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18 दिसंबर 2014

सावित्री काला की कहानी - अर्द्धशती

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अर्द्धशती

'मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ' अंकुश ने सुधि से फोन पर कह ही डाला।

'अरे नहीं , ऐसी बात सोचना भी मत, मैंने कभी भी तुम्हें दोषी नहीं समझा।'

'मैं तो अब तक इसी सोच में रहा कि तुम सुखी जीवन जी रही होगी, सो तुम्हारे जीवन में मैंने कभी दस्तक देना उचित नहीं समझा। मुझे सच में तुम्हारे विषय में कुछ भी मालूम नहीं था, किसी ने कभी बताया भी तो नहीं कि तुमने इतना कष्टमय जीवन व्यतीत किया। कैसे झेल पाई तुम वह सब, जिसमें मैं भी सामान दोषी था। '

'मैंने तुम्हारे नाम की ही यातनायें भोगी हैं। कोई दिन ऐसा नहीं जाता था जब मेरा नाम तुमसे न जुड़ता हो, हर बात में मुझे तुम्हारे नाम के ताने सुनने पड़ते थे। शादी से पहले भी और शादी के बाद भी।'

'सच में मैं अपने को तुम्हे दी जाने वाली यातनाओं का जिम्मेदार समझता हूँ।' अंकुश ने भावुक होकर कहा।

'समझना नहीं,तुम ही एकमात्र जिम्मेदार हो, पर मैंने तो कभी कोई शिकायत नहीं की।'

'इसी बात का तो दुःख है कि तुमने अकेले वह सब सहा, मुझे बताने की जरा भी कोशिश नहीं की।'

'कहाँ करती पिछले पचास वर्षो से तो हम मिले ही नहीं।'

'खैर अब तो मिल गये हैं, और आगे भी मिलते रहेंगे।'

'कितने विश्वास से कह रहे हो ,कहीं मेरे प्यार को तुम्हारी ही नज़र न लग जाये।'

'क्यों तुम अपना ही प्यार क्यों कहती हो,' अंकुश ने सुधि से कहा।

'क्या तुम्हारा भी इसमे कुछ दखल है , मुझे तो पता ही नहीं था।'

 

'तुम बिल्कुल नहीं बदली हो सुधि,' अंकुश ने भावुकता से कहा 'जब से मिली हो बस तुम्हें ही याद करता रहता हूँ।'

'और बाकी काम कौन करता है।'

'घर में बहुत है करने वाले।'

'बड़ा खुशहाल जीवन जी रहे हो, बहुत अच्छा लगा सुन कर।'

फिर थोड़ा रुक कर बोली, 'चलो, मैं नहीं कोई और ही सही जिसके जीवन में तुम बहारें लेकर आये हो, सच में तुम्हें खुश देखकर मैं बहुत खुश हूँ।

'पर तुम्हारा दुःख सुनकर तो मैं दुखी हूँ', अंकुश ने सुधि को अपने मन से अवगत कराया, 'सोचा न था जीवन के इस मोड़ पर तुम से इस तरह मुलाकात होगी।'

'अरे जरा सी बात पर घबरा गये हो, यह घबराना तुम्हारा अब तक गया नहीं।'

'जा भी कैसे सकता है, तुम्हें देखते ही घबराहट बढ़ जाती है।'

'अपने दिल पर काबू रखिये महाशय, अवस्था के इस दौर में दिल की धड़कनें बढ़ना अच्छा शगुन नहीं है।'

'यह तुम कह रही हो।'

'हाँ मैं कह रही हूँ।'

 

'अच्छा तो इस अवस्था में हमें क्या करना चाहिये।'

'राम भजन गाना चाहिए।'

'सरे दिन तो भजन नहीं गये जा सकते', अंकुश ने पूछा।

'हां नहीं गाये जाते, तो कुछ काम कर दिया करो। घर के कामों में हाथ बंटाया करो।'

'जैसे-'

'बागवानी , बाजार का सामान लाना, घर के छोटे- छोटे कामों में श्रीमती जी की मदद करना।'

'तुम मुझे 'खानसामा' बनने की दावत तो नहीं दे रही हो, यह मुझसे नहीं होगा।'

