रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

रचनाकार

Latest Post
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

image

16 जुलाई, 2017 रविवार को नगर पालिक निगम, राजनांदगाँव, के सभागार में ’साकेत साहित्य परिषद् सुरगी’ का 18 वाँ वार्षिक साहित्य सम्मेलन, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन तथा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, के सहयोग से संपन्न हुआ। तीन सत्रों में आयोजित इस सम्मेलन के प्रथम सत्र में ’छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों का सांस्कृतिक अवदान’ विषय पर परिचर्चा हुई तथा ’साकेत स्मरिका’ का विमोचन किया गया जिसमें दुर्ग, बालोद एवं कवर्धा जिले के साहित्यकार बड़ी संख्या में उपस्थित थे। सत्र का संचाालन साहित्यकार कुबेर सिंह साहू ने किया।

अपने आधार वक्तव्य में श्री यशवंत ने कहा कि - कुछ दशक पहले तक लोकसंस्कृति धन अर्जित करने का साधन अथवा आजीविका का साधन कभी नहीं रही है। और तब तक यह लोक की अभिलाषाओं और आकांक्षाओं को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करके लोक अस्मिता को सुदृढ़ करता रही है। लोक को जीवनी शक्ति देता रही है। परंतु अब, जबकि इसमें ह्रास और विकृति पैदा करनेवाली, आज के लोककलाकारों की पीढ़ी, यश और धन की चाह में परंपरा से अर्जित लोक संस्कृति को, लोक साहित्य को बाजार के हाथों बेचने पर उतारू हुई है, अपसंस्कृति का दौर शुरू हुआ है। या तो इस परिवर्तन को परिवर्तनशील समाज की इच्छा मानकर मौन साध लें अथवा अपसंस्कृति पैदा करनेवाली बाजार निर्मित सेल्फी संस्कृति से बचने का कुछ तो प्रयास करें। सत्र को सभी साहित्यकारों ने छत्तीसगढ़ी भाषा में संबोधित किया।

अपने उद्बोधन में लोककला के प्रकांड विद्वान तथा लोककला मंच ’दूध मोंगरा’ के संस्थापक-संचालक डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में स्थापित और संचालित सभी लोककला मंच, दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित प्रथम छत्तीसगढ़ी लोककला मंच ’चंदैनी गोदा’ से प्रेरित और अनुप्राणित हैं। चंदैनी गोंदा द्वारा स्थापित आदर्श ही समस्त छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों का आदर्श है। यह आदर्श छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा का आदर्श है जो उसकी आत्मा है। छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा का इतिहास छत्तीसगढ़ के रामगढ़ में स्थापित विश्व के प्रथम नाट्यशाला के इतिहास से भी प्राचीन है, क्योंकि रामगढ़ में स्थापित विश्व के प्रथम नाट्यशाला का इतिहास भरतमुनि के नाट्य शास्त्र के बाद प्रारंभ होता है परंतु छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा तो लोक की कृति है और कहना न होगा कि लोक और उसकी परंपराएँ पहले आती है, शास्त्र बाद में। दुख की बात है कि वर्तमान में लोककला मंचों में द्विअर्थी संवादों और बाजार की संस्कृति ने प्रवेश करके इसे विकृत करना शुरू कर दिया है। समय के अनुरूप परिवर्तन मानकर इस अश्लील अपसंस्कृति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस सत्र के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सदस्य आदरणीय डाॅ. गणेश सोनी ’प्रतीक’ ने कहा कि - केवल हमार ममतामयी, गुरतुर छत्तीसगढ़ी महतारी भाखाच् ह आज लोककला मंच मन ल अपसंस्कृति से बचा सकथे। येकर खातिर हम सब लोकलाकार अउ साहित्यकार मन ल येला चुनौती मान के, ईमानदारी के संग अउ संकल्प लेके के काम करे जरूरत हे।

सत्र के अध्यक्ष प्रो. डॉ. नरेश कुमार वर्मा ने कहा कि - छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों के सांस्कृतिक अवदानों को रेखांकित करने का प्रयास पहले से चल रहा है परंतु इस संबंध में कोई उल्लेखनीय प्रगति दिखाई नहीं देती। आज ’साकेत साहित्य परिषद् सुरगी’ ने इस विषय को प्रमुखता के साथ साहियिक मंच पर उठाया है, इसके लिए यह परिषद् बधाई का पात्र है। इस सत्र में साहित्यकार आ. सरोज द्विवेदी, प्रसिद्ध कहानीकार कैलाश बनवासी, ’कलापरंपरा’ के संपादक डी. पी. देशमुख, तथा साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

सम्मेलन के दूसरे, सम्मान, सत्र के मुख्य अतिथि राजनांदगाँव संसदीय क्षेत्र के पूर्व सांसद तथा नगर पालिक निगम राजनांदगाँव के महापौर, जन-जन में लोक प्रिय, जन-जन के नायक, मधुसूदन यादव थे। सत्र में उनके उद्बोधन की साहित्यिक शैली से उनकी साहित्यिक प्रतिभा के दर्शन हुए। महापौर मधुसूदन यादव ने कहा कि - आज जन सेवा के प्रतिमान बदल चुके हैं। जनता से कटकर आप जन सेवा नहीं कर सकते। साहित्य भी जन सेवा का ही साधन है। आप सब साहित्यकारों से अनुरोध है कि साहित्य को जनोपयोगी बनाने के लिए आप जन से जुडकर एक नये प्रतिमान साहित्यिक की स्थापना करें। इस सत्र में महापौर मधुसूदन यादव ने जिले के व्यंग्यकार गिरीश ठक्कर ’स्वर्गीय’, पत्रकार प्रकाश साहू ’वेद’ तथा लोककलाकार दिनेश साव को ’साकेत सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मेलन के अंतिम सत्र में उपस्थित कवियों ने काव्य पाठ किया।

निवेदक - कुबेर

000

image

आज जब मैं नरेंद्र श्रीवास्तव जी की पुस्तक बारहमासी (बच्चों की कवितायेँ ) की समीक्षा लिखने बैठा तो बाल-साहित्य के बारे में प्रख्यात गीतकार और शायर गुलज़ार की एक बात मेरे जेहन में गूंजने लगी कि, ‘अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसका आनंद बच्‍चे से ले कर बड़े तक ले सकें। जिस प्रकार बाल कविताओं को रचने के लिए खुद को बच्चा बनाना पड़ता है ठीक उसी प्रकार बाल कविताओं के लिए भी बच्चों का मनोविज्ञान समझकर बिल्कुल सीधी और सरल भाषा में रोचकता का आवरण लिए बाल कवितायेँ रची जानी चाहिए। नरेंद्र जी ने बहुत ही सरल भाषा में इन कविताओं की रचना की है जो उनकी साहित्यिक परिपक्वता को परिलक्षित करती हैं।

नरेंद्र जी ने इन कविताओं के माध्यम से ,बच्चों को इस विरासत का महत्व जानने व उसका आनन्द लेने के लिए तथा हमारे देश की भाषाओं, इतिहास और संस्कृतियों के प्रति अपनेपन का भाव साझा करने का अप्रितम प्रयास किया है ।हम सभी को अपने बचपन में सुनी कुछ कहानियों और कविताओं की याद आती है वो हमारे अंतर्मन में इतने गहरे पैठीं हैं कि लगता है वो हमारे जीवन का एक हिस्सा है । सद्व्यवहार के संबंध में या नैतिक संदेश या चेतावनी देने वाली लोक-कथा अथवा स्कूल के खेल के मैदान में सुनाई गई कोई कविता आज भी हमारे आचरण का हिस्सा बनी है ।हमने शायद किसी क़िताब में कभी पढ़ें बिना - इन कहानियों या कविताओं को घर पर, समुदाय और स्कूल में सुन कर सीखा होगा। और इन लोक कथाओं और कविताओं से लगता है हमारा जन्म जन्मांतर का रिश्ता हो। दरअसल, बाल साहित्‍य का उद्देश्‍य बाल पाठकों का मनोरंजन करना ही नहीं अपितु उन्‍हें आज के जीवन की सच्‍चाइयों से परिचित कराना है। आज के बालक कल के भारत के नागरिक है वो जैसा पढ़ेंगें उसी के अनुरुप उनका चरित्र निर्माण होगा।

नरेंद्र जी ने कोशिश की है कि वो सरल भाषा में ऐसे बल साहित्य का सृजन करें जो बच्चों को मनोरंजन के साथ साथ देशप्रेम और नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाये। उनकी बाल कवितायेँ "जग में नाम कमाओ" "कहा बड़ों का माने " "आज़ादी के मतवाले "जैसी कवितायेँ चरित्र निर्माण और देशप्रेम की शिक्षा एवं सन्देश देती हैं।

