---प्रायोजक---

---***---

रु. 25,000+ के  नाका लघुकथा पुरस्कार हेतु लघुकथाएँ आमंत्रित हैं.

अधिक जानकारी के लिए यहाँ [लिंक] देखें. आयोजन में अब तक प्रकाशित लघुकथाएँ यहाँ [लिंक] पढ़ें.

नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ अथवा रचनाकार खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार

साझा करें:

**-** बन्द गली का द्वार -पुष्पा रघु ‘ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन’ फोन की घंटी बजी तो सुजाता यह कहते हुए लपकी - ‘लंबी घंटी है. लगता है कहीं दूर का...



**-**
बन्द गली का द्वार

-पुष्पा रघु

‘ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन’ फोन की घंटी बजी तो सुजाता यह कहते हुए लपकी - ‘लंबी घंटी है. लगता है कहीं दूर का फोन है’ - “हलो! हाँ, सुशांत, सुनाओ क्या हाल है?” उसका अनुमान ठीक ही था. लखनऊ से उसके भाई सुशांत का फोन था- “दीदी यहाँ उर्वी के लिए एक लड़का है – बैंक मैनेजर, परिवार भी सुशिक्षित, संस्कारित है.” सुजाता ने कहा- “पर उर्वी के लिए तो सुरेश के पोते से बात हो गई है. कैप्टन है. हां हां, वही अपनी गली वाला सुरेश.”

“नई दिल्ली की खुली हवा में रही उर्वी को कहाँ भेज रही हो दीदी? बंद गली के अंतिम छोर पर उनका वह सीलन भरा अँधेरा मकान! कैसे रह पाएगी वह?” सुशांत बोला.

“तुम तीस-पैंतीस साल पहले की बात कर रहे हो. सुशांत! उस गली और उस मकान को तुम अब देखो तो पहचान ही न पाओ. क्या आलीशान बँगला बनवाया है सुरेश ने! गली के अंत में जो खंडहर था, उसे तुड़वाकर उधर भी द्वार खुलवा दिया है.” सुजाता ने उत्तर दिया.

“फिर भी दीदी कहाँ हमारा परिवार और कहाँ एक दूध वाले का परिवार! पैसा होने से संस्कार तो नहीं बदल जाते.” चिंता जताई सुशांत ने.

“नहीं सुशांत! मैं नहीं मानती इन बातों को. सुरेश को मैं बचपन से ही जानती हूँ. कोई कमी नहीं है उसमें. देखाभाला परिवार, सुंदर-योग्य लड़का और क्या चाहिए? बीते कल को पकड़कर क्यों बैठें? फिर हमें तो मानता भी बहुत है.” सुजाता बोली. फिर सोचने लगी- यह बात तो सत्य है कि सुरेश दूधवाले का लड़का है, पर लगन-परिश्रम, बुद्धि, विनम्रता से कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया! – सुजाता स्मृति के पंखों पर सवार हो पहुँच गई अतीत के उपवन में – सुजाता का घर और सुरेश का घर था तो एक ही गली में, पर सुजाता का घर था गली के मुख्य द्वार से सटा, जहाँ गली बहुत खुली और चौड़ी थी. खूब बड़ा आलीशान मकान था और बाहर था एक चौड़ा चबूतरा. सारे दिन वहाँ बच्चे खेलते. सर्दी की दोपहरी में दादियों-ताइयों की पंचायत जुड़ती थी वहाँ और शाम को सजती सुजाता के ताऊ जी की हुक्का महफिल! सुजाता को आज भी वह सोंधी सुगंध याद है, जब गर्मियों में शाम को नौकर के चबूतरे पर छिड़काव करने से उठती थी. ठंडक करने के बाद वहाँ मूढ़े और चारपाई डाल दी जातीं. गली के बुजुर्ग वहाँ बैठ गपशप करते, हुक्का गुड़गुड़ाते और बैठक में बजते रेडियो से समाचार अथवा देहाती कार्यक्रम सुनते.

