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साक्षात्कार

जैसे चल रहा है वैसे चलेगा नहीं

मथुरा प्रसाद नवीन

मगही के कबीर कहे जाने वाले मथुरा प्रसाद नवीन का साक्षात्कार मनोज कुमार झा ने उनके गाँव बड़हिया, लखीसराय (बिहार) में 1989 में लिया था। कई वजहों से यह साक्षात्कार उस समय प्रकाशित नहीं हो पाया। मथुरा प्रसाद नवीन प्रगतिशील साहित्य आंदोलन से आजीवन जुड़े रहे। बिहार प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने विपुल लेखन किया है। उनके गीत जन आंदोलनों में गाए जाते रहे। ‘राहे राह अन्हरिया कटतौ’ उनका मगही कविता संग्रह है, जिसका प्रकाशन 1990 में हुआ। साक्षात्कार के कुछ प्रमुख अंश।

प्र. प्रगतिशील साहित्य आंदोलन से आप कब जुड़े?

उ. सन् 54-55 में एक बार पटना में कवि सम्मेलन हुआ था। उसमें कन्हैया जी और दिल्ली के कुछ वरिष्ठ लोग थे। कन्हैया जी के चलते ही हम प्रगतिशील लेखक संघ में आए और तब से जुड़े रह गए।

प्र. कन्हैया जी से आपका संपर्क कब हुआ?

उ. कन्हैया जी से कवि सम्मेलन में ही संपर्क हुआ। कवि सम्मेलन हिंदी साहित्य-सम्मेलन में हो रहा था। उस समय दिनकर जी सभापति थे। सम्मेलन शुरू हो जाने पर यकायक कन्हैया जी आए। मंच पर उनके आने के बाद लोग बड़ी सराहना करने लगे उनकी। मैंने सोचा कि कौन आदमी है जिसकी सराहना इतनी हो रही है। इसके बाद उनकी रचना सुनी मैंने। लगा, यह आदमी बहुत अच्छा लिखने वाला है और कर्मयोगी है। और इसके बाद अच्छा संपर्क रहा। घरेलू संपर्क हो गया।

प्र. जिस समय आप प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े, आपको याद है कि उस समय बिहार में क्या गतिविधियां होती थीं?

उ. उस समय पटना में प्रगतिशील लेखक संघ की एक पत्रिका निकलती थी। कुछ दिन चलने के बाद वह पत्रिका बंद हो गई। प्रलेस में दरार पड़ने लगा। धीरे-धीरे लोग बंट गए दो खेमे में। एक खेमा पटना प्रलेस के नाम से काम करने लगा। वह कारगर नहीं हुआ। लेकिन धीरे-धीरे हमलोग कमजोर पड़ने लगे। बिहार प्रलेस से कम लोग जुड़े। अब जो जुड़े वे कुछ तो हैं और कुछ नहीं। कमजोर पड़ने के बाद, दो खेमे मे बंटने के बाद पत्रिका बंद हो गई। बहुत दिनों तक चलता रहा कि अब निकलेगी, अब निकलेगी, नहीं निकल पाई और प्रलेस में दरार अभी पड़ा हुआ है। आपस में एक नहीं हो रहे हैं लोग।

प्र. इसके पीछे कारण?

उ. दरार पड़ने कारण था कुर्सी। सचिव, महासचिव बनने के लिए कुछ लोग जो सोफासेट थे, चाहते थे कि हमारे सिवा दूसरा कोई नहीं हो।

प्र. उस दौर में जब आप प्रलेस से जुड़े थे, उसके कार्यक्रमों का स्वरूप क्या होता था?

उ. उस समय कहीं भी सम्मेलन होता था और सम्मेलन में हमलोग जो तय करते थे, उसी के अनुसार काम होता था। जगह-जगह कवि सम्मेलन और साहित्यिक गोष्ठियां होती थीं। इससे नये लिखने वाले संगठन से जुड़ते थे।

प्र. कवि-सम्मेलनों से आप काफी दिनों से जुड़े रहे हैं। पहले जो स्थिति थी और अब जो है, उसमें क्या फर्क है?

उ. पहले सम्मेलन किसी पार्टी पर आधारित नहीं होता था। हर तरह के कवि उसमें भाग लेते थे। इसलिए भीड़ भी बहुत होती थी। आज खेमा बंट गया तो खेमे वाले ही कवि-सम्मेलन कराते हैं। लोग भी बंट गए हैं और अब जो भीड़ होती है कवि-सम्मेलनों में तो कहीं दू हजार, चार हजार, पांच हजार भी होती है, वो भी थोड़ी देर के लिए। पर हमलोग रात-रात भर कविता सुनाते थे। लोग उठते नहीं थे। जाड़े के दिन में रजाई ओढ़ कर लोग कविता सुनते थे रात-रात भर। अब यह माहौल है...दस बरस के अंदर हम देख रहे हैं कि आदमी भी जुटाना मुश्किल हो जाता है। उससे अच्छा हम गोष्ठी को समझते हैं। दस-बीस आदमी ही आते हैं, लेकिन बुद्धिजीवी होते हैं। कवि-सम्मेलन में अब वो माहौल नहीं रह गया है। सिनेमा के गीत लिखने वालों पर मेला जुटता है, ऐसे नहीं जुटता है।

प्र. कन्हैया जी भी कवि-सम्मेलनों में भाग लेते थे। उनका और आपका साथ तो काफी रहता होगा?

उ. कन्हैया जी भी कवि-सम्मेलनों में भाग तो लेते थे, लेकिन बहुत कम। कन्हैया जी लिखते बहुत थे। सबसे बड़ा उनका गुण था कि वे अनुवादक थे। रूसी साहित्य का उनका अध्ययन बहुत ज्यादा था। रूसी कवियों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद कर के उन्होंने बहुत प्रचारित किया। कवि-सम्मेलन में बुलाने पर चले भी जाते थे। अस्वस्थ रहते थे ज्यादा। कहीं जाने में उन्हें तकलीफ होती थी। हमलोग जब पहुंच जाते थे तो जबरदस्ती उनको लेकर जाते थे।

प्र. आजकल के नये कवियों को आप पढ़ते हैं जैसे अरुण कमल आदि।

उ. हां, नये कवियों को पढ़ते हैं। लेकिन हमको कोई ज्यादा रुचिकर प्रतीत नहीं होता है। इसलिए कि आडंबर साहित्य में बहुत ज्यादा घर कर गया है। नये-नये लेखक लोग, कवि लोग नये तरह से राह निकालना चाहते हैं। इसमें उनकी रचानाएं आम जनता तक नहीं पहुंच पाती हैं, भले ही वह पठन-पाठन के लिए, बुद्धिजीवियों के मस्तिष्क की खुराक हो, आम लोगों के पेट की रोटी नहीं मिलेगी। लोग समझ नहीं पाते हैं कि अरुण कमल की कविता क्या है। आम लोगों के समझ से बाहर उनकी कविता है। फिर भी अरुण कमल वगैरह लिख रहे हैं।

प्र. तो इस तरह के साहित्य की क्या भूमिका समझी जा सकती है?

उ. इस साहित्य की भूमिका कुछ नहीं है। यही इन लोगों की हॉबी है कि इसके माध्यम से हम आगे बढ़ जाएं। लेकिन ये कहीं आगे बढ़ेंगे तो कुर्सी मिलेगी अवश्य, कोई संस्था के मालिक बन जाएंगे। पर जनता के बीच में जरूरत नहीं है और न जनता समझती है कि उनकी जरूरत है। यह जो समाज है, उसमें लोग पेट की भूख और बेकारी से तबाह हैं और इतनी ऊंचाई तक सोचने के लिए तैयार नहीं हैं। किसी रचना को जो बहुत अच्छी रचना है, बहुत ऊंचाई से लिखी गई है, लोग ये समझते हैं कि ये मेरी बात नहीं है। ये कुछ लोगों की बात है। आम लोगों की बात इन लोगों की कविता नहीं है।

प्र. आम लोगों के लिए कविता और खास लोगों के लिए कविता के अलग-अलग मानदंड बनाए जा सकते हैं?

उ. हां, आम लोगों के लिए कविता...कविता तो समाज का दर्पण है। कविता में समाज की जो रूप-रेखा है, वही दिखाई देती है। लेकिन ये लोग करें तो क्या करें। इन लोगों के सामने कठिनाई है कि आम लोगों की बात करेंगे तो वे तो आम लोग हैं नहीं। अच्छा पेन्हना चाहिए, अच्छा ओढ़ना चाहिए, अच्छा से रहना चाहिए। इस तरह की जिंदगी और जनता की जिंदगी, दोनों में दरार है। जनता यह नहीं चाहती है कि वे लोग तो अच्छे से अच्छे ढंग से सुविधा में रहें और हम लोग भूख से तबाह रहें। तो ऐसी लेखनी क्या काम करती है...! लेकिन फिर भी लेखन लेखन है। अभी जो समाज है, उसमें लिखने वाला जो व्यक्ति है उसकी लड़ाई है पैसे वालों से। उसकी लड़ाई है धनवानों से। उसकी लड़ाई है धर्म के आडंबर से। और इस तरह की लड़ाई लड़ने वालों को समाज में बहुत तकलीफ उठानी पड़ती है।

प्र. आम लोगों के लिए जो साहित्य है, उसके प्रकाशन की कोई व्यवस्था नहीं हो पाती है। उसका प्रसार नहीं हो पाता है। इस समस्या के बारे में आप क्या सोचते हैं?

