बुधवार, 7 सितंबर 2005

गणेश चतुर्थी पर लक्ष्मीनारायण गुप्त की विशेष रचना


गणेश जी का महाभारत लेखन

-लक्ष्मीनारायण गुप्त

महाभारत के एक लाख श्लोकों की मानस-रचना हो चुकी थी
किन्तु वेद-व्यास जी को बड़ी चिन्ता हो रही थी।
कौन लेखन करेगा इस विशाल साहित्य का
साधारण लिपिक के लिये ये मामला नहीं बस का।
इसी उधेड़बुन में व्यास जी पड़े थे
तभी घूमते फिरते नारद जी आन पड़े थे।
सुन कर व्यास जी की कहानी
नारद जी ने कहा सुनिये मेरी ज़बानी।
अभी मैं कैलाश से लौट रहा हूँ
पार्वतीनन्दन गणेश से मिल कर आ रहा हूँ।
यदि मिल जाये आपको लिपिक गजानन जैसा
सरल हो जायेगा काम महाभारत लेखन का।
व्यास जी ने किया जैसे ही गजानन का ध्यान
क्षण मात्र में ही प्रकट हो गये गणेश भगवान।
गणेश जी ने कहा, सुना है आपको एक लिपिक की तलाश
बन्दा हाज़िर है आपकी सेवा में मुनिराज।
लेकिन एक शर्त आप मेरी सुन लीजिये
मुझे इन्तज़ार करने का मौका न दीजिये।
यदि मेरी लेखनी को कभी रुकना पड़ेगा
तो महाभारत लेखन का काम अधूरा रहेगा।
व्यास जी ने कहा एक शर्त मेरी भी सुनिये
बिना अर्थ समझे आप कुछ भी न लिखिये।
जितनी जल्दी व्यास जी श्लोक बोलते थे
उतनी ही जल्दी गणेश जी उसे लिख डालते थे।
बीच बीच में व्यास जी एक कठिन श्लोक बोल देते थे
जब तक गणेश जी उसे समझते थे
व्यास जी दो चार नये श्लोक बना लेते थे।
श्रोताओ इस तरह हुआ महाभारत का लेखन
सुना है आपने यह चरित्र अति पावन।
**-**
रचनाकार - लक्ष्मीनारायण गुप्त जी की अनवरत् लेखनी का आनंद आप उनके हिन्दी ब्लॉग http://kavyakala.blogspot.com/ से भी ले सकते हैं

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