सुरेश का घर गली के अंतिम सिरे पर था. वहाँ गली बहुत संकरी और बंद थी. छोटा सा मकान था – दो-तीन कोठरी, एक कोठा, दो खटिया का आँगन. न सूर्य का प्रकाश न बिजली का. उस घर के साथ एक टूटा-फूटा गुम्बज था, जिसने गली का अन्तिम सिरा बंद कर रखा था. बड़ा ही डरावना और रहस्यमय था वह गुम्बज का खंडहर!

सभी बुजुर्गों की वर्जना थी - ‘खंडहर में मत जाना, भूत रहते हैं.’ वैसे सुरेश के परिवार के प्रति सुजाता के घरवालों तथा गली के अन्य परिवारों की राय अच्छी न थी. परंतु गली के बच्चों का विशेष रूप से सुजाता का सुरेश के साथ खेले बिना काम न चलता. सुरेश की छठीं बहन मनभरी से भी सुजाता का बहुत मेल था. सुरेश छह बहनों का इकलौता सबसे छोटा लड़का था. उसके पिता दूध बेचकर परिवार पालते थे. थोड़ी खेती भी थी, पर पैदावार कम ही थी. बड़ी गरीबी व अभाव में पला था सुरेश, परंतु पढ़ाई में तेज होने के कारण निरंतर प्रथम आता तथा छात्रवृत्ति पाता था.

सुरेश और सुजाता दसवीं कक्षा में थे शायद जब मनभरी का विवाह हो गया. सुजाता को घर से निकलने के अवसर अब कम ही मिलते थे. दादी जी का आदेश था - “बहुत हो गए खेल तमाशे. अब घर के काम-काज, लक्खन-शऊर सीखो! दूसरे घर जाना है.”

अतीत की ग़लियों में न जाने सुजाता कितनी देर घूमती, किन्तु अनुपम ऑफ़िस से आ गया और बोला - “क्या हुआ मम्मी, किस सोच में डूबी हो?”

“कुछ नहीं, बस यूँ ही अपने और सुरेश के बचपन को याद कर रही थी. तुम्हारे मामा जी का फोन आया था – उर्वी के लिए लड़का बता रहा था. मैंने कह दिया कि उसका रिश्ता तो सुरेश के पोते अनुरूद्ध से पक्का हो गया है.”

‘मम्मी अभी तो बात ही की है आपने, पक्का कहाँ से हो गया? मामा जी से भी पूछ लेना चाहिए था. एक दो लड़के निगाह में रहें तो बुरा क्या है?’

‘अनिरुद्ध जैसा सुयोग्य लड़का कहाँ मिलेगा? सुरेश जैसा भलामानस आज की दुनिया में मिलेगा कहाँ? कितना संघर्ष किया, कितनी उन्नति की है! तूने तो देखी है न वह शुगर मिल जिसका वह जी. एम. था. उसके दोनों बेटे नरेश और प्रवेश स्थापित डॉक्टर हैं, दामाद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर है, पोता चौबीस साल की उम्र में ही कैप्टन बन गया. शानदार महल सा बँगला, चार-चार गाड़ियाँ, आम-अमरूद के लाखों की आय देने वाले बाग़. फिर भी कितना विनम्र है बंदा! उड़द पर सफेदी जितना भी घमण्ड नहीं है उसे.’ सुजाता एक ही सांस में कह गई.

“यही तो सोचना है कि अब वे इतने पैसे वाले हैं, इतने ठाठ-बाट हैं उनके तो...” अनुपम ने कहा, पर सुजाता उसकी बात काटती हुई बोली - “तो क्या? तू तो जानता है कि सुरेश कितना मानता है हमें! अपने यहाँ के हर फंक्शन में कितने आदर-प्यार से बुलाता है. हर होली-दीवाली मिलने आता है. कई बार कह चुका है- ‘सुजाता मैं तो चाहता हूँ कि हमारी बचपन की मित्रता रिश्तेदारी बनकर आगे भी चलती रहे.”

“मम्मी, सुरेश मामा जी की बात और है पर उनके बेटे-पोते तो अमीरी में ही पले-बढ़े हैं. उनके विचार भी अपने पिता या दादा जी जैसे हों, यह आवश्यक तो नहीं.”

