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बड़ा आश्चर्य है। राजस्थान से जो चोटियाँ कटने का सिलसिला शुरू हुआ, थम ही नहीं रहा है। दिल्ली होता हुआ उत्तरप्रदेश में और फिर गुजरात तक में इसने अपनी पहुँच बना ली। आज तक व्याख्या नहीं हो पाई कि आखिर कौन काट रहा है, ये चोटियाँ। दहशत फ़ैल गई है। समाधान के अबतक कई विकल्प आ चुके हैं। शायद कोई चुड़ैल है, या कुछ चुड़ैलें हों जो इसे अंजाम दे रहीं हैं। एक महिला को तो चुड़ैल मानकर पीट पीट कर मार ही डाला गया। कुछ लोगों का कहना है चोटियाँ कटने की बात केवल एक अफवाह है। वास्तव में तो चोटियाँ कटी ही नहीं हैं। कुछ उदाहरण ऐसे मिले भी। लेकिन कुछ की चोटियाँ यतार्थत: कटी देखी भी गईं हैं। कोई न कोई तो चोटी-कटवा है- इससे इनकार नहीं किया जा सकता। वो कौन है, पकडाई में नहीं आता। पुलिस ने एक को पकड़ा भी था – लेकिन एक ही आदमी इतनी सारी और इतनी जगहों पर एक साथ यह काम नहीं कर सकता। क्या कोई गैंग है ? एक व्याख्या यह भी है कि दरअसल एक बरसाती कीड़ा है जो बालों में घुस जाता है और पूरी की पूरी चोटी साफ़ हो जाती है।

बहरहाल चोटी की दहशत फैली हुई है। और सच मानिए यह कोई ऐसी-वैसी दहशत नहीं है, ‘चोटी’ की दहशत है। इसे नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। कितने ही लोग ऐसे हैं जो चोटियाँ रखते हैं। स्त्रियों की तो आमतौर पर चोटियाँ होती ही हैं, तमाम पुरुष भी ऐसे हैं की जिनके चोटियाँ हैं। भले ही वे स्त्रियो की तरह उनकी पीठ पर न लहराएं, पर अनेक हिन्दू लोगों के सर पर बीचों-बीच बालों का एक गुच्छा जो हजामत बनाते वक्त छोड़ दिया जाता है, वह उनकी चोटी, जिसे शिखा भी कहा जाता है, ही तो है। वाराणसी में आपको न जाने कितने ऐसे ‘चोटी के विद्वान’ मिल जाएंगे। उनकी चोटी तो किसी चोटी कटवा ने नहीं काटी ! सिर्फ स्त्रियों की चोटियाँ ही काटी जा रहीं हैं। चोटी कटने में भी ‘लिंग-भेद’ ! पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता यहाँ भी कायम है। वाह !

एक और अंतर देखिए। पुरुष की चोटी ‘शिखा’ है। वह उसके सर के बीचों-बीच उसके व्यक्तित्व का शिखर है। झंडे की तरह वहां स्थित है। और स्त्रियों की चोटियाँ ? झुक कर, गुंथी हुईं, स्त्रियों के कन्धों पर पडी हैं। वहीं लहराती हैं, खुश हैं। लेकिन आज के ज़माने में न तो पुरुष अपने सर पर कोई शिखर चाहता है और न हीं स्त्रियाँ लम्बे बालों की शौकीन हैं। अधिकतर पुरुषों ने अपनी चोटियाँ कटवा दी है। खुद ही कटवा दी हैं। कोई चोटी-कटवा उनके पास नहीं आया।

मेरी एक महिला मित्र हैं। उनके बड़े लम्बे बालों की लम्बी सी एक चोटी है। अच्छी तो लगती है लेकिन वे उसके रख-रखाव से दुखी हैं। कटवाना चाहती हैं। लेकिन घरवाले नहीं चाहते की इतने सुन्दर बालों को काट दिया जाए ! पर वे सैलून पहुँच ही गईं। लेकिन वहां भी बाल काटने वाले ने उन्हें हिदायत दे डाली कि वे अपने लम्बे बालों पर गर्व करें और रहम करें। चोटी न कटाएँ। फिर क्या था ! रात में जब सब सो रहे थे उन्होंने अपनी लंबी चोटी खुद ही काट डाली और लगे हाथों यह अफवाह उड़ा दी की कोई चोटी-कटवा उनकी चोटी काट ले गया। ...और लगीं विलाप करने !

पर्वतारोहण की शौकीनों ने न जाने कितने पर्वतों की चोटियाँ फतह कर डाली हैं। शायद ही कोई ऐसी चोटी रह गई हो जो फतह न हुई हों। हिमालय की सर्वोच्च चोटी, एवरेस्ट, पर कई देशों का झंडा कई बार लहराया जा चुका है। कई भारतीयों ने भी यह करिश्मा कर दिखाया। लेकिन आज तक किसी ने यह नहीं सोचा कि हिमालय क्या किसी भी पर्वत की कोई भी चोटी क़तर दी जाए। भले ही यह संभव न हो, पर कोशिश तो की ही जा सकती थी।

चोटियाँ स्त्रियों की ही कट रही हैं। स्त्रियाँ “सॉफ्ट टारगेट” हैं। स्त्रियों को वश में करना, उन्हें अपने अधीन कर लेना आसान है। उनकी चोटी काटने, कतरने में, उन्हें अपने आधिपत्य में ले लेने में, पुरुष ने दक्षता प्राप्त कर ली है। क्या किया जाए ? इसका एकमात्र समाधान यही है कि स्त्रियाँ पुरुषों से स्वयं को किसी तरह हीन न माने। अपना आत्मविश्वास जगाएं। स्त्रियों में एक बार यदि यह आत्म-विश्वास पैदा हो गया तो नि:संदेह सारे चोटी-कटवाओं की चोटियाँ कट जाएंगीं।

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड

इलाहाबाद – २११००१

विश्व फोटोग्राफी दिवस (१९ अगस्त) पर प्रख्यात फ़ोटोग्राफ़र व लेखक - प्रमोद यादव के छायाचित्र

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छायाकार- प्रमोद यादव

गया नगर , दुर्ग , छत्तीसगढ़

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खोजती रहस्य पृथ्वी !!

अपने अंदर एक संसार लिये
घूम रही है पृथ्वी
अपनी ही धूरी पर
चन्द्रमा को लादे
लगा रही है परिक्रमा
सूरज की......
जैसे कर रही हो साधना...प्रार्थना
अपने अंदर के संसार को
बचाने की....
भाग रही है ऐसे जैसे
मिल गया हो,
अपने ही जैसा कोई ग्रह
मिलने को आतुर है या
बचने की कोशिश में
अपने से बड़े ग्रह से
पता नहीं किस बंधन में
बंधी है
चक्कर पर चक्कर लगाती
जैसे खोज रही हो
आकाशगंगा में अपने जैसा ही
गुम हुआ संसार कोई.....।


संसार

जितना बड़ा संसार
अपने अंदर लिये
घूम रही है पृथ्वी
उससे कहीं बड़ा
संसार उसका बाहर है।

वह घूम भी रही है तो
ऐसे कि
अंदर के संसार को
पता ही न लगे
जैसे पृथ्वी के भीतर
पल-बढ़ रहा है
एक पूरा संसार
वैसे ही हरेक प्राणी
का है अपना
बनाया हुआ एक संसार।



बंधन मुक्त

धीरे-धीरे तोड़ रहा है
जैसे संसार सारे बंधन
पृथ्वी भी धीरे-धीरे
तोड़ रही है अंतरिक्ष के बंधन

अपनी ही धुरी से खिसक
जा रही है सूरज के समीप
जैसे शुक्र और बुध
पहुंच गए सदियों की
अनवरत यात्रा कर....।
जैसे आज मंगल है,
पृथ्वी भी वैसी ही थी
जब मंगल आ जाएगा
पृथ्वी की स्थिति में
पृथ्वी कहलाएगी बुध
बृहस्पति हो जाएगा मंगल
मंगल बन जाएगा पृथ्वी
शुक्र समा जाएगा
सूरज में....।
चलता रहेगा यह चक्र
आखिर सूरज को भी तो
चाहिए ऊर्जा
गर न हो भरोसा तो
देख लो
दूसरी आकाशगंगाओं की प्रक्रिया।


जीवन

केवल सांसें रहते रहना ही
जीवन नहीं
जीवन तो इसके बाद भी है।
पृथ्वी केवल यही पृथ्वी नहीं
कई और पृथ्वी
इसके बाद भी हैं।
चन्द्र-सूर्य केवल
यही नहीं
कई और चांद-सूरज हैं।
संसार केवल
यही संसार नहीं
जल, थल, वायु का
और भी संसार है।
जैसे आकाशगंगा
सिर्फ हमारी ही नहीं
कई और आकाशगंगाएं भी हैं।
जरा निकल कर देखो
पृथ्वी के बाहर
नई जिंदगी तुम्हें
बुला रही है
किसी नए ग्रह पर....!



