गुरुवार, 8 सितंबर 2005

पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार



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बन्द गली का द्वार

-पुष्पा रघु

‘ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन’ फोन की घंटी बजी तो सुजाता यह कहते हुए लपकी - ‘लंबी घंटी है. लगता है कहीं दूर का फोन है’ - “हलो! हाँ, सुशांत, सुनाओ क्या हाल है?” उसका अनुमान ठीक ही था. लखनऊ से उसके भाई सुशांत का फोन था- “दीदी यहाँ उर्वी के लिए एक लड़का है – बैंक मैनेजर, परिवार भी सुशिक्षित, संस्कारित है.” सुजाता ने कहा- “पर उर्वी के लिए तो सुरेश के पोते से बात हो गई है. कैप्टन है. हां हां, वही अपनी गली वाला सुरेश.”

“नई दिल्ली की खुली हवा में रही उर्वी को कहाँ भेज रही हो दीदी? बंद गली के अंतिम छोर पर उनका वह सीलन भरा अँधेरा मकान! कैसे रह पाएगी वह?” सुशांत बोला.

“तुम तीस-पैंतीस साल पहले की बात कर रहे हो. सुशांत! उस गली और उस मकान को तुम अब देखो तो पहचान ही न पाओ. क्या आलीशान बँगला बनवाया है सुरेश ने! गली के अंत में जो खंडहर था, उसे तुड़वाकर उधर भी द्वार खुलवा दिया है.” सुजाता ने उत्तर दिया.

“फिर भी दीदी कहाँ हमारा परिवार और कहाँ एक दूध वाले का परिवार! पैसा होने से संस्कार तो नहीं बदल जाते.” चिंता जताई सुशांत ने.

“नहीं सुशांत! मैं नहीं मानती इन बातों को. सुरेश को मैं बचपन से ही जानती हूँ. कोई कमी नहीं है उसमें. देखाभाला परिवार, सुंदर-योग्य लड़का और क्या चाहिए? बीते कल को पकड़कर क्यों बैठें? फिर हमें तो मानता भी बहुत है.” सुजाता बोली. फिर सोचने लगी- यह बात तो सत्य है कि सुरेश दूधवाले का लड़का है, पर लगन-परिश्रम, बुद्धि, विनम्रता से कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया! – सुजाता स्मृति के पंखों पर सवार हो पहुँच गई अतीत के उपवन में – सुजाता का घर और सुरेश का घर था तो एक ही गली में, पर सुजाता का घर था गली के मुख्य द्वार से सटा, जहाँ गली बहुत खुली और चौड़ी थी. खूब बड़ा आलीशान मकान था और बाहर था एक चौड़ा चबूतरा. सारे दिन वहाँ बच्चे खेलते. सर्दी की दोपहरी में दादियों-ताइयों की पंचायत जुड़ती थी वहाँ और शाम को सजती सुजाता के ताऊ जी की हुक्का महफिल! सुजाता को आज भी वह सोंधी सुगंध याद है, जब गर्मियों में शाम को नौकर के चबूतरे पर छिड़काव करने से उठती थी. ठंडक करने के बाद वहाँ मूढ़े और चारपाई डाल दी जातीं. गली के बुजुर्ग वहाँ बैठ गपशप करते, हुक्का गुड़गुड़ाते और बैठक में बजते रेडियो से समाचार अथवा देहाती कार्यक्रम सुनते.

सुरेश का घर गली के अंतिम सिरे पर था. वहाँ गली बहुत संकरी और बंद थी. छोटा सा मकान था – दो-तीन कोठरी, एक कोठा, दो खटिया का आँगन. न सूर्य का प्रकाश न बिजली का. उस घर के साथ एक टूटा-फूटा गुम्बज था, जिसने गली का अन्तिम सिरा बंद कर रखा था. बड़ा ही डरावना और रहस्यमय था वह गुम्बज का खंडहर!

सभी बुजुर्गों की वर्जना थी - ‘खंडहर में मत जाना, भूत रहते हैं.’ वैसे सुरेश के परिवार के प्रति सुजाता के घरवालों तथा गली के अन्य परिवारों की राय अच्छी न थी. परंतु गली के बच्चों का विशेष रूप से सुजाता का सुरेश के साथ खेले बिना काम न चलता. सुरेश की छठीं बहन मनभरी से भी सुजाता का बहुत मेल था. सुरेश छह बहनों का इकलौता सबसे छोटा लड़का था. उसके पिता दूध बेचकर परिवार पालते थे. थोड़ी खेती भी थी, पर पैदावार कम ही थी. बड़ी गरीबी व अभाव में पला था सुरेश, परंतु पढ़ाई में तेज होने के कारण निरंतर प्रथम आता तथा छात्रवृत्ति पाता था.