अनुपम ने अपना सन्देह जाहिर किया. पर सुजाता ने यह कह कर बात समाप्त कर दी -“अरे तो मेरी पोती क्या ऐसी-वैसी है? रूप में लक्ष्मी, बुद्धि में सरस्वती, जे.एन.यू से एम.एस.सी किया है उर्वी ने. कोई भी उसे पाकर स्वयं को कृतार्थ समझेगा.”

अमिता पति और सास की मीठी नोंक-झोंक पर पटाक्षेप करती हुई बोली- “अब आप लोग चाय-पकौड़ों का आनन्द लीजिए. लो पापा भी आ गए.”

बसंत पंचमी का दिन था. सुजाता का बँगला बासंती फूलों और पर्दों से सजा था. सुरेश का परिवार उर्वी की मंगनी करने को आ रहा था. सुजाता के निकट संबंधी रात को ही आ गए थे. क्योंकि वर पक्ष ने ग्यारह बजे का समय बताया था आने का. पहले नाश्ता फिर लंच. सभी बड़े उत्साहित-उत्कंठित थे. प्रतीक्षा की घड़ियां वैसे ही लम्बी होती हैं, पर यहाँ तो दो बज गए. सभी बेचैन हो रहे थे. सुजाता के पति झुंझला रहे थे- “यार! भारत के लोग समय का मूल्य कब समझेंगे? ये नवकुबेर तो किसी की परवाह करना जानते ही नहीं. आने दो सुरेश को, कहूँगा- क्यों बे साले!...”

अनुपम घबराकर बोला-‘पापा प्लीज, ऐसा कुछ मत कहिएगा. अब हम लड़की वाले हैं.’

उसकी घबराहट देख सभी हँस पड़े. तनाव के बादल कुछ छंटे. तभी गेट पर गाड़ी रूकती दिखाई दी. सभी लपककर अगवानी के लिए पंहुचे. आठ-दस गाड़ियाँ थीं. नरेश-प्रवेश का परिवार, नरेश के ससुराल वाले. सुरेश और उसकी पत्नी प्रमिला नहीं थे. सुजाता ने कहा-“बड़ी देर कर दी नरेश! पापा-मम्मी और भी देर से आएंगे क्या?”

“आंटी, पापा की तबीयत खराब थी, मम्मी उन्हें छोड़कर कैसे आतीं?”

उत्तर दिया नरेश की पत्नी, अनिरुद्ध की मां ने. सुजाता को अच्छा नहीं लगा, पर क्या उपाय था. अतिथियों को हाल में बिठा दिया. बैरे ड्रिंक्स स्नैक्स सर्व कर रहे थे. परिचय का दौर चल रहा था. सुजाता को बोलना पड़ा- “पहले आप लोग भोजन कर लें. काफी देर हो चुकी है.”

लॉन में ही मेजें लगाई गईं थीं. बड़े नखरे से वे लोग बाहर पधारे. हालांकि बाहर मौसम बहुत खुशगवार था. हवा में शीतलता थी, पर गुनगुनी धूप सुहावनी लग रही थी. पुरूष पर्ग सूट-बूट में डटा था, पर महिलाएँ! वे प्रायः सभी अजीबोगरीब परिधान, केश सज्जा व प्रसाधन में किसी पिक्चर के प्रीमियर का सा दृश्य उपस्थित कर रही थीं. उनकी भड़कीली पोशाकें आभिजात्य को उजागर करने में असमर्थ थीं. हाँ, उनके अंगों को अनावृत कर उनकी अभिरूचि व मनोवृत्ति को अवश्य दर्शा रही थीं.

अनिरूद्ध अपने मित्रों के साथ अपनी मौसी की बगल में बैठा था. मौसी ने कटस्लीव व डीप गले की शर्ट और पैरेलल पहना हुआ था. भांजे के इशारे पर अंग्रेजी नुमा हिन्दी में बोली- “हे! पहले ब्राइड को तो बुलाओ. काहां छीपा के रखा हय?”

किसी ने दहला फेंका- “शायद अभी वो ब्यूटी पार्लर से नहीं आई.”