अकेला कहां हूं मैं....!

तुम गए तो लगा
अकेला हो गया हूं मैं
असफलता से डरता रहा
इसलिए कि हो जाउंगा
अकेला.....
पर आंखें बंद की तो
लगा अकेला कहां हूं मैं
प्रतिदिन सूरज मिलने
आता है, मुझसे
किरणों संग
चंद्र बतियाता है रात्रि में
मुझसे तारों संग
हवा हमेशा होती है साथ मेरे
जैसे पूर्वजों की अदृश्य
शक्ति घुली-मिली हो
जब शुभचिंतक नहीं होते
मेरे पास
तब भी एक पूरा संसार
मेरे आसपास होता है
यही तो मेरी
सफलता है....
मेरे उत्साह का कारण
मुझ पर बनी हुई है
प्रकृति की कृपा

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-- आशीष श्रीवास्तव
स्वतंत्र पत्रकार,  भोपाल
ashish35.srivastava@yahoo.in

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जिस तरह खराब मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को बाहर का रास्‍ता दिखा देती है उसी तरह नया आविष्कार या एप पुराने आविष्कार या एप को बाहर कर सकता हैं । पहले फिल्‍मों का क्रेज था बाद में लोग टी.वी. से चिपके रहने लगे अभी इंटरनेट का क्रेज है ‘फेसबुक का क्रेज कुछ कम हुआ है। वॉट्‌सएप का क्रेज बंदस्‍तूर बना हुआ हैं । शायद खाना खाने से भी अधिक जरूरी हैं मैसेज फारवर्ड करना । लोग एक मिनट भी उधार नहीं रखना चाहते । हर कोई बेचैन है कि जल्‍दी से जल्‍दी मैसेज फारवर्ड कर चैन की सांस लें। अच्‍छा मैसेज अपने ग्रुप में सबसे पहले भेजने पर वही खुशी मिलती है जो सुबह-सुबह पेट हल्‍का होने पर मिलती है।

इस फेसबुक व वॉट्‌स्‌एप के जमाने में प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति कवि, साहित्‍यकार लेखक, चुटकुला मास्‍टर, गीतकार आदि और न जाने क्‍या-क्‍या बन चुका है। भले ही आपको हिन्‍दी अंग्रेजी व अन्‍य भाषाएं नहीं आती हो लेकिन आप उन भाषाओं पर भी अपना अधिकार जता सकते हैं। किसी भी भाषा में कविता, लेख, जोक आदि फारवर्ड कर सकते हैं बशर्तें किसी जानकार की सलाह लेकर ही भेजें । भाषाई अकिंचन लोगों की हाई-फाई हिन्‍दी अंग्रेजी देखकर आप भी मेरी तरह भौंचक हो सकते हैं ।

यह भी हो सकता है कि आपने कड़ी मेहनत से बहुत अच्‍छी कविता, चुटकुला या लेख तैयार कर अपने सभी ग्रुप (आजकल प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति कई ग्रुप में सदस्‍य हैं ) में भेजा । हो और आपको एक महीने के बाद कहीं से वही मैसेज वापस आए और लिखा हो कि ‘एकदम नया है‘ आपको लालू की तरह सिर पकड़कर बैठ जाना पड़ेगा। एक अजीब तरह का माहौल बन गया है। अफवाह विवाद एवं दंगा फैलाने वालों को एक डिजिटल हथियार मिल गया है। अच्‍छी चीजों का प्रचार-प्रसार कम है परन्‍तु नफरत घृणा विवाद का प्रचार प्रसार अधिक है नफरत की राजनीति करने वाले चांदी काट रहे हैं। अच्‍छा यही होगा कि इस पर आने वाले मैसेज को हम गंभीरता पूर्वक ग्रहण न करें क्‍योंकि उसकी प्रामाणिकता हमेशा ही संदेह के घेरे में रहेगी ।

ऐसा नहीं है कि इसमें सब कुछ गलत हो रहा हो । इसके फायदे अधिक हैं और नुकसान कम । एक बार में ही ग्रुप के सभी सदस्‍यों को संदेश पहुंचाया जा सकता है। भले ही वे विदेश में ही क्‍यों न हो । समाजवाद का सबसे सशक्‍त माध्‍यम वॉट्‌स एप है। एक ग्रुप में ही देशी दारू पीने वला मजदूर एवं अरबपति दोनों ही सदस्‍य हो सकते हैं । छोटे व बड़े दोनों सदस्‍य एक दूसरे से विचारों का आदान-प्रदान कर सकते हैं । एक दूसरे के जोक पर हंस सकते हैं। किसी गंभीर विषय पर एकमत हो सकते हैं या विपरीत ध्रुव पर खड़े हो सकते हैं। एक ही ब्रांड की बीड़ी पीने वाले एवं शराब पीने वाले के बीच जो भाईचारा होता है वही भाईचारा एक ग्रुप के सदस्‍यों के बीच पाया जाता है ।

ग्रुप के सदस्‍यों की संख्‍या 100 से बढ़कर 256 कर दी गई है, भला हो उनके मैनेजमेंट का अब 100 के बदले 256 लोगों के विचारों का आदान-प्रदान होगा। क्‍या होगा यदि यह संख्‍या 125 करोड़ कर दी जाए । लोगों को कुछ करना नहीं पड़ेगा । एकल खिड़की प्रणाली की तरह प्रत्‍येक काम एक ही जगह संभव हो जाएगा । एक जगह ही भाषण, आलोचना एवं मतदान हो सकेगा। देश के सबसे लोकप्रिय नेता का भाषण भी एक ग्रुप में ही लोड हो जाएगा । वह कुछ इस प्रकार होगा-

‘मित्रों मैं वॉट्‌स एप मैनेजमेंट का शुक्रिया अदा करना चाहता हूँ जिसने ग्रुप की संख्‍या 256 से बढ़ाकर 125 करोड़ कर दिया है। और पूरे भारतवर्ष के लोगों को इसका सदस्‍य बना दिया है। इसके माध्‍यम से मैं अब अपने प्‍यारे देशवासियों से रोज मन की बात कर सकूंगा । मेरी मैनेजमेंट से गुजारिश है कि 125 करोड़ जनता से उस व्‍यक्‍ति को जिसकी बुद्धि सबसे कम हो उसे इस ग्रुप से बाहर किया जाए और बुद्धि विकास के लिए  माल्‍या के पास भेज दिया जाए‘ ।

राजशेखर चौबे

रायपुर

                   

    यह समीक्षा-लेख वाणी प्रकाशन से सुधीश पचौरी के संपादकत्व में प्रकाशित पत्रिका ‘वाक्’ के मार्च 16, अंक 22 में छपा है. इस समीक्षा के  लेखक हैं एक शोध-छात्र जगन्नाथ दूबे. दूबे ने इस लेख में राजेश जोशी के काव्य-संकलन ‘जिद’ की समीक्षा की है. लेकिन इसमें जोशी की काव्य-प्रकृति खुल नहीं पाई है. समीक्षक एक शोध-छात्र हैं पर वह इसमें अपनी शोध-दृष्टि का उपयोग करते नहीं दिखाई देते.