उ. यह एक बहुत बड़ी समस्या है। इसके बारे में क्या कहा जाए। लक्ष्मी को ही लोग चाहते हैं। सरस्वती और लक्ष्मी में संबंध पहले नहीं था। पहले सरस्वती गरीब के घर में रहती थी। टूटी हुई चारपाई पर सोती थी। लेकिन अब सरस्वती प्रवेश कर गई है लक्ष्मी के घर में और सरस्वती का जो उपासक है, वो बेचारा भटकता चला जा रहा है। भूखे रहने की नौबत। देखता हूं कि आज से बीस-पच्चीस साल पहले मैं कलम के माध्यम से जी लेता था। कहीं न कहीं कवि-सम्मेलन, कहीं न कहीं कोई प्रोग्राम हो जाता था और कम से कम नोन-रोटी जरूर कलम देती थी। लेकिन इन दिनों हम देख रहे हैं कि नौबत ये आ गई है कि भूखे रहना पड़ता है। चूल्हा घर में नहीं जलता है। कहें तो किससे कहें, क्या कहें! समाज का स्तर ही ऐसा हो गया है कि जिसके पास पैसा है, उससे लड़ाई है। जिसके पास पैसा नहीं है, उसको हमसे भी ज्यादा तकलीफ है। अभी जो माहौल है, उसमें समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे हम लोग चलें। एक रास्ता ढूंढने के क्रम में हम लोग हैं।

प्र. लेकिन प्रकाशन, वितरण और साहित्य के प्रचार का काम संगठन क्यों नहीं करता?

उ. करना चाहिए संगठन को। लेकिन संगठन में लोग कहां हैं? नाम का संगठन सब जगह बना हुआ है, काम का नहीं।

प्र. खेमेबाजी की समस्या के समाधान का भी कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता है।

उ. अभी तो कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ रहा है।

प्र. जो स्थिति समझ में आती है, लगता है कि एक मध्यवर्गीय ढांचा बना हुआ है। ऊपर के लोग आते हैं। उनकी अपनी आकांक्षाएं होती हैं। अपनी जीवन-शैली होती है। उसमें किसी तरह का बदलाव, किसी तरह का हेर-फेर वो स्वीकार नहीं करते हैं। संगठन में मज़दूर-किसानों के बीच से लोग नहीं आते हैं। एक खेमे का आदमी दूसरे का मूल्यांकन कभी पूर्वग्रह-मुक्त होकर नहीं करता। तो ये जो सारी प्रवृत्तियां हैं, उनकी जड़ कहां है?

उ. खेमा को तोड़ने के लिए ऐसे लोग इसमें घुस गए हैं जो अपनी बात छोड़ना नहीं चाहते और अधिक संख्या है इन्हीं लोगों की। कम संख्या है वैसे लोगों की जो कुछ करना चाहते हैं। वे लोग पहचान में भी नहीं आते। यही दशा है। और यही कारण है कि प्रकाशन की व्यवस्था भी नहीं है। लोग टूट जाते हैं। अपने तरफ से, अपने इनकम से या पैसा कहीं से इकट्ठा कर के कोई अपनी पुस्तक प्रकाशित भी कर ले तो संगठन के लोग चाहें तो उसको वितरित कर सकते हैं, बेच सकते हैं, आगे काम बढ़ सकता है। लेकिन वैसे लोग भी, अपने लोग भी चाहते हैं कि किसका पैर खींचें। जैसे राजनीति में है, वैसे ही घुसपैठिया लोग साहित्य में भी घुसे हुए हैं। मार्क्स ने कहा है, बड़े-बड़े विद्वान लोगों ने कहा है कि ऐसा समय आता है जब लोग तोड़ने के क्रम में घुसते हैं। लेकिन वह नकाब इतना साफ रहता है कि तुरंत पहचान में आता नहीं है। हम लोग चाह रहे हैं कि वैसे लोगों को जमा किया जाए जो काम करने वाले हों। अभी ओहदा वाले लोग हैं जो चाहते हैं कि हमारी राजनीति सबसे आगे चली जाए। वैसे लोगों की जरूरत नहीं है। यह बात अब भी समझ में नहीं आ रही है कि कैसे इसका (प्रगतिशील लेखक संघ) का गठन किया जाए। कैसे कामयाब हम लोग हों, यह बात समझ में नहीं आ रही। फिर भी चिंतन में हैं हम लोग। आखिर तो एक न एक दिन कभी न कभी यही होना है। जैसे चल रहा है वैसे चलेगा नहीं।

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साहित्य समाचार

प्रलेस का उत्तर प्रदेश राज्य सम्मेलन

सभ्यता विकास की दीर्घ प्रक्रिया : वी एन राय

सभ्यता विकास की दीर्घ प्रक्रिया होती है. सभ्य वे कहलाते हैं जो कमजोर का ध्यान रखते हैं. हमारे जीन्स में सभ्यता नहीं है. हमजातीय आधार पर बंटे हुये हैं. अम्बेडकरवादी दुकानें भी जाति तोड़ने का नहीं, उनके विकास का काम कर रही हैंघ् पूर्व आई पी एस, महात्मागांधी अंतर्रष्ट्रीय हिंदी विश्व विध्यालय के पूर्व कुलपति तथा श्वर्तमान साहित्यश् के सम्पादक डा. विभूति नारायण राय का यह स्पष्ट मानना था. वे झाँसी में, 20-21 अगस्त को, प्रगतिशील लेखक संघ के उत्तर प्रदेश के दसवें राज्य सम्मेलन का, श्बुंदेलखंड महाविध्यालयश् के श्स्वर्ण जयन्ती सभागारश् में उद्घान करते हुये यह वक्तव्य दे रहे थे. उन्होंने कहा कि अपने समय के हालात में हस्तक्षेप से रचनाकार की पहचान होती है. प्रेमचंद-बाबू वृन्दावन लाल वर्मा जैसे रचनाकार ऐसे ही हस्तक्षेपकारी लेखक थे. वे समय परिवर्तन की प्रक्रिया में शामिल थेघ् यह कथाकार भीष्म साहनी जन्म शताबादी वर्ष भी चल रहा है. इस उपलक्ष्य में महाविध्यालय के प्राचार्य डा. बाबू लाल तिवारी, डा. नवेन्द्र सिंह डा. संजय सक्सेना, डा. मुहम्मद नईम, डा. मो. इकबाल खान के संयोजन में भीष्म साहनी के कथा संसार तथा उनके सामाजिक सरोकारों पर केन्द्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी भी रखी गई थी. भीष्म साहनी पर बोलते हुये डा. वी एन राय का कहना था कि यह चुनौती भरा समय है. देश की आजादी, आजादी के बाद के सपनों का टूटना जिसमें प्रतिगामी प्रवृत्तियां पैदा हो रही हैं, बुध्दिजीवियों को इसे समझना होगा. दधीचि की हड्डियों को परीक्षण, उनसे हथियार बनाने की सलाह, ऐसा अवैज्ञानिक सोच हमें कहाँ ले जायेगा. ऐसे समय में भीष्म साहनी को याद करना विवेक और तर्क की बात है.

सम्मेलन स्थल तक साहित्यकार तथा रंग-कर्मी शहीद चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर शांति-मार्च करते हुये पहुँचे थे. मार्च का नेतृत्व ट्रेड यूनियन समन्वय समिति के अध्यक्ष, जे एन पाठक तथा बीड़ी मजदूर नेता भगवानदास पहलवान ने किया. इप्टा, उरई के महासचिव राज पप्पन के निदेशन में नाट्य प्रस्तुति दी गई. सम्मेलन-स्थल पर प्रदर्शित पंकज दीक्षित की कविता-पोस्टर प्रदर्शनी तथा प्रगतिशील साहित्य केन्द्र का उद्घाटन झाँसी के निवर्तमान सांसद तथा केन्द्रीय राज्य मंत्री प्रदीप जैन श्आदित्यश् ने किया.

आरम्भ में प्रलेस उत्तर प्रदेश के महासचिव डा. संजय श्रीवास्तव ने सम्मेलन के उद्घाटन सत्र का संचालन सम्हाला. उन्होंने झाँसी के क्रान्तिकारी साहित्यकार डा. भगवान दास माहौर, मास्टर रूद्र नारायण, सदाशिवराव मलकापुरकर, आर बी धुलेकर, मैथिलीशरण गुप्त इत्यादि को याद करते हुये प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के उद्देश्य पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि शांति स्थापना राजनैतिक विकास से नहीं होती है. सैनिक हस्तक्षेप से भी नहीं होती है। किसी समाज के सांस्.तिक विकास से शांति स्थापित होती है... देश के आम आदमी में सांस्.तिक चेतना के विकास के उद्देश्य से ही 1936 में प्रेमचंद-सज्जाद जहीर जैसे साहित्यकारों ने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी.

प्रलेस के राष्ट्रीय महासचिव डा. अली जावेद का बहुत साफ कहना था कि आस्था तोड़ती नहीं, जोड़ती हैं. धर्म और जाति के नाम पर दंगे-फसाद, अलगाव राजनीतिबाजों के लिये खुद को सुरक्षित रखने के साधन होते हैं. इन्हें नीचे से जमीन खिसकती लगे तो आश्चर्य नहीं की देश को युध्द में झोंक दें लेकिन इनका मोहरा बनने से पहले हमें यह समझ लेना चाहिये कि सीमाओं पर लड़ने आम मजदूर-किसानों के बेटे जाते हैं. नेताओं, पूँजीपतियों के नहीं. विकास के नाम पर आज जो हालात पैदा किये जा रहे हैं, वे देश को कार्पोरेटर्स को सौंप देने की आधार भूमि है. भीष्म साहनी को याद करने का सबसे अच्छा तरीका यह होगा कि हम इन खघ्तरों को पहचानें. आम आदमी को इनके प्रति आगाह करें तथा इनके विरुध्द संघर्ष छेड़ने के लिये तैयार करें.

भारतीय जन-नाट्य संघघ्इप्टाघ्के राष्ट्रीय महासचिव राकेशजी का कहना था कि कला जनता के नाम एक प्रेम-पत्र होती है लेकिन जुल्मी सत्ता के विरुध्द अभियोग-पत्र भी होती है. समाज का विकास धर्मिक या आस्थावादी सोच से नहीं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण से होता है. प्रलेस तथा इप्टा समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हम कबीर तथा बुध्द की परम्परा के लोग हैं. समाज के उत्थान के लिये सामाजिक सोच से लैस तथा जुझारू जनता का निर्माण हमारा लक्ष्य है.

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष खगेन्द्र ठाकुर ने यह कर सत्र का सारांश प्रस्तुत किया कि भीष्म साहनी की अपने समय के समाज पर बहुत अच्छी पकड़ थी. वे अपने समय के सबसे बड़े कहानीकार थे.

