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*डॉ. रामकुमार बेहार बस्तर के साथ करते हैं सार्थक संवाद*

       डॉ. रामकुमार बेहार की समीक्षित पुस्तक "बस्तर : प्रकृति व संस्कृति" पर अपना समीक्षात्मक आलेख प्रस्तुत करते  हुए डॉ.श्रीमती मृणालिका ओझा ने कहा कि आज का आधुनिक समाज आदिवासियों को असभ्य की दृष्टि से समझने की कोशिश करता है, किन्तु सच यह है कि उनके अनेक रीति-रिवाज हमें बहुत कुछ सीखने को प्रेरित करते हैं ।हमें भी शहीद जवानों की स्मृतियों को "मेनहिर" की तरह  सहेजने का संदेश देते हैं। पुस्तक में प्रकाशित 15 लेख एवं 6 कविताओं में वे बस्तर के साथ संवाद करते हुए प्रतीत होते हैं एवं यह बस्तर को जाने बिना संभव नहीं है।"

        संस्कृति विभाग के सभागार में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम में छत्तीसगढ शोध संस्थान के अध्यक्ष एवं प्रख्यात साहित्यकार - इतिहासकार डॉ. रामकुमार बेहार के खंड काव्य "दसमत कैना" का विमोचन उपस्थित अतिथि सर्वश्री पद्मश्री डॉ. अरूण शर्मा, श्री बी. के. एस.रे, सेवानिवृत्त आई ए एस, श्री शशांक शर्मा, संचालक, ग्रंथ अकादमी, श्री राजाराम त्रिपाठी, किसान नेता एवं संपादक- ककसाड, श्री बालचंद्र कछवाहा, सेवानिवृत्त प्रोफेसर के द्वारा किया गया।

     इस कृति की कथा पर श्री के. पी. सक्सेना 'दूसरे' ने अपने विचार व्यक्त किये। श्री अनिल झा ने "बस्तर: प्रकृति व संस्कृति" पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि डॉ. रामकुमार बेहार के पास बस्तर पर कहने के लिए बहुत कुछ है, यह पुस्तक एक अंश मात्र है। डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि पुस्तक का हर आलेख वास्तव में स्वयं में एक अलग पुस्तक की मांग करता है और "बस्तर" को इस पुस्तक के माध्यम से समझने पर भी उन्होंने जोर दिया।

   कार्यक्रम के अतिथि श्री बी के एस रे, ने कहा कि बस्तर पर बहुत कुछ लिखा जा रहा है, लेकिन बस्तर में रहकर और बस्तर को जान-समझ कर जो लिखा जाए वह ही वास्तव में प्रामाणिक है। डॉ. रामकुमार बेहार का लेखन इस श्रेणी का ही लेखन है। श्री राजाराम त्रिपाठी ने कहा कि श्री बेहार का अथक श्रम,  स्तुति योग्य एवं प्रेरणादायक भी है।

       कृतिकारडॉ. रामकुमार बेहार ने कहा कि उनका उद्देश्य बस्तर की प्रकृति, परंपरा, संस्कृति आदि को वहीं की खुशबू और सुन्दरताके साथ प्रस्तुत करना रहा है। 'दसमत कैना' खण्ड काव्य की लगभग विलुप्त होती विधा को पूर्नजिवीत करने का एक प्रयास है।

    कार्यक्रम के प्रारंभ में सरस्वती पूजन के अतिरिक्त छत्तीसगढ शोध संस्थान की सचिव श्रीमती निर्मला बेहार द्वारा संस्थान की गतिविधियों से अवगत कराया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों एवं समीक्षकों का अभिनंदन पत्र एवं शाल देकर सम्मान भी किया गया। कार्यक्रम का संचालन श्री नर्मदा प्रसाद नरम द्वारा किया गया।

    शहर के बुद्धिजीवियों एवं साहित्यकारों की उपस्थिति में कार्यक्रम संपन्न हुआ।

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दो-तीन वर्ष पहले श्री प्रकाश चंद्र पारख,पूर्व कोयला सचिव, भारत सरकार की पहली पुस्तक “क्रूसेडर या कान्स्पिरेटर? (कोलगेट तथा अन्य सत्य)” ने पूरे देश में एक हलचल-सी मचा दी थी,देश-विदेश के पाठक हतप्रभ थे कि अपनी जान-जोखिम में डालकर ऐसा दुस्साहसिक कदम भी कोई सेवानिवृत्त उच्च पदस्थ बिरला अधिकारी ही उठा सकता है! उस पुस्तक ने सरकारी-तंत्रों एवं अन्य जांच-एजेंसियों को आत्मावलोकन करने के लिए प्रेरित किया।फिर उन्हीं मुद्दों से संबन्धित लगभग तीन साल बाद अचानक उन्हें अपनी दूसरी पुस्तक “कोल-कोनन्ड्रम:द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड जुडिशियल एरोगेन्स”लिखने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जबकि कोलगेट संबंधित सारे तथ्यों का खुलासा यथार्थता से उन्होंने अपनी पहली पुस्तक में प्रकाशित कर दिया था। फिर ऐसा क्या बाकी रह गया था,जिसे वे जनता के सामने लाना चाहते थे? यह बात सत्य है कि जीवन की कोई घनीभूत पीड़ा जब इंसान के मस्तिष्क में छाई रहती है तो उनका सृजन नई अनूभूति के रूप में प्रस्तावित होता है।पारख साहब के मन में दर्द और पीड़ा है। यह पीड़ा उनकी दोनों पुस्तकों में दृष्टिगोचर होती है। छायावादी कवि पीड़ा को साहित्यिक सृजन का अनिवार्य अंग मानते हैं,मगर दुखवाद के रूप में। प्रसिद्ध छायावादी कवि जयशंकर प्रसाद के काव्य आँसू की कुछ पंक्तियाँ इस सत्य को उजागर करती है:-

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई

दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

जबकि पारख साहब का व्यक्तित्त्व छायावादी साहित्यकारों से पूरी तरह भिन्न हैं,दुर्दिन में उनकी पीड़ा एक अव्यक्त ऊर्जा बन जाती है।जो उन्हें और ज्यादा संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती है।आँसू की पंक्तियों में आँसू की जगह अदृश्य ऊर्जा रूपांतरित हो जाती है।

जो घनीभूत पीड़ा थी मस्तक में स्मृति सी छाई

दुर्दिन में ऊर्जा बनकर वह आज गरजने आई।

साहित्यकारों के लिए यह एक प्रश्न उठता है कि पारख साहब की पुस्तकों को साहित्यिक-विधा की किस श्रेणी में लिया जाए,निबंध,आत्मकथा,संस्मरण,रेखाचित्र या और कोई दूसरी विधा।आधुनिक प्रबंधन साहित्य के अनुसार ये पुस्तकें पूर्व राष्ट्रपति महामहिम डॉ॰ एपीजे अब्दुल कलाम की पुस्तक ‘विजन-2020’, ‘शक्तिशाली भारत’,‘अग्नि की उड़ान’,पूर्व विदेशमंत्री कुँवर नटवर सिंह की पुस्तक ‘वन लाइफ इज नॉट इनफ’, लेखक और पत्रकार श्री संजय बारू की पुस्तक ‘द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर’, सीएजी श्री विनोद राय की पुस्तक ‘नॉट ओनली अकाउंटेंट’ आदि की श्रेणी में लिया जा सकता है, जो हमारे देश की राजनीतिक,आर्थिक,सामाजिक पहलुओं को स्पर्श करते हुए समसामयिक समस्याओं को उजागर करती है। दूसरे शब्दों में, ये सारी पुस्तकें ‘लंर्ड लेसन’(सीखे सबक) साहित्य की केटेगरी में आती है।

पारख साहब की इस पुस्तक की भाषा-शैली कानूनी संदर्भों से ओत-प्रोत होने के बावजूद अत्यंत सहज,सरल, वैचारिक दृष्टिकोण से उतनी ही पैनी और प्रखर हैं।अपनी विलक्षण विश्लेषण क्षमता और प्रकांड बुद्धिमता के आधार पर उन्होंने हमारे देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका को अपने कर्तव्यनिष्ठा के प्रति सजग रहने के साथ-साथ नागरिकों के मौलिक अधिकारों व हितों की रक्षा हेतु उन्हें नई दिशा दिखाने के लिए अपनी ओजस्वी कलम चलाई है।

कितनी विडम्बना है कि आज भी हम अपनी अभिव्यक्ति में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है!हमारे देश में अगर कोई लेखक अपने दम पर अपनी आप-बीती को पाठकों के समक्ष पूरे तथ्य एवं सत्य के साथ उजागर करना चाहता है तो कोई भी प्रतिष्ठित प्रकाशक सामने नहीं आते हैं।वे सरकारी संस्थाओं से खतरा मोल लेना नहीं चाहते है, कहीं ऐसा न हो जाए की सरकारी-तंत्र बेवजह उन पर हावी हो जाए और इस कारण उनके व्यापार को ठेस पहुंचे। क्या किसी बड़े लेखक की यथार्थ अभिव्यक्ति को स्वरुप प्रदान करने में हमारे देश के नागरिक आज भी इतने डरे हुए हैं कि इस विषय पर सरकारी दबाव और न्यायपालिका के अज्ञात डर से चर्चा करने तक से कतराते हैं।विवशतावश लेखक ने अपने खर्चे पर इस पुस्तक को प्रकाशित किया ताकि देश की पीढ़ी को न केवल जीवन जीने के सबक मिले,वरन देश के नीति-निर्धारकों को अपने भीतर जागने की जिज्ञासा पैदा हो।पारख साहब ने यह पुस्तक हमारे देश के युवा प्रशासनिक अधिकारियों को समर्पित की है और उनसे उम्मीद जताई है कि वे आजीवन अपने कर्तव्यों का निर्वहन निर्भयता,निष्पक्षता और ईमानदारी से करें।

इस पुस्तक का प्राक्कथन हमारे देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार एवं पूर्व विनिवेश मंत्री अरुण शौरी ने लिखा है:-

“ .... जब किसी ईमानदार प्रशासनिक अधिकारी को गलत तरीके से आरोपित किया जाता है तो उन्हें जनता के समक्ष विस्तार पूर्वक अपने सारे तथ्यों को उजागर करने में किसी भी प्रकार की कोताही नहीं बरतनी चाहिए। बड़े दुख की बात है कि सीबीआई द्वारा 10 महीनों की लगातार जांच के बावजूद जब उनके विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं होता है तब भी कोर्ट सीबीआई को पुनः जांच करने के आदेश पारित करती है.। यही नहीं बल्कि जब पुनः जांच के बाद भी सीबीआई को कोई गलती नजर नहीं आती,फिर भी कोर्ट सीबीआई की रिपोर्ट को खारिज करते हुए दोषारोपण कर देता है। उस अवस्था में उम्र की ढलान पर आरूढ़ एक ईमानदार अधिकारी को अपने सीमित संसाधनों के साथ अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है,यह हमारी सोच के परे हैं।... ”

पारख साहब ने इस पुस्तक के अपने आमुख में जस्टिस रूमा पाल के उद्बोधन का उदाहरण देते हुए ‘भारतीय न्यायपालिका के सात दोषों’ में “न्यायिक अहंकार” को प्रमुख दोष माना है,जिसमें न्यायाधीश बहुधा न्यायिक स्वतंत्रता को न्यायिक व प्रशासनिक अनुशासनहीनता के रूप में लेता है। इसी तरह ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड’ कहावत भारतीय न्यायपालिका के संदर्भ में पूरी तरह से चरितार्थ होती है।कानूनी व्यवस्था के अनुरुप नागरिकी मुकदमों के निपटान में ज्यादा से ज्यादा 3 महीने और अपराधिक मुकदमों के निपटान में ज्यादा से ज्यादा 6 महीने से अधिक समय नहीं लगना चाहिए।जबकि यथार्थ कुछ और ही है उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु की भूतपूर्व मुख्यमंत्री मिस जयललिता को भ्रष्टाचार की आरोपी घोषित करने में हमारी न्यायपालिका को 20 साल से ज्यादा का समय लगा और अंतिम फैसला उनकी मृत्यु के बाद आया। क्या यह देश की न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न नहीं है? लेखक खुद इस बात से आशंकित है कि हिंडालको केस का अंतिम निर्णय उनके जीवन काल में आ भी पाएगा या नहीं। यह कैसी विडम्बना है कि आजीवन एक ईमानदार अधिकारी को भ्रष्टाचार के आरोपी के रूप में जीना पड़े ?