सुरेश और सुजाता दसवीं कक्षा में थे शायद जब मनभरी का विवाह हो गया. सुजाता को घर से निकलने के अवसर अब कम ही मिलते थे. दादी जी का आदेश था - “बहुत हो गए खेल तमाशे. अब घर के काम-काज, लक्खन-शऊर सीखो! दूसरे घर जाना है.”

अतीत की ग़लियों में न जाने सुजाता कितनी देर घूमती, किन्तु अनुपम ऑफ़िस से आ गया और बोला - “क्या हुआ मम्मी, किस सोच में डूबी हो?”

“कुछ नहीं, बस यूँ ही अपने और सुरेश के बचपन को याद कर रही थी. तुम्हारे मामा जी का फोन आया था – उर्वी के लिए लड़का बता रहा था. मैंने कह दिया कि उसका रिश्ता तो सुरेश के पोते अनुरूद्ध से पक्का हो गया है.”

‘मम्मी अभी तो बात ही की है आपने, पक्का कहाँ से हो गया? मामा जी से भी पूछ लेना चाहिए था. एक दो लड़के निगाह में रहें तो बुरा क्या है?’

‘अनिरुद्ध जैसा सुयोग्य लड़का कहाँ मिलेगा? सुरेश जैसा भलामानस आज की दुनिया में मिलेगा कहाँ? कितना संघर्ष किया, कितनी उन्नति की है! तूने तो देखी है न वह शुगर मिल जिसका वह जी. एम. था. उसके दोनों बेटे नरेश और प्रवेश स्थापित डॉक्टर हैं, दामाद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर है, पोता चौबीस साल की उम्र में ही कैप्टन बन गया. शानदार महल सा बँगला, चार-चार गाड़ियाँ, आम-अमरूद के लाखों की आय देने वाले बाग़. फिर भी कितना विनम्र है बंदा! उड़द पर सफेदी जितना भी घमण्ड नहीं है उसे.’ सुजाता एक ही सांस में कह गई.

“यही तो सोचना है कि अब वे इतने पैसे वाले हैं, इतने ठाठ-बाट हैं उनके तो...” अनुपम ने कहा, पर सुजाता उसकी बात काटती हुई बोली - “तो क्या? तू तो जानता है कि सुरेश कितना मानता है हमें! अपने यहाँ के हर फंक्शन में कितने आदर-प्यार से बुलाता है. हर होली-दीवाली मिलने आता है. कई बार कह चुका है- ‘सुजाता मैं तो चाहता हूँ कि हमारी बचपन की मित्रता रिश्तेदारी बनकर आगे भी चलती रहे.”

“मम्मी, सुरेश मामा जी की बात और है पर उनके बेटे-पोते तो अमीरी में ही पले-बढ़े हैं. उनके विचार भी अपने पिता या दादा जी जैसे हों, यह आवश्यक तो नहीं.”

अनुपम ने अपना सन्देह जाहिर किया. पर सुजाता ने यह कह कर बात समाप्त कर दी -“अरे तो मेरी पोती क्या ऐसी-वैसी है? रूप में लक्ष्मी, बुद्धि में सरस्वती, जे.एन.यू से एम.एस.सी किया है उर्वी ने. कोई भी उसे पाकर स्वयं को कृतार्थ समझेगा.”

अमिता पति और सास की मीठी नोंक-झोंक पर पटाक्षेप करती हुई बोली- “अब आप लोग चाय-पकौड़ों का आनन्द लीजिए. लो पापा भी आ गए.”

बसंत पंचमी का दिन था. सुजाता का बँगला बासंती फूलों और पर्दों से सजा था. सुरेश का परिवार उर्वी की मंगनी करने को आ रहा था. सुजाता के निकट संबंधी रात को ही आ गए थे. क्योंकि वर पक्ष ने ग्यारह बजे का समय बताया था आने का. पहले नाश्ता फिर लंच. सभी बड़े उत्साहित-उत्कंठित थे. प्रतीक्षा की घड़ियां वैसे ही लम्बी होती हैं, पर यहाँ तो दो बज गए. सभी बेचैन हो रहे थे. सुजाता के पति झुंझला रहे थे- “यार! भारत के लोग समय का मूल्य कब समझेंगे? ये नवकुबेर तो किसी की परवाह करना जानते ही नहीं. आने दो सुरेश को, कहूँगा- क्यों बे साले!...”

अनुपम घबराकर बोला-‘पापा प्लीज, ऐसा कुछ मत कहिएगा. अब हम लड़की वाले हैं.’

उसकी घबराहट देख सभी हँस पड़े. तनाव के बादल कुछ छंटे. तभी गेट पर गाड़ी रूकती दिखाई दी. सभी लपककर अगवानी के लिए पंहुचे. आठ-दस गाड़ियाँ थीं. नरेश-प्रवेश का परिवार, नरेश के ससुराल वाले. सुरेश और उसकी पत्नी प्रमिला नहीं थे. सुजाता ने कहा-“बड़ी देर कर दी नरेश! पापा-मम्मी और भी देर से आएंगे क्या?”

