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सभी मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को 'शिवरात्रि' कहा जाता है किन्तु माघ (फाल्गुन पूर्णिमान्त) अर्थात फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी जो कि सबसे महत्वपूर्ण है इसे ही 'महाशिवरात्रि' कहा जाता है। शिवपुराण की कोटिरूद्रसंहिता में उल्लेख है कि महाशिवरात्रि व्रत करने से व्यक्ति को भोग एवं मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु एवं पार्वतीजी के पूछने पर भगवान महादेव ने बताया कि शिवरात्रि व्रत करने से महान पुण्य की प्राप्ति होती है।

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जो भक्त इस दिन उपवास करके बिल्व पत्तियों से भगवान शिव की पूजा अर्चना वन्दना करता है और रात्रिभर 'जागरण' करता है, शिवजी उसे नरक से बचाते हैं और आनन्द एवं मोक्ष प्रदान करते हैं तथा व्यक्ति स्वयं शिव हो जाता है। महाशिवरात्रि का पर्व परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का मंगल सूचक पर्व है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। अंग्रेजी कलेण्डर के अनुसार यह दिन फरवरी अथवा मार्च माह में ही प्रायः आता है। इस वर्ष यह पर्व 17 फरवरी मंगलवार को आ रहा है।

महाशिवरात्रि उत्सव के सम्बन्ध में गरुड़पुराण, स्कन्दपुराण, पद्मपुराण एवं अग्निपुराण आदि पुराणों में बड़ा ही सुन्दर वर्णन है। इन पुराणों में कहीं-कहीं वर्णनों में अन्तर है किन्तु प्रमुख बातें एक समान ही वर्णित है।

-शिव ही देवों के देव महादेव कैसे-

सृष्टि में महान या बड़़ा बनने के लिये त्याग, तपस्या, धैर्य, उदारता, सहिष्णुता जैसे अनेक गुण होना चाहिये। संसार के विष को अपने भीतर ही पीकर अपने भक्तों आश्रितों के लिये अमृत देने वाले और विरोधों विषमताओं को भी सन्तुलित रखने वाले परिवार में सुदृढ़ एकता बनाने वाला ही महादेव होता है। इनके निकट पार्वतीजी का सिंह तो दूसरी ओर वृषभ (बैल) शरीर पर साँप है तो कुमार कार्तिकेय का मोर, गणेशजी का वाहन मूषक है। विष है तो अमृतमयी गंगा का जल, शिव कभी पिनाकी धनुर्धर वीर हैं तो नरमुण्डधारी कपाली, कही अर्धनारीश्वर तो कहीं महाकाली के पैरों में लुण्ठित, कभी मृड अर्थात् सर्वधनी तो कभी दिगम्बर, निर्माण देव भव और संहारदेवरूद्र कभी, भूतनाथ कभी विश्वनाथ आदि अनेक विरोधी बातों का जिनके प्रताप से एक जगत् पावन संगम होता हो, वे ही आशुतोष तो देवों के देव महादेव ही हो सकते हैं।

-महाशिवरात्रि उसके अनेक रूप-

महाशिवरात्रि पर्व कई तरह से मनाया जाता है। प्रायः यह माना जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन से ही होली पर्व का प्रारम्भ हो जाता है। अनेक शिव भक्त ईख एवं बेर तब तक नहीं खाते, जब तक महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को अर्पित न कर दें। सामान्य रूप से शिवजी को बेलपत्र, जलाभिषेक कर पूजन किया जाता है। ऐसा मानना है कि महाशिवरात्रि के ही दिन नही शंकरजी का विवाह पार्वतीजी से हुआ था। उनकी बारात निकली थी। इस दिन व्रत धारण करने से पापों का नाश होता है। मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति का नाश होता है। उसके हृदय में दयाभाव उपजता है। ईशान संहिता में स्पष्ट उल्लेख है-

शिवरात्रि व्रतं नाम सर्वपापं प्रणाशनत्।

चाण्डाल मनुष्याणां भुक्ति मुक्ति प्रदायकं।।

पूजा कैसे करें

दिनभर यथाशक्ति जप करना चाहिये अर्थात् जो द्विज है और जिनका विधिवत यज्ञोपवीत संस्कार हुआ है तथा नियमपूर्वक यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें ''ऊँ नमः शिवाय'' महामंत्र का जप करना चाहिये किन्तु जो द्विजेतर अनुपनीत एवं स्त्रियाँ हैं, उन्हें प्रणवरहित केवल शिवाय नमः मंत्र का ही जप करना श्रेष्ठकर है। रूग्ण, अशक्त और वृद्धजन दिन में फलाहार कर रात्रि में पूजा कर सकते हैं, वैसे यथाशक्ति बिना फलाहार ग्रहण किये रात्रि पूजा करना उत्तम माना गया है। इस दिन अष्टाध्यायी का पाठ, हवन, पूजन तथा अनेक प्रकार से महादेवजी की पूजा कर अर्चना-वन्दना करनी चाहिये। मिट्टी के बर्तन में पानी भरकर उसमें बेलपत्र, आक धतूरे के पुष्प, चावल डालकर शिवलिंग पर चढ़ाना चाहिये। यदि घर के आसपास शिवालय न हो तो शुद्ध गीली मिट्टी से भी शिवलिंग निर्मित कर पूजना भी उत्तम होता है।

शिवजी तनिक सेवा से ही प्रसन्न होकर बड़े से बड़े पापी का उद्धार कर देते हैं इसीलिये इन्हें महादेव एवं आशुतोष कहा गया है। वे भक्त की दौड़कर रक्षा करते हैं। शिवजी की पूजा अनजाने में हो जाने पर व्यर्थ नहीं जाती है। सभी वर्ण के लोग एक होकर पूजा कर सकते हैं। देव, गंधर्व, राक्षस, किन्नर, नाग, मानव सभी उनके आराधक हैं। शिवलिंग पर तीन पत्ती वाला बेलपत्र और बून्द-बून्द जल चढ़ाना, सत्, रज और तम तीन गुणों को शिव को अर्पित कर उनकी अर्चना की जाती है। बून्द-बून्द जल जीवन के एक-एक क्षण का प्रतीक है। इसका सारांश यह है कि जीवन का प्रत्येक क्षण शिव की उपासना में समर्पित होना चाहिये।