'मातृभूमि के लिए लड़ेंगें

तन मन अपना न्यौछावर कर।

पीठ कभी न दिखलायेंगें

युद्धभूमि में आगे बढ़ कर।

बालक जीवन की अनमोल निधि होता है। बच्चे स्वभाव से सहज, सरल, सरस, जिज्ञासु, उत्साह से भरा, कल्पना की पंख लगाकर पूरी दुनिया की सैर करने वाला तथा मौलिक रचनात्मकता से भरा होता है। बच्चों के इसी कोमल मन को चित्रित करती उनकी एक कविता "चंदा मामा तुम प्यारे हो "की कुछ पंक्तियाँ

चंदा धीरे धीरे है चलता

रुके नहीं ,न है थकता।

चंदा का नीला आसमान।

खूब खेलने का मैदान।

बच्चों का मन हमेशा एक खोजी अन्वेषक की तरह है, जो हर समय क्रियाशील एवं सचेत रहता है। इसलिए हिंदी बाल कविता की पहली कोशिश यही रहनी चाहिए कि कोमल मन मस्तिष्क वाले बच्चों को प्यार भरी लुभावनी दुनिया में ले जाएं। नरेंद्र जी की कविता "ऐसा मौका आये "बच्चों के मन को विश्लेषित करती है।

पापा बोले प्यारे बेटा !

जब भी ऐसा मौका आये।

जोखिम लेकर निर्णय करो

मन को जो भी भायें।

इन बाल कविताओं में नरेंद्र जी ने सामाजिक सरोकारों की बात बहुत सहज तरीके से उठाई है। नरेंद्र जी का मानना है कि भले ही हमने हजारों हजार स्कूल, मदरसे, कॉलेज, विश्‍वविद्यालय, संग्रहालय, पुस्तकालय, अप्पूघर, पार्क, मैदान, बाग-बगीचे स्थापित कर लिए हों इसके बावजूद एक बड़ी शर्मनाक बात है कि हमारे लाखों करोड़ों नन्हे-नन्हे बच्चे काम करने को विवश हैं । कुछ पीठ पर अपने से बड़ा बोरा लटकाए कूड़े के ढेर में रोटी तलाश रहे हैं, कुछ होटल में कोमल-कोमल हाथों से बरतनों को चमका रहे हैं, कुछ अपनी कमीज खोलकर ट्रेन का फर्श या लोगों के जूते साफ कर रहे हैं तो कोई दन-कालीन, माचिस, बीड़ी-सिगरेट, पटाखे, बल्ब-ट्यूब या चूडि़याँ बनाने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं, कुछ गोबर, लीद ढूँढते रहने के बाद अंधेरे में दुबक रहे हैं । उन्होंने उस तबके की नींद की फिक्र की है, जिसके जिंदा होने तक की फिक्र समाज को नहीं होती! जैसे मानसिक विक्षिप्त बच्चे , भिखारीबच्चे , एड्स-रोगी बच्चे,बाल मज़दूर आदि।"छोड़ कर चिंता साडी " 'देखा संग में सपना "और ये मैंने रुपये जोड़े "कवितायेँ बच्चों के सामाजिक सरोकारों को आवाज़ देतीं हैं।

इन कविताओं में संगीतबद्धता नहीं है, पर शब्दों में प्रेम की वही गर्माहट है जो मां की सुरीली आवाज में होती है. वही शब्द हैं जो दिनभर में मिली थकान और जिल्लत को पोंछकर प्यार की थपकी दे सकें। इन कवितों में भोलापन है ,इनमे प्रेम ,वात्सल्य और भविष्य की आशाएँ पल्ल्वित हैं।

सबसे पहले उठ जाती मम्मी

सबको चाय पिलाती मम्मी।

खेल खिलोने टाफी बिस्कुट

खूब प्यार जताती मम्मी।

एक तरफ हम अपने बच्चों से इतना सारा प्यार करते हैं। उन्हें दुनिया की हर ख़ुशी देना चाहते हैं। उनके सामने भौतिक संसाधनों का अम्बार लगा देना चाहते हैं। उनके लिए संपत्ति और धन का सारा संकेन्द्रण कर देना चाहते हैं। और इस कथित प्यार को देने के लिए दुनिया भर में मार काट मचाते हैं, युद्ध लड़ते हैं, दंगे करते हैं। नैतिक-अनैतिक हर तरह का व्यवहार करते हैं। इन्हीं भावों से ओतप्रोत नरेंद्र जी की बाल कवितायेँ "शुभ हो मंगलदायक हो " "चालक लोमड़ी " "गाँधी जी " बच्चों एवं बढ़ो के बीच मधुर सम्बन्धों और संस्कारों का सन्देश देती हैं।

आज का समाज अतिव्यस्तता से भरा हुआ है। किसी के पास अपने बच्चों तक के लिए समय नहीं है। उनकी मीठी-मीठी तोतली बोली का आनंद लेने की फुरसत किसी के पास नहीं है। नौकरीपेशा माता-पिता के बच्चे अकेलेपन के संत्रास से जुझते रहते हैं। नरेंद्र जी ने बच्चों की कोमल भावनाओं का मधुर चित्रण करते हुए इन्हीं संत्रासों को अपनी कविताओं में आवाज दी है। उनकी कवितायेँ "तितली रानी ' "एक का पहाड़ा "बेटा तुम इतना करना" नानी जी में इन्हीं मानवीय सम्बन्धों का चित्रण किया है।

बच्चे तरल पदार्थ की तरह है, जिसका अपना कोई स्वरूप नहीं होता, उसे जिस रूप में तथा जिस आकार में तैयार कर दे, वह वैसा ही स्वरूप धारण कर लेता है। इसी तरह बच्चे की आदत, स्वभाव, विचार तथा स्वरूप नहीं होता, उसे परिवार, समाज, परिवेश और संस्कार जिस साँचे में ढाल दे, वैसा ही बच्चों के व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारण हो जाता है। जब बच्चे को बड़ा होकर किसी भी कारण से तथाकथित कमतर या महत्त्वपूर्ण कार्य ही करना पड़ जाता हॆ तो वह हीन भावना से ग्रसित रहता हॆ। कुंठित हो जाता है इन्हीं भावों को व्यक्त करती उनकी कवितायेँ "बच्चे पढ़ते मन लगा कर " 'छोड़ कर चिंता सारी " "हे प्रभु वर दीजिये" अंतर्मन को छूती हैं।

आज बाल साहित्य पर लेखन बहुत कम हो रहा है और जो हो भी रहा है वह बच्चों के समयानुकूल नहीं है इस सम्बन्ध में दिविक रमेश के एक आलेख का अंश उद्धृत करना चाहूंगा "वस्तुत: आज हमारे बाल-लेखकों की पहुंच ग्रामीण और आदिवासी बच्चों तक भी सहज-सुलभ होनी चाहिए। भारतीय बच्चों का परिवेश केवल कम्प्यूटर, सड़कें, मॉल्ज, आधुनिक तकनीकी से सम्पन्न शहरी स्कूल, अंतर्राष्ट्रीय परिवेश ही नहीं है ( वह तो आज के साहित्यकार की निगाह में होना ही चाहिए), गांव-देहात तक फैली पाठशालाएं भी है , कच्चे-पक्के मकान-झोंपड़ियां भी हैं , उन के माता-पिता भी हैं , उनकी गाय-भॆंस-बकरियां भी हैं ।प्रकृति का संसर्ग भी है। वे भी आज के ही बच्चे हैं। उनकी भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए जो कि दिख रही है।"

आज के वैश्विक दौर में बच्चों और बड़ों के बीच अंतर करना बहुत मुश्किल हो गया कभी कभी तो बच्चों का व्यवहार बड़ों से भी ज्यादा गंभीर लगने लगता है ऐसी स्थिति में बाल साहित्यकार के सामने न केवल बच्चे के बचपन को बचाए रखने की चुनौती है बल्कि अपने भीतर के शिशु को भी बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। नरेंद्र श्रीवास्तव जी की यह पुस्तक "बारहमासी "बच्चों और बड़ों के बीच में एक स्पष्ट लकीर खींचती है। इस बाल साहित्य के जरिये श्री नरेंद्र श्रीवास्तव अपने अंदर के बच्चे को बचाने में सफल हुए हैं। इस अमूल्य लेखन के लिए नरेंद्र जी साधुवाद के पात्र हैं।

--

पुस्तक का नाम -बारहमासी

लेखक -नरेंद्र श्रीवास्तव

प्रकाशक -पाथेय प्रकाशन जबलपुर

मूल्य -50 रूपये

image

जमीन और आसमान कहीं नहीं मिलता नहीं ऐसा तो नहीं है दृष्टि के अंतिम बिन्दु क्षितिज में तो मिलता दिखता है लेकिन ये तो आभास है । क्या ये आभास है ? पृथ्वी की सीमा पार करने पर तो पूरी जमीन सहित पूरी पृथ्वी ही आसमान की गोद में खेलती दिखाई पड़ती है। तो क्या इस आभासी दुनिया से सत्य जानने के लिए सीमाओं को तोड़ना होता है ? क्या हमेशा सच को जानने के लिए सीमाओं को तोड़ना पड़ता है? और फिर हमेशा सच को जानना जरूरी है क्या ?

