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August 2005
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सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष 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राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा

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नहीं लिखा है भाग में तेरे
एक वक्त का खाना जी
राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा
तुम्हीं भरो हर्जाना जी

अबके बरस ओ मेघ देवता
हमको नहीं रुलाना जी
खेतों में, खलिहानों में
सोना, चाँदी बरसाना जी

मेले में हमको ले जाना
करना नहीं बहाना जी
पैसे हों तो नई चप्पलें
हमको भी दिलवाना जी

भजन तुम्हारा कैसे गाएँ
नहीं पेट में दाना जी
बारह मास लगा रहता है
गम का आना जाना जी

रोजी, रोटी, बिजली, पानी
इनका नहीं ठिकाना जी
अपनी जेबें हरदम खाली
उनके पास खजाना जी

*-*-*
रचनाकार – अक्षय जैन – कवि, स्तंभलेखक, व्यंग्यकार और संपादक हैं. आपके जोशीले, व्यंग्य पूर्ण गीतों का एक संग्रह ऑडियो कैसेट रूप में भी जारी किया जाने वाला है जिसकी प्रक्रिया अंतिम चरणों में है.


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नभ समाधि

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इतनी ऊँचाई पर न चढ़ो
कि पृथ्वी दिखने लगे
एक गेंद की तरह
और सागर का विस्तार
सिमट जाए एक धब्बे में
और आदमी हो जाए लापता.

हो सकता है
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से विमुख
तुम्हारे यान का ईंधन
समाप्त हो जाए
और तुम पृथ्वी पर
लौट भी न सको.

दृश्य श्रव्य यंत्रों से
तुम्हारा संपर्क टूट जाए
तुम्हारी आवाज़
सुनाई भी न दे सके
और तुम्हारी तस्वीर
दिखाई भी न दे सके.

हो सकता है तुम्हारा यान
सभी नियंत्रक यंत्रों से
नाता तोड़कर
छिटककर दूर
आकाश की गहराइयों में
चला जाए
तुम्हारी प्राणवायु का
सीमित भंडार निपट जाए
और तुम हिचकियाँ लेते हुए
ले लो नभ समाधि.

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कथाकार कालीचरण प्रेमी की रचनाएँ सैकड़ों प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से अनेक पुरस्कृत भी हो चुकी हैं. आपकी कुछ रचनाओं का बांग्ला, पंजाबी व मराठी में भी अनुवाद किया गया है. कई पत्रिकाओं में आपका संपादन सहयोग भी है.

शेख़ सादी की कुछ कहानियाँ
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चुग़लख़ोर
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“गुरुजी, मेरा सहपाठी मुझसे जलता है. जब मैं ‘हदीस’ के कठिन शब्दों के अर्थों को बताता हूँ तो वह जल-भुन जाता है.” शेख सादी ने अपने शिक्षक से कहा.

गुरूजी बहुत नाराज हुए – “अरे नासमझ, तू अपने सहपाठी पर उंगली उठाता है, पर अपनी ओर नहीं देखता. मुझे यह समझ में नहीं आया कि तुझे किसने बताया कि लोगों के पीठ पीछे निन्दा करना अच्छा है? अगर उसने कमीने पन से अपने लिए नरक का रास्ता चुना है तो चुग़लख़ोरी की राह से तू भी तो वहीं पहुँचेगा.”

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चुग़ली
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एक आदमी एक दिन किसी समझदार आदमी के सामने चुगली कर रहा था. उसने कहा “तुम मेरे सामने दूसरों की बुराई कर रहे हो. यह अच्छी बात नहीं है. यह ठीक है कि जिसकी बुराई तुम मुझे बता रहे हो, उसके बारे में मेरे मन में विचार खराब हो जाएंगे, परंतु तुम्हारे बारे में भी मेरे विचार खराब हो जाएंगे. मैं सोचने लग गया हूँ कि तुम भी अच्छे आदमी नहीं हो.”

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बुद्धिमानी
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एक बादशाह ने एक विदेशी क़ैदी को मृत्युदंड दे दिया. क़ैदी को यह बहुत नागवार गुजरा और यह समझ कर कि उसे तो अब मरना ही है, बादशाह को अपनी भाषा में खूब गालियां देने लगा.

बादशाह ने वज़ीर से पूछा – “यह क्या बक रहा है?”

वज़ीर ने कहा – “हुजूर यह कह रहा है कि जो आदमी क्रोध को अपने वश में रखता है और जो दूसरों के गुनाहों को माफ कर देता है, अल्लाह उस पर मेहरबान होता है.”

बादशाह को कुछ अक्ल आई, और उसने क़ैदी को छोड़ देने का हुक्म दिया.

एक दूसरा भी वज़ीर वहाँ बैठा था. उसने बीच में टोका – “नहीं हुजूर, इसने आपसे झूठ कहा है. जहाँपनाह, क़ैदी को छोड़ें नहीं, दरअसल यह क़ैदी आपको तमाम गालियां दे रहा था.”

बादशाह ने उत्तर दिया - “तुम्हारी सच्ची बात से इसकी झूठी बात मुझे अधिक पसन्द आई. इसके झूठ के पीछे सद् विचार हैं. जबकि तुम्हारी सच्चाई किसी की बुराई पर टिकी है.”
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सर्वोत्तम इबादत
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एक बादशाह अत्यंत अत्याचारी था. एक बार उसने एक फ़क़ीर से पूछा - “मेरे लिए सबसे अच्छी इबादत क्या होगी?”

फ़क़ीर बोला - “तुम जितना अधिक सो सको, सोया करो. तुम्हारे लिए यही सबसे बड़ी इबादत है.”

बादशाह को अचरज हुआ. बोला - “यह कैसी इबादत है? भला सोते रहने में कैसी इबादत? फ़क़ीर यह कैसी आराधना तुम मुझे बता रहे हो?”

फ़क़ीर मुस्कराते हुए बोला - “मैं फिर से कहता हूँ कि तुम्हारे लिए यही सर्वोत्तम इबादत है. जितनी देर तक तुम सोते रहोगे, उतनी देर तक लोग तुम्हारे अत्याचार से बचे रहेंगे”

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सच्ची कविता
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एक कवि थे. जिसके सामने होते, उसकी प्रशंसा में कविता कर उसे सुनाते. बदले में उन्हें इनाम में जो कुछ मिलता, उससे गुजर-बसर आराम से चल रहा था.

एक बार वह डाकुओं के डेरे पर जा पहुँचे. डाकुओं के सरदार की प्रशंसा में कवि कविता सुनाने लगे.

डाकुओं के सरदार ने कहा - “इस मूर्ख को पता नहीं है कि हम डाकू हैं – खून-खराबा, लूटपाट हमारा पेशा है – और यह हमारी झूठी तारीफ़ों के पुल बाँध रहा है. इसे नंगा कर डेरे के बाहर फेंक दो.”

नंगे कवि को देख कुत्ते भौंकने लगे. कुत्तों को मार-भगाने के लिए कवि ने पास ही का पत्थर उठाना चाहा, परंतु वह जमीन में धंसा हुआ था. कवि गुस्से में चिल्लाया “कैसे हरामजादे हैं यहाँ के लोग. कुत्तों को तो खुला छोड़ देते हैं, और पत्थरों को जमीन पर गाड़ कर रखते हैं.”

सरदार उसे देख रहा था. उसने कवि की गुस्से में भरी ये बातें सुनीं तो वह हँस पड़ा. कवि को वापस बुलवाया और कहा - “तुम तो बड़े बुद्धिमान मालूम होते हो. चलो, तुम्हारी इच्छा पूरी की जाएगी. जो चाहते हो मांगो.”

कवि बोला - “मुझे मेरे कपड़े वापस कर दीजिए, और मुझे आराम से जाने दीजिए बस”

सरदार बोला - “बस, अरे भाई कुछ और मांगो.”

कवि बोला - “कामना किसी भले मानस से ही की जाती है. आप डाकू हैं – इंसानियत के दुश्मन – लुटेरे...” भय और गुस्से से उसकी आवाज़ कांप रही थी.

सरदार ठठाकर हँसा. बोला “कवि महोदय, यह जो तुमने अभी कहा वही तुम्हारी सच्ची कविता है. सच्ची कविता वही है जिसमें सच्ची बात कही जाए”

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सच्चा फ़क़ीर
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एक बार एक बादशाह ने नौकर को मोहरों की थैली देते हुए कहा - “ले, जा इन मोहरों को फ़क़ीरों में बांट आ.”

नौकर सारा दिन मोहरें बांटने के लिए तमाम जगह घूमता रहा और देर रात को वापस आया. बादशाह ने उसके हाथ में मोहरों से वैसी ही भरी हुई थैली देखकर पूछा - “क्यों मोहरें नहीं बांटीं क्या? इन्हें वापस क्यों ले आए?”

“हुजूर, मैंने फ़क़ीरों को बहुत ढूंढा, परंतु मुझे कोई फ़क़ीर मिले ही नहीं जिन्हें मोहरें दी जा सकें.” नौकर ने उत्तर दिया.

बादशाह का पारा गरम हो गया – वह गरजे - “क्या बकवास करता है – फ़क़ीरों का भी कोई टोटा है – सैकड़ों फ़क़ीर राह चलते ही मिल जाते हैं.”

“आप सही फ़रमा रहे हैं जहाँपनाह – पर मैं सच कहता हूँ, मैंने सारा दिन छान मारा – जो फ़क़ीर थे, उन्होंने ये मोहरें लेने से इनकार कर दिया और जो लेना चाहते थे वे तो किसी हाल में फ़क़ीर नहीं थे. अब बताएं मैं क्या करता?” नौकर ने सफाई दी.

बादशाह को अपनी भूल का अहसास हुआ. सच्चे फ़क़ीर धन से दूर रहते हैं.
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चाहत
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एक धनी बूढ़ा था. उसने शादी नहीं की थी. लोग उससे कहते – “अब तो बुढ़ापे में सहारे के लिए शादी कर लो मियाँ”

“किसी बुढ़िया से शादी करने को जी नहीं करता” बूढ़ा कहा करता.

“तो फिर किसी जवान से ही कर लो” लोग कहते - “औरतों की कोई कमी है क्या?”

बूढ़े का उत्तर होता - “जब मैं बूढ़ा किसी बुढ़िया से शादी करने की नहीं सोच सकता तो मैं कैसे सोच सकता हूँ कि कोई जवान मुझ बूढ़े से राज़ी खुशी, बिना लालच शादी करेगी”

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रचनाकार – शेख़ सादी – बारहवीं शती के महान संत और विचारक. मूल पर्शियन भाषा में कही गई शेख़ सादी की शिक्षाप्रद कहानियाँ सदियों से सारे जग का प्रेरणा-स्रोत बनी रही हैं. अँग्रेज़ी में अनूदित शेख़ सादी की अन्य कहानियाँ यहाँ पढ़ी जा सकती हैं : http://www.fordham.edu/halsall/pwh/sadi.html