    समीक्षक इस समीक्षा में अनुभव करते हैं कि हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जो मानवीयता के लिए भयानक संकट का समय है. वह यह भी अनुभव करते हैं कि यह संकट....कवि या कविता की तरफ से पैदा किया गया संकट नहीं है. यह संकट सत्ता की ओर से....पैदा किया जा रहा संकट है. लेकिन उनका ध्यान इस ओर नहीं गया कि भारत के एक वाद-बद्ध साहित्यकार-समूह, जो ऐसी ही बातें करता है, को प्रभावित करने वाले सार्त्र कहते हैं- Hell is the other people. माओ का सिद्धांत है  First we should choose who is Our friend avd who is our enemy (माओ का यह वक्तव्य तब का है जब वह चीनी-सत्ता को च्युत करने की तैयारी कर रहे थे). समीक्षक ने सत्ता का जो सरलीकरण किया है उसमें ये भी आते हैं. ये अपने आप में एक सत्ता की हैसियत रखते थे. ये कितने खतरनाक वक्तव्य हैं, समीक्षक स्वयं समझ सकते हैं.

    कविता हमें मुक्त-हृदय करती है. मुक्त-हृदय? क्या हृदय से मुक्त जैसे मुक्त-काम- कामना से मुक्त? तब तो मनुष्य जी ही नहीं पाएगा. शायद समीक्षक का आशय हो हृदय पर पड़े भारों से मुक्त. जोशी के ‘जिद’ संकलन की कविताओं ने समीक्षक को कितना मुक्त-हृदय किया, यह तो वही जानें पर स्वतंत्रता आंदोलन के समय मैथिली शरण गुप्त की ‘भारत भारती’ ने इस देश के जन को खूब मुक्त-मन किया. मन्मथ नाथ गुप्त ने इसी के गीतों को गा-गा कर स्वाधीनता नामक मूल्यवान त्तत्व से यहाँ के जन को जोड़ा. मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता के मूल आशय को पाने के लिए प्रखर बुद्धवादी लोग आज भी सिर खपा रहे हैं. इस जनपक्षधर कवि का ‘जन’ कौन है मैं आज भी ढूँढ़ रहा हूँ. क्यों कि खेत खलिहान में रहने वाला या मजदूर वर्ग तो इसे समझने से रहा, भवानी प्रसाद मिश्र जैसे कवि ने भी इसे एक बार पढ़ कर अलग रख दिया, दुबारा पढ़ने के लिए नहीं उठाया.                                                                                

अँधेरे की बात-

    अब ध्यान फिराते हैं इस लेख के शीर्षक पर. इस शीर्षक में एक तरह से ‘जिद’ संकलन का मूल कथ्य समेटा गया लगता है. समीक्षक अनुभव करता है कि राजेश जोशी अँधेरे समय में उजाला दिखाने वाले कवि तो हैं ही, अँधेरे का पर्दाफाश भी करने वाले कवि हैं. उजाला फैलाने और अँधेरे का पर्दाफाश करने के लिए वह ‘जिद’ ठाने हुए हैं. वह अपनी बात अंधेरा और उजाला का मानवीकरण कर रखते हैं.

    समीक्षक ने इस समीक्षा-लेख का नाम रखा है, अँधेरे के खिलाफ उजाले की जिद. तो समीक्षक को अपने लेख में इन दो बिंदुओं पर मुख्य रूप से फोकस रखना चाहिए था, यह अँधेरा क्या है और उजाला क्या है, जो नहीं रखा है.

    समीक्षक गोलमटोल शब्दों में कवि के अँधेरे की प्रतीति को सामाजिक अँधेरा कहते हैं. और इस सामाजिक अँधेरे को सत्ता द्वारा पैदा

किया मान लिए हैं. शायद अँधेरे के पर्दाफाश से उन्हें यह तथ्य मिला है.  

तो समाज में केवल सत्ता द्वारा पैदा किया ही अँधेरा है? और किस प्रकार के संकट और किस प्रकार के अनुभव उन्हें मिले, समीक्षक नहीं बताते.

    समीक्षक यह भी नहीं बताते कि यह सामाजिक अँधेरा है क्या. आज समाज भी अनेक है- दलित समाज, समाजवादी समाज, मार्क्सवादी समाज वगैरह. सबके अपने अँधेरे और सबके अपने उजाले हैं. इसे वह पाठक की समझ पर छोड़ देते हैं. (ऐसा कर समीक्षक का अपने दायित्व से बच लिकलना आसान है, आज के समीक्षकों में यह आम प्रवृत्ति दिखाई देती है.)

    कवि के अँधेरे को जानने के लिए मैंने इस संकलन की कविता अंधेरे

के बारे में कुछ वाक्य पर ध्यान जमाया. इसमें मुझे ये पंक्तियाँ मिलीं –

अँधेरे में सबसे बड़ी दिक़्क़त यह थी कि वह क़िताब पढऩा

नामुमकिन बना देता था।

    वैसे अँधेरे का काम ही क्या है. यह तो स्वाभाविक है.

    अँधेरा का यहाँ मानवीकरण किया गया है. अँधेरे ने जो भूतकाल में किया उसीका इसमें जिक्र किया गया है. वह “किताब पढ़ना नामुमकीन कर देता था” मतलब अब नहीं करता. समीक्षक यह नहीं बताता कि ‘था’ के प्रयोग से कवि का क्या प्रयोजन है. क्या ‘है’ के प्रयोग से वह प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता था. समीक्षक की पूरी समीक्षा ‘है’ में ही है,

    एक बात मेरी. मेरे जाने उजाले का न होना ही अँधेरा का होना है. किताबों पर पड़ती रौशनी जब हटती जाती है तब अँधेरा पसरता जाता है. यह तो कवि भी अनुभव करता है. यह एक सामान्य प्रक्रिया है इसमें अस्तित्वहीन अँधेरे का क्या दोष. उसने क्या बुरा किया?

    इस किताब को बुद्धि के उजाले का प्रतीक कैसे माना जाए. किताब

तो खुद अन्य उजाले से प्रकाशित होने पर ही दिखती है.

    कवि का अगला कथन है-

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या क़िताब (उजाला) से डरता था

    जिसका अस्तित्व ही उजाले के न होने से है वह शरारत क्या करेगा.

    इस कविता के पढ़ने पर अँधेरे का कोई स्पष्ट रूप नहीं उभरता. कवि इस अँधेरे के कई चेहरे का जिक्र करता है - 

लेकिन अँधेरे के अनेक चेहरे थे

         पॉवर-हाउस की किसी ग्रिड के अचानक बिगड़ जाने पर

         कई दिनों तक अन्धकार में डूबा रहा

         देश का एक बड़ा हिस्सा ।

    यह सामाजिक अंधकार तो नही है, तकनीक के फेल्योर से पैदा अंधकार है. ये पंक्तियाँ काव्यात्मक भी नहीं हैं. अँधेरे का मानवीकरण कर देने से ये काव्य-पंक्तियाँ नहीं बन जातीं. इससे क्या प्रतीकार्थ या लक्ष्यार्थ निकाला जाए. इस अँधेरे को दूर करने के लिए पावर हाउस के ग्रिड को ठीक करना ही काफी है जो एक इलेक्ट्रीशियन कर सकता है. वहाँ राजेश जोशी का उजाला या उसकी जिद क्या करेगी.

