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एक कवि द्वारा सृजित काव्य जिन परिस्थितियों में एक सामाजिक द्वारा आस्वाद्य होता है, उसके लिए उस सामाजिक का काव्य-सामग्री के प्रति रुचि लेना परामावश्यक है। सामाजिक की रुचि का विषय, किसी काव्य-सामग्री को पढ़कर मात्र रस या आनंद ग्रहण करना ही नहीं होता, वह उस काव्य-सामग्री में वर्णित मूल्यों का विवेचन करने, उसके सामाजिक प्रभाव देखने, उसमें कुछ नया खोजने या पाने की दृष्टि से भी काव्य का अध्ययन करता है। किसी भी काव्य-सामग्री की सार्थकता या निरर्थकता का संबंध आस्वादक या सामाजिक की वैचारिक अवधारणाओं पर निर्भर रहता है और आस्वादक की पूर्व निर्धारित वैचारिक अवधारणाएं उसके मन में विभिन्न प्रकार की रसात्मकता पैदा करती हैं।

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एक सुधी पाठक के मन में उसकी वैचारिक अवधारणाओं के अनुसार किस प्रकार और कैसी रसात्मकबोध की स्थिति बनती है, इसके लिए एक प्रामाणिक सुधी पाठक के रूप में यदि हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल की विवेचना करें और उस रस-दशा के निर्माण में उनके संस्कारों अर्थात् जीवन-मूल्यों के योगदान को परखें तो यह तथ्य खुलकर सामने आ जाते हैं कि किसी भी सामाजिक में समस्त प्रकार का भावोद्बोधन विचारों के द्वारा ही संपन्न होता है। आचार्य शुक्ल रामायण के आस्वादनोपरांत भक्तिरस से सिक्त होते हुए कहते हैं-‘‘ आदिकाव्य के भीतर लोकमंगल की शक्ति के उदय का आभास ताड़का और मारीच के दमन के प्रसंग में ही मिल जाता है। पंचवटी में वह शक्ति जोर पकड़ती दिखाई देती है। सीता-हरण होने पर उसमें आत्मगौरव और दाम्पत्य प्रेम की प्रेरणा बीच में प्रकट होकर, उस विराट मंगलोन्मुखी गति में समन्वित हो जाती है।1

आदिकाव्य रामायण के प्रति आचार्य शुक्ल की भक्ति और श्रद्धा से युक्त बनी मनोदशाओं के कारण को यदि हम खोजें तो-

1. आचार्य शुक्ल आदि काव्य के नायक राम को भगवान का वह स्वरूप मानते हैं, जो समय-समय पर अवतार लेकर दुष्टों का विनाश करता है, वे कहते हैं-‘‘यदि राम द्वारा रावण का वध तथा दमन न हो सकता तो भी राम की गतिविधि का पूरा सौंदर्य रहता, पर उनमें भगवान की पूर्ण कला का दर्शन न होता, क्योंकि भगवान की शक्ति अमोघ है।’’

2. आचार्य शुक्ल की लोकमंगल के लिए किए गए सुकार्यों के प्रति यह अवधारणा है कि-‘‘यदि करुणा किसी व्यक्ति की विशेषता पर अवलंबित होगी कि पीडि़त व्यक्ति हमारा कुटुम्बी, मित्र आदि है तो उस करुणा के द्वारा प्रवर्तित उग्र व तीक्ष्ण भावों में उतनी सुंदरता न होगी। पर बीज रूप में अंतस्संज्ञा में स्थित करुणा यदि इस ढब की होगी कि इतने पुरवासी, इतने देशवासी या इतने मनुष्य पीड़ा पा रहे हैं तो उसके द्वारा प्रवर्तित तीक्ष्ण या उग्र भावों का सौंदर्य उत्तरोत्तर अधिक होगा।’’1

मतलब यह है कि आचार्य शुक्ल को सौंदर्य का उत्तरोत्तर अनुभव ऐसे कार्यों से ही प्राप्त हो सकता है, जिनमें नायक किसी व्यक्ति विशेष पर आए संकट के प्रति करुणाद्र न होकर समूचे लोक पर आए संकट के प्रति करुणाद्र होता है और बचाने के प्रयास करता है। इससे सीधा अर्थ यह निकलता है कि आचार्य शुक्ल की वैचारिक अवधारणाओं की तुष्टि करुणा के उदात्त और मानवीय स्वरूप से होती है। चूंकि करुणा का लोकहितकारी रूप उन्हें आदि काव्य रामायण के नायक राम में दिखलाई देता है, अतः स्वाभाविक रूप से राम के प्रति श्रद्धा और भक्ति उनके मन में उद्बुद्ध हो जाती है।

लेकिन टॉलस्टॉय की कृतियों में जब उन्हें इसी प्रकार के लोककल्याणकारी और मानवीय तत्त्वों के दर्शन होते हैं तो उनके मन में संवेदनात्मक रसात्मकबोध का निर्माण नहीं होता, बल्कि उनके मन में प्रतिवेदनात्मक रस की स्थिति इस प्रकार बनती है-

‘‘टॉलस्टॉय के मनुष्य से मनुष्य में भ्रातृ प्रेम संचार को ही एकमात्र काव्य-तत्त्व कहने का बहुत कुछ कारण सांप्रदायिक था... टॉलस्टॉय के अनुयायी प्रयत्न पक्ष को लेते अवश्य हैं पर केवल पीडि़तों की सेवा सुश्रूषा की दौड़-ध्ूप... आततायियों पर प्रभाव डालने के लिए साधुता के लोकोत्तर प्रदर्शन, त्याग, कष्ट, सहिष्णुता इत्यादि में ही उसका सौंदर्य तलाश करते हैं। साधुता की इस मृदुल गति को वे आध्यात्मिक शक्ति कहते हैं। आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य या कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

मनुष्य जाति के संकट और दुख में करुणाद्र होकर उसे बचाने के प्रयत्न पक्ष में उत्तरोत्तर सौंदर्य का विकास महसूस करने वाले आचार्य शुक्ल आखिर टॉलस्टॉय की मनुष्य से मनुष्य के बीच भ्रातृ-प्रेम की प्रक्रिया [ जिसमें त्याग, कष्ट, सहिष्णुता, पीडि़तों की सेवा-सुश्रूषा आदि के रूप में करुणा के बहुआयामी, सौंदर्यातिरेक से पूर्ण दर्शन होते हैं ] को इतना बेमानी, सारहीन, सांप्रदायिक क्यों ठहरा देते हैं? उनके इस प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध के पीछे ऐसे कौन-से कारण हैं जो टॉलस्टॉय के काव्य में किसी प्रकार का करुणात्मक, रत्यात्मक, हर्षात्मक तत्त्वों के दर्शन नहीं होने देते। उत्तर के लिए हमें शुक्लजी के जीवन-मूल्यों को बारीकी से फिर समझना पड़ेगा।

1. चूंकि आचार्य शुक्ल की सारी-की-सारी वैचारिक अवधारणाएं ईश्वरवादी हैं अर्थात् उनकी रागात्मकता का विषय वह आलौकिक शक्ति है, जो समूचे लोक या मानव जाति की पीड़ाओं, संकटों के प्रति करुणाद्र होकर दुष्टों, अत्याचारियों आदि से रक्षा करता है, अतः शुक्लजी को [ राम को ईश्वरीय अंश या स्वरूप मानने के कारण ] आदि काव्य के नायक राम की समस्त व्यावहारिकता में तो कल्याणकारी, मानवतावादी तत्त्वों के दर्शन हो जाते हैं लेकिन जब यही गुण उन्हें काव्य के स्तर पर लोक के प्राणियों में दृष्टिगोचर होते हैं तो वे [ लौकिक प्राणियों का ईश्वरीय स्वरूप न बन पाने के कारण ] उन गुणों को लोक-कल्याणकारी नहीं मान पाते हैं।

2. चूंकि शुक्लजी अध्यात्म की सारी-की-सारी व्याख्याओं, मान्यताओं, आस्थाओं आदि को ईश्वर और भक्त या आत्म-परमात्मा के मध्य ही लेते हैं, फलतः टॉलस्टॉय के आध्यात्मकवाद को [ जिसमें भ्रातृ-प्रेम का संचार हो ] उनके संस्कार ग्रहण नहीं कर पाते हैं। अतः वे इस भ्रातृ-प्रेम के प्रति प्रतिवेदनात्मक रूप में आक्रोश की अभिव्यक्ति इस प्रकार करते हैं –

‘‘ आध्यात्मिक शब्द की मेरी समझ में काव्य-कला के क्षेत्र में कोई जरूरत नहीं है।’’

ईश्वर-संबंधी सत्ता के लोक-मंगलकारी स्वरूप की स्थापना करने के लिए आचार्य शुक्ल यह कैसी रहस्यमयी बात कह जाते हैं ? जबकि कथित अध्यात्म की स्थापना काव्य या कला के क्षेत्र में ही हुई है। काव्य या कला के क्षेत्र से इतर कहीं भी अध्यात्म जैसे शब्द का कोई अस्तित्व नहीं है।

