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भारत एक प्रजातंत्र देश है। यहां पर विकास की योजनायें कच्छप गति से चलती हैं। कहा यह भी जाता है कि भारत में सब समान हैं और सबका बराबर का हक है, परन्तु हालात इसके बिल्कुल विपरीत है। यहां कच्छप गति से योजनायें चलती है,जो अपने लक्ष्य तक पहुंचते पहुंचते असरहीन हो जाती है। जहां से यह योजना चलती है वहां यह 100 पैसे की मूल्य की होती है। जब वह आम आदमी तक पहुंचती है तो कुछ पैसे कीमत मूल्य की रह जाती है। यह कहानी इसी लक्ष्य को इंगित करती है।

महामहिम राष्ट्रपतिजी के बेडरूम की खिड़की एक सड़क की ओर खुलती थी। रोजाना हजारों आदमी और वाहन उस सड़क से गुजरते थे। राष्ट्रपतिजी इस बहाने जनता की परेशानी और दुःख-दर्द को निकट से जानने का अवसर पा जाते थे। एक दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की का परदा हटाया। उस दिन भयंकर सर्दी पड़ रही थी। आसमान से रुई के फाहे जैसे वर्फ गिर रहे थे। दूर-दूर तक सफेद वर्फ की चादर फैली हुई थी। अचानक उन्हें दिखा कि बेंच पर एक आदमी बैठा हुआ है। जो हड्डी तोड़ ठंड से सिकुड़ कर गठरी जैसा होता जा रहा था ।

राष्ट्रपतिजी ने पीए को कहा - बेंच पर बैठे उस आदमी के बारे में जानकारी लो और उसकी जरूरत का पता लगाओ।

दो घंटे बाद , पीए ने राष्ट्रपतिजी को बताया - सर, वह एक भिखारी है। उसे ठंड से बचने के लिए एक अदद कंबल की जरूरत है।

राष्ट्रपतिजी ने कहा -ठीक है, उसे एक कंबल दे दो।

अगली दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की से पर्दा फिर हटाया। बाहर का दृश्य देखकर महामहिमजी को घोर हैरानी हुई। कल वाला वही भिखारी अभी भी उसी बेंच पर जमा हुआ था। उसके पास ओढ़ने के कंबल अभी तक नहीं उपलब्ध नहीं कराया जा सका था। राष्ट्रपतिजी गुस्सित हुए और पीए से पूछे - यह क्या है ? उस भिखारी को अभी तक कंबल क्यों नहीं दिया गया ? मैंने तो कल ही बोल दिया था।

पीए ने कहा - महोदय, मैंने आपका आदेश सेक्रेटरी होम के आगे बढ़ा दिया था। मैं अभी देखता हूं कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ है।

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थोड़ी देर बाद सेक्रेटरी होम राष्ट्रपतिजी के सामने पेश हुए और सफाई देते हुए बोले - सर, हमारे शहर में हजारों भिखारी हैं। अगर एक भिखारी को कंबल दिया गया तो शहर के बाकी भिखारियों को भी देना पड़ेगा और शायद पूरे मुल्क में भी ऐसा करना पड़ेगा। अगर न दिया तो आम आदमी और मीडिया हम पर भेदभाव का इल्जाम लगायेगा।

राष्ट्रपतिजी को गुस्सा आया। वे बोले - तो फिर ऐसा क्या होना चाहिए कि उस जरूरतमंद भिखारी को कंबल मिल जाए ?

सेक्रेटरी होम ने सुझाव दिया -सर, जरूरतमंद तो हर भिखारी है। आपके नाम से एक कंबल ओढ़ाओ, भिखारी बचाओ योजना शुरू की जा सकती है। उसके अंतर्गत मुल्क के सारे भिखारियों को कंबल बांटा जा सकता है।

राष्ट्रपतिजी इस स्कीम से बहुत खुश हुए। वह अपने दैनिक कामों मे लग गये। अगली सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की से परदा फिर हटाया तो देखा कि वह भिखारी अभी तक उसी बेंच पर बैठा है। इसे देख राष्ट्रपतिजी आग-बबूला हो गए। उनके आदेश की लगातार अवहेलना जो हो रही थी। उन्होंने सेक्रेटरी होम को तलब किया और कारण पूछा।

सेक्रेटरी होम ने स्पष्टीकरण दिया -सर, भिखारियों की गिनती की जा रही है, ताकि उतने कंबलों की खरीद की जा सके।

राष्ट्रपति दांत पीस कर रह गए। अगले दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी को फिर वही भिखारी उसी बेंच पर वहां बैठा दिखा। वह खून का घूंट पीकर रहे गए। सेक्रेटरी होम की फौरन पेशी कराई गई। सेक्रेटरी ने विनम्रता के साथ बताया -सर, ऑडिट ऑब्जेक्शन से बचने के लिए कंबल खरीद का शार्ट-टर्म कोटेशन डाला गया है। आज शाम तक कंबल खरीद हो जायेगी और रात में बांट भी दिए जाएंगे।

राष्ट्रपति ने जोर देकर कहा -यह आखिरी चेतावनी है। अब मैं कोई बहाना सुनना नहीं चाहता।

अगले दिन की सुबह राष्ट्रपतिजी ने खिड़की पर से फिर परदा हटाया तो देखा बेंच के इर्द-गिर्द भीड़ जमा है। राष्ट्रपतिजी ने पीए को भेज कर पता लगवाया। पीए ने लौट कर बताया - सर, कंबल नहीं होने के कारण उस भिखारी की ठंड से मौत हो गयी है।