'तो क्या होगा तुमसे', सुधि ने पूछा।

'तुम्हारी यादों के झरोखों से तुम्हें याद करना।'

'ख्वाबों में याद करोगे तो करते रहो, किस को एतराज है।'

अंकुश आगे बोला 'सुधि तुमने मुझे क्यों इतना याद किया।'

 

'मेरी मजबूरी थी, जितनी तुम्हारे नाम के ताने सुने उतनी ही मेरी आसक्ति तुम पर बढ़ती रही। कभी तुमने मुझे जितना स्नेह दिया था, न उसी के सहारे मैंने जीवन के पचास वर्ष काट दिये है।'

'कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि आज के इस भौतिक युग में कोई किसी से इस रूप में प्यार कर सकता है, या पचास वर्ष तक बचपन की याद लिए जी सकता है।'

'अब तो पता चल गया है न'।

'मैं तुम्हारे लिए अब क्या कर सकता हूँ।'

'यह भी मुझे ही बताना होगा।'

'और किस से पूछूँ?'

'अपने आप से, अपने दिल से, तुम्हें किसी ने कितना अपने दिल में सहेज रखा है।'

'मैं स्वयं को तुम्हारा कसूरवार समझता हूँ।'

 

'खुद को इतना गुनहगार मत समझो अंकुश, यह तो मेरी अपनी ही मजबूरी थी तुम्हें याद करने की क्योंकि तुम्हारे अलावा मुझे समझने वाला व प्यार करने वाला कोई दूसरा शख्स मिला भी तो नहीं जीवन में।'

'ढूंढा नहीं तुमने।'

'बहुत कोशिश की लेकिन तुम्हारे प्यार का पलड़ा सदा भरी रहा। सो तुम्हारी यादों के सहारे जीवन के पचास साल आराम से कट गये।'

'अब क्या इरादा है।'

'अभी खोज जारी है, कोई तुमसे बैटर प्यार करने वाला, मुझे समझने वाला मिल जाये तो......|'

'मैं मदद करूं ढूंढने में।'

'अरे जब जवानी मैं ही तुमने साथ नहीं दिया तो बुढ़ापे में कौन घास डालेगा।'

'अरे घास नहीं प्यार डालेगा तुम्हारी झोली में।'

'हम भिखारी नहीं हैं, तुम कर पाओगे हमें प्यार।'

'हाँ भी और नहीं भी।'

 

'अरे झूठ ही कह दो। तुम्हारे पचास साल पहले कहे, सुने झूठे सच्चे प्यार के सहारे ही तो अब तक जी पाई हूँ, अब कहोगे तो आगे भी जी लूंगी।'

'झूठ कैसे बोल दूं।'

'तो सच ही बता दो, वह भी नहीं बता सकते, तो मन को झूठी सांत्वना ही दे दो मुझे तसल्ली तो रहेगी।'

'मैंने तुम्हें बहुत चाहा था कभी, यह तो मानती ही हो न।'

'तुम कहते हो तो चलो मान लेती हूँ।'

'मेरे कहने से नहीं, अपने दिल से पूछो क्या मेरे प्यार में कभी तुम्हें कोई मिलावट दिखी।'

'असलियत भी तो नहीं बताई तुमने कभी।'

'अब तो बता रहा हूँ।'

 

'पचास साल बाद, अच्छा बोलो सुन रही हूँ।'

'तुम्हें मुझ पर अभी भी विश्वास है न',अंकुश ने सुधि को बड़े ही अनुराग से पूछा।

'अपने से अधिक। वैसे जहाँ तक विश्वास की बात है, मैं रास्ते चलते हुए किसी भी शख्स पर विश्वास कर लेती हूँ।'

'अच्छा तुमने हमें रास्ते चलने वालों की श्रेणी में रखा है।'

'तुम्हें तो मैंने अपने मन मंदिर में बिठा रखा है", तुम जाना तो दूर, हिल भी नहीं सकते वहाँ से।'

'मुझे इन्सान ही रहने दो सुधि, मैं भगवान बनने के काबिल नहीं हूँ।'

'अपनी काबिलियत तो मेरे दिल से पूछो', सुधि ने कहा।

'तुम्हें बातों में कोई नहीं हरा सकता।'

'हमने तो तुम्हारे नाम पर जिंदगी ही हारी है।'

'अब नहीं हरोगी',अंकुश ने विश्वास दिलाया।

'अब बचा ही क्या है जिंदगी में।'

 

'क्यों अभी तो बहुत कुछ है, जीने के लिए, तुम हिम्मत मत हरो।'

'यह तुम कह रहे हो जिनका पिछले पचास साल से कुछ पता ही नहीं था।'

'अब तो पता है न।'

'तुमने अब तक अपने घर का पता बताया नहीं', सुधि ने अंकुश से कहा।'

'बताया तो है' अंकुश ने कहा।

'क्या ?'