“आंटी, पापा की तबीयत खराब थी, मम्मी उन्हें छोड़कर कैसे आतीं?”

उत्तर दिया नरेश की पत्नी, अनिरुद्ध की मां ने. सुजाता को अच्छा नहीं लगा, पर क्या उपाय था. अतिथियों को हाल में बिठा दिया. बैरे ड्रिंक्स स्नैक्स सर्व कर रहे थे. परिचय का दौर चल रहा था. सुजाता को बोलना पड़ा- “पहले आप लोग भोजन कर लें. काफी देर हो चुकी है.”

लॉन में ही मेजें लगाई गईं थीं. बड़े नखरे से वे लोग बाहर पधारे. हालांकि बाहर मौसम बहुत खुशगवार था. हवा में शीतलता थी, पर गुनगुनी धूप सुहावनी लग रही थी. पुरूष पर्ग सूट-बूट में डटा था, पर महिलाएँ! वे प्रायः सभी अजीबोगरीब परिधान, केश सज्जा व प्रसाधन में किसी पिक्चर के प्रीमियर का सा दृश्य उपस्थित कर रही थीं. उनकी भड़कीली पोशाकें आभिजात्य को उजागर करने में असमर्थ थीं. हाँ, उनके अंगों को अनावृत कर उनकी अभिरूचि व मनोवृत्ति को अवश्य दर्शा रही थीं.

अनिरूद्ध अपने मित्रों के साथ अपनी मौसी की बगल में बैठा था. मौसी ने कटस्लीव व डीप गले की शर्ट और पैरेलल पहना हुआ था. भांजे के इशारे पर अंग्रेजी नुमा हिन्दी में बोली- “हे! पहले ब्राइड को तो बुलाओ. काहां छीपा के रखा हय?”

किसी ने दहला फेंका- “शायद अभी वो ब्यूटी पार्लर से नहीं आई.”

सुजाता ने क्रोध दबाकर इतना ही कहा- “उर्वी ब्यूटी पार्लर नहीं जाती न ही उसे वहाँ जाने की आवश्यकता है. प्रज्ञा, जाओ उर्वी को ले आओ.” उर्वी आ गई तो जैसे बसंत ऋतु सशरीर उपस्थित हो गई. मैरून किनारे की बाती साड़ी, नितंब चुंबी केशों की ढीली-सी बेरी में पीले गुलाबों का गजरा, न कोई मेकअप न आभूषण, मंद मंद पग धरती सबके बीच में आ खड़ी हुई. अपनी सलज्ज सीपी-सी पलकों को उठा, कोमल हाथों को जोड़कर जब उसने ‘नमस्कार’ कहा तो जैसे वीणा के तार झंकृत हो उठे. एक बारगी सभी जैसे पलकें झपकाना भूल गए, परंतु सुजाता ने नोट किया- अनिरुद्ध के मुख पर मुग्धता का भाव नहीं था. क्रीम रंग का सूट पहने यद्यपि वह स्वयं भी राजकुमार-सा जंच रहा था, परंतु उर्वी तो स्वर्ग से उतरी अप्सरा को भी मात दे रही थी. उस मौन को तोड़ा अनिरुद्ध के मित्र की आवाज ने- “यार केप्टन! अब तो तुझे तपोवन में जाना पड़ेगा.”

हल्का सा हंसी का फव्वारा छूटा. बार-बार आग्रह करने पर खाना शुरू हुआ. अनिरूद्ध की मौसी-मामियों को जैसे कुछ भा ही नहीं रहा था. व्यंजनों से भरी-भरी प्लेटें टेबल के नीचे सरकाई जा रही थीं. अनुपम ने सबसे मंहगे व बढ़िया होटल से खाने की व्यवस्था कराई थी. सुजाता के शिक्षित सुसंस्कारित परिवार को यह गंवारपन देख कर बड़ी कोफ्त हो रही थी. सुजाता का संवेदनशील हृदय कह रहा था- ‘हजारों लोग यहाँ भूखे सो जाते हैं और कुछ बेरहम अन्न का ऐसा अनादर करते हैं.’ पर अवसर की नजाकत को देख मौन साधना पड़ रहा था.

एक कमरे में काफी देर तक विचार-विमर्श करने के पश्चात् नरेश की पत्नी ने एंगेजमेंट की रस्म पूरी की. नरेश बहुत गम्भीर था और अनिरूद्ध उखड़ा-उखड़ा. ऐसे मूड में ही उसने अंगूठी पहनी व पहनाई. महिलाएँ सब व्यंग्य-विद्रूप से भरी हुई थीं. उनके व्यवहार में अमीरी का फूहड़ दिखावा था. सुजाता परिवार के महंगे व सुरूचिपूर्ण उपहारों को भी बड़ी उपेक्षा से स्वीकार किया उन्होंने.

