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३ जैनधर्म के अन्य प्रवर्तक

भगवान ऋषभदेव के पश्चात् जैनधर्म के प्रवर्तक २३ तीर्थकर और हुए, जिनमें से दूसरे अजितनाथ, चौथे अभिनन्दननाथ, पाँचवे सुमतिनाथ और चौदहवें अनन्तनाथ का जन्म अयोध्या नगरी में हुआ। तीसरे संभवदेव का जन्म श्रावस्ती नगरी में हुआ। छठे पद्‌मप्रभू का जन्म कौशाम्बी में हुआ। सातवें सुपार्श्वनाथ और तेईसवें पार्श्वनाथ का जन्म वाराणसी नगरी में हुआ। आठवें चन्द्रप्रभू का जन्म चंद्रपुरी में हुआ। नौंवे पुष्पदन्त का जन्म काकन्दी नगरी में हुआ। दसवें शीतलनाथ का जन्म भद्‌दलपुर में हुआ। ग्यारहवें श्रेयांसनाथ का जन्म सिंहपुरी (सारनाथ) में हुआ। बारहवें वासुपूज्य का जन्म चम्पापुरी में हुआ। तेरहवें विमलनाथ का जन्म कपिला नगरी में हुआ। पन्द्रहवें धर्मनाथ का जन्म रत्नपुर में हुआ। सोलहवें शान्तिनाथ, सतरहवें कुन्थुनाथ और अठारहवें अमरनाथ का जन्म हस्तिनागपुर में हुआ। उन्नीसवें मल्लिनाथ और इक्कीसवें नमिनाथ का जन्म मिथिलापुरी में ' हुआ। बीसवें मुनिसुव्रतनाथ का जन्म राजगृही नगरी में हुआ।

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इनमें से धर्मनाथ, अमरनाथ, और कुन्थुनाथ का जन्म कुरुवंश में हुआ, मुनिसुव्रतनाथ का जन्म हरिवंश में हुआ और शेष का जन्म इक्ष्वाकुवंश में हुआ। सभी ने अन्त में प्रवज्या लेकर भगवान् ऋषभदेव की तरह तपश्चरण किया और केवलज्ञान को प्राप्त करके उन्हीं की तरह धर्मोपदेश किया और अन्त में निर्वाण को प्राप्त किया।

इन में से भगवान् वासुपूज्य का निर्वाण चम्पापुर से हुआ और शेष तीर्थंकरों का निर्वाण सम्मेदशिखर से हुआ। अन्तिम तीन तीर्थंकरों का वर्णन आगे पढिये ।

भगवान नेमिनाथ

भगवान् नेमिनाथ बाईसवें तीर्थंकर थे। ये श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे। शौरीपुर नरेश अन्धकवृष्णि के दस पुत्र हुए। सब से बड़े पुत्र का नाम समुद्रविजय और सब से छोटे पुत्र का नाम वसुदेव था। समुद्रविजय के घर नेमिनाथ ने जन्म लिया और वसुदेव के घर श्रीकृष्णने। जरासन्ध के भय से यादवगण शौरीपुर छोड्‌कर द्वारका नगरी में जाकर रहने लगे। वहाँ जूनागढ़ के राजा की पुत्री राजमती से नेमिनाथ का विवाह निश्चित हुआ। बड़ी धूम-धाम के साथ बारात जूनागढ़ के निकट पहुंची। नेमिनाथ बहुत से राजपुत्रों के साथ रथ में बैठे हुए आसपास की शोभा देखते जाते थे। उन की दृष्टि एक ओर गई तो उन्होंने देखा बहुत से पशु एक बाड़े में बन्द हैं, वे निकलना चाहते हैं किन्तु निकलने का कोई मार्ग नहीं है। भगवान्‌ ने तुरन्त सारथि को रथ रोकने का आदेश दिया और पूछा ये इतने पशु इस तरह क्यों रोके हुए हैं। नेमिनाथ को यह जानकर बड़ा खेद हुआ कि उन की बारात में आये हुए अनेक राजाओं के आतिथ्य सत्कार के लिए इन पशुओं का वध किया जाने वाला, है और इसीलिये वे बाड़े में बन्द हैं। नेमिनाथ के दयालु हृदय को बड़ा कष्ट पहुँचा। वे बोले-यदि मेरे विवाह के निमित्त से इतने पशुओं का जीवन संकट में है तो धिक्कार है ऐसे विवाह को। अब मैं विवाह नहीं करूँगा। वे रथ से तुरन्त नीचे उतर पड़े और मुकुट और कंगन को फेंककर वन की ओर चल दिये। बारात में इस समाचार के फैलते ही कोहराम मच गया। जूनागढ़ के अन्तःपुर में जब राजमती को यह समाचार मिला तो वह पछाड़ खाकर गिर पड़ी। बहुत से लोग नेमिनाथ को लौटाने के लिये दौड़े, किन्तु व्यर्थ।

वे पास में ही स्थित गिरनार पहाड़ पर चढ़ गये और सहस्राम्र वन में भगवान् ऋषभदेव की तरह सब परिधान छोड्‌कर दिगम्बर हो आत्मध्यान में लीन हो गये और केवलज्ञान को प्राप्त कर 'गिरनार से ही निर्वाण लाभ किया।

भगवान पार्श्वनाथ

भगवान् पार्श्वनाथ २३ वे' तीर्थंकर थे। इन का जन्म आज से लगभग तीन हजार वर्ष पहले वाराणसी नगरी में हुआ था। यह भी राजपुत्र थे। इन की चित्तवृति प्रारम्भ से ही वैराग्य की ओर विशेष थी। माता-पिता ने कई बार इन से विवाह का प्रस्ताव किया किन्तु उन्होंने सदा हंसकर टाल दिया। एक बार ये गंगा के किनारे घूम रहे थे। वहाँ पर कुछ तापसी आग जलाकर तपस्या करते थे। ये उन के पास पहुंचे और वोले--'इन लक्कड़ों को जलाकर क्यों जीव हिंसा करते हो। ' कुमार की बात सुनकर तापसी बड़े झल्लाये और बोले-'कहाँ है जीव ?' तब कुमार ने तापसी के पास से कुन्हाड़ी उठाकर ज्यों ही जलती हुई लकड़ी को चीरा तो उस में से नाग और नागिन का जलता हुआ जोड़ा निकला। कुमार ने उन्हें मरणोन्मुख जानकर उन के कान में मूलमन्त्र दिया और दुःखी होकर चले गये। इस घटना से उन के हृदय को बहुत वेदना हुई। जीवन की अनित्यता ने उन के चित्त को और भी उदास कर दिया और वे राजसुख को तिलान्जलि देकर प्रवजित हो गये। एकबार वे अहिच्छेत्र के वन में ध्यानस्थ थे। ऊपर से उन के पूर्वजन्म का वैरी कोई देव कहीं जा रहा था। इन्हें देखते ही उस का पूर्वसंचित वैरभाव भड़क उठा।

वह उन के ऊपर ईंट और पत्थरों की वर्षा करने लगा। जब उसस भी उसने भगवान के ध्यान में विध्न पड़ता न देखा तो मूसलाधार वर्षा करने लगा। आकाश में मेघों ने भयानक रूप धारण कर उन के गर्जन तर्जन से दिल दहलाने लगा। पृथ्वी पर चारों ओर पानी ही पानी उमड़ पड़ा। ऐसे घोर उपसर्ग के समय जो नाग और नागिन मरकर पाताल लोक में धरणेन्द्र और पद्यावती हुए थे, वे अपने उपकारी के ऊपर उत्सर्ग हुआ जानकर तुरन्त आये। धरणेन्द्र ने सहस्रफण वाले सर्प का रूप धारण कर के भगवान के ऊपर अपना फण फैला दिया और इस तरह उपद्रव से उन की रक्षा की। उसी समय पार्श्वनाथ को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई, उस वैरी देव ने उन के चरणों में सीस नवाकर उन से क्षमा याचना की। फिर करीब ७० वर्ष तक जगह-जगह विहार कर के धर्मोपदेश करने के बाद १०० वर्ष की उम्र में वे सम्मेदशिखर से निर्वाण को प्राप्त हुए। इन्हीं के नाम से आज सम्मेदशिखर पर्वत पारसनाथहिल' कहलाता है। इन की जो मूर्तियां पाई जाती हैं, उन में उक्त घटना के स्मृतिस्वरूप सिर पर सर्प का फन बना हुआ होता है। जैनेतर जनता में इन की विशेष ख्याति है। कहीं-कहीं तो जैनों का मतलब ही पार्श्वनाथ का पूजक समझा जाता है।

भगवान महावीर

भगवान महावीर अन्तिम तीर्थंकर थे। लगभग ६०० ई० पू० बिहार प्रान्त के कुण्डलपुर नगर के राजा सिद्धार्थ के घर में उन का जन्म हुआ। उन की माता' त्रिशला वैशालीनरेश राजा चेटक की पुत्री थी। महावीर का जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के दिन हुआ था। इस दिन भारतवर्ष में महावीर की जयन्ती बड़ी धूम से मनाई जाती है। महावीर सचमुच में महावीर थे। एक बार बचपन में ये अन्य बालकों के साथ खेल रहे थे। इतने में अचानक एक सर्प कहीं से आ गया और इनकी ओर झपटा। अन्य बालक तो डरकर भाग गये किन्तु महावीर ने उसे निर्मद कर दिया। महावीर जन्म से ही विशेष ज्ञानी थे। एक बार एक मुनि उनको देखने के लिये आये और उनके देखते ही मुनि के चित्त में जो शास्त्रीय शंकाए थीं वे दूर हो गई। जब महावीर बड़े हुए तो उनके विवाह का प्रश्न उपस्थित हुआ, किन्तु महावीर का चित्त तो किसी अन्य ओर ही लगा हुआ था। उस समय यज्ञादिक का बहुत जोर था और यज्ञों में पशु बलिदान बहुतायत से होता था। बेचारे मूक पशु धर्म के नाम पर बलिदान कर दिये जाते थे और 'वैदि की हिंसा-हिंसा न भवति' की व्यवस्था दे दी जाती थी। करुणासागर महावीर के कानों तक भी उन मूक पशुओं की चीत्कार पहुंची और राजपुत्र महावीर का हृदय उन की रक्षा के लिये तड़प उठा। धर्म के नाम पर किये जाने वाले किसी भी कृत्य का विरोध कितना दुष्कर है यह बतलाने की आवश्यकता नहीं। किन्तु महावीर तो महावीर थे। ३० वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड्‌कर वन का मार्ग लिया और भगवान ऋषभ- देव की ही तरह प्रवज्या लेकर ध्यानस्थ हो गये।

महावीर के जन्म आदि का वर्णन करने वाली कुछ प्राचीन गाथाएँ ' मिलती हैं जिन का भाव इस प्रकार है-

'जो देवों के द्वारा पूजा जाता था, जिसने अच्युतकल्प नामक स्वर्ग में दिव्य भोगों को भोगा, ऐसे महावीर जिनेन्द्र का जीव कुछ कम बहत्तर वर्ष की आयु पाकर, पुष्पोत्तर नामक विमान से च्युत होकर, आषाढ़ शुक्ला षष्ठी के दिन, कुण्डपुर नगर के स्वामी सिद्धार्थ क्षत्रिय के घर, नाथवंश में, सैकडों देवियों से सेवित त्रिशला देवी के गर्भ में आया। और वहां नौ माह आठ दिन रहकर चैत्र शुक्ला त्रयोदशी की रात्रि में उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के रहते हुए महावीर का जन्म हुआ।'

'अट्‌ठाईस वर्ष सात माह और बारह दिन तक देवों के द्वारा किये गये अमानुषिक अनुपम सुख को भोगकर जो आभिनिबोधित ज्ञान से प्रतिबुद्ध हुए, ऐसे देवपूजित महावीर भगवाने ने षष्ठोपवास के साथ मार्गशीर्ष कृष्ण दशमी के दिन जिनदीक्षा ली।

'बारह वर्ष पाँच माह और पन्द्रह दिन पर्यन्त छद्मस्थ अवस्था को बिताकर (तपस्या करके) रत्नत्रय से शुद्ध महावीर भगवान ने जृम्भिक ग्राम के बाहर कठकेला नदी के किनारे सिलापट्‌ट के ऊपर षष्ठोपवास के साथ आतापन योग करते हुए, अपराह्न कालमें , जब छाया पादप्रमाण थी, वैशाख शुक्ला दशमी के दिन क्षपक श्रेणिपर आरोहण किया और चार घातिया कर्मों का नाश कर के केवल ज्ञान प्राप्त किया।