गुस्से से हुए लाल-पीले राष्ट्रपति ने फौरन से सेक्रेटरी होम को तलब किया। सेक्रेटरी होम ने बड़े अदब से सफाई दी -सर, खरीद की कार्यवाही पूरी हो गई थी। आनन-फानन में हमने सारे कंबल बांट भी दिए। मगर अफसोस कंबल कम पड़ गये।

राष्ट्रपतिजी ने पैर पटके -आखिर क्यों कम पड़े ? मुझे अभी जवाब चाहिये।

सेक्रेटरी होम नजरें झुकाकर बोले- श्रीमान पहले हमने कम्बल अनुसूचित जाति के भिखारियों में बंटवाया उसके बाद अनुसूचित जनजाति के लोगों को दिया। फिर जो बचा वह अल्पसंख्यक लोगों को बंटवाया।

उसके बाद क्या ? राष्ट्रपतिजी ने गुस्से में तेजी आवाज में पूछा।

उसके बाद, सर,ओ बी सी के भिखारियों में कंबल बंटते रहे। आखिर में जब उस भिखारी का नंबर आया तो कंबल खत्म हो गए।

राष्ट्रपति चिंघाड़े -आखिर में ऐसा हुआ क्यों?

सेक्रेटरी होम ने भोलेपन से कहा -सर, इसलिये कि उस भिखारी की जाति ऊँची थी , और वह आरक्षण की श्रेणी में नहीं आता था। इसलिये उस को नहीं दे पाये। और जब उस भिखारी का नम्बर आया तो कम्बल खत्म हो चुका था।

आरक्षण का लाभ उन व्यक्तियों को दिया जा रहा है जिसको उसकी जरुरत नहीं। जिसको जरुरत है उसे नहीं मिल पाता है। यह भारत के लोकतंत्र की योजना व नीति है। ना जाने देश इससे मुक्ति पायेगा या ऐसे ही इसके तले दबता चला जायेगा ?

हिन्दू मिथक के अनुसार ‘यम’ मृत्यु का देवता है। ‘य’ का उच्चारण ‘ज’ की तरह भी किया गाता है, सो ‘यम’ कहें या ‘जम’, बात एक ही है। यमदूत और यमराज भी जमदूत और जमराज पुकारे जा सकते हैं। यमुना जी जमुना जी कहलाती हैं। जमुना को जमना या जमन भी कहते हैं – “गंगो जमन”।

लेकिन क्या ‘जमघट’ भी ‘यमघट’ है ? हरगिज़ नहीं। जमघट में जो जम है वह ‘यम’ नहीं है। जमघट तो भीड़ है, जमाव है,जमावड़ा है, मजमा है। लेकिन आजकल हिन्दी में भीड़ या जमघट की बजाय, अंग्रेज़ी के प्रभाव में ‘जाम’ शब्द ज्यादह इस्तेमाल होने लगा है। सड़क पर ‘जाम’ लग जाता है। यातायात ‘जाम’ के कारण घंटों रुका रहता है। इस जाम का जम से (जिससे जमघट बना है ) कोई लेना-देना नहीं है। यह तो अंग्रेज़ी के ‘जैम’ (jam) से ‘जाम’ होकर हिन्दी में आया है।

ध्यातव्य है कि ‘जाम’ शराब के प्याले को भी कहते है। किसी की सेहत के लिए पिया जाने वाला प्याला “जाम-सिहत” कहलाता है। कहते हैं कि ईरान का जमशेद नाम का एक बादशाह अपने ‘जाम’ में दुनिया में होने वाली तमाम घटनाएँ देख पाता था। जमशेद को संक्षेप में जम भी कहा जाता है।

अरबी /फारसी में एक शब्द है – जम्हूर। जम्हूर जमात को कहते हैं। समाज या समूह को कहते हैं। इसी से जम्हूरियत बना है। जम्हूरियत सामाजिक एकता की भावना है। डिमोक्रेसी या प्रजा तंत्र के लिए उर्दू का शब्द जम्हूरियत ही है। जम- जम्हूर- जम्हूरियत।

जम शब्द में जब हम ‘ज’ के नीचे नुख्ता लगा देते हैं तो ज़म का अर्थ जम से बिलकुल अलग हो जाता है। ज़म अरबी भाषा में निंदा या बुराई को कहते हैं। यह फुहश (फोश) बकना है। लेकिन हिन्दी ज़म के इस निन्दापरक अर्थ को कभी अपना नहीं पाई। हाँ, ज़म-ज़म नाम नाम हमारी भाषा में खूब जाना-पहचाना है। ज़म-ज़म मुसलामानों के तीर्थ, काबा, के पास एक पाक कुआं है जिसका पानी पवित्र माना गया है। इसे आब-ए-ज़मज़म कहा गया है। ज़म यदि पवित्र है तो ज़म-ज़म बहुत पवित्र है। दो बार पवित्र है।

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‘जमना’ बेशक यमना नदी हो सकती है। लेकिन हिन्दी में ‘जमना’ क्रिया भी है। किसी पतली चीज़ का गाढ़ी या ठोस हो जाना उसका जम जाना है – जैसे दूध का दही हो जाना, पानी का बर्फ बन जाना, क्रमश: दूध और पानी का जम जाना है। वह थोड़ा सा दही जिसे दूध में डालकर उसे जमाते हैं शायद “जामन” इसीलिए कहलाता है। हिन्दी में जमना (जम जाना) केवल ठोस या गाढ़ा हो जाने के अर्थ में ही प्रयुक्त नहीं होता। इसके अनेक अन्य प्रयोग हैं। कभी कभी मेंहमान आकर आपके घर “जम” जाते हैं- टिक जाते हैं, देर तक रुके रहते हैं। नई नई दूकान धीरे धीरे “जम” जाती है, चल निकलती है। शुरू शुरू में लेखकों को कोई नहीं पूछता, लेकिन यदि उनमें प्रतिभा है तो धीरे धीरे उनका नाम “जम’ जाता है , शोहरत मिल जाती है। कोई भी काम सीखने में बेशक मुश्किलें आ सकतीं हैं लेकिन अभ्यास से हाथ “जम” जाता है, निपुणता प्राप्त हो जाती है। इतना ही नहीं धाक ‘जम’ जाती है; रोब ‘जम’ जाता है। रंग ‘जम’ जाता है। कभी कभी हम गुस्से में थप्पड़ और गूँसे भी जमा देते हैं। शहद में शकर नीचे “जम’ जाती है, तलहटी में लग जाती है। जमने के और भी उदाहरण जमा किए जा सकते हैं।