अर्थव! अर्थव! मैं तुम्हें कब से आवाज दे रहीं हूं और तुम कहां खोये हुए हो ? देखो कनस्तर खाली हो गया है पत्नी अपर्णा की बात सुनकर अर्थव का ध्यान अब आसमान से खाली कनस्तर पर आ गया था। ऐसा अक्सर होता रहता था। हालांकि अर्थव जानता था कि कनस्तर खाली है फिर भी उसने उसे एक बार अन्दर तक देखा।

अब अर्थव कनस्तर को भरने के लिए बाहर निकलता है। बाहर सड़क पर टहलते टहलते अर्थव फिर विचारों में गुम हो गया । उसके खराब आर्थिक हालात ने उसे एक अच्छी चीज भी दी थी। वो यह कि उसका नशा उससे दूर करा दिया था। लेकिन आज भी वो कभी कभी सिगरेट पी लिया करता था। सड़क पर ही उसने किनारे पर पान की दुकान देखकर सिगरेट लेने का मन बनाया और जेब में हाथ डाला लेकिन जीन्स की जेब में कुछ भी नहीं था फिर उसने आगे पीछे सभी जेबों को कई बार देखा की कहीं एक भी सिक्का निकल आये पर कुछ भी नहीं निकला । पहले अर्थव खाली जेब देखकर थोड़ा मायूस हुआ फिर थोड़ा खुश भी कि चलो जेब खाली है लेकिन जेब तो है। उसे उसी दिन पता चला कि संग्रह करने की क्षमता भी खुशी प्रदान करती है। अर्थव के पास बस उतना ही पैसा था जिसमें कनस्तर भर सके और वो उसे अपने शर्ट की ऊपर वाली जेब में संभालकर रखा था। ट्यूशन पढ़ाकर खुद का खर्चा तो निकल जाता था लेकिन अपर्णा से शादी के बाद से हालात बिगड़ गये थे। अपर्णा ने परिस्थितियों के सामने सरेन्डर कर दिया था कि वो कॉपरेटिव थी ये तो पता नहीं लेकिन वो अर्थव से कभी कोई मांग या अतिरिक्त चीजों के लिए नहीं कहती थी। अर्थव खुद भी चाहता था कि अपर्णा उससे जिद करे और बोले कि ‘‘मुझे वो वाला टॉप चाहिये’’ या ’’देखो पड़ोसी ने ये ले लिया है तुम कब लोगे?’’ या ‘‘आज शहर में एक्जीबिशन लगी है घूमने चलते हैं।’’ लेकिन अपर्णा कभी कुछ भी नहीं बोलती थी सिवाय खाली कनस्तर के और कभी अर्थव की भी हिम्मत नहीं हुयी अपर्णा से ये सब पूछने की।

खैर अब पान की दुकान में अर्थव को कुछ मोहल्ले के लोग सिगरेट पीने के साथ गप लड़ाते दिख गये तो अर्थव भी सिगरेट के कुछ कश मारने के उद्देश्य से उनके बीच जाकर वार्ता में शामिल हो गया । पान की दुकानों की वार्ता हमेशा ही दिलचस्प हुआ करतीं हैं। उसमें से एक व्यक्ति ने पूछा ‘‘ अरे यार अब इतनी गर्मी तो हो गयी बरसात कब आएगी’’ तो उसका जवाब सामने वाले अपने आंखों के ऊपर भौहों के समानांतर हथेली लगाकर दक्षिण दिशा की ओर आसमान देखते हुये दिया ‘‘ अब मानसून आ रहा है।’’ लेकिन इस वार्ता से अर्थव को सिगरेट की एक कश मिल चुकी थी और अब वो भरा कनस्टर लेकर घर की ओर चल दिया। और फिर सोच में डूब गया वो जानता था कि भूख मुख्य समस्या नहीं है क्यों कि कई बार ऐसे हालात आ चुके थे कि अर्थव कनस्टर भरने में असमर्थ रहा था और उस समय अपर्णा के कुछ दोस्त काम आये थे। समस्या ये थी कि अर्थव के द्वारा वो कनस्तर कैसे भरा जाए? और अर्थव के स्वभाव की भी अपनी समस्या थी कि वो जानता था कि जब भी वह इस कनस्तर को भरने के बारे में सोचने लगता है तो वो उन तमाम चीजों से दूर होने लगता है जिसको देखकर अपर्णा ने उसे कालेज में प्रेम करना शुरू किया था। इन्हीं तमाम उधेड़बुन में चलते चलते अर्थव अपने घर पहुंचा जहां अपर्णा को पहले से ही उम्मीद थी कि अर्थव वापस आने में इतना ही समय लगाएगा। दोनों का जीवन बहुत स्थिर सा था। सिवाय ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों के सिवाय किसी का आना जाना उसके घर में नहीं था।

अपर्णा के पास कुछ चमकीले पत्थर, बालू में मिलने वाले छोटे छोटे शंख और कागज के हाथ से बनाए हुए कुछ टॉप्स थे जो कि खुद अर्थव ने अपर्णा के लिए कालेज में बनाए थे और पत्थर व छोटे शंख भी अर्थव ने ही अपर्णा को दिए थे।  आज भी जब अर्थव को ऐसे चीजें सड़क पर या कहीं मिल जाती थीं तब वह उसे अपर्णा को लाकर दे देता था। कई बार तो रंगीन पत्थरों की तलाश में नदी के तट तक भी चला जाता था।

अपर्णा अपने मौजूदा हालात के लिए कभी भी अर्थव को जिम्मेदार नहीं ठहराती थी और न ही उन हालात के प्रति कभी भी असंतुष्टि जाहिर करती थी, लेकिन सामने रहने वाली विभा और बगल वाली स्नेहा बार-बार उसको उसके इन हालात का बोध करा जाती थीं। इसलिए कहीं न कहीं अपर्णा भी अब इस विषय पर सोचने लगी थी। लेकिन उसने कभी अर्थव से इस विषय पर कुछ नहीं कहा क्यों कि वह उसके स्वभाव को शुरू से जानती थी। उसने अपनी हालात की चर्चा अक्सर उसके जरूरत पर काम आने वाले दोस्त सुयश से की। सुयश एक कम्पनी में इवेन्ट मैनेजर था हालांकि वो खुद भी बस किसी तरह ही एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर पा रहा था लेकिन उसने अपर्णा की मदद करने को बोला और अपने बॉस से बात की । उसके बॉस ने उसको इन्टरव्यू के लिए कॉल बुलाया। इन्टरव्यू पर आने के लिए फार्मल कपड़ों की व्यवस्था भी सुयश ने ही अपर्णा के लिए की,बॉस ने अपर्णा को बहुत गौर से देखा और बिना कोई खास प्रश्न किये ही बतौर रिसेप्शनिस्ट के तौर पर नियुक्त कर दिया। अपर्णा भी अपना काम बहुत मन लगाकर करने लगी बस कभी-कभी बॉस के कुछ ऐसे मजाकों से आहत हो जाती थी जो कि उसे पसन्द नहीं आते थे। ये बात वो सुयश से बताती थी, सुयश की भी हिम्मत कभी बॉस से बोलने की तो नहीं होती थी लेकिन वो कहता था कि अभी किसी तरह चलाओ फिर हम तुम दोनों कहीं और जॉब की जाएगी। मैं खुद भी यहां से परेशान हूं।

