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October 2005
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1 काव्य मंच की कविता : अक्का बक्का तीन तलक्का
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अक्का बक्का तीन तलक्का
फेंका गुगली मारा छक्का,
दर्शक हो गए हक्का-बक्का.

करता बन्दन कर-जोर आज,
नेता मेरे देश की लाज.
अल्ला ने इनको भेजा है,
करने को धरती पर राज.

अब मत कहना चोर-उचक्का
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनकी है अपनी मजबूरी,
मुँह में राम बगल में छुरी.
देश लाद कर चलें पीठ पर,
राम बढ़ावें इनसे दूरी.

वोट करो बस इनका पक्का
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

झूठ की गठरी इनके पास,
खोलकर गठरी बांटे आस.
गंगाजल लेकर भी बोलें,
करना नहीं इनका विश्वास.

जाम करें चलती का चक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनका काम बड़ा है चोखा,
सगे बाप को देते धोखा.
रंग बदलते गिरगिट जैसा,
ये हैं भूत यही हैं सोखा.

कर देते सबको भौंचक्का.
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

इनसे बचो ये छुट्टा सांड,
कभी तो रंडी कभी ये भांड.

चोर-पुलिस, अफसर-चपरासी,
सबका ये कर लेते स्वांग.

ये तो हैं दुक्की पर इक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

संसद हो या गांव की सड़क,
आगे रहे होकर बेधड़क.
चित इनकी पट भी इनकी
चारों तरफ इन्हीं की हड़क.

रोज करे हैं लत्ता-मुक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.


जब चुनाव तब ये बेचारे,
फिरते हैं सब मारे-मारे.
आँखों में घड़ियाली आँसू
लेकर जाते द्वारे-द्वारे.

बच्चे को भी कहते कक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.


अफसर से होते परेशान,
इनको चुन्नी न उनको कान.
शेर-स्यार मौसेरे भाई,
जब जागे हो तभी बिहान.

आगे बढ़ते देकर धक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

शुरू में थी खद्दर पहचान,
चेंज हो गया अब परिधान.
मिल जाए सी एम की चेयर,
जेब में रखते हैं अरमान.

खाते माल बताते मक्का,
अक्का-बक्का तीन तलक्का.

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2 काले कोट
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कचहरी में वकील मिलते हैं,
ट्रेन में टीटी चलते हैं,
बारहों महीने कोट क्यों पहनते हैं?
अगर नहीं जानते राज
जान जाइए आज.
कोट पहनने से-
जेबों की संख्या हो जाती है ज्यादा,
आपकी सुरक्षा और संरक्षा का पक्का वादा.
जो भी थका हारा, मजबूरी का मारा,
धाकड़ या बेचारा,
इनके पास आता है,
मुँह माँगी रकम थमा जाता है,
काले कोट रूपी समंदर में,
सब.... समा जाता है.

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रचनाकार – टेक्नोक्रेट मोहन द्विवेदी की कविताएँ, गीत एवं कथा साहित्य देश की प्रतिष्ठित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. आपको अनेकों साहित्यिक सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं. आप काव्य मंचों में काव्यपाठ भी करते हैं. रचनाकार पर मोहन द्विवेदी की कुछ अन्य रचनाएँ यहाँ पढ़ें :
http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_17.html http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_19.html


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- स्वामी वाहिद काज़मी

अपने सीने में दहकते अंगारे भरे, सिर से धुएँ के बादल उड़ाती, मेल ट्रेन धड़धड़ाती हुई आकर, प्लेटफ़ॉर्म पर विश्राम के लिए ठहरी. इस स्टेशन पर उसका पाँच मिनट का स्टॉप था. नाश्ते का समय था. यात्री अपने जलपान और भोजनादि के सरंजाम में व्यस्त हो गए.

चीकट कपड़ों में लिपटा, अधनंगे भिखमंगे बच्चों का एक छोटा-सा समूह बिखरकर, हर डिब्बे के पास जाकर, किसी यात्री को कुछ खाते-पीते देख अपना पिचका कटोरा या हाथ फैलाकर गिड़गिड़ाने लगा. उन्हीं में थी चीथड़ेनुमा पेटीकोट, उटंगा ब्लाउज़ और नाममात्र की ओढ़नी पहने, दस बारह वर्षीया एक भिखारन बालिका. वह साधारण डिब्बों की ओर न जाकर, एक थ्री-टियर शयनयान में लपककर चढ़ गई और समस्त माताओं-बहनों के सामने बेहद दुःखी सूरत और कातर स्वर में कुछ खाने को मांगने लगी.

जब वह डिब्बे से नीचे उतरी तो उसके हाथों में पूरी-परांठों के आधे-चौथाई टुकड़े, कुछ साबुत रोटियों के अलावा कूढ़ी सूखी सब्जी और अचार की एकाध फांक भी थी. यकीनन वह खुश थी कि दाताओं की इस उदारता के कारण आज उसे द्वार-द्वार मांगने की झंझट नहीं उठानी पड़ी. और कम से कम रात तक का भोजन उसके पास जुट गया है.

बाकी बच्चे अपने-अपने भाग्य का खाते या अपने रीते हाथों पर कुढ़ते हुए, उसकी प्रचुर खाद्य-संपदा को इस प्रकार तकने लगे मानों उन्हें उसके भाग्य पर ईर्ष्या हो रही हो. एकाध छोटे बालक ने उसके सामने हाथ पसारकर कुछ देने की याचना उसी ढंग से की जैसे उसकी साथिन एक भिखारी नहीं, दाता हो. बालिका ने उसे ऐसे अंदाज में झिड़क दिया जैसे कोई कंजूस सेठ किसी भिखारी को दुरदुराए.

वह सीधी प्लेटफ़ॉर्म के कोने में, पेड़ के नीचे बने बाथरूम में घुस गई. खाद्य-संपदा को उसने अपनी ओढ़नी में लपेटकर पेड़ की जड़ के पास एक ईंट से दबाकर रख दिया.

थोड़ी देर बाद जब वह बाथरूम से निकली तो एक ऐसा दृश्य उसके सामने था जिसकी उसे कल्पना भी नहीं हो सकती थी. एक भिखमंगा बालक कलुआ बड़े इत्मीनान से पैर पसारे वहीं बैठा, उसकी रोटियाँ आराम से खा रहा था. साफ पता लग रहा था कि उसने कुछ हिस्सा तो जल्दी-जल्दी उदरस्थ कर लिया था. अब जो बचा था उसे वह धीरे-धीरे चबाकर ठूंसना चाहता था.

बालिका उस ‘कलूटे’ को बहुत दिनों से जानती है. कभी-कभी अपना बड़प्पन क़ायम रखती हुई वह उससे बोल-बतरा भी लिया करती है. जिस दिन उसे बिल्कुल भी रोटी नहीं मिल पाती थी और उसके पास जरूरत से कुछ अधिक रोटियाँ होतीं, तो वह बड़ी उदारता पूर्वक एकाध रोटी उसे भी अहसान जताते हुए, दे देती थी. मगर कलुओ एक दिन ऐसा दुःसाहस कर पाएगा, यह तो उसने सोचा तक नहीं था.

मारे गुस्से के पेचोताब खाती कुछ पल तो वह सोच ही नहीं सकी कि कलूटे को ऐसी कौन-सी नंगी और नुकीली गाली दे जो उसको वास्तव में चुभकर तिलमिला दे. फिर शायद यह सोचकर कि ऐसी गाली भी उसके पेट से रोटी तो वापस नहीं निकाल लेगी, वह पेटीकोट से अपने गीले हाथ पोंछना छोड़, पैर पटककर चिल्लाई, “क्यों बे कलूटे, ये रोटियाँ तूने यहाँ से उठाई हैं, ऐं?”

“हाँ.” कलुआ निर्विकार भाव से कौर निगलते हुए, ऐसे उत्तर दिया मानों यह कोई बात ही न हो और रोटियों से हाथ खींच लिया.

“अबे कुत्ते ! क्यों उठाई तूने मेरी रोटियाँ ?” वह और जोर से चीख़ी.

“मैं रातभर से भूखा था,” कलुआ बोला, “इस टैम बी एक टुकड़ा तक नईं मिला. तू इत्तीसारी रोटियों का, का करती ऐं ?”

“भूख लगी तो क्या मैं तेरी अम्मा लगूं हूँ के लुगाई, जो मेरी रोटियाँ खा गया. कुच्छ नईं मिला था तो मेरे से मांग लेता. मेरी रोटियाँ तूने उठाईं क्यों !”

“जोरों की भूख लगी थी न.” कलुआ मिनमिनाया, “क्या पता तू देती बी के नईं.”

वह तिलमिलाकर दाँत पीसती हुई बोली, “मैं बी तो रात से भूखी हूँ ! कित्ती मुसकल से मैंने जे पाई थीं... और... तूने... ! ”

“मरी काहे जाती है !” कलुआ उसकी बात काटकर जल्दी से बोला, “सारी तो नईं भकस लीं, इत्ती जो बची है तू खा ले !”

“कुत्ते-कमीने ! हरामी के पिल्ले ! रंडी के जने !” बालिका के मुँह से एकदम गालियों की बौछार शुरू हो गई, जिसे वह अब तक दबाए हुए थी !

गालियाँ बकते-बकते ही उसने झपटकर बाकी बची रोटियाँ उठाई और उस तरफ फेंक दी जहाँ पटरियों के बीच गंदी कीचड़ और पानी जमा हो गया था ! तीन-चार कौए कहीं से ताककर आए और अपनी-अपनी चोंच में जितने समाए उतने टुकड़े छपटकर उड़ गए. एक मरियल कुत्ता बूते भर भौंकता लपका और जो कुछ बच गया था उस पर जीभ लपलपाने लगा.

रोटियाँ फेंककर वह मुड़ी तो कलुआ वहां से तिड़ी हो चुका था. अब बालिका के मुँह पर क्रोध व आवेश का स्थान एक प्रकार के मलाल ने ले लिया था. वह रूआँसी हो रही थी.

ऐसे विवाद का मज़ा लेने के लिए इस बीच दो-तीन भले-मानस वहाँ आदतन जमा हो गए थे. बालिका को रुआँसी देखकर एक व्यक्ति ने उससे कहा, “क्यों री, तूने रोटियाँ फेंक क्यों दीं ?”

“अब क्या खाएगी ? अपनी सास का कलेजा ?” दूसरे ने व्यंग्य किया.

“यों ही झूठ बक रही थी कि रात से भूखी हूँ.” तीसरे ने तनिक त्यौरी चढ़ाकर टिप्पणी की.

“नईं बाऊजी, मैं झूठ नईं बोल रई. मेरे को रात से कुच्छ बी खाने को नईं मिला. कित्ती मुसकल से तो इत्ती चीज़ें मांगी थीं के पेट भर खाने को होती.” वह रुआँसे स्वर में बोली.

“मरी ! तो तूने उन्हें फेंक क्यों दिया ?” पहले वाले महाशय ने अपना प्रश्न दोहराया.

बालिका एक-दो क्षण तक बेहद घृणा से उस ओर घूरती-सी रही जिस तरफ कलुआ गया था. फिर बोली, “ये कलुआ न, ये स्साला भंगी है.”

इन शब्दों के साथ उसने पच्च-से जमीन पर थूक दिया और उदासी में डूबी एक ओर चल पड़ी.

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रचनाकार – चर्चित साहित्यकार स्वामी वाहिद काज़मी की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :

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ग़ज़ल (१)
जब भी गिरता है नीर आँखों से,
झरने लगती है पीर आँखों से.

उसके झोले में चाँद सूरज हैं,
वो, जो दिखता फकीर आँखों से.

खींच देगा वो आज सीने पर,
पीर की एक लकीर आँखों से.

फिर ना जाने, गई कितनी जानें
उसने छोड़े जो तीर आँखों से.

पंखुरी लब की चूमने निकली,
ओस भी बे-नजीर आँखों से.

ग़ज़ल (२)

पीर है, प्यार है, जमाना है
और हम हैं, हमें निभाना है.

आँधियों को सहेज भी लेता,
नीड़ लेकिन मुझे बनाना है.

रात भर करवटें बदलता हूँ,
नींद है, या कि छ्टपटाना है.

तू ना मेरी तरह परेशां हो,
तू, ना मेरी तरह दीवाना है.

चुप हुई रूह इस तरह अपनी,
जिस्म जैसे कि कैदखाना है.

ग़ज़ल (३)
अपनी ही गल्तियों से, उछ्ले मेरे फ़साने
लोगों ने बहुत रोका, हम थे कि हम ना माने.

उनकी सियासतों ने कितना दिया वतन को,
आबाद कब्रगाहें, रोशन यतीमख़ाने.

बस इस तरह से बीते है जिन्दगी हमारी,
साँसों का कर्ज, आहों से हम लगे चुकाने.

मिलके जो उनसे लोटे, ये हाल था हमारा
ना होश थे ठिकाने, ना हम रहे ठिकाने.

पतझर, बसंत, फागुन, बारिश, बहार, सरदी
सूरत बदल के मौसम, आते रहे लुभाने.

जिस भी तरफ गए हम, टूटा है दिल हमारा
कोई कभी तो आए, 'मजलूम' को बचाने.

ग़ज़ल (४)
उसको गर अब उड़ान दे मालिक,
तो नया आसमान दे मालिक.

जिसमें घर का सुकून मिलता हो,
मुझको ऐसा मकान दे मालिक.

अपनी बातों से आग ना बरसे,
हमको मीठी जुबान दे मालिक.

आ के मजहब की बात में निसदिन,
कोई क्यूँ अपनी जान दे मालिक.

प्यार बच्चों को बाँटने दीजे,
मजहबों का ना ज्ञान दे मालिक.

सारी आजमाईशें मेरी ही क्यों?
वो भी तो इम्तिहान दे मालिक.

ग़ज़ल (५)
जितनी तेज दुपहरी होगी,
छाया उतनी गहरी होगी.

दुआ ना आ पाई मुझ तक क्यूँ?
कहीं राह में ठहरी होगी.

बाई ने ही पाला होगा,
बच्चे की माँ शहरी होगी.

झूठे लोग- मुकदमे झूठे,
पर खामोश कचहरी होगी.

तन्हाई रोशन है जिससे,
कोई याद सुनहरी होगी.

जिसने दिल की बात ना समझी,
दुनिया गूँगी-बहरी होगी.

ग़ज़ल (६)
मुश्किलों से भरी है डगर देखिए
वक्त से दुश्मनी का असर देखिए.

याद में रात भर जिसकी जागेंगे हम
सो रहा है यहाँ बेखबर देखिए.

दर्द पलकों के नीचे मचलने लगा
इस नदी में उठी जो लहर देखिए.

कौन जाने कि कल हम रहें ना रहें
आज हैं, तो जरा-सा इधर देखिए.

होश की बात करते रहे उम्र भर.
वो ही बेहोश हैं, इक नजर देखिए.

ग़ज़ल (७)
जुगनू लेकर अड़ा हुआ हूँ
रात के आगे खड़ा हुआ हूँ.

ठोकर खा-खा कर सीखा है,
ऐसे ही तो बड़ा हुआ हूँ.

सबकी प्यास बुझाई मैंने,
जाम-सा टूटा पड़ा हुआ हूँ.

बाहर बाहर फूल-सा कोमल,
भीतर भीतर कड़ा हुआ हूँ.

फाँस बना हूँ, दुनिया भर की-
दो आँखों में गड़ा हुआ हूँ.

ग़ज़ल (८)
जितने गहरे रिश्ते होंगे,
उतने ज्यादा रिसते होंगे.

उस बस्ती में बुत महँगे हैं,
तय है इन्सां सस्ते होंगे.

पीढ़ी-दर-पीढ़ी काँधों पर,
वही पुराने बस्ते होंगे.

मेरे-तेरे सम्बन्धों पर,
दुनिया वाले हँसते होंगे.

पंछी दो दानों की खातिर,
नित जालों में फँसते होंगे.

ग़ज़ल (९)
जीने को हैं बहुत जरूरी,
आधे सपने, नींदें पूरी.

चाहा जिसको उसे ना पाया,
साध हमारी रही अधूरी.

सपने कैसे सच हो पाते?
किस्मत की थी नामंजूरी.

आहें देखी, आँसू देखे;
किसने देखी है मजबूरी?

जिस्मों-जिस्मों मिलना देखा,
रूहों-रूहों देखी दूरी.

ग़ज़ल (१०)
मँझधार में ना छोड़ के जाने की बात कर,
झूठा ही सही प्यार निभाने की बात कर.

किसने निभाई दोस्ती किसने दगा दिया,
तू अपनी बात कर, ना जमाने की बात कर.

माना कि बड़ी मुश्किलें हैं सामने तेरे,
जैसे भी सही रब्त निभाने की बात कर.

मस्जिद की बात कर ना शिवाले की बात कर,
एक ताजमहल और बनाने की बात कर.

गीता-कुरान-बाइबिल वो आप पढ़ेगा,
बच्चे को अपने प्यार पढ़ाने की बात कर.

रातों की ओर देख ना तारों की ओर देख,
रुखसार से बस जुल्फ हटाने की बात कर.

जाति के भेदभाव के मसले निकाल दे,
'संजय' दिलों में प्यार जगाने की बात कर.

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महान् लेखक मार्क ट्वेन पांडुलिपि में विराम-चिह्नों का प्रयोग नहीं ही करते थे. एक बार अपनी एक पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशक को भेजते हुए उन्होंने लिखा-

महोदय, एक नई पुस्तक की पांडुलिपि प्रकाशनार्थ भेज रहा हूँ. कृपया इन चिह्नों :-

: ; ….. ‘’ “” – ( ) ? !

को पुस्तक के समस्त वाक्यों में यथास्थान, आवश्यकतानुसार लगवा देंगे.

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प्रसिद्ध नाटक-लेखक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ एक दफा एक प्रीति भोज में किसी महिला से बातें कर कर रहे थे. शॉ लगातार घंटे भर तक अपने बारे में बोलते ही रहे. अचानक उन्हें ध्यान आया कि उन्होंने तो उस महिला को बोलने का कोई मौका ही नहीं दिया.

वे उस महिला से बोले, “माफ कीजिएगा, मैं भी कितना अशिष्ट हूँ, सारा समय अपने बारे में ही बात करता रहा. खैर कोई बात नहीं, आइए दूसरे विषय में बात करते हैं. हाँ, तो यह बताइए कि आपको मेरा नया नाटक कैसा लगा?”

