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November, 2005 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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लोककथा : एक सेर धान

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प्राचीन समय की बात है. एक नगर में अत्यंत समृद्ध सेठ रहता था. उसकी अत्यंत रुपवती विवाह योग्य कन्या ने अपने विवाह के लिए बड़ी विचित्र किस्म की शर्त रखी थी. शर्त यह थी कि जो युवक कीचड़ से भरे तालाब में नख-शिख तक डुबकी लगाने के उपरांत एक गिलास जल से अपने शरीर को भली प्रकार साफ कर लेगा, उसी से वह विवाह करेगी.

यूँ तो शर्त आसान सी प्रतीत होती थी, परंतु सैकड़ों युवक इस कोशिश में असफल रहे थे. एक गिलास पानी में समस्त शरीर का कीचड़ भला कैसे साफ हो सकता था. सेठ को अपनी कन्या के विवाह की चिन्ता सता रही थी. परंतु उस रुपवती कन्या का कहना था कि कोई न कोई बुद्धिशाली युवक किसी दिन आएगा और उसकी इस शर्त को पूरा कर उसे ब्याह ले जाएगा. अन्यथा, उसे कुंवारी रहना ही मंजूर है.

अंततः दूर देश के एक अत्यंत चतुर युवक को इस स्वयंवर के बारे में पता चला. वह उस रुपवती कन्या से ब्याह रचाने चल पड़ा. उसने कीचड़ भरे तालाब में डुबकी लगाई और धूप में खड़ा हो गया. फिर साथ लाए बांस की पतली कमचियों से कीचड़ को छीलकर-रगड़-रगड़ कर छुड़ाया. धूप में शरीर का बाकी बचा कीचड़ जब सूखकर महीन धूल में परिवर्तित हो गया तो उसने उसे भी रगड…

अकबर बीरबल की कहानियाँ

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बीरबल की खिचड़ी
एक दफा शहंशाह अकबर ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति सर्दी के मौसम में नर्मदा नदी के ठंडे पानी में घुटनों तक डूबा रह कर सारी रात गुजार देगा उसे भारी भरकम तोहफ़े से पुरस्कृत किया जाएगा.

एक गरीब धोबी ने अपनी गरीबी दूर करने की खातिर हिम्मत की और सारी रात नदी में घुटने पानी में ठिठुरते बिताई और जहाँपनाह से अपना ईनाम लेने पहुँचा.

बादशाह अकबर ने उससे पूछा – तुम कैसे सारी रात बिना सोए, खड़े-खड़े ही नदी में रात बिताए? तुम्हारे पास क्या सबूत है?

धोबी ने उत्तर दिया – जहाँपनाह, मैं सारी रात नदी छोर के महल के कमरे में जल रहे दीपक को देखता रहा और इस तरह जागते हुए सारी रात नदी के शीतल जल में गुजारी.

तो, इसका मतलब यह हुआ कि तुम महल के दीए की गरमी लेकर सारी रात पानी में खड़े रहे और ईनाम चाहते हो. सिपाहियों इसे जेल में बन्द कर दो - बादशाह ने क्रोधित होकर कहा.

बीरबल भी दरबार में था. उसे यह देख बुरा लगा कि बादशाह नाहक ही उस गरीब पर जुल्म कर रहे हैं. बीरबल दूसरे दिन दरबार में हाजिर नहीं हुआ, जबकि उस दिन दरबार की एक आवश्यक बैठक थी. बादशाह ने एक खादिम को बीरबल को बुलाने भेजा. खादिम ने लौ…

कुछ पाकिस्तानी ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
- परवीन फ़ना सैयद

सोचते हैं तो कर गुजरते हैं
हम तो मंझधार में उतरते हैं

मौत से खेलते हैं हम, लेकिन
ग़ैर की बंदगी से डरते हैं

जान अपनी तो है हमें भी अज़ीज़
फिर भी शोलों पे रक़्स करते हैं

दिल-फ़िगारों से पूछकर देखो
कितनी सदियों में घाव भरते हैं

जिनको है इंदिमाले-जख़्म अज़ीज़
आमदे-फ़स्ले-गुल से डरते हैं

छुपके रोते हैं सबकी नज़रों से
जो गिला है वो खुद से करते हैं
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ग़ज़ल 2

-फ़ातिमा हसन

किससे बिछड़ी कौन मिला था भूल गई
कौन बुरा था कौन था अच्छा भूल गई

कितनी बातें झूठी थीं और कितनी सच
जितने भी लफ़्जों को परखा भूल गई

चारों ओर थे धुंधले-धुंधले चेहरे-से
ख़्वाब की सूरत जो भी देखा भूल गई

सुनती रही मैं सबके दुःख ख़ामोशी से
किसका दुःख था मेरे जैसा भूल गई

भूल गई हूं किससे मेरा नाता था
और ये नाता कैसे टूटा भूल गई

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ग़ज़ल 3

- शहनाज़ परवीन सहर

मेरी वफ़ाएँ पड़ी हुई हैं तेरे रस्ते-रस्ते में
तुझको ही ये माल मिलेगा और फिर वो भी सस्ते में

यूँ ही बस वो मुझको छोड़ के सबसे मिलता रहता है
बच्चा भी तो ग़लत किताबे रख लेता है बस्ते में

उसका ठंडा नाम लिया है और भी जान जलाने को
हाथ में सूरज थाम लिया है हमने आज झुलसते में

उससे बिछड़ …

कुछ अगणित-सी गणितीय कविताएँ...