श्भीष्म साहनी की कथा-यात्राश् सत्र की अध्यक्षता करते हुये साहित्यकार-पत्रकार श्याम कश्यप ने कहा कि लेखक समाजपरक विचारधारा के सापेक्ष होगा, तभी समाज को प्रगतिगामी साहित्य दे पायेगा. यह बात भीष्म साहनी के साहित्य में निरंतर देखने को मिलती है. कथाकार महेश कटारे ने भीष्म साहनी की रचना श्वांग्चूश्, श्चीफ की दावतश् इत्यादि का उल्लेख करते हुये कहा कि वे विलक्षण रूप से आम नहीं, निम्न वर्ग के साहित्यकार थे. उनके साहित्य में वाम राजनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखता है. जन संस्.ति मंच के महासचिव राजेन्द्र राजन का कहना था कि वर्तमान समय में भीष्म साहनी को पढ़ना समाज को दिशा दे सकता है. जय प्रकाश श्धूमकेतुश् का कहना था कि भीष्म साहनी साहित्यकार के साथ-साथ बेहद सरल व्यक्ति तथा विचारक भी थे.

विचार- सत्र का विषय प्रस्तुतीकरण महात्मागांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्व विध्यालय, वर्धा के, इलाहाबाद केंद्र के प्रभारी डा. संतोष भदौरिया ने किया. इस सत्र में श्अभिव्यक्ति की चुनौतियांश् विषय पर बोलते हुये मुख्य अतिथि, राज्य सभा चौनल के कार्यकारी सम्पादक डा. उर्मिलेश ने आंकड़ों के साथ बताया कि भारत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के क्षेत्र में दुनिया के 180 देशों में से 133 वें स्थान पर है. उन्होंने खघ्ेद व्यक्त करते हुये कहा कि हमने देश के बड़े वर्ग को सामाजिक आजादी नहीं बख्शी है. हम शब्द और कर्म के क्षेत्र में ढोंगी हैं. अतीत गौरव में जीते हैं. इससे काम नहीं चलेगा. जरूरत विचार बदलने की है. समाज में सबसे पिछड़े आदमी से संवाद की आवश्यकता है. इन सब के अभाव में झंडे बदलने से काम नहीं चलेगा. उन्होंने भगत सिंह तथा डा. अम्बेडकर की तुलना करते हुये कहा कि भगतसिंह क्रान्तिकारी थे. अम्बेडकर सामाजिक सुधार के पक्षधर थे. वे हिंदू धर्म से जाति व्यवस्था समाप्त करना चाहते थे. डा. उर्मिलेश ने कहा कि देश के उत्थान के लिये भगत सिंह तथा डा. अम्बेडकर में समन्वय की आवश्यकता है. हालांकि डा. विभूति नारायण राय का स्पष्ट मत था कि भगत सिंह मार्क्सवादी विचारधारा से अनुप्राणित थे. देश का समाजोन्मुखी, प्रगतिगामी विकास भगत सिंह तथा कार्ल मार्क्स के समन्वय से ही सम्भव है. सत्र की अध्यक्षता कर रहे डा. चौथीराम ने इतिहास को चुनौती देते हुये कहा कि दावा किया जाता था कि इक्कीसवीं सदी नेहरू तथा गांधी की होगी लेकिन बीते दशकों का घटनाक्रम गवाही दे रहा है कि वर्तमान शताब्दी डा. अम्बेडकर को साबित करने जा रही है.

संगठन सत्र की अध्यक्षता भी डा. चौथीराम ने की. इस अवसर पर हुये राज्य कार्यकारिणी के चुनाव में डा. संतोष भदौरिया अध्यक्ष तथा डा. संजय श्रीवास्तव महासचिव चुने गये.

प्रस्तुतिः दिनेश बैस, झांसी

 

भवेशचंद्र जायसवाल नहीं रहे

मीरजापुर। 22.6.2016 को सायं आकाशवाणी इलाहाबद से भवेशचंद्र जायसवाल की कविता उन्हीं की वाणी में प्रसारित हो रही थी और उनका परिवार, पड़ोसी व मित्रगण उन्हें लेकर डॉक्टर के यहां भागे जा रहे थे.

डॉक्टर ने भवेशचंद्र जायसवाल का परीक्षण करके कहा कि अब इनके जीवित बने रहने की कोई संभावना नहीं है. तुरंत करुण कुंदन का कोहराम मच गया.

भवेशचंद्र जायसवाल का जन्म 19 जून 1952 को मीरजापुर (उ.प्र.) में हुआ था. इलाहाबाद के ए.जी. ऑफिस से वे सेवा निवृत्त हुए थे. वे नई कविता के सशक्त हस्ताक्षर थे. उनकी कविताएं अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित आकाशवाणी इलाहाबाद से प्रसारित होती रहती थीं. संयोग ही था कि उनकी मृत्यु के समय भी उनकी कविता रेडियो पर प्रसारित हो रही थी. उनका तीसरा काव्य संग्रह ‘‘संभावना सच हो सकती है’’ वर्ष 2015 में प्रकाशित हुआ, जो काफी चर्चा में रहा. कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में उसकी चर्चा हुई थी.

भवेशचंद्र जायसवाल सौम्य, सहज, सुंदर गौर थे. हृदयाघात की कोई संभावना नहीं थी, पर इस तरह उनका अचानक सबको छोड़कर चले जाना सचमुच अच्छा नहीं लगा.

भवेशचंद्र जायसवाल अपने पीछे पत्नी, एक पुत्र व 2 पुत्रियां छोड़ गये. अभी अपने किसी पुत्र-पुत्री का विवाह नहीं कर पाये थे. उनके छोटे भाई भूपेशचंद्र जायसवाल अभी इलाहाबाद बैं में वरिष्ठ प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं.

पत्रिका परिवार की ओर से भवेशचंद्र जायसवाल के प्रति घोर शोक संवेदना और उनके परिवार को इस संकट से उबरने के लिए धैर्य व साहस की आकांक्षा है.

प्रस्तुतिः केदारनाथ सविता

 

फूल मसरूफ हैं कांटों की सनाआनी में

‘विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ’ की जनपदीय इकाई मऊ और ‘काव्यामुखी साहित्य अकादमी’ मुहम्मदाबाद गोहना मऊ के संयुक्त प्रयास से, एक अदबी मुशायरा-कवि सम्मेलन का आयोजन, शाह गोला दीवान प्राथमिक विद्यालय आदर्श नगर मुहम्मदाबाद के संवादहॉल में, बुजुर्ग मकबूल शादूर मुजीब बस्तवी की सदारत (अध्यक्षता) डॉ. कमर मुहम्मदबादी के कामयाब संचालन में, विगम 29 मई 2016 को, युवा कवि प्रेमगम आज़मी की वाणी वंदना और कामरान आदिल गाक्तिपुरी की नात से प्रारंभ हुआ. ‘काव्यमुखी’ के महानिदेशक, विश्वयात्री डॉ. मधुर नज्मी ने अपने उद्बोधन में ‘काव्य-समारोहों की उपादेयता’ पर प्रकाश डालते हुए इसके पतनशील स्तर पर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, ‘काव्य-समारोहों (हिंदी-उर्दू) का उत्थान लघु काव्य समारोहों को आयोजित करके किया जा सकता है. इसके लिये सतर्क श्रोताओं और सुलझे हुए अदीबों की दरकार है. काव्य-मंच कविता का समर्थक संप्रेषणीय माध्यम रहा है किंतु आज इसकी स्थिति शोचनीय है.’’ साहित्यिक प्रतिभा मंच फाउंडेशन संत कबीर नगर की ओर से डॉ. मधुर नज्मी, डॉ. कुमार मुहम्मदबादी को ‘प्रतिभा-मंच गौरव’ सम्मान से संस्था के महा-सचिव असद निजामी अध्यक्ष अतहर खान ने प्रतीक चिह्न देकर, अदबी सम्मान से विभूषित किया. आजमगढ़ संत कबीर नगर, मऊ, गोराखपुर बस्ती, सिद्धार्थ नगर आदि जनपदों से पधारे कवियों-शादूरों ने अपनी-अपनी प्रतिनिध रचनाओं का पाठ किया. समाज के विविध पलुओं अपने-अपने कलम की रंगिमा बुनते हुए शादूरों के कलाम बेहद पसंद किये गये-

‘‘सैंकड़ों निकलते हैं दाने एक दाने से-

रख दिया कमाल उसमने कितना एक दाने में’’ कामरान ‘आदिल’ गालिब पुरी.

‘‘गुमराह कर सकेगी कहां तीरगी मुझे-

अपनी पनाह में है किये रोशनी मुझे.’’ मतीन ख़ैराबादी

‘‘देखे थे उसने ख़्वाब महल्लात के मगर-

आई गरीबी चुपके से सपने बिखर गये.’’ डॉ. कमर मुहम्मदबादी

सामाजिक विसंगतियों पर नश्तरी चाकू की तरह चलते हुए शहरों के शरीर अपने मुल्क के परिदृश्य की अक्कासी कर रहे थे. श्रोता-सामयिन कवियों और शादूरों के ख्यालात की नर्मियों में डूबकर प्रशंसित दाद दे रहे थे. असद निजामी की कई-कई गजलों के ये शेर खूब प्रशंसित हुए.

‘‘हंसते-हंसते ही रो भी सकते थे-

हम अदाकार हो भी सकते थे-

हाथ छोड़ा नहीं बड़ों का कभी-

वर्ना मेले में खो भी सकते थे. असद निजामी

‘‘खाक सबकुछ हुआ है यहां देखिये-

राख बुझती नहीं है जहां देखिये.’’ महेश गोस्वामी

‘‘किन हवाओं ने बदल डाली चमन की तहज़ीब-

फूल मसरूफ हैं कांटों की सनासनी में.’’ एहसान एम.ए.