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इस पुस्तक में पारख साहब ने जिन तीन विषयों पर ध्यान आकृष्ट किया है,वे हैं:-

1. भारत की कोयला नीति

2. कोयले के ब्लॉक आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट के न्याय की विसंगति

3. सीबीआई और सीबीआई कोर्ट का अहम या अनभिज्ञता

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इसके अतिरिक्त, लेखक ने पाठकों की सुविधा के लिए इस पुस्तक के परिशिष्ट में कोल माइंस नेशनलाइजेशन अमेंडमेंट बिल 2000, स्क्रीनिंग कमेटी के नियोजन,श्री मुकुल रोहतगी-अटॉर्नी जनरल ऑफ इंडिया के नाम लेखक का पत्र,समाचार पत्रों जैसे ‘दक्कन क्रॉनिकल’, ‘द इकोनॉमिक्स टाइम्स’ आदि में कोलगेट घोटाले की जांच एवं आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित छपे हुए अनेक संपादकीय भी शामिल किए है।

जीवन-पर्यंत ईमानदार छबि वाले कर्मठ प्रशासनिक अधिकारी ने अपने अर्जित अनुभवों एवं कोल माइंस संबन्धित कानून के गहन अध्ययन के आधार पर तथ्यों,तर्कों तथा विश्लेषणात्मक संदेशों द्वारा इस पुस्तक में अपना पक्ष रखा है।अपनी छबि को जांच एजेंसी द्वारा अज्ञानतावश या जानबूझकर धूमिल किए जाने से मर्माहत पारख साहब की मनोव्यथा,वेदना,तीव्र विद्रोह व आक्रोश की झलक इसमें स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ती है; उदाहरण के लिए पेज नंबर 101 पर हैदराबाद स्थित अपने निवास स्थान में औचक सीबीआई रेड होने पर अपने पत्नी की मानसिक स्थिति का मार्मिक बयान किया है:-

“ .... She was stunned and was visibly angry at this reward for the 36 years of dedicated and blemish less service in the government॰She of course regained her composure within a few minutes, after which the search operations started. We live in 1600 square feet two and half bedroom flat. It took CBI team little over 3 hours to look into every nook and corner of the house॰ ”

जब एक ईमानदार छबि वाले अधिकारी पर जांच एजेंसी द्वारा आधे-अधूरे तथ्यों के आधार पर आपराधिक भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जाते हैं तो उसके मन में भयंकर पीड़ा का तूफ़ान पैदा होना स्वाभाविक है।पारख साहब ने अपनी इस पीड़ा का उल्लेख इस पुस्तक के पृष्ठ संख्या 160 पर बेबाकी से किया है:-

... when an honest citizen is robbed of his honour and dignity, by being wrongfully charged with criminal offences, it is worse than death for him॰”

उपरोक्त पंक्तियों में पारख साहब के संवेदनशील मन में गीता के निम्न श्लोक की अनुगूँज साफ सुनाई देती हैं,

अकीर्ति चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेअव्य्याम।

संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादातिरिच्यते ॥2.34॥

किसी भी सेलिब्रिटी के लिए अकीर्ति मृत्यु से भी बदतर है। अकीर्ति होने से अवसादपूर्ण मानसिक अवस्था उन अधिकारियों की हो जाती है। यहां तक कि कुछ अधिकारी या तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं या फिर आत्महत्या तक कर लेते हैं।कुछ ही वर्ष पूर्व ओड़िशा के संबलपुर जिले के दिल्ली में प्रतिनियुक्त वरिष्ठ आईएएस अधिकारी ने अपने परिवार के सभी सदस्यों को गोली मारकर स्वयं आत्महत्या कर ली। इस मानसिक तनाव का आखिर का जिम्मेदार कौन हो सकता है? क्या वह खुद जिम्मेदार है अथवा कार्यस्थल की परिस्थितियां उसे इस आत्मघाती कदम के लिए विवश करती है?

एक IAS अधिकारी को निजी कंपनियों में कार्यरत आईआईएम या आईआईटी के स्नातकों से बहुत कम वेतन मिलता है। इसके बावजूद भी केवल सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण वे इस सेवा का चयन करते हैं। मगर जब उनकी प्रतिष्ठा पर आंच लगती है तो वह अधिकारी मानसिक अंतर्द्वंद के थपेड़ों को खाते हुए घोर अवसाद की गहराई में चला जाता है। ऐसी ही मानसिक अवस्था का उल्लेख लेखक ने इस पुस्तक में किया है:-

“ As a Civil Servant, by the time of retirement, one may receive a pay packet equal to what a fresh graduate from IIM or IIT receives on his first posting in the private sectorBut this is a small price to be paid in the service of the nation॰ What is much worse is that despite sincere and honest service, one may be robbed of one’s dignity, honour and self respect and be financially ruined by being forced to run around the CBI, lawyers and courts in the evening of one’s life, all because of ignorance or arrogance of a Police officer or a Judge

इस पुस्तक के प्रथम अध्याय ‘भारत की कोयला नीति’ में कोयला खनन के इतिहास,कोयले की खदानों के राष्ट्रीयकरण के कारणों, भारतीय अर्थव्यवस्था एवं बिजली उत्पादन संबंधित सुधारों,कोयला खनन में निजी निवेश,कैप्टिव माइनिंग, कोल माइंस नेशनलाइजेशन अमेंडमेंट बिल 2000 के प्रावधान और विभिन्न स्टेकहोल्डर के सुझावों का विशद वर्णन लेखक ने किया है,जिसमें कोयला-मंत्रालय,ऊर्जा-मंत्रालय,NTPC, स्टील-मंत्रालय भारी उद्योग विभाग,फेडरेशन ऑफ इंडियन चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज,एसोसिएटेड चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री ऑफ इंडिया,श्रमिकसंघों में भारतीय मजदूर संघ,एटक,इंटक,सीटू और अधिकारी संघों में सीएमओएआई, कोल इंडिया ऑफिसर्स एसोसिएशन सभी शामिल हैं।लेखक अपने सटीक तर्कों से स्पष्ट करते हैं कि कैप्टिव माइनिंग एक गलत नीति है।दुनिया में कहीं भी कोयले की कैप्टिव माइनिंग नहीं होती है।जहां हम कोल इंडिया को अंतरराष्ट्रीय स्तर की कंपनी होने का दावा करते हैं,वहाँ लेखक इस कंपनी के मंत्रालय की सबसे ऊंची पादान यानी सचिव की भूमिका में रहकर अर्जित अपने अनुभवों के आधार पर इसे खारिज करते हुए स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं:-

“... like most monopolies CIL is an extremely inefficient company॰”

आगे तकनीकी तौर पर उनके कारणों की भी वे व्याख्या करते हैं:-

“.....for political reasons and pressure from coal/sand mafia, it was operating a number of underground mines where the cost of mining was so high that even if all workers employed in the mine were paid wages simply sitting at home without having to work, the losses would be much lower than the operating these mines॰”

लेखक ने उल्लेख किया है कि हालांकि पार्लियामेंटरी स्टैंडिंग कमेटी के अधिकांश सदस्य कोयला वाणिज्य खनन को निजी क्षेत्र के लिए खोलना चाहते थे,मगर वामपंथी पार्टियों ने इस प्रस्ताव पर अपनी असहमति प्रकट की तथा कोल इंडिया के पांच प्रमुख श्रमिक संघों ने इसके विरोध में हड़ताल पर जाने की सामूहिक घोषणा की।

इनका विचार था कि कामर्शियल माइनिंग को निजी क्षेत्र के लिए खोलने से विदेशी कंपनियाँ आधुनिक संयंत्र और टेक्नोलोजी लाएगी और कोल इंडिया उनकी प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पाएगा। क्या श्रमिक संघ यह चाहते थे कि हमारे देश में नवीन तकनीकी का इस्तेमाल न हो और अभी भी हम अविकसित देशों की भांति पिछड़ा हुआ बने रहे? कोल इंडिया को नवीन तकनीकियों के इस्तेमाल करने से कौन रोक रहा था ? इस तरह के ‘माइंड सेट’ की अवस्था में क्या हमारा देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकता है?हमारी विफलता की कीमत हमें बढ़ते हुए कोयले के आयात से चुकानी पड़ी है।लेखक ने विभिन्न ग्राफों के माध्यम से चीन,इंडोनेशिया और हमारे देश के कोयला उत्पादन तथा कोयला आयात और निर्यात का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर हमारी विदेशी मुद्रा में अत्यधिक ह्रास को दर्शाया है।सही समय पर सही निर्णय लेने में हमारी राजनीतिक असक्षमता के कारण सम्पूर्ण व्यवस्था किस तरह से पंगु हो जाती है,इस अध्याय में इंगित होती है।

 दूसरे अध्याय “कोयला ब्लॉकों के आवंटन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला” में लेखक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा नैसर्गिक न्याय को पूरी तरह से नजर अंदाज करने पर गहरी हताशा व्यक्त की है। जब हमारे लोकतन्त्र की बहुत सारी संस्थाएं जनता  की नजरों में इतनी गिर चुकी हैं कि उन पर विश्वास करना मुश्किल हो गया है,तब सुप्रीम कोर्ट ही जनता के मौलिक अधिकारों की रक्षा की एकमात्र आशा की किरण बनकर हमारे सामने उभरा था।मगर सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की सूक्ष्म समीक्षा  द्वारा लेखक ने हमारी न्यायिक प्रणाली की खामियों को उजागर किया है। कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट,माइंस एंड मिनरल डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन एक्ट के  प्रावधानों और  वैधानिक व्याख्या के सिद्धांतों  के उद्धहरण देते हुए स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों पर बिंदुवार अपने तर्कसम्मत वैधानिक तरीके से यह सिद्ध किया है कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा लिए गए सभी  निर्णय तत्कालीन समय के अनुरूप असंगत नहीं थे।भारत सरकार के महालेखापरीक्षक ने भी सन 1993 से 2005 तक किए गए आवंटन में किसी भी प्रकार की अनियमितताएं नहीं पाई है। सन 2006 के बाद होने वाले आवंटनों में अवश्य विपरीत प्रेक्षण उन्हें मिले थे। 

स्क्रीनिंग कमेटी का गठन भारत सरकार के कार्यालय मेमो द्वारा किया गया था,जिसमें कोयला-मंत्रालय,रेलवे मंत्रालय,ऊर्जा-मंत्रालय संबंधित राज्यों की सरकारों के प्रतिनिधि शामिल थे। बाद में कोल इंडिया तथा उनकी अनुषंगी कंपनियों के निदेशक,अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशकों को भी जोड़ दिया गया। ये सभी सदस्य अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ थे। स्क्रीनिंग कमेटी कोई अंतिम निर्णय नहीं लेती थी,बल्कि सिर्फ सरकार को अपनी सिफ़ारिश करती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने सारे आवंटनों को, जिनमें राज्य सरकारों के उपक्रमों को दिए गए ब्लॉक भी शामिल हैं, अपने आदेश के पैरा 155 में कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट और माइंस एंड मिनरल(डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन)एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ मानकर उन्हें अवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया। लेखक ने अपनी सूक्ष्म विश्लेषण शक्ति के आधार पर यह सिद्ध किया कि कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट की धारा 3(3) के तहत राज्य सरकार द्वारा संचालित उपक्रम भी केंद्र सरकार के उपक्रमों की तरह कामर्शियल माइनिंग के हकदार हैं।सुप्रीम कोर्ट ने यहां ‘सरकारी कंपनी’ का अर्थ केंद्र सरकार की कंपनी समझ लिया,जबकि कंपनी एक्ट की धारा 617 में ‘सरकारी कंपनी’ का अर्थ राज्य सरकार अथवा केंद्र सरकार की कंपनियों से अभिप्रेत होता है। अतः राज्य सरकार के उपक्रमों को आवंटित कोयले के ब्लॉकों को निरस्त करने का कोई कारण अथवा आधार नहीं बनता है।

ठीक इसी तरह कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट की धारा 3(3)(ए)(iii) में ‘कंपनी के इंगेज’ होने की परिभाषा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गलत मान लिए जाने पर पारख साहब ने दुख व्यक्त किया है।अगर कोर्ट के आदेश के पैरा 151 को सही मान लिया जाए तो बिजली उत्पादन कंपनियों को पहले अपने विद्युत संयंत्रों की स्थापना करनी चाहिए और फिर कोयले की खदानों के लिए आवेदन करना चाहिए।इस अवस्था में क्या उनके पावर प्लांट छह से आठ साल तक कोयले के अभाव में बंद पड़े रहेंगे?