अँधेरे का एक चेहरा यह-

       लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था

       जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था

       या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले

       ग़ुलाम दिमाग़ों से !

    लगता है यहाँ समीक्षक की शोध-दृष्टि नहीं पड़ी है. कवि इस कविता में अँधेरे को पैदा करने वाली सत्ता की राजनीतिक जिद की बात करता है, अँधेरे के खिलाप उजाले की जिद की नहीं. इस कविता में अँधेरे को तोड़ने के लिए उजाले को जिद करते नहीं दिखाया गया है. मेरे देखे राजनीतिक सताएँ अँधेरा नहीं फैलातीं वरन् उजाले के केन्द्रों को ध्वस्त करती हैं और अँधेरा पाँव पसार देता है. गुलाम हों या आजाद उनमें अँधेरा नहीं फैलाया जाता, उनके पास उजाला पाने की जो युक्ति है उसे छीन लिया जाता है. क्योंकि वस्तुतः उजाले का ही अस्तित्व है अँधेरे का नहीं.

    राजनीति ने आज के समाज में बहुत अँधेरा पैदा किया है. इसमें कोई दो राय नहीं. यह उसने मनुष्य की स्वतंत्रता (उजाला) छीन कर किया है. दो उदाहरण सामने ही है, रूस के नोवेल पुरस्कार निजेता साल्झेनित्सिन और चीन के विचारक ल्यु श्याबाओ का. इन दोनों को सत्ता के सामाजिक विचार से भिन्न मत रखने के कारण जेल के भीतर डाल कर लेखन जगत और विचार जगत में अँधेरा पैदा किया गया. समीक्षक सत्ता द्वारा अँधेरा पैदा करने का उदाहरण कबीर और मुक्तिबोध के साथ किए गए सत्ता के व्यवहार को बताते है. वह भूल गए हैं कि सिकंदर लोदी धर्मांध था. उसने हाथी के पैर तले कबीर को कुचलवा कर अपने धर्म को ऊपर करना चाहा था. इससे कोई अँधेरा पैदा होता तो वह धार्मिक अँधेरा होता सामाजिक नहीं. किंतु वह यह अँधेरा पैदा कर नहीं सका. और मुक्तिबोध कोई इतिहासविद नहीं थे. कुछ इतिहासकारों के आधार पर उन्होंने विद्यार्थियों के लिए आर्य संस्कृति का जो चित्र खींचा था वह सर्वस्वीकार्य नहीं था. इसपर प्रतिबंध से कौन सा अँधेरा फैला? प्रतिबंध तो प्रेमचंद के सोजे वतन पर भी लगा था. अब रोमिला थापर आर्यों का इतिहास इक्ष्वाकु से मानती हैं, इसे कौन मानेगा.

    कवि के अनुसार इस राजनीतिक जिद से एक बौद्धिक अँधेरा भी पैदा होता था -  

एक बौद्धिक अन्धकार मौक़ा लगते ही सारे देश को

हिंसक उन्माद में झोंक देता था ।

सहृदय जन को यहाँ कुछ सोचने का अवसर मिलता है. यह बौद्धिक

अँधेरा है क्या, समीक्षक तो इसे स्पष्ट नहीं करते. मेरी समझ से सोच विवेक को अपहृत कर लेना ही बौद्धिक अँधेरा है. तो इसके उलट सोच विचार को पैदा करना ही उजाला प्रदान करना होगा. यह तो कृत्रिम ढंग से किया जा सकता है, शैक्षणिक जैसी विधियों से. कवि इस कविता में यह उजाला परदा को हटा कर या बंद कर करता है (आगे वे पंक्तियाँ उद्धृत की गई हैं). यह उजाला पहले से ही स्वतंत्र उपस्थित है.

    किंतु सत्ता हमेशा बौद्धिक अँधेरा ही पैदा करती हो ऐसा नहीं है. सत्ता ने कला, विचार-विवेक के क्षेत्र में भी योगदान दिया (उजाला पैदा किया) है, कलाकारों को सहयोग देकर. मनुष्य के सर्वांग को प्रकाशित करने वाले गौतम बुद्धों के उजाले पर तत्कालीन सम्राटों ने प्रतिबंध लगा कर अँधेरा पैदा करने की कोशिश नहीं की. वे उस उजाले को उनसे छीन भी कैसे सकते थे. मिनांडर ने तो नागार्जुन से बाकायदा शास्त्रार्थ किया था. राजपूत कला, मुगल कला जैसी कलाएँ भी सत्ता द्वारा विकसित हुईं हैं.

    कृत्रिम उजाला अँधेरे को दूर नहीं कर सकता. क्यों कि उसका होना न होना अधूरे व्यक्तियों के हाथ में होता है. जैसे कलबुर्गी मूर्तिपूजा को अंधविशास मान कर उसे जन से दूर करना चाह रहे थे. जबकि उन्हें जानना चाहिए था कि मीरा ने परमात्म तत्व के अनुभव के लिए मूर्ति को ही माध्यम बनाया था. और इस अंधविश्वास को मिटाने के लिए वह मूर्तियों की उपेक्षा करने की सीख देते थे. कहते थे कि मूर्तियों पर तो मूता जा सकता है. (यह समाचार उस समय के हिंदू दैनिक में छपा था.) मजा यह कि वह सामाजिक उजाले के पैरोकार थे.

अब उजाले की बात.

    समीक्षक के अनुसार कवि उजाला दिखाने वाला और अँधेरे का पर्दाफाश करने वाला कवि है. .

कविता अंधेरे के संबंध में कुछ वाक्य में राजेश जोशी ने रौशनी का भी जिक्र किया है-

रोशनी के पास कई विकल्प थे

      ज़रूरत पडऩे पर जिनका कोई भी इस्तेमाल कर सकता था

      ज़रूरत के हिसाब से कभी भी उसको

      कम या ज़्यादा किया जा सकता था

      ज़रूरत के मुताबिक परदों को खीच कर

      या एक छोटा सा बटन दबा कर

      उसे अन्धेरे में भी बदला जा सकता था

    कवि की रौशनी (उजाला) विकल्पों वाली है. इसका इस्तेमाल (शब्द पर ध्यान दें) किया जा सकता है, वह भी जरूरत के मुताबिक. यह रौशनी हमारे हृद-मन को प्रकाशित करने वाली नहीं, टार्च की रौशनी-सी है. क्या यही रौशनी अँधेरे (कवि ने इसे किसी गढ़ अर्थ में लिया है) को हटाने की जिद किए हुए है?

    मैं सोच में पड़ गया हूँ कि कविता में रौशनी (उजाले) के उजाले ने जिद कर रखी है तो उस जिद का जिक्र कहाँ है. यहाँ तो अवरोध हटाओ, अँधेरा गायब. अवरोध खड़ा कर दो अँधेरा हाजिर. यह अवरोध खड़ा करने वाला कौन है. केवल सत्ता? कबीर के उजाले को कोई सत्ता नहीं रोक सकी थी. आज के दिन सत्ता की एक बड़ी ताकत अमरीका (निक्सन का) ने ओशो को जहर दिया, उन निहत्थे को बाईस देशों तक खदेड़ा, वहाँ ठहरने के लिए उतरने नहीं दिया, उन्हें उनके अपने देश में रहने के लिए उसने तब अनुमति दी जब राजीव सरकार ने यह स्वीकार कर लिया कि किसी से उन्हें मिलने नहीं दिया जाए. प्रकांतर से समाज से काट दिया जाए. क्या ओशो के प्रकाश को रोका जा सका? उनके प्रकाश ने तो कोई जिद भी नहीं की. निक्शन की ज्यादती इसलिए नहीं थी कि दुनिया में अँधेरा पैदा करना है. वह इसलिए थी कि कहीं उनकी सिखावन ईसाइयत के ऊपर न हो जाए. वह स्वयं एक क्रूसेड (धर्मयुद्ध) की अगुआई करना चाह रहे थे. दुनिया में हैरी पॉटर के बाद सबसे अधिक बिकने वाली उन्हीं की प्रकाशप्रकीर्णक पुस्तकें है. उनकी पुस्तकों को छापने के लिए आज वह बाजार लालायित है, जिस बाजार को अन्यों के साथ समीक्षक भी कोसता है. बाजार अपने हानि-लाभ को जरूर देखता है. किंतु पुस्तक में कुछ जीवनदाई है तो उसे भी अंगीकार करता है. फणीशवर नाथ रेणु के मैला आँचल को प्रकाशक ओमप्रकाश ने खोज कर छापा था.

