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बाल-विज्ञान-कथा टाइटन की सैर - डॉ. अरविन्द दुबे

राजू आज फिर नदी के किनारे उसी जगह पर खड़ा था जहां कुछ महीनों पहले उसकी नीनो से अचानक मुलाकात हुई थी। वही नीनो जो किसी किसी अज्ञात ग्रह का वासी था जो अपने चार साथियों के साथ मानसिक ऊर्जा के द्वारा प्रकाश की गति से भी तेज चलने वाले यान पर सवार होकर रहने के लिए एक शांत जगह की तलाश में पृथ्वी पर आया था। यह वही नीनो था जो एक भाषा परिवर्तक यंत्र के जरिए पृथ्वी पर बोली जाने वाली सारी भाषाओं को सुन कर समझ सकता था और बोलने पर उसकी आवाज सामने वाले को उसकी ही भाषा में सुनाई देती थी। कमाल का यंत्र था वह, जिसे तकनीकी रूप से हम मानवों से बहुत विकसित, नीनो की जाति के वैज्ञानिकों, ने तैयार किया था। राजू की अच्छी तरह याद है कि नीनो ने उसे बताया था कि उसके अपने ग्रह पर, वहां के निवासियों की अकड़ के चलते, विभिन्न क्षेत्रों में भयंकर युद्ध हुआ था जिसमें आणुविक, एंटीग्रेविटी और बहुत सारे हथियारों का जम कर प्रयोग हुआ था। इस युद्ध में वहां की नब्बे प्रतिशत आबादी समाप्त हो गई थी। वातावरण में इतना विकरण था कि वहां सांस लेना भी मौत को दावत देना था। नीनो के ग्रह के बचे-खुचे लोग छोटे-छोटे समूहों में जेनेरशनशिपों में बैठकर वहां से भाग निकले थे। यह जेनेरेशन शिप एक तरह से एक पूरा चलता फिरता शहर ही होते थे जिनमें हर चीज स्वनियंत्रित होती थी। बिना कोई ईंधन भरे मानसिक ऊर्जा से संचालित यह जेनेरेशन शिप शताब्दियों तक अंतरिक्ष में चक्कर लगाते रह सकते थे।

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एक विशेष प्रकार की किरणों की अदृश्य दीवार इन जेनेरेशन शिपों को अंतिरिक्षीय हानिकारक विकरणों से बचाती थी। ऐसे ही एक जेनेरेशन शिप में निकला था नीनो का दल, अंतरिक्ष में ऐसी जगह की तलाश  में, जहां उनकी लुटी-पिटी सभ्यता फिर से विकसित हो सके। पृथ्वी पर आकर उन्होंने वहीं द्वेश, कपट और थोथी अकड़ देखी थी; यहां के निवासियों में आणुविक हथियारों सहित पूरी मानवता के संहार में सक्षम हथियारों की होड़ देखी थी; तभी वह समझ गए थे कि एक न एक दिन इस पृथ्वी का भी वही हश्र होगा जो उनके अपने ग्रह का हुआ था। उन्हें लगा था कि पृथ्वी पर भी बसना ठीक नहीं है क्योंकि जब यह आणुविक हथियार प्रयोग होंगे तो उन्हें अन्य पृथ्वी वासियों की तरह यहां से भी जान बचाकर भागना पड़ेगा। अंततः वह यह कहते हुए लौट गए थे कि हम फिर से वही विनाश का दृश्य नहीं देखना चाहते हैं जो हमने अपने ग्रह पर देखा है। वे ऐसी पृथ्वी पर एक बार बस कर फिर से नहीं उजड़ना चाहते थे जिस पर विनाश का खतरा मंडराता उन्हें साफ दिखाई दे रहा था। हालांकि राजू ने उन्हें विश्वास दिलाना चाहा था कि वह बच्चों की इस पीढ़ी पर एक बार भरोसा करके तो देखें। वह देंगे उन्हें एक दुनियां जिसमें छल, कपट और हथियारों की होड़ नहीं होगी और हमेशा शांति रहेगी। पर नीनो और उसके साथी राजू की पुकार को अनसुना करक एक उपयुक्त स्थान की तलाश में चले गए थे, जहां उनकी उजड़ी सभ्यता एक बार फिर पनप सके। हाँ जाते-जाते वह यह वादा जरूर कर गए थे कि एक ठीक-ठाक बसेरा मिलते ही वह उससे मिलने जरूर आएंगे। तब से आज तक राजू नियम से शाम को रोज नदी के किनारे यहां पर आता है क्योंकि न जाने क्यों उसका मन कहता है कि सुदूर ग्रह से आया उसका दोस्त, वह भला प्राणी नीनो, एक न एक दिन उससे मिलने जरूर आएगा। पहले तो उसके अन्य दोस्त भी उसके साथ होते थे पर एक-एक कर के सबने उसके साथ आना छोड़ दिया था। राजू धीरे-धीरे अकेला होता गया। अब वह न किसी के साथ खेलता है और न स्कूल के अलावा और कहीं जाता है। अब तो सपनों में भी उसे नीनो ही दिखता था। राजू पर नीनो का यह भूत इस हद तक सवार था कि कोई उसे सनकी मानता था तो कोई दिन में सपने देखने वाला लड़का। पर इस सबसे बेखबर राजू हर शाम नदी के किनारे इसी जगह पर आता और सूर्य छिपने तक यही बैठा चारों ओर ताकता रहता था। उसके पिता-माता भी सोच में थे कि आखिर राजू को यह हुआ क्या है?

हर रोज की तरह राजू आज भी काफी देर से नदी के किनारे पर बैठा था। चूंकि आज स्कूल की छुट्टी थी इसलिए राजू नाश्ता करने के बाद यहीं आकर जम गया था। राजू तरह-तरह के ख्यालों में खोया था कि  उसे लगा कि अचानक हवा तेज-तेज चलने लगी है। फिर किसी भारी चीज के धीरे से गिरने की आवाज आई। पेड़ों पर बैठे पक्षी चीख कर आसमान में चक्कर काटने लगे। राजू को थोड़ा डर भी लगने लगा। आखिर क्या बात हुई? झाड़ियों में कोई जंगली जानवर तो नहीं आ गया? यह पक्षी चीख कर पेड़ों से क्यों उड़े? उसे लगा अब लौटना चाहिए। वह अपनी जगह से उठा और वहां से थोड़ी ही दूर पर बसे अपने गांव की ओर तेज-तेज कदमों से चलने लगा।

'राजू'

राजू को लगा किसी ने उसे पुकारा है। राजू ने पलट कर देखा पर वहां कोई न था। वह मुँह फेर कर उस पतली पगडंडी पर चलने लगा जो गांव की तरफ जाती थी। 'राज' उसके पीछे से आवाज आई। राजू ठिठक गया। एक बार डरते-डरते उसने पीछे मुड़ कर देखा। अबकी बार उसे झाड़ियों से कोई बाहर निकलता नजर आया। राजू वहीं रुक गया। झाडियों से निकलने वाला उसी की ओर बढता आ रहा था। वह भागने को ही था तभी फिर एक आवाज आई 'राज'। राजू जहां था वहीं रूक गया। थोड़ी देर बाद उसी तरह का एक और प्राणी झाड़ियों से निकलता दिखाई दिया। वही करीब 4 फीट का कद, बॅाहें घुटनों तक पहॅुचतीं हुईं, सिर शरीर के मुकाबले काफी बड़ा, लम्बा चेहरा, खाल जैसे सीधे-सीधे हड्डियों पर चिपकी सी दिखी।

"कहीं ये नीनो तो नहीं", उसने सोचा।

राजू की तरफ आनेवाला अब काफी करीब आ गया था।

'अरे ये तो नीनो जैसा है.............बिलकुल नीनो जैसा', राजू ने सोचा। आने वाला अब और पास आ चुका था।

'राज', राजू को अब उसकी आवाज साफ सुनाई दी। वे राजू की ओर बढ़ते आ रहे थे।

राजू ने दूर से पुकारा, "नीनो...........क्या तुम नीनो हो?"

"हां, और तुम 'राजू'?"

"हां मैं राजू हॅू", कहता हुआ राजू दौड़ कर नीनो के पास पहुंच गया।

"मुझे पता था तुम एक दिन जरूर आओंगे", राजू ने हांफते हुए कहा। "तभी तो मैं आ गया।" राजू का दिल बल्लियों उछलने लगा। वह लपक कर आगे बढ़ा। नीनो ने अपने हाथ आगे बढ़ाए तो राजू ने उन हड़ियल हाथों को पकड़ लिया.......बेजान से ठंडे हाथ.... पर आज उसे कुछ भी अलग नहीं लग रहा था।

"नीनो तुम्हारा वह भाषा बदल यंत्र कहां है, आज लाए नहीं क्या?"

"ये रहा , उसी से तो बोल रहा हूँ राजू, वरना तुम मेरी बात कैसे समझ पाते?"

''वाह! आज तो इससे बिलकुल हमारी जैसी बोली सुनाई दे रही है, पहले जैसी नहीं, मैं.........नीनो.........आया दूर से मिलने तुमसे।"

दोनों हंस पड़े।

"ओह मैं तो समझा कि अबकी बार तुम हमारी भाषा सीखकर आए हो।

"सीखी तम्ुहारी भाषा.............पर हम गलत बाले ता तुम सुनता तो हंसता तुम..............."

"अच्छा अगर तुम बिना भाषा बदल यंत्र के बोलोगे तो गलत बोलोगे और मैं उस पर हसॅूगा?" नीनो से स्वीकृति में सिर हिलाया। अब तक नीनो का दूसरा साथी भी आ पहुंचा था वह भी एकदम नीनो जैसा ही था।

"नीनो क्या यह तुम्हारा भाई है," राजू ने आनेवाले की ओर इशारा किया।

"भाई.........भाई क्या.............?" राजू समझ नहीं पा रहा था कि उसे कैसे समझााए कि भाई क्या होता है? फिर भी उसने समझाने की कोशिश की,

"एक पिता दो बेटे........ भाई-भाई......... " "बेटे.........बेटे क्या.....", नीनो की समझ में जैसे कुछ नहीं आया। राजू ने एक बार फिर समझाने की कोशिश की। उसने नीनो को पहले अपनी एक उंगली दिखाई और बोला मां........"फिर नीनो की उंगली पकड़ी और बोला "पिता" फिर दोनों उंगलियों को एक साथ मिलाया और बोला "बेटा"।

"नही..........मां नहीं..........पिता नहीं............बेटा नहीं.........हम लोग ........" नीनो राजू को कुछ समझाने की कोशिश कर रहा था पर शायद उसके लिए उपयुक्त शब्द नहीं जुटा पा रहा था।

क्या बेटा नही!ं मां नहीं...........पिता नहीं..........बेटा नहीं ...............ठीक है, ठीक है.......खैर जाने दो" यह कह कर राजू ने उसे उस ऊहापोह की स्थिति से उबारा। राजू को जैसे कुछ याद आया । "हां नीनो तुम्हें अपने रहने लिए कोई जगह मिली क्या, या फिर उसी तरह भटक रहे हो?"

"मिली........जगह मिली..........बहुत दूर....... ..."

"बहुत दूर, आखिर किस ग्रह पर?

"ग्रह पर नहीं उपग्रह पर....तुम जानते उपग्रह?"

"हाँ....हाँ उपग्रह यानि कि किसी ग्रह का चंद्रमा

"ठीक कहा "

"क्या कहते हो तुम उसे.......कौन सा है वह ग्रह जिस पर जाकर तुम बसे हो?"

"एक ग्रह ठंडा जिसके चारों ओर बर्फ से बने छल्ले है।"

"अच्छा शनि..."

"तो तुम्हारे यहां उसे शनि कहते हैं?" हाँ तो तुम शनि पर जाकर बसे हो........मगर कैसे ........हमारे सर तो कहते हैं कि शनि पर तो कोई धरातल ही नहीं है वहाँ 1800 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाएं चलती हैं और फिर वहां का तापक्रम शून्य से भी काफी नीचे.....तुम्हारी कुल्फी नहीं जम जाती वहाँ?"

"कुल्फी......... कुल्फी क्या......... कुल्फी तो खाते?" ओफो....... कुल्फी क्या........कुल्फी मतलब बर्फ..........बर्फ नहीं जम जाती तुम्हारी वहॉ?" "अरे नहीं हम शनि पर नहीं रहते......"

"तो"

"शनि का चंद्रमा.......हम शनि के एक चंद्रमा पर बसे हैं"

"शनि का चंद्रमा........... कौन सा शनि के तो साठ से ज्यादा चंद्रमा हैं"

"उनमें से ही एक, जिसे तुम लोग टाइटन कहते हो"

"तुम्हें कैसे पता नीनो कि हम किसे क्या कहते हैं?"

"भूल गए, पिछली बार हमने तुम्हें बताया तो था कि हमारे पास पृथ्वी की सारी भाषाओं का वापस मैप है। हमने यहां की तीन अरब पुस्तकालयों की सारी किताबें रिकार्ड कर रखीं हैं..."

"क्या! वैसे एक बात बताओ नीनो इनमें से कितनी किताबें तुम पढ़ पाओगे........ अब तक कितनी पढ़ पाए हो?"

"एक तरह से सारी"

"क्या", राजू का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया।

"हॉ हमारे मस्तिष्क में एक चिप लगाते वह चिप हमको हमारे ग्रह के सुपर कंम्प्यूटर से जोड़ता और हम जो जानकारी चाहते, मिल जाती"

"हूँ तो तुम शनि के चंद्रमा टाइटन पर जाकर बसे

हो"

"बसे नहीं बसने की कोशिश एक........"

"यानि कि अभी तक वहां पर जाकर अपने को ढाल नहीं पाए हो"

"ढाल क्या?"

"अरे तुम्हारे पास तो हमारी भाषा का वायस मैप है

भाषा परिवर्तक यंत्र है फिर भी पूछते हो ढाल क्या?" "पर एक बात बताओ नीनो तुम लोग टाइटन पर ही

क्यों बसे?

"क्योंकि बहुत बातों में टाइटन तुम्हारी पृथ्वी से मिलता है। जैसे तुम्हारी पृथ्वी के चारों ओर एक चंद्रमा चक्कर लगाता है वैसे ही टाइटन, शनि ग्रह का चंद्रमा जो तुम्हारे चंद्रमा से दो गुने से थोड़ा सा ही छोटा और करीब 16 दिन में शनि का एक चक्कर पूरा करता ....."

"वहां भी आदमी रहते हैं क्या नीनो?"

"नहीं, पर मानता अगर तुम्हारी पृथ्वी के अलावा इस ब्रह्माण्ड में जीवन कहीं और पनपा तो टाइटन पर ....।" "अब वहां ठीक से रह तो रहे हो नीनो?"

"नहीं.............अभी तो वहाँ रहना सीख रहे..." "क्यों अब वहां भी कोई परेशानी है?"

"परेशानी! टाइटन इतना ठंडा कि जम जाएं, शून्य से 180 डिग्री नीचे। "बाप रे!"

"और वातावरण में 97 प्रितशत नाइट्रोजन, आक्सीजन बिलकुल नहीं।"

"तो तुम वहां रहते कैसे हो नीना?"

"हमने बहुत बड़े बुलबुलों के आकार का एक शहर बसाया....वातावरण हमने अपने हिसाब से नियंत्रित किया"

"और सांस लेन के लिए आक्सीजन क्योंकि टाइटन के वातावरण में करीब 97 प्रतिशत तो नाइट्रोजन है पर आक्सीजन बिलकुल नहीं है।

"वह हम वहां की और गैसों से और वहां की जमी बर्फ से निकालते हैं।"

"काश मैं भी देख पाता कि बुलबुलों जैसे शहर कैसे होते हैं?", राजू ने नीनो से कहा। नीनो ने एक पल को सोचा और बोला, "देख सकते हो, हमारे साथ चलो।"

"तुम्हारे साथ..........फिर मेरे माता-पिता मुझे ढूंढेंगे तो?"

"नहीं, शाम तक हम तुम्हें वापस यहीं पहुंचा जाएंगे।"

"क्या बात करते हो!, शनि यहां से लाखों-अरबों किलोमीटर दूर है और तुम मुझे शाम तक वापस लौटा लाओग", राजू ने आश्चर्य से कहा।

"भूल गए तुम, हमारा यान मानसिक ऊर्जा से चलता है इसलिए प्रकाश की गति से हजारों गुना तेज चलता है, मन की गति से "

"क्या?"

हमारे मस्तिष्क में एक चिप लगा..........वह जुड़ा हमारे यान के कम्प्यूटर से ..... जब हम सोचते कि यान चले तो हमारा चिप सिग्नल देता यान कमप्यूटर को, यान चल पड़ता।"

"मतलब यान को चलाने के लिए तुम्हें हाथ-पांव कुछ नहीं चलाना पड़ता है सिर्फ तुम्हें यह सोचना है कि यान चले तो ये कमांड तुम्हारे मस्तिष्क में चली चिप रिसीव करके यानके कम्प्यूटर को दे देती है और तुम्हारा यान चल पड़ता है?"

