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रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 : मिशेल फूको विशेषांक पीडीएफ ईबुक के रूप में नीचे दिए विंडो में पढ़ें. बड़े आकार में फुल स्क्रीन में पढ़ने के लिए संबंधित आइकन को क्लिक करें. पीडीएफ फ़ाइल भी डाउनलोड कर ऑफलाइन पढ़ सकते हैं.  इसके लिए आर्काइव.ऑर्ग की फ़ाइल लिंक को टच/क्लिक करें.

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जब से मैने सुना है कि कलकत्ता के राम कृष्ण मिशन अस्पताल में एक पूंछ वाले बच्चे ने जन्म लिया है तब से मैं बहुत खुश हूं। हमारे पूर्वजों की भी पूंछ हुआ करती थी। डाक्टरों का कहना है कि जब एक-डेढ महीने का भ्रूण पेट में होता है तो उसकी भी पूंछ होती है। और नौ महीने बीतते-बीतते वह पूंछ समाप्त हो जाती है। परंतु इस बच्चे ने पुराने संस्कार त्यागने से इंकार कर दिया। और पूंछ सहित पैदा हो गया। इस हिसाब से यह बच्चा हमारे पूर्वजों का लघु-संस्करण है। अतः पूज्यनीय है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि पूज्यनीय पूर्वज का जन्म कलकत्ता में हुआ। मैं ठहरा एक अदना सा व्यंगकार, इतना किराया खर्च करके उस महान आत्मा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करने में असमर्थ हूं। अतः यहीं बैठे-बैठे ही मैं उस महापुरुष को साष्टांग प्रणाम करता हूं।

कह्ते हैं कि हमारे पूर्वजों की भी एक प्यारी-सी, छोटी-सी पूंछ हुआ करती थी। परंतु मनुष्य तो जन्म से ही इर्ष्यालु है। जानवरों की लम्बी पून्छ उसे फूटी आंख न भाई। बस, मनुष्य ने भगवान की व्यवस्था के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया। नारे लगने लगे। रैलियां निकलने लगीं क्रमिक भूख-हडताल से लेकर आमरण अनशन तक रखे जाने लगे। चारों ओर हाहाकार, लूटमार मच गई। भगवान के (यम) दूतों ने मनुष्य को बहुत समझाया। परंतु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। मनुष्यों की मांग थी कि हमारी पूंछ को बडा करो। कुछ लोगों ने तो जानवरों की पूंछ को विदेशी नागरिकों की संज्ञा दी और उसे काटने की मांग करने लगे। भगवान भी परेशान। लोग भूख ह्डताल व यमदूतों के गदा प्रहारों से धडाधड़ मरने लगे। न नर्क में जगह बची न स्वर्ग में। गुस्से से भरकर भगवान ने नर्क व स्वर्ग की तालाबन्दी कर दी। और आदमी की पूंछ जड़ से ही काट कर आदमी को जमीन पर धक्का दे दिया। तब से मनुष्य पूंछ के बिना लुटा-लुटा सा घूम रहा है।

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यदि मैं यहां पूंछ के गुणों का बखान करने लगूं तो एक महाकाव्य ही तैयार हो जाय। आपको याद होगा कि एक बार जब श्री राम चन्द्र जी की धर्मपत्नि “ श्रीमति राम “ का विपक्षी दल के नेता रावण ने अपहरण कर लिया था तो उस समय हनुमान जी ने अपनी पूंछ से ही सारी लंका जला दी थी। सांप भी मर गया और लाठी भी बच गई। आज मैं सोचता हूं कि अगर हनुमान जी की पूंछ न होती तो श्रीमति राम का क्या होता ?

जिस प्रकार से मनुष्यों में इज्जत की निशानी मूंछ होती है उसी प्रकार से जानवर भी अपनी पूंछ की बेईज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकते। एक सिर फिरे आदमी ने एक कुत्ते की घनी व लच्छेदार टेढी पूंछ को सीधा करने का प्रयास किया था। कहते हैं कि 12 साल बाद भी कुत्ते ने अपने जाति-स्वभाव को नहीं छोड़ा। और उसकी पूंछ टेढ़ी ही रही।

जब मेरी मूंछें फूटनी शुरु ही हुई थी तो मेरे दिल में मूंछ पर एक कविता लिखने की सनक सवार हो गई। उस कविता में मूंछ की तुक पूंछ से भिडाते समय मेरे दिल में अचानक यह ख्याल आया कि आदमी की पूंछ क्यों नहीं होती ? मैंने अपनी पीठ पर रीढ की हड्डी के नीचले सिरे तक हाथ फिरा कर देखा और पून्छ को नदारद पाकर मुझे बहुत दुख हुआ। बस मैं कागज़ कलम वहीं पर पटक कर दौडा-दौडा अपने पिता जी के पास गया और उन से आदमी की पूंछ न होने की शिकायत की। पिता जी ने दूसरे ही दिन मेरी शादी कर दी। यानि बाकायदा मेरी पूंछ मेरे पीछे चिपक गई। अब यह पूंछ इतनी लम्बी हो गई है कि मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। और घर में केवल पूंछ ही पूंछ दिखाई देती है। अब मैं इस बढी हूई पूंछ से इतना परेशान हूं कि इसको काटने के तरह-तरह के उपाय सोचता रहता हूं परंतु यह बढ़ती ही जाती है। सोचता हूं बिना पूंछ के ही ठीक था।

राम कृष्ण खुराना
99889 27450
#Ram_Krishna_Khurana

एक नजरिया यह भी:

