रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - रचनाकार में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com

Latest Post
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अश्विनी कुमार आलोक आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गुनो सामताणी गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज मित्र पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार साह प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह मानसून मार्कण्डेय मिलान कुन्देरा मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र विजय राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विजय केसरी विज्ञान कथा विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविधा विवेक रंजन श्रीवास्तव विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शेखर मलिक शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्रीनाथ सिंह श्रृंगी संजय दुबे संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वतंत्रता दिवस हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

संदीप पाल की कलाकृति

बड़ी हवेली

अचानक सिहरन महसूस होने पर मीनाक्षी आरामकुर्सी से उठती है और पास पड़े मोबाईल को ऑन कर टाइम देखती है ,अरे सात बज गए पता ही नहीं चला मन ही मन बुदबुदाते हुए अपने खुले बालों को समेटते हुए ज्यों ही ऊपर देखती है तो खुले आसमाँ में झिलमिलाते हुए तारो को देख वापस अपनी कुर्सी पर बैठ जाती है और अपलक इस खूबसूरती को निहारते हुए सोचती है ऐसी ही एक शाम देख कर तो उसने अपनी एक छोटी सी नज़्म राजेश के लिए लिखी थी ।


सच उस वक़्त लिखने के लिए शब्द भी थे और वज़ह भी ।अब तो मुद्दतें हुई कलम को उठाए हुए हाँ पर्चियों पर दवा लिखने के लिये वैसे तो दिन में कई बार उठती है ।
ये अचानक मैंने राजेश का नाम कैसे ले लिया ,जिस शख्स को और उससे जुड़ी हर याद को बरसो पहले दफ़्न कर चुकी हूँ।


फिर यकायक ये नाम मेरे ज़हन में कैसे आ गया आज ?
हल्की ठण्ड सी महसूस होने पर अपने दुपट्टे को फैला कर ओढ़ते हुए वापस अपनी आराम कुर्सी पर पसर गई और सोचने लगी कि छत पर आयी तो ढ़लते सूरज को देख कुछ फैसला करने थी लेकिन फैसला करते करते अतीत के कितने पन्नों को पलट दिया मैंने ।


खैर जो भी हो साँवली जाना तो तय हुआ मेरा कितने दिन हो गए थे फ़ैसला नहीं कर पा रही थी कि वहां जाऊं या नहीं , ऐसा ही होता था अक्सर जब भी ज़िन्दगी में कोई परेशानी होती थी या कोई फैसला नहीं ले पाती थी तो छत पर जा ढ़लते सूरज को देखा करती थी और उस वक़्त जो भी मन कह देता था बस वही मेरा फ़ैसला हो जाया करता था ।


आप यहाँ सर्दी में क्या कर रही हो माँ कन्नू ने मेरे हाथों को पकड़ते हुए कहा ,कुछ नहीं बस अच्छा लग रहा था सो बैठ गई थी ,चलो नीचे चलते है मैंने उठते हुए कहा ।
जब हम सीढ़ियां उतरते हुए नीचे आ रहे थे तो कन्नू बोला मम्मा दो दिन बाद मेरा जन्म दिन आ रहा है और मैं अठारह साल का हो जाऊँगा और आप मुझे बाइक दिलवा रही हो इस बार याद है न आपको , तभी बीच में माँ की आवाज़ आती है अरे क्या याद दिलवा रहा है अपनी माँ को तू , आजकल तेरी माँ को न जाने क्या हो गया है उसे तो चाय पीना भी याद नहीं रहता ,देखो शाम चाय बना के दी अब तक टेबल पर ही रखी है ।ओह माँ सॉरी सच में याद ही नहीं रहा बस हस्पताल से आ चेंज कर सीधा छत पर चली गई और चाय पीना भूल गई ।पूरा दिन दौड़ भाग करती रहती हो कुछ समय खुद को भी दिया करो चलो आ जाओ खाना खा लो कहते हुए माँ डाइनिंग टेबल पर खाना लगाने लगी ।बस पाँच मिनिट में एक फोन कर के आती हूँ कहते हुए मीनाक्षी अपने कमरे में चली गई और जो लैटर साँवली से आया था से फोन नं ले तीन दिन बाद पहुंचने की सूचना दे देती है । कन्नू का जन्मदिन मना के बस निकल जाऊंगी अगले दिन । खाना खाते हुए माँ से कहती है तो माँ कुछ उदास होते हुए सिर्फ इतना ही कहती है कि,आखिर तय कर लिया तुमने तो मानोगी नहीं , वैसे भी तुम वहीँ करोगी जो तुम चाहोगी ।


एसी बात नहीं है माँ बहुत सोच के ये फ़ैसला किया है वहाँ पैसा अच्छा मिल रहा है ,फिर अब कन्नू भी बड़ा हो गया है ,वक़्त के साथ साथ खर्चे भी तो बढ़ रहे है ।फिर समय समय पर आती रहूंगी तुम लोगों के पास हमेशा के लिए थोड़े ही जा रही हूँ ।
साँवली के लिए सीधी ट्रैन नहीं थी , उसांगढ़ से बस या जीप मिलेगी जो दो घंटे में साँवली पहुँचा देगी फोन पर ये ही बताया था ।
टिकिट ले ट्रेन में बैठी तो देखा ज़्यादा भीड़ नहीं थी खिड़की की तरफ बैठ स्टेशन को गौर से देखने लगती हूँ कि पता नहीं अब वापस कब आना होगा । सही समय पर ट्रेन रवाना हो चुकी थी और जैसे जैसे ट्रेन रफ़्तार पकड़ अपने गंतव्य की और बढ़ रही थी ,मीनाक्षी उतना ही पीछे अपने अतीत में गोते लगा रही थी ।


यदि राजेश उस वक़्त अपने घर वालों से मुझे मिलवा देता ,मुझसे शादी कर लेता तो आज शायद मैं ये सफ़र नहीं कर रही होती । कितनी बातें ,कितने वादे किए थे साथ जीने मरने के , कितनी कसमें खाई थी एक दूसरे के बग़ैर न जीने की ।
और आज देखो एक दूसरे के बग़ैर  ......लंबी साँस लेते हुए मन ही मन सोचती है वक़्त भी कहां से कहां ले आता है ।


काश ! उस रात मैं राजेश के यहाँ न रूकती तो अच्छा होता ,हमेशा की तरह अपने हॉस्टल से शाम उससे मिलने गई थी अचानक मौसम खराब हो गया था और बारिश थी की रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी ,हालाँकि कहा था मैंने राजेश से जाने के लिए पर अपना वास्ता दे कर ,मुझ पर विश्वास नहीं तुमको न जाने क्या क्या कह कर रोक लिया था । नियति में शायद लिखा था यही सब होना ,और जब मैंने राजेश से अपनी प्रेग्नेंसी को लेकर शादी की बात की तो वो अभी तैयार नहीं था इसके लिए उसे वक़्त चाहिए था ,वो जमींदार राईस खानदान से था और उसका कहना था कि उसके घर वाले एकदम इस शादी के लिए तैयार नहीं होंगे ,उसने अबॉर्शन के लिए दबाव डाला जबकि मैं इसके खिलाफ थी ।


यदि मैं उस वक़्त राजेश का कहा मान लेती तो मेरा प्यारा कन्नू ,उसके प्यार से मैं वंचित रह जाती ।
राजेश और उसकी दुनिया से दूर ,अपने घर वालों के खिलाफ जा कर मैंने अकेले ही कन्नू को इस दुनिया में लाने का फ़ैसला किया था ,और आज मुझे अपने उस फ़ैसले पर फक्र है ।हालाँकि कन्नू के जन्म के साथ साथ नर्सिंग की पढाई फिर नौकरी बहुत परेशानियां आयी ज़िन्दगी में लेकिन वात्सल्य प्रेम के आगे ये सब बौनी साबित होती गई ।वक़्त गुज़रता जा रहा था और इन्हीं सब के बीच पिता के चले जाने से माँ भी अकेली हो गई थी ,जो अब मेरे साथ थी ।


