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व्यंग्य की जुगलबंदी-35 'बिना शीर्षक’
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व्यंग्य की 35 वीं जुगलबंदी का विषय था -बिना शीर्षक। मतलब जो मन आये लिखा जाये। मतलब एक तरह का ’ओपन मन इम्तहान’। खुल्ला खेल फ़रक्खाबादी। कुल 16 लोगों ने 17 लेख लिखे। सबसे पहला लेख आया आलोक खरे का। उन्होंने तो ’इधर विषय आया उधर लेख सटाया।’ कल को हम पर आरोप लगाये कि हमने ले-देकर आलोक को पहले से पर्चा आउट कर दिया तो हमको जमानत न मिले।

बहरहाल

, ALok Khare

ने जुगलबंदी को भगीरथ प्रयास बताया और अनूप शुक्ल से मजे लेते हुये नमन किया। मने फ़ुल मौज। 90 और 10 वाला सम्पुट भी दोहरा दिया। हाल यह हुआ कि हिम्मत इतनी बढी कि अपनी श्रीमती जी को भी बिजी की जगह इजी रहने की सलाह दे डाली। फ़िर किसिम किसिम के किस का किस-किस बहाने वर्णन किया वह आप खुद ही देख लीजिये उनकी पोस्ट में। हम कुछ बतायेंगे तो आपका मन भरेगा नहीं। एक और बात जो सिर्फ़ आपको बता रहे हैं। किसी को बताइयेगा नहीं- इसमें एक ठो रॉयल किस का किस्सा भी है। बांचिये फ़टाक देना। लिंक यह रहा:

https://www.facebook.com/alok.khare3/posts/10210728465302710

आलोक खरे के फ़ौरन बाद हमारे

Anshuman Agnihotri

जी ने विषय में कई छेद देखे और हर छेद पर कारतूस दागे। देखिये उनका शब्द कारतूस से गंजा हुआ लेख :

“क्या शीर्षक सोच कर व्यंग्य लिखा जाता है ? लोग अपनी झोंक में लिख मारते हैं , फिर हेडिंग ढूंढ़ते हैं ।एक महान लेखक ने , न मिला , तो शीर्षक दिया as you like it .

कई लोग लिखने में बड़े सक्षम, पर किताब का नाम धराने के लिए विकल होकर किसी भी पीर बावर्ची भिश्ती खर से नाम धरा कर छपा लेते हैं ,फिर कहते हैं _ चलो किस्सा खत्म हुआ वरना बड़ी सिरदर्दी थी ।

बिना शीर्ष , मने बिना सिर का हो तो कोई पूजनीय और कोई निंदनीय हो जाता है ।जैसे छिन्न मस्ता की मूर्ति पूजनीय और कबंध निंदनीय ।

कोई सरकटा डरावना होता है, कोई नहीं । किसी किसी कारखाने में रात्रिपाली में सरकटा अंगरेज अकेला आदमी पा कर सिगरेट मांगता है ।

शीर्षक विहीन लिखना , अश्वमेध के घोड़े. की तरह छुट्टा घूमना है, आगे नाथ न पीछे पगहा , पर शीर्षक बताने को ज्ञानी चाहिए ।अपने लड़के का नामकरण कराने को पंडित जी के पास जाना पड़ता है ।“

समीरलाल उर्फ़

Udan Tashtari

एकदम राजा बेटा टाइप लेखक हैं। जो विषय मिला उसी पर मन लगाकर लिखने लगे। सबेरे उठकर। उनको पता है सुबह की पढाई-लिखाई में बरक्कत होती है। लेख में नेता, जनता, आग, दरिया, भक्त, भगवान, चमचों, पिछलग्गुओं का जमावड़ा कर डाला समीर भाई ने। बिना शीर्षक लेख है इसका ये मतलब थोड़ी कि लेख बिना भीड़-भाड़ के होगा। झांसे में लेकर पूरा लेख पढवा दिया और फ़िर कहते हैं -बिन शीर्षक क्या लिखें। देखिये पूरा लेख इस कड़ी पर पहुंचकर:

https://www.facebook.com/udantashtari/posts/10155043592386928

Taau Rampuria

ने क्या लिखें, कैसे लिखें सोचते-बताते सभी व्यंग्यकारों के मतलब की बात बता दी:

“व्यंगकार वही जो साठा पाठा होकर भी बछडे की तरह कहीं भी सींग घुसेडने में माहिर हो।“

सभी लोग मानेंगे कि इस पैमाने पर तो वे सच्चे व्यंग्यकार हैं। बहरहाल ताऊ रामपुरिया ने अपनी बात पर अमल किया और सच्चे ’व्यंग्य-बछड़े’ की तरह “माता बखेडा वाली” का नाम लेकर “संटू भिया कबाड़ी”, कबीरदास, परसाईजी और न जाने कहां-कहां अपने सींग घुसाते हुये जो लिखा उसको आप इस लिंक पर पहुंचकर बांचिये और बताइये कि ताऊ सच्चे व्यंग्यकार हैं कि नहीं:

https://www.facebook.com/taau.rampuria/posts/10212826557489868

अर्चना चावजी

ने इसबार संवाद शैली का चुनाव किया अपनी बात कहने के लिये। शीर्षक, अनूप शुक्ल और व्यंग्यकारों से कम्बोमौज लेते हुये वे लिखती हैं:

“व्यंगों की जमात के सिर चुनकर लोग उस पर ताज रखते हैं फिर उसका शीर्ष कभी भी, कहीं भी किसी भी तरह इस्तेमाल करने लगते हैं, जबकि मोलभाव पिछलग्गी दुमों का किया धरा होता है clip_image003
-ओह!बात तो सई कही,अब ये बता मेरे पास क्यों आया?
-इस बार भी छपना है,साबजी ! "बिना शीर्षक"
-उससे क्या होगा?
-साबजी दुम के भाव बढ़ेंगे,जुगलबंदी शहर के शहंशाह सरसती देस में नाम कमाएंगे ....
-और ?
-और लोग जान जाएंगे कि व्यंग्य भी "बिना शीर्ष के" जिंदा रहकर यानि छपकर ताज वालों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकता है ।
-शाबास!
-तो हाँ समझूं साबजी
-अरे हाँ, बिंदास जा और फेसबुक वॉल पे ड्यूटी संभाल...."बिना शीर्ष के"

पूरा लेख इस लिंक पर पहुंचकर बांचिये :

https://www.facebook.com/archana.ch…/posts/10209521196609025

हमारे साथी

Manoj Kumar

ने इस लेख के बहाने अपनी आपबीती सी बखान मारी। बिना सरनेम का आदमी , बिना शीर्षक के लेख की तरह होता है। जो मिलता है अपने हिसाब से सरेनेम/शीर्षक सोचता है। जो हुआ वह खुदै बांच लीजिये। बूझने में आसानी होगी:

“कचहरी के बाबू ने मुझसे पूछ दिया, “आपका नाम?”
मैंने कहा, “मनोज कुमार।”
उन्हें संतोष नहीं हुआ, पूछा - “आगे ..”
मैंने कहा, “कुछ नहीं।”
वे फिर बोले, “कुछ तो होगा न ..?”
मैंने फिर कहा, “यही, और इतना ही है।”
वे बोले, “पर, नाम तो आपको पूरा बताना चाहिए।”
मैंने कहा, “पूरा ही बताया है।”
वे खीज गए, “अरे भाई! शर्मा, वर्मा, राय, प्रसाद, ... कुछ तो होगा ... सरनेम।”
मैंने समझाया, “भाई साहब! मेरा नाम तो मनोज कुमार ही है --- और वैसे भी – उपनाम में क्या रखा है?”
उन सज्जन ने ऐसी घूरती नज़र मुझपर डाली – जैसे वे रुद्र हों और अभी मेरी दुनिया भस्म कर देंगे।
तब मुझे लगा कि शायद इनके लिए उपनाम में बहुत कुछ रखा है।
इंसानी फ़ितरत ही यही है, – वह नाम कमाए न कमाए, उपनाम गँवाने से बहुत डरता है। यह हमारी कमज़ोरी है। इंसान आज इतना कमज़ोर हो गया है कि छोटी-छोटी चीज़ों से डर जाता है और बहादुर भी इतना है कि भगवान से नहीं डरता। “

मनोज कुमार का पूरा लेख बांचने के लिये इधर पहुंचिये लेकिन उसके पहले लेख का हसिल-ए-अनुभव मुलाहिजा फ़र्मा लीजिये।काम आयेगा:

“जिनके उपनाम ही न हों, उनकी तो फाइल न आगे बढ़ती है और न ही बंद होती है। उसकी उठा-पटक होती रहती है – कभी इस पाले में तो कभी उस पाले में।“
लेख का लिंक यह रहा:

https://www.facebook.com/mr.manojiofs/posts/10203077669818217

भाई

Vivek Ranjan Shrivastava

ने पहले तो उस्ताद लेखक की तरह लेख के विषय ’बिना शीर्षक’ का सहारा लेते हुये अपनी एक कविता ठेल दी जिसका शीर्षक ही ’शीर्षक’ था। कविता चूंकि छोटी सी है और इसको उन्होंने अपनी एकमात्र पत्नीजी को सुनाया था इसलिये आप भी मुलाहिजा फ़र्मा लीजिये:

"एक नज्म
एक गजल हो
तुम तरन्नुम में
और मैं
महज कुछ शब्द बेतरतीब से
जिन्हें नियति ने बना दिया है
तुम्हारा शीर्षक
और यूं
मिल गया है मुझे अर्थ "

