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झुमक दास की कलाकृति

मैंने अपने घर में एक साइन बोर्ड लगवा रखा है जिसमे बड़े हर्फ में लिखा है।

"जो घर फूंके ...." शेष छोटे शब्द हैं जो साथ चलने के पर्याय वाले,और घर से जुदा होने के नियम- शर्तों को ताकीद करते हुए हैं।

दर-असल एक दिन आत्मचिंतन करने पर यूँ पाया कि राष्ट्र निर्माण में अपना कतई कोई योगदान नहीं है|

अक्सर ये होता है कि जहाँ हमारा योगदान नहीं होता वहां हम दुखी होने लगाते हैं। पिताजी ने मकान बनवाया ,हम कुछ न कर सके। दो-दो बहनों की शादी करवाई हम दहेज में पायल-बिछिया ,तोले भर सोने से आगे न बढ़ सके।

इस कामचलाऊ योगदान से हमारी अंतरात्मा बोझ तले हरदम हमें दबाती सी रही।

हम आम जरूरत की सहायता और सहयोग को भी अनावश्यक या गैरजरूरी समझने की भूल करते रहे। कभी दोस्त स्कूटर मांग लेते तो इनका र की सूरत तलाशते। इस महंगाई में दो तीन लीटर पेट्रोल को बिना बात के फुक के वापस कर देने वाला मोहल्ला है ,यही आशंका से घिरे रहते। पड़ोसियों को उधार देने के नाम पर कन्नी काटने के अपने ढेरों प्रसंग है| उन मांगने वालों की तरफ तब तक नहीं जाते जब तक किसी खुफिया सूत्र से उनके ठीक ढंग से खाते-पीते होने की खबर न लग जाती।

न जाने क्यों इतने नकारात्मक सोच के बीच हममें कुछ कर गुजरने का जज्बा ठीक सठियाने बाद पैदा हुआ.... ? हमें राष्ट्रीय स्तर पर कुछ न कर गुजरने के नाम पर अंतरात्मा धिक्कारती उसका तोड़ जरूरी सा लगता।

अंतरात्मा की आवाज को बहुत दबाई नहीं जा सकती।

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-लोकल पंडितों से धुमा-फिरा के पूछने पर पता चला कि जो शख्स अपनी अंतरात्मा की नहीं सुनता उसके नरक--गमन को कोई नहीं रोक सकता। परिणामतः परलोक सुधारने की मुहिम के साथ आनन-फानन में देश-हित की आइडियोलॉजी का जन्मोदय हुआ। मेरे ख्याल से कई बड़े आंदोलन की शुरुआत कुछ इसी तर्ज पर हुआ हो ....कह नहीं सकता ?

पहले कोई एन जी ओ बनाने/खोलने का ख्याल आया मगर इन दिनों के हालात जिसमे हरेक एन जी ओ, बदनामी के हिचकोले खा रहे हैं . आइडिया ड्राप कर देना पड़ा।

बैठ कर योजना बनाते समय लगा राह आसान नहीं है। एक-एक आदमी को पकड़ के उनको अपने अभियान की जानकारी देना,किसी मिशन से कम नहीं। करेंट-अफेयर्स के बारे में बताना ,साथ ही , अपने राष्ट्रीय स्तर के अभियान को पास के बीते दिनों की किसी सक्सेसफुल अभियान के समकक्ष रखने की कोशिश करना पड़ेगा ये दिमाग में छप गया ।

मन में ख्याल आया, अपने सारे शुभचिंतकों की एक आम मीटिंग बुला लूँ। ऐसे मौके पर अपने मुल्क में मीटिंग बुलाने का विचार आप ही आप जन्म ले लेता है। परंपरा के तौर पर इसे निभाया भी जाता है। किसी ने सुझाया ,आरंभिक दौर में मीटिंग्स में ,सवाल-जवाब, टांग खिंचाई और आपसी बुराई या कभी-कभी सर फुटौव्वल का नजारा सामने आता है| बहरहाल ,एक-एक से इंडिजुअली मिलने का तय हुआ।

पहले श्रीवास्तव साब को पकड़े,

- लाला जी, विदेश से कब लौटे ...? बच्चे उधर सब मजे में होंगे ? ये मनोविज्ञान कहता है कि विदेश से लौटा हुआ आदमी अपने देश के प्रति ज्यादा संवेदन शील रहता है। उसे देश के प्रति ज़रा सा जगा दो तो रात-रात भर पहरा देने को तैयार मिलता है। हमने उनको देश की कमजोरियां गिनवाईं| उनकी सहमति के बादल बरसने के लिए तैयार होने लगे। तब हमने कहा ,

हमारे पास चार -पांच राष्टीय स्तर में मुद्दे हैं ,गाय के ,किसानों के, ऋण पर मरने वालों के ,राम लला ,आरक्षण-जाति ,और प्रायोजित भ्रष्टाचार किसम के .... समय-समय पर इनमें से किसी एक मुद्दे को तूल देकर बड़ा राजनैतिक बन्द और सत्याग्रह की बात की जायेगी। इसमें आप की सक्रिय भागीदारी की अपेक्षा है। हाँ दिमाग में ये रहे कि, हमारी संस्था का सूत्र वाक्य है " घर फुकने की नौबत आई तो पीछे नहीं हटेंगे ...."

यही शिष्टाचार संवाद, जब हमने रिटायर्ड बाबू गणपत साहू से किया तो, वे हैं हे ,,,, करने लगे ,देखिये यादव जी, आपको मालूम है कितने संघर्ष के दिन देखे हैं हमने ....। आज सस्पेंड कल बहाल,वाली नौबत में नौकरी की नइय्या को ले-दे के रिटायर मेन्ट तक खींच के लाये हैं। किसी तरह से , टू बी एच के वाले मकान मकान में सुख लेने के दिन आये तो, आप हमारे सामने बखेड़ों का पहाड़ फिर से खड़ा करने पर तुले हैं।

हमें तो आप तोलिये मत , अंतुले जानिये। किसी लफड़े में नइ पड़ना। घर फूंकने की न हमारी हैसियत है और न हिम्मत। जय जोहार .... वे बढ़ गए।

एक तीसरे को, बनने वाली संस्था का जिक्र किया तो भाषण नुमा हश्र सूना गए देखिये ,

आप किसी आदमी को चलते-फिरते घर फूंकने की सलाह नहीं दे सकते ... ?

आज की सरकार के खिलाफत में मुंह खोलने वालों का अंजाम पता भी है आपको ....?

छापे -छापे और छापे ....| नामी बेनामी कुछ नहीं देखेगी .....। आप जस्टिफाई नहीं कर सकोगे, वो इतनी जांच के गहरे में ले जायेगी कि आपकी नाक तक पानी कब आ गया पता नहीं चलेगा।

सो .... भाई साब ! मेहनत की इस कमाई के हिफाजत की पूरी जिम्मेदारी परिवार में अकेले मुझी पर है। मुझे माफ करें .....

स्साला .... वो दिन भूल गया ,दफ्तर में किसी बात पर अफसर बिगड़ते थे तो घिघियाते हुए अपने पास ही आता था। यादव जी बचा लो .... बच्चे छोटे-छोटे हैं। अपना दिल तो पसीजने वाले मशीन से बना है न ..... ? उनके बच्चे छोटे न भी होते तो बचाने की जुगत में कोई कोर कसर नहीं रह छोड़ते। अब क्या कहे जो राष्ट्र के सही निर्माण में अपनी हिस्सेदारी नहीं पहचानता , उससे बड़ा अभागा किसे कहें ..... ?

दूर कहीं ‘नत्थू नजरिया’ आते दिखा ... हमने हाथ से छूटे बाल को बाउंडरी तरफ जाने से न रोकते हुए ,नत्थू को रोकना फायदे का समझा ....| उनसे कुशल क्षेम की जानकारी बाद अपनी योजना की भूमिका सूनाई। वे गदगद हुए। शायराना अंदाज में इंकलाबी शेर सुनाकर दाद पाने की गरज से देखे ....| हमारी दाद पर पीछे से, उनने कहा चलिये कहाँ सर कटाना है .....?

हमने कहा ,नत्थू जी सर -वर अभी नहीं नहीं कटाना ,समय पे बताएँगे ,बस आज के बाद इस संस्था से जुड़ जाइये। आपको कोई इनाम वगैरह मिला हो तो देश हित में त्याग दीजिये| ये आजकल फैशन में हैं। हमारे आंदोलन से,फायदा पूछने वालों से कहिये , जैसा हमने पिछले आंदोलन की बदौलत सी एम और पच्चासों विधायक हमने बनते देखा है, कहीं आप भी उन भाग्यशाली में से एक न हों| किसी इलाके से विधायकी वाला आई डी प्रूफ आपके गले लटकते कल मिल जाए .....? वे फिर गदगद हुए ,शेर कहने लगे ....

मेरे आंदोलन की चिंगारी को ‘नत्थू-नुमा’ लोग हवा देने में लगे हैं। मैं तमाम घर-फूंक के तमाशा देख सकने वाले, जांबाज बहादुरों की प्रतीक्षा में हूँ। मुझे प्रतीकात्मक रूप से लगता है देश की प्रगति वहीं-कहीं रुकी है।

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सुशील यादव

न्यू आदर्श नगर दुर्ग (छ.ग.)

susyadav7@gmail.com ०९४०८८०७४२०

बदलते परिवेश में रक्षा बंधन

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श्रीमती शारदा नरेन्‍द्र मेहता

(एम.ए. संस्‍कृत विशारद)

रक्षा बन्‍धन एक धर्म निरपेक्ष त्यौहार है। भारतीय समाज का हर वर्ग इस पर्व को बड़े उत्साह से मनाता है । भारत ही नहीं अपितु मॉरीशस, नेपाल, आदि देशों में यह पर्व मनाया जाता है। विदेशों में जहाँ भी भारतीय निवास करते हैं, वे अपने भाईयों-बहनों से संचार माध्‍यम से सम्‍पर्क कर इस पवित्र त्यौहार का भरपूर आनन्‍द लेते हैं ।

राखी का पर्व कब से प्रारम्‍भ हुआ इस विषय में कहा जाता है कि जब देव तथा दानवों का युद्ध हुआ तो इन्‍द्र घबराकर देवगुरू बृहस्‍पति के पास पहुँचे। इन्‍द्र की पत्‍नी इन्‍द्राणी ने जब यह समाचार सुना तो उन्होंने रेशमी धागों को मंत्र-शक्‍ति से अभिमंत्रित कर लिया तथा उन्‍हें इन्‍द्र के हाथ पर बाँध दिया। कहा जाता है कि इसी के प्रभाव से इन्‍द्र युद्ध में विजयी हुए।