‘जमना’ और ‘जमा होना’ इन दोनों में बड़ा अन्तर है। जमा होना इकट्ठा होना है। भीड़ जमा हो जाती है। गणित में जमा जोड़ को कहते हैं। दो जमा तीन, पांच के बराबर होता है। जमा ‘कुल’ या ‘इकट्ठा’ के अर्थ में भी उपयोग किया जाता है। जमा पूंजी, जमा खर्च इत्यादि। धन जमा करना पैसा इकट्ठा करना है। जमा खाता बैंक की पास-बुक है जिसमे आपके जमा-खर्च का हिसाब होता है। हम बेंक में अपना पैसा ‘जमा’ करते हैं। हम किसी संस्था या व्यक्ति के पास पैसा या कोई भी चीज़ अमानत के रूप में भी जमा कर सकते है। जमा है तो जमा-कर्ता भी हैं, जमाखोर भी हैं और जमामार भी हैं। जमाखोर जमा पैसा मारने की फिराक में रहते हैं और अक्सर जमामार बन भी जाते हैं। जमादार सिपाहियों आदि, का मुखिया –हैड कान्सटबल-- होता है। सफाई कर्मचारियों की निगरानी करने वाले को भी जमादार कहा गया है।

जमाना, इसका एक अर्थ व्यवस्थित करना भी है। सजाना भी है। हम घर जमाते हैं, किताबें जमाते हैं –उन्हें सजाते हैं व्यवस्थित करते हैं। लेकिन इसी जमाने के “ज” में यदि नुख्ता लगा दिया जाए तो यह ‘ज़माना’ हो जाता है। ज़माने को जमाया नहीं जा सकता। वह तो बदलता रहता है।

जम, जाम और जमा से अलग ही एक शब्द है, जामा। संस्कृत में जामा बेटी को कहते हैं। इसी से जामाता बना है। जामाता कन्या का पति है। बोलचाल की भाषा में हम जामाता को जमाई भी कहते हैं। लेकिन फारसी में जामा का अर्थ कपडे या पहनावे से है। दूल्हे को जामा, एक प्रकार का अंगरखा, पहनाया जाता है। जिसकी देह पर कपडे खिलते हैं वह जामाज़ेब है। जामा शब्द भी हिन्दी में रच-बस गया है। जामा को लेकर अनेक मुहावरे बन गए हैं। आपे से बाहर होना, अत्यंत क्रोधित हो जाना जामे से बाहर हो जाना है। बहुत खुश होकर इतराना जामे में फूला न समाना है।

डा, सुरेन्द्र वर्मा (मो, ९६२१२२२७७८ ) १०, एच आई जी ; १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद २११००१

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पात्र

1- सक्षम - मुख्‍य पात्र (गाँव का बूढ़ा व्‍यक्‍ति कम पढ़ा-लिखा)

2- श्रद्धा - सक्षम की बीबी

3- रागिनी - भतीजी (कॉलेज में अध्‍ययनरत्‌ )

4- रुची - बैंक कर्मचारी

5- लक्‍की - बैंक मैनेजर

6- अरुण - सहयोगी (बैंक में)

7- आनंद - चायवाला

8- रोहित - सब्‍जीवाला

9- आर्यन - क्‍योस्‍क सेंटर मैनेजर

10. प्रिया - क्‍योस्‍क सेंटर कर्मचारी

11. शुभांगी - क्‍योस्‍क सेंटर कर्मचारी

 

(स्‍थान- बैंक के अंदर का दृश्‍य, सर्वप्रथम आर्यन फिर अरुण उसके उपरांत सक्षम श्रद्धा बैंक में प्रवेश करते हैं।)

सक्षम - (अरुण से) काय भैया जो पइसा वारो फारम भर देहो।

अरुण - हाँ दादा जी अभी भर देता हॅूं। पासबुक कहाँ है। सक्षम - हओ अभे देत हूँ। मुनिया की बाई पासबुक दइयो।

श्रद्धा - जा लेओ।

अरुण - दादाजी कितने पैसे निकालना है।

सक्षम - पचास हजार रुपइया निकालने हैं।

(आर्यन फार्म भरते हुए उनकी बात सुनकर बीच में बोलता है)

आर्यन - इतने पैसे नहीं निकलेंगे, दादाजी।

सक्षम - भइया तुम से नई पूँछ रये और काय ने निकर हैं।

अरुण - ये यहाँ साइन करके वहाँ लाइन में लग जाइये।

सक्षम - हओ भइया। मुनिया की बाई तुम इतई बैठ जाओ।

(सक्षम,अरुण और आर्यन बैंक की लाईन में लग जाते हैं। सक्षम की बारी आने पर)

रुची - दादाजी कितने पैसे चाहिए।

सक्षम - बाई 50000/. रु चइये।

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रुची - दादाजी सरकार द्वारा नोटबंदी के कारण आप सिर्फ 24000 रु ही अपने खाते से निकाल सकते हैं।