-चित्रा मुद्‌गल


सामने बैठे मेजर अहलूवालिया सुधीश के गोल्फ की तारीफ कर रहे थे, “अब भी खेलता है...”
“फुरसत गोल्फ के मैदान में ही गुजरती है, एक पाँव शिमला में ही रहता है,” वह प्रशंसा को पचा नहीं पाई, अनजाने रूखी हो आई।
मेजर ने खिन्नता को थपकाया, “भई पुराना इश्क है, पुरानी शराब सा...”
जवाब उसके होंठ पर बेचैन हुआ मगर एक लंबे निश्वास में खामोश हो आया। बहुत कुछ ऐसा है जो भीतर उबलता रहता है मगर सुधीश से सामना करने से कतराता है। जरूरत भी महसूस नहीं होती...
“भीतर... बैठक में चलकर बैठें?” उसने आग्रह किया। मेजर की नजर घाटियों में उलझी हुई थी। घाटियों में संवला आई सांझ सांकल खटका रही थी और सघन चीड़ों के बाजुओं से एकाएक आजाद हुई हवा में बर्फीला कटाव घुल आया था, जो रह-रहकर सिहरा रहा था!
“चलिए वरना आपके कुल्फी बनने का अंदेशा है साहब! मगर एक शर्त पर!” मेजर अहलूवालिया बेतकल्लुफ हुए।
“शर्त... कैसी ?” वह हैरत से सिमटी।
“सुधीश की अनुपस्थिति के बावजूद मैं ड्रिंक लूंगा... केवल चाय पर नहीं टलने वाला...”
भीतर बैठते ही उसने सुखराम से हीटर लगा देने के लिए कहा और अपने लिए शॉल भी मंगवाई।
“क्या बनवाऊँ ?” वह मेजर साहब से मुखातिब हुई। उसे अच्छी नहीं लगती सुधीश की गैर हाजिरी में उसके दोस्तों की आवभगत !
“क्या है ?”
“मैं नहीं बता पाऊंगी, बाबूराम के जिम्मे है सुधीश का बार !” उसने बाबूराम को पुकारा।
“रम में कॉन्टेसा है ?” उन्होंने बाबूराम से पूछा।
“है न साब।”
“तो मेरे लिए एक लार्ज पेग कॉन्टेसा का, गुनगुने पानी में... और आप ?”
“मैं सॉफ़्ट ड्रिंक लूंगी...”
“ठंड में सॉफ़्ट ड्रिंक, मजाक कर रही हैं? सॉफ़्ट ड्रिंक से काम नहीं चलेगा। कॉन्टेसा लीजिए... कॉन्टेसा का पंख की छुअन-सा चढ़ता सुरूर, बात ही कुछ और है उसकी।”
“रम कड़वी लगती है...”
“सुधीश के साथ ली होगी”
“चलिए, आपके साथ लेकर देख लेते हैं !” अंदाज भाया उसे।
उन्होंने ही पास खड़े बाबूराम को समझाया, “मेमसाब के लिए चिल्ड सोडे में एक पेग कॉन्टेसा !”
“शादी से पहले सुधीश ने बताया था कि उसका ब्याह एक खिलाड़ी सुंदरी से हो रहा है, जो बास्केटबॉल चैंपियन है। एम आई राइट ?”
“जी... कभी थी !” उतरी मुस्कान धकियाती हुई वह उनकी स्मृति पर विस्मित हुई। 19 साल पुरानी बात ! उसे खुद ही अब याद नहीं कि वह कभी खेला करती थी और बहुत अच्छा खेला करती थी। सोनू, मोनू जब भी अपनी जीत के प्रशंसा पत्र और ट्रॉफी उसके हाथों में लाकर थमाते हैं तो कही किसी फाइल में दबे पड़े उसके अपने प्रमाणपत्र फड़फड़ाने लगते हैं। जी करता है कि दौड़कर उन्हें निकाल लाए और धूल झाड़ सोनू, मोनू को दिखाए, उन्हें चमत्कृत कर दे।
... ‘चिल्ड’ सोडे की चुनचुनाहट में रम के गहरे घूँट का मौसम ही बदल गया ! समझ नहीं पाई। सोडे की पहल है या मेजर साहब के संग-साथ का मनुहार !
“आप नहीं खेलते ?” बात कहीं से तो शुरू करनी थी।
“खेलता हूं...”
“क्या ? क्रिकेट, हॉकी, टेनिस, गोल्फ... ?”
प्रत्युत्तर में बैठक की छत से एक जोरदार ठहाका टंग गया, पत्थर की दीवारों में चकरी-सा भँवर लेता।
वह भौंचक-सी मेजर अहलूवालिया का चेहरा देखती रह गई। क्या कुछ ऐसा-वैसा सवाल कर दिया उसने ! “मैंने कुछ...” अटपटाहट झेली न गई उससे।
“आप भी... भला बताइए, इस उम्र में अब क्रिकेट, हॉकी... ? भई, सच तो यह है कि बची खुची जिंदगी को अलमस्ती से जीना चाहते हैं, उन्मुक्त परिंदों-से बिचरते हुए... जीवन रस का घूँट-घूँट पीते हुए... और इसके लिए हम दोस्त अकसर नए-नए खेल ईजाद किया करते हैं। पिछले दिनों हमारे विशेष क्लब में जिस खेल की तरंगें तरंगित हो रही हैं उसे कहते हैं...” मेजर अहलूवालिया ने ठिठककर उसकी आंखों में बहुर आए कोतूहल के चरम को टटोला, “जरा बूझिए तो ?”
कंधे उचकाकर उसने विवशता जाहिर की।
“उसे कहते हैं ‘वाइफ स्वैपी’ यानी कि पत्नियों की अदला बदली ! सुना है ?”
“नहीं तो...” विचित्र लगा खेल का नाम !
अपने गिलास का लंबा घूँट भर उन्होंने उसके गिलास पर नजर डाली और उसे ज्यों का त्यों पाकर खिन्न हुए, “ठंड में इस कदर ठंडापन बरदाश्त करवाना क्या खूबसूरत सोहबत के प्रति ज्यादती नहीं है हिमानी ?”
“न, न... ऐसी बात नहीं, सुनने में डूबी हुई हूं,” गिलास को होठों से लगा उनके उलाहने के अंतिम शब्द से उपजी छुअन को भी जबरन घुटका उसने। नाम के कितने चेहरे होते हैं। किसी और के स्वर की हथेली पर ठुड्डी टिका वे कितने अनछुए अर्थों के पृष्ठ खोल बैठते हैं।
“हाँ तो मैं ‘वाइफ स्वैपी’ के बारे में बता रहा था। होता यह है कि महीने के आखिरी शनिवार की शाम हमारे क्लब की प्रतीक्षित ड्रिंक, डांस, डिनर पार्टी आयोजित होती है। देर रात तक जश्न ए हंगामा चलता रहता है साहब ! अंत में एक बड़े-से बियर जग में चिल्ड बियर की बोतलें उंडेली जाती हैं। उफनती झाग में सभी सदस्य हौले से बियर जग में गिरा देते हैं। फिर हममें से कोई एक सदस्य छड़ी के सहारे बियर जग में पड़ी चाभियों को उलट-पलट कर मिक्स करता है। फिर बारी आती है चाभी उठाने की। कायदा यह है, जो सबसे पहले चाभी डालेगा, वही सबसे पहले चाभी उठाएगा...
“... सांस रोके, धड़कते दिलों से हम सभी चाभी उठाने की अपनी बारी का बेसब्री से इंतजार करते हैं, क्योंकि जिस भी गाड़ी की चाभी हमारे हाथ लगेगी उस गाड़ी के मालिक की पत्नी यानी कि उनकी मलिका-ए-आलम हमारी उस खुशनुमा रात की लॉटरी होंगी...
“... सभी सदस्य चाभियाँ उठा लेते हैं तो मत पूछो हिमानी ! खुशी की चीखों से सारा हॉल गूंज उठता है, मानो उनके हाथ अचानक कोई गड़ा खजाना लग गया हो। जाम बनते हैं, चियर्स फॉर वाइफ स्वैपी के नाम पर टकराए जाते हैं। जाम खत्म होते ही चाभी वाली गाड़ी की मालकिन लजाती शरमाती आपकी बगल में आकर खड़ी हो जाती है और...”
उसने टोका, “पत्नियाँ आपत्ति नहीं करतीं ? भारतीय संस्कार आड़े नहीं आते ?”
“नॉट एटॉल... दे एन्जवाय ईक्वली ! हाँ... भारतीय संस्कार आड़े आते हैं तब-जब...” सहसा मेजर अहलूवालिया विचारमग्न-से हुए। फिर बोले, “पहली बार का वाकया सुनो। खासा दिलचस्प है। दरअसल असली खेल वही है, जो अकसर हमारे बीच दोहराया जाता है...
“हुआ यों कि चाभियाँ मिलाई गईं और, मेरे हिस्से में आई मिस्टर कुमार की गाड़ी की चाभी यानी कि बला के सांचे में ढली मिसेज कुमार ! मेरी पत्नी के हिस्से में आए मिस्टर सिंह यानी कि एक उद्योगपति कवि ! खैर, वो आलम ही कुछ और था, हम अलमस्त धुनकी में थे और मिसेज कुमार को अपने हिस्से पाने की खुशी में अंधे ! ध्यान ही नहीं दिया कि हमारी मेमसाब हैं कहाँ। सो हम तो अपनी किस्मत को सलाम ठोंकते गाड़ी ले उड़े। ऐंड आइ रियली टेल यू हिमानी...” मेजर साहब अपनी सेंध लगाती अर्थपूर्ण मुस्कान को जबरन बंधक बनाते हुए आत्मविस्मृत-से ठिठके, जैसे उन मादक क्षणों में वे एक बार फिर पहुँच गए हों, “... वह एक खूबसूरत रात थी, बेहद खूबसूरत, एक साथ हजारों सितारों की रून-झुन में डूबी, शी वाज वंडरफुल... वेरी कोऑपरेटिव...
“...हां तो साहब, दूसरा दिन इतवार था। जाहिर है, नींद का कोटा चढ़ती दोपहर तक पूरा होना था। मगर स्वयं रात भर जगने के बावजूद मेमसाब की आंखों में नींद कहाँ। दस नहीं बजने दिए और उठाकर बैठा दिया। लाड़ और मनुहारों की तड़ातड़ बौछार के बीच चाय पेश की गई। चाय खत्म होते-न-होते कटाक्षों के तीर छूटने लगे – ‘क्यों, कैसी कटी रात ? कैसा रहा गरमागरम साथ ? क्या-क्या किया ! बोलो न ?’ जल्दी उठाने का मकसद समझ में आ गया। बड़ा नाजुक मसला था। चेहरे पर लापरवाही का भाव ओढ़ मैंने बीवी को बाजुओं में समेट लिया, ‘छोड़ो भी, रात गई, बात गई। तुम तो मैडम अपने नाजुक हाथों से एक प्याला गरम चाय पिलाओ... इस राधेश्याम ससुरे को चाय बनाने तक की तमीज नहीं।”
“ऊं हू... इतनी बुरी भी चाय नहीं बनाता राधेश्याम जो पी न जा सके,” बीवी जी सीने में चेहरा रगड़ते हुए फुन्नाई, “बात टाल रहे हो तुम। बताते क्यों नहीं ?”
“क्यों अच्छी-भली सुबह का जायका खराब कर रही हो ?” मिसेज कुमार की पूनी-सी मुलायम देह की रेशमी रपटन का स्मरण करते हुए मैंने पैंतरा बदला, “सुनो डियर, आइंदा से हम ऐसी किसी बेशर्म पार्टी में शामिल नहीं होंगे, अपनी तो वही पुरानी ‘ब्रिज’ मंडली भली।”
“मन-मन भावे, मूंड़ी हलावै !” बीवी जी ने चोट खाई नागिन-सी फुंकार छोड़ी, “मिसेज कुमार की गाड़ी की चाभी हाथ लगते ही तुम खुशी से यूँ उछले थे मानो अंधे के हाथ बटेर लग गई हो।”
“झूठ... यह सच नहीं है !”
“यही सच है !”
“फिजूल बात का बतंगड़ बना रही हो तुम ! धुनकी में थे, सभी खुशी से उछल रहे थे, हम भी उछल लिए होंगे...”
“सच कहूँ अनु... कोई औरत थी जो पल्ले पड़ी ! पाइरिया है उसे। मुँह खोलती है कि ढक्कन खुल जाता है...”
“छोड़ो झांसे, मुझे बहलाने से रहे तुम,” अविश्वास से पत्नी ने सिर झटका, “मेरी निगाह तो तुम्हीं पर गड़ी हुई थी। भूलकर भी तुमने मेरी ओर नहीं देखा... कैसी बेशर्मी से मिसेज कुमार की कमर में हाथ डाल चल दिए थे तुम !”
अपने पैंतरे को कुछ और तराशने की कोशिश की मैंने। पत्नी के रेशमी बालों को उंगलियों से उलझाते हुए बोला, “प्लीज अनु, समझने की कोशिश करो, कभी झूठ बोला है तुमसे जो अब बोलूंगा ? मानता हूँ, सभी कहते हैं, कि मिसेज कुमार बला की खूबसूरत हैं। होंगी ! मुझे नहीं लगतीं - नहीं लगतीं। लाख भौंहे नुचवा वे अपने नख-शिख तीखे कर लें, मगर चेहरे पर तुम-सा सलोनापन कहाँ से लाएंगी...”
“वो तो तुम सही कह रहे। वाकई अचरज होता है यह देखकर कि उनके क्लब में दाखिल होते ही सारे मर्द बीवियों को छोड़ उनके इर्दगिर्द मक्खियों-से भिनकने लगते हैं। आखिर क्या है उस घमंडिन में, सिवा एक गोरी चमड़ी के !”
“बिलकुल सही,” चैन की सांस ली मैंने।
“तो... कुछ नहीं किया !”
फिर वही सवाल ! मन किया – उसे परे धकेल धाड़ से कमरे से बाहर निकल जाऊँ। मगर यह सोचकर गम खा गया कि धैर्य छोड़ना विषबीज की जड़ें सींचना होता। बोला, “कुछ नहीं।”
“फिर रात भर करते क्या रहे...”
“बातें। वह अपने विद्यार्थी जीवन के रस भरे किस्से सुनाती रही और मैं सुनाता रहा अपनी-तुम्हारी मोहब्बत की छुपा-छुपौवल।”
“हाथ-वाथ भी नहीं पकड़ा... किस-विस ?”
“इतना हिम्मती मैं नहीं हूँ कि तुम्हारे अलावा किसी और को छू भी सकूं...”
“फिर झूठ...”
“नहीं सच, एकदम सच।”
“खाओ मेरी कसम !”
“तुम्हारी कसम।”
“ऊं... ऐसे नहीं, मेरे सिर पर हाथ रखकर कहो।”
“तुम्हारी कसम,” मैंने उसके सिर पर हाथ रख दिया। उसके चेहरे पर आश्वस्ति कौंधी।
अब मैंने उसे कुरेदा, “हमारा हाले-दिल तो पूछ लिया जनाब आपने, कुछ अपने बारे में भी बताइए... कवि के साथ कैसी मस्ती मारी.. ?”
“माइगॉड !” पत्नी ने खिन्नी के धोखे में मुंह आई निबौरी-सा कड़वा मुँह बनाया, “वो आदमी है कि पाजामा ! जानते हो कहाँ ले गया मुझे ? मौर्या शेरटन ! ऐसी सहमी हुई थी कि उसकी गाड़ी में पाँव देते ही सीधा हनुमान चालीसा का जाप शुरु कर दिया। क्षमा मांगी। रावण हर के नहीं ले जा रहा। सीता माता स्वेच्छा से उनके संग जा रही हैं। स्वेच्छा से न जा रही होतीं तो उसकी गाड़ी में चढ़ने से मना न कर देतीं ? कैसे मना करतीं। पति इच्छा को जो अपनी इच्छा बना लिया था। सतीत्व का धर्म, उनका धर्म। सो मन ही मन प्रभु को पुकारा। ऐसा चक्कर चलाओ प्रभु कि पति की इच्छा भी पूरी हो जाए और सतीत्व का सत् भी न टूटे। प्रभु ने फौरन मंत्र दिया। कवि की कविताओं की प्रशंसा शुरू कर दो। सब भूल चित-पट हो जाएगा। वही किया। हनुमान चालीसा पूरा करते ही कवि की कविताओं की प्रशंसा शुरू कर दी। विभोर कवि महाशय आनन फानन आत्म इतिहास के गलियारों में प्रविष्ट हो गए, पहली कविता कैसे, कब लिखी गई और कब, कहाँ पढ़ी, छपी, सराही गई, ब्यौरेवार बताने लगे। बस फिर क्या था, द्रौपदी की चीर-सी असमाप्त कविताएँ सुबह पाँच बजे तक सस्वर पाठ होती रहीं - रात बीत गई...”
“घर छोड़ने आए तो अश्रु विह्वल थे। बोले, जीवन संगिनी को तुम-सी चुटकी भर भी रसज्ञता मिली होती तो मेरा कवि कर्म सार्थक हो गया होता...”
मैंने ताली बजाई, “वाह भाई वाह ! कवि के साथ जुगलबंदी में तुम भी किस्से-कहानी के फंदे बुनने लगीं ? कोई विश्वास करेगा ! वह सा..ला घाघ है, घाघ। औरत देखते ही लार टपकने लगती है उसकी। बड़े दिनों से मौके की ताक में था। कब खेल शुरू हो और हरामजादे को मेरी गाड़ी की चाभी हाथ लगे...”
“आई स्वॅर... कुछ नहीं किया उन्होंने। कुछ करना भी चाहते तो मैं इतनी गिरी हुई नहीं हूँ कि उन्हें करने देती...”
“झूठ... गाड़ी की चाभी हाथ लगते ही पट्ठे ने लपक कर तुम्हारा हाथ नहीं चूम लिया था ?”
“हाँ... बस उतना भर ही...”
“मेरी आँखों में देखकर कहो, चुंबन शुंबन भी नहीं लिया उसने और...”
“और क्या ?”
“झूले नहीं डाले... पींगे-शींगे...”
“छि: कैसी बेहूदी बातें कर रहे हो... तुम्हारे अलावा किसी और का स्पर्श भी बरदाश्त नहीं मुझे।”
“यानी... कुछ नहीं हुआ...”
“कुछ नहीं...”
“रखो मेरे सिर पर हाथ और खाओ कसम अपने सुहाग की कि तुमने उस गैंडे को कुछ नहीं...”
“सुहाग की कसम !” बेहिचक पत्नी ने हाथ मेरे सिर पर रख दिया... !”
वाक्य पूरा होते ही अचानक बैठक की छत से एक और छतफोड़ ठहाका टंग गया। बड़ी देर तक झूलते झूमर-सा झूलता रहा... झूलता रहा...
फिर अस्फुट-से स्वर में शेष हंसी को कंठ में भींचते हुए से बोले, “सिर पर हाथ तो रखवा लिया था मैंने हिमानी ! पर मन ही मन चौंकन्ना हुआ। कहीं उसने भी सिर पर हाथ रखकर कसम वैसे ही तो नहीं खाई जैसे मैंने खाई थी ? हाथ तो रख दिया था सिर पर, लेकिन ईश्वर से क्षमा मांगते हुए, कि यह जो कसम मैं खा रहा हूँ, उसकी सुख-शांति के लिए खा रहा हूँ... कि अगर मैंने उससे सचाई कबूल दी तो सारी आधुनिकता के बावजूद हमारी जिंदगी निश्चित ही नरक हो उठेगी...”
...बाबूराम को पुकारकर मेजर ने अपने लिए एक और लार्ज पेग बना लाने के लिए कहा। फिर उसकी ओर झुककर उससे पूछा “हिमानी आप... ?”
इनकार में उसने सिर हिला दिया, “यही ज्यादा लग रहा है !”
उन्होंने कुर्सी के हत्थे से टिकी उसकी निश्चेष्ट औंधी हथेली पर अपनी हथेली रख दी, “देखो हिमानी, साथ दिया है तो साथ देना होगा... अच्छे खिलाड़ी बीच मँझधार में से चप्पू नहीं फेंकते...”
... उनकी हथेली की गिरफ़्त में उसकी हथेली चीड़ के डोरिहा पत्तों-सी थरथराई !

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रचनाकार - चित्रा मुद्‌गल की अपनी विशिष्ट पहचान है हिन्दी कहानीकारों में । कई उपन्यासों के साथ कोई दर्जन भर से अधिक कहानी संग्रह आपने लिखी हैं – जिनमें से कुछ खासतौर पर बच्चों के लिए भी हैं। आप दूरदर्शन/प्रसारभारती से भी जुड़ी रही हैं। आपको हिन्दी साहित्य के कई विशिष्ट सम्मान पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है, जिसमें रेणु सम्मान तथा दिल्ली हिन्दी अकादमी पुरस्कार आदि सम्मिलित हैं।

-स्वामी वाहिद काज़मी
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दिल्ली से एक पाठक ने किसी आवश्यकतावश पत्र लिखा और इस प्रकार चार-छः पत्रों के आदान-प्रदान का सिलसिला रहा. मैं उन्हें अपने पत्रों में ‘आदरणीय’ ही लिखता था. एक बार उन्होंने मुझे लिखा- “मेरी उम्र मात्र तीस वर्ष है और मेरे पिताजी छियासठ वर्ष के हैं. आप मुझे ‘प्रिय’ ही संबोधित करेंगे, न कि आदरणीय.”

उनकी आपत्तिनुमा दिक्कत मेरी समझ में आई. ‘आदरणीय’ तो बड़े बूढ़ों, बुज़ुर्गों को लिखना चाहिए, न कि युवाओं को. उनके टोकने के पीछे यही मंशा रही. ‘आदरणीय’ संबोधन के लिए मैं उम्र का हिसाब या लिहाज़ नहीं रखता. मेरे लिए सभी पाठक, इन्सान होने के नाते, आदर योग्य यानी आदरणीय ही हैं. इतना ही नहीं, मैं पते पर ‘सेवा में’ और नाम से पूर्व ‘श्रीयुत’ लिखना भी नहीं भूलता. चाहे पाने वाला चौराहे पर बैठा जूतियाँ गांठता चमार या आपकी-हमारी क्या – सारे समाज की गंदगी ढोने वाला भंगी ही क्यों न हो. अपने जीविकोपार्जन हेतु ऐसे पेशे से जुड़े हैं तो क्या वे आदर-योग्य नहीं रह गए? घृणा या अपमान के योग्य कैसे हो गए?

इसके पीछे किसी भी प्रकार की औपचारिकता या दिखावा नहीं है. बल्कि यही मेरी तालीम व तर्बियत (शिक्षण-प्रशिक्षण) और समझ रही है. अदब, क़ायदा, तमीज़-तहज़ीब आदि तमाम चीज़ें जिस एक शब्द में समाई हुई हैं वह शब्द है- संस्कार. इसे अब धर्म कर्म जैसी पुरानी व रूढ़िग्रस्त चीज़ों से जोड़ दिया जाता है जबकि इसका सीधा सा अर्थ है- ऐसे सभी शिष्टाचार तमीज़, तहज़ीब, अदब, क़ायदे इस हद तक सीखना-सिखाना कि आदत में शुमार हो जाए. अलग से सम्प्रास प्रयोग नहीं करना पड़े.

एक शब्द जिसे आज रोज़मर्रा के जीवन से तो क्या, बोली-बानी के देश से ही मानो निर्वासित कर दिया गया है, वह है- आदाब! इसका सामान्य अर्थ अभिवादन ही है, पर इसकी सीमा यहीँ तक नहीं है. अरबी भाषा का शब्द ‘आदाब’ बहुवचन है ‘अदब’ का. और इसका अर्थ है – अदब, सलीका, तमीज़, शिष्ट आचरण. जब हमने बोलना भी नहीं सीखा था तभी से यह हमें घुट्टी में घोल-घोलकर पिलाया जाने लगा था. खाने-पीने के आदाब, बोलने-बतलाने के आदाब, बैठने-उठने के आदाब, दूसरों से व्यवहार करने यानी हर बात, हर व्यवहार का शिष्टाचार हमारे तमाम क्रिया-कलाप और व्यवहार का कंठहार बन गया.
मूंगफली जैसी मामूली चीज़ चलते-फिरते तो दूर, खड़े-खड़े भी नहीं खा सकते थे. कोई भी चीज़ खाओ तो बैठकर ङी खाओ! खड़े-खड़े खाद्य पदार्थ का निरादर होगा. पानी पियो तो बैठकर पियो, दाहिने हाथ से पियो. किसी को कोई चीज़ दो तो दाहिने हाथ से. लो तो भी दाहिने हाथ से. भोजन फ़र्श पर चटाई पर दस्तरख़्वान बिछाकर, अदब से. भोजन करते समय व्यर्थ की गपशप, ठी-ठी, खी-खी, ज़रा भी नहीं. ये करना भोजन का, अन्न का अपमान जैसा होगा. ये सब हमें सिखाए गए आदाब थे. नतीज़ा ये कि आज भी मैं किसी विवाह समारोह आदि में अव्वल तो जाता ही नहीं हूँ, जाना ही पड़े तो भोजन क़तई नहीं करता. क्योंकि अब खड़े-खड़े तो दूर, खी-खी करते, चलते-फिरते, धकियाते, ठेलते हुए भोजन का रिवाज मुझे सरासर बदतमीज़ी, बेअदबी और अन्न का अपमान प्रतीत होता है.

पिताजी वकील थे. जब कभी वे अपने बैठक में न होकर भीतर हम लोगों के पास होते थे और बाहर कोई आवाज़ देता तो हमें यही सिखाया गया था कि सबसे पहले आगंतुक को माथे तक हाथ उठाकर सलाम करो फिर उसका नाम और काम पूछ कर आओ. हम उसी सांचे में ढले हैं. और, विश्वास मानिए, आप अपने बच्चों को जिस सांचे में आप ढालना चाहेंगे, वे उसी में ढलेंगे. आज बहुतों को यह विश्वास ही नहीं होगा कि हमारी इस अदब-तमीज़ के कारण कुछ लोग तो भावुक हो जाते थे- अरे, जिन्हें लोग किसी गिनती में नहीं गिनते. पास नहीं बिठाते. झिड़ककर, घृणा से बात करते हैं उन्हें ये बच्चे इतने अदब से सलाम करते हैं. धन्य हैं वकील साहब और धन्य हैं उनकी संतानें! कोई निम्नतम श्रेणी का, छोटी से छोटी जाति का व्यक्ति क्यों न हो, पिताजी उसे अपने पास कुर्सी पर ही बैठाते थे. उधर वह संकोच, शर्म, लिहाज से दोहरा हुआ जा रहा है. ज़मीन पर बैठना चाह रहा है, मगर नहीं! पिताजी का आग्रह – बैठो कुर्सी पर.

मेरे बचपन में गांव-भर में ग़ैर औरतें रहती ही नहीं थी. यदि वे हिन्दू होतीं तो कोई जिज्जी होती तो कोई काकी. यह मौसी तो वह मामी. हम उम्र या हमसे छोटी उम्र की बालिकाओं को ही उनके नाम से पुकार सकते थे. मेहतरानियों तक को उनके नाम से नहीं उनके मायके के गांव-शहर के नाम से पुकारा जाता था. काम निपटाकर जब वे पानी पीने या सुस्ताने अंदर ज़नानख़ाने में आतीं तो दुरदुराया नहीं जाता था. उन्हें खाना-पीना भी दिया जाता था. आप सोच सकते हैं कि जब हर जाति-बिरादरी की स्त्रियों के प्रति इतना आदर-भाव बरता जाता था तो पुरुषों के प्रति कितना होता होगा.