अन्त में महादेवजी की श्रेष्ठतासूचक महाभारत का एक वाक्य निवेदन स्वरूप लिख कर इतिश्री करता हूँ-

नास्ति शर्वसमो देवो नास्ति शर्वसमा गतिः।

नास्ति शर्वसमो दाने नास्ति शर्वसमो रणे।।

- अनुशासन पर्व 15/11

अर्थात् शिव के समान देव नहीं है, शिव के समान गति नहीं है, शिव के समान दाता नहीं है, शिव के समान यौद्धा(वीर) नहीं है।

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मानस शिरोमणि” डॉ. नरेन्द्र कुमार मेहता

Sr. MIG-103, व्यास नगर,

ऋषिनगर विस्तार उज्जैन (म.प्र.)

Email:drnarendrakmehta@gmail.com

यह तो सरासर ग़लत है। कृपया गधों के साथ राजनीति न करें। गधा एक बहुत ही उपयोगी जीव है। उसकी उपयोगिता को देखकर मेहरबानी करके गधों में फूट न डालें। फूट डालो और राज करो यह मन्त्र केवल हमारी, इंसानों की, दुनिया में कारगर हो सकता है। गधों में नहीं। आप गधों में फूट डाल ही नहीं सकते। गुजरात के गधों और उत्तरप्रदेश के गधों के बीच भी नहीं। उनमें बड़ी एकता है। गधे किसी भी प्रदेश के हों उनमें कोई अंतर पड़ ही नहीं सकता। है ही नहीं। सब गधे ही हैं। खालिस, निखालिस, गधे ही हैं। गधे हर जगह होते हैं। काबुल तक में सिर्फ घोड़े नहीं होते। गधे वहां भी होते हैं। एक जैसे।

इस बात को ध्यान में रखना बड़ा ज़रूरी हैं कि गधे सिर्फ ‘गधे’ ही नहीं होते। उनके सच्चे-सीधे स्वभाव को मूर्खता बताना सिर्फ आदमी की मूर्खता का द्योतक है। वक्त पड़ने पर वे दुलत्ती भी मार सकते हैं।

इंसानों के साथ रहते हुए भी गधों की मानसिकता में कभी कोई अंतर नहीं आया, भले ही इंसानों ने गधों से बहुत कुछ क्यों न सीख लिया हो। दुलत्ती मारना आखिर आदमी ने गधों से ही तो सीखा है। जब आदमी सामनेवाले का सामना नहीं कर पाता, दुलत्ती झाड़ता है। चुनाव-काले दुलत्तियों का जलवा देखने लायक होता है पक्षी ज़रा सा चहचहाया नहीं, कि विपक्षी ने दे मारी दुलत्ती ! इस प्रकार दुलत्तियों का एक सिलसिला चल निकलता है। दुलत्ती दर दुलत्ती। खेल चालू हो जाता है।

मरहूम कृष्ण चंदर एक मशहूर लेखक रहे हैं। हम उनके साहित्य को बड़े अदब से पढ़ते हैं। वे गधों से इतने मुतअस्सिर हुए कि उन्होंने एक गधे की आत्मकथा ही लिख डाली। व्यंग्यकार शरद जोशी भी पीछे रहने वाले नहीं थे। उन्होंने एक अदद नाटक, ‘एक था गधा’, लिख मारा। गधा सिर्फ गधा नहीं होता। अच्छे अच्छे साहित्यकारों के लिए वह प्रेरणा का स्रोत रहा है। आज भी न जाने कितने व्यंग्यकार गधों पर छोटे-मोटे आलेख लिखकर गधों की उपयोगिता के गुण गा रहे हैं। जय हो।

हर क्षेत्र के लोगों ने गधों की सेवा ली है। लेकिन आदमी बड़ा अहसान-फरामोश है। अगर धोबी के पास एक अदद गधा न हो तो उसका काम नहीं चल सकता। फिर भी गधा बेचारा धोबी का गधा ही कहलाता है – घर का न घाट का। जब कि असलियत यह है कि घर और घाट, दोनों ही जगहों का भार गधा ही उठाए है।

गधा आर्थिक क्षेत्र में भी ‘सार्थक’ प्रमाणित हुआ है। खबर आई थी कि किस तरह गधों ने एक दीवाला- पिटी-नगरपालिका की इज्ज़त बचाई। कर्मचारियों को उनका वेतन देने के लिए गधों का मेला लगाकर पैसे कमाए गए जिससे कर्मचारियों को कई माह बाद उनका वेतन मिल पाया।

गधे दलबदल नहीं करते। इस दलदल में वे कभी नहीं पड़े। दलबदल सिर्फ आदमी करते हैं। एक बार की बात है, एक कोई विधायक दलबदल करने के लिए उतावला था। लेकिन उसके समर्थक नहीं चाहते थे की वह ऐसा करे। समर्थकों ने उसका घेराव किया|। उसके विरुद्ध नारे लगाए। नेता फिर भी न माना। दलबदल के लिए अड़ा रहा। तब एक गधे की सेवाएं ली गईं। विधायक को धमकी दी गई कि यदि वह दलबदल करेंगें तो इस गधे पर उनका जुलूस निकाला जाएगा। गधे का रुतबा देखिए। धमकी कारगर हुई। विधायक ने दल बदलने की बजाय अपना इरादा बदल दिया।

गधे बेशक राजनीति में भी कारगर हुए हैं। लेकिन कृपया गधों पर राजनीति न करें। उनमें फूट डालने की कोशिश न करें। गधा चाहे गुजरात का हो या उत्तरप्रदेश का, सब गधे ही होते हैं।

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डा. सुरेन्द्र वर्मा (९६२१२२२७७८)

