संदेश

September, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

कहानी : आत्म-समर्पण

चित्र
संजय विद्रोही

'सुनो कँवर साब आज एक अजीब बात सुनी है.' पापाजी ने आकर बैठते हुए कहा.
'क्या पापाजी?' परेश ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए मुस्कुराकर पूछा.
'पूरी कॉलोनी में सबने अपने घरों के मुख्य-द्वार पर दोनों ओर हल्दी और मेंहदी के थापे मार रखे हैं.' उन्होंने अचरज के साथ बताया.

'क्या?' सुनकर परेश अचम्भित रह गया.
'हाँ, मुझे तो सुबह विपिन ने बताया तो एकाएक मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ. मगर जब मैं शाम को टहलने गया तो देखा, वाकई सबने थापे लगा रखे हैं. जगह-जगह औरतें भी खड़ी खुसुर-फुसुर करती दिखीं' उन्होंने आगे बताया. हम दोनों की बातें सुनकर प्रतिभा भी पास आकर बैठ गई.

'देखो प्रतिभा पापाजी क्या बता रहे हैं?' परेश ने पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा.
'हाँ पापाÊ सुबह सामने वाली भी बता रही थी. कहते हैं तीन चार चुडैलें कहीं से छूटकर यहाँ आ गई हैं. घर-घर जाकर रोटी-प्याज माँगती हैं. यदि कोई तरस खाकर रोटी-प्याज दे देता है, तो रोटी तो वहीं फेंक देती हैं, प्याज को दरवाजे पर ही मुठ्ठी में भींचकर फोड़ देती हैं और उसका रस चूसकर पी जाती हैं. जिस-जिस घर में उन्होंने ए…

हास्य-व्यंग्य : स्त्री स्तोत्र

चित्र
-भारतेंदु हरिश्चंद्र

इस पूजा में अश्रु जल ही पाद्य है, दीर्घश्वास ही अर्ध्य है, आश्वासन ही आचमन है, मधुर भाषण ही मधुपर्क है, सुवर्णालंकार ही पुष्प है, धैर्य ही धूप है, दीपक है, चुप रहना ही चंदन है और बनारसी साड़ी ही विल्वपत्र है, आयु रूपी आँगन में सौंदर्य तृष्णा रूपी खूँटा है, उपासक का प्राण पुंज छाग उसमें बंध रहा है. देवी के सुहाग का खप्पर और प्रीति की तलवार है, प्रत्येक शनिवार की रात्रि इसमें महाष्टमी है, और पुरोहित यौवन है.

पदादि उपचार करके होम के समय यौवन पुरोहित उपासक के प्राण समिधाओं में मोहाग्नि लगाकर सर्वनाश तंत्र से मंत्रों से आहुति दे ‘मानखण्ड के लिए निद्रा स्वाहा’, ‘बात मानने के लिए मां बाप का बंधन स्वाहा’, ‘वस्त्रालंकारादि के लिए यथा सर्वस्व स्वाहा’ ‘मन प्रसन्न करने के लिए यह लोक परलोक स्वाहा’ इत्यादि, होम के अनन्तर हाथ जोड़कर स्तुति करें :

हे स्त्री देवी ! संसार रूपी आकाश में तुम गुब्बारा (बेलून) हो, क्योंकि बात-बात में आकाश में चढ़ा देती हो, पर जब धक्का दे देती हो तब समुद्र में डूबना पड़ता है अथवा पर्वत के शिखरों पर हाड़ चूर्ण हो जाते हैं. जीवन के मार्ग में तुम रेलगाड़ी हो.…

रचनाकार को अपना अमूल्य सहयोग दें...

चित्र
प्रकाशनार्थ रचनाएँ rachanakar@gmail.com  पर भेजें.



