गुरुवार, 1 सितंबर 2005

व्यंग्यः समाज और संस्थाओं को बदलने का ठेका

- राजकुमार कुम्भज

खबर बेशक दिमाग खराब करने वाली हो सकती है, बशर्ते कि आपके पास दिमाग हो और दिमाग में रहने वाली अक्ल को इस्तेमाल करने की जरा भी अक्ल हो. कहा गया है कि खुदा ने हर इंसान को अक्ल दी है, लेकिन अक्ल को इस्तेमाल करने की अक्ल इंसान को खुद पैदा करना पड़ती है. लगता है कि सरकारों के पास न तो दिमाग ही रह गया है न ही दिमाग में अक्ल और न ही अक्ल को इस्तेमाल करने की अक्ल. इसीलिए तो यह खबर चौंकाती है कि उत्तरप्रदेश के ललित कला अकादमी के अध्यक्ष पद पर जिस ‘कलाकार’ की नियुक्ति की गई है, वे ये बाहुबली विधायक हैं जो कभी “राजा भैया” जैसी ‘महान विभूति?’ को भारत का प्रधानमंत्री बनाए जाने की वकालत करते फिरते थे. वैसे भी बाहुबलियों के लिए तो आजकल की राजनीति सुलभ शौचालय के समान है.

यूँ भी, यूपी-बिहार की राजनीति में राजनीतिज्ञों का गुण - रंगदारी-अपहरण आदि जैसी कलाओं में परिपूर्ण होना ही हो गया है. बिहार के तीन-तीन अरेस्ट वारंट को धता बताते हुए शहाबुद्दीन तमाम भारत में सरे आम घूम रहे हैं – बिहार पुलिस को ललकारते हुए – कि हिम्मत है तो गिरफ़्तार करके दिखाओ. इधर, जनता जो मतदाता भी है, राजनीतिज्ञों को न सिर्फ नतमस्तक होकर प्रणाम करती है, बल्कि अपने बच्चों को डराकर सुलाने के काम में भी उनके नाम का इस्तेमाल करती है. फंडा यही है कि यहाँ डंडा है, डंडे पर झंडा है, और झंडा लालबत्ती वाली कार पर लगा है.

हमारी सरकार का स्वरूप और हमारी सरकार के विकास का स्वरूप हमें आँख मूंदकर ही देखना चाहिए. ताकि भविष्य में होने वाले महान कारनामें देखने के लिए हमारी आंखें बची रहें. कहा जाता रहा है कि संसार को बदलने में कला अत्यंत सहायक होती है, लेकिन जिस कला को बदलने की जिम्मेदारी घोषित गुंडे-बदमाशों को सौंप दी जाए, तो उस कला का उद्धार कैसे अनिश्चित रह सकता है? जाहिर है, मध्यप्रदेश और राजस्थान की साहित्य-कला अकादमियों के विवादों से प्रेरणा लेकर अन्य प्रदेशों की सरकारें, मसलन- उत्तरप्रदेश की सरकार, ने भी अपने नकारात्मक शुभंकरों को उपकृत करना प्रारंभ कर दिया है, तो फिर क्या गुनाह किया है?

वैसे भी, इस जमाने में सरकारें सुबह शाम बदल रही हैं. और तो और, एक ही पार्टी की सरकार के मुखिया के मुखिया भी इसी गति से बदलते रहते हैं. मुखिया बदलते ही सरकार का स्वरूप भी बदल जाता है. सरकार में कोई मुखिया बना नहीं कि उसी घड़ी से उसे हटाने और नया किसी को बिठाने की कवायद चलने लगती है. ऐसे में, जाहिर है- सरकार बदलते ही संस्कार भी बदलने लगते हैं. पता नहीं किस कृपानिधान का विधान है कि साहित्य का संस्कार नहीं बदलता, कला की बला नहीं बदलती, राग की आग यथावत् कायम रहती है. परंतु सरकारें डंडे के बल पर इनकी संस्थाओं में अपना अधिकार जताने की चेष्टा करती रहती हैं.

सारंगी या सितार बजाने से संस्थाओं का चरित्र नहीं बदलता है. चरित्र बदलने के लिए झंडा चाहिए और झंडे के लिए डंडा. डंडा गड़ जाए तो झंडा अपने आप लहराने लगता है, झंडा लहराने की खूबी सब में नहीं होती है. अगर ऐसा हुआ होता तो डंडे का आविष्कार ही नहीं होता. डंडा सिर्फ झंडे का ही नहीं, वह बाहुबली का भी पुख्ता पहचान है. डंडा नहीं तो बाहुबली नहीं, और आजकल तो इसके बगैर सरकार भी नहीं!

*-*-*
रचनाकार - राजकुमार कुम्भज जाने माने व्यंग्यकार हैं. आपकी व्यंग्य रचनाएँ तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------