मैं ,कन्नू और माँ बस यही संसार था या कहूँ यही मेरी ज़िंदगी थी ।
अचानक चाय वाले की आवाज़ से चौक जाती हूँ ,हड़बड़ाती हुई चाय वाले से पूछती हूँ भइया कौन-से स्टेशन पर रुकी हुई है ये ट्रेन लेकिन वो सुन कर भी मेरे प्रश्न को अनसुना करता ,अपनी चाय बेचने में व्यस्त ,मैं उठ कर बाहर जाती हूँ और डिब्बे के गेट पर खड़े लोगों से स्टेशन के बारे में पूछती हूँ तो एक जवाब देता है कोसी आया है ।मैं अपनी सीट पर आ निश्चिंत हो बैठ जाती हूँ अभी दो और स्टेशन आएंगे उसके बाद उंसागढ़ है , साथ ही मन में अजीब सा भय भी की अँधेरा होने वाला है क्या साधन होगा कैसे जाऊंगी । अनजान जगह है ,अनजान लोग है ।क्या मेरे पास जो फोन नं है उस पर फोन करू ,इसी उहापोश में न जाने कब उंसागढ़ आ गया पता ही नहीं चला ,मैं तेजी से अपना सामान उठा ट्रेन से नीचे उतरती हूँ ।

स्टेशन छोटा होने के कारण ट्रेन बहुत कम समय के लिए रूकती थी ।अपने सामान के साथ प्लेटफार्म पर खड़ी सोच रही थी कि अब कहा कैसे जाया जाए कि , तभी पीछे से आवाज़ आती है मैडम नयी लगती है शायद पहली बार आयी है यहाँ । मैं पीछे मुड़ कर देखती हूँ शायद गार्ड होगा हाथ में हरी ,लाल झंडियां लिए खड़ा मुस्कुरा रहा था ।मैंने जब साँवली जाने का रास्ता ,साधन का पूछा तो जवाब मिला, एक बस जाती है दिनभर में जो दिन में निकल गई ,अभी लास्ट एक प्राइवेट जीप है जो सवारियों को ले के जायेगी ।स्टेशन के बाहर आकर जीप को तलाशने में जरा सी भी परेशानी नहीं हुई क्योंकि एक मात्र जीप ही खड़ी हुई थी जिसमे दो , चार सवारियां बैठी थी ।


मैंने जीप वाले को एड्र्स बता के समान रखा और अंदर जा के बैठ गई ।इसी बीच मैंने उन लोगों को भी फोन पर सूचना दे दी की कुछ ही देर में ,मैं वहाँ पहुंच रही हूँ ।कुछ देर इंतज़ार कर जीप वाले ने अपनी जीप एक टूटी फूटी सड़क पर दौड़ा दी ,कही खेतों के बीच से तो कही पगडण्डियों पर दौड़ाता हुआ अँधेरा होने से पहले उसने मुझे मेरे बताये एड्र्स पर उतार दिया ।
अपने सामान के साथ खड़ी मैं चारों और नज़र दौड़ाती हूँ तो सुकून सा महसूस हुआ , हराभरा छोटा सा गाँव , भले से दिखने वाले लोग छोटे ,छोटे से घर । तभी सामने से एक बुजुर्ग व्यक्ति धोती कुर्ता पहने ,सर पर पगड़ी बाँधे बड़े अदब से अभिवादन करते हुए पूछता है ,क्या आप सेठ अमर प्रसाद जी के यहाँ आयी है ? मैंने हाँ में अपना सर हिला दिया तो उसने मेरा सामान उठा के साथ चलने को कहा , मैं भी उनके पीछे पीछे हो ली ।आप का नाम क्या है बाबा और हमे कितनी दूर जाना होगा मेरे सवाल पर वो मुसकुरा दिए ,की मेरा नाम हँसी राम है और सड़क पार जो बड़ी हवेली दिख रही है बस यहीं तक ।


उनका जवाब सुन मैं भी हँसे बगैर नहीं रह सकी क्योंकि हम सड़क पार कर हवेली के सामने थे ।
आलीशान हवेली किसी राजा के महल की तरह,  रौशनी से नहाई हुई
इसके भीतर आ कर एक पल को भी नहीं लग रहा था कि इतने छोटे गाँव में ये खूबसूरत हवेली होगी ।
आपको रास्ते में कोई तकलीफ तो नहीं हुई , एक भारी आवाज़ को सुन कर चौक जाती हूँ  . मैं नहीं कहते हुए खड़ी हो रही होती हूँ कि वो बैठने को बोल देते ,मैं प्रणाम कहते हुए अपने दोनों हाथों को जोड़ देती हूँ , जीती रहो के साथ बेटी शब्द सुन कर अच्छा लगा । मेरे साथ चाय पीते हुए उन्होंने अपने बेटे के बारे में सब कुछ बताया जिनकी देखभाल के लिए मैं यहाँ आयीं हूँ ।
बातों बातों में उन्होंने बताया कि पंद्रह साल पहले एक हादसे में उनका बेटा राज अपना मानसिक संतुलन खो चुका था अपाहिज़ की तरह बिस्तर पर है ।
अभी तक उसकी माँ ज़िन्दा थी तो वो उसकी देखभाल करती थी ,लेकिन दो महीने पहले वो भी इस दुनिया को छोड़ कर चली गई ।इस लिए अब उनके बेटे राज की देखभाल के लिए एक नर्स की ज़रूरत है जो दिन रात उसे संभाल सके ।


मुझे उम्मीद है बेटी तुम मेरे राज की अच्छे से देखभाल करोगी ।
मैंने भी हामी में सर हिला दिया ।
अभी तुम आराम कर लो सफर में थक गई होंगी , कल सुबह से राज तुम्हारी जिम्मेदारी होगा ।
हँसी राम बाबा ने मुझे मेरा कमरा दिखा दिया ,जो बेहद खूबसूरत था पीछे बालकनी से पूरे गाँव का व्यू दिखाई दे रहा था ।
मेरे कमरे में ही खाना , पानी रखते हुए बाबा हिदायत दे रहे थे की इसे अपना ही घर समझना और किसी भी चीज की ज़रूरत हो तो बे झिझक कह देना ।
खाना खा के कब सो गई पता ही नहीं चला ,दरवाजे खटखटाने की आवाज़ से जागते हुए दरवाज़ा खोला तो सुबह की राम राम के साथ सामने बाबा चाय लिए खड़े थे ।
आधा घंटे में ,मैं तैयार हो कमरे से बाहर आई तो सेठ अमर प्रसाद मानो मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे ,मुझे देखते हुए बोले रात नींद तो आ गई थी बेटा नयी जगह ,नए लोगों के बीच अक्सर नहीं आती ।मैंने कहा नहीं ऐसा कुछ नहीं है मुझे ऐसी कोई परेशानी नहीं हुई ।


आओ तुमको राज से मिलवाता हूँ , कह कर वो ऊपर की और सीढ़िया चढ़ने लगे और मैं भी उनके पीछे पीछे चलने लगी ।
कमरे के ताले को खोलते हुए वो कह रहे थे अब बहार से ताला लगाना पड़ता है ,पहले माँ थी इसकी तो ज़रूरत नहीं पड़ती थी ,क्योंकि वो पूरा दिन राज के ही पास रहा करती थी । अब तुम अपने हिसाब से देख लेना जैसे ठीक समझो करना .व्हील चेयर पर एक कृष काया जिसके बाल बे तरतीब से बढ़े हुए दीवारों को घूरता हुआ शांत बैठा हुआ था ।
पास जा कर उसके चेहरे पे पड़े बालों को पीछे कर जब गौर से देखती हूँ तो  ......चक्कर सा आने लगा था मुझे  ..... मेरे चारों ओर अँधेरा सा छाने लगा था , कुछ बोलना चाह रही थी पर शब्द नहीं निकल रहे थे मुँह से  ...


