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रविवार, 24 मई 2015

कहानी - कागज के फूल

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जिस दिन से बेटे के आने का समाचार प्राप्त हुआ था रामनरेश और मीरा के पाँव जमीन पर नहीं थे। आज जैसे ही टेलीफोन की घंटी घनघनाई रामनरेश शर्मा ने दौड़कर मोबाइल हाथ में उठाया और रसोईघर की ओर दौड़ गए। अपनी पत्नी से फोन सुनने का आग्रह करते हुए बोले-'लो सुनो तुम्हारे लाड़ले का फोन है।' मीरा ने बेसन में सने हाथ दिखाते हुए कहा-' तुम्हीं सुन लो।'लेकिन मिस्टर शर्मा ने फोन मीरा के कानों पर लगा दिया। बेटे की आवाज सुनते ही मीरा ममत्व के रंग में घुल गई। उसने हाथ धोए अपनी साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछते हुए फोन अपने हाथ में पकड़ लिया। पहले उनके मुख से आशीर्वाद की झड़ी लग गई। लेकिन पाँच मिनट बाद ही मुख मलिन हो गया। पत्नी ने झल्लाते हुए फोन रख दिया और खीजकर बोली-'तुम फोन रिसीव नहीं कर सकते थे।'

शर्मा जी मुस्कराकर बोले-'अरे भागवान! ये पकवान भी तो उसी के लिए बना रही हो। जिसका फोन आया था। फिर वह तुमसे तन-मन की बातें तो कर लेता है। देखा नहीं ,जब मैं बात करता हूँ तो दो मिनट में बातें खत्म हो जाती है और तुम आधे-आधे घंटे बतियाती रहती हौ। परदेश में है बेचारा! माँ से सब गिले शिकवे कर लेता है परन्तु तुमने आज इतनी जल्दी फोन क्यों रख दिया? चलो कोई बात नहीं बस चार घंटे बाद तो आलोक आ ही रहा है।

नहीं, आलोक नहीं आ रहा है। यहीं बताने के लिए उसने फोन किया था। उसकी छुटटी कैंसिल हो गई क्योंकि उसे नया प्रोजेक्ट मिला है और उसे प्रोजेक्ट मैनेजर नियुक्त किया गया है। इसलिए उसने हवाई- जहाज का टिकट कैंसिल करा दिए। सुनकर रामनरेश जी माथा पकड़कर बैठ गए।

पिछले पाँच सालों से उनको अपने जिगर के टुकडे के दर्शन नहीं हो पा रहे थे। क्योंकि दो सालों तक वह इंग्लैंड़ रहा। वहाँ से दो माह के लिए वह बंगलौर आया। तब वह बेटे से मिलने के लिए दिल्ली के एयरपेार्ट पर गए भी लेकिन अधिक कोहरा और धुँध होने के कारण हवाई.जहाज को दिल्ली एयरपोर्ट पर उतरने की अनुमति नहीं मिली और यात्रियों को अहमदाबाद के एयरपेाट पर उतारा गया। अगले दिन यात्रियों को दिल्ली लाया गया। निराश होकर रामनरेश अपने घर लौट आए थे। अब तीन सालों से वह ओस्लो में रह रहा था। वहीं पर पोते का जन्म हुआ था। अब वह आस्लो से पूणे लौट रहा था। इसलिए एक दिन के लिए माता-पिता से मिलने लिए आ रहा था।

पत्नी ने चेहरे को पढ़ लिया था। वह पति के कंधे पर हाथ रखते हुए बोली-'दिल छोटा क्यों करते हो जी! उसकी कोई मजबूरी रही होगी, अन्यथा वह आ तो रहा था।' सुनकर वह गुस्से में या शायद निराशा में बोले-'तुम मेरी पीड़ा को क्या समझोगी। तुम तो कुछ दिन पहले ओस्लो में उसके पास रह आई हो। बहु की डिलीवरी के बहाने तुम्हें तीन माह उसका सान्निध्य मिल गया। मैं ही अभागा तड़प रहा हूँ उससे मिलने के लिए ।'