स्‍कन्‍धपुराण तथा पद्‌मपुराण के अनुसार राजा बलि ने 100 यज्ञ पूर्ण कर स्‍वर्ग का राज्‍य प्राप्‍त करने का प्रयत्‍न किया देवता भयभीत होकर भगवान विष्‍णु के पास गये। विष्‍णु ने ब्राह्मण वेष धारण किया। वे राजा बलि के पास भिक्षा माँगने पहुँचे। शुक्राचार्य ने राजा बलि को तीन पग जमीन देने से मना कर दिया किन्‍तु बलि बचनबद्ध थे। उन्‍होंने तीन पग जमीन दे दी। एक पग में आकाश, दूसरे में पताल तथा तीसरे में धरती का दान हो गया। राजा बलि को स्‍वयं रसातल में जाना पड़ा। बलि का अभिमान चूर हो गया किन्‍तु बलि ने अपनी भक्ति की शक्ति से भगवान विष्‍णु से कहा कि आप हमेशा मेरे सम्‍मुख रहें। विष्‍णु वचनबद्ध हो गये। जब विष्‍णुजी वापस नहीं आये तो लक्ष्‍मीजी चिंतित हो उठी। वे राजा बलि के पास पहुँची। वहाँ उन्‍होंने श्री विष्‍णु को बलि के सम्‍मुख पाया। उन्होंने बलि को अपना भाई बनाकर उसे रक्षा सूत्र बाँधा और भाई से अपने पति भगवान विष्‍णु को ले आई। उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। इसके बाद भगवान्‌ विष्‍णु ने हयग्रीव का अवतार लिया। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

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द्वापर युग में भगवान्‌ श्रीकृष्‍ण ने शिशुपाल के 100 अपराध पूर्ण होने पर उसका वध कर दिया। उन्‍होंने बाएँ हाथ की ऊँगली से सुदर्शन चक्र चलाकर शिशुपाल की गर्दन काट दी, किन्‍तु संयोगवश श्रीकृष्‍ण की ऊँगली से खून बहने लगा। जब द्रौपदी ने यह दृश्‍य देखा तो अपनी साड़ी से चिंदी फाड़कर श्रीकृष्‍ण की ऊँगली में बाँध दिया जिससे रक्‍त प्रवाह रूक गया। भगवान श्रीकृष्‍ण ने द्रौपदी को अपनी बहिन मानकर हमेशा उसका साथ दिया और भरी सभा में जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब श्रीहरि द्वारा द्रौपदी की रक्षा की।

रक्षा बंधन के विषय में यह कथा भी प्रचलित है-

एक बार श्रीगणेश और ऋद्धि-सिद्धि से उनके पुत्र शुभ-लाभ ने अपने लिये एक बहन के लिये इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी। श्रीगणेशजी तथा ऋद्धि-सिद्धि ने अपने तपोबल से माँ संतोषीमाता को आहूत कर उन्‍हें अपने पुत्रों के लिये बहिन के रूप में आने के लिये कहा। उन्‍होंने इसे स्‍वीकार किया और अपने भाईयों को रक्षा सूत्र बाँधा।

सिकंदर और राजा पुरू के विषय में भी एक कथा प्रचलित है। भारतवर्ष पर आक्रमण करने के पश्‍चात्‌ राजा पुरू की शक्ति से सिकन्‍दर घबरा गया। उनकी पत्‍नी भी बड़ी व्‍याकुल हो गई। उन्‍होंने पुरू के लिये एक रक्षा सूत्र भिजवाकर उसे अपना भाई स्‍वीकार किया जिससे युद्ध समाप्‍त हो गया।

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चित्तौड़ पर बहादुरशाह ने आक्रमण किया। वहाँ की रानी कर्णावती थी ,वह विधवा थी । आक्रमण से वह घबरा गई। उसने हुमायूँ को राखी बाँधी थी। एैसे संकट के समय हुमायूँ ने अपनी बहिन कर्णावती की रक्षा की तथा युद्ध में सहायता की।

रवीन्‍द्रनाथ टैगोर अपने विश्‍वविद्यालय शांति निकेतन में विश्वबन्‍धुत्‍व की भावना को उजागर कर इस पर्व को मनाते थे।

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भारत में आज भी अनेक विद्यालयों में छोटी-छोटी कन्‍याएं भैयाओं को राखी बाँधती है और अपने इस पावन सम्‍बन्‍ध को आजीवन निभाने के लिए बचनबद्ध रहती हैं। इसी परम्‍परा को आगे बढ़ाते हुए भारत के शासकीय तथा अशासकीय कार्यालयों में महिला कर्मचारी पुरूष कर्मचारियों की कलाई पर राखी बाँधे तो इससे हमारी भारतीय संस्‍कृति की रक्षा होगी और नैतिकता के स्‍तर में सुधार होगा।

सेना में कार्यरत देश के रक्षक जवान जो इस पवित्र पर्व पर भी अपने गृह नगर नहीं आ सकते हैं उनको समीपवर्ती इलाके की बहिने रक्षा सूत्र बाँधकर सफल तथा दीर्घायु होने की कामना करना चाहिए। यह महापर्व हम सबके लिये गौरव और स्‍वाभिमान का प्रतीक है।

इस त्यौहार का आध्‍यात्‍मिक मूल्‍य भी है इसमें कहीं न कहीं एक दूसरे की रक्षा के वचन के साथ ही नैतिक तथा सांस्‍कृतिक मूल्‍य भी दृष्‍टिगोचर होता है।

भाभी भी अपने भ्रातृ तुल्‍य देवर को राखी बाँधती है। यह रक्षा सूत्र उनमें सम्‍बन्‍धों की विशालता की परिचायक है। छोटे भाई की पत्‍नी भी अपने पति के बड़े भाई (जेठजी) को राखी बाँधकर इस संबंध को प्रगाढ़ बना सकती है।

रक्षा बंधन पर संस्‍कृत दिवस भारत में ही नहीं अपितु विश्‍व के कई संस्‍कृत संस्‍थानों में मनाया जाता है। इस दिन पंण्‍डित क्षमाराव का जन्‍म दिवस भी रहता है। गुरू पूर्णिमा से श्रावणी पूर्णिमा (रक्षा-बंधन) तक अमरनाथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। शासन की ओर से पूर्ण सुरक्षा का प्रबन्‍ध किया जाता है। लंगर का आयोजन होता है। मेला भी लगता है अमरनाथ गुफा में शिवलिंग के दर्शन कर भक्त अपने जन्‍म को सफल मानते हैं। यह शिवलिंग बर्फ का होता है, यह इसी समय निर्मित होता है ।

महाराष्‍ट्र में इस दिन को नारियल पूर्णिमा या श्रावणी पूर्णिमा कहते हैं। पवित्र नदी या समुद्र किनारे जाकर यज्ञोपवीत बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करते है। वेदपाठी ब्राह्मण द्वारा ही यह कार्य सम्‍पन्न कराया जाता है । फलस्‍वरूप उन्‍हें उचित दक्षिणा दी जाती है।

राजस्‍थान में इसे राम राखी कहा जाता है। भाभियों को चूड़ाराखी बाँधी जाती है। जोधपुर में राखी के दिन गणपति, दुर्गा तथा अरून्‍धती का पूजन किया जाता है। तर्पण कर पितृऋण से मुक्‍त होते है राखी का पूजन कच्‍चे दूध से करते है।

केरल, उड़ीसा, तमिलनाडू तथा दक्षिण भारत में नदी किनारे यज्ञोपवीत बदलते हैं इस दिन वेद अध्‍ययन प्रारम्‍भ किया जाता है। ब्रज में हरियाली तीज से श्रावणी पूर्णिमा तक ठाकुर जी को झूले में बिठाया जाता है और उनका प्रतिदिन श्रृंगार किया जाता है ।

उत्‍तर प्रदेश में आज के दिन बहिन भाई की कलाई पर मंगल कामना करते हुए राखी बांधती है ।

बुन्‍देलखण्‍ड में पूर्णिमा से पूर्व नवमी को गेहूँ जौ को सकोरे में बोया जाता है। उनकी संध्‍याकाल में आरती पूजन किया जाता है इसे कजरी कहते है ।

मालवा प्रान्‍त में इसे एक धार्मिक स्‍वरूप प्राप्‍त है। प्रातःकाल नदी किनारे जाकर पण्‍डित के मार्गदर्शन में यज्ञोपवीत को धारण किया जाता है । गौमूत्र, गाय का गोबर, घी शहद आदि का उपयोग किया जाता है । रक्षा बन्‍धन के पूर्व भाई अपनी बहिनों को सम्‍मान निमंत्रित करता है कई घरों में बहिन को बीरपस (औपचारिक निमंत्रण) दिया जाता है जिसका अर्थ राखी का निमंत्रण ही है। जिस वर्ष भाई के परिवार में आकस्‍मिक किसी सदस्‍य की मृत्‍यु हो जाती है तो बिना निमंत्रण के बहिन राखी बांधने जाती है। कई घरों में दीवार पर या कागज पर श्रवण कुमार का चित्र गेरू से बनाकर उसका पूजन किया जाता है फिर राखी बाँधी जाती है । देवगुरू बृहस्‍पति ने इन्‍द्र को यह मंत्र दिया था जिसे राखी बाँधते समय बोला जाता है -

येन बद्धो बलिराजा दानवेन्‍द्रः महासुरः ।

तेन त्‍वां प्रतिबध्‍नामि रक्षो मा चल मा चल ॥

अर्थात जिस रक्षा सूत्र से महा बलशाली दानवेन्‍द्र राजा बलि को बाँधा गया था उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ। हे रक्षे (राखी) तुम अडिंग रहना अपने संकल्‍प से कभी विचलित न होना।

बाजार में विभिन्‍न आकार - प्रकार डिजाईन के रंग-बिरंगे रक्षा सूत्र उपलब्‍ध हैं। वर्तमान में चाईनीज राखियों की भरमार है । ये राखियाँ स्‍वास्‍थ्‍य की दृष्‍टि से हानिकारक हैं। मेरे विचार से बहिनों को चाहिये कि वे बाजार से राखी बनाने की सामग्री लाकर स्‍वयं के हाथों से बनी आकर्षक, सुन्‍दर राखी बनाकर अपने परिवार में उनका प्रयोग करें। इससे उनकी रचनात्‍मकता को उजागर होने का अवसर प्राप्‍त होगा और परिवार के बालक भी तथा अन्‍य सदस्‍य भी कुछ नया सीखने का प्रयत्‍न करेंगे। ये मनोयोग से बनाई गई राखियाँ हमारी सांस्‍कृतिक धरोहर को सहेजते हुए भाभी-भाईयों की कलाईयों की श्रीवृद्धि करेगी।