राजनीति ( पॉलिटिक्स ) यूनानी भाषा के 'पोलिस' शब्द से बना है, जिसका अर्थ है - समुदाय, जनता या समाज .आमतौर पर हम लोग जनता की नुमाइंदगी करके सत्ता तक पहुँचने, बड़ा ओहदा हथियाने , जनता और सरकार का बिचौलिया बनकर अपने छल बल से जनता का पैसा अपने खाते में पहुँचाने या फिर जनता को लुभावने सपने दिखाकर गुमराह करने को ही राजनीति समझते हैं. परन्तु यदि हम अतीत पर गौर करें तो पाएगें कि बीते जमानें में अफलातून ( प्लूटो ) और अरस्तु ( एरिस्टोटल ) जैसे महान चिंतको ने ऐसे प्रत्येक विषय को राजनीति कहा, जिसका सम्बंध पूरे समुदाय को प्रभावित करने वाले सामान्य प्रश्नों से है. खैर यह भी सत्य है कि प्रत्येक मानव प्राणी की आत्म-सिद्धि के लिए समाजिक जीवन में सहभागिता आवश्यक है. गर हम बुनियादी तौर पर कहें तो मनुष्य एक राजनीतिक प्राणी है. इसका मतलब यह है कि हमारे रोजमर्रा की जिन्दगी में किया जाने वाला कार्य भी राजनीति का एक हिस्सा होता है. फर्क बस इतना है कि हमारे राजनीतिक कार्य राष्ट्र राजनीति न होकर स्वयं के लिए आत्म राजनीति होती है, जो हमें दिन प्रतिदिन सम्भालती है, सँवारती है और एक अच्छा इंसान बनाकर बेहतर जीवन की ओर अग्रसित करती है.

कुछ प्रेरक विचार :

1- बर्नार्ड़ क्रिक - राजनीति ऐसा क्रिया कलाप है जिसके द्वारा शासन के किसी खास इकाई के अन्दर आने वाले अलग अलग हितों को, सम्पूर्ण समुदाय की भलाई और अस्तित्व के लिए उनके अलग अलग महत्व को ध्यान में रखते हुए, उसी अनुपात में सत्ता में हिस्सा देकर उनके बीच सामंजस्य स्थापित किया जाता है.

2- उदारवादी दृष्टिकोण - राजनीति सामंजस्य की खोज की एक प्रक्रिया है.

3- राबर्ट ए. डैड्ल - राजनीति वह व्यवस्था है जिसका सम्बंध नियंत्रण, प्रभाव शक्ति और प्राधिकार से होता है.

4- रैफेल के अनुसार - राजनीति वह है, जिसका सम्बंध राज्य से होता है.

5- पाल जैनेट के अनुसार - राजनीति समाज का वह अंग है जिसमें राज्य का आधार तथा सरकार के सिद्धान्तों पर विचार करके जनता के बीच सुचारू रूप से लागू किया जाता है.

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मौजूदा हालात:

यकीनन् हम यह कह सकते हैं कि आज आजाद भारत में राजनीति को अपना हथियार बनाने वाले जनता के चुने हुए अधिकतर नुमाइंदें ओछी राजनीति करके अपना उल्लू सीधा करने में दिन रात लगे हुए हैं. इन्होनें अपने काले करतूतों से स्वच्छ राजनीति की परिभाषा ही बदल ड़ाली है. आज तो राजनीति को साम्प्रदायिकता का जामा पहनानें का नया दौर चल रहा है. राजनीति में अपने को प्रबुद्ध वर्ग मानने वाला तबका भी निजी स्वार्थ के लिए सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़नें के लिए तैयार बैठे हैं. जिधर देखिए, उधर बस भाषा, परिधान व नये नये वादों को हथियार बनाकर भारत की भोली भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. हर एक राजनीतिक व्यक्ति सेक्युलर बनने की होड़ में "अल्पसंख्यक राजनीति " का सहारा ले रहा है. नतीजन आज स्थिति अत्यन्त भयावह है, साफ़ सुथरी छवि वाले राजनीतिक लोगो की सँख्या हाशिए पर आ खड़ी है. जरा सोचिए , जिस देश में जनता के चुने हुए नुमाइंदे ही दागदार हों, तो उस देश की राजनीति कितनी स्वच्छ होगी......???

जरा शर्म करो :

अपने उस वक्त को याद कीजिए, जब आप जनता को गुमराह करके सत्ता के गलियारों में पहुँचने में सफल हो जाते हैं. हत्या, चोरी, भ्रष्टता आदि आरोपों में घिरे होने के बावजूद भी जनता ने आपको एक मौका दिया है. वह आप ही तो थे, जो जाति धर्म को दरकिनार करके अपने निजी स्वार्थ के लिए लोगों की चरण वन्दना करते दिख रहे थे. उस वक्त क्या आपको शर्म नहीं आती है, जब आप सरपंच, विधायक, सांसद या ओहदेदार पद के लिए निष्ठा, इमानदारी व देशप्रेम की शपथ ले रहे होते हैं ? आपका अतीत और भविष्य दोनों इसके विपरीत ही रहने वाला है. क्या यह बापू या फिर मिसाइल मैन के सपनों का भारत है ? मंत्री, अफसर, धन्नासेठ सब अर्थजगत के शीर्षस्थ स्वामियों के हाथ की कठपुतली नज़र आते है. जनता के खून पसीनों के पैसों से मौज मस्ती व पानीदारी दिखाने वाले दागी नेताओं को शर्म से ड़ूब मरना चाहिए. आपका शायद एक सूत्री एजेण्ड़ा है कि अन्याय व अत्याचार से धन इकट्ठा करके चुनाव लड़ना, साम-दाम-दण्ड़-भेद अपनाकर कुर्सी हासिल करना और फिर घोटाला करके पैसों को स्विस बैंकों में भरना. याद रखिए ! नेता जी इसका हिसाब आप ही चुकता करोगे, जनता तो जवाब देगी ही, उससे कहीं अधिक वक्त बखूबी आपको सबक सिखाएगा. परन्तु मुझे यकीन है कि आप फिर भी जस के तस रहोगे, क्योंकि आप निर्लज्य हो. ऐसे भ्रष्ट नेताओं पर हमें धिक्कार है, धिक्कार है....!!