'ओस्लो में रहते हुए वीडियो- कॉन्फ्रेसिंग तो तुमने भी की थी। अब उस बेचारे की जॉब बाहर है तो क्या करे। हमेशा दिलासा देने वाली पत्नी के शब्द भी उसके हृदय पर पानी नहीं, घी का काम कर रहे थे। वो अपनी पत्नी को कैसे समझाए कि बच्चे साथ में रहते है तो कितना अच्छा लगता है। आदमी बुढ़ापे में भी शेर रहता है। जब वह अपने पोते को गोद में लेकर चलता है या पोते के नन्हे-नन्हें हाथ पकड़कर चलता है तो बूढ़ा दिल भी झूमकर गुनगुना उठता है। खिलखिला उठता है उसका बूढ़ा दिल जब वो पोते के लिए घोडा बनता है या जब पोते को पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ता है। यदि बेटा नाराज भी हो जाए या गुस्से में बोलना भी छोड़ दे तो भी माँ- बाप को तसल्ली रहती है क्योंकि जाते समय बेटे की पीठ और आते समय बेटे का चेहरा तो दिखाई देता है। मीरा को क्या पता उसकी तड़प का। बेटे को सीने से लगाने के लिए उसका दिल तड़प रहा है। वीडियो - कॉन्फ्रेसिंग तो कागज के फूल है जिनसे कभी खुशबू नहीं आती रसगुल्ले का पोस्टर देखकर मुँह मीठा नहीं होता।

मीरा बड़बडाती जा रही थी, पकवान बनाती जा रही थी । पकवान बनाना उसकी मजबूरी थी। गीली सामग्री को निबटाना ही पडेगा। लेकिन मीरा का कलेजा भी अन्दर से सिंदड़ रहा था। उसे आलोक की नौकरी अब खटकने लगी थी। इस नौकरी पर कितना गर्व करती थी। बड़ी दुआएँ की थी बेटे की नौकरी के लिए, क्योंकि घर के हालात हमेशा ही खस्ता रहे। निर्धन माता- पिता

पुत्र की नौकरी को बड़ी लालसा से देखते है। लालसा से देखना उनकी मजबूरी होता है। स्वयं जिम्मेदारियाँ पूरी करने में असमर्थ वे बेटे से जिम्मेदारियाँ पूरी करने की आशा रखते है। मीरा की आँखें भर आई उन दिनों को याद करके जब आलोक लखनउ में एम0 सी0 ए0 कर रहा था। पूरा घर कितनी लगन से मेहनत करता था। तब आलोक की फीस का जुगाड़ हो पाता था। पढ़ाई पूरी होने पर कैम्पस प्लेसमैंट न होने पर आलोक कितना टूट गया था। बेटे की यह निराशा रात-दिन मीरा को खाए जा रही थी ा उसे चिंता थी कि बच्चा निराशा में कहीं कोई गलत कदम ना उठा ले। लेकिन कहावत है न कि कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। आलोक की रात दिन की मेहनत आखिर रंग ले ही आई। जब बेटे की नौकरी की खबर लगी तो खुशी से मीरा की आँखें छलक आईं। भगवान को धन्यवाद देने के लिए मीरा जनवरी के महीने में नंगे पाँव पाँच किलोमीटर चलकर शिवमंदिर गई।

रसोई का काम पूरा हो गया था। उसने हाथ धोए और रसोई से बाहर निकल आई । रामनरेश अब भी मूर्तिवत बैठे थे। निराशा उनके चेहरे से अब भी स्पष्ट टपक रही थी। साड़ी के पल्लू से हाथ पोंछते हुए मीरा उनके पास बैठ गई। चुप्पी तोड़ते हुए बड़ी आत्मीयता से बोली-'कल या परसों रेल से रिजर्वेशन करा लो। दोनों ही चलते है बेटे बहू से मिलने के लिए। पोते को भी खिला लेंगे। लेकिन रामनरेश का चेहरा बिल्कुल निर्विकार और शांत था। उन्होंने मौन न तोड़ते हुए प्रश्नवाचक दृष्टि से मीरा को घूरा। शायद मीरा मौन की भाषा को भी विस्तृत रूप से समझ गई थी। आत्मीयता की यही तो विशेषता होती है वह मन की मूक भाषा को भी पढ़ लेती है। वैसे भी दोनों का दुख तो समान ही था जिसे मीरा जबरदस्ती छुपाने का असम्भव प्रयास कर रही थी।

हालात बदल गए थे। जब से बहू आई थी बेटा बिल्कुल बेगाना हो गया था। क्या करें? उसकी भी मजबूरी है ।आजकल की लड़कियाँ यही चाहती है कि उन्हें सास ससुर की परछाई भी न दिखे। उनकी दृष्टि में पति ही ससुराल होता है। सास-ससुर, नन्द देवर तो एक्सटरा परसन बन जाते है। जिनका जीवन में न कोई अस्तित्व है न ही आवश्यकता।