इसके बाद तो विवेक भाई ने अनामिका पर पूरी इंजीनियरिंग करते हुये खुद को फ़ेमिनिस्ट बताते हुये लेख में जो गुल खिलायें हैं वो आप खुदैअ देखिये उनकी पोस्ट पर पहुंचकर। लिंक देने के पहले आप उनका यह खतरनाक आह्वान तो देखते चलिये :

“ महिलाओ को अपनी बिन मांगी सलाह है कि यदि उन्हें अपनी तर्जनी पर पुरुष को नचाना है तो उसकी अनामिका पर ध्यान दीजीये “
बताओ भला ये भी कोई सलाह है। लेकिन अब जो है सो है ! संविधान भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिमायती है न! क्या किया जा सकता है। खैर आप पूरा लेख बांचिये इस लिंक पर पहुंचकर:

https://www.facebook.com/vivek1959/posts/10209578386271622

विनय कुमार तिवारी

जी ने पहले तो “बिना शीर्षक के व्यंग्य को बे-कालर जैसा!” बताया इसके बाद फ़ाइनली सलाह दी “बिना शीर्षक के व्यंग्य टाइप का बे-कालर बने रहना ही ठीक रहेगा, लोग खिंचाई नहीं कर पाएँगे।“

लेकिन इस बीच पहले अपनी फ़िर राजनेताओं की, मौनीबाबाओं की जो खिंचाई की है उसका मजा आपको उनकी पोस्ट पढकर ही आयेगा। तो पहुंचिये इस लिंक पर क्लिक करके घटनास्थल पर और लीजिये मजे बिना शीर्षक इस व्यंग्य के:
https://www.facebook.com/vinaykumartiwari31/posts/1290692217715401

Ravishankar Shrivastava

जी ने अपने लेख की शुरुआत लेखक और पाठक के बीच सहज वैचारिक मतभेद बयान करते हुये की:

“पूरी कहानी पढ़ लेने के बाद, और बहुत से मामलों में तो, पहला पैराग्राफ़ पढ़ने के बाद ही, आपको लगता है कि आप उल्लू बन गए और सोचते हैं कि यार! ये कैसा लेखक है? इसे तो सही-सही शीर्षक चुनना नहीं आता. इस कहानी का शीर्षक यदि ‘यह’ के बजाय ‘वह’ होता तो कितना सटीक होता!”

बहाने से व्यंग्य की जुगलबंदी के शीर्षक रखने वाले से मौज भी ले ली:

“आदमी के जेनेटिक्स में ही कुछ है. वो किसी चीज को बिना शीर्षक रहने ही नहीं देता. और, कुछ ही चक्कर में आपका दिमागी घोड़ा धांसू सा शीर्षक निकाल ले आता है और, तब फिर आप कलाकार को कोसते हैं – मूर्ख है! इसका शीर्षक “यह” तो ऑब्वियस है. किसी अंधे को भी सूझ जाएगा. पता नहीं क्यों अनटाइटल्ड टंगाया है.”

इसके बाद समकालीन राजनीति से भी कुछ बिना शीर्षक नमूनों का जिक्र किया है रवि रतलामी जी ने। वह सब आप इस लिंक पर पहुंचकर बांच सकते हैं:

http://raviratlami.blogspot.in/2017/05/blog-post_21.html

Alankar Rastogi

ने जुगलबंदी के लिए तो नहीं लिखा शायद लेकिन एक लेख में टैग किया मुझे। हम उसी को ’बिना शीर्षक’ वाला लेख समझ लिये। अलंकार ने आधुनिक समय में ’विजिटिंग कार्ड’ को सामाजिक प्रतिष्ठा का पैमाने बताते हुये लेखक के हाल बयान कर दिये (हर व्यक्ति अपना ही रोना रोता रहता है) देखिये क्या कहते हैं अलंकार:

“एक बेचारा लेखक ही ऐसा होता है जो समाज को अच्छा साहित्य देकर भी कभीं सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं कमा पाता है. अभी समय लगेगा एक लेखक को मुख्यधारा में आने के लिए. उसे भावना से लिखने के बजाये अपने लिखे हुए का भाव लगाना आना चाहिए. उसे अर्थपूर्ण लेखन के बजाये वही लिखना होगा जिससे उसके बटुए का अर्थ पूर्ण हो जाए. उसे अब वह सब करना पड़ेगा जिसमे वह साहित्यिक प्रतिमान के साथ स्वाभिमान भी गढ़े.”

लेख में पुराने स्कूटर और जीवनसाथी को बरतने के सूत्र बताये गये हैं। पूरा आनन्द और ज्ञान लेने के लिये पहुंचिये इस लिंक पर:

https://roar.media/…/visiting-card-and-social-status-hindi…/

व्यंग्य की जुगलबंदी के राडार पर

Alok Puranik

के दो लेख पकड़ में आये।

’एप्पल टैंक और एंड्रायड लड़ाकू विमान’ में हर साल मोबाइल के नये संस्करण आते रहने के बवाल का वर्णन किया गया है। कल्पना की गयी है जिस गति से मोबाइल अपडेट होते हैं उसी स्पीड से अगर टैंक के माडल अपडेट होने लगें तो क्या होगा? इसी लेख में अपडेट का फ़ंडा बताया गया है:

“आप इतने अपडेट निकालते क्यों हैं, हमारा काम तो पुराने से भी ठीक-ठाक ही चलता है।

लो जी आपको क्या लगता है कि अपडेट आपके लिए निकालते हैं, ना जी, अपडेट तो हम अपने लिए ही निकालते हैं। नये नये मोबाइल बेचने है, नये नये अपडेट के नाम पर बेचते हैं। आप टेंशन ना लें, अपडेट आपके लिए नहीं निकालते। “

पूरा लेख यहां पहुंचकर बांचिये:

https://www.facebook.com/puranika/posts/10154741380713667

’आतंकी एक्सचेंज आफ़र’ लेख के बारे में हम कुछ न बतायेंगे। बताने पर मजा लीक होने का खतरा है। बस आपको एक अंश पढ़वा देते हैं:

"पाकिस्तान कमाल का मुल्क इस अर्थ में है कि पाक बच्चों को पढ़ाये गये इतिहास में पाक ने कभी कोई युद्ध नहीं हारा। पाक किताबों में 1971 पाक ने जीता है, कारगिल पाक ने जीता है। पाकिस्तान को इस तरह की इतनी जीत की आदत हो गयी है कि अब वो सचमुच की जीत के लिए मेहनत भी ना करते। जल्दी होनेवाले भारत पाक क्रिकेट मैच में अगर इंडियन टीम हारी, तो इंडियन टीम की खाट खड़ी की जायेगी। इंडियन टीम की बैटिंग, बालिंग, फील्डिंग पर सवाल उठाये जायेंगे। पर पाक टीम हारी, तो वहां का नौजवान कहेगा कि अंपायर हमारे बैट्समैन के शाट को समझ ना पाया। ठीक है हमारे बैट्समैन के तीनों विकट उड़ गये। पर यह भी तो देखना चाहिए था कि हमारे बैट्समैन ने किस स्टाइल से बैट घुमाया था। वह कलात्मकता देखनी चाहिए थी और आऊट नहीं देना चाहिए था। अंपायर हमारे बल्लेबाज की बैटिंग समझ ना पाये।"

बाकी का लेख इस लिंक पर पहुंचकर बांचिये:
https://www.facebook.com/puranika/posts/10154732721278667

Indra Awasthi

अभी हाल ही में जुगलबंदी में एक्टिव हुये और जब हुये तो खूब हुये।

ब्लॉगिंग में काफ़ी दिन ठेलुहई करने अब जुगलबंदी में भी मजे लेने शुरु किये हैं।
न्यूटन बाबा के बैठने के लिये सही जगह के हुनर की तारीफ़ करते हुये इंद्र अवस्थी कहते हैं:

“वह तो कहो न्यूटन नारियल के पेड़ के नीचे नहीं बैठा था , नहीं तो शायद सौ - डेढ़ सौ साल और निकल जाते इस गुरुत्व-फुरूत्व को नाम देने में | कितने वीर बालक इस चक्कर में ज़्यादा पास हो गए होते |”

नाम का लफ़ड़ा स्वतंत्रता संग्राम में पिला पड़ा है। देखिये तो सही:

“अब १८५७ को ही ले लिया जाय | मंगल पांडे ने बन्दूक चला दी, तात्या टोपे, लक्ष्मी बाई आदि सबने बवाल काट डाला, बहादुरशाह दिल्ली में जी भड़भड़ा के बैठे रहे कलम में स्याही भरते हुए कि जैसे ही थोड़ा खाली हुए, शायरी झेला डालेंगे , इस बीच कई अँगरेज़ शहीद हो गए | इतना सब हुआ, पर यह सब होने के पहले कोई इस चक्कर में नहीं पड़ा कि इस पूरे घटनाक्रम को क्या नाम दिया जाय | जब सब हो गया तो इस बेगाने बवाल में सारे इतिहासकारों में सिर - फुटौव्वल मची | और मची क्या अभी तक एक दूसरे का पजामा खींचे पड़े हैं | एक बोले कि इसे ‘पहला स्वाधीनता संग्राम ‘ कहा जाय | दूसरे पक्ष ने बहुत बुरा माना और कहा कि परिभाषा ‘सिपाही विद्रोह ‘ वाली सही बैठती है | तीसरा मध्यमार्गी निकला, ‘१८५७ की ग़दर’ का नाम चिपका दिया | अभी तक कौआरार मची है |”

इस नाम-अनाम वाले लेख का शानदार वाक्य रहा - “क्या तौल के कंटाप पड़ा है “। बाकी तो सब जो है सो हईयै है।