अतीत कुछ यूँ था:

वह भी एक वक्त था, जब लोग राष्ट्र को सही दिशा में ले जाने हेतु जान की बाजी खेलने तक को तैयार थे. इसके एक नहीं , सैकड़ो उदाहरण हमारे सामने हैं. राष्ट्र प्रेमी नेताओं के मन में एक अटल संकल्प था कि हम वतन के गौरव को शीर्ष पर पहुँचा कर ही दम लेंगे. ये वही क्रान्तिकारी राजनेता थे जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माता को बेड़ियों से मुक्त कराया. 'तुम मुझे खून दो, मै तुम्हें आजादी दूँगा', ' जय जवान जय किसान', 'हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान', ' भारत माता अमर रहें , हम दिन चार रहें न रहें'.... के नारे और संकल्पों को साकार करने वाले नेताओं के बाद देश में उनके जैसा दूसरा नेता न होना बड़े दुर्भाग्य और दुःख की बात है. आज भारत माता अन्याय व अत्याचार से लाचार होकर चीख़ रहीं हैं कि कहाँ गए वो महात्मा गाँधी, सुभाष चन्द्र बोष, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, चाचा नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी, ड़ा अब्दुल कलाम... जिन्होंने अपने समूचे जीवन को भारत माता के चरणों में न्यौछावर करके सार्थक राजनीति की एक मिशाल पेश की थी.

फिर ऐसा क्यूँ :

आजादी के कई दशक गुजर जाने के बाद भी रोटी के लाले क्यूँ ? नतीजन हजारो हजार लोग भुखमरी से मर रहें हैं.आम आदमी आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित क्यूँ ? बेरोजगारी का आलम इस कदर है कि कुछ लोगों को मजबूरी में अपनी रोजमर्रा चलाने के लिए वतन छोड़ना पड़ता है. अन्नदाता कहा जाने वाला किसान आत्म हत्याएँ कर रहा है, गरीबी से जूझ रहा है , फिर भी अपना खून पसीना एक करके हमारे लिए अन्न पैदा करता ही है. परन्तु अन्नदाता की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है, ऐसा क्यूँ ? इस मुल्क के अधिकारी, राजनेता, कर्मचारी, व्यापारी, उद्योगपति यहाँ तक कि न्यायाधीश पर भी बिकने का आरोप लगा हो, इतना ही नहीं, यहाँ कुछ लोग ऐसे भी है जो दो वक्त की रोटी के लिए अपना खून बेचते फिरते है, आखिर ऐसा क्यूँ ? यह विशेष गौरतलब है कि मुल्क की अर्थव्यवस्था महज कुछ एक लोगों के हाथों सिमटती जा रही है, जोकि भविष्य के लिए बेहद चिंतनीय है.

कुछ आप ही विचारिए:

यह सर्वमान्य हैं कि व्यक्ति से बड़ा परिवार, परिवार से बड़ा समाज, समाज से बड़ा राष्ट्र होता है. आवश्यकता पड़ने पर परिवार के लिए स्वयं को, समाज के लिए परिवार को और राष्ट्र के लिए समाज को प्रत्येक पल समर्पित रहना चाहिए. मगर आज का मंजर बिल्कुल विपरीत है, लोग स्वयं को परिवार , समाज और वतन से भी ज्यादा ऊपर समझने लगे हैं. "वसुधैव कुटुम्बकम" की व्यापक विचारधारा वाला देश महज व्यक्ति विशेष तक सिमटता नज़र आ रहा है.

यही वजह है कि राजनेता, अधिकारी , कर्मचारी, व्यापारी सब के सब भ्रष्टता में लिप्त दिख रहें हैं. स्वयं को इमानदार और गाँधीवादी बताने वाले लोग जनता की गाढ़ी कमाई से गुलछर्रे उड़ा रहे हैं. जिधर देखो उधर सिर्फ अवसरवादी, लोलुप, धूर्त लोगों का बोलबाला नज़र आ रहा है. स्थिति यह है कि सत्ता के गलियारों तक पहुँचने वाले अधिकतर राजनेता, राजनीतिक शुचिता और राजधर्म पालना से कोसों दूर नज़र आते है.

स्वयं के विचार बदलिए:

एक बात तो साफ है कि सत्ता की लौ में रोटी सेंकने वाले लोग स्वयं को नहीं बदल पाएगें, इसलिए आप ही उनको बदल दीजिए. वास्तविकता तो यह है कि इन नेताओं ने तो राजधर्म की परिभाषा ही बदल ड़ाली है. आलम यह है कि अधिकतर नेता राजधर्म को जानते तक नहीं हैं तो राष्ट्र सेवा ही कितना कर पाएगें ...?? रामचरित मानस में बाबा तुलसी दास जी ने बिल्कुल सटीक लिखा है कि "राजा वही हो सकता है, जो प्रजा को त्रिताप से मुक्त करे". चारो ओर परिवर्तन की अलख जग रही है, देर मत कीजिए, स्वयं के विचार बदलिए, नज़रिया तो स्वतः बदल जाएगा. स्वच्छ छवि, इमानदार, जुझारू, योग्य नेता चुनिए, जो समाज की विषमताओं को हुक्मरानों तक पहुँचाकर उसका निवारण करें, भारत माँ के गौरव को बढ़ाए और एक नई क्रान्ति लाए.