-अनूप शुक्ल

--१०१ प्रार्थनाएँ++

वर दे,
मातु शारदे वर दे!
कूढ़ मगज़ लोगों के सर में
मन-मन भर बुद्धि भर दे।

बिंदु-बिंदु मिल बने लाइनें
लाइन-लाइन लंबी कर दे।
त्रिभुज-त्रिभुज समरूप बना दो
कोण-कोण समकोण करा दो
हर रेखा पर लंब गिरा दो
परिधि-परिधि पर कण दौड़ा दो
वृत्तों में कुछ वृत्त घुसा दो
कुछ जीवायें व्यास बना दो
व्यासों को आधार बना दो
आधारों पर त्रिभुज बना दो
त्रिभुजों में १८० डिग्री धर दो।

वर दे,
वीणा वादिनी वर दे।

--वृत्त वृत्तांत++

हेरी मैं तो वृत्त दीवानी
मेरो दरद न जाने कोय।
नैन लड़े हैं वृत्त देव से
किस विधि मिलना होय।

बस एक बिंदु पर छुआ-छुई है
केहिं विधि धंसना होय ?
जबसे छुआ है मैंने प्रिय को
मन धुकुर-पुकुर सा होय।

पर प्रियतम पलटा है नेता सा
मुझसे बस दूर भागता जाता
बस छुअन हमारी परिणति है
वह बार-बार चिल्लाता ।

जुड़वा बहना भी संग चली थी
उसको भी ये भरमाता है।
मैं इधर पड़ी वो उधर खड़ी
ये भी कैसा सा नाता है।

अनगिन रेखाओं को स्पर्शित कर
इस मुये वृत्त ने भरमाया ।
खुद बैठा है मार कुंडली
पता नहीं किस पर दिल आया।

मैं भी होती जीवा जैसी
इसके आर-पार हो जाती।
भले न पाती इस बौढ़म को
छेद, चाप दे जाती ।

शायद दूर पहुंचकर लगता
मैंने जीवन में क…

चंद कविताएँ, चंद ग़ज़लें

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कविता : सुनो रे संतों - देवेन्द्र आर्य
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जिसका नाम उचारा प्रभु ने
वो तो गया बेचारा संतों।

रैन अंधेरी, पूरनमासी
सुबह के सपने शाम को बासी
दिशा भरम का मरम न जानूं
दिल्ली लूं या मथुरा काशी।

चाहे कुछ भी ले लो फिर भी
कुछ भी नहीं तुम्हारा संतों।

क्या तो बाभन, क्या तो पासी
खेत बेच के हुए खलासी
कहो प्रवासी, मजे में हो ना
हम निरगुनियाँ मूल निवासी।

कभी ब्रह्म सा कभी प्रेत सा
हमको गया उभारा संतों।

गोरखपुर, आजमगढ़, आरा
डूब रहा हर जगह किनारा
डग्गामार बसों सी कविता
धक्का ही रह गया सहारा।

किलक रही है नीम उदासी
बिलख रहा उजियारा संतों।

इस यमुना से आमी बेहतर
बिकने से गुमनामी बेहतर
ऐसी मलिकाई क्या होगी
हमसे कहीं असामी बेहतर।

नमक हरामी मीठी लगती
और पसीना खारा संतों।

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ग़ज़ल : रमेशचन्द्र श्रीवास्तव

धर्म क्या है यह न पूछो कर्म से ग़ाफ़िल नहीं
ईश्वर की सब दया है मैं किसी काबिल नहीं

सिर्फ जन सेवा मेरा उद्देश्य था, उद्देश्य है
एक ही मंजिल है मेरी, दूसरी मंजिल नहीं

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे होठों पे हँसी
तेरे सीने में कोई पत्थर है शायद, दिल नहीं

तुझको धन-दौलत मिली है और मुझको शांति
हाँ मुझे संतोष हासिल है, तुझे हासिल नहीं

कौन इस साग…

देवेन्द्र आर्य की कुछ ताज़ा ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
--.--
यह भी हो सकता है अच्छा हो, मगर धोखा हो
क्या पता गर्भ में पलता हुआ कल कैसा हो