"ठीक जाना........राजू"

"कमाल है"

"कमाल नहीं मानसिक ऊर्जा का सही पूरा प्रयोग"

"इसका मतलब जब तुम सोचोगे कि यान दाएं मुड़े तो यान दाएं मुड़ जाएगा और जब यह सोचोगे कि यान रुके तो यान रुक जाएगा?"

"ठीक जाना.........यान की तरह हमारे यहां और यंत्र भी सिर्फ सोचने से चलते" राजू की सारी शंकाएं मिट चुकीं थीं। वह मन ही मन नीनो के साथ जाने के लिए तैयार था फिर भी उसने पक्का करने के लिए पूछा, "नीनो हम शाम तक वापस लौट तो आएंगे?"

"बिलकुल"

"तो फिर चलें?"तीनों यान में सवार हो गए। हल्का सा धक्का महसस हुआ और यान चल पड़ा।

थोड़ी देर बाद यान में हल्का सा कंपन महसूस हुआ। नीनो कुछ परेशान सा दिखाई दिया। नीनो के साथी ने नीनो की ओर मुड़ कर देखा और नीनो ने राजू की ओर, मानो कुछ कहना चाहता हो। "क्या बात है नीनो", राजू ने थोड़ा डरते हुए पूछा। नीनो ने राजू की ओर देख कर कहा, "कोई खास बात नहीं। राजू तुम्हें मानसिक ऊर्जा का प्रयोग करने की आदत नहीं.......तुम्हारी पूरी मानसिक ऊर्जा हमें नहीं मिलती.... हमारा यान हम तीनों की पूरी मानसिक ऊर्जा से ही ठीक चलता।"

"तो", राजू ने पूछा।

"तुम सो जाओ.......तुम्हारी मानसिक ऊर्जा पर तुम्हारे जागृत मस्तिष्क का नियंत्रण खत्म ......तुम्हारी पूरी मानसिक ऊर्जा मिलती......प्रयोग होते........यान ठीक चलता.

....." मैं सो जाऊँ तो मेरा जागृत मस्तिष्क मानसिक ऊर्जा के प्रयोग में रुकावट पैदा नहीं करेगा?"

"ठीक"

"पर मुझे कोई परेशानी ..........."

"परेशानी कोई नहीं.....केवल नींद, सचमुच की नींद ....राजू डर गया। वह सोना नहीं चाहता था पता नहीं ये लोग क्या करे उसके बाद। उसे पछतावा हो रहा था कि वह उनके साथ क्यों आया?

"सोना ...........बोलो"

"नहीं मैं सोना नहीं चाहता, मैं यान की खिड़की से बाहर झांक कर देखना चाहता हॅू", राजू ने बहाना बनाया।

"बाहर देखना, बाहर कुछ नहीं....अंधेरा, घना अंधेरा........बाहर कुछ दिखाई नहीं देता, सो जाओ प्लीज।

यान में एक बार फिर कंपन हुआ। राजू ने सोचा कि अगर वह न सोया तो क्या पता यान चले ही न या यहीं से गिर कर नष्ट हो जाए। अगर वह सो जाता है तो पता नहीं ये लोग उसके बाद उसके साथ क्या करें? अंततः उसने फैसला कर लिया कि वह सो ही जाएगा। यूं मरने से तो सोना अच्छा। "सोना?"

"हां" राजू की मरी सी आवाज निकली, "पर मुझे तो नींद ही नहीं आ रही है कैसे सोऊं", राजू डर रहा था। "उस नीली रोशनी की ओर देखो", नीनो ने कहा। राजू नीली रोशनी की ओर देखने लगा और उसकी पलकें अपने आप मुंदने लगीं।

"राजू जागो हम पहुंचने ही वाले हैं," नीनो राजू की झिंझोड़ कर जगाने का प्रयास कर रहा था। राजू ने आंखें खोल दी।

"हम कहां आ गए", अपनी नींद खुलते ही राजू ने प्रश्न किया।

"शनि के पास..................."

"शनि के पास क्यों? हमें तो उसके उपग्रह टाइटन पर जाना था। क्या यान भटक गया", राजू ने घबरा कर प्रश्न किया।

"नहीं यान  भटका नहीं, जानते टाइटन शनि से हजारों किलोमीटर दूर?"

"हां-हां तुमने बताया था कि टाइटन को अपनी धुरी पर घूमने में भी उतना ही समय लेता है जितना शनि की एक परिक्रमा करने में इसलिए इसका एक भाग हमेशा शनि की और रहता है दूसरा हमेशा उससे दूर।"

"इसलिए हम शनि की एक लाई बाई के बाद टाइटन की कक्षा में प्रवेश करते।"

"लाई बाई क्या?"

"लाई बाई मतलब शनि का एक चक्कर लगा कर हमारा यान पहुंचता टाइटन की कक्षा में, फिर धीरे-धीरे उतरता टाइटन पर।"

एक झटका लगा और यान शनि की कक्षा में प्रवेश कर गया।

"क्या मै शनि को देख सकता हूं, राजू ने पूछा"

"हां यान की गति धीमी तुम देख सकते" यान में एक ओर एक खिड़की खुली शनि नजर आने लगा पर यह सब कुछ मिनटों तक ही दिखा क्यों कि तेज गति से चलता यान टाइटन की कक्षा में प्रवेश कर गया था।

"थोड़ी देर में हम टाइटन पर पहुंचते .............

..", नीनो कह रहा था। राजू उत्सुकता से टाइटन पर उतरने की प्रतीक्षा करने लगा। पर उसे अभी नीचे कोई मानव निर्मित रचना नजर नहीं आ रही थी। चारों तरफ कोहरा सा नजर आता था।

"नीनो यह कोहरा", राजू ने प्रश्नवाचक निगाहों से देखा।

"मीथेन गैस से बना कोहरा", नीनो ने उत्तर दिया।

"तभी यहां कुछ दिख नहीं रहा है"

"लो देखो", नीनो ने यान का राडार चालू कर दिया। यान की दीवार पर नीचे के चित्र साफ नजर आने लगे। अब टाइटन पर झीलें पहाड़, मैदान बालू के ढ़ेर साफ नजर आ रहे थे। यान जैसे ही टाइटन के दूसरी ओर पहुंचा तो कई बहुत बड़े-बड़े दानवाकार बुलबुले नजर आने लगे जो वड़ी तेजी से पास आ रहे थें।

"अब हम पहुंचने वाले हैं" नीनो ने कहा।

यान जाकर एक बुलबले के एक हिस्से पर चिपक गया। यान के एक हिस्से में एक दरवाजा खुल गया था। आगे एक संकरी सुरंग थी जिसमें भरपूर प्रकाश था। तीनों लोग जैसे ही यान से बाहर निकल कर सुरंग में आए उनके पीछे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। राजन ने घबराकर बंद दरवाजे की ओर देखा। "हमारे बुलबुले शहर का अपना वातावरण.....टाइटन से अलग। दरवाजा बंद.....बाहर का वातावरण बाहर, अंदर कर अंदर....मिलावट नहीं" नीनो राजू को समझाने की कोशिश कर रहा था। सुरंग समाप्त होने पर फिर एक ऐसा ही दरवाजा था जो नीनो के पहुंचते ही अपने आप खुल गया और उनके अंदर प्रवेश करते ही अपने आप बंद हो गया। नीनो के तरह के ही एक जीव ने एक तेज रोशनी नीनो के कलाई पर बंधे बेंड पर डाली और नीनो को आगे जाने दिया। इसी तरह उसका दूसरा साथी आगे निकला। अब राजू की बारी थी। राजू के आगे रोशनी डाल कर वह अस्पष्ट स्वर में कुछ भनभुनाया। नीनो ने अपना भाषा परिवर्तक यंत्र उतारा और उस व्यक्ति से बात करने लगा। लगता था उनमें किसी बात पर बहस हो रही थी। अंततः उनमें सहमति हो गई और तीनों लोग आगे चले।

"चलो चलें", नीनो ने अब अपना भाषा बदल यंत्र पहन लिया था। राजू को घर की कल्पना गुदगुदा गई। नीनो पास के एक दरवाजे के पास पहुंचा। उसने एक नजर दरवाजे को देखा और दरवाजा खुल गया। राजू ने उनके साथ दरवाजे में प्रवेश किया। पर यह क्या वे तो एक उसी तरह के स्लाइडर या खिसकने वाले झूले के ऊपर बैठे थे जैसा कि आम तौर पर पार्कों में लगा होता है। इसके दूसरी एक दीवार पर एक चमकीली स्क्रीन लगी थी। जब वे तीनों लोग उस झूले पर बैठ गए तो नीनो ने उस स्क्रीन की ओर देखा। स्क्रीन के ऊपर रोशनी में कुछ अंक चमके। नीनो के उस स्क्रीन से नजर हटाते ही वे अपने आप उस खिसकने वाले झूले पर बहुत तेजी से खिसकने लगे। राजू को लगा कहीं वह किसी चीज से टकरा न जाए। उसकी चीख निकल गई।

"घबराना नहीं यह हमारे यहाँ का यातायात सिस्टम....हम उस स्क्रीन में फीड किया कहां जाना, वहीं जाकर रुक जाएगा अपने आप....... कोई खतरा नहीं", नीनो ने उसे सांत्वना दी। सचमुच ही वे एक दरवाजे के पास जाकर अपने आप रुक गए। उन लोगों के पहुंचते ही दरवाजा अपने आप खुल गया। अब वे एक गोल  कमरे में थे जिस में एक ही कमरे में सेल्फ बनाकर काफी जगह निकाली गई थी। उसमें नीनो जैसे चेहरेवाले दो जीव और थे। उनके चेहरे की खाल अपेक्षात लटक गई थी जिस से लगता था कि वे नीनो से ज्यादा उम्र के थे। राजू ने उन्हें हाथ जोडकर प्रणाम किया तो वे दोनों आश्चर्य सक कुछ बोले। राजू ने नीनो की ओर देखा कि कहीं उस से कुछ गलत तो नहीं हो गया?

"तुम क्या किया यह",  नीनो ने पूछा।

"प्रणाम", हमारे यहां बड़ों को प्रणाम करते हैं, ये तुम्हारे माता-पिता हैं न", राजू ने जानना चाहा।

"माता-पिता क्या", नीनो ने एक क्षण को सुपर कंप्यूटर से संपर्क किया और बोला, "ओह माता-पिता, हमारे यहां माता-पिता नहीं .....सुपीरियर और जूनियर......ये मेरे सुपीरियर हैं......हम इनके साथ एक ही स्पेस में रहते...हमको यहां के संस्कार देना इनका उत्तरदायित्व......." राजू हैरान था उसने पूछा, "माता नहीं......पिता नहीं फिर तुम लोग........" "हमारे यहां जब कोई अपना जूनियर चाहता...अपने शरीर से एक कोशिका सेंटर में देता.......उस कोशिका से क्लोन करके जूनियर बनता........पूरा जूनियर", नीनो ने समझाने की कोशिश की। राजू की आंखें आश्चर्य से फैलती जा रही थीं।

".............एक सुपीरियर को सिर्फ एक ही जूिनयर की परमीशन बस......ये दोनों सुपीरियर हम दोनों जूनियर" "नीनो तुम्हारा भी कोई जूनियर..."

"नहीं अभी मेरे पास सुपीरियर होने भर के लाइफ पॉइंट नहीं"

"नीनो तुम्हारा कमरा कहां है" राजू ने उत्सुकता पूछा।

"कमरा"...........कमरा नहीं स्पेस ......उधर", नीनो ने उसी कमरे के एक हिस्से की और इशारा किया । तुम्हारा मतलब यही एक कमरा तुम सारे लोगों के लिए"

" ठीक समझता....." "पर........."

तंम्हारे जैसा बड़ा-बड़ा स्पेस यहां नहीं......सब आर्टीफिशियल स्पेस ...नियंत्रित वातावरण..."

"फिर किचन, बाथरूम....शौचालय.............. " नीनो ने ये शब्द सुनकर एक बारगी एकबारगी कुछ सोचा फिर बोला, "ओह किचन खाना की जगह"

"खाना बनाने की जगह", राजू ने भूल सुधारी।

"जहां खाना बनता वहीं खाना खाता....... तुम को भूख लगी?" राजू को सचमुच भूख लगी थी बोला, "लगी जोर की भूख लगी।" नीनो ने कहा, "खाना अपने स्पेस में नहीं खाते एक बुलबुले के सारे लोगों का खाना एक ही जगह बनता, वहीं चलते...."  पलक झपकते ही खिसकने वाले झूलों पर सवार होकर वे भोजन कक्ष में पहुंचे। खाने को कमरा भी अजीब था। वहां एक रेलवे की टिकिट खिड़की जैसी जगह थी जिस के एक ओर एक चमकीला पर्दा लगा था जिस पर कुछ अक्षर चमक रहे थे। नीनो ने कुछ अक्षरों पर उंगली रखी तो तीन प्लेटें काउंटर पर आ गईं उनमें कुछ काली काली गोलियां थीं। नीनो ने एक प्लेट उठाकर राजू को दी और बोला -

"खाओ"

"क्या है यह.............", राजू भौंचक्का था।

"खाना....इनर्जी बस....पूरे दिन की इनर्जी  को काफी, खाकर तो देखो। तीन गोलियां खाकर लम्बे समय तक तुम्हें भूख-प्यास नहीं" राजूने तीन गोलियां उठाई और मुंह में डालीं। इनमें कोई स्वाद न था। वह जबरदस्ती उन्हें निगलने की कोशिश करने लगा पर गोलियां थी कि उसके हलक में चिपकी जाती थी।

"पानी", वह चिल्लाया। नीनो उठकर तेजी से भागा और एक गिलास पानी ले आया। पानी पी कर राजू की जान में जान आई। गोलियां निगलते ही लगा उसके पूरे शरीर में गरमी भर गई थी पर थोड़ी ही देर में सब सामान्य हो गया। उसकी भूख खत्म हो गई थी।

"ओह..." उसने एक गहरी सांस ली, "तो पानी है तुम्हारे यहां?" "पानी......पानी नहीं.......पानी बनाते......यलू सले में हाइड्रोजन और आक्सीजन मिलाकर.......आक्सीजन भी यहां नहीं......आक्सीजन काबर्न डाइ आक्साइडड से निकालते ...बहुत कम पानी पीते हम"

"पर यहां उतरते समय तो मुझे झीलें दिखी थीं"

"वह पानी नहीं ....द्रव मीथेन...... हम पानी को तरह उसे इस्तेमाल करना सीख रहे"

"पानी नहीं, तब तुम नहाते कैसे हो", राजू ने जानना चाहा। नीनो एक क्षण को खामोश हुआ। वह सुपर कंप्यूटर से नहाने के बारे में जानकारी ले रहा था। क्षण भर बाद बोला, "नहाना नहीं......... डिसइंफेक्शन चेम्बर......वहां जाता..........डिसइंफेक्टेंट किरणों से सारा शरीर डिसइंफेक्ट करता.

.........बैक्टीरिया खत्म..........गंदगी खत्म... " मतलब तुम हमारी तरह नहीं नहाते हो? सिर्फ केमीकल से अपने आप को जीवाणु रहित करते हो?" नीनो ने सहमति में सिर हिलाया।

"नीनो क्या हम घूमने के लिए बुलबुले से बाहर जा सकते हैं", राजू ने पूछा।

"बाहर का वातावरण बहुत कठिन ........बहुत ठंडा शून्य से 180 डिग्री नीचे...........टाइटन के वातावरण का दबाब तंम्हारी पृथ्वी का डेढ़ गुना......वातावरण में आक्सीजन बिलकुल नहीं ......फिर भी हम बाहर जाते.....

