गुरुवार, 29 सितंबर 2005

हास्य-व्यंग्य : स्त्री स्तोत्र


-भारतेंदु हरिश्चंद्र

इस पूजा में अश्रु जल ही पाद्य है, दीर्घश्वास ही अर्ध्य है, आश्वासन ही आचमन है, मधुर भाषण ही मधुपर्क है, सुवर्णालंकार ही पुष्प है, धैर्य ही धूप है, दीपक है, चुप रहना ही चंदन है और बनारसी साड़ी ही विल्वपत्र है, आयु रूपी आँगन में सौंदर्य तृष्णा रूपी खूँटा है, उपासक का प्राण पुंज छाग उसमें बंध रहा है. देवी के सुहाग का खप्पर और प्रीति की तलवार है, प्रत्येक शनिवार की रात्रि इसमें महाष्टमी है, और पुरोहित यौवन है.

पदादि उपचार करके होम के समय यौवन पुरोहित उपासक के प्राण समिधाओं में मोहाग्नि लगाकर सर्वनाश तंत्र से मंत्रों से आहुति दे ‘मानखण्ड के लिए निद्रा स्वाहा’, ‘बात मानने के लिए मां बाप का बंधन स्वाहा’, ‘वस्त्रालंकारादि के लिए यथा सर्वस्व स्वाहा’ ‘मन प्रसन्न करने के लिए यह लोक परलोक स्वाहा’ इत्यादि, होम के अनन्तर हाथ जोड़कर स्तुति करें :

हे स्त्री देवी ! संसार रूपी आकाश में तुम गुब्बारा (बेलून) हो, क्योंकि बात-बात में आकाश में चढ़ा देती हो, पर जब धक्का दे देती हो तब समुद्र में डूबना पड़ता है अथवा पर्वत के शिखरों पर हाड़ चूर्ण हो जाते हैं. जीवन के मार्ग में तुम रेलगाड़ी हो. जिस समय रसना रूपी एन्जिन तेज करती हो, एक घड़ी भर में चौदह भुवन दिखला देती हो. कार्यक्षेत्र में तुम इलेक्ट्रिक टेलिग्राफ हो, बात पड़ने पर एक निमेष में उसे देशदेशांतर में पहुँचा देती हो. तुम भवसागर में जहाज हो, बस अधम को पार करो.

तुम इंद्र हो. श्वसुर-कुल के दोष देखने के लिए तुम्हारे सहस्त्र नेत्र हैं. स्वामी पर शासन करने को तुम वज्रपाणि हो. रहने का स्थान अमरावती है क्योंकि जहाँ तुम हो वहीं स्वर्ग है.

तुम चन्द्रमा हो. तुम्हारा हास्य कौमुदी है, उससे मन का अंधकार दूर होता है. तुम्हारा प्रेम अमृत है, जिसके प्रारब्ध में होता है वह इसी शरीर से स्वर्ग सुख अनुभव करता है और लोक में जो तुम व्यर्थ पराधीन कहलाती हो यही तुम्हारा कलंक है.

तुम वरूण हो क्योंकि इच्छा करते ही अश्रुजल से पृथ्वी आर्द्र कर सकती हो. तुम्हारे नेत्र जल की देखादेखी हम भी गल जाते हैं.

तुम सूर्य हो. तुम्हारे ऊपर आलोक का आवरण है पर भीतर अंधकार का वास है. हमें तुम्हारे एक घड़ी भर भी आँखों के आगे न रहने से दसों दिशा अंधकारमय मालूम होती है, पर जब माथे पर चढ़ जाती हो तब तो हम लोग उत्ताप के मारे मर जाते हैं. किम्बहुना देश छोड़कर भाग जाने की इच्छा होती है.

तुम वायु हो क्योंकि जगत की प्राण हो. तुम्हें छोड़कर कितनी देर जी सकते हैं? एक घड़ी भर तुम्हें देखे बिना प्राण तड़फड़ाने लगते हैं, जल में डूब जाने की इच्छा होती है, पर जब तुम प्रखर बहती हो, किस बाप की सामर्थ्य है कि तुम्हारे सामने खड़ा रहे.

तुम यम हो. यदि रात्रि को बाहर से आने में विलम्ब हो, तो तुम्हारी वक्तृता नरक है. यह यातना जिसे न सहनी पड़े वही पुण्यवान है, उसी की अनंत तपस्या है.

तुम अग्नि हो क्योंकि दिन रात्रि हमारी हड्डी-हड्डी जलाया करती हो.

तुम विष्णु हो. तुम्हारी नथ तुम्हारा सुदर्शन चक्र है. उसके भय से पुरुष-असुर माथा मुड़ाकर तटस्थ हो जाते हैं. एक मन से तुम्हारी सेवा करे तो सशरीर बैकुण्ठ को प्राप्त कर सकता है.

तुम हुमा हो. तुम्हारे मुख से जो कुछ बाहर निकलता है वही हम लोगों का वेद है और किसी वेद को हम नहीं मानते. तुमको चार मुख हैं क्योंकि तुम बहुत बोलती हो. सृष्टिकर्ता प्रत्यक्ष ही हो. पुरुष के मनहंस पर चढ़ती हो. चारों वेद तुम्हारे हाथ में हैं, इससे तुमको प्रणाम है.

तुम शिव हो. सारे घर का कल्याण तुम्हारे अधीन है. भुजंग बेनी धारिणी हो. त्रिशूल तुम्हारे हाथ में है. क्रोध में तुम्हारे कंठ में विष है तो भी आशुतोष हो.

इस दिव्य स्तोत्र पाठ से तुम हम पर प्रसन्न होओ. समय पर भोजनादि दो. बालकों की रक्षा करो. भृकुटी-धनु के सन्धान से हमारा वध मत करो और हमारे जीवन को अपने कोष से कंटकमय मत बनाओ.

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रचनाकार – भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) – आधुनिक हिन्दी साहित्य जगत् के पितृपुरुष के रूप में जाने जाते हैं.

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चित्र आकल्पन : सौजन्य - सृजन कैमरा क्लब, रतलाम.

4 blogger-facebook:

  1. अन्तिम वाक्य में "कोष" के बजाय "कोप" तो नहीं है ?

    स्त्रोत्र बहुत सुन्दर और उपयोगी हैं । कंठस्थ करने की इच्छा हो रही है ।

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