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लॉ स्टेटस

गांधी जी ने कहा था कि हम स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे खिड़की खुले रखें, पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें। मैंने गांधी जी की ‘पर’ से पहले की बात को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है और ‘पर’ के बाद भी बाद का अर्थ नहीं समझ पाने के कारण उस पर गौर करना ठीक नहीं समझा।

बुनियाद क्या होती है, मैं नहीं जानता और ना ही मुझे इससे कोई विशेष मतलब ही है। मैं नित नया टीवी और अखबारों से सीखता हूँ। मार्केट में कौन सा पेस्ट आ रहा है जो मेरे दांतों को मोती जैसा चमकाएगा, मुंह की दुर्गंध हटाएगा और मसूड़ों को सुरक्षित रखेगा। यह विज्ञापन में आने वाले डॉक्टर साहब मुझे बताते हैं।

सुन्दर सी छरहरे बदन वाली गोरी युवती मुझे यह बताती है कि मुझे कौन सा साबुन यूज करना है। कौन सा साबुन मुझे पसीने की बदबू से बचाएगा, शरीर को तरोताजा रखेगा। कीटाणुओं से रक्षा करेगा। मुझे साबुन से ज्यादा विज्ञापन देखना पसंद है। विज्ञापन में आने वाली युवतियों की मनमोहक अदाएं बरबस ही मुझे उनकी बात मानने पर मजबूर कर देती है। यह सब मानना स्वस्थ्य सांस्कृतिक प्रभाव के लिए आवश्यक है।  

जब भी मैं कोई विज्ञापन देखता हूँ, पूरी तरह से अपने दिमाग के खिड़की दरवाजे खोल देता हूँ। दिमाग में पहले से भरे हुए बासी ज्ञान को मैं अपने नए सामान्य ज्ञान पर हावी होने नहीं देता। कभी-कभी मेरा दिमाग नए ज्ञान का थोड़ा बहुत प्रतिवाद करता है तो मेरी पत्नी और मेरा बेटा मुझे ऐसी गलती करने से रोक देते हैं। वे कहते हैं कि अपने दकियानूसी विचारों से घर का माहौल खराब नहीं करूं।

मैं तुरन्त अपने में सुधार कर लेता हूं और दिल और दिमाग के दरवाजे पूरी तरह खोल देता हूूं। इससे दिमाग के साथ-साथ घर में भी ताजी हवा का प्रवेश हो जाता है। जिसका परिणाम होता है वातावरण में हमेशा ताजगी बने रहना।

शरीर को पवित्र बनाए रखने के लिए गंगाजल से बना साबुन भी मार्केट में उपलब्ध है। यह साबुन बनाने का कारखाना गंगा नदी से कितनी कोस दूर है, इसमें गंगाजल कैसे मिश्रित हुआ, यह सब जानने की बिना जहमत उठाए, मैं अपने शरीर को भी गाहे-बगाहे, गंगाजल से पवित्र करता रहता हूँ।

मैं उन लोगों में से नहीं हूं और जो हर खाद्य पदार्थ से, हर पेय से, धुंआ देने वाले पदार्थों सहित हर ऐसी वस्तु से, अपने आपको अलग रखते हैं, जिन्हें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताया जाता है। मैं ‘मात्र स्वास्थ्य’ को प्राप्त करने के लिए स्वयं को इन सबके आनन्द से वंचित रखना मूर्खता समझता हूँ।

मुझे क्या करना है, इसके लिए मैं अपने दिमाग पर जोर नहीं डालता। मेरा मानना है कि इतने अनुसंधान करने के बाद जिस वस्तु को तैयार किया गया है, निश्चित रूप से वह उपभोग के लिए है, आनन्द के लिए है। मैंने पूरी तरह बौद्धिक दासता को स्वीकार कर लिया है। जैसा मुझे विज्ञापन बताते हैं उसे हूबहू स्वीकार कर लेता हूँ। टीवी पर आने वाले सीरीयलों के पात्र कैसे कपड़े पहन रहे हैं, घर की सजावट कैसी है, रात को पार्टियों में क्या होता है। किस ब्राण्ड की कौनसी चीज इस्तेमाल करते हैं। यह सब देखकर ही मेरे घर की खरीददारी होती है। अनुकरण की संस्कृति से जितना फायदा उतना किसी में नहीं। जितना दिमाग लगाना था, उतना वे लोग लगाते थे। हम बेवकूफ नहीं हैं जो अपना दिमाग खपाएं।

इस सबका परिणाम है कि मुझे और मेरे परिवार को मॉडर्न समझे जाना। मैं अपनी सोसायटी में मॉर्डन समझा जाता हूँ। मैंने अपने नातेरिश्तेदारों के यहां जो मेरे स्टेटस के नहीं है, लॉ स्टेटस के हैं, के घर जाना बंद कर दिया है। उनमें सोसायटी के बैठने के, रहने के, खानेपीने के एटिकेट्स नहीं है। उनके दिमाग के दरवाजे बंद हैं। कुछ भी नया ग्रहण करना नहीं चाहते।

मेरी दादी कहती है, मैं अपनी बुनियाद भूल गया हूं। अपनी पहचान भूलता जा रहा हूं। कहीं ऐसा ना हो कि मैं इस छद्म आधुनिकता की अंधी दौड़ में दौड़ता हुआ स्वयं को समाप्त कर लूं।

आज कल शहरों में मैं देखता हूँ कि लोग फ्लेटों में रहते हैं। कोई पांचवी मंजिल पर तो कोई दसवीं पर।

सिर्फ फ्लेट आपका है, छत आपकी नहीं। यदि छत पर घूमने का मानस बनाओ तो छत पर पहुंचने में ही नानी सपने याद आ जाएं। लिफ्ट से आप वहां पहुंच भी जाओ तो छत पर घूमने की जगह ही नहीं। बिल्कुल सटी हुई, आसपास रखी पानी की टंकियां। नीचे देख लो तो वही हार्ट अटेक हो जाए।

नरेन्द्र कोहली ने अपने व्यंग्य सार्थकता में लिखा है कि एक दिन किसी फ्लेट में एक ब्रेसियर उडकर नीचे आ पड़ी थी और चौकीदार अपनी ईमानदारी में उसे ले जाकर प्रत्येक फ्लेट में जा जाकर पूछता फिर रहा था, ‘मेम साहब! यह बनियान आपकी है?’

मेम साहब ब्रेसियर को देखती और चेहरे पर झूठमूठ क्रोधित होने का नाटक कर चौकीदार को घूरती और दरवाजा उसके मुंह पर बंद कर देती। फटाक! बदतमीज चौकीदार!

ब्रेसियर को हाथ में लिए महिलाओं से कोई ऐसे सवाल करता है?

थोड़ी देर में सारी महिलाएं बालकनियों पर खड़ी होकर चौकीदार को देख रही होती कि कौन ब्रेसियर को स्वीकार करता है।

जब चौकीदार नीचे मिसेज सिंह के पास पहुंचता है तो वे झपट कर ब्रेसियर छीन लेती हैं और दरवाजा बंद कर देती हैं। चौकीदार बंद दरवाजे को अपने दांत फैलाकर चिढ़ाता हुआ लौट आता है।

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राधिका एनजे की कलाकृति

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मिसेज सचान आज मुझको दूसरी बार देख रही थी और देखते ही मुझसे मुलाकात की ख्वाहिशमंद हो उठी थी। उनकी ये ख्वाहिश मैंने उनकी आँखों में बखूबी पढ़ी थी। मैं एक लेखक हूँ और लोग मुझे भावनाओं का चितेरा कहते हैं। तो भावनाओं के चितेरे रोमांटिक कहानियां लिखने वाले एक लेखक के लिए किसी औरत की आँखों की भाषा पढ़ना कोई कठिन काम नहीं था। बल्कि ये काम उस समय अत्यंत सरल हो जाता है जब वो आँखें किसी बेहद खूबसूरत महिला की हों। सच मिसेज सचान अपनी आँखों की ही तरह एक बेहद खूबसूरत महिला थी। मैं मिसेज सचान से अपनी दूसरी मुलाकात से कहानी आगे बढ़ाऊँ उससे पहले लाज़िमी है मैं उनसे अपनी पहली मुलाकात का ज़िक्र करता चलूँ।

मैंने अपनी किताब 'स्वीट सिक्सटीन' के प्रकाशक से पहली बार मिसेज सचान का नाम सुना था। वो उन्हें मेरी इस पुस्तक के विमोचन में बुला रहे थे। मेरी इस पुस्तक के विमोचन में कई ओर लोग भी आ रहे थे जीने मैं जानता था। पर मिसेज सचान मेरे लिए अनजान थी। जब मैंने प्रकाशक से उनके बारे में दरयाफ्त की तो वो मेरी अज्ञानता पे हँसते हुए बोले 'प्रियजीत अब तुम अभी इतने बड़े लेखक भी नहीं हो जो मिसेज सचान जैसी बड़ी चित्रकार को न जानने का ड्रामा करो।'

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हालांकि मैं वास्तव में किसी मिसेज सचान को नहीं जानता था जो चित्रकार हो पर उस वक़्त मैंने चुप रहना ही मुनासिब समझा।

पुस्तक के विमोचन में जब मेरी नज़र मिसेज सचान पे पड़ी तो न जाने कितने लम्हे उन पर ही ठहर कर रह गई। वे तक़रीबन चालीस साल की सुगठित और गोरी देह वाली एक बेहद खूबसूरत महिला थी। यद्यपि पुस्तक विमोचन के कार्यक्रम में कई बेहद खूबसूरत लड़कियां भी आई हुई थी पर मिसेज सचान का आकर्षण कुछ ऐसा था की वहां उपस्थित हर व्यक्ति सिर्फ उन्हें निहार रहा था, उनके करीब आने को लालायित था, उनसे बात करना चाहता था।

मैं भी यक़ीनन मिसेज सचान की ओर आकर्षित हो गया होता जो मेरी ज़िन्दगी किसी दोशीजा के आकर्षण से बंधी न होती। यद्यपि मेरी ज़िन्दगी में एक लड़की का आकर्षण शामिल था फिर भी मिसेज सचान की खूबसूरती का जादू ऐसा था कि मेरी आंखें कई बार मेरी इज़ाज़त के बिना ही उनकी ओर चली गई।

पुस्तक विमोचन के अपने हाथ में मेरी किताब 'स्वीट सिक्सटीन' की प्रति अपने हाथ में पकड़े हुए मिसेज सचान मुस्कराती हुई मेरे सामने आकर खड़ी हो गई।

'स्वीट सिक्सटीन' को अपने अद्भुत हाथों से मेरे सामने लगभग लहराते हुए वे बोली 'प्रियजीत ये आपकी पहली किताब होगी जो मैं पढ़ूंगी।'

मिसेज सचान की ही तरह उनकी आवाज़ इतनी दिलकश थी कि मैं उसमें डूबकर उनकी बात का कोई जवाब तुरंत नहीं दे पाया। मुझे यूँ खामोश पा मिसेज सचान आगे बोली 'प्रियजीत क्या सिर्फ आप उपन्यास ही लिखते हो या  ... मेरा मतलब कविता, ग़ज़ल भी करते हो क्या ?' 

'नहीं मैम मेरा हाथ सिर्फ उपन्यास पे चलता है। कविता, ग़ज़ल हमसे नहीं बनती।' मेरी बात सुनकर मिसेज सचान अपने होठों की मुस्कान तनिक गहराते हुए बोली 'प्रियजीत जैसे ही अपने मुझे मैम कहा मैं समझ गई आप कविता, ग़ज़ल नहीं लिखते। क्योंकि कवि, ग़ज़लकार मैम जैसा बोरिंग शब्द जल्दी प्रयोग नहीं करते।'

मिसेज सचान की बात में अकबका गया और कोई बात जब न सूझी तो मैंने कहा 'इस पुस्तक पे मुझे आपकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार रहेगा।' 

'हाँ श्योर, मैं तो इस उपन्यास को आज ही पढ़ डालूंगी।'

'जी थैंक्स मिसेज सचान।'  अबकी बार मैंने उन्हें मैम की जगह मैसेज सचान कह कर संबोधित किया था।

मेरे मिसेज सचान कहने पर उनके गुलाबी होठ तनिक गोल गए थे, वो कुछ कहना चाहती ही थी कि उन्हें प्रकाशक ने बुला लिया और बिना कुछ कहे ही मुस्कराती हुई चली गई।

उस दिन मिसेज सचान तक़रीबन पंद्रह मिनट और उस फंक्शन में रुकी पर वो अन्य लोगों से मिलने में इतना व्यस्त थी कि मुझसे दुबारा बात ही नहीं हो पाई। मिसेज सचान के साथ वहां मौजूद लोगों को इतना व्यस्त देखकर मुझे कई बार ऐसा लगा जैसे ये प्रोग्राम मेरी पुस्तक के विमोचन का न होकर मिसेज सचान की किसी पेंटिंग का हो।

खैर वहां से जाते वक़्त मिसेज सचान एक मिनट के लिए मेरे पास आई और बोली 'अबकी जब मुलाकात होगी तो मैं आपके उपन्यास स्वीट सिक्सटीन पे बात करूंगी।

जब मिसेज सचान चली गई तो मुझे भान हुआ कि सभी उनकी पेंटिंग्स की इतनी तारीफ कर रहे थे और मैंने उनसे इसका ज़िक्र तक नहीं किया। फिर मैंने सोचा जब मिसेज सचान ने मुझे खुद कहा है कि वो मुझे मिलेगी तो मैं उस वक़्त उनसे जरूर उनकी चित्रकारी के बारे में बात करूँगा। बाद में मेरे प्रकाशक मित्र ने मुझे बताया कि मिसेज सचान न सिर्फ मशहूर चित्रकार है बल्कि एक बेहद कामयाब बिजनेसवोमेन भी है और काफी व्यस्त रहती है।

मेरे मित्र के ये कहने के बाद कि मिसेज सचान बेहद व्यस्त महिला है मुझे उनसे दूसरी मुलाकात की उम्मीद कम ही थी, पर आज मैंने मिसेज सचान को बिलकुल तन्हा खड़ा खड़ा देखा था शहर से काफी दूर एक रिसोर्ट टाइप रेजिडेंस सोसाइटी में। न सिर्फ मैंने मिसेज सचान को देखा था बल्कि उन्होंने भी मुझे देख लिया था।