खैर... हम यहां सिर्फ यह बताना चाहते हैं कि एक सुधी पाठक अपने संस्कारों से बंधकर किस प्रकार संवेदनात्मक या प्रतिवेदनात्मक-रसात्मक अवस्थाएं करता है। यह संस्कारों के रूप में मूल्यबोध का ही परिणाम है कि कृष्ण, राम, लक्ष्मण और ब्राह्मणों के क्रिया-कलापों से रागात्मक संबंध स्थापित करने वाले आचार्य शुक्ल जब-जब यह अनुभव करते हैं कि अमुक काव्य-कृति में उक्त पात्रों के प्रति लेखक ने न्याय बरतते हुए इनके स्वरूप के निखारा है तो वह श्रद्धा-भक्ति से सिक्त हो उठते हैं। लेकिन जब उन्हें यह लगता है कि अमुक काव्य में उक्त पात्रों को गिराने या नीचा दिखाने की कोशिश की गई है तो उन पात्रों एवं लेखक के प्रति उनके रसात्मकबोध की स्थिति एकदम उलट जाती है। जिसका अनुमान उनके वाचिक अनुभावों से इस प्रकार लगाया जा सकता है-

‘‘माइकेल मधुसूदन ने मेघनाद को अपने काव्य का रूप-गुण-संपन्न नायक बनाया, पर लक्ष्मण को वे कुरूप न कर सके। उन्होंने जो उलटफेर किया, वह कला या काव्यानुभूति की किसी भी प्रकार की प्रेरणा नहीं। बल्कि एक पुरानी धारणा को तोड़ने की बहादुरी दिखाने के लिए। इसी प्रकार बंग भाषा के एक दूसरे कवि नवीनचंद्र के अपने ‘कुरुक्षेत्र’ नामक ग्रंथ में कृष्ण का आदर्श ही बदल दिया। उसमें वे ब्राह्मणों के अत्याचार से पीडि़त जनता के लिए उठ खड़े हुए क्षत्रिय महात्मा के रूप में हैं। अपने समय की किसी खास हवा की झोंक में प्राचीन आर्ष काव्यों में पूर्णतया निर्दिष्ट स्वरूप वाले आदर्श पात्रों को एकदम कोई नया, मनमाना रूप देना भारती के पवित्र मंदिर में व्यर्थ की गड़बड़ मचाना है।’’

माइकेल मधुसूदन एवं बंगकवि नवीनचंद के काव्य का आस्वादन आचार्य शुक्ल को मूल्यों, संस्कारों, वैचारिक निर्णयों के अंतर्विरोधों के कारण क्यों प्रतिवेदनात्मक रसात्मक-अवस्था की ओर ले जाता है, जबकि वह यह भी अनुभव करते हैं कि माइकेल मधुसूदन ने लक्ष्मण को कुरुप नहीं किया है। नवीनचंद ने कृष्ण के माध्यम से पीडि़त जनता का उद्धार करवाया है। कारण स्पष्ट है कि वे लक्ष्मण के आगे मेघनाद के चरित्र को रूप-गुण संपन्न देखना ही नहीं चाहते हैं और नवीनचंद्र की कृति के ब्राह्मणों को वे दयालु, श्रद्धालु, लोकमंगलकारी रूप में ही मानते हैं , इसलिए कृष्ण का क्षत्रिय होकर भी महात्मा रूप में अवतरित होना उन्हें गवारा नहीं होता। परिणामतः वे अपनी बौखलाहट का निशाना सारी-की-सारी काव्य-सामग्री को बना डालते हैं।

बहरहाल इस रसात्मक विवेचन से यह निष्कर्ष तो निकल ही आता है कि किसी पाठक, श्रोता या दर्शक में रसनिष्पत्ति उसके संस्कारों से बंधकर होती है। वह जैसा काव्य के प्रति निर्णय लेता हो, उसकी रसात्मक अवस्था उसी के अनुरुप बन जाती है।

सन्दर्भ-

1.काव्य में लोकमंगल की साधनावस्था, आचार्य शुक्ल, भा.का.सि., पृष्ठ-26

2. भा. का. सि., पृष्ठ-24

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रसमर्मज्ञ डॉ. राकेश गुप्त रसास्वादक के संस्कारों के संबंध में चर्चा करते हुए लिखते हैं कि ‘‘एक ओर कवि की परिवेश होता है, दूसरी ओर सहृदय का। कवि ने जिन परिस्थितियों, परंपराओं और संस्कारों से बंधकर काव्य की रचना की है, सहृदय जब तक सामंजस्य नहीं कर लेता, तब तक वह रचना उसके लिए आस्वाद्य नहीं हो सकती। वर्ग-संघर्ष को साहित्य का प्राण मानने वाले मार्क्सवादी पाठक बिहारी के काव्य का आस्वादन नहीं कर सकता।’’1

डॉ. राकेश गुप्त के उक्त कथन से एक आस्वादक के बारे में रसात्मकबोध संबंधी जो तथ्य उभरते हैं, उनके अनुसार एक कवि अपनी परिस्थितियों, परंपराओं और संस्कारों से बंधकर जो काव्य-रचना करता है, वह काव्य-रचना आस्वादक के लिए तभी आस्वाद्य होगी, जबकि कवि के संस्कारों द्वारा सृजित काव्य-रचना के संस्कारों, जीवन-मूल्यों, मान्यताओं से आस्वादक के संस्कार, जीवन-मूल्य, आस्थाएं, परम्पराएं आदि मेल खायें। काव्य के मूल्य जब आस्वादक के मूल्यों से मेल खा जाते हैं, तभी उसमें रुचि और रमणीयता जैसे तत्वों का समावेश होता है। सारतः कवि जिन मूल्यों या संस्कारों के माध्यम से काव्य में रसात्मकता की स्थिति लाता है, एक आस्वादक भी उन्हीं मूल्यों से बंधकर रसात्मकबोध ग्रहण करता है।

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रस आचार्य भरतमुनि भी इस तथ्य पर पूरी तरह सचेत थे कि ‘‘भिन्न-भिन्न रुचियों के लोग भिन्न-भिन्न प्रकार के दृश्यों से तुष्ट होते हैं। तरुणजन काम से, विरागी मोक्ष से, शूर वीभत्स से और वीर रौद्र से तुष्ट होते हैं।2

इसका अर्थ यह हुआ कि एक सामाजिकों या कथित सहृदयों की जिस प्रकार की मनोवृत्तियां बन जाती है, वह अपनी मानसिकतानुसार विविध विषयों से तुष्ट होते हैं। कारण स्पष्ट है- तरुणजन काम से इसलिए तुष्ट होते हैं क्योंकि उनके मन में नारी भोग का विचार रहता है। ठीक इसी तरह समाज को माया, मोहजाल मानने वाला विरागी, समाज से विरक्त होने में इसलिए तुष्ट होता है क्योंकि वह यह मानकर चलता है कि उसे ईश्वर के सामीप्य से ही मोक्ष मिलेगा। शूर या वीर वीभत्स और रौद्रता से भरे कार्य करके इसलिए तुष्ट होते हैं ताकि समाज उन्हें श्रद्धा के साथ देखे या उनके भय खाए या वे ऐसे कृत्य कर पराजितों पर शासन कर सकें। शूर या वीरों की यही मानसिकता, उन्हें शौर्य और वीरता से भरे काव्य के प्रति रससिक्त करने में सहायक होती है।

आचार्यों की आस्वादन के संबंध में रसात्मक व्याख्या की एक कमजोर और दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि जब रसों के नाम गिनाने की बात आती है तो उसकी व्याख्या में वे भी रस समेट लिए जाते हैं जिनका रमणीयता या रागात्मकता से सीधा-सीधा कोई संबंध नहीं होता। लेकिन जब आश्रय में रसनिष्पत्ति संबंधी सिद्धांत गढ़ा जाता है तो उसके अंतर्गत काव्य का सिर्फ रमणीय पक्ष ही लिया जाता है।

जब डॉ. गुप्त यह तथ्य स्पष्ट रूप से स्वीकारते हैं कि काव्य के प्रति पाठक के प्रतिक्रिया ही पाठक का रसात्मकबोध होती है और इस रसात्मकबोध की स्थिति में पाठक संवेदनात्मक या प्रतिवेदनात्मक दोनों में से किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया कर सकता है।’’1 तब पहला प्रश्न तो विचारने योग्य यह हो जाता है कि क्या प्रतिक्रिया को रस माना जाए या रस के अंतर्गत प्रतिक्रिया को अनुभाव की श्रेणी में रखा जाए। हमारे विचार से प्रतिक्रिया अनुभाव ही ठहरती है, प्रतिक्रिया चूंकि भावोद्बोधन के कारण होती है अतः डॉ. गुप्त का प्रतिक्रिया सिद्धांत चाहे अधूरा ही सही, लेकिन रस के क्षेत्र में प्रतिवेदनात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से एक नया आयाम यह जरूर खोलता है कि किसी भी काव्य-सामग्री के पाठन के समय मात्र पाठक संवेदनात्मक रसात्मकता से ही सिक्त नहीं होता, उसका रसात्मकबोध प्रतिवेदनात्मक भी हो सकता है।