कविता चाहे जिस विधा की हो आज के तब्दील होते परिदृश्य पर कवि की दरवेशी दृष्टि से इन्कार नहीं किया जा सकता. आज कविता के हल्के में विसंगतियों की भरपूरगी है. गीतकार सुरेन्द्र सिंह ‘चांस’ ने अपने गीत के माध्यम से श्रोताओं को सोचने के लिये मजबूर कर दिया- ‘‘जो आंधियां बुझाती जलते दिये हमारे/ वो आंधियां जला दें तेरे दिये सहारे.’’ विक्रम शिला हिंदी विद्यापीठ के अंतर्राज्यीय कार्यदर्शी समन्वयक डॉ. मधुर जन्मी ने पढ़ा-

‘‘गजल के फूल खिले और शादूरी महके-

तेरे ख्याल की खुशबू से जिंदगी महके.’’ डॉ. मधुर नज्मी

‘‘हुस्ने-खुदसर को सुबुकसर करना आसां तो नहीं-

पत्थरों के शहर में शीशानगरी की बात है.’’ आज़म नज्मी

‘काव्यमुखी’ की ओर से वशिष्ठ शादूरी मुजीब बस्तवी और मिलन चौरसियो को स्मृति चिह्न डॉ. मधुर नज्मी, डॉ. कमर मुहम्मदाबादी, एहसान एम. ए., रण विजय मौर्य, आदिल गालिबदुरी के संयुक्त सहयोग से भेंट किया गया. शाहगोला दीवान विद्यालय के प्रबंधक एवम् ‘काव्यमुखी’ के महा-सचिव उपदेश कुमार चतुर्वेदी ने आभार व्यक्त किया.

प्रस्तुतिः उपदेश कुमार चतुर्वेदी

 

महा-सचिव ‘काव्यमुखी’

साहित्यकार डॉ. मधुर जन्मी हिंदी विद्यापीठ के प्रादेशिक कार्यदर्शी- समन्वयक नियुक्त

‘विक्रमशिला हिंदी-विद्यापीठ के कुल सचिव डॉ. देवेन्द्र नाथ साह ने अपने पत्रांक 5020 दिनांक 25-7-2016 के माध्यम से, उत्तर प्रदेश की प्रादेशिक शाखा की घोषणा करते हुए विश्वयात्री, गीतकार, गजलकार, समीक्षक डॉ. मधुर नज्मी को उत्तर प्रदेशीय इकाई का कार्यदर्शी, समन्वयक नियुक्त किया है. समन्वयक के माध्यम से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महा-सचिव, कोषपाल और नव सदस्यीय व्यक्तियों का चयन होगा.

अध्यक्ष, महा-सचिव और कार्यदर्शी समन्वय की सहमति से पांच साहित्यकारों को विद्यासागर (डी. बिट मानद) दस को विद्यावाचस्पति (पी.एच.डी. मानद) दी जायेगी. अन्य 50 उपाधियां विभिन्न संवर्ग से होंगी. यह निर्णय पहली बार उत्तर प्रदेश के लिये, डॉ. मधुर नज्मी के प्रयास से संभव हो सका है. अन्य राज्यों में विद्यापीठ की शाखा समिति का निर्णय विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ के अक्टूबर-नवंबर की बैठक में होने की संभावना है. उत्तर प्रदेशीय शाखा के अध्यक्ष सुकवि डॉ. चंद्रभाल सुकुमार पूर्व जिला जज इलाहाबाद और महासचिव डॉ. अरविंद सिंह संपादक ‘शॉर्प रिपोर्टर’ आजमगढ़ होंगे ‘काव्यमुखी साहित्य-अकादमी’ मुहम्मदाबाद गोहना के महानिदेशक, ‘सृजन-संवाद-मंच’ के परिकल्पक, अध्यक्ष डॉ. मधुर नज्मी के इस कामयाब प्रयास के लिये अनेकशः प्रादेशिक साहित्यिक संस्थाओं ने बधाइयां दी हैं.

प्रस्तुतिः डॉ. मधुर नज्मी, मऊ (उ. प्र.)

 

डॉ. कुंवर प्रेमिल सम्मानित

जबलपुरः विगत दिनों जबलपुर में अखिल भारतीय साहित्यिक परिषद् के एक भव्य आयोजन में प्रतिनिध लघुकथाएं के संपादक डॉ. कुंवर प्रेमिल सहित नगर के साहित्यकार मणि मुकुल एवं प्रभा विश्वकर्मा शील को शॉल, श्रीफल एवं मोमेंटो भेंट कर उनके साहित्यिक अवदानों की भी चर्चा संस्था की ओर से की गई. इस शुभ अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार प्रोफेसर राजेन्द्र ऋषि का भी सम्मान उनके जन्म दिवस के उपलक्ष में किया गया. शहर की साहित्यिक संस्थाएं वर्तिका, जागरण, आंचलिक साहित्यकार परिषद्, अनेकांत सहित अनेक संस्थाओं के सदस्यों की उपस्थित उल्लेखनीय रही.

दूसरे सत्र में काव्यपाठ की अध्यक्षता डॉ. गुमाश्ता तथा मुख्य अतिथि डॉ. अव्यक्त अग्रवाल के द्वारा संपन्न करायी गई.

श्री शरद अग्रवाल, राज सागरी, डॉ. अभिजात, कृष्ण त्रिपाठी, मनोज शुक्ल ने कार्यक्रम को अंजाम तक पहुंचाने में अपनी गरिमामय उपस्थिति दर्ज कराई.

श्री प्रेमिल को नाथद्वारा (राजस्थान) में आयोजित हिन्दी लाओ, देश बचाओ की भव्य आयोजना में ‘हिन्दी साहित्य शिरोमणि’ की मानद उपाधि से भी समाहत किया गया है. स्वास्थय कारणों से उनकी अनुपस्थिति में यह सम्मान डॉ. सुमित्र द्वारा स्वीकार किया गया. बधाई.

प्रस्तुतिः सुरेश तन्मय, उपाध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, जबलपुर

कवि के चिंतन से निकली भीषण चिन्गारियां

डॉ. सूर्यप्रसाद शुक्ला

मानवीय अनुभूति के भावपूर्ण मानस उत्कर्ष से उपजी शब्दार्थमय अभिव्यक्ति ही चेतना का चारुत्व बनकर कवि के काव्य जीवन का सत्य उद्घाटित करती है. जिससे उसके स्मृति कोष में संचित अनुभव के स्फुलिंग ही व्यष्टि से निकल कर समष्टि तक चेतना के चारुत्व को सम्प्रेषण का आधार देते हैं.

श्री कन्हैयालाल गुप्त ‘सलिल’ के काव्य जीवन का यही सत्य, चित्त, चैतन्य और चेतना का पर्याय बनकर जीवन दर्शन का काव्य-विवेक बना है. उनकी विचार प्रधान रचनाओं का भावपूर्ण संकलन ‘चिंतन की चिंगारियां’ इस कथन का प्रमाण हैं जिसमें जगत भी है, जीवन भी है, और जीवन का आधार कोई रहस्यमय परा प्रकृति का पारमार्थिक तत्व भी उद्भाषित हुआ है. इस संकलन में कवि के पांच चिंतनपरक काव्याख्यान लंबी कविताओं के रूप में विविध वैचारिक सत्यों से समन्वित होकर वाक्य वक्रता का दर्शन बने हैं जिनमें शब्दालंकारों के साथ ही अर्थालंकारों की चमत्कारिकता बहुत ही सहज रूप में वस्तु तत्व को प्रतिपादित करने का अभीष्ट बनी है. इन रचनाओं में कल्पना शक्ति कवि प्रतिभा के रूप में अनुभव (भाव, ज्ञान और अभिव्यंजना) बनकर शब्द सामर्थ्य का प्रमाण बनी हैं.

इस संकलन की पहली कविता है ‘मैं सलिल’ हूं. सलिल का सामान्य अर्थ जल तो होता ही है, स्वयं इस संकलन के कवि का उपनाम भी ‘सलिल’ ही है जो जल के विशेष गुणों की धारक है. करुणा कवि का प्रमुख गुण है तभी तो कविता के प्रारंभ में ही अपनी आत्म चेतना का परिचय देते हुए कहा है कि मैं पानी तो हूं ही पर ‘आंसू बनकर बहने वाली दुखिया की राम कहानी’ भी हूं. सलिलाक्षरों में उच्चादर्शों की अभिव्यंजना बनकर जल को ‘अनेक अर्थों’ और अनेक पदार्थों तथा दृश्यों में कविता के स्वर प्राप्त हुए हैं. आदिम मानव की उद्भव और आज के विज्ञानी मानव की विनाश कथा भी इन पंक्तियों में जीवन विकास से लेकर प्रतिफल विनाश तक चले जा रहे घटना क्रमों से शब्द में रूपायित हुई. यह संपूर्ण कविता काव्य धारणा और प्रयोजन तक ही सीमित नहीं है, इसमें तो काव्य की मार्मिकता, गंभीरता और उदात्तता के साथ समय को गति प्रदान करने वाली निष्ठापूर्ण प्रेरणा का प्रेरक तत्व भी उत्कर्षित हुआ है.

कृति में ‘सलिल जी’ की दूसरी रचना है ‘अंधकार का लघु-दीपक’. निःसंदेह अज्ञान के अंधकार के तमसाछन्न जीवन की भटकन को ज्ञान का एक नन्हा सा दीपक ही अपनी आलोक रश्मियों से प्रकाशमय कर सकता है. कवि का यह कथन कि मैं अंधकार का लघु दीपक उन अंधियारी गलियों की ज्योति कथा बनता हूं जिन में मेरी आवश्यकता होती है. इस कविता में सृजन के स्वर भी हैं, विजन के स्वर भी हैं, नश्वरता और अवसान के अर्थ भी समाहित हैं. विज्ञान बोध की विद्युत धारा का वर्णन भी है और पूजन की थाली में सजे हुए पावन चंदन चर्चित अगरू अक्षत और कर्पूर की सुरभि से संबंधित पावनता का प्रतीकात्मक पाठ भी समाहित है. अपने व्यक्तित्व को विलीन करके अग-जग को अपनी रश्मियों से उर्जस्वित करने वाले लघु दीपक की आत्म कथा महानतम व्यक्तित्व की आदर्श गाथा है.