ये काटेज मेरे एक मित्र की थी। मैं वैदिककालीन पे एक उपन्यास लिखना चाहता था जिसके लेखन के लिए मुझे किसी एकांत और शांत जगह की जरूरत थी। मेरी समस्या का समाधान करते हुए मेरा मित्र मुझे अपनी इस काटेज में छोड़ गया था। यहाँ अपार शांति थी। शहरों का शोरगुल बिलकुल नहीं था। मित्र के जाने के बाद मैंने ज्यों ही काटेज की खिड़की खोली तो तनिक दूर सामने बने बंगले की बालकनी में मिसेज सचान को खड़ा हुआ देखा। उन्हें पहचानने में मुझे कोई परेशानी नहीं हुई थी। वो सुंदरता की प्रतिमूर्ति बनी खड़ी थी। लेकिन मुझे न जाने क्यों वो आज मुझे किसी ठहरी हुई नदी की तरह उदास लग रही थी।

शायद मिसेज सचान का मोबाइल बजा होगा, जो काटेज के भीतर होगा या फिर अन्य कोई कारण होगा वे अचानक ही मुड़कर बालकनी से काटेज के भीतर जाने लगी थी। जब वो मुड़ी तो उनकी एक नज़र जरूर मेरी खिड़की से टकराई होगी तभी उन्होंने काटेज के दरवाजे पे पहुंचकर अपनी मरमरी गर्दन को मोड़कर मेरी खिड़की को और देखा था। हालांकि जैसे मैं उन्हें पहचान गया था वैसे ही वो मुझे पहचान ले मुझे इसकी बिलकुल उम्मीद नहीं थी। पर मुझे देखते ही उनके होठों पे आई मुस्कान ने मुझे बता दिया था कि वे मुझे पहचान गई है।

बस मुझे देखते हुए वे एक पल को मुस्कराई और फिर काटेज में भीतर चली गई। उनके यूँ भीतर चले जाने से मेरे मन में वापस उस शंका ने जन्म ले लिया था कि मिसेज सचान ने मुझे पहचाना या नहीं। खैर मैंने अंदाज़ा लगाया कि मिसेज सचान जिस किसी भी वजह से बालकनी से काटेज के भीतर गई है उससे फारिग होकर शीघ्र ही बालकनी में वापस आएंगी और अपने होठों पे मुस्कान लाकर मुझे देखकर मुझे पहचान लेने की ताक़ीद कर देंगी।  इसी उम्मीद से में उनकी बालकनी को तकते हुए अपने काटेज की खिड़की पे रहा।

ज्यों ज्यों समय बीत रहा था मेरी बेचैनी बढ़ रही थी। मिसेज सचान लौट कर बालकनी में नहीं आए थी। क्या उन्होंने मुझे नहीं पहचान था पहचान के भी उन्होंने मुझे इग्नोर कर दिया था। यक़ीनन मिसेज सचान न सिर्फ एक स्थापित चित्रकार थी अपितु वे एक सफल बिजनेसवोमेन भी थी। मेरे प्रकाशक मित्र ने बताया था कि मिसेज सचान ने अपना ये बिजनेस खुद खड़ा किया है और उनके इस बिजनेस की एक ब्रांच ढाका में भी है। मिसेज सचान खुद महीने में एक बार ढाका जाती थी अपने बिजनेस की देखभाल के लिए।

मिसेज सचान के बालकनी में न आने की वजह से मैं बेचैन जरूर था लेकिन नाउम्मीद नहीं। मुझे हलकी सी उम्मीद थी की मिसेज सचान मुझे देखने के लिए बालकनी में जरूर आएंगी। मैं अपनी एकाग्र आँखों से मिसेज सचान की सूनी बालकनी तक रहा था तभी मेरी काटेज की डोरबेल बजी। हालांकि मेरे दोस्त ने अपनी इस काटेज में कोयल के मीठे स्वर वाली डोरबेल लगवाई थी फिर भी इस वक़्त ये आवाज़ मुझे बेहद कर्कश लगी थी। मुझे डर था जब मैं काटेज का दरवाज़ा खोलने गया और उसी वक़्त मिसेज सचान बालकनी में आकर वापस चली गई तो पता नहीं मैं उन्हें फिर कब देख पाऊंगा। मैंने मिसेज सचान के एक दीदार के खातिर डोरबेल को इग्नोर कर दिया था। पर कुछ समय बाद डोरबेल दूसरी बार बजी फिर तीसरी बार। झुंझलाकर मैंने मिसेज सचान की बालकनी पे एक नज़र डाली और फिर डोर की तरफ ये सोचते हुए बढ़ा 'कि जब मैं चित्रांगदा जैसी एक बेहद खूबसूरत लड़की की ओर आकर्षित हूँ तो फिर मिसेज सचान की एक झलक देखने को मैं इतना बेचैन क्यों हूँ।

दरवाज़े तक पहुंचते पहुँचते डोर बेल चौथी और और फिर पांचवीं बार बजी, जिसने मेरी झुंझलाहट को और बड़ा दिया। इसी झुंझलाहट में मैंने तेजी से दरवाजा खोला। दरवाज़ा खुलते ही मेरी झुंझलाहट और गुस्सा कपूर की तरह गायब हो गया था। दरवाज़े में मेरे सामने मिसेज सचान खड़ी थी। किसी ठहरी हुई नदी की तरह शांत। उनके होठों पर मुस्कान की कोई लकीर नहीं थी जबकि अभी कुछ देर पहले मैंने उन्हें उनकी बालकनी में मुझे देखकर मुस्कराते हुए पाया था। हालांकि उससे पहले वो बालकनी में उसी तरह खड़ी थी जैसे अभी मेरे सामने दरवाज़े पे खड़ी थी, किसी ठहरी हुई नदी की तरह शांत और उदास।

अपने हाथों में पकड़ी मेरी किताब स्वीट सिक्सटीन मेरे और बढ़ाते हुए मिसेज सचान बोली 'तुम्हारी किताब पढ़ ली मैंने।'

'सच कैसी लगी आपको।' मैं उत्साहित होकर बोला 'आइये अंदर आइये न।'

इतनी घटिया किताब इससे पहले मैंने नहीं पढ़ी। आलरेडी तुम्हारी किताब मेरा काफी वक़्त ख़राब कर चुकी है अब मैं अंदर आकर अपन और समय बर्बाद नहीं करना चाहती।' मिसेज सचान ने बेहद रूखे लहज़े में कहा और फिर पलट कर अपने बंगले की और चल दी।

मिसेज सचान के रूखेपन से मैं इतना आहत नहीं हुआ था जितना उन्हें अपनी किताब के पसंद न आने की वजह से हुआ था। उन्होंने मेरी किताब को सीधे सीधे घटिया करार दे दिया था। हालाँकि मैं अब तक कोई बड़ा लेखक नहीं था पर अब तक किसी ने भी मेरे सामने मेरी पुस्तक को यूँ घटिया नहीं कहा था। मिसेज सचान के जाने के बाद में काफी देर अपने को यूँ तसल्ली देता रहा कि हो सकता है मेरी ये पुस्तक वास्तव में मिसेज सचान को घटिया लगी होगी। ख़ैर मेरा मूड अपसेट हो चुका था और यूँ ढलती रात तक न ही मैंने अफ़साने का एक भी अक्षर लिखा न ही मिसेज सचान के दीदार की ललक में बालकनी में गया।

अपने ख़राब मूड को दुरुस्त करने की गरज़ से मैं कैंपस में मौजूद क्लब में आ गया था। बार काउंटर पे बैठकर मैं व्हिस्की के घूंट भरते बज रहे धीमे संगीत का तक़रीबन आंखें बन्द करके लुत्फ़ लेने लगा।

'ओह तो आप भी रॉयल स्टेग ही पीते है।'

पहचानी हुई आवाज़ सुनकर मैंने उसकी ज़ानिब आंखें उठाई तो पाया मेरे बिलकुल करीब मिसेज सचान खड़ी थी। हाफ आसितिनो और लॉन्ग स्कर्ट पहने हाथों में व्हिस्की का गिलास और मदिर होठों पे मुस्कान लिए। हलके हरे रंग के टॉप और गहरे हरे रंग की स्कर्ट में क्लब की दूधिया रोशनी में किसी परी की मानिंद चमक रही थी।

मिसेज सचान के दोपहर वाले व्यवहार को याद करके मैं खामोश रह गया। मुझे खामोश देखकर मिसेज सचान बोली 'प्रियजीत अपना पैग खत्म करके डांस फ्लोर पे आ जाना।' कह कर मिसेज सचान ने गिलास की व्हिस्की एक घूंट में गले में उतारी और फिर गिलास को काउंटर पे रखकर डांस फ्लोर पे जाके म्यूजिक की धुन पे थिरकने लगी।

मिसेज सचान मेरे लिए एक पहेली लगी और शायद इस पहेली को सुलझाने के लिए मैं व्हिस्की के सिप लेते हुए उन्हें थिरकते हुए देखता लगा।

हाथ में शराब का गिलास लिए एक अधेड़ ने अचानक मिसेज सचान की कमर पकड़ ली और मिसेज सचान ने उसके कंधे थाम लिए। दोनों के कदम म्यूज़िक पे लयबद्ध हो उठे। मिसेज सचान का सर उसे अधेड़ पे झुका देखकर मेरे दिल में एक अजब सी हूक उठी। न जाने क्यों मुझे उस आदमी जी के कंधे का सहारा लेकर मिसेज सचान डांस कर रही थी उससे ईर्ष्या होने लगी।

हाथ में शराब का गिलास लिए एक अधेड़ ने अचानक मिसेज सचान की कमर पकड़ ली और मिसेज सचान ने उसके कंधे थाम लिए। दोनों के कदम म्यूज़िक पे लयबद्ध हो उठे। मिसेज सचान का सर उसे अधेड़ पे झुका देखकर मेरे दिल में एक अजब सी हूक उठी। न जाने क्यों मुझे उस आदमी जी के कंधे का सहारा लेकर मिसेज सचान डांस कर रही थी उससे ईर्ष्या होने लगी।

चित्रांगदा सी खूबसूरत लड़की से मैं प्यार करता था। हालांकि उसने अब तक मेरे प्यार का जवाब नहीं दिया था पर वो मेरी बेहद करीबी दोस्त थी। और मुझे उम्मीद थी वो जल्द ही मेरे प्यार को कबूल कर लेगी। ये उम्मीद मुझे इसलिए भी थी क्योंकि जब कुछ दिन पहले मैंने किसी बात पे उत्तेजित होकर उसके होठों को चूमा तो बजाय नाराज़ होने के वो शरमा गई थी।

मिसेज सचान ने आज दोपहर मुझसे बेहद रूखा व्यवहार किया था। वो बेहद धनाढ्य महिला थी, स्वावलंबी थी। ऐसी हाई सोसाइटी ज़िन्दगी उनकी रोजमर्रा की कहानी थी। मेरे जैसे व्यक्ति उनके लिए नौकर से ज्यादा हैसियत नहीं रखता था फिर किसी व्यक्ति के कांधे का सहारा लेकर नाचते देख मुझे बुरा क्यों लग रहा था।

मैंने अपना सर झटका। मैं जानता था ऐसा मैंने अपने ख्यालों से मिसेज सचान को झटकने के लिए क्या था। पर मैं नाकाम रहा। ज्यों ही मैंने अपना झटका सर सीधा किया मेरी आँखें मेरे हुक्म से आज़ाद होकर मिसेज सचान पे जाकर ठहर गईं। मेरी आँखें मिसेज सचान की काली गहरी आँखों से चार हुई और ठीक उसी समय उन्होंने अपनी पलकों की जुम्बिश से मुझे आमन्त्रित किया। हालांकि उन्होंने मुझे अपनी पलकों के इशारे से आमंत्रित किया था या फिर यूँ ही पलकें झपका दी थी फिर भी आज रात उनकी खूबसूरती के आकर्षण का आलम ये था कि मैं मेरे कदम भी मेरी आज्ञा की अवहेलना करके मुझे डांसिंग फ्लोर पे लेकर आ गए थे।

मुझे अपने करीब देखते ही मिसेज सचान अपने डांस पार्टनर से आज़ाद होकर किसी लता की मानिंद मेरे सीने से आ लिपटी। मेरे शानो पे उनके नरम गुदाज़ हाथों की की पकड़ बेहद सख्त थी और उनकी मखमली देह मेरी देह से हर जाविये से सटी हुई थी।

जब मिसेज सचान ने अपनी गर्म खुशबूदार सांसें मेरे मुँह पे डालते हुए अपने नरम होठों के मेरे होठों के करीब लाकर कहा 'प्रियजीत रोमांटिक कहानी लिखने में तुम्हारा कोई जवाब नहीं।' तो मैंने अपने ख्यालों में सोचा काश आज की ये रात इस कायनात की सबसे तवील रात हो और मिसेज सचान मेरे गले से लगे यूँ ही रक्स करती रहें। हालांकि मैंने एक बार दिल में सोचा की 'मिसेज सचान से पूछ लूँ कि उन्हें मेरी कौन सी रोमांटिक स्टोरी पसंद आई है, क्योंकि वे 'स्वीट सिक्सटीन' दोपहर ही खारिज़ कर चुकी थी।' पर मिसेज सचान की देह से झरती झरने सी खुशबू ने मुझे ऐसा करने से रोक लिया। शायद मैं इस वक़्त किसी तौर मिसेज सचान को तनिक भी नाराज़ नहीं करना चाहता था।

उस रात मिसेज सचान मुझसे रक्स करते हुए मीठी बातें करती रही। और फिर जब व्हिस्की के असर से लहराती उनकी लज़्ज़तदार देह को उनके बंगले के हवाले करके अपनी काटेज जाने के लिए मुड़ा तो मिसेज सचान ने मुझे 'बाय' कहते हुए मेरे गाल पे अपने होठों के निशान छोड़ दिए।

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मुझे इस कॉटेज में आये तीन दिन बीत चुके थे और इन बीते तीन दिनों में मैंने पानी कहानी के अक्षर भी नहीं लिखे थे। मेरे कुछ भी न लिख पाने के वजह मिसेज सचान ही थी।

उस रात जब मिसेज सचान ने अपने होठों के लम्स से मेरे गाल को सरशार किया तो उससे हौसला पा के मैं अगले दिन उनसे मिलने उनके बंगले पहुंचा तो उन्होंने मुझे दरवाज़े से ही मुझे ये कहकर रुखसत कर दिया 'प्रियजीत अच्छा होगा जो तुम अपनी काटेज में जाकर अपने लेखन में सुधार का प्रयास करो।'

मैंने मिसेज सचान की आवाज़ में बेहद रूखापन महसूस किया था। मैं न जाने कितनी देर अपसेट मूड के साथ काटेज में टहलता हुआ सोचता रहा मिसेज सचान की ये आवाज़ डांस करते वक़्त मुझसे बात करते हुए से बिलकुल अलग थी। उस वक़्त उनकी आवाज़ शहद में डूबी हुई थी।

शाम ढलते ढलते मिसेज सचान का रूखापन मुझ पे वहशत बनके टपकने लगा तो रात गहराते ही वो मेरे काटेज में आ गई। हाथ में प्लास्टिक का एक झोला उठाये। मैंने दरवाज़ा खोल तो बिना कुछ कहे भीतर आ के सोफे पे बैठ गई। फिर थोड़ी देर बाद झोले से 'रॉयल स्टेग' की बोतल टेबल पर रखते हुए बोली 'प्रियजीत फ्रिज़ में आईस तो होगी न ?'