सक्षम - मेरे खाते में पैसा है, मोहे जरुअत है। तुमरे थोड़े माँग रओ हूँ, मोहे तो पूरे चइये।

रुची - दादाजी सरकार ने सिर्फ 24000 रु हफ्‍ते में निकालने का सीमा तय कर रखी है। हम कुछ नहीं कर सकते।

सक्षम - ऐसे थोड़े होत है हमें तो पूरे पइसा चइये।

रुची - दादाजी मुझे और लोगों के भी पैसे देने हैं आप वो बड़े साहब से बात कर लीजीए।

अरुण - (पीछे से) दादाजी हमें भी जल्‍दी है तुम साहब से बात कर लो। हठ जाओ।

 

(अपनी पत्‍नि को बुलाने का इशारा करता है। और बैंक अधिकारी के पास जाकर)

सक्षम - साहब, हमें पइसा चइये और वा बाई मना कर रई है का इतने पइसा नई निकरें । हमरे खाते में अभई धान के पइसा आए हैं।

श्रद्धा - दे दो साहब।

लक्‍की - देखो भइया सरकार ने पैसा निकालने की सीमा तय कर रखी है हम इससे ज्‍यादा नहीं दे सकते हैं।

सक्षम - साहब हमरी बहू की तबियत खराब है हमरे मौड़ा हे ऊँगरी से चलबे बारो मोबाईल चइये, उधारी बारे जान खाय ले रये हैं हमें पइसा की भोतई जरुअत है।

लक्‍की - हम आपकी मजबूरी समझ रहे हैं पर हम मजबूर हैं।

सक्षम - तुमरो तो हर दान को जोइ नाटक है, हमरो खातो बंद कर दो और हमरे पइसा पूरे दे दो, हम चले, अब नई आयें।

लक्‍की - खाता बंद करने के बाद भी हम आपको 24000 रु से ज्‍यादा नगद नहीं दे सकते अगर हमारे हाथ में होता तो हम जरुर दे देते।

सक्षम - तो में का करुँ मोहे भी तो दूसरे के पइसा देनो है मेरी जान खाय जा रये हैं।

लक्‍की - भाई साहब चैक से दे दो या उसके खाते में पैसा ट्राँसफर करा दो।

सक्षम - सााहब ने जो मोहे कछु पता ने जो मोहे आय।

लक्‍की - भाई साहब फिर हम कुछ नहीं कर सकते आगे आपकी मर्जी।

सक्षम - हओ साहब कछु नई कर सको तो जो धरो तुमरो फारम हम चले।

 

(सक्षम और उसकी बीबी आपस में बात करते हुए बैंक से बाहर निकल कर जाते हुए रास्‍ते में चाय की दुकान पर)

रागिनी - अरे कक्‍का कहाँ जा रहे हो चाय पी लो।

सक्षम - (सक्षम और उसकी बीबी पैर पड़ते हुए) काय मौडी कहाँ से आ रई है।

रागिनी - कॉलेज गई थी कक्‍का। चायबाले भइया दो चाय देना। तुम दोई कहाँ घूम रये हो

सक्षम - अरे का बतायँ मौड़ी, बैंक गये पइया मध्‍धे, मनो का बतायँ उनने तो दए नइ।

रागिनी - इतनी क्‍या जरुरत आ गई कक्‍का।

आनंद - ये लो चाय

श्रद्धा - तू नइ पी रइ मौड़ी।

रागिनी - मैने अभी तो पी है।

श्रद्धा - का बतायँ, उधार बारे जान खा ले रये हैं, तेरी भैाजी की तबियत खराब है नागपुर ले के जाने है और तेरो भइया वो ऊँगरी से चलावे वारे मोबाईल काजे मरो जा रओ है।)

रागिनी - अच्‍छा! कितने पैसे हुए भइया।

आनंद - 15 रु।

 

सक्षम - में देत हॅूं मौड़ी। (डिस्‍पोजल फेंक कर)

रागिनी - कक्‍का नहीं रहने दो। (रागिनी पेटीएम करती है सक्षम गौर से देखता है।), कक्‍का थोडी सब्‍जी और ले लें फिर चलते हैं।

आनंद - भइया इसको कचरे में डाल देते।

सक्षम - जो तुमरो काम है।

आनंद - हमारा काम है इसलिए तो डब्‍बा यहाँ रखा है कचरे के लिए।

रागिनी - कक्‍का अपने गाँव हे, शहर हे, देष हे साफ रखनो अपनी भी जिम्‍मेदारी है इसलिए कचरा हमेशा कचरे के डिब्‍बे में ही डालें।

सक्षम - हओ मौड़ा डालदेत हूँ, मनो जल्‍दी करिये, बस जाबे बारी है।

रागिनी - बस अभी 10 मिनिट और। (जाते हुए रास्‍ते में)

सक्षम - जा सरकार ने तो घर के पइसा भी निकरवा के बैंक में जमा करवा लए और अब दे भी नई रए। अब का करें भुखे मरें।

श्रद्धा - बड़ी परेसानी है मौड़ी।

 

रागिनी - इससे बडा फायदा है कक्‍का।

सक्षम - हमरे पइसा सब ले लए, हमरो का फायदा उनको हुए कछु।

(सब्‍जी की दुकान पर पहुँचकर)