लगातार आँसू निकल रहे थे जो एक ही नाम पुकार रहे थे ... राजेश ।
ये तो राजेश है ,मेरा राजेश जो अठारह साल पहले मुझे छोड़ के चला गया था ,हमेशा हमेशा के लिए ।


। मैं पलट कर सीढ़ियों की तरफ दौड़ती हूँ , अपने कमरे से सामान को समेट बाहर आ सेठ अमर प्रसाद को रुंधे गले से बस इतना ही कह पाती हूँ कि मैं आपके राज की देखभाल नहीं कर सकूंगी ....नहीं कर सकूंगी  ,और हवेली के बाहर निकल पड़ती हूँ ।

सुमन गौड़
बनस्थली

इस जगह पर आने की कभी भी उसकी इच्छा नहीं थी पर क्या करे। कोई दूसरा विकल्प भी तो उसके पास नहीं था। उस पर बेहोशी के इंजेक्शन का प्रभाव क्रमश: उसी भाँति छाता जा रहा था जिस प्रकार वर्षा ऋतु में बादल धीरे-धीरे सूर्य को अच्छादित का लेते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क कार्यरत था। उससे मिलना मुझे अच्छा लगता था। खास के बाद कैन्टीन में हम दोनों उसी चिर परिचित टेबल के चारों ओर पडी कुर्सियों पर बैठ जाते जिस के ऊपर मतिमंद राजनीति की भांति, जब यह विश्वविद्यालय बना था, उसी समय का पंखा अपनी धीमी गति से चलता रहता था।

हाँ वे कुर्सियों जो कभी रंगीन आबनूसी रही होंगी उनका रंग ही नहीं उड़ गया था वरन् उनमें लगी बेंत की बुनायी भी ग्‌ल गयी थी। उन पर हम संभल कर बैठने के अभ्यस्त हो गये थे। लेकिन इन कुर्सियों पर बैठने के बैलेंसिंग एक्ट में कभी भी काफी का स्वाद खराब नहीं हुआ था। पता नहीं यह उसके साथ बैठकर काफी पीने के कारण से था अथवा वहाँ उस स्टूडेन्ट्स कैन्टीन में काफी बनती ही अच्छी थी।

एक बार काफी पीते हुये मधुर की दृष्टि उंगलियों से फिसलते हुए मेरे नाखूनों पर टिक गयी। वह काफी का सिप लेता जा रहा था और मौन था. पर उसकी निगाह मेरी उंगलियों के नाखूनों पर टिकी रही। हम दोनों काफी पीने के बाद टैगोर लाइब्रेरी के सामने निर्मित सुन्दर लम्बे टैंक जिसमें होली आने के पहले छात्रगण अपने मित्रों को इसी में फेंककर, होली का प्रारम्भ कर देते थे, टैंक में तैरती रंगीन मछलियों को निरखते, बाटल-पाम के नीचे लगी बेंच पर बैठ गये।

' 'इन रंगीन मछलियों में किस रंग की मछली तुम्हें अच्छी लगी? मधुर का प्रश्न था।

. 'गोल्ड फिश।'

''क्या तुम्हें किसी सुर्ख लाल रंग की मछली का पता है ?''

''यह तो तुम्हीं बताओ।''

मधुर मौन हो गया और ध्यान से छोटी ब्लैक मोली जो टैंक में तेजी से तैर रही थी, को देखने लगा। वह मुझे टीज करने के लिए यह हरकत कर रहा था; मैं जानती थी।

वह मेरी हल्की गुलाबी ड्रेस का व्यंग्य कर रहा था।

उस दिन शाम को मैंने हजरतगंज जाकर जीवन में पहली बार सुर्खलाल रंग की नेल पालिश खरीदी थी। विज्ञान वर्ग की छात्रायें उस समय में कम फैशन परस्त हुआ करती थीं। उनके लिये तो, जैसा कि ऑल इंडिया मुशायरे में कभी सुना था ''सादगी गहना है, इस सिन के लिए'' की बात अधिक खरी उतरती थी। दो दिनों बाद हम काफी पीने फिर कैन्टीन पहुंच गये। आमने-सामने बैठ कर आने वाले छात्र-चुनाव की बातें कर रहे थे कि पिछली बार की तरह मधुर की निगाह मेरी उँगलियों पर जाकर टिक गयी।

उसके होठों को बीच एक पतली मुस्कान की रेखा खिल गयी। वह इतनी क्षणिक भा कि कोई दूसरा शायद इस ओठों के कुतूहल को देख भी नहीं पाता। मैं-अंतरंगता के महत्व, उसकी मीठी अनुभूति से पूर्ण परिचित थी।

मधुर कुछ बोला नहीं। उसकी आंखों, में, नेत्रों में विचारों के, भावनाओं के बिम्ब झलक रहे थे। उसने भरपूर निगाहों से मुझे देखा और कहने लगा ' 'वोट किसको दोगी ?''

''उसे नहीं, जिसको तुम वोट दोगे'' मेरा मुस्कान भरा उत्तर था।

''तुम तो मेरी हर बात पर प्रतिवाद करती हो ?''

''यह मेरा अधिकार है।''

और कर्त्तव्य?

''तुम्हारे साथ काफी पीना।

वह खुलकर हंसा था-उसके दाँत सफेद और सुन्दर थे। हंसने पर वह और सुदर्शन हो उठता था।

मेरी सहेलियाँ कहती थीं कि हम दोनों की मित्रता सुन्दर दाँतों के कारण है। हो सकता है उनकी बातें, उनका अनुमान सही हो।

शिक्षण-सत्र समाप्त हो रहा था, जिस दिन अन्तिम पीरियड था. -मधुर के आग्रह पर मैंने उसके साथ क्वालिटी में चलकर काफी पीने के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया था उसने संकेतों से मुझे अपने बगल बैठने का इशारा किया था।

पर मैं बैठी उसके सामने। मुझे उसको सामने से देखने में और टीज करने में मजा आता था। क्रीम काफी आयी। हम खामोशी से उसे सिप करते रहे। कोई खास बात हुयी ही नहीं। सिर्फ 'क्वालिटी' में दूसरों की आवाजें और चम्मचों की खड़खड़ाहट ही हम सुनते रहे। पेमेन्ट कर मधुर उठा और एकाएक मेरे बालों पर, अपनी उंगलियां फिसलाता हुआ धीरे से फुसफुसाया ' 'उमा तुम्हारे बाल मुझे बहुत सुन्दर लगते हैं।''

''इसीलिये लेक्चर थियेटर में तुम मेरे पीछे बैठते हो'' अपनी आंखों में कृत्रिम रोष झलकाते हुये, मैंने उसकी आँखों में देखते हुये उत्तर दिया था।

वास्तविकता के आकलन हेतु उसने गहरायी से मेरी आंखों में झाँका था परन्तु वह बोला कुछ नहीं। वह मौन रहा। मैं उसके इस नो कमेन्ट की आदत से पूर्ण परिचित थी और यह मुझे पसन्द नहीं थी।

मधुर ने रिक्शे पर बैठने का आग्रह किया। न चाहते हुये भी मैं उसके आग्रह को अस्वीकार नहीं कर सकी। उसके साथ रिक्शे पर बैठना। मंकी ब्रिज पर गोमती की शीतल बयार ने मेरे शरीर में ऊष्मा का संचार कर दिया था। परन्तु मधुर निश्चेष्ठ बना रहा। शायद उसे मेरी कोई बात चुभ गयी थी या वह मुझे तटस्थ रहकर टीज' करना चाहता रहा हो।

समय के पंख होते हैं।

मैंने शोध कार्य प्रारम्भ कर दिया और पता चला कि मधुर को किसी इन्टरनेशनल कम्पनी में अच्छा जाब मिल गया। हम लोगों का संपर्क बर्थ डे ग्रीटिंग और न्यू इयर ग्रीटिंग द्वारा बना रहा। फोन करने से हम दोनों ने परहेज सा कर रखा था, शायद हम यथार्थ को स्वीकार करने में कतरा रहे थे।

विवाह मेरे लिये एक कटु अनुभव था। मैंने डाईवोर्स लेकर अपनी शक्ति को अपने शोध छात्र और छात्राओं के साथ जैव विज्ञान की समस्याओं के निराकरण करने में लगा दिया था। कभी-कभी शारीरिक जैव रसायन मेरे मानस को उद्वेलित कर देते थे। किसी की आवश्यकता तीव्रता से सताती थी, कष्ट देती थी, मेरे मन को, उन क्षणों में मुझे मधुर....।

एक बार. हिम्मत करके मैंने मधुर को फोन किया। पहले तो वह मेरी आवाज को पहचान नहीं पाया। पहचानता कैसे. दस साल एक लम्बा समय होता। इतने वर्षों में दुनियां बदल जाती है, लोग बदल जाते हैं।

मेरा नाम सुनकर उसने कहा था उमा! अभी मैं मीटिंग में हूँ मैं आज ही तुम्हें कॉल करूँगा।''

और उसने रात्रि दस बजे मुझे कॉल किया।

हमेशा की भाँति उसने मेरा नाम लिया और बात को प्रारम्भ करने की प्रतीक्षा करने लगा।

' 'अब तुम्हारे बच्चे तो बडे हो गये होंगे?''