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परिचय -

"अन्तू, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश की निवासिनी शालिनी तिवारी स्वतंत्र लेखिका हैं । पानी, प्रकृति एवं समसामयिक मसलों पर स्वतंत्र लेखन के साथ साथ वर्षो से मूल्यपरक शिक्षा हेतु विशेष अभियान का संचालन भी करती है । लेखिका द्वारा समाज के अन्तिम जन के बेहतरीकरण एवं जन जागरूकता के लिए हर सम्भव प्रयास सतत् जारी है ।"

सम्पर्क - shalinitiwari1129@gmail.com

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राजनीति में अपराधिक छवि के लोगों का आना हम सब के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए, पर ऐसा है नहीं.

संसद के २०१४ के चुनाव के बाद, एक-तिहाई सदस्य ऐसे हैं जिन के विरुद्ध अपराधिक मामले हैं और इनमें से २१% तो ऐसे सदस्य हैं जिनके विरुद्ध गंभीर मामले हैं.

‘कार्नेगी इंन्डाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के ‘मिलन वैष्णव’ का मानना है कि लोग अपराधिक छवि के नेताओं को इस लिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे नेता उनके लिए कुछ कर पायेंगे, खासकर ऐसे प्रदेशों में जहां सरकारी तन्त्र थोड़ा कमज़ोर  हो चुका है.

मिलन वैष्णव की बात कुछ हद तक सही हो सकती है,  पर मेरा मानना है की हम भारतीयों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता की जिस व्यक्ति को हम चुनकर लोक सभा या विधान सभा या पंचायत वगेरह में भेज रहे हैं उसका चरित्र कैसा है. न्याय की परिभाषा हमारी अपनी ही होती है जो समय और स्थिति के अनुरूप बदलती रहती है. क़ानून और व्यस्था में हमारा अधिक विश्वास नहीं है. दूसरे की सुख सुविधा की चिंता हम कम ही करते हैं.

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हम जब सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं तो इस बात की बिलकुल परवाह नहीं करते कि हमारे कारण दुर्घटना में किसी की जान भी जा सकती है. कुछ दिन पहले जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार २०१५ में लगभग ५ लाख सड़क दुर्घटनाएं घटी जिन में एक लाख सतहत्तर हज़ार लोगों ने जान गवाई, अर्थात हर एक घंटे में कहीं न कहीं बीस लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई.

यह एक भयावह स्थिति है पर कितने लोग हैं जो इस बात को लेकर चिंतित हैं. हम अब भी वैसे ही सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं जैसे दौड़ाते आये हैं. अधिकतर लोग तो सड़क पर किसी को रौंद कर या आहत कर पल भर को रुकते भी नहीं और दुर्घटना स्थल से तुरंत भाग जाते हैं. कोई विरला ही वहां रुक कर ज़ख़्मी की सहायता करता है. 

इस देश में सिर्फ २४ लाख लोग ही मानते हैं कि उनकी आय दस लाख से अधिक है. यह एक हास्यास्पद बात ही है. एन सी आर में ही दस लाख रुपये कमाने वालों की संख्या शायद २४ लाख से अधिक हो.  सत्य तो यह है की लाखों-लाखों  लोग आयकर से बचने के लिए आयकर रिटर्न भरते ही नहीं या फिर झूठे और गलत रिटर्न भरते हैं.

अपने आस पास देख लें, आपको सैंकड़ों ऐसे घर दिखाई दे जायेंगे जो नियम-कानून की अवहेलना कर बनाये गए हैं या जिनमें नियमों के विरुद्ध फेर-बदल किये गए हैं.

सरकारी कार्यलयों में आपके कुछ ही लोग दिखेंगे जो अनुशासन का पालन करते हुए पुरी निष्ठा और लगन के साथ अपना काम करते हैं. अधिकतर तो बस समय काटते हैं या अपने पद का दुरूपयोग करते हैं.

ऐसे कितने ही उदाहरण आपको मिल जायेंगे जो दिखलाते हैं कि  नियम, व्यवस्था, अनुशासन को लेकर हमारा व्यवहार बहुत ही लचीला है. इस कारण हम लोगों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि जिस व्यक्ति को हम अपना वोट दे रहें हैं वह एक अपराधी है या दल-बदलू है या उसका चरित्र संदेहास्पद है.

अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी संख्या में अपराधिक छवि के लोग संसद, विधान सभाओं और दूसरी अन्य संस्थाओं के लिए न चुने जाते.  दोष राजनीतिक पार्टियों का उतना नहीं जितना नहीं हमारा है. हम अपने को दोषमुक्त मानने के लिए राजनीतिक दलों को दोषी ठहरा देतें हैं. इस कारण निकट भविष्य में स्थिति में किसी सुधार की आशा करना गलत होगा. 

यह खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई कि मैं देश-सेवा के लिए उतरने वाला हूं । उसने सुना, भागा आया और मेरे निर्णय की दाद दी । बधाई-संदेशों का तांता लग गया- ''सुना, आप देश-सेवा पर उतर रहे हैं, ईश्वर देश का भला करें !''

प्रस्ताव-पर-प्रस्ताव आने लगे कि बाइ द वे, शुरुआत कहां से कर रहे हैं? कौन-सा एरिया चुन रहे हैं? हमारे अंचल से करिए न! बहुत स्कोप है । हेलीपैड बनकर विकसित होने लायक इफरात जमीन पड़ी है । आबोहवा भी स्वास्थ्यप्रद हे । ईश्वर की दया से गरीबी, भुखमरी ओर अशिक्षा आदि किसी बात की कमी नहीं । लोग भी सीधे-सादे नादान किस्म के हैं-आखें मूंदकर माई-बाप का रिश्ता जोड़ लेने वाले । अगले दस सालों तक तो बहकने की कोई गुंजाईश नहीं । वर्षों सुख-शांति, अमन-चैन से गुजार सकेंगे, आप 'माई-बाप', इन देश के लालों के साथ । ये हमेशा रोटी के लाले पड़े रहने पर भी कभी शिकवे-शिकायत नहीं करते । हर हाल में मुंह सिलकर रहने की जबरदस्त ट्रेनिंग मिली है इन्हें ।

मैंने सोचा, जगहें तो सारी एक-सी हैं; ऐसे स्कोप कहा नहीं है! लेकिन जब कहा जा रहा है, आफर मिला है तो उन्हीं के एरिया से शुरुआत हो जाए । मेरा निश्चय सुनते ही प्रेस वाले दौड़े आए और आग की तरह फैलती इस खबर में घी डाल गए ।

शाम को उस एरिया का सबसे बड़ा कांट्रेक्टर आया और सलाम करके बोला - 

' 'बंगला कहां छवेगा

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मैं हैरान । कैसा बंगला? अभी देश-सेवा तो हुई नहीं कुछ, उससे पहले बंगला छवाने आ गया!