इसके आगे उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों को (जिन्हें कोर्ट द्वारा आर्बिट्रेरी मान लिया गया था) न्याय संगत माना है। कोर्ट की नजरों में स्क्रीनिंग कमेटी ने अलग-अलग बैठकों में अपनी मार्गदर्शिका बदली है। इस संदर्भ में लेखक ने अपना तर्क दिया है कि कार्यान्वयन में अवरोध पैदा होने की स्थिति में उन्हें बदलना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसी तरह आवेदकों द्वारा प्राप्त सूचनाओं के आधार पर स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय, एक ही ब्लॉक के सब आवेदकों की तुलनात्मक गुणवत्ता,विवादास्पद अवस्था में स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा राज्य सरकार की सिफारिशों को मानना,कमेटी द्वारा बिना विज्ञापन के आवेदकों को आमंत्रित करना,कोयले की कम आवश्यकता वाली पार्टियों को बड़े ब्लॉक आवंटित करना-सभी मुद्दों पर लेखक ने अत्यंत ही सहज ढंग से तार्किक विश्लेषणात्मक पहलुओं पर खुले विचार प्रकट करते हुए उन्हें समय की मांग के अनुरूप सुसंगत,सत्य एवं उपयुक्त बताया है।

पारख साहब के अनुसार निष्कासित कोयले पर पैनल्टी रु 295/-टन लगाना पूरी तरह से असंगत है।यह आंकड़ा कोर्ट ने सीएजी की रिपोर्ट के आधार पर लिया है,मगर कोर्ट इस आंकड़े के पीछे छुपे तथ्य को ठीक से नहीं समझ पाया। अलग-अलग खदानों में अलग-अलग गुणवत्ता का कोयला पैदा होता है।अलग-अलग गुणवत्ता के कोयले का विक्रय मूल्य भी अलग-अलग होता है।पारख साहब ने यहां एक और भी प्रश्न उठाया है। कोल इंडिया की तुलना में निजी कंपनियों को खराब गुणवत्ता वाले ब्लॉक दिए गए थे। यदि इसके बावजूद भी निजी कंपनियाँ अधिक लाभ कमा रही थी तो उसके पीछे उनके उच्च कोटि की दक्षता थी,क्या इस दक्षता पर सरकार या कोर्ट को कर लगाना चाहिए?

स्क्रीनिंग कमेटी में भाग लेने वाले सभी अधिकारियों और मंत्रियों को आपराधिक कदाचार के लिए दोषी पाना क्या उचित है?अगर यह मान भी लिया जाए कि सभी अधिकारियों और मंत्रियों ने गलत निर्णय लिए,पर जिन कंपनियों ने उस समय कि व्यवस्था के अनुसार आवेदन किए और कोयले की खदाने खोलने और अपने पॉवर अथवा स्टील प्लांट लगाने में हजारों करोड़ रुपए लगाए,उनकी तो कोई गलती नहीं थी। फिर उनको क्यों दंड दिया गया। करेगा कोई और भरेगा कोई और? क्या कोर्ट के इस प्रकार के निर्णय को जस्टिस रूमा पाल के कथन ‘न्यायिक अहंकार’ और ‘हमारे कानूनों की गैरकानूनी विज्ञान’ के अंतर्गत नहीं आते ?

तीसरा अध्याय ‘सीबीआई और सीबीआई कोर्ट’ इस पुस्तक का सबसे बड़ा अध्याय है। सीबीआई ने 2004-05 में हुए आवंटन की जांच के दौरान पारख साहब को कई बार समन किया।कई ब्लॉकों के आवंटन के बारे में पूछताछ हुई। उनमें एक मसला था तलाबीरा-II कोल ब्लॉक के आवंटन में हिंडालको के नाम का शामिल करना। CBI ने उन पर आरोप लगाया कि उन्होंने स्क्रीनिंग कमेटी के निर्णय को पलट दिया।पारख साहब ने सीबीआई को स्पष्ट किया कि इस आवंटन का प्रथम आवेदक हिंडालको ही था और कोल माइंस नेशनलाइजेशन एक्ट तथा माइंस मिनरल(रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट के प्रावधानों के तहत स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों में आंशिक संशोधन करते हुए अन्य लोक सरकारी उपक्रमों के साथ संयुक्त उद्यम हेतु हिंडालको का नाम उसमें जोड़ना उचित एवं न्याय संगत था। माइंस मिनरल(रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट के अनुसार तो वह सबसे बड़ा दावेदार था। सैकड़ों अन्य कंपनियों की तरह हिंडाल्को को भी उतना ही लाभ मिला। न कुछ ज्यादा,न कुछ कम। मगर ये सारी बातें सीबीआई के सिर से ऊपर चली गई और 15 अक्टूबर 2013 की सुबह पारख साहब के घर पर सीबीआई की टीम ने छापा मारा। जब हिंडाल्को को तलाबीरा-II कोल ब्लॉक आवंटन होने के सिलसिले में सीबीआई ने उन पर और श्री कुमार मंगलम बिरला पर आपराधिक षड्यंत्र के आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज की,तब उन्होंने अंतिम निर्णय लेने वाले प्रधानमंत्री का नाम इस निर्णय शृंखला में शामिल नहीं होने के कारण ‘षड्यंत्र-थ्योरी’ पर एक करारा प्रश्न चिन्ह लगा दिया।पारख साहब का नाम आते ही IAS, IPS,IFoS अधिकारियों के संघों ने सीबीआई की कारवाई की खुलेआम भर्त्सना की। अपनी पहली पुस्तक में पारख साहब ने सीबीआई से 9 सवाल पूछे। प्रतिक्रिया-स्वरुप श्री रंजीत सिन्हा,सीबीआई डायरेक्टर ने ‘इकोनॉमिक्स टाइम्स’,‘पीटीआई’,’हिंदुस्तान टाइम्स’, ‘इंडिया टुडे’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में उन पर ‘चरमोत्कर्ष अहंकारी’,‘अपने आप जज होने’, ‘सुपरसिलिसियस एटीट्यूड’ जैसे घटिया आरोप लगाए। मगर 10 महीने के भरसक प्रयास, 57 गवाहों के बयान और हजारों पृष्ठों को पलटने के बाद सीबीआई इस निष्कर्ष पर पहुंची।

“No evidence of criminal conspiracy,dishonest intention or criminal misconduct by public servant has emerged against the person named in the FIR or otherwise॰ it is therefore respectfully prayed that instant report may be accepted and matter closed॰”

सीबीआई कोर्ट इस रिपोर्ट के बावजूद भी संतुष्ट नहीं हुई और न केवल पारख साहब aur श्री बिरला वरन पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी के खिलाफ भी अपने आदेश द्वारा संज्ञान लेने का निश्चित किया। सीबीआई कोर्ट के प्राथमिक आदेश के पैरा 50 से 61 पर लेखक ने अपनी टिप्पणी प्रस्तुत की है कि वित्तीय मामलों पर जांच करने वाले पुलिस अधिकारी और यहां तक की न्यायधीश भी किस तरह गलत निष्कर्ष निकालते हैं। सरकारी प्रणाली की उचित समझ नहीं होने से नीति-निर्णयों के तथ्यों की तोड़-मरोड़ इसके मुख्य कारण होते हैं।इस पर लेखक ने कई सवाल उठाए हैं।जैसेकि क्या एक मंत्री का अपने उचित तथा सही निर्णय लेने की संवैधानिक दायित्व नहीं होता? क्या अफसरशाही तथा राजनीतिक स्तर पर रिप्रजेंटेशन कोर्ट की समझ में अपराध की श्रेणी में आता है? क्या किसी नागरिक को निम्न स्तर पर लिए गए निर्णय पर शिकायत होने की अवस्था में समाधान हेतु कोर्ट में ही जाना चाहिए?

इसी तरह सीबीआई कोर्ट के अंतिम आदेश पर लेखक ने अपना स्पष्टीकरण दिया है।उनमें भी कई सवाल उठाए हैं।जैसेकि क्या किसी उद्योगपति का अपनी कंपनी की जायज मांग के लिए अधिकारियों या मंत्रियों से मिलना हमारे देश में अपराध की श्रेणी में आता है? न्यायाधीश ने हिंडालको की नोटिंग पर हस्ताक्षर करने वाले ओड़िशा सरकार के सभी अधिकारियों के नाम षड्यंत्रकारी की तालिका में शामिल क्यों नहीं किए? लेखक ने स्पष्ट किया है कि कैसे न्यायाधीश तीन कंपनियों के संयुक्त उद्यम के उद्देश्य और योजना को समझ नहीं पाए और इस वजह से वह गलत निष्कर्ष पर पहुंचे।उनके हर पैराग्राफ का उत्तर अत्यंत सशक्त भाषा में पारख साहब ने दिया है।

इसके अतिरिक्त इस अध्याय में लेखक ने तलाबीरा–II ब्लॉक का पूरा इतिहास (सन 1993 से अद्यतन) प्रस्तुत किया है कि किस प्रकार से कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए हिंडाल्को को संयुक्त उद्यम में सम्मिलित किया गया।

स्क्रीनिंग कमेटी की भूमिका पर लेखक ने यह कहते हुए ध्यान आकर्षित किया है:-

“ ... The screening committee was not like a bench of High Court or Supreme Court where each member of the bench is an expert on law and if there is a difference of opinion, a final decision is taken best based on majority view॰ ”

सारांश, यह पुस्तक कोलगेट पर सीबीआई एवं सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कानूनी आदेशों में भूल-चूक,गलत निर्णय एवं निष्कर्षों का खुला दस्तावेज होने के साथ-साथ जांच एजेंसियों द्वारा सरकारी प्रणालियों की सही जानकारी नहीं होने के कारण अपनी अज्ञानता अथवा अहंकारवश किस तरह गलत जांच की जाती है,उसका एक प्रतिरूप है। यह पुस्तक न केवल पठनीय, संग्रहणीय बल्कि विचारोत्तेजक भी है,जिसे किसी भी प्रशासनिक अधिकारी,टेक्नोक्रेट,कानूनविद,राजनेता और श्रमिक संघों के नेताओं को अवश्य पढ़नी चाहिए।