१०, एच आई जी / १, सर्कुलर रोड इलाहाबाद -२११००१

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इसे संयोग ही कहा जाये कि अभी अभी हम एक ऐसे तथाकथित प्रेम के विशेष त्यौहार से रूबरू हुए और उसके ठीक बाद प्रेम का एक ऐसा त्यौहार जो सनातन भी है और पुरातन् भी । ऐसे में हमें  सत् चित आनन्द तीनों की प्राप्ति का सुंदर अवसर मिलता है। ये बात सही है की भारत एक ऐसा देश है जहां हर मौका ख़ुशी का हो तो उसे त्यौहार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा जा सकता है । इसीलिये आज का यह शुभ अवसर,शुभ दिन जिसे हम महाशिवरात्रि कहते है। महाशिवरात्रि आज के जगद् गुरु शंकर का विवाह माता पार्वती से हुआ जिसके सन्दर्भ में कहा गया- 


   शिव: शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभावितुम।
न चेदेवं देव: न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि।।
    


विवाह का अर्थ,विवाह का उद्देश्य इन सभी का उत्तर हमें इस विशेष पर्व से मिलता है । प्रायः हम दो तरह से विवाह को बोलते है एक विवाह दूसरा बियाह।
यदि शादी राम के प्रेरणा से करेंगे तो विवाह-वाह बन जायेगा ।
यदि शादी वासना के प्रेरणा से करेंगे तो बियाह-आह! बन जायेगा।
भगवान शंकर का विवाह राम के प्रेरणा से हुआ है इसलिए उनका विवाह आज वाह वाह है।
काशी में इस पर्व का अपना अलग मज़ा है,इसको मनाने का अपना अलग अंदाज़ है। यहां आज के दिन पंचक्रोशी यात्रा की जाती है ।
इस यात्रा का प्रारंभ या तो मणिकर्णिका कुंड से संध्या के समय करते हैं, या फिर अस्सी घाट से मध्यरात्रि के आस-पास यात्रा का प्रारंभ करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी चलने की क्षमता के अनुसार यह यात्रा 1, 3 या 5 दिनों में पूरी करता है।
यह यात्रा पुरुषोत्तम मास में भी की जा सकती है। जिसे हिन्दू तिथिपत्र या पंचांग के अनुसार मलमास या अधिक मास भी कहा जाता है, जो हर 2-3 सालों में आता है। मेरा तर्क कहता है, क्योंकि, यह अधिक मास है तो इस यात्रा के लिए यह शुभ काल भी हो सकता है।
हिन्दू तिथिपत्र के फालगुन, वैशाख और चैत्र महीनों में भी यह यात्रा की जा सकती है।
मेरा मानना है कि, अगर आप स्वयं तैयार है तो आप कोई भी तीर्थ यात्रा कभी भी कर सकते हैं।

पंचक्रोशी यात्रा पर जाने का मार्ग

पञ्च क्रोशी यात्रा सूचना पट्ट
पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ मणिकर्णिका कुंड से होता है। यह एक छोटा सा जलाशय है जो प्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट के पास स्थित है। कहा जाता है कि यह कुंड वाराणसी में बहनेवाली गंगा से भी प्राचीन है। उपाख्यानों ने इस कुंड को शिव, शक्ति और विष्णु से जोड़ते हुए हिन्दू धर्म के तीनों संप्रदायों के लिए इसे महत्वपूर्ण बताया गया है। भक्त इस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी अंजुली में पानी लेकर यात्रा करने का संकल्प करते हैं। यह एक प्रकार से यात्रा पूरी करने का वचन है। अगर आप के मन कोई इच्छा हो तो उसकी पूर्णता की कामना करने का यही अच्छा समय है। और आपकी इच्छा पूर्ण होने के बाद आपको फिर से यहां पर माथा टेकने आना होता है।   मणिकर्णिका कुंद में संकल्प ले भक्तगण नाव से अस्सी घाट की ओर बढ़ते हैं, जो वाराणसी में गंगा के दक्षिणी क्षेत्र की ओर स्थित है। यहीं से यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है। इसके बाद आपको रास्ते में 5 पड़ावों से गुजरते हुए जाना है, जो 50 मील या करीब-करीब 80 कि.मी. के मार्ग पर स्थित है। पंचक्रोशी यात्रा का यह मार्ग, तीर्थ यात्रा का बहुत ही प्राचीन मार्ग है। इस मार्ग पर आपको अनेकों सूचना पट्ट दिखेंगे जो इस पूरी यात्रा में आपका मार्गदर्शन करेंगे इस यात्रा में कुल पांच पड़ाव है जैसे-  

मणिकर्णिका से कर्दमेश्वर – 3 कोस
कर्दमेश्वर से भीम चंडी – 5 कोस यानी कुल 8 कोस
भीम चंडी से रामेश्वर – 7 कोस यानी कुल 15 कोस
रामेश्वर से शिवपुर – 4 कोस यानी कुल 19 कोस
शिवपुर से कपिलधारा – 3 कोस यानी कुल 22 कोस
कपिलधारा से मणिकर्णिका – 3 कोस यानी कुल 25 कोस ।

कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने अपने तीनों भाइयों और पत्नी सीता के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग रामेश्वर मंदिर में पाये जाते हैं। भगवान राम ने यह यात्रा अपने पिताजी दशरथ को श्रवण कुमार के माता-पिता के श्राप से मुक्ति दिलाने के लिए की थी।।                
द्वापर युग में पांडवों ने यह यात्रा द्रौपदी के साथ की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग शिवपुरी के पांडव मंदिर में पाये जाते हैं। इस मंदिर के पास में ही एक जलकुंड है, जिसे द्रौपदी कुंड के नाम से जाना जाता है। पांडवों ने यह यात्रा अपने निर्वासन काल या अज्ञात वास के दौरान की थी।
ये सभी इस बात के द्योतक है काशी में किस तरह से इस महापर्व का आयोजन किया जाता होगा । इस दिन लोग भगवान शंकर के विवाह में  बराती के रूप में सम्मिलित होते है और इस सनातन मांगलिक कार्यक्रमों के हिस्सा बनते है।
भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते।               जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे।
शिव को पशुपति कहा गया हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे।