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स्व. जमनालाल बजाज ने वर्धा में एक मंदिर बनवाया जिसमे सवर्ण हिन्दुओं के साथ ही हरिजनों के प्रवेश की भी व्यवस्था थी. (उस जमाने में आमतौर पर मंदिरों में हरिजनों का प्रवेश वर्जित होता था). इसे शास्त्र सम्मत बताने के उद्देश्य से उन्होंने प्रसिद्ध विद्वान् डा. भगवानदास को लिखा- “आप कुछ ऐसे श्लोक शास्त्रों में से चुनकर हमें भेजें जो हरिजनों के मंदिर प्रवेश का समर्थन करते हों. इन श्लोकों को मंदिर प्रवेश द्वार पर अंकित कराया जाएगा.”

डा. भगवानदास ने शास्त्रों में खोज-बीन की परंतु उन्हें इस तरह के कोई श्लोक नजर नहीं आए. निदान उन्होंने स्वयं दो श्लोक बनाकर भेजे और लिखा – “इन्हें मंदिर की दीवारों पर लिखवा दो. सौ साल बाद ये भी पुराने हो जाएंगे और चल निकलेंगे.”

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एक दिन एक ड्राइवर ने सुप्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग के घर के रोड-साइड में लगे वृक्ष को बस से टकराकर नुकसान पंहुचा दिया. किपलिंग को बड़ा क्रोध आया. उन्होंने बस के मालिक को ड्राइवर की शिकायती चिट्ठी लिख भेजी. बस के मालिक का एक होटल था. उसने होटल में ग्राहकों के समक्ष वह चिट्ठी नीलामी के लिए रख दी. वह चिट्ठी दस शिलिंग में नीलाम हो गई.

पत्र का उत्तर नहीं मिलने पर किपलिंग ने और भी कड़े शब्दों का प्रयोग करते हुए बस मालिक को एक पत्र और लिखा. परंतु उस पत्र को भी नीलामी में होटल मालिक ने एक पौंड में बेच दिया.

जब फिर जवाब नहीं मिला तो किपलिंग स्वयं गुस्से में आग बबूला होते हुए बस मालिक के पास पहुँचे और बस मालिक को फटकार लगाई.

बस मालिक ने माफी माँगते हुए कहा, “महोदय, मैंने आपके पत्रों का उत्तर जानबूझ कर नहीं दिया. मुझे आशा थी कि आप मुझे नित्य ऐसा पत्र भेजते रहेंगे. बस की अपेक्षा आपके पत्रों से मुझे ज्यादा आमदनी होने लगी थी.”

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आउटलुक के संपादक विनोद मेहता एक पार्टी में गए. वहाँ कुछ नेता आपस में बात कर रहे थे. उनके पास पहुँचते ही कुछ हलचल मची. उनमें से एक ने विनोद मेहता से कहा – “मैं आपकी मौजूदगी में सहज नहीं हूँ.”

विनोद मेहता ने कहा, “ऐसा ही होना चाहिए.”

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जॉर्ज बर्नार्ड शॉ अंग्रेजी के वर्तनी और उसके उच्चारण दोषों को बिलकुल वाहियात मानते थे. इस बात को सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक शब्द रचा – Ghoti.

फिर लोगों से इसका उच्चारण पूछा.

जाहिर है, कुछ लोगों ने इसका उच्चारण घोटी बताया तो कुछ ने कहा गोटी.

बर्नार्ड शॉ ने कहा, नहीं - इसका उच्चारण होगा ‘फ़िश’

सबने आश्चर्य से पूछा, कैसे ?

उन्होंने बताया- जैसे Cough में gh = फ़, Women में o= ि, और Nation में ti=श होता है, वैसे ही !
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-सआदत हसन मण्टो

नगर-नगर ढिंढोरा पीटा गया कि जो व्यक्ति भीख मांगेगा, उसको गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. गिरफ़्तारियाँ आरंभ हुईं. लोग खुशियाँ मनाने लगे कि बहुत पुराना अभिशाप दूर हो गया.

कबीर ने यह देखा तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. लोगों ने पूछा, “ऐ जुलाहे ! तू क्यों रोता है ?”

कबीर ने रोकर कहा- कपड़ा दो चीजों से बनता है- ताने और पेट से. गिरफ़्तारियों का ताना तो आरंभ हो गया, पर पेट भरने का पेटा कहाँ है?

एक एम.ए.एल-एल.बी. को दो सौ खुड्डियां अलाट हो गईं. कबीर ने यह देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए.

एम.ए.एल-एल.बी. ने पूछा, “ऐ जुलाहे के बच्चे ! तू क्यों रोता है ? क्या इसलिए कि मैंने तेरा अधिकार छीन लिया है ?”

कबीर ने रोते हुए उत्तर दिया- “तुम्हारा कानून तुम्हें यह नुक्ता समझाता है कि खुड्डियां पड़ी रहने दो और सूत का जो कोटा मिले, उसे बेच दो. मुफ़्त की खटपट से क्या लाभ ? परंतु यह खटपट ही जुलाहे की जात है.”

छपी हुई पुस्तक के फर्में थे, जिनके छोटे-बड़े लिफ़ाफ़े बनाए जा रहे थे. कबीर का उधर से गुजरना हुआ. उसने दो तीन लिफ़ाफ़े उठाए और उन पर छपा हुआ लेख देखकर उसकी आँखों में आँसू आ गए. लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने आश्चर्य से पूछा-

“मियाँ कबीर तुम क्यों रोने लगे ?”

कबीर ने उत्तर दिया- “इन कागजों पर भक्त सूरदास की कविता छपी हुई है. लिफ़ाफ़े बनाकर अनादर न करो.”

लिफ़ाफ़े बनाने वाले ने आश्चर्य से कहा-

“जिसका नाम सूरदास है वह भक्त नहीं हो सकता.”

कबीर ने फूट-फूटकर रोना आरंभ कर दिया.

एक ऊँचे भवन पर लक्ष्मी की बहुत सुंदह मूर्ति स्थापित थी. लोगों ने जब उसे अपना दफ़्तर बनाया, तो उस मूर्ति को टाट के टुकड़ों से ढांप दिया. कबीर ने यह देखा तो आँखों में आँसू उमड़ आए. दफ़्तर के लोगों ने उसे ढांढस दिया और कहा, “हमारे धर्म में यह बुत उचित नहीं.”

कबीर ने टाट के टुकड़ों की ओर अपनी भीगी हुई आँखों से देखते हुए कहा- “खूबसूरत चीज को बदसूरत बना देना भी किसी धर्म में उचित है !”

दफ़्तर के लोग हँसने लगे, कबीर दहाड़ें मार-मारकर रोने लगा.

पंक्ति में सजी हुई फ़ौजों के सामने जरनैल ने भाषण करते हुए कहा- “अनाज कम है, कोई परवाह नहीं. फसलें तबाह हो गयी हैं, कोई चिंता नहीं ! हमारे सिपाही शत्रु से भूखे ही लड़ेंगे.”

दो लाख फौजियों ने जिन्दाबाद के नारे लगाने आरंभ कर दिए.

कबीर चिल्ला चिल्ला कर रोने लगा. जरनैल को बहुत गुस्सा आया. वह पुकार उठा - “ऐ व्यक्ति बता सकता है, तू क्यों रोता है ?”

कबीर ने रोनी आवाज में कहा- “ऐ मेरे बहादुर जरनैल ! भूख से कौन लड़ेगा ?”

दो लाख व्यक्तियों ने कबीर मुर्दाबाद के नारे लगाने शुरू कर दिए.

“भाइयों दाढ़ी रखो, मूंछें कुतरवाओ और शरई पाजामा पहनो. – बहनों ! एक चोटी करो. सुर्खी पाउडर न लगाओ. बुर्का पहनो.”

बाजार में एक व्यक्ति चिल्ला रहा था तो कबीर ने यह देखा. उसकी आँखें आँसुओं से डबडबा आयीं.

चिल्लाने वाले व्यक्ति ने और अधिक चिल्लाकर पूछा, “कबीर, तू क्यों रोने लगा ?”

कबीर ने अपने आँसू रोकते हुए कहा - “तेरा भाई है, न तेरी बहन और यह जो तेरी दाढ़ी है इसमें तूने वस्मा क्यों लगा रखा है ? – क्या यह सफेद अच्छी नहीं थी ?”

चिल्लाने वाले ने गालियाँ देनी आरंभ कर दीं. कबीर की आँखों से टप-टप आँसू गिरने लगे.

एक जगह बहस हो रही थी.

“साहित्य-साहित्य के लिए है.”

“सर्वथा बकवास है. साहित्य जीवन के लिए है.”

“वह जमाना लद गया. – साहित्य प्रोपेगण्डे का दूसरा नाम है.”

“तुम्हारी ऐसी की तैसी-”

“तुम्हारे स्टालिन की ऐसी की तैसी-”

“तुम्हारे रूढ़िवाद और अमुक-अमुक रोगों के मारे हुए फलाबियर बाउलियर की ऐसी की तैसी.”

कबीर रोने लगा. बहस करने वाले बहस छोड़कर उसकी ओर आकर्षित हुए. एक ने उससे पूछा-

“तुम्हारे तनमन में अवश्य कोई ऐसी वस्तु थी, जिसे ठेस पंहुची है.”

दूसरे ने कहा- “ये आँसू बुर्जुआई दुःख का परिणाम हैं.”

कबीर और अधिक रोने लगा. बहस करने वालों ने तंग आकर एक साथ प्रश्न किया - “मियाँ यह बताओ कि तुम रोते क्यों हो ?”

कबीर ने कहा- “मैं इसलिए रोया था कि आपकी समझ में आ जाए – साहित्य-साहित्य के लिए है या साहित्य जीवन के लिए है.”

बहस करने वाले हँसने लगे. एक ने कहा - “यह पोल्तारी मसखरा है.”

दूसरे ने कहा - “नहीं, यह बूर्जुआई बहुरूपिया है.”

कबीर की आँखों में फिर आँसू आ गए.

कानून लागू हो गए, नगर की समस्त वेश्याएँ एक महीने के अंदर-अंदर विवाह कर लें और शरीफाना जीवन व्यतीत करें.

कबीर एक चकले के सामने गुजरा तो वेश्याओं के उतरे हुए चेहरे देखकर उसने रोना आरंभ कर दिया. एक मौलवी ने उससे पूछा – “मौलाना, आप क्यों रो रहे हैं?”

कबीर ने रोते हुए उत्तर दिया- “नीति के अध्यापक इन वेश्याओं के पतियों के लिए क्या व्यवस्था करेंगे ?”

मौलवी, कबीर की बात न समझा और हँसने लगा. कबीर की आँखें और अधिक आँसू बहाने लगीं.

दस-बारह हजार की सभा में एक व्यक्ति भाषण कर रहा था- “भाइयो ! विरोधियों से छुड़ाकर लायी हुई महिलाओं की समस्या हमारी सबसे बड़ी समस्या है. इसका हल हमें सबसे पहले सोचना है. यदि हम ग़ाफ़िल रहें, तो ये औरतें वेश्यालयों में चली जाएंगी – बाजारी बन जाएंगी. – सुन रहे हो, बाजारी बन जाएंगी. तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम उनको भीषण भविष्य से बचाओ और अपने घरों में उनके लिए स्थान पैदा करो. अपनी, अपने भाई की या अपने बेटे की शादी करने से पहले तुम्हें इन औरतों को कदापि-कदापि भूलना नहीं चाहिए.”

कबीर फूट-फूटकर रोने लगा. भाषण करने वाला रुक गया. कबीर की ओर संकेत करके उसने ऊँची आवाज में उपस्थित लोगों से कहा- “देखा, इस व्यक्ति के दिल पर कितना प्रभाव हुआ है ?”

कबीर ने भर्राई हुई आवाज में कहा- “शब्दों के बादशाह ! तुम्हारे भाषण ने मेरे हृदय पर कुछ प्रभाव नहीं किया – मैंने जब सोचा कि तुम किसी मालदार औरत के साथ शादी करने के उद्देश्य से अभी तक कुंआरे बैठे हो, तो मेरी आँखों में आँसू आ गए.”

एक दुकान पर यह बोर्ड लगा हुआ था, “जिन्नाह बूट हाउस”

कबीर ने देखा, तो ताबड़तोड़ रोने लगा.

लोगों ने देखा कि एक व्यक्ति खड़ा है, बोर्ड पर आँखें जमी हैं, और रोए जा रहा है. उन्होंने तालियाँ बजाना आरंभ कर दीं- “पागल है, पागल है.”

देश का सबसे बड़ा क़ाइद (नेता) चल बसा, तो चारों ओर शोक के बादल छा गए. प्रायः लोग भुजाओं पर काले बिल्ले बांधकर फिरने लगे. कबीर ने यह देखा, तो उसकी आँखों में आँसू आ गए. काले बिल्ले वालों ने उससे पूछा- “तुम्हें क्या दुःख पहुंचा जो तुम रोने लगे ?”

कबीर ने उत्तर दिया- “ये काले रंग की चंदियाँ (बिल्ले) यदि जमा कर ली जाएँ तो सैकड़ों की नग्नता ढंक सकती है.”

काले बिल्ले वालों ने कबीर को पीटना आरंभ कर दिया. तुम साम्यवादी हो- कम्यूनिस्ट हो- फ़िफ़्थ काल्मिस्ट हो ! पाकिस्तान के गद्दार हो.

कबीर हँस पड़ा, “परंतु दोस्तो, मेरे बाजू पर तो किसी रंग का बिल्ला नहीं.”

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रचनाकार – उर्दू के जानेमाने कथाकार सआदत हसन मण्टो की कहानियाँ मार्मिक व्यंग्य प्रस्तुत करती हैं, जिन्हें पढ़ पाठक सचमुच रो देता है.


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ग़ज़ल 1
- इब्न – ए – इंशा
देख हमारे माथे पर यह दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ
हमसे अजब तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियाँ

अहल-ए-वफ़ा से बात न करना, होगा तेरा उसूल मियाँ
हम क्यों छोड़ें उन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ

यूँ ही तो नहीं दश्त में पहुँचे, यूँ ही तो नहीं जोग लिया
बस्ती बस्ती कांटे देखे, जंगल जंगल फूल मियाँ

यह तो कहो है इश्क़ किया, जग में हुए हो रुसवा भी?
इसके सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियाँ

नस्ब करें मेहराब-ए-तमन्ना, दीदः-ओ-दिल को फ़र्श करें
सुनते हैं वो कू-ए-वफ़ा में आज करेंगे नुजूल मियाँ

सुन तो लिया किसी नार की ख़ातिर काटा कोह निकाली नहर
एक जरा से क़िस्से को अब देते क्यों हो तूल मियाँ

खेलने दें उन्हें इश्क की बाज़ी, खेलेंगे तो सीखेंगे
क़ैस की या फ़रहाद की ख़ातिर खोलेंगे स्कूल मियाँ

अब तो हमें मंजूर है यह भी शहर से निकलें, रुसवा हों
तुझको देखा, बातें कर लीं, मिहनत हुई वसूल मियाँ

‘इंशाजी’ क्या उज्र ह तुमको नक़्द-ए-दिल-ओ-जाँ नज्र करो
रूप नगर के नाके पर यह लगता है महसूल मियाँ

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दश्त-ए-तलब= इच्छा का जंगल, मामूल= नियम, नस्ब करें= लगाएँ, नुज़ूल= आएंगे, क़ैस= मजनूं

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ग़ज़ल 2
-जावेद वशिष्ट

तुम जो हुस्न की बात करो हो, वो भी इक पर्दा है मियाँ
जुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार से आगे और भी इक दुनिया है मियाँ

काबे में क्या ढूंढ रहे हो, काशी में क्या खोजो हो
सब कुछ अपने ही अंदर है, बाहर क्या रक्खा है मियाँ

कौन हो तुम यह तो पहचानो, समझो कुछ मेरी मानो
अपनी अना का राज भी जानो ! आगे नाम-ए-खुदा है मियाँ

यह मेरा यह तेरा कैसा ? कैसी तू-तू मैं-मैं है
रेत से किसकी प्यास बुझी है, दरिया तक प्यासा है मियाँ

यह दुनिया सपने की माया, आँख खुले तो कुछ भी नहीं
साए के पीछे मत भागो ! साया फिर साया है मियाँ

रमता जोगी, बहता पानी, आज यहाँ कल जाने कहाँ
नगरी नगरी बस्ती बस्ती जोगी का फेरा है मियाँ

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ग़ज़ल 3
-सैयद मुहम्मद मीर ‘सोज़’

मेरी जान जाती है- यारो ! संभालो
कलेजे में कांटा चुभा है निकालो

न भाई मुझे जिन्दगानी, न भाई
मुझे मार डालो, मुझे मार डालो

खुदा के लिए ऐ मेरे हमनशीनो !
ये बांका जो जाता है इसको बुलालो

अगर वो न आवे तुम्हारे कहे से
तो मिन्नत करो घेरे-घेर बुलालो

अगर्चे ख़फा हो के वो गालियाँ दे
तो दम ले रहो कुछ न बोलो न चालो

कहो एक बन्दा तुम्हारा मरे है
उसे जांकनी से तो आकर बचा लो

जलों की बुरी आह होती है प्यारे
तुम इस ‘सोज़’ की अपने हक़ में दुआ लो

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ग़ज़ल 4

-मुहम्मद दीन ‘तासीर’

मेरी वफ़ाएँ याद करोगे
रोओगे फरियाद करोगे

मुझको तो बरबाद किया है
और किसे बरबाद करोगे

हम भी हँसेंगे तुम पर एक दिन
तुम भी कभी फरियाद करोगे

महफ़िल की महफ़िल है ग़मगीं
किस किस के दिल शाद करोगे ?

दुश्मन तक को भूल गए हो
मुझको तुम क्या याद करोगे

खत्म हुई दुशनाम तराज़ी,
या कुछ और इरशाद करोगे

जाकर भी नाशाद किया था
आकर भी नाशाद करोगे

छोड़ो भी ‘तासीर’ की बातें
कब तक उसको याद करोगे ?