ऐसे पुनीत पर्व पर हमारे शहर के वृद्धाश्रम के वृद्धजन, कारागृह के कारावासियों, दिव्‍यांगों, अनाथालयों, के बालकों विभिन्‍न चिकित्‍सालयों में भर्तीर् रोगियों को जाकर रक्षाबन्‍धन मनाना चाहिये। नारी निकेतन की बालिकाओं के प्रति अपनी सद्‌भावना रखनी चाहिये तथा रक्षा बन्‍धन के इस पर्व पर उनके प्रति उदार दृष्‍टिकोण रखते हुऐ शुभकामना प्रगट करना हम देशवासियों का परम कर्तव्‍य है।

बालिकाओं को चाहिये कि इस दिन सर्वप्रथम भगवान गोपाल कृष्‍ण को राखी बांधे। श्रीहनुमान्‌जी को राखी बाँधे फिर घर के सदस्‍यों को राखी बाँधे। घर, कलम, दवात, वाहन, आदि को भी राखी बाँधे। यह पर्व श्रवण पूर्णिमा से जन्‍माष्‍टमी तक मनाया जाता है कई घरों में ऋषि पचंमी के दिन भी राखी बाँधते है ।

आधुनिक काल में परिवार का आकार सीमित हो गया है । परिवारजनों की मानसिकता संकुचित हो गई है। परिवार का अर्थ माता-पिता और उनके एक या दो बच्‍चों तक ही सीमित रह गया है काका, ताऊ, मामा, बुआ, मौसी, आदि के सम्‍बन्‍धों में दूरियाँ बढ़ती जा रही है। जहाँ दो बहने एक दूसरे की रक्षा का वचन ले सकती हैं दो भाई भी आपस में राखी बाँधकर संकट की घड़ी में साथ निभा सकते हैं ।

प्रकृति का सान्निध्‍य भी हमारे जीवन में बहुत महत्‍वपूर्ण है। इनकी रक्षा भी हमारी भावी पीढ़ी के लिये अति आवश्‍यक है। वर्तमान को सहेजकर ही हम भविष्‍य को सुनहरा बना सकते हैं। वृक्ष हमारे जीवनदाता है उनकी रक्षा करना हमार कर्तव्‍य है। प्रत्‍येक बालक-बालिका को चाहिये कि रक्षा बन्‍धन के दिन एक पौंधे को राखी बांधे और अपने इस रक्षा बन्‍धन को पौधे के पूर्ण विकसित होने तक, उसके पेड़ बनने तक निभाये। यह प्रकृति के प्रति एक बड़ी कर्तव्‍य निष्‍ठा होगी।

‘‘तरूवर फल नहीं खात है सरवर पियत न पान ’’ पेड़ स्‍वयं फल नहीं खाता है वह सब को देता ही है तालाब स्‍वयं पानी पीता नहीं है सबकी प्‍यास बुझाता है अर्थात देने में जो सुख है वह लेने में नहीं है ।

यह रक्षा बन्‍धन है। दोनो हाथों से दूसरों को दो और एक हाथ से लो। यही जीवन का श्रेष्‍ठतम ध्‍येय होना चाहिये।

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श्रीमती शारदा नरेन्‍द्र मेहता

एम.ए. संस्‍कृत विशारद

Sr. MIG-103ए व्‍यास नगर, ऋषिनगर विस्‍तार

उज्‍जैन (म.प्र.)456010

Ph.:0734-2510708, Mob:9406660280

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

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16 जुलाई, 2017 रविवार को नगर पालिक निगम, राजनांदगाँव, के सभागार में ’साकेत साहित्य परिषद् सुरगी’ का 18 वाँ वार्षिक साहित्य सम्मेलन, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग छत्तीसगढ़ शासन तथा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, के सहयोग से संपन्न हुआ। तीन सत्रों में आयोजित इस सम्मेलन के प्रथम सत्र में ’छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों का सांस्कृतिक अवदान’ विषय पर परिचर्चा हुई तथा ’साकेत स्मरिका’ का विमोचन किया गया जिसमें दुर्ग, बालोद एवं कवर्धा जिले के साहित्यकार बड़ी संख्या में उपस्थित थे। सत्र का संचाालन साहित्यकार कुबेर सिंह साहू ने किया।

अपने आधार वक्तव्य में श्री यशवंत ने कहा कि - कुछ दशक पहले तक लोकसंस्कृति धन अर्जित करने का साधन अथवा आजीविका का साधन कभी नहीं रही है। और तब तक यह लोक की अभिलाषाओं और आकांक्षाओं को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करके लोक अस्मिता को सुदृढ़ करता रही है। लोक को जीवनी शक्ति देता रही है। परंतु अब, जबकि इसमें ह्रास और विकृति पैदा करनेवाली, आज के लोककलाकारों की पीढ़ी, यश और धन की चाह में परंपरा से अर्जित लोक संस्कृति को, लोक साहित्य को बाजार के हाथों बेचने पर उतारू हुई है, अपसंस्कृति का दौर शुरू हुआ है। या तो इस परिवर्तन को परिवर्तनशील समाज की इच्छा मानकर मौन साध लें अथवा अपसंस्कृति पैदा करनेवाली बाजार निर्मित सेल्फी संस्कृति से बचने का कुछ तो प्रयास करें। सत्र को सभी साहित्यकारों ने छत्तीसगढ़ी भाषा में संबोधित किया।

अपने उद्बोधन में लोककला के प्रकांड विद्वान तथा लोककला मंच ’दूध मोंगरा’ के संस्थापक-संचालक डॉ. पीसी लाल यादव ने कहा कि छत्तीसगढ़ में स्थापित और संचालित सभी लोककला मंच, दाऊ रामचंद्र देशमुख द्वारा स्थापित प्रथम छत्तीसगढ़ी लोककला मंच ’चंदैनी गोदा’ से प्रेरित और अनुप्राणित हैं। चंदैनी गोंदा द्वारा स्थापित आदर्श ही समस्त छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों का आदर्श है। यह आदर्श छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा का आदर्श है जो उसकी आत्मा है। छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा का इतिहास छत्तीसगढ़ के रामगढ़ में स्थापित विश्व के प्रथम नाट्यशाला के इतिहास से भी प्राचीन है, क्योंकि रामगढ़ में स्थापित विश्व के प्रथम नाट्यशाला का इतिहास भरतमुनि के नाट्य शास्त्र के बाद प्रारंभ होता है परंतु छत्तीसगढी़ लोकनाट्य नाचा तो लोक की कृति है और कहना न होगा कि लोक और उसकी परंपराएँ पहले आती है, शास्त्र बाद में। दुख की बात है कि वर्तमान में लोककला मंचों में द्विअर्थी संवादों और बाजार की संस्कृति ने प्रवेश करके इसे विकृत करना शुरू कर दिया है। समय के अनुरूप परिवर्तन मानकर इस अश्लील अपसंस्कृति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

इस सत्र के मुख्य अतिथि छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सदस्य आदरणीय डाॅ. गणेश सोनी ’प्रतीक’ ने कहा कि - केवल हमार ममतामयी, गुरतुर छत्तीसगढ़ी महतारी भाखाच् ह आज लोककला मंच मन ल अपसंस्कृति से बचा सकथे। येकर खातिर हम सब लोकलाकार अउ साहित्यकार मन ल येला चुनौती मान के, ईमानदारी के संग अउ संकल्प लेके के काम करे जरूरत हे।

सत्र के अध्यक्ष प्रो. डॉ. नरेश कुमार वर्मा ने कहा कि - छत्तीसगढ़ी लोककला मंचों के सांस्कृतिक अवदानों को रेखांकित करने का प्रयास पहले से चल रहा है परंतु इस संबंध में कोई उल्लेखनीय प्रगति दिखाई नहीं देती। आज ’साकेत साहित्य परिषद् सुरगी’ ने इस विषय को प्रमुखता के साथ साहियिक मंच पर उठाया है, इसके लिए यह परिषद् बधाई का पात्र है। इस सत्र में साहित्यकार आ. सरोज द्विवेदी, प्रसिद्ध कहानीकार कैलाश बनवासी, ’कलापरंपरा’ के संपादक डी. पी. देशमुख, तथा साहित्यकार दुर्गा प्रसाद पारकर ने भी अपने विचार व्यक्त किये।

सम्मेलन के दूसरे, सम्मान, सत्र के मुख्य अतिथि राजनांदगाँव संसदीय क्षेत्र के पूर्व सांसद तथा नगर पालिक निगम राजनांदगाँव के महापौर, जन-जन में लोक प्रिय, जन-जन के नायक, मधुसूदन यादव थे। सत्र में उनके उद्बोधन की साहित्यिक शैली से उनकी साहित्यिक प्रतिभा के दर्शन हुए। महापौर मधुसूदन यादव ने कहा कि - आज जन सेवा के प्रतिमान बदल चुके हैं। जनता से कटकर आप जन सेवा नहीं कर सकते। साहित्य भी जन सेवा का ही साधन है। आप सब साहित्यकारों से अनुरोध है कि साहित्य को जनोपयोगी बनाने के लिए आप जन से जुडकर एक नये प्रतिमान साहित्यिक की स्थापना करें। इस सत्र में महापौर मधुसूदन यादव ने जिले के व्यंग्यकार गिरीश ठक्कर ’स्वर्गीय’, पत्रकार प्रकाश साहू ’वेद’ तथा लोककलाकार दिनेश साव को ’साकेत सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मेलन के अंतिम सत्र में उपस्थित कवियों ने काव्य पाठ किया।

निवेदक - कुबेर

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आज जब मैं नरेंद्र श्रीवास्तव जी की पुस्तक बारहमासी (बच्चों की कवितायेँ ) की समीक्षा लिखने बैठा तो बाल-साहित्य के बारे में प्रख्यात गीतकार और शायर गुलज़ार की एक बात मेरे जेहन में गूंजने लगी कि, ‘अच्‍छा बाल साहित्‍य वह है जिसका आनंद बच्‍चे से ले कर बड़े तक ले सकें। जिस प्रकार बाल कविताओं को रचने के लिए खुद को बच्चा बनाना पड़ता है ठीक उसी प्रकार बाल कविताओं के लिए भी बच्चों का मनोविज्ञान समझकर बिल्कुल सीधी और सरल भाषा में रोचकता का आवरण लिए बाल कवितायेँ रची जानी चाहिए। नरेंद्र जी ने बहुत ही सरल भाषा में इन कविताओं की रचना की है जो उनकी साहित्यिक परिपक्वता को परिलक्षित करती हैं।