केवलज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद भगवान महावीर ने ६६ दिन तक मौनपूर्वक विहार किया, क्योंकि तबतक उन्हें कोई गणधर गणका-संघ का धारक, जो कि भगवान के उपदेशों को स्मृति में रखकर उन का संकलन कर सकता, नहीं मिला था। विहार करते करते महावीर मगध देश की राजधानी राजगृही में पधारे और उस के बाहर विपुलाचल पर्वतपर ठहरे। उस समय राजगृही में राजा श्रेणिक रानी चेलना के साथ राज्य करते थे।

वही पर आसाढ़ शुक्ल पूर्णिमा, जिसे गुरुपूर्णिमा भी कहते हैं, के दिन इन्द्रप्रभूति नाम का गौतमगोत्रीय वेद-वेदांग में पारंगत एक शीलवान ब्राह्मण विद्वान जीव अजीव विषयक सन्देह को दूर करने के लिये महावीर के पास आया। और सन्देह दूर होते ही उसने महावीर के पादमूल में जिनदीक्षा ले ली और उन का प्रधान गणधर बन गया उस के बाद ही प्रात: कालमें भगवान महावीर की प्रथम देशना हुई। जैसा कि प्राचीन गाथाओं में लिखा है--

पंचशैलपुर में (पाँच पर्वतों से शोभायमान होने के कारण राजगृही को पंचशैलपुर या पंचपहाड़ी कहते हैं) रमणीक, नाना- प्रकार के वृक्षों से व्याप्त और देव-दानव से वन्दित विपुल नामक पर्वत पर महावीर ने भव्यजीवों को उपदेश दिया।

' वर्ष के ' 'प्रथम मास अर्थात श्रावणमास में, प्रथम पक्ष अर्थात कृष्णपक्ष में प्रतिपदा के दिन, प्रातकाल के समय अभिजित नक्षत्र के उदय रहते हुए धर्मतीर्थ की उत्पत्ति हुई।'

'इस प्रकार जिन श्रेष्ठ महावीर ने लगभग ४२ वर्ष की अवस्था में राग, द्वेष और भय से रहित होकर अपने धर्म का उपदेश दिया। भगवान महावीर ने तीस वर्ष तक अनेक देश देशान्तर में विहार कर के धर्मोपदेश दिया। जहाँ वह पहुंचते थे वहीं उन की उपदेश सभा लग जाती थी, और उस में हिंस्र पशु तक पहुंचते थे और जातिगत क्रूरता को छोड्‌कर शान्ति से भगवान का उपदेश सुनते थे। इस तरह भगवान काशी, कोशल, पंचाल, कलिंग कुरुजांगल कम्बोज, वाल्हीक, सिन्धु, गांधार आदि देशों में विहार करते हुए अन्त में पावा' नगरी (विहार) में पधारे। और वहाँ से कार्तिक कृष्णा चतुर्दशी की रात्रिमें अर्थात् अमावस्या के प्रातःकाल में सूर्योदय- से पहले मुक्तिलाभ किया। जैसा कि लिखा है-

'उनतीस वर्ष, पाँच मास और बीस दिन तक ऋषि, मुनि, यति और अनगार इन चार प्रकार के मुनिओं और बारह गणों अर्थात् सभाओं के साथ विहार करने के पश्चात भगवान महावीर ने पावानगर में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन स्वाति नक्षत्र के रहते हुए, रात्रि के समय शेष अघाति कर्मरूपी रज को छेदकर निर्वाण को प्राप्त किया।

वर्तमान में जो वीर निर्वाण सम्वत् जैनों में प्रचलित है, उस के अनुसार ५२७ ई० पू० में वीर का निर्वाण हुआ माना जाता है। कुछ प्राचीन जैन-ग्रन्थों में शकराजा से ६०५ वर्ष ५ मास पहले वीर- के निर्वाण होने का उल्लेख मिलता है' । उससे भी इसी काल की पुष्टि होती है ।

४ भगवान महावीर के पश्चात

जैनधर्म की स्थिति

भगवान महावीर के सम्बन्ध में जैन और बौद्ध साहित्य से जो कुछ जानकारी प्राप्त होती है, उस पर से यह स्पष्ट पता चलता है कि महावीर एक महापुरुष थे, और उस समय के पुरुषों पर उनका मानसिक और आध्यात्मिक प्रभाव बड़ा गहरा था । उनके प्रभाव; दीर्घदृष्टि और निस्पृहता का ही यह परिणाम है जो आज भी जैन धर्म अपने जन्मस्थान भारत देश में बना हुआ है जब बौद्ध धर्म शताब्दियों पूर्व यहाँ से लुप्त-सा हो गया था ।

भगवान महावीर का अनेक राजघरानों पर भी गहरा प्रभाव था । भगवान महावीर ज्ञातृवंशी थे और उनकी माता लिच्छवि गणतंत्र के प्रधान चेटक की पुत्री थी । ईसा से पूर्व छठी शताब्दी में पूर्वीय भारत में लिच्छवि राजवंश महान और शक्तिशाली था । डाँ० याकोवी ने लिखा है कि जब चम्पा के राजा कुणिक ने एक बड़ी सेना के साथ राजा चेटक पर आक्रमण करने की तैयारी की तो चेटक ने काशी और कौशल के अट्‌ठारह राजाओं को तथा लिच्छवि और मल्लों को बुलाया और उनको पूछा कि आप लोग कुणिक की माँग पूरा करना चाहते हैं अथवा उससे लड़ना चाहते हैं महावीर का निर्वाण होने पर उनकी स्मृति में उक्त अट्‌ठारह राजाओं ने मिलकर एक महोत्सव भी मनाया था ।

इससे स्पष्ट है कि उस समय के प्रमुख राजवंश प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से महावीर से प्रभावित थे ।

भगवान महावीर के ग्यारह प्रधान शिष्य थे, जिनमें मुख्य गौतम गणधर थे । भगवान महावीर के पश्चात उनके शिष्यों में से तीन केवलज्ञानी हुए-- गौतम गणधर, सुधर्मास्वामी और जम्बू स्वामी । तथा इनके पश्चात् पांच श्रुत-केवली हुए-विष्णु, नन्दि- मित्र, अपराजित, गोवर्धन और भद्रबाहु । अन्तिम श्रुतकेवली भद्रबाहु मगध में दुर्भिक्ष पड़नेपर एक बड़े जैन संघ के साथ दक्षिण देश को चले गये, जिसके कारण तमिल और कर्नाटक प्रदेश में जैन- धर्म का खूब प्रसार हुआ ।

- अत: भगवान महावीर के पश्चात् जैनधर्म की स्थिति का परिचय कराने के लिये उसे दो भागों में बाँट देना अनुचित न होगा-एक उत्तर भारत में जैनधर्म की स्थिति और दूसरा दक्षिण भारत में जैन- धर्म की स्थिति ।

उत्तर भारत में जैनधर्म

उत्तर भारत के विभिन्न प्रान्तों में जैनधर्म की स्थिति तथा राज- घरानों पर उनके प्रभाव का परिचय कराने से पूर्व पूरी स्थिति का विहंगावलोकन करना अनुचित न होगा ।

विभिन्न बौद्ध इतिहासज्ञों के कथन से पता चलता है कि बुद्ध निर्वाण के पश्चात् प्रथम शती में उत्तर भारत के विभिन्न स्थानों में जैन लोग प्रमुख थे । चीनी यात्री हुएनत्सांग ईस्वी सन् की सातवीं शती में भारत आया था । वह अपने यात्रा विवरण में नालन्दा के विहार का वर्णन करते हुए लिखता है कि निर्ग्रन्थ (जैन) साधु ने जो ज्योतिष विद्या का जानकार था, नयेभवन की सफलता की भविष्य- वाणी की थी । इससे प्रकट है कि उस समय मगध राज्य में जैनधर्म फैला हुआ था । जैनधर्म की उन्नति का सूचक दूसरा मुख्य प्रमाण अशोक की प्रसिद्ध घोषणा है, जिसमें निर्ग्रन्थों को दान देने की आज्ञा है । जो बतलाती है कि अशोक के समय में जैन-जो पहले निर्ग्रन्थ के नाम से विख्यात थे योग्य माने जाते थे तथा इतने प्रभावशाली थे कि अशोक की राज्यघोषणा में उन का मुख्य रूप से निर्देश करना आवश्यक समझा गया था।

उत्तर भारत में जैनधर्म को उन्नति की दृष्टि से कलिंग का नाम उल्लेखनीय है। ईस्वी पूर्व दूसरी शताब्दी का प्रसिद्ध खारवेल शिलालेख कलिंग में जैनधर्म की प्रगति को प्रमाणित करता है। श्री रंगास्वामी आयंगर के मतानुसार बौद्धधर्म के प्रचार के प्रति अशोक ने जो उत्साह दिखलाया उस के फलस्वरूप जैनधर्म का केन्द्र मगध से उठकर कलिंग चला गया जहाँ हुएनत्सांग के समय तक जैनधर्म फैला हुआ था।

खारवेल शिलालेख की तरह ही प्रसिद्ध मथुरा के शिलालेख प्रकट करते हैं कि ईसा की प्रथम शताब्दी से बहुत पहले से मथुरा जैनधर्म- का एक मुख्य केन्द्र था।

इस प्रकार भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात् लगभग पाँच शताब्दियों तक जैनधर्म उत्तर भारत के विभिन्न प्रदेशों में बड़ी तेजी के साथ उन्नति करता रहा। किन्तु सातवीं शताब्दी के पश्चात् उस का पतन प्रारम्भ हो गया।

आगे उत्तर भारत के प्रत्येक प्रान्त में भगवान महावीर के बाद की जैनधर्म की स्थिति का परिचय कराते हुए ऐसे राजवंशों और प्रमुख राजाओं का परिचय कराया जाता है, जिन्होंने जैनधर्म को अपनाया था। या जिन के साहाय्य से जैनधर्म फूला और फला। उस से पहले उत्तर भारत के प्रारंभिक इतिहास का विंहगावलोकन कराना अनुचित न होगा।

भगवान महावीर के समय में मगध के सिंहासन पर शिशुनागवंशी राजा बिम्बसार उपनाम श्रेणिक विराजमान थे। उन का उत्तराधिकारी उन का पुत्र अजातशत्रु (कुणिक) हुआ। अजातशत्रु ने अपने नाना चेटक के राज्य पर आक्रमण कर के वैशाली तथा लिच्छविदेशों को मगध के साम्राज्यों में मिला लिया और राजगृही के स्थान पर वैशाली को राजधानी बनाया। अजात शत्रु के पुत्र उदयन ने पाटलीपुत्र को मगध की राजधानी बनाया। इस वंश के राजच्युत होनेपर नन्दवंश का राज्य हुआ और चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्दों का सिंहासन छीन लिया।

चन्द्रगुप्त के बाद उस का पुत्र बिन्दुसार गद्दी पर बैठा। और बिन्दुसार के बाद उस का पुत्र अशोक पदासीन हुआ। अशोक के बाद उस के चार उत्तराधिकारी और हुए। अन्तिम मौर्य सम्राट वृहद्‌रथ को उस के सेनापति पुष्पमित्र ने मारकर सिंहासन पर कब्जा कर लिया और इस तरह शुंगवंश का राज्य हुआ।

अभी पुष्पमित्र मगध के सिंहासन पर जम भी न पाया था कि उसे दो प्रबल शत्रुओं का सामना करना पड़ा- उत्तर पश्चिमीय सीमा प्रान्त से मनीन्द्र ने उस के राज्य पर आक्रमण कर दिया और दक्षिण में कलिंगराज खारवेल ने। तीसरी पीढ़ी के बाद शुगवंश भी समाप्त हो गया। उस के बाद आन्ध्रों का राज्य हुआ जो दक्षिणी थे। ईसा की चौथी शताब्दी के प्रारम्भ में आन्ध्रों के एक अधिकारी ने ही जिस का नाम या उपाधि गुप्त्त थी, गुप्तवंश की नींव डाली। अस्तु, अब प्रकृत विषय पर आइये।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

भारतीय धर्म और अहिंसा

एक अध्ययन

नाभिपुत्र ऋषभ और ऋषभपुत्र भरत की चर्चा प्राय: सभी हिन्दू पुराणों में आती है। मार्कंडेय पु० अ० ९०, कर्म पु० अ०- ४१, आ० पु० अ० १०, वायुपुराण अ०-३३, गरुण पुराण अ० १, ब्रह्माण्ड पु अ० १४, वाराह पु० अ० ७४, लिंगपुराण अ० ४७, विष्णु पु० र०, अ० १ और स्कन्द पुराण वुभार खण्ड अ० ३७ में ऋषभदेव का वर्णन आता है। इन सभी में ऋषभ को नाभि और मरुदेवी का पुत्र कहा है। ऋषभ से सौ पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें से बड़े पुत्र भरत को राज्य देकर ऋषभ ने प्रव्रज्या ग्रहण की। इसी भरत से इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा। यथा-