शराब के हलके हलके घूंटों ने उनकी काली आँखों को हल्का लाल कर दिया था। और जब शराब के इन घूंटों का असर बढ़ा तो उन्होंने मेरे करीब बैठ कर अपने सर को मेरे कांधे का सहारा दे दिया।

मिसेज सचान की उम्र भले ही चालीस के आस पास हो पर वे बेमिसाल हुस्न का नमूना थी। मेरे कांधे पे झुके उनके होठों से निकलती गर्म सांसें और उनकी रेशमी बेतरतीब ज़ुल्फें कभी भी मुझे बहका सकती थी। इसलिए मैं खाली हुए गिलास में शराब डालने के बहाने से उनका सर सोफे की पुश्त से टिका कर उनसे तनिक दूर हट गया।

'प्रियजीत जानते हो मैं बमुश्किल सत्रह साल की थी जब मिस्टर सचान ने मुझसे शादी का प्रपोज़ किया था।' गिलास में शराब डालते हुए मैंने मिसेज सचान के ज़ानिब देखा। वे सोफे की पुश्त से आँख बन्द किया तक़रीबन अधलेटी अवस्था में थी।

'मिस्टर सचान सुंदर थे सजीले थे, इंजीनियर थे मैं भी उनसे प्यार कर बैठी थी। जल्द ही हमने शादी कर ली। और अगले एक साल में ही मैं मां भी बन गई।' गिलास में शराब डाल के मैं एक गिलास मिसेज सचान को देते हुए उनके करीब बैठ गया। इस वक़्त मिसेज सचान की आवाज़ मुझे कहीं दूर अंतरिक्ष से आती हुई प्रतीत हो रही थी। उस रात मिसेज सचान काफी देर तक मेरे साथ काटेज में थी। आज बहुत कुछ उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का दर्द मुझसे बाटा था।

और फिर रात में एक पहर ऐसा आया जब में शराब और रात के असर से मिसेज सचान की बातें सुनते हुए नींद के हवाले हो गया। इससे पहले कभी भी इतनी देर रात तक मैं कभी जगा भी नहीं था। सुबह सूरज आसमान में चढ़ने पे जब आँखें खुली तो मैं सोफे पे सो रहा था। मिसेज सचान की तलाश मेरी आँखों ने सेकेण्ड के सौंवे हिस्से से भी कम समय में कमरे की तलाशी ले डाली। अगले एक मिनट में मैंने सोफे से उठकर पूरी काटेज को खंगाल डाला। पर मिसेज सचान मुझे नज़र आई उनकी बालकनी में स्लेटी रंग का स्टोल ओढ़े हुए छोटे छोटे पौधों को पानी देते हुए।

अगले एक घंटे में दैनिक कामों से निपट कर मिसेज सचान के बंगले पे जा धमका था।

मिसेज सचान अभी अभी नहाई थी। पानी की बूंदें उनके बालों और गर्दन पे ढुलक रही थी। गुलाबी रंग का पानी से हल्का सा भीगा तौलिया उनके कांधे पे ढलका था और घुटनों तक नील गाउन में उनकी उन्नत देह लिपटी हुई थी। उनकी पिंडलियां बेहद आकर्षक और गुदाज़ थी और मेरी नजरें उन रोमहीन पिंडलियों से हटने को तैयार ही नहीं थी।

मिसेज सचान सोफे के पुश्त पे बेपरवाही से तौलिया फेंक कर आदमकद शीशे के सामने खड़े होकर अपने बाल सुलझाने लगी थी।

उन्होंने मुझसे कोई हाय हेल्लो भी नहीं की थी।

'आप रात को अपने बंगले में कब चली आई ?' बातचीत का एक सिरा ढूंढते मैंने पूछा था।

'प्रियजीत अभी मुझे कुछ ऑफिस का काम निपटाना है।' वो मुझसे बेज़ारी प्रदर्शित करते हुए बोली।

'रात पता नहीं कब मेरी आँख लग गई।' मैंने वापस बातचीत का सिरा पकड़ने का प्रयास किया था।

'मैंने कहा मुझे काम है क्या तुम्हें समझ नहीं आया।' मिसेज सचान मेरी और पलटकर तीखे आवाज़ में बोली।

उनकी इस तीखी और बेरुखी भरी आवाज़ ने मुझे अपनी काटेज के ओर आने पे मज़बूर कर दिया था।

उस दिन मुझ पे मिसेज सचान की बेरुखी का असर ये रहा की मैं तमाम दिन अपनी काटेज में कैद रहा। हालांकि उनकी एक झलक देखने को दिल ने बड़ी बेताबी दिखाई फिर भी मैं अपने दिल को कंट्रोल किये रहा और मिसेज सचान की बालकनी से अपनी आँखों को दूर रख पाने में कामयाब रहा।

लेकिन जब रात ने साँझ को अपने आगोश में लेकर उसे अपना सा बना लिया तो मैं भी मिसेज सचान की सांचे में ढली देह की एक झलक पाने की अपनी दिल और आँखों की ख्वाहिश के आगे पराजित हो गया।

मिसेज सचान यक़ीनन क्लब गई होगी इसलिए मैं भी क्लब जाने के लिए काटेज से निकल कर कोलतार की बनी सड़क पर आ गया था। आसमान में चन्द्रमा मुकम्मल हो चूका था और उसकी छिटकी चांदनी में कोलतार की बनी सड़क किसी अल्हड़ के ज़ुल्फ़ों की चोटी की तरह बल खा रही थी। मैंने एक नज़र आकाश में में चमकते चंद्रमा पे डाली और फिर जेब में दोनों हाथ डाल के क्लब की ओर बढ़ चला।

अब जबकि मैं क्लब पहुँचने ही वाला था तो वहां से एक साये को बाहर निकलते देखा। एक तो उस सुगठित देह का असर दूसरे चन्द्रमा की छिटकी चांदनी। मैं पहली नज़र में ही उन्हें पहचान गया था।

'मिसेज सचान।' मेरे होठों से बेसाख्ता निकला था।

न सिर्फ मैंने मिसेज सचान को पहचान लिया था बल्कि छिटकी चांदनी में मिसेज सचान भी मुझे पहचान गई थी।

'प्रियजीत।' उनके होठों से निकला और फिर आगे बढ़के उन्होंने हलके से मुझे अपने गले लगा लिया।

'आज बहुत जल्द क्लब से बाहर आ गई आप ?' मैंने मिसेज को गहरी नज़र से देखते हुए कहा मुझे डर था कहीं दोपहर की तरह मिसेज सचान मुझ पे चिल्ला न पड़ें।

पर मेरी उम्मीद के विपरीत वो मेरा हाथ पकड़ के बोली 'मुझे लगा तुम क्लब में होंगे प्रियजीत, तुमसे मिलने चली आई पर तुम्हें क्लब में न पाकर बोर होने लगी थी इसलिए निकल आई।' 

मिसेज सचान सच में पहेली थी। मैं सोच में पड़ गया क्या अभी सामने खड़ी वही मिसेज सचान है जिन्होंने आज दोपहर मुझसे यूँ व्यवहार किया था मानो मुझे जानती तक न हो और अभी कितनी आत्मीयता से बात कर रही है।

'प्रियजीत क्या तुम्हारी काटेज में व्हिस्की पड़ी है ?' मिसेज सचान की आवाज़ सुनके मैं अपनी सोच के दायरे से बाहर निकलते हुए बोला 'हाँ मिसेज सचान चलो काटेज में चलके एक एक पेग लेते हैं।'

'नहीं प्रियजीत।' मिसेज सचान अपनी खूबसूरत ऊँगली से एक पेड़ के नीचे बने ईंट के चबूतरे की ओर इशारा करके बोली 'प्रियजीत तुम जाके व्हिस्की ले आओ हम आज चाँद की चांदनी और उस पेड़ की छाँव में बैठकर बातें करेंगे।' 

'हाँ ठीक है।' मैं एक नज़र पेड़ और फिर एक नज़र मिसेज सचान पे डालते हुआ बोला।

'और हाँ कुछ बर्फ और सोडा भी।'   मिसेज सचान अपनी अंगुलियां मेरी कलाई में चुभते हुए बोली।

मैं जब प्लास्टिक के एक थैले में शराब, सोडा और बर्फ लेकर पेड़ के पास पहुंचा तो मिसेज सचान पेड़ के नीचे बने चबूतरे के सामने पड़ी पत्थर की बेंच पे आँखें बंद किये बैठे थी। उन्हें यूँ एक पल देख के मुझे लगा मानो स्वर्ग की कोई अप्सरा धरती में इसलिए आई हो ताकि चंद्रमा से बरस रही चांदनी रूपी अमृत को धरती के हर जर्रे को बराबर बाँट सके।

मेरी नज़र मिसेज सचान के चेहरे पे ठहर गई। उन्हें देखके दिल में टीस उठी। उनका चेहरा उस वक़्त मुझे दर्द में डूबा लगा। मानो स्वर्ग की अप्सरा को किसी ने अभिशप्त कर दिया हो।

उनके दर्द की थाह लेते हुए मैं उनके बगल में पत्थर की बेंच पर बैठ गया था।

'प्रियजीत, छोटे - छोटे पैग बनाना।' मिसेज सचान मेरे कंधे पे सर टिका कर बोली।

मिसेज सचान मेरा हाथ पकड़ के कभी पेड़ के नीचे बने चबूतरे पे बैठती, कभी पत्थर की बेंच बैठ कर मेरे कंधे पे सर टिकाती कभी छिटकी चांदनी में टहलने लगती। पैग खत्म होते ही नए पैग की फरमाइश करती। अपने गुज़रे दिनों की ज़िन्दगी की दास्ताँ बयां करते हुए।

मिसेज सचान न एक सफल बिज़नेसवोमेन थी बल्कि एक मशहूर चित्रकार भी थी। उनकी बनाई पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगाने के लिए बड़ी बड़ी संस्थाएं लालायित रहती थी। उन्होंने अपने कई दर्द मुझसे बांटे पर मिस्टर सचान से डाइवोर्स क्यों हुआ ये नहीं बताया। मिस्टर सचान से अलग होकर उन्होंने अपना एक अलग मुकाम बनाया था। बेहद सफल महिला के तौर पे समाज उन्हें जानता था, पहचानता था।

मिसेज सचान का एक बीटा था जो अपने पिता मिस्टर सचान के साथ रहता था और बॉलीवुड में उसकी एक फिल्म रिलीज भी हो चुकी थी। मैंने वो फिल्म नहीं देखी थी पर ट्रेलर और पोस्टर में रत्नेश को देखा था, एकदम चॉकलेटी हीरो की तरह।

मैंने जब मिसेज सचान को एक फ़िल्मी हीरो की मां होने की बधाई दी तो वो न जाने कितनी देर बिना कुछ कहे सिर्फ हंसती रही।

'एक पैग ओर प्रियजीत।' मिसेज सचान ने जब अपना खाली गिलास मेरी ओर बढ़ाया तो मैंने उनके सामने व्हिस्की की खाली बोतल लहरा दी।

'ओह ठीक है, चलो फिर चलते है।' कहते हुए मिसेज सचान उठी तो शराब की तरंग की वजह से लड़खड़ा गई। मैंने उन्हें तुरंत ही संभाल लिया। सड़क पर चलते हुए मिसेज सचान मेरा सहारा लिए हुए थी। मेरे काटेज के सामने जब वो पहुंची तो तक़रीबन मुझसे किसी लता की तरह झूलते हुए बोली 'प्रियजीत देखो चाँद अब किस तौर दिख रहा है, मानो धरती को चूमने का प्रयास कर रहा हो।'

यद्यपि मैं लेखक था, पर मिसेज सचान की ये बात सुनके मुझे लगा कि शराब अपना असर दिखाते हुए उनसे बहकी - बहकी बातें करवा रही है।

'चलिए मैं आपको आपके बंगले तक छोड़ देता हूँ।' कहकर मैं अपने कंधे से झूल रही मिसेज सचान को संभाल कर उनके बंगले की ले चला।

मिसेज सचान को उनके बंगले में छोड़कर मैं जब चला तब उन्होंने एक बार मेरा हाथ पकड़ा और फिर तुरन्त ही छोड़ दिया।

मिसेज सचान ने दरवाज़ा बंद कर लिया और मैं अपनी काटेज में आ के बिस्तर के हवाले हो गया।

अगली सुबह मेरी आँख काफी देर से खुली और मैं जब मिसेज सचान का हाल जानने के लिए उनके बंगले की और जा रहा था तो आमने उन्हें कार की ड्राइविंग सीट पे बैठा देखा। उन्होंने एक नज़र मुझ पे डाली और फिर कार ड्राइव करते हुए मेरे बगल से यूँ निकल गई जैसे मैं उनके लिए कोई अनजान शख्स हूँ।

सच में मिसेज सचान मेरे लिए एक अनजान पहेली थी। वो कभी मेरे से बहुत अपनत्व से मिलती और कभी बिलकुल बेगानों सा व्यवहार करती। मैं मिसेज सचान की जाती हुई कार को देखते हुए उन्हें समझने का प्रयास कर रहा था तभी जींस की जेब में पड़ा मेरा मोबाइल बज उठा। जेब से मोबाइल निकाल के देखा तो चित्रांगदा मुझे काल कर रही थी।

