मंगलवार, 27 सितंबर 2005

रामनारायण मिश्र की कहानी : मंगल सूत्र


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कहानी : मंगलसूत्र

- रामनारायण मिश्र

चिलचिलाती गर्मी के सन्नाटे ने एक रहस्यमयी उदासी की मानिन्द पूरे वातावरण को घेर रखा था. विचित्र सी उखड़ी-उखड़ी तनहाई... आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े... हवा न चलने के तारण कहीं-कहीं स्थिर से चुपचाप पड़े थे. सूरज अत्यंत तेजी से चमक रहा था, ऐसा लग रहा था मानों आकाश मार्ग का यह जलता अग्नियात्री अत्यंत उग्र हो उठा हो. इस भयानक दहकते मौसम की गर्मी से दीपक के शरीर का प्रत्येक अंग झुलस-सा रहा था. उसे यह अहसास हो रहा था... इस झुलसती गर्मी से न सही, पर विषम परिस्थितियों से उत्पन्न खिन्नता से उसकी पत्नी व दो बच्चे अवश्य ही ग्रसित थे. ... दो साल से वह एक अर्ध-सरकारी प्रतिष्ठान में सुपरवाइजर के पद पर अस्थाई रूप से नौकरी कर रहा था. यह नौकरी उसे एक सिफारिसी-पत्र के आधार पर मिली थी. जिस समय वह इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स कर रहा था तभी उसके पिता ने उसका विवाह करवा दिया था, क्योंकि दीपक की मां की मृत्यु के पश्चात् कोई स्त्री घर में नहीं थी जो घर को संभाल लेती... परन्तु ट्रेनिंग पूरी होते-होते ही उसके पिता भी चल बसे थे. ... दो बच्चे और पत्नी, उसका परिवार... समस्याओं की दरिया में बहता डूबता दीपक लगातार प्रयासरत रहने पर भी उसकी नौकरी स्थाई नहीं हो पा रही थी. उसे लग रहा था कि संस्था के प्रबंधक की कार्यवाहियाँ कतई उसके विरोध में है. उसकी शर्तें न मारती है, न जिलाने के प्रति ही आश्वस्त करती है. बहुत चुपके से व्यवस्था उसका गला धीरे-धीरे लेत रही है और वह निरीह मुँह बाये पशु की मानिन्द चुपचाप अपनी हत्या होते देख रहा है. लगातार दो साल से वह मात्र आधे वेतन पर गुजर-बसर कर रहा था. जब एक सिफारिशी चिट्ठी लेकर प्रतिष्ठान के मैनेजर के पास पहुँचा था, तो मैनेजर साहब एक चालबाज बुद्धिजीवी की भांति सिर से पैर तक उसे देखते हुए बोले थे- “…देखिए, आज राज या मिस्री भले ही न मिल पाएँ, उन्हें ढूंढना पड़ सकता है, परन्तु .... ये डिग्री, सार्टिफिकेट वाले मारे मारे फिर रहे हैं. इनको नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं. ...बहुत बड़ी तादाद में आज हमारे देश में ये डिग्रीधारी बगल में डिग्रियाँ व सर्टिफिकेट दबाए नौकरी की तलाश में फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं मिल पाती नौकरी...”

बेकारी, बेरोजगारी ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि डिग्रियाँ, सर्टिफिकेट्स, बिना नौकरी रे दो कौड़ी के बराबर भी नहीं होते... वह हारा-सा चुप खड़ा रहा था. मैनेजर साहब उसके चेहरे की दीनता से द्रवित होकर बोले थे – “आप फिक्र मत कीजिए. मैं व्यवस्था कर लूंगा. स्थाई होने का इन्टरव्यू तो केवल दिखावा है... बस डोनेशन के तौर पर दस हजार रुपए तो देने ही होंगे... आपको...”

उसके पैर तले की जमीन खिसकती मालूम हुई थी. दस हजार? दस हजार की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी और दो साल से लगातार मैनेजर की जेब में उसका आधा वेतन बड़ी आसानी से चला जाता रहा था. हर माह की तरह मैनेजर ने इस माह भी दीपक को अपने केबिन में बुला भेजा... होठों पर मुस्कुराहट बिखेरते हुए बड़े ही शांत लहजे में उन्होंने दीपक को सामने की कुर्सी पर बैठाते हुए अपनी मेज की दराज से एक रजिस्टर निकाल लिया और कुछ नोट उसे सौंपते हुए सहजता से बोलने लगे “यह लो भई अपना वेतन – और इस पर अपने हस्ताक्षर कर दो...”