बाबा के विवाह में घटी एक अजीब घटना-
भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म

वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे।
सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र
भगवान शिव और पार्वती की शादी बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित हुई। पार्वती की तरफ से कई सारे उच्च कुलों के राजा-महाराजा और शाही रिश्तेदार इस शादी में शामिल हुए, लेकिन शिव की ओर से कोई रिश्तेदार नहीं था, क्योंकि वे किसी भी परिवार से ताल्लुक नहीं रखते। आइये जानते हैं आगे क्या हुआ…

भगवान शिव की शादी में आए हर तरह के प्राणी

जब शिव और पार्वती का विवाह होने वाला था, तो एक बड़ी सुंदर घटना हुई। उनकी शादी बहुत ही भव्य पैमाने पर हो रही थी। इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। शिव – जो दुनिया के सबसे तेजस्वी प्राणी थे – एक दूसरे प्राणी को अपने जीवन का हिस्सा बनाने वाले थे। उनकी शादी में बड़े से बड़े और छोटे से छोटे लोग शामिल हुए। सभी देवता तो वहां मौजूद थे ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंचे। आम तौर पर जहां देवता जाते थे, वहां असुर जाने से मना कर देते थे और जहां असुर जाते थे, वहां देवता नहीं जाते थे।

शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। उनकी आपस में बिल्कुल नहीं बनती थी। मगर यह तो शिव का विवाह था, इसलिए उन्होंने अपने सारे झगड़े भुलाकर एक बार एक साथ आने का मन बनाया। शिव पशुपति हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और सारे जीव उनकी शादी में उपस्थित हुए। यहां तक कि भूत-पिशाच और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुंचे। यह एक शाही शादी थी, एक राजकुमारी की शादी हो रही थी, इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह होना था।


भगवान शिव और देवी पार्वती की वंशावली के बखान की रस्म

वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है जो उसके जीवन का गौरव होता है। तो पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया गया। यह कुछ देर तक चलता रहा। आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर शिव बैठे हुए थे।

सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उसके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उसके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहां नहीं आया था क्योंकि उसके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ आया था जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे। वे इंसानी भाषा तक नहीं बोल पाते थे और अजीब सी बेसुरी आवाजें निकालते थे। वे सभी नशे में चूर और विचित्र अवस्थाओं में लग रहे थे।


फिर पार्वती के पिता पर्वत राज ने शिव से अनुरोध किया, ‘कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।’ शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था।
शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे।


समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, ‘इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीची जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।’  फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे – टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूं? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, ‘वर के माता-पिता नहीं हैं।’ राजा ने पूछा, ‘क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?’


‘नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।’ पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, ‘हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या मां ही न हो।’ नारद ने जवाब दिया, ‘क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है – ध्वनि। आदि, शून्य प्रकृति ने जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी – ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा हूं।’ इसलिए शंकर को स्वयंभू कहा गया है ।

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भूत परेत बनलबा बराती
आठों अंग भेला की भभूती
गरवा सांप मारे ला फुंफकारी
लोग देखि कठुआय गइलन हो बाबा
गौरा दुआरे आई गइली बरतिया
गौरा क सखियां निहारें सुरतिया
नाऊन जो चलली करे परछन को
फेंक के मूसरा पराय गईली हो बाबा
मचल हाहाकार सखी गौरा की नगरिया
देखि-देखि मयना पीटें आपन छतिया
अइसन तपसी से बेटी ना बियहबों
भले रहि जइहें गौरा कुंआर हो बाबा
शिव जी आए मदारी बन के बाबा.
चल देखि आई बरतिया हो सखी
चल चलीं हिमाचल की पार
बरतिया देखि आंई सखी
आगे-आगे ब्रम्हा चलें
पीछे-पीछे विष्णु
शिव बूढ़े बैल असवार हो सखी
चल देखि आंई बरतिया हो सखी
माथे सोहें गंगा लीलरा
चनरमा
संपवा गरे में सोहे चार हो सखी
चल देखि आई बरतिया हो सखी
केहू के गोड़ नाहीं
हाथ नाहीं केहू के मुंहवां से दीखे आरपार हो सखी
चल देखि आई बरतिया हो सखी।।।

 

यह पर्व हमें अपनी जिम्मेदारी,हमारे मायने,हमारे कर्तव्य की ओर विमुख करता है इसलिए शिव के जीवन में त्याग,प्रेम,विनम्रता सब कुछ जो जीवन को वाह बनाता है, आह नहीं।
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शैलेश त्रिपाठी
छात्र-काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
विदेशी भाषा अध्ययन विभाग एवम्
भारतीय प्रतिनिधि,
संचेतना हिंदी पत्रिका,क्वांगचौ चीन

एक बार भगवान शंकर व माता पार्वती विचरण करते हुए एक पर्वत पर बैठे थे। इधर-उधर की बातें होने लगीं। संसार के बारे में चर्चा हो रही थी। तभी माता पार्वती के पैर पर पानी की एक बून्द गिरी। माता ने आश्चर्य से ऊपर देखा। आसमान साफ था। ऊपर कोई पक्षी भी दिखाई नहीं दिया। फिर यह पानी की बूंद कहां से आई। माता ने बहुत सोचा परंतु पानी की बून्द का रहस्य समझ में न आया। उन्होंने अपनी शंका भगवान शंकर से कही। भगवन ने देखा तो उन्हें भी कुछ समझ में न आया। माता ने जिद की तथा बूंद के रहस्य का पता लगाने के लिए कहा। शंकर भगवान अंतर्ध्यान हो गए।
जब शंकर जी ने अपने नेत्र खोले तो माता पार्वती ने फिर अपनी जिज्ञासा जाहिर की तथा पूछा कि यह पानी की बूंद कहां से आई।