नाभि स्त्बजनपत पुत्र मस्देव्यां महाद्युति:।

ऋषभ पार्थिव श्रेष्ठं सर्वेक्षत्रस्य पूर्वजम्।।

ऋषभाद् भरतो जज्ञे वीर: पुत्रशतोशुज:।

सो5 भिषिच्यर्षभ: पुत्र महा प्रावाज्यमास्थित:।।

हिमाह्व' दक्षिणं वर्ष तस्य नाम्ना विंदुर्बुधी:।

उक्त श्लोक थोड़े से शाब्दभेद के साथ प्राय: उक्त सभी पुराणों में पाये जाते हैं। श्री मद्‌भागवत. में तो ऋषभावतार का पूरा वर्णन है, और उन्हीं के उपदेश से जैन धर्म की उत्पत्ति बतलाई है। यथा-

बर्हिषि तस्मिन्ने विष्णुदत्त भगवार परमर्षिभिः प्रसादितो नामे:

प्रियविकीर्षया तद वरोधावने मस्देज्या धर्मान् दर्शायेतुकाभौ

वातरशनाना श्रमणानाम षोणार्म्ध्वमन्धिंना शुक्क्लया

तनुवावततार '२०' स्व. पू. अ. ३१।

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उक्त कथन में बातरशन (नग्न) श्रमणों के धर्म से स्पष्ट ही जैन धर्म का अभिप्राय है क्योंकि आगे ऋषभदेव के उपदेश से ही आर्हत धर्म (जैन धर्म) की उत्पत्ति बतलाई है।

भारत के राष्ट्रपति और प्रसिद्ध दार्शनिक स्व० डल राधाकृष्णन् ने अपने भारतीय दर्शन के इतिहास (जि. प.- पृ १८७) में लिखा है- 'जैन परम्परा ऋषभदेव से अपने धर्म की उत्पत्ति का कथन करती है। जो बहुत सी शताब्दियों पूर्व हुए हैं। इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेवजी की पूजा होती थी। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि जैनधर्म वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ, और अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थंकरों के नाम आते हैं। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैनधर्म के संस्थापक थे।

भागवत्कार ने ऋषभदेवजी का जो वर्णन किया है वह जैन मान्यता के ही अनुरूप है। वह योगी थे। उन का योग कर्म सन्यास रूप था जन धर्म में कर्म सन्यास रूप योग की ही साधना की जाती है ऋषभदेव से लेकर महावीर पर्यन्त सभी तीर्थंकर योगी थे। मौर्यकाल से लेकर आज तक की सभी जैन मूर्तियाँ योगी के रूप में ही प्राप्त होती हैं।

योग की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है। वैदिक आर्य उस में परिचित नहीं थे। किन्तु सिन्धु घाटी सम्यता योग से अछूती नहीं थी। योग शास्त्रों के अनुसार योग के लिये तीन वस्तुएँ आवश्यक हैं- आसन, मस्तक, ग्रीवा और धड् का सीधा रहना तथा अर्धनिमीलित नेत्र या नासाग्रदृष्टि। जैसा कि भगवद् गीता में भी कहा है -

सम कायशिरोगीवं धारय.:: चलास्थिर:।

संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्व दिशाश्चानवलोकयर।। ५-१३

स्व० श्री रामप्रसाद चन्दा के अनुसार मोहेन्जोदडों से प्राप्त पत्थर की मूर्ति, जिसे मि. मैके, पुजारी की मूर्ति बतलाते थे, योगी की मूर्ति है।

श्री चन्दा ने मार्डर्न रिव्यू जून १९३२ में एक लेख प्रकाशित कराया था। उस में उन्होंने भारतीय धर्मों में योग की स्थिति का चित्रण कर के लिखा है-सिन्धुघाटी से प्राप्त मोहरों पर बैठी अवस्था में अंकित देवताओं की मूर्तियाँ ही योग की मुद्रा में नहीं हैं किन्तु खड़ी अवस्था में अंकित मूर्तियाँ भी योग की कार्योत्सर्ग मुद्रा को बतलाती हैं। मथुरा म्यूजियम में दूसरी शती की कार्योत्सर्ग में स्थित एक वृषभदेव जिन की मूर्ति है, इस मूर्ति की शैली से सिन्धु से प्राप्त मोहरों पर अंकित खड़ी हुई देवमूर्तियों की शैली बिल्कुल मिलती है। ... ऋषभ या वृषभ का अर्थ होता है बैल और ऋषभदेव तीर्थंकर का चिह्न बैल है। मोहर नं० ३ से ५ तक के ऊपर अंकित देवमूर्तियों के साथ बैल भी अंकित है जो ऋषभ का पूर्वरूप हो सकता है। शैवधर्म और जैनधर्म जैसे दार्शनिक धर्मों के प्रारम्भ को पीछे ठेलकर ताम्रयुगीन काल में ले जाना किन्हीं को एक अवश्य ही साहस पूर्ण

देवताओं को पूजते थे। सिन्धुघाटी से प्राप्त मूर्तियों को देखते हुए यही अर्थ ठीक प्रमाणित होता है क्योंकि मोहेन्जोदड़ो से प्राप्त योगी की मूर्ति तो नग्न है ही, किन्तु जिसे शिवजी की मूर्ति माना जाता है उस में भी लिंग अंकित है। इस पर से यह अनुमान किया गया है कि मोहन्जोदड़ो के निवासियों में लिंग सहित शिव को पूजने की प्रथा थी।

मोहन्जोदड़ो की तरह हड़प्पा से प्राप्त मूर्तियाँ भी नग्न हैं जिन में से एक शिव की मूर्ति मानी गई है और दूसरी को भारत सरकार के पुरातत्व विभाग के तत्कालीन संयुक्त निर्देशक श्री टी० एन० रामचन्द्रन् ऋषभ तीर्थंकर की मूर्ति मानते हैं। उन्होंने भी अपने एक लेख में शिश्नदेव का अर्थ नंगे देवता किया है। इस तरह सिन्धु सभ्यता से प्राप्त नग्न मूर्तियों के प्रकाश में ऋगवेद के शिश्नदेवाः का अर्थ शिश्नयुत देव अर्थात नग्नदेव करना उचित प्रतीत होता है। जो उन के उपासक थे वे भी उससे लिये जा सकते हैं। यह अर्थ लिंगपूजकों में और लिंगयुत नग्नदेवों के पूजकों में समान रूप में घटित होता है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि अपने चिह्न लिंग पूजा को लिये हुए शिव निश्चय ही अन-आर्य देवता हैं। बाद में आर्यों के द्वारा उन्हें अपने देवताओं में सम्मिलित कर लिया गया। किन्तु लिंग पूजा का प्रचलन, आर्यों में बहुत काल के पश्चात हुआ है क्योंकि भाष्यकार पतंजलि ने अपने भाष्य में पूजा के लिये शिव की प्रतिकृति का निर्देश किया है शिव लिंग का नहीं। तथा चीनी यात्री हयुनत्सांग के यात्रा विवरण में शिव की मूर्ति का तो वर्णन है किन्तु लिंगपूजा का वर्णन नहीं मिलता। डा., भण्डारकर ने लिखा है कि उस समय में भी लिंगपूजा अज्ञात थी ऐसा लगता है, क्योंकि उस के सिक्के के दूसरी और शिव की मानवमूर्ति, अंकित है, जिस के हाथ में त्रिशूल है तथा बैल का चिह्न बना है। (शै० बै० पु० १६४)

उक्त कथनों के प्रकाश में हमारा ध्यान ऋषभ और शिव की ओर जाता है। मोहन्जोदड़ो और हड़प्पा से प्राप्त नग्न योगी की मूर्ति जिसे श्री रामप्रसाद चन्दा और डॉ० रामचन्द्रन ऋषभ की मूर्ति होने की संभावना व्यक्त करते हैं, तथा शिव की मूर्ति का पाया जाना और उस पर डॉ० राधाकुमुद मुखर्जी का यह लिखना कि यदि उक्त मूर्ति या ऋषभ का ही पूर्व-रूप है तो शैव धर्म का मूल भी ताम्रयुगीन सभ्यता तक जाता है और इस से सिन्धु सम्यता एवं ऐतिहासिक भारतीय सभ्यता के बीच की खोई हुई कड़ी का भी एक उभय साधारण सांस्कृतिक परम्परा के रूप में कुछ उद्धार हो जाता है, विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उभय शब्द से ऋषभ और शिव को लेने पर दोनों के मध्य एक साधारण साँस्कृतिक परम्परा का रूप सामने आता है, क्योंकि दोनों के कुछ वाह्य रूपों में, आँशिक समानता है। ऋषभ देव का चिह्न बैल है जो मोहन्जोदड़ो से प्राप्त सील न!, ३ से ५ तक पर अंकित है तथा कार्योत्सर्ग मुद्रा में अंकित प्रकृतियों के साथ भी अंकित है। उधर शिव का भी वाहन बैल है। इधर ऋषभदेवा का निर्वाण कैलास पर्वत से माना जाता है, उधर शिव भी कैलासवासी माने जाते हैं।

इस पर से यह कल्पना होती है कि दोनों का मूल एक तो नहीं है अथवा एक ही मूल पुरुष को दो परम्पराओं ने अपने-अपने रूप में स्वीकार तो नहीं किया ।

डा० भण्डारकार शिव के साथ उमा के योग को उत्तरकालीन बतलाते हैं, उमा का नाम तो उपनिषद में आया है और उसे हैमवती-हिमवत् की पुत्री बतलाया है किन्तु शिव या रुद्र की पत्नी नहीं बतलाया है।

इस विषय पर विशेष प्रकाश डालने के लिये वेदों की ओर आना होगा। ऋगवेद में २—33-15 रुद्रसूक्त में एक ऋचा है।

एव वस्त्रो वृषभ चेकितान यथा देव न हणोणे न हँसी।

हे वृषभ! ऐसी कृपा करो कि हम कभी नष्ट न हों।

आगे चलकर वैदिक देवता रुद्र ने शिव का रूप ले लिया और वे पशुपति कहलाये। किन्तु तांडय और प्राजपथ ब्रह्मा में ऋषभ को पशुपति कहा है। यथा-

ऋषमेवा पशुनामधिपति (तां.ब्रा.- १४-२-५)

ऋषमेवा पशुनां प्रजापति: (प्रजा. प्रा. ५,२-५-१७

पशु शब्द का अर्थ प्रात: बा. ६-२-१-२ में इस प्रकार किया है-

(अग्नि) एतान् पन्वच् पशूनपश्चत्। पुरुषमश्चं भविमजमं। यदपश्यत्तरुमादेजे पशव:।

अर्थात् अग्नि ने (प्रजापति ने) पुरुष, अश्व, गौ, भेड़ बकरी को देखा। क्योंकि इन को देखा, इसलिये ये पशु कहलाये।

संस्कृत में देखना अर्थवाली दृश् धातु के स्थान में पश्य', आदेश होता है। बाह्य ग्रन्थों में पशु शब्द के अर्थ इस प्रकार पाये जाते हैं-

श्री वै पशान. (ता. बा. १३-२-३)

पशवो यश: (प्रात. ब्रा. १-८-१-३८)

शान्ति: पशव: (ता. ४-५-१८)

पशवो वै राय: (प्रात. ब्रा ३, ३-1-8)

आत्मा वै पशु: (कौ स्यब्रा १२-7)

अर्थात् श्री, यश, शान्ति. धन, आत्मा आदि अनेक अर्थो में पशु शब्द का व्यवहार वैदिक साहित्य में हुआ है। अत: पशुपति का अर्थ हुआ-पूजा, श्री, यश, धन, आत्मा आदि का स्वामी। और ऋषभ पशुपति हैं। इसी तरह महाभारत, अनु- शासन पर्व में महादेव के जमों में शिव के साथ ऋषभ नाम भी है। यथा ऋषभत्वं पवित्राणां योगिनां निष्कल: शिव:। (अ.१४, श्रलो १८)