पूरा लेख यहां पहुंचकर बांचिये। मजे की गारंटी। मजा न आये तो अगला लेख बांचिये। लेख का लिंक यह रहा:

https://www.facebook.com/indra.awasthi/posts/1576170989062457

Arvind Tiwari

जी ने ’ व्यंग्य की चिड़िया की टांग पर निशाना’ लगाया और खूब लगाया। व्यंग्य लेखन के मौलिक फ़ंडे बताते हुये अरविन्द जी लिखते हैं:

"व्यंग्य के चिंतन की कुछ शर्तें होती हैं मसलन लेखक कॉलेज या वि वि में पढ़ाता रहा हो,किसी प्रकाशन संस्थान में काम करता रहा हो,पत्रकारिता में हो।कुछ नहीं भी हो तो बड़े शहर या दिल्ली एनसीआर का निवासी तो होना ही चाहिए।ऐसा करो एक दो वर्ष यहाँ दिल्ली में रह लो। "

व्यंग्य लिखने के दिल्ली में रहना अपरिहार्य बताते हुये अरविन्द जी लिखते हैं:
"दिल्ली में हम हैं न।हमारे साथ रहोगे तो लिखने पर नहीं,चर्चित होने पर ध्यान देने लगोगे।हमारे साथ हमप्याला होगे,तो बस आला दर्ज़े के हो जाओगे।"
"पर सर!मैं तो पीता ही नहीं।"

" फिर मेरा वक़्त क्यों जाया कर रहे हो।तुम्हें मालूम नहीं व्यंग्य साहित्य में मुझे कितना काम करना है।20 पुस्तकों का सम्पादन करचुका हूँ,इतनी ही पुस्तकें और आनी हैं।आप ऐसा करो,झुमरी तलैया में कोई पानी वाली तलैया देखकर उसमें डूब मरो"।

मजा अभी और भी है। लेख पूरा बांचने के लिये इधर आइये:
https://www.facebook.com/permalink.php…

Kamlesh Pandey

जी ने भी ’बिना शीर्षक’ लेख लिखने की सुविधा का फ़ायदा उठाते हुये ’गाय’ पर निंबध खैंच डाला। आजकल गाय जिस तरह दूध, दंगे, देशप्रेम की बहुउद्धेशीय परियोजनाओं में काम आ रही है उसका दिलचस्प वर्णन किया है कमलेश जी ने। कुछ अंश देखिये:

"जीव-विज्ञान के कोण से एक पशु होने के कारण गाय के चार पैर होते हैं. इसी कोण को थोड़ा और वैज्ञानिक कर लें तो इन चार टांगों पर टिका भारी-सा शरीर एक स्वचालित मशीन है जो घास और चारे जैसी बेकार चीजों को दूध जैसी कीमती वस्तु में बदल देती है. पिछले दो पैरों के बीच चार नल फिट होते हैं, जिन्हें दुह कर दूध निकालने का काम गाय के मानस-पुत्र पूरी तत्परता से करते हैं. कभी-कभी गाय के अपने पुत्र बछड़े भी इस दूध को पीते देखे गए हैं."

"गाय बड़ी सीधी होती है. इस हद तक कि आदमी अपनी सीधी-सादी औरतों को गाय कह कर पुकार लेता है. अपने सींघों का इस्तेमाल ये कम ही करती है, पूंछ अलबत्ता जरूर भांजती रहती है पर उसका भी निशाना मक्खी-मच्छर ही होते हैं ".

"गाय को दूध के बदले जो चारा खिलाना पड़ता है, उसे इधर कई घोटालेबाज आदमी भी खाने लगे हैं, सो जीवन भर खिलाने का क़र्ज़ कारोबारी गो-पुत्र उसके हाड मांस से भी वसूलने का इरादा रखते हैं. अब उनके खिलाफ सांस्थानिक मोर्चाबंदी होने लगी है. गोरक्षा को मिशन भाव से अपनाने वाले स्वयंसेवक मार्ग में आने वाले इंसानों की भी जम कर कुटाई और कभी कभी ह्त्या भी कर देते हैं. कुल मिला कर गाय के प्रति एक जबरदस्त संवेदना की लहर है. ऐसी लहरें चुनावी राजनीति को भी लहरा देती हैं."

गाय का आधार कार्ड भी बनेगा। जब ऐसा होगा तो क्या हाल होगा यह सब जानने के लिये पहुंचिये इस लिंक पर

https://www.facebook.com/kamleshpande/posts/10209601738060252

हम इतना समेटकर बस पोस्ट करने ही वाले थे कि

Shefali Pande

की पोस्ट भी आ गयी। शेफ़ाली जी आजकल व्यंग्य की जुगलबंदी को होमवर्क की तरह कर रही हैं। पीछे छूटे हुये सारे लेख एक-एक करके लिखती जा रही हैं। उनका कहना है कि जुगलबंदी के बहाने उनका लिखना फ़िर से शुरु हुआ। कित्ती बढिया बात है।

’बिना शीर्षक’ व्यंग्य में शेफ़ाली ने अलग तरह से लिखा। यह बात उनके लेख के शुरुआत से ही पता चल गई:

“एक दिन ऐसा भी हुआ कि सारे अखबारों में से मोटे - मोटे अक्षरों में छपने वाले शीर्षक गायब हो गए | सारा दिन न्यूज़ चैनलों से ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश नहीं हुई | व्हाट्सप्प से एक भी हिंसक वीडियो वायरल नहीं हुआ |”

इसके बाद क्या गजब हुआ यह न पूछिये। गर्मी, बरसात, सर्दी सब सामान्य तरीके से गुजरे। सामान्य तरीके से मने जैसे कभी बचपन में गुजरते थे। एक नमूना देख ही लीजिये आप भी:

“जाड़ा बचपन की तरह आया | एक पतला सा स्वेटर पहने हुए, न इनर , न जूते, न मोज़े, न टोपी, न मफलर, न कफ सीरप,न डॉक्टर के चक्कर लगे | नाक बहती रही, खांसी खुद ब खुद बोर होकर बिना दवाई के ठीक हो गयी | बिना हीटर और ब्लोवर के एक ही रजाई में सारे भाई - बहिन सो गए | सन टेनिंग, त्वचा का शुष्क होना, होंठ और गाल फटना इत्यादि छोटी मोटी समस्याओं की टेंशन से दूर सारा दिन धूप में खेलते - कूदते हुए गुज़ार दिया | जाड़े के मौसम में यह न खाएं, वह न पीएं ऐसा किसी डाइट एक्सपर्ट ने नहीं बताया |”

फ़ाइनली जो हुआ सो कुछ ऐसा हुआ:

“रात को मैंने बच्चों से पूछा, '' आज दिन भर में कुछ भी डरावना नहीं हुआ बच्चों | किसी अखबार मे रेप, दुष्कर्म, अपहरण, आतंकवाद, हत्या की खबर नहीं है | सारे चैनल सुनसान पड़े हैं | आज तुम परियों की कहानी सुनना चाहोगे ?”

शेफ़ाली की पूरी पोस्ट पढने के लिये इधर आइये:

https://www.facebook.com/pande.shefali/posts/1563006623711844

Anil Upadhyay

जी का आगमन हुआ व्यंग्य की जुगलबंदी में। 13 दिन में 13 व्यंग्य लेख लिखने का व्रत धारण करके आये अनिल जी का व्यंग्य का चौथा लेख ’व्यंग्य की जुगलबंदी-35' में शामिल हुआ। शीर्षक रहा उनके लेख का- ’बोलिए गैयापति श्री शेरचंद्र की जय’

लेख की शुरुआत मौलिक प्रश्न से हुई :

"आखिर जंगल का राजा शेर ही क्यों होता है ? और क्या इसलिए होता है कि उसे कोई खा नहीं सकता I उस पर कोई ऊँगली उठाने की हिमाकत नहीं कर सकता I क्या उसी ने अपने रसूख के आधार पर अपने परिवार के सदस्य बाघ को राष्ट्रीय पशु बनाया है I एक व्यक्ति दो लाभ के पद नहीं रह सकता I क्या इसी कारण बाघ को राष्ट्रीय पशु तो नहीं बनाया गया है I शेर को राजा रहने दिया गया है I "

इस लेख का आगे का किस्सा इस लिंक पर पहुंचकर बांचिये।

https://www.facebook.com/137.anil/posts/10213151887973922

इसके अलावा जो लोग लिखने से रह गये उनमें से एक Nirmal Gupta जी हैं जो कुछ दिन से लेखकीय ब्लॉक जैसे मोड से गुजर रहे हैं। Anshu Mali Rastogi हैं जो अब ब्लॉग में लिखते हैं। Sanjay Jha Mastan हैं जो अब फ़िल्म निर्माण में जुट गये हैं। Yamini Chaturvedi सेलेब्रिटी लेखिका होने के साथ ही उनके लेखों की मांग बढ गयी है और लिखना कम ! बाकी लोगों के न लिखने का कारण अभी पता नहीं चला है !

इसके अलावा अनूप शुक्ल हैं जिनके पास कोई बहाना भी नहीं न लिखने का फ़िर भी नहीं लिखे। खैर नहीं भी लिखेंगे तो क्या नुकसान हो गया? लिख रहे थे तब भी कौन तीर मार रहे थे।

बहरहाल अब पेश है यह 35 वीं ’व्यंग्य की जुगलबंदी’ । बताइयेगा कैसी लगी?

बड़ा कौन?

अतुल मोहन प्रसाद

‘मां! अब मैं बच्चा नहीं रहा. तुमने मुझे सृजित किया. आज मैं बड़ा हो गया हूं. मेरी अब अपनी पहचान बन गयी है. अब कोई यह नहीं कहता है कि मैं अमुक का बेटा हूं।’ संसद ने गर्व से सीना तान कर कहा.