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हालाँकि चित्रांगदा ने कभी भी मेरे प्यार को कबूल नहीं किया था पर वो मेरी बेहद करीबी दोस्त थी। हमने कुछ अवसरों पे एक दूसरे को चुम्बन किया था। चित्रांगदा एक उभरती हुई मॉडल थी। कई फिल्मों में वो छोटे - छोटे रोल भी कर चुकी थी। वो करीब बीस साल की एक बेहद सुन्दर और आकर्षक देह वाली युवती थी। चित्रांगदा से मेरी मुलाकात उस वक़्त हुई थी जब मैं एक धारावाहिक की कहानी लिख रहा था। चित्रांगदा ने उस सीरियल में एक अल्पकालिक रोल किया था। चित्रांगदा भी मेरे लेखन से बहुत इम्प्रेस थी। जब मैं किसी कहानी के लेखन के लिए शहर के हंगामों से दूर अपने दोस्त की काटेज में था और वहां मिसेज सचान नाम की पहेली से रूबरू हो रहा था तो उस वक़्त चित्रांगदा इटली में थी, अपने किसी फोटो शूट के लिए।

चित्रांगदा ने मुझे फोन करके बताया 'कि उसे फोटो शूट के दौरान किसी से प्यार हो गया और उसने तुरन्त शादी कर ली है। उसने शादी किससे की ये सुनने से पहले ही फोन कट हो गया। चित्रांगदा यूँ किसी से शादी कर सकती है ये बात मेरे ख्वाबों तक में न थी। चित्रांगदा के यूँ गैर हो जाने से मैं कई महीने अपने फ्लैट में कैद सिर्फ शराब से खेलता रहा।

ऐसे ही एक बारिश वाली शाम में जब मैं व्हिस्की के सिप ले रहा था तो अख़बार की एक खबर पे मेरी नज़र पड़ी।

मिसेज सचान ने अपने चित्रों की एक प्रदर्शनी के दौरान किसी जर्नलिस्ट के किसी सवाल का जवाब देते हुए कहा था 'कि ये उनके चित्रों की आखिरी प्रदर्शनी है।

मिसेज सचान मेरे लिए भले ही अब तक एक पहेली रही हो और मैं उन्हें समझ पाने में असफल रहा होऊं तो भी इतना समझता था कि मिसेज सचान जैसी सफल औरत के भीतर भी कोई दर्द लावा बनके बह रहा है।

मिसेज सचान...मिसेज सचान.....मिसेज सचान मेरे होठों ने ये नाम कई बार दोहराया। मिसेज सचान का नाम दोहराते हुए अचानक मैं उनसे मिलने को बेकरार हो उठा।

जब मैं मिसेज सचान के फ्लैट पे पहुंचा तो वे वहां नहीं थी। न जाने क्यों मुझे लगा मिसेज सचान कहीं अपने रिसोर्ट टाइप बंगले पे तो नहीं गई। दिल में ये ख्याल आते ही मैं अपने दोस्त के घर गया और उसे ये बता के कि मुझे एक कहानी लिखने के लिए तुरंत एकांत की जरूरत है उसके काटेज की चाभी लेकर रिसोर्ट की और चल पड़ा। कई दिनों से हो रही बरसात आज अपने पूरे शबाब पर थी पर मैं इससे बेपरवाह था। मेरे जेहन में सिर्फ मिसेज सचान घूम रही थी। मैं पहेली को हल करना चाहता था मिसेज सचान के दर्द की वजह जानना चाहता था।

रिसोर्ट पहुँचते पहुँचते रात के साये फिजां में फैल चुके थे, तेज बारिश के बीच चमकती बिजली की रोशनी में भी मिसेज सचान के बंगले में कुछ नज़र नहीं आया।

काटेज में पहुंचकर जब मैंने मिसेज सचान का बंगले को अँधेरे में डूबा पाया तो मुझे लगा मिसेज सचान शायद यहाँ रिसोर्ट में न आकर कहीं और गई है।

क्लब... हाँ यक़ीनन मिसेज सचान क्लब में होगी। मैं सर पे अम्ब्रेला लगाए बारिश से बचने की नाकाम कोशिश करते हुए फ़ौरन क्लब पहुँच गया था। बाहर हो रही बारिश के असर से अलमस्त न जाने कितने लोग, न जाने कितने जोड़े शराब की खुमारी में डूबे सिर्फ अपने या अपनों में व्यस्त थे।

मैंने पूरा क्लब छान मारा था, मिसेज सचान कहीं नज़र नहीं आई। मैं थक कर बार काउंटर पे बैठ गया। व्हिस्की का पैग लेकर उसके सिप लेते हुए मैंने मन ही मन सोचा शायद मिसेज सचान यहाँ न आकर कहीं ओर गई होगी। अब जबकि मिसेज सचान यहाँ नहीं थी तो मैं यहाँ क्योंकर रुकता। पर इतनी तेज बारिश में इतनी रात गए वापस जाने को दिल तैयार नहीं हुआ। रात काटेज में बिताकर सुबह यहाँ से निकल जाऊंगा ऐसा सोचकर मैं क्लब से बाहर आ गया।

बारिश और तेज हो चली थी। काटेज तक पहुँचते पहुँचते मेरे सर के अलावा मेरे शरीर का हर हिस्सा भीगा था। छाते को दरवाज़े के पास रखकर मैंने दरवाज़े का लॉक खोलना चाहा तो दरवाज़ा खुद ब खुद खुल गया। जेहन को झटका लगा मिसेज सचान की तलाश में क्लब जाते वक़्त में बेध्यानी में दरवाज़ा लॉक करना भूल गया था। ख़ैर मैं भीतर आकर लाइट जलाकर एक तौलिये से अपने गीले बदन को सुखाने लगा। अचानक मेरी नज़र राइटिंग टेबल पर गई। पेपर वेट के नीचे एक पेपर रखा था।

पेपर वेट के नीचे से वो कागज निकाल के मैंने उसे देखा, मेरे नाम का खत था। किसने लिखा और यहाँ कब रख के गया जानने के लिए मैंने उसे पलटा तो दूसरी तरफ खत ख़त्म होने की जगह अंग्रेजी पे PS  लिखा था। ये PS  कौन है जानने के लिए मैंने तुरंत खत पढ़ना चालू कर दिया।

प्रियजीत !

तुम एक अच्छे लेखक हो शायद अच्छे इंसान भी हो। जानते हो तुम इतना अच्छा लिखते हो कि मैंने अब तक तुम्हारा लिखा हर अफसाना पढ़ा है। और हाँ 'स्वीट सिक्सटीन' आपकी लिखी एक बेहतरीन किताब है, जानते हो उस दिन मैंने तुझसे झूठ बोला था कि ये एक घटिया किताब है।

-खत पढ़ते - पढ़ते मैं रुक गया। वापस खत पलटा और मेरी निगाह PS पे ठहर गई। जहाँ तक मुझे याद था मेरी किताब स्वीट सिक्सटीन को केवल मिसेज सचान ने घटिया कहा था और किसी ने नहीं। फिर ये PS कौन है जानने के लिए मैं वापस खत पलट के उसे पढ़ने लगा।

प्रियजीत,   तुम ये नहीं जानते मैं भी पहले कहानियां लिखती थी, चित्र नहीं बनाती थी। पर मिस्टर सचान से शादी के बाद मेरी लाइफ में एक लड़का आया। मैं मिस्टर सचान से प्यार करती थी हमारी शादी लव मैरिज थी पर शादी के बाद मुझे पता चला की मिस्टर सचान के और भी कई अफेयर है। मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की अपने प्यार की दुहाई थी। पर मेरी हर प्लीडिंग उनपे बेअसर रही। मैं अक्सर तनहा रहने लगी और इसी तन्हाई में मैं एक लड़के की ओर आकर्षित हो गई। अमृत एक उभरता हुआ मशहूर चित्रकार था।

हम अक्सर मिलने लगे। मैं अमृत के चित्रों की हर एग्जीबिशन में जाने लगी। उसके साथ वक़्त बिताने लगी। इसी बीच मैं गर्भवती हुई और रत्नेश हमारी दुनिया में आया।

जानते हो प्रियजीत इस समाज में पुरुष चाहे कितनी भी लड़कियों से अफेयर रखे ये जायज माना जाता है पर एक स्त्री अगर किसी पुरुष से दोस्ती भी कर ले तो ये किसी को भी हज़म नहीं होता। मेरे और अमृत का मिलना झूलना मिस्टर सचान को पसन्द नहीं आया और उन्होंने मुझे डाइवोर्स दे दिया। मैंने भी उनके डायवोर्स वाले फैसले का विरोध नहीं किया क्योंकि मुझे अमृत से बहुत उम्मीदें थी।

पर अमृत भी हर पुरुष की तरह निकला। एक बच्चे की मां और तलाक़शुदा औरत से शादी करके ज़िन्दगी बिताना उसे पसंद नहीं था। मिस्टर सचान और फिर अमृत की बेवफाई से मैं टूटी जरूर पर टूट कर बिखरी नहीं। मैंने अपना बिजनेस खड़ा किया। रत्नेश की परवरिश किया उसे सिने इंडस्ट्रीज के लायक बनाया। ये बिजनेस मैंने खड़ा किया मिस्टर सचान के पुरुषत्व वाले अभिमान को चुनौती देने के लिए और अमृत को जवाब देने के लिए मैंने अपना शौक लेखन छोड़कर चित्रकारी शुरू की और देखते ही देखते मैं अमृत से कहीं ज्यादा सफल चित्रकार के रूप में जाने जानी लगी।

मैंने सोच लिया था अब मैं कभी भी किसी तौर किसी पुरुष की ओर आकर्षित नहीं होउंगी। पर एक दिन रत्नेश की गर्लफ्रेंड चित्रांगदा के पास मुझे एक नावेल मिली जो तुमने लिखी थी।

खत पढ़ते -पड़ते चित्रांगदा का नाम आने से मैं चौंक पड़ा।

--चित्रांगदा, रत्नेश की गर्लफ्रेंड। क्या रत्नेश की गर्लफ्रेंड चित्रांगदा और मेरी दोस्त चित्रांगदा एक ही लड़की है। चित्रांगदा के पास से मेरा नावेल मिसेज सचान ने लिया था तो यक़ीनन रतनेश की गर्लफ्रेंड और मेरी दोस्त चित्रांगदा एक लड़की थी। चित्रांगदा ने एक सिने अभिनेता से शादी की थी और मिसेज सचान का लड़का रत्नेश भी एक सिने अभिनेता था।

अब तक मैं ये समझ चूका था ये खत मिसेज सचान ने लिखा था जबकि अब तक PS का मतलब मेरी समझ से बाहर था। और अब चित्रांगदा का सच....

उफ्फ्फ्फ़.....

मेरा सर चकराने लगा और मैं धम्म से सोफे पे बैठ गया। एक बार पलकें झपका के मेरी आँखें स्वतः ही खत को आगे पढ़ने लगी।

प्रियजीत तुम्हारी किताब पढ़के मुझे अपने बीते दिन याद आ गए। मुझे लगा तुम मेरे जैसा लिखते हो। मैं तुमसे मिलना चाहती थी। और मेरी ये इच्छा तुम्हारी पुस्तक के विमोचन में पूरी भी हो गई। और मैं तुम्हारी तरफ आकर्षित हो गई जबकि मैंने कभी खुद से वादा किया था कि कभी किसी पुरुष की ओर आकर्षित नहीं होउंगी।

पर तुम भी पुरुष हो प्रियजीत मैं ये भूल गई थी। मैंने कई बार रात के अँधेरे में तुम्हारे करीब आने की कोशिश की पर तुम मुझे ठुकराते रहे। और फिर तुम्हारी इन हरकतों से गुस्सा होकर मैं दिन के उजालों में तुम पर बेवजह अपना गुस्सा निकाल कर अपने को शांत करती रही। और फिर उस रात तुमने पूरी तरह से सिद्ध कर दिया कि तुम भी बाकी पुरुषों की तरह हो जब तुमने मेरी पहचान मेरी सफलताओं के बजाय मेरे अभिनेता बेटे रत्नेश की मां होने की वजह से किया। वो रत्नेश जिसने अपनी शादी की सूचना शादी करने के बाद दी।

प्रियजीत अब मैं तुमसे कभी नहीं मिलूंगी, तुम भी मुझसे नहीं मिलना क्योंकि मैं अब तुम्हारे सामने नहीं आना चाहती क्योंकि मैं लाइफ में किसी के तरफ आकर्षित तो पहले भी हुई पर प्यार शायद मुझे पहली बार हुआ है।

PS 

PS  का मतलब कोई भी हो क्या मालूम, मुझे तो बस ये मालूम था ये खत मिसेज सचान ने ही लिखा था। मतलब मिसेज सचान यही इसी रिसोर्ट में थी। पर कहाँ ?