अब अपर्णा का ज्यादातर समय सुयश के साथ ही बीतता था और उसके घर के हालात भी पहले से बेहतर होने लगे थे। सुयश और अपर्णा ऑफिस में टिफिन साथ साथ करते थे। सुयश ने भी अब एक बेहतर जॉब अपने और अपर्णा के लिए खोज ली थी। बढ़ते हुयी दौड़-भाग को देखकर अपर्णा ने एक एक्टिवा खरीदी और बड़ी खुशी के साथ अथर्व को दिखाई । अथर्व भी उसको देखकर बहुत खुश हुआ लेकिन उसकी पहली सवारी के लिए जब अर्थव अपने शरीर को गतिशीलता देने ही वाला था कि अपर्णा सुयश को बैठाकर निकल गई। यह देखकर अथर्व कुछ देर सोचता रह गया फिर और फिर अपने जीवन में लग गया।

लेकिन अब घर में ज्यादातर बातें सुयश की होने लगी थीं। अथर्व भी देख रहा था कि अब उसके लाए गये पत्थरों व शंखों को संभालकर नहीं रखा जाता वे इधर-उधर बिखरे दिख जाते हैं। कभी भी अगल बगल के वातावरण और लोगों से प्रभावित न होने वाला अथर्व अब कहीं न कहीं अपनी तुलना सुयश से करने लगा और कभी-कभी देर रात से आने का कारण और ओवर वर्क करने का कारण अपर्णा से पूछ लेता था, जो कि वो इससे पहले कभी नहीं पूछा करता था। अब अथर्व को कहीं न कहीं ये बात महसूस होने लगी थी कि अपर्णा उसके प्रति उदासीन सी हो रही है। वो इसका कारण अपनी बेहद सीमित जरूरतों में भी खुश रहने को मानता था। इसलिए उसे लगने लगा कि अब उसे भी व्यवसायिकता की ओर बढ़ना चाहिए। अब वह अपने दोस्तों से मिलकर उनकी कोचिंग्स में पढ़ाने लगा तथा धीरे-धीरे व्यस्त रहने लगा। अब घर लौटने पर अपर्णा की मुलाकात बहुत कम अथर्व से हो पाती थी। अथर्व को भी अब इस व्यस्तता में आनन्द आने लगा था । अब उसका ध्यान भी नहीं जाता था कि उसके लाए गये पत्थर और शंख कहां रखे जाते हैं। और अब तो वह इन चीजों को लाना भी बन्द कर दिया था। उसे रंग-बिरंगे पत्थरों की तलाश में नदी तक गये कितना समय हो गया था, वो उसे खुद भी याद नहीं रहा। अब उसे सिर्फ और सिर्फ अपने व्यवसाय को प्रसारित करने की ही धुन सवार रहती थी। अब तो उसने खुद की एक कोचिंग भी खोल ली थी। अब न कभी अपर्णा के पास आफिस में अथर्व का ये पूछने के लिए कॉल आता कि ‘खाना खाया कि नहीं’ और न ही लौटने पर यह पूछा जाता कि ‘आज का दिन कैसा रहा?’ ये सब देखकर अपर्णा को भी लगने लगा कि अथर्व में अब अब काफी अन्तर आ गया है वो एक दिन ऑफिस न जाकर उसके लाए पत्थरों और शंखों को देखती रही । उसके कागज के बनाए टॉप्स को पहनकर उसके आने का इंतजार कर रही थी। अर्थव काफी देर के बाद घर लौटा और अपर्णा उसके पास उसके कागज के बनाए टॉप्स पहनकर गयी और पूछी कैसी लग रहीं हूं ? अथर्व ने भी जवाब दिया कि ‘हमेशा की तरह अच्छी लग रही हो।’ फिर अथर्व ने बोला अच्छा जल्दी से खाना खा लिया जाए निकलना है। तब अपर्णा ने बोला कि अरे कहां निकलना है आज हम आफिस नहीं गये हमने तो सोचा आज दोनों पूरा दिन साथ में बिताएंगे लेकिन तुम तो । अथर्व ने कहा नहीं फिर कभी अभी जाना है काम है।

तब अपर्णा बहुत गुस्सा हो गयी और बोली अरे अथर्व तुम्हें क्या हो गया मैं बहुत दिन देख रहीं हूं तुम अब पहले जैसे एकदम नहीं रहे जिससे मैंने शादी की थी। अर्थव कुछ नहीं बोला अपर्णा ने फिर जोर से बोला बताओ मैं तुम्हीं से पूछ रहीं हूं। तब अथर्व ने एक लंबी सांस ली और बस इतना बोला ‘‘क्यों कि अब क्षितिज नहीं दिखता’’। और कहते हुए चला गया।

---


सक्षम द्विवेदी।

रिसर्च इन इण्डियन डायस्पोरा, महात्मा गांधी इण्टरनेशनल हिन्दी यूनिवर्सिटी,महाराष्ट्र।

सम्पर्क : 20 नया कटरा दिलकुशा पार्क इलाहाबाद।

image

‘ लो पहन लो बहू !’ सासू माँ की सीलन भरी आवाज़ सुन मुड़ी, तो देखा !

वह अपने हाथों में बेरंग जीवन लिए खड़ी थीं। कैसे बताऊँ कि जीवन में रंग तो अब आया है , पर वो तो माँ थीं !

निकेत अब इस दुनिया में नहीं है। मुझे इस बात का डर कब से था पर नियति के आगे तो हम सभी विवश होते हैं।

आज भी वो पल आँखों के सामने छपाक –छपाक कर तैर रहे हैं। संगम में नहाते हुए निकेत ने किनारे पर बैठी मेरी डरी -सहमी एक जोड़ी आँखों की भाषा समझ यही कहा था - ‘ डरो मत , डूबूँगा नहीं , तुम्हारी आँखों में डूब - डूब कर तैरना जो सीख लिया है। ’ शरमाते –शरमाते बस मैं इतना बोल पायी थी , ‘चढ़ गयी है ज्यादा क्या ?’

सच भी यही था, जिससे मैं भाग भी नहीं सकती थी। कहते हैं , स्वीकार में हल छुपा होता है।

कई –कई बीत जाते दिन निकेत के प्यार भरे बोलों को तरस जाती थी ,कितनी पथरीली शामें चुभीं हैं अभी तक, ज़ेहन में। कितने सपनों का क़त्ल किया था तुमने निकेत ?

कोलोनी पार्क के पास बेहोश मिले थे तुम। ‘ओवरडोज़ ....’ बाबूजी बस इतना ही बोल पाये थे। मेरी सारी इच्छाओं,आशाओं को जैसे लकवा मार गया था उस दिन। किसको दोष देती, किसे कोसती ?आँख नहीं मिला पा रहे थे हम सभी किसी से। माँ ,बाबूजी तो जैसे जड़ ही होते जा रहे थे। थक चुके थे क्या करते भला ?दवा,दुआ ,प्यार ,मनुहार ,फटकार,दुत्कार के फूलों-पत्थरों को फेंकते –फेंकते मन की हथेलियों को मानो पक्षाघात हो गया था।

जानते हो ! दिया लेकर ढूँढा था पिता जी ने ये रिश्ता। खुश होती हुई अम्मा कितनी बार ,यही वाक्य दोहराती थीं। अम्मा, पिताजी के चेहरे की आलतायी तरंगें तुमसे थीं। तुम्हें पाकर जैसे दूसरा बेटा पा लिया था उन्होंने। गौर वर्ण ,सहज ,आकर्षक व्यक्तित्व। इन सात सालों में मुश्किल से तीन-चार बार वो लोग तुमसे मिले होंगे। पर मैं उन्हें रोज उसी निकेत से मिलाती रही, जिसे उन्होंने सगाई वाले दिन देखा था। यही सब सोच कि उन्हें यह जानकर कष्ट होगा , कभी अपने दुखों की आँच को उन तक नहीं पहुँचने दिया।

मुझे भी कहाँ भूल पाया है वो सगाई वाला निकेत। झुकी, शरमाई आँखें ,सहज व्यवहार। मैं तो मिट ही गयी थी, पहली नज़र में। पर वो संतुलित क्षणबीज , कितने असंतुलित पलों की क्यारियाँ सजा रहे थे क्या पता था ?

याद है जिस दिन मैंने पहली बार वाईन की बोतल तुम्हारे कार में देखी थी ! ‘बस कभी -कभार ले लेता हूँ ,पार्टी -शार्टी में यार ! क्यों चौंक रही हो इतना ,तुमसे ज्यादा नशा शराब में नहीं है, और क्या कमी कर रखी हैं मैंने, ठाट -बाट में तुम्हारे। ’ कहकर मुझे चुप करा दिया था तुमने।

दुःख होता है। काश! उस दिन चिल्ला- चिल्लाकर सब बता देती, दोनों घरों की दीवारों और आँगन को। पर नहीं ,नहीं था इतना साहस। एक मर्यादित रिश्ते को तार - तार करने का। नहीं थी इतनी विद्रोही कि त्याग देती तुम्हें। नही थी इतनी समर्थ की चली जाती अकेले मायके। कि लो ! लौट आई तुम्हारे घर की शान ,उतारो आरती !बँटवा दो पूरे मुहल्ले में रेवड़ियाँ ! छुपा लो अपना दमकता चेहरा समाज से !