रागिनी - सब्‍जी कैसी दी भइया।

रोहित - जीजीबाई आलू 15 रु किलो, टमाटर 10रु किलो, मिर्च 10रु पाव, गोभी 10रु किलो।

रागिनी - ये मटर कैसी दी।

रोहित - 20रु किलो।

रागिनी - और अदरक।

रोहित - 10रु पाव।

रागिनी - अच्‍छा, आधा किलो गोभी, आधा किलो मटर, एक पाव मिर्ची, एक किलो आलू, एक  किलो टमाटर, थोड़ी सी 5रु की धनिया दे देना।

रोहित - हओ जीजी लेओ। (पन्‍नी में सब्‍जी देता है)

 

रागिनी - झोला है मेरे पास

श्रद्धा - जई पन्‍नी में ले ले।

रागिनी - नई काकी इनसे बहुत नुकसान है हमें सामान हमेशा कपड़े के झोले में ही लेना चाहिए इसलिए मै हमेशा झोला साथ रखती हूँ। (सब्‍जी लेने के बाद) कितने हुए भइया।

रोहित - 5, 10, 10, 10, 5 , 15 - 55रु हुए जीजी बाई।

रागिनी - ठीक है। (रागिनी पेटीएम करती है) हो गया भइया।

रोहित - हाँ जीजी।

रागिनी - चलो कक्‍का अब चलें।

सक्षम - काय मौड़ी तुमरी तो भोत पहचान है। कहूँ पइसा नई लगे।

रागिनी - नहीं काका पैसा तो दे दिए मैने।

श्रद्धा - काय झूठ कै रई है मौड़ी। हमने तो तोहे पैसा देत देखेइ नई।

रागिनी - अरे काकी मैने तो मोबाइल से दे दिए।

 

(आर्यन का प्रवेश होता है।)

आर्यन - दादाजी आप बैंक में भी बहुत परेशान थे मैंने देखा आपको। चलो मेरे साथ मै आपकी पूरी समस्‍या हल कर दूँगा और आपके सभी सवालों के जवाब भी मिल जायेंगे।

सक्षम - कहाँ।

आर्यन - मेरे क्‍योस्‍क सेंटर

श्रद्धा - जो का होत है। हमें कहूँ नई जाने।

रागिनी - काकी ग्राहकों की सेवा के लिए बनाये गये सेंटर होते हैं जहाँ बैंकों की तरह सभी काम  होते हैं।

सक्षम - हओ चलो भइया।

 

(क्‍योस्‍क सेंटर पर पहुँचकर,)

सुभांगी - हाय रागिनी।

रागिनी - हाय सुभांगी हाय प्रिया। तुम यहाँ काम करती हो।

सुभांगी - हाँ। बहुत दिन हो गये। और कैसे आना हुआ।

रागिनी - आप के सर जी हमें साथ लाये हैं। काकाजी को कुछ पूछना था।

प्रिया - नमस्‍ते काकाजी, नमस्‍ते काकीजी। हमारा काम ही सभी की सहायता करना है। पूछिये क्‍या पूछना था।

सक्षम - सरकार ने जे नोट बंद कर दये जा से का फायदा भओ।

सुभांगी - जो पैसा आपके पास था वो किसी के काम का नहीं था, अब वो बैंक में जमा हो गया है। नकली नोट खतम हो गये। काला धन सब बाहर आ गया। आपके द्वारा बैंक में जमा पैसे पर आपको ब्‍याज मिलेगा और सरकार के पास पैसा जमा होने से नई-नई  योजनायें बनेंगी, जरुरतमंदों को पैसा मिलेगा, नए उद्योग खुलेंगे, रोजगार के नए अवसर मिलेंगे।

श्रद्धा - हमरे सब पइसा तो बैंक में जमा हें हमें पइसा की बहुतइ जरुरत है अब हम का करें।

प्रिया - आप पैसा चैक से दे सकते हैं, सामने वाले के खाते में ट्राँसफर कर सकते हैं, मोबाइल से या इन्‍टरनेट से दे सकते हैं।

सक्षम - हमरे पास तो मोबाइलइ नई है, ने हमें चलावो आत है हम का करें।

सुभांगी - आप आधार कार्ड से भी सबकुछ कर सकते हैं बस आधार कार्ड अपने खाते में लिंक होना चाहिए।

श्रद्धा - ऐं ! जा आधारकार्ड से पइसा निकल सकत है?

प्रिया - हाँ। आपका आधार कार्ड दीजिए हम पैसा निकाल कर बताते हैं।

(आधार कार्ड से पैसे निकालकर बताती है।)

सक्षम - हमरी मौड़ी को व्‍याव है हमें भोत पइसा चहिए हम का करें।

सुभांगी - सरकार ने इसकी भी व्‍यवस्‍था की है आप बैंक में शादी का कार्ड बताकर ढ़ाई लाख रु. निकाल सकते हैं तथा अन्‍य तरीकों से भी भुगतान कर सकते हैं।

श्रद्धा - जो का होत है केसलेस।

प्रिया - जब हम भुगतान नगद में न करके किसी अन्‍य तरीकों जैसे- इन्‍टरनेट से, एटीएम से, चैक से या अन्‍य तरीकों से करेंगे ता ये कैशलेस कहेंगे जब पूरा भारत इसका उपयोग करेगा तब भारत कैषलैष इंडिया बनेगा।