उनको विदा करते-करते सुजाता तन-मन से थककर चूर हो चुकी थी. औरों की हालत भी ऐसी ही थी. सभी के दिलों में कुछ खटक रहा था, पर उस अव्यक्त को कोई व्यक्त नहीं कर पा रहा था, अथवा करना नहीं चाह रहा था.

सुजाता सोच रही थी कि सुरेश अपने न आ सकने का कारण बताने की औपचारिकता तो निभाएगा ही. वह तब कहेगी- “हाँ भई! अब तुम लड़के वाले हो, वर के दादा हो, नखरे तो दिखाओगे ही.” तभी विवाह की तिथि के विषय में भी बात कर लेगी. परंतु दो-तीन दिन बीत गए, सुरेश के यहाँ से फोन नहीं आया. कई विचार उसके मन-मष्तिष्क को मथने लगे. उसने फोन किया. उधर नरेश ने फोन उठाया. सुजाता ने कहा- “जरा सुरेश को फोन दो नरेश!”

“आंटी पापा को तो हार्ट-अटैक हो गया है.” सुजाता को झटका लगा-“कब? कहाँ? घर पर हैं या हॉस्पिटल में? आते हैं हम लोग.”

“नहीं नहीं, प्लीज आप लोग मत आइए.” नरेश जैसे घबराकर जल्दी से बोला.

“क्या कह रहे हो तुम? सुरेश को हार्ट-अटैक हुआ है और हम आएं भी नहीं.” सुजाता चकरा कर बोली.

“क्या बताएँ? आंटी आपको तो बताना ही पड़ेगा.” अटकते रुकते नरेश ने कहना प्रारंभ किया- “बात यह है कि पापा अनिरूद्ध के रिश्ते को लेकर बहुत अपसेट हैं. आपसे कुछ कह नहीं सकते. आप तो जानती हैं कि आजकल के बच्चे अपने फैसले आप करते हैं. वे मां-बाप को ही नहीं गिनते, दादा-दादी की कौन कहे? अनिरूद्ध मिलिट्री में कैप्टन है, वह कहता है मुझे तो मॉड लड़की चाहिए, कोई शकुंतला नहीं. वेरी सॉरी आंटी! आप कभी आकर अपना सामान ले जाएं, हमारा दे जाएं. पापा से कुछ मत कहिएगा- हम खाने-पीने का खर्चा भी दे देंगे.”

सुजाता के हाथ से फोन छूट गया और वह गिरा वहीं मेज पर सजे उर्वी के बनाए मॉडल पर. छनाक की आवाज के साथ मॉडल टूट गया और कांच बिखर गया. सुजाता के मुँह से निकला - “हाय राम! ये क्या हो हुआ?”

उर्वी दौड़ी आई- “दादी मां, जाने दो! कांच का था, टूट गया. और बन जाएगा. यह बताओ आपको कांच चुभा तो नहीं?”

कैसे कहे सुजाता- एक मॉडल, एक आदर्श जिसे वह बचपन से सहेजती आ रही थी, संजोती आ रही थी, बेशकीमती था उसके लिए, वह टूटकर बिखरा ही नहीं, उसकी किरचें चुभकर आहत कर गई हैं उसे कहीं बहुत गहरे तक!

सुशांत ठीक कहता था- संस्कार नहीं बदलते. सुरेश ने गुम्बज का खंडहर तो तुड़वा दिया, परंतु फिर भी संस्कारों की गली का बंद द्वार नहीं खुलवा सका- सुजाता ने सोचा. एक दीर्घ सांस निकल गई उसके मुख से.
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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.
पुष्पा रघु की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर पढ़ें – श्रद्धांजलि – (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_13.html ) तथा बूढ़ा बचपन (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_08.html )

चित्र सौजन्य- सृजन कैमरा क्लब, रतलाम

3 blogger-facebook:

  1. कहानी बहुत अच्छी लगी। परन्तु एक बात की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहेंगे। कहानी के प्रारम्भ में लिखा है "पुष्पा रघु की कहानीः बन्द गली का द्वार"
    परन्तु कहानी के अन्त में लेखिका का नाम मीरा शलभ दिया गया है, कृपया इसे देख लें।
    सारिका

    उत्तर देंहटाएं
  2. इस गंभीर गलती की ओर इंगित करने के लिए सारिका जी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया.

    कहानी अच्छी लगी इसके लिए पुष्पा जी बधाई की पात्र हैं. आपका संदेश उन तक पहुँचा दिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह कहानी बदलती हुई पीढ़ी को बयां करती है..

    उत्तर देंहटाएं

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