डॉ. राकेश गुप्त के प्रतिक्रिया सिद्धांत को सार्थक और संशोधित स्वरूप में ग्रहण करने के उपरांत अब दूसरा विचारणीय प्रश्न यह है कि जब पाठक प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध से भी अभिभूत होता है तो क्या मार्क्सवादी पाठक बिहारी के काव्य का आस्वादन नहीं कर सकता? एक प्रबुद्ध आस्वादक बिहारी से लेकर घनानंद, विद्यापति, केशव, सूर, तुलसी, कबीर, निराला, धूमिल, मुक्तिबोध आदि के मार्क्सवादी या गैर मार्क्सवादी हर प्रकार के काव्य का आस्वादन करता है। लेकिन यदि वह मार्क्सवाद या वर्ग-संघर्ष में विश्वास रखने वाला है तो वर्ग-संघर्ष को क्षीण करने वाला साहित्य उसे विरोध, विद्रोह, जुगुप्सा, क्रोध आदि से सिक्त करेगा। ठीक इसी प्रकार रीतिकालीन, भक्तिकालीन काव्य में रति रखने वाले पाठक को मार्क्सवादी काव्य में कोई रमणीय तत्त्व अनुभव नहीं होगा। वह भी काव्य में वर्णित मार्क्सवादी मूल्यों के प्रति विरोधादि से सिक्त हो उठेगा। इसलिए रस के संबंध में महत्वपूर्ण आस्वादन नहीं, आस्वादन की प्रक्रिया के समय उत्पन्न आश्रय की वह भाव अवस्था है जो उसकी संवेदनात्मक, प्रतिवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं में उजागर होती है। फिर भी एक पाठक, श्रोता या दर्शक की प्रतिवेदनात्मक व्याख्या के प्रति इतना सूक्ष्म और सार्थक चिंतन करने वाले डॉ. राकेश गुप्त एक मार्क्सवादी पाठक की बिहारी के काव्य के प्रति आस्वादन की समस्या को इतने सतही संदर्भों में पता नहीं क्यों ले बैठे? हमें ऐसा लगता कि काव्य के आस्वादन के प्रति उनकी दृष्टि कोमल और परंपरावादी रही है, जबकि आस्वादन के विवेचन के संबंध में उनकी दृष्टि वैज्ञानिक है। डॉ. राकेश गुप्त के प्रतिक्रिया सिद्धांत को पुनः उठाते हुए कि काव्य का अध्ययन करते हुए पाठक के मन में मनौवैज्ञानिक प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ अनुभूतियां या भावनाएं जागती हैं... जागी हुई भावनाएं कविता में वर्णित भावना से सदा मेल नहीं खातीं, कभी उनका रूप संवेदनात्मक होता है और कभी प्रतिवेदनात्मक’ के माध्यम से हम यह कहना चाहेंगे कि रस की स्थिति आश्रयों की रुचियों के अनुसार जब अपने संवेदनात्मक पक्ष में उभरती है तो आश्रय, काव्य में वर्णित मूल्यों, पात्रों, आदि से तादात्म्य स्थापित करते हैं, उस काव्य के प्रति अपनी रुचि में प्रगाढ़ता लाते हैं, और इस स्थिति में सारा-का-सारा काव्य उन्हें रमणीय अनुभव होता है। लेकिन जब काव्य के आस्वादकों को यह अनुभव होता है कि प्रस्तुत सामग्री उनके संस्कारों अर्थात् जीवन-मूल्यों, आस्थाओं, परंपराओं-धारणाओं आदि के विपरीत जा रही है तो उनके मन में उस काव्य-सामग्री के प्रति विरोध की ऊर्जा उत्पन्न हो जाती है, जिसका रसात्मकबोध रति के विरोधी भावों जैसे क्रोध, आक्रोश, असंतोष, घृणा आदि के अंतर्गत देखा जा सकता है।

सन्दर्भ –

1. डॉ. राकेश गुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-26

2. वही , पृष्ठ-28

3. वही , पृष्ठ-65 व् 193

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काव्य के रसतत्त्वों एवं उनके रसात्मकबोध को तय करने वाली समस्त प्रक्रिया का निर्माण कवि के संस्कारों द्वारा ही संपन्न होता है। संस्कारों के विभिन्न रूपों [ धार्मिक, सामाजिक, मानवतावादी, व्यक्तिवादी संस्कार ] में से एक कवि जिस प्रकार के वैचारिक मूल्यों द्वारा संस्कारित होता है, वह उन्हीं मूल्यों के अनुसार अपने परिवेश, अपने समाज के घटनाक्रमों, पात्रों आदि को काव्याभिव्यक्ति का विषय बनाता है। नारी के मादक स्वरूप पर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाले रीतिकालीन कवियों को नारी के नुकीले नयनों, रूप की चिलकचौंध, आलिंगन के समय कंपन, स्वेद आदि में जो आनंद की प्राप्ति होती है, यह आनंदातिरेक इन कवियों द्वारा नारी के प्रति अपनाई गई ऐसी मूल्यवत्त्ता से प्राप्त होता है, जिसकी वैचारिक अवधारणाएँ, नारी को भोग-विलास की वस्तु मानने में अंतर्निहित हैं। इसलिए यदि बिहारी नायिका के स्तन-मन-नैन नितंब में चंचलता और बढ़ोत्तरी देखते हैं तो यह अप्रत्याशित नहीं है। कारण स्पष्ट है कि बिहारी के संस्कार शृंगार के नाम पर नारी की नग्नता पर मोहित हैं और रति के नाम पर पलकों पर पीक लगाते हैं।

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छायावादी कवि यदि काव्याभिव्यक्ति के माध्यम से नारी के कपोल चूमते-चूमते प्रसूनों, पल्लवों, दूब और जल को चूमने लग जाते हैं, तो यह उनके ऐसे व्यक्तिवादी संस्कारों के कारण होता है।

बिहारी-सतसई के अधिकांश स्थलों में बिहारी जिस प्रकार के रसात्मकबोध से सिक्त होकर, जिस प्रकार की रचनात्मक प्रक्रिया से गुजरते हैं, वह सारी-की-सारी प्रक्रिया यौनाकर्षण की प्रक्रिया है | यह रसदशा जिन मूल्यों या संस्कारों द्वारा उद्बुद्ध होती है, वह मूल्य नारी-भोग के ऐसे जीते-जागते नमूने हैं, जो वर्तमान में कवि द्वारा इस प्रकार अभिव्यक्ति पाते हैं-

फैल रही है परिधि स्तनों की

हसरतें अब जवान हैं

आओ दोस्तों और साथियो

आओ मेरे झंडे के नीचे।

उँगलियों से कह दो,

आज रियायत करें तनिक भी

किंतु पेश आएँ, मुनासिब बेरहमी से।

[ कु. शान्ता सिन्हा ]

लेकिन जिन कवियों के संस्कार नारी को भोग-विलास की मूल्यवत्ता से हटकर, नारी को स्वाभिमानी, संघर्षशील, पारिवारिक एवं सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करने वाली नायिका के जीवन-मूल्यों से जोड़कर जाँचने, परखने या भोगने के रहे हैं, ऐसे कवि यदि नारी-आकर्षण से किसी प्रकार की रसदशा ग्रहण करते हैं तो वह रसदशा कुछ इस प्रकार की होती है-

हम घर के दरवाजे बनकर अब बेहद खुश हैं

प्यार मिला देता है हमको साँकल के स्वर में।’

उक्त उदाहरणों के माध्यम से जो बात स्पष्ट करनी है, वह सिर्फ इतनी-सी है कि एक कवि अपने परिवेश के प्रति जिस प्रकार की संस्कारित मूल्य-दृष्टि अपनाता है, वह मूल्य दृष्टि ही काव्य में रसात्मकता का विषय बनती है। आचार्य तुलसी जहाँ ब्राह्मणों, संतों, साधुओं आदि के हवन, पूजन गंगा-स्नान को गौरवशाली सत्योन्मुखी परंपरा का प्रतीक मानकार श्रद्धा और भक्ति जैसे रसात्मकबोध को जन्म देते हैं, वहीं कबीर को यह सारी-की-सारी परंपराएँ ढोंग, आडंबर, शोषण से युक्त विकृत रुढि़याँ नजर आती हैं। काव्य के स्तर पर रसात्मकता का यह अंतर निस्संदेह कबीर और तुलसी के मूल्यबोधें का अंतर है।

मूल्यबोध् और रस-संबंधी उक्त व्याख्या के अनुसार जो तथ्य उभरकर आते हैं, वह निम्न हैं-

1. किसी भी कवि द्वारा काव्य के सृजन की प्रक्रिया उसकी परिवेश के प्रति अपनायी गई संस्कारित मूल्य-दृष्टि के द्वारा ही संपन्न होती है।

2. कवि की मान्यताएँ, धारणाएँ, आस्थाएँ आदि ही उसके संस्कारों का स्वरूप हुआ करते हैं, जो उसके जीवन-मूल्य होते हैं।

3. किसी कवि में जिस प्रकार के संस्कार होते हैं, उस कवि में उन्हीं संस्कारों के अनुसार भाव, संचारीभाव, स्थायीभाव उद्बुद्ध हुआ करते हैं, जो अंततः उसकी सृजनात्मकता के माध्यम से पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों के सामने आते हैं।

4. कवि के मन में संस्कार रूप में स्थायीभाव नहीं, मूल्य या विचार रहते हैं। कवि इन्हीं मूल्यों या विचारों के अनुसार विभिन्न प्रकार की भाव-अवस्थाएँ ग्रहण करता है। बात को थोड़ा स्पष्ट करने के लिए एक राष्ट्रीय मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाले कवि की काव्याभिव्यक्ति इस प्रकार की होगी-

न चाहूँ मान दुनिया में, न चाहूँ स्वर्ग को जाना

मुझे वर दे यही माता रहूँ भारत पै दीवाना।

भवन में रोशनी मेरे रहे हिंदी चरागों की

स्वदेशी ही रहे बाजा बजाना, राग का गाना।

उक्त पंक्तियों में राष्ट्र के प्रति भक्ति का भाव कवि की राष्ट्र संबंधी उन वैचारिक अवधारणाओं द्वारा संपन्न हुआ है, जो अंग्रेजों की कुनीतियों, अत्याचारों, दमन, शोषण आदि का अनुभव करने पर राष्ट्र को आजाद कराने के लिए जन्मीं। राष्ट्र को आजाद कराने की यही वैचारिक अवधारणाएँ अंग्रेजी साम्राज्य से टक्कर लेने के लिए वतन पर जान कुर्बान कर देने की प्रेरणा जब कवि को देती हैं तो उसकी रचनात्मक अभिव्यक्ति पाठकों के समक्ष इस प्रकार आती है-

सरपफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है।

राष्ट्रीय-मूल्यों को सर्वोपरि मानने वाले कवि अमर क्रांतिकारी रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ जिस समय उक्त प्रकार के काव्यात्मक मूल्य राष्ट्र को प्रदान कर रहे थे, वह अंग्रेजों की भारतीयों पर लगातार किए जाने वाले अत्याचारों का समय था। उस समय जिन कवियों को राष्ट्र के इस सिसकते परिवेश से कुछ लेना-देना नहीं था, उनकी चेतना में नदी, झरनों, पहाड़ों, फूलों के प्रतीक और उपमान तैर रहे थे। ऐसे सारे-के-सारे कवि पृथ्वी के रूप में नारी के ऊपर झुके पुरुष जैसे लग रहे मेघों से भाव, संचारीभाव और स्थायीभाव ग्रहण कर रहे थे-

घिर आया नभ

उमड़ आये मेघ काले

भूमि के कंपित उरोजों पर झुका-सा

विशद् श्वांसाहत चिरातुर

छा गया इन्द्र का नील वक्ष।

-सावन मेघ, अज्ञेय

उपरोक्त उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि ‘‘किसी भी साहित्यिक कृति का संबंध कृतिकार के व्यक्तित्व से है। कृतिकार का रागात्मक जीवन और उसके आधार पर निर्मित जीवन-दर्शन कृति में अनिवार्यतः प्रतिफलित होता है।’’

सन्दर्भ-

1. आस्था के चरण, डॉ. नगेन्द्र, पृष्ठ-80

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समूची मानवजाति की रागात्मक चेतना का विकास विशिष्ट स्थान, समाज, देश और काल की उन परिस्थितियों के बीच हुआ है, जिन्होंने उसकी चेतना को विभिन्न तरीकों से झकझोरा या रिझाया है। मानव का इस परिस्थितियों के प्रति समायोजित होने की स्थिति में रत्यात्मकता के रूप में रमणीयता तथा असमायोजन की स्थिति में पलायन या परिस्थितियों को बदल डालने की प्रक्रिया आदिकाल से चल रही है और जब तक मानव-अस्तित्व है, यह प्रक्रिया चलती रहेगी।

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परिस्थितियों के अनुसार मानव के अस्तित्व की सुरक्षा का चक्र जैसी-जैसी वैचारिक प्रक्रिया से होकर गुजरता है, उसी वैचारिक प्रक्रिया के अनुसार उसमें विभिन्न प्रकार की रागात्मकवृत्तियों का निर्माण तथा विकास होता चलता है। मानव अपनी सुरक्षा के लिए, परिस्थिति, परिवेश या काल में जैसी वैचारिक-प्रक्रिया अपनाता है, वह प्रक्रिया ही उसके रस या आनंद का विषय बनती है।

मानव की यह वैचारिक-प्रक्रिया किस प्रकार रस और आनंद की अवस्था तक पहुँचती है, इसको समझने के लिए हमें मानव के गतिशील एवं सुप्त संस्कारों को समझना आवश्यक है। सामान्यतः संस्कार शब्द का अर्थ विवाह आदि के कृत्य, शुद्धि-सुधार, पवित्रता के कर्म आदि से लिया जाता है। यदि हम शब्द के अर्थ की गहराई में जाएँ तो संस्कार मानव की उस आत्मिक व्यवस्था के द्योतक हैं, जिनके मूल में मानव में नैतिक एवं सामाजिक मूल्यों का समावेश होता है। संस्कार हमें यह सिखलाते हैं कि मानव, अपने समाज के प्रति कैसा व्यवहार करे। लेकिन संस्कारों का उद्भव एवं विकास चूँकि विभिन्न देशों, जातियों, संप्रदायों एवं परिवेशों के बीच हुआ है, इसलिए संस्कारों संबंधी नैतिक मूल्यवत्ता भी इन्हीं दायरों में सिमटती हुई विकसित हुई है? जिसका परिणाम यह हुआ है कि एक समाज की नैतिकता, दूसरे समाज की नैतिकता के, एक संप्रदाय की सांप्रदायिकता, दूसरे संपदाय की सांप्रदायिकता के, एक समाज की धार्मिकता, दूसरे समाज की धार्मिकता के, एक राष्ट्र की राष्ट्रीयता, दूसरे राष्ट्र की राष्ट्रीयता के, एक वर्ग की आर्थिकता, दूसरे वर्ग की आर्थिकता के युग-युग से आड़े आती रही है। और जब तक लोक या समाज में इस प्रकार के दायरे कायम रहेंगे, यह समस्या, समस्या ही बनी रहेगी। इसलिए संस्कारों के दायरों पर कतिपय प्रकाश डालना यहाँ अभीष्ट होगा।

1. धार्मिक संस्कार-

धर्म का अर्थ मनुष्य के उस व्यवहार से है, जो नैतिक, सामाजिक एवं मानवीय मूल्यों से युक्त हो, लेकिन धर्म शब्द संप्रदायों की सीमाओं में कैद होकर सिर्फ अलौकिक शक्तियों संबंधी क्रियाकलापों तक रूढ़ है। इसलिए विभिन्न संप्रदाय, विभिन्न दैवीय शक्तियों के प्रति किस प्रकार की पूजा-पद्धति तथा उनके किस प्रकार के स्वरूपों को अपनाकर चलते हैं, यह स्वीकारोक्तियाँ ही उनके धार्मिक स्वरूपों को स्पष्ट करने में सहायक हो सकती हैं। अतः विस्तार में न जाकर यहाँ यह बता देना आवश्यक है कि जैसे हिंदू-संप्रदाय के धार्मिक संस्कारों का विकास सगुण, निर्गुण, शैव, वैष्णव, सनातन, आर्य जैसे कई संप्रदायों, उपसंप्रदायों से होकर गुजरा है, ठीक उसी प्रकार इस्लाम, ईसाई, बौद्ध संप्रदायों से लेकर विश्व के अन्य संप्रदायों का विकास भी विभिन्न उपसंप्रदायों आदि में विकसित हुआ है। इन संप्रदायों के धार्मिक-संस्कार चूँकि दूसरे संप्रदायों के धार्मिक संस्कारों से विपरीत एवं भिन्न हैं, इसलिए इन संप्रदायों की रूढ़ धार्मिकता, अन्य संप्रदायों की रूढ़ धार्मिकता को ग्रहण करने, या स्वीकारने में अवरोधक का कार्य करती है, जिसका परिणाम आज विभिन्न संप्रदायों का हिंसक-रक्तपिपासु रूप हम सबके लिए चिंता का विषय बना हुआ है। बहरहाल एक सांप्रदायिक मनुष्य को उसकी संप्रदाय-संबंधी काव्य-सामग्री जहाँ रति और भक्ति जैसे रमणीय तथ्यों की ओर ले जाएगी, वहीं उसे दूसरे संप्रदाय की काव्य-सामग्री प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त करेगी। बाबरी मस्जिद प्रकार इसका ज्वलंत प्रमाण है।

2. सामाजिक संस्कार-

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज की रीति-रिवाज, मर्यादा, परंपरा आदि के अनुसार ऐसे सामाजिक संस्कार ग्रहण करता है जो उसे उस समाज के साथ तालमेल बिठाने में सहायक हुआ करते हैं। माँ, बहिन, बेटी, पिता, पुत्र से लेकर पति-पत्नी, चाचा-ताऊ , मौसा-मौसी तक के सारे-के-सारे मानवीय रिश्ते मनुष्य के उन वैचारिक मूल्यों की देन हैं, जिन्हें वह जन्म के बाद संस्कार के रूप में ग्रहण करता है और इन रिश्तों की सार्थकता के अनुसार आजीवन अपने व्यवहार को मर्यादित किए रहता है। मनुष्य के व्यवहार के इस संस्कार रूप का परिणाम यह है कि मनुष्य अपनी प्रेमिका या पत्नी के साथ तो संभोग जैसी प्रक्रिया से आसानी से गुजर जाता है, परंतु बहिन, बेटी या माँ के साथ उक्त प्रकार का विचार भी उसे जुगुप्सा से सराबोर कर डालता है। पूरा-का-पूरा हिंदी साहित्य इस बात का प्रमाण है कि आदिकाल में शकुन्तला-दुष्यन्त, भक्तिकाल में राम-सीता, रीतिकाल में राधा-कृष्ण या आधुनिक काव्य के नारी-पुरुष पात्र, प्रेमी-प्रेमिका के स्वरूप में ही रति या शृंगार संबंधी क्रियाकलापों से गुजरे हैं, उनमें चुंबन, मिलन, विहँसन जैसे अनुभाव अन्य रिश्तों के साथ जागृत नहीं हुए हैं, यदि ऐसी अवस्था आई भी है तो उसका स्वरूप संभोग के स्वरूप से विपरीत है या स्वीकार नहीं किया गया है।