बस जिस पल बोलना था मन और जुबान ने साथ नहीं दिया। मुकर गए सभी, नियति की घुड़की से। अपने ही अस्तित्व से इतना अजनबीपन ,शरीर और संवेदना दोनों स्तरों पर। काश ! तुम जान पाते निकेत , एक लड़की बचपन से जब भी भावुक पलों को जीती है, उन सपनों में उसका एक राजकुमार भी शामिल होता है। गुड्डे से लेकर राजकुमार को खोजने की लम्बी काल्पनिक यात्रा, मेरे भी मन ने की थी , पर उस यथार्थ के निशान अम्मा के माथे और पिताजी के तलवों पर पड़े थे। कितने रिश्तों को दरकिनार कर तुम चुने गए थे।

‘राजयोग पड़ा है तेरी कुंडली में। देख ! कैसा लड़का ढूँढ निकाला हमने और जीजा जी ने मिलकर, अपनी प्यारी भांजी के लिए ’ मामा की आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है। अच्छा हुआ यह सब देखने से पहले ही मामा ....।

मैं आज तक नहीं समझ पायी कि नशे में ऐसा क्या है, जो अपनों से बेहतर होता है। लानत है ऐसी सुरसा प्यास पर, जो जीवन-सरिता को मरुस्थल बना दे ! एक आभासी संसार रचकर उसे जीते जाना ,ज़िन्दगी है भला ? अपनेपन की मिठास का सुख, चेतना से ही प्राप्त होता है।

शराब की एक - एक बूँद तुम्हारे साँसों की लय को तोड़ रही थी निकेत। काश तुम ये समझ पाते ! मेरी उम्मीदों के साथ, कितनी उम्मीदें जुड़ी थीं। सपनों के कितने गुलदस्ते ,तुम्हारे नशे की सावनी फुहारों से मुरझा गये,

जीवन की विडम्बना नहीं तो और क्या बोलूँ इसे ? तुम्हारे पाँव में प्लास्टर था, तेज बुखार से सारा शरीर तप रहा था और ऊपर से तुम्हारी जिद .....रात के नौ बजे, हाँ ! अकेले बाज़ार, वो भी शराब लाने। मैं अकेली,लोग क्या कहेंगे, पति के लिए शराब लेने आयी है या ....सारी आशंकाओं के बावज़ूद उठ गए थे मेरे कदम। ले आई थी उस रात ज़हर की बोतल। भूल पाऊँगी कभी निकेत ? जिस बेटी को बाप ने शराब शब्द बोलने पर कभी चाटा मारा था, वही बेटी शराब की बोतल खरीद कर ले आयी। सुन लेते तो, घटश्राद्ध कर देते अपना। ना ही याद आयें वो पल तो ठीक है......।

धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आया, जब मैं तुम्हें, तुम्हारे उसी रूप में स्वीकार चुकी थी। जैसे तुम थे। और मैं इस बात से खुश हो जाती थी कि, तुम शराब पीकर घर आये हो। कितना प्यार बरस जाता था सावन-भादों - सा। दरवाजा खोलते ही निकेत मुझे बाहों में भर लेते। मेरे घने लम्बे बालों को, जिन्हें पूरे होशोहवाश में , कभी कैंची से कुतर दिए थे। वही कुतरे बाल नशे में धुत होते ही लहराती नागिन लगने लगते निकेत को , उन्हीं पर शायरियाँ भी कहने लगते। सूख चुके पपड़ाये होंठों को गुलाब की पंखुडियां और बेतरतीब - सी बंधी साधारण कॉटन साड़ी में भी, मैं निकेत को ‘इज़ाज़त’ और ‘घर’ वाली रेखा ही नज़र आने लगती।

जब निकेत होश में होते तो सजने का मतलब क्या ?और जब नशे में होते, तो बिना सजे भी , मैं उन्हें कातिलाना ही लगती।

जीवन की इन्हीं विडम्बनाओं ने सिकोड़ दिया था मुझे। मैं सजना भूल चुकी थी। अब तो बस शाम को निकेत के लड़खड़ाते क़दमों की आहट ही मेरे गृहसुख का पर्याय थी। इसी को मैंने जीवन का सच मान, स्वीकार लिया था।

मेरी उबड़ -खाबड़ नींदों ने दिव्यांग स्वप्नों को ही ,ऊँची -लम्बी कूद करने की इज़ाजत दे दी थी। अब तो निकेत जितनी देर नशे के आगोश में रहते ,समय और जीवन दोनों शान से चलते। सुबह चढ़ते सूरज के साथ, निकेत का ढलता नशा कहर ढाता था। चीखना, चिल्लाना ,बर्तनों की तोड़ –फोड़ उफ़्फ़ ! कभी -कभी जी में आता शराब में ही चाय की पत्ती , चीनी उबालकर पिला दूँ।

‘बोलो आज क्या चाहिए ,आज जो भी बोलोगी दे दूँगा मेरी जान। ’ मैं गुस्से से बोल पड़ी थी – ‘ज़हर पिला दो मुझे !’मेरी आँखों में उतर आये कुहासे को अपने हाथों से साफ़ करते हुए निकेत ने मेरे गालों पर हलकी - सी चपत देते हुए कहा था -‘चुप कर पगली ! तुझसे पहले मैं ना खा लूँ ज़हर। आज के बाद फिर कभी ऐसा मत बोलना। मैं तुम्हारे रेशमी एहसासों के बिना जी पाऊँगा क्या ?’

‘तो फिर ये पीना बंद कर दो। ’ मेरी ऐसी हिदायत सुनकर बोलते –‘मुझे छोड़कर ये शराब नहीं जी पायेगी मेरी जान !’ और ऐसा कहते हुए निकेत के लड़खड़ाते ठहाके, पूरे घर में गिरने -सँभलने लगते।

इन्हीं पतझड़ पलों को समेटती हुई जी रही थी, निकेत के साथ। ऐसा लगता था मानो दुःख की गीली ज़मीन पर कोई आग रख जाता है रोज ,जिनमें भभक कर ना जाने कितने अंकुरित स्वप्न ,प्रश्न और इच्छाएँ भस्म हो जातीं थीं। माँ अक्सर दुआओं की लम्बी फेहरिस्त भेजतीं रहती थीं। तिनका -तिनका विलीन होता सुख उन्हें कहाँ सम्हाल पाता भला ?

और एक दिन जब भैया ने पिताजी को बताया कि निकेत बहुत पीने लगा है, तो उन पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा।

भैया ने समझाया भी की कोई बात नहीं, लिमिट में रहकर पिए तो क्या बुरा ? पर लाख समझाने के बावजूद .....पिताजी अब पहले वाले पिताजी कहाँ रहे थे ? अपराधबोध की जो तख्ती उन्होंने अपने गले लटका ली थी पीड़ादायक थी। आज भी नहीं जानती कि भैया को निकेत के पीने की बात कहाँ से पता चली। पर ये जान गयी कि नियति हवाओं से भी अपना काम निकलवा लेती है।

अब तो पिताजी और भैया मुझे लेकर अक्सर आपस में उलझ जाते, ‘कमाता तो है ना पिताजी ,अब ये तो सुविधि के ऊपर है कि कैसे उसे पीने से रोक पाती है ! पत्नी अगर चाहे तो ........हुंह दिन भर बेटी का रोना लिए बैठना कहाँ तक उचित है ? नहीं निभ रही , तो अलग हो जाये। आये दिन का स्यापा ख़त्म। ’

मुझे याद है ! मायके में जब भी भैया और भाभी मेरी नरक होती ज़िन्दगी के गुणा - गणित में उलझते तो दादी अक्सर वो दर्दभरा लोकगीत गुनगुनाने लगतीं - “माता के रोये से नदिया बहत है ,बाबुल के रोये सागर पार , भैया के रोये से टूका भिजत है, भौजी के दुई –दुई आँस.......।

बेटी के लिए अपने ही घर में भावों और आँसुओं का ऐसा बँटवारा .....! सुनकर ,झीने चादर -सा मन निचुड़ जाता।

‘एक बच्चा हो जायेगा तो सब सही हो जायेगा। ’ लोगों की ऐसी बातें सुनकर गठिया लेती। आखिरकार ! ढेर सारी गांठों ने मेरे संकल्पों की चादर को फटने पर मजबूर कर दिया।

अविक को मेरे आँचल में आये पाँच साल हो गया था , पर पुत्रमोह भी निकेत को उसके संकल्पों से ना डिगा सका।

“भला बताओ कैसे दूँ ये ज़हर ,अपने हाथों से तुम्हें निकेत ?सिर्फ़ इसलिए कि मुझे अपने प्यार भरे सार्थक पल चाहिए। नहीं –नहीं ! मैं इतनी स्वार्थी नही हो सकती। तुमसे मिली उपेक्षा ,झिड़कियां भी तो प्यार ही हैं मेरे लिए !”