. तुम्हें लिए हम बाहर जाते।" नीनो ने राजू को एक विशेष तरह के कपडे दिए, "प्रेशर सूट......इसमें आक्सीजन......ताप नियंत्रित.....सर्दी नहीं लगता.........यहां का वायुमडल दबाब तुम्हारी पृथ्वी से

डेढ़ गुना पर प्रेशर सूट के साथ परेशानी नहीं।" प्रेशर सूट, पहनते ही राजू के शरीर पर अपने आप फिट हो गया। नीनो ने अपनी कलाई पर बंधे यंत्र का बटन दबाया। थोडी देर में खिडकियों वाली एक पिरामिड के आकार की चीज उनके पास आकर रुकी।

"यह क्या नीनो", राजू ने पूछा।

"स्पेस कॉप्टर, इसके अंदर बैठने पर तुम पर टाइटन का बाहरी वातावरण कुछ असर नहीं ........इसके अंदर तुम सुरक्षित", नीनो ने बताया।

स्पेस कॉप्टर का दरवाजा खुला। राजू नीनो के साथ उसके अंदर बैठ गया।

थोड़ी देर में जब नीनो और राजू टाइटन पर मीथेन की झीलें, धूल के टीले, पहाड़ और मैदान देख कर लौट रहे थे तो राजू को घर की सुधि आई। उस ने नीनो से कहा, "अब मुझे पृथ्वी पर वापस छोड़ो तुमने वादा किया था।" "ठीक है", नीनो ने सिर हिलाया। लौटते समय वे खिसकने वाले झूले पर चढ़कर उसी रास्ते से लौटे जिस से वे गए थे। वह आदमी जो उन्हें इस बुलबुले वाले शहर में घुसते समय मिला था वह फिर वहीं मौजूद था। नीनो की उससे फिर कुछ बहस हुई जिसे राजू समझ नही सका क्योंकि तब नीनो ने भाषा परिवर्तक यंत्र उतार दिया था।

"हमें इधर से चलना.........तुम्हारा मेिडकल चेक-अप होना तब वापस जाना", नीनो ने राजू को समझाया। राजू को डर लग रहा था पर मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय न था। वह नीनो के साथ दूसरी ओर चल दिया। नीनो राजू को फिसलने वाले झूले पर बिठाकर एक और बलबुले में ले गया। अब वे एक बड़े कमरे में थे जिसमें तरह-तरह के यंत्र लगे थे। नीनो की तरह के एक जीव ने उसे एक मेज पर लेटने को कहा। राजू ने डरकर नीनो की ओर देखा।

"डरना नहीं, चेक-अप, सिर्फ चेक-अप........कोई कष्ट नहीं", नीनो ने सांत्वना दी। राजू मेज पर चढकर लेट गया। नीनो की शक्ल के जीव ने एक यंत्र दीवार से खीचकर राजू के ऊपर लगा दिया। थोड़ी देर बाद उसमें से एक लाल रोशनी निकल कर राजू के सिर पर गिरने लगी। उसे इस लाल रोशनी देखने को कहा गया। राजू ने लाल रोशनी देखना शुरू किया और उसकी आंखें अपने आप मुंदने लगीं। उठो दोस्त हम वापस आते हैं",  नीनों राजू को झिंझोड़ कर जगा रहा था।

राजू ने ऑखें खेाल दीं।

"कहां हैं हम," राजू ने अगड़ाई लेते हुए पूछा।" "पृथ्वी पर, जहां से हम जाते" राजू ने देखा वे यान के बाहर थे, वहीं, जहां से वे गए थे। सूरज छिपने वाला था।

"तो मैं जाऊँ", राजू ने कहा।

"हां जाओ पर हमें भूलना मत दोस्त......हम फिर मिलते", उन्होने हाथ हिलाया और यान के अंदर चले गए।

यान का दरवाजा बंद हुआ और यान वापस उड़ गया। राजू घर की ओर चल दिया। वह याद करने की कोशिश करने लगा कि वह तो यहां नीनो का इंतजार कर रहा था। उसके बाद क्या हुआ उसे कुछ भी याद नहीं आ रहा था। उसे नहीं मालूम था कि चेक अप करने के बहाने नीनो की दुनिया के लोगों ने यान में चढ़ने से लेकर टाइटन पर जाने और वहाँ से लौट कर धरती पर पुन वापस आने तक की उसकी स्मृतियों को एक विकसित यंत्र द्वारा उसके मस्तिष्क से मिटा दिया था। सूरज डूब रहा था राजू लंबे लंबे डग भरता हुआ अपने घर की ओर बढ़ने लगा। 

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ई-मेल : drarvinddubey2004@gmail.com

वि ज्ञान कथाएं विज्ञान जगत के विविध आयामों को जो अनउदघाटित, सवर्था नूतन, अनूठे , अन्वेषणात्मक हैं प्रामाणिकता के साथ तथा बड़ी मार्मिकता एवं तरलता से संस्पर्श करती हैं। इन्हीं गुणों से युक्त हैं डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय की प्रस्तुत विज्ञान कथा संकलन की कथाएँ।

पुस्तक :

रोमांचक विज्ञान कथाएँ

लेखक :

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय

प्रकाशक :

साहित्य प्रकाशन एस-14, राज आंगन, एन.आर.आई. कॉलोनी, प्रतापनगर जयपुर-302033

संस्करण :

प्रथम, 2016

मूल्य :

रु. 250/-

विज्ञान कथाओं में तनिक फंतासी का पुर होता है लेकिन यह वैज्ञानिक परिकल्पनाओं का बहिर्वेशन होती है। कई बार तो यह 'बहिर्वेशन' अकल्पनीय हो जाता है। एक पाठक को इसके साथ-साथ चलना कठिन हो जाता है लेकिन अंत में वह इसके परिणामों को लेखक दंग रह जाता है। उसके मुख से 'वाह' निकल उठता है। ऐसी ही कथा है 'लखनऊ'।

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कथा का नायक 'सतत गतिमान समय-सरिता प्रवाह में गति करता हुआ इसी का अंश बन जाता है। यह समय सापेक्ष्य है, वह स्थिर भी है और गतिमान भी। वह प्रकाश की भांति भी है जो सीधी रेखा में और तरंगों की भांति चलता है, पर रहता वह प्रकाश ही है जैसे- बीता हुआ कल आने वाले कल में समाहित हो जाता है, वैसे ही यह चक्र अनादि है और अनन्त काल से गतिमान है। हम इसी के अंश है... इसी से यह धारणा अत्यन्त जटिल है।

टाइम मशीन में भी भूतकाल और भविष्य का गमन होता है लेकिन इस कथा में समय अलौकिक तथा दुरूह धारणा लिये हुये हैं। कथा में नायक गतिमान समय चक्र का इस तरह से हिस्सा बन जाता है, कि पता ही नहीं चलता वह कब, भूतकाल में गमन कर जाता है। 'टेम्पोरल लॉब' में उद्दीपन भी उसे समय के एक अन्य आयाम में पहुँचा देते हैं।

कथा में नायक निज्ञकार पुराने लखनऊ के आई.टी. कॉलेज से राजा बाजार त्रिकालज्ञ से भेंट करने पहुँचता है। वह मस्तिष्क के टेम्पोरल लाब में बंटी हुई गतिविधियों के कारण शुजाउद्दौला, आसफुद्दौला के समय के साथ विचरता हुआ उनके खानपान रहन सहन, तथा तौरतरीकों को देखता है। वह लखनऊ के आखिरी नवाब वाजिद अली के जमाने में उनके 'रहस' देखता उनके कत्थक देखता और उनकी बनाई हुई शास्त्रीय संगीत की रागिनियों को सुनता अपनी पूर्व प्रेयसी नगमा से बतियाने के पश्चात् उससे विदा लेकर एक पेड़ पर

शगुप्ता के साथ बैठकर सतत गतिमान समय सरिता में प्रवेश कर उसी का हिस्सा बन जाता है पुराने लखनऊ की संस्कृति का जीवन्त दर्शन हर किसी का मन मोह लेता है। लेकिन लेखक हमें एक ऐसे अत्याधुनिक समाज के दर्शन कराता है जो निकट, भविष्य के गर्भ में छिपा है- नैनो टेक्नॉलाजी युक्त समाज।

निराकार तथा नगमा धीरे धीरे कर समय की सीढिय़ों

की तरह कश्मीरी मोहाल जाने वाली सीढ़ियों से नीचे उतरते हैं। वे जब सौ मीटर नीचे पहुँचते हैं तो निराकार एक दूसरे ही लखनऊ के दर्शन कर चकित रह जाता है। यह अत्याधुनिक लखनऊ है। यहां पब्लिक ट्रांस्पोर्ट है लेकिन उनके चलने का समय नियंत्रित होता है। यहां अन्डरग्राउंड रेल, ट्रामें है लेकिन ध्वनि प्रदूषण की लेख मात्र भी गुंजाइश नहीं। यहां वाहन पेट्रोल से नहीं चलते बल्कि कार्बन डाइआक्साइड को तोड़ कर, डिकम्पोज कर उसकी ऑक्सीजन से चलते हैं। यहां सभी फैक्ट्रियां नैनो प्रौद्योगिकी पर आधारित हैं। उनका जीवन पूर्णरूपेण नियंत्रित होता है। वे अन्डरग्राउन्ड जमीन से सौ मीटर ऊपर सतह पर विसान द्वारा पहुंचते हैं जो पानी के ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन से चलते हैं। यह सब कुछ निकट भविष्य में संभव है। कल्पना करो कि युद्धों से भूमि प्रदूषित हो गई तो मानव क्या अन्डरग्राउंड शहर बनाकर नहीं बनायेगा। अतः प्रस्तुत कथा में अत्याधुनिक अन्डरग्राउन्ड लखनऊ की कल्पना विज्ञान सम्मत है। अतः गतिमान समय सरिता प्रवाह की संकल्पना हमें वास्तविक तथा ठोस वैज्ञानिक धरातल पर ले आती है। इससे कथानक अत्यन्त रोचक बन पड़ा है।

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय के इस संग्रह की दूसरी विज्ञान कथा 'मदाम आभू' 'अमरता' पर आधारित है। अमरता को वरदान माना जाता है लेकिन यह अभिशाप भी है। कथा की नायिका 'मदाम आमू' अमृत रस का पान करती है, अमृतरस जो विशिष्ट प्रकार की जड़ी बूटियों को मिलाने से बनता है। कथा का एक पान्त आमन इसे प्रदान करता हो। वह कितने वर्ष की होगी, कोई नहीं जानता शायद हजारों वर्ष हो... आमू को अमरता मस्त जड़ी बूटियों के मिलाने से ही प्राप्त नहीं हुई। यह अमरता भी रहस्य के आवरण में लिपटी हुई है। आमू अमरता प्राप्त होने का रहस्योघाटन एक पात्र बारबू से करती है। एक दिन मृत्यु का देवता। ओमेन-रा (सूर्य) प्रकट होता है, वह उसे स्वर्ग ले जाता है तथा उसे अमरता प्रदान करता है तथा उसे पुनः धरती पर लोगों वा भविष्य जानने हेतु भेज देता है। ओमेन-रा एक सुदर्शन पुरोहित भी है। इसके पश्चात् कई हजार वर्ष बीत जाते हैं। अब मदाम आमू मृत्यु का वरण करना चाहती है अमरता अब इसके लिये अभिशाप है वह चांदनी रात में नदी किनारे ओमेन-रा को अपने साथ ने चलने के लिये आव्हान करती है। लेकिन मृत्यु देवता नहीं आते हैं। रहस्य रोमांच और मिथक का उपयोग करने से यह कथा अत्यन्त रोचक बन पड़ी है। कथा रस की सुगंध मनमोहक हो उठती है।

आमू क्यों अमरता से अब जाती है। यह रहस्यमयी है। आमू को मृत्यु प्राप्त कराने के लिये आमन पत्थर के काले पात्र में विषपान कराता है, पर उसे मृत्यु नहीं आती। अब आमू उसे अनेक औषधियों के साथ 'थियोब्रोमीन' मिलाने गके लिये कहती है। इस मिश्रण का सेवन करते ही वह जड़वत हो जाती है। थियोब्रोमीन एक विष के समान रसायन है। वैज्ञानिकता का फट कथा को विज्ञान कथात्मक बनाता है तथा रहस्य रोमांच की दुनिया से निकालकर वास्तविकता के धरातल पर ले आता है। अब बारबू, आमू की सुरक्षित रखी जड़ी बूटियों, रसायन से औषधि का निर्माण करना चाहता है। इससे वह लोग के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का उपचार कर पाने से सक्षम होगा। वह तथा आमन एक मेले में पहुंचते है। पहले वे जादू दिखाकर लोगों को आकृष्ट करते हैं और फिर रोगियों को इलाज के लिये आमंत्रित करते हैं। कथा में अनेक रोचक प्रसंग है। एक व्यक्ति के बाल झड़ रहे होते हैं, वे इसके सिर पर टालोमी के तेल की गर्म बूदें टपका कर फिर से बाल उगा देते हैं। वे इसलिए के सम्राटों तथा मित्र देवी असीमित का हवाला देकर पुरुष तथा स्त्रियों को काम बदुक दवा प्रदान करते हैं। कथा को इस तरह से गढ़ा जाता है कि मध्य युगीन परिवेश का सृजन हो सके। इससे कथा अत्यन्त जीवन्त बन पड़ी है। तिलस्म और जादू कथा का हिस्सा होते हैं। विज्ञान तकनीक परक होकर भी तिलस्म के आवरण में लिपटा होता है तथा कथा को विज्ञान कथात्मक बनाता है। कथा 'वह ग्रह' अंतरिक्ष के एक ग्रह से पृथ्वी वासियों द्वारा खनिजों के उत्खनन से संबंधित है। विश्व भर में क्षुद्र गुहों से उत्खनन कर खनिजों को लाने के लिये प्रयास जारी हो चुके हैं। धरती की खनिज सम्पदा धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। हमें। अंतरिक्ष से भविष्य में खनिजों का दोहन करना होगा। अब तो सरकार के साथ प्राइवेट कम्पनियां भी इस क्षेत्र में कूद पड़ी हैं। नासा 2017 में निअर अर्थ एस्टेरायड से खनिजों के दोहन के लिये स्पेसशिप भेज रहा है। प्राइवेट कम्पनी 'स्पेस एक्स- इस दिशा में अग्रसर है। वह मंगल पर भी मानव को

भेजने की दिशा में कार्यरत है। कथा में ग्रह के मूल निवासी मायातोरी विदेशियों के द्वारा इस ग्रह पर आधिपत्य जमाने और ग्रह के खनिज दोहन से उत्तेजित होते हैं। वे विदेशियों की हत्या करने पर आमादा है। वे युवा तकनीशियनों की हत्या करते हैं। इन हत्याओं का संचालक कौन है? इसका पता हमें वहां पहुंचे सुरक्षा विशेषज्ञ कर्नर माधवन की डायरी के कुछ अंशों, डॉ. जयालिन की रिपोर्ट, जनरल रंगतुंगे की नोट बुक को सिलसिले वार पढ़नपे से उजागर होता है। हत्यायें प्रमुख तौर पर उक्त ग्रह की वासिनी माया तोरी कर्नल इंगे के इशारों पर होती है।

वहां पहुंचे अंतरिक्ष दल का सामना मीमाकास हाइब्रिड्स से होता है। इनमें नरसिंह तथा वराह व भालू के क्रॉस से उत्पन्न जीव प्रमुख है। ये जीव चंद्रमा से भेजे गये। अभियान दल पर आक्रमण करते हैं ये मृतकों को नोंच - नोच कर भक्षण करते हैं। उन्होंने दो अभियान दलों का इसी तरह सफाया किया था। ग्रह के वासी मायातोरी एक छोटी माउन्टेरिअना पिक एक्स से दलके युवा सदस्यों की खोपड़ी पर प्रहार करते हैं। उसका नुकीला सिरा क्रेनियम के उतकों के मध्य गहराई तक करीब 10 सेमी मिड ब्रेन से धंस जाता है। माया तेारी जनों के तीन उंगलियां होती है। वे आदिवासियों की तरह सिर पर पक्षियों का मुकुट पहने हाथ में लम्बा झाला लेकर चलते हैं। वे ग्रह के परिवर्तन शील, वातावरण में रहना जानते हैं। वे अभियान दल को इसलिये मारना चाहते हैं ताकि ग्रह पर वे उत्खनन नहीं कर सकें। पहले विदेशी तीन हजार थे। अब बहुत कम लोग जीवित है। संचालिका का रहस्य माइकेल के 'मेमोरी क्यूब से पता चलता है जो उसने हत्या होने से पूर्व बलवन्त को सौंपा था। अंत में रेस्क्यू शिप से कर्नल माधवन मायातोरी पर प्रहार करते है। इंगे के सिर में लगी बुलेट उसकी जीवन लीका समाप्त कर देती है कथा में आधुनिक विज्ञान की जीवंतता को रखने के लिये कई अत्याधुनिक वैज्ञानिक शब्दों का प्रयोग हुआ है, जैसे 'इन्फार्मेशन मेमोरी क्यूब', ऑटो-क्लार्क, इलेक्ट्रोनिक डायरी गाइडेड रोबो, इन्पैक्ट पिस्तौल, इन्फो पैन आदि।