‘बेटा! मैंने तुम्हारा सृजन नहीं किया. सृजन करने वाला तो कोई और रहा है. हां, मैंने तुम्हें जन्म दिया है. तुम्हें योग्य बनाया. अब तुम्हारी पहचान बन गयी है. इस पहचान को बनाए रखने के लिए अपनी अस्मिता के साथ खिलवाड़ मत करो. मां, मां होती है और बेटा, बेटा. मां की दृष्टि में बेटा कितना ही बड़ा क्यों न हो जाए बेटा ही रहता है, मां नहीं हो सकता.’ जनता मां ने दो टूक शब्दों में जवाब दिया.

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सुहाग की निशानी

अतुल मोहन प्रसाद

‘माँ! मैं बैंक की परीक्षा में पास हो गई हूं.’ ‘बहुत खुशी की बात है बेटे! तुम्हारी पढ़ाई पर किया गया खर्च सार्थक हो गया. गांव में कॉलेज रहने का यही तो लाभ है. लड़कियां बी.ए. तक पढ़ जाती हैं.’ मां खुशी का इजहार करती हुई बोली.

‘इंटरव्यू लगभग तीन माह बाद होगा. बैंक की शर्त के अनुसार कम्प्यूटर कोर्स करना आवश्यक है.’

‘तो कर लो.’

‘शहर जाकर करना होगा. उसमें पांच हजार के करीब खर्च है.’ उदास होती हुई बेटी बोली.

‘कोई बात नहीं.’ मां अपने चेहरे पर आई चिंता की रेखाओं को हटाती हुईं बोली- ‘मैं व्यवस्था कर दूंगी.’

‘कैसे करोगी मां?’ बेटी विधवा मां की विवशता को समझती थी. ‘अभी मंगलसूत्र है न? किस दिन काम आएगा.’

‘नहीं मां! वह तो तुम्हारे सुहाग यानी पिताजी की निशानी है. तुम उसे हमारे लिए...’

‘तुम भी तो उसी सुहाग की निशानी हो, उसी पिता की निशानी हो. इस सजीव निशानी को बनाने के लिए उस निर्जीव निशानी को गंवाना भी पड़े तो कोई गम नहीं.’ कहती हुई मां के कदम आलमारी में रखे मंगलसूत्र की ओर बढ़ गए.

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लुटेरे

अतुल मोहन प्रसाद

तिहास के दो छात्र भारत पर हुए आक्रमण एवं लुटेरों के विषय पर अत्यंत ही तार्किक ढंग से बात कर रहे थे- ‘अति प्राचीन काल से अनेक आक्रमणकारी यहाँ आए. कुछ भारत विजय की इच्छा लेकर आए तो कुछ लूट-पाट की नीयत से. अनेक बहादुरी की डींग मारते आए और रोते-पीटते वापस गए. भारत के वैभव की कहानियां उन्हें भारत आने के लिए आकर्षित करती रहीं. शक, हूण, मंगोल तो यहीं रच-बस गए.’ पहले छात्र ने बात को प्रारंभ किया.

‘किन्तु भारत पर सबसे पहला आक्रमण कोई पुरुष न होकर महिला थी- मिस्र की महारानी सैरेमिस.’ दूसरे छात्र ने प्रथम आक्रमणकारी का खुलासा करते कहा.

‘उसके बाद नाम आता है- यूनान के बच्छूस एवं डायनोसियस का. यूनान के बाद ईरान के डेरियस प्रथम.’ पहले छात्र ने आक्रमणकारियों का क्रम देते हुए कहा- ‘इसके बाद आते हैं- कासिम, गजनवी, गोरी, चंगेज खां, कुतबुद्दीन, तैमूर, कंग, सिकंदर लोदी, इब्राहीम लोदी, बाबर, अंग्रेज...रुक क्यों गए? ये लोग बाहर से आए और भारत की
धन-सम्पदा को लूटकर अपने देश ले गए. किन्तु आज अपना देश विपरीत परिस्थिति के लुटेरों को झेल रहा है. ये लोग यहीं के हैं और यहां के धन सम्पत्ति को लूटकर बाहर के देशों में जमा करते हैं. जानते हो ये लुटेरे कौन हैं?’

‘बड़ा ही विषम सवाल खड़ा कर दिया भाई. इस पर तो हमारी संसद भी मौन है.’

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मोह

अतुल मोहन प्रसाद

क आतंकी को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी. फांसी की तिथि निश्चित हो गई थी.

‘मेरी साजिश या करतूत के कारण ढाई सौ से
अधिक जान चली गयी. मुझे इसका कभी अफसोस नहीं रहा. किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हुई. मोह तो छूकर भी नहीं गया. किन्तु अभी न जाने क्या हुआ है? एक जान जाने की बात सुनकर तकलीफ चरम सीमा पर पहुंच जाती है. ऐसा क्यों हो रहा है?’ उसने अपने आपसे सवाल किया.

‘क्योंकि वह सारी जान दूसरों की थीं. अब अपनी बारी है. सबकी जान उतनी ही प्यारी होती है, जितना अभी अपनी लगती है.’ स्वयं ही उसने उत्तर दिया.

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सर्वजीत कुमार सिंह की कविता
डेली की भागदौड़ थी,
बस का सफर था.
मौसम सुहाना था,
बस अफसोस था कि खिड़की वाली सीट
किसी और के पास थी.
फोन में गाना था,
दिल को रिझाना था,
बगल वाले से छिपाना था,
मौसम सुहाना था.

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मेरे बगल में बैठे
बीती उम्र के एक आदमी ने बोलना शुरू किया,
‘‘भीड़ बढ़ती ही जा रही है,
जाने क्या होगा देश का आने वाले सालों में.’’
मैंने आज के फेमस शब्द का इस्तेमाल किया,
और ‘हम्म’ में जवाब दिया.
फिर सिलसिला कुछ यूँ शुरू हुआ,
‘‘तुम यूथ हो इस देश का, तुम्हें कुछ तो करना होगा.
बदल कर कुछ नीतियों को,
लोकतंत्र को साबित करना होगा.’’
‘‘कैसे?’’
‘‘मैं राजनीति नहीं जानता.’’
‘‘पर आपको भी तो साथ चलना होगा,
वरना हम क्या कर पाएंगे..’’
‘‘नहीं, मैं भी तो देखूं आखिर,
कब तक देश संभालता है.’’
‘‘ये देखो सड़कों पर कितने कचरे दिखाई देते हैं,
स्वच्छ भारत के अधिकारी जाने कहाँ पर रहते हैं.
एक बार की बात है,
मैं कचरे के आगे से गुजरने वाला था.
सोचा आज मैं कुछ करके रहूँगा.
वहां पर रोजाना ऐसा होता था.
लेकिन फिर दिल न किया
और कल पर छोड़ कर आगे बढ़ गया.
‘‘आपने कुछ किया क्यों नहीं,
एमसीडी में शिकायत करवाते.’’
‘‘मेरा काम था वोट देना, दे दिया,
अब देखूं आखिर,
कब तक देश संभालता है.’’
‘‘वैसे तुम यूथ हो, कुछ करो.’’
‘‘दिल्ली की सड़कों का बुरा हाल है,
ट्रैफिक ने सबकी जान खा रखी है.
ऑड-इवन तो फेल हुआ,
तुम्हारे पास कोई आइडिया है क्या?’’
‘‘फिलहाल तो कुछ नहीं,
आप ही कुछ बता दीजिये.’’
‘‘बेटा समय ही नहीं मिलता,
काम के अलावा कुछ और सोच सकें.”
‘‘आप करते क्या हैं?’’
‘‘सरकारी मुलाजिम हूँ.’’
  
डेली की भागदौड़ थी,
बस का सफर था.
मौसम सुहाना था,
बस अफसोस था कि खिड़की वाली सीट...

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व्यंग्य कवितायें


डॉ. हरेश्वर राय
1.
मेरे गाँव का पप्पू
  
असरदार हो गया
मेरे गाँव का पप्पू.
मुश्किल से इंटर किया
बी.ए. हो गया फेल
रमकलिया के रेप केस में
चला गया फिर जेल
  
रंगदार हो गया
मेरे गाँव का पप्पू.
  
नेताकट कुर्ता पाजामा
माथे पगड़ी लाल
मुँह में मीठा पान दबाये
चले गजब की चाल
  
ठेकेदार हो गया
मेरे गाँव का पप्पू.
  
पंचायत चुनाव में
काम हो गया टंच
जोड़ तोड़ का माहिर पप्पू
चुना गया सरपंच
  
सरकार हो गया
मेरे गाँव का पप्पू.
2.
फागुन में आया चुनाव
  
फागुन में आया चुनाव
भजो रे मन हरे हरे
कौए करें काँव काँव
भजो रे मन हरे हरे.
  
पाँच साल पर साजन आये
गेंद फूल गले लटकाये
इनके गजब हावभाव
भजो रे मन हरे हरे.
  
मुंह उठाये भटक रहे हैं
हर दर माथा पटक रहे हैं
सूज गए मुंह पाँव
भजो रे मन हरे हरे.
  
बालम वादे बाँट रहे हैं
थूक रहे हैं, चाट रहे हैं
पउवा बँटाये हर गाँव
भजो रे मन हरे हरे.
  
अबकी हम पहचान करेंगे
सोच समझ मतदान करेंगे
मारेंगे ठाँव कुठाँव
भजो रे मन हरे हरे.
  
संप्रतिः प्राध्यापक (अंग्रेजी) शासकीय पी.जी. महाविद्यालय सतना, मध्यप्रदेश.
पत्राचारः पांचजन्य, बी-37, सिटी होम्स कॉलोनी, जवाहर नगर, सतना, मध्यप्रदेश-485001
मो. 09425887079, 07672296198
  
ईमेल royhareshwarroy@gmail.com
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आधुनिक नेता


जयप्रकाश विलक्षण
  
मेहनत की रोटी खाते हैं.
अपने हाथों से काटकर,
जनता की बोटी खाते हैं..
  