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ग़मगीं= शोकातुर, शाद= प्रसन्न, तराज़ी= गाली देना, नाशाद= खिन्न

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ग़ज़ल 5

-‘शाद’ आरिफ़ी

चमन को आग लगाने की बात करता हूँ
समझ सको तो ठिकाने की बात करता हूँ

सहर को शम्अ जलाने की बात करता हूँ
ये गाफ़िलों को जगाने की बात करता हूँ

वो बाग़बान जो पौदों से बैर रखता है
ये आप ही के जमाने की बात करता हूँ

शराब-ए-सुर्ख की मौजों से मुद्दआ होगा
अगर मैं खून बहाने की बात करता हूँ

वो सिर्फ अपने लिए जाम कर रहे हैं तलब
मैं हर किसी को पिलाने की बात करता हूँ


यहाँ चिराग तले लूट है अन्धेरा है
कहां चिराग जलाने की बात करता हूँ


उस अंजुमन से उठा हूँ खरी खरी कहकर
फिर अंजुमन में न आने की बात करता हूँ


दबी ज़बां से गुजारिश है नागवार अगर
तो क्या सवाल उठाने की बात करता हूँ


निकाब-ए-रू-ए-जमाना न उठ सकेगी कि मैं
गुलों से ओस उठाने की बात करता हूँ


घिसे हुओं को नई फिक्र दे रहा हूँ ‘शाद’
मंझे हुओं को सिखाने की बात करता हूँ
--*--


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-विजय

उरसुला ने ईंटों के चूल्हे पर चढ़ी देगची संडासी से उतारी और चूल्हे के आगे जमा हुई राख पर रख दी. चूल्हे में सूखी लकड़ियाँ चट-चट की आवाज कर रही थीं. उरसुला को लगा कि दूर झितिज पर जैसे आकाश जल रहा हो. उसे महसूस हुआ कि बत्तीस तैंतीस की उम्र तक आते-आते चटख चटखकर उसका अस्तित्व भी राख बन गया है.

ध्यान टूटते ही उसने दूसरी देगची में सांभर चढ़ा दिया, मिर्च कुछ चटख ही डाली क्योंकि लड़कों को पसंद है. सी सी करते हुए वे एक दूसरे को खूब छेड़ते हैं. उनकी छेड़छाड़ के बीच उरसुला भी जी लेती है. चूल्हे की दो लकड़ियों को उसने अंदर की तरफ कोंचा जिससे आग धीमी हो जाए. सांभर की दाल में सौंधापन आ जाए और वह ठीक से गल जाए.

आग धीमी तो हो गई मगर बुझे हुए हिस्सों से धुंआ भी फूट पड़ा. उरसुला को लगा कि धुंआ-धुंआ होकर वह भी राख बन गई है.... राख जो दूसरों के खाने को कुछ देर गर्म रख पाती है. पेड़ से टूटी लकड़ी जैसा ही उसका हश्र हुआ.

चावल का मांड निकालने के लिए उरसुला कपड़े से देगची पकड़ती है... कपड़ा कहाँ? एक लड़के की झीनी चदरिया सी बनियान है. उरसुला की मूक ठिठकन को भांप कुर्ता उतार बनियान उछाल दी थी और पुनः कुर्ता धारण कर लिया था. बाकी के तीन लड़के हँसे थे... ‘त्याग!’

हँसा था लड़का भी, “त्याग कैसा? जिस दिन पुलिस के हत्थे चढ़ गया, ये सारे कपड़े फेक एनकाउंटर में खून से रंग जाएंगे. न मेरे काम आएंगे और न अम्मा की उंगलियाँ जलने से बचा पाएंगे.”

जेब से पॉलीथीन की छोटी थैली से कुछ निकाल दूसरा लड़का कहता है, “अपन तो इसे खाकर चैन की नींद सो जाएंगे, कपड़े पहने पहने स्वर्ग पहुँच जाएंगे.”

“स्वर्ग!” तीसरा लड़का कड़वाहट के साथ कहता है, “स्वर्ग अगर होता तो न्यूक्लीयर बम दिखा कर अमरीका इंद्र से कभी का छीन लेता और वहाँ रोज अपनी इंडस्ट्री के माल का बाज़ार लगाता.”

चौथा लड़का सब को डांटता है, “चुप! स्वर्ग में सब नंगे जाते हैं. खुद फोर्ड का वहाँ से ख़त आया है कि यहाँ तो मेरे पास फटा कोट भी नहीं है.”

चारों लड़के हंसे थे पर संजीदा हो गई थी उरसुला. उसे नन्हे बच्चों को मौत की बातें करना अच्छा नहीं लगा था.

उरसुला को कभी कोई और कभी कोई लड़का अपनी कोख से जाया लगता... पर कोख! आठ साल पहले बाप या शायद उसके बेटे के तेजाब से जाग उठी थी कोख पर लालची कुतिया जो सफाई करने आती थी खुफिया बन गई, बोल दिया इनाम के लालच में मालिकों से... “नाई मालिक, कोई कापुड़ नाई गिरा इस महीने.” फिर क्या था, बिस्तर ही बन गया बूचड़ खाना... भल.. भल.. खून बह उठा था जाँघों की दीवारों को नकारते हुए.

उरसुला चाहती है कि वजूद और इंसाफ की लड़ाई छेड़े इन लड़कों को बढ़िया खाना खिलाए. इनके साथ हंसने बोलने के लिए लड़कियाँ भी आएँ, पर अपनी बात कहे कैसे? दस साल से झूठ के सहारे मौन साधे हैं, मलयाली! नौ तेलुगू!

कभी इन्हीं लोगों को उरसुला डाकू समझ बैठी थी. जब समझी तो मन कातर हो उठा... स्कूल कॉलेज जाने के दिनों में ये जंगलों में बिखरे पड़े हैं. बल्लम, छुरा, देसी पिस्तौल क्या हजारों पुलिस फौज वालों के चमचमाते हथयारों से इन्हें बचा सकेंगे? कभी-कभी ढेर सारे लड़के अंधेरे में जमा हो जाते और बड़े जंगल से आकर राजैया समझाता, “लोगों में जमींदार, किसान, सेठ और पुलिस हमें बागी कहकर बदनाम करते हैं. पर क्या हम अपने सुख के लिए लड़ते हैं? हम क्या किसी निर्दोष को छूते हैं? कानून की संगीनों के सहारे आदमी को गुलाम बनाए रखने वाले भेड़ियों पर हम हमला करते हैं. भ्रष्ट लोगों की पुलिस सुरक्षा करती है. एक-एक कर हम सब जल्दी-जल्दी मरेंगे क्योंकि जिनके लिए हम लड़ रहे हैं वे धर्मभीरू और सहमे हुए हैं. गम बर्बर कहाँ हैं? हम तो अपनी गुलाम माताओं को आजाद कराना चाहते हैं. औरत गिरवी रखने का हक समाप्त करना चाहते हैं. जीने का हक छीनने वालों को यहाँ सरकार सुरक्षा देती है और जीने का हक मांगने वालों को गोली.”

पहली बार यह सब सुनकर सघन वृक्षों के मध्य मलमल कर नहाई थी उरसुला और तलैया में मुँह देखते हुए कंघी की थी. जिस्म के अलावा देने के लिए उसके पास था ही क्या? ...मगर शर्म से गड़ गई थी जब टोल के चारों लड़कों ने उसकी ओर बिना देखे दो बार अम्मा कहते हुए चावल मांगा. सोते में बूढ़ी हो जाने की आशंका भी जागी थी. फिर मुट्ठियाँ बंध गई थीं... कमीना. बड़े घर का मालिक आदिशंकराचार्य का फोटो फार्महाउस पर भी लगाए था और कर्म! ये बच्चे तो क्राइस्ट का संस्करण हैं जिन्हें एक-एक कर सलीब पर चढ़ जाना है. ...आह, जब कभी चावल कम पड़ जाता है तो कोई पेट थपथपाते कहता है... टैंक फुल हो गया, दूसरा जोर की डकार लेते हुए सोने के लिए खंडहर के कोने में चला जाता है. एक दिन सूखे पत्ते जमाकर कह रहे थे- आज डबल बैड पर सोकर देखते हैं. सुना है, बड़ा गहरा नींद आता है

उरसुला को याद आया था वह दिन जब उसका पति माइकिल बड़े आदमी के घर बहाने से छोड़ गया था. उस घर की औरतें दिन भर फल खाती रहीं क्योंकि उस दिन एकादशी थी. रसोई बनी नहीं इसलिए नौकरानियों को निराहार रहना पड़ा.

उसे घर में देख दादी अम्मा से लेकर बहू और बेटी तक ने खूब गालियाँ दीं. तीर से तेज प्रश्नों के जवाब में उरसुला गूंगी बन गई और यह जाहिर किया कि उसे तेलगू नहीं आती है. फिर वे हँसने लगीं... “जरूर इसकी मां के पास कोई बड़ा आदमी सोया होगा, इसीलिए तो इतनी सुन्दर है यह. अब यह हमारे हक के वीर्य को निरर्थक करेगी.”

उसे माइकिल से नफरत हो गई थी. माइकिल भी उसकी तरह इसी प्रदेश में मलयाली माता-पिता से जन्मा था. उरसुला के बाप की चिरौरी करके उसे ब्याह सका था मगर शादी के एक साल बाद यहाँ के कसबे में स्थानांतर होते ही बदल गया. बड़े घर के बाप और बेटे खूब दारू पिलाते. एक रात बेटे के साथ आया था नशे में गाफिल माइकिल. सिंहनी बन गई थी उरसुला तो चीखते हुए गया था बेटा, “इसे तो मेरा बाप नथेगा.”

होश आने पर उरसुला ने माइकिल के सीने पर मुक्के मारे थे मगर माइकिल पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा. उसे सिर्फ शराब के अलावा सारे रिश्ते और पवित्र ग्रंथ अनजाने लगते थे. जिससे शराब मिले वही अपना, ठीक सिक्कों की तरह. एक मुक्का शायद जोर का लगा था, चीखा था माइकिल- “हरामजादी! बढ़िया अंग्रेज़ी पिलाता है. एक बार सो लेती तो क्या घिस जाती. औरत लोग उसका तलवा चाटता है.” दूसरे दिन बहाने से माइकिल उसे बड़े आदमी के घर छोड़ आया था.

शाम होते ही नौकरानी ने बेसन मल के नहलाया. वह गुनगुना रही थी- “तू भाग्यशाली घोड़ी है, तुझ पर मख़मली जीन पड़ेगी. हम तो गधे का बोझ उठाते रहे” फिर ये समझते हुए कि उरसुला तेलगू नहीं जानती है अपने मर्द की चालाकी गाती रही जिसने खेत बचाने के नाम पर उसे गिरवी रख महीनों शराब पी होगी. धरम के नाम पर वह भागने से भी लाचार है.

अँधेरा होने से पहले बंद गाड़ी उसे फार्म हाउस पर छोड़ गई, जहाँ बड़े दाँतों वाला दत्तू उसको निगरानी में अन्दर ले गया. उसे देख हँसा था, ग्यारह टेढ़े दाँत हलकी कालिमा में बाहर निकल आए थे. रात बूढ़ी सलमा ने कई तरह के गोश्त बनाए और खुदा को गवाह बना उरसुला को सुनाती रही कि बदजात आदमी की सज़ा में औरत पराए बिस्तर पर पहुँच जाती है. अल्लाह ने औरत को सज़ा भुगतने के लिए ही बनाया है... फिर समझाया सराहा था- “तुम तो फार्म हाउस की रौनक बनी हो, घर पर तो दस जनानियाँ लहूलुहान रहती हैं काम से, घर का काम, फसल का काम... तुम्हारा हुस्न तुम्हारे काम आया. ऐश की कमी नहीं है यहाँ,” कहते हुए शराब की केबिनेट खोल दी थी. उस रात बूढ़े ने खूब उछलकूद की. हैरान थी हारे थके इंसान की हवस पर उरसुला. फिर गटागट शराब पी बेहोश हो गई थी. विजयी भाव से सोया था बूढ़ा. पाँच दिन खूब आराम किया उसने. छटे दिन बड़े आदमी का बेटा आ गया. सात दिन बाद छुट्टी वाले दिनों में बूढ़ा फिर आ गया... घिना उठी. बूढ़े की भूख पर उरसुला, पर लाचार थी.

खाना, सजना और फिर देह के खेल. पिंजरे में फड़फड़ाती उरसुला के दो ढाई वर्ष कट गए. पैंतरा बदला था उरसुला ने, गर्मी की भरी दोपहर में कई बार उपकृत किया दत्तू को, शराब पिलाई और उत्तेजित किया, बेहोश होने की हद तक. मालिक के बिस्तर पर उसकी रखैल के साथ लेटकर खुद को बादशाह मान मस्त हो जाता दत्तू.

एक दिन अवसर मिलते ही भागी थी. थाने में रोते और हाँफते हुए बलात्कारों की दास्तान सुनाई थी. सुनकर ए.एस.आई. ने जीप में तफतीश के बहाने बैठा बड़े आदमी के घर उसे छोड़ दिया था. समझ गई थी कि इस समाज में औरत पैसे वाले आदमी की वासना का नाश्ता और खुराक है. उस पैसे से व्यवस्था खरीद औरत रूपी आधी दुनिया को वह आसानी से कनीज बनाए रखता है. उसे धर्म, कानून और समाज बाँध नहीं सकते हैं.

घृणा से बाप बेटे ने दुत्कारा था. रखैल से दासी हो गई उरसुला. घर की औरतें अपने आदमी के अभाव में आधी रात तक पैर दबवातीं, सुबह पानी भरवाकर उन्हें खेतों की तरफ हांक दिया जाता. कुछ ऐसी ही औरतें उस पर हंसतीं- “इसे कहते हैं अपना भाग्य खुद फोड़ना” बत्तीस तैंतीस की होते उरसुला बूढ़ी हो गई.

उरसुला का ध्यान टूटता है... एक दिन बहुत खुश थे लड़के. एक लड़का पुराना अख़बार पढ़ते हुए बता रहा था- “बड़े मन्दिर हैं चेन्नई में, भक्त नंगे पाँव देवल जाते हैं और वहाँ सोना चाँदी चढ़ाते हैं. घरों में आदिशंकराचार्य का चित्र लटका रहता है. कुछ लोग राम विरोधी भी हैं, पर बात रईसों की है. रईस लोग देर रात ऐश करके लौटते हैं. पुलिस वाला रास्ते में रोक पाकिट से नोटबुक निकाल पूछता है- कहाँ गया था? आपने कहा कि किसी को देखने अस्पताल गया था या रिश्ते वालों में तो नंबर नोट... कल थाने में आएं. अगर कह दिया कि रखैल के यहाँ तो पुलिसवाला फौरन सलाम मारता है. समझ जाता है कि खानदानी रईस और रसूख वाला आदमी है.”

उरसुला को याद आई वह रात जब बड़े आदमी का बेटा रात फार्म हाउस पहुँच गया था. उरसुला ने इशारों में फरियाद की थी... “परसों तेरा बाप मेरे साथ...”

“झाड़ू मार बूढ़े को. सांप है, दौलत छुपा के रखा है नहीं तो मार के इधर गाड़ देता.” वह क्रोध में भुनभुनाया. फिर डुप्लीकेट चाबी से अलमारी खोल व्हिस्की निकाल ली थी.

सीने पर झुका बड़े आदमी का बेटा तो उरसुला की छाती में चेन से बंधा कास चुभा, सिसकी ली उरसुला और बेटा हिंस्र हो गया था. उरसुला को लगा कि शैतान वाचाल हो रहा. अब वह बेवल की मीनार उठाके ही रहेगा. सुबह नहाने से पहले बाहर परकोटे में पेड़ के नीचे बनी सांप की बांबी में क्रास सरका दिया था... जब इतने बलात्कारों से गुजर गई तो कब्र तक क्यों लादे रहे. इसे भी सहने दो सर्पदंश.

एक दिन जमादारिन ने बताया- “बाप बेटा त्रिपुति जाकर केश दे आया है. मैंने बेटे से पूछा तो बोला- मरने से पहले बूढ़े का क्रियाकर्म कर आया हूँ.” कहने के साथ हँसी थी जमादारिन बख्शीश की उम्मीद में.

उरसुला के अन्दर दर्द ने हिलोर ली थी... कुटनी तूने ही बाप बेटे को खबर दी... इस माह कोई कपड़ा नहीं मालिक... और ले आए थे वे डायन दाई. खाली कर गई थी पेट... भल-भल खून उसकी जांघों के बीच बह रहा था और दाई शाबासी पा रही थी.

उरसुला ने जमादारिन के सामने ही अपनी नफरत छुपाने के लिए शराब गिलास में डाल कर पीना शुरू कर दिया था. अचानक पीते-पीते हंसी थी उरसुला- “बच्चा हो जाता तो बाप बेटा लड़ता... मेरा है, मेरा है. फिर मुझसे पूछते.”

“क्या तुम बता सकती थीं कि किसका था?” जमादारिन ने पूछा था.

कहकहा लगाया था उरसुला ने... “तेरे होते कमीनी यह अवसर क्या कभी आ सकता है,” कहते हुए जमादारिन को धक्के देकर बाहर निकाल दिया था.

बड़े आदमी के घर में बेटे की बहू घंटों रात में पैर दबवाती. बेटे की बहू खोदती रहती- “तू रहता था न फार्म हाउस पर! उधर आता था न वह. सुना है अब कोई जहांनारा पहुँच गई है.”

उरसुला गुमसुम रहती तो लात झटक देती बेटे की बहू- “आठ दिन का बिल्ली का बच्चा भी म्याऊँ बोलना सीख जाता है... तू न सीखी न बोली.”

खेतों पर अपनी-अपनी माँ का दस से बारह बरस के लड़के लड़कियाँ हाथ बटाते. बड़े होते होते वे माँ पर होते अत्याचारों पर, हथेली पर मुक्का मार विरोध जताते. कुछ दिनों बाद बड़े होते ही अधिकांश भाग जाते. बाप आकर धर्म की कसम खाता और उसकी माँ की गुलामी की अवधि बढ़ा जाता. उनमें से कई मर्दों ने नई औरतें घर में रख ली थीं.

रात खुले में या जानवरों से बची जगहों पर औरतें सोतीं. एक दूसरे को छेड़तीं और फिर लिपटकर रोतीं... भगवान जाने कब हमारे अपराध क्षमा करेगा. अंधेरी रातों में पेट के ऊपर से कांप सरसराते हुए निकल जाते.

एक रात पहले भोर में जब अंतिम तारा आकाश से धरती पर निगाह जमाए था पंद्रह वर्ष की आनंदी ने आत्महत्या कर ली थी. लाश पर रोई भी दबे स्वर में थी उसकी माँ... बहुत मिन्नत की थी छोकरी ने,... मुझे छोड़ दे. तेरा बाप मेरा भी बाप है. पर माना नहीं.

लाश उठने से पहले पुलिस आई थी. चायपानी के बाद मुंशी ने पंचनामा सुनाया था... सर्पदंश से मृत्यु. मन ही मन कसमसाई थी उरसुला... हाँ सर्पदंश! पर सर्प का फन क्यों वहीं कुचलती है पुलिस. रिटायर्ड इंजीनियर दीक्षित ने जहाँ लाश रखी थी वहाँ हवन करा मोटी दक्षिणा लेते हुए बूढ़े से कहा था... कभी हमें भी...