पारख साहब की इन पुस्तकों का गहन अध्ययन करने के उपरांत अगर कोई फिल्म निर्माता ‘एक आईएएस अधिकारी की आत्मकथा’,‘धर्मयोद्धा’,‘शिखर पर संघर्ष’,‘अंधा कानून’ जैसी युगांतरकारी फिल्मों का निर्माण करें तो जनसामान्य के अरण्य में विप्लव की मानसिकता के स्फुलिंग पैदा करने में सक्षम साबित होंगी, क्योंकि अंग्रेजी भाषा में लिखी गई इन दोनों पुस्तकों की लक्षित पाठकों की संख्या अत्यंत ही सीमित है।अधिकांश पाठक परोक्ष या अपरोक्ष रूप से या तो कोयला उद्योग से जुड़े हुए हैं या फिर किसी सरकारी उपक्रम के अधिकारी या कर्मचारीगण है या फिर नीति-निर्धारण में भाग लेने वाले व्यक्ति विशेष।पारख साहब के जीवन चरित्र एवं उनकी सत्यनिष्ठा संबंधित सिद्धांतों को जन सामान्य से अवगत कराने के लिए उनकी दोनों पुस्तकों का देश की अलग-अलग भाषाओं में न केवल अनुवाद होना चाहिए,वरन देश की नामी-गिरामी साहित्यिक संस्थाओं जैसे नेशनल बुक ट्रस्ट,केंद्रीय हिंदी साहित्य अकादमी आदि द्वारा इन पुस्तकों का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार होना चाहिए।सही अर्थों में,भ्रष्टाचार के खिलाफ तथा देश के प्रति अपने कर्तव्यनिष्ठा का उल्लेख करने वाली ये पुस्तकें देश की वर्तमान कार्यपालिका,न्यायपालिका,सांसद एवं जनप्रतिनिधियों को कार्य पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन की ओर दिग्दर्शन करने वाली एक अनूठी दास्तान हैं, जिसमें एक सच्चे अधिकारी के हृदय का दर्द उभर कर सामने आता है।

श्री अरुण शौरी के प्राक्कथन- “हर अधिकारी को अपनी प्रतिष्ठा ऐसी बनानी चाहिए और आजीवन उसकी इस तरह रक्षा करनी चाहिए कि यदि कभी भी उसे गलत तरीके से फंसाया जाए तो जनता ऐसे षड्यंत्र पर विश्वास नहीं करें। ऐसे अधिकारी को विस्तारपूर्वक जनता के सामने सारे सही तथ्यों को रखने में किसी भी तरह हिचकिचाना नहीं चाहिए। उन्हें सत्य को ऐसे शब्दों में लिखना चाहिए,जिसे आम जनता आसानी से समझ सके और उनके मन-मस्तिष्क में उसकी प्रतिष्ठा पर लगे दाग को मिटाकर पुनः प्रतिष्ठा पुनर्जीवित हो सके”- से मैं पूरी तरह सहमत हूँ।

इसलिए मेरा यह प्रयास रहता है कि पारख साहब की पुस्तकों का हिंदी पाठकों के लिए सरल,सहज व सुबोध समीक्षा लिखी जाए और कम से कम कोयला उद्योग जगत में उनकी निष्कलंक छबि को स्थापित किया जा सके। ओवरमेन,माइनिंग सरदार, फिटर तथा अन्य कामगार जो अंग्रेजी भाषा की पुस्तकों को नहीं पढ़ते हैं,उन पर चर्चा नहीं कर पाते हैं,ऐसा मध्यमवर्गीय जनमानस अपना सही अभिमत प्रस्तुत कर सकें।जैसे भारत सरकार के ‘बिजनेस रूल्स’ के तहत किसी भी मंत्री अथवा मंत्रालय के सचिव के क्या दायित्व होते हैं?क्या उन्होंने अपना दायित्व का सही ढंग से निर्वहन किया?स्क्रीनिंग कमेटी के क्या कार्य निर्धारित किए गए थे? सीबीआई कोर्ट ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट को क्यों नहीं माना?क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला न्याय की दृष्टि से सही है? तलाबीरा ब्लॉक का पूर्ण इतिहास क्या कहता है?तरह-तरह के सवालों को सही दृष्टिकोण से तभी समझा जा सकता है। तभी जनमानस अपने ‘नीर क्षीर’ विवेक द्वारा देश में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों तथा नीति निर्धारण के पहलुओं पर अपनी आम सहमति बना सकते हैं।

पुस्तक का विवरण:-

शीर्षक:- द कोल कोन्नड्रम: एग्जिक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स

लेखक/प्रकाशक:- प्रकाश चंद्र पारख

पता:- 4A-1,जागृति रेजीडेंसी, ईस्ट मरेडपल्ली, सिकंदराबाद 5000 26

मोबाइल:- 993 900 30 272

आईएसबीएन:- 978 89 9340 14 08

मूल्य:- रुपए 600

ईमेल:-parakh31@ hotmail.com

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प्रस्तुति - दिनेश कुमार माली

कृष्ण दास की कलाकृति

मिस्टर शर्मा का मेहनत रंग लाया और अंततः उसकी नियुक्ति खाद्य संरक्षण विभाग में बतौर निरीक्षक के पद पर हुआ. भली-भाँति विभागीय प्रशिक्षण प्राप्त कर ओहदा संभालते ही अत्मविश्वास, कर्तव्य-निष्ठा और कुछ अच्छा कर गुजरने की ख्वाहिश से लबरेज उसकी आँखें अनायास ही चमक उठी. परंतु पता नहीं यह संसार प्रत्येक की परीक्षा लेने हेतु सदैव इतना आतुर क्यों रहता है?

अपना कार्यभार संभालने के पश्चात अगले ही दिन अचल कर्तव्य-निष्ठा से भरपूर उस नव-नियुक्त अफसर के समक्ष उसे बगैर दो घड़ी चैन की साँस लेने दिए ही उसकी परीक्षा की घड़ी आ चुकी थी. शायद जन सामान्य में किसी नव-युक्ति प्राप्त अफसर से मुनासिब सहायता प्राप्त हो सकने की आशा अब भी शेष थी. यह मामला बड़े पैमाना में दूध में मिलावट होने से संबंधित था.

शिकायत प्राप्ति के अगले ही दिन अपने कार्यालय में पहुँचकर उसने सामनेवाली चाय की दुकान से गर्मागर्म कड़क चाय मंगवाकर पिया. फिर अपने विभागीय दल-बल को इकट्ठा किया और शिकायत-निस्तारण हेतु दूध में मिलावट करने वाले छोटे-बड़े, फुटकर-थोक मिलावटखोर दूध विक्रेता की खोज में पूरे मनोयोग से निकल पड़ा. उस दिन खाद्य-संरक्षण विभाग का जगह-जगह छापेमारी पड़ा.

विभाग की तरफ से वह सदल-बल जगह-जगह छापेमारी कर देर शाम तक वापस कार्यालय पहुँचा. यद्यपि छापेमारी में कुछ भी गलत व्यक्ति चिन्हित नहीं हो सका, तथापि बेशक ताबड़तोड़ विभागीय छापेमारी से जन सामान्य में उस नव-नियुक्त अफसर की छवि साफ-सुथड़ी और बेहद ईमानदार एक कड़क अफसर के रूप में होने से संबंधित चर्चा जोर-शोर से चल पड़ी.

अब तो क्षेत्र में मानो वह सिलसिला ही चल पड़ा और उसके नेतृत्व में विभागीय छापेमारी नियमित रूप से चलने लगा. किंतु विभाग को दोषी को पकड़ने में संभवतः कभी सफलता प्राप्त न हुई. अतः कुछ समय पश्चात तो जन सामान्य की विभाग से अपेक्षा भी पुनः लुप्तप्राय हो गया. किंतु मिस्टर शर्मा भी लंबे समय तक अपने पद पर यथास्थिति बने रहे और अपनी कर्तव्य का निर्वहन करते हुए सेवानिवृत्ति के कगार तक पहुँच गए.

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उनकी सेवानिवृत्ति में कुछेक महीना ही शेष रह गई थी. तभी एक दिन उनको विभागीय प्रोन्नति प्राप्ति की सूचना प्राप्त हुई. सुसमाचार से मिस्टर शर्मा बहुत उत्साहित हुये और उस खुशनुमा उपलक्ष्य में अपने कार्यालय ही में टी-पार्टी आयोजित किये. आज चाय पहुंचाने उसका पुराना दुकानदार स्वयं ही आया, जो अब बिलकुल बूढ़ा हो चूका था. चाय पहुँचते ही सब जमकर टी-पार्टी मनाये.

जश्न मनाते हुये मिस्टर शर्मा बारंबार इस तथ्य का जिक्र करते रहे कि उनकी कर्तव्य-निष्ठा से उनका कार्यक्षेत्र मिलावटखोर से सदैव मुक्त रहा. बूढ़ा दुकानदार एक कोना में खड़ा होकर सब कुछ देखता-सुनता रहा. जब पार्टी का समापन हुआ तो वह निरीक्षक मिस्टर शर्मा के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया. मिस्टर शर्मा के पूछने पर उसने दूध में मिलावट करनेवालों की खोज और उसके विरुद्ध उचित कार्यवाही करने हेतु मौखिक गुहार लगाया.

दुकानदार की बात सुनकर मिस्टर शर्मा चौंक गए," तुम्हारा चाय भी तो दूध ही से बनता है न? फिर चाय पीकर तो कभी वैसा महसूस नहीं हुआ कि वह कृत्रिम रसायनयुक्त पानी के मिलावटवाली दूध से बना हो?"

"श्रीमान, आपके विभागीय कार्यवाही से डरकर आपको परोसा जाने वाला चाय में सदैव ज्यादा उबाल लगाता जिससे पीते समय उसमें मौजूद कृत्रिम रसायनयुक्त पानी की गंध और मात्रा का मालूम न चल सके. फिर डर उस बात की थी कि मिलावटखोर दूध विक्रेता की कारगुजारी का दंड मुफ़्त में एक निर्दोष चाय विक्रेता को प्राप्त न हो." दुकानदार बोला.

"किंतु आप उस बात की शिकायत स्वयं किसी से कभी क्यों नहीं की?"

"श्रीमान, आपके कर्तव्य-निष्ठा से बारंबार प्रतीत होता कि दोषी व्यक्ति एक दिन जरूर शिकंजा में आयेगा. फिर प्रत्येक खाद्य सामग्री शिकायत निवारण हेतु आप ही विभागीय टीम का नेतृत्व सदैव करते रहे. आप सदैव चाय के शौक़ीनों में एक रहे. तथापि कभी एक बार सोच लेते कि चाय में भी दूध का इस्तेमाल होता है तो आपको दूध के मिलावटखोर के कार्यसमय का सही अंदाजा हो जाता और दोषियों पर उचित कार्यवाही भी हो पाता."

"अर्थात आपने यह समझ लिया कि मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण और संपूर्ण घर गृहस्थी विभाग के पास गिरवी है? जबकि आप स्वयं ही मिलावटखोर को उस तरह बेजा सहायता पहुँचाते रहे...?" वैसा कहते हुये मिस्टर शर्मा की न केवल भृकुटि तन गई, अपितु उसने बूढ़े दुकानदार पर खाद्य संरक्षण अधिनियम के तहत कठोरतम क़ानूनी कार्यवाही करते हुये उसे पुलिसिया हिरासत में भी ले लिया. अगले दिन उसके मामला को अदालत में विचारार्थ भेज दिया गया.