नल में पानी साफ नहीं है,
मिनरल वाटर मंहगा है.
इसलिए,
जनता का खून पीते हैं,
बेचारे बड़ी मुश्किल में जीते हैं.
  
रोटी से कब्ज हो जाती है,
दूध से दस्त लग जाते हैं,
बस यही मजबूरी है,
कि रिश्वत खाते हैं.
  
किसी का खून करवाते हैं,
भतीजे को नौकरी लगवाते हैं.
तो क्या बुरा करते हैं?
अरे इस तरह तो वे,
बेकारी और आबादी की समस्या
हल करते हैं?.
   --------

व्यंग्य कविता


जाँच के आदेश
रामकिशोर उपाध्याय

कौन
खड़े हो क्यों मौन
हुजूर मैं एक मजदूर
पैसे से हूँ मजबूर
कभी किसी की बाई
कभी किसी की रसोई की सफाई
बेटा और कभी बेटी बीमार
कभी बूढ़ी माँ को पैसे की दरकार
बहुत महंगाई है
दाल भी सौ रुपये में एक किलो आई है
प्याज का दाम न पूछो
किसकी कुर्सी का बाप है, न पूछो
किस-किस का भाव बताऊँ
कौन-कौन सा दुखड़ा सुनाऊं
नौकरी से भी आपने निकाल दिया...
सरकार कुछ मदद हो जाये
दूंगा दुआ
मिलेगी अगर बीमार को दवा
साहब खैरात नहीं
उधार चाहिए
हर महीने की मजदूरी से कटना चाहिए 
अब यह कैसे कहूँ...
  
न जाने कहाँ से आ जाते हैं
खुद को खुद्दार बताते हैं
पर मजदूर
और मजबूर
होने का नाटक दिखाते हैं
कहाँ से दें तुम्हें?
पिछले साल साढ़े चार फीसदी बढ़ा व्यापार
घाटे ने किया चौपट है और लाचार
पेट्रोल और डीजल के दाम में आग लगी
तो मजदूरों की छटनी करनी पड़ी
बीबी और बच्चों का जेबखर्च
नहीं कर सकते कम
वे तो कर देते हैं नाक में दम
  
होटल में जाना कर दिया कम
रोज नहीं, बस तीसरे दिन में गए थम
  
सुनकर
मजदूर पत्रकार की ओर मुड़ा
पत्रकार भी भूख से रहा था लड़खड़ा
बोला मजदूर...
मित्र, तुम तो हमारे सच्चे हितैषी हो
यहीं के और देशी हो
कैसे चलेगा जीवन...
कुछ तो लिख डालो, चलो दो कलम
और कुछ लोन ही दिला दो
  
साहेब ने पत्रकार को देखा
और कहा यह मेरा छटनी किया मजदूर है
फिर उसे कागज का टुकड़ा दिया थमा
मजदूर समझा नहीं
पत्रकार बोला...
मजदूर मित्र तुम्हारे विषय में ही लिखूंगा
अगले दिन खबर छपी
छटनी किये मजदूर ने
उधार न देने पर
मालिक से बदसलूकी की
और बाद में खुदकुशी कर ली...
मजदूरों का एक धड़ा
इसे साजिश मानने पर अड़ा 
सरकार ने जाँच के आदेश दे दिए हैं...

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काव्य जगत


डॉ. राजकुमार ‘सुमित्र’ 
  
दोहे
अवमूल्यन नेतृत्व का, बौने सब श्रीमान.
निहित स्वार्थ की भट्ठियां, जलता हिन्दुस्तान.
  
इंसानी कमजोरियां, सहज और स्वीकार.
लेकिन वो तो खड़े हैं, सीमाओं के पार.
  
तिरियाओं के ‘चरित’ का, काफी हुआ बखान.
नेताओं के चरित्तर, काटें उनके कान.
  
प्रतिपल मन पर घन चलें, चलें पीर पर तीर.
गधे पंजीरी खा रहे, सांड़ों को जागीर.
  
नियम-धरम सब ढह गया, राजनीति तूफान.
बुद्धि न्याय सहमे डरे, टुच्चों का सम्मान.
  
मेहनतकश भूखा मरे, अवमूल्यित विद्वान.
हर लठैत ने खोल ली, भैंसों की दुकान.
  
नेता अंधी भेड़ है, सत्ता है दीवार.
राजनीति अब हो गई, वेश्या का व्यवहार.
  
सम्पर्कः 112, सराफा, जबलपुर (म.प्र.)
मोः 9300121702
  
  
  
  
बुन्देली गीत
आचार्य भगवत दुबे

  
सैंया न जइयो कलारी
सैंया न जइयो कलारी, बिनती है हमारी.
मिट गई गिरस्ती सारी, जइयो न कलारी.
     
      ये दारू ने घर फुंकवा दओ
      गहना-गुरिया सब बिकवा दओ
बिक गये हैं घर-बाड़ी, जइयो न कलारी.
     
      खाबे के लाले पड़ गये हैं
      अंग-अंग पीरे पर गये हैं
कर दओ हमें भिखारी, जइयो न कलारी.
     
      बच्चों के भी छूटे मदरसा
      आबारा घमूत हैं लरका
कर रये चोरी-चपारी, जइयो न कलारी.
     
      हो रइ गली-गली बदनामी
      अनब्याही है बिटिया स्यानी
नइया कछू तैयारी, जइयो न कलारी,
सैंया न जइयो कलारी, बिनती है हमारी.
  
सम्पर्कः पिसनहारी मढ़िया के पास,
जबलपुर-482003 (म.प्र.)
मोः 9300613975
  
रघुबीर ‘अम्बर’
  
ग़ज़ल

दवा हूं गम की खुशी बेमिसाल देता हूं.
मैं कर के नेकियां दरिया में डाल देता हूं.
  
डरा नहीं मैं किसी दौर में सितमगर से,
जो बात सच है वो मुंह पर उछाल देता हूं.
  
खुदा अगर है तू मेरा निज़ाम भी सुन ले,
जरा हो शक़ तो समुन्दर खंगाल देता हूं.
  
नहीं कुबूलते बच्चे हराम की दौलत,
उन्हें हमेशा मैं रिज्के-हलाल देता हूं.
  
मैं अपने घर की फजा खुशगवार करने को,
अहम से लड़ता हूं रिश्ते सम्हाल देता हूं.
  
नहीं जवाब मिला मुझको जिन सवालों का,
उन्हें मैं मजहबी सांचों में ढाल देता हूं.
  
वो अपनी सोच को ‘अम्बर’ जुबां न दे पाये,
मैं अपने शेर लहू में उबाल देता हूं.
  
सम्पर्कः इयू. नं. 7, कचनार सिटी,
विजय नगर, जबलपुर-482002 (म.प्र.)
मोः 8349855808


श्रीश पारिक
बदलाव

किसी झूले को सिसकते हुए देखा
उस अंधेरे में चांद की रोशनी में
झांक रहा था चर मर की आवाजों के बीच
सिसकियां दब रही थीं जब बच्चे आ जाते थे पार्क में
खेला करते थे धूल उड़ जाती थी
और घाव भर जाते थे झट से किलकारी के बीच
जब सब होते थे उसके चारों ओर
शहंशाह सा महसूस करता था वो
और सबके जाते ही लगता था
गरीबी का दौर चालू हो जाता था
ना आटा ना दाल ना चावल
सब होते हुए भी बिरयानी बनती नहीं थी
बना लेते थे कभी बेमन से तो भी
हलक से निवाला नहीं उतरता था अकेलेपन में
लगता था मानो रूह निकल गई हो शरीर से
क्यों खुशियां हर पल साथ नहीं होती
सब वहीं होते हुए भी वक्त क्यों करवट लेता है
कातर आंखें आज भी सिसकी सुनती हैं
जब जब उस झूले में चर चर की आवाज होती है.
  
सम्पर्कः सुनार मोहल्ला, बदनौर,
भीलवाड़ा (राजस्थान)
  
एम. पी. मेहता
हम इंसान हैं

सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ हैं हम,
क्योंकि इंसान हैं हम
स्वच्छंद भ्रमण हमारी आदत है,
दूसरों को गुलाम बनाना हमारी ताकत है.
  
झूठ बोलना हमारी मजबूरी है
दूसरों का मुंह बंद करना हमारी कमजोरी है.
  
दोषी को निर्दोष साबित करना
निर्दोष को फांसी पर चढ़ा देना,
हमारे बाएं हाथ का खेल है
क्योंकि हम रखते सबसे मेल हैं.
  
नर-पशु में फर्क समझता नहीं
पशु पक्षी और सर्प, मछली
सबकुछ खा सकता हूं मैं
तभी तो सर्वभक्षी कहलाता हूं मैं.
  
मांस-मांस में फर्क करता नहीं
इंसानी रिश्तों को जानता नहीं
क्या बहु और क्या बेटी,
क्या छोटी और क्या बड़ी
सभी को शिकार बनाता हूं मैं.
  
