मंगलवार, 6 सितंबर 2005

देवेन्द्र आर्य की दो नई ग़ज़लें


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ग़ज़ल 1
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जीवन क्या है, कांच का घर है।
मौत के हाथों में पत्थर है।

पर्वत तो हो सकते हैं हम
सागर होना नदियों पर है।

मौसम, मजहब, चाहत, मण्डी
घर पर किसका खास असर है।

जब सपने नाखूनों में हों
आँखें होना बुरी खबर है।

विष पी कर हम अमर हो गए
मन का जादू बड़ा जबर है।

गांव में बदली इस दुनिया की
जड़ में कोई महानगर है।

आँसू तुम कहते हो जिसको
दुनिया का पहला अक्षर है।
--.--

ग़ज़ल 2
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मेरी यादों में ढल रही थी धूप।
गिर रही थी सम्हल रही थी धूप।

मैं था गुड़ की तरह पसीजा हुआ
और नमक सी पिघल रही थी धूप।

मां ने बेटी को गौर से देखा
अपने कद से निकल रही थी धूप।

हाथ कम खुरदुरे न थे मेरे
फिर भी इनसे फिसल रही थी धूप।

ढंक के कोहरे से चाँद भी खिड़की
अपने कपड़े बदल रही थी धूप।

तीरगी के घने दरख्तों की
छांव में फूल फल रही थी धूप।

कुछ बहुत व्यक्तिगत सी बातें थीं
यूँ ही थोड़े न खल रही थी धूप।

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रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की ग़ज़लें अपना अलग रंग, सुर और तेवर लिए हुए होती हैं – अकसर, समाज को उसका नंगा चेहरा दिखाती हुईं.

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