मोहन द्विवेदी की हास्य - व्यंग्य कविताएँ

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हास्य - व्यंग्य कविताएँ
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पीर हरो नेताजी!
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भूखी आँखें सूखे ओंठ देख रहे हैं तेरी ओर,
इनकी पीर हरो नेताजी।।

शादी को है घर में बाला,
नहीं निवाला इतना ठाला।
यह तो है गरीब का कम्बल,
जितना धोता उतना काला।

तू भी काला फिर भी माला फेंक रहे सब तेरी ओर,
अब तो शरम करो नेताजी।।

हम गुदड़ी में जीने वाले,
नहीं चाहिए शाल दुशाले।
जी.डी.पी. को हम क्या जानें,
हमको तो रोटी के लाले।

वर्षों से प्यासी धरती पर मचा रही मानवता शोर,
कुछ तो रहम करो नेताजी।।

कमर लँगोटी हाथ लकुटिया,
घर क्या है बस टूटी टटिया।
बिखरे बर्तन बुझता चूल्हा,
द्वार पड़ी पुश्तैनी खटिया।

आंखों में अंधियारी छाई घूर रहे कब होगी भोर,
कितनी धीर धरें नेताजी।।

सब हाथों को काम चाहिए,
और नहीं आराम चाहिए।
बेसुर की सब तानें छोड़ो,
आशा को अंजाम चाहिए।

बहुत हो गया कुछ तो सोचो मुड़कर देखो मेरी ओर,
दूर अभी दिल्ली नेताजी।

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जेब की महिमा
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एक दिन राह में, कुछ पाने की चाह में, भटक रहा था...
सहसा, खोपड़ी में कोई बात खटकी,
सीधे जेब में आकर अटकी. मैं सोचने लगा...
आदमी की जेब भी क्या चीज़ होती है?
कभी पाती है, कभी खोती है, कभी जागती है, कभी सोती है,
कभी हँसती है, कभी रोती है।

नरम हो या गरम, हल्की हो या भारी, प्राइवेट हो या सरकारी,
अमीर हो या गरीब यह रहती है दिल के करीब।
प्रारम्भ में जिसने भी जेब बनाई होगी,
आइंस्टीन से भी ज्यादा बुद्धि लगाई होगी।
यदि जेब न होती, सारी दुनिया सोती,
भविष्य की चिन्ताएँ मुँह मोड़ चुकी होतीं,
बहुत सी कलाएँ और प्रतिमाएँ दम तोड़ चुकी होतीं।

राजनीति का फन्दा न होता, परेशान कोई बन्दा न होता,
आँख वाला अंधा नहीं होता, जेबकतरों का धंधा न होता,
हाथ की सफाई न होती, देवर की भौजाई न होती,
मर्द की लुगाई न होती, कुंवारे की सगाई न होती,
आपस में बुराई न होती, अमीर और गरीब के बीच खाई न होती।

जेब सर्दी में ठंड से बचाती है, गर्मी बढ़ाती है, झिझक मिटाती है,
हाथों को टिकाती है, सिद्धांतों को डिगाती है।
रेलगाड़ी में, बस में, खाली में-ठसाठस में,
जाने-अनजाने में, कचहरी में-थाने में, नाच और गाने में,
स्टेशन में, दुकान में, सार्वजनिक स्थान में,
जहाँ भी जाता हूँ, लिखा हुआ पाता हूँ-
‘मेरा भारत महान’, ‘जेब कतरों से सावधान’।

पढ़ते ही दिमाग गड़बड़ाता है, हाथ हड़बड़ाता है,
सीधे जेब में जाता है, टटोल कर पता लगाता है,
बची है कि कट गयी, उतनी ही है कि घट गयी।

अकसर मेरे साथ यह होता है, जब कहीं जाता हूँ,
लोगों की निगाह बचाकर, हाथ जेब में घुसाता हूँ,
हाथ से तुड़े-मुड़े नोट का अनुमान लगाता हूँ,
थोड़ी-थोड़ी देर में यही क्रिया दोहराता हूँ।
बिना कटे, बिना लुटे जब घर आता हूँ,
पत्नी को जेब की ओर झांकते पाता हूँ.

जेब के अनुसार, होता है पत्नी का व्यवहार,
जेब नरम तो पत्नी गरम, जेब गरम तो पत्नी नरम।
जेब पर निर्भर है अपना दाना-पानी,
कटु या मीठी बानी, बुढ़ापा या जवानी।
पत्नियाँ भी जेब के मामले में समझदार होती हैं,
हल्की हो तो बेवफा, भारी हो तो स्वामीभक्त होती हैं।
कुछ बेचारों की मजबूरी है, पत्नी की डांट से बचने हेतु,
जेब गरम रखना जरूरी है।

आपकी जेब से आपकी ज्ञानेंद्रियों का नजदीकी संबंध है,
चेहरे की चमक, मस्तिष्क में उत्साह, पैरों की चाल, हाथ का कमाल
आँखों में शुरूर, मन में गुरूर का जेब से अनुबंध है।
भरी जेब भूख कम करती है, तनाव घटाती है, ब्लडप्रेशर नीचे लाती है,
खाली जेब भूख बढ़ाती है, आदमी को ईमानदार बनाती है,
उसे साहित्यकार – रचनाकार बनाती है।

जहाँ तक दफ़्तरों का सवाल है भाई,
खाली जेब देखकर बाबू लेता है जम्हाई,
काम, कल पर टालता है, फ्री में झंझट कौन पालता है?
कुछ अनुभवी आँखें जेब का वज़न आँक लेती हैं,
बिना स्केल मोटाई नाप लेती हैं। इशारा पाते ही...
होंठ मुस्कराते हैं, हाथ खुजलाते हैं, बिना रुके आपको निपटाते हैं।

आप कहते हैं भ्रष्टाचार है, मैं कहता हूँ स्वदेशी व्यापार है,
आपसी सद्व्यवहार है।
जेब ही असली समाजवाद है, मिल बांट कर खाने का रिवाज है।
आपका पैसा है, चाहे ऊपर वाली जेब में रखें चाहे नीचे वाली,
चाहे टिकिट पैकेट में, चाहे पीछे वाली,
देश का पैसा है, देश की जेब में - चाहे मेरी – चाहे आपकी जेब में।

बड़ी-बड़ी जगहों पर यही जेब अटैची बन जाती है,
एसी कार से आती है, एसी कमरे में समा जाती है.
यह अमीर की अटैची है, गरीब की थैली है,
किसी की सफेद है, किसी की मैली है,
किसी की विकराल है, किसी की फटेहाल है,
किसी की काल है और किसी की ढाल है,
जेब के पीछे सारी दुनिया बेहाल है,
अपना भी यह जो हाल है, इस जेब का ही कमाल है।

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रचनाकार – टेक्नोक्रेट मोहन द्विवेदी की कविताएँ, गीत एवं कथा साहित्य देश की प्रतिष्ठित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. आपको अनेकों साहित्यिक सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं. आप काव्य मंचों में काव्यपाठ भी करते हैं.

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3 टिप्पणियाँ "मोहन द्विवेदी की हास्य - व्यंग्य कविताएँ"

  1. दोनो ही कवितायें बडी सुस्वादु लगीं । इनमें काफी तीखा मसाला है ।

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  2. बेनामी5:18 am

    These are great! Please keep it up.
    Thanks
    Subodh Sharma
    American Hindu Federation
    Los Angeles, California

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी1:00 am

    Very funny and cute. Please share more. Thanks.
    -Ajay Sharma
    Atlanta, USA

    उत्तर देंहटाएं

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