मेरा पेट कभी भरता नहीं
खुद को भूखा रख सकता नहीं
भूखे को खाना देता नहीं
  
दूसरे को खाते देख सकता नहीं
नंगे को कपड़ा पहनाता नहीं,
  
दूसरे का खाना छीन सकता हूं मैं
पशुओं का चारा खा सकता हूं मैं
  
गरीबों को हक मारकर धन का ढेर लगाता हूं मैं
अपनों का खून बहाकर, अपनी संपत्ति बढ़ाता हूं मैं
  
मां-बाप की सेवा भाता नहीं
मेरा अपमान करे, सुहाता नहीं
मां-बाप का सहारा बनूं अच्छा लगता नहीं
औरत का सम्मान बर्दाश्त होता नहीं
  
मैं हूं ऐसा मदारी,
नाचते मेरे इशारे पर सभी
दारोगा, पेशकार और पटवारी
सरकार हो या सरकारी कर्मचारी
  
मैं हूं एक बलात्कारी,
करता हूं मैं रोज बलात्कार
मुझे नहीं कोई सरोकार,
अपने घर की हो या परायी नारी.
  
जिस्म का धंधा है मेरा कारोबार
करता हूं मानव अंग का व्यापार
मैं हूं ऐसा भिखारी
मुझे ही टैक्स देते सभी भिखारी
क्या मंदिर और क्या मजार
हर जगह करता मैं सख्त निगरानी
बच नहीं सकता मुझसे कोई,
लेता हूं मैं सबसे रंगदारी
  
हर घृणित काम करता हूं
घृणा और नफरत फैलाता हूं
धर्म के नाम पर दंगा फैलाता हूं
फिर भी रामनाम का जाप करता हूं
  
समाज को बांटने का काम करता हूं
भाइयों को आपस में लड़ाता हूं.
देशद्रोहियों से हाथ मिलाता हूं,
फिर भी देशभक्त कहलाता हूं.
  
हम हैं मौत के सौदागर
सस्ते दामों में करते हैं
चोरी, डकैती, अपहरण और बलात्कार
हर किस्म की मौत देते हैं
ग्राहक हो यदि खरीदने को तैयार.
  
हम हैं सृष्टि के घृणित प्राणी
हम करते हैं हर वो काम
मानवता होती है जिससे बदनाम
शर्म आती नहीं हमें
मुर्दों का कफ़न छीनने में
लाज लगती नहीं हमें
दूध मुंहे बच्चे का दूध पीने में.
  
सम्पर्कः मुख्य वाणिज्य प्रबंधक (या. से.)
पश्चिम मध्य रेल, जबलपुर
मोः 9752415951


ये साल संतोष त्रिवेदी का पहला व्यंग्य संग्रह ‘सब मिले हुये हैं’ आया था. पुस्तक मेले के अवसर पर. छपते ही लेखक को मिलने वाली प्रतियों में से एक मास्टर जी ने भेजी थी. उसके बाद पुस्तक मेले में और किताबों के अलावा सुशील सिद्धार्थ जी की ‘मालिश महापुराण’ भी खरीदी थी. कुछ दिनों दोनों किताबें मेज पर, यात्रा में, बैग में साथ-साथ रहीं- जैसे उन दिनों दोनों गुरु-चेला (मित्र-मित्र पढ़ें अगर गुरु चेले पर एतराज हो). एक बार जबलपुर से वाया दिल्ली कलकत्ता जाते हुये दोनों किताबें बाकायदे पेंसिल से निशान लगाते हुये पढ़ीं भी गयीं. सोचा था इनके बारे में विस्तार से लिखेंगे. लेकिन लिख न पाये. मालिश महापुराण पर इसलिये कि उसके बारे में छपी समीक्षाओं का ‘गिनीज बुक रिकार्ड’ टाइप बन गया होगा. हमको संकोच हुआ कि सूरज को क्या 20 वाट का बल्ब दिखायें.

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संतोष त्रिवेदी के ‘सब मिले हुये हैं’ के बारे में लिखने की बात भी आई-गई हो गयी. पूरी किताब एक बार पढ़कर भी लिखना न हो पाया. बाद में स्थगित होते-होते एकदम टल गया. दोनों किताबें भी दोनों मित्रों की तरह की बदली स्थितियों के अनुसार अलग-अलग कमरों में अलग-अलग अलमारियों में पहुंच गयीं.

‘सब मिले हुये हैं’ के अधिकतर लेख अखबारों में छपे हुये हैं. छपने की जल्दी में फौरन फाइनल करके भेजे लेख. अखबार में छप जाने के बाद लेख ऐसे भी किताब में छपने की पात्रता हासिल कर लेता है. उसी पात्रता के तहत किताब में शामिल हुये लेखों में समसामयिक घटनाओं पर अपने विचार व्यक्त किये हैं. ज्यादातर लेख सरकार के किसी काम या बयान पर जनता के नुमाइन्दे की तीखी प्रतिक्रिया के रूप में हैं. सरोकार के भरपूर. जिधर देखो उधर सरोकार ही सरोकार.

संतोष त्रिवेदी के लेखन का श्रेय केन्द्र की वर्तमान सरकार को भी जाता है. जिस समय उन्होंने अखबार में छपना शुरू किया संयोग से उसी समय वैचारिक रूप से उनके विपरीत मिजाज वाली सरकार सत्ता में आई. लेखन ने जब ‘सरकार मुकाबिल हो तो अखबार में लेख निकालो’ पर अमल किया और दनादन लेख लिखे. एक बार जब लेखन और छपने का चस्का लगा और सरकार कोई मुद्दा हासिल नहीं करा पाई तो सामान्य बातों पर भी की बोर्ड खटखटा दिया.

संतोष त्रिवेदी की किताब की भूमिका लिखते हुये सुशील सिद्धार्थ जी ने लिखा है- ‘समकालीन व्यंग्य-लेखन के युवा परिदृष्य में संतोष त्रिवेदी एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति हैं.’ हालिया समय की सबसे लोकप्रिय वनलाइनर लिखने वाली रंजना रावत जी ने लिखा- ‘संतोष जी के व्यंग्यों की विशेषता यह है कि वह हास्य और व्यंग्य का समानुपात रखते हैं.’

हमने आज इस किताब को पंच के लिहाज से दोबारा देखा, पढ़ा. कुल जमा इकतीस पंच मिले 127 पेज में छपे 55 लेखों में. मतलब फी लेख लगभग आधा पंच. हो सकता है कोई फड़कता हुआ पंच निगाह से चूक गया हो. दुबारा देखने पर नजर आये.

हम आलोचक नहीं हैं. संतोष त्रिवेदी हमारे मित्र हैं. मित्र की किताब को मित्र नजरिये से ही देखा जाता है. गुस्सा है तो कह देंगे- कूड़ा है. मन खुश तो कह देंगे- कलम तोड़ दी यार तुमने तो.

होली के मौके पर लिखने का फायदा ये भी है कि आइंदा कोई बुरी लगने वाली बात भी धड़ल्ले से कही जा सकती है.

इसी बात पर याद आया कि पिछले साल जब हम यह किताब पढ़ रहे थे और लखीमपुर से कानपुर आते हुये कुछ देर एक कोल्हू पर रुके थे. वहां देखा कि गन्ना पेरने पर सबसे ऊपर की मैल सरीखी परत को बहाने के बाद तब बाकी का गुड़ बनाते हैं. उस समय सोचा था कि जब संतोष की किताब पर लिखेंगे तब यही लिखेंगे कि लेखन की गुड़ की भेली बनने के पहले बहाये शीरे सरीखी है यह किताब. अब यह निकल गयी अब शानदार गुड़ बनाओ. लेकिन अब सोचते हैं तो यह बड़ी हल्की बात लगती है. एक मुकम्मल किताब को खारिज करने का इससे घटिया संवाद और क्या होगा?

संतोष के लेख चूंकि तात्कालिक परिस्थितियों पर लिखे गये. जब छपे उसी समय लोग उसको समझ गये होंगे लेकिन समय के साथ प्रसंग भूल जाते हैं. ‘काले चश्मे का गुनाह’ ‘उनकी कैंटीन और हमारी कटिंग चाय’, ‘खटिया के नीचे जासूस’, ‘गायब होते देश में’, ‘गिरता हुआ रुपय्या’ आदि इसी तरह के लेख हैं. इन लेखों की खासियत है कि लेख विषय पर ही जमा रहता है. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है कि लेख घूम-घूमकर वहीं ‘कदमताल’ करता रहता है. मतलब कहने का लेख इकहरा टाइप बना रहा रहता है.

संतोष और हमारे समेत तमाम साथी जो तकनीक की सुविधाओं के विस्फोट एक मंच पाये अपने को अभिव्यक्त करने का उनके सामने फौरन छपने की सुविधा तो है लेकिन साथ ही खतरा भी है कि हम लोग छपने से ही खुश हो जाने की आदत की गिरफ्त में आ सकते हैं. संतोष तो खैर उमर से भले ही युवा हैं लेकिन समझ में सिद्ध लेखकों को भी हिदायतें देने की हैसियत रखते हैं. देते भी रहते हैं। लेकिन आज ‘सब मिले हुये हैं’ पढ़ते हुये अपने लेखन की तमाम कमियां समझ में आ रही हैं.

आजकल हम पंच संकलन के काम में लगे हुये हैं. इसलिये हर व्यंग्य लेख को पंच के पैमाने से देखते हैं. यहां पंच मेरी समझ में ऐसे वाक्य से है जो लेख से एकदम अलग करके स्वतंत्र रूप में अपने में एक धांसू डायलाग के रूप में प्रयोग किया जा सके. पंच की औकात
गठबंधन सरकार में निर्दलीय की तरह होती है. होता भले अकेले हो लेकिन मिलता मंत्री पद है.

पंच के लिहाज से ‘हम सब मिले हुये हैं’ में और बेहतरी की गुंजाइश थी. भूमिका लिखने वाले दोनों लेखक सुशील सिद्धार्थ और रंजना रावत दोनों पंच मास्टर हैं. उनसे सीखना चाहिये हम लोगों को. संतोष, सुशील के दीगर व्यवहार पर नजर रखने की बजाय यह देखते कि गुरु जी पंच कैसे लगाते हैं तो पंच दुगुने तो हो ही जाते. कई जगह कोई पंच बनते-बनते रह गया और वाक्य बनकर पैरे से जुड़ा रहा.