शंकर भगवान ने कहा – “अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी। जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया और आपके पैर पर पानी की बूंद पड़ गई।”
“यह कैसे हो सकता है ?” मां पार्वती ने शंका जाहिर की। “क्या मगरमच्छ इतना बलशाली है कि उसकी छलांग लगाने से पानी इतना ऊपर उछल कर आ गया ? समुद्र तो यहां से बहुत दूर है।”
“हां पार्वती, ऐसा ही हुआ है।” भगवान ने शांत भाव से उत्तर दिया।
“परंतु यह बात मेरे गले नहीं उतर रही। मैं इस की जांच करना चाहती हूं। मैं स्वयं जाकर देखना चाहती हूं।” पार्वती ने आज्ञा मांगने के आशय से कहा।
“हां पार्वती, मैं ठीक कह रहा हूं। ऐसा ही है।’ भगवान ने पार्वती को फिर समझाया।
“परंतु मुझे विश्वास नहीं हो रहा। मैं अपनी शंका का समाधान करना चाहती हूं।” पार्वती ने कहा “मैं स्वयं जाकर सच्चाई जानना चाहती हूं।”


भगवान शंकर “जैसी आपकी इच्छा।” कहकर फिर अंतर्ध्यान हो गए।
माता पार्वती नीचे समुद्र तट पर पहुंच गईं। उन्होंने देखा कि एक मगरमच्छ किनारे पर ही तैर रहा है। उन्होंने झट उस मगरमच्छ को बुला कर उससे पूछा -“क्या तुमने अभी कुछ देर पहले पानी में छलांग लगाई थी ?”
“हां माता श्री, क्या मुझसे कोई भूल हो गई है ? कृप्या मुझे क्षमा कर दें।” मगरमच्छ ने हाथ जोड़ दिये।
“नहीं वत्स, तुमसे कोई भूल नहीं हुई। मैं अपनी एक शंका का निवारण करने आई थी।” पार्वती ने कहा।
“कैसी शंका माता श्री ?” मगरमच्छ ने प्रश्न किया।
“मैं ऊपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी। आसमान भी साफ था तथा ऊपर कोई पक्षी भी नहीं उड़ रहा था। मैंने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने ही यह सब बताया।” पार्वती आश्चर्य से मगरमच्छ को देख रहीं थीं। “लेकिन यदि तुम्हारे पानी में कूदने से जल इतना ऊपर आया है तो इसका मतलब यह हुआ कि तुम बहुत बलशाली हो।” माता ने फिर कहा।
“नहीं मां, मैं कहां बलशाली हूं। मेरे जैसे और मेरे से भी अधिक बलशाली कई मगरमच्छ इस समुद्र में रहते हैं। समुद्र हम सबको समेटे हुए है। तो बलशाली तो समुद्र हुआ न।” मगरमच्छ दीनता से बोला।
“तुम ठीक कहते हो।” यह कहकर पार्वती मां समुद्र के पास जाकर बोलीं – “समुद्र-समुद्र, तुम बहुत बलशाली हो।”


समुद्र हाथ जोड़कर खडा हो गया। “क्या बात है माता, आप ऐसा क्यों कह रहीं हैं ?”
“मैं ऊपर शंकर भगवान के साथ बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी। आसमान भी साफ था तथा कोई पक्षी भी नहीं उड़ रहा था। मैंने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि अभी थोडी देर पहले नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी। जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया यह उसी पानी की बूंद है।” माता पार्वती ने आगे कहा – “सोचो वह मगरमच्छ कितना बलशाली है। और ऐसे कई मगरमच्छों को तुम समेटे हुए हो। अतः तुम बहुत बलशाली हो।”
“माता आप ऐसा कहकर सिर्फ मेरा मान बढाना चाहती हैं। यह आपका बड़प्पन है। मैं तो कुछ भी नहीं। अब देखिए न, यह सामने पर्वत खडा है। समुद्र में इतनी ऊंची-ऊंची लहरें ऊठती हैं पानी के थपेडे दिन-रात इसको टक्कर मारते रहते हैं। फिर भी यह कई वर्षों से इसी प्रकार निश्चल खडा है। इस पर मेरी लहरों और थपेडों का कोई असर नहीं होता। मुझ से तो बलशाली यह पर्वत है।” समुद्र ने कहा।


‘ओह, मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। वाकई, पर्वत बहुत बलशाली है।” यह कहकर पार्वती जी पर्वत के पास जाकर बोली –“पर्वत बेटा, मैने सुना है कि तुम बहुत बलशाली हो।”
“यह आप कैसे कह सकती हैं माता जी।” पर्वत ने नम्रतापूर्वक प्रश्न किया
“मैं शंकर भगवान के साथ वहां ऊपर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी। मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी। जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया। वह मगरमच्छ कितना बलशाली है। और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में अठखेलियां करते हैं। उसी समुद्र की लहरों के हजारो-लाखों थपेडों का भी तुम पर कोई असर नहीं होता। तब तो तुम ही बलशाली हुए न।” पार्वती मां ने सारी कहानी सुनाते हुए पर्वत से पूछा।
“नहीं-नहीं माता जी। सच्चाई तो यह है कि मेरे जैसे कई छोटे-बडे पर्वत इस पृथ्वी पर कई वर्षों से खडे हैं। और पृथ्वी हम सब का भार अपने ऊपर लिए निश्चल खडी है। तो पृथ्वी हमसे भी अधिक बलशाली हुई।” पर्वत ने अपना तर्क दिया।


पार्वती सोच में पड़ गईं। वो सोचने लग गई मैं भी कहां भूली हुई थी। बलशाली तो पृथ्वी है चलो पृथ्वी के पास चलते हैं। मां पृथ्वी के पास जाकर कहने लगीं – “अरे पृथ्वी रानी। मैं तो भूली पडी थी। मुझे पहले ख्याल ही नहीं आया। तुम तो बहुत बलशाली हो।”
“वो कैसे मां।” पृथ्वी ने प्रश्न किया।
“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी। मैंने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी। जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया। वह मगरमच्छ कितना बलशाली है। और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में विचरण करते हैं। उसी समुद्र की लहरों के हजारों-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं। इन जैसे कई पर्वतों का और हम सब का भार तुमने अपने ऊपर लिया हुआ है। इसलिए इसमें शक की कोई गुंजाईश ही नहीं है। तुम ही सबसे बलशाली हो।” पार्वती मां ने पृथ्वी को समझाया।