कथा 'भवानी' ठंगों के जीवन पर केन्द्रित है। ठगों का जीवन कैसा होता है। किस प्रकार ठगी की जाती है? कैसे वे सगुन अपशगुन के चक्कर में पड़ जाते हैं। ठगी की शुरूआत सगुन का संकेत मिले बिना नहीं होती। कथा नायक अमीर अली ठगी और हत्याओं के कारण सीखचों के पीछे बंद होता है। उसे फांसी लगने वाली होती है लेकिन एक दुर्दांत ढंग गणेशा को पकड़वाने का विश्वास दिलाने के कारण उसे मुक्त कर दिया जाता है। तब वह कर्नल मेडोज टेलर को ठगी की पूरी दास्तां सुनाता है। ठग बनने के लिये भवानी कर कोई न कोई संकेत मिलना चाहिये। दरख्त पर बैठे एक उल्ल की टइटराहट होती हे। यह संकेत देता है कि भवानी की कृपा हुई है तथा वह ठग बनने के लायक है। दल का एक सरदार पानी से भरे एक लौट, जो एक रस्सी से दाहिनी ओर लटकता है, को लेकर चलता और लटकता है, यदि वह गिरता है तो अपशगुन माना जाता है। कथा में पिलहाऊं और थिआऊ सगुन है। अमीर अली एक साहूकार को लूटकर उसकी हत्या कर देता ही। वह रूमाल से टेंटुआ दबाकर हत्या करता है तथा लाश को 'बिल' (कब्र) में दफना दिया जाता है। और उसके पेट में खूटी ठोक दी जाती है। जिससे वह फूलती नहीं है। पाठक को लगता है जैसे लेखक ने ठगों के क्रिया कलापों का गहन विश्लेषण किया है।

अमीर अली अपनी बीवी के मिलने की भी दांस्ता सुनाता है। एक बार अमीर अली एक रईस के रौनक दार मकान के पास से गुजर रहा था, उसे एक और की आवाज सुनाई पड़ती है। वह उसे अपनी को मालिका के पास ले जाती है। मलिका को पहली नजर में ही उससे प्यार हो जाता है। वह उसे अपनी बीवी बनाने के लिये तैयार हो जाता है। उनका मिलन अत्यन्त रोमांचक होता है। वह उससे दरगाह पर मिलने का वादा कर वहां से चला जाता है तथा अपने वालिद से अजीमां के बारे में बताता है एवं पूरे घटनाक्रम का जिक्र करता है। वालिद उसका निकाह करने के लिये तैयार हो जाता है। अमीर अली तथा उसकी प्रेयसी नियत स्थान पर मिलते हैं। बीदर पहुंचने पर मुल्ल किताब खोलकर दो चार आयतें पढ़ता है और निकाल कबूल करा देता है। रात्रि में अजीमां को भवानी दिखाई पड़ती है। इसका अर्थ था ये भवानी की दुआ मिल गई। अमीर अली बाद में ठगी का घूंघट छोड़ देता है। अजीमां की मृत्यु हो जाती हैं। वह अंत तक नहीं जान पाती है कि अली एक ठग है। अंत में फांसी से पूर्व दशहरे के दिन अमीर अली भवानी की पूजा करना चाहता है। सिपाही उसे मंदिर ले जाता है। मंदिर में वह अकेला ही प्रवेश करता है। जन अमीर काफी समय तक अली, बाहर नहीं आया तो सिपाही दरवाजा खोलकर भीतर झांकता है, पर अली वहां नहीं था। क्या वह अदृश्य हो गया? या भवानी उसे ले गयी? कथा इतनी रोचक है कि पाठक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।

अंतिम कथा 'योगिराज' योग के विविध पक्षों का कथा के माध्यम से उद्घाटित करती है। योगिराज साइबरनेटिक्स इंजीनियर डॉ. हीरोजा नारायणम, डॉ. विलियस तथा मेधना इको उनके गुरु गंध बाबा के चमत्कारी सिद्धियों के बाद में बताते हैं। सिद्ध बाबा के पास काश्मीरोत्पल से निर्मित यंत्र रइवर होता है। वह जात्यान्तर यदुति का प्रयोग करते हैं। वह स्फटिक यंत्र को उठाकर उसके द्वारा गुलाब के फूल पर सूर्य रश्मियों का प्रयोग करने लगे। गुलाब के फूल में एक स्थल परिवर्तन होता है। पहले एक लाल आभा प्रस्फुटित होती है। धीरे-धीरे गुलाब का फूल अव्यक्त-अदृश्य हो गया। उसके स्थान पर एक खिला हुआ साया पुष्प प्रकट हो जाता है। यह एक प्रकार का कायान्तरण है। यह रूपान्तरण अकल्पित, अविश्वनीय अद्भुत है और यह सब बाबा के अनुसार सूर्य विज्ञान का अनुसरण करके होता है।

गंधबाबा सर्वज्ञ थे। वे लुइस रोजर्स की तरह एक ही समय में दो स्थानों पर प्रकट हो सकते थे। ऐसा वे सूक्ष्म शरीर का प्रयोग कर कर सकते थे। विष का भी उन पर कोई प्रभाव नहीं होता था। सांप बिच्छू उन्हें काटने पर मर जाते थे। वह यही नहीं रुके। भक्त के आग्रह पर अदृश्य होकर अपने शरीर के अंगों को अलग कर उनके सामने रख देते थे। और सशरीर प्रकट हो जाते। गंध बाबा के पास सिद्धियों की कोई कमी नहीं थी। एक स्त्री गंधबाबा के पास पुत्र की कामना से आती हो दूसरे ही क्षण एक शिशु उसके गोद में होता है। बाबा अदृश्य हो जाते हैं। इससे साथ ही शिशु भू अदृश्य हो जाता है और एक वर्ष पश्चात् स्त्री के गर्भ से शिशु जन्म लेता है। वे कहते हैं कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर अलौकिक सिद्धियों पाया जा सकता है। वे नाभि प्रदेश में अपने हाथों के संचालन से एक गड्ढा सा बना देते हैं। धंसे मार्ग में नाल का उदय होता है जिस पर एक सुन्दर सुगन्धित कमल पुष्प खिला होता है। इस प्रकार की कई चमत्कारी घटनाओं का उल्लेख हमें पतंजलि दर्शन में मिलेगा। स्थूल पदार्थ जत्यान्तर के फलस्वरूप अन्य पदार्थों में परिवर्तित किये जा सकते हैं। आज हम तत्वों के तत्वांतरण से भली भांति परिचित है। लेकिन मध्य युगीन युग में अलकेमी या कीमियागिरी जीवन को अमृत पान कराने तथा पारस-पाषाण की खोज, किसी से छिपी नहीं है। मनुष्य रासायन योगों द्वारा दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकते है। महान् दार्शनिक नागार्जुन की उम्र 600 वर्ष मानी जाती है। जब डॉ. विलियम रस सिद्धि पर शंका जाहिर करते हैं तो मेघना उन्हें सुदूर मूकक्षा में गतिमान उपग्रह को निर्देशत कर बिड़ला मंदिर स्थित एक शिलालेख का विवरण प्रस्तुत करती है।

27 मई 1942 को बिरला हाउस में प. कृष्ण गोपाल शर्मा ने एक तोला सोना करीब एक तेाला पारद-मरकरी से हम सभी के सामने बनायो शिलालेख पर पारद से सोने बनाने की वििध को भी दर्शाया गया है। अन्य जगहों यथा ऋषिकेश में भी इसके प्रमाण मिलते हैं। सन् 1943 में पं. कृष्ण पाल रस वैद्य ने 16 किग्रा पारे से 16 किग्रा स्वर्ण निर्मित कर सभी को चकित कर दिया। डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय की खोज परक अन्वेष्णात्मक दृष्टि अत्यन्त श्लाघनीय है। उन्होंने इसका तालमेल आधुनिक  भौतिकी को कोल्डफ्यूजन प्रक्रिया से बैठाया। हीरोता का कहना है कि यह कार्य बिना रेडियाधर्मी प्रदूषण उत्पन्न किये तथा बिना रेडियोधर्मी के तत्वों के प्रयोग के किया जा सकता है। मध्ययुग में भारतीय तलवारों की धार तीखी होने इन तलवारों की हैमरिंग करने पर फौलाद में नानोकण उत्पन्न हो जाते थे और धार की तीक्ष्णता बनी रहती थी। डॉ. उपाध्याय भारतीय प्राच्य विद्या का आधुनिक विज्ञान से साम्यता बैठाने में बेजोड़ हैं। सिद्ध योगी जब समाधिंस्थ होते हैं तो उनके मस्तिष्क से बीटा तरंगें प्रवाहित होती है। इन तरंगों को योगी के शरीर के सिर पर हृदय क्षेत्र में बाहों पर नेत्रों पर तथा छाती पर इलेक्ट्रोड को लगाकर मोनीटर स्क्रीन पर देखा जा सकता है। उभरती हुई रेखाएं क्रमशः हल्की होती जाती हैं और अंत में अदृश्य हो जाती है। इस प्रकार डॉ. उपाध्याय जी ने योग की वैज्ञानिक विवेचना की है। डॉ. उपाध्याय ने योग साधना तथा हमारे प्राच्य ज्ञान को जिस तरह कथा के माध्यम से प्रदर्शित किया है, अद्भुत है अकल्पनीय, शलाघनीय है उन्हें काटे-काटे साधुवाद। अतः प्रस्तुत संग्रह की कथाएं रहस्य, रोमांच के आवरण में लिपटी होने के बावजूद आधुनिक विज्ञान के ठोस वैज्ञानिक आधार से साम्यता बैठाने के कारण विज्ञान कथात्मक होने उद्घोषण करती है। कथाएं इतनी रोचक आकर्षण तथा मनोरंजक होती हैं कि पाठक धारा प्रवाह पढ़ने से स्वयं को रोक नहीं पाता इसके बावजूद कि वे वैज्ञानिक पुट लिये होती हैं।

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            ईमेल : harishgoyalsfw@gmail.com

वह एक उदास शाम थी। एरन नदी के किनारे डूबते सूरज को एकटक देखती जेनिफर जाने किन यादों में खोई थी। स्वीडन में पढ़ते यही उसकी पहली मुलाकात हुई थी नील से। दोनों दो अलग-अलग कॉलेज से आई टीम में शामिल थे जो यहाँ की जैव विविधता का अध्ययन करने आई थी। फील्ड वर्क के दौरान खाली समय में छात्र यहाँ-वहाँ भ्रमण, मनोरंजन आदि तो करते तो करते ही रहते थे, मगर सबसे स्मरणीय घटना थी- दोनों कॉलेज के मध्य वाद-विवाद प्रतियोगिता; जिसका प्रतिनिधित्व क्रमशः नील और खुद जेनिफर ही कर रहे थे। प्रतियोगिता का विषय था- ''जैव संरचना में परिवर्तन की आवश्यकता''। जहाँ जेनिफर इसे भविष्य में इंसानों की बढ़ती जनसंख्या और तदनुरूप बढ़ती आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए खाद्य आदि क्षेत्र में बीजों की जैव संरचना में आंशिक परिवर्तन कर खाद्यान्न की उपज बढ़ाने जैसे सीमित रूप में करने की पक्षधर थी, वहीं नील मानव की ही जैव संरचना में परिवर्तन कर उसी के स्वरूप में मनोनुकूल संशोधन करने के पक्ष में था। पहली नजर में नील का विचार युवाओं में उत्तेजना और रोमांच जगाने में सक्षम तो था, मगर जेनिफर की नजर में यह न सिर्फ नैतिकता के बल्कि प्रकृति के स्वाभाविक नियमों से छेड़छाड़ था, जिसे वह उचित नहीं मानती थी। इसे उसने बाद में भी कई मुलाकातों के दौरान नील को समझाने की कोशिश की। उसकी राय में प्रकृति स्वयं ही अपनी रचनाओं के साथ यथोचित परिवर्तन करती आई हैं विशालकाय जीव-जन्तुओं के एकछत्र राज के दौर से आज सभी एक सामान्य आकार-प्रकार तक आ पहुँचे है। प्रकृति तब उपयुक्त समझोगी सृष्टि में आवश्यक परिवर्तन स्वयंमेव होंगे, किन्तु असमय उसमें छेड़छाड़ उचित नहीं है। नील उससे कई बातों में सहमत रहा करता था, किन्तु यह एक ऐसा विषय था जिसपर उसकी राय जेनिफर से अलग थी। वह मानव शरीर में जेनेटिक प्रक्रिया से ऐसे परिवर्तन लाना चाहता था, जिससे वो अपार शक्तिशाली, सभी बीमारियों से मुक्त और भूख-प्यास की समस्या से सदा के लिए निजात पा जाएँ।

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नील जानता था कि परम्परागत शोध संस्थान उसे ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम करने की अनुमति तथा संसाधान नहीं देंगे। ऐसे में वह किसी बाह्य फाइनान्सर की तलाश में था, और आखिर जैक्सन के रूप में उसे वो सहारा मिल ही गया। जैक्सन जेनेटिक इंजीनियरिंग के किसी ऐसे ही प्रॉडक्ट की तलाश में था जिसके पेटेंट से वह न सिर्फ और भी अमीर बल्कि विश्व की चंद प्रभावशाली हस्तियों में शामिल हो जाए। उसकी इस परियोजना से कुछ और भी महत्वाकांक्षा थी, जिसे उसने अभी नील के सामने भी स्पष्ट नहीं किया था। अपने प्रोजेक्ट को पूरा करने के जुनून में नील को भी शायद शेष किसी और चीज से कोई सरोकार था भी नहीं।

जैक्सन के सहयोग से उसने एक निर्जन टापू पर अपनी प्रयोगशाला स्थापित कर शोध कार्य प्रारंभ कर दिया था। जाने से पहले वो आखरी बार जेनिफर से मिला था, जो अब स्वीडन की ही एक प्रमुख प्रयोगशाला में वैज्ञानिक बन चुकी थी और बीजों के जेनेटिक गुणों में परिवर्तन द्वारा उनकी उपज बढ़ाने के क्षेत्र में अनुसंधान कर रही थी। जेनिफर जानती थी अब यहाँ से नील को लौटा पाना मुश्किल है, इसलिए उसने बस उसे अपनी शुभकामनाएँ ही दीं। इसके बाद से दोनों में कोई संपर्क न हो पाया था। जेनिफर इन्हीं यादों में खोई उसके शोध में प्रगति पर विचार कर रही थी। सूरज डूब चुका थ, तारे झिलमिलाने लगे थे, वो भी अपने कमरे में लौट आई। लौटते ही जिस चीज ने उसे चौंका दिया वो था नील के द्वारा भेजा पत्र। उसने एक साँस में ही पूरा पत्र पढ़ डाला-

''प्रिय जेनिफर,

मैं वर्तमान में जहाँ हूँ वहाँ से तुमसे संपर्क का अब और कोई भी साधन नहीं हे। एक सहयोगी जिसे किसी तरह मैंने यहाँ से निकल जाने को विवश किया था- उसी के माध्यम से तुम तक यह पत्र पोस्ट करवा रहा हूँ। तुम मेरे शोध कार्य के विषय में अवगत हो। यह कार्य अपनी परिणति की अंतिम अवस्था पर ही था। मैंने इस दिशा में निर्मित वैक्सीन का परीक्षण चूहों और खरगोशों पर किया जा काफी हद तक सफल रहे। किन्तु इंसानों पर परीक्षण के बिना यह प्रयोग अधूरा था। तुम्हें शायद यह पता न हो कि मैं खुद भी कैंसर से ग्रसित था, इसलिए मैंने इसका प्रयोग स्वयं पर ही करने का निर्णय लिया। तुम तो जानती ही हो कि पशुओं और मनुष्यों के डीएनए में कुछ प्रतिशत का ही अन्तर होता है। शायद यही अन्तर इस दवा के मानव शरीर पर विपरीत दुष्परिणाम का कारण बन गया। मेरे शरीर की दुर्दशा का अनुभव तुम खुद देख कर ही कर सकोगी। इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम एक बार यहाँ आ जाओ तो मैं न सिर्फ तुमसे आखरी बार मिल लूँ बल्कि इस

शोध का फॉर्मूला भी तुम्हारे सुरक्षित हाथों में सौंप दूँ। क्योंकि मुझे डर है कि जैक्सन इस खोज के दुष्परिणाम का भी लाभ उठाना चाहता है। वह इस वैक्सीन का गलत प्रयोग कर न सिर्फ एक दानवाकर सेना खड़ी कर लेगा बल्कि इसके दुष्परिणामों का भय दिखा वैश्विक जगत को ब्लैकमेल भी कर सकता है। जल्द आ जाओ।

तुम्हारी प्रतीक्षा में......