यह मिस्टर शर्मा द्वारा उसके कार्यकाल में संभवतः प्रथम दर्ज एफ. आई. आर. था, जिसे दर्ज करने पर उसे आत्मिक संतुष्टि और अपना अचल कर्तव्य-निष्ठा निभाने का गंभीर आनंद प्राप्त हो रहा था. उधर कुछ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मिडिया को उस आशय का एक सनसनीखेज खबर मिल चूका था कि "एक मिलावटखोर अंततः कानून के शिकंजा में आया" और वह एक पक्षीय रूप से उसे प्रसारित कर टी.आर.पी. भुनाने में पूरे जी-जान से लग गया. इस तरह उस लाचार बूढ़े दुकानदार के पक्ष को छोड़कर अधिकांश पक्ष अपने-अपने अचल कर्तव्य-निष्ठा के शक्ति परीक्षण और प्रदर्शन में लग गए.(सर्वाधिकार लेखकाधीन)

प्रणाली की कलाकृति

संस्कृति की अवधारणा विराट है। लोक संस्कृति में लोक साहित्य, लोक कलाएँ और लोक परंपराएँ, सब कुछ समाहित हैं। यह केवल लोक मनोरंजन का साधन न होकर लोकशिक्षण, लोक प्रतिरोध और लोक अभिव्यक्ति का माध्यम भी है। परंतु आज यह अपने इस मूल उद्देश्य से भटकी हुई दिखाई देती है। इस भटकाव के लिए काफी हद तक बाजार की संस्कृति और बाजार की ताकतें जिम्मेदार हैं।

बाजार की संस्कृति शोषकों की संस्कृति है। शोषकों के मन में जिस दिन यह विचार आया कि मरे हुए चूहे को भी बेचकर धन कमाया जा सकता, उसी दिन से बाजार की संवेदनाओं का अवसान शुरू हो गया था। आज बाजार की संस्कृति में संवेदनाओं के लिए कोई जगह नहीं है। बाजार की नजरों में आज मनुष्य की स्थिति उस मरे हुए चूहे के सामान है, जिसे बेचकर अकूत धन पैदा किया जा सकता है। बाजार आज दुनिया की सर्व शक्तिमान ताकत है। दुनिया के किसी भी देश में, वहाँ चाहे जैसी भी शासन प्रणाली हो, सबका नियंत्रण आज बाजार के हाथों में आ चुकी है।

यह कैसे हुआ? इसने अपनी जादुई ताकत से सामूहिक सम्मोहन पैदा करके सबसे पहले मनुष्य की चेतना पर कब्जा किया। और इसीलिए बाजार को अब वर्तमान मनुष्य की चेतना के स्तर को जानने के लिए, कि आज का मनुष्य क्या सोचता है, और कहाँ तक सोचता है, सर्वेक्षण कराने की जरूरत नहीं है। क्योंकि बाजार की संस्कृति आज हमें या तो सोचने का अवसर और अवकाश ही नहीं देती है या फिर हम जो भी सोचते हैं उसकी दिशा, विषय और तौर-तरीके बाजार के द्वारा पहले से ही तय किया हुआ होता है। अर्थात हम वही सोचते हैं, वही देखते हैं और वही करते हैं जो बाजार चाहता है। बाजार हमारी हर कमजोरी और हर कमी, को अपने लाभ के लिए हमारे विरुद्ध प्रयोग करता है।

समाज को सामूहिक सम्मोहन में जकड़ने-वाली पहली शक्ति थी सांप्रदायिकता। सांप्रदायिकता हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है। यह न तो हमें आदमी बनने देती है और न ही हमें आदमी की तरह रहने देती है। बाजार की ताकत ने इसे और भी शक्तिशाली और अपने अनुकूल बना लिया है।

सांप्रदायिकता रूपी हमारी इस कमजोरी को और बाजार की बढ़ती हुई शक्ति को प्रेमचंद ने 1934 में ही समझ लिया था; तभी तो हमें सावधान करते हुए उन्होंने अपने निबंध ’सांप्रदायिकता और संस्कृति’ में लिखा है -

’’सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलते शायद लज्जा आती है, इसीलिए वह गधे की भांति जो सिंह की खाल ओढ़कर जंगल के जानवरों पर रौब जमाता फिरता था, संस्कृति का खोल ओढ़कर आती है। अब संसार में केवल एक संस्कृति है और वह है आर्थिक संस्कृति; मगर हम आज भी हिंदू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं।’’ कहना न होगा कि संवेदना-शून्य बाजार, संस्कृति और सांप्रदायिकता का आवरण ओढ़कर और भी क्रूर और हिंसक हो जाता है।

बाजार की सर्वशक्तिमान, निरंकुश और संवेदनहीन ताकत ने साहित्य को भी प्रभावित किया है। लोक साहित्य हो या शिष्ट साहित्य, दोनों ही आज बाजार की ताकत की गिरफ्त में दिखाई देते हैं। इसका असर पठन और चिंतन पर भी हुआ है। आज की पीढ़ी छपी हुई सामग्री, चाहे वह साहित्य की किताबें हो या पत्रिकाएँ, के पठन के दायरे से बाहर हुई हैं। आज की पीढ़ी अपने स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर या कंप्यूटर के स्क्रीन पर, घंटों समय व्यतीत करती है।

जाहिर है, वहाँ वह कुछ न कुछ पढ़ती जरूर होगी। इस संस्कृति को प्रसिद्ध आलोचक अवधेश कुमार सिंह ने पट पाठ (screen text) की संस्कृति कहा है।

साहित्यिक संस्कृति और बाजार नामक निबंध में वे लिखते हैं - ’’नई साहित्यिक संस्कृति को पट पाठ (screen text) ने काफी हद तक प्रभावित किया है। इसमें समस्या यह है कि पाठ साधना के लिए पाठ पर चिंतन-मनन की आवश्यकता होती है जिसके लिए अवकाश (space) जरूरी होता है।’’ पट पाठ (screen text) की गति और वातावरण (विज्ञापन और अन्य दृश्यावलियाँ) पाठक को कभी कोई अवकाश नहीं देता। पट पाठ (screen text) करते हुए पाठक का ध्यान भटकता है और वह एक साथ कई दिशाओं में क्रियाशील हो जाता है। अर्थात पाठक तब एक साथ एक से अधिक कार्य करने की स्थिति में आ जाता है। यह मल्टी टास्किंग (multi-tasking) की अवस्था होती है। ऐसी दशा में चिंतन और मनन की बात ही बेमानी लगती है। अवधेश कुमार सिंह आगे लिखते हैं - ’’पट पाठ (screen text) के पठन की प्रकृति ऐसी है कि इसमें मल्टी टास्किंग (multi-tasking) करनी पड़ती है। .... मल्टी टास्किंग (multi-tasking) चिंतन विरोधी होता है। मल्टी टास्किंग (multi-tasking) पशु गुण है, क्योंकि पशु को खाने के साथ-साथ अन्य पशुओं और शिकारियों का ध्यान रखना होता है। पशु समाज से मनुष्य समाज की उत्क्रांति में मल्टी टास्किंग (multi-tasking) से सिंगल टास्किंग (single-tasking) की ओर बढ़ती प्रवृत्ति ने बड़ा योगदान किया, क्योंकि इसने चिंता से चिंतन, अतियोग से योग, और अति विचार से सुविचार की क्षमता विकसित करके अपनी भूमिका निभाई। मल्टी टास्किंग करती बया अभी भी अपना घोसला वैसे ही बनती है जैसे हजारों साल पहले।’’

समाज की अवधारण ही सामूहिकता की अवधारण है। समाज का निर्माण सामूहिकता की संस्कृति द्वारा होता है। एक ऐसी संस्कृति के द्वारा जो चेतना-पूरित होती है। मनुष्य समाज उत्सवधर्मी समाज है। उत्सव हो अथवा दुख और विपत्ति के क्षण, मनुष्य समाज में हर जगह सामूहिक चेतना के दर्शन होते हैं। इसके विपरीत आज की पट पाठ की संस्कृति ने आज की पीढ़ी को एकांतिकता की गहरी अंध कूप में ढकेला है जहाँ न तो समाज है, न ही जीवन और न ही चेतना। आपके मन में सवाल उठ सकते हैं - तो क्या आज की पट पाठ की संस्कृति और उसकी मल्टी टास्किंग की प्रक्रिया वर्तमान मनुष्य समाज को आदिम युग की ओर ढकेल रही है? मैं कह सकता हूँ कि यदि ऐसा हुआ है तो यह आदिम मानव समाज की स्थिति से भी बदतर स्थिति है।

हमारी संस्कृति आत्मचिंतन की संस्कृति रही है। सर्वमंगल कामना इसकी आत्मा रही है। यह संस्कृति एक ऐसे परिवेश की मांग करती है जहाँ सघन ध्यान संभव हो सके। इसके लिए अवकाश अर्थात space की आवश्यकता होती है। परंतु आज हमारी यह आत्म self संस्कृति सेल्फी selfie संस्कृति में बदल रही है जहाँ सघन ध्यान के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। सेल्फी संस्कृति बाजार की मंगलकामना करनेवाली संस्कृति है। यहाँ सर्व मंगलकामना की बात करना ही बेमानी है। आत्मचिंतन करनेवाला समाज समय की थाह लेनेवाला, समय के साथ संघर्ष करनेवाला, और समय को अपने अनुकूल बनानेवाला समर्थ और पुरुषार्थ करनेवालों का समाज रहा है और उसके इसी सामर्थ्य और पुरुषार्थ ने अब तक की सारी संभ्यताओं को जन्म दिया है। आज की सेल्फी संस्कृति विचारशून्य, संवेदनाशून्य और चेतनाशून्य लोगों की संस्कृति है। समय की धारा में बह जाना इसकी नियति है।

बाजार की ताकत ने लोकसाहित्य को भी प्रभावित किया है। लोक की चेतना सामूहिक होती है। यह वाचाल और मुखर चाहे न होती हो पर यह प्रखर जरूर होती है। लोक की चेतना हर यथास्थिति को समझती और पहचानती है। यह अपने शासकों और शोषकों की नीयत को भी अच्छी तरह समझती और पहचानती है। उसने बाजार को भी समझा और पहचाना है। लोक आत्मनिर्भर और स्वतंत्र प्रकृति का होने के बाद भी शासन की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश होता है। परंतु उसकी आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता की प्रकृति उसे शासकों और शोषकों की चाटुकारिता से बचाती है। लोक साहित्य में शासकों और शोषकों के विरुद्ध प्रतिरोघ के स्वर भी होते है और उनके प्रति शुभकामनाएँ भी परंतु चाटुकारिता कदापि नहीं होती। लोक संस्कृति की परंपरा इसे अब से कुछ समय पहले तक निभाते आई है, चाहे लोकगीतों में हो, चाहे लोकगाथाओं में हो, लोकनाट्य नाचा में हो या फिर चाहे आज की आधुनिक लोककला मंचों में हो। परंतु वर्तमान में इस परंपरा में ह्रास और विकृति दिखाई देने लगी है। इस ह्रास और विकृति की चर्चाएँ और आलोचनाएँ भी हो रही हैं। पर निदान हमारे हाथों में नहीं है। यह दुखद स्थिति है। इस ह्रास और विकृति की पड़ताल करने पर पता चलता है कि ऐसा करनेवाली लोककलाकारों की वर्तमान पीढ़ी है, लोककलाकारों की वह पीढ़ी है जो बाजार की शक्तियों की गिरफ्त में आ चुकी है। यह वह पीढ़ी है जो पट पाठन और मल्टी टास्किंग की परंपरा से आ रही है और जिसने सेल्फ संस्कृति को त्यागकर सेल्फी संस्कृति को अपना लिया है।

कुछ दशक पहले तक लोकसंस्कृति धन अर्जित करने का साधन अथवा आजीविका का साधन कभी नहीं रही है। और तब तक यह लोक की अभिलाषाओं और आकाक्षाओं को सशक्त तरीके से प्रस्तुत करके लोक अस्मिता को सुदृढ़ करती रही है। लोक को जीवनी शक्ति देती रही है। परंतु अब, जबकि इसमें ह्रास और विकृति पैदा करनेवाली, आज के लोककलाकारो की पीढ़ी, यश और धन की चाह में परंपरा से अर्जित लोक संस्कृति को, लोक साहित्य को बाजार के हाथों बेचने पर उतारू हुई है, या तो इसे परिवर्तनशील समाज की इच्छा मानकर मौन साध लें अथवा बाजार निर्मित सेल्फी संस्कृति से बचने का कुछ तो प्रयास करें।

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kuber singh sahu

Rajnandgaon

9407685557

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स्वप्न मलिक की कलाकृति

कबीर गर्व न किजीये, ऊँचा देखि आवास।

काल पडे भुंइ लेटना, ऊपर जमसी घास॥

संत कबीर

प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वशः |अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || २७ ||