सक्षम - तुम तो जा बताओ जा सब से फायदा का भओ।

सुभांगी - आपके पूरे लेनदेन की जानकारी सरकार को होगी जिससे सरकार को पूरा टेक्‍स मिलेगा। जो टैक्‍स चोरी कर रहे हैं वह सब बंद हो जायेगा। जब सरकार को पूरा टैक्‍स मिलेगा तब सरकार के पास पैसा होने से सरकार देष की रक्षा के लिए नए हथियार खरीद सकती है, नौकरियाँ दे सकती है, रोड़ें बनवा सकती है, नए उद्योग लगा सकती है, बिजली की व्‍यवस्‍था सुधार सकती है, खेलकूद की और अच्‍छी व्‍यवस्‍था कर सकती है, षिक्षा का स्‍तर सुधार सकती है। सरकार स्‍वच्‍छ भारत अभियान को और तेजी से चला  सकती है जिससे पूरे देष को खुले में शौच मुक्‍त बना सकती है। और ये सब तभी संभव है जब सरकार को सही टैक्‍स प्राप्‍त होगा।

सक्षम - तुमने तो भोतई अच्‍छे से हमें सबकछु बतादओ। मोड़ियों तुम तो भोतइ जानत हो, तुम तो खूबई पढ़ी-लिखी हो।

श्रद्धा - अब हम सबसे केहें बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, अपने शहर, गाँव हे खुले में शौच मुक्‍त बनाओ और अपने देष हे कैशलैस बनावे में सरकार को साथ दो।

(आर्यन - हमने अपने इस नाटक के माध्‍यम से कैशलैस इंडिया के बारे में बताया आप इस जानकारी को जन-जन तक पहुँचाने में सरकार की मदद करेंगे और देश को कैशलैस बनाने में पूरा सहयोग देंगे। आप अपनी बनखेड़ी को स्‍वच्‍छ बनाने में सहयोग देंगे तथा कचरा निर्धारित जगह पर ही डालेंगे, पन्‍नी के स्‍थान पर कपड़े की थैली का उपयोग करेंगे, खुले में शौच मुक्‍त बनायेंगे तथा बेटी बचाने तथा बेटी पढ़ाने का संकल्‍प लेकर यहाँ से जायेंगे तभी हमारा यह नाटक सही मायनों में सफल होगा।)

नारे - भारत माता की जय

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'कालिया और कालिया' में 'मेरी प्रिय कहानियाँ' का लोकार्पण

दिल्ली। कहानी लिखना एक साधना और एकाकी कला है। चाहे कितने आधुनिक साधन और संजाल आपके सामने बिछे हों, लिखना आपको अपनी नन्हीं कलम से ही है। कई कई दिन कहानी दिल दिमाग में पडी करवटें बदलती रहती हैं। अंतत: जब कहानी लिख डालने का दबाव होता है,अपने को अपने ही बहुरंगी घर-संसार से निर्वासित कर लेना पड़ता है। सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने विश्व पुस्तक मेले में राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम 'कालिया और कालिया' में अपने दिवंगत पति रवींद्र कालिया को याद करते हुए कहा कि जीवन संघर्ष ने उनकी रचनाधर्मिता को तीखी धार दी और रचनाकर्म कभी रुका नहीं। इस अवसर पर राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तकों 'मेरी प्रिय कहानियाँ - ममता कालिया' तथा 'मेरी प्रिय कहानियाँ -रवींद्र कालिया' का लोकार्पण भी हुआ। इस अवसर पर ममता कालिया ने कहा कि प्रतिनिधि और प्रिय कहानियों की अनेक शृंखलाएँ विभिन्न प्रकाशकों द्वारा संचालित हैं किन्तु राजपाल एंड सन्ज़ की शृंखला में अपनी किताब को देखना सचमुच सुखद और गौरवपूर्ण है क्योंकि यह इस तरह की पहली शृंखला थी जिसने व्यापक पाठकों तक पहुंच बनाई।

आयोजन में युवा आलोचक एवं बनास जन के संपादक पल्लव ने ममता कालिया तथा रवींद्र कालिया के कहानी लेखन के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए उन्हें हिन्दी कहानी के जरूरी हस्ताक्षर बताया। उन्होंने ममता जी की कहानी 'दल्ली' की चर्चा भी की। युवा कवि प्रांजल धर ने ममता कालिया से संवाद करते हुए उनकी रचना प्रक्रिया पर कुछ रोचक सवाल किये। उनके एक सवाल के जवाब में ममता कालिया ने रवींद्र जी की प्रसिद्ध कहानी 'नौ साल छोटी पत्नी' के लिखे जाने की कहानी सुनाई। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने रवींद्र कालिया की कहानी 'सुंदरी' तथा अपनी कहानी 'लड़के' को अपनी अब तक की सबसे प्रिय कहानियाँ बताया। ममता कालिया ने कहा कि अभी उनकी सबसे अच्छी कहानी लिखी जानी है और वही सबसे प्रिय कहानी भी होगी।

आयोजन में सुपरिचित कथाकार शिवमूर्ति, सुषम बेदी, प्रदीप सौरभ, हरियश राय, प्रेमपाल शर्मा, शरद सिंह, प्रभात रंजन,राजीव कुमार, उद्भावना के संपादक अजय कुमार सहित बड़ी संख्या में युवा लेखक, विद्यार्थी तथा पाठक उपस्थित थे। राजपाल एंड सन्ज़ की निदेशक मीरा जौहरी ने 'मेरी प्रिय कहानियाँ' शृंखला के बारे में बताते हुए अंत में सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रेषक - प्रणव जौहरी