घर के हर बच्चे पर तमाम बड़ों की दृष्टि रहती थी कि किसी से बेअदबी से तो पेश नहीं आता. बदतमीज़ी, जुबानदराज़ी, बदकलामी तो नहीं करता. मैं उन्हीं पुराने संस्कारों को पीये हुए जिया हुआ आदमी हूँ. बहुत लोग होंगे जिन्हें ये बातें व्यर्थ के बंधन प्रतीत होंगें. रूढ़ियों जैसे लगेंगे. फ़िज़ूल की पाबंदियों जैसे महसूस होंगे. मगर उन दिनों आदमी को इनसान बनाने का रसायन यही चीज़ें, यही बातें थी. आज आदमी और आदमियत के पैमाने बदल डाले गए तो क्या हुआ. हमारी और आपकी भी जड़ें तो वही हैं. जो सच है, है. कोई माने, न माने इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. आज जो अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, उद्दंडता आदि हर ओर नज़र आ रही है, यह कोई आसमान से नहीं बरसी है, इसी धरती से उपजी है. क्योंकि हम एडवांस्ड, माडर्न होने की अंधी दौड़ में उन संस्कारों से पल्ला झाड़कर अलग हो गए जो हमारी पहचान थे. कभी इस पर सोचिएगा अवश्य! तहज़ीब की पहली पहचान और क्या है?

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रचनाकार - स्वामी वाहिद काज़मी - प्रतिष्ठित, वरिष्ठ साहित्यकार हैं



कहानीः राजू का साहस
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- शरतचन्द्र

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उन दिनों मैं स्कूल में पढ़ता था. राजू स्कूल छोड़ देने के पश्चात् जन-सेवा में लगा रहता था. कब किस पर कैसी मुसीबत आयी, उससे उसे मुक्त करना, किसी बीमार की सेवा-टहल, कौन कहाँ मर गया, उसका दाह-संस्कार इत्यादि कार्य वह दिन-रात किया करता था.

मैं राजू का दाहिना हाथ था. जरूरत पड़ने पर राजू मुझे बुला भेजता. दाह-संस्कार के कार्य अकेले न कर सकने के कारण उसे मेरी जरूरत प्रायः पड़ती ही थी.

एक बार ज्येष्ठ एकादशी के दिन हमारे मामा के यहाँ नाटक हो रहा था. कलकत्ता से पार्टी आई थी. गांव के सभी लोग नाटक देखने आए थे. मैं एक कोने में बैठा तन्मयतापूर्वक नाटक देख रहा था. ठीक उसी समय न जाने राजू कहाँ से टपक पड़ा और मुझसे बोला “सुनो, इधर आओ”

मैं बाहर चला आया. राजू ने कहना जारी रखा- “उस मुहल्ले में तारापद के लड़के की मृत्यु हैजा से अभी हो गई है. महज तीन साल का छोटा बच्चा है. एक ही लड़का था तारापद का. तारापद और उसकी पत्नी लाश को लेकर रो-रोकर जमीन आसमान एक किए दे रहे हैं. मेरे विचार में इस छूत की बीमारी वाली लाश का शीघ्र अंतिम संस्कार कर देना चाहिए. सोच रहा हूँ, इसी समय श्मशान ले चलूं. गांव के सभी लोग तो नाटक देख रहे हैं. कोई बुलाने से भी नहीं आ रहा. चल, तू तो मेरे साथ चल.”

बिना कोई प्रतिवाद किए मैं चुपचाप उसके साथ हो लिया. अधूरा नाटक ही मेरे भाग्य में था.

तारापद और उसकी पत्नी को जैसे तैसे दिलासा देकर, जैसे तैसे हमने उसके बच्चे की लाश एक तरह से हमने अंतिम संस्कार के लिए छीन ली. उसके बाद हम गांव से श्मशान की ओर चल पड़े. रात बहुत बीत चुकी थी. एक बजने को था. सर्वत्र अंधियारा था.

रास्ते में मैंने राजू से कहा - “एक लालटेन साथ ले लेते तो अच्छा था.”
राजू ने कहा- “अच्छा तो होता पर इस समय मिलेगी कहाँ? घर में कौन बैठा है? मेरे पास माचिस है, जरूरत पड़ी तो इसी से काम चलाएंगे.”

जवाब में मैंने कुछ नहीं कहा. मृत बच्चे को गोद में लिए राजू आगे-आगे चल रहा था. पीछे-पीछे मैं चुपचाप चला जा रहा था.

श्मशान गंगा किनारे है. श्मशान विराट और भयावह नीरव है जिसके कारण लोग दिन में भी आने से यहाँ डरते हैं. आसपास दूर-दूर तक कोई गांव या झोंपड़ी तक नहीं है. नाम मात्र को दो-चार खजूर और कटहल के विशालकाय वृक्ष हैं जो वातावरण को और भारी बनाते हैं. दूर दूर तक गंगा की बालू दिखाई देती है.

श्मशान के बीचों बीच एक फूस की झोंपड़ी थी. क्रिया-कर्म करने वाले इसी झोंपड़ी में धूप-बरसात में पनाह लेते थे. लोगों का कहना था कि झोंपड़ी में भूतों का अड्डा है. रात की तो बात ही छोड़िए, दिन में भी कोई आदमी उस झोंपड़ी के भीतर अकेले जाने से डरता था.

राजू इन सब अफवाहों पर ध्यान नहीं देता था. वह सीधे उस झोंपड़ी में घुस गया. यद्यपि मैं भी उसके पीछे-पीछे उस झोंपड़ी में आया. लेकिन स्वाभाविक रूप में नहीं. मैं डरा हुआ था और मुझे लग रहा था कि किसी ने मेरा हाथ पैर कसकर पकड़ रखा है. साथ में राजू था इसी लिए कुछ हिम्मत थी वरना मैं कब का भाग खड़ा होता.

जमीन पर लाश रखते हुए राजू ने कहा - “काफी देर से बीड़ी नहीं पी है. चल पहले एक-एक बीड़ी पी ली जाए. इसके बाद आगे काम करेंगे. क्यों ठीक है न?”

राजू के प्रश्न का उत्तर मैं देने जा रहा था कि उस अन्धकारमय झोंपड़ी के भीतर स्पष्ट रूप से यह आवाज सुनाई दी - “क्या एक बीड़ी मुझे भी दे सकते हैं?”

भय से मेरा कलेजा मुँह को आ गया. सिर के बाल तक खड़े हो गए. मारे भय के सारा बदन पसीने से तरबतर हो गया.

लेकिन राजू ने ठण्डे स्वर में पूछा -“तुम हो कौन?”

उत्तर आया “मैं हूँ?”
“मैं हूँ...” कहते हुए राजू ने माचिस जलाई. क्षणिक सी रोशनी में हमने देखा – हमारे पास ही एक मैले बिस्तर पर मनुष्य की तरह की कोई आकृति पसरी हुई है. सिर से पैर तक सारा बदन कपड़ों से ढंका हुआ है.

राजू ने अच्छी तरह देखने के बाद कहा - “अरे, यह तो एक और मुर्दा है. पता नहीं कौन ले आया है? शायद लकड़ी लाने गए हैं.”

तभी आवाज फिर से आई - “नहीं बेटा, मैं मुर्दा नहीं हूँ.”

इस बार अत्यधिक भय के कारण मैं राजू से लिपट गया. मैं बेतरह कांप रहा था. मेरी घिग्घी बंध गई. लेकिन राजू, वाह रे राजू! धन्य है तू! उसने उसी निर्भय भाव से पूछा- “तब तुम कौन हो?”

माचिस की तीली बुझ चुकी थी. राजू ने दूसरी जलाई. इस बार गौर करने पर पता चला कि आवाज गन्दे कपड़ों के भीतर से आ रही थी- “मैं गंगा यात्री हूँ बेटा!”

राजू ने मुझे ढाढ़स बंधाते हुए कहा -“डरने की बात नहीं है रे! यह मुर्दा नहीं – गंगा यात्री है!”

इसके बाद एक बीड़ी सुलगाकर उसके मुँह में ठूंस दी. वह एक कृशकाय वृद्ध था. बीड़ी का कश लेने के बाद उसकी आवाज फिर आई. इस बार उसकी आवाज में परम तृप्ति थी- “ओह! जान बची. कई दिन हुए यहाँ ला कर पटक दिए हैं. मांगने पर कोई बीड़ी भी नहीं पिलाता. सबके सब कमीने हैं.”

अब राजू ने वृद्ध से सवाल करना शुरू किया- “कितने दिन हुए यहाँ आए? तुम्हारे साथ कितने आदमी हैं? वे लोग कहाँ गए?”

वृद्ध ने कहा- “तीन दिन हुए. मौत नहीं आ रही है. मेरे दो नाती और एक पड़ोसी मुझे यहाँ ले आए हैं. वे लोग भी मेरे साथ यहाँ थे. आज न जाने कहाँ पास ही में कलकत्ता से कोई नाटक कम्पनी आई है- वहीं वे लोग नाटक देखने चले गए हैं. मैं जल्दी मर नहीं रहा हूँ. यहाँ तो गंगा किनारे की हवा खाकर चंगा हुआ जा रहा हूँ. मरने का नाम ही नहीं ले रहा हूँ. पता नहीं मेरे भाग्य में क्या है – न जाने क्या होगा! एक बार गंगा-यात्री बनने के बाद सुना है, घर वापस नहीं जाना चाहिए.”

राजू ने कहा - “कौन कहता है कि घर नहीं जाना चाहिए. आपको देखने पर कोई नहीं कह सकता कि आप मरने वाले हैं. अभी तो आप काफ़ी भले-चंगे हैं. आपका घर कहाँ है? चलिए घर लौट चलिए. हम लोग आपको वापस ले जाएंगे, नहीं तो आपको घर वापस नहीं जाना चाहिए कहने वाले लोग ही शायद आपका गला दबा देंगे.”

वृद्ध ने कहा -“तुम ठीक कह रहे हो बेटा! कई दिनों से यही बात कहकर वे लोग मुझे डरा रहे हैं. पता नहीं कब मेरा गला दबा दें.”

राजू ने कहा- “खैर, कोई हर्ज नहीं. हम लोग अपना काम पूरा करते हैं फिर आपको अपने साथ ले चलेंगे. आज की रात आप मेरे घर रह लेना, कल सुबह आपको घर छोड़ आएंगे.”

तारापद के लड़के का दाह संस्कार हमने किया. इसके पश्चात् राजू गंगा में स्नान कर वापस आया. मुझसे कहा- “तू यह सब कपड़ा बिछौना पकड़ ले मैं इनको उठा लेता हूँ”

जिस तरह आते समय आए थे, हम उसी तरह वापस जा रहे थे. राजू वृद्ध को पीठ पर लादे चल रहा था. पीछे मैं कथरी-चद्दर लादे चुपचाप चल रहा था.

मामा के घर के पास आने पर मालूम हुआ – नाटक अभी समाप्त नहीं हुआ है.

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सुप्रसिद्ध कहानीकार-उपन्यासकार बाबू शरतचन्द्र (1876-1938) की मूल बंगाली में लिखी ग्रामीण जीवन की कहानियाँ हिन्दी भाषियों में भी अच्छी-खासी लोकप्रिय हैं.

आलेखः कार्य का आनंद
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- विक्रम दत्ता

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महाविद्यालय की पढ़ाई पूरी करते-न-करते छात्र-छात्राओं के सामने उचित रोजगार चुनने का संकट खड़ा हो जाता है. लोग कहते हैं कि आज के समय में रोजगार नहीं है. परंतु यह एक सत्य है कि रोजगार पहले की अपेक्षा आज के समय में कहीं ज्यादा हैं. हाँ, ये हो सकता है कि सरकारी नौकरियों के लिए अवसर कुछ कम हो गए हों, परंतु उससे कहीं ज्यादा संख्या में - तमाम निजी क्षेत्रों में चाहे वे बैंकिंग हों या बीमा और निर्माण हो या टेलिकॉम सेवाएँ – रोजगार के अवसर हाल ही के कुछ वर्षों में पैदा हुए हैं- और यह स्थिति आने वाले कुछ वर्षों तक टिकी रहनी है. हां, रोजगार के इन अवसरों को हथियाने के लिए आपको भीड़ में अपनी अलग पहचान बनानी होगी. प्रतियोगिता के इस दौर में आपको अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच पहले के दस-बीस स्थानों में मुकाम बनाना होगा. समस्या यहीं आती है. लोग पीछे रह कर उम्मीद करते हैं कि उन्हें रोजगार मिले – ऐसा कभी न हुआ है ओर न होने वाला है.

अब सवाल यह है कि रोजगार कैसा चुना जाए. रोजगार उस क्षेत्र का चुनें, ऐसा रोजगार चुनें जिसमें आपको मज़ा आए. जैसे कि, अगर आपकी कोई हॉबी है – और आप उस हॉबी को अपना रोजगार बना लेते हैं – तब आप अपने रोजगार के हर क्षण का, काम के हर आयाम का मजा लेंगे. यह तो सोने में सुहागा जैसा होगा.

मेरा अपना ही उदाहरण है. मेरे सामने एयर फोर्स में ग्राउंड ड्यूटी पायलट ऑफ़ीसर तथा महाविद्यालयीन लेक्चरर में से एक का चुनाव रोजगार के रूप में करने का विकल्प था. जहाँ एक ओर हर नौजवान की तरह मैं भी एडवेंचरस लाइफ युक्त सेना के पायलट के रूप में उस बेहतरीन रोजगार के प्रति आकर्षित था तो दूसरी ओर वह सामान्य सा रोजगार, एडवेंचरहीन, ग्लैमरहीन रोजगार – लेक्चरर का था. मैं प्रारंभ से वाचाल था, बोलने-बताने में मुझे मजा आता था, विद्यालय-महाविद्यालयों के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में मेरा कोई सानी नहीं था – ये सब चीज़ें मुझे लेक्चरर के उस रोजगार के लिए आकर्षित कर रही थीं, जो मेरी हॉबी थी. मैं भयंकर पाठक था, लिहाजा किसी भी विषय पर किसी भी समय घंटों भाषण दे सकता था. भले ही सेना के पायलट का रोजगार एडवेंचर युक्त, ग्लैमर युक्त था, परंतु कॉकपिट पर बैठ कर घंटों खामोश बैठकर युद्धक विमान चलाने में मुझे कोई मजा नहीं आने वाला था यह तय था. जबकि लेक्चरर के रुप में मुझे हर क्षण मज़ा आने वाला था यह तय था. मैंने उस समय का सबसे कठिन निर्णय लिया - जो दूसरों की नज़र में निहायत बेवकूफ़ाना था – लेक्चरर की नौकरी करने का. आज मुझे अपने उस निर्णय पर कोई पछतावा नहीं है. मैंने अपने रोजगार के हर क्षण का आनंद लिया है.

आप अपने कार्य में आनंद तो लें ही, हर क्षण सीखने के लिए भी तत्पर रहें. मैंने शुरूआती दिनों में कार्य का वह क्षेत्र चुना जो मुझसे अनजाना था. पिछड़ा इलाका था – डाकुओं का क्षेत्र था. कक्षाओं के भीतर से तमंचा अड़ाकर छात्रों को अपहृत कर लिया जाता था. खुले आम बंदूक की नोक पर नक़ल करने का चलन था. मैंने सीखा कि आप ऐसी जगह रह कर अकेले ऐसे भ्रष्ट तंत्र को नहीं बदल सकते. परंतु ऐसी जगहों पर भी गंभीर विद्यार्थी मुझे मिले जो सचमुच शिक्षा को अपनाना चाहते थे. मैंने उनकी सहायता कर उन्हें उनके सपने को साकार करने में संबल बन कर कम से कम ऐसे भ्रष्ट तंत्र को अंगूठा तो दिखा ही दिया. जिन्होंने नकल किए, उन्हें अपने गले में टांगने डिग्री तो भले ही मिली, उनका कोई वास्तविक इस्तेमाल वे नहीं कर सकते.

एक और बात कही जाती है – आमतौर पर शिक्षक और विद्यार्थी का स्तर गिरता जा रहा है. अनुपात में कहीं कमी बेसी हो सकती है, परंतु आज भी लगनशील विद्यार्थी हैं जिन्हें अपनी पढ़ाई के अलावा कुछ सूझता नहीं है और अभी भी ऐसे संस्कारवान् शिक्षक हैं जो डॉ. राधाकृष्णन के पदचिह्नों का पूरा अनुसरण करते हैं. एक उदाहरण है- मेरे एक शिक्षक मित्र ने एक विद्यार्थी को नकल करते पकड़ा. विद्यार्थी को यह नागवार तो गुजरा ही, उसने मारपीट और गालीगलौज भी की लिहाजा प्रकरण पुलिस में चला गया. न्यायालय में सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने शिक्षक मित्र से बयान देने को कहा कि विद्यार्थी ने कौन सी गाली दी थी. उस मित्र के मुँह से बयान के लिए, अपराध साबित करने के लिए भी गालियाँ नहीं निकली. वह गंदे शब्द अपने मुँह से निकाल ही नहीं सका. उसके संस्कार ने उसे रोक दिया था – कहने का सार यह कि सारा समाज यहीँ है, शिक्षक भी यहीं से हैं और विद्यार्थी भी. अच्छे बुरे सभी में हो सकते हैं. इसके उलट उदाहरण भी हैं – शिक्षक जिन्हें ट्यूशनों और दूसरे काम धंधों से इतनी फ़ुरसत नहीं मिलती कि वे सही तरीके से अपनी कक्षाएं ले सकें.

लोगों की भावनाएँ समझें और उनकी छोटी छोटी समस्याओं का समाधान आप अगर कर दें तो लोगों में काम के प्रति समर्पण की भावना पैदा होते देर नहीं लगेगी. एक उदाहरण है प्रिंसिपल के रूप में मैं एक ऐसे महाविद्यालय में पदस्थ हुआ जहाँ कक्षाएँ नहीं लगती थीं. विद्यार्थी कक्षाओं में नहीं आते थे. महाविद्यालय भवन अन्य शासकीय योजनाओं की तरह अव्यावहारिक रूप से शहर से बहुत बाहर वीराने में बना था जिससे लोगों को तमाम तरह की समस्याएँ आती थीं. पर ये समस्याएँ छोटी-छोटी ही थीं. जिन्हें हल करने में कोई खास मेहनत नहीं करनी थी और जिसके नतीजे अच्छे आ सकते थे. जैसे, पीरियड के घंटों को व्यवहारिक बना कर 10 बजे से 3 बजे तक किया गया ताकि छात्र-शिक्षकों को आने जाने में परेशानी न हो. पहले यह अव्यावहारिक रूप से सुबह आठ बजे था. जाहिर है, इतनी सुबह आवागमन की सुविधा प्राप्त करने में प्रायः सभी को कठिनाइयाँ आती थीं. पब्लिक ट्रांसपोर्ट के लिए व्यवस्था की गई. महाविद्यालय के माहौल को हरा-भरा साफ-सुथरा तो बनाया ही गया, रोजगार संबंधी सूचनाओं का एक हब भी बनाया गया. छात्रों को महाविद्यालय से फिर से जुड़ने में ज्यादा समय नहीं लगा. कुछ महीनों में ही कायाकल्प हो गया. विद्यार्थियों को पढ़ने में मज़ा आने लगा तो शिक्षकों को पढ़ाने में.