उसने उसी अदब भरी मुस्तैदी से कहा, ''वही तो, जब तक बंगला नहीं छवेगा, देश-सेवा-जनहित जैसे महान काम कहां बैठकर करेंगे आप? लोक-सेवक लोग आकर कहां ठहरेंगे? मुलाकाती कहां लाइन लगाएंगे? संतरी कहां सिडकेगा उन्हें?... फूस की छत या टिन के शैड के नीचे मुलाकाती नहीं इकट्ठे होते । कोई बेवकूफ थोड़े है । सीधी-सी बात है, जो अपने सिर पर छत नहीं खड़ी कर पाया, वह उनके सिरों पर साया कहां से करेगा? अपना नहीं तो कम-से-कम अपने दुःख-दर्द सुनाने आने वालों का तो ख्याल कीजिए ।''

मैंने कहा, ' 'तब फिर छवा दीजिए, जहां ठीक समझिए ।''

वह खुश हो गया । वहीं-का-वहीं बैठकर नक्शा वगैरह खींचकर वह बोला, 'गेराज एक रहेगा या दो ?' '

मैंने कहा, ' 'अरे यार! पहले कार तो हो।

उसने कहा, ' 'आपकी न सही, मुलाकातियों की तो होगी! और फिर यों समझ लीजिए कि बप्पा साहव को देशहित के पैवेलियन में कुल छ: महीने ही गुजरे हैं और आलरेडी दोनों बेटों के ट्रकों और स्टेशन-वैगनों के लिए जगह की कमी पड़ रही है ।''

मैंने आज्ञाकारी बच्चे की तरह कहा, ' 'तब जैसा आप लोग उचित समझिए ।''

कांट्रेक्टर खुश हो गया, ' 'ऐसा करते हैं, एक गेराज बना देते हैं और दो की जगह छोड़ देते हैं पोर्च पोर्टिको आलीशान बनाएंगे, नहीं तो संतरी टुटपुंजिए मुलाकातियों को रुआब से दुतकारेगा कैसे? संतरी जितना कटखना होता है, आदमी उतना ही पहुंच वाला माना जाता है । अच्छा मैं चलता हूं । बंगले का आहाता, लान सींचने, साग-सजी फूल-पत्तों की क्यारी संवारने के लिए मेरा एक आदमी है, बड़ा नेक और विश्वासपात्र । इस काम के लिए उसी को रखिएगा, जनहित जैसे काम करने जा रहे हैं तो इस एरिया के नक्कालों से सावधान रहने की जरूरत है ।' '

शाम को उस एरिया के व्यापारी-संगठन का प्रमुख आया और आजिजी से बोला ' 'देश-सेवियों का भोजन तो अत्यंत संतुलित और नियमित होता है । साहब तो अनाज को हाथ नहीं लगाते थे और देख लीजिए काठी ऐसी है कि सत्तर की उम्र में सत्ताईस वालों को बगल में दबाकर घूमे । अखाड़ेबाजों-सा सधा और तना हुआ शरीर सिर्फ मीनू की बदौलत ही तो! बाइ द वे आपका मीनू?' '

मैंने झेंपकर कहा, ' 'अभी बनाया नहीं... ।' '

उसने ताकीद की, ' 'तो झटपट बना डालिए-खानपान की दुरुस्ती पहले । आप जानो रूखी-सूखी वाले महात्मा को कौन पूछता है? मेरा तो आज तक किसी नमक-रोटी खाने वाली महान आत्मा से साबका पड़ा नहीं । मेरे देखते-देखते कितने ही जनसेवी नमक, रोटी, प्याज से शुरू होकर फल, दूध और सूखे मेवों वाले मीनू पर स्थानांतरित हो आज तक स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं ।' '

मैंने संकोच से कहा, ' 'सूखे मेवे तो गरिष्ठ होंगे । सोचता हूं शुरू-शुरू में रोटी-दाल ही ठीक रहेगा ।'

उसने फौरन टोककर कहा, ' देखिए, आप दाल-रोटी खाइए या नमक-रोटी, लेकिन एक बात समझ लीजिए-इधर भड़काने वाले बहुत हैं-घर-घर यह बात पहुंच जाएगी कि जो खुद नमक-रोटी खाता है वह हमें मालपुए कहां से खिलाएगा? -और इस एरिया के लोग भोले-भाले, नादान हैं ।' '

. मैंने कहा ' आपकी बात ठीक है लेकिन मेवे बहुत महंगे भी तो हैं ।''

वह बेतकल्लुफी से बोला, ' क्यों शर्मिंदा कर रहे हैं आप? आप इस एरिया के जनसेवक होकर आ रहे हैं और खरीदकर मेवे खाएंगे ' लानत नहीं होगी इस जमीन के बाशिंदों के . लिए? आखिर हम किस मर्ज की दवा हैं? आज ही सूखे मेवों का एक टोकरा भेजे देते मैंने जल्दी से कहा, ' नही-नहीं, आपके मेवे...