' 'नहीं।''

' 'क्या मतलब ?''

''मेरे या इस तरह कहूँ कि हम निःसन्तान हैं।''

' 'क्यों ?''

''मेरी पत्नी के यूटेरस को कैंसर ने ग्रसित कर दिया था। उसको निकालना पड़ गया।''

ओह! बेरी सैड'', कहते हुए उमा स्वर काँप उठा। ''और तुम्हारा परिवार कैसा है? '' मधुर ने प्रश्न किया। ''मैने डाईवोर्स ले लिया था पिछले दस वर्षों से अकेली हूँ'' मैं ने उत्तर दिया।

''कठिन है तुम्हारा जीवन।''

' 'मैंने अपने को शोध में डुबा दिया है, मधुर, .मेरे स्वर के दर्द को मधुर शब्दों के माध्यम से देख रहा था।

''फोन तो तुमने सकारण किया होगा?''

हां मधुर! एकाकीपन कभी कभी त्रासद हो जाता है। '

'तुम .अभी चालीस की भी नहीं हो।''

''मैं तुम्हारे संकेत को समझ रही हूँ। पर वह मैं चाहती नहीं।

उमा का स्वर मधुर को कहीं दूर से आता हुआ लगा। '

'फिर. '' मधुर ने संशयात्मक स्वर में कहा।

' 'उस शहर में स्पर्म बैंक तो होंगे ही यों कहना चाहिये कि दो स्पर्म बैंक हैं वहाँ'' उमा, ने बात पूरी नहीं की।

' अच्छा फिर'' मधुर के स्वर में विस्मय का मिश्रण था।

फोन पर कुछ क्षणों का मौन रहा फिर उमा की आवाज आयी मधुर (यह नाम उमा ने दस वर्षों के बाद लिया था) क्या तुम अपना स्पर्म वहाँ डोनेट कर सकते हो?''

''ओह। तुम्हारा तात्पर्य ?'' उधर से आश्चर्य भरी ध्वनि थी। ''

तुम्हें याद है क्वालिटी से तुम्हारे साथ रिक्शे पर वापस आते समय तुम्हारा पाषणवत बने रहना।

'' तो तुम्हें वह क्षण अब भी याद है?'' अचरज भरा मधुर का स्वर उमा को प्रिय लगा।

' 'यदि तुम साहस किये होते, तो यह दस वर्षों की घटना घटित नहीं हुई होती'' उमा के स्वर में उलाहना की पीड़ा थी.

' 'ओह। '' एक गहरी सांस लेकर मधुर कुछ कहना चाहते हुये भी कह न सका।

' 'वह मेरी '' मधुर की बात अधूरी रही ।

' 'तुम अब क्या चाहती हो''

' 'कर सकी तो कहूँ''।

''हां कहो।'

''क्या तुम अपना स्पर्म - स्पर्म बैंक में डिपाजिट कर सकते हो ''

' 'तुम्हारा तात्पर्य है कि तुम उससे. ''।

' 'माँ मधुर। तुम ठीक समझ रहे हो। मैं यही चाहती हूँ.

' 'उमा के स्वर की व्यथा और अनुरोध को मधुर समझ गया था।

''मैं प्रिया से भी बातें कर लूँ-प्रिया मेरी पत्नी है उमा 'मधुर ने कहा।

'' मैं प्रतीक्षा करूँगी'' कहते हुये उमा ने फोन रख दिया। बीते क्षण कितने मधुर होते हैं- वह सोच रही थी।

मधुर का फोन आया तीन दिनों के बाद परन्तु यह तीन दिन उमा को बहुत ही लम्हे लगे। मधुर ने उमा को बताया कि उसकी पत्नी ने स्वीकृति दे दी और वह इसी संदर्भ में उससे बात करना चाहती है। उमा ने धड़कते दिल से मधुर की पली से बात की।

फोन के बाद वह प्रसन्न थी, उसका उद्वेलित मन शान्त था।

'' इन.. इन-वीट्रो-इम्प्लान्टेशन ''सफल रहा है। उमा की डाक्टर ने समयानुसार चेकिंग के बाद उसे सूचित किया। उमा इस समाचार से उत्साहित थी। मधुर को उसने एसएमएस कर दिया था ।

उमा की डाक्टर ने अस्ट्रा साउन्ड की रिपोर्ट देखी। वह विस्मित नेत्रों से प्लेट के देख रही थी।

. 'क्या बात है डाक्टर आप कुछ चकित दिख रही हैं' उमा का प्रश्न सुनकर डाक्टर मौन रही।

. 'यह विचित्र केस है, ऐसा तो दो करोड़ केसों में मात्र एक बार देखा जाता है'' कहती हुयी डाक्टर ने फिर रिपोर्ट को और प्लेट को ध्यान से देखा।

''जी मुझे भी बताइये '' उमा के आग्रह पूर्ण स्वर में निहित वेदना की पीडा को डाक्टर अनदेखी न कर सकी। ''तुम्हारा डिम्बाणु पहले दो भागों में विभाजित हुआ और फिर एक भाग दो में पुर्नविभाजित हो गया। इस प्रकार तीन पुत्र तुम्हारे गर्भ में पल रहे हैं'' कहकर डाक्टर ने उमा को ध्यान से देखा। उमा का चेहरा रक्ताभ था और उसके होठों पर मंद मुस्कान थिरक रही थी। तीन समान गुण के बच्चे.

आईडन्टिकल ट्रिपलेट, वह -'सोच रही थी।

मेरे लिए एक शिशु पर्याप्त है. शेष दो मैं।

प्रकृति के संवेग को समझना कठिन है। उमा को पीड़ा की अनुभूति हुयी।

उमा कराह रही थी। पीड़ा ने उसकी बेहोशी जनित चेतना को जागृत कर दिया था। वह सिस्टर को देखकर धीरे से बोली '' वे लोग अभी तक नहीं आए'

दूसरे पल दरवाजे पर नाक करने की आवाज आयी। सिस्टर ने दरवाजा खोला।

दरवाजे पर एक पुरुष और महिला प्रतीक्षारत थे।,,

''मैं मधुर हूँ क्या मैं उमा से मिल सकता हूँ ?''

''आइये'' कहती हुयी सिस्टर हट गयी।

मधुर तो भीतर आ गया, पर उसकी पत्नी बाहर रुक गई।

सिस्टर ने दरवाजा बन्द कर किया। धड़कते दिल से घबराया, हुआ मधुर रूम में आ गया।

मधुर को देख उमा के चेहरे पर प्रसन्नता हिलोरें लेने लगीं. मधुर ने उमा का हाथ पकड लिया . दूसरे क्षण मधुर का हाथ उमा के होठों पर था।

उमा कराह उठी।

सिस्टर ने मधुर को बाहर जाने का संकेत कर आप्रेशन थिएटर की तरफ बेड को बढ़ा दिया उमा के चेहरे पर चादर उसके दाहिने हाथ की उठी हुयी दो उँगलियों पर लगी पोलिश को मधुर ध्यान से देख रहा था।

***

परिचय:

डॉ. राजीव रंजन उपाध्याय; जन्म; ४ मार्च १६५२, शिक्षा: एम-एस-सी. लखनऊ विश्वविद्यालय), पीएच.डी. (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय-वाराणसी, नोराड (नारवे) एव अलैक्जैंडर-फान हनवोल्ट-फेलो (जरमनी), पूर्व प्रोफेसर कैंसर शोध, तबरीज़ विश्वविद्यालय, ईरान । विज्ञान कथाओं की दशाधिक पुस्तकें एवं अखिल भारतीय स्तर के प्रतिष्ठित पत्रों एवं पत्रिकाओं में अनेक विज्ञान कथाएँ प्रकाशित तथा कुछ हिब्रू बंगला में अनुवादित, पुरस्कार-सम्मान : ईरान का कैंसर शोध पुरस्कार 1978, अमेरिकन बायोग्राफिकल इंस्टीट्‌यूट के रिसर्च बोर्ड का सम्मान 1991 विज्ञान-वाचस्पति मानद उपाधि 1996, विज्ञान-कथा-भूषण सम्मान 2001, पद्मश्री सोहनलाल द्विवेदी जन्मशती हिन्दी-सेवी सम्मान 2005, अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कार रजत अलंकरण 2006, साहित्य दिवाकर ( २००७, सम्पादक सरताज २००७, भारत गौरव २००७, सम्पादकश्री २००८, शान्तिराज हिन्दी गौरव अलंकरण 2008, सम्पादक सिद्धहस्त 2008, सम्पादक शिरोमणि 2011, वितान-परिषद प्रयाग सम्मान 2013, गणेशदत्त सारस्वत सम्मान (२०१३), विज्ञान परिषद् प्रयाग : सारस्वत-सम्मान 2015 आदि । सम्प्रति स्वतंत्र रूप से विज्ञान कथा लेखन ।