2 अप्रैल , अविक का जन्मदिन ,बहुत संतुलित कदमों और आवाज़ों को बुलाया था। चैत्र नवरात्रि चल रहा था ,पूरे दिन निकेत के लड़खड़ाते क़दमों की प्रार्थना की। भगवान ने सुन ली, नशे में बहके निकेत के संग पूरी पार्टी कब बीत गयी, पता ही ना चला। अब तो मुझे नशे में डूबे निकेत की आदत हो गयी थी। संवेदनाओं का अथाह सागर था मेरे पास , जिसमें मैं गोते लगाती रहती थी। मन बुद्धू -सा महसूसता, मानो दुनिया का सबसे अच्छा पति भगवान ने मेरी ही कुंडली के सप्तम भाव में डाल दिया है।

‘तो क्या और कोई उपाय नहीं बचा ?’ बाबू जी ने डॉक्टर साहब से यह पूछते हुए थूक को सूखते हलक से नीचे उतारा। ‘पूरे शरीर को ख़त्म कर रहा है धीरे –धीरे ये ज़हर ..’ बुदबुदाते हुए बाबू जी कमरे से बाहर चले गए थे। और निकेत की मुखाग्नि के बाद से आज तक , हम दोनों एक- दूसरे के सामने जाने की हिम्मत नही जुटा पाये।

कैसे बताती उन्हें कि मैंने मार डाला उनके बेटे को ! क्या कोई औरत इतनी क्रूर भी हो सकती है ? आज मैं खुद से भी तो यही सवाल करती हूँ ! सिर्फ़ सुकून के दो पल और निकेत का प्यार, यही पाना था ना मुझे, बस....!

बिना नशे के निकेत की वहशियाना हरकतें अपनी हदें पार कर जातीं थीं। जो भी थोड़ा -बहुत सुख सहेजा, वो तो नशे में बहके हुए निकेत से मिला उपहार था। और मैं अभिशप्ता, अपने जीवन -अलाव को गर्म रखने की चाह में ,छाँव उपजाने वाली टहनियों को ही झुलसाये जा रही थी।

मेरे पूरे शरीर पर निकेत के हैवानियत की कितनी तूलिकाएं सजी हुई हैं। और उस दिन तो निकेत ने मुझे कुलटा ही करार दे दिया ,जिस दिन अविक ने उनकी गोद में जाने से मना कर ,हमारे यहाँ किराये पर रहने वाले भाई साहब के साथ पार्क में चला गया था। बार –बार पिघलते काँच सरीखे निकेत के वो अपमानजनक शब्द – ‘मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि ये मेरा बेटा है सुविधि ....’ मुझे भावशून्य बना गए ,मैं स्तब्ध थी। कुछ भी ना बोल सकी। मानो मेरे चिंतन से उत्पन्न नवजात शब्द, ज़ुबान तक आते - आते आत्मघात कर ले रहे हों।

कैसे बताती , अविक के स्कूल में लोकल गार्जियन भाई साहब ही हैं। जी में तो आया था ,चीख- चीख कर सारा नशा उतार दूँ उसी पल, निकेत का। पर घर –परिवार को सोच, चुप रह गयी थी .....मन में तो आया था बता दूँ ,कि जब तुम नशे के आगोश में समा चुके होते हो और अचानक घर में किसी की तबीयत ख़राब हो जाती है तब। सिलिंडर बदलना हो तब। तुम्हारी लड़ी –भिड़ी गाड़ी पार्क करनी हो तब। बाबू जी की डायलेसिस करानी हो तब .... और ना जाने कितनी-कितनी जिम्मेदारियाँ ....सब भाई साहब ही करते हैं। कहने भर को उनके परिवार नहीं है बस्स ! तुम्हारे शराबीपने ने उन्हें भी परिवार, उपहार में दे दिया है। और तो और अविक, एक शराबी बाप का बेटा होने की कितनी बड़ी सजा काट रहा है। काश ! तुम ये बातें समझ पाते निकेत !

एक औरत को शराब के नशे में धुत पाकर ,एक पति कब का तिलांजलि दे देता उसे, पर ये तो हमारे संकल्पों की गहरी नीवों ने मुझे अब तक टिकाये रखा है।

बस इन्ही मनहूस लम्हों के साये से खुद को ,अविक को बचाते- बचाते मैंने, तुम्हे हमेशा के लिए खो दिया निकेत !

मुझे माफ़ कर देना ! क्या करती, हमारे शादी की सालगिरह थी उसदिन। मैं तुम्हारे साथ अपने खूबसूरत पलों को जी लेना चाहती थी। क्या कहूँ ! मेरे जीवन की विडम्बना ....काश ! उस दिन तुम्हारा वालेट ना चोरी हुआ होता ! तुम आये भी तो, घर में तूफ़ान लेकर। मेहमानों ने आना शुरू भी कर दिया था। मैं तुमसे चुप होने की भीख माँगती रही। भैया –भाभी,बुआ सारे रिश्तेदारों के सामने बस अपने माँ -बाप की इज्ज़त बचाना चाहती थी। डॉक्टर के लाख मना करने के बावज़ूद मैंने पूरी बोतल तुम्हारे सामने रख दी। पता था, एक भी बूँद शराब की , कभी भी जहर बन सकती थी तुम्हारे लिए। कैसे कहती सबसे ,तुम्हारे लड़खड़ाते कदमों से ही मेरे संतुलित जीवन का राग जन्म लेता है। और हाँ ! मेरे स्वार्थी मन ने जी लिया उन पलों को, उस दिन।

जब तुम मुझे पहली बार इस घर में लाये थे तो मुझसे कहा था – “ मरते दम तक तुम्हे रानी बना के रखूँगा, और तुमने किया भी वही ! जी भर के सभी रिश्तेदारों के सामने मेरी तारीफ़ की। भाभी और बुआ जी का चेहरा तो देखते बन रहा था। बुआ जी तो भाँप भी ना पायीं कि तुमने पी रखी है। जाते –जाते सभी आशीर्वाद की भारी –भारी गठरियाँ भी गिरा गए। पर मेरी नियति के कमज़ोर कंधे उसे उठाने में समर्थ कहाँ थे निकेत ? चंद पलों में तुमने मुझे जीवन का वो सुख दे दिया,जिसकी शायद मैं पूरी तरह से हक़दार थी भी या नहीं !

जानते हो निकेत ! आज भाई साहेब भी कमरा छोड़कर जा रहे हैं, तुम्हारे शान्तिपाठ तक रुकेंगे बस।

क्यों ? ये प्रश्न पूछने का साहस नहीं मुझमें,किरायेदार हैं कहीं भी जा सकते हैं अपनी सुविधा से। पर उनकी पवित्र और निर्दोष आँखों में तुम्हारे लिए कोई शिकायत नहीं है। अविक को नहीं बताया है ,पूरा घर सिर पर उठा लेगा। बाबूजी बिलकुल शांत हैं,अंतिम महीने का किराया भी नहीं लिया भाई साहेब से, उन्होंने। ‘अविक के लिए दे रहा हूँ, रख लीजिये कहकर’ , मुझे देकर चले गये।

तुम तो चले ही गए थे निकेत और आज भाई साहब भी जा रहे हैं। एक –एक कर सबको जाना है...... रीचेबल ....नॉट रीचेबल। बस यही फर्क रहता है। एक अनकहा खालीपन रहेगा यहाँ। यादों की ना जाने कितनी बेतरतीब कहानियाँ रोज यूँ ही लिखती रहूँगी, पर भेज कहाँ पाऊँगी ? एक बात बोलूँ निकेत ! तुम्हारे जाने के बाद का सन्नाटा अंतिम सत्य की बुझ चुकी अनलशिखा से भी ज्यादा भयावह लगता है। और शोर से तो जैसे प्यार ही हो गया है अब। जीवन को स्वीकार ,आत्मसात करना पड़ता है, नये संकल्प -विकल्प तलाशने पड़ते हैं। बहुत कुछ है तुम्हारा दिया हुआ निकेत। चाहे शोर था या सन्नाटा सब स्वीकार है।

हुम् ....हरे रंग की कांजीवरम में देखना चाहते थे ना, मुझे तुम ! ये जानते हुए कि मुझे हरा रंग पसंद नहीं। सालगिरह वाले दिन भी मैं तुम्हारे वादे को पूरा ना कर सकी।

और आज एक अशान्त मन लिए तुम्हारे शान्तिपाठ में जाना है। जी में आता है आज तुम्हारे पसंद का रंग पहनूँ ......पर !