उन्होंने बात काटकर कहा, ' .उन्हें मेरे मेवे नहीं, देश-सेवा के मेवे समझकर खाइएगा, बस! बसे भी आप चखकर देखिएगा तब समझिएगा कि खरीदकर खाए मेवों में वो स्वाद और लज्जत कहां जो देश-सेवा से प्राप्त मेवे में होती है! पैसों की चिंता मत कीजिएगा ' मुझे आप पर भरोसा है; मेरे पैसे कहीं नहीं जाएंगे । सब वसूल हो जाएंगे ।''

अगले दिन उस एरिया का नामी-गिरामी दर्जी आया और बड़े प्यार से मुझे अपने फीते में जकड़ते हुए बोला, ' 'आप फिक्र न कीजिए । मुझे सब अंदाज है । यथा साहब से मैंने पहली बार नाप लेते वक्त ही कह दिया था कि अगली अचकन और पाजामे के लिए कम-से-कम पौना-पीना मीटर कपड़ा ज्यादा लाइएगा । और वही हुआ! वैसे ही आप भी करिएगा लिवास तो यही रखेंगे न! रखना भी चाहिए । शुम्र, स्वच्छ बकुल-पंखी-अर्थात् बगुले की तरह सफेद शक्काफ । हर मौके और हर जगह के लिए पूरी तरह दुरुस्त । जमाने की हवा सर्द हो या गर्म, ये वस्त्र पूरी तरह वातानुकूलित रहते हैं । समझ लीजिए, लिफाफे हैं जो अपना मजमून बदलते रहते हैं । कोई बाहर से इनके अंदर का मजमून भांप नहीं सकता । और इधर तो इस लिबास की महिमा और बढ़ गई है । इतिहास बताता है कि पहले इस लिबास को महान लोग पहनते थे, अब इसे जो पहन लेता है तुरत-फुरत महान हो जाता है ।''

अगले दिन सुबह-सुबह तेल-पिलाई लाठी और घुल-बकरी सीने वाला एक मुच्छड् आया और सलाम ठोंककर बोला, ' 'मैं संतरी हूं सिर्फ देश-सेवियों के पोर्टिकों और पोर्चों के लिए समर्पित । अब तक की सारी जिंदगी, समझ लीजिए, देश-सेवी फाटकों ओर पोर्चों पर ही कुर्बान की है । खिदमत में कोई कोरकसर नहीं रहेगी, इसका भरोसा रखें । बप्पा साहब ने तो पूरी हक-हुकूमत दे रखी थी । जिसे चाहता अंदर जाने देता, जिसे चाहता चार धक्के दे, कालर पकड़, बाहर कर देता । बप्पा साहब कभी दखल न देते थे ।

अहा, क्या आदमी थे! कभी पूछा-पैरवी की ही नहीं । मेरी वजह से कभी टुटपुंजिए, फटेहाल मुलाकती उनके पास फटक ही नहीं पाए । समझ लीजिए, वे तो नाम के मंतरी ये । असली मंतरी तो मैं यानी उनका संतरी ही हुआ करता था । अब आपको क्या बताना, समझ लीजिए एक तरह से पूरे देश की बागडोर संतरियों के हाथ में ही होती है.. अच्छा चलता हूं । फाटक, पोर्टिको तैयार हो जाए तो बुलवा लीजिएगा । ये रहा मेरा विजिटिंग कार्ड । मेरे सिवा कोई और यहां संतरी न होने पाए, इसका ख्याल रखिएगा । यह ओहदा जिस-तिस को सौंपने लायक नहीं । बड़ी जिम्मेदारी, बड़े जोखम का काम है । हां, सांझ को इस इलाके के कुछ और नामी-गिरामी, तावेदार लोग आपसे दुआ-सलाम किया चाहते हे जिससे आपको पूरा इत्मीनान हो सके ।''

शाम को, सर पे टोपी लाल, गले में रेशम का रूमाल बांधे वे लोग भी आए और मुझे पूरा भरोसा दिला गए कि 'हमारे रहते इस पूरे इलाकेभर में किसी की हिम्मत नहीं जो आपके काम में दखल दे । न आपकी तरफ कोई आंख उठा सकता हे, न कोई इन्क्वायरी बैठ सकती है । हम जो हैं! आप तो बस खाइए और चेन से सोते हुए देश की खुशहाली का सपना देखिए । किसी की मजाल नहीं जो कोई रोड़ा अटकाए! अटकाए तो हमें तलब कीजिएगा । इसी तरह हमें पूरा भरोसा है कि आपके रहते हम पर आँच न आने पाएगी । है कि नहीं? न हमारा काम रुके, न आपका । बप्पा साहब जब तक रहे अपनी बात रखी, हम निर्द्वंद्व घूमते रहे । अब यह जिम्मेदारी आप पर । आप अपना हाथ हमारे सर पे रख दें तो हमें भी इत्मीनान हो जाए ।' '

मैंने ससंकोच उन्हें समझाने की कोशिश की, ' 'लगता है आप लोगों को कुछ गलतफहमी हो गई है-मैं तो यहां देश-सेवा के इरादे से आया हूं ।' '

उन्होंने फौरन कहा, ' 'लीजिए, तो हम कौन-से देश के बाहर हैं? हम भी तो उसी देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है, प्रदूषण की । हमें कोई गलतफहमी नहीं है! और एक बात आपको भी याद दिला दें कि आप भी किसी गलतफहमी में न पड़िएगा, यह इलाका जितना आपका है उतना ही हमारा भी । इतना ध्यान रखिएगा, देश-सेवा के क्षेत्र में रहकर हमारे जैसे देशवासियों से द्रोह न मोल लीजिएगा! बाकी जिम्मेदारी हमारी । न वोट की कमी होने देंगे न नोट की । आप चैन से सामाजिक-आर्थिक क्षेत्र के पिछड़े हुए तमाम काम कीजिए, चाहे काम तमाम कीजिए ।'

इस प्रकार धमकी भरे आश्वासन और आश्वासन-भरी धमकियां देते हुए भूतपूर्व मंतरी के संतरी और उसके बिरादरों ने अपने-अपने क्षेत्रों को गमन किया और उस विचारोत्तेजक धमकी से प्रेरित हुआ मैं, ओ मेरे क्षेत्रवासियों, आपके नाम यह संदेशनुमा धमकी जारी करता हूं कि चूंकि मुझे अब कुछ भरोसेमंद साथी मिल गए हैं, अत: मैं बेखौफ, बेहिचक आपके क्षेत्र की सेवा के अखाड़े में कूदने वाला हूं । सावधान!