नील

पत्र पढ़ते ही जेनिफर उद्विग्न हो उठी और यथाशीघ्र दिये पते पर जाने की तैयारी करने लगी। अगली सुबह वह सफर में थी। तीन दिन का समुद्री सफर तय कर वह उस द्वीप पर जा पहुँची। उसकी नजरें नील को ढूंढ रही थीं। मगर वहाँ नील था कहाँ। उसने आवाज दी, तो एक पर्दे के पीछे से सरसराहट महसूस हुई और वहाँ से जो आकृति निकली वह किसी भी सूरत में नील की तो नहीं लगती थी। हरा शरीर, लाल आँखें, लम्बाई आम इंसानों से दो से ढाई गुनी, मांसपेशियां उभर कर बाहर आती हुईं। वह एक बारगी डर ही गई, मगर नील की उसी धीर-गंभीर आवाज ने उसे संभाल लिया। नील ने कहा- ''जेनिफर, तुम सही थी। प्रकृति से छेड़छाड़ की कोशिश कहीं से भी उचित नहीं। मेरा हश्र तुम्हारे सामने है। न सिर्फ मैं अपना अस्तित्व खोने की ओर हूँ बल्कि यह रिसर्च यदि किन्हीं गलत हाथों में पड़ गई तो जाने और क्या भयावह परिस्थिति हो! मेरी जान खतरे में है। मुझसे वैक्सीन का फार्मूला छीनने जैक्सन और उसके माफिया मित्र पहुँचते ही होंगे। तुम उनके आने से पहले उन्हें ले यहाँ से वापस लौट जाओ।'' यह कहते हुये नील दूसरे कमरे की एक गोपनीय दराज से उन्हें निकालने चला गया। जेनिफर प्रकृति और विज्ञान से खिलवाड़ के इस दुष्परिणाम को देख स्तब्ध और दुःखी थी। तभी उसे बाहर से हेलिकॉप्टर के आने और गोलियों के चलने की आवाज सुनाई दी।

नील भागता हुआ उसके पास आया और उसे एक सीडी पकड़ा, अपनी मजबूत बाहों में थामे बाहर की ओर भागते हुये चिल्लाया - ''तुम जल्दी वोट से निकलो, मैं इन्हें रोकने की कोशिश करता हूँ। मैं अब शायद बच न पाउं, इसलिए लौट कर वापस न आना।'' जेनिफर भौंचक-अवाक थी और बस नील की दी सीडी को मजबूती से पकड़ी हुई थी। बोट के करीब पहुँच उसने जैसे ही जेनिफर को उतारा, वो तेजी से बोट की ओर भागी। सामने से एक हेलिकॉप्व्टर तेजी से उनकी ओर ही आ रहा था। जेनिफर अचंभित रह गई जब उसने नील को एक छलांग में हेलिकॉप्टर की ऊँचाई पर पहुँच उस पर वार करते देखा। हेलिकॉप्टर तेजी से नीचे की ओर आ रहा था। बोट समुद्र में आगे बढ़ी जा रही थी। उसने देखा दूसरा हेलिकॉप्टर तेजी से उसी की ओर आ रहा था। नील ने उसका पीछा किया हाथों से ही उसके डैनों को पकड़ने की कोशिश की। जैक्सन ने अंदर से उसकी ओर हथगोला फेंका, जिसे लिए हुये ही नील हेलिकॉप्टर से जोर से लिपट गया। और फिर एक जोरदार धमाके के साथ सब कुछ खत्म हो गया। जेनिफर उन्हें के सामने समुद्र में समाती देख रही थी। द्वीप फिर से सुनसान हो चुका था। वातावरण में सिर्फ जेनिफर की बोट और उसकी सिसकियों की आवाज थी। नम आँखों से अदृश्य में नील को तलाशती जेनिफर ने अपनी कसी उंगलियां ढीली छोड़ दीं। उठती-गिरती लहरों के साथ सीडी समुद्र के नीले पानी में बही जा रही थी। शायद उसके मुख्य भूमि पर पहुँचने का सही समय अभी नहीं आया था। जेनिफर क्षितिज की ओर खामोशी से देख रही थी, जहाँ दूर कहीं सूरज डूब रहा था।

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ईमेल : abhi.dhr@gmail.com

एलियन का अर्थ पृथ्वी के बाहर के जीवन हैं। आकाशगंगा मंदाकिनी के एक तारे सूर्य के ग्रह पृथ्वी पर विविधता पूर्ण जीवन पाया जाता है। इनमें हम मानव सर्वाधिक विकसित जीव हैं। मानव में सोचने समझने की शक्ति है मानव ने जबसे अपने पर्यावरण को समझना प्रारम्भ किया, उसके मन में एक प्रश्न उठने लगा कि क्या पृथ्वी के बाहर किसी अन्य ग्रह पर भी जीवन है? प्रारम्भ में मानव के पास ज्ञान सीमित था तो उसने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए अपनी कल्पना शक्ति का सहारा लिया और बिना किसी प्रमाण के पृथ्वी बाहर के आकाशीय पिण्डों पर विविध प्रकार के जीवों होने की कहानियां रच डाली। इस विषय पर बहुत साहित्य लिखा गया है। कई लोकप्रिय फिल्में भी बनती रही हैं।

विज्ञान का विकास होने पर मानव ने पृथ्वी पर जीवन कैसे और कब से हैं? जैसे प्रश्नों के उत्तर जानने का प्रयास किया डार्विन के विकासवाद सिद्धान्त के साथ ही यह स्पष्ट हो गया कि गर्म गोले के रूप में जन्मी पृथ्वी धीरे धीरे ठण्डी हुई तब इसका वातावरण बना। वातावरण में उपस्थित तत्वों के संयोग से सरल यौगिक व उनसे जटिल यौगिक बने। इन यौगिकों में जीवन के आधार अणु जैसे जल, अमीनों अम्ल, नाभिकीय अम्ल आदि भी थे। इन अणुओं के घनीभूत होने पर आकस्मिक रूप से प्रथम जीवन की उत्पत्ति हुई। उस प्रथम जीव ने ही जैव विकास की प्रक्रिया द्वारा सहित सभी जीवों को जन्म दिया। पृथ्वी पर जीवन पनपने का कारण उसकी सूर्य से विशिष्ट दूरी हैं पूथ्वी सूर्य से इतनी दूरी पर है कि वहां जल तरल रूप में रह सकता है।

अन्तरिक्ष की जानकारी बढ़ने के साथ ही यह स्पष्ट हुआ कि हमारी अपनी आकाशगंगा में सूर्य जैसे अरबों तारे हैं तथा उनके सौर परिवार भी हैं। अनेक तारों के सौर परिवार में पृथ्वी जैसे ग्रह भी हैं। रेडियो खगोलिकी के विकास के साथ ही यह ज्ञात होने लगा कि जिन रसायनिक अणुओं ने पृथ्वी पर जीवन को जन्म दिया वे अणु अन्तरिक्ष में बहुतायत से उपस्थित

है। इससे यह अवधारणा विकसित हुई कि पृथ्वी के बाहर अनेक ग्रहों पर जीवन उपस्थित है। यह भी माना गया कि अनेक ग्रहों पर पृथ्वी से भी विकसित जीवन है। इसी से उड़न तश्तरियों में बैठ कर एलियनों के पृथ्वी पर आने की बात लोगों के मन में पनपने लगी। 1972 में पायोनियर 10 के छोड़े जाने के समय तो पृथ्वी बाहर मानव से बहुत अधिक विकसित जीवन होने की बात स्पष्ट रूप से स्वीकारी जाने लगी थी। उस समय वैज्ञानिकों को यह भय भी सताने लगा था कि बाह्य सभ्यता, हमारी किसी भूल के कारण, हमसे नाराज होकर हम पृथ्वीवासियों पर हमला कर सकती है। पायनियर 10 योजना में अन्तरिक्षयान को बृहस्पति ग्रह के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला जाना था। भय इस बात का था कि अपनी अनन्त यात्रा के दौरान पायोनियर 10 किसी विकसित सभ्यता के सम्पर्क में आ सकता था। विकसित सभ्यता पायोनियर 10 को उन पर मानव सभ्यता द्वारा किया हमला मान हम पर पलट वार भी कर सकती थी। इस गलतफहमी को दूर करने के लिए पायोनियर 10 पर एक प्लेट पर मानव स्त्री-पुरुष को मित्रता की मुद्रा में चित्रित किया गया तथा सांकेतिक भाषा में यान के पृथ्वी से भेजे जाने की बात प्रदर्शित की गई थी। योजना अनुसार पायोनियर 10 बृहस्पति के पास से होते हुए हमारे सौर मण्डल से बाहर चला गया मगर किसी बाह्य सभ्यता का कोई संकेत नहीं मिला है। वैज्ञानिक संसाधनों के विकसित होने के साथ पृथ्वीवासियों ने बाहरी जीवन की खोज करने करने प्रयासों को तेज कर दिया। बड़े-बड़े रेडियो दूरसंवेदी (सर्च फोर एक्सट्रा टेरेस्ट्रीयल इन्टेलीजेन्स 1999) लगा कर दूर अन्तरिक्ष में होने वाली फुसफुसाहट को सुनने के प्रयास किए जाते रहे हैं। इन सभी प्रयासों का परिणाम अभी तक शून्य ही रहा है। मानव से भी अधिक विकसित सभ्यता की बात तो बहुत दूर की है, पृथ्वी से बहार किसी किसी सूक्ष्म जीवन के होने के संकेत भी, वैज्ञानिक जगत अभी तक नहीं जुटा सका है। इस खोज को किसी परिणाम तक पहुँचाने के लिए नासा ने एक महत्वाकांक्षी योजना प्रारम्भ की है। नए वैज्ञानिक अनुसंधान बताते हैं कि हमारी गेलेक्सी आकाशगंगा में एक अरब पृथ्वी के जैसे संसार हैं, इनमें से अनेक पृथ्वी की तरह ही चट्टानी है। अब तक देखे गए ब्रह्मांड में लगभग 100 अरब आकाशगंगाएं हैं। नासा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एलेन स्टोफेन का कहना है कि आज हम पृथ्वीवासियों के पास बहुत पक्के सबूत है कि आगामी एक दशक में पृथ्वी बाह्य जीवन को खोज लेंगे। 20 या 30 वर्ष में तो एलियन के विषय में पक्के प्रमाण जुटा लिए जायेंगे। एलेन स्टोफेन की बात पर शंका करने का भी कारण नहीं क्योंकि आभासी सौरमण्डलीय प्रयोगशालाओं व अन्तरिक्ष में उपस्थित दूर संवेदी साधनों ने मानव समझ को पूर्व के किसी समय की तुलना में बहुत बढ़ा दिया है। पृथ्वी जैसे ग्रहों के साथ बर्फ से

ढके उपग्रहों जैसे यूरोपा पर भी जीवन खोजा जा रहा है। किसी बाह्य पिण्ड पर जीवन होने के संकेत अनुभव के साथ बदलते रहे हैं। पहले किसी आकाशी पिण्ड के वायुमण्डल में आक्सीजन, ओजोन या मीथेन की उपस्थिति जीवन की उपस्थिति का पर्याय माना जाता था। प्रयोगों में पाया गया कि भौतिक क्रियाओं में भी ये गैसें उत्पन्न हो सकती है, तब से किसी गैस को जीवन का प्रतीक मानने बदल दिया गया है। वर्तमान यह माना जा रहा है कि यदि मीथेन व ऑक्सीजन दोनों साथ साथ पाई जाती है तो यह जीवन की उपस्थिति का सूचक होगा। यह सोच वैसी ही है जैसे महाविद्यालयी विद्यार्थी उपस्थित हैं तो पिज्जा वहां होगी ही।

यह हुआ सिक्के एक पहलू। वैज्ञानिकों के दूसरे समूह की सोच है कि पृथ्वी बाहर जीवन तो मिल सकता है मगर उसके पृथ्वी जैसा विकसित होने की संभावना नगण्य ही है। इनका मानना है कि जीवन के विकास के लिए जल युक्त पृथ्वी जैसा चट्टानी ग्रह होना ही पर्याप्त नहीं है। पृथ्वी जैसे पिण्ड पर जीवन की उत्पत्ति होने में कोई परेशानी नहीं है, परेशानी जीवन की उत्पत्ति के बाद उस पिण्ड के वातावरण को जीवन योग्य बनाए रखने में होती है।

इन वैज्ञानिकों का मानना है पृथ्वी जैसे ग्रह के बनने के बाद आधा अरब वर्ष तक तो वह पिण्ड अत्याधिक गर्म व विस्फोटक होता है। ऐसे में जीवन पनपने की कोई संभावना नहीं होती। लगभग आधे से एक अरब के बीच पिण्ड इतना ठण्डा हो जाता है कि रसायनिक यौगिकों के संयोग से जीवन की उत्पत्ति हो सके। जीवन की उत्पत्ति के लिए ग्रह के वातावरण का जीवन योग्य होना आवश्यक नहीं है। असली परीक्षा ग्रह के बनने के एक डेढ़ अरब वर्ष की आयु के बाद में होती है जब वातावरण स्थायी रूप से जीवन योग्य बनाए रखना होता है। यह जंगली साण्ड की सवारी करना जैसा कठिन होता है। ''वाइटल डस्ट'' के लेखक डी डुवे का कहना है कि अधिकांश पृथ्वी जैसे ग्रह अपनी आयु के प्रथम एक अरब वर्ष तक ऐसा करने में असफल रहते हैं और वहां उत्पन्न जीवन सूक्ष्म अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पिण्ड पर जीवन उत्पन्न के बाद, जीवन ग्रह के भौतिक वातावरण के साथ पुर्नभरण संवाद करने लगता है। यह संवाद सकारात्मक व नकारात्मक दोनों प्रकार का हो सकता है। सामान्यतः यह नकारात्मक होता है और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। जहाँ जीवन का अपने वातावरण से सकारात्मक पुर्नभरण संवाद स्थापित हो पाता है वहां ही जीवन का आगे विकास होता है। जैसा कि पृथ्वी पर हुआ। इस सकारात्मक पुर्नभरण संवाद को वैज्ञानिक जेम्स लवलोक व लिन मार्गुलिस (1974) ने गैअन (धरती माता) नियमन नाम दिया है।

गैअन नियमन के अनुसार पृथ्वी एक सजीव इकाई की तरह कार्य करते हुए उस पर उपस्थित जीवों से सकारात्मक पुर्नभरण करती है। गैअन नियमन को पहले एक परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया गया था मगर आधुनिक अनुसंधानों के आधार पर इसे सिद्धांत का दर्जा दे दिया गया। आध्यात्मिक विचार के लोग तो पहले से ही धरती को माता कह कर जीवन को पालने में धरती की भूमिका स्वीकारते रहे हैं। विज्ञान जगत के लिए धरती को सजीव मानना गले नहीं उतर रहा है। इससे धरती के सउद्देश्य विकसित होने की बात सामने आती है जो विज्ञान में स्वीकार नहीं है।

यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि पृथ्वी एक ईकाई के रूप में कार्य करते हुए ही यहाँ के वातावरण को जीवन के पक्ष में बनाए रखा है। इस बात के प्रमाण मिले है कि जीव व उसका भौतिक वातावरण सकारात्मक पुर्नभरण संवाद करते हुए साथ-साथ विकसित हुए हैं। इस बात को स्वीकारते हुए भू-कार्यकी जैसे विषय पढ़ाए जाने लगे हैं। जैव मण्डल

(बायोस्फेयर) के रूप में धरती उसके जीव व वायुमण्डल को एक इकाई मान कर भू-जैव-रसायन चक्र का अध्ययन किया जाने लगा। यह भी माना जाने लगा है कि भू-जैव-रसायन चक्र में हस्तक्षेप कर मानव ने प्रदूषण को जन्म दे ग्लोबल वार्मिंग का संकट उत्पन्न किया है।