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

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जैनधर्म का इतिहास

१. इतिहास

१ आरम्भ काल

एक समय था जब जैनधर्म को बौद्धधर्म की शाखा समझ लिया गया था। किन्तु अब वह भ्रान्ति दूर हो बुरी है और नई खोजों के फलस्वरूप यह प्रमाणित हो चुका है कि जैनधर्म बौद्ध धर्म से न केवल एक पृथक् और स्वतन्त्र धर्म है किन्तु उस से बहुत 'प्राचीन भी है अब अन्तिम तीर्थ-दूर भगवान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक नहीं माना जाता और उन से अढ़ाई सौ वर्ष पहले होने वाले भगवान पार्श्वनाथ को एक ऐतिहासिक महापुरुष स्वीकारकर (१ इस भ्रान्ति को दूर करने का श्रेय स्व० डा० हर्मान याकोवी को प्राप्त है। उन्होंने अपनी जैनसूत्रों की प्रस्तावना में इस पर विस्तृत विचार किया है। वे लिखते हैं- ''इस बात से अब सब सहमत हैं कि लालपुल, जो महावीर अथवा वर्धमान के नाम से प्रसिद्ध हैं, बुद्ध के समकालीन थे। बौद्ध-ग्रन्थों में मिलने वाले उल्लेख हमारे इस विचार को दृढ़ करते हैं कि नातपुत्त से पहले भी निर्ग्रन्थों का जो आज जैन अथवा अहित के नाम से अधिक प्रसिद्ध है, अस्तित्व था। जब बौद्धधर्म उत्पन्न हुआ तब निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक बडे सम्प्रदाय के रूप में गिना जाता होगा। बौद्ध पिटकों में कुछ निर्ग्रन्थों का बुद्ध और उस के शिष्यों के विरोधी के रूप में और कुछ का बुद्ध के अनुयायी बन जाने के रुप में वर्णन आता है। उस के ऊपर से हम उक्त बात का अनुमान कर सकते हैं। इस के विपरीत इन अन्यों से किसी भी स्थान पर ऐसा कोई उल्लेख या सूचक वाक्य देखने में नहीं आता कि निर्ग्रन्थों का सम्प्रदाय एक नवीन सम्प्रदाय है और नातपुत्त उस के संस्थापक हैं। इस के ऊपर से हम अनुमान कर सकते हैं कि बुद्ध के जन्म से पहले अतिप्राचीन काल से निर्ग्रन्थों का अस्तित्व चला आता है।'') लिया गया है। इस तरह अब जैनधर्म का आरम्भ-काल 'सुनिश्चित रीति से ईस्वी सन् से ८०० वर्ष पूर्व मान लिया गया है। किन्तु जहाँ अब कुछ विद्वान भगवान पार्श्वनाथ को जैनधर्म का संस्थापक मानते हैं वहाँ कुछ विद्वान ऐसे भी हैं जो उस से पहले भी जैन- धर्म का अस्तित्व मानते हैं। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध जर्मन विद्वान स्व० डॉ० हर्मन याकोबी और प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक सर राधाकृष्णन् का मत उल्लेखनीय है। डॉ. याकोबी लिखते हैं- 'इन में कोई भी सबूत नहीं है कि पार्श्वनाथ जैनधर्म के संस्थापक थे। जैन परम्परा प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव को जैन-धर्म का संस्थापक मानने में एक मत हैं। इस मान्यता में ऐतिहासिक सत्य की सम्भावना है।'

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(१ उत्तराध्ययन सूत्र के प्राक्कथन में डॉ. चार्पेन्टर लिखते हैं-''हमें स्मरण रखना चाहिये कि जैनधर्म भ० महावीर से प्राचीन है और महावीर के आदरणीय पूर्वज पार्श्वनाथ निश्चित रूप से एक वास्तविक व्यक्ति के रूप में वर्तमान थे। अतः जैनधर्म के मूल सिद्धान्त भ ० महावीर से बहुत पहले निर्धारित हो चुके थे'। विवलोग्राफिया जैन की प्रस्तावना में, डा० गैरीनाट लिखते हैं- इसमें कोई संदेह नहीं है कि पार्श्वनाथ एक ऐतिहासिक व्यक्ति थे। जैन मान्यता के अनुसार वे सौ वर्ष- तक जीवित रहे और महावीर से २५० वर्ष पूर्व निर्वाण को प्राप्त हुए। अतः उन का कार्य- काल ईस्वी सन् से ८०० वर्ष. पूर्व था। महावीर के माता-पिता पार्श्वनाथ के धर्म को मानते थे।'')

डॉ. सर राधाकृष्णन् कुछ विशेष जोर 'देकर लिखते हैं- 'जैन परम्परा ऋषभदेव से अपने धर्म की उत्पत्ति होने का कथन करती है, जो बहुत सी शताब्दियों पूर्व हुए हैं। इस बात के प्रमाण पाये जाते हैं कि ईस्वी पूर्व प्रथम शताब्दी में प्रथम तीर्थंकर ऋषभ- देव की पूजा होती थी। इस में कोई सन्देह नहीं है कि जैनधर्म वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी पहले प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभ-देव, अजितनाथ और अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थंकरों के नामों का निर्देष है। भागवत पुराण भी इस बात का समर्थन करता है कि ऋषभदेव जैनधर्म के संस्थापक थे।'

उक्त दो मतों से यह बात निर्विवाद हो जाती है कि भगवान पार्श्वनाथ भी जैनधर्म के संस्थापक नहीं थे और उन से पहले भी जैनधर्म प्रचलित था। तथा जैन परम्परा श्रीऋषभदेव को अपना प्रथम तीर्थंकर मानती है और जैनेतर साहित्य तथा उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री से भी इस बात की पुष्टि होती है। नीचे इन्हीं बातों को स्पष्ट किया जाता है।

जैन परम्परा

जैन परम्परा के अनुसार हमारे इस दृश्यमान जगत में काल का चक्र सदा घूमा करता है। यद्यपि काल का प्रवाह अनादि और अनन्त है तथापि उस कालचक्र के छ: विभाग हैं-१ अतिसुस्वरूप, २ सूखरूप, ३ सुख-दुःखरूप, ४ दुःखसुखरूप, ५ दुखरूप और ६ अतिदुःखरूप। जैसे चलती हुई गाड़ी के चक्र का प्रत्येक भाग नीचेसे

ऊपर और ऊपर में नीचे जाता आता है वैसे ही ये छः भाग भी क्रमवार सदा घूमते रहते हैं। अर्थात् एक बार जगत् सुख से दुःख- की ओर जाता है तो दूसरी बार दुःख से सुख की ओर बढ़ता है।

सुख से दुःख की ओर जाने को अवसर्पिणीकाल या अवनति-काल कहते हैं और दुःख से सुख की ओर जाने को उत्सर्पिणी-काल या विकास काल कहते हैं। इन दोनो कालों की अवधि लाखों करोड़ों वर्षों से भी अधिक है। प्रत्येक अवसर्पिणी और उत्सर्पिणीकाल के दुखसुखरूप भाग में २४ तीर्थंकरों का जन्म होता है, जो 'जिन' अवस्था को प्राप्त कर के जैनधर्म का उपदेश देते हैं। इस समय अवसर्पिणीकाल चालू है। उस के प्रारम्भ के चार विभाग बीत चुके हैं और अब हम उसके पाँचवें विभाग में से गुजर रहे हैं। चूँकि चौथे विभाग का अन्त हो चुका, इसलिये इस काल में अब कोई तीर्थंकर नहीं होगा। इस युग के २४ तीर्थंकरों में से भगवान ऋषभदेव प्रथम तीर्थङ्कर थे और भगवान महावीर अन्तिम तीर्थंकर थे। तीसरे कालविभागों में जब तीन वर्ष ८।। माह शेष रहे तब ऋषभदेव का निर्वाण हुआ और चौथे कालविभाग में जब उतना ही काल शेष रहा तब महावीर का निर्वाण हुआ। दोनों का अन्तरकाल एक कोटा-कोटी सागर बतलाया जाता है। इस तरह जैन परम्परा के अनुसार इस युग में जैनधर्म के प्रथम प्रवर्तक भगवान ऋषभदेव थे। प्राचीन से प्राचीन जैनशास्त्र इस विषय में एक मत हैं और उन में ऋषभदेव का जीवन-चरित्र बहुत विस्तार से वर्णित है।

जैनेतर साहित्य

जैनेतर साहित्य में भी श्रीमद्भागवत का नाम उल्लेखनीय है। इस के पांचवे स्कन्ध के अध्याय २-६ में ऋषभदेव का सुन्दर वर्णन है, जो जैन साहित्य के वर्णन से कुछ अंश में मिलता-जुलता हुआ भी है। उस में लिखा है जब ब्रह्मा ने देखा कि मनुष्य संख्या नहीं बढ़ी तो उसने स्वयंभू मनु और सत्यरूपा को उत्पन्न किया। उन के प्रियव्रत नाम का लड़का हुआ। प्रियव्रत का पुत्र अग्नीध्र हुआ। अग्नीध्र के धर नाभि ने जन्म लिया। नाभि ने मरुदेवी से विवाह किया और उस से ऋषभदेव उत्पन्न हुए। ऋषभदेव ने इन्द्र के द्वारा दी गई जयन्ती नाम की भार्या से सौ पुत्र उत्पन्न किये, और बड़े पुत्र भरत का राज्याभिषेक कर के संन्यास ले लिया।

उस समय केवल शरीर मात्र उन के पास था और वे दिगंबर वेष में नग्न विचरण करते थे। मौन से रहते थे, कोई डराये, मारे, ऊपर थूकें, पत्थर फेंके, मूत्र- विष्ठा फेंके तो इन सब की ओर ध्यान नहीं देते थे। यह शरीर असत् पदार्थों का घर है ऐसा समझकर अहंकार ममकार का त्याग कर के अकेले भ्रमण करते थे। उनका कामदेव के समान सुन्दर शरीर मलिन हो गया था। उन का क्रियाकर्म बड़ा भयानक हो गया था। शरीरादिक का सुख छोड्‌कर उन्होंने 'आजगर' व्रत ले लिया था। इस प्रकार कैवल्यपति भगवान ऋषभदेव निरन्तर परमआनन्द का अनुभव करते हुए भ्रमण करते-करते कौंक, वेंक कुटक दक्षिण कर्नाटक देशों में अपनी इच्छा से पहुंचे, और कुटकाचल पर्वत के उपवन में उन्मत्त की नाई नग्न होकर विचरने लगे। जंगल में बाँसों की रगड़ से आग लग गई और उन्होंने उसी में प्रवेश कर के अपने को भस्म कर दिया।'

इस तरह ऋषभदेव का वर्णन कर के भागवतकार आगे लिखते हैं- 'इन ऋषभदेव के चरित्र को सुनकर कोंक, बेंक, कुटक देशों का राजा अर्हन् उन्हीं के 'उपदेश को लेकर कलियुग में जब अधर्म बहुत हो जायगा तब स्वधर्म को छोड्‌कर कुपथ पाखंड (जैनधर्म) का प्रवर्तन करेगा। तुच्छ मनुष्य माया से विमोहित होकर, शौच आचार को छोड्‌कर ईश्वर की अवज्ञा करनेवाले व्रत धारण करेंगे। न स्नान न आचमन, ब्रह्म, ब्राह्मण, यज्ञ सब के निन्दक ऐसे पुरुष होंगे और वेद-विरुद्ध आचरण कर के नरक में गिरेंगे। यह ऋषभावतार रजोगुण से व्याप्त मनुष्यों को मोक्षमार्ग सिखलाने के लिये हुआ।'

श्रीमद्‌भागवत के उक्त कथन में से यदि उस अन्श को निकाल दिया जाये, जो कि धार्मिक विरोध के कारण लिखा गया है तो उस से बराबर यह ध्वनित होता है कि ऋषभदेवने ही जैनधर्म का उपदेश दिया था क्योंकि जैन तीर्थंकर ही केवलज्ञान को प्राप्तकर लेने पर 'जिन' अर्हत् आदि नामों से पुकारे जाते हैं और उसी अवस्था में वे धर्मोपदेश करते हैं जोकि उन की उस अवस्था के नाम पर जैनधर्म या आर्हत धर्म कहलाता है।

सम्भवत: दक्षिण में जैनधर्म का अधिक प्रचार देखकर भागवतकार ने उक्त कल्पना कर डाली है। यदि वे सीधे ऋषभदेव से ही जैनधर्म की उत्पत्ति बतला देते तो फिर उन्हें जैनधर्म को बुरा भला कहने का अवसर नहीं मिलता। अस्तु, श्रीमदभागवत ने ऋषभदेवजी के द्वारा उन के पुत्रों को जो उपदेश दिया गया है वह भी बहुत अंश में जैनधर्म के अनुकूल ही है। उस का सार निम्न प्रकार है-

(१) हे पुत्रो ! मनुष्यलोक में शरीरधारियों के बीच में यह शरीर कष्टदायक है, भोगने योग्य नहीं है। अत: दिव्य तप करो, जिस से अनन्त सुख की प्राप्ति होती है।

(२) जो कोई मेरे से प्रीति करता है, विषयी जनों से, स्त्री से, पुत्र से और मित्र से प्रीति नहीं करता, तथा लोक में प्रयोजनमात्र आसक्ति करता है वह समदर्शी प्रशान्त और साधु है।

(३) जो इन्द्रियों की तृप्ति के लिये परिश्रम करता है उसे हम अच्छा नहीं मानते; क्योंकि यह शरीर भी आत्मा को क्लेशदायी है।

(४) जब तक साधु आत्मतत्व को नहीं जानता तब तक वह अज्ञानी है। जब तक यह जीव कर्मकाण्ड करता रहता है तब तक सब कर्मों का शरीर और मन द्वारा आत्मा से बन्ध होता रहता है।