हाँ जरूर वो अपने बंगले में होगी। ये ख्याल आते ही मैं उनके बंगले की ओर भागा। दरवाज़े में रखा छाता लेने की भी सुध नहीं रही। अब बारिश अपने प्रचंड वेग पे थी। मेरे कदमों ने सेकंडों में मिसेज सचान के बंगले तक का फसल तय कर डाला। मिसेज सचान के बंगले तक पहुँचते पहुँचते मेरे शरीर का रोयां रोयां बारिश ने भिगो डाला था।

मेरी बेक़रारी का आलम ये था कि मैंने दरवाज़े को नॉक करने की जगह सीधे धक्का दिया। दरवाज़ा बेआवाज़ खुल गया। अगर थोड़ी बहुत आवाज़ हुई भी होगी तो बारिश आवाज़ में दब गई होगी। मैं बंगले में आ गया। पूरा बंगला अँधेरे के हवाले था। मोबाइल की बैटरी जलाकर मैंने लाईट का स्विच ढूंढ कर आन कर दिया। बंगला रोशनी से नहा उठा।

मैं दीवानावार पूरे बंगले में मिसेज सचान को ढूंढ रहा था। वो कहीं नहीं थी। एक टेबल में एक फोटो फ्रेम की हुई रखी थी, न्यू मैरिड कपल की। मैं उन दोनों को जानता था। एक मशहूर हीरो मिसेज सचान का बेटा रत्नेश था और दूसरी मेरी दोस्त रही चित्रांगदा थी। मेरी नज़र एक पल के लिये उस फोटो पे ठहरी और फिर मैं वापस मिसेज सचान को तलाशने लगा।

मिसेज सचान को कहीं न पाकर मैं हताश उनके बंगले की बालकनी में आ गया। अब जबकि मिसेज सचान के बंगले का दरवाज़ा खुला था तो लाज़िमी था वो भी बंगले में होगी पर कहाँ। क्योंकि वो क्लब में तो नहीं थी।

अचानक मेरी नज़र नीचे की और गई।

मिसेज सचान के बंगला को पोशीर नदी को छूकर बहती थी। नदी तक नीचे जाने के लिए मिसेज सचान ने पत्थर की सीढ़ियां बनवा रखी थी जो एक लोहे के गेट से बंद रहती थी।

एकाएक बिजली चमकी और मैंने देखा मिसेज सचान सीढ़ियों पर बैठी है और नदी उनके बेहद करीब से गुज़र रही है। कई दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने नदी का जल स्तर बहुत ही बढ़ा दिया था। इस नदी में रिसोर्ट वालो ने अवैध डैम बना रखा थे, रिसोर्ट में पानी की आपूर्ति के लिए। अचानक मुझे भयानक आवाज़ सुनाई दी जैसे पत्थर खिसक रहे हो। यक़ीनन पानी का तेज बहाव डैम को अपने साथ बहा ले जाने को मचल रहा था।

मिसेज सचान !

मिसेज सचान !

मिसेज सचान !

मैंने उन्हें कई आवाजें दी पर या तो वो कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी या फिर बारिश की आवाज़ ने मेरी आवाज़ उन तक पहुँचने ही नहीं दी।

अचानक डैम खिसकने की वापस पुनः कर्कश आवाज़ गूंजी। मिसेज सचान ने वो आवाज़ भी नहीं सुनी होगी पर मैंने सुनी बिलकुल साफ साफ।

अगले ही पल मैं छलांग लगाकर भागा और कुछ समय में ही सीढ़ियां उतर के मैं मिसेज सचान के करीब पहुंचा। अगले ही पल एक भीषण ध्वनि के साथ बांध टूटा और पानी लहराते हुए हमारी और लपका। मैंने झुककर दिन दुनिया से बेज़ार मिसेज सचान को उठा के अपने कंधे पे डाला और तेजी से सीढ़ियां चढ़ने लगा।

बंगले में पहुंचकर मैंने मिसेज सचान को कंधे से नीचे उतारा तो वो बिना कुछ कहे सोफे पे बैठ गई। उनके बदन से बहता पानी सोफे को गिला करने लगा। मैं उन्हें देखता हुआ खड़ा रहा चुपचाप। कुछ देर बाद वो बोली 'प्रियजीत कपड़े बदल लो नहीं तो सर्दी लग जायगी।'

'अरे भाड़ में जाये सर्दी लगती है तो लग जाने दो।' मिसेज सचान की बात सुनकर मैं फट पड़ा और उनके पास सोफे के नीचे बैठते हुए बोला 'वहां अगर मुझे तनिक भी देर हो जाती तो वो नदी आपको कहाँ बहा कर ले जाती आपको मालूम है और यहां आप मुझे सर्दी न लग जाये इसके लिए फिक्रमंद है।'   

'बहाकर अगर ले भी जाती तो क्या होता, किसको क्या फ़र्क़ पड़ता प्रियजीत।' 

'क्या सिर्फ दूसरों को फ़र्क़ नहीं पड़ता इसलिए अपनी ज़िन्दगी गर्क कर देना जायज़ है मिसेज सचान।'

मेरी बात सुनकर मिसेज सचान कुछ देर खामोश बैठी रही और फिर उठकर शराब की बोतल से गिलास में शराब उड़ेलने लगी। मैंने उठाकर उनके हाथ से शराब की बोतल छीन ली।

'प्रियजीत लौटा दो बोतल मुझे इसकी जरूरत है।' कहकर मिसेज सचान मेरी ओर बढ़ी।

'लौटा दूंगा मिसेज सचान पर ये बोतल नहीं बल्कि वो चीज जिसकी आपको जरूरत है।'

'कौन सी चीज प्रियजीत ?'

वही मिसेज सचान जो आपने कभी छोड़ दी थी किसी के लिए।'

'क्या प्रियजीत ?' मिसेज सचान ने अपना हाथ शराब की बोतल की ओर बढ़ाया।

'तुम्हारा लेखन।' कहकर शराब की बोतल की और बढ़ रहा मिसेज सचान के हाथ को पकड़ के मैंने अपनी ओर खिंचा।

'मैंने लेखन किसी के प्यार के लिए छोड़ा था।' मिसेज सचान मेरे खींचने की वजह से मेरे सीने से लगते हुए बोली।

'और मैं तुम्हें प्यार करता हूँ मिसेज सचान इसलिए तुम्हें तुम्हारा शौक लौट रहा हूँ, मैं चाहता हूँ तुम वापस कहानियां लिखो।

'क्या कहा प्रियजीत तुम मुझे प्यार करते हो ?' मिसेज सचान ने मेरी आँखों में झांककर कहा।

'हैं मिसेज सचान मैं तुम्हें प्यार करता हूँ ।'

'झूठ कह रहे हो तुम प्रियजीत।' मिसेज सचान मुझसे अलग होते हुए बोली।

'ये सच है मिसेज सचान कि मैं तुम्हें प्यार करने लगा हूँ। मैंने उन्हें खींचकर वापस अपने सीने से लगा लिया था।

'अगर ये सच होता तो तुम इसे वक़्त मुझे मिसेज सचान नहीं बल्कि मेरे नाम से बुला रहे होते।'

'ओह तो तुम PS की बात कर रही हो पर मैं इसका मतलब नहीं समझ।' मैंने अबकी बार अपनी बात के साथ मिसेज सचान नहीं जोड़ा था।

'प्रियजीत अगर तुमने कभी मेरी बनाई पेंटिंग ध्यान से देखी होती तो तुम्हें आज PS का मतलब पूछने की जरूरत नहीं पड़ती और जबकि तुम कहते हो मुझे तुम प्यार करते हो।' कहकर मिसेज सचान ने वापस मेरी बाँहों से छूटने का प्रयास किया था।

उनकी बात सुनकर मैंने उनका चेहरा अपनी हथेलियों में देखकर उनकी आँखों में झांक कर कहा 'मिसेज सचान अब जबकि हर वक़्त मैं तुम्हारी आँखों को ही ध्यान से देखता रहा तो तुम्हीं कहो फिर कब मैं तुम्हारी पेंटिंग्स देखने का समय निकल पाता।' फिर मैं उनकी पीठ सहलाते हुए बोला 'कहो मिसेज सचान जब तुम सी हुस्न की देवी सामने हो तो क्या तुम्हारा प्रेमी तुम्हारे अलावा कुछ ओर भी देख सकता है।'

'प्राची  .. प्राची सचान। मिसेज सचान नहीं प्राची कहो।'  कह कर मिसेज सचान भी अब अपने नरम गुदाज़ हाथों से मेरी पीठ सहलाने लगी।

'प्राची.....।'

मेरे होठों ने उनका नाम किसी मन्त्र की तरह लिया और मेरे हाथों ने उनका खूबसूरत चेहरा अपनी ज़ानिब उठाया था। उनकी आंखें मेरी आँखों में खुद को तलाश रही थी और होठ लरज़ रहे थे।

अचानक मिसेज सचान, अरे नहीं नहीं प्राची अपने पंजों पे उचकी और उन्होंने अपने होठों से मेरे होठों को हलके से चूम लिया।

उनके इस प्रेम प्रदर्शन के बाद उनकी स्वर्णिम देह पे मेरी पकड़ सख्त हो गई और उनके चुम्बन का उत्तर देने के लिए मेरे होठ उनके होठों की ओर बढ़ गए।

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सुधीर मौर्य

गंज जलाबाद, उन्नाव

उत्तर प्रदेश - 209869

09145176548

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परिचय

नाम---------------सुधीर मौर्य 'सुधीर' 

जन्म---------------०१/११/१९७९, कानपुर

माता - श्रीमती शकुंतला मौर्य

पिता - स्व. श्री राम सेवक मौर्य

पत्नी - श्रीमती शीलू मौर्य

तालीम------अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा.

सम्प्रति------इंजीनियर, और स्वतंत्र लेखन.

कृतियाँ-------                                                 

                  1) 'हो न हो" (नज़्म संग्रह)

                  2) 'अधूरे पंख" (कहानी संग्रह)

                  3) 'एक गली कानपुर की' (उपन्यास)

          4)किस्से संकट प्रसाद के  (व्यंग्य उपन्यास)

                  5)अमलतास के फूल  (उपन्यास)

            6) देवलदेवी: एक संघर्षगाथा  (ऐतिहासिक उपन्यास )

            7) क़र्ज़ और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह )

            8) माई लास्ट अफेयर (उपन्यास)  

            9) वर्जित (उपन्यास)

            10) मन्नत का तारा (उपन्यास)

            11) ऐंजल ज़िया (कहानी संग्रह)

            12) पहला शूद्र (वेदककालीन उपन्यास) प्रकाशनाधीन 

पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन - खूबसूरत अंदाज़, अभिनव प्रयास, सोच विचार, युग्वंशिका, कादम्बनी, बुद्ध्भूमि, अविराम,लोकसत्य, गांडीव, उत्कर्ष मेल, अविराम, जनहित इंडिया, शिवम्, अखिल विश्व पत्रिका, रुबरु दुनिया, विश्वगाथा, सत्य दर्शन, डिफेंडर, झेलम एक्सप्रेस, जय विजय, परिंदे, मृग मरीचिका, प्राची, मुक्ता आदि में.

वेब प्रकाशन - गद्यकोश, स्वर्गविभा, काव्यांचल, इंस्टेंट खबर, बोलो जी, भड़ास, हिमधारा, जनहित इंडिया, परफेक्ट खबर, वटवृक्ष, देशबंधु, अखिल विश्व पत्रिका, प्रवक्ता, नाव्या, प्रवासी दुनिआ, रचनाकार, अपनी माटी, जनज्वार, आधी आबादी, अविराम, हिंदीनेस्ट, सरिता, प्रतिलिपि आदि में.

पुरस्कार - कहानी 'एक बेबाक लड़की की कहानी' के लिए प्रतिलिपि २०१६ कथा उत्सव सम्मान।

संपर्क----------------ग्राम और पोस्ट-गंज जलालाबाद, जनपद-उन्नाव,

पिन-२०९८६९,  उत्तर प्रदेश

ईमेल ---------------sudheermaurya1979@rediffmail.com

Sudheermaurya2010@gmail.com

                  blog --------------http://sudheer-maurya.blogspot.com

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(प्रस्तुत निबन्ध लेखक द्वारा वरिष्ठ वर्ग में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली द्वारा आयोजित प्रतियोगिता -95 -96 हेतु लिखा गया व पुरस्कृत हुआ)

नागरी लिपि के उद्भव और विकास को जानने के लिए यह आवश्यक है, कि हम पूर्ववर्ती साहित्य को देखें। प्राचीन काल के साहित्यिक ग्रन्थों वैदिक और बौद्ध साहित्य को देखने से स्पष्ट होता है, कि भारत में लेखन कला का प्रचार चौथी शताब्दी ई0 पू0 से बहुत पहले उपलब्ध था; जब कि इसके विपरीत योरोपीय लोगों का मानना है कि भारतीयों ने चौथी, आठवीं या दसवीं शती ई0 पू0 में लेखन कला का ज्ञान प्राप्त किया। जो कि मेरी दृष्टि में नितान्त सारहीन ,खोखला तथा भारतीयों को सांस्कृतिक दृष्टि से निम्न स्तर का प्रमाणित करने का षडयंत्र है।

नागरी लिपि का प्रयोग उत्तर भारत में 10 वीं शताब्दी से पाया जाता है। तो वहीं दक्षिण भारत में इसका प्रयोग 8 वीं श्ाती में ही विद्यमान था। जहां इसका नाम नंदिनागरी था। उत्तर और दक्षिण भारत के लिपि सम्बन्धी प्रयोग देखने के बाद यह तो स्पष्ट ही है ; कि 10 वीं शताब्दी में देवनागरी नाम प्रचलन मे था। दसवीं शताब्दी से आज तक देवनागरी की वर्णमाला मे पर्याप्त विकास हुआ। इसका स्वरूप शनैः -शनै : सुन्दर से सुन्दर तर अक्षरों के रूप में बदलता गया। जहां तक शिलालेख ,ताम्रपत्र, अभिलेख आदि का सम्बन्ध है तो इस काल में लिखे गए राजस्थान, संयुक्त प्रान्त, बिहार, मध्य भारत तथा मध्यप्रान्त के सभी लेख देवनागरी लिपि में ही पाये जाते है।जिनसे देवनागरी के उद्भव व विकास के क्षेत्र में सामग्री जुटाने हेतु पर्याप्त बल मिलता है।देवनागरी लिपि के विकास व प्रारम्भिकी स्थिति पर कुछ निष्कर्ष सामने आते हैं। जैसा कि दसवीं शताब्दी की नागरी में कुटिल लिपि की भांति अक्षरों का सिर चौड़ाई सदृश्ा और दो भांगों में विभाजित होता था। किन्तु ग्यारहवीं शती की नागरी लिपि वर्तमान देवनागरी से मिलती -जुलती है। बारहवीं शताब्दी आते -आते यह पूर्णतया आज की वर्तमान वैज्ञानिक लिपि देवनागरी हो जाती है अर्थात् आधुनिक समय की देवनागरी लिपि आज से नौ सौ साल पहले की नागरी लिपि का ही परिष्कृत रूप है। जिसने समय व परिस्थितियों के साथ स्वंय को बदला है। सभी से अनुकूलन कर सामंजस्य स्थापित किया है। देवनागरी ,नागरी की दसवीं शताब्दी से आज तक की विकास यात्रा पर डॉ0 गौरी शंकर हीराचन्द ओझा जी ने पर्याप्त प्रकाश डाला है। उनके अनुसार-'' ईसा की दसवीं शताब्दी की उत्तरी भारत की नागरी लिपि में कुटिल लिपि की नाई अ, आ, प, म, य, श् औ स् का सिर दो अंशों में विभाजित मिलता है, किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी मे यह दोनों अंश मिलकर सिर की लकीरें बन जाती हैं और प्रत्येक अक्षर का सिर उतना लम्बा रहता है जितनी कि अक्षर की चौड़ाई होती है।ग्यारहवीं शताब्दी की नागरी लिपि वर्तमान नागरी लिपि से मिलती -जुलती है और बारहवीं शताब्दी से लगाातार आज तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप मे चली आती है। '' ( भारतीय प्राचीन लिपि माला पृष्ठ संख्या- 69-70)