जीवात्मा अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जब कि वास्तव में वे प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।

गीता (अध्याय -3 श्लोक -27 )

आत्म' वह है जिसके साथ हम पैदा हुए हैं । अहंकार’ वो है जिसे हमने एकत्रित किया है ; अहंकार हमारी उपलब्धि है। यह प्राकृतिक नहीं है आत्मिक भी नहीं है।

अहंकार एक मृगतृष्णा है जो सिर्फ लगता है कि है। और जब हम आध्यात्मिक रूप से गहरी नींद में होते हो, तब वह बहुत प्रबल हो जाती है; स्वाभाविक है वह हमारे लिए समस्या खड़ी कर देती है। हमारा सारा कष्ट इसके द्वारा निर्मित हो जाता है,हमारा तनाव, हमारी चिंताएं सब का हेतु हमारा अहंकार होता है। हमारा अहंकार उन घोषणाओं और कथनों के साथ जो हमारी पहचान निर्धारित करते हैं के रूप में "मैं" और "मुझे" के पीछे छुपा होता है। अहं को परिभाषित करना मुश्किल है क्योंकि अहंकार सिर्फ एक विशिष्ट गुण या अवगुण नहीं है।यह वास्तव में कई अलग-अलग मान्यताओं से बना है जो एक व्यक्ति अपने जीवन में प्राप्त करता है। ये मान्यतायें विविध और भी विरोधाभासी हो सकतीं हैं जो अहंकार को परिभाषित करना और अधिक जटिल बनाती हैं।प्रत्येक व्यक्ति का अहंकार भिन्न होता है। यदि कोई व्यक्ति अपने अहंकार के सभी हिस्सों को स्पष्ट रूप से पहचानने की कोशिश करे तो संभवतः वह भ्रमित हो जाएगा।अहंकार का मतलब ही यही है कि आप दूसरों को प्रभावित करने की चेष्टा कर रहे हैं। आपको अहंकार के लिए किसी दूसरे की जरुरत पड़ती है। जब आप अपनी जगह पर अकेले होते हैं, तब वहाँ अहंकार नहीं हो सकता। अहंकार की संरचना-फ्रायड ने मानव व्यक्तित्व में तीन तत्त्वों इदम्, अहम्,अति अहम् को स्वीकार किया है । इदम् में व्यक्ति सुख सिद्धान्त को महत्त्व देता है । अहम् में वह अपने परितोष के लिए मार्ग निर्धारित करता है ।अति अहम् व्यक्ति के इदम् और अहम् पर नियन्त्रण रखता है । वह नैतिक,सांस्कृतिक, मूल्यों व आदर्शों को महत्त्व देता है । इन तीनों का सन्तुलन मानव का सही रूप है, जबकि असन्तुलन विकार का कारण बनता है ।अहंकार हमारे अपने निर्माण की पहचान है, एक ऐसी पहचान जो झूठ पर आधारित है।अगर हम अपने सभी विश्वासों की बात करें जिनमें हम हमने व्यक्तित्व को परिलक्षित या प्रतिबिंबित करते हैं और एक काल्पनिक संसार अपने मस्तिष्क में बसा लेते हैं। ये सभी विश्वास जो - हमारे व्यक्तित्व, प्रतिभा और क्षमताओं को हमारे अनुरूप परिभाषित करते हैं यही हमारे पास अहंकार की संरचना है।ये हमारी योग्ताएं , प्रतिभाओं और क्षमताएं हमारे अंदर हमारे "स्व" का मानसिक निर्माण करने में सहायक होती हैं जो कि कृत्रिम है। हमारा अहंकार एक स्थैतिक चीज़ की तरह लगता है, जबकि ऐसा नहीं है। बल्कि, यह हमारे व्यक्तित्वों का एक सक्रिय और गतिशील हिस्सा है, हमारे जीवन में भावनात्मक नाटक बनाने में इसकी विशाल भूमिका है।

अहंकार का स्वरुप

अहंकार का त्याग नहीं किया जा सकता क्योंकि अहंकार का कोई अस्तित्व नहीं है। अहंकार केवल एक विचार है। अहंकार अंधकार के समान है;अंधकार का अपना कोई सकारात्मक अस्तित्व नहीं होता; यह बस प्रकाश का अभाव है। अहंकार का समर्पण नहीं करना होता, उसका साक्षी बनना होता है। उसे पूरा-पूरा जानना होता है। अहं और अहंकार दोनों अलग अलग हैं। अहं का अर्थ होता है अस्तित्व। प्रत्येक जीवित वस्तु को अपने अस्तित्व का ज्ञान होता है यद्यपि उनमें यह जागरूकता नहीं होती कि वो क्या हैं। अगर एक सोने का टुकड़ा कहे कि "मैं सोना हूँ "तो यह अहंकार नहीं हैं यह अहम् है वो अपने वास्तिक रूप को पहचान रहा है किन्तु अगर एक लोहे का टुकड़ा कहे "मैं सोना हूँ " तो यह अहंकार है क्योंकि वो उस अस्तित्व की बात कर रहा है जो वो नहीं है। यही मनुष्य के साथ होता है। "मैं हूँ "ये अहम है लेकिन "मैं क्या हूँ "ये अहंकार है। अहं अस्तित्व का संज्ञान है जबकि अहंकार कृत्रिम अस्तित्वों का निर्माण है।अहं प्राकृतिक है आत्मिक है जबकि अहंकार बनावटी बहरूपिया है। आपने सड़कों पर कई बहरूपिये देखें होंगे जो कभी कृष्ण कभी शिव और कभी पुलिस का भेष बनाकर लोंगो को मजा देते हैं। वास्तव में वो होते भिखारी है लेकिन हम और वो स्वयं एक क्षण के लिए उसी रूप में उनकी पहचान करने लगते हैं। हमें मालूम है कि ये बहरूपिया है। ऐसा ही कुछ स्वरूप हमारे अहंकार का होता है। मूल एवम आत्मिक रूप से अलग स्वयं और दूसरों से छल करता हुआ। अहंकार का मूलकारण कर्त्तापन का अहसास है। जैसे ही कर्त्तापन विकसित हुआ, तब हम ईश्वर की तुलना में स्वयं पर ही अधिक विश्वास करने लगे। जिसके कारण हमारे मन में अयोग्य संस्कार की निर्मित होने लगे जैसे, अधीरता, भय, चिंता करना, हडबडी करना, कठोर, अतिविश्लेषक (अधिक सोचना), नकारात्मक विचार, अतिव्यवस्थितता इत्यादि विकसित हुए जिससे जीवन को संभालने में मन की ऊर्जा अधिक मात्रा में व्यय होती है, इससे हमारी क्षमता घट जाती है और हम परिस्थितियों में तनाव से ग्रसित हो जाते हैं। और यही अयोग्य संस्कार हमें अपने आत्मस्वरूप से परे ले जाने लगे जिससे हमारे अंदर अहंकार का जन्म हुआ।

अहंकार के प्रकार

मनुष्य का अहंकार दो प्रकार का होता है :-

1. सात्त्विक अहं या शुद्ध अहं -यह स्थिति उच्चतम स्तर के संतों में होती है जब ईश्वर के साथ पूर्णतया एकरूप न होने के कारण उनमें अहं का कुछ अंश शेष दिखाई देता है । इसलिए इन संतों को केवल अपने अस्तित्व का भान होता है । शारीरिक क्रियाओं के निर्वाह के लिए यह अंशात्मक अहं आवश्यक होता है ।शुद्ध अहं या सात्विक अहम् में स्वयं को ब्रह्म (ईश्वरीय तत्त्व) से भिन्न समझना, अर्थात द्वैत द्वारा स्वयं का भान बनाए रखना प्रमुख है

यह अहं भी केवल भौतिक शरीर का अस्तित्व होने तक रहता है । संतों द्वारा देहत्याग के पश्चात इसका भी अंत हो जाता है ।

2. असात्त्विक अहं

हममें से अधिकांश लोग इस प्रकार का अहं अनुभव करते हैं । लगभग हम सबका तादात्म्य अपने भौतिक शरीर, विचार एवं भावनाओं से होता है और हम अपनी बुद्धि पर गर्व अनुभव करते हैं । ऐसा हमारे सूक्ष्म देह में विद्यमान स्वाभाविक विशेषताएं, इच्छाएं (वासनाएं), रूचि एवं अरूचि इत्यादि के संस्कारों के कारण होता है ।

अहंकार को कैसे पहचानें

अहंकार को देखना मुश्किल है, क्योंकि यह उन विचारों के पीछे छुपाता है जो सच दिखाई देते हैं। अहंकार को पहचानने का आसान तरीका यह है कि वह भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को पीछे छोड़ देता है। जैसे

1. किसी प्रियजन पर गुस्सा।

2. कुछ स्थितियों में असुरक्षा की भावना।

3. ईर्ष्या की भावनाएं।

4. किसी को प्रभावित करने की भावना।

ये सभी भावनाएं हमारे अंदर गलत विश्वास उत्पन्न करती हैं जिससे अहंकार जन्म लेता है।

कहीं आप अभिमानी तो नहीं खुद को जाँचिए-निम्न बिंदुओं पर आप अपने आपको परखिये ➧ अगर आपको खुद पर विश्वास नहीं है।

➧आप हमेशा हेकड़ी की भाषा अपनाते हैं।

➧आप हमेशा अपने से दूसरों को निम्न मानते हैं।

➧ आप हमेशा विचलित नजर आते हैं।

➧आप अगर अवसर वादिता की तलाश में रहते हैं।

➧ आप सफलता का पूरा श्रेय स्वयं लेना चाहते हैं।

➧ आप को अपने स्वभाव पर नियंत्रण नहीं रहता।

➧आप अपनी आलोचना सहन नहीं कर पाते हैं।

➧ आप लगातार दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।

➧ आप सिर्फ वही काम करते हैं जहाँ आपको प्रमुखता मिलती हो।

➧.आप अपनी योग्यता को लेकर अति आत्मविश्वासी हैं ।

➧. अगर आपको दूसरों को नीचा दिखाने में अपनी महत्ता सिद्ध होती दिखती है।

➧.आप हमेशा दूसरों को शिक्षा देते नजर आते हैं।

➧ आप अपनी असफलता के लिए हमेशा दूसरों को दोष देते हैं।

➧ अगर आप हमेशा अपनी कमियों को ढांकने की कोशिश करता है एवं अपनी गलतियां कभी स्वीकार नहीं करते हैं।

➧ आप सफलता प्राप्त करने के लिए रिश्ते तोड़ देते हैं।

➧ अगर आप चाहते हैं की सिर्फ उसकी सुनी एवं मानी जाये ये दूसरों की बातों या विचारों को महत्व नहीं देते।


ये सभी अहंकार के कुछ स्वाभाविक गुण हैं -अगर ये गुण या ये संकेत आपके व्यवहार में है तो संभल जाइये क्योंकि आपके अंदर अभिमान या अहंकार गहरे पैठ कर चुका है।

अहंकार से भेद बुद्धि उत्पन्न होती है जो मनुष्य को मनुष्य से ही दूर नहीं कर देती, अपितु अपने मूलस्रोत परमात्मा से भी भिन्न कर देती है।

परमात्मा से भिन्न होते ही मनुष्य में पाप प्रवृत्तियाँ प्रबल हो उठती है। वह न करने योग्य कार्य करने लगता है। अपने सच्चे आत्मस्वरूप का दर्शन करने के लिए ईश्वर की उपासना , आराधना , भक्ति व उस ईश्वर के दर्शन हेतु निरंतर प्रयास करना , अच्छे-अच्छे ज्ञानप्रद आध्यात्मिक ग्रंथों का स्वाध्याय करना , सत्पुरुषों की संगति करना , किन्हीं आत्मज्ञानी सतगुरु की शरण में जाकर उनके मार्गदर्शन में रहते हुए साधना करने से हमारा अहंकार सोऽहं में परिवर्तित हो कर हमें सदगति प्रदान करता है।