चेतना के चिंतन सूत्रों में पिरोई मानस चिंगारियों की अगली कड़ी है ‘मुझको तो प्यारा लगता है’ शीर्षक कविता. जिसमें कवि ने कृत्रिम तथाकथित सभ्य और जन्नत कहे जाने वाले नगरीय जीवन की वितृष्णा प्रकट करते हुए कहा है कि ‘मुझको तो प्यारा लगता है, वही पुराना गांव. जहां खुरदरी सी जमीन पर सोती शीतल छांह.’ ‘सलिल जी’ का बचपन याद रखने का अपने स्मृति को सीधी और सहज जीवन गति से आप्लावित किये रखने का सुख सपना तो है ही. बहुत अच्छी कविता है- प्रेम की, नेह की, अपनेपन की अपनी विसंगतियों को पुरानी यादों के सहारे भुलावा देने की नई पीढ़ी को अपनी विरासत का संदेश भी है इस कविता में.

इस संकलन की चौथी कविता है कवि का स्वयं को आह्वाहन देकर कुछ इस प्रकार का गीत लिखने को कहना कि जिसमें मानवीय मूल्यों का प्रेम, करुणा का, सत्य का, दया का, क्षमा का, और वीर भावों का समावेश हो. जिसमें अपने कर्तव्य पथ पर सत्य के लिए, देश के लिए, समाज के लिए और दलित, दमित और पीड़ित के कष्ट में साझीदार होने के स्वर समाहित हैं. इन्हीं भावों को व्यक्त करने के लिए कहा गया है कि एक ओजस्वी रचना जो सोई हुई जवानी को जगा दे, कवि कुछ इस प्रकार का गीत लिखो.

अंतिम रचना है ‘फूल और शूल’ जीवन में कुरूपता भी है और सुंदरता भी है. एक फूल की डाली पर उगे शूल भी जीवन के अंकुरण का संदेश देने वाले हैं और फूल तो अपनी वाह्य और आंतरिक सुषमा से सभी को अलौकिक आनंद प्रदान करते ही हैं. इस कविता में फूल और शूल दोनों को ही जगत और जीवन का अभिन्न और आवश्यक अंग मानकर चिंतन प्रधान भाव प्रदान किये गये हैं.

इन कविताओं में वस्तु तत्व की प्रधानता है, जिसे ‘सलिल जी’ ने आदर्श और यथार्थ के समन्वय से चिंतन की चिंगारियों के रूप में अभिव्यक्त किया है.

संपर्कः 119/501-सी3, दर्शनपुरवा, कानपुर

मो. 9839202423

समीक्षा

आस्था और विश्वास का गीत-संग्रह : ‘कहां हो तुम’?

डॉ. राजेश कुमार

र्तमान काल में काव्य की विधाओं के उन्नयन में गीत का भी विशिष्ट स्थान है. गीत भावों की शब्दबद्ध योजना का निदर्शन करता है. जहां कविता पुरुष भावों की भी व्यंजना करती है, वहां गीत कोमल भावों की अभिव्यंजना का निरूपण करता है. भारतीय काव्य में गीतों का महत्त्व-बोध असंदिग्ध है. प्रायः कविता और गीत में मुख्य अंतर यह होता है कि कविता अपनी सम्पूर्णता में संप्रभाव का सर्जन करती है, वहीं गीत की पहली पंक्ति ही अपनी रमणीयता और कमनीयता के समावेश से पाठकों और श्रोताओं को रससक्ति करती है. यह निर्विवाद है कि गीतों में माधुर्य और प्रसाद गुणों की अर्थच्छाया पूर्ण रूप में विद्यमान होती है. तमसा नदी के किनारे मिथुनरत क्रौंच पक्षी के जोड़े में से नर क्रौंच की हत्या होने से कवि वाल्मीकि का आक्रोश निम्नलिखित शब्दों में अभिव्यक्त हुआ-

‘‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वं गमः शाश्वती समाः.

यतं क्रौंच मिथुनादेकं वधीः काममोहितम्...’’

स्पष्ट है कि कविता हो अथवा गीत, दोनों में मानवता की विराट् भावभूमि को स्पंदन अनुस्यूत होता है. अशोक अंजुम एक प्रातिभ रचनाकार हैं. व्युत्पत्ति और अभ्यास से समन्वित उनकी प्रतिभा जब काव्य की मनोभूमि में विचरण करती है, तब भावप्रवणताजन्य माधुर्य की संसृष्टि होती है. गीत के संदर्भ में अपने प्रथम ‘गीत-संग्रह’ ‘एक नदी प्यासी’ में ‘अंजुम’ ने गीत को सुपरिभाषित किया है-

‘‘गीत क्या है-

रोशनी का घट,

या कि डोरी पर थिरकता नट.

सांस का संगीत है ये

धड़कनों की ताल है,

एक परिचित गंध वाला

रेशमी रूमाल है.’’

‘कहां हो तुम?’ अशोक अंजुम का दूसरा गीत-संग्रह है, जिसमें उनके विविधवर्णी भाव-चेतना के पुष्कल स्वरों को नवीनता का समावेश भी है. प्रायः गीत कोमल भावनाओं का संवाहक माना जाता है, जिसमें प्रेम की पीर का सौंदर्यबोध उद्भासित होता है. अशोक ‘अंजुम’ ने गीत को सीमाओं से बाहर किया है. कोमल भावनाओं के साथ-साथ जीवन-यथार्थ का हर पहलू उनके गीतों में है. गीतकार के मन में एक ऐसी पीड़ा है, जो निराशा और हताशा को द्योतित न करते हुए आस्था और विश्वास के स्वरों को उद्गीरित करती है. ‘अंजुम’ के इस संग्रह में उनके व्यक्तिगत संदर्भ पूरी ईमानदारी के साथ अभिव्यक्ति हुए हैं. संग्रह का पहला गीत ‘कहां हो तुम?’ औत्सुक्य संचारी का जागरण करता हुआ चौंकाता है. इस गीत के आधार पर संग्रह का नामकरण हुआ है. ऐसा प्रतीत होता है कि अंजुम के इस गीत के अपने प्रिय आलंबन के बिछुड़ने का गम है, जो विविध बिम्बों एवं प्रतीकों में भासमान है-

‘‘हो रहा है मन बहुत व्याकुल,

कहां हो तुम?

जी नहीं लगता कहीं बिल्कुल,

कहां हो तुम?

है बहुत कुछ पास

फिर भी कुछ नहीं है,

जिंदगी की झील में

काई जमी है,

थरथराता प्राण का ये पुल,

कहां हो तुम?’’

इस संग्रह में ‘कहां हो तुम?’, ‘संवाद नहीं रहता’, ‘उत्तर नहीं मिले’, ‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं’, ‘याद रखना’ उत्कृष्ट वैयक्तिक गीत हैं, जिनमें गीतकार के पीड़ाजनक स्वर हैं. इन गीतों में पद-सौकुमार्य एवं भाव-प्रखरता का सामंजस्य है. गीत भावों की रसधारा के अजस्र स्रोत हैं. ‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं’ गीत में गीतकार का प्रेम के आलंबन के प्रति निष्ठावान विवेक, चाक्षुष बिम्बों, स्पर्श्य बिम्बों के माध्यम से घनीभूत हुआ है. इस गीत में ‘अंजुम’ की प्रतिभा श्लाघ्य है-

‘‘क्या-क्या तुमको याद दिलाऊं.

भूल गए चुपके-चुपके पिछवाड़े आना,

और मौन की भाषा से सब कुछ कह जाना,

भूल गए अंगुली से लिखना नाम रेत पर,

पकड़ के कहना हाथ, साथ छूटे न उम्र-भर,

दृष्टि फेरकर जाना अब कैसे सह पाऊं!?

क्या-क्या...’’

इस गीत-संग्रह में विविधवर्णी भाव-चेतना को वैचारिक आयाम देने का सारस्वत प्रयास किया गया है. गीतकार ने पर्यावरण-संरक्षण के प्रति अपनी नवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा का परिचय दिया है. इस संदर्भ में ‘बीमार है गंगा’, ‘निर्मल तुम बहती ही रहना’, ‘गुनगुनाती नदी’, ‘जल जीवन है’, ‘एक बूंद पानी की’ गीत उत्कृष्ट हैं. इसके साथ ही देश की अस्मिता के लिए आत्मोत्सर्ग करने वाले शहीदों के प्रति श्रद्धा का प्राकट्य भी ‘अंजुम’ के गीतों में पाया जाता है. उनके गीतों में राष्ट्रीय भावधारा की स्रोतस्विनी का प्रवेग स्पंदित होता है, जिसमें व्यक्तिवाद, अहंवाद से ऊपर उठकर देशानुराग की अनन्त रागमयी स्थितियों का चित्रांकन है. ‘उन शहीदों को नमन’, ‘मेरे प्यारे वतन’, ‘देश मेरे’ इस संदर्भ में स्मरणीय गीत हैं. उन के कुछ गीतों में व्यंग्य की वक्रोक्तिपरक व्यंजना क्रांतदर्शिता के समन्वय से रमणीय हुई है. यह रमणीयता, गीतों को न्यूनता प्रदान करती है.

कहा जा सकता है कि अशोक ‘अंजुम’ के गीतों में जीवन को ऊर्जा प्रदान करने वाली प्रगतिशील चेतना का डिण्डिम निनाद है. लोकधर्मी चेतना से ‘अंजुम’ का तादात्म्य घनीभूत संवेदना के साथ सम्पृक्त है. हिंदी के उत्थान और काव्य-साधकों के प्रति ‘अंजुम’ का प्रेम एक नए तेवर के साथ मुखरित हुआ है. हिंदी के संवर्द्धन और सम्मान के प्रति ‘अंजुम’ का ‘हिंदी-गीत’ मिश्रित छंद की बानगी है. हिंदी के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें करने वालों को ‘अंजुम’ कटूक्तियों और व्यंग्योक्तियों से तिरस्कृत करते हैं, जिस के कारण उनके कथ्य का उदात्तबोध न केवल अभिनंदनीय बन जाता है, बल्कि अपनी भाषा के प्रति सम्माननीय भी बनता है. लयात्मक अनुसंधान, प्रतीक-बोध तथा प्रतीयमान अर्थ की सशक्त व्यंजना करने वाले इनके अधिसंख्य गीत पाठकों को रसार्द्र करेंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है. ‘अंजुम’ के गीतों पर गर्व किया जा सकता है.