पृथ्वी पार्वती की बात सुनकर नत-मस्तक होकर बोली –“ मैं कहां बलशाली हूं मां ? मैं तो स्वयं ही शेषनाग पर टिकी हुई हूं। जब शेषनाग ज़रा सा भी अपना सिर हिलाते हैं तो मैं डोल जाती हूं। बलशाली तो शेषनाग जी हैं।”
पार्वती जी का माथा ठनका। व सोचने लगीं। अरे वाकई, पृथ्वी सही कह रही है। इतनी बडी पृथ्वी का सारा का सारा भार शेषनाग ने अपने शीश पर ऊठा रखा है। तो बलशाली और महाशक्ति तो वही हुआ।
पार्वती जी झट से शेषनाग के पास पहुंचीं और उससे कहने लगी। – “शेषनाग जी मुझे तो आज पता चला कि आप बहुत शक्तिशाली हो।”
“वह कैसे ?” शेषनाग ने जिज्ञासा प्रकट की।


“मैं शंकर भगवान जी के साथ ऊपर पर्वत पर बैठी थी कि मेरे पैर पर पानी की एक बूंद आकर गिरी। मैने जब शंकर जी से इसका रहस्य पूछा तो उन्होंने बताया कि नीचे समुन्द्र में एक मगरमच्छ ने छलांग लगाई थी। जिससे पानी उछल कर ऊपर की ओर आया। वह मगरमच्छ कितना बलशाली है। और ऐसे कई मगरमच्छ समुद्र में रहते हैं। उसी समुद्र की लहरों के हजारों-लाखों थपेडों को यह पर्वत सहते हैं। ऐसे कई पर्वत पृथ्वी पर आसन जमाए बैठे हैं। वही पृथ्वी केवल तुम्हारे शीश पर टिकी हुई है। तुम ही सबसे बलशाली हो। तुम महान हो। तुम महाशक्ति हो” पार्वती ने सारी कहानी दोहरा दी।


शेषनाग हाथ जोड़ कर दंडवत प्रणाम करके पार्वती माता के चरणों में लोट गया और बोला –
“हे मां, आप ऐसा कहकर मुझे पाप का भागी बना रही हैं। मैं तो एक अदना सा प्राणी हूं। मेरी ऐसी बिसात कहां। असल महाशक्ति तो आपके पति शंकर भगवान हैं।”
“शंकर भगवान ? वो कैसे ?” मां ने प्रश्न किया।
“मेरे जैसे कई सर्प, कई नाग उनके गले में लिपटे रहते हैं, उनके शरीर पर रेंगते रहते हैं। आप कहां भटक गईं माता। महाशक्ति तो शंकर भगवान हैं।” शेषनाग का उत्तर सुनकर ऐसा लगा जैसे पार्वती के सोचने की शक्ति समाप्त हो गई थी। वे वापिस आकर शंकर भगवान के चरणों में गिर पडीं।

 

राम कृष्ण खुराना

Ram Krishna Khurana

9988927450

 

मानव को अनुरंजित व आनंदित करने वाले लोक साहित्य की परम्परायें प्रत्येक देश व समाज में पायी जाती हैं। लोक साहित्य द्वारा ही युग -युग की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक परिस्थितियों का परिचय हमें मिलता है।

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एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक तथा एक समुदाय से दूसरे समुदाय तक पहुंचने वाले लोक साहित्य की परम्परायें आज हम तक पहुंची हैं। यही वह कड़ियां हैं, जिन्होंने हमें इतिहास की लुप्त होती हुई कड़ियों को जोड़ने में सहायता पहुंचायी है। अतीत को वर्तमान से जोड़कर उसमें परस्पर समन्वय स्थापित करना इस साहित्य की एक अलग विशेषता रही है, जिसके परिणाम स्वरूप ही यह केवल सांस्कृतिक धरोहर एवं बीते हुए कल की आवाज मात्र न होकर आज भी जीवन्त सर्जना है। आज लोक साहित्य, वाणी है, इसी कारण लोक साहित्य का महत्व शैक्षणिक एवं ऐतिहासिक क्षेत्रों में भी स्वीकार कर उपयोग किया जाता है।

लोक साहित्य शब्द अंग्रेजी के फोकलोर शब्द का अनुवाद है, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेजी के विद्वान विलियम टाम्स ने किया था। इसी फोकलोर के समकक्ष हिन्दी में लोकसाहित्य शब्द का प्रयोग किया जाता है। भारतीय लोक साहित्य जनता के व्यापक जनसमूह की सभी मौलिक सर्जनाओं का परिणाम है। यह केवल लोक काव्य या गीतों तक ही न सीमित न होकर जनता के जीवन धर्म, संस्कृति तथा परम्पराओं से भी जुड़ा हुआ है। फिर भारतीय लोक साहित्य की विशालता के समक्ष शक्षितों का साहित्य दाल में नमक के बराबर भी नहीं है। आवश्यकता है तो बस इसके संग्रह की। लोक साहित्य जनता के कंठों में देश के सभी राज्यों, भाषाओं और छोटी -छोटी बोलियों के रूप में भरा हुआ है।

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आज का लोक साहित्य कल के लोक मानस की मौखिक सर्जना का परिणाम है। इसमें मानवता के विकास की उस समय की संस्कृति निहित एवं सुरक्षित है, जिस समय समाज में लेखन पद्धति का प्रादर्भाव भी न हुआ था और मनुष्य अपनी सर्जनाओं को मौखिक ही कण्ठस्थ कर लेता था, इसीलिए लोक साहित्य एक ऐसा पालना है कि जिसमें लेखन प्रणाली से पूर्व की मानव संस्कृति की अमूल्य निधि, धर्म, दर्शन, संस्कृति, परम्परायें, रीति -रिवाज, लोकाचार, संस्कार, कर्मकाण्ड, नृत्यगान काव्य -कथायें, नाटक आदि झूलते और खेलते रहे हैं।