सुजाता ने क्रोध दबाकर इतना ही कहा- “उर्वी ब्यूटी पार्लर नहीं जाती न ही उसे वहाँ जाने की आवश्यकता है. प्रज्ञा, जाओ उर्वी को ले आओ.” उर्वी आ गई तो जैसे बसंत ऋतु सशरीर उपस्थित हो गई. मैरून किनारे की बाती साड़ी, नितंब चुंबी केशों की ढीली-सी बेरी में पीले गुलाबों का गजरा, न कोई मेकअप न आभूषण, मंद मंद पग धरती सबके बीच में आ खड़ी हुई. अपनी सलज्ज सीपी-सी पलकों को उठा, कोमल हाथों को जोड़कर जब उसने ‘नमस्कार’ कहा तो जैसे वीणा के तार झंकृत हो उठे. एक बारगी सभी जैसे पलकें झपकाना भूल गए, परंतु सुजाता ने नोट किया- अनिरुद्ध के मुख पर मुग्धता का भाव नहीं था. क्रीम रंग का सूट पहने यद्यपि वह स्वयं भी राजकुमार-सा जंच रहा था, परंतु उर्वी तो स्वर्ग से उतरी अप्सरा को भी मात दे रही थी. उस मौन को तोड़ा अनिरुद्ध के मित्र की आवाज ने- “यार केप्टन! अब तो तुझे तपोवन में जाना पड़ेगा.”

हल्का सा हंसी का फव्वारा छूटा. बार-बार आग्रह करने पर खाना शुरू हुआ. अनिरूद्ध की मौसी-मामियों को जैसे कुछ भा ही नहीं रहा था. व्यंजनों से भरी-भरी प्लेटें टेबल के नीचे सरकाई जा रही थीं. अनुपम ने सबसे मंहगे व बढ़िया होटल से खाने की व्यवस्था कराई थी. सुजाता के शिक्षित सुसंस्कारित परिवार को यह गंवारपन देख कर बड़ी कोफ्त हो रही थी. सुजाता का संवेदनशील हृदय कह रहा था- ‘हजारों लोग यहाँ भूखे सो जाते हैं और कुछ बेरहम अन्न का ऐसा अनादर करते हैं.’ पर अवसर की नजाकत को देख मौन साधना पड़ रहा था.

एक कमरे में काफी देर तक विचार-विमर्श करने के पश्चात् नरेश की पत्नी ने एंगेजमेंट की रस्म पूरी की. नरेश बहुत गम्भीर था और अनिरूद्ध उखड़ा-उखड़ा. ऐसे मूड में ही उसने अंगूठी पहनी व पहनाई. महिलाएँ सब व्यंग्य-विद्रूप से भरी हुई थीं. उनके व्यवहार में अमीरी का फूहड़ दिखावा था. सुजाता परिवार के महंगे व सुरूचिपूर्ण उपहारों को भी बड़ी उपेक्षा से स्वीकार किया उन्होंने.

उनको विदा करते-करते सुजाता तन-मन से थककर चूर हो चुकी थी. औरों की हालत भी ऐसी ही थी. सभी के दिलों में कुछ खटक रहा था, पर उस अव्यक्त को कोई व्यक्त नहीं कर पा रहा था, अथवा करना नहीं चाह रहा था.

सुजाता सोच रही थी कि सुरेश अपने न आ सकने का कारण बताने की औपचारिकता तो निभाएगा ही. वह तब कहेगी- “हाँ भई! अब तुम लड़के वाले हो, वर के दादा हो, नखरे तो दिखाओगे ही.” तभी विवाह की तिथि के विषय में भी बात कर लेगी. परंतु दो-तीन दिन बीत गए, सुरेश के यहाँ से फोन नहीं आया. कई विचार उसके मन-मष्तिष्क को मथने लगे. उसने फोन किया. उधर नरेश ने फोन उठाया. सुजाता ने कहा- “जरा सुरेश को फोन दो नरेश!”

“आंटी पापा को तो हार्ट-अटैक हो गया है.” सुजाता को झटका लगा-“कब? कहाँ? घर पर हैं या हॉस्पिटल में? आते हैं हम लोग.”

“नहीं नहीं, प्लीज आप लोग मत आइए.” नरेश जैसे घबराकर जल्दी से बोला.

“क्या कह रहे हो तुम? सुरेश को हार्ट-अटैक हुआ है और हम आएं भी नहीं.” सुजाता चकरा कर बोली.