उसी रात कुछ बागी लड़कों ने पक्के मकान के चारों ओर पेट्रोल छिड़क आग लगाकर उन्हें जगाकर कहा था... भागो. वे भागीं तो खेत खलिहान में भी आग लगा दी. चूहे, कुत्ते, औरतें और गाय बैल भाग रहे थे. अंदर चीखने की आवाज़ें उठ रही थीं. बड़े आदमी और उसके कुनबे को आग सूअर की तरह भून रही थी, बाहर लड़के हँस रहे थे.

भागी थी उरसुला भी. भागते भागते कहीं टकराकर गिरी तो बेहोश हो गई. होश आने पर खुद को लड़कों के बीच जंगल में पाया.

हाथ मुँह धोकर उरसुला चूल्हे के पास पहुँच जाती है. एक एक कर लड़के लौट रहे थे... रवि, पॉल, सत्यनारायण. उरसुला केले के पाँच पत्तों पर चावल रख बीच में गड्ढा कर सांभर डाल देती है. पूछना चाहती है कि असलम कहाँ है?

तभी रवि एक पत्ता सरकाते हुए कहता है... “असलम नहीं आएगा!”

“क्यों?”

उंगलियों में चिपके चावल छिड़क कर रवि चीखता है..., “वह मर गया. पुलिस ने उसे मार डाला.”

कुछ ठहरकर रुआँसे स्वर में रवि कहता है, “अंधी अम्मी ने खबर कराई थी कि नज़्मा को यहाँ से निकाल ले जा. नज़्मा को लेकर भाग रहा था असलम कि शाह के फोन पर पुलिस ने उसे मार दिया. लाश शहर भेज दी... एनकाउंटर में मारा गया आतंकवादी.”

उरसुला के हाथों में असलम की फटी बनियान आ जाती है, उरसुला चीख रही थी... “आतंकवादी? बच्चा था वह. पुलिस क्या बच्चों को भी मारने लगी है. अपनी बहन को गारत होने से बचाना क्या आतंकवाद है?”

अचानक रवि उरसुला से पूछता, “अम्मा तुमको तेलगू नहीं आता था न!”

भरभरा के रो पड़ती है उरसुला, रवि गंभीर हो जाता है क्योंकि रूदन की भाषा नहीं होती है, अहसास होता है रूदन. उरसुला फटी बनियान सीने से दबाए रोती रहती है. पॉल पास आकर कंधा सहलाता है, “रो मत अम्मा. आंसू बचाकर रख. हम सब इसी तरह एक-एक कर मरेंगे क्योंकि अपनी बंधक माताओं को हम आजाद कराना चाहते हैं. क्योंकि रिलीजन, व्यवस्था और खुद हमारे बाप हमारे खिलाफ हैं. हमारी मौत निश्चित है और यह भी निश्चित है कि हम कम नहीं होंगे.”

उरसुला पॉल का हाथ घबरा कर थाम लेती है. पॉल हाथ छुड़ाकर अपनी जगह बैठ जाता है, वह कह रहा था- “क्योंकि हमें शीघ्र मरना है, हमें दुःखी मत कर और चावल खाने दे. इसी चावल के प्रयोजन में हमारी माँ बंधक हैं. तू भी खा अम्मा. आज पाँच लोगों का चावल चार लोग खाकर ठीक से पेट भर सकेंगे.”

खाते हुए लड़के सामान्य हो जाते हैं. उरसुला को लगता है कि जीवन की विभीषिका के मुकाबले इन्हें मौत सहज लगती है.

अचानक सत्यनारायण कहता है, “असलम, शाह की नाजायज औलाद था. किसान बाप और न ही नाजायज बाप लाश लेने जाएगा. कैसी अजीब बात है कि हिंदुस्तान में मुश्किल से बीस लाख समृद्ध या हथियारबंद लोगों से सत्तानवे करोड़ लोग डरते रहते हैं. पुलिस भी कफन का पैसा गोलकर असलम को नंगा ही दफना देगी.”

उरसुला के अंदर कोख से टीस उठती है... काश कुटनी खबर नहीं देती तो उसका बेटा या बेटी असलम की जगह पाँचवे चावल पर बैठा होता.

पॉल के स्वर में तेजाब था- “बूढ़ा अरब का शेख जब नाबालिग लड़की को ले जाना चाहता है तो कानून मानवीयता का बुत बन जाता है मगर हजारों लाखों नाबालिग लड़कियों को चकलों में फंसा देखकर वह दृष्टि चुरा लेता है. हमारी गिरवी पड़ी माताएँ बलात्कार सहती हैं और कानून मुस्कराता रहता है. शाह का गिरवी औरत से जना लड़का पुलिस की गोली से मरता है और लाश को कफन नसीब नहीं.”

“नहीं!” मैं उढ़ाऊँगी उसे कफन. मैं दफन करूंगी उसे, “मैं दफन करूंगी उसे,” चीखती है उरसुला.

लड़कों के चेहरे पर दर्प झलक उठता है, “अम्मा हमारी बोली बोलती है. वह हमारी बंधुआ माताओं जैसी कमजोर, लाचार और धर्म के खूंटे से बंधी गाय नहीं है.”

खोजी कुत्ते की तरह असलम की फटी बनियान नाक पर लगा उरसुला दौड़ पड़ती है. पॉल चीखता है- “रुक जा अम्मा.”

रवि कहता है- “वह रुकेगी नहीं क्योंकि पहली बार वह अपने निजी दुःख की परछाईं से मुक्त हुई है.”

“शायद वह लौट आए!” सत्यनारायण कहता है.

“क्या हम सब हमेशा वापस लौट सकेंगे?” रवि पूछता है.

“लेकिन हमें अम्मा को तलाशना होगा. लौटाना होगा. मुद्दतों बाद कोई जंगल में हमारे लिए चावल पकाने के लिए रुका था.”

उरसुला और असलम के पत्तों के चावल को तीनों आपस में बांट लेते हैं.

पर उरसुला लौटी नहीं. लड़के सच्चाई, हक और इंसानियत के परचम लेकर गाँव गाँव घूमते. जिनके लिए वे संघर्ष कर रहे थे वे सामने आने से कतरा जाते. और एक रात जंगल में ही गोलियाँ चलीं. बचा था घायल रवि. अस्पताल से जेल आया था और जेल से उसे धक्का देकर अदालत जाने वाली गाड़ी के अंदर पहुँचा दिया गया था. चकित रह गया था रवि... कोने में बैंच पर बैठी थी उरसुला. सामने के दाँत टूट गए थे और अब बासठ की लग रही थी. रवि को देखा तो चहक उठी..., “चार दिन शाह ने रौंदा, पाँचवे दिन उसे खलास कर दिया मैंने.”

रवि उँगली होंठ पर रख चुप रहने के लिए कहता है मगर हुलस उठी थी उरसुला, “बाकी कहाँ हैं?”

रवि आकाश की तरफ ऊँगली उठा चुप हो जाता है.

अन्य कैदियों को अंदर धकेल संगीनधारी सिपाही खुद भी बैठते हुए द्वार बंद कर लेता है. ड्राइवर की बगल में बैठने वाला सिपाही बाहर ताला जड़कर ड्राइवर की बगल में आ बैठता है. गाड़ी चल पड़ती है.

उरसुला सिसक रही थी. सिपाही डपटता- “चुप कुतिया.”

भभक उठती है उरसुला- “तुम कमीनों के पहरेदार हो. शैतान के कहने पर बन रही बेवर की मीनार की हिफाजत करते हो. एक दिन ऊपर जाओगे तो रोओगे.”

सिपाही बन्दूक का बट उसकी तरफ बढ़ाता है. उरसुला का स्वर तेज हो जाता है- “मार डालो जिससे खेतों का बचा चावल और गले से खींचे मंगलसूत्र का सोना भी तुम्हें मिल जाए. तुम शैतान के सांप हो, इस बार तुम्हें नोहा की नाव में जगह नहीं मिलेगी.”

सिपाही तिरछी राइफल का बट उरसुला के मुँह पर मारता है. उरसुला के होठों खून चू उठता है.

सात खून के इल्जाम में पकड़ा गया सनमखान सिपाही की कलाई पकड़ लेता है. सिपाही चूजे की तरह नर्म होते हुए याचना भरी दृष्टि से कसाई जैसे कैदी की ओर देखता है. रवि को लगता है कि सिपाही और डकैत मौसेरे भाई हैं.

सनमखान कहते है, “भीमा को कल फांसी हो गई. साला दस दिन से अपना आधा चावल खाता था और आधा चिड़ियों को डाल देता था. अजीब तरह की खैरात है न!”

“क्या किया था उसने?” रवि पूछता है.

“अपने बहनोई को मारा था जिसने उसकी बहन को कोठे पर बेच दिया था.”

“फिर फाँसी क्यों?” लहूलुहान होठों से पूछती है उरसुला.

सनमखान सिपाही को कोहनी मार कहता है- “कानून कमीनों के हाथ बिक गया है. समझता नहीं है कि कुछ कत्ल फ़र्ज होते हैं.”

सिपाही हिम्मत बटोर कर कहता है- “चुप रहो.”

रवि को लगता है कि भीमा की तरह उरसुला को भी जरूर फाँसी होगी क्योंकि वह भी अपना ज्यादा से ज्यादा चावल लड़कों को खिलाने की कोशिश करती थी.

चलती हुई पुलिस वैन में सन्नाटा फैल जाता है. हर कैदी दूसरे के गले में फाँसी के फंदे की आशंका में सिहर कर खामोश हो गया था.

**-** रचनाकार – विजय – रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से सेवानिवृत्त वैज्ञानिक – के कोई दो दर्जन उपन्यास/कहानीसंग्रह/बाल कथा संग्रह/किशोर उपन्यास प्रकाशित हैं. स्थान विशेष पर लिखी विशिष्ट-विविध रूपों में लिखी गई कहानियों की श्रेणी में से खास तौर पर रचनाकार के लिए चुनी गई है यह कहानी.


**-**
ग़ज़ल 1

वह सामने नहीं है मगर कल्पना तो है
आँखें जो बन्द की हैं वो अकसर दिखा तो है

चिट्ठी के शब्द-शब्द में उसका ही बिम्ब था
तनहाई में वो साथ हमेशा रहा तो है

हम जानते हैं कितने गुनहगार हैं मगर
उसके करम का फिर भी हमें आसरा तो है

पर्यावरण खराब करें चाहे जितना हम
फिर भी स्वच्छ साफ सी बहती हवा तो है

दिनरात चल रहे हैं अदालत के काम काज
दुष्कर्म जो करेगा तो उसकी सज़ा तो है

छिप-छिप के फिर भी, पाप किए जा रहे हैं हम
यह जानते हैं कोई हमें देखता तो है

‘रचश्री’ हजार दूरियाँ रिश्तों के बीच हों
समझौते की दिलों में एक आकांक्षा तो है

**-**
ग़ज़ल 2


न यह सहरा न यह गुलशन रहेगा
मोहब्बत का दीया रोशन रहेगा

यह देखेंगे हमारी दोस्ती का
जमाना कब तलक दुश्मन रहेगा

सभी मरने के साधन ढूंढते हैं
कोई जीने का भी साधन रहेगा?

बदल जाएगा चेहरा आदमी का
मगर दर्पण सदा दर्पण रहेगा

हम अपने घर में मिल-जुलकर रहेंगे
हमारा एक ही आँगन रहेगा

मुकम्मल चाँद हो जाने दें ‘रचश्री’
उजाला बादलों से छन रहेगा

**-**

ग़ज़ल 3

तहों से तुम उभरते क्यों नहीं हो
जो कहते हो वह करते क्यों नहीं हो

अगर खुशबू हो तुम, तो कैद क्यों हो
हवाओं में बिखरते क्यों नहीं हो

तुम्हें शक है वफ़ाओं पर हमारी
तो फिर इल्जाम धरते क्यों नहीं हो

सितारों तक रसाई है तुम्हारी
सितारों पर ठहरते क्यों नहीं हो

हमें तुम आईना कहते हो लेकिन
बिगड़ते हो, संवरते क्यों नहीं हो

तुम्हें हक है कि तुम वायदे से अपने
मुकर जाओ, मुकरते क्यों नहीं हो

बताओ ‘रचश्री’ तस्वीरे ग़म में
हँसी के रंग भरते क्यों नहीं हो

***
रसाई (फ़ा., स्त्री.) = पहुँच/प्रवेश

रचनाकार – रमेशचन्द्र श्रीवास्तव इलाहाबाद, उप्र के जाने माने साहित्यकार हैं.

4
ये हैं कंप्यूटर गुरू स्टीव जॉब्स. एप्पल कंप्यूटर और पिक्सार एनिमेशन स्टूडियोज़ के प्रमुख. मौक़ा है स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का. दिन रविवार. तारीख़ 12 जून 2005.

मुख्य वक्ता स्टीव जॉब्स ने छात्रों को जो कुछ बताया वह जीवन को सच्ची जीवटता से जीने की सही मिसाल है. इससे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं – बहुत कुछ.

प्रस्तुत है स्टीव जॉब्स के संबोधन का पूरा पाठ- (मूल अंग्रेज़ी से अनुवाद: आशीष श्रीवास्तव (http://desh-duniya.blogspot.com/ ) )

इस विद्यापीठ के, जिसे विश्व के सर्वोत्तम विद्यापीठों में से एक माना जाता है, दीक्षान्त समारोह में शामिल होकर मैं अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रहा हूँ. मैंने किसी महाविद्यालय से उपाधि नहीं ली है. सच्चाई यह है कि मैं यहां पर आज मौजूद हूं यह महाविद्यालय और उपाधि से मेरी सबसे ज्यादा निकटता है. आज मैं आपको अपनी जिन्दगी से जुड़ी तीन कहानियाँ सुनाने जा रहा हूं. बस वही. कोई बड़ी बात नहीं, सिर्फ तीन कहानियां.

पहली कहानी है बिन्दुओं को मिलाने के बारे में.

मैंने रीड कालेज पहले ६ महीने में ही छोड़ दिया था, लेकिन मैं वहां पर अगले १८ महीने और रहा. उसके बाद मैंने कालेज सही अर्थों में छोड़ दिया. मैंने कालेज क्यों छोड़ा ?

दरअसल इसकी नींव तो मेरे जन्म लेने से पहले से रखी जा चुकी थी . मेरी जन्मदात्री जवान कुंवारी मां कालेज स्नातक छात्रा थी. उसने मुझे किसी को गोद देने का निश्चय किया था. उसकी मजबूत सोच थी कि मुझे किसी कालेज स्नातक माता पिता को ही गोद लेना चाहिए. इस लिये एक वकील और उसकी पत्नी मुझे गोद लेने के लिये तैयार थे, लेकिन जब मेरा जन्म हुआ तब उन्होंने आखिरी क्षणों में लड़की गोद लेना निश्चय किया. अब मेरे पालक जो प्रतीक्षा सूची में थे को आधी रात में फोन कर के पूछा गया "अप्रत्याशित रूप से हमारे पास एक बालक शिशु है, क्या आप उसे गोद लेना चाहेंगे ?" उनका जवाब हां में ही था. मेरी जन्मदात्री मां को बाद में जब पता चला कि मेरी मां और पिता ने किसी कालेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त नहीं की है, गोद लेने के काग़ज़ातों पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया. मेरे माता पिता के मुझे कालेज भेजने के आश्वासन देने बाद मेरी जन्मदात्री मां किसी तरह से हस्ताक्षर करने को तैयार हुई.

और, इस तरह १७ साल बाद मैं कालेज गया. लेकिन मैंने जो कालेज चुना था वह स्टैनफोर्ड के जैसा ही महंगा कालेज था. मेरे माता पिता की सारी कमाई मेरी फीस में चली जाती थी. ६ महीनों के बाद मैंने महसूस किया कि इस कालेज शिक्षा का कोई लाभ मेरे लिए नहीं है. मुझे नहीं मालूम था कि मैं जिन्दगी में क्या करना चाहता हूँ, और मेरे कालेज की शिक्षा इसमें क्या मदद करने वाली है. और मैं उस कालेज शिक्षा पर अपने माता पिता की सारी जिंदगी की कमाई खर्च कर रहा था. तब मैंने कालेज छोड़ने का निश्चय किया और विश्वास किया कि इससे सब कुछ ठीक हो जायेगा, यह एक डरावना निर्णय था, लेकिन जब आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो सोचता हूँ कि वह निर्णय मेरे द्वारा लिये गये सर्वोत्तम निर्णयों में से एक है. जिस क्षण मैंने कालेज छोड़ा, मैंने अरुचिकर कक्षाओं में जाना बन्द कर दिया और रुचिकर कक्षाओं में जाना कम कर दिया.

यह सब अच्छा (रोमांटिक) नहीं था. मेरे पास सोने के लिये कमरा नहीं था, मैं दोस्तों के कमरे में जमीन पर सोता था. मैं कोक की बोतलों को जमा कर वापस करता था जिससे मुझे हर बोतल पर ५ सेंट मिलते थे, इन पैसों से मैं खाना खरीदता था. हर रविवार मैं ७ मील चलकर हरे कृष्णा मन्दिर अच्छा खाना खाने जाता था. मुझे यह सब अच्छा लगता था. मेरी जिज्ञासा और अंतरात्मा को लेकर मेरा संघर्ष बाद में अमूल्य साबित हुआ. मैं आपको एक उदाहरण देता हूँ
रीड कालेज उस समय कैलीग्राफी (लिपि/अक्षर बनाने की कला) का सबसे अच्छा शिक्षण देता था. पूरे कैम्पस में हर पोस्टर , दराजों पर लिखे गये नाम बहुत ही सुंदरता से लिखे गये थे. मैं कालेज छोड़ चुका था और मुझे सामान्य कक्षाएँ नहीं करनी होती थी, मैंने कैलीग्राफी की कक्षाएँ करने का निश्चय किया. मैंने शेरीफ और सैन्स शेरीफ टाईप फ़ेस सीखा, विभिन्न तरह के अक्षरों के बीच की कम ज्यादा जगह छोड़ने के बारे में सीखा, मैंने सीखा कि क्या है जो किसी टाइपोग्राफी को अच्छा बनाती है. यह एक सुंदर , ऐतिहासिक, कला है, जो विज्ञान नहीं सिखा सकता, और मुझे मनोरंजक लगा.

इसमें से कुछ भी मेरी जीवन में काम आएगा ऐसी उम्मीद नहीं थी. लेकिन १० साल बाद जब हम पहला मैकिंतोश बना रहे थे, यह सब मुझे याद आया. और यह सब हमने मैक में डाला. वह पहला कम्पयूटर था जिसके अक्षर सुंदर थे. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैक के पास विभिन्न चौड़ाई और दो अक्षरों के बीच भिन्न-भिन्न खाली जगह वाले फ़ॉन्ट नहीं होते . और जिस तरह विन्डोज ने मैक की नकल की, यह संभावना है कि किसी भी निजी कम्प्यूटर में ये नहीं होता. यदि मैंने कालेज नहीं छोड़ा होता तो मैंने कैलीग्राफी की कक्षा नहीं की होती और निजी कम्प्यूटर में सुन्दर टाइपोग्राफी नहीं होती. हां मेरे कालेज में रहते हुए बिन्दुओं को सामने की ओर जोड़ना असंभव था, लेकिन दस साल बाद ये आसान है.
फिर से आप बिन्दुओं को आगे की तरफ नहीं जोड़ सकते, आप उन्हें पीछे की ओर देखते हुए ही जोड़ सकते हैं. आपको भरोसा करना होगा कि ये सभी बिंदु भविष्य में जुड़ जाएंगे. आपको अपनी शक्ति, भाग्य, जीवन, कर्म वगैरह पर भरोसा करना होगा. मेरी इस शैली ने मुझे कभी नीचा नहीं दिखाया है और इसी ने मेरा जीवन कुछ हट कर बनाया है.

मेरी दूसरी कहानी है प्यार और नुकसान के बारे में

मैं भाग्यशाली था. मैंने जिन्दगी की शुरूआत में जान लिया था कि मुझे किससे प्यार है. वाझ और मैंने अपने मातापिता के गैरेज में "एप्प्ल" की शुरूआत की, जब मैं २० साल का था. हमने कड़ी मेहनत की और १० साल में एप्प्ल गैरेज में काम करने वाले हम २ लोगों से बढकर २ बिलियन डॉलर और ४००० कर्मचारियों वाली कंपनी बन चुका था. एक साल पहले हम अपनी सबसे खूबसूरत कृति मैकिंतोश को बाजार में उतार चुके थे, और मैं ३० साल का हो चुका था. और तब मुझे एप्प्ल से निकाल दिया गया ! आप उस कम्पनी से कैसे निकाले जा सकते हैं जिसकी स्थापना आपने की थी ? अच्छा, जैसे-जैसे एप्पल बढने लगा था, हम लोगों ने कुछ ऐसे लोगों को नौकरी दी थी जिनके बारे में मैं सोचता था कि वे मेरे साथ कंपनी चलाने में प्रतिभाशाली साबित होंगे. और पहला साल अच्छा गया. लेकिन उसके बाद हमारी भविष्य की सोचों में अंतर आने लगा और हम अलग होने लगे. जब ऐसा हुआ तब कंपनी के निदेशक मंडल ने उनका साथ दिया. तो ३० साल की उमर में मैं बाहर था. मेरी संपूर्ण वयस्क जिन्दगी का केन्द्र जा चुका था और ये दिल तोड़ देने वाला था.

अगले कुछ महीनों तक मुझे नहीं मालूम था कि क्या करना चाहिए. मुझे महसूस होता था कि मैंने पिछली पीढ़ी के व्यावसायिकों को नीचा दिखाया है. मुझे दिया गया 'बेटन' मैंने नीचे गिरा दिया है. मैं डेविड पैकार्ड और बॉब नोयके से मिला और उनसे इस बुरी स्थिती के लिये क्षमा माँगी. मैं एक असफलता का प्रतीक था और मैंने 'सिलिकॉन वैली' से भाग जाने की भी सोच लिया था. लेकिन मेरे अंदर कुछ आलोकित हो रहा था, मैंने जो किया उससे मुझे प्यार था. एप्प्ल में जो कुछ हो रहा था उसमें कुछ भी नहीं बदला था. मुझे नकार दिया गया था लेकिन मैं उससे प्यार करता था. और मैंने सब कुछ फिर से शुरू करने की ठानी.

मैंने उस समय महसूस नहीं किया लेकिन एप्पल से मुझे निकाल दिया जाना मेरी जिन्दगी में घटित सबसे अच्छी घटना है, एक सफल इंसान होने का बोझ, अब एक नयी शुरूवात करने वाले का हल्का मन बन चुका था. इस घटना ने मुझे अपने जिन्दगी के सबसे क्रियाशील हिस्से में आने का अवसर दिया.

अगले ५ सालों में मैंने एक कम्पनी NeXT शुरू की, एक और कम्पनी 'पिक्सार' भी शुरू की. उसी समय एक प्यारी स्त्री के प्यार के गिरफ़्त में भी आ गया जो बाद में मेरी पत्नी बनी. पिक्सार ने विश्व की सबसे पहली कम्प्यूटर द्वारा एनीमेशन फीचर फिल्म 'टॉय स्टोरी' बनायी. आज पिक्सार विश्व का सबसे सफल एनीमेशन स्टूडियो है. परिस्थितियों में बदलाव कुछ ऐसे हुआ कि एप्प्ल ने NeXT को खरीद लिया, मैं एप्प्ल वापिस लौटा और जो तकनीक हमने NeXT में विकसित की आज एप्पल की तकनीक का हृदय है. और लारेंस और मेरा एक सुखी परिवार है.

मुझे पूरा विश्वास है कि यदि मुझे एप्पल से निकाला नहीं गया होता तो ये सब कुछ नहीं होता. वह एक कड़वी दवाई थी लेकिन मरीज को उसकी जरूरत होती है. यदि जिन्दगी आपके सर पर एक ईंट का प्रहार करे तो भी भरोसा ना छोड़ें. मुझे विश्वास है कि इकलौती चीज जो मुझे संघर्ष करने की प्रेरणा देती रही, वो था मेरा अपने किये गये कार्य से प्यार. आपको अपना प्यार पाना है, और यह आपके काम के लिये उतना ही सच है जितना आपके प्रेमी के लिये. आपका कार्य आपकी जिन्दगी का एक बड़ा हिस्सा बनने जा रहा है और अपने जीवन में संतोष पाने का इकलौता रास्ता है आपका सोचना कि जो काम मैं कर रहा हूँ वो सर्वोत्तम है. और एक सर्वोत्तम काम वह है जिससे आप प्यार करते है. यदि आपको अपना प्यार नहीं मिला, ढूंढते रहें – ढूंढते रहें. रुकें नहीं. वह आपको जब भी मिलेगा आपका दिल उसे पहचान लेगा . और एक अच्छे रिश्ते की तरह वह समय के साथ अच्छा, और अच्छा होते जाता है, तो ढूंढते रहिये, रूकें नहीं.

मेरी तीसरी कहानी है मौत के बारे में

जब मैं १७ वर्ष का था, मैंने कहीं पढ़ा था "यदि आप हर दिन को जिन्दगी के अंतिम दिन की तरह जीते हैं, किसी दिन आप जरूर सच होंगे". इसने मेरे मन पर गहरा प्रभाव डाला था और तब से पिछले ३३ सालों से हर सुबह मैंने आईने में खुद को देखा है और पूछा है "यदि आज मेरी जिन्दगी का अंतिम दिन है तो मैं आज मैं करने जा रहा हु वह मैं करना चाहूँगा या नहीं ?" और जब मेरा उत्तर कुछ दिनों तक लगातार नकारात्मक आया है मुझे मालूम हो जाता है कि मुझे कुछ परिवर्तन की जरूरत है.

अपनी मृत्यु को याद रखना, वह सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसने मुझे जिन्दगी के हर बड़े चुनावों में मदद की है. क्योंकि लगभग सब कुछ , हर उम्मीद , गर्व या असफलता की शर्म का डर ये सब मौत के सामने मायने नहीं रखते, बच जाता है जो सच ए महत्वपूर्ण है. आप एक दिन मरने वाले हैं इसे याद रखना , आपको कुछ खो देने के डर के जाल में फंसने से बचाएगा. आप के पास खोने के लिये कुछ नहीं है, आप को अपने दिल की भावना का पालन नहीं करने के लिये कोई कारण नहीं है.
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एक साल पहले मुझे कैंसर होने का पता चला था. सुबह ७.३० बजे मेरी जांच हुई, और मेरे पित्ताशय में मैने ट्यूमर अच्छी तरह से दिख रहा था. मुझे पित्ताशय क्या होता है यह भी नहीं मालूम था. डाक्टर ने बताया कि इस तरह के कैंसर का कोई इलाज नहीं है और मुझे ३ से ६ महीने से ज्यादा जीने की उम्मीद नहीं रखना चाहिए. डाक्टर ने मुझे घर जा कर सभी काम व्यवस्थित करने की सलाह थी, जो उनकी भाषा में होता है मृत्यु की तैयारी करो. इसका मतलब होता है अपने बच्चों को आपके अगले १० सालों की योजना को कुछ महीनों में बताना. इसका मतलब होता है कि सब कुछ व्यवस्थित कर देना जिससे आपके परिवार को परेशानी कम से कम हो. इसका मतलब था अलविदा कहना.
पूरे दिन मैं उस जांच के भय के साथ रहा. बाद में शाम को मेरी बॉयप्सी हुई,. उन लोगों ने में मेरे गले से एक एन्डोस्कोप, मेरे पेट में, मेरी आंतों तक पहुँचाया और मेरे पित्ताशय से सुई के द्वारा कुछ कोशिकायें निकाली. मैं बेहोश था, लेकिन मेरी पत्नी जो वहां पर थी, ने बताया कि जब डाक्टरों ने कोशिकाओं को सुक्ष्म्दर्शी से देखा और चीखना शुरू कर दिया. यह उन बिरले कैंसर में से एक था जो शल्यचिकित्सा से ठीक हो जाता है. मेरी शल्य चिकित्सा हुई और मैं अब अच्छा हूँ.

यह मौत से मेरा सबसे नजदीकी साक्षात्कार था, और आशा है इसका अनुभव अगले कुछ दशकों तक रहेगा. इस से गुजरने के बाद मैं आपसे कुछ ज्यादा विश्वास से कह सकता हूँ कि मौत एक उपयोगी लेकिन बौद्धिक विषय है.
कोई नहीं मरना चाहता. जो स्वर्ग जाना चाहते है वह भी वहां जाने के लिये मरना नहीं चाहते. लेकिन मौत एक ऐसा मंजिल है जिसे हर किसी को पहुँचना है. कोई बच नहीं पाया है. और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि मौत जिंदगी का सबसे बडा आविष्कार है. वह जीवन का परिवर्तक है. वह पुराने को हटा, नये के लिये रास्ता बनाता है. आज आप नये है, लेकिन एक दिन - आज से ज्यादा दूर नहीं, आप बूढ़े हो जाएंगे और किनारे हटा दिये जाएंगे. नाटकीयता के लिये क्षमा चाहूँगा, लेकिन यही सच है.

आपके पास समय कम है, इसलिये किसी और की जिन्दगी जीने के लिये बर्बाद न करें. किसी और के विचारों के अनुसार जीने के जाल में न फँसें. किसी और की सोच का शोर आपकी अंतरात्मा की आवाज को दबा ना पाये. और, सबसे महत्वपूर्ण, आपके पास अपने दिल और अंतरात्मा के कहे का पालन करने का साहस होना चाहिये. वो किसी-तरह-से जानते है कि आप सच में क्या बनना चाहते हैं. बाकी सब, किसी महत्व का नहीं है.

जब मैं जवान था, एक अच्छा प्रकाशन था "व्होल अर्थ कैटेलाग", जो हमारी पीढ़ी के लिये बाइबिल था. वह यहां मेनलो पार्क से कुछ ही दूर रहने वाले स्टीवर्ट ब्राण्ड ने लिखा था, और उसे काव्यात्मक अंदाज में जीवन दिया था. यह १९६० के दशक के आखिर की बात है जब निजी कम्प्यूटर और डेस्कटॉप का प्रकाशन नहीं था. यह टाइपराटर, कैंची और पोलराईड कैमरों से बनी थी. उसे गूगल का पेपरबैक अंक कहा जा सकता है, ३५ साल पहले, गूगल के आने से पहले. वह एक आदर्श था और अच्छी जानकारी से भरपूर था.

स्टीव और उनकी टीम ने "व्होल अर्थ कैटेलाग" के कई अंक प्रकाशित किये और जब वे थक गये तब उन्होंने उसका अंतिम अंक प्रकाशित किया. यह १९७० के दशक के मध्य की बात है जब मैं आपकी उम्र का था. उसके अंतिम अंक के पिछले कवर पर एक गांव के रास्ते का सुबह के समय का चित्र था, कुछ उस तरह का आपको पहाड़ों में देखने को जरूर मिलेगा यदि आप साहसी है और हिचहाइकिंग करते है. उसके नीचे लिखा था. "भूखे रहो, मूर्ख रहो" यह विदाई का संदेश था, क्योंकि उन्होने प्रकाशन बन्द कर दिया था. भूखे रहो, मूर्ख रहो और मैंने अपने लिये यही चाहा है और आपको भी यही शुभकामना देता हूँ

भूखे रहो, मूर्ख रहो – नए ज्ञान के लिए - भूखे रहो, मूर्ख रहो.

धन्यवाद


- रवीन्द्र नाथ टैगोर

पूज्यवर,
आज पन्द्रह साल हुए हमारे ब्याह को. हम तब से साथ ही रहे. अब तक चिट्ठी लिखने का मौका ही नहीं मिला. तुम्हारे घर की मझली बहू जगन्नाथपुरी आई थी, तीर्थ करने.

आई तो जाना कि दुनिया और भगवान् के साथ मेरा एक और नाता भी है. इसलिए आज चिट्ठी लिखने का साहस कर रही हूँ. इसे मझली बहू की चिट्ठी न समझना.

वह दिन याद आता है, जब तुम लोग मुझे देखने आए थे. मुझे बारहवां साल लगा था.

सुदूर गांव में हमारा घर था. पहुँचने में कितनी मुश्किल हुई तुम सबको. मेरे घर के लोग आव-भगत करते-करते हैरान हो गए.

विदाई की करूण धुन गूंज उठी. मैं मझली बहू बनकर तुम्हारे घर आई. सभी औरतों ने नई दुल्हन को जाँच परखकर देखा. सबको मानना पड़ा – बहू सुन्दर है.

मैं सुन्दर हूँ, यह तो तुम लोग जल्दी भूल गए. पर मुझ में बुद्धि है, यह बाद तुम लोग चाहकर भी न भूल सके. मां कहती थी, औरत के लिए तेज दिमाग भी एक बला है.

लेकिन मैं क्या करूं. तुम लोगों ने उठते बैठते कहा, “यह बहू तेज है.”

लोग बुरा भला कहते हैं सो कहते रहें. मैंने सब साफ कर दिया.

मैं छिप-छिपकर कविता लिखती थी. कविताएँ थीं तो मामूली, लेकिन उनमें मेरी अपनी आवाज थी. वे कविताएँ तुम्हारे रीति रिवाजों के बन्धनों से आजाद थीं.

मेरी नन्हीं बेटी को छीनने के लिए मौत मेरे बहुत पास आई. उसे ले गई पर मुझे छोड़ गई. मां बनने का दर्द मैंने उठाया, पर मां कहलाने का सुख न पा सकी.

इस हादसे को भी पार किया. फिर से जुट गई रोज-मर्रा के काम-काज में. गाय-भैंस, सानी-पानी में लग गई. तुम्हारे घर का माहौल रूखा और घुटन भरा था. यह गाय-भैंस ही मुझे अपने से लगते थे. इसी तरह शायद जीवन बीत जाता.

आज का यह पत्र लिखा ही नहीं जाता. लेकिन अचानक मेरी गृहस्थी में जिन्दगी का एक बीज आ गिरा. यह बीज जड़ पकड़ने लगा और गृहस्थी की पकड़ ढीली होने लगी. जेठानी जी की बहन बिन्दू, अपनी मां के गुजरने पर, हमारे घर आ गई.

मैंने देखा तुम सभी परेशान थे. जेठानी के पीहर की लड़की, न रूपवती न धनवती. जेठानी दीदी इस समस्या को लेकर उलझ गई एक तरफ बहन का प्यार तो एक तरफ ससुराल की नाराजगी.

अनाथ लड़की के साथ ऐसा रूखा बर्ताव होते देख मुझसे रहा न गया. मैंने बिन्दू को अपने पास जगह दी. जेठानी दीदी ने चैन की सांस ली. अब गलती का सारा बोझ मुझ पर आ पड़ा.

पहले-पहले मेरा स्नेह पाकर बिन्दू सकुचाती थी. पर धीरे-धीरे वह मुझे बहुत प्यार करने लगी. बिन्दू ने प्रेम का विशाल सागर मुझ पर उड़ेल दिया. मुझे कोई इतना प्यार और सम्मान दे सकेगा, यह मैंने सोचा भी न था.

बिन्दू को जो प्यार दुलार मुझसे मिला वह तुम लोगों को फूटी आँखों न सुहाया. याद आता है वह दिन, जब बाजूबन्ध गायब हुआ. बिन्दू पर चोरी का इल्जाम लगाने में तुम लोगों को पलभर की झिझक न हुई.

बिन्दू के बदन पर जरा सी लाल घमोरी क्या निकली, तुम लोग झट बोले- चेचक. किसी इल्जाम का सुबूत न था. सुबूत के लिए उसका ‘बिन्दू’ होना ही काफी था.

बिन्दू बड़ी होने लगी. साथ-साथ तुम लोगों की नाराजगी भी बढ़ने लगी. जब लड़की को घर से निकालने की हर कोशिश नाकाम हुई तब तुमने उसका ब्याह तय कर दिया.

लड़के वाले लड़की देखने तक न आए. तुम लोगों ने कहा, ब्याह लड़के के घर से होगा. यही उनके घर का रिवाज है.

सुनकर मेरा दिल कांप उठा. ब्याह के दिन तक बिन्दू अपनी दीदी के पाँव पकड़कर बोली, “दीदी, मुझे इस तरह मत निकालो. मैं तुम्हारी गौशाला में पड़ी रहूँगी. जो कहोगी सो करूंगी...”

बेसहारा लड़की सिसकती हुई मुझसे बोली, “दीदी, क्या मैं सचमुच अकेली हो गई हूँ?”

मैंने कहा, “ना बिन्दी, ना. तुम्हारी जो भी दशा हो, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ.” जेठानी दीदी की आँखों में आँसू थे. उन्हें रोककर वह बोलीं, “बिन्दिया, याद रख, पति ही पत्नी का परमेश्वर है.”

तीन दिन हुए बिन्दू के ब्याह को. सुबह गाय-भैंस को देखने गौशाला में गई तो देखा एक कोने में पड़ी थी बिन्दू. मुझे देख फफककर रोने लगी.