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पूजा कुशवाहा की कलाकृति

यह सुविदित है कि आधुनिक हिंदी कविता को नया सौंदर्यबोध और नई अर्थवत्ता प्रदान करने में प्रयोगवाद की भूमिका अवश्य रही है।प्रयोगवाद व नई कविता में भेद रेखा स्पष्ट नहीं है। एक प्रकार से प्रयोगवाद का विकसित रूप ही नई कविता है। नयी कविता भारतीय स्वतंत्रता के बाद लिखी गईं उन कविताओं को कहा गया, जिनमें परंपरागत कविता से आगे नये भावबोधों की अभिव्यक्ति के साथ ही नये मूल्यों और नये शिल्प-विधान का अन्वेषण किया गया। प्रयोगवाद को इसके प्रणेता अज्ञेय कोई वाद नहीं मानते।1943 में ’तारसप्तक‘ का प्रकाशन हिन्दी काव्य संवेदना को पूर्णतः बदलने वाली साहित्यिक घटना के रूप में हमारे सामने है। लेकिन इसके पहले ही हिंदी कविता में प्रयोग के नए अंकुर फूटने लगे थे। अज्ञेय द्वारा संपादित ’तारसप्तक‘ के प्रकाशन के चार-पाँच वर्ष पूर्व ’तारसप्तक‘ के कवियों के अतिरिक्त केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, त्रिलोचन, भवानीप्रसाद मिश्र जैसे अनेक समर्थ कवि नए ढंग से काव्य रचना में तल्लीन रहे थे। कविता केवल व्यक्ति की मानसिकता या चेतना की इकाई मात्र नहीं होती । वह वस्तुसत्ता से निरूपित हुई एक नितांत नयी संश्लिष्ट इकाई होती है । यह संश्लिष्ट इकाई मानवीय बोध की इकाई होकर दूसरों के मानवीय बोध की इकाई बन जाती है । ऐसा ही क्रम बराबर चलता रहा है और आदमी ऐसे क्रम के द्वारा ही अपने को, अपने समाज को, अपने परिवेश को और देशकाल के घटनाक्रम को और उसके विभिन्न आयामों को और तदनुरूप कविता को रचता रहा है ।’

प्रयोगवादी कविता का कथ्य कवि की आत्मा से जुडा हुआ है, लेकिन समाज में कवि अपने वर्तमान से बिल्कुल असंतुष्ट है। सब कहीं पराजय ही पराजय नजर आती है। आशा की किरणें कहीं भी दिखाई नहीं देतीं। ऐसे संदर्भ में प्रयोगवादी कवि जीवन के कृष्ण पक्ष को ही सत्य मानकर उसकी विस्तृत अभिव्यक्ति के लिए तैयार हो उठता है। साहित्य सार्थक शब्दों की ललित कला है। नई कविता परंपरा को नहीं मानती। मनुष्यों में वैयक्तिक भिन्नता होती है, उसमें अच्छाईयाँ भी हैं और बुराईयाँ भी। नई कविता के कवि को मनुष्य इन सभी रूपों में प्यारा है। उसका उद्देश्य मनुष्य की समग्रता का चित्रण है। नई कविता जीवन के प्रति आस्था की रखती है। आज की क्षणवादी और लघुमानववादी दृष्टि जीवन-मूल्यों के प्रति स्वीकारात्मक दृष्टि है।

नई कविता में अनेक विधाओं में मूल रूप में कहानी-कविता को समाज ने आसानी से स्वीकारा है। दोनों विधाओं में समाज की स्थिति को भली-भांति दर्शाने की क्षमता है। नई कविता में दो तत्व प्रमुख हैं- अनुभूति की सच्चाई और बुद्धिमूलक यथार्थवादी दृष्टि। वह अनुभूति क्षण की हो या एक समूचे काल की, किसी सामान्य व्यक्ति की हो या विशिष्ट पुरूष की, आशा की हो या निराशा की, अपनी सच्चाई में कविता के लिए और जीवन के लिए भी अमूल्य है। नई कविता में बुद्धिवाद नवीन यथार्थवादी दृष्टि के रूप में भी है और नवीन जीवन-चेतना की पहचान के रूप में भी।आधुनिक कविता जो कि ‘जन जीवन के लिए समर्पित थी ने पूर्वकालीन और पारम्‍परिक साहित्यिकता से कविता को बाहर निकाला ताकि आम आदमी भी कविता को कविता की तरह प्यार करने लगे और समाजवादी यथार्थवाद की मानसिकता से वह सम्‍बद्ध होने लगे ।’ नारी कथाकारों ने नारी पर हो रही लांछनाओं, नागफनियों, तपती रेत, सूखी धारा को अपनी रचनाओं का आधार बनाया है। उसके स्वाभिमान, उसकी अस्मिता एवं उसके साहस की बिंबात्मक अभिव्यक्ति है। मैत्रेयी पुष्पा के 'इदन्नमम', 'अलमा कबूतरी' जैसे उपन्यास इसके उदाहरण हैं - स्वयं मैत्रेयी जी के शब्दों में -

'मेरे लिए स्त्री-विमर्श का अर्थ स्त्री की स्वतंत्रता, इच्छा और अस्मिता है।' मैत्रेयी जी की नारी काम-काज वाले संसार की है, वह चाहे 'इदन्नमम' की मंदा हो या 'चाक' की सारंग, 'अलमा कबूतरी' की अलमा हो या 'गोमा हँसती है' की गोमा, सभी स्त्रियाँ जीवन के प्रत्यक्ष कुरुक्षेत्र में हैं।

'इदन्नमम' से एक उद्धरण से कथाकार की नारी-चेतना को स्पष्ट करने का प्रयास है

समकालीन कविता अपने को पूर्ववर्तियों की वैचारिक मान्यताओं की कड़ी के रूप में प्रस्तुत करती है। वह केवल वास्तविकता की ओर उन्मुख नहीं है। वास्तविकता को वह आत्मचेतना के स्तर पर रचने का प्रयास करती है, जिसमें भविष्य और उसके रास्ते संकेतित होते हैं। कविता की यही प्रकृति है। कवि के आत्मसंघर्ष की यह प्रकृति है। कवि वास्तविकता का हिस्सा मात्र नहीं होता। वह वास्तविकता के विरुद्ध एकांत की रचना करता है,और एकांत जिस चुप्पी की रचना करता है उसमें अनन्त का स्फोट होता है। दूसरे शब्दों में, भविष्य का स्फोट होता है।

नई कविता समाज सापेक्ष बनी है,जबकि प्रयोगवादी कही जाने वाली कविता पूर्णत: समाज-निरपेक्ष थी। डॉ. धर्मवीर भारती ने लिखा है कि "प्रयोगवादी कविता में भावना है,किंतु हर भावना के आगे प्रश्न चिह्न लगा है। इसी प्रश्न चिह्न को आप बौद्धिकता कह सकते हैं।" परंतु नई कविता प्रयोगवाद की अगली कड़ी इस अर्थ में है कि अब कवियों ने प्रश्न-चिह्नों के उस आवरण को उतार फैंका है। अब यह कविता प्रश्न चिह्न मात्र न रहकर समाज और जीवन के व्यापक सत्यों को खंड-खंड चित्रों के रूप में ही सही साधारणीकृत होकर समग्र प्रकार की सम्प्रेषणीयता से अन्वित हो गई है। इसमें साधारणीकरण की समस्या अब नहीं रह गई है।आधुनिक कविता, अपने सफल-असफल दावों में, मानवता के लिए संश्लिष्ट विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है।

विश्वदृष्टि का अर्थ विचारधारा अथवा माक्र्सवादी दृष्टि नहीं। विश्वदृष्टि का सम्बन्ध साहित्य से है, वह साहित्य से उद्भूत होने वाली चीज़ है। नई कविता भी विश्वदृष्टि अर्जित करने का प्रयास करती है। नई कविता ने लोक-जीवन की अनुभूति, सौंदर्य-बोध, प्रकृत्ति और उसके प्रश्नों को एक सहज और उदार मानवीय भूमि पर ग्रहण किया। साथ ही साथ लोक-जीवन के बिंबों, प्रतीकों, शब्दों और उपमानों को लोक-जीवन के बीच से चुनकर उसने अपने को अत्यधिक संवेदनापूर्ण और सजीव बनाया। कविता के ऊपरी आयोजन नई कविता वहन नहीं कर सकती। वह अपनी अन्तर्लय, बिंबात्मकता, नवीन प्रतीक-योजना, नये विशेषणों के प्रयोग, नवीन उपमान में कविता के शिल्प की मान्य धारणाओं से बाकी अलग है।पूर्व में कविता जब भावों, छन्दों, पदों की सीमा में निबद्ध थी तब प्रत्येक व्यक्ति के लिए काव्य रूप में अपने मनोभावों को व्यक्त करना सम्भव नहीं हो पाता था। नयी कविता के पूर्व प्रगतिशील, प्रयोगवादी, समकालीन कविता आदि के नाम से रची-बसी कविता ने मनोभावों को स्वच्छन्दता की उड़ान दी। नायक-नायिकाओं की चेष्टाओं, कमनीय काया का कामुक चित्रण, राजा-बादशाहों का महिमामण्डन करती कविता से इतर नयी कविता ने समाज के कमजोर, दबे-कुचले वर्ग की मानसिकता, स्थिति को उभारा है।

समकालीन हिंदी कविता में आज के भारत का बिंब विभिन्न प्रश्नों के माध्यम से उपस्थापित है। भूमंडलीकरण, उपभोगवादी संस्कृति में बाजारवाद का वर्चस्व, विकसित पूँजीवाद की छद्म लीलाएँ, सांप्रदायिक एवं आतंकवाद की वीभत्सता, स्त्री-चेतना के विविध पहलू, जातीय समीकरण की चीख, मानवीय मूल्यों एवं संबंधों की भयानक क्षरणशीलता के शब्द चित्र अंकित हैं। प्रयोगवादियों के काव्य सत्य की तलाश दरअसल नए मानव की वास्तविकता की तलाश है या यों कहिए कि वह उसकी अस्मिता की तलाश है।विद्रोह की अनिवार्यता यहाँ काव्य-सत्य को व्यापक बनाने हेतु नूतन प्रयोगों पर बल दिया। अतः प्रत्येक संवेदनशील एवं सृजनात्मक प्रतिभा के लिए प्रयोग की प्रक्रिया से गुजरना अनिवार्य बन गया। निराला में जिस विद्रोह का स्वरूप मिलता है और वह प्रयोगवादी कवियों में प्रयोग बन गया है।नई कविता अगर इस काल की प्रतिनिधि और उत्तरदायी रचना-प्रवृत्ति है, और समकालीन वास्तविकता को ठीक-ठीक प्रतिबिम्बित करना चाहती है, तो उसे स्वयं आगे बढक़र यह त्रिगुण दायित्व ओढ़ लेना होगा।

सन्दर्भ ग्रन्थ

1 नई कविता नई आलोचना और कला -कुमार विमल

2.हिंदी साहित्य का इतिहास -डा. रामचन्द्र शुक्ल

3. कवि परंपरा - तुलसी से त्रिलोचन-श्रोत्रिय प्रभाकर

4. हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास- चतुर्वेदी रामस्वरूप

5. आधुनिक हिंदी कविता में शिल्प -कैलाश बाजपेई

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बिगड़ते वर्तमान हालात नवयुवकों एवं राष्ट्र के भविष्य के लिए बेहद चिंतनीय है.