संपर्क:

ईमेल : rajeevranjan.fzd@gmail.com

हम अखबार पढ़ने के इतने आदी हो गए हैं कि सुबह के वक्त अगर अखबार न आए तो तो लगता है सारा दिन बेकार हो गया | सुबह चाय की चुस्की लेते हुए हम अखबारों में समाचार पढ़ते हैं | भले ही टी वी और इन्टरनेट जैसी सुविधाएं हमें प्राप्त क्यों न हों, बिना अखबार पढ़े चैन नहीं आता | आखिर खबरों का खज़ाना हमें वहीं से मिलता है |

खबर को अंग्रेज़ी में न्यूज़, हिन्दी में समाचार और उर्दू में खबर कहा जाता है | इनमें न्यूज़ की कहानी बेहद दिलचस्प है | बारहवीं शताब्दी के पूर्व इंग्लैंड में एक युद्ध हुआ था- जर्मन और केल्ट लोंगे के बीच | तब हर रोज़ लड़ाई के नतीजे जानने के लिए केल्ट महिलाएं पहाड़ियों के नीचे आकर सवाल पूछ्तीं “व्हाट इस न्यू?”, नया क्या हुआ? लड़ाई के अंतिम दिनों में इतनी अधिक खबरें आने लगीं कि औरतों ने न्यू का बहुवचन “न्यूज़” बना दिया | और पूछने लगीं, व्हाट इस न्यूज़? यानी, क्या क्या हुआ? कालान्तर में यही न्यूज़ शब्द खबर के लिए रूढ़ हो गया | इसे समाचार के लिए पर्यायवाची मान लिया गया |

अत: कहा जा सकता है कि अंग्रेज़ी में जिसे न्यूज़ कहते हैं ये वे घटनाएं हैं जिनमें कुछ न कुछ नयापन होता है | सामान्य रूप से घटित होने वाली घटनाएं न्यूज़ नहीं बनातीं | ह्त्या, बलात्कार, चोरी, डकैती, युद्ध, आगजनी के क़िस्म की घटनाएं जो सामान्य जीवन धारा से हटकर हैं न्यूज़ बन जाती हैं | ऐसी घटनाएं हमें किसी भी दिशा में क्यों न मिलें अखबारों में छपने लायक मसाला जुटाती हैं | जी हाँ, किसी भी दिशा में | न्यूज़ के चारों अंग्रेज़ी अक्षर - एन, ई, डब्ल्यू एस – चारों दिशाओं की और ही तो संकेत करते हैं | नोर्थ, ईस्ट, वेस्ट और साउथ – उत्तर, पूर्व, पश्चिम और दक्षिण |

हिन्दी शब्द, समाचार, को न्यूज़ का पर्यायवाची मना गया है | पर यह भ्रामक है | ‘समाचार’ सम+आचार को जोड़ कर बनाया गया है | इस प्रकार इसका अर्थ हुआ, जैसा कि अपेक्षित है , जो सामान्य रूप से स्वीकार्य है, -वैसा आचरण | आप कभी बिहार के भोजपुरी क्षेत्र में जाकर गौर करें वहां इस शब्द का सही उपयोग सुन पाएंगे | वहां लोग यह नहीं पूछते - कहिए, क्या समाचार हैं? वे पूछते हैं – समाचार तो है न ! इस अर्थ में स्पष्ट ही सामान्य आचरण से हटकर किसी नए आचार-व्यवहार का संकेत नहीं है , जैसा की ‘न्यूज़’ में निहित है | वहां पूछा जाता है,“समाचार बा नूं !” समाचार तो है , सब कुछ सामान्य तो है ! समाचार में कुछ भी नया नहीं होता | यह सामाजिक व्यक्तियों दवारा प्रतिदिन बरतने वाला सामान्य आचरण है | लेकिन आज के समाचार पत्रों में सम + आचरण के लिए कोई स्थान नहीं है | उनमें तो बस ‘न्यूज़’ ही होती है |

न्यूज़ के लिए एक अन्य शब्द जो हिन्दी में प्रयोग में आता है, वह है, ख़बर | ख़बर वस्तुत: अरबी भाषा का शब्द है जिसे हिन्दी/उर्दू में पूरी तरह अपना लिया गया है | ख़बर का अरबी भाषा में बहुवचन ‘अख़बार’ है | अखबारों में हम “खबरें” पढ़ते हैं इसलिए उन्हें अखबार कहा गया है | लेकिन खबर का अर्थ केवल सूचना या समाचार ही नहीं होता | खबर – होश या चेतना के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है | होश में आ जाओ, खबरदार हो जाओ | अभी तक नहीं चेते तो अब चेत जाओ | इन अर्थों में भी खबर हिन्दी में खूब प्रयुक्त होता है |

इतना ही नहीं, डांटने, फटकारने, दंड देने के लिए भी खबर शब्द का इस्तेमाल देखा जा सकता है | हम बच्चों को अक्सर डांटते हैं कि अब दोबारा गलती की तो ख़बर ली जाएगी, अर्थात, तुम्हें सज़ा दी जाएगी | खबर शब्द हिन्दी में इन सभी अर्थों में प्रयुक्त होता है | हिन्दी ने इसे पूरी तरह अपना जो लिया है !

यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाचार पत्रों में सामान्य जीवन से सम्बंधित बातें छपती ही नहीं | उनमें सामान्य आचरण के अपवाद ही मुख्य स्थान प्राप्त कर पाते हैं | सामान्य जीवन के अपवाद ही अब समाचार (सम+आचार) बन गए हैं | समाचार पत्रों से यदि आप किसी समाज के सामान्य लोगों के सामान्य जीवन के बारे में जानना चाहें तो शायद निराशा ही हाथ लगे |

डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो. ९६२१२२२७७८ )

१०, एच आई जी / १, सक्चुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

ए... चश्मे वाले...!/

 

कहानी

 

क़ैस जौनपुरी

qaisjaunpuri@gmail.com

 

ट्रेन रुकी. बहुत सारे लोग छोटे से डिब्बे में चढ़े. कुछ उतरे भी. एक साथ चढ़ने-उतरने में कुछ लोग आपस में टकराए भी. कुछ अपना गुस्सा पी गए. कुछ ने कुछ नहीं कहा. वहीं एक से रहा नहीं गया. वो उतरने ही वाला था कि एक चढ़ने वाले से टकरा गया. भीड़ में कोई ज़रा सा धक्‍का दे दे तो आदमी का सारा गुस्सा बाहर आ जाता है. आजकल तो इन्सान इतना गुस्से वाला हो गया है कि छोटी सी बात पे भी जान ले लेने पे उतारू हो जाता है, ख़ून कर देता है.

चढ़ने वाला चढ़ गया था. उतरने वाला उतर गया था. लेकिन कुछ था, जो उतरने वाला कहना चाहता था, जो वो गेट पे नहीं कह पाया था, भीड़ की वजह से. लेकिन उसने उस चढ़ने वाले का हुलिया देख लिया था. आगे खिड़की पे जाके उसने देखा, वो चढ़ने वाला अन्दर आ चुका था. उतरने वाला अचानक से बोल गया, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

ये गाली अचानक से पूरे डिब्बे में हवा की तरह फैल गई. उस आदमी ने मुड़के देखा, मगर वहाँ कोई नहीं था. ट्रेन चल चुकी थी. उस आदमी ने गेट पे भी जाके देखने की कोशिश की कि वो कौन था, जिसने कहा, “ए भोस**...चश्मे वाले...!!!”