(५) गुणों के अनुसार चेष्टा न होने से विद्वान् प्रमादी हो, अज्ञानी बनकर, मैथुनसुखप्रधान घर में बस कर अनेक संतापों को प्राप्त होता है।

(६) पुरुष का स्त्री के प्रति जो कामभाव है यही हुदय की ग्रन्थि है। इसी से जीव को घर, खेत, पुत्र, कुटुम्ब और धन से मोह होता है।

(७) जब हृदय की सन्धि को बनाये रखनेवाले मन का बन्धन शिथिल हो जाता है तब यह जीव संसार से छूटता है और मुक्त होकर परमलोक को प्राप्त होता है।

(८) जब सार असार का भेद कराने वाली व अज्ञानान्धकार का नाश करने वाली मेरी भक्ति करता है और तृष्णा, सुख दुःख का त्याग कर तत्व को जानने की इच्छा करता है, तथा तप के द्वारा सब प्रकार की चेष्टाओं की निवृत्ति करता है तब मुक्त होता है।

(९) जीवों को जो विषयों की चाह है यह चाह ही अन्धकूप के समान नरक में जीव को पटकती है ।

( १०) अत्यन्त कामनावाला तथा नष्ट दृष्टिवाला यह जगत अपने कल्याण के हेतुओं को नहीं जानता है।

( ११) जो कुबुद्धि सुमार्ग छोड़ कुमार्ग में चलता है उसे दयालु विद्वान कुमार्ग में कभी भी नहीं चलने देता।

( १२) हे पुत्रो ! सब स्थावर जंगल जीवमात्र को मेरे ही समान समझकर भावना करना योग्य है।

ये सभी उपदेश जैनधर्म के अनुसार हैं। इन में नम्बर ४ का उपदेश तो खास ध्यान देने योग्य है, जो कर्मकाण्ड को बन्ध का कारण बतलाता है। जैनधर्म के अनुसार मन, वचन और काय का निरोध किये बिना कर्मबन्धन से छुटकारा नहीं मिल सकता। किन्तु वैदिक धर्मों में यह बात नहीं पाई जाती।

शरीर के प्रति निर्ममत्व होना, तत्वज्ञान पूर्वक तप करना, जीवमात्र को अपने समान समझना, कामवासना के फन्दे में न फँसना, ये सब तो वस्तुत: जैनधर्म ही है। श्रीमद्‌भागवत के अनुसार भी श्री ऋषभदेव से ही जैन धर्म का उद्‌गम हुआ ऐसा स्पष्ट ध्वनित होता है। अन्य हिन्दू पुराणों में भी जैनघर्म की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रायः इसी प्रकार का वर्णन पाया जाता है। ऐसा एक भी ग्रन्थ अभी तक देखने- में नहीं आया, जिस में वर्धमान या पार्श्वनाथ से जैनधर्म की उत्पत्ति बतलाई गई हो। यद्यपि उपलब्ध पुराण साहित्य प्राय: महावीर के बाद का ही है, फिर भी उस में जैनधर्म की चर्चा होते हुए भी महावीर या पार्श्वनाथ का नाम तक नहीं पाया जाता। इस से भी इसी बात की पुष्टि होती है कि हिन्दू परम्परा भी इस विषय में एक मत है कि जैनधर्म के संस्थापक ये दोनों नहीं हैं।

इस के सिवा हम यह देखते हैं कि हिन्दू धर्म के अवतारों में अन्य भारतीय धर्मों के पूज्य पुरुष भी सम्मिलित कर लिये गये हैं, यहाँ तक कि ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी में होनेवाले बुद्ध को भी उस में सम्मिलित कर लिया गया है जो बौद्धधर्म के संस्थापक थे। किन्तु उन्हीं के समकालीन वर्धमान या महावीर को उस में सम्मिलित नहीं किया है, क्योंकि वे जैनधर्म के संस्थापक नहीं थे। जिन्हें हिन्दू परम्परा जैनधर्म का संस्थापक मानती थी वे श्रीऋषभदेव पहले से ही आठवें अवतार माने हुए थे। यदि श्रीबुद्ध की तरह महावीर भी एक नये धर्म के संस्थापक होते तो यह संभव नहीं था कि उन्हें छोड़ दिया जाता। अत: उन के सम्मिलित न करने और ऋषभदेव के आठवें अवतार माने जाने से भी इस बात का समर्थन होता है कि हिन्दू परम्परा में अति प्रचीनकाल से ऋषभदेव को ही जैन- धर्म के संस्थापक के रूप में माना जाता है। यही वजह है जो उन के बाद में होनेवाले अजितनाथ और अरिष्टनेमि नाम के तीर्थंकरों का निर्देश यजुर्वेद में मिलता है।

ऐतिहासिक सामग्री

इस प्रकार जैन और जैनेतर साहित्य से यह स्पष्ट है कि भगवान् ऋषभदेव ही जैनधर्म के आद्य प्रवर्तक थे। प्राचीन शिलालेखों से भी यह बात प्रमाणित है कि श्रीऋषभदेव जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर थे और भगवान महावीर के समय में भी ऋषभदेव की मूर्तियों की पूजा जैन लोग करते थे। मथुरा के कंकाली नामक टीले की खुदाई में डाक्टर फूहरर को जो जैन शिलालेख प्राप्त हुए वे करीब दो हजार वर्ष प्राचीन है, और उनपर इन्डोसिथियन राजा कनिष्क हुविष्क और वासुदेव का सम्वत् है। उस में भगवान ऋषभदेव की पूजा के लिये दान देने का उल्लेख है।

श्रीविसेण्ट' ए० स्मिथ का कहना है कि 'मथुरा से प्राप्त सामग्री लिखित जैन परम्परा के समर्थन के विस्तृत प्रकाश डालती है और जैनधर्म की प्राचीनता के विषय में अकाट्‌य प्रमाण उपस्थित करती हे। तथा यह बतलाती है कि प्राचीन समय में भी वह अपने इसी रूप में मौजूद था। ईस्वीसन् के प्रारम्भ में भी अपने विशेष चिह्नों के साथ चौबीस तीर्थंकरों की मान्यताओ में दृढ़ विश्वास था'।

इन शिलालेखों से भी प्राचीन और महत्वपूर्ण शिलालेख खण्डगिरि उदयगिरि उड़ीसा की हाथी गुफा से प्राप्त हुआ है जो जैउन सम्राट खारवेल ने लिखाया था। इस २१०० वर्ष प्राचीन जन शिलालेख से स्पष्ट पता चलता है कि मगधाधिपति पुष्यमित्र का पूर्वाधिकारी राजा नन्द कलिंग जीतकर भगवान श्रीऋषभदेव की मूर्ति, जो कलिंग राजाओं की कुलक्रमागत बहुमूल्य अस्थावर सम्पत्ति थी, जयचिह्न स्वरूप ले गया था। वह प्रतिमा खारवेल ने नन्दराजा के तीन सौ वर्ष बाद पुष्यमित्र से प्राप्त की। जब खारवेल ने मगध पर चढाई की और उसे जीत लिया तो मगधाधिपति पुष्यमित्र ने खारवेल को वह प्रतिमा लौटाकर राजी कर लिया। यदि जैनधर्म का आरम्भ भगवान महावीर या भगवान पार्श्वनाथ के द्वारा हुआ होता तो उन से कुछ ही समय बाद की या उन के समय की प्रतिमा उन्हीं की होती। परन्तु जब ऐसे प्राचीन शिलालेख में आदि तीर्थंकर की प्रतिमा का स्पष्ट और प्रामाणिक उल्लेख इतिहास के साथ मिलता है तो मानना पड़ता है कि श्रीऋषभदेव के प्रथम जैन तीर्थंकर होने की मान्यता में तथ्य अवश्य है।

अब प्रश्न यह है कि वे कब हुए?

ऊपर बतलाया गया है कि जैन परम्परा के अनुसार प्रथम जैन तीर्थंङ्कर श्रीऋषभदेव इस अवसर्पिणीकाल के तीसरे भाग में हुए, और अब उस काल का पाँचवाँ भाग चल रहा है अत: उन्हें हुए लाखों करोड़ वर्ष हो गये। हिन्दू परम्परा के अनुसार भी जब ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में स्वयंभू मनु और सत्यरूपा को उत्पन्न किया तो ऋषभदेव उन से पाँचवीं पीढ़ी में हुए। और इस तरह वे प्रथम सतयुग के अन्त में हुए। तथा अब तक २८ 'सतयुग बीत गये हैं। इस में भी उन के समय की सुदीर्घता का अनुमान लगाया जा सकता है। अत: जैनधर्म का आरम्भकाल बहुत प्राचीन है। भारतवर्ष ' में जब आर्यों का आगमन हुआ उस समय भारत में जो द्रविड़ सभ्यता फैली हुई थी, वस्तुत: वह जैन सभ्यता ही थी। इसी से जैन परम्परा में बाद को जो संघ कायम हुए उन में एक द्रविड़ संघ भी था।

२ ऋषभदेव

काल के उक्त छ: भागो में से पहले और दूसरे भाग में न कोई धर्म होता है, न कोई राजा और न कोई समाज। एक परिवार में पति और पत्नी ये दो ही प्राणी होते हैं। पास में लगे वृक्षों से, जो कल्पवृक्ष कहे जाते हैं उन्हें अपने जीवन के लिए आवश्यक पदार्थ प्राप्त हो जाते हैं, उसी में वे प्रसन्न रहते हैं। मरते समय एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म देकर वे दोनों चल बसते हैं। दोनों बालक अपना-अपना अंगूठा चूसकर बड़े होते हुए और बड़े होने पर पति और पत्नी रूप से रहने लगते हैं। तीसरे काल का बहुभाग बीतने तक यही कम रहता है ओर इसे भोग-भूमिकाल कहा जाता है-क्योंकि उस समय के मनुष्यों का जीवन भोग-प्रधान रहता है। उन्हें अपने जीवन-निर्वाह के लिए कुछ भी उद्योग नहीं करना पड़ता। किन्तु इस के बाद परिवर्तन प्रारम्भ होता है। धीरे-धीरे उन वृक्षों से आवश्यकता की पूर्ति के लायक सामान मिलना कठिन हो जाता है और परस्पर में झगडे होने लगते हैं। तब चौदह मनुओं की उत्पत्ति होती है। उन में से पाँचवाँ मनु वृक्षों की सीमा निर्धारित कर देता है। जब सीमा पर भी झगड़ा होने लगता है तो छठवाँ मनु सीमा के स्थान पर चिह्न बना देता है। तब तक पशुओं से काम लेना कोई नहीं जानता था और न उन की कोई आवश्यकता थी। किन्तु अब आवश्यक होने पर सातवाँ मनु घोडों पर चढ़ना वगैरह सिखाता है। पहले माता पिता सन्तान को जन्म देकर मर जाने थे। किन्तु अब ऐसा होना बन्द हो गया तो आगे के मनु बच्चों के लालन- पालन आदि का शिक्षण देते हैं। इधर-उधर जाने का काम पड़ने पर रास्ते में नदियों पड़ जाती थी, उन्हें पार करना कोई नहीं जानता था। तब बारहवाँ मनु पुल, नाव वगैरह के द्वारा नदी पार करने की शिक्षा देता है।

पहले कोई अपराध ही नहीं करता था, अत: दण्ड व्यवस्था की भी आवश्यकता नहीं पड़ती थी। किन्तु जब मनुष्यों की आवश्यकता पूर्ति में बाधा पड़ने लगी तो मनुष्यों में अपराध करने की प्रवृत्ति भी शुरू हो गई। अत: दण्ड व्यवस्था की आवश्यकता हुई। प्रथम के पाँच मनुओं के समय केवल 'हा' कह देना ही अपराधी के लिए काफी होता था। बाद को जब इतने से काम नहीं चला तो 'हा', अब ऐसा काम मत करना' यह दण्ड निर्धारित करना पड़ा। किन्तु जब इतने से भी काम नहीं चला तो अन्त के पाँच कुलकरो के समय में 'धिक्कार' पद और जोड़ा गया। इस तरह चौदह मनुओं ने मनुष्यों की कठिनाइयों को दूर करके सामाजिक व्यवस्था का सूत्रपात किया। चौदहवें मनु का नाम नाभिराय था। इन के समय में उत्पन्न होने वाले बच्चों का नाभिनाल अत्यन्त लम्बा होने लगा तो इन्होंने उस को काटना बतलाया। इसलिए इस का नाम नाभि पड़ा। इन की पत्नी का नाम मरुदेवी था। इन से श्रीऋषभदेव का जन्म हुआ। यही ऋषभदेव इस युग में जैनधर्म के आद्य प्रर्वतक हुए। इन के समय में ही ग्राम नगर आदि की सुव्यवस्था हुई।' इन्होंने ही लौकिक शास्त्र लोकव्यवहार की शिक्षा दी और इन्होंने ही उस धर्म की स्थापना की जिस का मूल अहिंसा है। इसीलिए इन्हें आदि ब्रह्मा भी कहा गया है।