नरेंद्र जी ने इन कविताओं के माध्यम से ,बच्चों को इस विरासत का महत्व जानने व उसका आनन्द लेने के लिए तथा हमारे देश की भाषाओं, इतिहास और संस्कृतियों के प्रति अपनेपन का भाव साझा करने का अप्रितम प्रयास किया है ।हम सभी को अपने बचपन में सुनी कुछ कहानियों और कविताओं की याद आती है वो हमारे अंतर्मन में इतने गहरे पैठीं हैं कि लगता है वो हमारे जीवन का एक हिस्सा है । सद्व्यवहार के संबंध में या नैतिक संदेश या चेतावनी देने वाली लोक-कथा अथवा स्कूल के खेल के मैदान में सुनाई गई कोई कविता आज भी हमारे आचरण का हिस्सा बनी है ।हमने शायद किसी क़िताब में कभी पढ़ें बिना - इन कहानियों या कविताओं को घर पर, समुदाय और स्कूल में सुन कर सीखा होगा। और इन लोक कथाओं और कविताओं से लगता है हमारा जन्म जन्मांतर का रिश्ता हो। दरअसल, बाल साहित्‍य का उद्देश्‍य बाल पाठकों का मनोरंजन करना ही नहीं अपितु उन्‍हें आज के जीवन की सच्‍चाइयों से परिचित कराना है। आज के बालक कल के भारत के नागरिक है वो जैसा पढ़ेंगें उसी के अनुरुप उनका चरित्र निर्माण होगा।

नरेंद्र जी ने कोशिश की है कि वो सरल भाषा में ऐसे बल साहित्य का सृजन करें जो बच्चों को मनोरंजन के साथ साथ देशप्रेम और नैतिक शिक्षा का पाठ भी पढ़ाये। उनकी बाल कवितायेँ "जग में नाम कमाओ" "कहा बड़ों का माने " "आज़ादी के मतवाले "जैसी कवितायेँ चरित्र निर्माण और देशप्रेम की शिक्षा एवं सन्देश देती हैं।

'मातृभूमि के लिए लड़ेंगें

तन मन अपना न्यौछावर कर।

पीठ कभी न दिखलायेंगें

युद्धभूमि में आगे बढ़ कर।

बालक जीवन की अनमोल निधि होता है। बच्चे स्वभाव से सहज, सरल, सरस, जिज्ञासु, उत्साह से भरा, कल्पना की पंख लगाकर पूरी दुनिया की सैर करने वाला तथा मौलिक रचनात्मकता से भरा होता है। बच्चों के इसी कोमल मन को चित्रित करती उनकी एक कविता "चंदा मामा तुम प्यारे हो "की कुछ पंक्तियाँ

चंदा धीरे धीरे है चलता

रुके नहीं ,न है थकता।

चंदा का नीला आसमान।

खूब खेलने का मैदान।

बच्चों का मन हमेशा एक खोजी अन्वेषक की तरह है, जो हर समय क्रियाशील एवं सचेत रहता है। इसलिए हिंदी बाल कविता की पहली कोशिश यही रहनी चाहिए कि कोमल मन मस्तिष्क वाले बच्चों को प्यार भरी लुभावनी दुनिया में ले जाएं। नरेंद्र जी की कविता "ऐसा मौका आये "बच्चों के मन को विश्लेषित करती है।

पापा बोले प्यारे बेटा !

जब भी ऐसा मौका आये।

जोखिम लेकर निर्णय करो

मन को जो भी भायें।

इन बाल कविताओं में नरेंद्र जी ने सामाजिक सरोकारों की बात बहुत सहज तरीके से उठाई है। नरेंद्र जी का मानना है कि भले ही हमने हजारों हजार स्कूल, मदरसे, कॉलेज, विश्‍वविद्यालय, संग्रहालय, पुस्तकालय, अप्पूघर, पार्क, मैदान, बाग-बगीचे स्थापित कर लिए हों इसके बावजूद एक बड़ी शर्मनाक बात है कि हमारे लाखों करोड़ों नन्हे-नन्हे बच्चे काम करने को विवश हैं । कुछ पीठ पर अपने से बड़ा बोरा लटकाए कूड़े के ढेर में रोटी तलाश रहे हैं, कुछ होटल में कोमल-कोमल हाथों से बरतनों को चमका रहे हैं, कुछ अपनी कमीज खोलकर ट्रेन का फर्श या लोगों के जूते साफ कर रहे हैं तो कोई दन-कालीन, माचिस, बीड़ी-सिगरेट, पटाखे, बल्ब-ट्यूब या चूडि़याँ बनाने जैसे खतरनाक कामों में लगे हैं, कुछ गोबर, लीद ढूँढते रहने के बाद अंधेरे में दुबक रहे हैं । उन्होंने उस तबके की नींद की फिक्र की है, जिसके जिंदा होने तक की फिक्र समाज को नहीं होती! जैसे मानसिक विक्षिप्त बच्चे , भिखारीबच्चे , एड्स-रोगी बच्चे,बाल मज़दूर आदि।"छोड़ कर चिंता साडी " 'देखा संग में सपना "और ये मैंने रुपये जोड़े "कवितायेँ बच्चों के सामाजिक सरोकारों को आवाज़ देतीं हैं।

इन कविताओं में संगीतबद्धता नहीं है, पर शब्दों में प्रेम की वही गर्माहट है जो मां की सुरीली आवाज में होती है. वही शब्द हैं जो दिनभर में मिली थकान और जिल्लत को पोंछकर प्यार की थपकी दे सकें। इन कवितों में भोलापन है ,इनमे प्रेम ,वात्सल्य और भविष्य की आशाएँ पल्ल्वित हैं।

सबसे पहले उठ जाती मम्मी

सबको चाय पिलाती मम्मी।

खेल खिलोने टाफी बिस्कुट

खूब प्यार जताती मम्मी।

एक तरफ हम अपने बच्चों से इतना सारा प्यार करते हैं। उन्हें दुनिया की हर ख़ुशी देना चाहते हैं। उनके सामने भौतिक संसाधनों का अम्बार लगा देना चाहते हैं। उनके लिए संपत्ति और धन का सारा संकेन्द्रण कर देना चाहते हैं। और इस कथित प्यार को देने के लिए दुनिया भर में मार काट मचाते हैं, युद्ध लड़ते हैं, दंगे करते हैं। नैतिक-अनैतिक हर तरह का व्यवहार करते हैं। इन्हीं भावों से ओतप्रोत नरेंद्र जी की बाल कवितायेँ "शुभ हो मंगलदायक हो " "चालक लोमड़ी " "गाँधी जी " बच्चों एवं बढ़ो के बीच मधुर सम्बन्धों और संस्कारों का सन्देश देती हैं।

आज का समाज अतिव्यस्तता से भरा हुआ है। किसी के पास अपने बच्चों तक के लिए समय नहीं है। उनकी मीठी-मीठी तोतली बोली का आनंद लेने की फुरसत किसी के पास नहीं है। नौकरीपेशा माता-पिता के बच्चे अकेलेपन के संत्रास से जुझते रहते हैं। नरेंद्र जी ने बच्चों की कोमल भावनाओं का मधुर चित्रण करते हुए इन्हीं संत्रासों को अपनी कविताओं में आवाज दी है। उनकी कवितायेँ "तितली रानी ' "एक का पहाड़ा "बेटा तुम इतना करना" नानी जी में इन्हीं मानवीय सम्बन्धों का चित्रण किया है।

बच्चे तरल पदार्थ की तरह है, जिसका अपना कोई स्वरूप नहीं होता, उसे जिस रूप में तथा जिस आकार में तैयार कर दे, वह वैसा ही स्वरूप धारण कर लेता है। इसी तरह बच्चे की आदत, स्वभाव, विचार तथा स्वरूप नहीं होता, उसे परिवार, समाज, परिवेश और संस्कार जिस साँचे में ढाल दे, वैसा ही बच्चों के व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारण हो जाता है। जब बच्चे को बड़ा होकर किसी भी कारण से तथाकथित कमतर या महत्त्वपूर्ण कार्य ही करना पड़ जाता हॆ तो वह हीन भावना से ग्रसित रहता हॆ। कुंठित हो जाता है इन्हीं भावों को व्यक्त करती उनकी कवितायेँ "बच्चे पढ़ते मन लगा कर " 'छोड़ कर चिंता सारी " "हे प्रभु वर दीजिये" अंतर्मन को छूती हैं।

आज बाल साहित्य पर लेखन बहुत कम हो रहा है और जो हो भी रहा है वह बच्चों के समयानुकूल नहीं है इस सम्बन्ध में दिविक रमेश के एक आलेख का अंश उद्धृत करना चाहूंगा "वस्तुत: आज हमारे बाल-लेखकों की पहुंच ग्रामीण और आदिवासी बच्चों तक भी सहज-सुलभ होनी चाहिए। भारतीय बच्चों का परिवेश केवल कम्प्यूटर, सड़कें, मॉल्ज, आधुनिक तकनीकी से सम्पन्न शहरी स्कूल, अंतर्राष्ट्रीय परिवेश ही नहीं है ( वह तो आज के साहित्यकार की निगाह में होना ही चाहिए), गांव-देहात तक फैली पाठशालाएं भी है , कच्चे-पक्के मकान-झोंपड़ियां भी हैं , उन के माता-पिता भी हैं , उनकी गाय-भॆंस-बकरियां भी हैं ।प्रकृति का संसर्ग भी है। वे भी आज के ही बच्चे हैं। उनकी भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए जो कि दिख रही है।"

आज के वैश्विक दौर में बच्चों और बड़ों के बीच अंतर करना बहुत मुश्किल हो गया कभी कभी तो बच्चों का व्यवहार बड़ों से भी ज्यादा गंभीर लगने लगता है ऐसी स्थिति में बाल साहित्यकार के सामने न केवल बच्चे के बचपन को बचाए रखने की चुनौती है बल्कि अपने भीतर के शिशु को भी बचाए रखने की बड़ी चुनौती है। नरेंद्र श्रीवास्तव जी की यह पुस्तक "बारहमासी "बच्चों और बड़ों के बीच में एक स्पष्ट लकीर खींचती है। इस बाल साहित्य के जरिये श्री नरेंद्र श्रीवास्तव अपने अंदर के बच्चे को बचाने में सफल हुए हैं। इस अमूल्य लेखन के लिए नरेंद्र जी साधुवाद के पात्र हैं।

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पुस्तक का नाम -बारहमासी

लेखक -नरेंद्र श्रीवास्तव

प्रकाशक -पाथेय प्रकाशन जबलपुर

मूल्य -50 रूपये

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जमीन और आसमान कहीं नहीं मिलता नहीं ऐसा तो नहीं है दृष्टि के अंतिम बिन्दु क्षितिज में तो मिलता दिखता है लेकिन ये तो आभास है । क्या ये आभास है ? पृथ्वी की सीमा पार करने पर तो पूरी जमीन सहित पूरी पृथ्वी ही आसमान की गोद में खेलती दिखाई पड़ती है। तो क्या इस आभासी दुनिया से सत्य जानने के लिए सीमाओं को तोड़ना होता है ? क्या हमेशा सच को जानने के लिए सीमाओं को तोड़ना पड़ता है? और फिर हमेशा सच को जानना जरूरी है क्या ?