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'कारवाने ग़ज़ल' का लोकार्पण

नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेले में राजपाल एन्ड सन्ज़ के स्टाल पर सुरेश सलिल की पुस्तक 'कारवाने ग़ज़ल'  का लोकार्पण हुआ। लोकार्पण समारोह के मुख्य अतिथि विख्यात कवि-आलोचक अशोक वाजपेयी ने कहा कि ग़ज़ल, सॉनेट और हाइकू ऐसे काव्य रूप हैं जिनमें दुनिया की सभी भाषाओं में सृजन हुआ। उन्होंने सुरेश सलिल की पुस्तक 'कारवाने ग़ज़ल' को इस संदर्भ में मौलिक बताया कि इसमें आठ सौ साल के भारतीय ग़ज़ल इतिहास के सभी महत्त्वपूर्ण ग़ज़लकारों को सम्मिलित किया गया है। उन्होंने कहा कि हिंदी कवियों की ग़ज़लों को भी इस संग्रह में देखना सचमुच महत्त्वपूर्ण है। इस अवसर पर उन्होंने स्मृतियों को ताज़ा करते हुए कहा कि राजपाल एंड सन्ज़ की शृंखला में प्रकाश पंडित की पुस्तकों के द्वारा वे उर्दू शाइरी के प्रशंसक बने थे।

आयोजन में 'शुक्रवार' के साहित्य संपादक और प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने कहा कि हिन्दी अकादमिक संसार में यह दुर्लभ ही है कि मीर, ग़ालिब और फैज़ के साथ हिन्दी कवियों की ग़ज़लों को भी साथ देखा-पढ़ा जाए। उन्होंने इस अनूठे संग्रह के लिए सुरेश सलिल को बधाई देते हुए कहा कि उनके अनुभव भंडार का लाभ लेकर साहित्य को ऐसी दुर्लभ कृतियाँ दी जा सकती हैं। 'कारवाने ग़ज़ल' के संपादक सुरेश सलिल ने ग्रन्थ के निर्माण की प्रेरणा और आवश्यकता बताते हुए कहा कि हिंदुस्तानी स्वभाव वाली खड़ी बोली की कविता की शुरुआत अमीर खुसरो से हुई। उन्होंने इधर के पूंजीवादी समाज और संस्कृति के बीच इंसान की बौनी होती हैसियत को लेकर जदीदी ग़ज़ल की संजीदगी को भी रेखांकित किया।

हिन्दी -उर्दू के विद्वान आलोचक डॉ जानकीप्रसाद शर्मा ने अपने सारगर्भित उद्बोधन में ग़ज़ल के इतिहास को बताते हुए इससे जुड़े अनेक विवादों-अपवादों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि कभी मान लिया गया था मीर-ग़ालिब के बाद ग़ज़ल में नया लिखना असम्भव है लेकिन बाद की समृद्ध ग़ज़ल परम्परा इसे गलत साबित करती है जिसकी गवाही सुरेश सलिल की किताब 'कारवाने ग़ज़ल' है।

आयोजन के दूसरे भाग में हिन्दी साहित्य की चर्चित पत्रिका 'उद्भावना' के ब्रेख्त विशेषांक का लोकार्पण किया गया। आयोजन में ग़ज़लकार रामकुमार कृषक, कथाकार हरियश राय, आलोचक डॉ जीवन सिंह, कवि उपेंद्र कुमार, उद्भावना के सम्पादक अजय कुमार सहित बड़ी संख्या में लेखक,पाठक और युवा विद्यार्थी उपस्थित थे। अंत में राजपाल एंड सन्ज़ की निदेशक मीरा जौहरी ने आभार व्यक्त किया।

प्रेषक - प्रणव जौहरी

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'सफर में हमसफ़र - रवींद्र कालिया और ममता कालिया' का लोकार्पण

दिल्ली। रवि को अपनी यादों का पिटारा जान से प्यारा था। होता भी क्यों न! कितने तो शहरों में तंबू लगाए और उखाड़े, कितने लोगों की सोहबत मिली, एक से एक नायाब और नापाम तजुर्बे हुए। पर दाद देनी पड़ेगी उनकी सादगी की कि कभी जीवन-जगत के ऊपर से विश्वास नहीं टूटा। बीहड़ से बीहड़ वक्त और व्यक्तित्व में उन्हें रोशनी की एक किरण दिखी। सुप्रसिद्ध कथाकार ममता कालिया ने विश्व पुस्तक मेले में साहित्य भण्डार द्वारा आयोजित पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में अपने दिवंगत पति रवींद्र कालिया को याद करते हुए कहा कि रवि के लेखन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि उसमें तेवर है पर तल्खी नहीं, तरंग है पर तिलमिलाहट नहीं। इस अवसर पर साहित्य भण्डार द्वारा सद्य प्रकाशित पुस्तक 'सफर में हमसफ़र - रवींद्र कालिया और ममता कालिया' का लोकार्पण हुआ।

आयोजन में युवा आलोचक राजीव कुमार ने रवींद्र कालिया के साथ हुई अंतिम भेंट का संस्मरण सुनाया। उन्होंने कहा कि कालिया जी बड़े लेखक और बड़े संपादक होने के साथ बहुत बड़े मनुष्य भी थे। आयोजन में वरिष्ठ कथाकार हरियश राय ने ममता कालिया और रवींद्र कालिया के संस्मरण लेखन को हिन्दी साहित्य के संसार में अविस्मरणीय सृजन बताया। उहोने कहा कि ग़ालिब छुटी शराब की तरह पाठक 'सफर में हमसफ़र' को भी खूब पसन्द करेंगे। आयोजन में बनास जन के संपादक पल्लव, युवा कवि प्रांजल धर, फिल्म विशेषज्ञ मिहिर पंड्या, युवा आलोचक गणपत तेली सहित बड़ी संख्या में लेखक, विद्यार्थी तथा पाठक उपस्थित थे। साहित्य भंडार के प्रबंध निदेशक विभोर अग्रवाल ने अपने प्रकाशन संस्थान से कालिया परिवार के आत्मीय संबंधों का उल्लेख करते हुए अंत में सभी का आभार व्यक्त किया।

प्रेषक - विभोर अग्रवाल

रचना समय - अगस्त-सितंबर 2016 : मिशेल फूको विशेषांक पीडीएफ ईबुक के रूप में नीचे दिए विंडो में पढ़ें. बड़े आकार में फुल स्क्रीन में पढ़ने के लिए संबंधित आइकन को क्लिक करें. पीडीएफ फ़ाइल भी डाउनलोड कर ऑफलाइन पढ़ सकते हैं.  इसके लिए आर्काइव.ऑर्ग की फ़ाइल लिंक को टच/क्लिक करें.