गैअन बोतल ग्रीवा स्पष्टीकरण

ब्रह्मांड में पृथ्वी जैसे ग्रहों की बहुतायत होने तथा उनमें से बहुतों पर जीवन उत्पन्न होने की प्रचुर संभावनाएं होने की बाद भी ब्रह्मांड में विकसित-जीवन की नगण्यता क्यों है? इस प्रश्न का जवाब गैअन बोतल ग्रीवा स्पष्टीकरण के रूप में दिया गया है। आस्ट्रेलिया के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के खगोलजीव वज्ञैानिक आदित्य चोपड़ा व चालरेलाइन्वीवर ने अपनी परिकल्पना में कहा है कि प्रारम्भिक जीवन बहुत नाजुक होता है, इस कारण उसके आगे के विकास की संभावना अत्यन्त कम होती है, इस कारण उसके आगे के विकास की संभावना अत्यन्त कम होती है। ग्रहों का प्रारम्भिक वातावरण बहुत अस्थिर होता है। जीवन को बनाए रखने के लिए ग्रह के तापक्रम को कम सीमा में बनाए रखना होता है। ऐसा ग्रीन हाउस गैसों के नियमन से संभव होता है। यह गैअन नियमन से संभव होता है जैसा कि पृथ्वी पर हुआ। चौपड़ा व लाइन्वीवर का मानना है कि किसी ग्रह के गैअन नियमन अवस्था तक पहुँचने की संभावना अत्यन्त क्षीण होती है। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि मंगल व शुक्र ग्रह प्रारम्भ में जीवन योग्य थे मगर तेजी से बदलते वातावरण में स्थायित्व लाने में दोनों ही ग्रह असफल रहे। इस कारण मंगल आज जमा हुआ उजाड़ है और शुक्र गर्म गेंद बन गया है। पृथ्वी के वातावरण में स्थायित्व लाने में यहां उत्पन्न जीवन ने बहुत भूमिका निभाई है। गैअन बोतल ग्रीवा स्पष्टीकरण के अनुसार पृथ्वी जैसे ग्रह पर, जीवन का उत्पन्न होना व विलुप्त हो जाना ही प्रकृति की नियति है। किसी ग्रह को जीवन योग्य बने रहने के लिए उस पर जीवन को होना आवश्यक है। इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जीवन ही किसी ग्रह के वातावरण को जीवन योग्य बनाता है। ग्रह का वातावरण व जीवों का विकास साथ-साथ चलते हैं मगर जैसे मुँह की जाते हुए बोतल संकरी होती है वैसे स्थायित्व की ओर बढ़ने का मार्ग भी कठिन होता जाता है। सामान्यतः सफलता नहीं मिलती और जीवन प्रारम्भिक अवस्था में ही नष्ट हो जाता है। किसी पृथ्वी बाह्य जीवन से हमारी मुलाकात नहीं हो पाने का रहस्य भी इसी में छिपा है। चोपडा व लाइन्वीवर की कल्पना के पक्ष में फिलहाल कोई  प्रमाण उपलब्ध नहीं है जब अन्तरिक्ष में जीवन मिलने लगेगा और वह सूक्ष्म में जीवों के स्तर का ही होगा तो चोपड़ा व लाइन्वीवर की कल्पना की पुष्ट होगी । कछु खगोल जैववैज्ञानिकों ने पृथ्वी पर जीवन के विकास के अध्ययन से कछु अवरोधक खोज निकाले हैं। सामान्य अणुओं से जनन-क्षम अणुओं की उत्पत्ति पहला अवरोधक रहा होगा। इन अणुओं के संयोग से सरल पूर्व  केन्द्रिकी कोशिका की उत्पत्ति दूसरा अवरोधक रहा हाोगा। पूर्व केन्द्रिकी से सुकेन्द्रिकी कोशिका की उत्पत्ति तीसरा अवरोधक रहा होगा। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि पृथ्वी पर, 3.5 अरब वर्ष  तक जीवन में कोई  परिवर्तन नहीं हुआ था।

कुछ लोग परिकल्पना को धर्म प्रभावित मान कर इसको खारिज भी करते हैं। स्पष्ट की जब तक कोई एलियन सचमुच में नहीं मिल जाता तब तक कल्पनाओं का दौर चलता रहेगा।

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ईमेल :

vishnuprasadchaturvedi20@gmail.com

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  एक मशीनी मानव जब उसके पास गुजरा तो उसने किताब पर से नजर उठाकर एक उचटती नजर उसकी ओर डाली। उस गैलरी में मशीनी मानवों का चलना फिरना कुछ अस्वाभाविक नहीं था। क्योंकि वह दुनिया की जानी मानी रिसर्च लैब थी और वहाँ अधिकतर काम रोबोटों के ही जरिये होता था। वह यहाँ एक इंटरव्यू के सिलसिले में आयी थी और अपनी कॉल का इंतजार कर रही थी।

वैसे यह रोबोट उसे कुछ अजीब सा मालूम हुआ। क्योंकि दूसरे रोबोटों की तरह इसकी चाल यान्त्रिक न होकर किसी मानव जैसी लचीली थी। बिल्कुल ऐसा ही मालूम हुआ था जैसे कोई मानव पास से गुजर गया हो। उसने एक बार फिर किताब पर अपनी नजरें गड़ा दीं। कुछ क्षणों बाद वहाँ का कर्मचारी उसके पास आया। जिसने उससे थोड़ी देर पहले उसका बायोडाटा लिया था।

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''मैडम आप अन्दर चली जाइए। आपको कॉल किया गया है।'' उसने एक रूम की तरफ इशारा किया और वह अपना पर्स समेटते हुए उठ खड़ी हुई। कमरे में दाखिल होने से उसने बाहर लिखा तख्ती पर नजर दौड़ाई जिस पर 'चेयरमैन' अंकित था।

रूम के अन्दर घुसते हैं उसे हैरत का एक झटका लगा। क्योंकि सामने चेयरमैन की कुर्सी पर वही रोबोट विराजमान था जो थोड़ी देर पहले उसके सामने से गुजरकर गया था।

''आइए मिस अनुशा!'' उसने अपने यान्त्रिक हाथ से उसको सामने कुर्सी पर बैठने का संकेत किया।

''अ..आप!'' हैरत से उसे देखते हुए अनुशा ने कुछ कहना चाहा।

'' हैरत करने की जरूरत नहीं। मैं देखने में मशीनी मानव जरूर लगता हूं। लेकिन मैं एक इंसान ही हूं। मेरा दिमाग और जिस्म का अच्छा खासा हिस्सा अभी इंसान रूप में है। वैसे आजकल साईबोर्ग बनना तो एक आम बात हो गयी है। अनुशा ने चुपचाप उसकी बात पर सर हिलाया। इस दौर में इंसान के ऊपर काम का बोझ बहुत ज्यादा हो गया था। और यह संभव नहीं था कि मानवीय शरीर लेकर वे इतना काम कर पाते। इसलिये अक्सर लोग अपने जिस्म का कुछ कुदरती हिस्सा हटवाकर वहां उच्च कोटि की मशीनें लगवा लेते थे। लेकिन इस सामने वाले इंसान ने तो हद कर दी थी। शायद ही उसके जिस्म में दिमाग को छोड़कर कोई हिस्सा कुदरती रहा हो।

''शायद आ सोच रही है कि मैंने अपने मानव रूप की पहचान को बिल्कुल ही क्यों मिटा दिया है।'' वह व्यक्ति शायद सामने वाले के दिमाग को भी पढ़ सकता था।

''जी हां! मगर!'' अनुशा ने कुछ कहना चाहा मगर उस व्यक्ति ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।

''मैं तुम्हें अपनी कहानी इसलिये सुना रहा हूँ क्योंकि इस कहानी का सम्बन्ध तुम्हारी जॉब से है।''

अनुशा ने हैरत से उसे देखा।

''तुम्हें मालूम है कि आजकल हर इंसान को साईबोर्ग बनने की सनक सवार हैं लेकिन मेरे साथ ऐसा मजबूरी में हुआ है। क्योंकि मेरी पिछली कई पुश्तों ने चूंकि अपनी को साईबोर्ग बनाकर कुदरती तौर पर अधूरा बना लिया था इसलिए मैं पैदा ही अधूरा हुआ और मेरे जिस्म को मुकम्मल किया गया मशीनों के द्वारा।''

''ओह!'' अनुशा ने एक गहरी साँस ली।

''और मेरी शादी भी एक अधूरी औरत से की गयी। जो मेरी तरह ही जिस्मानी तौर पर विकलांग है और मशीनों के द्वारा उसे कम्पलीट किया गया है।'' अनुशा को वाकई यह जानकर दुःख पहुंचा था, कि वह एक विकलांग जोड़े से मिल रही थी। लेकिन साथ ही उसे रश्क भी था क्योंकि यह जोड़ा एक भारी भरकम कंपनी का मालिक था।

''अब तुम सोच रही होगी कि मेरी इस कहानी का तुम्हारी जॉब से क्या सम्बन्ध?''

''ज...जी हां सर!'' अनुशा ने गड़बड़ा कर कहा।

''बात ये है कि मेरी पत्नी का भीतरी जिस्म भी काफी कुछ मशीनी है और डाक्टरों ने उसका चेकअप करने के बाद साफ कहा है अगर उसने अपने गर्भ में हमारे बच्चे को रखा तो वह बच्चा भी विकलांग पैदा होगा।''

''ओह!''

''इसलिए हम अपने बच्चे के लिये ऐसी कोख चाहते हैं जो पूरी तरह कुदरती हो और यह कोख हमें आप प्रदान कर सकती हैं मिस अनुशा।'' उसने अपनी आँखें अनुशा के ऊपर गड़ा दी और अनुशा एकदम से हड़बड़ा गयी।

''म..मैं!''

''हाँ! हमारे ऑफिस की एक्सरे मशीनों ने आपके जिस्म की जाँच की है। और उसमें कुछ भी मशीनी नहीं है। अगर आप हमारा ऑफर स्वीकार कर लेती हैं तो हम आपको इसके लिये मुंहमांगी कीमत देने के लिये तैयार हैं क्योंकि हम नहीं चाहते कि कैमरून स्टेट का वारिस विकलांग हो।'' कहते हुए उसने जेब से एक प्लास्टिक कार्ड निकाला और उसे अनुशा के सामने रख दिया।

''इस कार्ड के जरिये आप किसी भी बैंक से मेरे एकाउंट से कोई भी रकम निकाल सकती है। उतनी बड़ी, जितनी कि आप चाहें। क्योंकि मैं जानता हूं कि अभी आप सिर्फ बीस वर्ष की हैं। ऐसे में किसी और के बच्चे को गर्भ में रखने के लिये आपको काफी समझौते करने पड़ सकते हैं। और इसके लिये निःसन्देह आप बड़ी से बड़ी रकम की हकदार है।'' उसने अनुशा की आँखों में झांका।

कुछ पल लगे अनुशा को फैसला करने में।

'' ठीक है। मुझे यह ऑफर मंजूर है।'' अनुशा ने कार्ड उठाकर अपने पर्स में रखे लिया।

कैमरून की आधी मशीनी और आधी मानवीय आँखों में चमक आ गयी थी।

उस समय मौजूद निहायत मामूली तकनीक द्वारा कौमरून व उसकी पत्नी का जायगोट अनुशा के गर्भ में शिफ्ट कर दिया गया। और बच्चा अनुशा के गर्भ में आकार पाने लगा। फिर नौ महीने बाद वह समय भी आया जब उसने प्यारे से गोल मटोल बच्चे को जन्म दिया। कैमरून की ख्वाहिश पर यह नार्मल डिलेवरी हुई थी। वरना उस समय तो एकाध के अलावा सभी औरतों की च्वाइस सीजेरियन ही होती थी।

अनुशा ने बच्चे की तरफ नजर की और फिर मानों उस पर से हटाना ही भूल गयी। माँ बनने के अनूठे एहसास ने उसके अन्दर एक रोमाँच सा भर दिया था। उसने बच्चे को गोद में उठा लिया और बेतहाशा उस पर अपना प्यार लुटाने लगी।

अचानक उसे लगा किसी ने सुहावने सपने से उसे जगा दिया हो। क्योंकि दरवाजा खोलकर कैमरून अपनी पत्नी के साथ वहाँ दाखिल हो रहा था।

''कैसी हो अनुशा!'' कैमरून ने नर्म स्वर में पूछा।

''ठीक हूं।'' अनुशा ने सर हिलाया।

''फारिया, ये हमारा बच्चा है।'' अनुशा की गोद में विराजमान बच्चे की तरफ इशारा करके कहा कैमरून ने अपनी पत्नी से।

''मेरा बच्चा।'' फारिया आगे बढ़ी और उसने अनुशा की गोद से बच्चे को उठा लिया।

अभी तक आराम से सोया हुआ बच्चा अचानक जोर जोर से रोने लगा। मानो उसे एहसास हो गया था कि वह मानव की बजाय किसी मशीनी गोद में पहुंच गया है। फारिया ने उसे बहलाने की कोशिश की लेकिन बच्चा किसी भी तरह चुप नहीं हो रहा था।

''इसे मुझे वापस दे दीजिए।'' अनुशा ने उसे लेने के लिये हाथ बढ़ाया लेकिन फारिया बच्चे को लिये हुए उससे दूर हट गयी।

यह मेरा बच्चा है। इसे मेरी गोद में रहने की आदत डालनी ही पड़ेगी। फारिया ने सख्त लहजे में कहा। अनुशा ने दुःख की नजरों से कैमरून की तरफ देखा। कैमरून शायद सिचुएशन समझ गया था।

''फारिया, अभी बच्चे को अनुशा को दे दो। इसे भूख लगी हे। और इसकी ये जरूरत फिलहाल तुम पूरा नहीं कर सकतीं।''

फारिया ने दुःखी नजरों से कैमरून की तरफ देखा और बच्चे को वापस अनुशा को थमा दिया।

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जैसे जैसे हारून यानि कैमरून का बेटा बड़ा हो रहा था उसे अनुशा से दूर रहने की आदत डाली जा रही थी। अब फारिया कोशिश कर रही थी कि उसे ज्यादा से ज्यादा अपने पास रखे। हालांकि हारून अभी भी अनुशा से ज्यादा लगाव दिखाता था और ये बात फारिया को बुरी तरह खल जाती थी। फिर एक दिन वह भी आया जब अनुशा को कुछ रकम देकर उसे चुपचाप हारून की जिंदगी से बहुत दूर जाने को कह दिया गया। अनुशा ने एक नजर अपने हाथ में पकड़े बड़ी रकम के कार्ड पर डाली और दूसरी फारिया पर।

''माँ बनने की बड़ी खुशी के बाद मेरी नजरों में किसी रकम की कोई अहमियत नहीं। आप इससे प्लीज हारून के लिये ढेर सारी खुशियाँ खरीद लीजिए। मैं उसकी जिंदगी से बहुत दूर जा रही हूं।'' अनुशा ने उदासी के साथ कहा और हारून को बिना अंतिम बार देखे उस आलीशान मशीनी महल से बाहर निकल आयी जिसके मालिक भी मशीन ही थे। वक्त बीतता रहा और अनुशा हर रोज दरवाजे की तरफ आस भरी निगाहें उठाती रही कि शायद हारून के माँ बाप को अपनी गलती का एहसास हो जाये। और वे हारून को अनुशा की ममता के साये में ले आयें। लेकिन उसकी उम्मीद मात्र एक सपना बनकर ही रह गयी और अब वह अपनी उम्र के बयालीसवें पड़ाव पर थी। कैमरून का कहना बिल्कुल सच साबित हुआ था कि किसी और के बच्चे को गर्भ में रखने के लिये उसे काफी समझौते करने पड़ सकते हैं। उसके बाद कोई लड़का उससे शादी पर राजी नहीं हुआ था। और वह अपना जीवन अकेले ही काट रही थी।

फिर अचानक एक दिन उसके मोबाइल पर एक खूबसूरत

लेकिन अजनबी लड़की का चेहरा उभरा।

''हैलो अनुशा जी। मैं कैमरून स्टेट के चेयरमैन के पर्सनल सेक्रेटरी बोल रही हूं।''

''क्या?'' अनुशा को हैरत का एक झटका सा लगा। तो क्या कैमरून को अपनी गलती का एहसास हो गया? लेकिन ये भी हो सकता था कि अब हारून ही कैमरून स्टेट का चेयरमैन बन चुका हो।

''ठीक है। मैं तैयार हूं।'' अनुशा ने जवाब दिया। अनुुशा को पक्का यकीन था कि अगर कैमरून ही चेयरमेन है तो उसे अपनी गलती का एहसास हो गया है और वह अपने बेटे को उससे मिलवाना चाहता है और अगर हारून चेयरमैन बन चुका है तो उस माँ की मोहब्बत उसे अपनी तरफ खींच रही है जिसने अपनी कोख में उसकी परवरिश की थी।

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अनुशा जब चेयरमैन के चैम्बर में पहुंची तो उसका दूसरा अनुमान सच साबित हुआ। यानि चेयरमैन की कुर्सी पर बैठने वाला बदल चुका था। यह बीस साल का हैंडसम जवान बिलाशक हारून था।

''वेलकम अनुशा जी। प्लीज सिट।'' हारून का लहजा पूरी तरह प्रोफेशनल था। तो क्या उसने उसे नहीं पहचाना? अनुशा जी। तमाम दुनिया के अरबों लोगों की पर्सनल ईप्रोफाइल चेक करने के बाद हमारे साइबर एनेलाईजर ने जो रिपोर्ट सौंपी है, उसके मुताबिक दुनिया में सिर्फ दो ही इंसान ऐसे बचे हैं जो मुकम्मल तौर पर इंसान है। यानि जिनके जिस्म का कोई भी हिस्सा मशीनी नहीं है।

अनुशा खामोशी से उसकी बात सुन रही थी। ''उन दो लोगों में से पहला इंसान मैं हूँ।'' कहकर हारून एक पल को रूका। अनुशा खामोशी से उसे देखती रही। न जाने उसकी आँखें कितनी प्यासी थीं कि एकटक हारून के चेहरे पर गाड़ी थीं। यही वह इंसान था जिसे उसने अपने गर्भ में पाला था।

हारून ने अपनी बात आगे बढ़ायी, ''और दूसरी इंसान आप हैं अनुशा जी। इसके अलावा और कोई इस दुनिया में कम्पलीट इंसान नहीं। सब साइबोर्ग बन चुके हैं मेरी बीवी भी।''

''ओह।''