3. आर्थिक संस्कार-

हमारा संपूर्ण भारतीय समाज या राष्ट्र पूंजीवादी व्यवस्था के कारण आर्थिक संबंधों पर आधारित है। आज ऐसा लगता है जैसे सामाजिक संबंधों की सार्थकता मात्र आर्थिक संबंधों की सार्थकता बनकर रह गई है, इसलिए पूरा का पूरा भारतीय समाज ऐसे आर्थिक चरित्र को अपनाता जा रहा है जिसके बीच मानवीय मूल्यवत्ता मृतप्रायः हो गयी है। धन एकत्रित करने की आपाधापी ने मनुष्य को ऐसे आर्थिक संस्कारों से ग्रस्त कर डाला है जो मनुष्य को शोषण, लूट-खसोट, डकैती, राहजनी और फरेब के रास्तों पर बढ़ने को प्रेरित करते हैं, जिसका परिणाम यह है कि चाहे ‘माया महा ठगिनि हम जानी’ जैसे उपदेश देनेवाले धर्म के ठेकेदार हों, चाहे समाजवाद या साम्यवाद का ढिंढोरा पीटने वाले नेता हों, सबके सब आदर्शवादी नारों, उपदेशों के बल पर अपने आर्थिकपक्ष को मजबूत करने में लगे हुए हैं। आर्थिक संस्कारों का वर्तमान स्वरूप इतना जटिल, क्लिष्ट और घिनौना हो चुका है कि उस पर जितना प्रकाश डाला जाए उतना ही कम है। जबकि आर्थिक संस्कारों का आदिकाल स्वरूप सिर्फ जीवनसुरक्षा या संततिसुरक्षा के सत्प्रयासों तक ही सीमित था, जिसका अपवाद रूप राजा या महाराजा या उनसे जुड़े कुछ खास व्यक्तियों, महाजनों आदि में जरूर मिलता है। लेकिन आज स्थिति यह है कि आर्थिक संस्कारों का राजा-महाराजाओं से शुरू हुआ संक्रामक रोग जनसामान्य में भी घुसपैंठ कर चुका है। आर्थिक संस्कारों के वर्तमान स्वरूप की देन यह है कि धन के बल पर व्यवसायी से लेकर राजनेताओं तक सारी साम्राज्यवादी ताकतें आम आदमी का चरित्र, उसकी इज्जत खरीदने में कमजोर वर्ग पर अनाचार, अत्याचार, अन्याय करने में सीना ठोंककर शान के साथ लगी हुई है। दहेज जैसी कुप्रथा भी इन्हीं आर्थिक संस्कारों की देन है। कुल मिलाकर आर्थिक संस्कारों का यह अजगरी चेहरा आज आदमी की सुख-शांति से लेकर उसकी सत्योन्मुखी संवेदनशीलता को निगलता जा रहा है। आर्थिक संस्कारों के कारण वर्तमान साहित्य में उभरा वर्ग-संघर्ष और दलित वर्ग की पीड़ा का करुणामय स्वरूप, कवि के माध्यम से आर्थिक संस्कारों की घिनौनी वृत्तियों से मुक्त कराने के लिए जिस प्रकार की चिंतन शैली और अभिव्यक्ति को अपना रहा है, उसकी रसात्मकता, आक्रोश, विरोध और विद्रोह आदि के रूप में देखी जा सकती है।

4. राजनीतिक संस्कार-

गाँव के मुखियाओं, कबीले के सरदारों, राजा-महाराजाओं की आदिकालिक व्यवस्था से लेकर वर्तमान व्यवस्था चाहे जो रही हो, उसके मूल में जिस प्रकार के राजनीतिक संस्कारों की व्यवस्था अंतर्निहित है, उसकी प्रमुख कार्यप्रणाली या समस्त वैचारिक प्रक्रिया, जनता पर शासन करने की ही रही है। उक्त कार्य एक जाति, एक व्यक्ति या एक समाज ने, दूसरे व्यक्ति, दूसरी जाति, दूसरे समाज को शासित करने के लिए अपनी बौद्धिक, आर्थिक और शारीरिक क्षमताओं के बल पर किया है। यह राजनीतिक संस्कारों का ही परिणाम है कि अंग्रेजों ने पूरे विश्व को शासित करने का प्रयास किया। हिटलर ने पूरे विश्व की समस्त जातियों से, अपनी जाति को श्रेष्ठ और शासक माना। गलत राजनीतिक संस्कारों से ग्रस्त शासक, न्याय और सुरक्षा के नाम पर जनसामान्य का शोषण, उस पर अत्याचार युग-युग से करते आए हैं। शासकों के घिनौने संस्कारों का स्वरूप वर्तमान में भी ज्यों-का-त्यों विद्यमान है। वर्तमान कविता में गलत राजनीति के प्रति जिस प्रकार विरोध, विद्रोह, प्रहार और चुनौती के स्वर मुखरित हो रहे हैं, वह मानव की एक ऐसी आंतरिक छटपटाहट के द्योतक हैं जो मानव को हर हालत में इस शोषक राजनीतिक व्यवस्था से मुक्त देखना चाहते हैं।

5. राष्ट्रीय संस्कार-

हर राष्ट्र की सुरक्षा, एकता, अखंडता, ऐसे राष्ट्रीय चिंतकों की सूझ-बूझ और वैचारिक प्रक्रिया पर निर्भर हुआ करती है, जो राष्ट्र के अस्तित्व को जाति, धर्म , व्यक्ति, संप्रदाय आदि से ऊपर उठाकर मूल्यांकित करते हैं। एक राष्ट्रीय संस्कारों से ओत-प्रोत व्यक्ति या नागरिक की विशेषता यह होती है वह उठते-बैठते, जीते-मरते सिर्फ राष्ट्र के अस्तित्व की सुरक्षा के बारे में सोचता है। अमरक्रांतिकारी भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रामप्रसाद बिस्मिल, अशपफाक, सूर्यसेन तिलक, सुभाष आदि राष्ट्रीय संस्कारों से युक्त ऐसे महानायकों के ज्वलंत प्रमाण हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय अस्तित्व के लिए असह्य कष्ट झेले, हँसकर फाँसी पर चढ़े या सीने पर गोलियाँ खायीं। राष्ट्रीय संस्कारों की ओजपूर्ण अभिव्यक्ति जिस प्रकार भगतसिंह, बिस्मिल, अशपफाक आदि के साहित्य में हुई है, ऐसे प्रमाण अत्यंत दुर्लभ हैं।

6. व्यक्तिवादी संस्कार-

जब किसी व्यक्ति की वैचारिक अवधारणाएँ समाज, राष्ट्र या मानव के स्थान पर स्वअस्तित्व की पुष्टि या पोषण करने लगती हैं तो उस व्यक्ति में ऐसे संस्कारों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, जो नितांत स्वार्थपरक, वैयक्तिक होती है। एक व्यक्तिवादी संस्कारों से ग्रस्त व्यक्ति की विशेषता यह होती है कि वह छल-प्रपंच, झूठ, अनैतिकता, व्यभिचार, थोथे दंभ का सहारा लेकर सामाजिक, राष्ट्रीय और मानवीय मूल्यों की हत्या करने में हर समय लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति चारित्रिक पतन के ऐसे बदबूदार तहखानों में जीता है, जिसमें घिनौनी मानसिकता के कीड़े हर समय बुदबुदाते रहते हैं।

वर्तमान समय में भारतीय फिल्म निर्माता, अपराध-कथा लेखक या कविसम्मेलनों के चुटकुलेबाज अपनी अर्थपूर्ति के लिए रसात्मकता के नाम पर, जिस प्रकार का गैर-मानवीय जहर दे रहे हैं, ठीक उसी प्रकार का जहर आदिकाल से लेकर अब तक हमारे धर्म के ठेकेदारों, तथाकथित रसवादियों ने दिया। यह व्यक्तिवादी संस्कारों का ही परिणाम है कि-

नर्तकी के पाँव घायल हो रहे

देखता एय्याश कब यह नृत्य में।

व्यक्तिवादी संस्कारों की शिकार सारी-की-सारी साम्राज्यवादी ताकतें, चाहे वे धर्मगुरु , पुजारी-पंडे, महाजन, उद्योगपति, दुकानदार, पक्ष-विपक्ष के नेता, सरकारी मशीनरी के नुमाइंदे हों, अधिकांशतः अनैतिकता का सहारा लेकर पूरे राष्ट्र को तहस-नहस करने पर तुले हैं। यह व्यक्तिगत संस्कारों का ही परिणाम है कि एक बलात्कारी को बलात्कार में, डकैत को डकैती डालने, तस्कर को तस्करी जैसे अमानवीय कृत्यों में सुखानुभूति होती है। कुल मिलाकर व्यक्तिवादी संस्कारों से ग्रस्त व्यक्ति का सुख, दूसरों को हर स्तर पर दुःखानुभूति से ही सिक्त करता है। इसी तथ्य की मार्मिक अभिव्यक्ति महाकवि रहीम अपने एक दोहे के माध्यम से इस प्रकार करते हैं-

कह रहीम कैसे निभै बेर-केर कौ संग

वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।

7. मानवीय संस्कार-

मानवीय संस्कार, मानव के ऐसे मूल्य हैं, जिनकी अर्थवत्ता समूचे विश्व को बिना किसी भेदभाव के एक रागात्मकता के साथ जोड़ती या मूल्यांकित करती है। मानवीय संस्कारों के अंतर्गत समूचे लोक की मंगलकामना एक ऐसी वैचारिक प्रक्रिया ग्रहण करती है, जिसमें व्यक्तिगत विद्वेष, अत्याचार, बर्बरता, शोषण, उत्पीड़न जैसी अमानवीयता का किंचित स्थान नहीं होता। मानवीय मूल्यों से संस्कारित व्यक्ति का सुख-दुःख समूचे लोक के सुख-दुःख से जुड़ जाता है। लोक में ऐसे अनेक महान् पुरुष हमें मिल जायेंगे, जिन्होंने अपना जीवन-राग, मानव-राग बनाकर जीया। कार्ल मार्क्स की समूची संवेदनशीलता विश्व के उन शोषित और पीडि़त जनों के पक्ष में उभरी, जो शोषक वर्ग के हमेशा से शिकार होते आए हैं।