संतोष त्रिवेदी का जब यह व्यंग्य संकलन आया था, तब से उनकी समझ बहुत परिपक्व हुई है. अध्ययन भी बढ़ा है. अब आगे उनका अगला व्यंग्य संकलन जो आयेगा उसमें आशा है कि और शानदार रचनायें होंगी.

यह लिखना इसलिये कि संतोष त्रिवेदी की भेजी किताब एक जिम्मेदारी के रूप में थी और मन में था कि इसके बारे में लिखना है. यह इस किताब के बारे में अंतिम बयान नहीं है. आज की सोच है मेरी. कल को इसके किसी और पहलू पर भी लिखा जा सकता है. किताबों और लेखक के बारे में विचार तो बदलते रहते हैं.

संतोष त्रिवेदी को उनके पहले व्यंग्य संकलन के लिये पन्द्रह महीने बाद बधाई. होली की शुभकामनायें बधाई के साथ मुफ्त में.


किताब : सब मिले हुये हैं

लेखक   : संतोष त्रिवेदी

प्रकाशक : अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली

पेज 127

कीमत   : 250 रुपये

यूँ तो लखनलाल पाल की कहानियाँ सुपरिचित पत्र-पत्रिकाओं में दिखाई देती रही हैं, लेकिन अब हाल ही में उनका पहला उपन्यास ‘बाड़ा’ प्रकाशित हुआ है, जिसकी पृष्ठभूमि भी उनकी कहानियों की तरह ग्रामीण ही है. बुन्देलखण्ड के एक पिछड़े गाँव सिटैलिया की भीतरी कहानी है, जहाँ आज भी पाल समाज में लड़के का रिश्ता तय करना एक टेढ़ी खीर है. तमाम आशंकाओं व दुविधाओं में पड़ा पाल समाज परम्पराओं और रूढ़ियों में इस तरह जकड़ा है कि उनसे उबरना नहीं चाहता, बल्कि जरा से मनमुटाव के कारण गुटबाजी करके आपस में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिये पैंतरेबाजी में अपनी ऊर्जा नष्ट कर रहा है. थोड़ी सी असन्तुष्टि या अनादर पर बिरादरी से बाहर कर देने का षड्यन्त्र मुखिया के माध्यम से चलता रहता है.

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समाज का मुखिया भदोले दाऊ है, जो पुरानी परम्पराओं का पोषक तो है ही और वाक्पटु भी है. दूर-दूर तक बिरादरी की पंचायतें निबटाता है. उसके बिना समाज में पत्ता नहीं हिल सकता. बिरादरी से बन्द किये जाने का अधिकार उसके पास है, जिसे वह एक अस्त्र की तरह प्रयोग करता है. सामाजिक बहिष्कार को लोग घोर मानहानि के रूप में लेते हैं और डरते हैं. इसी दम पर समाज के उसकी सत्ता कायम है. रामकेश ‘माड़साब’ जैसे प्रगतिशील युवा ऐसे हथियार को भोथरा कर देना चाहते हैं. इन्हीं टकराहटों से उठी चिंगारियाँ ही अनेक रोचक प्रसंगों व अन्तर्कथाओं को जन्म देती हैं.

कहानी के केन्द्र में पण्डिताइन चाची का एक बाड़ा है, जिसे वह बेचना चाहती है. बाड़ा पाल समाज के घरों से लगा होने से उनमें खरीदने की होड़ लग जाती है तो चाची भाव बढ़ा देती है, जिससे आपसी मनमुटाव हो जाते हैं और गुटबाजी शुरू हो जाती है. शोषण और पीड़ा का खेल शुरू हो जाता है. अन्य वर्ग के लोग फायदा उठाने को सक्रिय हो उठते हैं. अनेक रोचक मोड़ आते चले जाते हैं.

जब गाँव है तो चुनाव है, राजनीति है, जातिवाद है, आर्थिक व शारीरिक शोषण है, भ्रष्टाचार है, आपसी झगड़े हैं, बेरोजगारी है, सूखा है, अकाल है. अन्य पिछड़े वर्ग की दबंगी है. सरपंच के चुनाव में जातिवाद का बोलबाला है. चन्दू जब हिरिया भौजी को चुनाव में खड़ा करता है तो उसकी जीत पर लोग मूँछ मुड़ाने का ऐलान कर देते हैं. गाँव में अनेक जातियाँ हैं. ब्राह्मणों में सम्मान की भूख है और जमींदारी की ठसक-भसक उनके खून में है. दलितों से बेगार करवाते हैं. फसलों की बुआई, कटाई उन्हीं के जिम्मे रहती है. विरोध करने पर लोगों के सामने मूड़-थपड़ी कर देते हैं. दलितों की नज़र ब्राह्मण के पैरों से ऊपर कभी नहीं उठी. (पृष्ठ 19) गाँव में रोजगार न होने से लोग दूर ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करके घर चलाते हैं. शादी-विवाह के मामले पेचीदा एवं दुश्मनी निकालने के मौके बनते हैं. मान-मनौव्वल माँगते हैं. छोटे-मोटे कारणों से बिरादरी से बाहर कर दिया जाता है. सामूहिक दण्ड, भोज, भागवत कथा पर ही समाज में शामिल हो पाते हैं. सत्यनारायण की कथा शुद्धि का उपाय होता है, जो ब्राह्मणों द्वारा ही ग्रामीणों के मन में भर रखा है. उत्सव की तरह भोज जीमकर बिरादरी को सन्तुष्टि मिलती है. दूसरे का खूब खर्च होता है तो समझते हैं उसे खासा दण्ड मिल गया है.

गुन्दी और हरकू मिसिर की कथा है, जो दिमाग से उतर कर शरीर पर समाप्त होती है. गुन्दी का विवाह 15 वर्ष की उम्र में 48 के विधुर अजुद्धी से होता है, जो टीबी का मरीज है. गुन्दी से सभी मजाक करते हैं और उसके शरीर तक पहुँचना चाहते हैं. हरकू मिसिर की पत्नी का वर्षों पहले निधन हो चुका है. वह गुन्दी से स्त्रीसुख चाहते हैं, लेकिन ब्राह्मणत्व बचाकर. मिसिर का जीवन ब्याज पर निर्भर है. गुन्दी पति के इलाज के लिए हरकू मिसिर से पैसे लेने जाती है तो वह उसे बखरी से पकड़कर मड़ैया में ले जाते हैं. उपन्यासकार के अनुसार, ‘एकान्त में साम्यवाद स्थापित करते हैं.’ जब गुन्दी से पैसा वापस माँगते हैं तो वह स्पष्ट कहती है, ‘मिसुर तुम्हाई मसखरी की आदत न गयी!...वहीं भूसा वाली बखरी में तो नईं दे आईती?’...‘कब?’...‘उसी दिन, मड़इया के कोने में. ध्यान करो मिसुर’ गुन्दी मुस्कराई. मिसिर गुन्दी की कमर में हाथ डालकर बोला, ‘अधबीच में तो नहीं छोड़ जाओगी?’...‘गारण्टी नईं देत’...‘गारण्टी?’...‘रोज-रोज की भटा-लुँचई थोरी है.’

मिसिर के पुत्र ने जब उन्हें घर से निकाला तो कहा, ‘पण्डित के घर में जन्म लेने पर ऐसे करोगे तो नरक में जाओगे.’...मिसिर बुदबुदाये, ‘जिसके पास लुगाई है, वो पण्डित है. लुगाई नहीं होती तब असलियत पता चलती कि आदमी पण्डित है या भंगी.’

गाँव में पानी की टंकी है, लेकिन पाइप लाइन टूटी है. इन्दिरा आवास बने हैं, लेकिन अधूरे और भ्रष्टाचार के नमूने भर हैं. राठ कस्बे के बाजार में बनियों द्वारा ग्रामीणों से ठगी के किस्से हैं.

लाली की सास और गुन्दो का प्रवाही वाक्युद्ध घोर अचम्भित करता है. ग्रामीण महिलाएँ झगड़ती हैं तो किस तरह जननांगों का उल्लेख करते हुए एक-दूसरे का चरित्रहनन करती हैं. किसी भी भद्दी गाली को रसमय तारतम्य से जुबान पर लाने में बिना हिचकती नहीं हैं.

बुन्देली कहावतों और मुहावरों के साथ कहीं-कहीं ठेठ बुन्देली संवादों के प्रयोग से उपन्यास में भीनी लोकगन्ध है, जिससे इसे आँचलिक उपन्यास कहा जा सकता है. पात्रों की संख्या अधिक होते हुये भी संवादों के चुटीलेपन व सटीक होने से पात्रों को याद रखा जा सकता है. मैत्रेयी पुष्पा के बुन्देलखण्ड की पृष्ठभूमि पर लिखे उपन्यासों को स्त्री विमर्श के रूप में देखा जाता है, पर लखनलाल पाल का यह उपन्यास बुन्देलखण्ड के पिछड़े वर्ग पाल बिरादरी के विमर्श के रूप में देखा जाना चाहिए. यह उनके संघर्ष, पीड़ा व कुण्ठा का ज्वलन्त रूप प्रस्तुत करता है. उनकी विसंगतियों को समेटे है तथा एक अनोखे परिवेश से साक्षात्कार कराता है. यह नायक-नायिका जैसे पात्रों नहीं बल्कि समूह का उपन्यास है.