अचानक ! मैंने देखा कि अविक के नन्हे कदम हाथों में पार्सल लिए हुए मेरे कमरे की तरफ आ रहे थे। अविक के हाथों से पार्सल लेते हुए, माँ जी बस इतना बोल सकीं , ‘ निकेत ने ऑनलाइन ऑर्डर किया था बहू , तुम्हारे लिए........ हरी कांजीवरम ! ........ पर तुम्हे तो हरा रंग ....’। माँ जी की कंपकपाती आवाज़ को, बीच में ही काटते हुए मैं बोल पड़ी – ‘अब पसंद है माँ जी !’

पलट कर देख रही हूँ तो बिस्तर पर निकेत के पसंद की हरी कांजीवरम रखी हुई है। अविक के नन्हे –नन्हे हाथ उसकी परतें खोल रहे हैं।

‘ तुम परेशान मत होना बेटा ,हरे रंग का ब्लाउज रखा है मेरे पास, लाती हूँ अभी ..........................!’

यह कहते हुए, माँ सफ़ेद साड़ी को अपने हाथों में लिए , मेरे कमरे से बाहर चली गयीं।

--

अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर'

जन्म :    1  मार्च

ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में रचनाएँ प्रकाशित

2001  में बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार

2003   में बालकन जी बारी संस्था   द्वारा बाल -प्रतिभा सम्मान

आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी प्रसारित

परिनिर्णय ’  कविता शलभ संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयन

mail- singh.amarpal101@gmail.com

image

फूलों की बड़ी पूछ है। जिसे देखिए फूलों पर आसक्त है। फूल लगा देखा नहीं तोड़ने को जी चाहता है। उनमें महक और रंग है। दूर से ही देख, सूँघ लिया जाता है। पास जाएं तो उनकी कोमल पंखुड़ियां रिझाने लगती हैं। फूलों का आकर्षण हमें मोह लेता है। स्त्रियाँ अपने जुड़े में फूल लगाती हैं। पुरुष अपने बटन-होल में उसे खोंस लेते हैं। कोई दुष्ट ही होगा जो उन्हें पैरों से कुचल दे। फूलों से गले का हार बनता है। फूलों के गुच्छे से मेहमान का स्वागत होता है। फूलों की खूबसूरती ही उनके लिए अभिशाप है। अक्सर तो बेचारे पूरा खिल भी नहीं पाते, कलियाँ ही तोड़ ली जाती हैं। यादगार के लिए किसी किसी फूल को तो किताबों के बीच दबा कर रख लिया जाता है। वहीं दबे दबे वह दम तोड़ देता है।

फूल के सामने खादी के रूमाल की भला क्या बिसात ! हाँ गांधी जी के ज़माने में पहली बार और शायद आखिरी बार, खादी का रुतबा ज़रूर बढ़ गया था। लोग खादी कातते थे, खादी पहनते थे, खादी उपहार में देते थे। खादी का कोई वस्त्र देकर, वस्त्र नहीं तो खादी का एक रूमाल ही देकर, मेहमान का स्वागत करते थे। लेकिन खादी भले ही स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व जैसे मूल्यों की वाहक रही हो, है तो आखिर खुरदरी ही। धीरे धीरे वह चुभने लगी। उसका अवमूल्यन होने लगा। वह व्यंग्य की परिभाषा बन गई। व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई ने सबसे पहले व्यंग्य को खादी की सहायता से परिभाषित करते हुए कहा था – व्यंग्य बेशक खादी की तरह चुभता तो है पर गरमी देता है। व्यंग्य जीत गया। खादी हार गई|

[ads-post]

कितने लोग हैं जिन्हें पुस्तकों से प्यार है ? गिने-चुने। विद्यार्थी अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ लें वही बहुत है। सिर्फ पढ़ने की खातिर भला किताब कौन पढ़ता है ? बिरले ही होंगे। अमीर लोग दूसरों पर बौद्धिक होने का अपना रोब झाड़ने के लिए बड़े बड़े लेखकों की पुस्तकें अपनी अलमारियों में सजावट के लिए रखते हैं। पुस्तकें या सजाई जाती हैं या रद्दी में बेंच दी जाती हैं। एक समय था जब कुछ पुस्तक-प्रेमी पुस्तकों को अपने मित्रों को उपहार स्वरूप भेंट किया करते थे। शादी विवाह में भी उन्हें अक्सर भेंट किया जाता था। लेकिन जैसे जैसे हमारे समाज में पैसे का वर्चस्व बढ़ा है उपहार स्वरूप किताबों को भेंट करना समाप्त सा ही हो गया है। भेट के लिए किताबों की हैसियत अब फर्श पर आ गई है।

स्कूल के दिनों में मेरी गणित बहुत कमज़ोर थी। एलसीएम और जीसीएफ के सवाल कभी समझ ही में न आए। जीसीएफ – यानी ‘ग्रेटेस्ट कॉमन फेक्टर’। क्या आप बता सकते हैं कि फूल, खादी का रूमाल और पुस्तक - इन तीनों का जीसीएफ क्या है ? वो कौन सी एक बड़ी बात है जो इन तीनों में समान है ? बात गणित की नहीं है, राजनीति और समाज शास्त्र की है। ऊपरी तौर से तो ऐसा कोई समान तत्व नज़र नहीं आता। लेकिन ज़रा गहराई से देखें तो पता चलता है कि तीनों में एक बात जो समान है वह यह है कि ये तीनों ही उपहार की वस्तुएं हैं और रही हैं जिन्हें किसी के भी स्वागत हेतु भेंट किया जाता/ जा सकता है।

इस सन्दर्भ में फूलों का रुतबा आज भी सबसे अधिक है। हम आज भी अधिकतर फूलों से ही लोगों का स्वागत करते हैं, अभिनन्दन करते हैं, फूलों की माला और उन्हें पुष्प गुच्छ भेंट करते हैं। खादी के रूमाल की यह हैसियत कभी नहीं रही। इसकी पूछ तो बस गांधी जी के समय ही थी। इस मामले में तो खादी का रूमाल आज बेकवर्ड क्लास में आ गया है। किताबें अलबत्ता कभी कभी उपहार स्वरूप भेंट की तो जाती हैं, लेकिन भेंट करने वाला हमेशा एक अहसास ए कमतर से ग्रस्त हो जाता है।

क्या आप इस भेदभाव को हमेशा के लिए जारी रखना चाहेंगे ? हमारे प्रधान मंत्री तो यह कतई नहीं चाहते। वे फूलों को भी, सुन्दरता के कारण जो उनकी दुर्दशा हो रही है, उससे बचाना चाहते हैं और खादी के रूमाल को भी वही सम्मान देना चाहते हैं जो कभी भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के समय उसका रहा था। वे पुस्तक प्रेमी होने के नाते पुस्तकों का उपहार भी अनदेखा नहीं कर पाते हैं। अत: उनका आदेशात्मक निवेदन है कि उनका स्वागत ‘बुके’ से न किया जाए ‘बुक’ से किया जाए। फूलों को रौंधा न जाए और पुस्तकों का सम्मान किया जाए। वैसे स्वागत और सम्मान के लिए तो खादी का एक रूमाल ही भेंट में काफी है जो हमें स्वतंत्रता, समानता, और भ्रातृत्व के मूल्यों की कद्र का अहसास कराता है। उसी को भेंट कर स्वागत किया जा सकता है। करना भी चाहिए। लेकिन हमारी भी जिद तो देखिए। इतनी मशक्कत के बाद भी प्रधान मंत्री जी के एक मित्र ने उनका अभिनन्दन एक ‘बुके’ से ही किया। बेचारे क्या करते ? उन्हें उसे विनम्रता-पूर्वक स्वीकार करना ही पडा ! लेकिन क्या हम अपनी जिद पर काबू नहीं पा सकते ?


- डा. सुरेन्द्र वर्मा ( मो. ९६२१२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड. इलाहाबाद – २११००१

image

शायद ठीक से बंधा न होगा इसीलिए लोक-गीत की इस नायिका का बाजूबंद खुल खुल जाता है। वैसे भी जो बंद है कभी न कभी तो खुलता ही है, फिर वह ‘भारत-बंद’ जैसा ही बंद क्यों न हो !