जिस समय ये गर्भ में थे, उस समय देवताओं ने स्वर्ण वृष्टि की इसलिये इन्हें 'हिरण्यगर्भ' भी कहते हैं। इन के समय में प्रजा के सामने जीवन की समस्या विकट हो गई थी, क्योंकि जिन वृक्षों से लोग अपना जीवन निर्वाह करते आये थे वे लुप्त हो चुके थे और जो नई वनस्पतियाँ पृथ्वी में उगी थी, उन का उपयोग करना नहीं जानते थे। इन्होंने उन्हें उगे हुए इक्षु दण्डों से रस निकालकर खाना सिखलाया। इसलिए इन का वंश इक्ष्वाकु वंश के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और ये उस के आदि पुरुष कहलाये। तथा' प्रजा को कृषि, असि, मषी, शिल्प,वाणिज्य और विद्या इन षट्‌कर्मों में आजीविका करना बतलाया। इसलिए इन्हें प्रजापति भी कहा जाता है। सामाजिक व्यवस्था को चलाने के लिए इन्होंने तीन वर्गों की स्थापना की। जिन को रक्षा का भार दिया गया वे क्षत्रिय कहलाये। जिन्हें खेती, व्यापार, गोपालन आदि के कार्य में नियुक्त किया गया वे वैश्य कहलाये। और जो सेवावृत्ति करने के योग्य समझे गये उन्हें शूद्र नाम दिया गया।

भगवान् ऋषभदेव के दो पत्नियाँ थी-एक का नाम सुनन्दा था और दूसरी का नन्दा। इन से उन के सौ पुत्र और दो पुत्रियाँ हुई। बड़े पुत्र का नाम भरत था। यही भरत इस युग में भारत- वर्ष के प्रथम चक्रवर्ती राजा हुए।

एक दिन भगवान् ऋषभदेव राज सिंहासन पर विराजमान थे। राजसभा लगी हुई थी और नीलांजना नाम की अप्सरा नृत्य कर रही थी। अचानक नृत्य करते करते नीलान्जना का शरीरपात हो गया। इस आकस्मिक घटना से भगवान का चित्त विरक्त हो उठा। तुरन्त सब पुत्रों को राज्यभार सौंप कर उन्होंने प्रव्रज्या ले ली और छ माह की समाधि लगाकर खडे हो गये। उन की देखादेखी और भी अनेक राजाओं ने दीक्षा ली। किन्तु वे भूख-प्यास के कष्ट को न सह सके और भ्रष्ट हो गये। छ माह के बाद जब भगवान की समाधि भंग हुई तो आहार के लिए उन्होंने बिहार किया। उन के प्रशान्त नग्न रूप को देखने के लिए प्रजा उमड़ पड़ी। कोई उन्हें वस्त्र भेंट करता था, कोई भूषण मेट करता था, कोई हाथी घोड़े लेकर उन की सेवा में उपस्थित होता था। किन्तु उन को भिक्षा देने की विधि कोई नहीं जानता था। इस तरह घूमते-घूमते ६ माह और बीत गये।

इसी तरह घूमते-घूमते एक दिन ऋषभदेव हस्तिनापुर में जा पहुंचे। वहाँ का राजा श्रेयांस बडा दानी था। उसने भगवान का बड़ा आदर सत्कार किया। आदरपूर्वक भगवान को प्रतिग्रह कर के उच्चासन पर बैठाया, उन के चरण धोये, पूजन की और फिर नमस्कार कर के बोला- भगवान्? यह इक्षु रस प्रासुक है, निर्दोष है इसे आप स्वीकार करें। तब भगवान ने खड़े होकर अपनी अन्जलि में रस लेकर पिया। उस समय लोगों को जो आनन्द हुआ वह वर्णनातीत है। भगवान का यह आहार वैशाख शुक्ला तीज के दिन हुआ था। इसी से यह तिथि 'अक्षय तृतीया' कहलाती है। आहार कर के भगवान् फिर वन को चले गये और आत्म ध्यान में लीन हो गये। एक बार भगवान 'पुरिमताल' नगर के उद्यान में ध्यानस्थ थे। उस समय उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हुई। इस तरह 'जिन' पद प्राप्त कर के भगवान बड़े भारी समुदाय के साथ धर्मोपदेश देते हुए विचरण करने लगे। उनकी व्याख्यान सभा 'समव-सरण' कहलाती थी। उस की सब से बड़ी विशेषता यह थी कि उस में पशुओं तक को धर्मोपदेश सुनने के लिये स्थान मिलता था और सिंह जैसे भयानक जन्तु शान्ति के साथ बैठकर धर्मोपदेश सुनते थे। भगवान जो कुछ कहते थे सब की समझ में आ जाता था। इस तरह जीवनपर्यन्त प्राणिमात्र को उन के हित का उपदेश देकर भगवान ऋषभदेव कैलाश पर्वत से मुक्त हुए। वे जैनधर्म के प्रथम तीर्थंकर थे। हिन्दू पुराणों में भी उन का वर्णन मिलता है। इस युग में उन के द्वारा ही जैनधर्म का आरम्भ हुआ।

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(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)

सुखजीत सिंह कुक्कल की कलाकृति


अंदेशा
 
      ‘‘कांव-कांव’’, ‘‘कांव-कांव’’ - - -
सुबह खिड़की खोलते ही बागान में कौवे की बोली सुनायी पड़ जाने से वह अंदेशा में पड़ गया. करीब सात साल पहले उसने इसी तरह सुबह अपने मकान पर बैठे एक कौवे की बोली सुनी थी तो दोपहर में डाकिया आकर एक पोस्‍टकार्ड दे गया था. घर से चाचा ने लिखा था कि दादा नहीं रहें.

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     दुबारा करीब तीन साल पूर्व अपने बागान के अंदर एक कौवे की बोली सुनी थी. उस दिन उसकी ससुराल से सास, ससुर और साली आ गये थे. ससुराल के परिवार को आया देख कर उसे खुशी हुई थी. लेकिन गर्मी की पूरी छुट्‌टी बिता कर जब तक ससुराल वाले गये, तब तक उसका दिवाला निकल चुका था. छुट्‌टी तो बेकार हो ही चुकी थीं.
     पिछले माह भी उसने कौवे की बोली सुनी थी. और जब वह कार्यालय पहुंचा था तो चपरासी ने उसे एक पोस्‍टकार्ड दिया था. ससुर ने सूचित किया था कि उसकी पत्‍नी के बेटा हुआ है. बेटा होने की बात सुन कर उसके सहकर्मियों ने उसे घेरा तो मिठाई खाने के बाद ही छोड़ा. परिवार से लेकर पड़ोस तक बेटा होने की  बात जिसने सुनी, सबका मुंह मीठा कराना पड़ा.
     महीने का अंतिम सप्‍ताह चल रहा था. इसलिये कौवे का कांव-कांव सुन कर वह अंदेशा में पड़ गया था. पता नहीं क्‍या संदेशा आ जाये.
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अपना घर
                       
     जब से शादी हुई थी, वह प्रताड़ित जिंदगी जी रही थी. ससुराल में पति और सास अपना रोआब दिखाने से नहीं चूकते थे. ननद और देवर भी उसे आंखे दिखाने से नहीं चूकते थे.
     ससुराल से तंग आकर वह मैके चली गयी. वहां पूरी स्‍थिति से अवगत होने पर मां ने समझाया, ‘‘बेटी, यह तुम्‍हारे पिता का घर है. घूमने या भेंट करने के लिये तुम यहां आ सकती है. लेकिन जहां तक रहने की बात है, इसके लिये तुम्‍हें अपने पति के घर ही जाना होगा. हमारे समाज की यही व्‍यवस्‍था है.’’
     वह दूसरे दिन ही ससुराल वापस चली गयी. वहां प्रताड़नाओं का दौर फिर शुरू हो गया. ससुराल में रहना उसे दूभर हो गया. पिता के घर से वह पति के घर आयी थी. उसका अपना घर कोई नहीं था. अपने घर की तलाश में वह पति के घर से निकल गयी.
     अगले दिन लोगों ने देखा कि मुहल्‍ले के कुएँ में उसकी लाश तैर रही है.
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                                                            अंकुश्री
          प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,
          नामकुम, रांची-834 010

अनीस नियाजी की कलाकृति

बड़ा साहेब के आने की खबर मिलते शनिचरा बेचैन हो गया. अभी दस बज रहा है. साहेब दो बजे आयेंगे. यानी साहेब के आने में अभी चार घंटा बाकी है. वह सोचने लगा. चार-पांच तरह की सब्‍जियां, सूप, चटनी, सलाद, रोटी, चावल, दाल आदि बनाना होगा. वह तैयारी में लग गया. पानी बोझने के बाद वह चूल्‍हा जलाने लगा. अरे, लकड़ी तो फाड़ी हुई है ही नहीं. कुल्‍हाड़ी उठा कर वह जल्‍दी-जल्‍दी लकड़ी फाड़ने लगा.

साहेब के आगमन की बात सुन कर शनिचरा उनके भोजन की तैयारी में लग गया था. उसे यह भी याद नहीं रहा कि वह पिछले तीन दिनों से बीमार है और इस दौरान उसने कुछ खाया तक नहीं है.

शनिचरा की बीबी साहेब के आने की बात सुन कर बहुत खुश हुई. उसे जब पता चला कि साहेब नहीं, बड़ा साहेब आ रहे हैं तो उसकी खुशी आसमान चढ़ कर बोलने लगी थी. बड़ा साहेब के आने पर खाने-पीने की व्‍यवस्‍था ज्‍यादा अच्‍छी होती है. उसने शनिचरा से कहा, ‘‘जाओ ! जल्‍दी-जल्‍दी सब काम निपटाओ. मसाला पीसने और सब्‍जी काटने का काम मैं आकर कर दूंगी.’’ हर बार वह ऐसा ही करती थी. रेस्‍ट हाउस में जब कोई साहेब आ जाते थे, उसकी बीबी उसके कामों में पूरी सहायता करती थी.

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‘‘लेकिन आज हिम्‍मत नहीं कर रहा है.’’ रेस्‍ट हाउस में आने से पहले शनिचरा न बीबी से कहा था, ‘‘उठने पर सिर में चक्‍कर आ रहा है. लगता है, ऐसी हालत में कैसे काम कर सकूंगा.’’

‘‘साहेब आने वाले हैं इसलिये जाना तो पड़ेगा ही. उनके भोजन की व्‍यवस्‍था तो करनी ही होगी.’’ बीबी ने समझाते हुए धीरे से कहा था, ‘‘साहेब के आने से आज के भोजन की समस्‍या तो हल हो जायेगी.’’ और शनिचरा रेस्‍ट हाउस पहुंच कर काम में जुट गया था.

शनिचरा अनदिना में एक सांस में जितनी लकड़ी फाड़ लेता था, उतनी लकड़ी फाड़ने में आज वह बदहाल हो गया था. एक बार जब कुल्‍हाड़ी उठा कर वह लकड़ी पर वार करता था तो उसे लगता था कि कुल्‍हाड़ी का दूसरा वार लकड़ी पर नहीं कर सकेगा. लेकिन एक के बाद दूसरा, दूसरा के बाद तीसरा और फिर - - - इस तरह वह लकड़ी के कुंदे पर लगातार वार करता गया.

पौने दो बजे एक बार शनिचरा ने सारे कामों का मुआयना किया. उसने सब काम फीट-फाट कर दिया था. उसे संतोष हुआ कि समय से पहले ही उसने सारी तैयारियां पूरी कर ली है. सब्‍जी तैयार, दाल तैयार, मुर्गा तैयार, सब कुछ तैयार. आटा गुंथ कर रख दिया है और भात के लिये चूल्‍हे पर पानी भी तैयार है. साहेब के आते खौलते हुए पानी में चावल छोड़ देगा. दूसरे चूल्‍हे पर तवा रख कर फुलकी सेंक लेगा. पापड़ तो खाने के समय तला ही जाता है. इधर भात पसायेगा और उधर पापड़ के लिये तेल गरमा जायेगा.

साहेब दो बजे आयेंगे. अभी दस मिनट देर है. सारी तैयारी पूरी हो चुकी है. देह का पोर-पोर टूटा जा रहा है. साहेब के आने के बाद फुरसत कहां मिल पायेगी. अभी मौका है, क्‍यों न एक प्‍याली चाय पी ली जाये. यह सोच कर उसने चाय चढ़ा दी.

लकड़ी की तेज आंच, एक प्‍याली चाय का पानी तुरंत खौलने लगा. चीनी और चाय की पत्‍ती डाल कर शनिचरा ने जल्‍दी-जल्‍दी चाय छान ली. कुछ खाना तो दूर, सुबह से उसके गले में एक घूंट पानी भी नहीं उतरा था. उसका गला सूख रहा था. चाय की प्‍याली हाथ में थामते ही उसके मुंह में पानी भर आया.