रचनाकार में महज कुछ  वर्षों के दौरान हजारों हजार रचनाएं प्रकाशित हुई हैं जिनमें कई एक तो पूरे कहानी संग्रह, कविता संग्रह, यात्रा संस्मरण, संपूर्ण उपन्यास इत्यादि भी शामिल हैं. दर्जनों ई-बुक भी प्रकाशित किए गए हैं, जिन्हें मुफ़्त में डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है. रचनाकार को प्रतिमाह लाखों पाठकपढ़ते हैं. रचनाकार के इस बढ़ते कदम में आप भी अपना अमूल्य सहयोग प्रदान कर सकते हैं. 

कैसे?

अपनी स्वयं की, मित्रों की रचनाएँ कम्प्यूटर पर किसी भी फ़ॉन्ट में टाइप कर अथवा टाइप करवाकर रचनाकार को ईमेल या सीडी के जरिए भिजवाएँ.

पुरानी, रॉयल्टी फ्री हिन्दी साहित्य की रचनाएँ जिन्हें आपको लगता है कि इंटरनेट पर होनी चाहिएँ उन्हें कम्प्यूटर पर टाइप कर / टाइप करवाकर रचनाकार को भेजें.

औसतन एक ए-4 आकार के पृष्ठ को टाइप करने का खर्च 10 रुपए ($1/4) के करीब आता है. कोई रचना यदि आप इंटरनेट पर देखना चाहते हैं, और उसके लिए इस रूप में सहयोग करना चाहते हैं व राशि दान करना चाहते हैं तो कृपया रचनाकार को rachanakar@gmail.com पर लिखें. यदि आपके पास पेपाल (PAYPAL) का खाता …

रामनारायण मिश्र की कहानी : मंगल सूत्र

चित्र
**-**
कहानी : मंगलसूत्र

- रामनारायण मिश्र

चिलचिलाती गर्मी के सन्नाटे ने एक रहस्यमयी उदासी की मानिन्द पूरे वातावरण को घेर रखा था. विचित्र सी उखड़ी-उखड़ी तनहाई... आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े... हवा न चलने के तारण कहीं-कहीं स्थिर से चुपचाप पड़े थे. सूरज अत्यंत तेजी से चमक रहा था, ऐसा लग रहा था मानों आकाश मार्ग का यह जलता अग्नियात्री अत्यंत उग्र हो उठा हो. इस भयानक दहकते मौसम की गर्मी से दीपक के शरीर का प्रत्येक अंग झुलस-सा रहा था. उसे यह अहसास हो रहा था... इस झुलसती गर्मी से न सही, पर विषम परिस्थितियों से उत्पन्न खिन्नता से उसकी पत्नी व दो बच्चे अवश्य ही ग्रसित थे. ... दो साल से वह एक अर्ध-सरकारी प्रतिष्ठान में सुपरवाइजर के पद पर अस्थाई रूप से नौकरी कर रहा था. यह नौकरी उसे एक सिफारिसी-पत्र के आधार पर मिली थी. जिस समय वह इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स कर रहा था तभी उसके पिता ने उसका विवाह करवा दिया था, क्योंकि दीपक की मां की मृत्यु के पश्चात् कोई स्त्री घर में नहीं थी जो घर को संभाल लेती... परन्तु ट्रेनिंग पूरी होते-होते ही उसके पिता भी चल बसे थे. ... दो बच्चे और पत्नी, उसका परिवार..…

कथाकार-उपन्यासकार हृदयेश का हृदय को बींधता संस्मरण

चित्र
**-**
आत्म-कथ्य : हृदयेश ने हड्डियाँ निकलवा दी हैं, चोट नहीं लगती.
**-**
-हृदयेश

हृदयेश ग्यारह बजे के आसपास बाहर आ गए थे, सड़क पर, डाक की प्रतीक्षा में. ऐसा वह रोज करते थे. इस आदत की लत से आदत लत की होती है- वह कभी-कभी अवकाश के दिन भी सड़क पर आ जाते थे. किन्तु फिर ध्यान आ जाने पर कि अरे, आज तो डाक बंटना नहीं है, वह अपनी बेवकूफ़ी पर हंसते, लज्जाते, अकसर झुंझलाते भी हुए हट आते थे. डाक उनको बहुत-कुछ साहित्य की अपनी दुनिया के करीब लाती थी, उससे उन्हें जोड़ती थी. पिछले तीन दिन से कोई डाक आई नहीं थी. प्रतीक्षा इसलिए भूखी थी.