अन्य सार्थक पहलुओं के साथ देवनागरी लिपि के विकास मे अंकों की भूमिका भी अत्यन्त महत्वपूर्ण रही है, जिनका विकास क्रमिक रूप से हुआ है जो अंक -1 सातवीं और आठवीं शताब्दी तक पड़ी रेखा (-) के रूप मे लिखा जाता था। वही परिष्कृत होकर दसवीं शताब्दी आते -आते सीधी (।) खड़ी रेखा में लिखा जाने लगा। इसी भांति 2 और 3 की भी स्थिति हुई; जो आगे चलकर आज के इन वर्तमान रूप एवं स्वरूपों को प्राप्त हुए।

देवनागरी के नामकरण के सम्बन्ध में विद्वानों में पर्याप्त मत भेद रहा है। देवनागरी अथवा नागरी लिपि नाम क्यों पड़ा ? इस पर विभिन्न विद्वानों ने अपने -अपने विचार व्यक्त किये है। एक किन्तु ठोस सर्वमान्य मत कोई प्रस्तुत नहीं कर सका है। फिर भी हम प्रत्येक पर क्रमश्ाः प्रकाश डालने का प्रयास करेंगे-

1-कुछ विद्वान इसका सम्बन्ध नागर ब्राह्मणों से लगाते हैं, जो कि गुजरात में अधिक संख्या में हैं तथा वे इसका प्रयोग करते थे। इसी लिए यह लिपि देवनागरी कही जाने लगी।

2-एक दूसरे मत के अनुसार नागरी अर्थात् नगरों में प्रचलित होने के कारण नागरी कहलायी। नागरी से पूर्व 'देव' शब्द देवताओं का वाची है और इसी आधार पर इसे देवनागरी कहा जाता है।

3-इस मत के अनुसार - तान्त्रिक मन्त्रों में बनने वाले कुछ चिन्ह देवनगर कहलाते थे जिनसे मिलते -जुलते होने से इसका नाम लिपि से जुड़ गया और यह लिपि देवनागरी हो गयी।

4-आइ0 एम0 शास्त्री जी के विचारानुसार - ''देवताओं की मूर्तियां बनने के पूर्व सांकेतिक चिन्हों द्वारा उनकी पूजा होती थी। ये चिन्ह कई त्रिकोण तथा चक्रों आदि से बने हुए मंत्र थे; जो देव नगर कहलाता था के मध्य लिख जाते थे। देवनगर के मध्य लिखे जाने के कारण अनेक प्रकार के सांकेतिक चिन्ह कालान्तर में उन -उन नामों के पहले अक्षर माने जाने लगे और देवनगर के मध्य में उनका स्थान होने से उनका नाम देवनागरी हुआ।''

5- ललित विस्तार में संकेतित '' नाग'' लिपि नागरी है। 'नाग' से नागरी होना सरल है का उल्लेख मिलता है। जिसका तीव्र विरोध करते हुए डा0 एल0डी0 वार्नेट ने कहा है-''कि 'नागलिपि' का नागरी लिपि से कोई सम्बन्ध नहीं है।''

6-काशी (वाराणसी) का दूसरा नाम देवनगर है। यहां प्रचलित होने के कारण देवनागरी स्पष्ट शब्दों में यही देवनागरी है।

7-डॉ0 धीरेन्द्र वर्मा के अनुसार -मध्य युग में स्थापत्य की एक शैली नागर थी। उसमें चतुर्भुज आकृतियां होती थीं। इन चर्तुमुखी आकृतियों के कारण ही इसे देवनागरी कहा गया।

उपयुक्त सभी मत देखने से स्पष्ट होता है, कि सभी परस्पर विरोधी हैं तथा एक -दूसरे से अत्यन्त दूर जान पड़ते हैं। नागरी शब्द नागर से निर्मित हुआ है जिसका अर्थ है -नगर का अर्थात् सभ्य, शिष्ट और शिक्षित। वस्तुतः जिस लिपि में सभ्य, शिष्ट, सुसंस्कृत और परिष्कृत रुचि वाले व्यक्यिों द्वारा साहित्य रचा और लिखा गया ।वही नागरी लिपि कहलायी और कालान्तर में अपने विकास के आयामों का स्पर्श करती हुई देवनागरी लिपि के रूप में जानी जाने जगी ।

देश व समाज में होने वाले सांस्कृतिक ,राजनीतिक व नैतिक परिवर्तनों सें भाषा व लिपि अछूती रह जाए ऐसा तो संभव ही नहीे है। देवनागरी लिपि पर भी देश की परिवर्तित परिस्थितियों, सांस्कृतिक आक्रमणों ,राजनीतिक अस्थिरता, सामाजिक, धा`िर्मिक आन्दोलनों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। देवनागरी लिपि विभिन्न भाषाओं और उनके प्रभावों से प्रभावित हुए बिना न रह सकी।देवनागरी को सर्वाधिक प्रभावित किया है फारसी ने। क्योंकि भारत भूमि फारसी के प्रभाव में निरन्तर आठ सौ वर्षौं तक रही है। यही वह समय भी था। जब नागरी विकास के सोपान चढ़ रही थी और ऐसी स्थिति में अधिक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। जिसके परिणाम स्वरूप देवनागरी में जिह्नामूलीय ध्वनियां क, ख, ग,फ, आदि विकसित हुईं। डॉ0 भोलानाथ तिवारी के अनुसार-'' नागरी में नुक्ते या बिन्दु का प्रयोग निश्चित रूप से फारसी का प्रभाव हैं मध्य युग में कुछ लोग य, प दोनों को य जैसा और व, ब को व लिखने लगे थे। फारसी के बाद यदि किसी भाषा या संस्कृति ने सर्वाधिक प्रभावित किया है; तो वह अंग्रेजी ही रही है। जिसके प्रभाव वश देवनागरी लिपि में अनेक परिवर्तन हुए। परिणामत : आज भी यदि कोई अंग्रेजी पढ़ा-लिखा देवनागरी में लिखता है, तो वह अंग्रेजी की ही भांति बिना लेखनी उठाये लिखता चला जाता है। अंग्रेजी ने हमारे विराम चिन्हों ,उद्धरण चिन्हों, अल्प -अर्द्ध विराम आदि को भी प्रभावित किया है। यदि हम पूर्ण विराम को छोड़ दे तो लगभग सभी पर अंग्रेजी का प्रभाव परिलक्षित होता है। कुछ विद्वजन तो ऐसे भी देखे जा सकते हैं जो आज तक पूर्ण विराम के लिए पाई (। ) का प्रयोग न कर केवल (ं ∙) बिन्दु का उपयाग करते हैं बल्कि यह दुर्भाग्य अथवा लिपि के भाग्य की बिडम्बना ही कही जाएगी। कि आज भी कुछ हिन्दी पत्रिकाएं पूर्र्ण विराम के लिए मात्र बिन्द ु(∙) को ही मान्यता देती हैं। अंग्रेजी प्रभाव के सन्दर्भ में डॉ0 भोलानाथ तिवारी का मत है कि-'' भाषा के प्रति जागरूकता के कारण कभी-कभी ह्नस्व ए ,ओ के द्योतन के लिए अब ऐं , ओं का प्रयोग भी होने लगा है।''

बंगला लिपि का देवनागरी के विकास पर कोई विशेष प्रभाव न पड़ सका। हाँ डॉ0 मनमोहन गौतम का मत अवश्य इस सम्बन्ध मे उदधृत करना चाहेंगे। उनके अनुसार- ''अक्षरों की गोलाई पर बंगला का प्रभाव अवश्य दिखलाई पड़ता है। चौकोर लिखे जाने वाले अक्षर अब गोलाई में लिखे जाने लगे हैं।''

मराठी ने भी देवनागरी लिपि को प्रभावित करने में कोई कृपणता नहीं की। बल्कि इसके प्रभाववश एक ही वर्ण दो -दो रूपों में प्रचलित हुआ है। उदाहरणार्थ -न्न्र -अ, भ - झ आदि।

गुजराती लिपि ने भी देवनागरी को प्रभावित किया है। चूँकि गुजराती लिपि शिरोरेखा विहीन लिपि है। इस कारण परिणामतः आज भी अनेक विद्वान शिरोरेखा के बिना ही लिखते चले जाते हैं। जिनमें से अधिसंख्य गुजराती साहित्य से प्रभावित ही हैं।

देवनागरी लिपि की विशेषताओं पर यदि हम दृष्टि डालें तो पाते हैं ,कि यह आज की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। जिसकी सर्व प्रिय विशेषता है - जैसा लिखना वैसा पढ़ना। इसमें अंग्रेजी अथवा उर्दू की भॉति लिखा कुछ और पढ़ा जाता कुछ नहीं ; बल्कि इसकी ध्वनियां इतनी पूर्ण व सशक्त हैं, कि इसमें जो जैसा लिखा जाता है वैसा ही बोलकर पढ़ने की अपूर्व क्षमता है। इसके उच्चारण स्थान मुख, तालु , मूर्धा, दन्त्य और ओष्ठ में विभाजित है। जिस क्रम में उच्चारण के स्थान हैं। ठीक वही क्रम स्वर व व्यंजन के विभाजन का भी है। इसमें स्वर -व्यंजनों की तरह एक ही वर्ण को कई -कई ध्वनियों के रूपों में प्रयोग नहीं किया जाता है, बल्कि प्रत्येक ध्वनि के लिए एक अलग वर्ण है। संसार की किसी भी भाषा -लिपि में स्वरों की मात्राएं भी निश्चित नहीं हैं। लेकिन देवनागरी लिपि के स्वरों की मात्रायें भी निश्चित की गई हैं। यह ध्वनि प्रधान लिपि है। वर्णों का क्रम उच्चारण स्थानों के आधार पर क्रमबद्ध किया गया है।प्रत्येक उच्चारण स्थान की ध्वनि भिन्न होती है। किसी भी ध्वनि के लिए हमें किसी प्रकार की न्यूनता का आभास नहीं होता है। तुलनात्मक दृष्टि से भी देखें तो देवनागरी लिपि अति उत्तम है।अंग्र्रेजी और उर्दू की भॉति वर्ण संकेतों की अल्पता नहीं है। कुँवर को कुनवर ,जेर जेबर, पेश का अभाव जैसी समस्यायें भी नहीं हैं। बल्कि इसमे मात्राओं का निश्चित विधान मिलता है। ह्नस्व और दीर्घ की मात्राएं भी निश्चित हैं।

निष्कर्षत : नागरी के नाम से आरम्भ की गई अपनी यात्रा के अनेक पड़ावों ,भाषायी प्रभावों मत - मतान्तरों आदि को अपने में आत्मसात करती हुई देवनागरी अपने विकास के उच्चतम शिखर की ओर बढ़ रही है। जिसमे उसकी सरलता, बोधगम्यता ,उच्चारण की शुद्धता, वैज्ञानिकता ध्वनि लिपि की विशेषता पर्याप्त योग देकर नूतन आयामों को स्पर्श कराने में सहयोग कर रही है। आशा है कि लिपि देवनागरी अपने लक्ष्य तक की यात्रा बड़ी सुगमता से पूर्ण कर लेगी।

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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फिल्म के निर्माण की अनेक महत्त्वपूर्ण कड़ियों में से अहं कड़ी हैं - संवाद। संवाद सृजन प्रक्रिया के साथ जुड़नेवाली कला है। संवादों के माध्यम से कहानी को कथात्मक रूप से संवादात्मक और नाटकीय रूप प्राप्त होता है, जिसका उपयोग अभिनय के दौरान होता है। फिल्मों की व्यावसायिक और कलात्मक सफलता भी तस्वीरों की सूक्ष्मताओं और संवाद के आकर्षक होने पर निर्भर होती है। न केवल भारत में बल्कि विश्व सिनेमा में आरंभिक फिल्में अवाक (बिना आवाज) की थी। इन्हें सवाक (वाणी के साथ, आवाज के साथ) होने में काफी समय लगा। हालांकि सिनेमा के निर्माताओं की मंशा इन्हें आवाज के साथ प्रदर्शित करने की थी परंतु तकनीकी कमजोरियां और कमियों के चलते यह संभव नहीं हो सका। धीरे-धीरे दर्शकों का और सारी दुनिया का सिनेमा के प्रति आकर्षण उसमें नई-नई खोजों से इजाफा करते गया और फिल्में सवाक बनी और आगे चलकर रंगीन भी हो गई। चित्रों के माध्यम से प्रकट होनेवाली कथा-पटकथा संवाद के जुड़ते ही मानो लोगों के मुंह-जुबानी बात करने लगी। लोग पहले से अधिक उत्कटता के साथ फिल्मों से जुड़ने लगे और विश्वभर में सिनेमा का कारोबार दिन दुनी रात चौगुनी प्रगति करने लगा। फिल्मों के लिए चुनी कहानी को पटकथा में रूपांतरित करने के लिए और पटकथा को संवादों में ढालने के लिए आलग-अलग व्यक्तियों की नियुक्तियां होने लगी। इसमें माहिर लोग पात्रों के माध्यम से अपने संवाद कहने लगे और आगे चलकर यहीं संवाद लोगों के दिलों-दिमाग की बात भी करने लगे। संवादों का फिल्मों के साथ जुड़ते ही फिल्में सार्थक रूप में जीवंत होने की ओर और एक कदम उठा चुकी।