अर्थव! अर्थव! मैं तुम्हें कब से आवाज दे रहीं हूं और तुम कहां खोये हुए हो ? देखो कनस्तर खाली हो गया है पत्नी अपर्णा की बात सुनकर अर्थव का ध्यान अब आसमान से खाली कनस्तर पर आ गया था। ऐसा अक्सर होता रहता था। हालांकि अर्थव जानता था कि कनस्तर खाली है फिर भी उसने उसे एक बार अन्दर तक देखा।

अब अर्थव कनस्तर को भरने के लिए बाहर निकलता है। बाहर सड़क पर टहलते टहलते अर्थव फिर विचारों में गुम हो गया । उसके खराब आर्थिक हालात ने उसे एक अच्छी चीज भी दी थी। वो यह कि उसका नशा उससे दूर करा दिया था। लेकिन आज भी वो कभी कभी सिगरेट पी लिया करता था। सड़क पर ही उसने किनारे पर पान की दुकान देखकर सिगरेट लेने का मन बनाया और जेब में हाथ डाला लेकिन जीन्स की जेब में कुछ भी नहीं था फिर उसने आगे पीछे सभी जेबों को कई बार देखा की कहीं एक भी सिक्का निकल आये पर कुछ भी नहीं निकला । पहले अर्थव खाली जेब देखकर थोड़ा मायूस हुआ फिर थोड़ा खुश भी कि चलो जेब खाली है लेकिन जेब तो है। उसे उसी दिन पता चला कि संग्रह करने की क्षमता भी खुशी प्रदान करती है। अर्थव के पास बस उतना ही पैसा था जिसमें कनस्तर भर सके और वो उसे अपने शर्ट की ऊपर वाली जेब में संभालकर रखा था। ट्यूशन पढ़ाकर खुद का खर्चा तो निकल जाता था लेकिन अपर्णा से शादी के बाद से हालात बिगड़ गये थे। अपर्णा ने परिस्थितियों के सामने सरेन्डर कर दिया था कि वो कॉपरेटिव थी ये तो पता नहीं लेकिन वो अर्थव से कभी कोई मांग या अतिरिक्त चीजों के लिए नहीं कहती थी। अर्थव खुद भी चाहता था कि अपर्णा उससे जिद करे और बोले कि ‘‘मुझे वो वाला टॉप चाहिये’’ या ’’देखो पड़ोसी ने ये ले लिया है तुम कब लोगे?’’ या ‘‘आज शहर में एक्जीबिशन लगी है घूमने चलते हैं।’’ लेकिन अपर्णा कभी कुछ भी नहीं बोलती थी सिवाय खाली कनस्तर के और कभी अर्थव की भी हिम्मत नहीं हुयी अपर्णा से ये सब पूछने की।

खैर अब पान की दुकान में अर्थव को कुछ मोहल्ले के लोग सिगरेट पीने के साथ गप लड़ाते दिख गये तो अर्थव भी सिगरेट के कुछ कश मारने के उद्देश्य से उनके बीच जाकर वार्ता में शामिल हो गया । पान की दुकानों की वार्ता हमेशा ही दिलचस्प हुआ करतीं हैं। उसमें से एक व्यक्ति ने पूछा ‘‘ अरे यार अब इतनी गर्मी तो हो गयी बरसात कब आएगी’’ तो उसका जवाब सामने वाले अपने आंखों के ऊपर भौहों के समानांतर हथेली लगाकर दक्षिण दिशा की ओर आसमान देखते हुये दिया ‘‘ अब मानसून आ रहा है।’’ लेकिन इस वार्ता से अर्थव को सिगरेट की एक कश मिल चुकी थी और अब वो भरा कनस्टर लेकर घर की ओर चल दिया। और फिर सोच में डूब गया वो जानता था कि भूख मुख्य समस्या नहीं है क्यों कि कई बार ऐसे हालात आ चुके थे कि अर्थव कनस्टर भरने में असमर्थ रहा था और उस समय अपर्णा के कुछ दोस्त काम आये थे। समस्या ये थी कि अर्थव के द्वारा वो कनस्तर कैसे भरा जाए? और अर्थव के स्वभाव की भी अपनी समस्या थी कि वो जानता था कि जब भी वह इस कनस्तर को भरने के बारे में सोचने लगता है तो वो उन तमाम चीजों से दूर होने लगता है जिसको देखकर अपर्णा ने उसे कालेज में प्रेम करना शुरू किया था। इन्हीं तमाम उधेड़बुन में चलते चलते अर्थव अपने घर पहुंचा जहां अपर्णा को पहले से ही उम्मीद थी कि अर्थव वापस आने में इतना ही समय लगाएगा। दोनों का जीवन बहुत स्थिर सा था। सिवाय ट्यूशन पढ़ने वाले बच्चों के सिवाय किसी का आना जाना उसके घर में नहीं था।

अपर्णा के पास कुछ चमकीले पत्थर, बालू में मिलने वाले छोटे छोटे शंख और कागज के हाथ से बनाए हुए कुछ टॉप्स थे जो कि खुद अर्थव ने अपर्णा के लिए कालेज में बनाए थे और पत्थर व छोटे शंख भी अर्थव ने ही अपर्णा को दिए थे।  आज भी जब अर्थव को ऐसे चीजें सड़क पर या कहीं मिल जाती थीं तब वह उसे अपर्णा को लाकर दे देता था। कई बार तो रंगीन पत्थरों की तलाश में नदी के तट तक भी चला जाता था।

अपर्णा अपने मौजूदा हालात के लिए कभी भी अर्थव को जिम्मेदार नहीं ठहराती थी और न ही उन हालात के प्रति कभी भी असंतुष्टि जाहिर करती थी, लेकिन सामने रहने वाली विभा और बगल वाली स्नेहा बार-बार उसको उसके इन हालात का बोध करा जाती थीं। इसलिए कहीं न कहीं अपर्णा भी अब इस विषय पर सोचने लगी थी। लेकिन उसने कभी अर्थव से इस विषय पर कुछ नहीं कहा क्यों कि वह उसके स्वभाव को शुरू से जानती थी। उसने अपनी हालात की चर्चा अक्सर उसके जरूरत पर काम आने वाले दोस्त सुयश से की। सुयश एक कम्पनी में इवेन्ट मैनेजर था हालांकि वो खुद भी बस किसी तरह ही एक सम्मानजनक जीवन व्यतीत कर पा रहा था लेकिन उसने अपर्णा की मदद करने को बोला और अपने बॉस से बात की । उसके बॉस ने उसको इन्टरव्यू के लिए कॉल बुलाया। इन्टरव्यू पर आने के लिए फार्मल कपड़ों की व्यवस्था भी सुयश ने ही अपर्णा के लिए की,बॉस ने अपर्णा को बहुत गौर से देखा और बिना कोई खास प्रश्न किये ही बतौर रिसेप्शनिस्ट के तौर पर नियुक्त कर दिया। अपर्णा भी अपना काम बहुत मन लगाकर करने लगी बस कभी-कभी बॉस के कुछ ऐसे मजाकों से आहत हो जाती थी जो कि उसे पसन्द नहीं आते थे। ये बात वो सुयश से बताती थी, सुयश की भी हिम्मत कभी बॉस से बोलने की तो नहीं होती थी लेकिन वो कहता था कि अभी किसी तरह चलाओ फिर हम तुम दोनों कहीं और जॉब की जाएगी। मैं खुद भी यहां से परेशान हूं।

अब अपर्णा का ज्यादातर समय सुयश के साथ ही बीतता था और उसके घर के हालात भी पहले से बेहतर होने लगे थे। सुयश और अपर्णा ऑफिस में टिफिन साथ साथ करते थे। सुयश ने भी अब एक बेहतर जॉब अपने और अपर्णा के लिए खोज ली थी। बढ़ते हुयी दौड़-भाग को देखकर अपर्णा ने एक एक्टिवा खरीदी और बड़ी खुशी के साथ अथर्व को दिखाई । अथर्व भी उसको देखकर बहुत खुश हुआ लेकिन उसकी पहली सवारी के लिए जब अर्थव अपने शरीर को गतिशीलता देने ही वाला था कि अपर्णा सुयश को बैठाकर निकल गई। यह देखकर अथर्व कुछ देर सोचता रह गया फिर और फिर अपने जीवन में लग गया।

लेकिन अब घर में ज्यादातर बातें सुयश की होने लगी थीं। अथर्व भी देख रहा था कि अब उसके लाए गये पत्थरों व शंखों को संभालकर नहीं रखा जाता वे इधर-उधर बिखरे दिख जाते हैं। कभी भी अगल बगल के वातावरण और लोगों से प्रभावित न होने वाला अथर्व अब कहीं न कहीं अपनी तुलना सुयश से करने लगा और कभी-कभी देर रात से आने का कारण और ओवर वर्क करने का कारण अपर्णा से पूछ लेता था, जो कि वो इससे पहले कभी नहीं पूछा करता था। अब अथर्व को कहीं न कहीं ये बात महसूस होने लगी थी कि अपर्णा उसके प्रति उदासीन सी हो रही है। वो इसका कारण अपनी बेहद सीमित जरूरतों में भी खुश रहने को मानता था। इसलिए उसे लगने लगा कि अब उसे भी व्यवसायिकता की ओर बढ़ना चाहिए। अब वह अपने दोस्तों से मिलकर उनकी कोचिंग्स में पढ़ाने लगा तथा धीरे-धीरे व्यस्त रहने लगा। अब घर लौटने पर अपर्णा की मुलाकात बहुत कम अथर्व से हो पाती थी। अथर्व को भी अब इस व्यस्तता में आनन्द आने लगा था । अब उसका ध्यान भी नहीं जाता था कि उसके लाए गये पत्थर और शंख कहां रखे जाते हैं। और अब तो वह इन चीजों को लाना भी बन्द कर दिया था। उसे रंग-बिरंगे पत्थरों की तलाश में नदी तक गये कितना समय हो गया था, वो उसे खुद भी याद नहीं रहा। अब उसे सिर्फ और सिर्फ अपने व्यवसाय को प्रसारित करने की ही धुन सवार रहती थी। अब तो उसने खुद की एक कोचिंग भी खोल ली थी। अब न कभी अपर्णा के पास आफिस में अथर्व का ये पूछने के लिए कॉल आता कि ‘खाना खाया कि नहीं’ और न ही लौटने पर यह पूछा जाता कि ‘आज का दिन कैसा रहा?’ ये सब देखकर अपर्णा को भी लगने लगा कि अथर्व में अब अब काफी अन्तर आ गया है वो एक दिन ऑफिस न जाकर उसके लाए पत्थरों और शंखों को देखती रही । उसके कागज के बनाए टॉप्स को पहनकर उसके आने का इंतजार कर रही थी। अर्थव काफी देर के बाद घर लौटा और अपर्णा उसके पास उसके कागज के बनाए टॉप्स पहनकर गयी और पूछी कैसी लग रहीं हूं ? अथर्व ने भी जवाब दिया कि ‘हमेशा की तरह अच्छी लग रही हो।’ फिर अथर्व ने बोला अच्छा जल्दी से खाना खा लिया जाए निकलना है। तब अपर्णा ने बोला कि अरे कहां निकलना है आज हम आफिस नहीं गये हमने तो सोचा आज दोनों पूरा दिन साथ में बिताएंगे लेकिन तुम तो । अथर्व ने कहा नहीं फिर कभी अभी जाना है काम है।