''लेकिन मैं अपने बच्चे को एक कम्प्लीट इंसान के रूप में ही देखना चाहता हूँ। जैसा कि मैं खुद हूँ। और इसके लिये मैं एक पूरी तरह कुदरती कोख चाहता हूँ। जो कि इस दुनिया में सिर्फ आपके पास है।''

''ओह।'' अनुशा ने एक गहरी साँस ली। हारून ने अपनी बात जारी रखी, ''इसके लिये मैं आपको मुंहमांगी कीमत देने के लिये तैयार हूं।'' कहते हुए उसने जेब से एक प्लास्टिक कार्ड निकाला और उसे अनुशा के सामने रख दिया, ''इस कार्ड के जरिये आप किसी भी बैंक से मेरे एकाउंट से कोई भी रकम निकाल सकती है। उतनी बड़ी, जितनी कि आप चाहें।''

अनुशा ने कार्ड लेने के लिये अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाया। फिर हारून ने खुद ही कार्ड उसके सामने रख दिया। अनुशा की नजरें बीस साल पहले की दुनिया देख रही थीं जब ऐसा ही कार्ड हारून के बाप ने उसके सामने रखा था।

''मालूम नहीं तुम्हें याद है या नहीं। बीस साल पहले तुम भी मेरी ही कोख से पैदा हुए थे।'' वह धीरे से बोली।

''हाँ। मैं अपनी पैदाईश की कहानी जानता हूँ और मुझे ये भी मालूम है कि उसके बदले मेरे बाप ने आपको एक अच्छा एमाउंट पे किया था। लेकिन मैं उससे भी ज्यादा एमाउंट पे कर सकता हूं। क्योंकि अब कैमरून स्टेट का साम्राज्य बहुत ज्यादा बढ़ चुका है ओर उस साम्राज्य का मैं अकेला मालिक हूं।'' हारून की आवाज में गर्व के अलावा और कुछ नहीं था। अनुशा ने उसकी आँखों में देखा लेकिन शायद जो वह देखना चाहती थी वह देखने में नाकाम रही।

''अब मुझे इसके अलावा और कोई ख्वाहिश नहीं कि मेरा बेटा ठीक मेरी तरह एक मुकम्मल इंसान बनकर पैदा हो। अनुशा जी अब आप इसके लिये तैयारी शुरू कर दें। मेरा फैमिली डाक्टर बहुत जल्द आपसे कान्टेक्ट कर लेगा।'' अनुशा ने सामने रखा कार्ड उठाया और उसे अपने हाथों में तौलते हुए पूरी तरह शांत स्वर में बोलने लगी, ''तुम्हारी ये सोच एक बड़ी भूल है कि तुम मुकम्मल मानव हो। भला अधूरे माँ बाप का बेटा मुकम्मल कैसे हो सकता है। तुम सिर्फ एक मशीन हो। एक मुकम्मल मशीन, अपने माँ बाप से भी ज्यादा मुकम्मल। क्योंकि तमाम मशीनें सिर्फ क्वालिटी देखती है। बाकी भावनाओं, प्यार और इंसानी कमजोरियों के लिये उनके सर्किटों में कोई जगह नहीं होती। माफ कीजिए। किसी मशीन के लिये काम करने से इंसानियत का कोई भला नहीं होने वाला। मुझे आपका ऑफर स्वीकार नहीं।'' अनुशा कार्ड को वापस हारून की तरफ रख चुकी थी। जिसे वह जड़ होकर घूर रहा था।

कुर्सी से उठते समय अनुशा की तमाम बेचैनी खत्म हो चुकी थी। उसका दिल पूरी तरह शांत था।

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ईमेल :  zeashanzaidi@gmail.com

मौत के बाद

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(कहानी)

मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, क़ासिम की कराहट भरी चीखें फ़लक को तार-तार किए दे रही थीं। लेकिन मलैकुल मौत को उस पर ज़रा भी तरस नहीं आ रहा था। मेरी अम्मी मेरी राह देख रही होंगी मेरे ऊपर बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ हैं, मुझे अभी कई काम-करने हैं, मुझ पर रहम करो मुझे छोड़ दो, मुझे जाने दो, तुम्हें अपने रब का वास्ता मुझे छोड़ दो। मलैकुल मौत जिसे कभी किसी पर तरस नहीं आता, जो किसी की बात का जवाब नहीं देती, क़ासिम की बातों को सुनकर कहती है ''तुम दुनियाँ में पहले इन्सान नहीं जो ज़िम्मेदारियाँ छोड़ कर आए हो, हमारे साथ आने वाले सभी लोग किसी न किसी ज़िम्मेदारी में घिरे रहते हैं तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए कि तुम्हारे ऊपर से दुनियाँ के सभी बोझ उतर गये, और यह अल्लाह का बनाया कानून है जिसकी रूह एक बार जिस्म से निकल गई वह दुबारा दाख़िल नहीं की जा सकती। नहीं-नहीं ऐसा नहीं है आप चाहें तो अल्लाह के हुक्म से सब कुछ हो सकता है, पहले भी कई बार ऐसा हुआ है कि बन्द धड़कन दुबारा चालू हो गईं, और इन्सान फिर जी उठा। नहीं क़ासिम तुम समझ नहीं रहे हो, ऐसा नहीं हो सकता। नहीं मलैकुल मौत ऐसा न कहो, मेरी हालत पर तरस खाओ। मेरा काम तरस खाना नहीं अल्लाह के हुक्म को मानना और उसे अमली जामा पहनाना है। इंसान को दुनियाँ से प्यार नहीं करना चाहिए, दुनियाँ से प्यार उसे अल्लाह से दूर कर देता है, जैसा कि तुम्हारे साथ हुआ है। नहीं मलैकुल मौत मुझे दुनियाँ से लगाव नहीं है, मैं तो अल्लाह का ही बन्दा हूँ पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ता था किसी का काम हो तो मदद के लिए भी पीछे नहीं हटता, किसी का बुरा नहीं चाहता था। मलैकुल मौत पर किसी भी बात का कोई असर नहीं होता, वह बिल्कुल नहीं पसीजती और उसकी रूह को खैंच कर ले जाने लगती है। क़ासिम फिर बुरी तरह दहाड़ें मार-मार कर रोता है और अचानक मलैकुल मौत के पैर पकड़ लेता है। छोड़ो-छोड़ो यह क्या करते हो, क़ासिम! नहीं आपको मेरे लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा? अच्छा पैर तो छोड़ो मैं कुछ करता हूँ, और क़ासिम पैर छोड़ देता है, मलैकुल मौत हाथ फैलाकर कुछ पढ़ने लगती है काफ़ी देर बाद जब वह आँखें खोलती है तो कहती है कि अल्लाह ताला के हुक्म से तुम्हें सिर्फ़ छह महीने की ज़िन्दगी और मिलती है, तुम अपने छूटे हुए सभी कामों को पूरा कर लो, मैं तुम्हें यहीं छोड़ कर जा रही हूँ और छह महीने बाद तुम्हें लेने फिर आऊँगी।

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इतना कहने के बाद मलैकुल मौत ग़ायब हो गई, इसके बाद क़ासिम की रूह तेज़ी से ज़मीन की तरफ़ जाने लगी, जहाँ सुबह ऐक्सिडेन्ट में उसकी मौत हुई थी, वहाँ पहुँचने पर उसने देखा कि उस जगह पर कुछ ख़ून पड़ा हुआ है और उसकी बाइक का कहीं आता -पता नहीं है, उसकी रूह कुछ सोचते हुए घर की तरफ़ तेज़ी से चल देती है, जहाँ उसकी लाश को नहलाया जा रहा है, लाश की हालत बड़ी ख़राब है, क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा वह लाश के अन्दर कैसे समाए, मलैकुल मौत ने उसे कोई तरक़ीब भी तो नहीं बताई थी, लाश कई जगह से मोट-मोटे टाकों से सिली हुई थी शायद यह सब पोस्टमार्टम के बाद का हाल था उसकी रूह ने लाश के अन्दर घुसने की बहुत कोशिश की लेकिन नाकामयाब रही, पूरे घर में सन्नाटा छाया हुआ था, अन्दर वाले कमरे से कुछ सुबकने की आवाज़ आ रही थी, क़ासिम की रूह ने अन्दर जाकर देखा तो उसकी अम्मी और दोनों बहने दूसरी औरतों के साथ दबी आवाज़ में रो रही थीं, शायद रोते-रोते थक चुकी थीं, अब्बू बाहर आदमीयों के साथ बैठे थे जनाज़ा नहलाया जा चुका था, कुछ लोग बाहर टुकड़ियों में खड़े थे क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा था कि मलैकुल मौत ने उसके साथ ऐसा क्यों किया, अगर उसकी रूह जिस्म में दाख़िल नहीं हो सकती थी तो छोड़ा क्यों। सामने मेरा सबसे प्यारा दोस्त अब्दुल उदास खड़ा था उसके साथ कुछ दूसरे दोस्त भी खड़े आपस में बातें कर रहे थे, एक बोला पिछले दिनों पाकिस्तान में एक अजीब हादसा हुआ, दो भाई क़ब्रों में से मुर्दे निकाल कर खाया करते थे यहाँ तक कि अपने बाप की लाश भी क़ब्र में से निकाल ली, और काट कर फ़्रीज में भर ली, पकड़े जाने पर छोटा भाई बोला, मैं गोश्त नहीं खाता था मैं तो बड़े भाई को सिर्फ़ पका कर देता था।

सचमुच क़्यामत आने वाली है इससे ज़्यादा बुरा काम और क्या होगा, दूसरा दोस्त बोला रेशमाँ के बारे में तुम लोगों ने कुछ सुना उसका पैंसठ साल का मियाँ कितना परेशान है, उसकी समझ में बिल्कुल यह बात नहीं आ रहा कि उसकी पहली दो बीवीयाँ जब माँ नहीं बन पाईं, तो रेशमाँ को बच्चा कैसे होने वाला है, दोनों में आजकल बहुत खटपट चल रही है। अचानक अन्दर से रोने की आवाज़ें तेज़ आने लगीं शायद जनाज़ा तैयार है, क़ासिम अपने माँ-बाप का अकेला बेटा था, और उसकी दो बहने हैं, माँ की आँखों का ऑपरेशन होना था, ताकि उसमें रोशनी आ सके, जनाज़ा बाहर आ चुका था, जनाज़े में लोगों की तादात बहुत थी क़ासिम की रूह सब देख रही थी, जनाज़ें में ऐसे लोग भी थे जिनके आने की उम्मीद उसे नहीं थी और कुछ ऐसे ख़ास दोस्त ग़ायब थे कि यक़ीन नहीं आ रहा था, क़ासिम की उम्र तक़रीबन तीस साल रही थी, बहने उससे दोनों छोटी हैं, एम0कॉम0, करने के बाद से वह नौकरी की तलाश में परेशान था, अब्बू उसके सरकारी दफ़्तर में मुंशी हैं जो कुछ ही दिन में रिटायर होने वाले हैं।

जनाज़ा क़ब्रिस्तान पहुँचा, कुछ ओर लोग वहाँ पहले से मौजूद थे, जल्दी ही जनाज़े को दफ़न कर दिया गया, और फ़ातिहा पढ़ी गई, ख़ानदान के काफ़ी लोग अब्बू के साथ थे, जो अब्बू को हौसला दे रहे थे कि हमारे और आप के बस में कुछ नहीं है, सब्र कीजिए, कभी कोई काम हो तो हमें बताइए। और फिर होले-होले सब लोग क़ब्रिस्तान से चले गए, अब्बू भी चचाज़ात भाई समद की गाड़ी पर बैठ कर घर चले गए, क़ासिम की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे, मलैकुल मौत ने तो उससे छह महीने बाद ले जाने की कहा है, उसके यहाँ रहने से अब क्या फ़ायदा वह तो अब किसी की कुछ मदद भी नहीं कर सकता, वह सोचता है- कहाँ जाऊँ, क्या करूँ, घर जाकर देखूँ अम्मी-अब्बू का क्या हाल है। घर पर बहने अम्मी को रोने के लिए मना कर रही हैं, जबकि वह भी होले-होले रो रही हैं, घर के बाहर खड़े लोग अब्बू से माज़रत चाहते हुए जा रहे हैं, घर के अन्दर रिश्तेदारों का जमावड़ा है, रात को अब्बू चचाज़ात भाई समद से खाने के इन्तेज़ाम के लिए कहते हैं, खाना आने के बाद सभी अफ़सुर्दा हालत में थोड़ा बहुत खाना खाते हैं, दूसरे दिन सुबह तीजा होता है, बाहर से आए कुछ मेहमान तीजे के बाद चले जाते हैं, दो-तीन लोग ही हैं जो रूके हुए हैं, दो दिन बाद वह भी चले गए, इस बीच मिलने-मिलाने वालों का सिलसिला चलता रहता है, पुर्से के लिए लोग आते रहते हैं, कुछ ऐेसे दोस्त भी आते हैं जिन्हें देख क़ासिम की रूह को यक़ीन नहीं आता, यह तो उससे हमेशा जलते थे और कुछ ऐेसे ख़ास दोस्त जिन्हें आना चाहिए था वह अब तक आकर नहीं झांके थे, सात दिन हो चुके थे। अब्बू रोज़ समद के साथ फ़ातिहा पढ़ने क़ब्रिस्तान जाते हैं, अम्मी की आँखों का ऑपरेशन होना था, अब्बू को भी आए दिन अपेंडिक्स का दर्द उठता था उनका भी ऑपरेशन होना था और फिर दोनों बहने शादी के लिए जवान थीं, ख़र्चे के लिए सिर्फ़ अब्बू की तनख़्वाह ही थी जो कि रिटायर होने के बाद कम होने वाली थी।