“क्या बताएँ? आंटी आपको तो बताना ही पड़ेगा.” अटकते रुकते नरेश ने कहना प्रारंभ किया- “बात यह है कि पापा अनिरूद्ध के रिश्ते को लेकर बहुत अपसेट हैं. आपसे कुछ कह नहीं सकते. आप तो जानती हैं कि आजकल के बच्चे अपने फैसले आप करते हैं. वे मां-बाप को ही नहीं गिनते, दादा-दादी की कौन कहे? अनिरूद्ध मिलिट्री में कैप्टन है, वह कहता है मुझे तो मॉड लड़की चाहिए, कोई शकुंतला नहीं. वेरी सॉरी आंटी! आप कभी आकर अपना सामान ले जाएं, हमारा दे जाएं. पापा से कुछ मत कहिएगा- हम खाने-पीने का खर्चा भी दे देंगे.”

सुजाता के हाथ से फोन छूट गया और वह गिरा वहीं मेज पर सजे उर्वी के बनाए मॉडल पर. छनाक की आवाज के साथ मॉडल टूट गया और कांच बिखर गया. सुजाता के मुँह से निकला - “हाय राम! ये क्या हो हुआ?”

उर्वी दौड़ी आई- “दादी मां, जाने दो! कांच का था, टूट गया. और बन जाएगा. यह बताओ आपको कांच चुभा तो नहीं?”

कैसे कहे सुजाता- एक मॉडल, एक आदर्श जिसे वह बचपन से सहेजती आ रही थी, संजोती आ रही थी, बेशकीमती था उसके लिए, वह टूटकर बिखरा ही नहीं, उसकी किरचें चुभकर आहत कर गई हैं उसे कहीं बहुत गहरे तक!

सुशांत ठीक कहता था- संस्कार नहीं बदलते. सुरेश ने गुम्बज का खंडहर तो तुड़वा दिया, परंतु फिर भी संस्कारों की गली का बंद द्वार नहीं खुलवा सका- सुजाता ने सोचा. एक दीर्घ सांस निकल गई उसके मुख से.
**-**-**

कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.
पुष्पा रघु की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर पढ़ें – श्रद्धांजलि – (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_13.html ) तथा बूढ़ा बचपन (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_08.html )

चित्र सौजन्य- सृजन कैमरा क्लब, रतलाम

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर: 3
  1. कहानी बहुत अच्छी लगी। परन्तु एक बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहेंगे। कहानी के प्रारम्भ में लिखा है "पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार"
    परन्तु कहानी के अन्त में लेखिका का नाम मीरा शलभ दिया गया है, कृपया इसे देख लें।
    सारिका

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस गंभीर गलती की ओर इंगित करने के लिए सारिका जी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया.

    कहानी अच्छी लगी इसके लिए पुष्पा जी बधाई की पात्र हैं. आपका संदेश उन तक पहुँचा दिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह कहानी बदलती हुई पीढ़ी को बयां करती है..

    उत्तर देंहटाएं

-----****-----

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1

.... प्रायोजक ....

-----****-----

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच करें : ~

* कहानी  || * उपन्यास || * हास्य-व्यंग्य  || * कविता  || * आलेख  || * लोककथा  || * लघुकथा  || * ग़ज़ल  || * संस्मरण  || * साहित्य समाचार  || * कला जगत  || * पाक कला  || * हास-परिहास  || * नाटक  || * बाल कथा  || * विज्ञान कथा  ||  * समीक्षा  ||

---***---


|आपके लिए कुछ चुनिंदा रचनाएँ_$type=complex$count=8$src=random$page=1$va=0$au=0

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3864,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,337,ईबुक,192,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2811,कहानी,2136,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,489,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,90,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,348,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,327,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,50,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,9,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,18,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,238,लघुकथा,862,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,24,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,62,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1932,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,659,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,703,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,61,साहित्यम्,2,साहित्यिक गतिविधियाँ,186,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,58,हास्य-व्यंग्य,69,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार
पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार
http://photos1.blogger.com/blogger/4284/450/320/bandgali.jpg
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_08.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_08.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