उनके संबंध हाथों में आई बर्फ के समान पिघलते जा रहे थे। कितने अरमान थे कि बहु के लिए।' कैसी भी बहू आ जाए उसे बेटी ही बना लूँगी।' उसे अपने आप पर पूर्ण विश्वास था । लेकिन वह हार गई । जीतती कैसे? आखिर अच्छाई का प्रमाणपत्र तो उसकी बहू ही देती न । बहू को बेटी बनाने का प्रयास विफल हो गया था । शायद ईश्वर कदम-कदम पर मनुष्य की परीक्षा लेता है तभी तो मीरा परीक्षा देते-देते थक गई थी। खैर, जीवन ही संघर्ष है । अब उसने अपने आपको परिस्थिति के अनुरूप ढ़ाल लिया था । अब उसपर किसी बात का कोई खास असर नहीं पड़ता था। लेकिन सबसे छोटी बेटी की शादी के बाद जीवन की संध्या में अकेलापन उन्हें काटने लगा था । शायद उससे भी अधिक उसके पति परेशान थे । उनकी पीड़ा उनकी आँखों में सदैव झलकती थी।

मीरा चुपचाप उठी और अलग कमरे में चली गई। उसने आलोक को फोन मिलाया और बताया कि 'तेरे पापा तेरे न आने से बिल्कुल टूट से गए है वो तेरे आने का बड़ी बेसब्री से इन्तजार कर रहे थे। उन्होंने अपने पोते से मिलने के हजारों रंगीन सपने सजा रखे थे। उनका बूढ़ा दिल इतना सब कुछ बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है ।हो सके तो दो-चार दिन के लिए आ जाओ।

सुनकर बेटा थोडा सा नाराज होकर बोला-'तुम कैसी बात करती हो मम्मी ! पापा बिल्कुल बच्चे हैं क्या? नया प्रोजेक्ट है। मैं प्रोजेक्ट मैनेजर हूँ जब मैं औरों को छुटटी नहीं दे रहा तो मैं कैसे आ सकता हूँ? एक बात ध्यान से सुनो मम्मी'साथ रहने और अलग रहने में अन्तर ही क्या है। यदि मैं आपके साथ भी रहूँगा तों कितनी देर साथ रहूँगा? सुबह साढे सात बजे घर से निकल जाउँगा और रात को नौ बजे घर में आउँगा। शायद कभी ग्यारह बजे या उससे भी देर से। फिर रात को खाना खाकर सो जाउँगा । ये जितनी भी एम एन सी कम्पनी है , सब खून चूसती है। जितना ये पैसा देती है उससे ज्यादा काम लेती है ।'

मीरा चुपचाप सुन रही थी। वह सोच रही थी कि बेटा कितना नादान है । चाहे बेटा चौबीस घंटे पास न रहे लेकिन सुबह-शाम उसके दर्शन तो होंगे। चाहे सारे दिन बाहर रहे फिर भी संतुष्टि तो रहेगी । आलोक लगातार फोन पर बातें कर रहा था-' मम्मी पापा को समझाओ सभी की औलाद साथ नहीं रहती। ऐसा पहले से होता आया है। राजा दशरथ के पुत्र' राम' भी पहले गुरुकुल में रहे फिर विश्वामित्र के साथ चले गए फिर वन चले गए। बड़े-बड़े व्यापारियों के बच्चे भी कई-कई साल के लिए व्यापार के सिलसिले में बाहर जाते थे। यहाँ बैंगलुरु पूणे, अहमदाबाद ,हैदराबाद में; न जाने कितनी दूर- दूर के लोग रहते हैं। एक काम करो मम्मी! पपा से कहो- कि अपना पासपोर्ट बनवा लें। अतिशीघ्र मेरा नम्बर यू एस में आने वाला है । टूरिस्ट वीजे पर मैं पापा को अपने पास बुला लूँगा। पापा घूम भी आयेंगे और मेरे साथ रहने का उनका सपना भी पूरा हो जाएगा। ।'

' हाँ बेटा तुम सही कहते हो। ऐसा ही करते है।'

अब माँ और बेटे के बीच सम्पर्क समाप्त हो गया । लेकिन मीरा का मन कराह उठा। बेटे को कैसे समझाए कि माँ - बाप का दिल कितना बेचैन रहता है औलाद का सान्निध्य पाने के लिए। बेटियाँ ससुराल चली जाती है। बेटा परदेश चला जाता है। जीवन-संध्या में माँ- बाप कितने अकेले रह जाते है जब उन्हें सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती । आहट सी सुनकर मीरा ने सिर उठाया तो देखा सामने पतिदेव खड़े हैं।

