दोहे-(५)
नेता कहते पूत से प्रजातंत्र को मूल ।
फूल सूल में भेद नहि बको उलूल-जुलूल ।।
हमको कुछ नहि हरज है देश जाय जो भाड़ ।
यसकेपी नेता नहीं हम हैं देश उजाड़ ।।
विरोधी को न छाड़िये बहुत उछालो कीच ।
यसकेपी सोते रहो पाँच साल के बीच ।।
जागो बेटा उस समय साल जाय जब बीत ।
यसकेपी कुछ भी करो होय चुनावीं जीत ।।
दुश्मन अपना को नहीं नहि कोई है मीत ।
यसकेपी कुर्सी बचे यही हमारी नीत ।।
तंत्र मंत्र फैलाय के जीतो अवसि चुनाव ।
यसकेपी लूटो देश को अगर लगे जो दाव ।।
राजनीति को छोड़कर बाकी सब बेकार ।
यसकेपी क्या चूकना कर सपना साकार ।।
पढ़े-लिखे बहु घूमते आते अपने पास ।
यसकेपी किरपा करो कहते बहुत उदास ।।
अधिकारी जितने बने सब अपने अधिकार ।
यसकेपी हम तस करें जस चाहें व्यवहार ।।
हम हैं राजा आज के औरन जानों दास ।
यसकेपी हम देश में करते अधिक सुपास ।।
नेता बनि भरि लीजिए यसकेपी भंडार ।
जनसेवा यह ही बड़ी बिना किए धिक्कार ।।
कोठी हो हर शहर में हर कोठी में कार ।
यसकेपी सेवा यही करत लगे नहि वार ।।
बिजली विल या फोन विल को नहि कोई भार ।
यसकेपी को का करी हम भारत सरकार ।।
सेवा से मेवा मिलै कही कहावत जात ।
जनसेवक सब जानते यसकेपी यह बात ।।
याते ही नेता लगे जनसेवा दिन रात ।
यसकेपी सब मिलि करैं पूत पतोहू नात ।।
नेता खोये होश सब खोज रहे बहु दाम ।
जनता की रक्षा करें यसकेपी के राम ।।
राम रखे यह देश है राम करैं कल्यान ।
यसकेपी सच ही कहा अपना देश महान ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ. प्र.) ।
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