सम्पर्कः पी.सी. बागला (पी.जी.) कॉलेज,

हाथरस (उ.प्र.)

मो. 09897172160

समीक्षित गीत-संग्रह : ‘कहां हो तुम?’

गीतकार : अशोक ‘अंजुम’

प्रकाशक : सरस्वती प्रकाशन, ‘सारस्वत’, 1, बी.एन. छिब्बर मार्ग, देहरादून-248001

प्रथम संस्करण : 2016

मूल्य 150

समीक्षा

सच पर मर मिटने की जिदः साहित्यिक विरासत से रू-ब-रू होने का सच

गणेश चंद्र राही

सच पर मर मिटने की जिद हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक एवं कवि भारत यायावर की स्मरणीय पुस्तक है. इस पुस्तक में उनके द्वारा समय समय पर लिखे गये आलोचनात्मक लेखों का संकलन किया गया है. लेकिन जब इन लेखों को पढ़ेंगे तो लेखक की अनुसंधानात्मक दृ-िट एवं शुरू से अंत तक वैचारिक चिंतन भी समझ में आने लगता है. देश के ऐसे लेखकों के बारे में नयी नयी जानकारियों एवं उनको करीब से जानने का एक ऐसा साक्ष्य है जो पाठक को पुस्तक को पढ़ने के लिये बाध्य करते हैं. यहां लेखन के बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक एवं लेखन में भी विविधता है. संस्मरण, व्यक्ति चित्र, एवं गंभीर शोध का भी परिचय मिलेगा. फणीश्वरनाथ रेणु, गीतकार शैलेंद्र, राजेंद्र यादव, डॉ नामवर सिंह, नाटककार भुवनेश्वर, अनिल जनविजय, हजारीबाग शहर के साहित्यकारों के संक्षिप्त किंतु अनछुए पहलुओं को खोलनेवाले इतिहास एवं उनकी रचनाओं की पडताल. ये सभी लेख देश की चर्चित पत्र पत्रिकाओं में प्रकााशित हुए है. इनमें साहित्यिक एवं गैर-साहित्यिक लेख हैं.

हिंदी साहित्य के अमर कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु और फिल्मी जगत के महान गीतकार एवं फिल्मकार शंकर शैलेंद्र की फिल्म तीसरी कसम के निर्माण को लेकर जितनी परेशानियों का सामना करना पडा और दोनों हस्तियों के बीच कितने प्रगाढ मधुर प्रेम संबंध थे इसका जीता जागता हास्य करुणा से युक्त महत्व पूर्ण संस्मरण -सच मर मिटने की जिद है. यह भारत यायावर की कलम की ताकत है जिसने ऐसे संस्मरण लिख कर हिंदी पाठकों को चौकाया है. संस्मरण के वाक्य दर वाक्य शंकर शैलेंद्र के जीवन, उसके संघर्-ा, आर्थिक बदहाली, टूटन, दर्द, और तीसरी कसम फिल्म को पूरा करने की बेचैनी साथ ही ऐसे संकट की घड़ी में रेणुजी का सहयोग मन पढ़ते वक्त दर्द एवं करुणा पैदा करता है. शैलेंद्र इस फिल्म के निर्माण के लिये हर प्रकार की कठिनाइयों को झेलने एवं बाधाओं से लोहा लेने तैयार रहते थे. लेखक ने इस परिस्थिति का चित्रण आंखों देखा हाल जैसा किया है- ‘रेणु पर पांच सौ रुपये का कर्ज था और दुर्गति भोग रहे थे. उधर शैलेंद्र भी खस्ताहाल थे. उन पर कर्ज का पहाड़ चढ़ गया था जो फिल्म ढाई तीन लाख में पूरी करनी थी और समय लगना था पांच छह महीने, उसे बनते बनते पांच साल से ऊपर हो गये और खर्च 22 लाख रुपये. जो रेणु शैलेंद्र के लिये हृदय के स्पंदन की तरह थे उनको भी कुछ नहीं दे पा रहे थे. अजीब बेबसी का आलम था. उन्हें भरोसा था तो एक ही कि तीसरी कसम रिलीज होगी और वे तमाम कर्ज से मुक्त हो जायेंगे. लेकिन क्या हुआ? तीसरी कसम शैलेंद्र के जीते जी नहीं रिलीज हुई. 20 सितंबर को उन्होंने रेणु को फिल्म रिलीज होने की सूचना दी पर वह दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में ही प्रदर्शित हो पायी. उन्होंने लिखा- मुझे अपनी फिल्म का प्रीमियर शो देखना भी नसीब नहीं हुआ 14 सितंबर को राजकूपर जब अपना जन्मदिन मना रहे थे खबर आयी कि शैलेंद्र नहीं रहे. पूरा फिल्म-जगत मर्माहत हो उठा. लेखक ने इन स्थितियों, प्रसंगो एवं भाव बोध का मार्मिक चित्रण किया है. जैसे सारी घटनाएं लेखक की आंखों के सामने घट रही हैं. अदभुत लेख है पढने वाले के दिल को छूता है.

हिंदी आलोचना की एक गौरवशापी परंपरा है. जिसके आधार स्तंभ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, नंद दुलारे वाजपेयी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह. डॉ नामवर सिंह हिंदी आलोचना की अंतिम कड़ी हैं, जिसे इतिहास पुरु-ा कहा जा सकता है. भारतीय पंरपरा और आधुनिकता के द्वंद्व से उनकी आलोचना निर्मित हुई है. यही कारण है उनमें एक तरफ संस्कृत, अपभ्रंश एवं हिंदी साहित्य की प्रगतिशील परंपरा का गहरा बोध है दूसरी तरफ पाश्चात्य देशों की मनी-ाा का अवगहान. अपार ज्ञानरात्मक अनुभव के साथ उन्होंने एक अलग दृ-िट निर्मित की एवं हिंदी आलोचना के विकास में महत्वूपर्ण योगदान दिया. लेखक ने डॉ नामवर सिंह के हिंदी आलोचना क्षेत्र में आर्विभाव और उनकी दीर्घकालीन साहित्य साधना को अस्सी के नामवर सिंह लेख में काफी गंभीरता से विचार किया है. नामवर सिंह ने हिंदी आलोचना को शिखर तक पहुंचाने का काम किया है. इस कारण उन्हें आलोचना के शिखर पुरु-ा कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कही जा सकती है. लेखक ने नामवर सिंह के वैचारिक दृ-िट का विकास और उनके चिंतन को आग्रह पूर्वक नहीं बल्कि उनकी समस्त आलोचनात्मक कृतियों और शोधग्रंथों का गहन अध्यन कर रेखांकित किया है. आलोचक नामवर सिंह को समझने की यहां एक स्प-ट दृ-िट है.

हिंदी कथा जगत को अपने लेखन, वैचारिक विमर्श एवं संपाकदीय लेखों द्वारा प्रभावित करनेवाले सुविख्यात कथाकार राजेंद्र यादव पर लिखा गया लेख ‘राजेंद्र यादव की विरासत’ सुचिंतित एवं हास्य व्यंग्य से भरपूर है. लेखक ने अपने व्यक्तिगत संबंधों, मुलाकातों एवं उनकी कृतियों के आस्वादन कर अपनी आत्मीय शैली में काफी रोचक ढंग से लिखा है. हंस के संपादक रहते हुए उन्होंने अपने संपादकीय के माध्यम से कई प्रकार के विमर्श छेड़े हैं. हिंदी के विद्वानों एवं लेखकों का ध्यान उस ओर जाता रहा है. कई बार राजेंद्र यादव को विवादित संपादकीय के लिये तीव्र व्यंग्यवाणों का प्रहार भी सहना पड़ा है. उनका कभी दलित विमर्श तो कभ स्त्री विमर्श और कभी हिंदी पटटी को गोबर पटटी बताकर चर्चा में आ जाते थे. राजेंद्र यादव नयी कहानी आंदोलन के सशक्त हस्ताक्षरों में से एक रहे हैं. कमलेश्वर एवं मोहन राकेश के साथ इन्होंने कहानियों की कथावस्तु पर विशे-ा बल दिया. कहानियों में रूढ़ियों का विरोध एवं आधुनिक जीवन-दृ-िट को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. इन पर लिखा यह लेख पहले पाखी में छपा था. जो काफी चर्चित हुआ था. भारत यायावर ने इस लेख में राजेद्र यादव के लेखन, चिंतन एवं व्यक्तिगत जीवन से ऐसे संदर्भों को खोज निकाला है जो हिंदी के पाठकों एवं साहित्यकारों के लिये भी चौकानेवाले हैं. और सबसे बड़ी बात यह है कि लेखक की ईमानदारी, आत्मीयता एवं सत्य की खोजी दृ-िट ने लेख को अधिक रोचक एवं पठनीय बनाया है. राजेंद्र यादव जैसी हस्ती पर इतने साहस एवं चुनौतियों का सामना करने की दृढ़ता बिरले लेखकों में पायी जाती है. लेखक उनके व्यक्तित्व का एक चित्र यहां इस तरह खिंचता है- ‘राजेंद्र यादव कितने ही रावण के पक्षधर हों, कितनी भी नकारात्मक दृ-िट रखते हों लेकिन वे खलनायक तो कतई नहीं हैं. उनके जैसा प्रेमी साहित्यकार हिंदी में दूसरा नहीं. वे सरल, सहज और उदार हैं. जनवादी हैं. विद्रोही हैं. विनम्र और मिलनसार हैं. सहनशील हैं. सामाजिक हैं. अपने साथ के लोगों की चिंता करते हैं. मिलने पर आत्मीयता से बतियाते हैं. चाय पीते एवं पिलवाते हैं. छोटों से भी दोस्ताना अंदाज में बतियाते हैं. विरोधी बातें करनेवालों को भी तरजीह देते हैं. वे हिंदी लेखकों के हमदम हैं. मैं उनसे उम्र में पच्चीस वर्-ा छोटा हूं, किंतु मुझसे जब भी मिले समान स्तर पर मिले और मुझे लगा कि इतना खुला हुआ आदमी हिंदी साहित्य में कोई दूसरा नहीं है.’