    राजेश जोशी की रौशनी का एक और विकल्प है –

    एक रोशनी कभी कभी बहुत दूर से चली आती थी हमारे पास

    एक रोशनी कहीं भीतर से, कहीं बहुत भीतर से

    आती थी और दिमाग को एकाएक रोशन कर जाती थी ।

    कवि यहाँ कुछ दार्शनिक-सा हो गया लगता है. समीक्षक ने इन, कहीं दूर से और कहीं भीतर से आती रौशनियों पर विचार ही नहीं किया है. ये कैसी रौशनियाँ (उजाले) हैं. सत्ता द्वारा पैदा किए गए अँधेरे का फाश करने, उसे दूर करने के लिए, उससे उलझने के लिए कवि के हाथ में जो उजाला है वह कैसा है, पर्दा हटाने से आने वाला या बटन दबाकर पैदा किया उजाला या इन दूर से और भीतर से आती रौशनियों का उजाला. इन अंतिम ऱौशनियों के उजाले का प्रभाव ऐसा है कि यह कवि के दिमाग को एकाएक रौशन कर देती थी (अब शायद नहीं करती). दिमाग तो किसी व्यक्ति का ही रौशन हो सकता है समाज का नहीं. तो फिर इससे सामाजिक अँधेरा केसे दूर हो सकेगा. समाज तो अनेक लोगों से बनता है. समाज के हर व्यक्ति पास ये ऱौशनियाँ आएँ तो ही तभी समाज रौशन हो सकता है, इस रौशनी को आने देने में या उसे आने से रोकने में सत्ता क्या कर सकती है. मुहम्मद साहब को ये रौशनियाँ उतरी थीं उनके विरोधी इसे रोक नहीं सके थे. इस उजाले को कवि फैलाता तो अँधेर को हटाने की ओर उसका एक कदम हो सकता था. किंतु कवि को केवल इन रौशनियों का अहसास भर है. केवल अहसास वाली रौशनी से न तो कोई विरोध सफल हो सकता है न कोई आंदोलन. वह भी कवि का एक शायर दोस्त उसके मन में एक शंका डाल देता है-

एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था

    वह शक ही नहीं करता था. वह-

           कहता था, उसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो

           रोशनी किस जगह से काली है

रौशनी देने वाले स्रोत के जिस हिस्से से रौशनी नहीं आ रही हो वह हिस्सा काला दिख सकता है पर रौशनी किस जगह से काली है यह देखने की बात समझ के बाहर है. कवि के दोस्त कुछ अनूठी दृष्टि वाले है.  

    तो यह है कवि राजेश जोशी का उजाला जिसकी प्रकृति ही अस्थाई है. जो खुद ही एक बटन के सहारे अंधेरे में बदला जा सकता है वह किस दम के साथ अंधेरे के खिलाफ कोई जिद ठान सकता है.

    कहा जा सकता है कि उक्त कविता में अंधेरे और उजाले के बिंब खड़े किए गए हैं. तो मैं इतना ही कहूँगा कि कबीर के पास भी एक उजाला था, स्थिर प्रकृति का. उस उजाले को जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने एक काव्य-बिंब खड़ा किया, लुकाठी और घर का. यह लुकाठी उजाले का पुंज प्रज्ज्वलित करती हुई लकड़ियों की ढेरी में से निकाल ली गई एक जलती हुई लकड़ी है, जो किसी घर (अंधेरा) को जला कर उजाला पैदा कर सकती है. (उजाला आता है तो अँधेरा स्वतः हटता जाता है, इसे अँधेरे का जलना कहा जा सकता है). उजाले और अंधेरे के ये कबीर के बिंब बहुत स्वाभाविक हैं. हमारे बोध में सहज रूप से उतर जाते हैं.

अब उजाले की जिद की बातः

    समीक्षक ने अपनी समीक्षा में यह साफ नहीं किया है कि कवि के पास उजाला कौन सा है और उजाले की जिद की बात करने लगता है.  कवि की ‘जिद’ शीर्षक से लिखी दो कविताओं में ऐसा कुछ भी नहीं दिखता. द्वीतीय ‘जिद‘ कविता में निराशा कवि के पीछे पड़ी हुई है. कवि मीटिंग का बहाना बनाकर उससे पीछा छुड़ाना चाहता है. यह कह कर कि तुम वही बातें कहोगी जो अन्य कहते हैं. वे (अँधेरे के) विरुद्ध एजेंडा बनाते हैं, किसी उद्यान में मीटिंग करते हैं, समाचार बनाकर छपवा देते हैं. लेकिन उनपर भी कभी कभार उदासी छा जाती है. प्रथम ‘जिद’ कविता से पता चलता है कि वे विरोध के लिए अपनी जेबें निचोड़ते हैं, पोस्टर बनाते हैं, प्रदर्शन करते हैं. पर यह सब तो शासन से कुछ माँगने के लिए किया जाता है. ऐसे विरोध को समीक्षक कवि के उजाले की जिद मान लेता है. हालाँकि कवि ने कविता में इस विरोध को अन्यों द्वारा किया जाता बताया है. यह जिद कवि की है, कैसे कहा जा सकता है. क्या यह जिद है भी?

    समीक्षक कवि को बेचैनी से भरा एक संबेदनशील कवि कहते हैं. गजब की बेचैनी और संवेदनशीलता है इन कवि में. वह इतना बेचैन हैं कि अपनी ‘गुरुत्वाकर्षण’ कविता में न्यूटन से गुरुत्वाकर्षण के अपने नियम को वापस ले लेने का उनसे गुहार करते हैं. क्योंकि पृथ्वी फिसल रही है (अगर यह अनुभूति है तो कवि अनोखी अनुभूति वाले कवि हैं). क्या नियम वापस ले लेने से पृथ्वी का फिसलना बंद हो जाएगा? न्यूटन एक वैज्ञानिक थे. वैज्ञानिकों के आविष्कार को मनुष्य जाति का आविष्कार माना जाता है. पर यह कवि सीधे उससे अपना पिंड छुड़ा लेते हैं- न्यूटन तुम अपना..नियम वापस ले लो...राषट्राधयक्षों की जबान कब फिसल जाए कोई नहीं कह सकता. जहाँ तक संवेदनशीलता का प्रश्न है, इन पंक्तियों से कौन सी संवेदनशीलता संप्रेषित होती है. मेरे जाने कविता में संवेदनशीलता पिरोना होता है.

    समीक्षक बहुपठित लगते हैं, शोध-छात्र हैं. कवि की बेचैनी और संवेदनशीलता के संभवतः उदाहरणस्वरूप ही ये पेक्तियाँ उद्धृत की हैं.