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जब से मैने सुना है कि कलकत्ता के राम कृष्ण मिशन अस्पताल में एक पूंछ वाले बच्चे ने जन्म लिया है तब से मैं बहुत खुश हूं। हमारे पूर्वजों की भी पूंछ हुआ करती थी। डाक्टरों का कहना है कि जब एक-डेढ महीने का भ्रूण पेट में होता है तो उसकी भी पूंछ होती है। और नौ महीने बीतते-बीतते वह पूंछ समाप्त हो जाती है। परंतु इस बच्चे ने पुराने संस्कार त्यागने से इंकार कर दिया। और पूंछ सहित पैदा हो गया। इस हिसाब से यह बच्चा हमारे पूर्वजों का लघु-संस्करण है। अतः पूज्यनीय है। यह मेरा दुर्भाग्य है कि पूज्यनीय पूर्वज का जन्म कलकत्ता में हुआ। मैं ठहरा एक अदना सा व्यंगकार, इतना किराया खर्च करके उस महान आत्मा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करने में असमर्थ हूं। अतः यहीं बैठे-बैठे ही मैं उस महापुरुष को साष्टांग प्रणाम करता हूं।

कह्ते हैं कि हमारे पूर्वजों की भी एक प्यारी-सी, छोटी-सी पूंछ हुआ करती थी। परंतु मनुष्य तो जन्म से ही इर्ष्यालु है। जानवरों की लम्बी पून्छ उसे फूटी आंख न भाई। बस, मनुष्य ने भगवान की व्यवस्था के विरुद्ध आन्दोलन छेड़ दिया। नारे लगने लगे। रैलियां निकलने लगीं क्रमिक भूख-हडताल से लेकर आमरण अनशन तक रखे जाने लगे। चारों ओर हाहाकार, लूटमार मच गई। भगवान के (यम) दूतों ने मनुष्य को बहुत समझाया। परंतु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। मनुष्यों की मांग थी कि हमारी पूंछ को बडा करो। कुछ लोगों ने तो जानवरों की पूंछ को विदेशी नागरिकों की संज्ञा दी और उसे काटने की मांग करने लगे। भगवान भी परेशान। लोग भूख ह्डताल व यमदूतों के गदा प्रहारों से धडाधड़ मरने लगे। न नर्क में जगह बची न स्वर्ग में। गुस्से से भरकर भगवान ने नर्क व स्वर्ग की तालाबन्दी कर दी। और आदमी की पूंछ जड़ से ही काट कर आदमी को जमीन पर धक्का दे दिया। तब से मनुष्य पूंछ के बिना लुटा-लुटा सा घूम रहा है।

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यदि मैं यहां पूंछ के गुणों का बखान करने लगूं तो एक महाकाव्य ही तैयार हो जाय। आपको याद होगा कि एक बार जब श्री राम चन्द्र जी की धर्मपत्नि “ श्रीमति राम “ का विपक्षी दल के नेता रावण ने अपहरण कर लिया था तो उस समय हनुमान जी ने अपनी पूंछ से ही सारी लंका जला दी थी। सांप भी मर गया और लाठी भी बच गई। आज मैं सोचता हूं कि अगर हनुमान जी की पूंछ न होती तो श्रीमति राम का क्या होता ?

जिस प्रकार से मनुष्यों में इज्जत की निशानी मूंछ होती है उसी प्रकार से जानवर भी अपनी पूंछ की बेईज्जती बर्दाश्त नहीं कर सकते। एक सिर फिरे आदमी ने एक कुत्ते की घनी व लच्छेदार टेढी पूंछ को सीधा करने का प्रयास किया था। कहते हैं कि 12 साल बाद भी कुत्ते ने अपने जाति-स्वभाव को नहीं छोड़ा। और उसकी पूंछ टेढ़ी ही रही।

जब मेरी मूंछें फूटनी शुरु ही हुई थी तो मेरे दिल में मूंछ पर एक कविता लिखने की सनक सवार हो गई। उस कविता में मूंछ की तुक पूंछ से भिडाते समय मेरे दिल में अचानक यह ख्याल आया कि आदमी की पूंछ क्यों नहीं होती ? मैंने अपनी पीठ पर रीढ की हड्डी के नीचले सिरे तक हाथ फिरा कर देखा और पून्छ को नदारद पाकर मुझे बहुत दुख हुआ। बस मैं कागज़ कलम वहीं पर पटक कर दौडा-दौडा अपने पिता जी के पास गया और उन से आदमी की पूंछ न होने की शिकायत की। पिता जी ने दूसरे ही दिन मेरी शादी कर दी। यानि बाकायदा मेरी पूंछ मेरे पीछे चिपक गई। अब यह पूंछ इतनी लम्बी हो गई है कि मेरा अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। और घर में केवल पूंछ ही पूंछ दिखाई देती है। अब मैं इस बढी हूई पूंछ से इतना परेशान हूं कि इसको काटने के तरह-तरह के उपाय सोचता रहता हूं परंतु यह बढ़ती ही जाती है। सोचता हूं बिना पूंछ के ही ठीक था।

राम कृष्ण खुराना
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