भारत यायावर ने अपने चिरपरिचित साहित्यकारों पर अनूठे शब्द चित्र लिखे हैं. इन शब्द चित्रों में अनिल जनविजय, भारत भारद्वाज के नाम शामिल किये जा सकते हैं. लेखक ने अपने अजीज मित्र अनिल जनविजय जो सपरिवार रूस में रहते हैं दिल खोलकर न केवल प्रशंसा की है, बल्कि उनके जीवन में आयी दुख की घड़ियों एवं उनके संघ-ारें को बड़े ही आत्मीय ढंग से बताया है. यारों का यार अनिल जनविजय नामक के इस शब्द चित्र में कवि जनविजय के व्यक्तित्व के कई महत्वूपर्ण एवं रोचक पहुलओं को उभारा है. इतनी आत्मीयता एवं प्रेम है कि पढ़ते वक्त लेखक की भावनाओं में बहना पडता है. लेख की शुरुआत इस प्रकार से है- अनिल! दोस्त, मीत, मितवा! मोरी आत्मा का सहचर! जीवन के पथ पर चलते चलते अचानक मिला भिक्षुक को अमूल्य हीरा. निश्छल -बेलौस -लापरवाह -धुनी -मस्तमौला -रससिद्ध अनिल जनविजय! जब उससे पहली बार मिला, दिल की धडकनें बढ़ गयीं. क्यों, कैसे? नहीं कह सकता. यह भी नहीं कह सकता कि हमारे बीच में इतना प्रगाढ प्रेम कहां से आकर अचानक समा गया. अनिल को बाबा नागार्जुन मुनि जन विजय कहा करते थे. उसने पहचान लिया था कि उसके भीतर कोई साधु-संन्यासी की आत्मा विराजमान है. वह प्रेम का राही है, जो भी प्यार मिला ,वह उसी का हो लिया. इसमें अपने कवि मित्र के प्रति भारत यायावर का हृदय बहता हुआ दिखायी पडता है. इसमें एक आवेग है, जोश है, उमंग है एवं गहरी रागात्मकता है. उन्होंने अनिल जन विजय के अभावग्रस्त जीवन, उसकी स्थितियों एवं पारिवारिक तकलीफों के साथ उसमें बाद में आये परिवर्तन सुख और खुशिहाली के दिनों का भी बड़ी ही आत्मीयता, करुणा एवं प्रेम का चित्रण किया है. अपने अजीज दोस्त की आतिथ्य सत्कार वृत्ति एवं उसके सहयोगी व्यक्तित्व पर बाग बाग हो जाता है. लेख में कई रोचक प्रसंग हैं.

मेरे मीता भारत भारद्वाज में भारत यायावर का दोस्ताना अंदाज बड़ा ही मजेदार है. भारत भारद्वाज पर उनका दोस्ताना अंदाज पढ़ा एवं जाना सकता है. सबसे बड़ी बात जो है वह यह कि भारत यायावर का व्यक्तित्व ही दोस्ताना है. उनके संपर्क में आनेवाले लोग चाहे उम्र में उनसे काफी छोटा हो या बड़ा सबसे आत्मीय व्यवहार कर उनका दिल जीत लेते हैं. देश की सभा गो-िठयों में एवं सेमिनारों में मिलनेवाले साहित्यकार उनका मीता हो जाता है. यह गुण हर लेखक में अक्सर देखने को नहीं मिलता. यदि दोस्ती में कोई बाधक है तो अपना नया फार्मूला भी बनाना जानते हैं. और उनकी इस संवांद शैली से सामनेवाला व्यक्ति बिना प्रभावित रह नहीं सकता. दूसरी वह जो भी कहते हैं हदय से कहते हैं. निःसंकोच और बेधड़क कहते हैं. भारत भारद्वाज के बारे में कहते है- ‘भारत भारद्वाज वन पीस आदमी हैं. दिल्ली में रहते हैं और दिल्ली में रमे हुए हैं. और मैं हजारीबाग में रहता हूं. स्वीकार करता हूं कि मै हर खेल में अनाड़ी हूं. किसी किसी खेल का कोई कोई गुर वे ही बताया करते हैं. हम दोनों भारत हैं और प्यार से एक दूसरे को मीता कहते हैं. इस मीतापन को और गहरायी में जाकर उनके व्यक्तित्व की व्यापकता को इस प्रकार बताते है- भारत भारद्वाज स्मार्ट ही नहीं बेहद अध्ययनशील आदमी हैं. रोज 12 घंटे लिखते-पढ़ते हैं. बाकी के काम कब करते हैं, वे ही जानते हैं. उन्हें जो भी काम सौंपा दिया जाए उसे तुरंत तत्परता से करते हैं. पढ़ते लिखते समय थोड़ा पीते हैं और पीने को रस-रंजन कहते हैं. वे इतना रस ग्रहण करते हैं कि फिर भी कठोर लगते हैं. पर मैं जानता हूं- वे भावुक और हमदर्द इंसान हैं. बड़ा ही रोचक, हास्य एवं व्यंग्य के साथ ज्ञान को बढ़ानेवाला लेख है. दोनों की अंतरंगता एवं प्रेम की अनूठी मिसाल इस लेख में पेश है.

साहित्यकारों का शहर लेख में उन्होंने अपने प्रिय शहर हजारीबाग के रचनाकारों पर अदभुत संस्मरण लिखा है. यह संस्मरण इसलिये ऐतिहासिक हो गया है कि इसमें पहली बार हजारीबाग में कई दशकों से विभिन्न भा-ााओं में लिखनेवाले कवियों, कहानीकारों, उपन्यासकारों एवं साहित्य मनी-िायों के जीवन, उनके साथ बिताये गये पल, साहित्यिक गो-ठी एवं साहित्य परिवेश को दर्ज किया है. भारत यायावर ने अपने संपर्क में आनेवाले चाहे वह लेखन के क्षेत्र में पहला कदम रखनेवाला छात्र हो व वरीय रचनाकार हो उनके बारे में जरूरत के अनुसार लिखा है. संस्मरण को अधिक रोचक एवं पठनीय बनाने के लिये लेखक ने लेखकों के जीवन के विभिन्न प्रसंगों का उल्ल्ेाख किया है. यह संस्मरण हजारीबाग के लेखकों के लिये प्रेरणा देनेवाला नहीं, बल्कि देश के किसी भी शहर में लिखनेवाले संवेदनशील रचनाकारों को प्रेरित कर सकता है. हजारीबाग से महाकवि रवींद्रनाथ टैगोर, राहुल सांस्कृत्यायन, रामबृक्षपुरी, रामनंद संिहत रेणु जी, विजय कुमार संदेश, गोपाल शरण पांडेय, छविनाथ मिश्र, विजय बहादुर सिंह, नंददुलारे वाजपेयी, कुमार सरोज, शंभु बादल, रमणिका गुप्ता, प्राणेश कुमार, रतन वर्मा, डॉ चंद्रेश्वर कर्ण, भूपाल उपाध्याय, शंकर तांबी, सच्चिदानंद धूमकेतु, विजय केसरी, अशोक प्रियदर्शी, रामनरेश पाठक, जहीर गाजीपुरी, डॉ. नागेश्वर लाल, गणेश चंद्र राही समेत दर्जनों साहित्यकारों के साहित्यिक परिचय, उनके व्यवहारिक जीवन एवं लेखन को बड़ी ही विद्वता से इस लेख में समेटा गया है. कौन कहां से हजारीबाग आये, कहां किस पद नौकरी की एवं रचनात्मक लेखन से किस प्रकार उनका जुड़ाव रहा. उनका हजारीबाग की साहित्यिक भूमि को सींचने में कितना अहम योगदान रहा, भाारत ने बडी सादगी एवं नि-ठा के साथ कलमबद्ध किया है. आनेवाली नये रचनाकारों की पीढ़ियों को कुछ नया लेखन एवं ऐतिहासिक कार्य करने के लिये यह एक तरह से भूमिका लिखी गयी है. और शहर के रचनाकारों पर इस परंपरा को वहन करने की जिम्मेवारी दी है.

पुस्तक में इसके अलावे राधाकृःण के संग और उनके ढंग, राधाकृःण एक अप्रतिहत रचनाकार, मैं ऐसे बाबा का चेला हुआ, फकीरों में नव्वाब, गिरहकट, अघोरी साधक : भुवनेश्वर एवं महापुरु-ाों में बालगंगाधर तिलक, गोपाल कृःण गोखले, अबुल कलाम आजाद, एनी बेसेंट एवं जयप्रकाश नारायण पर गंभीर चिंतनपरक लेख विरासत की तरह हैं. हर लेख एक नया दृ-िटकोण प्रदान करता है और साथ ही भारत यायावर की गंभीर अध्ययन प्रवृत्ति. मैं ऐसे बाबा का चेला हुआ लेख हिंदी के महान जनकवि बाबा नागार्जुन के साथ गुजारे कई अंतरंग क्षणों एवं उनके साथ सीखे ज्ञान अनुभव के ऊपर लिखा गया है. नागार्जुन के व्यवहार एवं व्यक्तित्व के कई अनजाने पहलुओं से पहली बार अवगत होते हैं. पूरी किताब पढ़ने में जो हमें कहीं भटकने नहीं देती वह है लेखक की प्रवाहपूर्ण शैली. यह गंभीर अध्ययन, साधना एवं नियमित लेखने से प्राप्त हो सकती है. पढ़ते वक्त काव्यात्मक आनंद होता है. सरल एवं सहज भा-ाा में लिखे गये सभी लेख साहित्य की विरासत में संजोये जाने लायक है. नवीन चिंतन एवं जानकारियां पुस्तक को बार बार पढने की इच्छा जगाते हैं. ज्ञान एवं संवेदना लेखक की भा-ाा की विशे-ाता रही है.