' सुनो जी! तुम्हारे लिए एक खुशखबरी है।' कहकर वो चहक उठी और मीरा ने आलोक द्वारा यू एस बुलाने की बात सुना दी। सुनकर रामनरेश का मन लू में मुरझाए वर्षा की बौछार प्राप्त होने पर प्रफुल्लित पुष्प की भाँति खिल गया। वे फौरन बोल उठे'-ठीक है ।मैं कल ही पासपोर्ट बनवाने के लिए अप्लाई कर देता हूँ । तुम्हारा पासपोर्ट तो पहले ही बना हुआ है । दोनों साथ चलेंगे नहीं तो तुम बिल्कुल अकेली पड़ जाओगी । तुम्हारा अकेलापन तो मुझे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं। अकेले रहने की पीडा तुम क्या जानो। मैने भुगता है इस पीड़ा को । जब तुम ओस्लो गई थी तीन माह के लिए ;कैसे कटते थे दिन- रात तुम क्या जानो ? दीवारें खाने को दौड़ती है,ना खाने में मन लगता है न पीने में। जीवन की इस शाम में सब दूर हो जाते है। वो औलाद; जिसके लिए हम जीते है,जिसकी खुशी अटल रखने के लिए हम न जाने क्या-क्या कर जाते है। पति-पत्नी को जीवन साथी इसीलिए कहा जाता ह क्योंकि वो सारी खुशियाँ सारे गम मिलकर सहते है। आज सभी भाग-दौड़ में लगे है, किसी के पास समय कहाँ है किसी के लिए। और बूढों के लिए तो बिलकुल भी नहीं। टी वी का साथ भी आदमी कहाँ तक लेगा?

जीवन सामान्य कट रहा था। रामनरेश का पासपोर्ट बन गया था। एक दिन बेटे का फोन आया कि वह दो साल के लिए यू एस जा रहा है। उसने अपने पापा को भी वीजा तैयार कराने के लिए कह दिया। बेटे की बातों में अत्यधिक उत्साह था। पत्नी और बेटे के जाने की व्यवस्था तो कम्पनी ने ही कर दी थी लेकिन रामनरेश के जाने की व्यवस्था का भार तो बेटे की जेब पर ही पडेगा। अतः यू एस जाने से पहले दोनों ने बेटे से मिलने के लिए बैंगलोर जाने की योजना बनाई। अधिक खर्च भी नहीं होगा और दोनों की बेटे-बहू के पास रहने की इच्छा भी पूर्ण हो जाएगी।

जाने की तैयारी में रामनरेश ऊपर से कुछ उतार रहे थे कि वह ऊपर से नीचे गिर पडे और उनके टखने की हड़ड़ी टूट गई थी। सभी सपने चकनाचूर हो गए। रिजर्वेशन भी कैंसिल कराना पडा। इस दुर्घटना को सुनकर बेटा आना भी चाहता था लेकिन केवल एक दिन के लिए। एक दिन आकर वो क्या पिता की सेवा कर लेता? व्यर्थ में पैसा बर्बाद करने वाली बात सोचकर मीरा ने ही मना कर दिया। वीडियो कान्फ्रेंसिंग व मोबाइल पर ही हालचाल जाने जाते रहे।

मीरा बेचारी बहुत हिम्मतवाली थी जो अकेली ने सब कुछ सँभाल लिया। रामनरेश जी ने भी साहस दिखाने में कमी नहीं छोड़ी। इतनी पीड़ा उन्होंने होठों पर नहीं आने दिया। उन्हें पता था कि उनकी पीड़ा पत्नी का साहस तोड़ देगी ।अतः हमेशा मुस्कराते रहते थे ।

बेटा यू एस ए चला गया। पैर ठीक होने में पूरे छह माह लग गए। पासपोर्ट तो पहले ही तैयार हो गया था। अब वीजा बनना शेष था। बेटे ने बैंगलुरु में एक फ्लैट ले लिया था जिसकी अच्छी खासी रकम ई एम आई में जाती थी। एक दिन बातों ही बातों में बेटे ने माँ से पिता को यू एस बुलाने की असर्मथता व्यक्त की। क्योंकि घर की ई एम आई तथा बेटे की फीस देने के बाद महीने के खर्च में भी तंगी आ जाती है। वैसे भी रामनरेश की पत्नी को साथ ले जाने की जिद। मीरा गुमसुम थी लेकिन रामनरेश का दिल इतना आहत हुआ कि उन्हें फालिस पड़ गया। फालिस की खबर सुनकर भी बेटा इतनी दूर से तो आ नहीं सकता था। वैसे भी आलोक दो साल के लिए गया था। वीडियो कान्फ्रेसिंग से काम चल रहा था। मोबाइल पर दिन में दो-तीन बार बातें हो जाया करती थी। मीरा इसी बात को सोचकर खुश हो जाया करती थी कि खुशबू चाहे न हो कागज के फूल तो आसपास बिखरे ही पडे हैं। इसके अलावा कोई चारा भी तो नहीं था ।

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रचनाकार

रविशंकर श्रीवास्तव

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462020 (भारत)