तब अपर्णा बहुत गुस्सा हो गयी और बोली अरे अथर्व तुम्हें क्या हो गया मैं बहुत दिन देख रहीं हूं तुम अब पहले जैसे एकदम नहीं रहे जिससे मैंने शादी की थी। अर्थव कुछ नहीं बोला अपर्णा ने फिर जोर से बोला बताओ मैं तुम्हीं से पूछ रहीं हूं। तब अथर्व ने एक लंबी सांस ली और बस इतना बोला ‘‘क्यों कि अब क्षितिज नहीं दिखता’’। और कहते हुए चला गया।

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सक्षम द्विवेदी।

रिसर्च इन इण्डियन डायस्पोरा, महात्मा गांधी इण्टरनेशनल हिन्दी यूनिवर्सिटी,महाराष्ट्र।

सम्पर्क : 20 नया कटरा दिलकुशा पार्क इलाहाबाद।

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‘ लो पहन लो बहू !’ सासू माँ की सीलन भरी आवाज़ सुन मुड़ी, तो देखा !

वह अपने हाथों में बेरंग जीवन लिए खड़ी थीं। कैसे बताऊँ कि जीवन में रंग तो अब आया है , पर वो तो माँ थीं !

निकेत अब इस दुनिया में नहीं है। मुझे इस बात का डर कब से था पर नियति के आगे तो हम सभी विवश होते हैं।

आज भी वो पल आँखों के सामने छपाक –छपाक कर तैर रहे हैं। संगम में नहाते हुए निकेत ने किनारे पर बैठी मेरी डरी -सहमी एक जोड़ी आँखों की भाषा समझ यही कहा था - ‘ डरो मत , डूबूँगा नहीं , तुम्हारी आँखों में डूब - डूब कर तैरना जो सीख लिया है। ’ शरमाते –शरमाते बस मैं इतना बोल पायी थी , ‘चढ़ गयी है ज्यादा क्या ?’

सच भी यही था, जिससे मैं भाग भी नहीं सकती थी। कहते हैं , स्वीकार में हल छुपा होता है।

कई –कई बीत जाते दिन निकेत के प्यार भरे बोलों को तरस जाती थी ,कितनी पथरीली शामें चुभीं हैं अभी तक, ज़ेहन में। कितने सपनों का क़त्ल किया था तुमने निकेत ?

कोलोनी पार्क के पास बेहोश मिले थे तुम। ‘ओवरडोज़ ....’ बाबूजी बस इतना ही बोल पाये थे। मेरी सारी इच्छाओं,आशाओं को जैसे लकवा मार गया था उस दिन। किसको दोष देती, किसे कोसती ?आँख नहीं मिला पा रहे थे हम सभी किसी से। माँ ,बाबूजी तो जैसे जड़ ही होते जा रहे थे। थक चुके थे क्या करते भला ?दवा,दुआ ,प्यार ,मनुहार ,फटकार,दुत्कार के फूलों-पत्थरों को फेंकते –फेंकते मन की हथेलियों को मानो पक्षाघात हो गया था।

जानते हो ! दिया लेकर ढूँढा था पिता जी ने ये रिश्ता। खुश होती हुई अम्मा कितनी बार ,यही वाक्य दोहराती थीं। अम्मा, पिताजी के चेहरे की आलतायी तरंगें तुमसे थीं। तुम्हें पाकर जैसे दूसरा बेटा पा लिया था उन्होंने। गौर वर्ण ,सहज ,आकर्षक व्यक्तित्व। इन सात सालों में मुश्किल से तीन-चार बार वो लोग तुमसे मिले होंगे। पर मैं उन्हें रोज उसी निकेत से मिलाती रही, जिसे उन्होंने सगाई वाले दिन देखा था। यही सब सोच कि उन्हें यह जानकर कष्ट होगा , कभी अपने दुखों की आँच को उन तक नहीं पहुँचने दिया।

मुझे भी कहाँ भूल पाया है वो सगाई वाला निकेत। झुकी, शरमाई आँखें ,सहज व्यवहार। मैं तो मिट ही गयी थी, पहली नज़र में। पर वो संतुलित क्षणबीज , कितने असंतुलित पलों की क्यारियाँ सजा रहे थे क्या पता था ?

याद है जिस दिन मैंने पहली बार वाईन की बोतल तुम्हारे कार में देखी थी ! ‘बस कभी -कभार ले लेता हूँ ,पार्टी -शार्टी में यार ! क्यों चौंक रही हो इतना ,तुमसे ज्यादा नशा शराब में नहीं है, और क्या कमी कर रखी हैं मैंने, ठाट -बाट में तुम्हारे। ’ कहकर मुझे चुप करा दिया था तुमने।

दुःख होता है। काश! उस दिन चिल्ला- चिल्लाकर सब बता देती, दोनों घरों की दीवारों और आँगन को। पर नहीं ,नहीं था इतना साहस। एक मर्यादित रिश्ते को तार - तार करने का। नहीं थी इतनी विद्रोही कि त्याग देती तुम्हें। नही थी इतनी समर्थ की चली जाती अकेले मायके। कि लो ! लौट आई तुम्हारे घर की शान ,उतारो आरती !बँटवा दो पूरे मुहल्ले में रेवड़ियाँ ! छुपा लो अपना दमकता चेहरा समाज से !

बस जिस पल बोलना था मन और जुबान ने साथ नहीं दिया। मुकर गए सभी, नियति की घुड़की से। अपने ही अस्तित्व से इतना अजनबीपन ,शरीर और संवेदना दोनों स्तरों पर। काश ! तुम जान पाते निकेत , एक लड़की बचपन से जब भी भावुक पलों को जीती है, उन सपनों में उसका एक राजकुमार भी शामिल होता है। गुड्डे से लेकर राजकुमार को खोजने की लम्बी काल्पनिक यात्रा, मेरे भी मन ने की थी , पर उस यथार्थ के निशान अम्मा के माथे और पिताजी के तलवों पर पड़े थे। कितने रिश्तों को दरकिनार कर तुम चुने गए थे।

‘राजयोग पड़ा है तेरी कुंडली में। देख ! कैसा लड़का ढूँढ निकाला हमने और जीजा जी ने मिलकर, अपनी प्यारी भांजी के लिए ’ मामा की आवाज़ आज भी कानों में गूंजती है। अच्छा हुआ यह सब देखने से पहले ही मामा ....।

मैं आज तक नहीं समझ पायी कि नशे में ऐसा क्या है, जो अपनों से बेहतर होता है। लानत है ऐसी सुरसा प्यास पर, जो जीवन-सरिता को मरुस्थल बना दे ! एक आभासी संसार रचकर उसे जीते जाना ,ज़िन्दगी है भला ? अपनेपन की मिठास का सुख, चेतना से ही प्राप्त होता है।

शराब की एक - एक बूँद तुम्हारे साँसों की लय को तोड़ रही थी निकेत। काश तुम ये समझ पाते ! मेरी उम्मीदों के साथ, कितनी उम्मीदें जुड़ी थीं। सपनों के कितने गुलदस्ते ,तुम्हारे नशे की सावनी फुहारों से मुरझा गये,

जीवन की विडम्बना नहीं तो और क्या बोलूँ इसे ? तुम्हारे पाँव में प्लास्टर था, तेज बुखार से सारा शरीर तप रहा था और ऊपर से तुम्हारी जिद .....रात के नौ बजे, हाँ ! अकेले बाज़ार, वो भी शराब लाने। मैं अकेली,लोग क्या कहेंगे, पति के लिए शराब लेने आयी है या ....सारी आशंकाओं के बावज़ूद उठ गए थे मेरे कदम। ले आई थी उस रात ज़हर की बोतल। भूल पाऊँगी कभी निकेत ? जिस बेटी को बाप ने शराब शब्द बोलने पर कभी चाटा मारा था, वही बेटी शराब की बोतल खरीद कर ले आयी। सुन लेते तो, घटश्राद्ध कर देते अपना। ना ही याद आयें वो पल तो ठीक है......।

धीरे-धीरे एक समय ऐसा भी आया, जब मैं तुम्हें, तुम्हारे उसी रूप में स्वीकार चुकी थी। जैसे तुम थे। और मैं इस बात से खुश हो जाती थी कि, तुम शराब पीकर घर आये हो। कितना प्यार बरस जाता था सावन-भादों - सा। दरवाजा खोलते ही निकेत मुझे बाहों में भर लेते। मेरे घने लम्बे बालों को, जिन्हें पूरे होशोहवाश में , कभी कैंची से कुतर दिए थे। वही कुतरे बाल नशे में धुत होते ही लहराती नागिन लगने लगते निकेत को , उन्हीं पर शायरियाँ भी कहने लगते। सूख चुके पपड़ाये होंठों को गुलाब की पंखुडियां और बेतरतीब - सी बंधी साधारण कॉटन साड़ी में भी, मैं निकेत को ‘इज़ाज़त’ और ‘घर’ वाली रेखा ही नज़र आने लगती।

जब निकेत होश में होते तो सजने का मतलब क्या ?और जब नशे में होते, तो बिना सजे भी , मैं उन्हें कातिलाना ही लगती।

जीवन की इन्हीं विडम्बनाओं ने सिकोड़ दिया था मुझे। मैं सजना भूल चुकी थी। अब तो बस शाम को निकेत के लड़खड़ाते क़दमों की आहट ही मेरे गृहसुख का पर्याय थी। इसी को मैंने जीवन का सच मान, स्वीकार लिया था।

मेरी उबड़ -खाबड़ नींदों ने दिव्यांग स्वप्नों को ही ,ऊँची -लम्बी कूद करने की इज़ाजत दे दी थी। अब तो निकेत जितनी देर नशे के आगोश में रहते ,समय और जीवन दोनों शान से चलते। सुबह चढ़ते सूरज के साथ, निकेत का ढलता नशा कहर ढाता था। चीखना, चिल्लाना ,बर्तनों की तोड़ –फोड़ उफ़्फ़ ! कभी -कभी जी में आता शराब में ही चाय की पत्ती , चीनी उबालकर पिला दूँ।

‘बोलो आज क्या चाहिए ,आज जो भी बोलोगी दे दूँगा मेरी जान। ’ मैं गुस्से से बोल पड़ी थी – ‘ज़हर पिला दो मुझे !’मेरी आँखों में उतर आये कुहासे को अपने हाथों से साफ़ करते हुए निकेत ने मेरे गालों पर हलकी - सी चपत देते हुए कहा था -‘चुप कर पगली ! तुझसे पहले मैं ना खा लूँ ज़हर। आज के बाद फिर कभी ऐसा मत बोलना। मैं तुम्हारे रेशमी एहसासों के बिना जी पाऊँगा क्या ?’