प्‍याली से गरमा-गरम धुंआ उठ रहा था. चाय की प्‍याली से उठ रहे धुएं में शनिचरा को अपनी बीबी और बच्‍चे का चेहरा दिखाई देने लगा. वह सोचने लगा कि गरमा-गरम चाय पीकर वह अपना सूखा हुआ गला तर कर लेगा. लेकिन उसके बीबी-बच्‍चे की भूखा से ऐंठ रही अंतड़ियों की गरमी और बढ़ गयी होगी. बीबी तो रेस्‍ट हाउस में आयी भी थी. लेकिन मसाला पीसने और सब्‍जी काटने के बाद वह वापस चली गयी थी. उससे गलती हो गयी. उसने यही चाय यदि उस समय बनायी होती तो बीबी को भी एक प्‍याली मिल गयी होती. जाड़े के भूखे पेट में गरमा-गरम चाय जाती तो बीबी को कुछ राहत मिलता. लेकिन काम में उलझे रहने के कारण उसे इस बात का खयाल ही नहीं रहा. साला काम भी अजीब बला है, जब तक निपट नहीं जाये, दिमाग कुछ सोच ही नहीं पाता.

एक बार उसने सोचा कि क्‍यों न चाय की यह प्‍याली बीबी को दे आये. लेकिन उसने फिर तुरंत सोचा कि नहीं, साहेब आ गये तो ? साहेब के आने पर उपस्‍थित नहीं रहने से सब किये-कराये पर पानी फिर जायेगा. नहीं, वह ऐसी गलती नहीं करेगा. बीबी के लिये चाय लेकर जाने की बात उसने दिमाग से झटक दी. उसने सोचा कि साहेब के खाने के बाद बचा-खूचा खाना अपने घर ले जायेगा तो बीबी-बच्‍चा दोनों के गले उतरेगा. साहेब के आने और खाने में अब देर ही कितनी है ?

हाथ में चाय की प्‍याली पकड़ वह अपनी बीबी-बच्‍चा के बारे में सोच रहा था. उसने अभी चाय पीनी शुरू नहीं की थी. बीबी के लिये चाय लेकर घर नहीं जाना है, यह फैसला करने के बाद उसने चाय पीनी शुरू की. उसने अभी हाथ की प्‍याली होठों से लगायी ही थी उसे मोटर का हॉर्न सुनायी पड़ा. उसके कान खड़े थे. वह चौकस था. हाथ की प्‍याली स्‍वतः होठों से हट कर जमीन पर चली गयी.

प्‍याली एक तरफ सरका कर वह किचन से बाहर निकल आया. रेस्‍ट हाउस के गेट पर एक कार खड़ी थी. वह गेट की ओर दौड़ पड़ा. कार की अगली सीट पर ड्राइवर था. पिछली सीट पर साहेब और मेम साहेब बैठे हुए थे. गेट खोल कर उसने साहेब और मेम साहेब को अदब के साथ झुक कर प्रणाम किया. लेकिन साहेब और मेम साहेब आपसी वार्तालाप में व्‍यस्‍त थे. वे शनिचरा को तो देख रहे थे, लेकिन उसके अभिवादन को नहीं दख सकें. अभिवादन की स्‍वीकृति नहीं मिलने के बावजूद शनिचरा को किसी तरह की झेंप नहीं हुई. साहेबों को किये गये अभिवादन की अस्‍वीकृति से वह अभ्‍यस्‍त हो चुका था.

रेस्‍ट हाउस के सामने कार लग जाने पर ड्राइवर ने डिक्‍की खोल दी. शनिचरा डिक्‍की का सामान रेस्‍ट हाउस के अंदर पहुंचाने लगा. उसके बाद उसने साहेब लोगों के लिये चाय बनायी. जब वह चाय लेकर रेस्‍ट हाउस में गया तब तक साहेब और मेम साहेब यात्रा के कपड़े बदल चुके थे. साहेब ने कुरता-पाजामा पहना था और मेम साहेब मैक्‍सी पहनी हुई थी. दोनों टेबुल के आमने-सामने की कुर्सियां पर बैठे थे.

चाय का ट्रे टेबुल पर रखते समय मेम साहेब ने शनिचरा को टोका, ‘‘खाना तैयार है ?’’

जवाब देने के लिये शनिचरा मेम साहेब की ओर मुखातिब हुआ. झिल्‍लीदार मैक्‍सी के अंदर से मेम साहेब की पूरी देह दिखाई दे रही थी. जब शनिचरा की नज़र उनके अंगों पर पड़ी तो वह शरमा गया. ऐसी निर्लज्‍ज पोषाक कि शरीर का अंग-अंग दिखाई पड़े ! छीः-छीः ! शर्म के कारण शनिचरा ने मेम साहेब की ओर से मुंह फेर लिया. साहेब की ओर मुखातिब होकर उसने कहा, ‘‘खाना तैयार है सा‘ब, लाऊं क्‍या ?’’

‘‘खाना लगाने की तैयारी करो !’’ मेम साहेब ने कहा, ‘‘चाय पीने के पांच मिनट बाद खाना ले आना.’’ मेम साहेब की बातें सुन कर भी शनिचरा इस बार उनकी ओर नहीं ताका.

चुपचाप आदेश स्‍वीकार कर शनिचरा किचन में आ गया. मेम साहेब की पारदर्शी पोशाक और उसके अंदर से झांक रहे उनके अंग अब भी शनिचरा की आंखों के सामने घूम रहे थे. क्‍या पोशाक बनाने के लिये उन्‍हें पारदर्शी के अलावा और कोई कपड़ा ही नहीं मिला ! यदि मेम साहेब ऐसी पोशाक पहनती हैं तो साहेब उन्‍हें क्‍यों नहीं मना करतें ! शनिचरा सलाद काट रहा था और मेम साहेब की पोशाक के बारे में सोचे जा रहा था. तभी किचन में, उसके माथे के ऊपर दीवाल में लगी घंटी घनघना उठी. घंटी की आवाज कान में पड़ते उसके हाथ का चाकू सलाद के प्‍लेट में आ गया और वह रेस्‍ट हाउस की ओर दौड़ पड़ा. साहेब ने खाना निकालने के लिये घंटी बजायी थी.

शनिचरा ने खाना लगा दिया. खा चुकने के बाद साहेब ने जूठा बरतन हटाने के लिये घंटी बजायी. शनिचरा भाग कर गया. उसने देखा कि मेम साहेब अभी हाथ-मुंह नहीं धोयी हैं. साहब बेसिन के पास खड़ा होकर हाथ-मुंह धो रहे थे. मेम साहेब बैठी-बैठी खाने के प्‍लेट में ही हाथ-मुंह धो रही थीं. प्‍लेट पर नज़र पड़ते शनिचरा हैरत में पड़ गया. मेम साहेब जिस प्‍लेट में हाथ-मुंह धो रही थीं उसमें बहुत सारा जूठा खाना भरा हुआ था. टेबुल पर रखे भोजन के सभी बरतन प्रायः खाली हो चुके थे. उन बरतनों का खाना मेम साहेब अपने प्‍लेट में ले तो ली थीं, मगर खा नहीं पायी थीं. मेम साहेब को अंचाते देख कर शनिचरा ठिठक कर खड़ा हो गया. उसने देखा कि मेमसाहेब प्‍लेट में हांथ तो धो ही रही थीं, कुल्‍ला भी उसी में कर रही थीं. खाने के प्‍लेट में कुल्‍ला करते देख कर शनिचरा का मन घृणा से भर गया.

जूठा बरतन हटाने के बाद किचन में आने पर शनिचरा ने राहत की सांस ली. काम निपटा कर स्‍थिर होते ही उसे भूख महसूस होने लगी. भूख से उसकी अंतड़ियां मरोड़ रही थीं. साहेब की सेवा में लगे रहने के कारण उसे भूख का अहसास तक नहीं हो पाया था. साहब और मेम साहेब को खिलाने के बाद उसे अपनी बीबी और बच्‍चे की चिंता सताने लगी. उसने जल्‍दी-जल्‍दी साहेब के ड्राइवर को खिला दिया.

सबके खा चुकने के बाद एक आदमी लायक खाना बच रहा था. यदि मेम साहेब जूठन में इतना खाना बेकार नहीं करतीं तो बचा हुआ खाना तीन आदमी के लिये बहुत था. खाना एक आदमी के लिये ही बचा है तो क्‍या हुआ ? उसी में बांट कर खा लेगा. बचा हुआ खाना घर ले जाने के लिये उसने एक प्‍लेट में निकाल लिया.

खाने का प्‍लेट लेकर शनिचरा रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट से अपने घर जा रहा था. हाथ में खाना का प्‍लेट लेकर घर जाते हुए उसे संतोष हो रहा था. बीमारी के कारण पिछले तीन दिनों से उसके खाली पेट को आज खाना मिलेगा ही, दो दिनों से भूखे रह रहे बीबी-बच्‍चा को भी कुछ राहत मिल जायेगा. कल ही उसकी बीमारी खत्‍म हो गयी थी. आज उसे पत्‍य खाना था. लेकिन पथ्‍य की कोई व्‍यवस्था नज़र नहीं आ रही थी. वह खाने की कोई व्‍यवस्‍था के जुगड़ में ही था कि उसे साहेब के आने की सूचना मिल गयी थी और वह - - - -. अच्‍छा ही हुआ, साहेब के आ जाने से उसके पथ्‍य की भी व्‍यवस्‍था हो गयी और परिवार को भी कुछ खाने के लिये मिल जायेगा. खाना थोड़ा-सा ही है तो क्‍या हुआ ? खाली पेट के लिये बहुत बड़ा राहत हो जायेगा. और एक बात यह भी तो है कि साहेब लोगों का खाना स्‍वादिष्‍ट तो होता ही है, उसमें पौष्‍टिक तत्‍व भी पूरा हुआ करता है. आधा पेट ही सही, भूख से मरोड़ती हुई अंतड़ियां कुछ तो शांत हो जायेंगी. साहेब के दिन के खाना के लिये आये हुए सामानों में से थोड़ा-सा चावल और आटा बच गया था. चाय के साथ साहेब को देने वाले कुछ बिस्‍कुट भी बच गये थे. उसने बचा हुआ सामान अपने गमछा में बांध लिया था. तेज कदमों से वह चला जा रहा था.

रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट से निकल कर शनिचरा अभी बीस कदम ही बढ़ा होगा कि उसके कानों में मोटर के हॉर्न की आवाज सुनाई पड़ी. आवाज रेस्‍ट हाउस के मेन गेट की ओर से आयी थी. शायद साहेब कहीं जा रहे थे. वह झटके से पीछे मुड़ गया. लेकिन तभी उसका ध्‍यान अपने हाथ के प्‍लेट की ओर चला गया. हाथ में खाना से भरा प्‍लेट लेकर साहेब के पास जाना ठीक नहीं होगा. यह सोच कर उसने अपने गमछा से प्‍लेट को ढंक दिया अैर प्‍लेट रास्‍ते से थोड़ा हटा कर रख दिया. गमछे में बंधा चावल, आटा और बिस्‍कुट उसने गमछा के दूसरे छोर से अच्‍छी तरह ढंक दिया.

दौड़ कर गया तो देखा कि साहेब का मोटर मेन गेट से बाहर खड़ा है और ड्राइवर गेट बंद कर रहा है. साहेब कहीं जा रहे थे. साहेब के साथ मेम साहेब भी बैठी हुई थीं.

शनिचरा पर नज़र पड़ते साहेब ने इशारे से उसे अपने पास बुलाया. अभी वह साहेब के पास पहुंच भी नहीं पाया था कि साहेब उसे डांटने लगे, ‘‘ड्राइवर इतनी देर से हॉर्न बजा रहा है और तुम्‍हारा कहीं पता नहीं है. रेस्‍ट हाउस में चौकीदारी करनी है तो ठीक से काम करो. - - - ’’ शनिचरा हाथ जोड़े खड़ा था. वह रोज के पगार पर काम करता था. वह पगार भी उसे कई महीने से नहीं मिल पाया था.

मोटर स्‍टार्ट हो चुका था. लेकिन शनिचरा के दिमाग में अब भी साहेब की बातें घूम रही थीं. बड़ा साहेब ठहरे, अगर इनकी नाराज़गी का थोड़ा-सा भी आभास यहां के किसी साहेब को हो गया तो नौकरी बचाना मुश्किल हो जायेगा. शनिचरा की नज़र से साहेब का मोटर ओझल हो गया था. वह रेस्‍ट हाउस की ओर चल पड़ा. साहब पता न कब तक आवें. यह सोच कर वह जल्‍दी-जल्‍दी रेस्‍ट हाउस का दरवाजा बंद करने लगा.

