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‎प्रेमजाल / कहानी / सतीश कुमार त्रिपाठी
‎प्रेमजाल / कहानी / सतीश कुमार त्रिपाठी

उसका आईने में खुद को निहारना और मेरा चोरी चोरी उसे निहारना प्रतिदिन की बात थी। उसके मन में मेरे प्र...

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व्यंग्य राग (6) रेवड़ियां बंट रही हैं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा
व्यंग्य राग (6) रेवड़ियां बंट रही हैं / डॉ. सुरेन्द्र वर्मा

रेवड़ियां बंट रही हैं. सामान्यत: जिसके पास रेवड़ियां होती हैं वह उन्हें बांटता नहीं फिरता. अंधा हो तो...

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व्यंग्य राग (५) लौटा दो – जल्दी करो / डा. सुरेन्द्र वर्मा
व्यंग्य राग (५) लौटा दो – जल्दी करो / डा. सुरेन्द्र वर्मा

वह सवेरे सवेरे आ धमके | बोले, लौटाया या नहीं, जल्दी करो, वरना बाद में पछताओगे, कहे देता हूँ | मैंने...

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व्यंग्य राग (४) सर्वर डाउन है / डा. सुरेन्द्र वर्मा
व्यंग्य राग (४) सर्वर डाउन है / डा. सुरेन्द्र वर्मा

अपनी बारी के इतजार में मैं एक लम्बी कतार में खडा था | मैंने खिड़की से गिनना शुरू किया, एक दो तीन चार...

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कलम के कोतवाल / व्यंग्य / शशिकांत सिंह 'शशि'
कलम के कोतवाल / व्यंग्य / शशिकांत सिंह 'शशि'

साहित्य में जहां सिपाही, मजदूर, संत, वकील आदि पाये जाते रहे हैं वहीं कोतवलों की संख्या भी अच्छी-खास...

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बकाया काम ही देते हैं तनाव और दुःख - डॉ. दीपक आचार्य
बकाया काम ही देते हैं तनाव और दुःख - डॉ. दीपक आचार्य

94133306077 www.drdeepakacharya.com इंसान के संसार के समस्त दुःखों और तनावों का मूल कारण जानने की ...

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