      अँधेरे से जब बहुत सारे लोग डर जाते थे

      और उसे अपनी नियति मान लेते थे

      कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में

      जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही

      रोशनी के बारे में गाना है ।

वो अँधेरे के समय में अँधेरे के गीत गाते थे

अपनी वेचैनी में कवि पीछे मुड़ कर (‘थे’ की अभिव्यंजना) देखता है. वहाँ उसे बहुत से लोग डरे हुए दिखते हैं जो अँधेरे को अपनी नियति मान लिए हैं. कुछ जिद्दी लोग भी दिखे जो जिंदगी को हार बैठे थे और अँधेरे का गीत गाने में ही अपनी सुरक्षा समझते थे, अँधेरे के बारे में गाना ही वे रौशनी के बारे में गाना मानते थै. यह किन लोगों की तरफ ईशारा है, भारतीय लोगों की या पश्चिमी लोगों की तरफ? मैथिली शरण गुप्त ने तो अतीत के अँधेरे में हुए उजाले की और उसे प्रयोग करने वालों के गीत अपने समय के अँधेरे में गाए थे, और निराला ने भी. इन लोगों ने अँधेरे के बारे में गीत गाकर उजाले का गीत समझने को नहीं कहा था.

    अँधेरे के बारे में गाना रौशनी के बारे में गाना कैसे है, समीक्षक ने इसको स्पष्ट करने में रुचि नहीं ली है. अँधेरे के बारें गाना, मेरी समझ से अँधेरे की सत्ता को मानकर उसकी जुगाली करना ही है. यह भारतीय मनीषा की जातीय प्रकृति नहीं है. फिर राजेश जोशी को इसका इलहाम कहाँ से हुआ. जरा इन पंक्तियों पर गौर करें-

क्या अँधेरे वक्त में भी गीत गाए जाएँगे

       हाँ, गाए जाएँगे

       अँधेरे वक्त में भी अँधेरे के गीत गाए जाएँगे। ---  बर्तोल्त ब्रेखत       

(वसुधा, मार्च-17)

    बर्तोल्त ब्रेख्त जर्मनी के कवि और नाटककार थे. बीसवीं सदी के जर्मनी के संदर्भ में उन्होंने यह कविता लिखी थी. आश्वित्ज कैंप के उत्पीड़न से वहाँ का एक चिंतक इतना निराश हो गया था कि उसने कविता लिखने की ही मनाही कर दी थी जबकि हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही से जापान ने हिम्मत नहीं हारी. संभव है ब्रेख्त ने सोचा हो अँधेरे के गीत में अँधेरे को दिखाते हुए उसमें चतुराई से जागरण की ध्वनि लपेट कर गाया जाए. हो सकता है उन्हें अपने जर्मनी देश के लिए ऐसा करना ही उपयुक्त लगा हो. जर्मनी के अवाम की नब्ज उनमें धड़कती थी. लेकिन इस अँधेरे के गीत को उजाले का गीत तो नहीं कहा जा सकता. कवि के लिए भारतीय संदर्भ में भारतीय अवाम की नब्ज को अपने हृदय में धड़कने देना चाहिए. अब इक्कसवीं सदी के भारत के संदर्भ में उक्त पंक्तियों का अनुभव कितना उपयुक्त बैठता है. देखने की बात है. जापानियों के उत्साहावेग को हम क्यों नहीं कोट करते?

    समीक्षक यह नहीं समझा पाए हैं कि उजाला और उजाले की जिद से इन पंकतियों का क्या ताल मेल है.

पुनश्चः

    यह शोध करने योग्य है कि राजेश जोशी का अँधेरे और उजाले का चिंतन उनके अपने चिंतन की उपज हैं या ब्रेख्त से लिया गया है.

मेरा ध्येय राजेश जोशी के ‘जिद’ कोव्य-संकलन की समीक्षा करना नहीं, जगन्नाथ दूवे की समीक्षा पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखनी थी. आज की आलोचना में आलोच्य की विवेचना की क्या पद्धति है यही जानने की मेरी अभिप्सा थी. क्योंकि अक्सर पढ़ने को मिलता है कि आज की आलोचना अपने पूर्व स्तर से च्युत हो गई है. मैंने इस समीक्षा में अनुभव किया कि संकलन में जो कहा गया है उसपर ध्यान न टिकाकर उसके माध्यम से समीक्षक अपनी बातें कहने में अधिक रुचि रखते है.

आलोचना ऐसी होनी चाहिए जिससे उस पुस्तक को पढ़ने में पाठक की रुचि जगे.


हर बार की तरह एक बार फिर हम स्वाधीनता पर्व मनाने जा रहे हैं. हर बार की तरह हम सबकी जुबान पर शिकायत होगी कि आजादी के 70 सालों के बाद भी हम विकास नहीं कर पाये. कुछ लोगों की शिकायतों का दौर यह होता है कि इससे अच्छा तो अंग्रेजों का शासन था. यह समझ पाना मुश्किल है कि क्या इन 70 सालों में भारत ने विकास नहीं किया? क्या विश्व मंच पर भारत की उपस्थिति नहीं दिखती है? क्या भारत ने स्वयं को महाशक्ति के रूप में स्थापित करने में सफलता प्राप्त नहीं की है? इन सवालों का जवाब हां में होगा तो फिर विकास का पैमाना क्या हो? सन् 1947 से लेकर 2017 तक का जब हम आंकलन करते हैं तो पाते हैं कि ऐसा कोई सेक्टर नहीं है जहां भारत ने कामयाबी के झंडे नहीं फहराया हो लेकिन भारतीय मानसिकता हमेशा से शिकायत की रही है और हम तकियाकलाम की तरह विकास नहीं होने की बात को कहते रहे हैं. यह शिकायत की मानसिकता हमारी ऐसी बन चुकी है कि हम अपने देश पर अभिमान कर नहीं पाते हैं. हम अपने देश की खूबियों को भी लोगों के सामने नहीं रख पाते हैं. दरअसल, भारत जैसे महादेश में लोगों ने अपने अपने टापू सरीखे घर और मन बना लिए हैं, जहां वे स्वयं को कैद रखते हैं. वे बाहर की दुनिया से कटे हुए हैं और उन्हें लगता है कि बाकि दुनिया विकास के आसमां छू रही है और भारत को अभी बहुत कुछ करना बाकी है.

इस शिकायतनामा को आप खारिज नहीं कर सकते हैं क्योंकि विकास सतत प्रक्रिया है और जितना हुआ या हो रहा है, उससे आगे की उम्मीद बनी रहती है. इस स्वाधीनता पर्व पर हमें नागरिक जिम्मेदारी के साथ आगे आना होगा. अपने आपसे यह वायदा करना होगा कि देश के विकास के लिए पहले वह अपने आसपास का विकास करेंगे. इसके लिए सबसे पहली और जरूरी शर्त है कि हम स्वयं को आत्मनिर्भर बनायें. शिकायतों की बात करें तो हमें इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि इन 70 सालों में हम पराश्रित रहे हैं. हमारी निर्भरता हर बात पर सरकार पर रही है. हम उम्मीद करते हैं कि हमारी हर जरूरत सरकार पूरा करेगी. फिर वह बुनियादी जरूरतें यथा सडक़, पानी, बिजली, स्वास्थ्य और रोजगार दिलाने का काम सरकार का है. मुसीबत टूटने पर सरकार को कोसने में हम पीछे नहीं हटेंगे.

लेकिन क्या कभी हमने अपने अपने स्तर पर सोचा है कि इस देश के प्रति, भारत की माटी के प्रति हमारा अपना भी कोई दायित्व है? कोई कर्तव्य है? शायद नहीं. हमने तो केवल और केवल अधिकारों की बात की है. हमारी इस कमजोरी को राजनीतिक दलों ने बखूबी भांप लिया है और यही कारण है कि राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र में ऐसे वायदे किए जाते हैं, जिसे पूरा करने का अर्थ नागरिकों को निकम्मा बनाना है. बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुए हैं. लगभग दो दशक से लोकतांत्रिक और चुनी हुई सरकारों ने आम आदमी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के बजाय उनकी निजी जरूरतों को पूरा करने में अपना ध्यान लगा दिया है. रोजगार के अवसर उत्पन्न करना सरकार का काम है लेकिन लगभग मुफ्त की कीमत में खाद्यान्न उपलब्ध कराना सरकार का काम नहीें है लेकिन सरकारें ऐसा कर रही हैं. बच्चे के पैदा होने से लेकर उसकी शादी-ब्याह तक की जिम्मेदारी सरकार ने ओढ़ ली है. यह काम सरकार का नहीं है. सरकार का काम है कि समाज को बेहतर शिक्षा, रोजगार के बेपनाह अवसर, अच्छी सडक़ें, बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था और अपराधमुक्त समाज की संरचना करना है तो यह सारे काम पीछे छूटकर अन्नप्रासन्न संस्कार से लेकर तीर्थदर्शन तक की जवाबदारी सरकार सम्हाल रही है.