‘तो फिर ये पीना बंद कर दो। ’ मेरी ऐसी हिदायत सुनकर बोलते –‘मुझे छोड़कर ये शराब नहीं जी पायेगी मेरी जान !’ और ऐसा कहते हुए निकेत के लड़खड़ाते ठहाके, पूरे घर में गिरने -सँभलने लगते।

इन्हीं पतझड़ पलों को समेटती हुई जी रही थी, निकेत के साथ। ऐसा लगता था मानो दुःख की गीली ज़मीन पर कोई आग रख जाता है रोज ,जिनमें भभक कर ना जाने कितने अंकुरित स्वप्न ,प्रश्न और इच्छाएँ भस्म हो जातीं थीं। माँ अक्सर दुआओं की लम्बी फेहरिस्त भेजतीं रहती थीं। तिनका -तिनका विलीन होता सुख उन्हें कहाँ सम्हाल पाता भला ?

और एक दिन जब भैया ने पिताजी को बताया कि निकेत बहुत पीने लगा है, तो उन पर तो जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा।

भैया ने समझाया भी की कोई बात नहीं, लिमिट में रहकर पिए तो क्या बुरा ? पर लाख समझाने के बावजूद .....पिताजी अब पहले वाले पिताजी कहाँ रहे थे ? अपराधबोध की जो तख्ती उन्होंने अपने गले लटका ली थी पीड़ादायक थी। आज भी नहीं जानती कि भैया को निकेत के पीने की बात कहाँ से पता चली। पर ये जान गयी कि नियति हवाओं से भी अपना काम निकलवा लेती है।

अब तो पिताजी और भैया मुझे लेकर अक्सर आपस में उलझ जाते, ‘कमाता तो है ना पिताजी ,अब ये तो सुविधि के ऊपर है कि कैसे उसे पीने से रोक पाती है ! पत्नी अगर चाहे तो ........हुंह दिन भर बेटी का रोना लिए बैठना कहाँ तक उचित है ? नहीं निभ रही , तो अलग हो जाये। आये दिन का स्यापा ख़त्म। ’

मुझे याद है ! मायके में जब भी भैया और भाभी मेरी नरक होती ज़िन्दगी के गुणा - गणित में उलझते तो दादी अक्सर वो दर्दभरा लोकगीत गुनगुनाने लगतीं - “माता के रोये से नदिया बहत है ,बाबुल के रोये सागर पार , भैया के रोये से टूका भिजत है, भौजी के दुई –दुई आँस.......।

बेटी के लिए अपने ही घर में भावों और आँसुओं का ऐसा बँटवारा .....! सुनकर ,झीने चादर -सा मन निचुड़ जाता।

‘एक बच्चा हो जायेगा तो सब सही हो जायेगा। ’ लोगों की ऐसी बातें सुनकर गठिया लेती। आखिरकार ! ढेर सारी गांठों ने मेरे संकल्पों की चादर को फटने पर मजबूर कर दिया।

अविक को मेरे आँचल में आये पाँच साल हो गया था , पर पुत्रमोह भी निकेत को उसके संकल्पों से ना डिगा सका।

“भला बताओ कैसे दूँ ये ज़हर ,अपने हाथों से तुम्हें निकेत ?सिर्फ़ इसलिए कि मुझे अपने प्यार भरे सार्थक पल चाहिए। नहीं –नहीं ! मैं इतनी स्वार्थी नही हो सकती। तुमसे मिली उपेक्षा ,झिड़कियां भी तो प्यार ही हैं मेरे लिए !”

2 अप्रैल , अविक का जन्मदिन ,बहुत संतुलित कदमों और आवाज़ों को बुलाया था। चैत्र नवरात्रि चल रहा था ,पूरे दिन निकेत के लड़खड़ाते क़दमों की प्रार्थना की। भगवान ने सुन ली, नशे में बहके निकेत के संग पूरी पार्टी कब बीत गयी, पता ही ना चला। अब तो मुझे नशे में डूबे निकेत की आदत हो गयी थी। संवेदनाओं का अथाह सागर था मेरे पास , जिसमें मैं गोते लगाती रहती थी। मन बुद्धू -सा महसूसता, मानो दुनिया का सबसे अच्छा पति भगवान ने मेरी ही कुंडली के सप्तम भाव में डाल दिया है।

‘तो क्या और कोई उपाय नहीं बचा ?’ बाबू जी ने डॉक्टर साहब से यह पूछते हुए थूक को सूखते हलक से नीचे उतारा। ‘पूरे शरीर को ख़त्म कर रहा है धीरे –धीरे ये ज़हर ..’ बुदबुदाते हुए बाबू जी कमरे से बाहर चले गए थे। और निकेत की मुखाग्नि के बाद से आज तक , हम दोनों एक- दूसरे के सामने जाने की हिम्मत नही जुटा पाये।

कैसे बताती उन्हें कि मैंने मार डाला उनके बेटे को ! क्या कोई औरत इतनी क्रूर भी हो सकती है ? आज मैं खुद से भी तो यही सवाल करती हूँ ! सिर्फ़ सुकून के दो पल और निकेत का प्यार, यही पाना था ना मुझे, बस....!

बिना नशे के निकेत की वहशियाना हरकतें अपनी हदें पार कर जातीं थीं। जो भी थोड़ा -बहुत सुख सहेजा, वो तो नशे में बहके हुए निकेत से मिला उपहार था। और मैं अभिशप्ता, अपने जीवन -अलाव को गर्म रखने की चाह में ,छाँव उपजाने वाली टहनियों को ही झुलसाये जा रही थी।

मेरे पूरे शरीर पर निकेत के हैवानियत की कितनी तूलिकाएं सजी हुई हैं। और उस दिन तो निकेत ने मुझे कुलटा ही करार दे दिया ,जिस दिन अविक ने उनकी गोद में जाने से मना कर ,हमारे यहाँ किराये पर रहने वाले भाई साहब के साथ पार्क में चला गया था। बार –बार पिघलते काँच सरीखे निकेत के वो अपमानजनक शब्द – ‘मुझे तो यकीन ही नहीं होता कि ये मेरा बेटा है सुविधि ....’ मुझे भावशून्य बना गए ,मैं स्तब्ध थी। कुछ भी ना बोल सकी। मानो मेरे चिंतन से उत्पन्न नवजात शब्द, ज़ुबान तक आते - आते आत्मघात कर ले रहे हों।

कैसे बताती , अविक के स्कूल में लोकल गार्जियन भाई साहब ही हैं। जी में तो आया था ,चीख- चीख कर सारा नशा उतार दूँ उसी पल, निकेत का। पर घर –परिवार को सोच, चुप रह गयी थी .....मन में तो आया था बता दूँ ,कि जब तुम नशे के आगोश में समा चुके होते हो और अचानक घर में किसी की तबीयत ख़राब हो जाती है तब। सिलिंडर बदलना हो तब। तुम्हारी लड़ी –भिड़ी गाड़ी पार्क करनी हो तब। बाबू जी की डायलेसिस करानी हो तब .... और ना जाने कितनी-कितनी जिम्मेदारियाँ ....सब भाई साहब ही करते हैं। कहने भर को उनके परिवार नहीं है बस्स ! तुम्हारे शराबीपने ने उन्हें भी परिवार, उपहार में दे दिया है। और तो और अविक, एक शराबी बाप का बेटा होने की कितनी बड़ी सजा काट रहा है। काश ! तुम ये बातें समझ पाते निकेत !

एक औरत को शराब के नशे में धुत पाकर ,एक पति कब का तिलांजलि दे देता उसे, पर ये तो हमारे संकल्पों की गहरी नीवों ने मुझे अब तक टिकाये रखा है।

बस इन्ही मनहूस लम्हों के साये से खुद को ,अविक को बचाते- बचाते मैंने, तुम्हे हमेशा के लिए खो दिया निकेत !

मुझे माफ़ कर देना ! क्या करती, हमारे शादी की सालगिरह थी उसदिन। मैं तुम्हारे साथ अपने खूबसूरत पलों को जी लेना चाहती थी। क्या कहूँ ! मेरे जीवन की विडम्बना ....काश ! उस दिन तुम्हारा वालेट ना चोरी हुआ होता ! तुम आये भी तो, घर में तूफ़ान लेकर। मेहमानों ने आना शुरू भी कर दिया था। मैं तुमसे चुप होने की भीख माँगती रही। भैया –भाभी,बुआ सारे रिश्तेदारों के सामने बस अपने माँ -बाप की इज्ज़त बचाना चाहती थी। डॉक्टर के लाख मना करने के बावज़ूद मैंने पूरी बोतल तुम्हारे सामने रख दी। पता था, एक भी बूँद शराब की , कभी भी जहर बन सकती थी तुम्हारे लिए। कैसे कहती सबसे ,तुम्हारे लड़खड़ाते कदमों से ही मेरे संतुलित जीवन का राग जन्म लेता है। और हाँ ! मेरे स्वार्थी मन ने जी लिया उन पलों को, उस दिन।

जब तुम मुझे पहली बार इस घर में लाये थे तो मुझसे कहा था – “ मरते दम तक तुम्हे रानी बना के रखूँगा, और तुमने किया भी वही ! जी भर के सभी रिश्तेदारों के सामने मेरी तारीफ़ की। भाभी और बुआ जी का चेहरा तो देखते बन रहा था। बुआ जी तो भाँप भी ना पायीं कि तुमने पी रखी है। जाते –जाते सभी आशीर्वाद की भारी –भारी गठरियाँ भी गिरा गए। पर मेरी नियति के कमज़ोर कंधे उसे उठाने में समर्थ कहाँ थे निकेत ? चंद पलों में तुमने मुझे जीवन का वो सुख दे दिया,जिसकी शायद मैं पूरी तरह से हक़दार थी भी या नहीं !