आधुनिक भारतीय साहित्य का रुझान जिस प्रकार मानवीय मूल्यों की ओर बढ़ा है, वह रुझान प्रमुख रूप से कबीर से प्रारंभ हुआ था और भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद, निराला, धूमिल, गुलेरी, रेणु से लेकर आज जाने कितने युवा और प्रतिष्ठित साहित्यकारों में हैं, जो भारतीय समाज को मानवीय मूल्यों से संस्कारित करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

इस लेख में संस्कारों के विभिन्न रूपों पर प्रकाश डालने के पीछे हमारा मकसद यह बताना रहा है कि संस्कार मूलतः हमारे वे वैचारिक मूल्य होते हैं, जिनके द्वारा हमारी रागात्मकवृत्तियों का निर्माण होता है। वीरगाथाकालीन काव्य में राजाओं के व्यक्तिवादी चिंतन ने जहाँ वीरता के नाम पर मानवता को रौंदा, वहाँ भक्तिकाल में राजाओं के स्वरूप दैवीय शक्तियों के प्रतीक बनकर, श्रद्धा और भक्ति के पात्र हो गए। रीतिकाल, छायावाद, प्रयोगवाद का साहित्य नारी को भोग-विलास का शृंगारपरक वर्णन बना। इसी तरह इस सबसे अलग भारतेंदु, द्विवेदी और वर्तमानकाल सत्योन्मुखी व्यवस्था की स्थापनार्थ व्यक्तिवादी मूल्यों के विरोध में संघर्ष की गाथा बना है। इसके पीछे साहित्य के मूल में कवि के वह संस्कार कार्य कर रहे हैं, जिनकी वैचारिक ऊर्जा अंततः किसी-न-किसी रस में तब्दील होती है।

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रसाचार्यों द्वारा गिनाए विभिन्न प्रकार के रसों का रसात्मकबोध अंततः इस तथ्य पर आधारित है कि इन रसों की आलंबन सामग्री किस प्रकार की है और वह आश्रयों को किस तरीके से उद्दीप्त करने का प्रयास कर रही है। आलंबन विभावों का आश्रयों को उद्दीप्त करने का तरीका ही, उनके मन में विभिन्न प्रकार के रसों का बोध कराता है।

आलंबन एवं उद्दीपनविभाव का जो परंपरागत ताना-बाना तैयार किया गया है, वह अधूरा इसलिए है कि नायक और नायिका के गुण-धर्म तथा इनसे अलग प्रकृति के जो गुण-धर्म रस-सामग्री के रूप में रसाचार्यों द्वारा बताए गए हैं, वह गुण-धर्म ही रसोद्बोधन के मूल आधार हैं, न कि नायक और नायिका। बात अटपटी अवश्य लग सकती है लेकिन यह एक ऐसी वास्तविकता है जिसको समझे बिना रसात्मकबोध के वैज्ञानिक स्वरूप को किसी भी हालत में नहीं समझा जा सकता है। इसलिए विभिन्न रसों पर चर्चा करने से पूर्व यह समझ लिया जाये कि जिस आश्रय में जिस प्रकार का रस बनता है, उसमें आलंबन और उद्दीपनविभाव के वे कौन-से गुण-धर्म रहे हैं, जो आश्रय को उस रसदशा तक ले जाने में सहायक हुए हैं?

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रस में विचारणीय क्या है-आलंबन या आलंबन के गुणधर्म ? उद्दीपन विभाव या उसके गुणधर्म ? इसकी व्याख्या के लिए हम कुछ रसों की, रससामग्री पर मनोवैज्ञानिक रूप से विचार करते हैं-

[ क ] शृंगार रस-

शृंगार रस की रस-सामग्री के रूप में [ परंपरागत चिंतन के अनुसार ] नायक और नायिका आलंबन होते हैं। लेकिन आलंबन विभाव के अंतर्गत इनकी उत्तम प्रकृति, गुणरूप संपन्न्ता, चिरसाहचर्य एवं श्रेष्ठता के जो गुण-धर्म जोड़े गए हैं तथा उद्दीपनविभाव के अंतर्गत नायक-नायिका की वेशभूषा, शारीरिक चेष्टाएँ आदि आलंबनगत-उद्दीपनविभाव के रूप में तथा ऋतुसौंदर्य, नदी-तट, चंद्रज्योत्स्ना, वसंत, एकांत, उपवन, कविता, मधुर संगीत, पक्षियों का कलरव आदि प्रकृतिगत उद्दीपनविभाव के रूप में दर्शाए गए हैं | दरअसल ये सब आलंबन या उद्दीपन के गुण आलंबनों को आश्रय के रूप में जब रति की अवस्था में ले जाते हैं तो इस रति के निर्माण के पीछे जो विचार कार्य करता है, उसके अंतर्गत नायिका के प्रति नायक में रति इस कारण जागृत होती है, क्योंकि नायक यह निर्णय ले चुका होता है कि नायिका प्रकृति श्रेष्ठ, गुणसंपन्न, उत्तम है तथा वह अपने हाव-भावों, वेशभूषा से यह संकेत दे रही है कि चांदनी रात है, नदी का किनारा है, पंछियों का कलरव, एकांत, ऋतु-सौंदर्य मन को मादक बनाए जा रहा है, ऐसे में आओ स्पर्श, आलिंगन और चुंबन आदि का सुख भोगें। नायिका की मोहक भंगिमाओं की संकेतक्रिया से नायक-नायिका की मनःस्थितियों को भाँपकर, ऐसे में यह निर्णय लेता है कि सारी स्थिति-परिस्थिति उसके पक्ष में है और हर तरह से प्रेम को सुरक्षा प्रदान करने वाली हैं, अतः वह नायिका का सामीप्य-सुख भोगने के लिए बेचैन हो उठता है। नायिका के साथ नायक का यह सामीप्य ही उसमें रति को जागृत करता है, जिसकी निष्पत्ति शृंगार के रूप में होती है। आश्रय के रूप में नायिका के प्रति भी उपरोक्त वैचारिक प्रक्रिया उसे रति से सिक्त करती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि रस-सामग्री के रूप में रसाचार्यों ने चिरसाहचर्य को भी रखा है। यह चिरसाहचर्य ही वह वैचारिक प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत नायक-नायिका एक-दूसरे के प्रति प्रेमी-प्रेमिका बनने की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरते हैं। प्रेमी-प्रेमिका बनने की यह कसौटी रागात्मक संबंधों की प्रगाढ़ता के बिना किसी प्रकार संभव नहीं। रागात्मक संबंधों की यह प्रगाढ़ता निस्संदेह उस विचार के कारण जन्म लेती है जिसमें एक-दूसरा, एक-दसरे के आत्म को संतुष्टि और सुरक्षा प्रदान करने का निश्छल और भरसक प्रयास करता है।

इस प्रकार रति संबंधी उक्त व्याख्या से जो तथ्य उभरकर सामने आते हैं, उन्हें संक्षिप्त रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है-

1. नायक और नायिका में रति चिरसाहचर्य से रति इस कारण पैदा होती है, क्योंकि नायक और नायिका लगातार यह विचार करते हैं कि-‘‘ एक-दूसरे का सामीप्य सुख भोगा जाए।’’ ‘सामीप्य सुख’ का यह विचार ही उन्हें एक-दूसरे के प्रति लगातार आकर्षित करता है।

2. नायक-नायिका का चिरसाहचर्य एक-दूसरे के मन में यह धारणाएँ निर्धारित कर देता है कि-‘‘जिसके साथ वह प्रेम-संबंध स्थापित करने जा रहे हैं या कर रहे हैं, वह श्रेष्ठ प्रकृति, उत्तम गुणधर्म वाला है, जो प्रेम में विश्वासघात नहीं कर सकता। उसका प्रेम सच्चा, पवित्र और निश्छल है।’’

3. नायक-नायिका का प्रेम इस विचार के द्वारा भी तय होता है कि वे जिसे प्रेम कर रहे हैं, उसके साथ चुंबन-विहँसन-आलिंगन [ चाहे चोरी-छुपे ही सही ] असामाजिक नहीं है।’’ अर्थात् उन दोनों के बीच ऐसा कोई रिश्ता नहीं, जो बहिन-भाई, पिता-पुत्री, माँ-बेटे के पावन संबंधों को अपराधबोध से ग्रस्त कर सके।

4. काव्य के नायक-नायिका का परकीया-प्रेम, अधिकांशतः उन स्थलों पर उभरा है जहाँ चांदनी रात, नदी का किनारा, पक्क्षियों का कलरव, अर्थात् कुल मिलाकर सामाजिक एकांत हो। इसका कारण भी नायक-नायिका के वे निर्णय हैं, जिनके तहत वे निर्विघ्न, निर्द्वन्द्व होकर रतिक्रिया कर सकें।

कुल मिलाकर भारतीय काव्य में शृंगाररस की निष्पत्ति नायक-नायिका के उस स्वरूप में निर्धारित है, जिसमें नायक-नायिका के शारीरिक भोग की तीव्र उत्कंठा की शांति, समाज से छुपकर ऐसे स्थलों पर प्राप्त होती है, जहाँ उन्हें रतिक्रिया के समय किसी भी प्रकार की असुविधा , असुरक्षा अनुभव न हो।

इस प्रकार शृंगाररस का सारा-का-सारा प्रसंग इस बात पर निर्भर है कि नायक और नायिका चोरी-छुपे इंद्रिय भोग का सुख लूटें। इंद्रिय भोग के सुख लूटने के समय नायिका के पिता, भाई या माँ यकायक यदि उस स्थल पर उपस्थित हो जाएँ तो सारा-का-सारा शृंगाररस भय, जुगुप्सा, लज्जा में तब्दील में हो जाता है। ऐसा नायक-नायिका के मन में आए इस विचार के कारण होता है कि वे माता-पिता के सामने सामाजिक-अपराध करते पकड़े गए हैं। अब उनकी खैर नहीं।’’