अब ट्रेन चल रही थी. गाली देने वाला जा चुका था. उसकी भड़ास तो निकल चुकी थी. लेकिन इस आदमी के लिए मुसीबत हो गई. उसे अपने चश्मे से नफ़रत सी हो गई. अगर ये चश्मा नहीं होता, तो उसे कोई इस तरह नहीं कहता, “ए भोस**...चश्मे वाले...!!!”

उसे ऐसा लगा, जैसे उसका काला चश्मा चूर-चूर होके उसकी आँखों में घुस गया हो. उसने अपना चश्मा निकाल के फेंक देना चाहा, मगर फिर रुक गया. उसे लगा, “इस चश्मे की वजह से मेरी आँखें ढँकी हुई हैं. इसे उतार दिया तो लोगों से नज़र कैसे मिलाऊँगा...?”

उसके कानों में अब एक ही आवाज़ गूँज रही थी, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” वो आदमी जैसे नाच गया हो. उससे रहा नहीं गया. लेकिन वो कुछ कर भी नहीं पा रहा था. वो बेचैन हो गया था. और जिसने उसे बेचैन किया था, वो वहाँ नहीं था. उसने एक भारी सा पत्थर उस डिब्बे में छोड़ दिया था, जो आवाज़ बनके डिब्बे के कोने-कोने में फैल गया था. ट्रेन के लोहे के बने डिब्बे का हर हिस्सा जैसे कह रहा हो, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

उस आदमी को समझ में नहीं आया कि अब वो जाए किधर! ट्रेन चल रही थी. वो कूद भी नहीं सकता था. कूदता तो मर जाता. इस डर से वो कूदा नहीं. लेकिन अगले ही पल वो सोचने लगा, “कूद जाता, तो अच्छा था. इतने लोगों का मुँह नहीं देखना पड़ता.” उसे शर्म महसूस हो रही थी. उसके साथ डिब्बे में मौज़ूद हर आदमी, जैसे उसे देख के कह रहा हो, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

ट्रेन में खड़े होकर सफ़र करने वाले लोगों के लिए बने हुए ढेर सारे हैण्डल, ट्रेन चलने के साथ इधर-उधर हिल रहे थे. उस आदमी ने देखा, जैसे सारे हैण्डल ख़ुशी में झूम रहे हैं और उसे ही देखके कह रहे हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” और ख़ूब हँस रहे हैं.

ट्रेन के डिब्बे में कुछ इश्तिहार लगे हुए थे. “लड़के चाहिएँ... तनख़्वाह बीस से तीस हज़ार रुपए महीना... घर बैठे काम करें.... दो दिन में पैन कार्ड बनवाएँ... डिलीवरी हाथों हाथ... बाबा बंगाली अजमेर वाले... शाह जी बंगाली मलाड वाले... हर समस्या का समाधान एक घण्टे में... 100% गारण्टी के साथ... प्यार में धोखा, बिजनेस में तरक़्क़ी, सौतन से छुटकारा, जादू-टोना, किया-कराया... फ़िल्मों में सफलता... हर समस्या का हल...”

वहाँ एक फ़ोन नम्बर भी लिखा था. उसे लगा कि फ़ोन मिला के बाबा बंगाली को ही अपनी समस्या बता दे. मगर वो भी उसकी समस्या दूर करने के लिए एक घण्टा लेंगे, इसलिए नहीं किया. उसे अपनी समस्या का हल तुरन्त चाहिए था. उसे कोई ऐसी दवा चाहिए थी, जो वो अपने माथे पे मल ले और भूल जाए कि किसी ने उसे गाली दी है. वो चाहता था, कोई ऐसी दवा, जो अपने कानों में डाल ले और उसे अब सुनाई न दे, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” और ऐसी कोई दवा उसे सूझ नहीं रही थी जो उसकी इस आवाज़ को भूलने में मदद कर सके.

“ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” ये आवाज़ अब गूँजने लगी थी. वो आदमी एक जगह से उठकर दूसरी जगह बैठ जाता था. मगर उसे लगता था जैसे सामने बैठा हुआ आदमी वही आदमी है जिसने कहा था, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” फिर वो खड़ा हो जाता था, दूसरी जगह तलाशता था, सोचता था, “गाली देने वाला तो उतर गया. ये सब तो नए लोग हैं.” ऐसा सोचके वो दूसरी जगह बैठ जाता था मगर अगले ही पल उसे “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” सुनाई देता था. सामने बैठा हुआ आदमी भले ही किसी भी हालत में बैठा हो, इस आदमी को यही लग रहा था जैसे सामने बैठे हुए आदमी ने भी “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” सुना था, और अब वो भी मुस्कुरा रहा है.

वो वहाँ से भी उठ गया. इधर-उधर देखने के बाद उसे ट्रेन की दीवार पे कुछ लिखा हुआ दिखा. लिखा था, “सेक्स...” और साथ में एक नम्बर लिखा हुआ था. मतलब ये था कि अगर आपको सेक्स चाहिए तो ये नम्बर मिलाइए. वो आदमी भन्‍ना सा गया. उसे गुस्सा सा आया. वो मन में ही कुछ बुदबुदा के रह गया. फिर उसने सोचा, “क्‍या पता दिमाग़ बदल जाए...??? मैं भूल जाऊँ, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” मगर वो नम्बर नहीं मिला सका. उसने सोचा, “अभी तो लोग, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” ही कह रहे हैं. नम्बर मिलाया तो लोग ठरकी भी कहेंगे.” इसलिए उसने रहने ही दिया.

तभी उसे ट्रेन में दूसरी तरफ़ एक औरत बैठी हुई दिखी. उसके सामने की सीट ख़ाली थी. वो वहाँ जाके बैठ गया. उसने सोचा, “ये औरत है. गाली नहीं देगी.” उसने एक नज़र उस औरत को देखा. सेहतमन्द औरत थी. मोट-मोटे बाज़ू थे. सोने के गहने पहने हुए थे. गुलाबी रंग की सलवार-कमीज़ पहने हुए थी. उस आदमी को थोड़ी राहत महसूस हुई. उसने उस औरत का चेहरा देखा. उसके मोटे-मोटे होंठ थे. जैसे ही उसने उस औरत के होंठों को देखा, उसे लगा वो मोटे-मोटे होंठ मुस्कुरा के कह रहे हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

फिर उस आदमी ने तुरन्त अपनी नज़र उस औरत के होंठों से हटा ली. उसने उसके बाज़ू देखे. मोटे-मोटे बाज़ू. फिर वो सरकते हुए उसकी कुहनी, फिर उसकी हथेली को देखने लगा. उसके हाथों का रंग थोड़ा गहरा था. उसने अपने मन में कहा, “गोरी नहीं है.” उसको तुरन्त जवाब मिला, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

वो आदमी सकपका सा गया. ये किसने कहा...? उसने देखा, हाथों को तो मुँह नहीं है, फिर किसने कहा...? तभी उसे लगा कि उस औरत का अंग-अंग बोल रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उसके कान की बाली बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उसके हाथ की चूड़ी बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत का गुलाबी सूट बोल रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत की मोटी गरदन बोल रही है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत की मोटी-मोटी छातियाँ बोल रही हैं, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” उस औरत का हर हिस्सा, जहाँ-जहाँ उस आदमी की नज़र जा रही थी, बोल रहा था, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!”

उस आदमी को यहाँ भी आराम न मिला. उसको अब लगा कि मेरे कान फट जाएँगे. उसने सोचा, “मैंने ऐसा कौन सा गुनाह किया था...? सिर्फ़ सबकी तरह ट्रेन में चढ़ा ही तो था. उस आदमी को भी मैं ही मिला था क्‍या...?”

तभी अगले स्टेशन पे ट्रेन रुकी. उसने सोचा, “अब क्‍या करूँ...? जाना तो और आगे है...?” तभी उसने सुना, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” इस बार ये ट्रेन के गेट ने कहा था. उसको लगा कि ट्रेन का गेट उससे कह रहा है, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!! अब तो उतर जा...!!!” और फिर उसने आव देखा न ताव, झट से नीचे उतर गया.