काम को बोझिल बनाने से बचें. किसी भी काम को करने के कई तरीके हो सकते हैं. काम करने का सबसे आसान तरीका होता है नियमबद्ध काम करना जो आपके पुरखे करते चले आ रहे होते हैं – क्योंकि काम करने का उसका रास्ता, उसका जरिया सबको पता होता है. परंतु अकसर यही सबसे बेकार और बोरियत भरा तरीका होता है. बोझिल तरीका होता है. टाइप्ड तरीका होता है. काम के वैकल्पिक, मजेदार तरीकों के बारे में सोचें. थोड़े लंबे तरीके से जाएँ – हो सकता है – आपको थोड़ा मजा आए. एक उदाहरण है – एक बच्चा अपने पिता जी से जिद कर रहा था कि पार्क घुमाने ले चलो. पिता को कुछ काम था और वह उस वक्त नहीं जा सकता था. उसने बच्चे को उलझाने के लिए एक पज़ल दिया – पृथ्वी का नक्शा था – उसके पचीस-पचास टुकड़े किए और बच्चे से कहा- इसको पूरा फिर से जोड़ कर सही नक्शा बनाकर ले आओ तो फिर चलेंगे. पिता ने सोचा कि बच्चा तो गया काम से दिन भर के लिए. परंतु अभी आधा घंटा बीते ही नहीं थे और बच्चा हाजिर – हल किए सवाल के साथ. नक्शा तैयार. पिता अचरज में. पूछा यह कैसे किया?

बालक ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया – मैंने शरीर को जमा लिया, तो नक्शा भी अपने आप जम गया. पिता ने पूछा – शरीर ? क्या मतलब? बच्चे ने पृथ्वी का नक्शा पलट दिया. पीछे मनुष्य के शरीर का नक्शा भी छपा हुआ था. बच्चे ने शरीर के हिस्से जमा दिए थे. नक्शा अपने आप जम गया था.

निष्कर्ष यह कि आप अपने आप को जमाएँ – सारा जहान आपके साथ ही खुद-ब-खुद जम जाएगा.

विक्रम दत्ता – जाने माने शिक्षाविद् हैं.


कहानीः बहाने से
· संजय विद्रोही

सड़क से देखने पर लगता था कि दूर कहीं आसमान से थोड़ा नीचे एक ऊंची-सी चीज के बदन पर एक जुगनू चिपक कर टिमटिमा रहा है. गौर से देखने पर मालूम पड़ा कि एक बहुमंजिला इमारत की ऊपरी मंजिल के किसी फ्लैट की किसी खिड़की से रोशनी की कुछ बदहवास लकीरें बेवजह बाहर झांक रही हैं. इमारत में घुसिए, लिफ्ट को ट्राई करें? बंद पड़ी है ना?! इस लिफ्ट का सदा ये ही हाल रहता है. चलो , सीढ़ियाँ/ पकड़ते हैं. चले आओ. चढ़ते जाओ. मंजिल दर मंजिल एक सूनापन चुपचाप, बिना किसी हलचल के सारी फ्लोर पर पसरा पड़ा है. सूई गिरने जितनी आवाज भी जिसको बर्दाश्त नहीं है. जरा ­सी आहट होते ही खामोश सन्नाटा जोर से चीख पड़ता है. सूई भी गिरती है तो बेचारी गिरते ही सहम जाती है और देर तक उसकी डरी हुई सांसों का आरोह-­अवरोह माहौल में सुनाई देता रहता है. लेकिन आप इन सब बातों में मत पड़िये. चलते रहिए, चढ़ते रहिए बस. दम फूलने लगा ना? घबराइये मत. अक्सर चलते­-चलते हांफने लगना जीवित होने का स्वयंसिद्ध प्रमाण है. अन्यथा लोग तो ऐसे भी हैं, जो चुपचाप बिना किसी आवाज के चले जा रहे हैं. निश्शब्द. साले मुर्दे कहीं के. किन्तु आपको बधाई. क्योंकि आप हांफ रहे हैं. क्योंकि आप जिंदा हैं. चढ़ते­-चढ़ते, लीजिए हम उस फ्लोर पर आ गए हैं. जिसके किसी फ्लैट की किसी खिड़की से रोशनी की कुछ बदहवास लकीरें बेवजह बाहर झांक रही थी. दम ले लीजिए जरा. फिर देखते हैं, भीतर क्या है?


दरवाजे पर धातु की महंगी­-सी नाम­-पट्टिका टंगी है, चमचमाती हुई. पट्टिका पर लिखा है­ अनुरिक्ता दासगुप्ता. आपको नहीं लगता कि खाली 'अनुरिक्ता' होता तो ज्यादा अच्छा होता ? बेकार में 'दासगुप्ता' को साथ में लटकाना जरूरी है क्या? अनुरिक्ता, जो कि तीसेक बरस की एक नौकरीपेशा लड़की है और इस महानगर में अकेली रहती है. आम लड़कियों ही की तरह जो सुन्दर है, जवान है, आधुनिक है, आकर्षक है, 'मादक' है. पर आम लड़कियों से भिन्न­, जो बोल्ड भी है. जो अपने जीवन को अपनी मर्जी से, अपनी शर्तों पर ,बगैर किसी की परवाह किए जीती है और भरपूर जीती है. चलो, दरवाजा खटखटाते हैं. ठक. चिर्ररररर. अरे! ये क्या? ये तो खुल ही गया. चलो, अच्छा हुआ. बेकार वो परेशान होती, दरवाजा खोलने उठकर आती. क्या पता किस हाल में हो? लड़कियों के साथ ये भी तो चक्कर है. एक मद्धिम रोशनी से भरे गलियारे के बाद एक जगमगाता हॉल है, आइए इधर बैठते हैं. छोटी-­छोटी मोढ़ियों जैसी कुशन लगी चार सुरुचिपूर्ण कुर्सियाँ पड़ी हैं. बीच में एक ग्लास टॉप वाली सेंटर टेबल पड़ी है. जिस पर कुछ अँग्रेज़ी के अखबार और एक फैशन एण्ड लाइफ़ स्टाइल वाली मैगजीन खुली पड़ी है. एक एश-ट्रे भी पड़ी है. जिसमें पड़े सिगरेट के कुछ अधजले टोंटे अपने जीवन की निरर्थकता का रोना आलाप रहे हैं. सामने एक टीवी रखा है, रंगीन है शायद. वैसे भी आजकल ब्लैक एण्ड व्हाइट चीजें पसन्द किसे आती हैं. सबको सबकुछ 'रंगीन' चाहिए. दाँये हाथ की तरफ वाली दीवार पर एक बड़ी पेंटिंग टंग रही है. जिसमें एक षोड़सी कन्या को स्नान करते हुए दिखाया गया है. जिसके दोनों अनावृत वक्षपिण्ड ऐसे सुडौल हैं कि बरबस ही देखने वाले के शरीर में 'कुछ' होने लगता है. लम्बी चिकनी मांसल जाँघें भी हाहाकारी प्रतीत होती हैं. हर आने वाला कुछ देर रुककर इसको जरूर देखता है. आप भी रुक गए ना? छोड़िए भी.

अब इधर देखिए. हाई­-फाई ऑडियो सिस्टम रखा हुआ है. ऑन करें? चलो, करते हैं. कोई ग़ज़ल की सीडी लगी है. ग़ज़ल सुनना भी फैशन­-सा हो गया है आजकल. हल्का संगीत तैरने लगा है माहौल में, खुशबू की तरह. क्या घर में कोई नहीं है? शायद न हो. शायद कहीं बाहर गया होगा. माफ करें, गई होगी. तो चलो, मौके का फायदा उठाएँ. एक राउंड ले लेते हैं. हॉल के अलावा केवल एक कमरा और है. हॉल में खुलने वाला यह कमरा बेडरूम है. बेड पर एक जोड़ा ब्रेज़ियर और पैंटी बेतरतीब­ सी पड़ी है. शायद पहनी हुई थी, उतार के पटकी हुई जान पड़ती है. कढ़ाईदार अन्त:वस्त्र काफी मंहगे हैं, जानते हैं आप? अंदर के वस्त्रों पर इतना पैसा खर्च करने का क्या औचित्य? शायद हो. बैड के सिरहाने आसमानी कलर की एक मख़मली नाइटी भी इसी तरह पड़ी है. जैसे कपड़े बदलते समय जमीन पर गिर गई हो. घिर्रा बनाकर और लापरवाही से उठाकर पटक दी गई हो बैड पर. बैड पर गुलाबी रंग की चादर बिछी है. सलवटें अभी भी जिस पर रात के सफर का जिक्र करने में व्यस्त हैं. दो हल्के आसमानी कलर के तकिए भी हैं. जो काफी दूर­-दूर पड़े हैं. दूर-­दूर क्यों? कुछ भी हो सकता है साहब. क्या सोचने लगे आप? यही ना कि एक अकेली लड़की के कमरे में दो तकिए क्यों? अरे भई! आप तो समझते नहीं हो. आजकल एक्स्ट्रा तकिए का फैशन है. बगैर उसके नींद कहाँ आती है किसी को. हल्के पीले रंग के परदे से ढंकी यहाँ एक खिड़की भी है. जिससे आसमान साफ दिखाई देता है और धरती धुंधली. यही वह खिड़की है जिससे छनकर आ रही रोशनी आपको सड़क पर से देखने पर जुगनू जैसी जान पड़ी थी. अरे! ये क्या? किसी की फोटो के टुकड़े पड़े हैं जमीन पर. किस की फोटो है? शायद लड़के की. या शायद लड़की की. नहीं, एक लड़का और एक लड़की की है. फाड़ी किसने? शायद लड़के ने. या शायद लड़की ने. देखो, उधर लैम्पशेड के पास रखी एश-ट्रे पर एक बुझी हुई आधी सिगरेट भी रखी है. शायद कोई मर्द था यहाँ. हाँ. लेकिन क्या लड़कियाँ सिगरेट नहीं पी सकतीं? क्यों नहीं पी सकतीं? पर आपको नहीं लगता एक अकेली जवान लडकी के बेडरूम में एक मर्द की कल्पना करना ज्यादा आनन्दित करने वाला होगा. तो क्यों ना मान लें कि कोई मर्द ही था यहाँ. फोटो के टुकड़ों में भी तो एक मर्द का चेहरा नजर आ रहा है. है ना? आओ अब कल्पना करें, यहाँ क्या हुआ होगा? कोशिश करने में क्या जाता है? नहीं? मान लो यहाँ रहने वाली लड़की यानी अनुरिक्ता का किसी लड़के से 'लकड़ा' चल रहा है. मान लो उसका नाम विवेक है. विवेक अकसर इस लड़की के यहाँ आता ­जाता है. खाता­ पीता है. रहता ­सोता है. कहने का मतलब है कि देअर इज एन इंटीमेट रिलेशनशिप बिटवीन दैम. पिछले कुछ बरसों से ऐसा ही चल रहा है. कई बार दोनों वीकएंड पर घूमने भी साथ गए हैं. साथ-­साथ इतना वक्त गुज़ारते हैं, तो साथ में फोटो होना भी लाजिमी है. आपको पता है अनुरिक्ता फैशन डिजाइनर है? उसके रहन­सहन से, घर के बनाव­सिंगार से नहीं लगता आपको? विवेक भी इसी लाइन का आदमी है. वो एक एड­ एजेंसी चलाता है. एक ही लाइन में होने पर रिश्तों में प्रगाढ़ता आ जाने की संभावनाएँ कई गुना बढ़ जाती हैं. लेकिन कई दफा रिश्तों की कलई खुल जाने में भी वक्त नहीं लगता. शुरुआती दोस्ती के बाद दोनों के बीच गहरे रिश्ते बन गए थे. दोनों ने भावना की आग में शरीरों को तापना शुरू कर दिया था. तपे हुए शरीरों पर कब कोई ओस की बूंद टिकी है? ओस का मतलब तो एक अनछुई, नाजुक, निर्मल हंसी है. छू दिया, मानो सब खत्म. प्यार भी देह की दहक के सामने यूं ही उड़ता है. तब शुरू होती हैं­ अपेक्षाएँ. हर वक्त मेरे ही साथ रहो. मेरे ही बारे में सोचो. मुझसे ही बातें करो. हर रात मेरे ही साथ सोओ. किससे बातें कर रही थी? किसके साथ घूम रही थी? क्या दादागिरी है भई? विवेक भी अगर यही सब सोचता हो तो क्या गलत नहीं है?

आज रात भी ऐसा ही कुछ हुआ. घड़ी देख रहे हैं आप? अभी रात का एक बज रहा है. तब शायद दस बजे का वक्त रहा होगा. टीवी देखने के बाद इस कमरे में दोनों आए. बगैर एक मिनट का भी समय गंवाये दोनों ने अपने आपको वस्त्रों और अन्त:वस्त्रों के बन्धन से मुक्त किया और धधकती देहों को वासना की भट्टी में झोंक दिया. उसी के निशानात हैं, ये बिखरे हुए अन्त:वस्त्र और सिमटी हुई बेडशीट. दूर-­दूर पड़े तकिए भी? नहीं. ये कुछ और दास्ताँ कह रहे हैं. अनुरिक्ता एक सोशल­गर्ल है. देर रात भड़कीली पार्टियों में रहना. रोज नए­-नए लोगों से मिलना . तरह तरह के मर्दों से घुलना­ मिलना. कभी काम से और कभी 'काम' से साथ में रहना, घूमना. ऐसे में विवेक का ये समझ लेना कि वो सिर्फ उसी की जागीर है. उसी के साथ रहने­-खाने­-सोने के लिए बनी है. तो बताओ क्या होगा? यही ना कि तकिए उठा­-उठा कर फेंके जाएँगे. हवा में हाथ हिला-­हिला कर चिल्लाया जाएगा. सिगरेट पीते­-पीते बीच ही में एश­-ट्रे में रख दी जाएगी और लेटेस्ट फोटो जो कि दिखाने के लिए लाई गई थी, चिंदी­-चिंदी करके हवा में उछाल दी जाएगी. आनन­-फानन में तब पैंट चढ़ाकर, शर्ट के बटन बंद करता हुआ वो चला जाएगा. बड़बड़ाता हुआ.

पीछे-पीछे ही जल्दबाजी में अनुरिक्ता भी नाइटी हटाकर स्कर्ट­-टॉप डालेगी. नीचे गिरी नाइटी को उठाकर बैड पर फेंकेगी और विवेक के पीछे­-पीछे धड़धड़ करती सीढ़ियाँ उतर जाएगी. आखिर देह की आग भी तो अपनी जगह है

चलो, घर देख लिया आपने. अच्छा हुआ. घर और घर में रहने वाली के बारे में काफी कुछ जान गए आप, पहली ही विजिट में. ये भी जान गये कि आजकल वो अकेली है. जाएँगे अब? ओके गुड नाईट. ओ! सॉरी. गुड मॉर्निंग. सी यू. एक्सक्यूज­ मी, मे आय इन्ट्रोडयूज माईसेल्फ, प्लीज़? आप कहेंगे­ 'श्योर, व्हाई नाट?' मैं कहूंगी­, 'माई सेल्फ­ अनुरिक्ता'.

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रचनाकार संजय विद्रोही के कई कविता संग्रह और कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. आपकी ताज़ातरीन कहानीसंग्रह ‘कभी यूँ भी तो हो’ साहित्य जगत् में चर्चा का विषय बनी हुई है.


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- चार्वाक

आजकल लोक में बहुत संभावनाएँ हैं. हमेशा ही रही हैं. मड़ई और चौमासा जैसी पत्रिकाओं को देखकर उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में चार व्यक्तियों को उस संभावना ने गुदगुदाया. कुछ दिन बाद ये व्यक्ति अध्यापक कक्ष में खिलखिला रहे थे. कायदे से इस समय इन्हें कक्षाओं में होना चाहिए था, पर परम्परा के अनुसार ये खिलखिलाते हुए समय बिता रहे थे. तभी इन्होंने तय किया कि लोकसाहित्य में कुछ हस्तक्षेप करना चाहिए. एक विद्वान जो विवाह से पूर्व हस्तक्षेप के कारण परम हस्तक्षेपी हो गए थे, बोले, ‘इसमें क्या है, कर देंगे. जब कहो तब कर दें.’ चार व्यक्तियों में तीन महापुरुष थे और एक महास्त्री. अंक महापुरूष ऋषि दुर्वासा के दत्तक पुत्र माने जाते थे. उन्होंने घोषणा की कि अगले हफ़्ते चलकर हांका लगाएंगे और लोकसाहित्य के किसी रूप का आखेट कर के लाएंगे. महास्त्री महाशांति के साथ मुस्कुराई.

एक सप्ताह बाद... दिन रविवार. चार विद्वान जीप पर जनादेश की भांति लदे हुए थे. जीप लोकतंत्र की तरह किसी गांव की ओर भागी जा रही थी. मिशन लोकसाहित्य. लोक काल के गुलगुले गाल में समा जायं इससे पहले उसे पकड़ कर प्रोजेक्ट के पिंजरे में डाल देना था. विद्वान एक तो उसका सिर अपने ड्राइंग रूम में लगाने के इच्छुक थे. आखेटक भागे जा रहे थे. लक्ष्य था दुर्वासा का गांव. जहाँ माल मिलेगा. दुर्वासा ने शिक्षिका को सखीभाव से देखकर छटपटाते हुए कहा, ‘अहा, क्या नहीं है लोकगीतों में. गोरिया सोवै उतान हो जोबना दूनो हालै.’ विषय प्रवर्तन न कर पाने की पीड़ा से ग्रस्त विद्वान एक ने टोका, ‘इसमें तो मर्यादा रूपी कंचुकी के बंद खुलते लग रहे हैं अर्थात् यह अश्लील है.’ दुर्वासा के वश में होता तो विद्वान एक को लील लेते, फिर भी बोले, ‘आपको विश्वविद्यालय में भर्ती किसने कर लिया भाई. यह तो अध्यात्म का उदाहरण है. गोरी यानी जीव, उतान यानी मोहनिद्रा में अचेत सो रहा है. परमात्मा या गुरु की कृपा सगुण और निर्गुण रूपी दो जोबनों की भांति उसे हिला हिला कर जगा रही है. यार, कभी तो देह के पीछे बैठे विदेह को देखा करो.’ शिक्षिका ने अपने सगुण और निर्गुण पर गड़ी दुर्वासा की दृष्टि को भांप कर उन्हें माया अर्थात् आँचल से आच्छादित कर दिया. जीप किसी कामुक की इच्छाओं की भांति लहराती हुई जा रही थी. विद्वान एक ने और सबने देखा कि बाईं ओर एक सांड़ निहित उद्देश्य के तहत एक गाय का अनुधावन कर रहा था. विद्वान एक बोले, ‘अहा, मानो गुरु योग्य शिष्य के भीतर ज्ञान प्रविष्ट कराने के लिए आतुर है. अहा.’ दुर्वासा ने रक्त का एक संक्षिप्त घूँट पिया.

जीप गांव में दाखिल हुई. जानवर चराने वाले लड़के, खेतों से आती औरतें और खैनी ठोकते फालतू बूढ़े आकर्षित हुए. कुछ उत्साहित लड़कों ने जीप में लटकने की फुर्ती दिखा ही दी. दुर्वासा दहाड़े, ‘अबे हट! गधे को तनिक भी तमीज़ नहीं. उठिबो चलिबो बोलिबो लिहिन विधाता छीन. जीप में खरोंच लग गई तो पैसा कौन भरेगा, तेरा बाप. अहा, लोक साहित्य में सच कहा गया है... इनसे बातें तब करो जब हाथ में डंडा होय. हट नहीं तो दूंगा लात.’ लड़के जीप छोड़कर पीछे पीछे चल रहे थे. दुर्वासा की गालियाँ विद्वान एक (मधुप जी), विद्वान दो (पपीहा जी), विद्वान ती (चकोरी जी) को ललित निबंध का लाइव टेलीकास्ट लग रही थीं. वे रहस्यवादी ढंग से खीसें प्रसारित कर रहे थे. जीप धूल और गालियां उड़ाती दुर्वासा के दरवाजे पर पहुँची. स्वागत में कुछ लोग खड़े थे. चारपाइयाँ बिछी थीं. दो बाल्टियों में पानी था. शुद्ध.

शिकारी जीप से उतरे. दुर्वासा घर के भीतर चले गए. मधुप पास खड़े नीम के पेड़ पर मुग्ध होने लगे. पपीहा कपड़े झाड़ रहे थे. चकोरी चारपाई पर यथा संभव बैठ गई. कन्धे पर अंगौछा डाले एक अर्द्ध आधुनिक युवक तेजी से करीब आ रहा था. आ गया तो पूछा, ‘का लेंगे आप लोग. ठंडा या गरम.’ मधुप बोले, ‘ठंडा यानी.’ युवक अदा के साथ ठठ्ठाया, ‘ठंडा मतलब कोका कोला. अरे अंकल, हियां सब मिलेगा.’ चकोरी यूटोपिया से बोली, ‘दही हो तो लस्सी बनवा लो... या नींबू का शरबत. ताजे नीबुओं की तो क्या खुशबू... और क्या स्वाद.’ युवक लहालेट हो गया, ‘क्या अंटी जी. हियाँ दूधै नहीं बचता, सब सप्लाई हो जाता है और निम्बू से बढ़िया है लिम्का. परधान के यहां जब अफसरान आवति हैं तौ लिम्कै पीते हैं और फिरि अंटी जी, बोतल क्यार मजै कुछ दूसर है.’ वाक्य पूरा करते-करते स्वाभाविक रूप से उसकी दूसरी आँख दब गई. चकोरी कुछ कहती कि मधुप बोले, ‘यार लिम्का ही मंगवा लो, हम तो भाई तुम्हारे मेहमान हैं. चाहे जैसी खातिरदारी करो.’ युवक के जाते ही पपीहा ने कहा, ‘देखा साले को. एक नम्बर का हरामी पीस है. गुरु हम लोग बिना मतलब दुःखी रहते हैं कि गांव वाले कष्ट में हैं. सब साले चकाचक हैं.’ मधुप गुनगुनाए, ‘भाड़ में जाएं इनके कष्ट. तुम प्रोजेक्ट का खयाल रखो बस. दुर्वासा बहुत नेता बनने की कोशिश कर रहा है.’ चकोरी चकित हुई, ‘मैं तो मान रही थी कि वे हमारे नेता हैं. आप लोग...’ पपीहा पुकार उठा, ‘उनके झांसे में मत आना मैडम चकोरी. सारी औरतों को बिटिया बिटिया करता रहता है, मगर मन में क्या है, भगवान जानें. आप को भी तो एक बार बिटिया कहा है.’ तब तक मधुप ने कुछ दूर खड़े एक लड़के को इशारे से पास बुलाया. लड़का सहमा फिर आगे बढ़ा. मधुप ने कहा, ‘एक लोटा पानी ला दो जरा धूल से भरा चेहरा ठीक कर लूं. ऐसी तैसी हो गई. तुम लोग यहाँ कैसे रहते हो यार.’ यार शब्द का प्रयोग आत्मीयता बढ़ाने के लिए किया गया था, जिसका उचित प्रभाव भी पड़ा. लड़का बोला, ‘अब्बै लाइति है.’ सहसा दुर्वासा प्रकट हुए और फट पड़े, ‘क्या लाएगा बे. अब ये बाहर से आए हैं, नहीं जानते, मगर तू तो जानता है अपनी जाति. सरऊ दिमाग खराब है. ये तेरे हाथ का पानी पिएंगे ठाकुर होकर. कभी तेरे बाप गजोधर ने ऐसी हिम्मत की थी.’ दुर्वासा अब लोकवीणा के ढीले तार कस रहे थे... यानी लड़के के कान उमेठ रहे थे. वीणा कस गई तो ध्वनि निकली. लड़का किसी तरह छूटा और चीखता हुआ भागा. युवक ठंडी बोतलें लिए पास आ रहा था. शिकारी खटिया पर पसर गए.

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दिव्य नाश्ते के बाद भव्य भोजन की व्यवस्था. नाश्ते में अंकल चिप्स थे तो भोजन में मटर पनीर की सब्जी. भोजनोपरांत दुर्वासा, पपीहा, मधुप और चकोरी एक-एक व्यक्ति को लेकर बैठ गए और उनसे कुछ नोट करने लगे. दुर्वासा के भाई ने लोक गायकों की टोली को बुलौवा भेज दिया था. उनके आने से पहले शिकारी ऋतु गीत, जाति गीत, श्रम गीत, संस्कार गीत आदि के नमूने नोट कर रहे थे. मधुप परम पुलकित थे. उनके हिस्से में गौने से ताजा ताजा लाभान्वित होकर लौटी युवती आई थी. मधुप पहले चिन्तित हुए फिर अधीर, फिर आशान्वित होने लगे. युवती ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हो चुकी थी. वह समझ रही थी और गौनान्वित गरिमा का निर्वाह कर रही थी. लिखते लिखते मधुप पेचिश सदृश मार्मिक मरोड़ के साथ बोले, ‘अभी अभी तो रेल चलाय दूंगी - इसका मतलब क्या है. कोठरी में रेल कैसे चला दोगी’ युवती रेल यात्रा के संस्मरणों में खो गई फिर सावधानी से मुसकराई, ‘हमारी चाची ने याद करवाया है. उनसे पूछ कर बताती हूँ.’ मधुप हड़बड़ाए, ‘रहने दो, मैं दुर्वासा सर से पूछ लूंगा.’ युवती मूड में थी, ‘कौन, बड़कऊ चाचा. वो लखनऊ में रहते हैं, चाची यहाँ. अकेले कहीं रेल चलती है. वो क्या बताएंगे मतलब. भौजी को बुलाऊं.’ मधुप ने कहा, ‘बस हो गया, तुम जाओ.’ तब तक युवती को बुलाने एक अन्य अविवाहित युवती आ गई. दोनों चली गईं. पपीहा के कान शायद इसी ओर थे. उठ कर आए और धीरे से कहा, ‘मधुप डियर ये जाहिल लोग हैं. लक्षणा व्यंजना नहीं समझते. जरा होशियारी से. बिच्छू का मंत्र नहीं जानते तो सांप की बांबी में हाथ क्यों घुसेड़ रहे हो.’ मधुप उत्तेजित और उत्साहित थे. इस बार लूजमोशनोचित लालित्य के साथ बोले, ‘सीईई! आह! ह हा! डियर पपीहा, लोकसाहित्य में क्या गंध है, क्या भराव है, क्या कसाव है. अभी भी बहुत कुछ अछूता है. मन करता है लोकसाहित्य के साथ ही सोऊं उसी के साथ जागूं. काश मैं रहूँ और रहे लोक. लोकसाहित्य को लेकर मेरे अरमान भड़क उठे हैं.’ पपीहा मुसकराया, ‘भगवन मुझसे न उड़ो. मैं न कहता हूँ कि दुर्वासा के चिरयौवन का रहस्य यही लोकसाधना है.’

मधुप ने मानों भीष्मप्रतिज्ञा की, ‘दाँत किटकिटा कर कहता हूँ कि अब लोकसाधना ही करूंगा. धीरे-धीरे ही सही, करूंगा. पत्नी छूटे, छूट जाय. करूंगा. धीरे धीरे ही सही. बूंद बूंद से सागर भर जाता है. एक एक रोंया मिलकर बालों का गुच्छा बन जाता है.’ इधर चकोरी जी तड़ातड़ लोकगीत गिरा रही थीं.

दुर्वासा अपने बड़े भाई मतंग के साथ दुआरे खटिया पर बैठे थे. दुर्वासा पूछ रहे थे कि तमाम जातियों में गाए जाने वाले गीत कैसे इकट्ठा होंगे. मतंग बमक पड़े, ‘छोटकन्ने सिंह सच्ची कहते हैं बड़कऊ कि सालों को मोटाई सवार है. किसी को परवाह है अपनी संस्कृति की. घर की परम्परा का किसी को ध्यान नहीं. इसके बाप दादा कितने नेक और देशभक्त थे. सौ सौ जूते खाए मगर घर की परम्परा नहीं त्यागी. अब कहारों धोबियों पासियों के गीत कहाँ मिलेंगे. सब सौखीन हो गए. कोई पैर दबाने वाला तो मिलता नहीं. पहले निकलो तो पैलग्गी करने वालों की लाइन लग जाती थी. अब कहीं मरजाद का खयाल नहीं. बहुत हुआ तो नमस्ते. कलियुग है. लोकसाहित्य और लोकगीत का तो राम ही मालिक है. जब तक हमारा बस चला जूतों के जोर पर इसे बचाए रखा. अब क्या होगा.’ दुर्वासा मारे क्रोध के कांपने लगे. बस चलता तो अभी नरसंहार प्रारंभ कर देते.

*--*

लोकगायकों ने समां बाँध दिया. शिकार पूरा हुआ. दुर्वासा भाई से बोले, ‘मैटर मिल गया. अब चलने की तैयारी की जाए. अगले महीने फिर आएंगे. लोक साहित्य खतरे में है.’ मधुप के मन में कुछ रेलगाड़ी सा धड़धड़ाया, ‘मेरे होते हुए उसे कोई छू भी नहीं सकता. तुम घबराना नहीं लोकसंस्कृति मैं फिर आउंगा.’ दुर्वासा धीरे से बोले, ‘पगलैटी मत झाड़ो, चलकर जीप में बैठो.’ जीप चली और गांव से बाहर आई. सहसा सामने एक बूढ़ा और बुढ़िया आ गए. दुर्वासा बुदबुदाए, ‘आ गए साले लतमरुए. ये दोनों अपने को लोकसंस्कृति का जानकार बताते हैं.... स्साले. अथवा एक साला एक साली.’ मधुप खिलखिलाया, ‘भूखी नंगी लोकसंस्कृति, चिथड़ा लपेटे लोक साहित्य.’ दुर्वासा का भाई मतंग दौड़ता आया और बूढ़ों को परे ढकेला. जीप बढ़ी. धूल में सब गुम हो गए. पपीहा गुनगुना रहा थाः
‘नई झुलनिया की छइयां
बलम दुपहरिया बिताय दा हो.’

शिकारियों से लदी जीप भाग रही थी.

*--*
साभारः कथाक्रम, जुलाई-सितम्बर 2005 अंक.
कथाक्रम – कथा साहित्य, कला एवं संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका है, जिसके संपादक शैलेन्द्र सागर हैं. 20 रुपए मूल्य की यह पत्रिका पिछले सात वर्षों से प्रकाशित हो रही है. संपर्कः 4, ट्रांजिट हॉस्टल, वायरलेस चौराहे के पास, महानगर, लखनऊ – 226006
ईमेल – kathakrama AT rediffmail DOT com

देवेन्द्र आर्य की दो ग़ज़लें
*-*-*
मैं तवायफ़ हूँ, बेहया तो नहीं
थोड़ी मोहलत दे, बच्चा सो जाए।

ग़ज़ल 1

*-*-*

पास पास थे चुभे, गड़े।
दूर दूर थे, नए लगे।

शहर भी अजीब है तेरा
भीख दी तो ज़ात पूछ के।

अपने ग़म में जल रही है वो
जाइए न हाथ सेंकिए।

रात जैसे लिख रही हो ख़त
दिन कि जैसे खो गए पते।

इश्क हमने इस तरह किया
जैसे कोई सीढ़ियाँ चढ़े।

डिगरियाँ कराहने लगीं
क्या बिके कि नौकरी लगे।

औरतें कठिन न हों तो मर्द
एक बार पढ़ के छोड़ दे।
--.--

ग़ज़ल 2
*-**-*
मौत भी जिंदगी सी हो जाए।
झूठ और सच का फ़र्क़ खो जाए।

तिश्ना लब के सिवाय कौन है जो
सुर्ख अहसास को भिगो जाए।

पिण्ड तो छूटे वर्जनाओं से
जो भी होना है आज हो जाए।

ऐसे मत मांग हाथ फैला के
हाथ में जो है वो भी खो जाए।

मैं तवायफ़ हूँ, बेहया तो नहीं
थोड़ी मोहलत दे, बच्चा सो जाए।

*-*-*


*-*-*
- मीरा शलभ

---
बड़े भैया. आप क्या कल सवेरे ही चले जाएंगे? छोटी गुड़िया ने जानते हुए भी यह प्रश्न किया था. “हां” – बड़े भैया ने एक लम्बी श्वास खींचते हुए कहा और हाथ का सामान हाथ ही में थामे न जाने क्या सोचते हुए रह गए. फिर एक क्षण को अपने अधरों पर एक विस्मत रेखा खींचते हुए से बोले ... “क्यों? गुड़िया तू चलेगी मेरे साथ. बता, चलेगी क्या?”

गुड़िया ने निरीह भाव से मुझे देखा और मैंने शीघ्रता से आँखें झुका लीं तथा पायल को सुलाने के बहाने उस कक्ष से आँगन में चली आई. गर्मियों के दिन थे. सब लोगों के बिस्तर आँगन और छत पर लगे हुए थे. कुछ लोग सो चुके थे और कुछ सोने लेने का उपक्रम कर रहे थे. कुछ सदस्य जाग भी रहे थे और जो जाग रहे थे वे आपस में बतिया रहे थे.

बड़े ताऊजी ने निःश्वास भरते हुए कहा... “लो भई मुरलीधर भी गए... अब हम ही रह गए हैं दिन गिनने के लिए...” फिर थोड़ा रुक कर बोले -“भई, आदमी का भी क्या है? आज है और आज नहीं. सामान सौ बरस का और कल की खबर नहीं”

अम्मा ने उनकी बात सुनकर दबी-दबी सिसकियों को ऊँचा आलाप देना शुरू कर दिया और अवरूद्ध कंठ से बोलीं ... “अरे तेरहवीं भी निबट गई. अब तुम सब लोग भी कल चले जाओगे... बस मैं ही अकेली रह जाऊँगी ... दीवारों से टकराती हुई डोलूंगी सारे घर में...” बुआ धीरे से बोलीं... “सुना है नित्या भी कल ही चला जाएगा.” इतना सुनते ही ताईजी बड़े ही नाटकीय अंदाज में बोलीं- “अरी बीवी... कौन किसका है? कौन किसके लिए बैठा रहे उम्र भर...? सभी अपने-अपने धंधों में लगे हुए हैं.”

अब तक के तमाम वार्तालाप को मैं चुपचाप सुन रही थी. किंतु ताई जी की व्यंग्यवाणी से मैं तिलमिला गई थी और यह सोचने पर विवश हो गई... आखिर क्यों आएंगे बड़े भैया यहाँ पर? क्या रखा है उनका इस घर में? केवल खोखले संबंध जिनमें छलावा ही छलावा बसा है. पिता जी की मृत्यु का दुःख अब इतना नहीं साल रहा था जितना कि भैया के प्रति हुए अन्याय एवं तिरस्कार का दुःख. जिस पर भैया अब भी उतने ही सामान्य बने हुए थे जैसे कि उनके साथ कुछ हुआ ही न हो, कुछ गलत घटा ही न हो.

बड़े भैया जब चार वर्ष के थे तब पिता जी ने उनको दूर-दराज की रिश्तेदारी से गोद लिया था. किंतु गोद लेने की रस्म का निर्वाह इसलिए नहीं किया था कि शायद-कभी भविष्य में ईश्वर ने उनकी गोद भर दी तो, फिर इस पराए रक्त से भविष्य में कैसा संबंध रहे या न रहे. यूँ भैया को पालने-पोसने में पिताजी ने कोई कसर नहीं रखी. उनका लालन-पालन उच्च स्तर का किया. अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया. किंतु अपनी संतान की अभिलाषा में पिता जी शायद उन्हें मन से कभी पुत्र रूप में स्वीकार नहीं कर पाए थे.

परंतु यह तो जीवन है... यूँ ही अविरल धारा की भांति सारे काम बहाव में होते रहते हैं. नौ बरस पश्चात् वास्तव में चमत्कार हो गया और पिता के आस-भरे आँगन में मेरा जन्म हो गया. मेरे बाद आशा, फिर अनिल, ललित फिर गुड़िया का जन्म हुआ. घर आँगन हम सब की किलकारियों से गूंज उठा. बड़े भैया उम्र में बड़े तो थे ही, उम्र का फासला भी बहुत था. हम सब पर उनका रौब चलता था. कब उनकी उँगली पकड़ कर मैं चलना सीखी – याद नहीं. दिन भर के कामों का ब्यौरा भैया नित्य हम सब भाई बहनों से लेते थे और रात्रि में अपने साथ हम सभी को पढ़ाते भी थे.

समय पंख लगाकर उड़ रहा था और हंसते-गाते व्यतीत भी हो रहा था. हम सारे बहिन-भाई एक दूजे में डूबे यूं ही बड़े होते गए. मुझे याद है बड़े भैया ने बी.ए. तक शिक्षा प्राप्त की तो पिताजी ने अपने मित्र की फैक्ट्री में उन्हें काम पर लगवा दिया था. नौकरी लगते ही अम्मा ने भैया के विवाह को लेकर शोर मचाना आरंभ कर दिया था... “देखो जी... अब नित्या कमाने लगा है सो जल्दी से घर में बहू ले आओ ताकि मैं चैन की थोड़ी सांस तो ले सकूँ, थोड़ी मुक्ति तो पा सकूँ इस घर के झमेले से.”

फिर सचमुच में ही एक सांवली-सलोनी कन्या ढूंढ कर अम्मा ने भैया का विवाह रचाया था. भाभी बहुत ही मधुर स्वभाव की थीं. घर भर की सेवा कर और अपनी मृदुल मुस्कान से उन्होंने सबका मन मोह लिया था. मगर एक दिन सुख की वर्षा पर अचानक जैसे वज्रपात हो गया. भैया की फैक्ट्री अचानक घाटे में आ जाने से बंद हो गई. घर में माहौल चिंताजनक हो गया. कुछ महीने तो भैया ने इधर-उधर हाथ पैर मारे तब कहीं जाकर सुदूर कलकत्ता के किसी व्यवसायी के यहाँ नौकरी मिली.

भैया होली दीवाली पर जरूर आते. अब मैं भी बड़ी हो चुकी थी. पिताजी एवं भैया को मेरी शादी की चिंता होने लगी. पिताजी अकसर ही भैया से कहा करते - “ प्रभा का विवाह जल्दी ही करना होगा... उसकी उम्र निकली जा रही है. अब तो सब तुम्हीं को करना है नित्या. भई मेरे पास जो कुछ भी था वह मैंने तुम्हारे पढ़ाने लिखाने में और तुम्हारे विवाह में लगा दिया”

एक दिन मेरे हाथ भी पीले हो गए. मेरे हाथों की मेहँदी का रंग भैया के सर पर बीस हजार रुपयों के कर्ज से आया था. इधर मेरे विवाह का कर्ज उनके सर से ले देकर उतरा ही था कि आशा विवाह के लिए तैयार बैठी थी. जैसे तैसे भाभी के गहने गिरवी रख और नए कर्ज लेकर भैया ने आशा का भी विवाह कर दिया.
आशा के विवाह के पश्चात् पिता जी की तबीयत अचानक ही तेजी से बिगड़ने लगी. जाँच पड़ताल से पता चला कि वे कुछ दिनों के मेहमान हैं – उन्हें रक्त-कैंसर हो गया था. एक दिन उन्होंने अपनी वसीयतनामा तैयार करवाई और उसे सीलबंद मुझे सौंप दिया था. आज जब उनकी मृत्यु के सभी कार्यक्रम सम्पन्न हो गए तो मुझे वसीयतनामा की याद आई.

मैं वसीयत पढ़ रही थी... “नित्यप्रकाश मेरे रिश्तेदार का पुत्र है, जिसकी परवरिश, पढ़ाई और ब्याह इत्यादि में मेरा बहुत रूपया खर्च हो गया. अतः मेरे मकान और जमीन जायदाद पर प्रभा, आशा, अनिल, ललित का बराबर-बराबर अधिकार है. जब तक मेरे बच्चे नाबालिग हैं उनकी देखरेख नित्यप्रकाश करेगा. मेरी पत्नी के देखरेख की जिम्मेदारी भी उस पर है... क्योंकि यह घर का सबसे बड़ा बेटा है.”

जैसे-जैसे मैं वसीयत पढ़ती जा रही थी, मेरी गर्दन शर्म से झुकती जा रही थी. मेरा रोम-रोम भैया के प्रति पिता के अन्याय और तिरस्कार के कारण कांप रहा था किंतु मैं विवशतापूर्वक क्रोध और ग्लानि के विष को पीती रही. जिसे निःसंतान रहने पर पिताजी दत्तक पुत्र बना कर लाए थे, अपनी संतान पाकर उसे एकदम से भूल गए. भैया की झोली में उन्होंने अपनी वसीयत में सिर्फ कर्तव्य ही डाले – परंतु अधिकार का कोई अंश नहीं डाला... हृदय में बार-बार हूक सी उठती और मैं सिसक-सिसक कर रह जा रही थी. लोगों को लग रहा था कि पिता की याद में मैं रो रही हूँ. वे कहने लगे थे - “न बेटी मत रो... जो चला गया वो लौट के थोड़े ही न आएगा... एक दिन सबको जाना है...”

रात आँखों में ही कट गई. मैं ईश्वर से विनती कर रही थी कि काश! समय यहीं ठहर जाए और सवेरा न हो... सवेरे भैया के जाने से पहले फिर रिश्तेदारों की टोली उन्हें घेर उनका कर्तव्यबोध कराएगी और मेरी आँखें फिर शर्म से झुक जाएंगी.

*-*-*
रचनाकार मीरा शलभ के कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं तथा एक-एक कहानी / लघुकथा और काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन हैं. कथा संसार पत्रिका में संपादन सहयोग का निर्वाह भी आपने किया है. प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में आपकी हर विधा में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं.


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आठवां दशक
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अस्सी का यह दशक
आयु का – किंतु पांचवाँ

जाने क्यों कतरनें छांटकर अखबारों की
रख लेने की पड़ी टेव थी

जैसै – सन् चौबीस में छपा
मगर पुनर्मुद्रित यह प्रकरण
साबरमती और बछड़े का

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या, फिरः डेढ़ सदी पहले की “जोग लिखी” वह
रेड इण्डियन किसी मुखिया की
सिटी गवर्नर, वाशिंगटन को...
“माता है यह भूमि हमारी
कैसे इसका मोल चुका सकते तुम हमको?”

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या, वह चिट्ठी – जिसे यादकर अभी, दुबारा
रोया था मैं फूट-फूटकर
“अब उतरेगा नहीं तुम्हारे लिए दूसरा गांधी कोई
गांठ बाँध लो इसे – अगर, चाहो तो...”

“नाम मुसलमानों के भारत के मेरा पैग़ाम आखिरी”
यही, यही तो शीर्षक था उस
डेढ़ कॉलमों में “एक्सप्रेस” के छपी हुई चिट्ठी का

जिस पर थे दस्तखत –
मृत्यु-शैया पर लेटे
जे. बी. कृपलानी के
कितना सार्वजनिक औ कितना निजी दौर वह
बिला गया चुपचाप
उम्र के छठे दशक में

अब तो मैं हो चला दार्शनिक
अभी-अभी पर
भिंचा डायरी के पन्नों में
एक और इकलौता स्मारक उसी दौर का
मुझको घूर रहा हैः

कैसे खोद पहाड़ उम्र का
एक निरापद पथ निकालता
दिवंगता साथिन की स्मृति में
दशरथ मांझी राजगीर का

इसे फाड़ फेंकूं या फिर से
नए साल की अगवानी में
नई डायरी में सहेज लूं

आखिर यह जो सोता भीतर
रूंधा पड़ा अख़बारों से ही

इसके फूट निकलने का
कोई तो
रास्ता
होगा?

*-*-*
हिन्दी के सुप्रसिद्ध, वरिष्ठ रचनाकार, रमेशचंद्र शाह भारत सरकार के प्रतिष्ठित सम्मान ‘पद्मश्री’ से नवाज़े जा चुके हैं.



*-*-*
गांधी एक बार फिर आओ
राह भूले पथिक को
मंजिल तक पहुँचाओ।
भटकी नैया पाल लगाने
तुम दीप स्तम्भ बन आओ। गांधी ...

सुन मानवता का करूण क्रन्दन
अबलाओं की आर्द्र पुकार।
बच्चा-बच्चा चीख रहा है
मुझे दिलाओ मेरा अधिकार।
तुम अग्रदूद बन आओ। गांधी ...

सत्याग्रह का संदेश देकर
सोई हुई शक्तियाँ जगाओ।
आहत मनुष्य को फिर से
अहिंसा का पाठ पढ़ाओ।
तुम मार्गदर्शक बन जाओ। गांधी ...

तुम्हारा भारत जूझ रहा है
आतंकवाद की मार से!
हत्याओं के भार से!
आत्महत्या, बलात्कार से!
इन सबको दूर भगाने
तुम क्रान्तिदूत बन आओ।
गांधी एक बार फिर आओ।

*-*-*

रचनाकार सरिता सुराणा ‘जैन’ हर विधा में लिखती हैं. आपकी रचनाएँ देश भर के तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

ग़ज़ल 1
--.--

बुजुर्गी बचपना काला न कर दे।
कहीं गंगा हमें मैला न कर दे।

अंधेरे को ज़रा महफ़ूज रखिए
ये मनबढ़ रौशनी अंधा न कर दे।

सफ़र दुश्वार कर देंगे ये आँसू
तू मेरा रास्ता आसान कर दे।

तुम्हारे इल्म का चमकीला दर्पण
मेरे चेहरे को बे-चेहरा न कर दे।

मुझे अवहेलना चर्चा में लाई
बड़ाई सब कहीं उल्टा न कर दे।

ये चुप्पी दिग्विजय करने चली है
ख़मोशी बीच में हल्ला न कर दे।

इसे महफ़ूज रखिए दिल तलक ही
मोहब्बत जेहन पर हमला न कर दे।


ग़ज़ल 2
--.--
तेरे भीतर पैदा हो यह गुन।
तू भी मतलब भर की बातें सुन।

घर इतने एख़लाक से पेश आया
मैंने खुद को समझ लिया पाहुन।

नफ़रत के अवसर ही अवसर हैं
प्यार का लेकिन बनता नहीं सगुन।

आँख लगी तो क्या देखा मैंने
गले मिले थे कर्ण और अर्जुन।

मन के दो ही रंग, हरा-भगवा
ऐसे में किस रंग का हो फागुन।

सुर भी बेसुर होने लगता है
जब बजती है एक ही धुन।

अब तक कब का बेच चुके होते
कविताएँ भी होतीं जो साबुन।

**-**
रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की ग़ज़लें अपना अलग रंग, सुर और तेवर लिए हुए होती हैं – अकसर, समाज को उसका नंगा चेहरा दिखाती हुईं.

-चित्रा मुद्​गल

वह जाग रहा है. तड़के ही उसकी नींद खुल जाती है. रात चाहे जितनी देरी से घर लौटा हो, चाहे जितनी देरी तक पढ़ता रहा हो, सुबह अपने आप जाग जाने की उसकी आदत छूटी नहीं. उसे आश्चर्य होता है. कुछ आदतें और नियम बदले हुए समय के साथ बहुरूपिए-से अपना चोला बदल लेते हैं. मगर कुछ आदतें किसी भी असर से बेअसर मरे बच्चे को छाती से चिपकाए बंदरिया हो उठती हैं. आज भी, जैसे ही दूध वाले की घंटी बजी, वह जाग गया. लेकिन दूध लेने के लिए नहीं उठा. उठती मां ही है. मां के उठने के कुछेक मिनटों उपरांत ‘मिल्क कुकर’ की कर्ण भेदी सीटी बजती है. चाय चढ़ती है. मसालेदार चाय. चाहे गरमी हो या सरदी. मां बगैर मसाले की चाय नहीं बनातीं. मसालेदार चाय की खुशबू पूरे घर में फैल जाती. घर में सुबह हो जाती. वह अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आंखें कुहनियों से ढके सुबह को होते देखता. सुनता. सुबह बड़ी हड़बड़ी में होती. वक्त जो बहुत कम होता है उसके पास...

उसे पता होता है कि अब आगे क्या होगा और ठीक उसके अगले ‘अब’ में...

अनु को उठाया जाएगा, ‘उठ न गुड़िया! उठ न ऽ ऽ !’

यह जो उसके बगल वाले पलंग पर चौंतेरे-सी पाँच फीट चार इंच की लड़की औंधी पड़ी हुई है (लड़की कहना मजबूरी है...) वह मां को गुड़िया लगती है. गुड़िया ‘ऊं ऊं’ के नखरों के साथ उलटी पलटी होती आहिस्ता से उकड़ूं उठ चाय का प्याला पकड़ लेती. ‘गुड़िया’ बगैर कुल्ला किए चाय पीती. जबकि रात-भर मुंह खोलकर सोती और तकिए पर ढेरों बदबूदार थूक उगलती. अभी कोई पास बैठ जाए तो मुंह से उठता बदबू का भभूका उसे टिकने न दे. मगर उसे कोई फर्क नहीं पड़ता. वह जमुहाइयां भरती, बदबू उड़ाती, चाय के घूँट गटकती, आलस तोड़ रही होती. मां अब कुछ नहीं कहतीं. पहले सख्ती इस कदर थी कि बगैर ब्रुश किए चाय मिलती ही नहीं थी. वह अब भी बगैर ब्रुश किए चाय नहीं पी सकता.

मनुहार चाय के प्याले के साथ बाबूजी के कमरे की ओर मुड़ जाती. दोनों मिलकर चाय पीते. पहले सब साथ बैठकर चाय पिया करते थे. बाबू जी की आदत थी कि उनके हाथ में चाय का प्याला और अख़बार आते ही दोनों बच्चों को भी उनके पास बैठे हुए होने चाहिए. देर से जागना उन्हें और मां को दलिद्दर न्यौतने जैसा लगता. (अब उसके पड़े रहने से नहीं लगता) चाय के दौर तक का आलम बड़ा शांत होता. फिर मां की ‘कमेंटरी’ शुरू हो जाती. सुर की मिठास अनायास कर्कश हो उठती, ‘अब और चाय नहीं मिलेगी... अख़बार छोड़ो जी... गीजर से पानी निकाल दिया है... फटाफट नहा के निकलो.’ ‘अनु पहले अपने बाबूजी को नहा लेने दे... तुझे बाल धोने है न... तू देर लगाएगी.’ ‘जी ये कल की पैंट चलेगी न! जेबों पर हलका सा मैल आ गया है’ ‘अनु, टिफिन रख लिया है बैग में... सब्जी आज कैंटीन से मंगवा लेना, करेले तू खाती नहीं, आलू हैं नहीं...’ ‘और हां ‘बीकासूल’ के कैप्सूल ले रही है न! लापरवाही नहीं बरतते’ (फिर गुड़िया...) ‘यह दूध क्यों छोड़ जा रही है? देर-सवेर का बहाना छोड़... खतम कर दूध!’

अनु ने धाड़ से अलमारी खोली. सूं-सूं इंटीमेट (विदेशी सुगंध) की बोतल से अपने को तर किया. अपने को ही नहीं पूरे कमरे को.

सजती ऐसे है जैसे दफ़तर न जाकर किसी सौन्दर्य प्रतिस्पर्धा में जा रही हो. वैसे भी आजकल सजने का शौक उसे कुछ ज्यादा ही हो गया. जिस दिन विदेशी सुगंध से देह को नहलाया जाता है, उसके कान खड़े हो जाते हैं. अवश्य ही बिहारी की नायिका कहीं किसी के साथ...

दरअसल, इस मामले में मां और बाबूजी अतिरिक्त उदार हैं. खुली ढील दे रखी है उन्होंने. साफ कहते रहते हैं, ‘हमारे दिन और थे. तुम लोगों को जब जिस वक्त जो करना हो, बस हमें बता भर देना. तुम्हारा अच्छा-बुरा तुम्हारे साथ. हां, अगर हमारे मन मुताबिक चलना हो तो पहले बता देना. हम लड़की देखेंगे, लड़का देखेंगे.’

मां और बाबूजी के विषय में वह कभी एक राय कायम नहीं कर पाता. सूप में राई-सा ढनंगता रहता. दोनों उसे कभी अपनी पीढ़ी के हिमायती और आधुनिक भाव-बोध के संवाहक प्रतीत होते, कभी चतुर सुजान. कौन चप्पलें घिसें संस्कारों और खानदानों के नखरे झेलते.

आलमारी भड़ाक् से बंद की.

उसके जी में आया कि उठ कर तड़ाक से एक थप्पड़ वह उसके गाल पर जमा दे. कोई तरीका है यह आलमारी खोलने और बंद करने का? वह सो रहा है और वह भड़ाम-भुड़ूम किए कान फोड़े डाल रही है. कुछ कहने से कोई फ़ायदा नहीं. जबसे नौकरी पाई है, जबान बेलगाम हो गई है. पलटकर बेइज्जती करने पर उतर आती है. वह बड़ा है यह लिहाज छोड़ छाड़. पहले मां सुनती तो बीच-बचाव करते हुए उसे डपट देती थी कि बड़े के मुंह मत लगाकर. ...लेकिन अब पासे बदल गए. उलाहना देने पर उलटा मां उसे ही गम खाने की पट्टी पढ़ाने लगतीं.

पिछले महीने घर पर मेहता कई दफे आए. एकाध बार अनु को छोड़ने के बहाने. कुछेक दफा अकेले. उसे बात नहीं जमी. विशेषतः उसका तलाकशुदा होना. क्यों नहीं पटी बीवी से? बातचीत में भी स्पष्ट नहीं लगे मेहता. लेकिन मां ने उसकी आपत्तियों पर गौर करने के बजाय मखौल उड़ाया कि बेकारी में उसका दिमाग कुंठित हो गया है. वह सही-गलत में फ़र्क़ नहीं कर पाता. बातों का बतंगड़ बनाने की जरूरत नहीं. वे न अंधे हें, न अक्ल के कंगले. बेहतर होगा कि वह मुंह बंद करके बैठे. दुनिया-जहान कुछ कहे न कहे, घर के भेदी लंका ढहाने में जुटे हुए हैं.

अनु के ‘पेंसिल हिल’ के सैंडलों की ‘टिक-टिक’ दरवाजे की ओर बढ़ रही. लॉक पूरा घूमता भी नहीं कि मां की चेतवानी उछलती है, ‘संभल के जाना’ – जैसे वह दूध पीती बच्ची हो. अपनी हिफ़ाज़त स्वयं कर पाने में असमर्थ. इधर वह लगातार महसूस कर रहा है कि जबसे अनु को ‘ओबराय’ में ‘रिशेप्सनिस्ट’ की आकर्षक नौकरी मिली है, मां की खैरख्वाही उसके लिए कुछ ज्यादा ही चिंतित हो उठी है. उसकी ओर उनका ध्यान ही नहीं जाता कि ऐसे निरर्थक बोझिल दिनों में उसे उनके ममत्व की कितनी जरूरत है. विचित्र समझ है मां की. अधाए पेट को रोटी खिला रही, जबकि जरूरत उसकी कल्लाती आंतों को वाजिब खुराक देने की है.

कितना उपेक्षित हो गया है वह.

उसे लगता है कि वह उठ कर बैठ जाए. कब तक और कितने दिनों तक नकली नींद का नाटक किए हुए पड़े-पड़े उनकी व्यस्तता से खुंदक खाता रहे. इसलिए कि उसे कहीं जाना नहीं? जल्दी उठ कर करेगा क्या? सारी गहमागहमी में एक कप चाय का भी डौल नहीं होता उसके लिए. अख़बार बाबूजी और अनु के हाथों में वालीबाल खेलता रहता. चलो, अख़बार खाली मिलता तब भी उसके जल्दी उठने की गुंजाइश बनती. कुछ तो होता जो सिर्फ उसके लिए खाली होता और उसके खालीपने को भरता.

उसके भूले-भटके जल्दी उठ जाने में मां को असुविधा होने लगती, ‘यह घंटे-भर तक पाखाने में घुसा बैठा क्या करता रहता है?... बाकी लोगों को नहीं गलती? ...तू नहाने घुस गया तो अनु कब नहाएगी? तुझे कौन दफ़्तर जाना है जो सुबह उठ कर बैठ जाता है छाती पर मोंगरी कूटने? ...तेरी चाकरी करूं या इन लोगों का ताम-झाम निबटाऊँ? चाय, चाय, चाय... न जाने कितनी चाय चाहिए तुझे. ...कमबख्त पेट है या हौदी?’

लॉक फिर घूमा. बाबूजी भी जा रहे.

घर काम-काजियों से खाली हो गया. अब कोई दिक्कत नहीं. सिग्नल हो गया. बेखौफ उठ सकता है.

रेखा के पास उसे दोपहर के खाने पर पहुँचना है...

रेखा उसकी दोस्त है. दोस्ती की परिभाषा इधर बदल रही. पहले वह अनु की सहेली थी और उन्हीं की कॉलोनी में रहा करती थी. अलग-अलग कालेजों में होने के बावजूद दोनों ने साथ-साथ बी.ए. किया. आगे पढ़ने की अनु की इच्छा नहीं थी. उसने बड़े मनोयोग से टाइपिंग और ‘शॉर्टहैंड’ की पढ़ाई की. गति अच्छी हो गई. आवेदन करते ही ‘सेंचुरी’ में नौकरी मिल गई.

आगे पढ़ने में रेखा की दिलचस्पी भी नहीं थी. उसके पिताजी चाहते थे कि अगर वह आगे नहीं पढ़ना चाहती है तो कायदे से उनकी ‘विज्ञापन एजेंसी’ में नौकरी कर ले. रेखा को अपने पिताजी के साथ काम करना मंजूर नहीं हुआ. कारण, ‘मैं अपने को पूरे समय किसी की निगरानी में नहीं बरदाश्त कर सकती.’ उसने ‘हिमालया एडवरटाइजिंग’ में कॉपी लेखक के रिक्त पद के लिए आवेदन कर दिया. पिता की हैसियत अपरोक्ष रूप से सहायक हुई. हालांकि रेखा की डींग थी कि उसका चुनाव उसकी योग्यता और चुस्ती-दुरुस्ती के आधार पर हुआ. योग्यता और चुस्ती-दुरुस्ती की इतनी ही कदर होती तो वह डेढ़ साल से बेकार बैठा रहता? कद-काठी में वह अच्छे-खासे लोगों के लिए ईर्ष्या का विषय है. बी.कॉम. है. ‘बिजनेस मैनेजमेंट’ की पढ़ाई द्वितीय श्रेणी में पास की है. सोच रहा है कि बैठे-ठाले कानून पढ़ डाले. अतिरिक्त योग्यता हो जाएगी. हालांकि अपना भविष्य उसे अंधकारमय दिखाई दे रहा.

कल सतीश आया था. वह भी उसी तरह बेकार घूम रहा. कह रहा था कि नौकरी खोजने में हम जितना समय जाया कर रहे, अच्छा है की कोई व्यवसाय करने की सोचें.

उसका तर्क था, ‘पैसा? पैसा कहाँ से आएगा?’

सतीश ने सुझाया, ‘क्यों न हम शिक्षित बेकारों के लिए खोली गई सरकार की ‘लघु उद्योग योजना’ की ऋण-नीति का लाभ उठाएँ?’

ऋण मिलेगा?

कुछ अपनी जेब से डालना होगा. बस एक धंधा निश्चित कर ले और अपने अतिरिक्त दो शिक्षित बेकारों की खोज और कर ले ताकि चारों की भागीदारी से काम बन सके. मामला आसान नहीं. वैसे आसान इस देश में है क्या?

‘मिल गया ऋण ऐसे... !’ उसने अविश्वास से सिर झटका.

‘पका-पकाया कुछ नहीं रखा. मगजमारी करनी होगी, करेंगे. खिलाना होगा, खिलाएंगे.’ सतीश ने चुटकी से सिक्के ठनकाने की मुद्रा बनाकर समस्या के बहुत जटिल न होने की ओर इंगित किया, ‘तुम तैयार तो हो, बंधु, नौकरी में ही हम क्या उखाड़ लेंगे? कोई भविष्य है?’

‘कहता तो तू ठीक है?’ बात उसे कुछ जमी.

‘चमड़े का काम शुरू करें? कोल्हापुरी चप्पलों की भारी मांग है. डोंबीवली या कल्याण में एक जगह खरीदकर... टीन-वीन का शेड बनवाकर, कच्चा माल देकर आठ-दस मजदूरों को बैठा देंगे!’

सहमत होता है तो सतीश के साथ भागा-दौड़ी शुरू करनी पड़ेगी. बस इसकी हिम्मत नहीं बंधती. उसे लगता है, प्रकृति से वह नौकरी करने के लिए अधिक अनुकूल है. व्यवसाय की चौबीसों घंटों की माथापच्ची, मारामारी उसे वश की नहीं. न तिया पाँच के लिए उसके पास गैंडे की खाल है. निराश होकर भी वह एकदम टूटा नहीं. दूसरे-तीसरे रोज भेजे जाने वाले आवेदन पत्रों पर जाने-अनजाने उम्मीद की एक नन्हीं कौंपल अंकुआने लगती है. शायद फलां कम्पनी से बुलावा आ ही जाए. जैसी उनकी अपेक्षाएँ हैं वह शत-प्रतिशत उन पर खरा उतर रहा...

चाय का प्याला हाथ में देकर मां उसके करीब आ बैठी.

वह अख़बार की तह खोलने ही जा रहा था कि मां के इस तरह पास आकर बैठ जाने से अच्छा लगने के बावजूद माथा ठनका. सब चले गए फिर भी यह उनके लिए फुरसत का समय नहीं. हो सकता है, बड़े दिनों बात उन्हें एकाएक उसकी सुध हो आई हो. पूछें कि वह कैसा है? कहाँ-कहाँ आवेदन-पत्र भेजे? किन जगहों पर उसे उम्मीद लगती है? आजकल वह ढंग से खाता-पीता भी नहीं. क्या बात है? रात में देर से घर क्यों लौटता है? जी नहीं लगता? अनु और मेहता की कोई बात हो, वे उससे सलाह-मशविरा लेना चाहती हों. आखिर वह घर का बड़ा बच्चा है...

‘तेरे बाबूजी पूछ रहे थे कि तू डा. गुप्ता से मिलने गया था?’

सत्यानाश. सुबह की रेढ़ हो गई.

‘कितनी बार जाऊँ?’ वह अनायास रूखा हो आया, ‘जब भी मिलने जाता हूँ, वे यह कहकर लौटा देते हैं कि भविष्य में गाहे-बगाहे मिलता रहूं. पिछले तीन महीनों से मैं उनसे गाहे-बगाहे मिल रहा हूँ. आज तक उन्होंने कभी किसी काम के लिए किसी से मिलने नहीं भेजा. मेरे बस की नहीं उनकी जी हुज़ूरी. होंगे बड़े फन्ने खां. एक कप चाय तक को नहीं पूछते. न जाने कैसे दोस्त हैं बाबूजी के, चिरकुट.’

‘भई, बड़े आदमी हैं... तब तक जबान नहीं खोलेंगे जब तक तेरे लायक कोई बात उनके दिमाग में नहीं आ जाएगी.’ मां ने डा. गुप्ता की तरफदारी की.

‘तुम जब किसी बात को नहीं जानती-समझतीं तो बीच में मत बोला करो. कुरसी का दंभ है उनको... अहंकार संतुष्ट होता है नई पीढ़ी को कुत्ते-सा दौड़ाने में’

‘मुझे क्या पड़ी... तेरे बाबूजी ने पूछा, सो मैंने पूछ लिया तो कौन-सा अनर्थ कर दिया... ?’

‘बाबूजी से कहा करो कि वे जो कुछ पूछना चाहते हैं खुद ही पूछ लिया करें... दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर दागने की जरूरत नहीं.’

मां तुनककर उठ गई बड़बड़ाती हुई. उसकी बेहयाई पर कि आखिर यह क्या तरीका है कि कुछ पूछो तो वह मरखने बैल सा सींगें दिखाने लगता है. धौंस काहे की दिखाता है?

मन में आया, लपककर मां की गरदन नाप ले कि तुम्हारी ममत्व की पोल खुल गई है. तुम पहले दरजे की कपटी औरत हो. तुम संतानों में भेदभाव बरतती हो. अनु को श्रेष्ठ और मुझे हेय बनाकर. परंतु जड़ हुआ-सा अख़बार के पन्ने थामे बैठा रहा. बस, इतना हुआ कि अख़बार के कोने मुठ्ठियों में मुस गए.

मां और बाबूजी की धारणा बन गई है कि वह न नौकरी पाना चाहता है न नौकरी करना. वरना अब तक उसे नौकरी मिल गई होती.

अब तो उन्हें शंका होने लगी है कि वह साक्षात्कार देने जाता भी है या आवारा दोस्तों के संग इधर-उधर भटकता रहता है? ‘गए थे?’ ‘क्या हुआ?’ पूछते उनका गला दुखने लगता. उन्हें उसके नौकरी न पाने का कोई कारण नजर नहीं आता. मां कहतीं कि उनके देखते कालोनी की ऐरी-गैरी नत्थू-खैरी लड़कियां नौकरी पर लग गईं. परिचितों के लड़कों के तबादले होने लगे.

कैसे समझाए कि बगैर सिफ़ारिश के आजकल बात नहीं बनती. और इसी अक्षत का अभाव है उसके पास. रही लड़कियों की बात, तो वे अपने आप में एक जबरदस्त ‘सिफ़ारिश’ हैं... भला उन्हें ‘सिफ़ारिश’ की क्या जरूरत ? जमाना ही लड़कियों का है. घर, सड़क, दफ़तर, बाग़-बगीचे, रेलवे प्लेटफॉर्म, फुटपाथ, बाजार, दुकानें – जहाँ देखो वहीं लड़किया ही लड़कियां उमड़ी चली आ रहीं. टिड्डियों के दल-सी यह जो युवकों में बेकारी की बाढ़ आई हुई है – लड़कियां ही जिम्मेदार हैं. घरों में बंद चूल्हा-चौका निपटा रही होतीं तो आज लड़के निठल्ले, बेरोजगार न घूम रहे होते. डिग्रियों का पुलिंदा कंधों और खोपड़ियों पर ढोए हुए !... निराश, हताश !... जीवन से विरक्त !...

उसे लगता है कि एक आंदोलन शुरू होना चाहिए. देशव्यापी स्तर पर. देश के सारे युवकों को संगठित होकर लड़कियों के खिलाफ नाकेबंदी करनी चाहिए कि वे घरों की शोभा हैं, कृपया घरों में पायल रूनकाती-झुनकाती, सिरों पर पल्लू डाले मांग में चुटकी भर सिंदूर भरे पतियों, भाइयों, सास, ससुर की सेवा करें !... दफ़तरों में कुर्सियां क्यों अगुवा रखी हैं, खाली करें !... ‘देश की महिलाएं मुरदाबाद !’ ‘महिलाओं दफ़तर खाली करो... !’ ‘महिलाओं को भगाओ, बेकारी मिटाओ !’ यह निश्चित है अगर देश की सारी नौकरी पेशा महिलाएं नौकरी से इस्तीफा दे दें तो देश में बेरोजगारी की समस्या चुटकियों में हल हो जाएगी.

इतने खराब मूड में भी वह मुस्कुराए बगैर नहीं रह सका.

अचानक कभी उसका दिमाग चमत्कारी हो उठता है और ऐसी-ऐसी धासूं बातें सोचता है जिनका कोई जवाब नहीं. भले ही वे बेसिर-पैर की हों. बेसिर-पैर की क्यों, वास्तविकता यही है. अपने ही घर का उदाहरण ले लें तो तस्वीर का पहलू यह भी हो सकता है था कि अनु घर पर बैठी काम के बोझ से त्रस्त खीजती-झल्लाती मां की मदद कर रही होती और वह उसकी जगह ओबराय में नौकरी कर रहा होता.

अब क्या पढ़ना अखबार ! होता ही नहीं पढ़ने लायक कुछ. रोज-ब-रोज घिसी-पिटी घुमा-फिराकर वही-वही बातें. उसकी पीढ़ी के लिए अख़बार हफ़्ते में सिर्फ एक ही रोज निकलता है. और वह दिन होता है रविवार. तीन पृष्ठ रिक्त स्थानों के विज्ञापनों से भरे हुए. आंखें गड़ाए सुबह से शाम हो जाए तब भी कुछ-न-कुछ पढ़ना छूट जाए. उनमें से अपनी लियाकत के मुताबिक रेखांकित करना तो और भी मुश्किल.

अख़बार परे फेंककर उठ खड़ा हुआ. नहा-धो ले. दाढ़ी भी बनानी है. रेखा को बढ़ी हुई दाढ़ी से नफरत है, ‘लगता है, आजीवन कारावास काटकर चले आ रहे हो...’ देखते ही ताना कसती. उसका नियम है. जिस वक्त उसे रेखा के पास जाना होता है उसकी पसंद-नापसंद महत्वपूर्ण हो उठती है.

हालांकि आजकल उसका मूड उखड़ा है और कटखना हो गया है. रेखा भी उसे दोस्त कम और प्रतिद्वंद्वी अधिक लगती है. ऐसे क्यों हो रहा है उसके साथ ! सामान्य बने रहने की चेष्टा किसी अदृश्य दबाव के तहत निष्फल हो उठती है.

उसकी तस्वीरें देख रही रेखा अंग्रेजी के भौंड़े-भौंड़े शब्दों में अपनी प्रसन्नता व्यक्त कर रही है, ‘हाय अशोक, किसने ‘डेशिंग’ लग रहे हो... ! यह ‘क्लोजअप’ ... वॉव, अशोक.’

रेखा का आग्रह गंभीरता से न लेने के बावजूद रख लिया था उसने. तस्वीरें धुलकर आ गई थीं और वह अलबम उसके पास दिखाने ले आया.

बहुत दिनों से रेखा उसके पीछे पड़ी हुई थी वह अपनी कुछ तस्वीरें क्यों नहीं उसकी विज्ञापन एजेंसी में रख देता. क्या पता. कभी किसी ‘क्लाएंट’ को उसकी तस्वीर पसंद आ जाए और वह माडलिंग के लिए चुन लिया जाए. माडलिंग... बतौर शौक करने में कोई हर्ज नहीं. पैसा भी ठीक-ठाक मिल जाता है. साथ ही शोहरत भी.

‘तुम मेरी बात पर कभी गौर नहीं करते अशोक... आईस्वेर... तुम कद-काठी से ही नहीं बल्कि चाल-ढाल, अंदाज से भी विशिष्ट लगते हो.’ वह हमेशा उसे प्रोत्साहित करती... उसे उकसाती. वह चाहे जो भी पहन ले. चाहे जैसे भी पहन ले.

‘रहने दो’ वह सोचता कि रेखा उसे लपेट रही है. कुछ ज्यादा ही चढ़ाती है उसे चने के झाड़ पर.

बहुत दिनों तक बात टलती रही. एक तो वह रेखा के माध्यम से कोई काम नहीं चाहता था. दूसरा उसे ‘मॉडलिंग’ का पेशा प्रतिष्ठित नहीं लगता रहा. मगर रेखा ने इस दिशा में अपनी प्रयास नहीं छोड़ा. एक रोज वह छायाकार दवे को लेकर घर पंहुच गई और उसने उसे तस्वीरें खिंचवाने के लिए मजबूर कर दिया. उसके और दवे के संकेतों पर कठपुतली बना वह मुद्राएँ देता पल-छिन नाचता रहा. रेखा को चेतावनी देता रहा कि वह फ़िज़ूल उसकी तस्वीरें खिंचाने में समय और पैसा जाया कर रही. संयोग और सुयोगों ने उससे किनाराकशी कर रखी है. सारी मेहनत बेकार जाएगी. मगर रेखा पूरे वक्त बहरी बनी हुई दवे के साथ परामर्श करती मनोयोग से अपने काम में लगी रही.

काम समाप्त कर दवे के जाते ही वे कमरे में आ बैठे पस्त से. मां ने उसके साथ चाय भर पी. रेखा के दोबारा चाय के आग्रह पर वे केवल ‘ट्रे’ उनके मध्य रखकर अपने कमरे में लौट गई. रेखा ने पास बैठने की बहुत जिद की. पर वे लगातार अन्यमनस्क बनी रहीं, ‘फिर कभी बैठूंगी, बेटे.’ रेखा ने भांप लिया कि मां-बेटे के मध्य जरूर कोई तनातनी चल रही. वरना मां उसके आने पर खूब खुश होतीं. खूब चटर-पटर करतीं. मन में आया कि अशोक से सीधे पूछे कि क्या बात है, मां इतनी चुप-चुप और अनमनी-सी क्यों है ? पर इस भय से छेड़ना मुनासिब नहीं लगा कि कहीं अशोक अपने मनोद्वंद्व को उगलने लगा तो उसकी स्थिति बड़ी विकट हो उठेगी. घर के खिलाफ अशोक के मन में ढेरों कड़वाहट उबल रही... विशेषकर मां के संदर्भ में. मां पर वह सदैव निर्भर रहा है. छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए. अब बढ़ी हुई उम्र और क्षीण हुई शक्ति के चलते वे शायद उसकी ज़रूरतों को अपेक्षित तवज्जोह नहीं दे पातीं. उपेक्षा का हल्का-सा झोंका भी उसे विश्रृंखल कर देता है...

‘इतने स्वार्थी और खुदगर्ज न बनो. किताबें बहुत पढ़ ली हैं. मां को जरा समझने की कोशिश करो. ये मामूली-सी बातें ज्यादा इसीलिए चुभती हैं तुम्हें, क्योंकि तुम अपने आपको असफल महसूस करने लगे हो... सीधे-सीधे से भी पूछी जाने वाली बातें तुम्हें ताना-तुक्का लगती हैं, अशोक. ऐसा नहीं है यह खीज उनकी दुश्चिंता है. तुम्हारे प्रति, तुम्हारे भविष्य के प्रति...’

रेखा बोलती है तो बोलती ही चली जाती है. दरअसल रेखा से किसी भी प्रकार की बहसबाजी उसे निरर्थक लगती है. किसी हद तक रेखा उसकी तिरस्कृत मनःस्थिति की खरोंच को महसूस करती है पर पूर्णतः नहीं. कर भी नहीं सकती. जिस अच्छे-खासे ओहदे पर वह बैठी हुई है, सफलता और संतुष्टि का चश्मा उसकी आंखों को सचाई से विमुख किए हुए है. वह तट पर बैठे किसी व्यक्ति का अवलोकन है, तैराक का नहीं. अनुमानों, कल्पनाओं और सहानुभूति से न किसी का नरक बंटा है, न बांटा जा सकता है. अपने घर में वह अकेली बेटी है.

एक वक्त था... मां की नजर में वही वह था. बचपन से ही उसे यह अहसास दिया गया कि तुम लड़के हो, श्रेष्ठ हो. तुम्हें कुछ बनना है. तुम्हारे कुछ-न-कुछ बनते ही सारा नक्शा बदल जाएगा. लेकिन बड़े होते-होते परिस्थिति कितनी बदल गई. बड़े होते-होते नहीं शायद... नौकरी की तलाश शुरू होते ही. शायद... वह और अनु घर के दो प्रतिस्पर्धी छोर हो गए. उनमें दुराव बरता जाने लगा. खुल्लम-खुल्ला. बाबूजी भी पहले वाले बाबूजी नहीं रहे. न पहले की तरह वे उसे पास बिठाते, न बतियाते, न सुझाते कि उसे क्या करना चाहिए. पहले जरा-सा भी वह कमजोर दिखाई देता तो वे उसे अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाकर धैर्य बंधाते. मेहनत करने के लिए प्रेरित करते.

मां कितना आगे-पीछे घूमती थीं उसके. कहां तो अनु को बमुश्किल एक वक्त दूध मिलता, जबकि उसे दोनों वक्त जबरन पिलाया जाता. नाश्ते में उसे रात में विशेष रूप से भिगोई गई बादाम की दो गिरियां खानी जरूरी होतीं. एक दफे पढ़ते समय उसने मां से आंखों में जलन होने की शिकायत की तो मां भरी दोपहरी दवाइयों की दुकान पर जाकर ‘गुलाब जल’ की शीशी खरीद लाई और अगले ही रोज दस किलो आंवले का मुरब्बा बना डाला. अनु खाने के लिए माँगती तो स्पष्ट झिड़क देतीं, ‘देखती नहीं कित्ता झटक गया है, अशोक ? कसरत करता है. बादाम उसके लिए आवश्यक हैं या तेरे लिए ? इस उम्र में बेचारे को खुराक के नाम पर मिलता क्या है. एक तेरे बाबूजी का जमाना था... दंड-बैठक पेलते थे तो छटांक-छटांक बादाम, बाल्टी-बाल्टी दूध पीते थे. वही खिलाई-पिलाई है आज काम दे रही है. तीन-तीन हार्ट अटैक हो जाना मामूली बात है ?’

किसी विषय में वह फेल हो जाता या कम नम्बर लाता, मां फौरन उसके लिये ‘टियूशन’ रख देतीं. अनु रिरियाती तो वे तंगी का रोना रोने लगतीं. उसका साल खराब हो गया तो उम्र का घपला हो जाएगा. सरकारी नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर सकेगा. तेरा क्या, तू ब्याह करके चली जाएगी ससुराल. प्रथम श्रेणी में पास हो या तीसरी. क्या फ़र्क़ पड़ता है ? सेवा बेटा ही करेगा... आखिरी समय मुंह में गंगाजल डालेगा... कंधों पर ढोकर ले जाएगा श्मशान... वंश वृद्धि करेगा...

...अब पासा पलट चुका है. उसकी जगह अनु ने ले ली है. मां को छीन लिया है, बाबू जी को छीन लिया है. नियति के हाथों वह कितना विवश है. समझ में आ रहा है. मां-बाप से बढ़कर व्यापारी दुनिया में और नहीं. वे सिर्फ अपने को जीते हैं. और जो उनके जीने में रंग भरे, वही उनका सब कुछ ! वास्तविकता यही है कि सामाजिक व्यवस्था अगर बहुत पहले लड़कियों को घर के भीतर की जिम्मेदारी न सौंप, आर्थिक पक्ष संभालने की जिम्मेदारी सौंप देती तो निश्चित ही छटांक-छटांक बादाम की गिरियां उसकी सेहत के लिए भिगोई जातीं और दरवाजे पर बंधी भैंसें बाल्टी-बाल्टी उसी के लिए दूध देतीं.

‘चाय पीने चलें ?’

‘...’

‘कहाँ खोए रहते हो हर वक्त ? शिप्रा ने तुम्हें विश किया और तुमने मात्र सिर हिला दिया ?’

उसने कोई जवाब नहीं दिया. ऐसा जान-बूझकर नहीं होता उससे. रेखा जानती है, शायद वह टोक इस वजह से रही है ताकि वह आगे से एजेंसी में अपने व्यवहार के प्रति सचेत रहे, सौहार्द्रपूर्ण रहे. उसके प्रति लोगों की धारणा अच्छी बने. मित्रतापूर्ण बने. तस्वीरें पसंद की जाती हैं तब यह जिम्मेदारी और बढ़ जाएगी. हालांकि उसे विश्वास नहीं कि उसकी तस्वीरें किसी ‘क्लाइंट’ को आकर्षित कर पाएंगी. जो भी हो. रेखा को तो तसल्ली हो गई.

शाम को चारों बेकारों की ‘मीटिंग’ हुई सतीश के घर. रूपरेखा को अंतिम रूप दिया गया. आवेदन-पत्र की औपचारिकताएँ पूरी की गईं. तय हुआ कि कौन क्या-क्या काम संभालेगा. भागा-दौड़ी उसके वश की नहीं. उसने अपने जिम्मे लिखा-पढ़ी ले ली. भागा-दौड़ी सतीश एवं निगम के हिस्से में पड़ी. जगह आदि तय करना नितिन के जिम्मे. नितिन ने बताया कि ‘वासी’ के निकट लघु उद्योगों के लिए महाराष्ट्र सरकार नाममात्र के पैसों पर जगह मुहैया करा रही है. अभी स्थान पूर्ण विकसित नहीं है, मगर जल्दी ही हो जाएगा. पानी और बिजली की सुविधा है.

उन्होंने कार्यक्रम बनाया कि अगले शनिवार को वे चारों वासी जाएंगे और जगह देख लेंगे. शेड किराए पर लेना हो तो उल्हास नगर बुरी जगह नहीं, मगर न्यू बांबे का पुल पूरा होते ही वासी सोना हो जाएगी. फिर अपनी जगह तो अपनी जगह है. सतीश के हिसाब से राजनीतिक पेपरवेट भी है उसके पास. खाद्य मंत्री शेवड़े रिश्ते में दूर के मामा लगते हैं. डेढ़-दो महीने में मामला जम जाना चाहिए. जमाना ही पड़ेगा. सबके ‘मूड’ हल्के-फुल्के हो आए. कल क्या होगा, पता नहीं, मगर एक शुरूआत हो चुकी. वे अपने दिलों में उत्साह और फुर्ती का संचार महसूस कर रहे थे...

निगम और नितिन उठे और सीधे अपने-अपने घर चल दिए. वह इतनी जल्दी घर लौटने के ‘मूड’ में नहीं था. क्या करेगा आठ बजे ही गर पहुँचकर ? आजकल कोई नई किताब भी नहीं पढ़ने के लिए. अनायास उसे ‘दाग’ का खयाल हो आया. मां ने बड़ी प्रशंसा कर रखी थी इस फ़िल्म की. सोचा, चलकर क्यों न ‘दाग’ ही देखी जाए. सतीश को प्रस्ताव भा गया. दोनों थिएटर पर पहुंच गए. टिकटघर पर खासी भीड़ थी. पुरानी फिल्मों को लेकर दर्शकों में अभी भी काफी उत्साह है. मां को बस पता लगना चाहिए कि कहां सुरैया की फिल्म लगी है, कहाँ नर्गिस या मधुबाला या निम्मी की. काम-धाम छोड़कर फिल्म देखने निकल लेंगी. पुरानी तो पुरानी, आज की फिल्में उनसे कहां छूटती हैं. अच्छी हों या बुरी. जिस फ़िल्म को वे और अनु एक बार बरदाश्त नहीं कर पाते उसे वे घर लौटकर दुबारा-तिबारा देखने की घोषणा ठोक देतीं. बाबूजी दबे स्वर में मां के शौक की तरफदारी करते हैं- पान न सुपाड़ी – ले दे के एक सिनेमा.

बाबूजी का तर्क सुनकर उसे हंसी आती. पचासों रुपए हर हफ़्ते मां के शौक के पीछे फुंक जाते, कभी तंगी महसूस न होती. तंगी की हाय-तौबा उसी समय मचती जिस समय वह मुंह खोल बैठता. उसे हजार सीखें सुननी पड़तीं. फिजूलखर्ची से आगाह किया जाता. बुरी लतों से दूर रहने की ताकीद की जाती.

एक बजे रात दरवाजा मां ने ही खोला.

चाबी साथ ले जाना ही भूल गया था. जब भी देरी से घर लौटना होता, गोदरेज लाक की चाबी साथ ले जाना न भूलता. ताकि उसकी खातिर किसी की नींद में खलल न पड़े.

कमरे की ओर बढ़ ही रहा था कि नियम के विपरीत मां ने पूछा, ‘खाना ?’

‘ले लूंगा... जाकर सो जाइए आप.’

‘गरम ही होगा अभी,’ कहकर वे मुड़ने लगी तभी अचानक उन्हें कुछ खयाल हो आया. ‘सुन... रेखा का फोन दो बार आया था तेरे लिए. कल ठीक ग्यारह बजे तुझे उसकी एजेंसी में पहुँच जाना है. किसी क्लाएंट से जरूरी मीटिंग है...’ और वे बगैर किसी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किए अपने कमरे में दाखिल हो गईं.

कल दोपहर सचिवालय जाना भी तय हुआ है. सतीश के साथ उसके मामा शेवड़े जी से मिलने. सुबह सतीश से फोन पर तय कर लेगा कि वह उससे कहाँ मिले. रेखा की एजेंसी वीटी पर ही है. ज्यादा दूर नहीं है वहां से सचिवालय.

मिल्क कुकर की सीटी पूरे घर में सुबह का ऐलान करने लगी.

उसकी नींद टूट गई. नींद आई भी बहुत गहरी थी. वरना दूध वाले की घंटी बजते ही वह जाग जाता. आज पता ही नहीं चला कि दूध वाले की घंटी कब बजी. थक बहुत गया था कल. रेखा के पास से लौट कर वह ठीक साढ़े चार बजे सचिवालय पहुँचा जहाँ खड़ा सतीश उसकी प्रतीक्षा करता मिला. दोनों ही मुलाक़ातें सार्थक रहीं. पीठ ठोंककर मंत्रीजी ने उनकी हिम्मत बढ़ाई और स्पष्ट संकेत दिए कि वे उनके मामले को शीघ्र ही देखेंगे. अपने दढ़ियल सेक्रेटरी को बुलाकर उन्होंने फौरन उनके काग़ज़ात ले लेने को कहा. बातचीत से उसे यही आभास हुआ कि जैसे उन्हें ऋण चुटकियों में मिल जाएगा. ... पर सतीश ने सदैव की भांति उसे उड़ने से रोका, ‘यार, यह तो निश्चित है कि अपना काम हो जाएगा, पर इतनी आसानी से नहीं, तू इन राजनीतिज्ञों को नहीं जानता. ये ऐसे सुनार हैं जो अपने बाप को भी न छोड़ें. अभी आठ-दस चक्कर लगने मामूली बात है.’

लौटते समय वे गिरगांव में चमड़े के थोक व्यापारी पवार सेठ से भी उनके घर पर मिलते हुए आए. पवार सेठ से मिलकर वे इस मुद्दे पर एकमत हुए कि कच्चा माल बजाय थोक व्यापारियों से खरीदने के, उनके लिए उन्हीं शहरों में जाकर सीधे खरीदना अधिक फ़ायदेमंद होगा.

खुशी और दिमागी हल्केपन का एक और जबरदस्त कारण था.

जिस क्लाएंट से रेखा ने उसे मिलवाया वह उससे मिलकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने बतौर अग्रिम अनुबंध राशि उसे हजार रूपए का लिफ़ाफ़ा पकड़ा दिया था. शेष पारिश्रमिक सत्ताईस-अट्ठाईस की दो दिन की ‘शूटिंग’ खत्म होने के उपरांत. यह भी शर्त रखी कि वह उनकी टाइयों के विज्ञापन के अतिरिक्त अन्य किसी टाई कम्पनी के लिए विज्ञापन नहीं करेगा. इसके लिए अनुबंध अवधि का हर माह उसे बंधा हुआ पैसा मिलेगा. उसे क्या दिक्कत हो सकती थी ? उसने बस इतना किया कि क्लाएंट जब उससे शर्तों की सहमति का ठप्पा लगवाना चाहता, वह रेखा की ओर संकेत कर देता... जैसा रेखा जी कहेंगी...

रेखा ने हर माह दिए जाने वाले पारिश्रमिक पर जरा आपत्ति प्रकट की कि यह राशि बहुत कम है. अन्य टाई कम्पनियों के लिए काम न करें इसके लिए पारिश्रमिक वाजिब तो होना ही चाहिए. थोड़े तर्क-वितर्क के बाद राशि आठ सौ रूपया महीना बढ़ गई. अनुबंध हस्ताक्षरित हो गया. वह रेखा की कार्यकुशलता पर मुग्ध हो उठा. उसे अनुमान नहीं था कि वह पुरुषों को चराने में इतनी चतुर होगी. क्लाएंट ने उसे प्रथम बधाई दी. रेखा ने भी, अपनी अंतरंगता न जाहिर करते हुए.

क्लाएंट की गाड़ी जाते ही उसने रेखा को बगैर ‘आसपास’ की परवाह किए बाजुओं में समेट लिया. रेखा को अरसे बाद उसने इतना खुश पाया था. घर के लिए ‘ब्रजवासी’ से रेखा ने दो किलो बरफी बंधवाई, ‘घर पहुँचते ही मां के हाथ में देना. पैर छूना न भूलना.’ बरफी का डिब्बा सादे खाकी कागज में पैक करवाया ताकि देखने में ऐसा आभास हो कि कुछ किताबों का बंडल है. रेखा को मालूम था कि उसके पास से उसे ‘सचिवालय’ पहुँचना है. सतीश वहां उसकी प्रतीक्षा कर रहा होगा...

आज दोपहर को उसे तीन-साढ़े तीन के बीच ताड़देव ‘उमेश’ के यहाँ पहुँचना है. कपड़ों का नाप देने. कपड़ों के चार ‘सेट’ बनेंगे उसके, जिन्हें उसे ‘शूटिंग’ के दौरान बदल-बदलकर पहनना है.

पिछले छः महीनों से वह बगैर बनियान के कमीजें पहन रहा. चड्डियां तो खैर... अभी कुछ दिन और घसीट ले जाएंगी. मां का ध्यान ही नहीं जा रहा था. उसे ध्यान दिलाना पड़ा तो मां बोलीं, ‘मैंने तो समझा था कि तू इसलिए नहीं बोल रहा है कि आजकल बगैर बनियान के कमीज पहनने का फैशन चल रहा...’ जी में आया कि संकोच छोड़ तड़ाक से कह दे कि... पर लिहाज में चुप्पी साध गया. वह कमाता नहीं है तो मां की नीयत स्पष्ट है कि कम-से-कम में काम चलाना चाहिए. नहीं है तो उसमें भी.

रेखा ने कहा ही था. उसने भी यही सोचा कि कायदे से पहली कमाई यही है और वह मां के हाथों में रखी जानी चाहिए. उसने किया भी वही. पैसों का लिफ़ाफ़ा और मिठाई का डिब्बा घर में घुसते ही मां को पकड़ा दिया. पाँव छू लिए. अनमने भाव से. अब ये ढकोसले बेनकाब हो चुके हैं. काहे का आदर, काहे का आशीष !

मां भौंचक्की रह गई. एकदम से समझ नहीं पाई. या विस्मय दिखाने का नाटक किया. वास्तविकता जानते ही उनकी आंखों का रंग बदल गया. उसकी बेरोजगारी के दुःख से सोई ममता अचानक उमड़ पड़ी. झर-झर आंसू बहने लगे. अभिनेत्री भी अच्छी हैं, ‘प्रसाद’ चढ़ाने की बात श्लोक-सी उच्चारी गई. ढोंग में उसे विश्वास नहीं. उसने स्पष्ट मना कर दिया था कि वह मंदिर-वंदिर नहीं जाएगा. शाम को बाबूजी ने गंभीरता के खोल से बाहर आए बगैर ही उसे विज्ञापन फिल्म पाने पर हार्दिक बधाई दी. अनु सदैव की तरह ही नाटकीय थी. मिलते ही कंधों से लटककर उसने उसका माथा चूमा. कैसे-कैसे क्या हुआ, पूछा. सारा कुछ ब्यौरेवार जानने की जिद की. बाबूजी भी पास आ बैठे. मां कॉफी बना लाई अपने आप. उसे अरसे पहले की वे सुबहें याद हो आईं. वे सुबहें कितनी सच्ची थीं... यह शाम... यह शाम कितनी औपचारिक अपरिचित !

अचानक अपनी कुहनी पर उसे किसी मुलायम स्पर्श का अहसास हुआ...

उसकी आदत है. वह सोता इसी तरह है. कुहनी से चेहरा ढंककर. इस वक्त जरूर किसी ने उसकी कुहनी को छुआ है... मगर कौन ? वहम भी तो हो सकता है उसका. जब से नींद टूटी है सोच रहा है, सोच रहा है... बाह्य हलचल से अस्पर्शित उसके भीतर एक दुनिया है जहाँ किसी का हस्तक्षेप नहीं. जहाँ वह अपने तरीके से रहता है. अपने तरीके से जीता है. अपने तरीके से किसी को प्यार करने के लिए स्वतंत्र है. किसी से घृणा करने के लिए भी. और, ये जो उसके अपने हैं, उन्हें वह उस दुनिया के भीतर खूब-खूब घृणा करता है. बात-बात में चुनौती देता है. तिरस्कृत करता है. यही लोग हैं जिनकी वजह से वह अपने को आज किसी काबिल नहीं रह गया अनुभव करता है, इन्होंने ही तो उसके जिस्म में कूट-कूटकर भर दिया है कि तू बेकार है, नकारा है. बुहारे कूड़े-सा.

कुहनी फिर छुई गई. झकझोरी गई. कोई उसे ही उठा रहा है. पर इतनी सुबह ? इस घर में यह अजूबा कैसा ? नियम भंग कैसा ? बेगाने घर को अचानक उसमें दिलचस्पी कैसे पैदा हो गई ? वह एकाएक सुबह में कैसे शामिल किया जा रहा है ? कहीं अनु के भ्रम में तो नहीं उठाया जा रहा उसे ?

कुहनी अबकी और जोर से झकझोरी गई. मनुहार भी उसकी ओर झुका. ‘उठ ना... ले चाय पी ले...’

मां... ? हां मां ही तो उठा रही हैं उसे. यह क्रम कैसे बदल गया ? वह उठ बैठा. ‘मां,... मां, मैं हूं... अनु नहीं...’ शब्दों पर मां को सहज पाया.

‘हां, हां, मैं तुझे ही उठा रही हूं, ले चाय पकड़ !’ चाय का प्याला उसकी ओर बढ़ाकर मां अनु के पलंग की ओर बढ़ गई – उसे उठाने. हतप्रभ हो उसने अनु की ओर देखा. अपने बिस्तर पर सिकुड़ी-सिमटी-सी पड़ी हुई अनु ने मां के हिलाने पर ऊं-ऊं की. गर्म चाय के प्याले से उसकी उँगली तपने लगी थी – उसे लगा जैसे उसने पैसों वाला वह लिफ़ाफ़ा पकड़ रखा है.

*-*-*

प्रख्यात कथा लेखिका चित्रा मुद्गल के कई उपन्यास, कहानी संग्रह, बाल कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. आपको दिल्ली की हिंदी अकादमी के साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है.
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-पुष्पा रघु

आज बाबू जी की तेरहवीं है. शामियाना लगा है. मेज पर बाबू जी का फ्रेम किया हुआ चित्र रखा है – ताजे गुलाबों की माला से सुशोभित. धूपबत्ती जल रही है. सारा वातावरण सौरभ और श्रद्धामय. पहले स्वामी नित्यानंद का प्रवचन हुआ – जीवन की अनित्यता तथा मृत्यु की नित्यता का बखान. तत्पश्चात् सबने बारी-बारी माला अथवा पुष्पों से श्रद्धांजलि अर्पित की. सभी मरने वाले का गुणगान कर रहे थे. “बड़े भले मानस थे बाबूजी. इतने सालों से गली में रह रहे थे. कभी किसी से नहीं झगड़े.”

“ड्यूटी के पाबंद थे. सदा नियत समय पर ऑफ़िस जाते थे.”

“बड़े ईमानदार थे जी तभी तो बेटे इतने अच्छे मिले हैं.” आदि-आदि.

बाबूजी के दोनों बेटे और बहुएँ फूट-फूट कर रो रहे थे. “हाय बाबूजी. हमें अनाथ कर गए बाबूजी. अम्मा तो पहले ही चली गई थी. अब आप भी हमें छोड़ गए.”

लोग उन्हें सांत्वना दे रहे थे. “तुमने तो अपना कर्तव्य पूरा कर दिया. रात-दिन सेवा की अब मौत पर किसका वश है?” एक पड़ोसी बोला. दूसरे ने कहा - “माता-पिता का साया तो सभी चाहते हैं. परन्तु वे बेचारे तो कष्ट ही पाते थे जबसे एक्सीडेन्ट में टाँग कटी थी उनकी. सब्र करो! ईश्वर की मर्जी बेटा!”

तीसरा बेटा जन्म से मंदबुद्धि था पर बाबूजी का अपार स्नेहपात्र था वह. अब उसके पास न कोई काम था न अपना. वह पिता के चित्र को टकटकी बांधे देख रहा था और बड़बड़ा रहा था, “बाबू जी आप तो देख रहे हैं ना! कुछ देर पहले तो ये सारे कचौड़ी मालपुए उड़ा रहे थे, जश्न मना रहे थे और अब...”

मेहमान-मित्र-रिश्तेदार चले गए. वह भूखा प्यासा एक कोने में लुढ़क गया. रात को दोनों भाइयों के झगड़ने की आवाज से उसकी नींद खुल गई – ‘कल मैं बाबू जी की पोस्ट के लिए आवेदन-पत्र देने जाऊँगा’ बड़ा कह रहा था.

मंझले की तेज आवाज आई ‘वाह जी सेवा की मैंने, खर्च किया मैंने, नौकरी तुम करोगे? मैं भी तो बेरोजगार हूँ.’

‘हां-हां मैं ही लूंगा उनकी नौकरी. बेवकूफ – तुम सेवा करते रहते और बूढ़ा खाट पर पड़ा पड़ा रिटायर हो जाता. पाप तो मेरे सिर पर है. उनको मुक्ति दिलाने की हिम्मत किसने की? मैंने.’

बड़े की आवाज का लावा छोटे को संज्ञाशून्य बना गया.


कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

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