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1. फिल्मी संवाद के प्रकार

फिल्मी संवादों को असगर वज़ाहत जी ने चार वर्गों में विभाजित किया है। उन्होंने कहा है कि "संवादों के माध्यम से न केवल साधारण बातचीत होती है बल्कि भावनाओं और विचारों को भी व्यक्त किया जाता है। परिस्थिति और घटनाओं का ब्योरा दिया जाता है, टिप्पणियां की जाती हैं। संवादों का बहुआयामी स्वरूप उसके प्रकार निर्धारित करने पर बाध्य करता है। संवाद के विविध प्रयोगों के आधार पर संवाद को चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – (1) सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, (2) औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, (3) विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और (4) भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 72)

अ. सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद – सामान्य जानकारी देनेवाले संवाद सीधे-साधे और सरल होते हैं। इनके माध्यम से केवल जानकारी और सूचनाएं प्राप्त होती है। इसकी भाषा और भाषा में निहित अर्थ दर्शकों की समझ में आसानी से आता है। इसमें कोई अतिरिक्त भाव नहीं होता है। इन संवादों में कोई चमत्कार और टेढ़ापन भी नहीं होता है। कोशिश यह होती है कि दर्शक पात्रों की भाषा को आसानी समझे और भ्रांति पैदा न हो।

आ. भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद – मनुष्य के स्थायी भाव ग्यारह प्रकार के हैं और इनके साथ जुड़कर आनेवाले विभाव, अनुभाव और संचारी भावों की संख्या भी अधिक हैं। अर्थात् विभाव, अनुभाव और संचारी भाव स्थायी भावों को ताकद प्रदान करते हैं और इन भावों को बड़ी सार्थकता के साथ फिल्मी संवादों में इस्तेमाल किया जाता है। फिल्मों में संवादों के माध्यम से मनोभावों को प्रकट करना कठिन और जटिल कार्य है। हर कहानी और पटकथा में यह भाव सर्वत्र बिखरे पड़े होते हैं और उनको बड़ी सादगी के साथ क्रम से सजाना होता है। संवाद लेखक के लिए चुनौती यह होती है कि सभी फिल्मों मे कम-अधिक मात्रा में यहीं भाव होते हैं तो अभिव्यक्ति करते वक्त कौनसे शब्दों और वाक्यों को चुना जाए। इतनी सारी फिल्में बन रही हैं और उनमें वहीं भाव प्रकट हो रहे हैं तो पुनरावृत्ति होने की संभावनाएं होती है। उससे बचने के लिए भावानुरूप शब्दों का चुनाव और संवाद लेखन कौशल का कार्य माना जाता है।

इ. विचार व्यक्त करनेवाले संवाद – विचार प्रकट करना जटिल कार्य है और इसकी भाषा आमतौर पर परिष्कृत होती है। फिल्मों में अगर परिष्कृत भाषा का प्रयोग किया जाए तो साधारण दर्शक की समझ में नहीं आएगी। अतः संवाद लेखक की यह जिम्मेदारी है कि परिष्कृत भाषा को थोड़ा नरम करते हुए दर्शकों को समझनेवाली भाषा के शब्दों को चुने और फिल्मी विषय तथा प्रसंग के भाषागत नीति-नियम की भी हानी न हो पाए। संवाद लेखक को ऐसे शब्दों का चुनाव करना पड़ता है जो पारिभाषिक न होते हुए भी विचार को व्यक्त करने में सक्षम हो।

ई. औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद – फिल्मों में कई औपचारिक प्रसंग आ जाते हैं जहां संवाद लेखक के लिए समतोल बनाने की आवश्यकता होती है। अदालती भाषा, पुलिस कार्य प्रणाली की भाषा, सरकारी कार्यालयों की भाषा आदि औपचारिक संवादों की श्रेणी में आते हैं और इन संवादों में संवाद लेखक को ऐसी भाषा के निकट पहुंचना पड़ता है। फिल्मों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल अगर हो जाए तो फिल्में यथार्थ के अधिक निकट पहुंच जाती है। तीन घंटे तक दर्शक के दिलों-दिमाग पर अगर राज करना है तो कसे हुए संवादों की आवश्यकता है।

2. फिल्मी संवाद की भाषा

संवाद के प्रकारों के भीतर संवाद की भाषा कैसी होनी चाहिए इस पर चर्चा हो चुकी है उसी चर्चा को यहां आगे बढ़ाया जा सकता है। संवादों की भाषा हमेशा गतिशील होती है और उसका गतिशील होना कहानी के हित में होता है, परंतु संवाद लेखक के लिए इस भाषा को गतिशील रखना एक प्रकार की चुनौती होती है। फिल्मों में आनेवाले पात्र हमारे आस-पास उपलब्ध होते हैं या यूं कहे कि मानवी जीवन की ही कहानियां फिल्मों में होती हैं, तो उसमें भाषाई प्रयोग भी उन पात्रों के अनुकूल ही होता है। संवादों की भाषा सबके लिए संप्रेषणीय होनी चाहिए क्योंकि फिल्में और धारावाहिकों को व्यापक जनसमुदाय देखता है और इस जनसमुदाय को वह समझ में आनी चाहिए। भाषा में सुगमता और सर्वग्राह्यता भी आवश्यक है। संवादों की स्वाभाविक भाषा लेखक की नहीं तो पात्रों की होती है। फिल्मी संवाद की भाषा को निम्म आकृति के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है।

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सामान्य जानकारी देने या लेनेवाले संवाद, औपचारिक कार्य-व्यापार की सूचना देनेवाले संवाद, विचार व्यक्त करनेवाले संवाद और भावनाएं व्यक्त करनेवाले संवाद यह चार संवादों के प्रमुख प्रकार हैं और इन प्रकारों के अनुरूप फिल्मों की भाषा बनती है। संवादों के प्रकारों में इसका विश्लेषण हो चुका है, अतः पुनरावृत्ति को रोकने के लिए यहां पर उसकी चर्चा नहीं कर रहे हैं। यहां जो अन्य बातें हैं उस पर संक्षेप में चर्चा कर सकते हैं जिसके भीतर भाव प्रधान संवाद और अन्य भाषाई प्रयोगवाले संवाद फिल्मों में सौंदर्य निर्माण करने का कार्य करते हैं।

फिल्मों में भावनाएं होती हैं और मनुष्य के ग्यारह प्रकार के स्थायी भाव – प्रेम (रति), उत्साह, हास, शोक, क्रोध, भय, घृणा (जुगुप्सा), विस्मय, निर्वेद (शम), श्रद्धा और वत्सलता का फिल्मों में अंकन होता है। इन भावों के अनुकूल शब्दों का चुनाव अत्यंत आवश्यक होता है। इन भावों के प्रकटीकरण के लिए संवाद लेखक अभिधा, लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का इस्तेमाल करते हुए संवाद लेखन करता है। व्यंजना शब्द शक्ति के भीतर अलंकारिक भाषा का भी उपयोग होता है। परंतु इन सारी विशेषताओं को संवाद की भाषा के साथ जोड़ते वक्त इस बात का ध्यान रहे कि संवाद स्वाभाविक, सरल और पात्रानुकूल बने। अतिशयता और अतिरंजितता विषय को खतरा पैदा कर सकती है।

· प्रतीक – "संवाद की भाषा में प्रतीक का प्रयोग अभिव्यक्ति के स्तर को बहुत ऊपर उठा देता है। किसी भाव या विचार को बहुत प्रभावशाली ढंग से बताने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं। प्रतीक आमतौर पर जनसाधारण में प्रचलित हैं और उनका संवाद में प्रयोग बहुत सरलता से पूरा संदेश प्रेषित कर देता है। मुख्य रूप से प्रतीक की विशेषताएं ये हैं कि वह अप्रस्तुत को प्रस्तुत कर देते हैं। मन में तुरंत किस भावना का संचार होता है। प्रतीक प्रायः अपने देश की संस्कृति, सभ्यता और इतिहास से प्रेरित होते हैं। प्रतीक बनने की प्रक्रिया लगातार जारी रहती है। प्रतीक के प्रयोग से न केवल वाक्य में नयापन आता है बल्कि उसका प्रभाव बढ़ जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 86-87)

उदा. मेरे दोस्त के घर में महाभारत शुरू है। एक भाई भीम की तरह कौरव सेना पर टूट पड़ा है। यहां पर महाभारत, भीम, कौरव सेना आदि भाषाई प्रयोग प्रतीक है।

· बिंब – फिल्में देखी जाती है अर्थात् वह दृश्य माध्यम है। फिल्मों में दृश्य स्वरूप में बिंबों को चित्रित किया जाता है। फिल्मों में यह अत्यंत प्रभावी प्रयोग है। बिल्कुल कम शब्दों में फिल्मी संवाद के भीतर बिंबों की सहायता से ताकत आ जाती है। फिल्मों में जहां दृश्य बिंब बनाना संभव नहीं वहां शब्द बिंबों की मदत ली जाती है। इसके कारण भावनाएं अधिक प्रभावशाली बन जाती है, संवादों में ताजगी और जीवंतता आती है।

उदा. खेत में काम करने के बाद अगर परिवार के सदस्य थक चुके हैं तो होनेवाले संवाद की भाषा में बिंबों का इस्तेमाल किया जाए तो इस प्रकार संवाद बनेगा – "मैं आज चुर-चुर हो गया हूं। क्या मेरे माता-पिता भी इसी प्रकार चुर-चुर हो गए होंगे। आज जैसे लग रहा है सारा शरीर चक्की में डालकर पिसा गया हो। क्या मां भी ऐसा ही महसूस कर रही होगी।"

· मुहावरा और लोकोक्ति (कहावत) - "भाषा में मुहावरों के माध्यम से सटीक और प्रभावी अभिव्यक्ति होती है। किसी प्रसंग या अभिव्यक्ति विशेष के संबंध में शताब्दियों से संचित अनुभव मुहावरों के रूप में स्थापित हो गए हैं। मुहावरों के माध्यम से न केवल सटीक बात कही जाती है बल्कि मुहावरे ऐसे बिंब भी बनाते हैं जो श्रोता को सरलता से गहराई तक ले जाते हैं। बोल-चाल की भाषा में मुहावरों का इस्तेमाल अक्सर किया जाता है। मुहावरे संवाद की भाव प्रधान भाषा में बहुत उपयोगी साबित होते हैं। लेकिन यह देखना आवश्यक है कि मुहावरा पूरे प्रसंग में सटीक बैठता हो और सिनेमा का दर्शक समुदाय उसे अच्छी तरह समझता हो। संवादों में मुहावरों का प्रयोग बहुत सोच-समझकर उचित स्थान पर ही करना चाहिए। मुहावरों की तरह लोकोक्तियां भी शताब्दियों से बोल-चाल की भाषा का हिस्सा हैं। लोकोक्तियां जीवन के कार्य व्यापार से संबंधित अनुभव आधारित अभिव्यक्तियां हैं, जो प्रायः सर्वमान्य हैं। मतलब यह कि उनके द्वारा व्यक्त किया गया मत प्रायः स्वीकार किया जाता है। मुहावरा कुछ शब्दों का समूह माना जाता है, जो एक साथ मिलकर अभिव्यक्त होते हैं। मुहावरों का सीधा अर्थ न होकर कोई और लक्षित अर्थ होता है। मुहावरें जब वाक्य में प्रयोग किए जाते हैं तब शब्दों को नया आयाम मिलता है। मुहावरों के शब्दों को समान्यतः बदला नहीं जाता क्योंकि ऐसा करने से उनका प्रभाव नष्ट होता है। लोकोक्तियां प्रायः वाक्य जैसी होती है। उनमें कोई अनुभव जनित सच्चाई छिपी होती है। लोकोक्तियां छोटी होती हैं। भाषा सरल होती है। इनमें लोकजीवन के तत्त्व भी होते हैं। लोकोक्तियों का प्रयोग वाक्य में नहीं किया जाता, इन्हें उदाहरण के तौर पर कहां जाता है।" (पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, पृ. 88)

उदा. उंगलियों पर नचाना (मुहावरा) – किसी को पूरी तरह अपने काबू में कर लेना। फिल्मों में कोई पात्र दूसरे पात्र के दिमाग और मन पर हांवी हो गया हो तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

तलवे चाटना (मुहावरा) – बहुत खुशामद करना, चापलुसी करना। फिल्मों में कोई पात्र अपने लाभ के लिए या भय से दूसरे पात्र की बहुत खुशामद कर रहा है, चापलुसी कर रहा है तो इस मुहावरे का इस्तेमाल हो सकता है।

अकल बड़ी की भैंस (लोकोक्ति) – बुद्धिमानी सबसे बड़ी ताकत है। बुद्धि और ताकत के इस्तेमाल से कोई काम किया जा रहा है और उस प्रसंग में सफलता बुद्धि के बल मिल जाए तो इस लोकोक्ति का इस्तेमाल होता है।

आम के आम गुठलियों के दाम (लोकोक्ति) – किसी काम से दोहरा फायदा होना। पर्यावरणीय संदेश देनेवाली फिल्म में पेडों को लगाने का आवाहन किया है और ऐसी स्थितियों में लोगों ने ऐसे पेड़ लगाए जो पर्यावरणीय संरक्षण करते हैं और फल भी देते हैं तो यहां पर इस लोकोक्ति का उपयोग हो सकता है।

सारांश

प्रारंभिक फिल्में अवाक थी। उनके साथ कोई संवाद नहीं था। चित्रों और अभिनय के माध्यम से फिल्म के कहानी को समझना पड़ता था। परंतु जैसे ही फिल्मों के साथ संवाद जुड़े तो सिनेमाघरों में तहलका मचने लगा। लोगों के दिलों-दिमाग की बातें संवादों के माध्यम से पर्दे पर साकार होने लगी। संवादों के जुड़ने से सिनेमा पहले से ज्यादा जीवंत हो गया। कहानीकार, पटकथा लेखक और संवाद लेखक की त्रयी सिनेमा को और अधिक प्रभावशाली बनाने में कामयाब हो गई। हालांकि संवादों का अस्तित्व हमारे कहानियों में पहले से मौजूद था अड़चन थी उसे तकनीकी तौर पर फिल्मों के साथ जुड़ने की। संवाद जब तकनीकी तौर पर सिनेमा से जुड़े तब अभिनय, चित्र और सिनेमा भी सार्थक बन गया। पात्रों के बीच चलनेवाले संवाद मनुष्य के विविध भावों को और मनोदशाओं को पर्दे पर सफलता के साथ प्रदर्शित करने में सफल हो गए हैं।

संदर्भ ग्रंथ सूची

1. कथा, पटकथा, संवाद – हूबनाथ, अनभै प्रकाशन, मुंबई, 2011.