जब वह रेस्‍ट हाउस के पिछले गेट पर पहुंचा तो सामने का नज़ारा देख कर उसे काठ मार गया. खाना के प्‍लेट पर एक कुत्‍ता झुका हुआ था. उसका गमछा भी प्‍लेट के पास नहीं था. ज्ञोड़ी दूर पर रेस्‍ट हाउस का नाला बहता था. शनिचरा ने देखा कि उसका गमछा नाले में लटक रहा था. लटके हुए भाग में ही चावल, आटा और बिस्‍कुट बंधा हुआ था.

प्‍लेट का खाना तो कुत्‍ता खा ही गया, गमछा में बंधा चावल, आटा और बिस्‍कुट भी बेकार हो गया. यदि साहेब के मोटर का हॉर्न सुनाई नहीं पड़ता तो खाना से भरा प्‍लेट और गमछा में बंधा सामान छोड़ कर वह हरगिज नहीं जाता, नहीं खाना और खाने का सामान बरबाद होता. उसे साहेब पर क्रोध आ रहा था. उसका मन कर रहा था कि वह मोटर का पीछा करते हुए अभी जाये और साहेब का मुंह नोच ले. मोटर का पीछा करने जैसा दुभर काम भी संभव हो सकता था. मगर साहेब का मुंह नोचना ? इसके बाद उसका क्‍या होगा ? यह सोचते उसका सारा क्रोध साहेब से हट कर कुत्‍ते पर आ गया. दांत पीसते हुए वह उस पर झपट पड़ा.

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अंकुश्री

प्रेस कॉलोनी, सिदरौल,

नामकुम, रांची(झारखण्‍ड)-834 010

E-mail : ankushreehindiwriter@gmail.com

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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास ऐसे वीर वीरांगनाओं की कहानियों से भरा पड़ा है जिनके योगदान को कोई मान्यता नहीं मिली है। ऐसे ही हमारे अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी हैं जिनका योगदान भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा है कि अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी को इतिहासकारों ने पूरी तरह से उपेक्षित रखा है।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीर वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध खुला विद्रोह किया और स्वतंत्रता की खातिर शहीद हो गये। इन्हीं शहीदों में क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी का नाम भी शामिल है। जिन्होंने अपने प्राणों की बाजी भारत माँ को आजादी दिलाने के लिए लगा दी। उनका जन्म एक किसान परिवार में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ग्राम चन्दीकाखेड़ा (फतेहपुर चैरासी) के लोधी परिवार में सन् 1903 में श्रीराम रतनसिंह लोधी के यहां हुआ था।

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लखनऊ के अमीनाबाद पार्क में झण्डा सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लेने उन्नाव जिले के कई सत्याग्रही जत्थे गये थे, परन्तु सिपाहियों ने उन्हें खदेड़ दिया और ये जत्थे तिरंगा झंडा फहराने में कामयाब नहीं हो सके। इन्हीं सत्याग्रही जत्थों में शामिल वीर गुलाब सिंह लोधी किसी तरह फौजी सिपाहियों की टुकड़ियों के घेरे की नजर से बचकर आमीनाबाद पार्क में घुस गये और चुपचाप वहां खड़े एक पेड़ पर चढ़ने में सफल हो गये। क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी के हाथ में डंडा जैसा बैलों को हांकने वाला पैना था। उसी पैना में तिरंगा झंडा लगा लिया, जिसे उन्होंने अपने कपड़ों में छिपाकर रख लिया था। क्रांतिवीर गुलाब सिंह ने तिरंगा फहराया और जोर-जोर से नारे लगाने लगे- तिरंगे झंडे की जय, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय। अमीनाबाद पार्क के अन्दर पर तिरंगे झंडे को फहरते देखकर पार्क के चारों ओर एकत्र हजारों लोग एक साथ गरज उठे और तिरंगे झंडे की जय, महात्मा गांधी की जय, भारत माता की जय।

झंडा सत्याग्रह आन्दोलन के दौरान देश की हर गली और गांव शहर में सत्याग्रहियों के जत्थे आजादी का अलख जगाते हुए घूम रहे थे। झंडा गीत गाकर, झंडा ऊंचा रहे हमारा, विजय विश्व तिरंगा प्यारा, इसकी शान न जाने पावे, चाहे जान भले ही जाये, देश के कोटि कोटि लोग तिरंगे झंडे की शान की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने के लिए दीवाने हो उठे थे।

समय का चक्र देखिए कि क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी के झंडा फहराते ही सिपाहियों की आंख फिरी और अंग्रेजी साहब का हुकुम हुआ, गोली चलाओ, कई बन्दूकें एक साथ ऊपर उठीं और धांय-धांय कर फायर होने लगे, गोलियां क्रांतिवीर सत्याग्रही गुलाबसिंह लोधी को जा लगीं। जिसके फलस्वरूप वह घायल होकर पेड़ से जमीन पर गिर पड़े। रक्त रंजित वह वीर धरती पर ऐसे पड़े थे, मानो वह भारत माता की गोद में सो गये हों। इस प्रकार वह आजादी की बलिवेदी पर अपने प्राणों को न्यौछावर कर 23 अगस्त 1935 को शहीद हो गये।

क्रांतिवीर गुलाबसिंह लोधी के तिरंगा फहराने की इस क्रांतिकारी घटना के बाद ही अमीनाबाद पार्क को लोग झंडा वाला पार्क के नाम से पुकारने लगे और वह आजादी के आन्दोलन के दौरान राष्ट्रीय नेताओं की सभाओं का प्रमुख केन्द्र बन गया, जो आज शहीद गुलाब सिंह लोधी के बलिदान के स्मारक के रूप में हमारे सामने है। मानो वह आजादी के आन्दोलन की रोमांचकारी कहानी कह रहा है। क्रांतिवीर गुलाब सिंह लोधी ने जिस प्रकार अदम्य साहस का परिचय दिया और अंग्रेज सिपाहियों की आँख में धूल झोंककर बड़ी चतुराई तथा दूरदर्शिता के साथ अपने लक्ष्य को प्राप्त किया, ऐसे उदाहरण इतिहास में बिरले ही मिलते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अग्रणी भूमिका निभाने के लिए उनकी याद में केंद्र सरकार द्वारा जनपद उन्नाव में 23 दिसंबर 2013 को डाक टिकट जारी किया गया।

एक सच्चा वीर ही देश और तिरंगे के लिये अपने प्राण न्यौछावर कर सकता है। ऐसे ही अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी एक सच्चे वीर थे जिन्होंने अपने देश और तिरंगे की खातिर अपना बलिदान दे दिया और तिरंगे को झुकने नहीं दिया। अमर शहीद गुलाब सिंह लोधी का बलिदान देशवासियों को देशभक्ति और परमार्थ के लिये जीने की प्रेरणा देता रहेगा। आज हम वीर शहीद गुलाब सिंह लोधी को उनके 82वें बलिदान दिवस पर नमन करते हुए यही कह सकते हैं कि-

‘‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर वर्ष मेले।

वतन पर मरने वालों का यह बाकी निशां होगा।’’

जय हिंद, जय भारत

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ब्रह्मानंद राजपूत, दहतोरा, शास्त्रीपुरम, सिकन्दरा, आगरा

(Brahmanand Rajput) Dehtora, Agra

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E-Mail  - brhama_rajput@rediffmail.com

जीवन अदलजा की कलाकृति

कहावत है "अप्पन हारल और बहुअक मारल" कोई किसी नहीं बताता। " भीतर के मार खायल वो ही जाने जो खाया है!" "जा हो बूड़बक मेहरारु से हार गये!" माना जाता है कि महिलाएं शारीरिक बल में कमजोर होती है पर यह " अर्धसत्य " है, ओमपुरी वाला नहीं!

तस्वीर का दूसरा पहलू भी है जो  " महिला सशक्तिकरण" के "लहालोट " में गंवई बिजली के बल्ब की तरह भुकभुका रहा है।सो काल्ड मर्दवादी समाज में " पत्नी पीड़ित" मुखर और संगठित नहीं है। है तो ये विमर्श टाइप का विषय पर किसी" सो काल्ड वाद" न जुड़ पाने और किसी "दल "का समर्थन न मिल पाने के कारण " नेपलिया ट्रेन" की भांति धुकधुका कर चल रहा है। काफी पहले से ही कुछेक मर्द अपनी पत्नियों द्वारा प्रताड़ित होते आ रहे हैं। कहने का यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि मर्द स्त्रियों पर जुल्म नहीं करते! बल्कि  क्विंटल के भाव में " महिला उत्पीड़न" हो रहा है पर क्या इससे महिलाओं को भी " टिट फार टैट" का लाइसेंस मिल जाता है?

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बेचारे इन पत्नी पीड़ितों के सूखे और उतरे चेहरों को देखो! क्या तुम्हें इनके पिलपिले शरीर" चमगादड़" जैसे ठेहुनिया काटे बैठे मरदूद पर दया नहीं आती। क्या पूरे पुरुष जाति के जुल्मों का बदला इन निरीहों से ले लोगे! यही चाहते हो कि मर्द आत्महत्या करते रहे हैं और महिलाएं जलाई जाती रही हैं। ये जो बड़े बड़े संन्यासी घर दुआर छोड़कर "घुड़मुड़िया" खाते रहे हैं ,एक प्रकार के पत्नी पीड़ित कहे जा सकते हैं।

फिल्मी संस्करणों में " हंटरवाली, बेरहम जालिम सास" से पीड़ित दामाद भी " स्त्री पीड़ित "की एक श्रेणी हैं। बड़ी छोटी कंपनियों और नौकरियों में यदि कि " जबरदस्त महिला बास" का पाला पर गया तो वो बेचारा दीन हीन ही जानता है कि क्या क्या झेलना पड़ता है। यह भी " स्त्री पीड़ितों" की एक श्रेणी है। कहते हैं" संघे शक्ति कलयुगे" पर इन बेचारों के संघ का तो सरकार भी रजिस्ट्रेशन करने से मना कर रही है क्योंकि " स्त्री विरोधी" का ठप्पा लग जाने का खतरा है। इन " पत्नी पीड़ितों " की व्यथा तो असहनीय है" बेचारा न घर का है न घाट का"!

वैसे समाज में यह लज्जा और शर्म की बात मानी जाती है । एक मैथिली गीत में दर्द उभरा है कि" हम्मर देह त घटल जाइअ , ओक्कर देह त बढल जाइअ"! उस बेचारे का खून सुखा रहा है खटते खटते पर मलकिनी का दिल नहीं पसीझता है। जल्दी से इसे कोई स्वीकारता नहीं है कि वो स्त्री पीड़ित है। यह बड़े साहस की बात होती है। लोग बाग उसे भले ही " हंसी" का पात्र बनाकर मजाक उड़ाये पर अंदर ही अंदर व्यथित होते हैं कि " काश उसमें भी यह साहस होता। वैसे आज के परिवेश में जब कोई भी पारिवारिक विवाद होता है तो सभी मर्द को ही दोषी ठहराते हैं और महिला के प्रति संवेदना जताते हैं। जैसे कि रोड एक्सीडेंट में गलती किसी की भी हो, मार बड़ी गाड़ी का ड्राइवर ही खाता है! " ढोल गंवार शुद्र पशु नारी, सब है ताड़न के अधिकारी" वाला समय बीत चुका है।

नारीवादियों ने इतना हल्ला मचाया है कि इसमें "पत्नी पीड़ितों" का दर्द नक्कारखाने में तूती के आवाज की तरह है। तभी तो वृद्धाश्रम , अनाथालय की तर्ज पर " पत्नी पीड़ित आश्रम " बन रहे हैं। यूँ तो दहेज विरोधी एक्ट और बलात्कार विरोधी कानून बनते हैं महिलाओं के संरक्षण के लिए पर इसकी प्रताड़ना के शिकार मर्द भला कहाँ जायें?  यह सत्य है कि इन पीड़ितों की संख्या अभी कम है या विभिन्न कारणों से काऊंटिंग नहीं हो पाया है पर भविष्य में बड़ी तेजी से बढ़ने की संभावना दिखती हैं। " आज तो गब्बर बहुत खुश हो रहा होगा कि नाच बसंती नाच!" पर वो दिन दूर नहीं जब गब्बर ता थैय्या कर रहा होगा"! जाके पैर न फटे बिवाई वो क्या जाने पीड़ पराई"!

हंस लो आज ! जब विश्वप्रसिद्ध बेलनास्त्र और झाड़ू बम का प्रयोग प्रारंभ होगा तो बोलोगे " भैया सही कहे थे"! मर्दाना टाइप के जनाना से सात हाथ की दूरी बनाये रखियो और " अखिल भारतीय पत्नी पीड़ित संघ" के कार्यालय का पता गूगल बाबा पर सर्च करते फिरोगे।

"इति श्री मेवा खंडे पत्नी पीड़ितस्य व्यथानाम प्रथमोध्याय"।

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