पोस्टमैन आ गया था. उनकी डाक भी थी उनके पास.

वह डाक लेकर अन्दर आ गए.

डाक में एक पत्रिका थी, मोड़े मुखड़े और दुर्बल काया वाली. उन्होंने उसे एक ओर डाल
दिया. एक कार्ड था. किसी अपरिचित पत्रिका के संपादक ने रचनात्मक सहयोग के रूप में
कहानी की मांग की थी. पत्र इसी आशय का किसी नामचीन पत्रिका से भी आया होता तब भी वह
उससे नहीं जुड़ते. जो उन्होंने तय कर रखा था कि अब उनको उपन्यास ही लिखना है, उस पर
वह अडिग थे. कहानी या अन्य कुछ लिखने का मतलब होगा कि उपन्यास के प्रति अपनी चाहत
या प्यास को कम कर …

आलेख : मस्जिद में हिन्दू, मन्दिर में मुसलमान

चित्र
वही है धर्म-ईमान

-स्वामी वाहिद काज़मी

मुमकिन है शीर्षक पढ़ते ही कुछ पाठकों के मन में विचार उठे कि आगे शायद कुछ कविता जैसी चर्चा होगी। नहीं, मैं कविता-चर्चा करने नहीं बैठा बल्कि अब जिस माहौल में एक-एक सांस कठिनाई से लेकर जीने को अभिशप्त हूँ, उससे उपजी मानसिक पीड़ा सहृदय पाठकों के साथ शेयर करने के इरादे से बैठा हूँ। कहाँ से शुरू करूं? जब यह सोचता हूँ तो एकदम से कोई सिरा तो लेखनी की नोक पकड़ नहीं पाती। आँसुओं की रुकी हुई धारा अवश्य आँखों से फूट पड़ना चाहती है।

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
वैसे तो शायद मन्ना डे का गाया हुआ किसी फिल्मी गीत का यह मुखड़ा है। न मैंने वह फिल्म देखी, न फ़िल्में देखता हूँ। किन्तु जब भी यह पंक्ति मेरे कानों में पड़ती है, तत्क्षण थोड़ी देर के लिए जैसे मैं इस दुनिया में नहीं रह जाता हूँ। इस पंक्ति के बहाने मुझे अतीत के स्वर्णिम दिन बेसाख्ता स्मरण हो आते हैं। विशेष रूप से उस जमाने का सामाजिक एवं धार्मिक व्यवहार, वह पूरा वातावरण जिसमें किसी प्रकार की जातिगत द्वेष भावना तो दूर, संकीर्णता और भेद-भाव भी नहीं था। बेशक इसे आज कोई यह कहे कि मैं अतीत-जीवी या माजीपसंद हूँ, पर क…

मोहन द्विवेदी की हास्य - व्यंग्य कविताएँ

चित्र
हास्य - व्यंग्य कविताएँ
**-**
पीर हरो नेताजी!
**.**
भूखी आँखें सूखे ओंठ देख रहे हैं तेरी ओर,
इनकी पीर हरो नेताजी।।

शादी को है घर में बाला,
नहीं निवाला इतना ठाला।
यह तो है गरीब का कम्बल,
जितना धोता उतना काला।

तू भी काला फिर भी माला फेंक रहे सब तेरी ओर,
अब तो शरम करो नेताजी।।

हम गुदड़ी में जीने वाले,
नहीं चाहिए शाल दुशाले।
जी.डी.पी. को हम क्या जानें,
हमको तो रोटी के लाले।