उक्त उदाहरणों से यह तो स्पष्ट है ही कि मन में जिस प्रकार का विचार उपस्थित होता है, उसके अनुसार ही उनमें रस की स्थिति देखी जा सकती है। ठीक इसी तरह वियोग शृंगार के अंतर्गत नायक और नायिका में मिलन की उत्कंठा तो तीव्र रहती है, लेकिन ‘मेरा प्रेमी मुझसे बिछुड़ गया है और अब न जाने कब मिलेगा?’ का विचार उनके नयनों में अविरल अश्रुधार, चेहरे पर मलिनता, अंग-प्रत्यंग में जड़ता और मन में दुख का समावेश बनाए रखता है।

अतः काव्य का यह शृंगारिक संयोग और वियोगपक्ष मात्र आलंबन या उद्दीपनविभाव के ही द्वारा तय नहीं किया जा सकता, इसके लिए आवश्यक तत्त्व जहाँ नायक-नायिका के गुणधर्म हैं, वही दूसरी ओर उद्दीपन की गुणधर्मिता भी रतिक्रिया को रसाभास या विपरीत रस में तब्दील कर सकती है। जो नायक-नायिका को तरह-तरह से प्रताडि़त करता हो, यातनाएँ देता हो, उन दोनों के बीच रति का चरमोत्कर्ष शायद ही देखने को मिले। ठीक इसी प्रकार चाँदनी रात, पक्षियों के कलरव और एकांत के बीच यदि कोई प्राकृतिक प्रकोप पैदा हो जाए तो नायक-नायिका की रति भयानक रस में बदल जाएगी।

[ ख ] अन्य रस-

शृंगार रस के विवेचन के उपरांत यदि हम रौद्ररस का विवेचन करें तो नायक में स्थायीभाव क्रोध तभी जागृत होता है जबकि वह विचार करता है कि ‘‘उसके आलंबनविभाव के रूप में जो व्यक्ति उसके सम्मुख है, वह उसे किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाने के लिए उद्यत है। यदि इसका विनाश नहीं किया गया तो यह मुझे [ नायक को ] खत्म कर सकता है।’’ यह स्थिति बहुध युद्ध के लिये प्रेरित करती है।

ठीक इसी प्रकार जब वीर नायक यह अनुभव करता है कि उसके समक्ष एक दीन, दुःखी व्यक्ति या व्यक्ति समूह सहायता के लिए चीख रहा है तो नायक यह विचार कर कि ‘दीनों पर दया करना तो वीरों का धर्म है’, सहायता के लिए उत्साहित हो उठता है। नायक के मन में आया यह उत्साह उसकी वीरता का ही परिचायक है, जिसमें वह दीन और दुःखी व्यक्तियों को बचाने, उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए अपने प्राण तक संकट में डाल देता है।

नायक जब यह विचार करता है कि ‘‘उसके समक्ष कोई भयंकर वस्तु या व्यक्ति, शत्रु अथवा हिसंक प्राणी, भूत, प्रेतादि उपस्थित है, जिससे वह अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता, किसी भी क्षण उसका विनाश हो सकता है’’ तो वह भय से ग्रस्त हो जाता है, जिसका चरमोत्कर्ष भयानक रस के रूप में उसे चिंता, दैत्य, त्रास, मूच्र्छा, आवेग, संभ्रम, शंका आदि से सिक्त कर सकता है।

अद्भुत रस के अंतर्गत आलंबन एवं उद्दीपनविभाव के गुण-धर्म अद्भुत, अलौकिक, असाधरण, अवश्य होते हों, लेकिन उन्हें देखकर नायक के मन में किसी भी प्रकार की असुरक्षा या विनाश के विचार जन्म नहीं लेते, अतः नायक या आश्रय सिर्फ आश्चर्य या विस्मय के भाव या उद्बोधित होते हैं, जिसके कारण आलंबनविभाव के प्रति वह अद्भुत रस से सिक्त हो जाते हैं।

आचार्य भरतमुनि द्वारा बताए गए अन्य रसों का भी यदि हम वैचारिक विवेचन करें तो सारे-के-सारे रसोद्बोधन के पीछे वस्तुओं या व्यक्तियों के गुणधर्म ही अपनी अहम भूमिका निभाते हैं।

आलंबन या उद्दीपनविभाव के गुण-धर्म को आश्रय जिस प्रकार के अर्थ देते जाते हैं, आश्रयों में उसी प्रकार के रस की निष्पत्ति होती चली जाती है।

रस निष्पत्ति की इन विभिन्न स्थितियों को समझाने के लिए हम रामायण के पात्र राम को आलंबनविभाव के रूप में ले तो उनका बाल्यकाल आश्रय पिता, दशरथ व माता कौशल्या में जहाँ वात्सल्य रस की निष्पत्ति करता है, वहीं राम जब वनवास को जाते हैं तो माँ कौशल्या, पिता दशरथ शोक से ग्रस्त हो जाते हैं। राम जब सुग्रीव-हनुमान आदि के समक्ष मधुर , श्रेष्ठ, मानवीय और प्रभुसमान व्यवहार करते हैं तो सुग्रीव-हनुमान आदि में भक्ति जागृत होती है, जबकि रावण के विनाश के लिए जब इन्हीं भक्तों को प्ररित करते हैं तो भक्तों में वीररस की निष्पत्ति हो जाती है। इस प्रकार यह तथ्य सरलता से समझाया जा सकता है कि आलंबनविभाव किसी भी प्रकार के रस के निर्माण में योगदान नहीं देता, योगदान देते हैं तो आलंबनविभाव के गुण-धर्म, जिनसे अपने निर्णयों के अनुसार कोई भी आश्रय विभिन्न प्रकार के रसों से सिक्त होता है।

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आचार्य भरतमुनि ने रस तत्त्वों की खोज करते हुए जिन भावों को रसनिष्पत्ति का मूल आधार माना, वह भाव उन्होंने नाटक के लिये रस-तत्त्वों के रूप में खोजे और अपने ‘विभावानुभाव व्यभिचारे संयोगाद् रसनिष्पतिः’ सूत्र के द्वारा यह बताया कि नाटक के विभिन्न पात्रों में भावों के सहारे किस प्रकार रसोद्बोधन होता है? रसोद्बोधन की इस प्रक्रिया को मंच पर अभिनय करने वाले पात्रों नट-नटी आदि पर लागू करते हुए उन्होंने स्पष्ट कहा कि ‘स्थायीभाव, विभावादि के संयोग से जो रसनिष्पत्ति होती है, वह रंगपीठ पर स्थित आश्रयों के हृदय में होती है, सहृदय तो उसे देखकर हर्षादि को प्राप्त होते हैं।1

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लेकिन रस-शास्त्र का दुर्भाग्य यह रहा कि ‘‘ जो रस-सूत्र रंगपीठ या काव्य में रस के निर्यामक तत्त्वों का निरूपण करने वाला था, उससे सहृदयगत रस का काम लिया जाने लगा।’’

इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह रही कि भरतमुनि ने काव्य या नाटक की भावों के सहारे जो रसात्मक व्याख्या की, उस व्याख्या से सीधा अर्थ यह लगा लिया गया कि काव्य में जो कुछ भी रसनीय है, वह भावों का ही परिणाम है। ‘काव्यं रसात्मक वाक्यं’ जैसे जुमलों के अंधानुकरण से आज भी स्थिति यह है कि बुद्धितत्त्व रसाभास का कारण बना हुआ है तथा आश्रय को एक निर्जीव-गूंगा, पात्र या एक कैमरा बनाकर रख दिया गया है। होना यह चाहिए था कि आश्रयगत रस की व्याख्या, काव्य या नाटक को रसनीय बनाने वाले तत्वों से अलग रखकर की जाती। क्योंकि, ‘‘काव्य या नाटक में वे कौन से तत्त्व हैं, इस बात के विवेचन से यह बात भिन्न है कि सहृदय के हृदय में उस रसनीय काव्य-प्रस्तुति के द्वारा किस प्रकार का रस-संचार हो रहा है और उसका स्वरूप क्या है।’’2

यदि हम आश्रयगत रस का विवेचन करें तो उस रस-विवेचन से हमें कई नए तथ्यों के साथ-साथ इस तथ्य की भी जानकारी मिल जाती है कि ‘‘काव्य का कला पक्ष [ विशिष्ट शब्दावली ] आश्रय के मन में सीधे घुसकर अर्थ निवेदित करता है।3’’

यदि हम इस अर्थ निवेदन की गहराई में जाएँ तो यह तथ्य निर्विवाद है कि हर शब्द अपने में एक सुनिश्चत अर्थ रखता है। विशिष्ट प्रकार के शब्दों के समूह जब पाठक, श्रोता या दर्शकों के एन्द्रिक माध्यमों द्वारा ग्रहण किए जाते हैं तो आश्रय अपने मानसिक स्तर पर उस विशिष्ट शब्दावली को अर्थ प्रदान कर एक विशिष्ट निर्णय लेता है और उसके प्रति उस निर्णयानुसार अपने अनुभावों में, अपनी रसात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करता है।’’ क्योंकि मनुष्य का मन किसी वस्तु को ज्यों-की-त्यों ग्रहण करता हुआ नहीं चलता, प्रतिक्रिया करना तो उसका स्वभाव है।’’4

काव्य में वर्णित सामग्री के प्रति आश्रयों की प्रतिक्रिया के विभिन्न रूप हमें नाटक देखते हुए दर्शकों के बीच जहाँ स्पष्ट पता चल सकते हैं, वहीं आलोचना के क्षेत्र में आलोचकों की आलोच्य सामग्री में इस प्रकार की विभिन्न प्रतिक्रियाओं के विभिन्न रूप पढ़े या सुने जा सकते हैं। इसी कारण डॉ. राकेश गुप्त एवं डॉ. नगेन्द्र इस बात की स्पष्ट घोषणा करते हैं कि ‘‘काव्य या नाट्य प्रस्तुति की आलोचना भी रसात्मक हुआ करती है। 5 ‘‘ रस का अभिषेक आलोचना में भी रहता है।’’6

अतः काव्य या नाटक प्रस्तुति से एक आश्रय के मन में किस प्रकार की रस-निष्पत्ति कैसे होती है? इसके लिए काव्य या नाटक के आलोचकों, समीक्षकों या रसमर्मज्ञों को ही हम सबसे अधिक प्रामाणिक तौर पर रख सकते हैं, क्योंकि रसनिष्पत्ति के संबंध में अब तक जिन आश्रयों को लिया जाता रहा है, वे ऐसे कल्पित आश्रय रहे हैं, जिनके बारे में रस-निष्पत्ति संबंधी कोई भी सिद्धान्त गढ़कर उन्हें प्रमाण के रूप में किसी भी तरह तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया जाता रहा है। ऐसे आश्रयों के लाख प्रमाण देने के बावजूद, हमारे समक्ष ऐसे नाम प्रमाण रूप में नहीं दिए गए हैं, जिसके आधार पर रसाचार्य यह कह सकें कि यह रहे वे आश्रय, जिनमें इस प्रकार के रस की निष्पत्ति हुई है या इनका साधारणीकरण हुआ है।

‘कविता के नए प्रतिमान’ [ लेखक डॉ. नामवर सिंह ] पुस्तक के पाँचवें अध्याय में वर्णित ‘मूल्यों का टकरावः उर्वशी विवाद’ को ‘उर्वशी’ काव्यकृति के प्रामाणिक आस्वादकों के रूप में कुछ प्रामाणिक आलोचकों को लेकर आइए तय करें कि उनका इस काव्यकृति के प्रति रसात्मकबोध किस प्रकार का है और डॉ. नामवर सिंह की इस मान्यता को परखने का प्रयास करें कि ‘रस-निर्णय अंततः अर्थ-निर्णय पर निर्भर है।’’ पाठक की कोरी रसानुभूति का विषय नहीं, बल्कि प्रस्तुत काव्य के सूक्ष्म विश्लेषण से संबध है।’’7

‘उर्वशी’ के सुधी पाठक एवं प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा मानते हैं कि-‘‘ दिनकर उद्दात भावनाओं के कवि हैं, उनके स्वरों में ढलकर उर्वशी की प्राचीन कथा, सहज ही रीतिकालीन शृंगार-परंपरा से ऊपर उठ गई है। निराला के बाद मुझे किसी वर्तमान कवि की रचना में मेघमंद्र स्वर सुनने को नहीं मिला। उर्वशी में नारी सौंदर्य के अभिनंदन के अतिरिक्त मातृत्व की प्रतिष्ठा भी की गई है।’’

उर्वशी काव्य पर डॉ. रामविलास शर्मा की इस संवेदनात्मक प्रतिक्रिया के मूल में, उक्त काव्यकृति के प्रति उद्बुद्ध रति के भाव उनकी जिस रसात्मक अवस्था को उजागर कर रहे हैं, यह रसात्मक अवस्था उर्वशी के आस्वादन से पूर्व दिनकर को उद्दात भावनाओं का कवि तय करने के साथ-साथ, एक प्राचीन कथा के रीतिकालीन काव्य-परंपरा से ऊपर उठ जाने तथा नारी सौंदर्य के अभिनंदन के अतिरिक्त नारी की मातृत्व रूप में प्रतिष्ठा करने के कारण उत्पन्न हुई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि डॉ. रामविलास शर्मा की उक्त रसदशा उनकी उन विचारधाराओं की देन है जो भावनाओं के उद्दात स्वरूप, रीतिकालीन भोग-विलास की काव्य-परंपरा की जगह नारी सौंदर्य के अभिनंदन और मातृत्व की प्रतिष्ठा की हामी है। कुल मिलाकर उर्वशी के आस्वादन में डॉ. रामविलास शर्मा को ऐसे सारे तत्त्व दिखलाई दे जाते हैं, जो उनकी निर्णयात्मकता, रसानुभूति या रागात्मक चेतना के आवश्यक अंग हैं, इसी कारण वे संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त हो उठते हैं।

‘उर्वशी’ एक प्रणय काव्य होने के बावजूद भारत-भूषण अग्रवाल को इसलिए आनंदानुभूति से सिक्त करती है क्योंकि उर्वशी में उन्हें लिजलिजी कोमलता दिखलाई नहीं देती, उन्हें इस कृति में ओज के विलक्षण सम्मिश्रण के दर्शन होते हैं।

डॉ. नैमीचंद्र जैन, दिनकर की एक अन्य चर्चित कृति ‘कुरुक्षेत्र’ को तो पढ़कर संवेदनात्मक रसात्मकबोध से सिक्त हो उठते हैं क्योंकि उनकी वैचारिक आस्थाएँ आधुनिक चेतना से युक्त काव्य में प्रति हैं, और यही कारण है कि ‘उर्वशी’ काव्य का आस्वादन उन्हें प्रतिवेदनात्मक रसात्मकबोध की अवस्था में ले जाता है और वे इस रसात्मक अवस्था का परिचय इस प्रकार देते हैं-‘‘ कुल मिलाकर उर्वशी में अनावश्यक और अनर्गल मात्रा बहुत है... उर्वशी आधुनिक चेतना का काव्य नहीं है।’’

प्रगतिशील विचारधारा के आधुनिक कवि एवं प्रखर आलोचक मुक्तिबोध कहते हैं कि-‘‘ मानो पुरुरवा और उर्वशी के रतिकक्ष में भोंपू लगे हों, जो शहर और बाजार में रतिकक्ष के आडंबरपूर्ण कामात्मक संलाप का प्रसारण, विस्तारण कर रहे हों’’

मुक्तिबोध की उर्वशी काव्यकृति पर इतनी तीखी और प्रतिवेदनात्मक रसात्मकअवस्था के उद्बुद्ध होने के मूल में मुक्तिबोध की वह जीवन-दृष्टि या निर्णयात्मकता है जो रति को गरिमा, गांभीर्य और नैतिक स्वरूप में स्वीकारने की कायल है। चूँकि उक्त कृति उनकी मान्यताओं के विपरीत जाती है, इस कारण उनके मन में रति के विरोधी भावों का उद्बुद्ध हो उठना स्वाभाविक है।

कुल मिलाकर उर्वशी के इस रसात्मकबोध के प्रसंग में-‘‘ यदि रामविलास शर्मा एक छोर पर हैं तो मुक्तिबोध दूसरे छोर पर। यह केवल संयोग की बात नहीं है। अंतर भाषाबोध का नहीं, मूल्यबोध का भी है।’’9

उर्वशी की काव्य-सामग्री के आस्वादकों के रूप में डॉ. रामविलास शर्मा, डॉ. नैमीचंद जैन, भारतभूषण अग्रवाल एवं मुक्तिबोध से लेकर हमारा उद्देश्य यह दर्शाना है कि आस्वादकों की मान्यताओं , आस्थाओं , वैचारिक अवधारणाओं एवं मूल्यबोधों के कारण किस प्रकार ‘ रसात्मक वाक्यं काव्यं’ और ‘ साधारणीकरण’ जैसे सिद्धांतों की धज्जियाँ उड़ जाती हैं |

आदि आचार्य भरतमुनि का यह तथ्य निस्संदेह सारगर्भित महसूस होता है कि विभावादि व स्थायी भाव के संयोग से जो रस-निष्पत्ति होती है वह रंगपीठ के आश्रयों के हृदय में होती है। सहृदय तो उसे देखकर हर्षादि को ही प्राप्त होते हैं। कुल मिलाकर इस सारे प्रकरण से यह निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं कि-

1. रससिद्धान्त मूलतः अर्थसिद्धान्त पर आधारित है।

2. किसी भी आश्रय के मन में रसनिष्पत्ति विचारों के कारण उद्बुद्ध हुए भावों से होती है।

3. रस अंततः काव्य-सामग्री के प्रति लिए गए निर्णय की भावावस्था है।

4. आश्रय, किसी भी काव्य-सामग्री के प्रति किसी भी प्रकार का निर्णय अपनी वैचारिक अवधरणाओं, मूल्यों, आस्थाओं के अनुसार लेता है।

5. यदि कोई काव्य-सामग्री पाठक को अपनी विचारधाराओं के अनुरूप लगती है तो उसके प्रति उसमें संवेदनात्मक रसात्मक अवस्था जागृत होती है, इसके विपरीत की स्थिति उसे प्रतिवेदनात्मक रसात्मक अवस्था में ले जाती है।

सन्दर्भ-

1. डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-24

2. वाष्पान्जली [ के.के. राजा ] भा.का. सि. पृष्ठ-69

3. डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-23.

4. डॉ. राकेशगुप्त का रस विवेचन पृष्ठ-68

5. आस्था के चरण , डॉ. नगेन्द्र पृष्ठ-91

6. कविता के नये प्रतिमान , डॉ. नामबर सिंह , पृष्ठ-46

7. कविता के नये प्रतिमान , डॉ. नामबर सिंह , पृष्ठ-68

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