राजनीतिक दलों ने वोटबैंक पक्का करने के लिए स्वयं को समाज की बुनियादी ढांचा दुरूस्त करने से खुद को दूर कर लोकलुभावन की योजनाओं को अमल में लाने की पहल की है. आम आदमी को लगता है कि सरकार उसके लिए चिंतित है लेकिन सच तो इसके खिलाफ है क्योंकि हमारी दैनंदिनी जरूरतों के लिए हमें स्वयं को मेहनत करना चाहिए तो हमें वह सब करने की जरूरत नहीं है. राजनीतिक दलों की इस मेहरबानी से समाज की समरसता टूट रही है. इसी समाज के एक बड़े वर्ग को राहत देने की बेवजह कोशिशों से एक दूसरे वर्ग में निराशा उत्पन्न हो रही है. इस स्थिति के लिए वोटबैंक पकाऊ राजनीतिक दल जवाबदार हो सकते हैं लेकिन इसके लिए आम आदमी में पनपता लालच पहले जवाबदार है.

केन्द्र की मोदी सरकार ने जब सब्सिडी खत्म करने की कड़ी पहल की तो लोगों को शिकायत हो गई लेकिन इसकी बड़ी जरूरत है. उच्च या निम्र आय वर्ग के व्यक्ति के लिए रोजगार के अधिकतम अवसर उत्पन्न करना सरकार का काम है लेकिन सुविधाओं की पूरी कीमत चुकाना नागरिक दायित्व है. ऐसे में मोदी सरकार से शिकायत क्यों? होना तो यह चाहिए कि मोदी सरकार पहले चरण में अपने दल के शासित राज्यों में नियम लागू कर दे कि इस तरह के लोकलुभावन योजनाओं का कोई लाभ नहीं दिया जाएगा. इसके स्थान पर रोजगार के नए अवसर उत्पन्न किए जाएंगे और हर हाथ को अधिकतम काम दिए जाएं जिससे वह आर्थिक रूप से सक्षम हो. इससे ना केवल सरकार पर आश्रित रहने का भाव खत्म होगा बल्कि हर आदमी के भीतर अपने देश को लेकर स्वाभिमान जागेगा. क्योंकि सच यह है कि मेहनत की कमाई ही हर आदमी के भीतर उसके सम्मान को जागृत करती है.

स्वाधीनता पर्व के इस पावन पर्व पर हमें संकल्प लेना होगा कि चुनाव के समय लोक-लुभावन घोषणाओं के फेर में हम सब नहीं आएंगे. बल्कि जो राजनीतिक दल ऐसा करेगा, उसका बॉयकाट करेंगे क्योंकि सरकारों का काम बुनियादी जरूरतों को पूरा करने का है ना कि आम आदमी की निजी जरूरतों को पूरा कर निकम्मा बनाने का. जिस दिन हम इस मुफ्तखोरी से स्वयं को मुक्त कर लेंगे, आप यकीन रखिए आजादी का सही अर्थों में हम आनंद उठा पाएंगे. कल तक हम अंग्रेजों के गुलाम थे, आज मुफ्तखोरी ने हमारी आजादी छीन ली है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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जनता को सूचना का कानूनी अधिकार भले ही दे दिया है पर इससे इंकार किया जाना मुश्किल है कि अभी भी आम जनता तो क्या विभागों के लोक सूचना अधिकारियों तक में इस कानून की जानकारी और जागरूकता का अभाव है। मिसाल के तौर पर राजस्थान में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार वहाँ 18 प्रतिशत लोक सूचना अधिकारियों (पीआईओ) को इसके आवेदन फार्म तक की जानकारी नहीं है और तो और केवल 20 प्रतिशत पीआईओ को पता है कि इस नए कानून के तहत उन्हें पीआईओ के रूप में जनता और अपने विभाग के बीच सूचना के आदान-प्रदान का माध्यम बनाया गया है।

रपट के बारे में सूचना के अधिकार के अधिकार की जानकारी जिन लोगों को है उनमें से बहुत कम लोग इसका उपयोग कर रहे हैं। बाजार प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता मामलों पर अध्ययन एवं परामर्श सेवा देने वाले गैर सरकारी संगठन कट्स इंटरनेशनल ने महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना और इंदिरा आवास योजना में भ्रष्टाचार का पता लगाने और इसे रोकने के लिए आरटीआई के उपयोग और प्रभाव जानने के लिए एक सर्वेक्षण किया। यह सर्वेक्षण राजस्थान के शहरी और अर्धशहरी इलाकों में किया गया।

कट्स की इस रिपोर्ट को प्रस्तुत करने वाले मधुसूदन शर्मा ने कहा कि इन योजनाओं में 78 प्रतिशत पीआईओ ने कहा कि उन्हें इस कानून की जानकारी है, पर उनमें से ज्यादातर ने इस अधिनियम के तहत सूचना उपलब्ध कराने में उदासीनता दिखाई। कट्स की सर्वे रिपोर्ट की जानकारी देते हुए संस्था के निदेशक जॉर्ज चेरियन ने बताया कि जयपुर और टोंक जिलों में संस्था इस सर्वेक्षण में मात्र 37 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के बारे में सुना है, जबकि इनमें से 5-6 प्रतिशत लोग ही इसका उपयोग कर रहे हैं।

राजस्थान में मात्र 26 प्रतिशत लोग जानते हैं कि आरटीआई के लिए कोई आवेदन फार्म भी होता है। जबकि सिर्फ सात आठ प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जिन्हें आरटीआई के तहत 30 दिन में जवाब मिलने की समय सीमा अथवा सूचना न मिलने पर प्रथम अथवा द्वितीय अपीलीय अधिकारी की जानकारी है। रिपोर्ट के मुताबिक 43 लोगों ने कहा कि भ्रष्टाचार रोकने में आरटीआई एक सक्षम हथियार हो सकता है। 39 प्रतिशत ने कहा कि यह कानून लागू होने से सरकार की योजनाओं में पारदर्शिता आई है।

सर्वे में शामिल किए गए लोगों ने कहा कि निगरानी की कमी, बड़े अधिकारों के ध्यान न देने और जनभागीदारी के अभाव में नरेगा, इंदिरा आवास योजना और स्वण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना जैसे कार्यक्रमों में भ्रष्टाचार को जन्म मिलता है। श्री चेरियन ने कहा कि सूचना के अधिकार के साथ-साथ जबावदेही का अधिकार भी होना चाहिए, ताकि सरकार के हर स्तर पर सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित कराई जा सके। राजस्थान सरकार के प्रशासनिक सुधार विभाग के उपसचिव श्री एसपी बस्वाला ने कहा कि नरेगा और इंदिरा आवास जैसी योजनाओं में जन-भागीदारी बहुत जरूरी है। कहा गया है कि आम लोगों को उनके अधिकारों की प्रति जागरूक किया जाएगा, तभी कल्याणकारी योजनाओं को कारगर तरीके से लागू किया जा सकता है।