दीपक ने इस बार फिर देखा – रजिस्टर पर दर्ज रकम उसके हाथ की रकम से दुगुनी है. उसे लगा वह किसी सामन्ती युग में जी रहा है.... उसने अब तक सोचा था कि चलो आधे वेतन में सही, स्थाई होने के लिए ग्राउन्ड तो बन रहा है. वैसे मैनेजर साहब अभी तक यही कोशिश करते रहे हैं कि कोई अस्थाई कर्मचारी स्थाई न होने पाए. वे आलाअधिकारियों को समझाते रहे हैं “काम तो चल ही रहा है – बेमतलब “फुल-पे-स्केल” देने से क्या फायदा...? प्रतिष्ठान की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब है...” आलाअधिकारियों को इतनी फुर्सत नहीं थी कि वे स्थाई-अस्थाई के झमेले में पड़ते. परंतु वह मैनेजर द्वारा निर्धारित ‘डोनेशन’ की राशि वह कहाँ से जुटाता?

दीपक को सोच-विचार में मग्न देख मैनेजर साहब बोले, “मुझे जो तजुर्बा है, तुम्हें नहीं है... समझो बात को... जो मिल रहा है उसे प्रभु का प्रसाद समझ कर ग्रहण करो. बोलो नहीं. नहीं तो यह अस्थाई नौकरी भी जाती रहेगी. यह समझ लो बस... समझदार को क्या कहते हैं... – इशारा ही बहुत है...” इतना कह कर मैनेजर शान्त हो गया, पर चश्मे के अन्दर से चमकती उसकी मोटी-मोटी आँखें दीपक के चेहरे को घूरती रहीं...

दीपक के चेहरे की उभरती नसों से बन्धी डोरियों से परेशानी की कितनी ही प्रतिक्रियाएँ बन्धी सी लगने लगी... उसके चेहरे का उड़ा हुआ रंग, बदहवासी, क्रोध तथा याचना की मिली-जुली भावनाएँ... और अन्त में परिस्थिति से लाचार समर्पण. कहीं ये टेम्परेरी जॉब भी हाथ से चला गया तो क्या होगा. बच्चे?पत्नी?... उसी समय मैनेजर ने धीरे से पेन खोलकर दीपक की तरफ बढ़ाते हुए मानो अपनी सारी दिरयादिली उंडेल दी – “यस, यस मिस्टर दीपक डोन्ट बी होपलेस... भई अभी तो बहुत कुछ करना है.... जॉब परमानेन्ट हो जाए, फिर लाइफ सेटल्ड हो जाएगी. देखो इस जॉब के लिए मैंने ही तुम्हारे लिए कोशिश की है. यह समझ लो सेक्रेटरी साहब के रिश्तेदार को मैने ही टाल दिया. और इसी वजह से वो मेरे से नाराज भी हो गए... पर क्या करें? सहयोग तो तुम्हें ही करना था मुझे... फिर जॉब परमानेंट करने के लिए भी ग्राउन्ड बना रहा हूँ... बस डोनेशन का प्रबन्ध तुम... यस, यस राइट, फिल द फुल अमाउन्ट हियर एण्ड साइन हियर... परमानेन्ट होते ही फुल पे तो लेना ही है आपको.”

दीपक ने बुझे मन से मैनेजर के निर्देश का पालन किया. उधर मैनेजर ने दराज में रखे बाकी नोटों को अपनी जेब के हवाले किया और कहा- “देखो, अब तुम परमानेंट होने के लिए प्रबन्ध कर ही लो. ऊपर पैसा देना पड़ेगा तभी स्थाई हो सकेंगे आप... मेरा सहयोग तो पूरा है ही आपको ... इसलिए चिन्ता की कोई बात नहीं. ऊपर वाले सब अपनी सुनते हैं, पर पैसे पर बात अटक जाती है आकर... हा... हा... हा... ”

मैनेजर के फूले हुए जेब में अपने परिश्रम की कमाई को निरीह भाव से देखता हुआ दीपक बाहर आ गया.

वह इस प्रकार बेजान-सा हो रहा था मानों कोई जबरदस्त लुटेरा किसी बेबस इन्सान का पिस्तौल की नोक पर सब कुछ लूट कर उसे आतंकित करके छोड़ देता है... उसे अब फिक्र सताने लगी परमानेन्ट होने की. वह इतनी बड़ी रकम कहां से लाएगा? उसे अपनी आँखों में जलन और सिर में चक्कर का अहसास हुआ और वह वहीं मैदान पर बिछी बेन्च पर सिर पकड़ कर बैठ गया.

उसने अपना घर पहले ही पढ़ाई पूरी करने में तथा नौकरी की तलाश में गिरवी रख छोड़ा था. अब इतना पैसा फिर कहाँ से लाएगा? अरसे से पत्नी बीमार चल रही थी. वह नगर पालिका के अस्पताल में खैराती दवा से तो कभी वैद्य जी का चूर्ण गटक कर संतोष कर रही थी. दीपक यह सब देखता था, समझता था कि इस प्रकार इलाज कराना केवल मन को सांत्वना देना मात्र है.