वर्षों से प्यासी धरती पर मचा रही मानवता शोर,
कुछ तो रहम करो नेताजी।।

कमर लँगोटी हाथ लकुटिया,
घर क्या है बस टूटी टटिया।
बिखरे बर्तन बुझता चूल्हा,
द्वार पड़ी पुश्तैनी खटिया।

आंखों में अंधियारी छाई घूर रहे कब होगी भोर,
कितनी धीर धरें नेताजी।।

सब हाथों को काम चाहिए,
और नहीं आराम चाहिए।
बेसुर की सब तानें छोड़ो,
आशा को अंजाम चाहिए।

बहुत हो गया कुछ तो सोचो मुड़कर देखो मेरी ओर,
दूर अभी दिल्ली नेताजी।

**-**
जेब की महिमा
**-**
एक दिन राह में, कुछ पाने की चाह में, भटक रहा था...
सहसा, खोपड़ी में कोई बात खटकी,
सीधे जेब में आकर अटकी. मैं सोचने लगा...
आदमी की जेब भी क्या चीज़ होती है?
कभी पाती है, कभी खोती है, कभी जागती है, कभी सोती है,
कभी हँसती है, कभी रोती है।

नरम हो य…

मोहन द्विवेदी की दो कविताएँ

चित्र
मोहन द्विवेदी की दो कविताएँ :

जब चला था छोड़कर
**-**
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर
संबंध अभिशापित हुए अनुबंध सारे तोड़कर।

धूल पगडंडी की पूछी लौटकर कब आओगे?
दौड़ नंगे पाँव मुझको देह से लिपटाओगे।
खिलखिलाकर हँस रहा था चन्दा मामा गांव में,
लोरियाँ नानी की छोड़ा श्वेत आँचल छांव में।

सब दूरियाँ बढ़ती गयीं मजबूरियों को जोड़कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

खो गयी सावन की कजरी और होरी-फाग भी,
छिन गयीं अगहन की सांझें और साझी आग भी।
हो गयी हैं मौन, गलियों की मधुर किलकारियाँ,
मन के उपवन में हमेशा चल रहीं अब आरियाँ।

संवेदना आहत हुई अभिव्यंजना झकझोर कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

शान्त था चौखट पुराना रो रही थीं ड्योढ़ियाँ,
पग बढ़े तो पास आ पूछीं पुरानी पीढ़ियाँ।
रह गयी थी क्या कमी मेरी कमाई में बता?
कौन है अपना सहारा इस बुढ़ाई में बता?

तब कल्पना कुंठित हुई करूणा चली मुँह मोड़कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

छीनकर अंधे की लाठी भाग आया गांव से,
ठोकरें खाने लगा हूँ अब शहर के पाँव से।
स्वप्न-सी लगने लगीं अनुभूतियाँ अब प्यार की,
यंत्रवत् जीने लगा हूँ जिन्दगी औज़ार सी।

सुख…

व्यंग्यः सर को क्यों न किया जाए बेअसर?

- राजकुमार कुम्भज

अपने आका को ‘सर’ कहने की प्रथा का आविष्कार अंग्रेज़ों ने किया. हम भारतीयों में अपने आकाओं को ‘सर’ कहने की प्रथा को प्रतिष्ठित करने का श्रेय भी अंग्रेजों को ही जाता है. अंग्रेज़ों ने हम भारतीयों पर बड़ा उपकार किया, जो वे यहाँ आए, दो सौ बरस तक हमें दास बनाए रखा और अपने आकाओं-चाकरों को ‘सर’ कहने-कहलाने की सीख दे गए. अगर अंग्रेज भारत नहीं आते, हमें दास नहीं बनाते, हम पर कोड़े नहीं बरसाते, तो हम अपने सिर में ‘सर’ कैसे घुसा पाते? अब तो हर तरफ़ ‘सर’ ही ‘सर’ दिखाई देते हैं. ऐसे में कभी किसी को लगता नहीं क्या कि अब ‘सर’ का सर कलम करने का समय आ चुका है.

हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ऑक्सफ़ोर्ड जाकर अंग्रेजों की प्रशंसा कर आए. हमें भी करना चाहिए. हमारे प्रधान मंत्री हमारे ‘सर’ हैं. उधर हमारे ‘सर’ के भी कई-कई ‘सर’ हैं. जैसे – लालू ‘सर’, पासवान ‘सर’, सुरजीत ‘सर’, येचुरी-करात ‘सर’ वग़ैरा वग़ैरा. ‘सर’ कहते रहने के अनेकानेक लाभ हैं. पाँव में रहने का दासत्व स्वीकारने वाला जूता कभी क्रांतिकारी बन कर किसी ‘सर’ के सिर की कपाल क्रिया कर सकता है. अतः जो महानुभाव अपनी कपाल क्रिया करवाने से…

भारतेंदु हरिश्चन्द्र की दो हज़लें (हास्य ग़ज़लें)

हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो हास्य ग़ज़लें
**-**
(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्कृत, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बँगला के भी विद्वान थे तथा संगीत, धर्म, दर्शन सब में माहिर थे. मात्र 35 वर्षों के जीवन काल में ही (9 सितंबर 1850- 6 जनवरी 1885) भारतेन्दु ने इतना कुछ साहित्यिक सृजन कर लिया, वह भी उस दौर में जब साहित्यिक-सहूलियतों का घोर अकाल था – ऐसी मिसाल कम ही मिलती है. उस जमाने में भी भारत की दशा संभवतः वही थी जो आज है- बानगी देखिए –चूरन साहब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता.)

**-**
हज़ल
*-*-*

नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से
तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़ दिल के साज से

दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अन्दाज़ से
हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से

सैकड़ों मुरदे जिलाए ओ मसीहा नाज़ से
मौत शरमिन्दा हुई क्या क्या तेरे ऐजाज़ से

बाग़वां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर
अब खुलें पर भी तो मैं वाक़िफ नहीं परवाज़ से

कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का खौफ़
वाज़ आए ए मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से

बाए गफ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो
चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से

नाज़े माशूकाना स…

पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार

चित्र
**-**
बन्द गली का द्वार

-पुष्पा रघु

‘ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन’ फोन की घंटी बजी तो सुजाता यह कहते हुए लपकी - ‘लंबी घंटी है. लगता है कहीं दूर का फोन है’ - “हलो! हाँ, सुशांत, सुनाओ क्या हाल है?” उसका अनुमान ठीक ही था. लखनऊ से उसके भाई सुशांत का फोन था- “दीदी यहाँ उर्वी के लिए एक लड़का है – बैंक मैनेजर, परिवार भी सुशिक्षित, संस्कारित है.” सुजाता ने कहा- “पर उर्वी के लिए तो सुरेश के पोते से बात हो गई है. कैप्टन है. हां हां, वही अपनी गली वाला सुरेश.”

“नई दिल्ली की खुली हवा में रही उर्वी को कहाँ भेज रही हो दीदी? बंद गली के अंतिम छोर पर उनका वह सीलन भरा अँधेरा मकान! कैसे रह पाएगी वह?” सुशांत बोला.

“तुम तीस-पैंतीस साल पहले की बात कर रहे हो. सुशांत! उस गली और उस मकान को तुम अब देखो तो पहचान ही न पाओ. क्या आलीशान बँगला बनवाया है सुरेश ने! गली के अंत में जो खंडहर था, उसे तुड़वाकर उधर भी द्वार खुलवा दिया है.” सुजाता ने उत्तर दिया.

“फिर भी दीदी कहाँ हमारा परिवार और कहाँ एक दूध वाले का परिवार! पैसा होने से संस्कार तो नहीं बदल जाते.” चिंता जताई सुशांत ने.

“नहीं सुशांत! मैं नहीं मानती इन बातों को. सुरेश को मैं बचपन…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.