अब ट्रेन फिर से चल दी थी. ट्रेन उसकी आँखों के सामने से दूर जा रही थी. वो डिब्बा जिसमें वो सवार था, आगे निकल चुका था. जैसे ही ट्रेन उसकी आँखों के सामने से ओझल हुई, उसने एक धीमी आवाज़ में सुना, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” इस बार उसे इतना बुरा नहीं लगा क्‍यूँकि इस बार आवाज़ कर्कश नहीं थी, और दूर से आई थी, ऐसा लग रहा था. और फिर धीरे-धीरे वो आवाज़, “ए भोस**... चश्मे वाले...!!!” हवा में घुल गई और गुम हो गई.

***



हर युग में परिधान हमारी जीवन शैली का प्रमुख परिचायक रहा है। परंतु अब हमारी सोच में परिवर्तन आया है। आदिकाल में परिधान सिर्फ तन ढकने का एक साधन मात्र होता था। उस समय लोग धूप, ठंड, वर्षा से बचने के लिए किसी भी तरह की चीजों को शरीर से लपेट लेते थे। परिधान का अर्थ होता है, पहिनावा! चाहे वह कपड़ा हो, या पेड़ की छाल या कुछ और परंतु आज कपड़े को ही परिधान समझा जाता है। कपड़ा जबसे चलन में आया, यह मानव सभ्यता के विकास को परिलक्षित करने का प्रमुख माध्यम बन गया। लोगों की जीवन शैली में कपड़े का महत्व हर दृष्टिकोण से था। जैसे मौसम से तन की सुरक्षा, दिखने में सुन्दरता, अपनी साख का परिचय देना, घर की साज सज्जा, पंडालों, तंबुओं, ध्वजा, सैन्य उपयोगों के अलावा भी बहुत सी चीजों में कपडो़ का उपयोग होने लगा। परंतु समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। और साथ ही बदल गई, परिधान पर हमारी 'सोच'! अब तो यह हवा,पानी,भोजन से भी ज्यादा जरूरी समझा जाने लगा है।
भिन्न-भिन्न रंग भिन्न-भिन्न भाव दर्शाते हैं। जैसे सफेद रंग शांति, शीतलता,शालीनता,लाल रंग क्रोध, उग्रता,चिंता नीला रंग गहराई,उंचाई, वृहदता, काला रंग निरस्ता,शोक, विरोध का प्रतिक माना जाता है। ठीक उसी प्रकार परिधानों में भी संकेत छुपे होते हैं। और हम जाने अनजाने उन संकेतों से अपने व्यक्तित्व और सोच को प्रदर्शित करते हैं। जब हम नये,अच्छे कपड़े पहने होते हैं तब लोग स्वत: ही अनुमान लगा लेते हैं की हम कोई उत्सव मना रहे हैं या हमारे लिए कोई विशेष अवसर है। पुराने कपड़ों में हम उदासीन नजर आते हैं।


कपड़े को अंततः हम कचरे में ही फेंकते हैं या जलाते हैं दोनों ही तरीकों में हमारा पर्यावरण प्रदूषित होता है। यहां भारतीय परिधान की वैज्ञानिकता को समझना आवश्यक है। साड़ी, धोती, कुरता, पैजामा या काटन, सूती के कपड़े मुख्य भारतीय परिधान हैं। इन कपड़ों से शरीर को आराम मिलता है। जैसे सूती साड़ी पहने माँ की गोद नर्म मुलायम बिछौने सा अहसास कराती है ऊपर से माँ से सुरक्षा का अहसास शिशु को स्वस्थ, निर्भय बनाता है। हमारे पहने हुए कपड़े भी बार-बार उपयोग में लाये जा सकते हैं। पुराने जमाने में साड़ी के पुराने होने पर उसे पर्दा, गद्दे का खोल, या खपरैल वाले घरों में पाल की तरह और कुरते पैजामों को थैले, चिंदी या इस तरह के अन्य उपयोग में लाया जाता था। पर अब कोई भी व्यक्ति घर से थैला लेकर बाजार नहीं जाता और साड़ी को पर्दा बनाने की बात पर तो लोग कंजूस और न जाने क्या-क्या कहने लगें! ऐसा कहने वाले लोग क्या बता सकते हैं कि फटी जिंस और छोटे कपड़ों को पहन कर स्टाइल कहने वाले लोगों को क्या कहेंगे? सूती काटन जैसे कपड़े जिंस टी शर्ट जैसे कपड़ों की तुलना में जल्दी सड़-गल के मिट्टी बन जाते हैं। हम कपड़ों का पूर्ण उपयोग करके अप्रत्यक्ष रुप से पर्यावरण की सुरक्षा कर सकते हैं।
हम अपने मूड के हिसाब से कपड़े तो पहनते ही हैं पर मजे की बात ये है कि कई बार कपड़ों के हिसाब से हमारा मूड ढल जाता है। कपड़ों का सही चयन भी एक तरह की कला है। आजकल ज्यादातर लोग नकल करना पसंद करते हैं और इस वजह से बहुत से लोग बेहूदे कपड़े पहने भी आसानी से नजर आ जाते हैं। जबकि अन्य देशों में भारतीय परिधान के लिए रुचि बढ़ी है और लोग इसे सहजता से अपना भी रहे हैं।


आपने एक जुमला "आप रुचि भोजन, पर रुचि श्रृंगार" सुना ही होगा। जब भी मैं इस जुमले को सुनता हूं तो मेरे जेहन मे एक सवाल आता है कि "क्या किसी दूसरे की पसंद, नापसंद हमारी निजी जिन्दगी में इतनी मायने रखती है कि हम अपने कपड़े भी दूसरों की मर्जी से चयन करें"। और अगर ऐसा ही है, तो फिर जब किसी को भड़कीले, छोटे या तंग कपड़ों के लिए टोका जाता है, तो टोकने वाले को गलत और रुढ़ीवादी व्यक्ति क्यों समझा जाता है। जब हमने कपड़ों का चुनाव ही दुनियावालों को दिखाने के लिए किया है, तो उन्हीं के टोकने पर हमें बुरा क्यों लगता है। और यदि ऐसा नहीं है तो तंग,छोटे कपड़ों की जरुरत और वैज्ञानिकता अगर कोई बताये तो समाज उनको टोकेगा भी नहीं और स्वयं भी तंग कपड़ों के फायदे भी ले सकेगा। तंग कपड़ों के विषय में डॉक्टर भी कह चुके हैं कि यह बहुत सी बीमारियों की जड़ है। गर्भवती महिलाओं को तो विशेष रुप से टोका जाता है।


वास्तव में पूरे विश्व में कपड़े का उपयोग जलवायु के हिसाब से हुआ और एक समय के बाद वही उन देशों की पहचान बन गई। जैसे ठंडे इलाकों में तन को पूर्ण रुप से ढंकने वाले मोटे कपड़े पहने जाते थे उन्हें अब अपनी आवश्यकता अनुसार ढाला जा रहा है जैसे लांग कोट, मफलर, हैट, जिंस ऐसे कपडे़ ठंड से बचने में कारगर होते हैं और सुंदरता भी बढाते हैं। ऐसे ही ज्यादा गर्म इलाकों में इलाकों में हल्के रंग कम कपडो़ का चलन बढ़ गया क्योंकि पूरे वर्ष भर गरमी का सामना करने के लिए ये कपड़े सहायता करते हैं। परंतु हम जिस तरह की जलवायु में रहते हैं हमें मौसम के परिवर्तन के साथ अपने परिधानों का चयन करना चाहिए।


ऐसे भी भारतीय परिधान स्वयं में इतने परिपूर्ण हैं कि हमें किसी नकल की आवश्यकता ही नहीं है। विकृत आधुनिकता को स्वीकार के हम भारतीय कारीगरों की कला को नजर अंदाज करते जा रहे हैं। पहले हमारे यहां के कारीगरों द्वारा बनाई गई छ: मीटर लंबी साडी़ एक माचिस की डिबिया में समा जाती थी। हमारे यहाँ की कारीगरी और कला उन्नत किस्म की मानी जाती थी, पर आज स्थिति ऐसी बन गई है कि विश्व में पहचान दिलाने वाली पारंपरिक कला विलुप्ति के कगार पर है। जबकि विश्व के कई देश इसे जीवित रखते हुए पहले से और ज्यादा मजबूत भी बना रहे हैं। भारत विश्व के लिए हमेशा ही आदर्श रहा है। पर हम अपनी ही ताकत और उपलब्धियों से विमुख क्यों हो रहे हैं? क्या हर कार्य के लिए कानून ही बनाना आवश्यक है? क्या इसके बिना हम अपना फर्ज नहीं निभा सकते ? हम आवश्यकता के अनुसार भारतीय परिधान पहन कर शालीनता सभ्यता का परिचय दे सकते हैं। लाखों कलाकारों को रोजगार भी दे सकते हैं। भारतीय संस्कृति, परंपरा को जीवित रख सकते हैं।