मेरे प्रिय नवयुवक साथियों,

मुझे पता है कि वर्तमान हालात को उजागर करते मेरे इस खत को पढ़कर आप या तो इस पर गौर नहीं करेंगे या इसको पूर्णत: निरर्थक समझेंगे. हाँ, यह भी हो सकता है कि आप मेरे विचारों को पढ़कर मुझे बुरा भला कहें, पुराने खयालातों वाली लेखिका कहकर इस चिंतनीय मुद्दे को सिरे से ख़ारिज कर दें, खैर यह कहने का तो आपका हक भी बनता है, स्वतंत्र होकर कहिए. जब आप इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे, मेरी आलोचना होगी, इस पर चिंतन होगा, तभी इसका कुछ सार्थक परिणाम भी निकलेगा. भविष्य आपका है, सार्थक, निरर्थक का विचार आपको ही करना होगा. एक राष्ट्र चिंतक और टमटमिया (छोटी) लेखिका होने के नाते यह मेरा फ़र्ज बनता है कि मैं दूरदृष्टि से वर्तमान हालात पर अपने विचार रखते हुए कलम की अस्मिता को जीवित रखूँ.

ध्यातव्य है कि दुनिया में बढ़ रही काल्पनिक वैचारिक भीड़ बेहद खतरनाक एवं चिंतनीय है. काल्पनिक इस लिए कह रही हूँ कि इस भीड़ के पीछे सोशल मीडिया को हथियार बनाकर कुछ छद्म मानसिकता वाले लोगों की हमारे नव स्वर्णिम समाज को दिशाहीन करने की एक सोची-समझी साजिश है. आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में हम इतने अस्त व्यस्त हैं कि हम समाज में हो रही गतिविधियों के मूल को जानने की कोशिश ही नहीं करते. मुझे इस बात को कहने में कोई गुरेज नहीं हैं कि हिन्दुस्तान में फल फूल रहे बड़े टी. वी. चैनलों एवं बड़ी सोशल साइट्स के आँका विदेशों में बैठकर अपने मंसूबों से स्वर्णिम हिन्दुस्तान को तोड़ने की साज़िश कर रहें हैं. उन्हें भली भाँति पता है कि यदि सबसे बड़े लोकतंत्र वाले इस देश को तोड़ना है तो इसके युवाओं को बरगलाना पड़ेगा, दिशाहीन करना पड़ेगा और उनको सोशल साइट्स द्वारा काल्पनिकता के दलदल में ढ़केलना पड़ेगा, गर देश की बुनियाद कमजोर हो जाएगी तो मजबूत राष्ट्र अपने आप ढ़ह जाएगा. आज खामियाज़ा भी हमारे सामने है, जो बेहद चिंतनीय है.

"सन् अस्सी के दशक में भारत के महान दार्शनिक ड़ा रजनीश (ओशो) ने भी इस दिशाहीन काल्पनिक भीड़ पर चिन्ता जाहिर की थी और 'अस्वीकृति में उठा हाथ' पुस्तक में उन्होंने साफ़ तौर पर कहा था कि भीड़ के भय के कारण हम असत्यों एवं गलत कदम को स्वीकार कर लेते हैं, जिसको हम सत्य मानकर बैठे हैं वह सत्य है ? या सिर्फ भीड़ का भय है कि चारों तरफ के लोग क्या कहेंगे ? चारों तरफ के लोग जिस दिशा में चल रहें हैं, उसी दिशा में तो मैं भी चल रहा हूँ. ऐसा व्यक्ति सच तक कभी नहीं पहुँच सकता, जो भीड़ को स्वीकार कर लेता है. वास्तविकता (सत्य) की खोज भीड़ से मुक्त होती है. भीड़ में तो लोग एक दूसरे से ही भयभीत रहते हैं. सीधे तौर पर यह असत्य (काल्पनिक) को सत्य (वास्तविक) बनाने की तरकीबें हैं. सत्य (वास्तविकता) अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है, लेकिन असत्य ( काल्पनिकता) को भीड़ का सहारा चाहिए, उसके बिना वह खड़ा नहीं हो सकता......."

आजकल हम यह मान बैठें हैं कि गर हमें ज़माने में रहना है तो ज़माने के रूख को स्वीकारना होगा. बात बिल्कुल सौ टके की है, ज़माने का रूख करो, कौन मना कर रहा है ? परिणाम भी तो हमें ही भुगतना है. लगातार नैतिक पतन और संस्कारों का हनन हो रहा है, जिससे गरीबी, भुखमरी, आत्महत्या, वृद्धाश्रम , अनाथाश्रम.... की संख्या में लगातार इजाफ़ा हो रहा है. ज़माने के साथ चलने में मुझे कोई गुरेज़ नहीं है, अत्याधुनिकता को अपनाओ, मगर उसके अच्छे बुरे पहलुओं को भी जानो और फिर उसका आत्मसात् करो, साथ ही साथ अपने अध्यात्म, संस्कार और सभ्यता को भी जीवित रखो. जो सदियों से सारे विश्व के लिए अनुकरणीय था और इसी वजह से आज भी वैश्विक स्तर पर दुनिया की निगाहें भारत पर ही टिकी हैं.

एक वाकया सचमुच हम सबको गौरवान्वित कर देने वाला है. एक बात यह साफ कर दूँ कि न तो मै किसी राजनीतिक पार्टी से हूँ और न ही किसी का महिमा-मण्ड़न कर रही हूँ. उस पल को याद दिलाना चाहती हूँ, जब हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री किसी मुल्क के राष्ट्राध्यक्ष को गीता भेंट की थी और कहा था कि मेरे पास इससे ज्यादा देने को कुछ भी नहीं है और विश्व के पास इससे ज्यादा लेने को भी कुछ नहीं है. परन्तु आज हमारी युवा पीढ़ी चौबीसों घड़ी सोशल साइट्स पर इतनी व्यस्त है कि उसके पास गीता जैसा नीतिशास्त्र और रामायण जैसा प्रयोगशास्त्र पढ़ने की फुरसत ही नहीं है.

आज हमारे नवयुवकों के मन पर सोशल साइट ऐसी परत जमा चुकी है कि वह उसी काल्पनिक दुनिया को ही वास्तविक दुनिया समझ बैठा है. खेलना- कूदना, मिलना-जुलना, निमंत्रण देना, किसी से बातें करना, प्रेम सम्बंध बनाना, शोक व्यक्त करना, गलत बात को सच साबित करना और तो और अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ में गंवाने का एक अहम माध्यम बन गया है. वजह साफ है, आज हम सोशल साइट्स की दुनिया में इतने मशगूल हैं कि हमारे पास वास्तविक जीवन जीने का वक्त ही नहीं बचा है. आज सोशल मीडिया पर धर्म, अध्यात्म, तकनीक, प्रेरणा व अन्य प्रकार के अच्छे-बुरे पोस्ट प्रसारित होते रहते हैं कि हमें गूढ़ से गूढ़ चीजें भी बिल्कुल आसान सी लगती हैं, हम उसका कुछ अंश भी आत्मसात् नहीं करते परन्तु उन पोस्टों पर अपनी लम्बी चौड़ी प्रतिक्रिया देकर स्वयं को अच्छा साबित करने का प्रयत्न हर पल जरूर करते हैं. सार्थक बदलाव तब तक नहीं हो सकता जब तक कि हम किसी भी विषय पर चिंतन मनन न करें और उसका अमल न करें. सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया पर अच्छे अच्छे पोस्ट एवं प्रतिक्रिया करने वाला नवयुवक बाहर से तो बड़ा योग्य, समझदार और सफलता को अपनी मुठ्ठी में समेटकर रखने वाला प्रतीत होता है परन्तु अन्दर ही अन्दर वह उतना ही अयोग्य, कुत्सित मानसिकता एवं भीड़ के भय से भयभीत रहता है. यही तो दुनिया की भीड़ और काल्पनिक संसार है, जो हमें सच से कोसों दूर रखता है.

यह बेहद चिंतनीय है कि आज सोशल साइट्स पर तकरीबन 20 करोड़ पोर्न वीड़ियो एवं क्लीपिंग उपलब्ध हैं, जो कि सीधे तौर पर इंटरनेट से ड़ाउनलोड़ किया जा सकता है. कई बार इस गंभीर मुद्दे पर भारत सरकार और विपक्षी दलों में बहस होती रही है, परन्तु बेनतीजा ही रही है. साल 2015 में राष्ट्रहित में भारत सरकार द्वारा 857 पोर्न कन्टेंट वाली वेबसाइट की लिस्ट इंटरनेट सर्विस प्रदाताओं को सौंपी थी और इनको ब्लाक करने का आदेश दिया गया था. सरकार के इस फैसले के खिलाफ विपक्षी लोगों द्वारा बड़ा हंगामा किया गया था और सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था. खैर यह तो साफ तौर पर सरकार की नैतिक हार ही थी. विभिन्न शोधों और अपराधियों के बयानों से यह स्पष्ट हो चुका है कि देश में बढ़ रही बलात्कार की घटनाएँ, अश्लील गतिविधियों व अन्य अमानवीय घटनाओं में पोर्न साइट्स की विशेष भूमिका रही है. एक तरफ सेक्स जहाँ शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करने में सहायक है, वहीं दूसरी ओर पोर्न सेक्स के प्रति एक वहशीपन एवं उन्माद पैदा करता है. जहाँ इन्सान मानसिक तौर पर जानवरों जैसा बर्ताव करने लगता है.

दुनिया के ऐसे तमाम देश हैं जिन्होंने पोर्न साइट के विरूद्ध अभियान छेड़ा हुआ है और हमारे यहाँ जब सरकार संजीदा हुई तो तथाकथित बौद्धिक प्रगतिशील लोगों ने अपनी ओछी दलीलें देकर सरकार को घुटने टिका दिए. इन्दौर के एक वकील कमलेश वासवानी पोर्न साइटों के खिलाफ कोर्ट पहुँचे, तो यह मुद्दा कुछ तथाकथित नैतिक लोगों को आर्टिकल 21 "राइट टू पर्सनल लिबर्टी" का हनन लगने लगा. अन्तत: चीफ जस्टिस ने इस मुद्दे को फिर सरकार के पाले में डाल दिया. साल 2014 में चीन ने 180000 अश्लील कन्टेंट वाली आनलाइन बेबसाइटों पर प्रतिबन्ध लगाकर समूचे विश्व के सामने एक बानगी पेश की, तो भारत क्यूँ नहीं कर सकता ?

एक शोध बड़ा चौंकाने वाला है कि आज हमारे नवयुवक सोशल साइट्स की दुनिया में इतने मशगूल हो चुके हैं कि उनका अधिकांश समय इसी पर व्यतीत होता है. एक अच्छे स्वस्थ नवयुवक को गर तीन दिन के लिए मोबाइल और सोशल साइट्स से दूर कर दिया जाए तो उसका ब्लड़प्रेशर स्वतः बढ़ जाएगा और शिकन उसके चेहरे से साफ झलकने लगेगी. यह सिर्फ और सिर्फ इस सोशल साइट्स की देन है. जिस वक्त हमारे नवयुवकों को आत्मसंयम के साथ अपनी काबिलियत को बढ़ाने की आवश्यकता रहती है, उस वक्त वो अपना बहुमूल्य समय सोशल साइट्स की इस काल्पनिक दुनिया में ज़ाया करते हैं.

अन्त में मै यह साफ कहना चाहती हूँ कि आप सोशल साइट्स से सार्थक बाते जरूर आत्मसात् कीजिए, सार्थक प्रयोग कीजिए, अत्याधुनिकता अपनाइए, टेक्नोलाजिकल एड़वांस बनिए, कोई गुरेज़ नहीं है. परन्तु आप कुछ भी उपयोग करने से पहले उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार कीजिए. एक सुदृढ़ समाज और राष्ट्र बनाने के लिए हम सबको यह आवश्यकता है कि मानसिक रूप से संयमित बनें, दूरदृष्टि एवं निर्णय शक्ति ठोस रखें और सकारात्मक दिशा में गतिशील रहें. जिससे कि प्रत्येक नवयुवक राष्ट्र को बेहतर बनाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे सकें.


शालिनी तिवारी

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