2. पटकथा लेखन एक परिचय – मनोहर श्याम जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2000, आवृत्ति 2008.

3. पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका – असगर वज़ाहत, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, छात्र संस्करण 2015.

4. मानक विशाल हिंदी शब्दकोश (हिंदी-हिंदी) – (सं.) डॉ. शिवप्रसाद भारद्वाज शास्त्री, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, परिवर्द्धित संस्करण, 2001.

5. सिनेमा : कल, आज, कल – विनोद भारद्वाज, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2006.

6. हिंदी साहित्य कोश भाग 1, पारिभाषिक शब्दावली – (प्र. सं.) धीरेंद्र वर्मा, ज्ञानमंड़ल लि. वाराणसी, तृतीय संस्करण, 1985.

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डॉ. विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद - 431005 (महाराष्ट्र).

ब्लॉग - साहित्य और समीक्षा डॉ. विजय शिंदे

मयंक घेदिया की कलाकृति

हुये रिटायर जोब से, अब पूरा आराम   
बीवी से लो मिल गये, बर्तन घीसू काम

रिटायर हैं ऑफिस की, दौड़ गई अब छूट
चक्कर सैन्ट्रल-लिंक के, घिसते जाते बूट

ऐलारम टिन टिन करे, गुस्सा ऐसा आय
एक हथोड़ा मार कर, कचरे में हो बाय

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चांद सितारे सो गये, पक्षी को विश्राम
नर मूरख है जाग कर, सपने में भी काम

जमी आसमाँ सो रहे, पृथ्वी ऊंघे खूब
खर्राटे भरती हवा नर क्यों जाता ऊब

दस घंटा ऑफिस रहे, लेपटॉप ले साथ
करो वर्क घर से अलग, मैनेजर है नाथ

बोर हुआ है उद्यमी, खालीपना उबाय
सुस्त बड़े आराम से, कुर्सी पर ले चाय

मन की वृत्ति शान्त है, करे जुगाली  गाय  
नर ठूँसता फास्ट फूड   जल्द निवाला खाय

झर झर झरना, सो रहा   बगुला आँखें मींच
नर सोता तकिया लिये खर्राटों के बीच

ढांढस बँधी-पगार से, मस्ती का बीज बोय
पेंशन में टेंशन बहुत, जल्दी खाली होय।
 

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हरिहर झा

जन्म स्थान: बांसवाड़ा ( राजस्थान )

प्रकाशित कृतियाँ:  "भीग गया मन", और “Agony churns my heart”। मेलबर्न पोयेट्स एसोसियेशन द्वारा द्विभाषी काव्यसंग्रह “Hidden Treasure” में तथा गेलेक्सी पब्लिकेशन द्वारा “Boundaries of the Heart” में कविता प्रकाशित हुई।
सरिता में लेख व वेब-दुनिया, साहित्य-कुंज, पूर्वाभास, काव्यालय , परिकल्पना, अनुभूति़, हिन्दीनेस्ट, कृत्या़ (हिन्दी व अँगरेजी), काव्यालय आदि में कवितायें प्रकाशित हुई। ’इंटरनेशनल लाइब्रेरी इन पोयट्री’ ने दो कविताओं को “Sound of Poetry” कविता की एलबम में शामिल किया। स्वयं की हिन्दी कविताओं पर दो संगीतबद्ध एलबम निकले।

लेखन: सृजनगाथा के स्तंभलेखक की हैसियत से आस्ट्रेलिया की संस्कृति और इतिहास पर लिखने के अलावा जोन हॉवर्ड, केरी पेकर, बुकर एवार्ड के विजेता पीटर केरी आदि कईं प्रसिद्ध व्यक्तियों पर आलेख लिखे तथा यहाँ के जाने माने भारतवंशियों के साक्षात्कार लिये। आपने ’हिन्द-युग्म’ के लिये रचनात्मक सहयोग दिया। शेक्सपियर के सोनेट का अनुवाद भी किया। काव्यसंग्रह में - देशान्तर, गुलदस्ता,बूमरैंग, अंग अंग में अनंग, मृत्युंजय, नवगीत-२०१३, VerbalArts(GJPP Author Press).

 

सम्मान: अँगरेजी कविताओं पर boloji द्वारा सम्मान और ’इंटरनेशनल सोसाइटी ऑफ़ पोयट्स’ (लास वेगास) तथा ’इंटरनेशनल लाइब्रेरी इन पोयट्री’ द्वारा एवार्ड मिले । हिन्दी व अँगरेजी कविताओं के योगदान के लिये भारतीय प्रौढ़ संघ (NRISA) ने इस वर्ष आपको “Community Service Award” प्रदान किया। साथ ही आपको परिकल्पना हिन्दी भूषण सम्मान (2013) भी मिला। 2015 में अनहद कृति द्वारा काव्य-प्रतिष्ठा-सम्मान मिला।[

 

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यह कोई नई बात नही है कि शब्दों में अथाह ऊर्जा होती है. गर हम गौर करें तो पाएगें कि हमारा सम्पूर्ण जीवन ही उस तरफ प्रवाहित होता है, जिस तरफ की अधिक ऊर्जा हमारे अन्दर सन्चित होती है. हाँ यह जरूर है कि वह सकारात्मक ऊर्जा भी हो सकती है और नकारात्मक ऊर्जा भी. यदि हमारे अन्दर सकारात्मक ऊर्जा अधिक है तो हम स्वतः हर रोज कुछ न कुछ नया सीखते समझते हुए आगे बढ़ते जाते हैं और इसके विपरीत यदि हमारे अन्दर नकारात्मक ऊर्जा अधिक है तो हम दिन प्रतिदिन वक्त की उठा-पटक से परेशान होकर अवनति की ओर बढ़ते जाते हैं. वास्तविकता तो यह है कि हम अधिकतर लोग इस मनोवैज्ञानिक सच को भलीभाँति समझ ही नही पातें हैं और सिर्फ अपनी किस्मत को कोसते हुए जिन्दगी को जैसे तैसे व्यतीत करते रहते हैं.

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अच्छा, व्यवहारिक तौर पर जरा विचारिए. यह शब्द ही है जो जोड़ भी सकता है और तोड़ भी, अपना भी बना सकता है और अपनों को दूर भी कर सकता है, बहुत कुछ दिला भी सकता है और गवाँ भी सकता है. परन्तु एक अहम सवाल यह है कि ये शब्द आते कहाँ से हैं ? सवाल बिल्कुल वाज़िब है. आप शायद यह महसूस किए होंगे कि जैसा हमारा अन्तःकरण होता है ठीक वैसा ही हम बाह्य आचरण भी करते हैं. यानी हम सीधे तौर पर यह कहें कि हमारे शब्द हमारे अन्तःकरण की ही अभिव्यक्ति हैं. सन्त कबीर दास जी ने बिल्कुल ठीक कहा था - एक शब्द सुखरास है, एक शब्द दुखरास. एक शब्द बन्धन करै, एक करै गलफाँस. यानी आपके शब्द आपको सुख, दुःख, बन्धन और मुक्ति सब कुछ दिला सकते हैं.

शब्दों के सम्बंध में कई महान विचारकों के मत् निम्न है-

1- कन्फ्यूशियस : शब्दों को नाप तौल कर बोलें, जिससे तुम्हारी सज्जनता टपके.

2- ऋषि नैषध : मितं च सार वाचो हि वाग्मिता, अर्थात् थोड़ा और सारयुक्त बोलना ही पाण्ड़ित्य है.

3- जे कृष्णमूर्ति : कम बोलो, तब बोलो जब यह विश्वास हो जाए कि जो बोलने जा रहे हो, उससे सत्य, न्याय और नम्रता का नाश नही होगा.

4- संत तिरूवल्लुवर : जो लोग बिना सोचे विचारे बोलते है, वे उस मूर्ख व्यक्ति की तरह होते हैं, जो फलों से लदे वृक्ष से पके फलों को छोड़कर कच्चे फलों को तोड़ते रहते हैं.

5- आचार्य चाणक्य : वाणी की पवित्रता ही सच्चा धर्म है.

जरा गौर कीजिए, श्री कृष्ण ने महाभारत में बिना अस्त्र-शस्त्र लिए ही अपने शब्दों के बल पर पूरे युद्ध को अपने हिसाब से चलाते गए. इतना ही नहीं, हम यह कह सकते हैं कि महाभारत का युद्ध ही पूर्णतया शब्दों पर केन्द्रित था. गर श्री कृष्ण जी ने अपने शब्द ऊर्जा का प्रवाह इस प्रकार न किया होता तो रणभूमि में होकर भी अर्जुन शायद अपना अस्त्र शस्त्र रखकर मैदान छोड़कर हट जाते. जब एक युद्ध में शब्दों की इतनी बड़ी महत्ता हो सकती है तो हमारे व्यक्तिगत जीवन में निश्चित रूप से शब्दों का बहुत बड़ा योगदान होता है, बस इसे समझने की आवश्यकता है.

विशेष ध्यातव्य है कि जीवन का एक चक्र होता है. सकारात्मकता हमें अग्रसित करती है और साथ ही साथ सबको आकर्षित भी करती है. सकारात्मक शब्द, सकारात्मक विचारों से उत्पन्न होते हैं. सकारात्मक विचार हमारे सकारात्मक वातावरण और संस्कार से मिलते हैं. सकारात्मक वातावरण हमारे सत्कर्मों से बनते हैं. शब्द ही सत्कर्म की प्रेरणा होते हैं. कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि अपनी एक नई दुनिया बनाइए, उसी में व्यस्त रहिए, मस्त रहिए, अच्छे बुरे रहनुमा तमाम मिलते जाएगें, कारवाँ बढ़ता जाएगा. अन्ततः आप एक महानता के पथिक बन जाएगें और आपके पद्चिन्हों का दुनियाँ अनुसरण करेगी.

खैर यह जरूर है कि आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में हमें संयमित एवं सकारात्मक वातावरण रखना थोड़ा मुस्किल सा हो गया है. अत्याधुनिकता के चलन में जहाँ देखो वहाँ अश्लीलता, फूहड़पन, द्विअर्थी संवाद और बेशर्में लोगों का कुनबा दिखाई देता है. पर क्या यह सच नही कि ऐसे लोग कहीं न कहीं मानसिक अस्थिरता एवं अशान्ति में जी रहे हैं ?. मै यह बिल्कुल नही कह रही हूँ कि आप आधुनिकता को मत अपनाइए, अपनाइए पर जरा सम्भल कर, आधुनिकता के दलदल में कहीं आपके पैर फिसल न जाए, जिससे आप दुबारा सम्भलने के काबिल ही न रह जाएँ. अच्छाइयों का आत्मसात् कीजिए, मानव हित में कार्य कीजिए, सतत् चलते जाइए. सुशब्दों के गीत गाते जाइए, यही एक अच्छा इंसान बनने का सूत्र भी है.

गर हम गौर करें तो शब्दों की ऊर्जा और महानता को आसानी से समझ सकते हैं. दुनियाँ के तकरीबन प्रत्येक धर्म भिन्न भिन्न भाषाओं में कुछ न कुछ मंत्र संजोये हुए हैं. शब्दों के संयोग से बना मंत्र अपने अन्दर अथाह ऊर्जा संचित किए रहता है, यानी जब उनका उच्चारण किया जाता है तब उनसे एक सकारात्मक ऊर्जा निकलती है जोकि किए जा रहे निमित्त संकल्प को लाभ पहुँचाती है. आपके दिमाक में यह प्रश्न भी उठ रहा होगा कि यदि हम मंत्रों के शब्दों में बदलाव या उलटफेर कर दें तो क्या होगा ?. शंका बिल्कुल वाजिब़ है. एक बात तो यह साफ है कि दुनियाँ के प्रत्येक जड़ चेतन स्वयं में अद्वितीय हैं, यानी उनके जैसा दूसरा कोई नहीं है. सबकी अपनी अपनी महत्ता है. ठीक इसी प्रकार शब्द भी अपने अन्दर अद्वितीय ऊर्जा का भण्ड़ार रखते हैं. यदि आप मंत्रों के शब्दों में बदलाव या उलटफेर कर देंगे तो निश्चित रूप से उसकी ऊर्जा में बदलाव आ जाएगा.

यकीनन् यह हमें मानना ही होगा कि हम सब कुछ विशेष कार्य के निमित्त जन्में हैं. जीवन को व्यसनों, कुविचारों और अन्धकार में बिताने से तो ठीक ही है कि अपने मनो-मस्तिष्क एवं शब्दों को पवित्र रखें. हाँ कुछ लोग आज यह जरूर बोलते हैं कि अब इमानदारी का जमाना नहीं रहा. वह शायद आज यह भूल चुके हैं कि दुनियाँ को चलाने वाला सर्वशक्तिमान पहले भी वही था और आज भी वही है. आप गलतफहमियों में मत पड़िए. अपने शब्दों को तराशिए, तोलिए फिर बोलिए. परिणाम आपको स्वतः दिख जाएगा. वह पल दूर नहीं, जब आप महानता के मुसाफिर बन जाएंगें. बस इतना जरूर कीजिए कि आप महानता को धन, सम्पत्ति, वैभव या यश से मत आकिए. महानता का सही मतलब तो यह है कि आपकी अपनी एक दुनियाँ होगी, उस दुनियाँ के आप ही पथ प्रदर्शक होंगे, आपके पद्चिन्हों पर चलने वाले लोगों की एक लम्बी फेहरिस्त होगी. आप नेक काम करते जाएंगें और सत्कर्मों का कारवाँ आगे बढ़ता जाएगा. यही सच्ची महानता होगी. इसलिए आप शब्दों की महत्ता समझकर उसको तोलिए, मोलिए फिर बोलिए.

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परिचय -

"अन्तू, प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश की निवासिनी शालिनी तिवारी स्वतंत्र लेखिका हैं । पानी, प्रकृति एवं समसामयिक मसलों पर स्वतंत्र लेखन के साथ साथ वर्षो से मूल्यपरक शिक्षा हेतु विशेष अभियान का संचालन भी करती है । लेखिका द्वारा समाज के अन्तिम जन के बेहतरीकरण एवं जन जागरूकता के लिए हर सम्भव प्रयास सतत् जारी है ।"

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