बिन्दू ने कहा कि उसका पति पागल है. बेरहम सास और पागल पति से बचकर वह बड़ी मुश्किल से भागी.

गुस्से और घृणा से मेरे तनबदन में आग लग गई. मैं बोल उठी, “इस तरह का धोखा भी भला कोई ब्याह है? तू मेरे पास ही रहेगी. देखूं तुछे कौन ले जाता है.”

तुम सबको मुझ पर बहुत गुस्सा आया. सब कहने लगे, “बिन्दू झूठ बोल रही है.” कुछ ही देर में बिन्दू के ससुराल वाले उसे लेने आ पहुँचे.

मुझे अपमान से बचाने के लिए बिन्दू खुद ही उन लोगों के सामने आ खड़ी हुई. वे लोग बिन्दू को ले गए. मेरा दिल दर्द से चीख उठा.

मैं बिन्दू को रोक न सकी. मैं समझ गई कि चाहे बिन्दू मर भी जाए, वह अब कभी हमारी शरण में नहीं आएगी.

तभी मैंने सुना कि बड़ी बुआजी जगन्नाथपुरी तीर्थ करने जाएंगी. मैंने कहा, “मैं भी साथ जाऊँगी.” तुम सब यह सुनकर बहुत खुश हुए.

मैंने अपने भाई शरत को बुला भेजा. उससे बोली, “भाई अगले बुधवार मैं जगन्नाथपुरी जाऊँगी. जैसे भी हो बिन्दू को भी उसी गाड़ी में बिठाना होगा.”

उसी दिन शाम को शरत लौट आया. उसका पीला चेहरा देखकर मेरे सीने पर सांप लोट गया. मैंने सवाल किया, “उसे राज़ी नहीं कर पाए?”

“उसकी जरूरत नहीं. बिन्दू ने कल अपने आपको आग लगाकर आत्महत्या कर ली.” शरत ने उत्तर दिया. मैं स्तब्ध रह गई.

मैं तीर्थ करने जगन्नाथपुरी आई हूँ. बिन्दू को यहाँ तक आने की जरूरत नहीं पड़ी. लेकिन मेरे लिए यह जरूरी था.

जिसे लोग दुःख-कष्ट कहते हैं, वह मेरे जीवन में नहीं था. तुम्हारे घर में खाने-पीने की कमी कभी नहीं हुई. तुम्हारे बड़े भैया का चरित्र जैसा भी हो, तुम्हारे चरित्र में कोई खोट न था. मुझे कोई शिकायत नहीं है.

लेकिन अब मैं लौटकर तुम्हारे घर नहीं जाऊँगी. मैंने बिन्दू को देखा. घर गृहस्थी में लिपटी औरत का परिचय मैं पा चुकी. अब मुझे उसकी जरूरत नहीं. मैं तुम्हारी चौखट लांघ चुकी. इस वक्त मैं अनन्त नीले समुद्र के सामने खड़ी हूँ.

तुम लोगों ने अपने रीति-रिवाजों के पर्दे में मुझे बन्द कर दिया था. न जाने कहाँ से बिन्दू ने इस पर्दे के पीछे से झांककर मुझे देख लिया और उसी बिन्दू की मौत ने हर पर्दा गिराकर मुझे आजाद किया. मझली बहू अब खत्म हुई.

क्या तुम सोच रहे हो कि मैं अब बिन्दू की तरह मरने चली हूँ. डरो मत. मैं तुम्हारे साथ ऐसा पुराना मजाक नहीं करूंगी.

मीराबाई भी मेरी तरह एक औरत थी. उसके बन्धन भी कम नहीं थे. उनसे मुक्ति पाने के लिए उसे आत्महत्या तो नहीं करनी पड़ी. मुझे अपने आप पर भरोसा है. मैं जी सकती हूँ. मैं जीऊँगी.

तुम लोगों के आश्रय से मुक्त,
मृणाल.

--**--

कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर (1861-1941) – भारत के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता लेखक, जिनकी पुस्तक गीतांजलि पर यह पुरस्कार उन्हें मिला. साहित्य की हर विधा – नाटक, कविता, निबन्ध, पत्र, उपन्यास आदि पर आपकी चर्चित रचनाएँ हैं, जिनका प्रायः विश्व की सभी प्रसिद्ध भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.


-हरिहर झा

सार्थक है वह कविता -
जो मंत्रियों की चाटुकारिता से
परहेज न करे
जो राजों रजवाड़ों के भाट चारण का
वारिस हो सके
करोड़ीमल के संस्मरण में
कुछ प्रशस्तियाँ गा सके -

पर इस अर्थ प्रधान
स्वार्थ प्रधान युग में
पुरस्कार की क्या बात
जो चार पैसे न कमा कर ला सके
अर्थहीन है वह कविता....

अर्थहीन है वह कविता ...
बिखरे विचारों की सजावट करती हुई
भ्रष्टाचार से बगावत करती हुई
विवश विद्रोह को मायने देती हुई
मियां मिठ्ठुओं को आइना दिखाती हुई
या फिर प्रेम की रंगीनियों में सोई हुई
प्रकृति के आगोश में खोई हुई
अर्थहीन है वह कविता....

पर ऐसी कविता
जो किसी ख़ेमे में छीना झपटी कर
झंडा उठा ले
राजनीतिक वादों इरादों पर
अपनी तुकबन्दी की छाप छोड़े
और मोदक की थाली की तरह सजाए -
खयाली पुलावों की चाशनी से बने
चुनावी घोषणा पत्र पर कसीदे करे
सफल है वह कविता...

जो जोखिम उठाए
रद्दी की टोकरी में गिर जाने का
पाखंडी शिखंडियों का मखौल सहने का
नेता भए विधाता के तीसरे नेत्र खुलने का
और सच का साथ दे
मोटी खाल में छिपे काइयाँपन को
व्यंग बाणों से भेद कर
लहूलुहान करे
तू-तू मैं-मैं की चीख पुकार के बीच
किसी अनहत नाद की सी प्रतीक्षा में
शांत सौम्य आनंदित भाव से
विवेक विचार का सृजन करे
अर्थहीन है वह कविता ...


रचनाकार - हरिहर झा राजस्थान के एक छोटे से कस्बे बांसवाड़ा से अपनी कविताओं का जौहर दिखाते हैं.

**-**
- स्वामी वाहिद काज़मी
उस नगर का नाम है – अब्दालगंज और अब्दालगंज का एक घना और बारौनक़ बाज़ार है- बड़ा बाज़ार. वहीं बारह-पंद्रह मुसलमान रंगरेज़ों की बड़ी-बड़ी दुकानें हैं, जो कपड़े रंगने का अपना पुश्तैनी व्यवसाय करते-करते इतने कुशल व धनवान हो गए हैं कि अब वह अपना रंगरेज़ी का धंधा त्यागकर दूसरे व्यवसाय करने लगे हैं. उनमें से अधिकतर शामियाने, कन्नातें, क्रॉकरी आदि किराए पर देने की ठेकेदारी करते हैं. किसी-किसी के तो ट्रक और टेम्पो भी चलते हैं.

छिद्दू खां अपने इन्हीं स्वजातीय बंधुओं के चौधरी हैं. आयु यही कोई चालीस-पैंतालीस वर्ष, सांवला रंग, मध्यम क़द, कुर्ता-पायजामा पहनने वाले. उनकी कपड़े की एक बड़ी दुकान थी. दुकान के पीछे तीन-चार मकान भी थे उनके. एक में रहते थे, बाक़ी किराए पर उठा रखे थे. उनकी दुकान के ऊपर एक मस्जिद थी, जो बड़ा बाज़ार की मस्जिद कहलाती थी. अल्लाह तेरी शान! चौधरी छिद्दू खां वैसे अंगूठा टेक व्यक्ति थे, किंतु धन-सम्पन्न और अच्छी-ख़ासी साख वाले होने के कारण उस मस्जिद के स्वयंभू मुतवल्ली (प्रबंधक) भी वही थे और सार्वजनिक मस्जिद को एक प्रकार से अपनी निजी संपत्ति में ही गिनते थे.

प्रत्येक वर्ष जब रमज़ान का पवित्र महीना शुरू होता, तो रात्रिकालीन तरावीह की विशेष नमाज़ पढ़ाने के लिए दिल्ली के एक युवा हाफ़िज़जी बब्बन मियाँ को सादर आमंत्रित किया जाता, जो एक माह तक उसी मस्जिद के हुजरे में निवास करते और बड़े मनोयोग से नमाज़ें पढ़ाया करते. कुरआन का सस्वर पाठ (क़िरअत) करने में हाफ़िज़जी का गला अत्यंत सुरीला था (यह तो वैसे कहूँ कि उनके गले में सरस्वती विराजती थी!) कहना चाहिए की उनके गले में स्वर नहीं जादू था! जब वे नमाज़ पढ़ाते तो पीछे खड़े नमाज़ी उनकी स्वर लहरी में डूबकर किसी अलौकिक आनंद से भर जाते थे. हाफ़िज़जी क्योंकि मेरे हम उम्र और हमख़्याल भी थे और सर्वप्रथम उन्हें मेरे ही मुहल्ले की मस्जिद में दिल्ली से बुलाया गया था. एक माह तक वे हमारे ही घर मेहमान रहे थे. अतः हम दोनों में गहरी मित्रता हो गई थी.

मेरा अधिकतर समय क्योंकि अपने मित्र हाफ़िज़जी के पास मस्जिद में गुजरता था. इसलिए छिद्दू खां से मिलना होता रहता था. मुझे यह बात कुछ समझ में नहीं आती थी कि किसी दिन तो छिद्दू खाँ बड़े प्रसन्न वदन और प्रफुल्लित नज़र आते थे तो किसी दिन बेहद खीझभरे और चिड़चिड़े.

साल में एक मास अर्थात् रमज़ान के अलावा बाक़ी दिनों में एक निपट अकेले सज्जन शरीफ़ मियाँ मस्जिद के उसी हुजरे में रहा करते थे. जोरू न जाता होने से अल्लाह मियाँ से उनका नाता था. मस्जिद की देख-रेख वही करते थे इसलिए छिद्दू खां की ओर से ही उनके भरण-पोषण की सुविधा जुटाई जाती थी. जब भी छिद्दु खां मुझसे कोई मज़हबी अथवा दीन-ईमान की बात करते तो शरीफ़ मियाँ उन्हें घूरकर देखते रहते और उनके इधर-उधर होते ही घृणा से मुँह बनाकर पिच्च से ज़मीन पर थूककर मुझसे कहते- “सुनी जनाब आपने चौधरी की बात?”
“तो इसमें झूठ भी क्या है, शरीफ़ मियाँ”, मैं कहता.
“अजी जनाब, आप क्या जानें उसके पेट में कितनी लंबी दाढ़ी है.” वे कहते- “अंदर किन ने देखा है, सब ज़ाहिरा में देखते हैं.”
“तो चौधरी की ऐसी बातें सचाई नहीं हैं.”
“अजी साहब तौबा कीजिए.”
“फिर क्या बात है?” मेरे इस सवाल पर वे कुछ नहीं बताते. किंतु इतना आश्वासन अवश्य देते कि वक़्त आने पर आप खुद देख लेना.

रियासती युग में अब्दालगंज भी एक रियासती शान वाला नगर रहा था. वहाँ के राजा-महाराजा भी यद्यपि अन्य रियासती नरेशों के समान विलास प्रिय तथा अय्याश हुआ करते थे. मगर इसके साथ ही वे बेहद कला-प्रेमी भी होते थे. कला के पारखी व गुण ग्राहक भी. ललित कलाओं में परम प्रवीण गुणीजनों के अलावा उनके दरबार से जुड़ी ऐसी दर्जनों स्त्रियाँ रहती थीं, जो नृत्य एवं गान-कला की कुशल कलाकार होती थीं. यद्यपि राजा से उनके शारीरिक संबंध हों या न हों, पर वे बाज़ार में कोठा सजाकर नहीं बैठती थीं. नाच-गाना ही उनका व्यवसाय होता था. और अधिकतर वेश्या पुत्रियाँ होती थीं इसलिए उन्हे तवायफ़ ही कहा जाता था. ऐसी नृत्यांगनाएं सरकारी या महल की तवायफ़ें कही जाती थीं और रियासत की ओर से उनको अच्छा-ख़ासा वेतन तो मिलता ही था. समय-समय पर इनाम-इकराम से भी नवाज़ी जाती थीं. उनका मुख्य कार्य रियासत के किसी उत्सव या समारोह आदि के अवसर पर गाना होता था. जन-साधारण से उनका कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता था. स्वभाव से वे धर्म भीरु होती थीं अतः धर्म-कर्म के कार्यों में मुक्त-हस्त पैसा ख़र्च करती थीं. रियासतें समाप्त होने के बाद ऐसी तवायफ़ों में से अधिकतर ने अपने पिछले अर्जित धन और यशः कीर्ति के बल पर शरीफ़ आदमियों से निकाह कर लिए और पूर्णतः गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगीं.

अब्दालगंज की अपने समय में नामी तवायफ़ शबनम उर्फ़ शब्बो भी एक ऐसी ही सरकारी तवायफ़ रही थी. मस्जिद बड़ा बाज़ार से आगे जाकर उसकी एक छोटी-सी शानदार कोठी थी. उसने किसी प्रतिष्ठित आदमी से निकाह कर लिया था. उसके दो युवा पुत्र स्थानीय मेडिकल कॉलेज में पढ़ते थे. एक पुत्री थी जिसने एमए कर लिया था और किसी बड़े सरकारी अफ़सर से ब्याही गई थी.

शब्बो हर वर्ष रमज़ान के महीने में नगर की कई मस्जिदों में एक-एक दिन अपनी ओर से शाम के समय, रोज़ेदारों के लिए अफ़तारी (भोज्य सामग्री) भेजा करती थी. उसके नौकर, स्वल्पाहार से भरे बड़े-बड़े थाल, गोटे-पट्टे के ख्वानपोशों से दबे अदब से अपने सिरों पर रखे मस्जिदों में पहुँचाया करते थे. मुझे मालूम था कि अन्य मस्जिदों में तो शब्बो की भेजी अफ़तारी ले ली जाती है. किंतु बड़ा बाज़ार की मस्जिद में छिद्दू खां उसकी भेजी अफ़तारी वापस कर दिया करते थे.

उस रोज़ जुमे का दिन था. सदा की भांति जब मैं संध्याबेला में मग़रिब की नमाज़ पढ़ने पहुँचा तो वहाँ एक हंगामा सा मचा हुआ था. शब्बो का नौकर एक बड़े थाल में रोज़ा अफ़्तार करने की सामग्री लिए मस्जिद के दरवाज़े पर खड़ा था और छिद्दू खां लाल-पीले होते हुए उस पर बरस रहे थे- “तुझसे बोला न! वापस ले जा ये अफ़तारी और पटक दे अपनी मालकिन के सर पर. यहाँ नमाज़ी परहेज़गार लोग आते हैं. हम हराम की कमाई वाली चीज़ें खिलाकर उनका ईमान नहीं बिगाड़ सकते. यहाँ रंडी-मुंडियों का भेजा हुआ खाना कोई नहीं छुएगा. ले जा यह थाल और खिला दे कुत्तों को.”

कुछ क्षण तो मैं यह तमाशा देखता-सुनता रहा. किंतु जब सहन करना कठिन हो गया तो छिद्दू खाँ के कंधे पर हाथ रखते हुए मैंने नर्मी से कहा- “चौधरी, आपको इतना गर्म नहीं होना चाहिए! अफ़तारी किसके यहाँ से आई है और भेजने वाला कौन है, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. जो भी सच्चे दिल और अक़ीदत से ऐसा करे, उसे बुरा कैसे कहा जा सकता है. फिर ये चीज़ें हलाल की कमाई की हैं या हराम की, इसका फ़ैसला आप कैसे कर सकते हैं. अफ़तारी मस्जिद में भेजी गई है. किसी के घर नहीं भेजी गई है. आप इसे रख लें.”

उन्होंने मेरी ओर आँखें तरेरकर देखा और बोले- “राशिद मियाँ, आप इते पढ़े-लिखे सैयदज़ादे होकर ऐसा कहते हैं. ज़रा सोचिए, रंडी-मुंडियों की कमाई क्या हलाल की होती है? क्या ये रोज़ेदारों के लिए जायज़ है? नहीं साब, ये अफ़तारी हम लोग नहीं ले सकते.”

अब मुझे भी ज़रा ताव आ गया. अतः इनकी ईंट का जवाब छोटे-से पत्थर से देते हुए कहा- “मस्जिद में भेजी किसी भी चीज़ को स्वीकार-अस्वीकार करने का आपको कोई हक़ नहीं है. आप इसे वापस नहीं कर सकते.”

“मगर मैं इस मस्जिद का मुतवल्ली हूँ. यहाँ जो मैं चाहूँगा वही होगा,” वे आवेश से तमतमाते हुए बोले. आँखें तो उनकी यों भी लाल-लाल रहती थीं. (जिसका कारण वे रात भर नफ़िल नमाज़ें पढ़ना बताते थे) अब गुस्से से और लाल हो गईं!

“हरगिज़ नहीं होगा!” मैंने भी उतने ही आवेश से कहा- “देखता हूँ कौन इस अफ़तारी को वापस करता है.” इतना कहकर मैंने थाल में से आधी सामग्री मस्जिद के द्वार पर इसीलिए भीड़ लगाए बच्चों में बांट दी और बाक़ी को खुद ऊपर ले जाकर रोजा खोलने के लिए दस्तरख़्वान के पास बैठे रोज़ेदारों के सामने रख दिया. कोई कुछ नहीं बोला! छिद्दू खाँ मुझे खा जाने वाली नज़रों से घूरते रहे! रोज़ा खोलने का समय हो गया था. अतः इस सामग्री में से पहला कौर हाफ़िज़ बब्बन मियाँ ने उठाया, दूसरा मैंने! जब लोगों ने इस सैयदज़ादे और इसके साथ हाफ़िज़जी को उसी सामग्री से रोज़ा खोलकर खाते देखा तो उनका भी हौसला बढ़ा और खाना शुरू कर दिया. केवल छिद्दू खाँ ऐसे थे जो उस समय दस्तरख़्वान पर भी नहीं बैठे!

इस घटना के बाद से छिद्दू खां मुझसे रुष्ट रहने लगे. मगर उनका इतना साहस नहीं था कि मुझसे कुछ कहा-सुनी कर पाते! रात को तरावीह की नमाज़ के बाद मैं और हाफ़िज़जी हुजरे में बड़ी देर तक बैठे इधर-उधर की बातें कर रहे थे. उस दिन शरीफ़ मियाँ मुझसे बोले- “राशिद साहब, आज रात आप यहीं सो जाइए.”
“क्यों जनाब,” मैंने मुस्कुराकर प्रश्न किया, “ख़ैर तो है?”
“कोई ख़ास बात ही होगी,” उन्होंने अर्थपूर्ण मुस्कान बिखेरते हुए कहा- “आपको एक मज़ेदार तमाशा दिखाना है.”
“मंजूर है,” मैंने कह दिया!
उसी दिन. रात का कोई डेढ़ बजा होगा. शरीफ़ मियाँ ने चुपके से हुजरे में आकर धीरे से मुझे जगाया और अपने होठों पर उँगली रखकर ख़ामोश रहने का संकेत करते हुए अपने पीछे आने को कहा. मैं उठ कर ख़ामोशी से उनके पीछे चल पड़ा. मस्जिद का जीना उतरकर वे मुझे नीचे ले गए. छिद्दू खां की दुकान के भीतर मंद रोशनी हो रही थी और आहिस्ता-आहिस्ता बातें करने की आवाज़ें भी आ रही थीं. शरीफ़ मियां ने धीरे से किवाड़ का एक पट भीतर की ओर धकेलते हुए मुझे भीतर जाने का इशारा किया.

मैंने भीतर प्रवेश किया तो देखता यह हूँ कि फ़र्श पर बिछे गद्दे पर छिद्दू खां सहित चार व्यक्ति अपने-अपने हाथों में थामे ताश के पत्तों में गुम हैं और बीच में नोटों की एक संक्षिप्त-सी ढेरी लगी है! दारू की ख़ाली बोतल कोने में लुढ़की पड़ी है और चार-पाँच गिलास भी पड़े हैं. उनमें से दो व्यक्तियों को मैं बस इतना जानता था कि वे नमाज़ पढ़ने नियमपूर्वक आते थे!

उस समय सभी लोग अपनी-अपनी चालों में कुछ इतने ध्यानस्थ थे कि बस इतना ही आभास पा सके कि कोई भीतर आया है, कौन है यह देखने की फुर्सत ही नहीं थी. छिद्दू खां ने ताश के पत्तों पर से दृष्टि हटाए बिना अपना एक हाथ मेरी ओर बढ़ाया और बेध्यानी में बोले- “क्यों रे, ले आया बीड़ी का बंडल?”

मैंने उनका बढ़ा हुआ हाथ अपने हाथ में लिया और व्यंग्य से मुस्कुराकर कहा- “हैलो, चौधरी साहब.”
मेरे शब्दों से वे एकदम चौंक उठे और मेरी ओर दृष्टि उठाई तो ताश के सारे पत्ते उनके हाथ से छूट गए! उनके तीनों साथियों ने मुर्दा हाथों से ताश के पत्ते नीचे रख दिए!
“खेलिए-खेलिए.” मैं बोला.
“र...राशिद मियाँ, अ... आप इस वक्त यहाँ...” छिद्दू खां बड़ी कठिनाई से थूक निगलकर बोले. उनके साथी भौंचक्के होकर मुझे घूरने से लगे!

कुछ मिनट बाद उनके तीनों साथी तो उठ कर चले गए. मैं और छिद्दू खां रह गए!

“तो ये हैं आपकी नफ़िल नमाज़ें और तहज्जुद की नमाज़, जो आप रात भर, रमज़ान के पाक महीने में भी पढ़ते रहते हैं,” मैं बोला!

मेरी बात को वह सिर झुकाए चुपचाप सुना किए. फिर ग्लानि भरे स्वर में बोले- “शर्मिंदा हूँ राशिद भाई! कसम खाता हूँ आगे फिर कभी ऐसा नहीं करूंगा. खुदा मुझे माफ़ करे. आप लोगों के सामने मुझे बेइज़्ज़त मत कीजिएगा.” इन शब्दों के साथ उन्होंने आदतन अपने मुँह पर तड़ातड़ तमाचे जड़ लिए!

मैं उन्हें इसी हालत में छोड़कर बाहर निकल आया!

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रचनाकार – स्वामी वाहिद काज़मी की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :

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-भारतेंदु हरिश्चंद्र

लोगो दौड़ो, मैं पाँचवाँ पैग़म्बर हूँ. दाऊद, ईसा, मूसा, मुहम्मद ये चार हो चुके. मेरा नाम चूसा पैगम्बर है. मैं विधवा के गर्भ से जनमा हूँ, और ईश्वर अर्थात् खुदा की ओर से तुम्हारे पास आया हूँ. इससे मुझ पर ईमान लाओ, नहीं तो ईश्वर के कोप में पड़ोगे.


मुझ को पृथ्वी पर आए बहुत दिन हुए, पर अब तक भगवान का हुक्म नहीं था इससे मैं कुछ नहीं बोला. बोलना क्या बल्कि जानवर बना घात लगाए फिरता था और मेरा नाम लोगों ने हूश, बंदर, लंका की सेना और मलेच्छ रखा था पर अब मैं उन्हीं लोगों का गुरु हूँ क्योंकि ईश्वर की आज्ञा ऐसी है. इससे लोगों ईमान लाओ.

जैसे मुहम्मदादि के अनेक नाम थे, वैसे ही मेरे तीन नाम हैं : मुख्य चूसा पैगम्बर, दूसरा डबल और तीसरा सुफैद और मेरा पूरा नाम श्रीमान् आनरेबल हजरत डबल सुफैद चूसा अलैहुस्सलाम वंदनीय पैग़म्बर आखिर कुन जमां है.

मुझको कोहेचूर पर खुदा ने जल्वा दिखाया और हुकुम दिया कि मैंने पैग़म्बर किया तुझको तू लोगों को ईमान में ला, दाऊद ने बेला बजा के तुझे पाया तू हारमोनियम बजाएगा, मूसा ने मेरी खुदाई रोशनी से कोहातूर जलाया तू आप अपनी रोशनी से जमाने को जला कर काला करेगा, ईसा मर के जिया था, तू मरा हुआ जीता रहेगा, मुहम्मद ने चाँद को बीच में से काटा तू चाँद का कलंक मिटा अपना टीका बनाएगा.

(खुदा कहता है) देख मूर्तिपूजन अर्थात् बुतपरस्ती को जमाने से उठा देना क्योंकि मैंने हाफ सिविलाइज्ड किया दुनिया को, पूरा तुझको. जो शराब सब पैग़म्बरों पर हराम थी मैंने हलाल किया तेरे पर, बल्कि तेरे मजहब की निशानी है जो तेरे आसमान पर आने के बाद रूए जमीन पर कायम रहेगी क्योंकि यद्यपि तेरा राज्य सर्वदा न रहेगा पर यह मत यहाँ सर्वदा दृढ़ रहेगा.

(खुदा कहता है) मैंने हलाल किया तुझ पर गऊ, सूअर, मेंढक, कुत्ता वगैरह सब जानवर जो कि हराम है, मैंने हलाल किया तुझ पर अपने मजहब के वास्ते झूठ बोलना और हुकुम दिया तुझको औरतों की इज्जत करने और उनको अपने बराबर हिस्सा देने का बल्कि यारों के संग जाने देने का, और सिवाय पब्लिक प्लेसों के कोहेचूर पर जहाँ मैंने जलवा दिखाया तुझको, तीन आराम गाह फरिश्तों से बनवाकर तुझे बख्शीं और तुझ पर हलाल कीं जिन तीनों का नाम कुर्सी, झुर्सी और दगली है.

(खुदा कहता है) देख, खबरदार, मुँह वगैरह किसी बदन को साफ न रखना नहीं तो तुझे शैतान बहका देंगे, लिबास सियाह हमेशा पहिरना और मेरी याद में सिर खुला रखना.

मैं खुदा के इन हुक्मों को मानकर तुम्हारे पास आया हूँ, मेरा कहा मानो और ईमान लाओ मैं खुदा का प्यारा पुत्र, माशूक, जोरू, नायब नहीं हूँ बल्कि खुदा का दूसरा रूप हूँ. यह इज्जत किसी पैग़म्बर को नहीं मिली थी.

लोगो! मेरा कहा मानो, खुदा मुझसे डरता है क्योंकि मैं प्रच्छन्न नास्तिक हूँ पर पैग़म्बरिन के डर से आस्तिक हो गया हूँ इससे खुदा को हमेशा हमारी दलीलों से अपने उड़ जाने का डर रहता है. तो जब खुदा मुझसे डरता है तब उसके बन्दों, तुम मुझ से बहुत ही डरो.

मेरे प्यारे अंग्रेजों ! तुम खौफ़ मत करो, मैं तुमको सब गुनाहों से बरी कराऊँगा क्योंकि नैशनलिटी बड़ी चीज है. पैग़म्बरिन व तुम्हारा रंग एक है इससे मैं तुम्हारे पापों को छिपा दूंगा.

प्यारे मुसलमानों ! मैं कुछ तुमसे डरता हूँ क्योंकि तुमको मार डालने में देर नहीं लगती इससे में तुम्हारी बेहतरी के वास्ते अपनी धर्मपुस्तक में लिख जाऊँगा कि हमारे सक्सेसर लोग तुम्हारी खातिर करें, तुम्हारे न पढ़ने पर अफसोस करें और तुम्हारे वास्ते स्कूल और कालिज बनावें.

मगर मेरे मेमने हिंदुओं ! तुमको मैं सब प्रकार नीच समझूंगा क्योंकि यह वह देश है जो ईश्वर के क्रोध रूपी अग्नि से जल रहा है और जलेगा और ईश्वर के कोप से तुम्हारा नाम जीते हुए, हाफ सिविलाइज्ड, रूड, काफिर, बुतपरस्त, अंधेरे में पड़े हुए, बारबर्स (घसेरे), बाजिबुल कत्ल (मार डालने योग्य) होगा.

देखो, हम भविष्य बानी कहते हैं : तुम रोते और सिर टकराते भागते-भागते फिरोगे, बुद्धि सीखते ही नहीं, बल नाश हो चुका है. एक केवल धन बचा है सो भी सब निकल जाएगा. यहाँ महंगी पड़ेगी. पानी न बरसेगा. हैजा, डेंगू वगैरह नए-नए रोग फैलेंगे. परस्पर का द्वेष और निन्दा करना तुम्हारा स्वभाव हो जाएगा. आलस छा जाएगा. तब तुम उसके कोप अग्नि से जल के खाक के सिवा कुछ न बचोगे.

पर प्यारो! जो मुझ सच्चे पैगम्बर पर ईमान लायेगा वह छुड़ाया जाएगा क्योंकि मैं खुशामद पसंद और घूस लेने वाला जाहिरा (दर्शनीय) नहीं हूँ, मैं ईश्वर का सच्चा पैग़म्बर और दुनिया का सच्चा बादशाह हूँ क्योंकि सूरज को खुदा ने रौशनी मेरे लिए इनायत की, चाँद में ठंडक सिर्फ मेरे लिए बख्शी गई और जमीन-आसमान मेरे लिए पैदा किया बल्कि फरिश्ते भी मेरे लिए ही बनाए गए.

ईमान लाओ मुझ पर, डाली चढ़ाओ मुझको, जूता उतार के आओ मेरी मज़ारे-पाक पर, पगड़ी पहन कर आओ मेरे मकबरे में, इनाम दो इनको और धक्का खाओ उनका जो मेरे मुखबिर (चमचे) हैं, क्योंकि वे मूजिब होंगे तुम्हारी नजात के, और जो कुछ मैं कहूँ उसे सुन कर हुजूर, साहब बहुत ठीक फरमाते हैं, बजा, इरशाद, बेशक ठीक है, सत बचन, जो आज्ञा जो आज्ञा जो आज्ञा, इसमें क्या शक, ऐसा ही है मेरे मालिक, मेरे बाबा जान, सब सच्च फरमाते हो- कहो क्योंकि जो मैं कहता हूँ वह ईश्वर कहता है, और मेरे अनादरों को सहो. अगर मेरी दरगाह में तुम्हें गरदनियाँ दी जाए तो उसकी कुछ लाज मत करो, फिर घुसो क्योंकि मेरी दरगाह से निकलना दुनिया से निकल जाना है.

देखो, शराब पियो, कुलीन का कुल सत्यानाश में मिलाओ, होटल में खाओ, लव करना सीखो, स्पीच दो, क्रिकेट खेलो, शादी में खर्च करो, मेम्बर बनो, दरबारदारी करो, पूजा पत्री करो, चुस्त चालाक बनो, ‘हम नहीं जानते’ को ‘हम नहीं जानता’ कहो, चक्करदार टोपी पहिनो वा सिर खुला रखो पर पोशाक सब तुम रखो, नाच-बाल, थियेटर अंटा गुड़गुड बंग प्रिवी सिवी घरों में जाओ क्योंकि ये काम मूजिब होंगे खुदा और मेरी खुशी के.

शराब पियो, कुछ शंका मत करो. देखो, मैं पीता हूँ क्योंकि यह खुदा का खून है जो उसने मुझे पिलाया और मैंने दुनिया को और यह उसके दोनों बादशाहत की निशानी है जो बाद में मेरे बहुत दिनों तक कायम रहेगी क्योंकि उसने हुक्म दिया है कि औरों की तरह तू मकान बहुत पक्का न बनवा क्योंकि दुनिया खुद नापायदार (निराधार) है. मगर मेरे खून की बोतलों के टुकड़े जो कि (खुदा कहता है) मेरी हड्डियाँ हैं, बहुत दिनों तक न गलेंगी और मेरे सच्चे राज की निशानी कायम रहेगी.

देखो, मेरा नाम चूसा है क्योंकि मैं सबका पाप रूपी पैसा चूस लेता हूँ क्योंकि खुदा ने फरमाया है कि मेरे बन्दे पैसों के बहकाने से गुनाह करते हैं अगर उनके पास पैसा न रहे तो खुद गुनाह न करें, इससे तू सबसे पहिले इनका पैसा चूस ले.

मेरा दूसरा नाम डबल है क्योंकि डबल हिन्दी में पैसे को कहते हैं और अंगरेज़ी में दूने को और पच्छिम में उस बरतन को जिससे घी वा अनाज निकाला जाता है और मेरा तीसरा नाम सुफैद है क्योंकि मैं रौशनी बख्शने वाला हूँ और दिल मेरा साफ चिट्टा चमकीला चीनी की जात है और चमड़ा मेरा गोरा है और भी मैं सफेद करूंगा लोगों को अपने दीन की चाँदनी से इनलाइटेड करके.

मेरे पहाड़ का नाम कोहेचूर है क्योंकि मैं सबके पापी दिलों को और पापों को तथा प्रैजुडिसों को, लोगों के बल और धन को चूर करूंगा, और मेरी पहली आरामगाह कुर्सी है क्योंकि अब वहाँ की आब-हवा साफ होकर बेवकूफी की शिकायत रफा हो गई और दूसरी झुरसी है जहाँ जलती आग पर मेरे जैसे पैगम्बर के सिवा दूसरा नहीं बैठ सकता और तीसरी दग़ली है उसमें चारों ओर दग़ल भरा है और बीच में मेरा सिंहासन है.

जहाँ पर खुदा ने हलाल किया है शराब, बीफ, मटन, बग्गी, दग़ल, फसल, नैशनलिटी, लालटेन, कोट, बूट, छड़ी, जेबी घड़ी, रेल धुंआकश, विधवा, कुमारी, परकीया, चाबुक, चुरुट, सड़ी मछली, सड़ी पनीर, सड़े अचार, मुंह की बू, अधो भाग के केश, बिना पानी के मल धोना, रूमाल, मौसी, मम्मी, बुआ, चाची मय अपनी बेटी पोतियों के, कज़िन, फ्रेंड, लेपालट की बहू, खानसामिन, हुक्का, थुक्का, लुक्का, बुक्का और आजादी को, और हराम किया बुत परस्ती, बेईमानी, सच बोलना, इन्साफ करना, धोती पहरना, तिलक लगाना, कंठी पहरना, नहाना, दतउन करना, स्वच्छन्द होना, उदार होना, निर्भय होना, कथा-पुरान, भाई वा मां वा पिता के साथ रहना, मूर्ति पूजन तथा आर्थोडाक्स की सुहबत, सच्ची प्रीत, परस्पर उपकार, आपस का मेल बुरी बातें घातें फातें छातें और प्रैजुडिस को.

लोगो! दौड़ो-दौड़ो, ईमान लाओ मुझ पर. देखो पीछे पछताओगे और हाथ मलते रह जाओगे. मैं ईश्वर का प्यारा दूसरा और पांचवां पैगम्बर केवल तुम्हारे उद्धार के वास्ते पृथ्वी पर आया हूँ. ईमान लाओ मुझ पर. हुकुम मानो मेरा. दाहिना हाथ जो तुम लोगों के सामने उठा है खुदा का हाथ है. इसको सिजदा करो. झुको, अदब करो. ईमान लाओ और इस शराब को खुदा का खून समझ कर पिओ-पिओ-पिओ.

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भारतेंदु हरिश्चंद्र की कुछ अन्य हास्य-व्यंग्य रचनाएँ यहां पढ़ें-
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- भारतेंदु हरिश्चंद्र

आप कौन हैं ?
मैं हूँ भंडाचार्य.
कहाँ से आ रहे हैं?
मैं अनादि कब्रिस्तान से उठा हूँ.
विशेषता क्या है?
क्या मतलब?
तो आप वसंत हैं।
इसमें संदेह क्या? खालिस वसंत हूँ.

चैत्रनंदन या वैशाखनंदन?
ओह! आक्षेप क्यों करता है? मैं मधुकैटभ के बड़े भाई का बेटा नहीं हूँ. मैं हिन्दू नामधारी हूँ, अतः माधवनंदन हूँ.
तब आपका स्वागत है. आइए माधवनंदन जी.
प्रणाम करता हूँ.
आइए, विराजिए.
हः हः हः आप भी बैठिए.
यह व्यर्थ शिष्टाचार का समय नहीं है, अतः बैठिए. यह आसन है.

मैं इस आसन पर बैठता हूँ.
(दोनों बैठते हैं)
किसलिए निकले हैं?
कहाँ से? घर से या माता की गर्भ गठरी से?
गर्भ गठरी से ही निकले जान पड़ते हैं, पहला प्रश्न फिर पूछता हूँ कि किस लिए निकले हैं?
होली खेलने के लिए.
वाह! ऐसे कठिन समय भी आप जैसे लोग होली खेलने का समर्थन करते हैं!! यह नहीं जानते कि यह समय होली खेलने का नहीं. भारतवर्ष का धन विदेश जाने से जनता भूख प्यास से पीड़ित है. यह क्या होली खेलने का समय है?

हम जैसों के घर सदा होली है. मैं लोगों का रोना नहीं सुनता. लोग तो हमेशा रोते ही रहते हैं.
तो आप ढुंढा के वंश में उत्पन्न हुए हैं?
मैं ढुंढिराज नहीं हूँ.
नहीं जी, मैंने तो यह पूछा कि क्या आप ढुंढा के कुल में पैदा हुए हैं?
मैं जयपुरी नहीं हूँ.
कौन कहता है कि आप जयपुरी, दिल्लीपुरी, गोरखपुरी, गिरी, भारती हैं?
तब तो मैंने ढुंढा शब्द का अर्थ नहीं समझा।
ढुंढा नाम की राक्षसी का ही यह होलिका पर्व है.
ओह, फिर राक्षस वंश का कलंक लगाकर मुझ पर आरोप करता है. मैंने मधुनंदन कहा, मैं मधुवंशी नहीं हूँ, माधवनंदन हूँ.

अच्छा, किसके साथ होली खेलेंगे?
जो भी मिल जाएगा, विश्व परिवार है उदार वृत्त वालों का.
किस चीज से आप होली खेलेंगे?
सफेद धूल, लाल पाउडर, काले कीचड़, पीले अगुरू आदि चीजों से और चोवा चंदन से भी. अबीर पिचकारी और इन जैसे वाक्यों से.
आजकल भारत में वैसे कीर्तिशाली नहीं रह गए हैं, सफेद धूल कहाँ से आएगी?
आपको मालूम नहीं? चुंगी रचित शाही सड़क से.

शाही सड़क हो या देवताओं की सड़क, परंतु बराबर बहुत छिड़काव होने से वहां धूल कहाँ?
अरे नामानुरूप गुण वाले! धूल की कमी नहीं है. भारत में प्रायः सभी की आँखों में धूर्तों द्वारा झोंकी गई धूल मिलेगी.
तब लाल पाउडर कहाँ से आएगा? क्या मेडिकल हाल से?
आप नहीं जानते, लाल पाउडर का नाम अबीर है. लाह है जो पाउडर यह समास हुआ.
लाल और पाउडर क्या दो वस्तुएँ हैं?

आप भी कितने घोंघा हैं. नहीं, नहीं, दूसरे रंगों को पृथक करने वाले लाल रंग से युक्त एक विशिष्ट वस्तु का बोधक सहज गुण वाले चूर्ण का नाम पाउडर है.
हाँ, अब समझा आप वैयाकरण भी हैं और नैयायिक भी.
सच है, यह तो प्रसिद्ध ही है कि जहाँ शब्द शास्त्री वहां तर्क-शास्त्री!
अच्छा लाल पाउडर लाइएगा कहाँ से? आर्यों के सिर पर तो रह नहीं गया है.
अहा-हा! मेरे नारीभंड के लिए रक्त रज का भी अभाव है, खासकर वसंत ऋतु में.
समझा! परंतु क्या जयचंद से शुरू कर आर्य वंश के लिए अनर्थ और विग्रह की जड़ के जन्म दाताओं के मुँह से या नारियों के आँसू भरे नेत्रों से काला कीचड़ लाइएगा.

नहीं, इत्र फरोशों के बाजार से.
अगुरू कहां से लाइएगा? क्या आर्यों की मुख कान्ति से?
पंजाब से, कश्मीर से. हम लोगों की गति सभी जगह है अतः कहीं से भी लाकर खेलूंगा.
आप बेफिक्र खेलिए. अफसोस हम जैसे देश की चिन्ता से ग्रस्त लोगों की खेल में क्या रुचि.
आप व्यर्थ ही देश की चिन्ता से व्याकुल हैं, आपके चिन्ता करने से क्या होगा?
शौक से खेलिए कूदिए. वह यौवन फिर कहाँ? रोने से क्या होता है? भारत ही होली में झोंक जाएगा. यहाँ तो यमघट छल का खेल ही बच रहेगा या चिंता रह जायेगी भारत में अगणित अंग्रेजों की राजधानी की चोटी पर बैठे हुए राजनीतिज्ञों के पास.

मित्र, उत्साह तो तुम्हारा खूब है, परंतु क्या इसका कारण भी जानते हो.
नहीं, दुनिया के सभी कामों में शिष्टाचार ही प्रधान माना जाता है अतः वही कारण होगा या देख लो आजकल के विद्यार्थियों को.
अच्छा, ऐसा ही करूंगा.

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भारतेंदु हरिश्चंद्र की कुछ अन्य व्यंग्य रचनाएँ यहाँ पढ़ें-http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_07.html http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_08.html
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-मीरा शलभ

*स्त्री
उसने सोचा था उसे पाँव की जूती
तभी तो आज वह काटने को आमादा हो गई।

*मिल बांट कर खाओ
माँ ने सिखलाया था
बचपन में कि सब मिल बाँट कर खाओ
इसी लिए तो आज
हम सभी मिल बाँट कर खा रहे हैं.


*यक्ष-प्रश्न
चिड़िया घर में
भेड़िये को देखकर
डर गया था वह नन्हा-सा बालक
और – अधिक सिमट गया था माँ के अंक में
किंतु... डरते डरते भी
कर बैठा एक यक्ष-प्रश्न
माँ क्या तुम वास्तव में नहीं डरीं
भेड़िये को देखकर
और क्यों नहीं डरीं?
जबकि अकसर-
आदमी को देखकर डर जाती हो।

*उद् घाटन
पुल के उद् घाटन से पूर्व
मुख्यमंत्री जी ने
अपने हृदय में
पुल देवता का
आह्वान किया...


तथा मन ही मन उन्हें
दंडवत् प्रणाम किया
और साथ में यह प्रार्थना की
कि... कृपया प्रभु
आप धैर्यपूर्वक
मेरे यहाँ रहने तक
यों ही स्थिर रहना।

*ग़ज़ल
फिर वही पुराना सिलसिला है
संग मेरे दर्द का क़ाफ़िला है

पत्थरों के शहर में मेरा
एक शीशे का किला है

किस किस से करूँ हिफ़ाज़त
हर हाथ में मुझे पत्थर मिला है

खुद ब खुद चटकने लगी हूँ मैं
टूटने का खौफ़ न निकला है

देख कर लहूलुहान जिस्म मेरा
कोई पत्थर नहीं पिघला है

रचनाकार – मीरा ‘शलभ’ की कई कहानियाँ एवं कविताएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा आपके कई कहानी/कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. ये लघुकथाएं – उनकी सद्यः प्रकाशित कहानी संग्रह – अंतर्मन की आग ( प्रकाशक – अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान, गाजियाबाद, आईएसबीएन क्र. 181-89105-12-4) से चुनी गई हैं.रचनाकार में इनकी अन्य रचनाएँ आप यहाँ पढ़ सकते हैं : http://rachanakar.blogspot.com/2005/10/blog-post_10.html http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_19.html

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-पुष्पा रघु

चिकी-मिकी उस पोखर के राजकुमार थे. क्योंकि उनकी माँ रोमी से उस ताल के सारे मेंढक-मेंढकी डरते थे. उसका शरीर खूब मोटा-ताजा था. पीले मटमैले रंग में हरी धारियाँ बड़ी सुन्दर लगती थीं. जब वह अपनी गोल आँखों को चमकाते हुए जोर से टर्राती तो पूरे पोखर में उसकी आवाज गूंज उठती. छोटी-मोटी मछलियाँ भी रोमी के सामने पड़ने से डरती थीं. वह थी भी झगड़ालू और घमण्डी. माँ की तरह चिकी-मिकी भी घमण्ड में रहते और ताल के सारे बच्चों से लड़ते-झगड़ते रहते. दूसरों के घर में घुसकर उनकी चीजें छीन लाना या तोड़-फोड़ करना उनका रोज का काम था. कोई उन्हें कुछ कहता तो उनकी माँ आँखें चमका कर इतनी जोर से टर्राती कि बेचारे डरकर दुबक जाते.

शुरू-शुरू में तो चिकी-मिकी की शरारतों की शिकायत करने लोग रोमी के पास आते थे, पर रोमी अपने बच्चों को डाँटने की बजाय उनसे ही लड़ने को उतारू हो जाती. वह उन लोगों को बुरी तरह दबोच लेती. उसकी छलांग सबसे लम्बी थी और शरीर भी सबसे ज्यादा मजबूत था. जान तो सबको प्यारी है. अतः धीरे-धीरे प्रायः सभी ने उन माँ-बेटों का विरोध करना छोड़ दिया. इससे चिकी-मिकी बहुत उद्दण्ड और आवारा हो गए. उन्हें माँ ने कोई काम करना तो सिखाया ही नहीं था. वे कभी किसी का न आदर करते थे न किसी से अच्छा व्यवहार.

पोखर के सब मेंढक और मछली बहुत दुःखी थे. एक दिन समझदार और बुजुर्ग मेंढकों ने एक सभा की. सबका कहना यही था कि चिकी-मिकी को सुधारने के लिए रोमी का घमण्ड दूर करना आवश्यक है. उसके लिए कई तरकीबें सोची गईं. कप्पू बड़ा बुद्धिमान था. उसने कहा कि यदि रोमी को ताल के बाहर भेजा जाए तो उसे अवश्य ही अपनी असलियत का पता चल जाएगा कि उससे भी ज्यादा ताकतवर लोग हैं. तब वे माँ-बेटे सुधर जाएंगे. सबने यह बात मान ली और एक योजना बनाई.

बस फिर क्या था. योजना के अनुसार सरकंडों की एक सुन्दर सी गाड़ी बनाई गई. जिसमें घोंघे के पहिए लगाए गए और मोर पंख की छतरी. एक उत्सव में यह गाड़ी रोमी को भेंट की गयी. उसे ऊँचे मंच पर बैठाकर फूलों की माला पहनायी और कहा कि रोमी हमारी रानी है. कई मेंढकों ने उसकी प्रशंसा में भाषण दिए, गीत गाए. चिकी-मिकी की बहादुरी को खूब सराहा गया. सबके बाद में कप्पू बोला, ‘हम सब रोमी जैसी रानी और चिकी-मिकी जैसे राजकुमार पाकर धन्य हैं. ताल के सभी वासियों की ओर से मैं रानी को यह गाड़ी भेंट करता हूँ. इसे खींचने को दो मेंढक सदा आपकी सेवा में रहेंगे. आप लोग रोज गाड़ी पर सैर के लिए जाएँ ताकि दूसरी ताल के मेंढक भी हमारी इस शान-बान को देखें.’

सबने तालियाँ बजाईं. रोमी और चिकी-मिकी खुशी से झूम उठे. रोमी अपने गलफड़े फुलाकर आँखें घुमाने लगी. चिकी-मिकी टर्ट-टर्र करके उछलने लगे.

अगले दिन से ही रोमी रानी अपने लाड़ले चिकी-मिकी के साथ गाड़ी पर सवार होकर सैर को जाने लगीं. गाड़ी के नीचे एक बाजा फिट था जो उसके चलने पर बजता टम-टमा-टम. दूसरा पोखर कुछ ही दूर था. बाजे की आवाज सुनकर सारे मेंढक किनारे पर आ गए. गाड़ी खींचने वाले मेंढकों ने ‘रोमी रानी की जय’ बोली तो वे भी जयकारे बोलने लगे, पर पास आने की हिम्मत नहीं हुई उनकी. जयकारे सुनकर मां-बेटे और भी अकड़कर बैठ गए.

इसी तरह तीन-चार दिन तो रानी की शोभा-यात्रा आराम से चलती रही. रोमी की अकड़ भी बढ़ती रही.

एक दिन जब रोमी की गाड़ी पगडंडी पर शान से टम-टमा-टम करती जा रही थी तो एक भैंस पोखर की ओर आयी. वह भागती आ रही थी. उसके गले में पड़ी घंटियों की आवाज में गाड़ी की आवाज दब गयी. गाड़ी खींचने वाले मेंढक भैंस को देखते ही गाड़ी एक किनारे खिसकाने लगे लेकिन रोमी बिगड़ उठी, ‘वाह, रानी क्यों हटे? भैंस को बचकर निकलना चाहिए.’

कहकर रोमी ने अपना शरीर फुलाया और पूरे जोर से टर्राने लगी, पर भैंस ने देखा भी नहीं. वह उसी मस्ती से दौड़ी आ रही ती. वे दोनों मेंढक तो गाड़ी छोड़, उछलकर एक झाड़ी में जा छुपे. चिकी-मिकी भी उस भयंकर जीव को देखकर डर से कांप उठे, पर रोमी अपनी अकड़ में बैठी थी.

अगले ही पल चिकी-मिकी उछलकर झाड़ी में जा छिपे. भैंस का पैर लगते ही गाड़ी और रोमी दोनों मिट्टी में मिल चुके थे.

चिकी-मिकी अपराधी-से रोते-कांपते ताल में आए. रोमी की दुखद मौत ने उनके जीवन को बदल दिया. वे अब मेहनती, दयालु और शरीफ बालक बन गए. उन्हें पता चल गया था कि घमण्ड आदमी को नष्ट कर देता है.

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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.

पुष्पा रघु की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर पढ़ें – श्रद्धांजलि – (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_13.html ) बन्द गली का द्वार (http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_08.html ) तथा बूढ़ा बचपन (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_08.html )

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- पुष्पा रघु
हद दर्जे की आलसी और निकम्मी लड़की है नूपुर. स्कूल से घर आती है तो बस्ता पटक, जूते-मोजे इधर-उधर फेंक, सीधी खाने की मेज पर. मम्मी कहती हैं, “नुप्पू बेटे यूनिफ़ॉर्म उतारो! हाथ मुँह धो लो, देखो तो कितने गंदे हो रहे हैं.”

“ऊँ-हूँ हमें जोर की भूख लगी है, खाना दो ना!” खाना खाया सो गई. सोकर उठते ही पार्क में खेलने चली जाती है और मम्मी लाख बुलाए पर अँधेरा होने से पहले वह नहीं लौटती. सुबह भी मुश्किल से जागेगी, जागते ही हड़पोंग मचाएगी- “यूनिफ़ॉर्म प्रेस करी हुई नहीं है, जूतों पर पॉलिश नहीं है, जुराब भी गंदे हैं.” मम्मी ही नहीं पापा भी भाग-दौड़ करते-करते परेशान हो जाते हैं तब कहीं जाकर नूपुर बस पकड़ पाती है. स्कूल-डायरी में जब देखो तब शिकायत. उसे स्कूल का काम करवाना कौन-सा सरल है. नौ साल की हो गई नूपुर पर ज्यों-ज्यों बड़ी हो रही है अधिक ही बिगड़ती जा रही है. छुट्टियों में तो उसने खूब ही तंग किया था मम्मी को. मम्मी सदा भगवान से प्रार्थना करती कि नूपुर को सदबुद्धि मिले और वह एक अच्छी लड़की बने. वह नूपुर को भी बहुत समझाती पर वह एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती.

रविवार का दिन था. नूपुर सदा की तरह उठते ही पार्क में पहुँच गई. तितलियों के पीछे भाग रही थी. उसने देखा कि एक गुलाब के पौधे पर फूल से भी बड़ी सोने के रंग की एक बहुत सुंदर तितली बैठी है. उसके मन में आया क्या ही अच्छा हो यह तितली मेरी पकड़ में आ जाए. कल स्कूल में मेरा कितना रौब पड़ेगा, सब पर. तभी उसने सुना - “नूपुर रानी मैं तुम्हारे पास आ तो जाता पर अभी तो मुझे बहुत काम करने हैं.” उसने हैरानी से चारों ओर देखा. तितली उसके कंधे पर आ बैठी और हँसकर बोली- “तितलियों की रानी हूँ. तुम नाहक मेरी बहनों को सताती रहती हो.”

“मुझे तितिलियाँ बहुत अच्छी लगती हैं.” नूपुर ने कहा.

“अच्छा! में तुम्हें जादू की कलम दूंगी जिससे तुम इससे भी सुंदर तितली बना सकोगी.” तितली बोली.

“सच!” नूपुर चहककर बोली- “दो ना तितली रानी!”

“दूंगी, पर एक शर्त है, ये गिट्टे ले जाओ और कम-से-कम सात घरों की लड़कियों के साथ खेलकर आओ.”

“अरे! वाह! यह भी कोई काम है! मैं अभी आई.” नूपुर ने ताली बजाते हुए कहा और उछलती-कूदती जा पहुँची प्रज्ञा के घर. “प्रज्ञा! प्रज्ञा! आ जा गिट्टे खेलेंगे.”

“ऊँह! यह भी कोई खेलने का समय है? मैं तो अपना कमरा साफ कर रही हूँ.” नूपुर ने राखी को आवाज़ लगाई, परन्तु वह नाश्ता बनाने में अपनी मम्मी का हाथ बंटा रही थी. उसने मना कर दिया. क्षिति गमलों में पानी दे रही थी. उर्वी अपने छोटे भाई को खिला रही थी. श्रुति नहा रही थी. स्वाति बैठी पढ़ रही थी. किसी ने भी उन सुंदर गिट्टों का स्वागत नहीं किया. अन्त में नूपुर नेहा के घर पहुँची. देखा वह भी हाथ में झाड़न लिए फर्नीचर झाड़-पोंछ कर रही है. वह बोली- “अरे क्या बेकार के काम में लगी हो, देख मेरे पास कितने सुंदर गिट्टे हैं. आ खेलते हैं.”

नेहा उसका हाथ झटक कर बोली- “चल निकम्मी, न खुद कुछ करती है न औरों को करने देती है. हमारे यहाँ मेहमान आने वाले हैं. कितना काम पड़ा है.”

नूपुर की आँखों में आँसू आ गए. मम्मी की बातें सच्ची और अच्छी लग रही थीं. अब वह अपनी सहेलियों की तरह अच्छी बच्ची बनेगी. उसने निश्चय कर लिया. वह तितली रानी को ढूंढ रही थी ताकि उससे कह सके - “मुझे जादू की कलम नहीं चाहिए न ही ये गिट्टे. मैं भी घर जाकर काम करूंगी, पढ़ूंगी.” पर तितली रानी तो मिल ही नहीं रही. अरे! ये तो मम्मी हैं. गीले बालों से मोती टपक रहे हैं. सतरंगा आँचल लहरा रहा है. नूपुर के सिर पर हाथ फेरती कह रही हैं- “उठ जा बेटी, जल्दी तैयार हो जा आज नानी के घर चलेंगे.”

नूपुर बिस्तर से उछलते कूदते उठी और शीघ्रता से तैयार होने लगी. उसके मन में तितली रानी के सुंदर गिट्टे नाच रहे थे.
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