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(हिन्दी हास्य व्यंग्य संकलन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से साभार)

विक्रमार्क ने हठ नहीं छोड़ा और एक बार फिर बैताल का शव पेड़ से उतार कंधे पर लादा और सदा की भांति मौन अपनी राह पर चल पड़ा । बैताल ने कुछ देर बाद कहा, ''मुझे तुम पर तरस आता है । तुम्हारा रास्ता काटने के लिए आज तुम्हें मैं तुम्हारी राजधानी दिल्ली का एक किस्सा सुनाता हूं । दिल्ली का एक आम इलाका है सराय रोहिल्ला, वहां बशेशरनाथ अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता है । लोअर मिडिल क्लास से तालुक रखता है । उसके दो बड़े भाई दिल्ली में ही अलग-अलग जगहों पर रहते हैं, एक इकलौती बहन है जो शादी के बाद अपने इकलौते पति के साथ हापुड में रहती है । इन चारों की मां मेरे किस्से की नायिका है ।

' बुढ़िया प्रागैतिहासिक हो चुकी थी । शरीर की शक्ति लगभग चुक गई थी और चूंकि उसके तीनों बेटे उसके हाथों से निकलकर अपनी पत्नियों के हाथों में खेल रहे थे, अत: वह बेचारी मेरठ में अपने छोटे भाई के साथ रहकर दिन काट रही थी । एक दिन होनी ऐसी हुई कि उसके भाई की मृत्यु हो गई । भाई के पुत्र ने सराय रोहिल्ला में बशेशरनाथ को तार दे दिया कि वे आएं और अपनी चल संपत्ति मां को ले जाएं जो वहां भाई के गम में अचल हो रही है । (हां, तुम्हें यह बता दूं कि मेरठ वाले की डायरी में सराय रोहिल्ला वाले का ही पता था) ।''

बैताल ने सांस लेकर फिर किस्सा शुरू किया, बशेशरनाथ को जब तार मिला, उस समय वह पत्नीविहीन हो, सुखी जीवन व्यतीत कर रहा था (पत्नी मायके गई हुई थी) । वह मां का सबसे छोटा व लाड़ला बेटा था, शायद इसीलिए उसके दिल में मां के लिए कहीं थोड़ी-सी 'वैकेंसी' थी । वह तुरंत मेरठ गया और मां को सराय रोहिल्ला ले आया । मां, भाई के गम व बुढापे की वजह से क्षीण हो गई थी । यहां दो दिन तो आराम से कटे किंतु तीसरे दिन जैसे ही श्रीमती बशेशरनाथ बच्चों के साथ घर लौटीं तो लौटते ही उसकी छातो पर काला भुजंग लोट गया । जब उसने देखा कि उसके बिछौने पर सास जी लेटी हुई दें और पतिदेव टेम्परेचर ले रहे हैं । कठिनाई से श्रीमतीनाथ ने अपना टेम्परेचर डाऊन किया । फारमल नमस्कार-चमत्कार के बाद पहला काम तो यह किया कि सास को अपने बिछौने से हटाकर पीछे की कोठरी में सास की उमर से मेल खाती हुई चारपाई-सी वस्तु पर स्थानांतरित कर दिया और फिर वशेशरनाथ पर चढ़ बैठी, 'क्यूं जी, एक तुम्हीं लाड़ले शरवन कुमार थे जो डोली में बिठाकर बुढिया को सराय रोहिल्ला तीर्थ पर लाकर पुन कमा रहे हो? बाकी दोनों सौतेले थे, मेरी जान को यही आफत लानी थी '' आदि... आदि ।

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उधर बुढ़िया बुखार में डूबी हुई थी । ये डायलाग सुनकर उसका दिल भी डूबने लगा, लेकिन तभी उसे तिनके का सहारा मिला जब बशेशरनाथ ने क्रोध दबाते हुए कूटनीतीय शैली में कहा, ''भागवान देखो अब यह उनकी विदा-वेला है, जाने कब चली जाएं, मैं तो जान-बूझकर उन्हें यहां लाया हूं ताकि लोग देखें और कहें कि अंतिम वक्त में बशेशर की घरवाली ही काम आई, सबसे छोटी बहू थी लेकिन सास का ख्याल उसी को सबसे ज्यादा था फिर मां कौन-सा तया करेंगी, पड़ी रहेंगी कोठरी में, खा-पी ज्यादा सकती नहीं हैं, राशन-कार्ड में उनका नाम चढ़वा लेंगे और राशन ब्लैक कर देंगे, क्यों ?' '

' बुढ़िया ने बेटे के कथन में से अपने मतलब का सार गह लिया और बाकी थोथा समझकर उड़ा दिया । और श्रीमती बशेशरनाथ ने बहुत अर्से बाद पति को समझदार विशेषण से विभूषित किया ।

