रचनाकार

25 हजार + रुपए के रचनाकार.ऑर्ग संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन 2018 के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित

अद्यतन # 1 - पुरस्कारों में इजाफ़ा - प्रज्ञा प्रकाशन की तरफ से पुस्तकें पुरस्कार स्वरूप दी जाएंगी. विवरण जल्द ही. अद्यतन # 2    - चुनिं...

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 43 : उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन // अमित शर्मा

प्रविष्टि क्र. 43 उन्मुक्त आकाश में परिंदों की उड़ान सा बचपन अमित शर्मा बचपन ज़ीवन का सबसे खूबसूरत दौर होता है। गौर करने वाली बात यह है कि केव...

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 42 : बगुला // नवल पाल प्रभाकर

प्रविष्टि क्र. 42  बगुला नवल पाल प्रभाकर आज सुबह ही मैंने सोचा था कि आज पम्प हाऊस पर चलना हैं क्योंकि मैं महीने में एक या दो बार हाऊस पर जर...

पाद टिप्पणी // डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

कहाँ कहाँ, कितने कितने, कैसे कैसे तो पाद हैं ! ऋषि पतंजलि ने अपने योग दर्शन को चार भागों में विभक्त किया है – समाधि पाद, साधन पाद, विभूति पा...

रामानुज श्रीवास्तव अनुज की 5 ग़ज़लें

..........(01) टूटे हज़ार बार जुड़े जिंदगी से हम। लगने लगे हैं फिर से किसी आदमी से हम। उठता है दर्द जब भी जिगर के करीब से, आँखों को पोंछते हैं...

महाभारत पर एक दृष्टि // श्री आनन्द किरण

  भारतीय इतिहास का सबसे मूल्यवान एवं सभ्यता का मजबूत साक्ष्य महाभारत ग्रंथ है। इसकी रचना कृष्णद्वैपायन व्यास द्वारा की गई थी। इसका प्रारंभिक...

भूमण्डलीकरण के दौर में भाषाओं पर बढ़ता खतरा // आकांक्षा यादव

अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी पर विशेष    भूमण्डलीकरण , उदारीकरण, उन्नत प्रौद्योगिकी एवं सूचना-तकनीक के बढ़ते इस युग में सबसे बड़ा खत...

व्यंग रचनाओं का अव्दितीय संग्रह है `मेथी की भाजी और लोकतंत्र`

व्यंग संग्रह - `पुन: पधारें`, `सूत्रों के हवाले से`, कविता पुस्तिका - `धूल और धुएँ के परदे में, `चिड़िया का सितार`, कविता संग्रह - `इस गणराज...

सुशांत सुप्रिय की तीन लघु-कथाएँ

1. धूप ---------- --- उदास-सा मैं इंडिया-गेट के मैदान में चला आया था । कुछ जोड़े किनारे की घास पर बैठे थे । किशोर मैदान में क्रिकेट खेल रहे ...

संस्मरण लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 41 : उसने कहा था // अशोक कुमार शुक्ला

प्रविष्टि क्र. 41 उसने कहा था अशोक कुमार शुक्ला वह जमाना सामाजिकता का था। आस पड़ोस के लोग घंटों एक दूसरे के पास बैठा करते थे। यह तो याद नहीं...

कहानी // अधूरी जिन्दगी // डॉ. विजय कुमार शर्मा

उस रात बादल फटा। मानो वह जलभार से असहाय होकर धैर्य खो बैठा हो भूमि को ढूँढ़-ढूँढ़ कर वर्षा के तीरों से भेदना आज उसे अपना कर्तव्य लग रहा था। अच...