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समीक्षक सम्पर्क : 282, राजीवनगर,

महावीरन, नगरा, झाँसी-284003

मोबाइल : 9455420727

समीक्षित कृति : बाड़ा (उपन्यास)

प्रकाशक : नीरज बुक सेण्टर, सी-32, आर्यनगर सोसायटी, प्लॉट-91, आई.पी. एक्सटेंशन, दिल्ली-110092

मूल्य : 450 रुपये, पृष्ठ संख्या-216


हते हैं हर पुरुष की सफलता के पीछे एक नारी का हाथ होता है. एक तरफ वह घर की जिम्मेदारियां उठाकर पुरुष को छोटी-छोटी बातों से मुक्त रखती है, वहीं वह एक निष्पक्ष सलाहकार के साथ-साथ हर गतिविधि को संबल देती है. महात्मा गाँधी के नाम से भला कौन अपरिचित होगा. पर जिस महिला ने उन्हें जीवन भर संबल दिया और यहाँ तक पहुँचाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, वह गाँधी जी की धर्मपत्नी कस्तूरबा गाँधी बा थीं.

गुजरात में 11 अप्रैल, 1869 को जन्मीं कस्तूरबा बा का 14 साल की आयु में ही मोहनदास करमचंद गाँधी जी के साथ बाल विवाह हो गया था. वे आयु में गांधी जी से 6 मास बड़ी थीं. वास्तव में 7 साल की अवस्था में 6 साल के मोहनदास के साथ उनकी सगाई कर दी गई और 13 साल की आयु में उन दोनों का विवाह हो गया. जिस उम्र में बच्चे शरारतें करते और दूसरों पर निर्भर रहते हैं, उस उम्र में कस्तूरबा बा ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन आरंभ कर दिया. वह गाँधी जी के धार्मिक एवं देशसेवा के महाव्रतों में सदैव उनके साथ रहीं. यही उनके सारे जीवन का सार है. गाँधी जी के अनेक उपवासों में बा प्रायः उनके साथ रहीं और उनकी जिम्मेदारियों का निर्वाह करती रहीं. गाँधी जी के उपवास के समय कस्तूरबा गाँधी बा भी एक समय का ही भोजन करती थीं. आजादी की जंग में जब भी गाँधी जी गिरफ्तार हुए, सारा दारोमदार कस्तूरबा बा के कन्धों पर ही पड़ा. यदि इतने सब के बीच गाँधी जी स्वस्थ रहे और नियमित दिनचर्या का पालन करते रहे तो इसके पीछे कस्तूरबा बा थीं, जो उनकी हर छोटी-छोटी बात का ध्यान रखतीं और हर तकलीफ अपने ऊपर लेतीं. तभी तो गाँधी जी ने कस्तूरबा बा को अपनी मां समान बताया था, जो उनका बच्चों जैसा ख्याल रखतीं.

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विवाह के बाद कस्तूरबा बा और मोहनदास 1888 ई. तक लगभग साथ-साथ ही रहे किंतु गाँधी जी के इंग्लैंड प्रवास के बाद से लगभग अगले 12 वर्ष तक दोनों प्रायः अलग-अलग से रहे. इंग्लैंड प्रवास से लौटने के बाद शीघ्र ही गाँधी जी को अफ्रीका चला जाना पड़ा. जब 1896 में वे भारत आए तब कस्तूरबा को अपने साथ ले गए. तब से गाँधी जी के पद का अनुगमन करती रहीं. उन्होंने उनकी तरह ही अपने जीवन को सादा बना लिया था. 1904-1911 तक वह डरबन स्थित गाँधी जी के फिनिक्स आश्रम में काफी सक्रिय रहीं.

दक्षिण अफ्रीका में एक वाकया कस्तूरबा बा की जीवटता और संस्कारों का परिचायक है. दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की दयनीय स्थिति के खिलाफ प्रदर्शन आयोजित करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया व 3 महीने कैद की सजा सुनाई गई. वस्तुतः दक्षिण अफ्रीका में 1913 में एक ऐसा कानून पास हुआ जिसके अनुसार ईसाई मत के अनुसार किए गए और विवाह विभाग के अधिकारी के यहाँ दर्ज किए गए विवाह के अतिरिक्त अन्य विवाहों की मान्यता अग्राह्य की गई थी. गाँधी जी ने इस कानून को रद्द कराने का बहुत प्रयास किया पर जब वे सफल न हुए तब उन्होंने सत्याग्रह करने का निश्चय किया और उसमें सम्मिलित होने के लिये स्त्रियों का भी आह्वान किया. पर इस बात की चर्चा उन्होंने अन्य स्त्रियों से तो की किंतु से नहीं की. वे नहीं चाहते थे कि बा उनके कहने से सत्याग्रहियों में जायँ और फिर बाद में कठिनाइयों में पड़कर विषम परिस्थिति उपस्थित करें. जब कस्तूरबा बा ने देखा कि गाँधी जी ने उनसे सत्याग्रह में भाग लेने की कोई चर्चा नहीं की तो बड़ी दुरूखी हुई और फिर स्वेच्छया सत्याग्रह में सम्मिलित हुई और तीन अन्य महिलाओं के साथ जेल गईं. जेल में जो भोजन मिला वह अखाद्य था. धर्म के संस्कार बा में गहरे पैठे हुए थे. वे किसी भी अवस्था में मांस और शराब लेकर मानुस देह भ्रष्ट करने को तैयार न थीं. कठिन बीमारी की अवस्था में भी उन्होंने मांस का शोरबा पीना अस्वीकार कर दिया और आजीवन इस बात पर दृढ़ रहीं. जेल में उन्होंने फलाहार करने का निश्चय किया. किंतु जब उनके इस अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया गया तो उन्होंने उपवास करना आरंभ कर दिया. अंततः पाँचवें दिन अधिकारियों को झुकना पड़ा. किंतु जो फल दिए गए वह पूरे भोजन के लिये पर्याप्त न थे. अतः कस्तूरबा बा को तीन महीने जेल में आधे पेट भोजन पर रहना पड़ा. जब वे जेल से छूटीं तो उनका शरीर ढांचा मात्र रह गया था, पर उनके हौसले में कोई कमी नहीं थी.

भारत लौटने के बाद भी वे गाँधी जी के साथ काफी सक्रिय रहीं. चंपारन के सत्याग्रह के समय बा तिहरवा ग्राम में रहकर गाँवों में घूमती और दवा वितरण करती रहीं. उनके इस काम में निलहे गोरों को राजनीति की बू आई. उन्होंने बा की अनुपस्थिति में उनकी झोपड़ी जलवा दी. बा की उस झोपड़ी में बच्चे पढ़ते थे. अपनी यह पाठशाला एक दिन के लिए भी बंद करना उन्हें पसंद न था अतः उन्होंने सारी रात जागकर घास का एक दूसरा झोंपड़ा खड़ा किया. इसी प्रकार खेड़ा सत्याग्रह के समय बा स्त्रियों में घूम घूमकर उन्हें उत्साहित करती रहीं. 1922 में जब गाँधी जी को गिरफ्तार कर छह साल की सजा हुई, उस समय कस्तूरबा गाँधी ने महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में विदेशी कपड़ों के त्याग के लिए लोगों का आह्वान किया. गाँधी जी का संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए वे गुजरात के गाँवों में दिन भर घूमती फिरीं. 1930 में दांडी कूच और धरासणा के धावे के दिनों में गाँधी जी के जेल जाने पर कस्तूरबा बा एक प्रकार से उनके अभाव की पूर्ति करती रहीं. वे पुलिस के अत्याचारों से पीड़ित जनता की सहायता करती, धैर्य बँधाती फिरीं. 1932 और 1933 का अधिकांश समय तो उनका जेल में ही बीता. इसी प्रकार जब 1932 में हरिजनों के प्रश्न को लेकर बापू ने यरवदा जेल में आमरण उपवास आरंभ किया उस समय बा साबरमती जेल में थीं. उस समय वे बहुत बेचैन हो उठीं और उन्हें तभी चैन मिला जब वे यरवदा जेल भेजी गईं.

गाँधी जी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान 9 अगस्त, 1942 को गाँधी जी के गिरफ्तार हो जाने पर बा ने, शिवाजी पार्क (बंबई) में, जहाँ स्वयं गाँधी जी भाषण देने वाले थे, सभा में भाषण करने का निश्चय किया किंतु पार्क के द्वार पर ही अंग्रेजी सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. दो दिन बाद वे पूना के आगा खाँ महल में भेज दी गईं, जहाँ गाँधी जी पहले से गिरफ्तार कर भेजे चुके थे. उस समय वे अस्वस्थ थीं. 15 अगस्त को जब यकायक गाँधी जी के निजी सचिव महादेव देसाई ने महाप्रयाण किया तो वे बार बार यही कहती रहीं महादेव क्यों गया, मैं क्यों नहीं? बाद में महादेव देसाई का चितास्थान उनके लिए शंकर-महादेव का मंदिर सा बन गया. वे नित्य वहाँ जाती, समाधि की प्रदक्षिणा कर उसे नमस्कार करतीं. वे उसपर दीप भी जलवातीं. यह उनके लिए सिर्फ दीया नहीं था, बल्कि इसमें वह आने वाली आजादी की लौ भी देख रही थीं. कस्तूरबा बा की दिली तमन्ना देश को आजाद देखने की थी, पर उनका गिरफ्तारी के बाद उनका जो स्वास्थ्य बिगड़ा वह फिर अंततः उन्हें मौत की तरफ ले गया और 22 फरवरी, 1944 को वे सदा के लिए सो गयीं.

संपर्क : टाइप निदेशक बंगला, पोस्टल ऑफिसर्स कॉलोनी, जेडीए सर्किल के निकट, जोधपुर,

राजस्थान- 342001

ई-मेल : akankshay1982@gmail.com

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