अचानक क़ासिम की रूह को नासिरा का ख़्याल आता है जो उसका जुनून थी, मकसद थी, ज़िन्दगी थी। भले ही नासिरा की नज़र में उसकी मुहब्बत की कोई कीमत न थी, लेकिन क़ासिम ने तो उसे पागलों की हद तक मुहब्बत की थी, उसकी एक झलक के लिए कई-कई घण्टे वह एक टाँग पर खड़ा रहता था। क़ासिम की रूह नासिरा के घर की तरफ़ चल देती है, जहाँ नासिरा टी0वी0 पर कार्टून पिक्चर देख रही है हाथ में चाय का कप है वह छोटे बच्चे की मानिन्द कार्टून देख बार-बार हस रही है, वह बहुत ख़ुश है, क़ासिम की रूह सोचती है कि शायद इसे मेरी मौत की ख़बर नहीं है। थोड़ी देर बाद नासिरा की अम्मी, आकर कहती हैं, तुम्हारी दोस्त फ़रहा आई है। उसे अन्दर भेज दो अम्मी। और फिर दोनों दोस्त एक दूसरे को देखकर बहुत ख़ुश होती हैं, बातों का सिलसिला शुरू हो जाता है, बेटी मैं तुम्हारे लिए चाय बनाकर लाती हूँ। अम्मी के जाने के बाद नासिरा बोली, मैं तुझे एक ख़ास बात बताने आई थी जो मुझे आज ही पता चली है। फ़रहा के बताने से पहले ही नासिरा उससे कहती है, तू शायद क़ासिम की मौत की ख़बर लायी है। फ़रहा कहती है हाँ, तुझे पता है। नासिरा, मुझे तो मेरे एक दोस्त ने उसी दिन ही बता दिया था जिस दिन वह मरा था, अच्छा हुआ बला टली पीछे ही पड़ गया था, कमबख़्त। फ़रहा उसकी शक्ल देखती रह जाती है और कहती है, वह तुझे कितना चाहता था तुझे उसके मरने का ज़रा भी अफ़सोस नहीं हुआ, तुम तो फ़रहा ऐसे कह रही है जैसे वह मुझे हीरे-जवाहरात देकर भूल गया हो। नासिरा, हीरे जवाहरात न सही उसने तुम्हें पागलों जैसी मुहब्बत तो की थी, और रही कुछ देने की बात तो पचाँसों बार उसने तुम्हें कुछ न कुछ गिफ़्ट तो दी ही, तुम ख़ुद दिखाती थीं। नासिरा बोली, ऐसे तो मुझे न जाने कितने लड़कों ने गिफ़्टें दीं, और न जाने कितने मेरे पीछे पड़े तो क्या मैं सबसे शादी करलूँ, और सबकी मौत पर मातम करूँ। और एक बात समझ लो फ़रहा शादी हमेशा माँ-बाप की मर्ज़ी से करो चाहे बाहर कितना भी एैश करो। मैं तुम्हारी बात से इत्तेफ़ाक नहीं रखती नासिरा, हमें अल्लाह के घर भी जाना है। तभी किसी लड़के का फ़ोन आता है और नासिरा खिड़की के पास जाकर बड़े ही प्यार से उससे बातें करने लगती है, बात करने का अन्दाज़ कुछ ऐसा था कि सामने वाला इस ग़लतफ़हमी में मुबतिला हो जाए कि वह भी उसे चाहती है, तभी थोड़ी देर बाद अम्मी चाय लेकर कमरे में आती हैं, नासिरा फ़ोन काट देती है और अम्मी से कहती है शबाना का फ़ोन था, अम्मी चाय रखकर चली जाती हैं, फ़रहा नासिरा से कहती है कि तुम क्यों लड़कों को बेवकूफ़ बनाती हो, तुम्हें अल्लाह का ज़रा भी डर नहीं है। नासिरा फ़रहा की तरफ़ बड़े ग़ौर से देखती है और कहती है तुम चाय लो। नहीं मुझे अब चाय नहीं पीनी मैं अब जाऊँगी, लेकिन इतना ज़रूर कहूँगी कि दिलों से खेलना ठीक नहीं है, ऊपर वाले के यहाँ देर है अन्धेर नहीं। और जो लड़की एक खूंटे से बंधकर नहीं रहती, वह कभी अपने शौहर की भी सगी नहीं हो सकती। इतना कहकर फ़रहा चली जाती है, अम्मी कमरे में आकर देखती हैं कि चाय वैसे ही रखी है, फ़रहा ने चाय नहीं पी नासिरा। मरने दो अम्मी, अच्छा हुआ नहीं पी, जब चाहा मुँह उठाए चली आती है, अपने आप को अल्लामा की नवाँसी समझने लगी है, मुझे समझा रही है जबकि मुझसे कम पढ़ी-लिखी है, आगे से आए तो मना कर दिया करो कि मैं घर पर नहीं हूँ। अम्मी चाय लेकर बाहर चली जाती हैं, नासिरा फिर किसी को मिस कॉल मारती है। और दूसरी तरफ़ से फिर मर्दानी आवाज़ आना शुरू हो जाती है और नासिरा उसके साथ बातों में मसरूफ़ हो जाती है। क़ासिम की रूह यह सब देख तड़प उठती है और वहाँ से चल देती है। आज उसे अपने ऊपर शर्म आ रही थी कि उसने मुहब्बत की भी तो किससे, अगर ज़िन्दा होता तो यह सब देख वैसे ही मर जाता, ख़ैर अल्लाह जो करता है बेहतर करता है। रास्ते में उसे ख़ालिद का मकान नज़र आता है जहाँ रात को सब दोस्त इकट्ठा हुआ करते हैं, वहाँ जाकर क़ासिम की रूह देखती है कि सिर्फ़ तीन दोस्त हैं, हामिद, सलीम और ख़ुद ख़ालिद, तीनों का ध्यान टी0वी0 पर आ रही किक्रेट की ख़बरों पर है, तभी निज़ाम और सुहैल आते हैं, निज़ाम कहता है अमा क्या ख़बरें सुन रहे हो ज़रा ''ज़ी-सिनेमा'' पर देखो इमरान हाशिमी की 'मर्डर' आ रही है। और फिर मर्डर लगा दी जाती है तभी ख़ालिद पूछता है कि अब्दुल की कुछ ख़बर, सुहैल कहता है कि उसे तो क़ासिम की मौत का सदमा बैठ गया है, साला रोज़ाना कब्रिस्तान में फ़ातिहा पढ़ने जाता है, और घर भी जाकर का़सिम के अब्बू से पूछता है कि कुछ काम हो तो बताना, निज़ाम बोला, कल मुझे मिला था, मैंने समझाया था कि मरने वाले के साथ ख़ुद थोड़े ही मरा जाता है, लेकिन साला सखी हातिम हो रहा है। सलीम बोला, अरे मैं बहुत समझाता था क़ासिम को कि गाड़ी धीरे चलाया कर लेकिन उसने मेरी बात नहीं मानी, ख़ुद भुगता।

क़ासिम की रूह का वहाँ रूकने का दिल नहीं करता, वह चल देती है, घर जाकर वह देखती है कि अम्मी फिर रो रही हैं और बहने चुप कराने में लगी हैं अभी क्या देखा था मेरे बच्चे ने हर वक़्त तुम्हारी शादी की फ़िक्र में लगा रहता था। कह रहा था अम्मी मैं अपने पैसों से तुम्हारी आँखों का ऑपरेशन कराऊँगा, फिर तुम्हें बिल्कुल साफ़ नज़र आएगा, अब साफ़ देखकर क्या करूँगी, जब मेरा लाल ही नहीं रहा, उनकी बातें सुनकर दोनों बहने भी रोने लगती हैं, आवाज़ें सुनकर दूसरे कमरे से अब्बू आते हैं, और डाटते हुए कहते हैं कि क्या हर वक़्त का रोना धोना लगा रखा है जानती नहीं हो ज़्यादा रोने से मरने वाले की रूह को भी तक़लीफ़ होती है और उनको चुप करा कर वह अपने कमरे में जाकर लेट जाते हैं, और बड़ी ही ख़ामोशी से रोने लगते हैं लेकिन उनके आँसू पौंछने वाला वहाँ कोई नहीं था और थोड़ी देर में रोते-रोते वह सो जाते हैं।

क़ासिम का दसवाँ भी हो जाता है, होले-होले चालीसवें का वक़्त आ जाता है क़ासिम की रूह ऐसे ही भटकती रहती है, एक दिन चचा समद की अम्मी से बोले। मैं सोच रहा हूँ कि समद का रिश्ता भाईजान की बड़ी बेटी शहाना के साथ कर दिया जाए, समद बीच में बोला नहीं मैं शहाना के साथ शादी नहीं करूगाँ। चचा ने डाटते हुए कहा बेवकूफ़़ भाईजान का लाखों का मकान है वो अब दोनों बेटियों को ही मिलेगा यानी आधा मकान तुझे, समझा, वरना तुम जैसे निखट्टू को कौन अपनी लड़की देगा, और शहाना में कमी भी क्या है मकान के लालच में कोई दूसरा हाथ साफ़ कर जाएगा, आई बात समझ में। और फिर रिश्ता करने से हमारी वाह-वाह ही होगी, मैंने बहुत सोच समझ कर यह तैय किया है। पूरी बात समझ समद बोला, अच्छा अब्बा आप कहते हैं तो मैं तैयार हूँ। अब्बा कहते हैं चालीसवें के बाद मैं किसी दिन भी बात छेड़ दूँगा। क़ासिम की रूह दूर खड़ी हुई यह सब सुन रही है। शाहना से छोटी का नाम हुसैना है वह बड़ी ही ख़ूबसूरत है उसने बी.एस.सी. इंजीनियरिंग की है, क़ासिम अपनी इस बहन पर जान छिड़कता था, वैसे भी वह घर में सभी की लाडली थी, चालीसवें वाले दिन घर में बहुत से लोग आते हैं सब से आख़िर में आए एक ख़ूबसूरत नौजवान को देख क़ासिम की रूह बड़ा पेरशान होती है कि यह शख़्स कौन है, इसे किसने बुलाया होगा। अब्बू उसे खाना खिलवाते हैं, वह बड़ी नज़ाकत से होले-होले खाना खाता है, खाना खा चुकने के बाद अन्दर से शाहना की आवाज़ आती है, अब्बू अली को अन्दर भेज देना अम्मी बुला रही हैं, और फिर अली अन्दर चला जाता है जहाँ हुसैना अम्मी के साथ बैठी है, वह भी सलाम करके सामने बैठ जाता है अम्मी कहती हैं, बेटा हुसैना तुम्हारी बड़ी तारीफ़ करती है क़ासिम ज़िन्दा होता तो कितना ख़ुश होता, वो तो हुसैना को बहुत चाहता था। अली बोला, अम्मी परेशान होने की ज़रूरत नहीं है ऊपर वाले को जो मंज़ूर होता है वही होता है, उसकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता, आप मुझे भी अपना बेटा समझें, कभी कोई बात हो तो आप मुझे बताइये मैंने आप के लिए डॉक्टर से बात कर ली है वह मेरा दोस्त है आँखों का बहुत अच्छा डॉक्टर है, जिस दिन आप फ़्री हों हुसैना के साथ अस्पताल आ जाइए, मैं भी वहीं पहुँच जाऊँगा। पता इस कार्ड पर लिखा है इसे रख लीजिए। थोड़ी देर बातचीत के बाद वह कहता है अच्छा अम्मी अब मैं इजाज़त चाहूँगा, हुसैना दरवाज़े तक उसे छोड़ने आती है दोनों में कुछ बातें होती हैं और अली चला जाता है, दूसरे दिन समद घर पर आता है और बोला, ताया आप किसी दिन मेरे साथ अस्पताल चलिए मुझे आप की बड़ी फ़िक्र रहती है मैं आपका ऑपरेशन कराऊँगा। अब्बा भी हर वक़्त आपकी ही की फ़िक्र में रहते हैं।

समद की इन बातों ने ताया के दिल में घर कर लिया क़ासिम की रूह यह सब नज़ारे बड़ी बारीकि से देख रही थी, कि चाहे कैसे भी सही पर कितनी आसानी से सारी ज़िम्मेदारियाँ पूरी ही रही थीं, वह कितना गिड़गिड़ाया था मलैकुल मौत के सामने जब तक वह जिन्दा था तो कितनी बड़ी लगती थीं यह ज़िम्मेदारियाँ और उसके मरने के कुछ ही दिन में सब कुछ ठीक हो गया, शायद मेरा मरना इन कामों को आसान कर गया, इसीलिए तो कहते हैं अल्लाह जो करता है बेहतर करता है और हाँ हो सकता मलैकुल मौत ने मुझे यह सब देखने के लिए ही ज़मीन पर भेजा हो।

दो महीने बीत चुके थे, अब्बू ने भी अब क़ब्रिस्तान जाना बन्द कर दिया था, दोस्तों को बीच भी उसका ज़िक्र अब कभी-कभी ही होता था अब्दुल भी अब ग्रुप में आकर ख़ालिद के घर बैठने लगा था, घर वालों ने दोनों बहनों की एक साल बाद एक साथ शादी के लिए कह दिया है, अम्मी-अब्बू के कामयाब ऑपरेशन हो गए हैं, हुसैना ज़्यादातर फ़ोन पर लगी रहती है और समद का भी अब घर पर आना बढ़ गया है।

ढाई महीने मे ही क़ासिम का वजूद तक़रीबन पूरी तरह फ़ना हो चुका है, उसकी समझ में नहीं आ रहा कि उसकी रूह अब यहाँ क्या कर रही है उसकी रूह क़ब्रिस्तान पहुँच कर अपनी क़ब्र के पास बैठ जाती है, ढाई महीने में ही क़ब्र ढाई साल पुरानी लग रही थी किसी जानवर ने शायद अपने पैरों से उसे उधेड़ दिया था, अचानक क़ासिम की रूह की आँखों से आँसू निकलने लगते हैं, अल्लाह मुझसे बहुत बड़ी ग़लती हो गई मुझे माफ़ कर दे, ऐ मलैकुल मौत तू कहाँ है मुझे ले चल, मुझे अल्लाह के पास पहुँचा दे, मैं यहाँ रहना नहीं चाहता और उसकी रूह तड़प-तड़प के चीखने लगती है रोते हुए वह हाथ उठाकर या कभी कानों को पकड़कर माफ़ी माँगती है और बुरी तरह करहाने लगती है, और चीख-चीख कर अल्लाह को पुकारती है। तभी कोई उसे पकड़कर झंझोड़ता है और कहता है कि क्या बात है क़ासिम क्या हुआ बेटा। हुसैना पानी लेकर आ पसीने-पसीने हो रहा है मेरा बच्चा, लगता है यह कोई बुरा ख़्वाब देख रहा था, अब्बू भी क़ासिम के कमरें मे आ जाते हैं क्या बात है। शाहना कहती है अब्बू, भाई ने कोई बुरा ख़्वाब देखा है वह ज़ोर-ज़ोर से चीख़ रहे थे। क़ासिम हैरत में आँखें फाड़-फाड़ कर सबको देख रहा था वह सोच रहा था कि यह बस क्या था वह अपने ज़िन्दा होने पर ख़ुश हो या फिर अफ़सोस करे।

कुछ देर बाद उठकर वह नहा धोकर तैयार होता है और नाश्ता कर सीधा अब्दुल के घर पहुँचता है अब्दुल एक कम्पनी में मुलाज़िम है और जाने के लिए तैयार खड़ा था। क़ासिम को देख वह कहता है आओ क़ासिम आज इतनी सुबह-सुबह कैसे आए, पाँच मीनट बाद आते तो शायद मैं न मिलता। वह दोनों बाहर ही खड़े होकर एक तरफ़ बात करने लगते हैं, क़ासिम उसे बताता है कि आज रात उसने कितना ख़ौफनाक ख़्वाब देखा था और उसके साथ ख़्वाब में क्या-क्या हुआ। अब्दुल उससे कहता है कि ख़ुद को मरे हुए देखना लम्बी उम्र की निशानी है तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए, मेरे दोस्त तुम्हारी तो उम्र बढ़ गई। क़ासिम कहता है यार अपने बॉस से मेरे लिए बात कर, मैं कब तब टयूशन पढ़ा-पढ़ा कर गुज़ारा करूँ, ख़र्चे दिन ब दिन बढ़ते जा रहे हैं। अब्दुल कहता है कि हमारे यहाँ कोई जगह भी तो नहीं है मैं फिर भी बॉस से तेरी बात करूँगा। क़ासिम कहता है अच्छा अब तुम जाओ, लेट हो रहे है शाम को मुलाकात करेंगे।

कुछ दिन में रमज़ान शुरू होने वाले हैं, क़ासिम सोचता है कि इस बार ख़ूब दिल लगा कर इबादत करेगा, हो सकता है अल्लाह सारे हालात ठीक कर दे। वह घर में हुसैना पर अब ज़्यादा निग़ाह रखता है लेकिन वह कभी उसे फ़ोन पर बात करते ही नहीं दीखती, और न हीं समद घर पर कभी आता है, रमज़ान शुरू हो जाते हैं क़ासिम पाबन्दी से जमआत के साथ नमाज़ पढ़ता है, और साथ ही तराबियों का भी पूरा-पूरा अहतराम करता है, रोज़े तो वह बचपन से ही पूरे रखता आया है। और फिर होले-होले रमज़ान ख़त्म हो ईद आ जाती है, इस बार वह नासिरा को ख़ुश करने क लिए सोने की लोंग लाता है, पहले तो वह अगूँठी की सोच रहा था लेकिन जेब की हालत जवाब नहीं दे रही थी दूसरे खर्चे भी बहुत थे, अब्बा से वह पैसे लेता नहीं था। ईद के तीसरे दिन वह नासिरा से एक जगह मिलता है और उसको ईदी की शक्ल मे लोंग देता है। पहले तो वह न नुकुर करती है लेकिन फिर ले लेती है और कहती है मैंने अम्मी से हमारी-तुम्हारी शादी की बात की थी लेकिन वह तैयार नहीं हो रहीं, तुम अच्छी सी नौकरी देखो मैं उन्हें मनाने की कोशिश करती हूँ। क़ासिम जी जान से नौकरी की तलाश में जुट जाता है और कुछ महीने बाद एक कम्पनी में उसका बहुत ही अच्छा इन्टर्वियू होता है। उसे अब पूरी उम्मीद है कि इस कम्पनी में उसको नौकरी मिल जाएगी। वह सोच-सोच बाइक पर ख़ुशी में उड़ा जा रहा था, कि अचानक उसकी निगाह सामने किसी की बाइक पर जा रही बुर्के वाली पर पड़ती है जो कि नासिरा है, वह बेचैन हो बाइक उसके पीछे लगा देता है, नासिरा जिस लड़के के साथ बाइक पर बैठी थी उसकी रफ़्तार बहुत तेज़ थी, क़ासिम ने भी रफ़्तार बड़ा दी, कि अचानक एक बस के पीछे से ट्रक निकला और क़ासिम की बाइक में से आवाज़ आई किर र र र ..... च र र र र ....... ध ध ध धड़ाम। क़ासिम और बाइक दोनों ट्रक के नीचे थे, एक ही झटके में रूह जिस्म के बाहर आ गई, लाश को कुछ देर तड़पने का मौक़ा भी न मिला, दूर मलैकुल मौत खड़ी मुस्करा रही थी, वह कहती है, छह महीने हो गए क़ासिम कितनी ज़िम्मेदारियाँ निभाईं। क़ासिम की रूह भी मुस्कराते हुए ही जवाब देती है, मलैकुल मौत अब मैं जान गया हूँ कि उनके पूरे होने का वक़्त अब आया है। क़ासिम की रूह अपना हाथ मलैकुल मौत के हाथ में दे देती है और दोनों मुस्कराते हुए बादलों के पार चले जाते हैं।

डॉ0 आसिफ़ सईद

जी-4, रिज़वी अपार्टमेन्ट-प्प्

मेडिकल रोड, 202002

अलीगढ़ (उ0प्र0)

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