जो खुला न हो वह बंद है। जो बंद है वह रुका हुआ है, कसा हुआ है। जकड़ा हुआ है, बंधा हुआ है। बंद गाँठ या गिरह को खोल पाना कभी कभी कितना कठिन हो जाता है। कुश्ती का एक पेंच हो जाता है – बंद। दरवाज़ा भेड़ कर या कुंडी लगा कर दरवाज़े को बंद कर दिया जाता है। लेकिन बाइबिल कहती है, खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा। खटखटाओ तो ! कोशिश करने से क्या नहीं हो सकता ?

लाख की चपटी चूड़ी ‘बंद’ कहलाती है। तनियों को बाँध कर, तान कर, स्त्रियाँ अपनी चोली बाँध लेती हैं। तनी भी तो ‘बंद’ ही हैं। किसी को थका मारने का अर्थ है, उसके बंद ढीले कर देना। जो कैद में बंद है, वह बंदी है। और तो और, कविता के भी बंद होते हैं। उर्दू या फारसी शायरी के जो चार-पांच मिसरे होते हैं वे शायरी के बंद ही तो हैं। बंद वस्तुत: फारसी का ही शब्द है। लेकिन हमारी हिन्दी में यह रच-बस गया है। हमें अब यह ‘अपना’ ही लगता है। हिन्दी कविता के चरण भी तो अक्सर कविता के बंद ही कहे गए हैं।

[ads-post]

बंद से ‘बंदगी’ बना है। बंदगी प्रणाम है, आराधना है। सेवा करना है, चाकरी करना है। जो बंदगी करता है, ‘बंदना’ करता है, वह ‘बंदक’ है। पूजा पाठ के लिए निर्धारित स्थान पर हम ‘बंदन-वार’ लगाते हैं।

अब इन शब्दों की हिन्दी/संस्कृत के समानार्थी शब्दों से ज़रा तुलना कीजिए। उर्दू/हिन्दुस्तानी में जो बंदगी है, वही हिन्दी में “वन्दगी” है। “बंदना” ‘वन्दना’ है। “बंदनवार” ‘वन्दनवार’ है। केवल ‘ब’ और ‘व’ का अंतर है। संभावना यही है कि ‘बंदगी’ आदि शब्द हिन्दी/संस्कृत के ‘वन्दगी’ आदि शब्दों से ही आए हों।

अच्छा-खासा आदान प्रदान है। हम हिन्दी में ‘बंदी’ को ‘वंदी’ नही बोलते। ‘बंदी’ ही कहते हैं। इसी तरह हम बंधे हुए को ‘बंद’ ही बोलते हैं, ‘वंद’ नहीं बोलते। बंद मुट्ठी हज़ार की।

‘बंद’ से ही मिलता-जुलता एक और शब्द है, ‘बंध’। बंध बंधन है, ज़ंजीर है, बेड़ी है, कैद है। जो कसा हुआ है, बंधा हुआ है, बंध है। बंधक रखी हुई वस्तु, बंध है। जो मुक्त नहीं है, बंध है। दार्शनिकों के अनुसार तो हमारा शरीर, हम खुद भी, मुक्त नहीं है। मुक्ति के लिए हमें प्रयत्न करना होगा। बंध, बंधे होने की अवस्था है। यह गुलामी की अवस्था है। गुलाम देशों को भी अपनी स्वतंत्रता की लिए संघर्ष करना होता है।

उर्दू/फारसी में जिसे शायरी का ‘मिसरा’ या ‘बंद’ कहते हैं, वही हिन्दी कविता में ‘बंध’ हो जाता है। बंध कविता का अनुच्छेद (स्टेंज़ा) है जिसमें चार या छ: पंक्तियाँ या चरण होते हैं। संभावना यही लगती है कि यह ‘बंध’ ही फारसी/उर्दू तक पहुंचते पहुंचते ‘बंद’ हो गया हो।

लोग वादा करते हैं और ‘वचन-बद्ध’ हो जाते हैं। अपने वचन से बंध जाते हैं। लेकिन जैसा कि हम जानते ही हैं वादे अधिकतर पूरे नहीं होते, खासकर नेताओं के किए गए राजनीतिक वादे। ‘बंध-पत्र’ एक लिखित प्रतिज्ञा है। सरकार बंध-पत्र या (बौंड्स) जारी करती है जिसमें वादा किया जाता है कि एक समयावधि के बाद आपकी निर्धारित जमा की हुई राशि निश्चित ब्याज सहित वापस मिल जाएगी। ये कोई राजनैतिक वादा नहीं होता !

बंद, वन्द और बंध – तीनों भिन्न भिन्न शब्द होने के बावजूद, अर्थ की अपेक्षा से इनमें परस्पर काफी व्याप्ति (ओवर्लेपिंग) है। लेकिन हमने अपने आलेख की शुरूआत बाजूबंद से की थी और यह बाजूबंद हमेशा बाजू ’बंद’ ही रहता है, ‘बंध’ या ‘वन्ध’ नहीं होता - भले ही खुल खुल ही क्यों न जाए !

डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड, इलाहाबाद -२११००१

image

*डॉ. रामकुमार बेहार बस्तर के साथ करते हैं सार्थक संवाद*

       डॉ. रामकुमार बेहार की समीक्षित पुस्तक "बस्तर : प्रकृति व संस्कृति" पर अपना समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत करते  हुए डॉ.श्रीमती मृणालिका ओझा ने कहा कि आज का आधुनिक समाज आदिवासियों को असभ्य की दृष्टि से समझने की कोशिश करता है, किन्तु सच यह है कि उनके अनेक रीति-रिवाज हमें बहुत कुछ सीखने को प्रेरित करते हैं ।हमें भी शहीद जवानों की स्मृतियों को "मेनहिर" की तरह  सहेजने का संदेश देते हैं। पुस्तक में प्रकाशित 15 लेख एवं 6 कविताओं में वे बस्तर के साथ संवाद करते हुए प्रतीत होते हैं एवं यह बस्तर को जाने बिना संभव नहीं है।"

        संस्कृति विभाग के सभागार में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में छत्तीसगढ शोध संस्थान के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार - इतिहासकार डॉ. रामकुमार बेहार के खंड काव्य "दसमत कैना" का विमोचन उपस्थित अतिथि सर्वश्री पद्मश्री डॉ. अरूण शर्मा, श्री बी. के. एस.रे, सेवानिवृत्त आई ए एस, श्री शशांक शर्मा, संचालक, ग्रंथ अकादमी, श्री राजाराम त्रिपाठी, किसान नेता एवं संपादक- ककसाड, श्री बालचंद्र कछवाहा, सेवानिवृत्त प्रोफेसर के द्वारा किया गया।

     इस कृति की कथा पर श्री के. पी. सक्सेना 'दूसरे' ने अपने विचार व्यक्त किये। श्री अनिल झा ने "बस्तर: प्रकृति व संस्कृति" पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. रामकुमार बेहार के पास बस्तर पर कहने के लिए बहुत कुछ है, यह पुस्तक एक अंश मात्र है। डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि पुस्तक का हर आलेख वास्तव में स्वयं में एक अलग पुस्तक की मांग करता है और "बस्तर" को इस पुस्तक के माध्यम से समझने पर भी उन्होंने जोर दिया।

   कार्यक्रम के अतिथि श्री बी के एस रे, ने कहा कि बस्तर पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन बस्तर में रहकर और बस्तर को जान-समझ कर जो लिखा जाए वह ही वास्तव में प्रामाणिक है। डॉ. रामकुमार बेहार का लेखन इस श्रेणी का ही लेखन है। श्री राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि श्री बेहार का अथक श्रम,  स्तुति योग्य एवं प्रेरणादायक भी है।

       कृतिकारडॉ. रामकुमार बेहार ने कहा कि उनका उद्देश्य बस्तर की प्रकृति, परंपरा, संस्कृति आदि को वहीं की खुशबू और सुन्दरताके साथ प्रस्तुत करना रहा है। 'दसमत कैना' खण्ड काव्य की लगभग विलुप्त होती विधा को पूर्नजिवीत करने का एक प्रयास है।

    कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती पूजन के अतिरिक्त छत्तीसगढ शोध संस्थान की सचिव श्रीमती निर्मला बेहार द्वारा संस्थान की गतिविधियों से अवगत कराया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों एवं समीक्षकों का अभिनंदन पत्र एवं शाल देकर सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री नर्मदा प्रसाद नरम द्वारा किया गया।

    शहर के बुद्धिजीवियों एवं साहित्यकारों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget