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October, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोहन द्विवेदी की हास्य-व्यंग्य कविताएँ

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1 काव्य मंच की कविता : अक्का बक्का तीन तलक्का
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अक्का बक्का तीन तलक्का
फेंका गुगली मारा छक्का,
दर्शक हो गए हक्का-बक्का.

करता बन्दन कर-जोर आज,
नेता मेरे देश की लाज.
अल्ला ने इनको भेजा है,
करने को धरती पर राज.

अब मत कहना चोर-उचक्का
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनकी है अपनी मजबूरी,
मुँह में राम बगल में छुरी.
देश लाद कर चलें पीठ पर,
राम बढ़ावें इनसे दूरी.

वोट करो बस इनका पक्का
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

झूठ की गठरी इनके पास,
खोलकर गठरी बांटे आस.
गंगाजल लेकर भी बोलें,
करना नहीं इनका विश्वास.

जाम करें चलती का चक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनका काम बड़ा है चोखा,
सगे बाप को देते धोखा.
रंग बदलते गिरगिट जैसा,
ये हैं भूत यही हैं सोखा.

कर देते सबको भौंचक्का.
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनसे बचो ये छुट्टा सांड,
कभी तो रंडी कभी ये भांड.

चोर-पुलिस, अफसर-चपरासी,
सबका ये कर लेते स्वांग.

ये तो हैं दुक्की पर इक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

संसद हो या गांव की सड़क,
आगे रहे होकर बेधड़क.
चित इनकी पट भी इनकी
चारों तरफ इन्हीं की हड़क.

रोज करे हैं लत्ता-मुक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.


जब चुनाव तब ये बेचारे,
फिरते हैं सब मारे-मारे.
आँखों में घड़ियाली आँसू

स्वामी वाहिद काज़मी की कहानी : लानत

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- स्वामी वाहिद काज़मी

अपने सीने में दहकते अंगारे भरे, सिर से धुएँ के बादल उड़ाती, मेल ट्रेन धड़धड़ाती हुई आकर, प्लेटफ़ॉर्म पर विश्राम के लिए ठहरी. इस स्टेशन पर उसका पाँच मिनट का स्टॉप था. नाश्ते का समय था. यात्री अपने जलपान और भोजनादि के सरंजाम में व्यस्त हो गए.

चीकट कपड़ों में लिपटा, अधनंगे भिखमंगे बच्चों का एक छोटा-सा समूह बिखरकर, हर डिब्बे के पास जाकर, किसी यात्री को कुछ खाते-पीते देख अपना पिचका कटोरा या हाथ फैलाकर गिड़गिड़ाने लगा. उन्हीं में थी चीथड़ेनुमा पेटीकोट, उटंगा ब्लाउज़ और नाममात्र की ओढ़नी पहने, दस बारह वर्षीया एक भिखारन बालिका. वह साधारण डिब्बों की ओर न जाकर, एक थ्री-टियर शयनयान में लपककर चढ़ गई और समस्त माताओं-बहनों के सामने बेहद दुःखी सूरत और कातर स्वर में कुछ खाने को मांगने लगी.

जब वह डिब्बे से नीचे उतरी तो उसके हाथों में पूरी-परांठों के आधे-चौथाई टुकड़े, कुछ साबुत रोटियों के अलावा कूढ़ी सूखी सब्जी और अचार की एकाध फांक भी थी. यकीनन वह खुश थी कि दाताओं की इस उदारता के कारण आज उसे द्वार-द्वार मांगने की झंझट नहीं उठानी पड़ी. और कम से कम रात तक का भोजन उसके पास जुट गया …

संजय विद्रोही की चंद ग़ज़लें

ग़ज़ल (१)
जब भी गिरता है नीर आँखों से,
झरने लगती है पीर आँखों से.

उसके झोले में चाँद सूरज हैं,
वो, जो दिखता फकीर आँखों से.

खींच देगा वो आज सीने पर,
पीर की एक लकीर आँखों से.

फिर ना जाने, गई कितनी जानें
उसने छोड़े जो तीर आँखों से.

पंखुरी लब की चूमने निकली,
ओस भी बे-नजीर आँखों से.

ग़ज़ल (२)

पीर है, प्यार है, जमाना है
और हम हैं, हमें निभाना है.

आँधियों को सहेज भी लेता,
नीड़ लेकिन मुझे बनाना है.

रात भर करवटें बदलता हूँ,
नींद है, या कि छ्टपटाना है.

तू ना मेरी तरह परेशां हो,
तू, ना मेरी तरह दीवाना है.

चुप हुई रूह इस तरह अपनी,
जिस्म जैसे कि कैदखाना है.

ग़ज़ल (३)
अपनी ही गल्तियों से, उछ्ले मेरे फ़साने
लोगों ने बहुत रोका, हम थे कि हम ना माने.

उनकी सियासतों ने कितना दिया वतन को,
आबाद कब्रगाहें, रोशन यतीमख़ाने.

बस इस तरह से बीते है जिन्दगी हमारी,
साँसों का कर्ज, आहों से हम लगे चुकाने.

मिलके जो उनसे लोटे, ये हाल था हमारा
ना होश थे ठिकाने, ना हम रहे ठिकाने.

पतझर, बसंत, फागुन, बारिश, बहार, सरदी
सूरत बदल के मौसम, आते रहे लुभाने.

जिस भी तरफ गए हम, टूटा है दिल हमारा
कोई कभी तो आए, 'मजलूम' को बचाने.

ग़ज़ल (४)
उसको गर अब उड़ान दे मा…

कुछ चुटीले, सच्चे प्रसंग

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महान् लेखक मार्क ट्वेन पांडुलिपि में विराम-चिह्नों का प्रयोग नहीं ही करते थे. एक बार अपनी एक पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशक को भेजते हुए उन्होंने लिखा-

महोदय, एक नई पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशनार्थ भेज रहा हूँ. कृपया इन चिह्नों :-

: ; ….. ‘’ “” – ( ) ? !

को पुस्तक के समस्त वाक्यों में यथास्थान, आवश्यकतानुसार लगवा देंगे.

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प्रसिद्ध नाटक-लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ एक दफा एक प्रीति भोज में किसी महिला से बातें कर कर रहे थे. शॉ लगातार घंटे भर तक अपने बारे में बोलते ही रहे. अचानक उन्हें ध्यान आया कि उन्होंने तो उस महिला को बोलने का कोई मौका ही नहीं दिया.

वे उस महिला से बोले, “माफ कीजिएगा, मैं भी कितना अशिष्ट हूँ, सारा समय अपने बारे में ही बात करता रहा. खैर कोई बात नहीं, आइए दूसरे विषय में बात करते हैं. हाँ, तो यह बताइए कि आपको मेरा नया नाटक कैसा लगा?”

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स्व. जमनालाल बजाज ने वर्धा में एक मंदिर बनवाया जिसमे सवर्ण हिन्दुओं के साथ ही हरिजनों के प्रवेश की भी व्यवस्था थी. (उस जमाने में आमतौर पर मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश वर्जित होता था). इसे शास्त्र सम्मत बताने के उद्देश्य से उन्होंने प्रसिद्ध…

सआदत हसन ‘मण्टो’ की कहानी : ...देख कबीरा रोया

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-सआदत हसन मण्टो

नगर-नगर ढिंढोरा पीटा गया कि जो व्यक्ति भीख मांगेगा, उसको गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. गिरफ़्तारियाँ आरंभ हुईं. लोग खुशियाँ मनाने लगे कि बहुत पुराना अभिशाप दूर हो गया.

कबीर ने यह देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. लोगों ने पूछा, “ऐ जुलाहे ! तू क्यों रोता है ?”

कबीर ने रोकर कहा- कपड़ा दो चीजों से बनता है- ताने और पेट से. गिरफ़्तारियों का ताना तो आरंभ हो गया, पर पेट भरने का पेटा कहाँ है?

एक एम.ए.एल-एल.बी. को दो सौ खुड्डियां अलाट हो गईं. कबीर ने यह देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए.

एम.ए.एल-एल.बी. ने पूछा, “ऐ जुलाहे के बच्चे ! तू क्यों रोता है ? क्या इसलिए कि मैंने तेरा अधिकार छीन लिया है ?”

कबीर ने रोते हुए उत्तर दिया- “तुम्हारा कानून तुम्हें यह नुक्ता समझाता है कि खुड्डियां पड़ी रहने दो और सूत का जो कोटा मिले, उसे बेच दो. मुफ़्त की खटपट से क्या लाभ ? परंतु यह खटपट ही जुलाहे की जात है.”

छपी हुई पुस्तक के फर्में थे, जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे. कबीर का उधर से गुजरना हुआ. उसने दो तीन लिफ़ाफ़े उठाए और उन पर छपा हुआ लेख देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए. लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने आ…

चुनिंदा शायरों की कुछ मजाहिया ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
- इब्न – ए – इंशा
देख हमारे माथे पर यह दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
हमसे अजब तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियाँ

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना, होगा तेरा उसूल मियाँ
हम क्यों छोड़ें उन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ

यूँ ही तो नहीं दश्त में पहुँचे, यूँ ही तो नहीं जोग लिया
बस्ती बस्ती कांटे देखे, जंगल जंगल फूल मियाँ

यह तो कहो है इश्क़ किया, जग में हुए हो रुसवा भी?
इसके सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियाँ

नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना, दीदः-ओ-दिल को फ़र्श करें
सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुजूल मियाँ

सुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर
एक जरा से क़िस्से को अब देते क्यों हो तूल मियाँ

खेलने दें उन्हें इश्क की बाज़ी, खेलेंगे तो सीखेंगे
क़ैस की या फ़रहाद की ख़ातिर खोलेंगे स्कूल मियाँ

अब तो हमें मंजूर है यह भी शहर से निकलें, रुसवा हों
तुझको देखा, बातें कर लीं, मिहनत हुई वसूल मियाँ

‘इंशाजी’ क्या उज्र ह तुमको नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ नज्र करो
रूप नगर के नाके पर यह लगता है महसूल मियाँ

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दश्त-ए-तलब= इच्छा का जंगल, मामूल= नियम, नस्ब करें= लगाएँ, नुज़ूल= आएंगे, क़ैस= मजनूं

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ग़ज़ल…

आंध्र प्रदेश की एक मर्मस्पर्शी कहानी : उसका चावल

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-विजय

उरसुला ने ईंटों के चूल्हे पर चढ़ी देगची संडासी से उतारी और चूल्हे के आगे जमा हुई राख पर रख दी. चूल्हे में सूखी लकड़ियाँ चट-चट की आवाज कर रही थीं. उरसुला को लगा कि दूर झितिज पर जैसे आकाश जल रहा हो. उसे महसूस हुआ कि बत्तीस तैंतीस की उम्र तक आते-आते चटख चटखकर उसका अस्तित्व भी राख बन गया है.

ध्यान टूटते ही उसने दूसरी देगची में सांभर चढ़ा दिया, मिर्च कुछ चटख ही डाली क्योंकि लड़कों को पसंद है. सी सी करते हुए वे एक दूसरे को खूब छेड़ते हैं. उनकी छेड़छाड़ के बीच उरसुला भी जी लेती है. चूल्हे की दो लकड़ियों को उसने अंदर की तरफ कोंचा जिससे आग धीमी हो जाए. सांभर की दाल में सौंधापन आ जाए और वह ठीक से गल जाए.

आग धीमी तो हो गई मगर बुझे हुए हिस्सों से धुंआ भी फूट पड़ा. उरसुला को लगा कि धुंआ-धुंआ होकर वह भी राख बन गई है.... राख जो दूसरों के खाने को कुछ देर गर्म रख पाती है. पेड़ से टूटी लकड़ी जैसा ही उसका हश्र हुआ.

चावल का मांड निकालने के लिए उरसुला कपड़े से देगची पकड़ती है... कपड़ा कहाँ? एक लड़के की झीनी चदरिया सी बनियान है. उरसुला की मूक ठिठकन को भांप कुर्ता उतार बनियान उछाल दी थी और पुनः कुर्त…

रमेश चन्द्र श्रीवास्तव की तीन ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1

वह सामने नहीं है मगर कल्पना तो है
आँखें जो बन्द की हैं वो अकसर दिखा तो है

चिट्ठी के शब्द-शब्द में उसका ही बिम्ब था
तनहाई में वो साथ हमेशा रहा तो है

हम जानते हैं कितने गुनहगार हैं मगर
उसके करम का फिर भी हमें आसरा तो है

पर्यावरण खराब करें चाहे जितना हम
फिर भी स्वच्छ साफ सी बहती हवा तो है

दिनरात चल रहे हैं अदालत के काम काज
दुष्कर्म जो करेगा तो उसकी सज़ा तो है

छिप-छिप के फिर भी, पाप किए जा रहे हैं हम
यह जानते हैं कोई हमें देखता तो है

‘रचश्री’ हजार दूरियाँ रिश्तों के बीच हों
समझौते की दिलों में एक आकांक्षा तो है

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ग़ज़ल 2


न यह सहरा न यह गुलशन रहेगा
मोहब्बत का दीया रोशन रहेगा

यह देखेंगे हमारी दोस्ती का
जमाना कब तलक दुश्मन रहेगा

सभी मरने के साधन ढूंढते हैं
कोई जीने का भी साधन रहेगा?

बदल जाएगा चेहरा आदमी का
मगर दर्पण सदा दर्पण रहेगा

हम अपने घर में मिल-जुलकर रहेंगे
हमारा एक ही आँगन रहेगा

मुकम्मल चाँद हो जाने दें ‘रचश्री’
उजाला बादलों से छन रहेगा

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ग़ज़ल 3

तहों से तुम उभरते क्यों नहीं हो
जो कहते हो वह करते क्यों नहीं हो

अगर खुशबू हो तुम, तो कैद क्यों हो
हवाओं में बिखरते क्यों नहीं हो

तुम्हें शक है वफ़ाओं पर …

भूखे रहो, मूर्ख रहो – स्टीव जॉब्स

ये हैं कंप्यूटर गुरू स्टीव जॉब्स. एप्पल कंप्यूटर और पिक्सार एनिमेशन स्टूडियोज़ के प्रमुख. मौक़ा है स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का. दिन रविवार. तारीख़ 12 जून 2005.

मुख्य वक्ता स्टीव जॉब्स ने छात्रों को जो कुछ बताया वह जीवन को सच्ची जीवटता से जीने की सही मिसाल है. इससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं – बहुत कुछ.

प्रस्तुत है स्टीव जॉब्स के संबोधन का पूरा पाठ- (मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद: आशीष श्रीवास्तव (http://desh-duniya.blogspot.com/ ) )

इस विद्यापीठ के, जिसे विश्व के सर्वोत्तम विद्यापीठों में से एक माना जाता है, दीक्षान्त समारोह में शामिल होकर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ. मैंने किसी महाविद्यालय से उपाधि नहीं ली है. सच्चाई यह है कि मैं यहां पर आज मौजूद हूं यह महाविद्यालय और उपाधि से मेरी सबसे ज्यादा निकटता है. आज मैं आपको अपनी जिन्दगी से जुड़ी तीन कहानियाँ सुनाने जा रहा हूं. बस वही. कोई बड़ी बात नहीं, सिर्फ तीन कहानियां.

पहली कहानी है बिन्दुओं को मिलाने के बारे में.

मैंने रीड कालेज पहले ६ महीने में ही छोड़ दिया था, लेकिन मैं वहां पर अगले १८ महीने और रहा. उसके बाद मैंन…

रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानी : स्त्री का पत्र

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- रवीन्द्र नाथ टैगोर

पूज्यवर,
आज पन्द्रह साल हुए हमारे ब्याह को. हम तब से साथ ही रहे. अब तक चिट्ठी लिखने का मौका ही नहीं मिला. तुम्हारे घर की मझली बहू जगन्नाथपुरी आई थी, तीर्थ करने.

आई तो जाना कि दुनिया और भगवान् के साथ मेरा एक और नाता भी है. इसलिए आज चिट्ठी लिखने का साहस कर रही हूँ. इसे मझली बहू की चिट्ठी न समझना.

वह दिन याद आता है, जब तुम लोग मुझे देखने आए थे. मुझे बारहवां साल लगा था.

सुदूर गांव में हमारा घर था. पहुँचने में कितनी मुश्किल हुई तुम सबको. मेरे घर के लोग आव-भगत करते-करते हैरान हो गए.

विदाई की करूण धुन गूंज उठी. मैं मझली बहू बनकर तुम्हारे घर आई. सभी औरतों ने नई दुल्हन को जाँच परखकर देखा. सबको मानना पड़ा – बहू सुन्दर है.

मैं सुन्दर हूँ, यह तो तुम लोग जल्दी भूल गए. पर मुझ में बुद्धि है, यह बाद तुम लोग चाहकर भी न भूल सके. मां कहती थी, औरत के लिए तेज दिमाग भी एक बला है.

लेकिन मैं क्या करूं. तुम लोगों ने उठते बैठते कहा, “यह बहू तेज है.”

लोग बुरा भला कहते हैं सो कहते रहें. मैंने सब साफ कर दिया.

मैं छिप-छिपकर कविता लिखती थी. कविताएँ थीं तो मामूली, लेकिन उनमें मेरी अपनी आवाज थी. वे कविताएँ…

अर्थहीन कविता

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-हरिहर झा

सार्थक है वह कविता -
जो मंत्रियों की चाटुकारिता से
परहेज न करे
जो राजों रजवाड़ों के भाट चारण का
वारिस हो सके
करोड़ीमल के संस्मरण में
कुछ प्रशस्तियाँ गा सके -

पर इस अर्थ प्रधान
स्वार्थ प्रधान युग में
पुरस्कार की क्या बात
जो चार पैसे न कमा कर ला सके
अर्थहीन है वह कविता....

अर्थहीन है वह कविता ...
बिखरे विचारों की सजावट करती हुई
भ्रष्टाचार से बगावत करती हुई
विवश विद्रोह को मायने देती हुई
मियां मिठ्ठुओं को आइना दिखाती हुई
या फिर प्रेम की रंगीनियों में सोई हुई
प्रकृति के आगोश में खोई हुई
अर्थहीन है वह कविता....

पर ऐसी कविता
जो किसी ख़ेमे में छीना झपटी कर
झंडा उठा ले
राजनीतिक वादों इरादों पर
अपनी तुकबन्दी की छाप छोड़े
और मोदक की थाली की तरह सजाए -
खयाली पुलावों की चाशनी से बने
चुनावी घोषणा पत्र पर कसीदे करे
सफल है वह कविता...

जो जोखिम उठाए
रद्दी की टोकरी में गिर जाने का
पाखंडी शिखंडियों का मखौल सहने का
नेता भए विधाता के तीसरे नेत्र खुलने का
और सच का साथ दे
मोटी खाल में छिपे काइयाँपन को
व्यंग बाणों से भेद कर
लहूलुहान करे
तू-तू मैं-मैं की चीख पुकार के बीच
किसी अनहत नाद की सी प्रतीक्षा में
शांत सौम्य आनंदित भाव से
विवेक विच…

स्वामी वाहिद काज़मी की कहानी : चिराग़ तले

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- स्वामी वाहिद काज़मी
उस नगर का नाम है – अब्दालगंज और अब्दालगंज का एक घना और बारौनक़ बाज़ार है- बड़ा बाज़ार. वहीं बारह-पंद्रह मुसलमान रंगरेज़ों की बड़ी-बड़ी दुकानें हैं, जो कपड़े रंगने का अपना पुश्तैनी व्यवसाय करते-करते इतने कुशल व धनवान हो गए हैं कि अब वह अपना रंगरेज़ी का धंधा त्यागकर दूसरे व्यवसाय करने लगे हैं. उनमें से अधिकतर शामियाने, कन्नातें, क्रॉकरी आदि किराए पर देने की ठेकेदारी करते हैं. किसी-किसी के तो ट्रक और टेम्पो भी चलते हैं.

छिद्दू खां अपने इन्हीं स्वजातीय बंधुओं के चौधरी हैं. आयु यही कोई चालीस-पैंतालीस वर्ष, सांवला रंग, मध्यम क़द, कुर्ता-पायजामा पहनने वाले. उनकी कपड़े की एक बड़ी दुकान थी. दुकान के पीछे तीन-चार मकान भी थे उनके. एक में रहते थे, बाक़ी किराए पर उठा रखे थे. उनकी दुकान के ऊपर एक मस्जिद थी, जो बड़ा बाज़ार की मस्जिद कहलाती थी. अल्लाह तेरी शान! चौधरी छिद्दू खां वैसे अंगूठा टेक व्यक्ति थे, किंतु धन-सम्पन्न और अच्छी-ख़ासी साख वाले होने के कारण उस मस्जिद के स्वयंभू मुतवल्ली (प्रबंधक) भी वही थे और सार्वजनिक मस्जिद को एक प्रकार से अपनी निजी संपत्ति में ही …

हास्य व्यंग्य : पांचवें पैग़म्बर

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-भारतेंदु हरिश्चंद्र

लोगो दौड़ो, मैं पाँचवाँ पैग़म्बर हूँ. दाऊद, ईसा, मूसा, मुहम्मद ये चार हो चुके. मेरा नाम चूसा पैगम्बर है. मैं विधवा के गर्भ से जनमा हूँ, और ईश्वर अर्थात् खुदा की ओर से तुम्हारे पास आया हूँ. इससे मुझ पर ईमान लाओ, नहीं तो ईश्वर के कोप में पड़ोगे.


मुझ को पृथ्वी पर आए बहुत दिन हुए, पर अब तक भगवान का हुक्म नहीं था इससे मैं कुछ नहीं बोला. बोलना क्या बल्कि जानवर बना घात लगाए फिरता था और मेरा नाम लोगों ने हूश, बंदर, लंका की सेना और मलेच्छ रखा था पर अब मैं उन्हीं लोगों का गुरु हूँ क्योंकि ईश्वर की आज्ञा ऐसी है. इससे लोगों ईमान लाओ.

जैसे मुहम्मदादि के अनेक नाम थे, वैसे ही मेरे तीन नाम हैं : मुख्य चूसा पैगम्बर, दूसरा डबल और तीसरा सुफैद और मेरा पूरा नाम श्रीमान् आनरेबल हजरत डबल सुफैद चूसा अलैहुस्सलाम वंदनीय पैग़म्बर आखिर कुन जमां है.

मुझको कोहेचूर पर खुदा ने जल्वा दिखाया और हुकुम दिया कि मैंने पैग़म्बर किया तुझको तू लोगों को ईमान में ला, दाऊद ने बेला बजा के तुझे पाया तू हारमोनियम बजाएगा, मूसा ने मेरी खुदाई रोशनी से कोहातूर जलाया तू आप अपनी रोशनी से जमाने को जला कर काला करेगा,…

संड-भंड संवाद

- भारतेंदु हरिश्चंद्र

आप कौन हैं ?
मैं हूँ भंडाचार्य.
कहाँ से आ रहे हैं?
मैं अनादि कब्रिस्तान से उठा हूँ.
विशेषता क्या है?
क्या मतलब?
तो आप वसंत हैं।
इसमें संदेह क्या? खालिस वसंत हूँ.

चैत्रनंदन या वैशाखनंदन?
ओह! आक्षेप क्यों करता है? मैं मधुकैटभ के बड़े भाई का बेटा नहीं हूँ. मैं हिन्दू नामधारी हूँ, अतः माधवनंदन हूँ.
तब आपका स्वागत है. आइए माधवनंदन जी.
प्रणाम करता हूँ.
आइए, विराजिए.
हः हः हः आप भी बैठिए.
यह व्यर्थ शिष्टाचार का समय नहीं है, अतः बैठिए. यह आसन है.

मैं इस आसन पर बैठता हूँ.
(दोनों बैठते हैं)
किसलिए निकले हैं?
कहाँ से? घर से या माता की गर्भ गठरी से?
गर्भ गठरी से ही निकले जान पड़ते हैं, पहला प्रश्न फिर पूछता हूँ कि किस लिए निकले हैं?
होली खेलने के लिए.
वाह! ऐसे कठिन समय भी आप जैसे लोग होली खेलने का समर्थन करते हैं!! यह नहीं जानते कि यह समय होली खेलने का नहीं. भारतवर्ष का धन विदेश जाने से जनता भूख प्यास से पीड़ित है. यह क्या होली खेलने का समय है?

हम जैसों के घर सदा होली है. मैं लोगों का रोना नहीं सुनता. लोग तो हमेशा रोते ही रहते हैं.
तो आप ढुंढा के वंश में उत्पन्न हुए हैं?
मैं ढुंढिराज नहीं हूँ.
नहीं …

मीरा शलभ की कुछ व्यंग्य कविताएँ

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-मीरा शलभ

*स्त्री
उसने सोचा था उसे पाँव की जूती
तभी तो आज वह काटने को आमादा हो गई।

*मिल बांट कर खाओ
माँ ने सिखलाया था
बचपन में कि सब मिल बाँट कर खाओ
इसी लिए तो आज
हम सभी मिल बाँट कर खा रहे हैं.


*यक्ष-प्रश्न
चिड़िया घर में
भेड़िये को देखकर
डर गया था वह नन्हा-सा बालक
और – अधिक सिमट गया था माँ के अंक में
किंतु... डरते डरते भी
कर बैठा एक यक्ष-प्रश्न
माँ क्या तुम वास्तव में नहीं डरीं
भेड़िये को देखकर
और क्यों नहीं डरीं?
जबकि अकसर-
आदमी को देखकर डर जाती हो।

*उद् घाटन
पुल के उद् घाटन से पूर्व
मुख्यमंत्री जी ने
अपने हृदय में
पुल देवता का
आह्वान किया...


तथा मन ही मन उन्हें
दंडवत् प्रणाम किया
और साथ में यह प्रार्थना की
कि... कृपया प्रभु
आप धैर्यपूर्वक
मेरे यहाँ रहने तक
यों ही स्थिर रहना।

*ग़ज़ल
फिर वही पुराना सिलसिला है
संग मेरे दर्द का क़ाफ़िला है

पत्थरों के शहर में मेरा
एक शीशे का किला है

किस किस से करूँ हिफ़ाज़त
हर हाथ में मुझे पत्थर मिला है

खुद ब खुद चटकने लगी हूँ मैं
टूटने का खौफ़ न निकला है

देख कर लहूलुहान जिस्म मेरा
कोई पत्थर नहीं पिघला है

रचनाकार – मीरा ‘शलभ’ की कई कहानियाँ एवं कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो च…

बाल कथा : चिकी-मिकी तुम सुधरोगे भी?

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-पुष्पा रघु

चिकी-मिकी उस पोखर के राजकुमार थे. क्योंकि उनकी माँ रोमी से उस ताल के सारे मेंढक-मेंढकी डरते थे. उसका शरीर खूब मोटा-ताजा था. पीले मटमैले रंग में हरी धारियाँ बड़ी सुन्दर लगती थीं. जब वह अपनी गोल आँखों को चमकाते हुए जोर से टर्राती तो पूरे पोखर में उसकी आवाज गूंज उठती. छोटी-मोटी मछलियाँ भी रोमी के सामने पड़ने से डरती थीं. वह थी भी झगड़ालू और घमण्डी. माँ की तरह चिकी-मिकी भी घमण्ड में रहते और ताल के सारे बच्चों से लड़ते-झगड़ते रहते. दूसरों के घर में घुसकर उनकी चीजें छीन लाना या तोड़-फोड़ करना उनका रोज का काम था. कोई उन्हें कुछ कहता तो उनकी माँ आँखें चमका कर इतनी जोर से टर्राती कि बेचारे डरकर दुबक जाते.

शुरू-शुरू में तो चिकी-मिकी की शरारतों की शिकायत करने लोग रोमी के पास आते थे, पर रोमी अपने बच्चों को डाँटने की बजाय उनसे ही लड़ने को उतारू हो जाती. वह उन लोगों को बुरी तरह दबोच लेती. उसकी छलांग सबसे लम्बी थी और शरीर भी सबसे ज्यादा मजबूत था. जान तो सबको प्यारी है. अतः धीरे-धीरे प्रायः सभी ने उन माँ-बेटों का विरोध करना छोड़ दिया. इससे चिकी-मिकी बहुत उद्दण्ड और आवारा हो गए. उन्हें …

बाल कहानी : बोली तितली रानी

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- पुष्पा रघु
हद दर्जे की आलसी और निकम्मी लड़की है नूपुर. स्कूल से घर आती है तो बस्ता पटक, जूते-मोजे इधर-उधर फेंक, सीधी खाने की मेज पर. मम्मी कहती हैं, “नुप्पू बेटे यूनिफ़ॉर्म उतारो! हाथ मुँह धो लो, देखो तो कितने गंदे हो रहे हैं.”

“ऊँ-हूँ हमें जोर की भूख लगी है, खाना दो ना!” खाना खाया सो गई. सोकर उठते ही पार्क में खेलने चली जाती है और मम्मी लाख बुलाए पर अँधेरा होने से पहले वह नहीं लौटती. सुबह भी मुश्किल से जागेगी, जागते ही हड़पोंग मचाएगी- “यूनिफ़ॉर्म प्रेस करी हुई नहीं है, जूतों पर पॉलिश नहीं है, जुराब भी गंदे हैं.” मम्मी ही नहीं पापा भी भाग-दौड़ करते-करते परेशान हो जाते हैं तब कहीं जाकर नूपुर बस पकड़ पाती है. स्कूल-डायरी में जब देखो तब शिकायत. उसे स्कूल का काम करवाना कौन-सा सरल है. नौ साल की हो गई नूपुर पर ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही है अधिक ही बिगड़ती जा रही है. छुट्टियों में तो उसने खूब ही तंग किया था मम्मी को. मम्मी सदा भगवान से प्रार्थना करती कि नूपुर को सदबुद्धि मिले और वह एक अच्छी लड़की बने. वह नूपुर को भी बहुत समझाती पर वह एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती.

रविवार का दि…

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