November 2005

लोककथा : एक सेर धान

**-** प्राचीन समय की बात है. एक नगर में अत्यंत समृद्ध सेठ रहता था. उसकी अत्यंत रुपवती विवाह योग्य कन्या ने अपने विवाह के लिए बड़ी विचित्र क...

अकबर बीरबल की कहानियाँ

**--** बीरबल की खिचड़ी एक दफा शहंशाह अकबर ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति सर्दी के मौसम में नर्मदा नदी के ठंडे पानी में घुटनों तक डूबा रह क...

कुछ पाकिस्तानी ग़ज़लें

**-** ग़ज़ल 1 - परवीन फ़ना सैयद सोचते हैं तो कर गुजरते हैं हम तो मंझधार में उतरते हैं मौत से खेलते हैं हम, लेकिन ग़ैर की बंदगी से डरते ...

कुछ अगणित-सी गणितीय कविताएँ...

-अनूप शुक्ल --१०१ प्रार्थनाएँ++ वर दे, मातु शारदे वर दे! कूढ़ मगज़ लोगों के सर में मन-मन भर बुद्धि भर दे। बिंदु-बिंदु मिल बने लाइनें ला...

चंद कविताएँ, चंद ग़ज़लें

**-** कविता : सुनो रे संतों - देवेन्द्र आर्य **-** जिसका नाम उचारा प्रभु ने वो तो गया बेचारा संतों। रैन अंधेरी, पूरनमासी सुबह के सपने शाम...

देवेन्द्र आर्य की कुछ ताज़ा ग़ज़लें

**-** ग़ज़ल 1 --.-- यह भी हो सकता है अच्छा हो, मगर धोखा हो क्या पता गर्भ में पलता हुआ कल कैसा हो भाप उड़ती हुई चीज़ें ही बिकेंगी अब तो शब्द...

घाघ की कहावतें

**-** 1 रहै निरोगी जो कम खाय बिगरे न काम जो गम खाय 2 प्रातकाल खटिया ते उठि के पियइ तुरते पानी कबहूँ घर में वैद न अइहैं बात घा...

संजय विद्रोही की कहानी : स्कार्फ़

-संजय विद्रोही " बाजार तो जाने को धर्म ही ना रह्यो, आजकल तो. इतनो ट्रेफ़िक, इतनो धुँआ और इतनो शोर. बाप रे बाप. इससे तो अपनो घर ही भलो....

वक्त की लकीरों से कुछ ग़ज़लें…

- ब्रजमोहन झालानी **-** आदमी वक्त की लकीरों से कट गया है आदमी अपने ही हाथों से बंट गया है आदमी भीतर और बाहर उलझन ही उलझन है प्रश्नों ही...

यथार्थ व्यंग्य : मुँदते ही मेरी आंखें

- स्वामी वाहिद काज़मी यह भला कैसे संभव है कि मैं भूल जाऊँ. कदापि नहीं ! मुझे ठीक मरते दम तक स्मरण रहेगा कि वह इक्कीसवीं शती में लुढ़कती ...

संजय विद्रोही की कहानी : इम्तिहान

· संजय विद्रोही अपने आप को सामान्य दिखाने की फ़िकर में मैं कुछ ज्यादा ही बन संवर कर निकला था, ऑफिस के लिए. लोग मेरे चेहरे से मेरी मनोदशा...

व्यंग्य : पटवारी को मत पकड़ो

**-** - लतीफ़ घोंघी यह जानकर दुःख हुआ कि एक पटवारी साहब सौ रुपया घूस लेते हुए पकड़ लिए गए. आश्चर्य इस लिए हुआ कि देश में ऐसे पटवार...

विश्व की सबसे लम्बी ग़ज़ल (दस हजार अश्आर) के कुछ अश्आर

**-** - राजकुमार ‘चन्दन’ तीरगी बनके तू छुपा क्या है ? रोशनी बनके भी दिखा क्या है ? पाँच कुल हर्फ हैं, मुहब्बत के न पढ़ें हों तो फिर पढ़ा ...

कम्प्यूटरों की दुनिया से कुछ चुटकुले...

*** भारत में एक दफा अमरीकी प्रतिनिधि मंडल भ्रमण के लिए आया. वे राजधानी दिल्ली में सरकारी कामकाजों का जायजा ले रहे थे. उन्हें एक स्थानीय शास...

2 जातक कथाएँ

**-** बंटवारा ---*--- एक जंगल में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था. एक दिन उसकी पत्नी को ताज़ी मछली खाने की तीव्र इच्छा हुई. सियार अपनी प...

संजय ग्रोवर की चंद ग़ज़लें

- संजय ग्रोवर ग़ज़ल 1 जो गया उससे निकलना चाहता हूँ आते लमहों में धड़कना चाहता हूँ मेरा दुख लाएगा सुख तेरे लिए मुझको करने दे जो करना चाहता हू...