लोक साहित्य में काव्य कला संस्कृति और दर्शन सभी कुछ एक साथ है।यह शब्द विनिमय का प्रथम कला पूर्ण प्रारम्भ भी है, जिसके द्वारा यंत्र -मंत्र, जंत्र -तंत्र, पहेली, मुहावरे, लोकोक्तियों, लोककथाओं, गीतों आदि के रूप में प्रत्येक जाति अपनी जीवन पद्धति और उसकी प्रणालियों को आगे आने वाली पीढ़ी को सौपती रही है।यही कारण है कि इसमें प्राचीन युग का साहित्य, धर्म दर्शन, विश्वास, संस्कार, कर्मकाण्ड तथा काल आदि सभी कुछ एक साथ प्राप्त होता है और इसी के द्वारा किसी भी देश, समाज व जाति की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, धार्मिक तथा बौद्धिक उन्नति को समझा जा सकता है।

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लोक साहित्य एक ओर जनता की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, तो दूसरी ओर सामूहिक जन -जीवन की रचना भी है।जोकि जनमानस के दैनिक जीवन में फैली हुई है।यह सामूहिक कार्यक्रमों, पुत्र जन्मोत्सव, अन्नप्राशन, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह के गीतों में स्पष्ट हो जाती है। विभिन्न प्रकार के गीतों के साथ भिन्न -भिन्न संस्कार, कर्मकाण्ड, अकारण नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे कहीं न कहीं और कुछ न कुछ महत्वपूर्ण कारण अवश्य छिपे हैं।

लोक साहित्य एक ओर जनता की भावनाओं की अभिव्यक्ति है, तो दूसरी ओर सामूहिक जन -जीवन की रचना भी है; जोकि जनमानस के दैनिक जीवन में फैली हुई है।यह सामूहिक कार्यक्रमों, पुत्र -जन्मोत्सव, अन्नप्राशन, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाह के गीतों में स्पष्ट हो जाती है। विभिन्न प्रकार के गीतों के साथ भिन्न -भिन्न संस्कार कर्मकाण्ड अकारण नही हैं, बल्कि इनके पीछे कहीं न कहीं और कुछ न कुछ महत्वपूर्ण कारण अवश्य छिपे हैं।

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लोक साहित्य की समस्त सामूहिकता इन्हीं गीतों में बिखरी है जिसमें जनता का काफी बड़ा भाग अपनी रचनात्मक प्रतिभा के लिए उपयोग हेतु सुअवसर पाता है, जिसके परिणामस्वरूप ही इन गीतों का वस्तु -विषय, कथ्यशिल्प आदि लोक मानस में प्रवेश कर जाता है।

यही कारण है कि लोक साहित्य में इतिहास को इतिहास के ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जाता जैसा कि इतिहासकार करते हैं। वास्तव में लोक साहित्य कला काव्य संस्कृति और दर्शन का एक सुन्दर, स्वरूप है, जिसमें रचनाकारों की कल्पना और उनके आदर्शों का समावेश रहता है ।जो सिर्फ प्राचीनता को ही प्रकट करता है।

लोक साहित्य इतिहास को एक प्रतिबिंब की भांति प्रस्तुत करता है। जिसमें ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन इतिहास की भांति न कर सामान्य जनता के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर किया जाता है। फिर लोक साहित्य की रचना जनता के ही कुशल शिल्पियों ने की है जो जनता की स्मृति में खो गये, लेकिन अपनी पहचान समाज में फैली हुई लोक कृतियों में छोड़ गये तथा जो जनता के मध्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक निरन्तर चलती और विकसित होती रही।

लेकिन आज की शिक्षा प्रणाली के प्रसार के कारण हम अपने ही देश, समाज व संस्कृति की प्राचीन परम्पराओं से दूर हो गये हैं और थोड़े से शब्दों की कोठरी में कैद हैं।उन शब्दों की परिधि हमें अपने ही देश में विदेशियों सा बनाये हुए है। इसीलिए यह प्रश्न उठता है कि वह देश कहां है जहां वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, बाणभट्ट, भवभूति जैसी महान विभूतियों की आत्माएं निवास करती हैं। कहां गयीं वे संस्कृति की परम्परायें जिन पर देश व समाज आज भी गर्व करता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम भौतिकवादी रहन -सहन से अपने देश की परम्पराओं, संस्कृति, सभ्यता से दूर हो गये हैं अथवा हमारे अल्पज्ञान का विशाल अभिमान देश को शान्ति प्रदान करने वाली उस हवा का आनन्द लेने नहीं देता अथवा हमारे बीच विदेशी संस्कृति -संस्कार और भाषा लोहे की दीवार बने खड़े हैं यही वह प्रश्न हैं जोकि विवश करते हैं कुछ सोचने के लिये जिनके कारण हम काफी दूर खड़े हैं अपनी भाषा, संस्कृति और सभ्यता से।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि लोक साहित्य अतीत की आवाज मात्र ही न होकर ऐसी कड़ी भी है जिसके अध्ययन के बिना किसी भी देश, समाज व संस्कृति से परिचित नहीं हुआ जा सकता है।

शशांक मिश्र भारती संपादक - देवसुधा, हिन्दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर - 242401 उ.प्र. दूरवाणी :-09410985048/09634624150