'हम तुम्हारे दिल में रहते है ' अंकुश ने निःसंकोच कहा।

'अच्छा। हमें तो मालूम ही नहीं था',सुधि ने उत्तर दिया।

यह सब बातें सुधि और अंकुश फोन पर ही बतियाते रहे।

मैं टेलीफोन ऑपरेटर थीं। मेरी ड्यूटी रात ८ से सुबह चार बजे तक की थी। मैंने दोनों की बातें बड़ी उत्सुकता से सुनी तथा उनकी उम्र का अनुमान लगाया। उनके निश्छल प्रेम में कोई अश्लीलता नहीं सुनाई दी। कैसा पवित्र प्रेम था इन दो प्रेमियों का। एक बेबाक अपने अनुराग का इजहार कर रहा था, दूसरा चाह कर भी स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर पा रहा था

 

मैं भी आश्चर्य में डूबी रही कि पचास वर्ष तक अपने दिलों में पहले प्यार को जमाने की नजरों से बचाकर अपने हर सांस की उच्छ्वास के साथ जी रहे थे दो प्रेमी। वरना आज तो प्यार क्षणिक होता है, वासना का जामा पहन कर ही जिया जाता है। रात बिता कर सुबह की गाड़ी से चले जाते हैं।

वे तामसी प्रेमी कहाँ समझ पायेंगे इस अर्द्धशती के प्यार को जो ये प्रेमी पल-पल जी रहे हैं। मैं एक टेलीफोन ऑपरेटर हूँ, इनकी बातें सुनकर अनुमान लगा सकती हूँ कि इन बिछड़े प्रेमियों के प्यार में सागर सी गहराई, पर्वत सी ऊँचाई तथा धरती के सामान पवित्र सच्चाई है। क्या कर पायेगा कोई ऐसा पवित्र प्रेम? रख सकता है कोई ऐसे सात्विक विचार ? जिसमे कामसूत्र के किसी भी सूत्र का प्रयोग कहीं भी लेश मात्र भी नहीं सुनाई दिया।

 

इनके सात्विक प्रेम कि तो कसमे खाई जा सकती है। वास्तव में जीवन का पहला प्यार वह खुराक है, जिसकी तरलता से सरलता पूर्वक जीवन जिया जा सकता है। कैसा अनछुआ प्यार, दुलार व अहसास है ये, दोनों प्रेमी फोन पर काफी देर तक बतियाते रहे। मुझे आश्चर्य भी हुआ कि पचास वर्ष बाद भी ये प्रेमी ऐसी रसभरी बातें कर रहे हैं।

 

इनको अलग करने वाला व्यक्ति कितना क्रूर रहा होगा। आज पचास वर्षों से अपने-अपने दिलों में प्यार का सागर समा कर भी ये प्रेमी प्यार की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। अपने मन की व्यथा कह कर दोनों प्रेमी अपनी-अपनी दिशा को चले गये होंगे। पुनः मिलन की आस लिये।

मैंने भी अपना बैग उठाया, मेरी ड्यूटी ख़त्म हो गई थी। दूसरी ऑपरेटर को चार्ज सौंप कर मैं बाहर खड़ी गाड़ी में बैठ गई। घर आकर भी काफी समय तक

उनकी बातें मेरे मस्तिस्क तो झकझोरती रही, कि आज के युग में भी क्या ऐसे प्रेमी देखने सुनने में आते हैं। यह प्रेम पचास वर्ष बाद भी अपने पहले प्यार को ह्रदय में संजोये जी रहे हैं। कितना पवित्र है यह अर्द्धशती का मिलन।

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