सोचिए जब किसी महिला को कम कपड़ों के लिए टोका जाता है तो टोकने वाले व्यक्ति के चरित्र और सोच पर कैसे सवाल खड़े किये जाते हैं। यदि किसी दफ्तर में कोई महिला छोटे,तंग कपड़े पहन कर आ जाये तो उसे कोई कुछ नहीं कह सकता। लेकिन वहीं कोई पुरुष हाप पेंट और बनियान में काम करने आ जाये, क्या तब भी उसे कोई कुछ नहीं कहेगा? मेरे ख्याल से उसे तुरंत टोक दिया जायेगा। अब ये सोचिए कि लोग जब छोटे कपड़ों की अवहेलना करते हैं तो वह किसी महिला को गलत नहीं ठहराते! बल्कि ओ तो पुरी संस्कृति की बात करते हैं। जिसे लोग अलग रंग दे देते हैं। परिधानों पर हमारी सोच बदली तो है। पर वास्तव में हम किस दिशा में जा रहे हैं ये सोचने का विषय है।

ललित साहू "जख्मी" छुरा
जिला - गरियाबंद (छ.ग.)

शब्द-सन्धान दन्त / दांत

डा. सुरेन्द्र वर्मा

अच्छे स्वास्थ्य के लिए दांतों की देखभाल बहुत ज़रूरी है। हिन्दी में दांत के लिए दन्त शब्द, जो वस्तुत: संस्कृत से आया है, का भी प्रयोग होता है। हिन्दी में दन्त के योग से अनेक संयुक्त शब्द बने हैं। दंतमंजन, दन्त-चिकित्सा, दन्त-रोग, दन्त-क्षत, दन्त-शूल आदि।

पंडित लोग कथा करते हैं और लेखकों द्वारा कथाएँ लिखी जाती हैं। लेकिन एक कथा “दन्त-कथा” भी होती है। दन्त कथा दांतों के बारे में कोई कथा नहीं है। ऐसी दन्त कथा शायद कभी लिखी भी न गई हो। यह तो जनश्रुति है, किम्वदंति है। किसी ने कभी कही और जन मानस में याद रह गई। ‘दन्त-कथा’ बन गई।। सामान्यत: लेखक कथाएँ भी लिखता है लेकिन “दन्त- लेखक” दांतों पर कथा लिखने वाला लेखक नहीं होता। यह दांतों की सफाई / रंगाई से जीविका चलाने वाला व्यक्ति है। वीणा एक वाद्य है जिससे संगीत पैदा किया जाता है। ‘दन्त-वीणा’ भी अपनी ही तरह का एक संगीत पैदा करती है। जी हाँ, दांतों के किटकिटाने को दन्त-वीणा कहते हैं।। दन्त-शोक बेशक मसूड़े की सूजन से उत्पन्न शोक है, लेकिन दन्त-हर्ष कोई प्रसन्नता की बात नहीं है। ठंडा पानी लगने से होने वाली यह भी दांत की पीड़ा ही है। पता नहीं यह दन्त-हर्ष कैसे कही जाने लगी !। आलय, जैसा कि हम जानते ही हैं, आश्रय-स्थान है। घर है, मकान है। देवालय वह जिसमें देवता वास करते हैं। दांतों का भी एक आश्रय स्थान है। वह व्यक्ति का मुख है। इंसान का मुंह उसका दंतालय कहा गया है।। आपने कई प्रकार के दर्शन किए और पढ़े होंगे। मंदिर में आप देवता के दर्शन करने जाते हैं। किताबों में आप वेदान्त-दर्शन पढ़ते है। लेकिन ‘दन्त-दर्शन’ कोई ऐसा दर्शन नहीं है जिसे किया या पढ़ा जा सके। यह लड़ाई-झगड़े आदि, में होठ फड़फड़ाते हुए दांत पीसना है। वैसे तो मुंह के अन्दर ही रहते हैं लेकिन गुस्से में दांत पीसते समय वे सार्वजनिक रूप से अपने दर्शन जो देने लगते हैं।

अंग्रेज़ी में दांत को “टुथ” कहते हैं। दन्त और टुथ में क्या कोई समानता देखी जा सकती है ? पर फ्रेंच भाषा में दन्त को बेशक “डेंट” कहते हैं। उच्चारण की दृष्टि से “दन्त” और “डेंट’ दोनों बहुत नज़दीक हैं। दन्त को यदि आप अंग्रेज़ी अक्षरों में लिखना चाहें, तो कैसे लिखेंगे ? इसके हिज्जे ‘डी ई एन टी’ तो बेशक नहीं होंगे। पर ई की जगह ए का इस्तेमाल करें, “दन्त’ ही लिख जाएगा। मजेदार बात यह है की अंग्रेज़ी में ‘डेंट” का मतलब छोटी-मोटी पिचक से है ( जैसे धक्का लगने से कार में डेंट पड़ गया ) न कि दांत से; दांत को तो अंग्रेज़ी में टुथ कहते हैं। पर दांत संबंधी सारी शब्दावली अंग्रेज़ी में “डेंट” से ही बनी है , जैसे, ‘डेंटिस्ट’ ‘डेन्चर’ आदि। ठीक ऐसे ही, हिन्दी में दन्त से दन्त-चिकित्सक, दन्तावली आदि बने हैं।

फारसी में यही दन्त “दंदां” हो गया। पहले एक दंत-मंजन आता था (क्या पता अब भी मिलता हो)। नाम था,अक्सीर दंदां, यानी दांतों के लिए अक्सीर। बाबा रामदेव ने आपके दन्त चमकाने के लिए “दन्त-कांति” बनाया है।

अगर कोई दांत आगे की ओर निकला हुआ होता है तो वह अलग से ही चमकता है, ठीक ऐसे ही जैसे दीवार से निकली हुई खूँटी अलग से दिखाई देती है। शायद इसी लिए इसे “दन्तक’ कहते हैं। किसी पर्वत की चोटी के पास आगे की ओर निकला हुआ पत्थर भी दन्तक ही कहलाता है।। जब कोई दो व्यक्ति गुत्थमगुत्था करते हैं तो अक्सर लड़ाई झगड़े में एक दूसरे को दांत से काटने भी लगते हैं। गुत्थमगुत्था के वजन पर इसे “दंतादंति” कहा गया है।। हाथी एक ऐसा पशु है जिसके दो बड़े बड़े दांत बाहर को निकले हुए होते हैं। इसीलिए हाथी को “दंताल” या “दंतार” कहा गया है।। हिन्दी वर्ण माला में तवर्ग (त थ द ध न) दंत्य वर्ग कहलाता है, क्योंकि इन अक्षरों के उच्चारण में दांतों का स्पर्श होता है।

संस्कृत शब्द, दन्त, हिन्दी में अपना लिया गया है। लेकिन दंत के लिए दांत शब्द ठेठ हिन्दी का शब्द है। इसे हम दन्त का हिन्दी अपभ्रंश कह सकते हैं। जहां दन्त से जुड़कर अनेक योगिक शब्द हिन्दी में बने हैं वहीं दांत शब्द को लेकर हिन्दी में अनेक मुहावरे प्रचलित हो गए हैं। गहरी मित्रता “दांत काटी रोटी” है। ‘दांत काढ़ना’, ‘दांत निपोरना’ गिड़गिड़ाना है। ‘दांत किरकिरे होना’ हार मानना है और ‘दांत खट्टे करना’ परास्त करना है। “दांतों उंगली काटना” आश्चर्य में पद जाना है। इसी प्रकार के और भी अनेक मुहावरे हैं।

हाथी दांत से बनी हुई वस्तुएं “दांतक” कहलाती हैं।। बाल काढ़ने के कंघे में “दांते” होते हैं।। ‘दातून’ से हम दांत साफ़ करते हैं

-डा. सुरेन्द्र वर्मा (मो, ९६२१२२२७७८) १०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड / इलाहाबाद -२११००१

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget