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August, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अक्षय जैन की व्यंग्य कविता : राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा...

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राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा

*-*-*

नहीं लिखा है भाग में तेरे
एक वक्त का खाना जी
राजा चुन कर तुम्हीं ने भेजा
तुम्हीं भरो हर्जाना जी

अबके बरस ओ मेघ देवता
हमको नहीं रुलाना जी
खेतों में, खलिहानों में
सोना, चाँदी बरसाना जी

मेले में हमको ले जाना
करना नहीं बहाना जी
पैसे हों तो नई चप्पलें
हमको भी दिलवाना जी

भजन तुम्हारा कैसे गाएँ
नहीं पेट में दाना जी
बारह मास लगा रहता है
गम का आना जाना जी

रोजी, रोटी, बिजली, पानी
इनका नहीं ठिकाना जी
अपनी जेबें हरदम खाली
उनके पास खजाना जी

*-*-*
रचनाकार – अक्षय जैन – कवि, स्तंभलेखक, व्यंग्यकार और संपादक हैं. आपके जोशीले, व्यंग्य पूर्ण गीतों का एक संग्रह ऑडियो कैसेट रूप में भी जारी किया जाने वाला है जिसकी प्रक्रिया अंतिम चरणों में है.

कालीचरण ‘प्रेमी’ की कविता : नभ समाधि

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*-*-*
नभ समाधि

*-*-*
इतनी ऊँचाई पर न चढ़ो
कि पृथ्वी दिखने लगे
एक गेंद की तरह
और सागर का विस्तार
सिमट जाए एक धब्बे में
और आदमी हो जाए लापता.

हो सकता है
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से विमुख
तुम्हारे यान का ईंधन
समाप्त हो जाए
और तुम पृथ्वी पर
लौट भी न सको.

दृश्य श्रव्य यंत्रों से
तुम्हारा संपर्क टूट जाए
तुम्हारी आवाज़
सुनाई भी न दे सके
और तुम्हारी तस्वीर
दिखाई भी न दे सके.

हो सकता है तुम्हारा यान
सभी नियंत्रक यंत्रों से
नाता तोड़कर
छिटककर दूर
आकाश की गहराइयों में
चला जाए
तुम्हारी प्राणवायु का
सीमित भंडार निपट जाए
और तुम हिचकियाँ लेते हुए
ले लो नभ समाधि.

*-*-*

कथाकार कालीचरण प्रेमी की रचनाएँ सैकड़ों प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से अनेक पुरस्कृत भी हो चुकी हैं. आपकी कुछ रचनाओं का बांग्ला, पंजाबी व मराठी में भी अनुवाद किया गया है. कई पत्रिकाओं में आपका संपादन सहयोग भी है.

संत शेख़ सादी की कुछ कहानियाँ

शेख़ सादी की कुछ कहानियाँ
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चुग़लख़ोर
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“गुरुजी, मेरा सहपाठी मुझसे जलता है. जब मैं ‘हदीस’ के कठिन शब्दों के अर्थों को बताता हूँ तो वह जल-भुन जाता है.” शेख सादी ने अपने शिक्षक से कहा.

गुरूजी बहुत नाराज हुए – “अरे नासमझ, तू अपने सहपाठी पर उंगली उठाता है, पर अपनी ओर नहीं देखता. मुझे यह समझ में नहीं आया कि तुझे किसने बताया कि लोगों के पीठ पीछे निन्दा करना अच्छा है? अगर उसने कमीने पन से अपने लिए नरक का रास्ता चुना है तो चुग़लख़ोरी की राह से तू भी तो वहीं पहुँचेगा.”

*-*-*
चुग़ली
*-*-*
एक आदमी एक दिन किसी समझदार आदमी के सामने चुगली कर रहा था. उसने कहा “तुम मेरे सामने दूसरों की बुराई कर रहे हो. यह अच्छी बात नहीं है. यह ठीक है कि जिसकी बुराई तुम मुझे बता रहे हो, उसके बारे में मेरे मन में विचार खराब हो जाएंगे, परंतु तुम्हारे बारे में भी मेरे विचार खराब हो जाएंगे. मैं सोचने लग गया हूँ कि तुम भी अच्छे आदमी नहीं हो.”

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बुद्धिमानी
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एक बादशाह ने एक विदेशी क़ैदी को मृत्युदंड दे दिया. क़ैदी को यह बहुत नागवार गुजरा और यह समझ कर कि उसे तो अब मरना ही है, बादशाह को अपनी भाषा में खूब गालियां देने लगा.

ब…

कहानी : वाइफ स्वैपी

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-चित्रा मुद्‌गल


सामने बैठे मेजर अहलूवालिया सुधीश के गोल्फ की तारीफ कर रहे थे, “अब भी खेलता है...”
“फुरसत गोल्फ के मैदान में ही गुजरती है, एक पाँव शिमला में ही रहता है,” वह प्रशंसा को पचा नहीं पाई, अनजाने रूखी हो आई।
मेजर ने खिन्नता को थपकाया, “भई पुराना इश्क है, पुरानी शराब सा...”
जवाब उसके होंठ पर बेचैन हुआ मगर एक लंबे निश्वास में खामोश हो आया। बहुत कुछ ऐसा है जो भीतर उबलता रहता है मगर सुधीश से सामना करने से कतराता है। जरूरत भी महसूस नहीं होती...
“भीतर... बैठक में चलकर बैठें?” उसने आग्रह किया। मेजर की नजर घाटियों में उलझी हुई थी। घाटियों में संवला आई सांझ सांकल खटका रही थी और सघन चीड़ों के बाजुओं से एकाएक आजाद हुई हवा में बर्फीला कटाव घुल आया था, जो रह-रहकर सिहरा रहा था!
“चलिए वरना आपके कुल्फी बनने का अंदेशा है साहब! मगर एक शर्त पर!” मेजर अहलूवालिया बेतकल्लुफ हुए।
“शर्त... कैसी ?” वह हैरत से सिमटी।
“सुधीश की अनुपस्थिति के बावजूद मैं ड्रिंक लूंगा... केवल चाय पर नहीं टलने वाला...”
भीतर बैठते ही उसने सुखराम से हीटर लगा देने के लिए कहा और अपने लिए शॉल भी मंगवाई।
“क्या बनवाऊँ ?” वह मेजर साहब से मुख…

आलेखः तहज़ीब की पहली पहचान

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-स्वामी वाहिद काज़मी
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दिल्ली से एक पाठक ने किसी आवश्यकतावश पत्र लिखा और इस प्रकार चार-छः पत्रों के आदान-प्रदान का सिलसिला रहा. मैं उन्हें अपने पत्रों में ‘आदरणीय’ ही लिखता था. एक बार उन्होंने मुझे लिखा- “मेरी उम्र मात्र तीस वर्ष है और मेरे पिताजी छियासठ वर्ष के हैं. आप मुझे ‘प्रिय’ ही संबोधित करेंगे, न कि आदरणीय.”

उनकी आपत्तिनुमा दिक्कत मेरी समझ में आई. ‘आदरणीय’ तो बड़े बूढ़ों, बुज़ुर्गों को लिखना चाहिए, न कि युवाओं को. उनके टोकने के पीछे यही मंशा रही. ‘आदरणीय’ संबोधन के लिए मैं उम्र का हिसाब या लिहाज़ नहीं रखता. मेरे लिए सभी पाठक, इन्सान होने के नाते, आदर योग्य यानी आदरणीय ही हैं. इतना ही नहीं, मैं पते पर ‘सेवा में’ और नाम से पूर्व ‘श्रीयुत’ लिखना भी नहीं भूलता. चाहे पाने वाला चौराहे पर बैठा जूतियाँ गांठता चमार या आपकी-हमारी क्या – सारे समाज की गंदगी ढोने वाला भंगी ही क्यों न हो. अपने जीविकोपार्जन हेतु ऐसे पेशे से जुड़े हैं तो क्या वे आदर-योग्य नहीं रह गए? घृणा या अपमान के योग्य कैसे हो गए?

इसके पीछे किसी भी प्रकार की औपचारिकता या दिखावा नहीं है. बल्कि यही मेरी तालीम व तर्बियत (शिक्ष…

कहानीः राजू का साहस

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कहानीः राजू का साहस
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- शरतचन्द्र

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उन दिनों मैं स्कूल में पढ़ता था. राजू स्कूल छोड़ देने के पश्चात् जन-सेवा में लगा रहता था. कब किस पर कैसी मुसीबत आयी, उससे उसे मुक्त करना, किसी बीमार की सेवा-टहल, कौन कहाँ मर गया, उसका दाह-संस्कार इत्यादि कार्य वह दिन-रात किया करता था.

मैं राजू का दाहिना हाथ था. जरूरत पड़ने पर राजू मुझे बुला भेजता. दाह-संस्कार के कार्य अकेले न कर सकने के कारण उसे मेरी जरूरत प्रायः पड़ती ही थी.

एक बार ज्येष्ठ एकादशी के दिन हमारे मामा के यहाँ नाटक हो रहा था. कलकत्ता से पार्टी आई थी. गांव के सभी लोग नाटक देखने आए थे. मैं एक कोने में बैठा तन्मयतापूर्वक नाटक देख रहा था. ठीक उसी समय न जाने राजू कहाँ से टपक पड़ा और मुझसे बोला “सुनो, इधर आओ”

मैं बाहर चला आया. राजू ने कहना जारी रखा- “उस मुहल्ले में तारापद के लड़के की मृत्यु हैजा से अभी हो गई है. महज तीन साल का छोटा बच्चा है. एक ही लड़का था तारापद का. तारापद और उसकी पत्नी लाश को लेकर रो-रोकर जमीन आसमान एक किए दे रहे हैं. मेरे विचार में इस छूत की बीमारी वाली लाश का शीघ्र अंतिम संस्कार कर देना चाहिए. सोच रहा हूँ, इसी समय श्मश…

आलेखः कार्य का आनंद

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आलेखः कार्य का आनंद
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- विक्रम दत्ता

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महाविद्यालय की पढ़ाई पूरी करते-न-करते छात्र-छात्राओं के सामने उचित रोजगार चुनने का संकट खड़ा हो जाता है. लोग कहते हैं कि आज के समय में रोजगार नहीं है. परंतु यह एक सत्य है कि रोजगार पहले की अपेक्षा आज के समय में कहीं ज्यादा हैं. हाँ, ये हो सकता है कि सरकारी नौकरियों के लिए अवसर कुछ कम हो गए हों, परंतु उससे कहीं ज्यादा संख्या में - तमाम निजी क्षेत्रों में चाहे वे बैंकिंग हों या बीमा और निर्माण हो या टेलिकॉम सेवाएँ – रोजगार के अवसर हाल ही के कुछ वर्षों में पैदा हुए हैं- और यह स्थिति आने वाले कुछ वर्षों तक टिकी रहनी है. हां, रोजगार के इन अवसरों को हथियाने के लिए आपको भीड़ में अपनी अलग पहचान बनानी होगी. प्रतियोगिता के इस दौर में आपको अपने प्रतिद्वंद्वियों के बीच पहले के दस-बीस स्थानों में मुकाम बनाना होगा. समस्या यहीं आती है. लोग पीछे रह कर उम्मीद करते हैं कि उन्हें रोजगार मिले – ऐसा कभी न हुआ है ओर न होने वाला है.

अब सवाल यह है कि रोजगार कैसा चुना जाए. रोजगार उस क्षेत्र का चुनें, ऐसा रोजगार चुनें जिसमें आपको मज़ा आए. जैसे कि, अगर आपकी कोई हॉबी है …

कहानीः बहाने से

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कहानीः बहाने से
· संजय विद्रोही

सड़क से देखने पर लगता था कि दूर कहीं आसमान से थोड़ा नीचे एक ऊंची-सी चीज के बदन पर एक जुगनू चिपक कर टिमटिमा रहा है. गौर से देखने पर मालूम पड़ा कि एक बहुमंजिला इमारत की ऊपरी मंजिल के किसी फ्लैट की किसी खिड़की से रोशनी की कुछ बदहवास लकीरें बेवजह बाहर झांक रही हैं. इमारत में घुसिए, लिफ्ट को ट्राई करें? बंद पड़ी है ना?! इस लिफ्ट का सदा ये ही हाल रहता है. चलो , सीढ़ियाँ/ पकड़ते हैं. चले आओ. चढ़ते जाओ. मंजिल दर मंजिल एक सूनापन चुपचाप, बिना किसी हलचल के सारी फ्लोर पर पसरा पड़ा है. सूई गिरने जितनी आवाज भी जिसको बर्दाश्त नहीं है. जरा ­सी आहट होते ही खामोश सन्नाटा जोर से चीख पड़ता है. सूई भी गिरती है तो बेचारी गिरते ही सहम जाती है और देर तक उसकी डरी हुई सांसों का आरोह-­अवरोह माहौल में सुनाई देता रहता है. लेकिन आप इन सब बातों में मत पड़िये. चलते रहिए, चढ़ते रहिए बस. दम फूलने लगा ना? घबराइये मत. अक्सर चलते­-चलते हांफने लगना जीवित होने का स्वयंसिद्ध प्रमाण है. अन्यथा लोग तो ऐसे भी हैं, जो चुपचाप बिना किसी आवाज के चले जा रहे हैं. निश्शब्द. साले मुर्दे कहीं के. किन्तु आप…

व्यंग्य: हांका और आखेट

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*-*-*
- चार्वाक

आजकल लोक में बहुत संभावनाएँ हैं. हमेशा ही रही हैं. मड़ई और चौमासा जैसी पत्रिकाओं को देखकर उत्तर प्रदेश के एक विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में चार व्यक्तियों को उस संभावना ने गुदगुदाया. कुछ दिन बाद ये व्यक्ति अध्यापक कक्ष में खिलखिला रहे थे. कायदे से इस समय इन्हें कक्षाओं में होना चाहिए था, पर परम्परा के अनुसार ये खिलखिलाते हुए समय बिता रहे थे. तभी इन्होंने तय किया कि लोकसाहित्य में कुछ हस्तक्षेप करना चाहिए. एक विद्वान जो विवाह से पूर्व हस्तक्षेप के कारण परम हस्तक्षेपी हो गए थे, बोले, ‘इसमें क्या है, कर देंगे. जब कहो तब कर दें.’ चार व्यक्तियों में तीन महापुरुष थे और एक महास्त्री. अंक महापुरूष ऋषि दुर्वासा के दत्तक पुत्र माने जाते थे. उन्होंने घोषणा की कि अगले हफ़्ते चलकर हांका लगाएंगे और लोकसाहित्य के किसी रूप का आखेट कर के लाएंगे. महास्त्री महाशांति के साथ मुस्कुराई.

एक सप्ताह बाद... दिन रविवार. चार विद्वान जीप पर जनादेश की भांति लदे हुए थे. जीप लोकतंत्र की तरह किसी गांव की ओर भागी जा रही थी. मिशन लोकसाहित्य. लोक काल के गुलगुले गाल में समा जायं इससे पहले उसे पकड़ कर प्रो…

देवेन्द्र आर्य की दो ताज़ा ग़ज़लें

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देवेन्द्र आर्य की दो ग़ज़लें
*-*-*
मैं तवायफ़ हूँ, बेहया तो नहीं
थोड़ी मोहलत दे, बच्चा सो जाए।

ग़ज़ल 1

*-*-*

पास पास थे चुभे, गड़े।
दूर दूर थे, नए लगे।

शहर भी अजीब है तेरा
भीख दी तो ज़ात पूछ के।

अपने ग़म में जल रही है वो
जाइए न हाथ सेंकिए।

रात जैसे लिख रही हो ख़त
दिन कि जैसे खो गए पते।

इश्क हमने इस तरह किया
जैसे कोई सीढ़ियाँ चढ़े।

डिगरियाँ कराहने लगीं
क्या बिके कि नौकरी लगे।

औरतें कठिन न हों तो मर्द
एक बार पढ़ के छोड़ दे।
--.--

ग़ज़ल 2
*-**-*
मौत भी जिंदगी सी हो जाए।
झूठ और सच का फ़र्क़ खो जाए।

तिश्ना लब के सिवाय कौन है जो
सुर्ख अहसास को भिगो जाए।

पिण्ड तो छूटे वर्जनाओं से
जो भी होना है आज हो जाए।

ऐसे मत मांग हाथ फैला के
हाथ में जो है वो भी खो जाए।

मैं तवायफ़ हूँ, बेहया तो नहीं
थोड़ी मोहलत दे, बच्चा सो जाए।

*-*-*

कहानीः दत्तक पुत्र

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*-*-*
- मीरा शलभ

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बड़े भैया. आप क्या कल सवेरे ही चले जाएंगे? छोटी गुड़िया ने जानते हुए भी यह प्रश्न किया था. “हां” – बड़े भैया ने एक लम्बी श्वास खींचते हुए कहा और हाथ का सामान हाथ ही में थामे न जाने क्या सोचते हुए रह गए. फिर एक क्षण को अपने अधरों पर एक विस्मत रेखा खींचते हुए से बोले ... “क्यों? गुड़िया तू चलेगी मेरे साथ. बता, चलेगी क्या?”

गुड़िया ने निरीह भाव से मुझे देखा और मैंने शीघ्रता से आँखें झुका लीं तथा पायल को सुलाने के बहाने उस कक्ष से आँगन में चली आई. गर्मियों के दिन थे. सब लोगों के बिस्तर आँगन और छत पर लगे हुए थे. कुछ लोग सो चुके थे और कुछ सोने लेने का उपक्रम कर रहे थे. कुछ सदस्य जाग भी रहे थे और जो जाग रहे थे वे आपस में बतिया रहे थे.

बड़े ताऊजी ने निःश्वास भरते हुए कहा... “लो भई मुरलीधर भी गए... अब हम ही रह गए हैं दिन गिनने के लिए...” फिर थोड़ा रुक कर बोले -“भई, आदमी का भी क्या है? आज है और आज नहीं. सामान सौ बरस का और कल की खबर नहीं”

अम्मा ने उनकी बात सुनकर दबी-दबी सिसकियों को ऊँचा आलाप देना शुरू कर दिया और अवरूद्ध कंठ से बोलीं ... “अरे तेरहवीं भी निबट गई. अब तुम सब लोग भी कल…

रमेशचंद्र शाह की लंबी कविता

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आठवां दशक
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अस्सी का यह दशक
आयु का – किंतु पांचवाँ

जाने क्यों कतरनें छांटकर अखबारों की
रख लेने की पड़ी टेव थी

जैसै – सन् चौबीस में छपा
मगर पुनर्मुद्रित यह प्रकरण
साबरमती और बछड़े का

--- . --- . ---

या, फिरः डेढ़ सदी पहले की “जोग लिखी” वह
रेड इण्डियन किसी मुखिया की
सिटी गवर्नर, वाशिंगटन को...
“माता है यह भूमि हमारी
कैसे इसका मोल चुका सकते तुम हमको?”

--- . --- . ---

या, वह चिट्ठी – जिसे यादकर अभी, दुबारा
रोया था मैं फूट-फूटकर
“अब उतरेगा नहीं तुम्हारे लिए दूसरा गांधी कोई
गांठ बाँध लो इसे – अगर, चाहो तो...”

“नाम मुसलमानों के भारत के मेरा पैग़ाम आखिरी”
यही, यही तो शीर्षक था उस
डेढ़ कॉलमों में “एक्सप्रेस” के छपी हुई चिट्ठी का

जिस पर थे दस्तखत –
मृत्यु-शैया पर लेटे
जे. बी. कृपलानी के
कितना सार्वजनिक औ कितना निजी दौर वह
बिला गया चुपचाप
उम्र के छठे दशक में

अब तो मैं हो चला दार्शनिक
अभी-अभी पर
भिंचा डायरी के पन्नों में
एक और इकलौता स्मारक उसी दौर का
मुझको घूर रहा हैः

कैसे खोद पहाड़ उम्र का
एक निरापद पथ निकालता
दिवंगता साथिन की स्मृति में
दशरथ मांझी राजगीर का

इसे फाड़ फेंकूं या फिर से
नए साल की अगवानी में
नई डायरी म…

सरिता सुराणा ‘जैन’ की कविता : गांधी एक बार फिर आओ

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*-*-*
गांधी एक बार फिर आओ
राह भूले पथिक को
मंजिल तक पहुँचाओ।
भटकी नैया पाल लगाने
तुम दीप स्तम्भ बन आओ। गांधी ...

सुन मानवता का करूण क्रन्दन
अबलाओं की आर्द्र पुकार।
बच्चा-बच्चा चीख रहा है
मुझे दिलाओ मेरा अधिकार।
तुम अग्रदूद बन आओ। गांधी ...

सत्याग्रह का संदेश देकर
सोई हुई शक्तियाँ जगाओ।
आहत मनुष्य को फिर से
अहिंसा का पाठ पढ़ाओ।
तुम मार्गदर्शक बन जाओ। गांधी ...

तुम्हारा भारत जूझ रहा है
आतंकवाद की मार से!
हत्याओं के भार से!
आत्महत्या, बलात्कार से!
इन सबको दूर भगाने
तुम क्रान्तिदूत बन आओ।
गांधी एक बार फिर आओ।

*-*-*

रचनाकार सरिता सुराणा ‘जैन’ हर विधा में लिखती हैं. आपकी रचनाएँ देश भर के तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

देवेन्द्र आर्य की दो ग़ज़लें

ग़ज़ल 1
--.--

बुजुर्गी बचपना काला न कर दे।
कहीं गंगा हमें मैला न कर दे।

अंधेरे को ज़रा महफ़ूज रखिए
ये मनबढ़ रौशनी अंधा न कर दे।

सफ़र दुश्वार कर देंगे ये आँसू
तू मेरा रास्ता आसान कर दे।

तुम्हारे इल्म का चमकीला दर्पण
मेरे चेहरे को बे-चेहरा न कर दे।

मुझे अवहेलना चर्चा में लाई
बड़ाई सब कहीं उल्टा न कर दे।

ये चुप्पी दिग्विजय करने चली है
ख़मोशी बीच में हल्ला न कर दे।

इसे महफ़ूज रखिए दिल तलक ही
मोहब्बत जेहन पर हमला न कर दे।


ग़ज़ल 2
--.--
तेरे भीतर पैदा हो यह गुन।
तू भी मतलब भर की बातें सुन।

घर इतने एख़लाक से पेश आया
मैंने खुद को समझ लिया पाहुन।

नफ़रत के अवसर ही अवसर हैं
प्यार का लेकिन बनता नहीं सगुन।

आँख लगी तो क्या देखा मैंने
गले मिले थे कर्ण और अर्जुन।

मन के दो ही रंग, हरा-भगवा
ऐसे में किस रंग का हो फागुन।

सुर भी बेसुर होने लगता है
जब बजती है एक ही धुन।

अब तक कब का बेच चुके होते
कविताएँ भी होतीं जो साबुन।

**-**
रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की ग़ज़लें अपना अलग रंग, सुर और तेवर लिए हुए होती हैं – अकसर, समाज को उसका नंगा चेहरा दिखाती हुईं.

लंबी कहानीः लिफ़ाफ़ा

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-चित्रा मुद्​गल

वह जाग रहा है. तड़के ही उसकी नींद खुल जाती है. रात चाहे जितनी देरी से घर लौटा हो, चाहे जितनी देरी तक पढ़ता रहा हो, सुबह अपने आप जाग जाने की उसकी आदत छूटी नहीं. उसे आश्चर्य होता है. कुछ आदतें और नियम बदले हुए समय के साथ बहुरूपिए-से अपना चोला बदल लेते हैं. मगर कुछ आदतें किसी भी असर से बेअसर मरे बच्चे को छाती से चिपकाए बंदरिया हो उठती हैं. आज भी, जैसे ही दूध वाले की घंटी बजी, वह जाग गया. लेकिन दूध लेने के लिए नहीं उठा. उठती मां ही है. मां के उठने के कुछेक मिनटों उपरांत ‘मिल्क कुकर’ की कर्ण भेदी सीटी बजती है. चाय चढ़ती है. मसालेदार चाय. चाहे गरमी हो या सरदी. मां बगैर मसाले की चाय नहीं बनातीं. मसालेदार चाय की खुशबू पूरे घर में फैल जाती. घर में सुबह हो जाती. वह अपने बिस्तर पर पड़े-पड़े आंखें कुहनियों से ढके सुबह को होते देखता. सुनता. सुबह बड़ी हड़बड़ी में होती. वक्त जो बहुत कम होता है उसके पास...

उसे पता होता है कि अब आगे क्या होगा और ठीक उसके अगले ‘अब’ में...

अनु को उठाया जाएगा, ‘उठ न गुड़िया! उठ न ऽ ऽ !’

यह जो उसके बगल वाले पलंग पर चौंतेरे-सी पाँच फीट चार इंच की लड़की औंधी पड़…

लघुकथाः श्रद्धांजलि

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-पुष्पा रघु

आज बाबू जी की तेरहवीं है. शामियाना लगा है. मेज पर बाबू जी का फ्रेम किया हुआ चित्र रखा है – ताजे गुलाबों की माला से सुशोभित. धूपबत्ती जल रही है. सारा वातावरण सौरभ और श्रद्धामय. पहले स्वामी नित्यानंद का प्रवचन हुआ – जीवन की अनित्यता तथा मृत्यु की नित्यता का बखान. तत्पश्चात् सबने बारी-बारी माला अथवा पुष्पों से श्रद्धांजलि अर्पित की. सभी मरने वाले का गुणगान कर रहे थे. “बड़े भले मानस थे बाबूजी. इतने सालों से गली में रह रहे थे. कभी किसी से नहीं झगड़े.”

“ड्यूटी के पाबंद थे. सदा नियत समय पर ऑफ़िस जाते थे.”

“बड़े ईमानदार थे जी तभी तो बेटे इतने अच्छे मिले हैं.” आदि-आदि.

बाबूजी के दोनों बेटे और बहुएँ फूट-फूट कर रो रहे थे. “हाय बाबूजी. हमें अनाथ कर गए बाबूजी. अम्मा तो पहले ही चली गई थी. अब आप भी हमें छोड़ गए.”

लोग उन्हें सांत्वना दे रहे थे. “तुमने तो अपना कर्तव्य पूरा कर दिया. रात-दिन सेवा की अब मौत पर किसका वश है?” एक पड़ोसी बोला. दूसरे ने कहा - “माता-पिता का साया तो सभी चाहते हैं. परन्तु वे बेचारे तो कष्ट ही पाते थे जबसे एक्सीडेन्ट में टाँग कटी थी उनकी. सब्र करो! ईश्वर की मर्जी बेटा!”

तीस…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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