इससे क्या होता है? पत्नी, पति तथा मासूम बच्चों के चलते अपनी असह्य पीड़ा को मानों पी जाती थी और कृत्रिम मुस्कुराहट के साथ पति की हिम्मत को बढ़ाने की कोशिश करती, ताकि उसका जॉब किसी तरह से स्थाई हो जाए, तो घर गृहस्थी को एक निश्चित दिशा मिल जाए... फिर आगे की तरक्की भी तो है... ये तंगी के दिन हैं, जो गुजर जाएंगे... फिर उनका परिवार निश्चय ही सुख और संतोष के दिन गुजार सकेगा. वह इ, तरह से विचार करते-करते आँगन में बिछी चारपाई पर जा पहुँचती और अपनी पीड़ा को दबाने का प्रयास करती.

परमानेंट जॉब के लिए मैनेजर की मांग, घर की टूटती आर्थिक स्थित, पत्नी का गिरता स्वास्थ्य... कम रौशनी में कमरे का माहौल बदलीग्रस्त दिख रहा था और उसकी पत्नी का चेहरा ग्रहण-ग्रस्त चाँद की मानिन्द. दीपक को लगा कि जैसे वह युवा होने से पहले ही बुढ़ा गया है.... टूटने लगा है... बुजुर्गों की तरह सोचने लगा है. उसने महसूस किया कि स्थाई नौकरी उसके लिए अलभ्य वस्तु थी, जो उसके पहुँच के बाहर थी.

अचानक दीपक को पत्नी का मंगल सूत्र और उसके हाथों के कंगन अंधेरे में कुछ ज्यादा ही चमकते दिखाई दिए. उसके जेहन में बिजली कौंधी. पर क्या पत्नी उसे मंगल सूत्र दे पाएगी? वह पत्नी से अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. उसे लगा मानों वह वर्षों से थका हुआ है और उसके मुंह से बोल भी नहीं फूट रहे हैं…

चारपाई पर लेटी पत्नी से जाने कब और कैसे वह जेवरों की मांग कर बैठा... उसे अपने ऊपर ही आश्चर्य हुआ था. पत्नी ने अपने हाथों के सोने के कंगन तो उसे दे दिए, परंतु मंगल-सूत्र सौंपते-सौंपते उसकी निस्तेज होती जा रही आँखों को वह सहन नहीं कर पाया. पत्नी की आंखों में असहायता, विवशता की स्पष्ट झलक महसूस करता वह मानों संज्ञाशून्य सा हो उठा था.... आखिर क्यों न इन से प्राप्त पैसों से वह पत्नी का उपयुक्त इलाज करवा दे, जिससे वह पीड़ा मुक्त तो हो सके. मंगलसूत्र सौंपते समय पत्नी इस तरह घबरा उठी थी जैसे उसकी इज्जत उतरी जा रही हो... वह फटी-फटी मुर्दे-की-सी आँखों से पति का मुंह ताकती रह गई थी.

बेचैनी तथा बदहवासी की सी स्थिति में उसने पत्नी से अप्रत्याशित प्रश्न किया था – “कितने तोले के होंगे” रुन्धे गले से कांपती-क्षीण-सी आवाज में पत्नी बड़ी देर में कह पाई थी- “छह-सात तोले के होंगे सब मिलाकर...”

इसके बाद दोनों के बीच संवाद खत्म से हो गए थे और दीपक चारपाई पर एक तरफ लुढ़क कर लेट गया था. बगल की खाट पर बीमार पत्नी कराहती पड़ी रही. दीपक जैसे अनिर्णय की स्थिति में फंस गया था कि क्या करना चाहिए, उसे अपने प्रतिष्ठान का चपरासी पन्नालाल अपने से कहीं बेहतर लग रहा था जो वर्षों से एक स्थाई नौकरी कर रहा था...उसने पन्नालाल से पत्नी की दवाई लाने के लिए एक-दो बार कुछ रुपए उधार भी लिए थे. एकाएक वह उठा और अपने सर्टिफिकेट और डिग्रियों के कागज़ात निकाले. उन्हें बार-बार देखते-सहेजते उसे गर्व हुआ – हाईस्कूल फर्स्ट डिवीजन, इन्टर फर्स्ट डिवीजन, बीए ऑनर्स, इंजीनियरिंग डिप्लोमा. उसे कुछ तसल्ली सी हुई कि अब वह मंगलसूत्र और कंगन के रुपयों से परमानेंट तो हो ही जाएगा, फिर तो आर्थिक स्थिति संभल ही जाएगी.