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v अक्सर हम अपनी सोच का आंशिक भाग व्यर्थ करते है, कि हम यह अथवा वह जो चाहते थे, नहीं बन पाए, बल्कि हमें तो खुश होना चाहिए कि हमारे जिस रूप अथवा स्वरूप से मानवता का कल्याण होता है, दूसरों के मुस्कान से स्वयं भाव -समृद्ध होते है, यही तो जीवन का काल-खंड है, जो प्रेरणा दायक होता है।

v हम अक्सर प्रेरणा स्रोत,  आदर्श पुरुषों,  महापुरुषों की जीवनी सुनते एवं पढ़ते है,  परन्तु गंभीर तथ्य यह है की हम उस तथ्यों,  सारगर्भिता को कितना सकारात्मक मूल्यांकन कर जीवन धरातल पर अवलोकन करते हैं।

v स्वयं से हँसना जीवन-रूपी आनंद नहीं है,  अपितु दूसरों की हँसी,  खुशियां आपको खुश करे,  आनंदमय रूप यही कहलाता है।

v बड़ा आदमी बनना आसान होता है,  लेकिन बड़प्पन एवं अपनत्व लाना उतना ही कठिन होता है।

v शालीनता, चारित्रिक रूपेण दर्पण है।

v विनम्रता,  अपनत्व से सत्यता की राह आसान होती है।

v नकारात्मक सीढ़ियों के सहारे हम सकारात्मक विचार की नींव बना सकते हैं।

v एकजुटता,  धर्मनिरपेक्षता,  समानता,  संप्रभुता आदि हर राष्ट्र प्रेमी में समायोजित होता है ।

v जिस किसी मानव ने प्रामाणिकता की कसौटी से खरे उतरे है, वही अपनी अंतर -चेतना की अनुभूति में स्वयं को महसूस कर सकते है ।

v आध्यात्मिक शक्तियों के लहरों को आंतरिक भाव चेतना से जीवन साधना का नया संस्कार रूपांतरित होता है ।

v हमारे समाज में आने वाले नस्ल में आंतरिक शुद्धि करण, सामाजिक,  सांस्कृतिक चेतना जागृत करने एवं नयी बीज बोना विश्व के राष्ट्र गुरु देश संपन्नता में अहम् भागीदारी होगी ।

v इंसान बनकर इंसानियत की भाषा केवल श्रेष्ठ मनुष्य ही दे सकता है ।

 

v सफलता उन्हें मिलती है, जो सपने देखना पसंद करते है, जिनके सपनों में जान होती है। हौसलों से जीत जाता है,  केवल वादों -इरादों से नहीं, बुलंदियों को छूने के लिए, सपनों को हकीकत में बदलना पड़ता है।

v जीवन को उत्कृष्ट करने के लिए तन -मन से मेहनत कर नया वातावरण बनाना पड़ता है । नए चेतना उन्मुक्त होने के लिए अपनी कुशल योग्यता पहचानने पड़ते है ।

v कांटों पर चल कर उम्मीदों की लकीर खींचना पड़ता है । तकदीर लिखती नहीं, बनायीं जाती है । दुनिया में जीने के लिए एक नयी पहचान बनायीं जाती है।

v आध्यात्मिक शक्तियों के लहरों से आंतरिक भावचेतना के जीवन साधना में नया संस्कार पैदा होता है |) जिस किसी मानव /जीव ने प्रामाणिकता की कसौटी से खरे, उतरे है, वही अंतरात्मा की अनुभूति को छू सकता है |

v हमारे समाज में आने वाले नस्ल/वंशज का प्रेरणास्रोत, सामाजिक, सांस्कृतिक जनचेतना एवम आंतरिक शुद्धिकरण का बीज बोना है |

v समाज में विराजमान निःस्पृह, निस्वार्थ, निश्छल, समाज- सेवियों चिंतको से हमेशा हमें नयी चेतना एवम प्रेरणा मिलती है |

v सदैव सकारात्मक पहलू विद्वता का परिचायक है |

v बड़ा आदमी बनना आसान हो सकता है, अपितु बड़प्पन एवम अपनत्व अपने अंदर लाना उतना ही कठिन है|

v इंसान की खोज में समय व्यर्थ न करो, अपितु इंसानियत की महत्त्व को अपने अंदर खोजे, स्वयं सच्चा इंसान आपको मिल जायेगा |

v  हम अक्सर बहरी सुंदरता देखकर अचंभित एवम आशंकित हो जाते है,बगैर जाने -समझे की असली सुंदरता, आत्मकोमलता एवम पवित्र हृदय से होता है |

v किसी की बुराई से न डरो, अपितु अपने अच्छाई से उसकी बुराई को ख़त्म करे, बड़प्पन एवं मर्यादा यही है |

v अच्छे बनने की होड़ में अपने अच्छाई को कतई पीछे न छोड़ना, नहीं तो बुराई आगे आकर आपकी अच्छाई को नष्ट कर देगी, जो आपके जीवन मूल्यों को ख़त्म कर देती है |

v दुनिया में जीने का एक मुकाम होता है,  हर किसी के जिंदगी का इस दुनिया में हिसाब होता है जीना जानते है सही से कुछ लोग, पर जिंदगी जीने का अंदाज कुछ को ही होता है |  तकदीर लिखती नहीं बनाई जाती है |

v मंजिल उसी को मिलती है‚  जिसे रास्तों से प्यार होता हैं | जीवन उतार-चढ़ाव का पर्याय है, अपने आत्मबल को कमजोर न होने देना |

v मन से इंसान को नहीं हारना चाहिए, क्योंकि मन से हारा हुआ इंसान कभी जीत नहीं पाता ।

v जीवन प्यार और ज्ञान का पर्याय है ।

v विनम्रता ही सफलता की सीढ़ी है ।

v आत्मबल, आत्मसम्मान नैतिकता का परिचायक है ।

v सत्यता आत्मबल को प्रबल करती है।

v हारा हुआ इंसान कमजोर नहीं होता, अपितु मन से हारा हुआ इंसान कमजोर होता है ।

v समय की उपयोगिता सफलता की राह दिखाती है, और सौम्यता, विनम्रता चारित्रिक दर्पण होता है ।

v उठना भी जरूरी है, उठाना भी जरूरी है, जीवन संघर्ष में मनोबल को बनाये रखना भी जरूरी भी है ।

v अनाथ, असहाय की मदद करने से जितनी पुण्य मिलती है, उतना ही पुण्य निर्मल पवित्र आत्मा को रखने से मिलती है ।

v महानता गिरने से कम नहीं होती अपितु गिर कर उठने  से महानता प्रबल होता है।

 

v गतिशीलता ही सफलता की राह आसान करती है, अपितु निरंतर प्रयास सही दिशा देती है ।

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AKHILESH KUMAR BHARTI (ASSISTANT MANAGER-DCC-EZ) MPPKVVCL, JABALPUR

09826767096(akhilesh.bharti59@gmail.com)

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