जानते हो निकेत ! आज भाई साहेब भी कमरा छोड़कर जा रहे हैं, तुम्हारे शान्तिपाठ तक रुकेंगे बस।

क्यों ? ये प्रश्न पूछने का साहस नहीं मुझमें,किरायेदार हैं कहीं भी जा सकते हैं अपनी सुविधा से। पर उनकी पवित्र और निर्दोष आँखों में तुम्हारे लिए कोई शिकायत नहीं है। अविक को नहीं बताया है ,पूरा घर सिर पर उठा लेगा। बाबूजी बिलकुल शांत हैं,अंतिम महीने का किराया भी नहीं लिया भाई साहेब से, उन्होंने। ‘अविक के लिए दे रहा हूँ, रख लीजिये कहकर’ , मुझे देकर चले गये।

तुम तो चले ही गए थे निकेत और आज भाई साहब भी जा रहे हैं। एक –एक कर सबको जाना है...... रीचेबल ....नॉट रीचेबल। बस यही फर्क रहता है। एक अनकहा खालीपन रहेगा यहाँ। यादों की ना जाने कितनी बेतरतीब कहानियाँ रोज यूँ ही लिखती रहूँगी, पर भेज कहाँ पाऊँगी ? एक बात बोलूँ निकेत ! तुम्हारे जाने के बाद का सन्नाटा अंतिम सत्य की बुझ चुकी अनलशिखा से भी ज्यादा भयावह लगता है। और शोर से तो जैसे प्यार ही हो गया है अब। जीवन को स्वीकार ,आत्मसात करना पड़ता है, नये संकल्प -विकल्प तलाशने पड़ते हैं। बहुत कुछ है तुम्हारा दिया हुआ निकेत। चाहे शोर था या सन्नाटा सब स्वीकार है।

हुम् ....हरे रंग की कांजीवरम में देखना चाहते थे ना, मुझे तुम ! ये जानते हुए कि मुझे हरा रंग पसंद नहीं। सालगिरह वाले दिन भी मैं तुम्हारे वादे को पूरा ना कर सकी।

और आज एक अशान्त मन लिए तुम्हारे शान्तिपाठ में जाना है। जी में आता है आज तुम्हारे पसंद का रंग पहनूँ ......पर !

अचानक ! मैंने देखा कि अविक के नन्हे कदम हाथों में पार्सल लिए हुए मेरे कमरे की तरफ आ रहे थे। अविक के हाथों से पार्सल लेते हुए, माँ जी बस इतना बोल सकीं , ‘ निकेत ने ऑनलाइन ऑर्डर किया था बहू , तुम्हारे लिए........ हरी कांजीवरम ! ........ पर तुम्हे तो हरा रंग ....’। माँ जी की कंपकपाती आवाज़ को, बीच में ही काटते हुए मैं बोल पड़ी – ‘अब पसंद है माँ जी !’

पलट कर देख रही हूँ तो बिस्तर पर निकेत के पसंद की हरी कांजीवरम रखी हुई है। अविक के नन्हे –नन्हे हाथ उसकी परतें खोल रहे हैं।

‘ तुम परेशान मत होना बेटा ,हरे रंग का ब्लाउज रखा है मेरे पास, लाती हूँ अभी ..........................!’

यह कहते हुए, माँ सफ़ेद साड़ी को अपने हाथों में लिए , मेरे कमरे से बाहर चली गयीं।

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अमरपाल सिंह ‘ आयुष्कर'

जन्म :    1  मार्च

ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर - प्रदेश

दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में रचनाएँ प्रकाशित

2001  में बालकन जी बारी संस्था  द्वारा राष्ट्रीय  युवा कवि पुरस्कार

2003   में बालकन जी बारी संस्था   द्वारा बाल -प्रतिभा सम्मान

आकाशवाणी इलाहाबाद  से कविता , कहानी प्रसारित

परिनिर्णय ’  कविता शलभ संस्था इलाहाबाद  द्वारा चयन

mail- singh.amarpal101@gmail.com

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फूलों की बड़ी पूछ है। जिसे देखिए फूलों पर आसक्त है। फूल लगा देखा नहीं तोड़ने को जी चाहता है। उनमें महक और रंग है। दूर से ही देख, सूँघ लिया जाता है। पास जाएं तो उनकी कोमल पंखुड़ियां रिझाने लगती हैं। फूलों का आकर्षण हमें मोह लेता है। स्त्रियाँ अपने जुड़े में फूल लगाती हैं। पुरुष अपने बटन-होल में उसे खोंस लेते हैं। कोई दुष्ट ही होगा जो उन्हें पैरों से कुचल दे। फूलों से गले का हार बनता है। फूलों के गुच्छे से मेहमान का स्वागत होता है। फूलों की खूबसूरती ही उनके लिए अभिशाप है। अक्सर तो बेचारे पूरा खिल भी नहीं पाते, कलियाँ ही तोड़ ली जाती हैं। यादगार के लिए किसी किसी फूल को तो किताबों के बीच दबा कर रख लिया जाता है। वहीं दबे दबे वह दम तोड़ देता है।

फूल के सामने खादी के रूमाल की भला क्या बिसात ! हाँ गांधी जी के ज़माने में पहली बार और शायद आखिरी बार, खादी का रुतबा ज़रूर बढ़ गया था। लोग खादी कातते थे, खादी पहनते थे, खादी उपहार में देते थे। खादी का कोई वस्त्र देकर, वस्त्र नहीं तो खादी का एक रूमाल ही देकर, मेहमान का स्वागत करते थे। लेकिन खादी भले ही स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व जैसे मूल्यों की वाहक रही हो, है तो आखिर खुरदरी ही। धीरे धीरे वह चुभने लगी। उसका अवमूल्यन होने लगा। वह व्यंग्य की परिभाषा बन गई। व्यंग्य सम्राट हरिशंकर परसाई ने सबसे पहले व्यंग्य को खादी की सहायता से परिभाषित करते हुए कहा था – व्यंग्य बेशक खादी की तरह चुभता तो है पर गरमी देता है। व्यंग्य जीत गया। खादी हार गई|

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कितने लोग हैं जिन्हें पुस्तकों से प्यार है ? गिने-चुने। विद्यार्थी अपने पाठ्यक्रम की पुस्तकें पढ़ लें वही बहुत है। सिर्फ पढ़ने की खातिर भला किताब कौन पढ़ता है ? बिरले ही होंगे। अमीर लोग दूसरों पर बौद्धिक होने का अपना रोब झाड़ने के लिए बड़े बड़े लेखकों की पुस्तकें अपनी अलमारियों में सजावट के लिए रखते हैं। पुस्तकें या सजाई जाती हैं या रद्दी में बेंच दी जाती हैं। एक समय था जब कुछ पुस्तक-प्रेमी पुस्तकों को अपने मित्रों को उपहार स्वरूप भेंट किया करते थे। शादी विवाह में भी उन्हें अक्सर भेंट किया जाता था। लेकिन जैसे जैसे हमारे समाज में पैसे का वर्चस्व बढ़ा है उपहार स्वरूप किताबों को भेंट करना समाप्त सा ही हो गया है। भेट के लिए किताबों की हैसियत अब फर्श पर आ गई है।

स्कूल के दिनों में मेरी गणित बहुत कमज़ोर थी। एलसीएम और जीसीएफ के सवाल कभी समझ ही में न आए। जीसीएफ – यानी ‘ग्रेटेस्ट कॉमन फेक्टर’। क्या आप बता सकते हैं कि फूल, खादी का रूमाल और पुस्तक - इन तीनों का जीसीएफ क्या है ? वो कौन सी एक बड़ी बात है जो इन तीनों में समान है ? बात गणित की नहीं है, राजनीति और समाज शास्त्र की है। ऊपरी तौर से तो ऐसा कोई समान तत्व नज़र नहीं आता। लेकिन ज़रा गहराई से देखें तो पता चलता है कि तीनों में एक बात जो समान है वह यह है कि ये तीनों ही उपहार की वस्तुएं हैं और रही हैं जिन्हें किसी के भी स्वागत हेतु भेंट किया जाता/ जा सकता है।

इस सन्दर्भ में फूलों का रुतबा आज भी सबसे अधिक है। हम आज भी अधिकतर फूलों से ही लोगों का स्वागत करते हैं, अभिनन्दन करते हैं, फूलों की माला और उन्हें पुष्प गुच्छ भेंट करते हैं। खादी के रूमाल की यह हैसियत कभी नहीं रही। इसकी पूछ तो बस गांधी जी के समय ही थी। इस मामले में तो खादी का रूमाल आज बेकवर्ड क्लास में आ गया है। किताबें अलबत्ता कभी कभी उपहार स्वरूप भेंट की तो जाती हैं, लेकिन भेंट करने वाला हमेशा एक अहसास ए कमतर से ग्रस्त हो जाता है।

क्या आप इस भेदभाव को हमेशा के लिए जारी रखना चाहेंगे ? हमारे प्रधान मंत्री तो यह कतई नहीं चाहते। वे फूलों को भी, सुन्दरता के कारण जो उनकी दुर्दशा हो रही है, उससे बचाना चाहते हैं और खादी के रूमाल को भी वही सम्मान देना चाहते हैं जो कभी भारत के स्वतंत्रता-संग्राम के समय उसका रहा था। वे पुस्तक प्रेमी होने के नाते पुस्तकों का उपहार भी अनदेखा नहीं कर पाते हैं। अत: उनका आदेशात्मक निवेदन है कि उनका स्वागत ‘बुके’ से न किया जाए ‘बुक’ से किया जाए। फूलों को रौंधा न जाए और पुस्तकों का सम्मान किया जाए। वैसे स्वागत और सम्मान के लिए तो खादी का एक रूमाल ही भेंट में काफी है जो हमें स्वतंत्रता, समानता, और भ्रातृत्व के मूल्यों की कद्र का अहसास कराता है। उसी को भेंट कर स्वागत किया जा सकता है। करना भी चाहिए। लेकिन हमारी भी जिद तो देखिए। इतनी मशक्कत के बाद भी प्रधान मंत्री जी के एक मित्र ने उनका अभिनन्दन एक ‘बुके’ से ही किया। बेचारे क्या करते ? उन्हें उसे विनम्रता-पूर्वक स्वीकार करना ही पडा ! लेकिन क्या हम अपनी जिद पर काबू नहीं पा सकते ?


- डा. सुरेन्द्र वर्मा ( मो. ९६२१२२७७८)

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