वह उठा और दीवार पर लगे छोटे से आइने में अपना चेहरा निहारने लगा. उसे लगा वह असमय बूढ़ा हो चला है... गालों में उभरी झुर्रियाँ, कनपटी पर सफेद बाल, बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी... ये सब गरीबी की सुपरिचित परिभाषा उसके चेहरे पर लिख रहे थे. उसे लगा कि उसका अपना व्यक्तित्व कहीं खो सा गया है और जो आइने में है वह कोई अजनबी है- अपरिचित है. वह घबरा कर वापस अपनी चारपाई पर पसर गया और करवटें बदलता रहा.

कंगन और मंगलसूत्र – रुपयों में रूपांतरित होकर चढ़ावे के रूप में मैनेजर के पास पंहुच चुके थे. नोटों की गड्डियाँ देख मैनेजर साहब मुस्कुरा कर चहक उठे थे. “दीपक, अब आगे मैं संभाल लूंगा... एक इंटरव्यू होगा... पर बस समझ लीजिए कि औपचारिकताएँ तो पूरी करनी पड़ती हैं... बस इसे डोनेशन ही समझिए... मेरा सहयोग आपके साथ हमेशा रहेगा... कल ही इंटरव्यू करवाए देता हूँ.”

मैनेजर के चेहरे से दीपक को नफरत हो गई और उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया. उसके मन में आया कि वह चिल्ला कर कह उठे- “साले बेईमान, घूसखोर, मक्कार, चरित्रहीन...” लेकिन उसने अपने अंदर जन्मी गालियों का गला घोंट दिया. पसीना-पसीना होते हुए वह केबिन से बाहर आ गया. परमानेंट होने का सुख, उसे लगा कि कभी नहीं मिल सकता.

स्थाई नियुक्ति पत्र मिलने पर दीपक को एक अरसे बाद अपने अन्दर पहली बार खुशी की लहर महसूस हुई. उसे इस समय कुछ रूपयों की आवश्यकता महसूस हुई. वह अपनी खुशी को बांटना चाहता था. कई दोस्तों से पहले ही इतने कर्ज वह ले चुका था कि कुछ मांगने का मुँह ही नहीं रह गया था उसका. अन्ततः उसे पन्नालाल याद आया. ऑफिस की छुट्टी होते ही वह पन्नालाल के पास पहुँचा और मिन्नत से उधार मांगा. उसे लगा कि कहीं पन्नालाल इनकार न कर दे. पन्नालाल से वह बोला- “दादा, कुछ रुपए मुझे अभी चाहिए... देखो अब मेरी नौकरी परमानेंट हो गई है, आपका उधार इसी वेतन पर चुका दूंगा.”

पन्नालाल भले ही अनपढ़ था, पर हृदयहीन नहीं था. उसे दीपक की आवाज में सच्चाई और आवश्यकता का प्रतिबिम्ब दिखाई दिया. वह बोला – “भइया, जब पिरमानेन्ट हो गए हो तो पइसा लौटा ही दोगे. लो अपना काम पूरा करो. समय सबके साथ ऊंच नीच करता है.”

दीपक उधार रुपयों को लेकर बछड़े की भांति कुलांचे मारता हुआ सुनार की दुकान पर पहुँचा और पत्नी के लिए एक छोटा-सा मंगलसूत्र खरीदा. मंगलसूत्र, जिसे देते वक्त उसकी पत्नी कातर-सी हो गई थी. अपने परमानेंट होने की खबर वह इस मंगलसूत्र को पहनाते हुए उसे देगा.

वह देर से घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसके घर के बाहर कुछ लोग खड़े थे. सब चुपचाप थे. उसने प्रश्नवाचक नजरों से चारों ओर निगाह डाली. माहौल में सन्नाटा था. वह विद्युत गति से घर के भीतर पहुंचा. देखा कि उसकी पत्नी चारपाई पर स्पंदन हीन पड़ी थी. उसकी दोनों फटी हुई खुली आँखें मानों असह्य पीड़ा को सहते-सहते मुक्ति याचना कर रही थीं... पीड़ा की अन्तिम सीमा को पार करती उसकी आँखें मौन-मूक न जाने क्या तलाश कर रही थीं...

दीपक से यह सब नहीं देखा गया. वह एक हृदयविदारक चीत्कार के साथ मृत पत्नी के ऊपर गिर पड़ा. जिस संबल, आलम्बन के सहारे उसकी जीवन लतिका फैल रही थी, वही आलम्बन आज एकाएक धूल-धूसरित हो उठा था. उसके द्वारा लाया गया मंगलसूत्र उसके हाथ से छूटकर चिरनिद्रा में निमग्न उसकी पत्नी की गोद में जा पड़ा था...

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रचनाकार – रामनारायण मिश्र हिन्दी के जाने माने कथाकार, उपन्यासकार और कवि हैं. आपके अनेकों कथा संग्रह, कविता संग्रह तथा उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. हिन्दी के कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं.

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चित्र- दीपक चव्हाण, सौजन्य - सृजन कैमरा क्लब, रतलाम

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