समीक्षक का पताः ग्राम-डूमर, पो. जगन्नाथधाम,

जिला- हजारीबाग-825317 (झारखंड)

पुस्तकः सच पर मर मिटने की जिद

लेखकः डॉ भारत यायावर

प्रकाशकः अनन्य प्रकाशन, ई-17,पंचशील गार्डन,

नवीन शहादरा, दिल्ली-1100032

मूल्यः 450 रुपया

यहां वहां की

जिंदगी ख्वाब नहीं चुटकुला

दिनेश बैस

वम्बर माह के गुणगान करने बैठ जायें तो पूरा महीना केक काटते-काटते खर्च हो जायेगा. महा-महा लोगों ने अवतार लेने के लिये नवम्बर का महीना ही चुना है. ट्रेनों की तरह जन्म लेने के लिये किसी प्रकार के आरक्षण की व्यवस्था होती तो न मालूम कितने लोग वेट लिस्ट में लगे दिखायी देते और नवम्बर निकल लिया होता. शुक्र है कि ऐसा कोई प्रावधान अभी तक नहीं हुआ है. लोग कभी भी, कैसे भी, कितनी भी संख्या में पैदा हो सकते हैं. इस छूट का लाभ उठाकर पहले लोग धड़ाधड़ पैदा होते रहे.बहुत सारे क्लियरेंस सेल शैली में भी आ गये. एक के साथ एक फ्री- जुड़वां पैदा हो गये- कुछ होते हैं जो अकेले नहीं रह पाते हैं. चीथने के लिये कोई न कोई उन्हें चाहिये. ऐसे लोगों ने सोचा होगा, कहां यार अलग-अलग पैदा हों. बोर हो जायेंगे.चलो, एकसाथ पैदा हो लेते हैं. अब समय बहुत खराब आ गया है.कुछ लोग हैं जो खुद पैदा करने में अक्षम हैं. सक्षम हैं तो उन्हें अपना नाम देने से पलायन कर जाते हैं. ऐसे साधू-साध्वी समझा-समझाकर परेशान हैं कि मन लगा कर पैदा करो.पालने वाला तो भगवान है. ऐसे लोग किन्हीं व्यापारी बाबा से सिफारिश करने की बात भी करते हैं कि बाबा बाबू, एक बार में चौका मारने वाली दवाई बनायें. अपने वालों को ही दें. लोग टका सा जवाब दे देते हैं कि वह पालेगा तो वही पैदा कर लेया, उनकी ओर से आप पैदाकर लें. या जो बाबा दवाई बना रहा है, वह अपनी दवाई खुद खा ले और चार नहीं, चौरासी पैदा कर ले.हमारे तो दो हो गये, बहुत हो गये. यों एक से भी काम चल जायेगा. वह भी नहीं होगा तो अनाथ आश्रम से ले आयेंगे.धर्मभ्रष्ट कर रखा है दो हो गये, बहुत हो गये वालों ने. प्रभु की लीला में व्यवधान उत्पन्न कर रहे हैं.

बहरहाल, महापुरुषों के जन्म लेने के सम्बंध में नवंम्बर काम ही ना काफी उदार माना जा सकता है. संतनामदेव, कवि कालिदास से लेकर महारानी लक्ष्मीबाई, पं.जवाहर लाल नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और न जाने कितनों ने जन्म लेने के लिये नवम्बर का महीना चुना. नवम्बर पुराण लिखते-लिखते ब्रेकिंग न्यूज आई कि हमारे प्रधान सम्पादक भारत यायावर हो गये हैं.यह जनाब भी महान बनने की ठान कर ही निकले लगते हैं. इसलिये महीना समाप्त होते-होते यह भी उन्तीस नवम्बर को दुनिया में कूद पड़े. जैसे कोई छूटती हुई ट्रेन दौड़कर पकड़ रहा हो. जिस पोथे की शपथ ग्रहण कर, हमें मूर्ख बनाने का अधिकार राजनीति बाज झपट लेते हैं, संविधान नाम का वह महाग्रंथ भी नवम्बर के महीने में ही जन्मा.

इतने सारे अवतारों के बीच मेरे जैसे लोगों के लिये चौदह नवम्बर का कभी बड़ा महत्व रहा है. पं. नेहरू का जन्मदिन है यह. पं. नेहरू से इतने प्रभावित रहे हैं कि उनके जन्म-दिन की प्रतीक्षा में पूरा सालगुजार देते थे. बाल-दिवस के रूप में मनाया जाता है यह दिन. स्कूल में इस दिन कुछ प्रवचन वगैरह पिला कर, हमें उनके बताये मार्ग पर चलना चाहिये जैसे निर्देश दे कर, स्कूल से मुक्ति मिल जाती थी. साथ में दो केले भी थमा दिये जाते थे. अपने लिये इतनी ही बड़ी बात थी कि स्कूल से छुट्टी मिली. केले तो पिता जी के सौजन्य से भीमिल ही जाते. दो नहीं, एक सही. साथ में एक थप्पड़ मुफ्त ससुर पीछे पड़ कर रह गया है. मानता ही नहीं है.

पं. नेहरू न होते तो एक दिन और स्कूल भोगना पड़ता.बचपन निकल गया. बाल-दिवस छूट गया. लेकिन चौदह नवम्बर अब भी जिंदगी से चिपका हुआ है. कारण बदल गये हैं. विद्वानों ने बच्चों को बाल-दिवस की सौगात दी है चौदह नवंबर के रूप में तो जवानी के मुंह मोड़ते-मोड़ते, बुढ़ापे के खटारे में सवार होने वाले लोगों को, चौदह नवम्बर अंतर्राष्ट्रीय मधुमेह दिवस के रूप में ढोलकी तरह गले में लटका दिया है- लो, बजाते रहो जब तक सांस है. जिदगी की पिपहरी बंद होने के साथ ही मधुमेह के ढोलकी धमाधम भी बंद होगी.

बहुत से लोग इसे मजाक मानते हैं. हां, मजाक में कोई कमी न रह जाये इसलिये नवम्बर के महीने में ही अंतर्राष्ट्रीय चुटकुला दिवस भी आ जाता है- खुद न हंस पाओ तो दूसरों को ही हंसाओ. नहीं हंसाओगे तो आप हास्यस्पद हो जाओगे.जिदगी एक ख्वाब नहीं, चुटकुला बन कर रह जायेगी.

लोग आपस में हैरत से पूछेंगे- न जाने क्यों आये थे.

दूसरे चैन की सांस लेते हुये कहेंगे- चलिये, अच्छा है, निकल लिये थे तो क्या उखाड़ रहे थे. चले गये तो कौन सा तूफान आ गया.

तो, नवम्बर का महीना डायबिटीज को भी समर्पित है.धूमधाम से सेलिब्रेट करें. हमारे देश में कोई भी धूमधाम मिठाई के बिना सम्पन्न नहीं होती है. हमारे तो देवता भी नमक खाना पसंद करते ही नहीं हैं. न जाने ब्लड प्रेशर के हाई जम्प करने का कितना डर रहता है. मिठाई है कि आने दो. आने दो. यहां हाल यह है कि नवम्बर माह में अंतराष्ट्रीय मधुमेह दिवस भी सैलिब्रेट करना है तो नीम और करेले खा कर. शक्कर की बढ़त मापने के लिये देह में सुई टुच्चवाकर. क्या मजाक है, खून में शुगर ही शुगर है मगर जुबान पर चीनी रखने पर भी पहरे हैं.

वहां पत्नी जी इस खुशी में लोगों के बीच लड्डू बांट रही हैं कि जांच में पति जी की शुगर काबू में पाई गई है. लगता है कि पत्नी नाम के प्राणी का निर्माण ही पतिनाम के पालतू पशु को काबू में रखने के लिये किया गया है.

इसलिये, षड्यंत्र ही प्रतीत होता है कि कुम्भकर्ण की परम्परा के वाहक जो देवता दीवाली के पटाखों के धमाकों तथा बारूद के धुंये के दम घोंटू प्रदूषण से भी नींद का पीछा नहीं छोड़ पाते हैं, नवम्बर में अचानक जाग जाते हैं- देव उठान हो जाता है. देवता जाग जाते हैं तो लोग शादियां करने पर टूट पड़ते हैं.शादियां बोले तो, आदमियों को पकड़-पकड़कर पत्नियों के हवाले करने का अभियान शुरू हो जाता है. ताकि आदमी काबू में रहे. अब तो आत्महत्या का ट्रेण्ड चल रहा है. आदमी एन्काउंटर में काम आने के बजाये आत्मसमर्पण में सम्भावनायें तलाशने लगा है- खुद ही शादी कर लेता है. अन्यथा अपने समय में तो फिट फॉर्मूला रहा है कि बचुआ बहुत पंख फड़फड़ा रहा है. किसी के खूंटे से बांध दो. अकल ठिकाने आ जायेगी.अक्ल ठिकाने लाने के इतने सफल उपाय के अस्तित्व में रहने के बावजूद पागल खाने बनाना पागलपन के अलावा और क्या माना जा सकता है. अभी तक किसी ऐसी तकनीकी का विकास नहीं हुआ है जो पत्नी जी के सामने टिक सके. पत्नी जी वह निगरानी करने तथा ठिकाने लगाने वाला तंत्र होती हैं कि आज तक जहां पति महोदय पत्नीजी कि कस्टडी में हों, वहां किसी का यह सूचनापट लगाने का साहस नहीं होता है कि आप क्लोजसर्किट टी वीकैमरा की निगरानी में हैं.

आदमी इतने-इतने इम्मोशनल अत्याचारों से कहीं बगावत न कर दे, चलन दे यह कहते हुये कि हम तो जाते अपने गांव सबको राम-राम-राम. इसलिये उसे बगावत प्रूफ बनाने के लिये सोलह नवंम्बर को ‘अंतर्राष्ट्रीय सहनशीलता दिवस’ आ धमकता है हाथ में आंसू पोंछने के लिये पसीना भरा रूमाल लिये.

सम्पर्कः 3-गुरुद्वारा, नगरा, झांसी-284003

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