इधर सूचना के अधिकार पर केंद्रित योजना आयोग को विजन फाऊंडेशन द्वारा पूर्व में सौंपे गए दस्तावेज के अनुसार संविधान के अनुच्छेद १९ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा में कहा गया है-भारत के सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति और अभिभाषण की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है।साल १९८२ में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार के कांमकाज से संबंधित सूचनाओं तक पहुंच अभिव्यक्ति और अभिभाषण की स्वतंत्रता के अधिकार का अनिवार्य अंग है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा-सरकारी कामकाज में खुलेपन का विचार सीधे सीधे सरकारी सूचनाओं को जानने के अधिकार से जुड़ा है और इसका संबंध अभिभाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से है जिसकी गारंटी संविधान के अनुच्छेद १९(ए) में दी गई है। इसलिए, सरकार को चाहिए कि वह अपने कामकाज से संबंधित सूचनाओं को सार्वजनिक करने की बात को एक मानक की तरह माने और इस मामले में गोपनीयता का बरताव अपवादस्वरुप वहीं औचित्यपूर्ण है जब जनहित में ऐसा करना हर हाल में जरुरी हो। अदालत मानती है कि सरकारी कामकाज से संबंधित सूचनाओं के बारे में गोपनीयता का बरताव कभी कभी जनहित के लिहाज से जरुरी होता है लेकिन यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि सूचनाओं को सार्वजनिक करना भी जनहित से ही जुड़ा हुआ है।

इडियन इविडेंस एक्ट,१८७२, की धारा ७६ में वे बातें कहीं गई हैं जिन्हें सूचना के अधिकार का बीज रुप माना जा सकता है। इस धारा के तहत प्रावधान किया गया है कि सरकारी अधिकारी को सरकारी कामकाज के कागजात मांगे जाने पर वैसे व्यक्ति को दिखाने होंगे जिसे इन कागजातों के निरीक्षण का अधिकार दिया गया है। परंपरागत तौर पर भारत में शासन-तंत्र अपने कामकाज में गोपनीयता का बरताव करता आ रहा है। इसके लिए अंग्रेजो के जमाने में बने ऑफिशियल सिक्रेसी एक्ट का इस्तेमाल किया गया। इस एक्ट को साल १९२३ में लागू किया गया था। आगे चलकर साल १९६७ में इसमें थोड़े संशोधन हुए । इस एक्ट की व्यापक आलोचना हुई है। द सेंट्रल सिविल सर्विस कंडक्ट रुल्स, १९६४ ने ऑफिशियल सिक्रेसी एक्ट को और मजबूती प्रदान की क्योंकि कंडक्ट रुल्स में सरकारी अधिकारियों को किसी आधिकारिक दस्तावेज की सूचना बिना अनुमति के किसी को को बताने या आधिकारिक दस्तावेज को बिना अनुमति के सौंपने की मनाही है।

इंडियन इविडेंस एक्ट, १८७२, की धारा १२३ में कहा गया है कि किसी अप्रकाशित दस्तावेज से कोई प्रमाण संबंधित विभाग के प्रधान की अनुमति के बिना हासिल नहीं किया जा सकता और संबंधित विभाग का प्रधान चाहे तो अपने विवेक से अनुमति दे सकता है और चाहे तो नहीं भी दे सकता है। सरकारी कामकाज के बारे में सूचनाओं की कमी को कुछ और बातों ने बढ़ावा दिया। इसमें एक है साक्षरता की कमी और दूसरी है सूचना के कारगर माध्यम और सूचना के लेन-देन की कारगर प्रक्रियाओं का अभाव। कई इलाकों में दस्तावेज को संजो कर रखने का चलन एक सिरे से गायब है या फिर दस्तावेजों को ऐसे संजोया गया है कि वे दस्तावेज कम और भानुमति का कुनबा ज्यादा लगते हैं। दस्तावेजों के अस्त-व्यस्त रहने पर अधिकारियों के लिए यह कहना आसान हो जाता है कि फाइल गुम हो जाने से सूचना नहीं दी जा सकती।

साल १९९० के दशक के शुरुआती सालों में राजस्थान के ग्रामीण इलाके के लोगों की हक की लड़ाई लड़ते हुए मजदूर किसान शक्ति संगठन ने व्यक्ति के जीवन में सूचना के अधिकार को एक नये ढंग से रेखांकित किया। यह तरीका था-जनसुनवाई का। मजदूर किसान शक्ति संगठन ने अभियान चलाकर मांग की कि सरकारी रिकार्ड को सार्वजनिक किया जाना चाहिए, सरकारी खर्चे का सोशल ऑडिट(सामाजिक अंकेक्षण) होना चाहिए और जिन लोगों को उनका वाजिब हक नहीं मिला उनके शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए। इस अभियान को समाज के की तबके का समर्थन मिला। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता, नौकरशाह और वकील तक शामिल हुए।

प्रेस काउंसिल ऑव इंडिया ने साल १९९६ में सूचना का अधिकार का पहला कानूनी मसौदा तैयार किया। इस मसौदे में माना गया कि प्रत्येक नागरिक को किसी भी सार्वजनिक निकाय से सूचना मांगने का अधिकार है।ध्यान देने की बात यह है कि यहां सार्वजनिक निकाय शब्द का मतलब सिर्फ सरकारी संस्थान भर नहीं था बल्कि इसमें निजी क्षेत्र के सभी उपक्रम या फिर संविधानएतर प्राधिकरण, कंपनी आदि शामिल हैं। इसके बाद सूचना के अधिकार का एक मसौदा कंज्यूमर एजुकेशन रिसर्च काउंसिल(उपभोक्ता शिक्षा अनुसंधान परिषद) ने तैयार किया। यह सूचना पाने की स्वतंत्रता के संबंध में सबसे व्यापक कानूनी मसौदा है। इसमें अंतर्राष्ट्रीय मानको के अनुकूल कहा गया है कि बाहरी शत्रुओं के छोड़कर देश में हर किसी को हर सूचना पाने का अधिकार है।

आखिरकार साल १९९७ में मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन में संकल्प लिया गया कि केंद्र और प्रांत की सरकारें पारदर्शिता और सूचना के अधिकार को अमली जामा पहनाने के लिए काम करेंगी। इस सम्मेलन के बाद केंद्र सरकार ने इस दिशा में त्वरित कदम उठाने का फैसला किया और माना कि सूचना के अधिकार के बारे में राज्यों के परामर्श से एक विधेयक लाया जाएगा और साल १९९७ के अंत तक इंडियन इविडेंस एक्ट और ऑफिशियल सीक्रेसी एक्ट में संशोधन कर दिया जाएगा। सूचना की स्वतंत्रता से संबंधित केंद्रीय विधेयक के पारित होने से पहले ही कुछ राज्यों ने अपने तईं सूचना की स्वतंत्रता के संबंध में नियम बनाये। इस दिशा में पहला कदम उठाया तमिलनाडु ने(साल १९९७)। इसके बाद गोवा(साल १९९७), राजस्थान(२०००), दिल्ली(२००१)महाराष्ट्र(२००२), असम(२००२),मध्यप्रदेश(२००३) और जम्मू-कश्मीर(२००४) में नियम बने।

सूचना की स्वतंत्रता से संबंधित अधिनियम(द फ्रीडम ऑफ इन्फारमेशन एक्ट) भारत सरकार ने साल २००२ के दिसंबर में पारित किया और इसे साल २००३ के जनवरी में राष्ट्रपति की मंजूरी मिली। सन २००५ से यह क़ानून पूरे देश पर लागू है लेकिन इस अधिनियम के प्रावधानों को नागरिक समाज ने अपर्याप्त मानकर आलोचना की है। वहीं सर्वेक्षणों में बार-बार् यह बात सामने आ रही है कि जानकारी,जागरूकता और प्रतिबद्धता के अभाव में इस का असर देखना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। यह एक बड़ी चुनौती है।

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लेखक आटीआई स्टेट रिसोर्स पर्सन

और दिग्विजय कालेज, राजनांदगांव

के राष्ट्रपति सम्मानित प्रोफ़ेसर हैं।

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