' 'बहन-भाइयों तक खबर पहुंची कि मां बीमार है और सराय रोहिल्ला में ही है, सो अगले इतवार नाश्ते के समय बड़े और भोजन के समय तक मझले भाई सपरिवार सराय रोहिल्ला पहुंच गए । मां का शारीरिक संस्करण कितना संक्षिप्त हो गया था, इस बात की वृहत रूप में चर्चा करने लगे । बच्चों के लिए दादी मां एक अजीब वस्तु थी, वे उसे छू-छू कर देख रहे थे कि कहां-कहां से बोलती है । हापुड़ से एक शाम बहन भी पति के साथ खाली हाथ आई और दो दिन बाद थैले भरकर ले गई ।

विक्रमार्क थक गया था, उसने कंधा बदला, बैताल फिर चालू हो गया, ''दिनों के साथ-साथ मां का शरीर भी गलने लगा । नौबत यहां तक पहुंच गई कि मां का शौचालय तक पहुंचना भी मुहाल हो गया जिससे श्रीमती बशेशरनाथ का बुरा हाल हो गया । परिवार-नियोजन वालों के सौजन्य से बच्चों को धोने-पोंछने से किसी तरह छुटकारा मिला था, लेकिन अब बुढ़िया ने भूली दास्तां बहुत जोर से याद दिला दी । कुछ दिन तो दवा-दारू (दारू बशेशरनाथ पीता था) की गई पर फिर श्री व श्रीमती नाथ को बोध हुआ कि यदि दवाएं चलती रहीं और असली मिलती रहीं तो बुढ़िया न जाने कब तक चलती रहे, अत: दवाएं बंद करके दुआएं चालू कर दीं कि छुटकारा जल्दी मिले, किंतु साईयां उसे रखने के पक्ष में था । श्रीमती बशेशरनाथ रोज सुबह एक नई आशा से उठतीं किंतु बुढ़िया को पलकें झपकाते देख निराश हो जातीं । बुढ़िया खाती कम थी, किंतु बनाती अधिक थी । घर के सभी पुराने कपड़े उसके उत्पादन को ठिकाने पहुंचाने में खत्म हो चुके थे । श्रीमती बशेशरनाथ ने कई मन्नतें मानीं, टोटके किए, व्रत भी रखे लेकिन हर वार खाली गया ।

हार कर उन्होंने एक ज्योतिषी को बुलाया और उससे बुढ़िया की मुक्ति सूचना चाही । ज्योतिषी अनब्याहा था । उसने जांच-वांचकर बताया, चिंता की बात नहीं है, मां जी शीघ्र ही स्वस्थ हो जाएंगी ।'

' उसी शाम आफिस से लौटते ही बशेशरनाथ को शाही फरमान मिला कि आज रात तक बुढ़िया जेठ जी के घर पहुंच जानी चाहिए । और उसी रात बुढ़िया का ट्रांसफर उसके बड़े पुत्र के पास मोरीगेट में हो गया ।

' दो ही दिन बाद बशेशरनाथ को सूचना मिली कि मां जी की मृत्यु हो गई । सारा परिवार मोरीगेट पर एकत्र हो गया । पंडित बुलाया गया, हवन किया गया, विमान आया जिसे तीनों भाइयों ने मिलकर सजाया, उसमें फल लटकाए, गुब्बारे बांधे । बढ़िया कफन मंगाया गया, बुढ़िया के लिए कपड़े, से, ट्रंक, बर्तन जो उसे जीते जी नसीब न थे, लाए गए और करीने से सजा दिए गार । बड़े-बूढ़े और उनसे ज्यादा मोहल्ले की औरतों ने जो कहा, मंगाया गया । बैंड-बाजे बुलवाए गार और बहुत धूम-धाम से शव-यात्रा निगम बोध घाट की ओर रवाना हुई । घंटे बजाए गए, गुलाल, फूल और सिक्के लुटाए गए । आगे-आगे जल छिड़कते हुए सिर घुटाए हुए नंगे पैर धोती-बनियान पहनकर जेठ जी शोक-विह्वल दहाई मारते चल रहे थे । श्मशान घाट पर जब बुढ़िया को जलाने के लिए पहली लपट जेठ जी ने लगाई, जेठानी पछाड़ खाकर गिर पड़ी । श्री व श्रीमती बशेशरनाथ पहले से ही आंसुओं से तर थे और जेठ जी अभी भी बिलख रहे थे ।श

थोड़ी देर मौन रहने के बाद बैताल ने फिर मुंह खोला, ''अच्छा विक्रमार्क, यह किस्सा समझो कि यहीं खत्म हुआ । अब इससे संबंधित मेरे प्रश्नों के उत्तर जान-बूझकर नहीं दोगे तो तुम्हारा सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा । प्रश्न है कि जब श्रीमती व श्री बशेशरनाथ बुढ़िया की मृत्यु ही चाहते थे तो भी उनके आंसू क्यों निकल रहे थे? दूसरे जेठ जी क्यों बिलख रहे थे और जेठानी पछाड़ खाकर क्यों गिरी? ''

विक्रमार्क ने कुछ देर सिर खुजलाने के बाद उत्तर दिया, 'जेठानी इसलिए पछाड़ खाकर गिरीं कि उन्हें यह अनुमान नहीं था कि बुढ़िया के मरने पर इतना अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा, खर्चे का हिसाब लगाते ही उन्हें गश आ गया । श्री व श्रीमती नाथ इसलिए आंसू बहा रहे थे कि दो दिन बुढ़िया को और अपने पास रखते तो जो यश जेठ-जेठानी को मिल रहा था, वह उन्हें मिलता और जेठ? वे शायद इसलिए बिलख रहे थे कि फैशनपरस्त होते हुए भी मां के मरने पर उन्हें सिर मुड़ाना पड़ा ।''

यों विक्रमार्क का मौन भंग होते ही बैताल का शव छूटकर वापिस उसी पेड़ पर लटक गया ।

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(हिन्दी हास्य व्यंग्य संकलन, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से साभार)

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