भाप उड़ती हुई चीज़ें ही बिकेंगी अब तो
शब्द हो, रेह हो, सपना हो या समझौता हो

यूँ तो हर मोड़ पे मिल जाता है मुझसे लेकिन
इस तरह मिलता है जैसे कि कभी देखा हो

जाने कितनों ने लिखी अपनी कहानी इस पर
फिर भी लगता है मेरे दिल का वरक सादा हो

रौशनी इतनी ज़ियादा भी नहीं ठीक मियाँ
ये भी हो सकता है आँखों में कोई सपना हो

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ग़ज़ल 2
मेरी भी आँख में गड़ता है भाई
मगर रिश्तों में वो पड़ता है भाई

जमाने की नहीं परवाह लेकिन
वही आरोप जब मढ़ता है भाई

खरी खोटी सुनाके लड़के मुझसे
फिर अपने आप से लड़ता है भाई

जिसे मैं भूल जाना चाहता हूँ
बराबर याद क्यों पड़ता है भाई

भले कितना ही सुन्दर हो, सफल हो
मगर सपना भी तो सड़ता है भाई

मुझे लगता है मैं ही बढ़ रहा हूँ
मेरे बदले में जब बढ़ता है भाई

जिसे तुम शान से कहते हो ग़ैर
वो अव्वल किस्म की जड़ता है भाई

ये मामूली सा दिखता भाई चारा
बहुत मंहगा कभी पड़ता है भाई
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ग़ज़ल 3
--.--
आयो घोष बड़ो व्यापारी
पोछ ले गयो नींद हमारी

कभी जमूरा कभी मदारी
इसको कहते हैं व्यापारी

रंग गई मन की अंगिया-चूनर
देह ने जब मारी पिचकारी

अपना…

घाघ की कहावतें

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1 रहै निरोगी जो कम खाय
बिगरे न काम जो गम खाय

2 प्रातकाल खटिया ते उठि के पियइ तुरते पानी
कबहूँ घर में वैद न अइहैं बात घाघ के जानी

3 मार के टरि रहू
खाइ के परि रहू

4 ओछे बैठक ओछे काम
ओछी बातें आठो जाम
घाघ बताए तीनो निकाम
भूलि न लीजे इनकौ नाम

5 ना अति बरखा ना अति धूप
ना अति बक्ता न अति चूप

6 माघ-पूस की बादरी और कुवारा घाम
ये दोनों जो कोऊ सहे करे पराया काम

7 चींटी संचय तीतर खाय
पापी को धन पर ले जाय

8 धान पान अरू केरा
तीनों पानी के चेरा

9 बाड़ी में बाड़ी करे करे ईख में ईख
वे घर यों ही जाएंगे सुने पराई सीख

10 जेकर खेत पड़ा नहीं गोबर
वही किसान को जानो दूबर

11 जेठ मास जो तपे निरासा
तो जानो बरखा की आसा

12 दिन में गरमी रात में ओस
कहे घाघ बरखा सौ कोस

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शहंशाह अकबर के दरबार के शान घाघ विद्वान पुरुष थे. घाघ अपनी कहावतों के लिए प्रसिद्ध हैं. घाघ ने मानव जीवन के अनुभवों का सूक्ष्म निरीक्षण कर बहुत सी प्रासंगिक बातें अपनी कहावतों के रूप में कहीं जो समाज में चलती रहीं. घाघ के द्वारा कही गई बहुत सी क…

संजय विद्रोही की कहानी : स्कार्फ़

चित्र
-संजय विद्रोही

" बाजार तो जाने को धर्म ही ना रह्यो, आजकल तो. इतनो ट्रेफ़िक, इतनो धुँआ और इतनो शोर. बाप रे बाप. इससे तो अपनो घर ही भलो. पर, बगैर जाय सरतो भी तो ना है. गली वालो बनियो, एक रुपय्या की चीज के सवा रुपय्या ले लेवे है मरो. बजार में ये तो है कि रिपिया की चीज रिपिया में मिल जावै है. गिरस्ती में इन सब बातन को भी तो ख्याल करनो पडे है लाली." विमला मौसी साड़ी के पल्लू से पसीने पोंछती हुई बोले जा रही थी.

"हाँ, सो तो है." मैंने छोटा-सा उत्तर देकर निजात पा ली. रिक्शेवाला हम दोनों की बातों से बे-खबर अपने काम में लगा था.

" तुम्हारी कसम लाली, ना ना करते पाँच हजार को तो राशन आ ही जातो है घर में महिना पै. अब तुम ही कहो, दूध ना पीयें, या घी ना खायें. साग सब्जिन कू भी मरिन कू आग लगि पडी है. कोई सब्जी दस रिपिया पाव से कम है ही ना मण्डी में. तुम्हारे अंकल कहेंगे, दाल बनाओ. तो दाल क्या मुफ़्त में आवै है? वाके भाव भी तो आसमान पै हैं."

" हाँ मौसी, सो तो है."

" अब तुम ही कहो शक्कर कितनी मंहगी है आजकल? और तुम्हारे अंकल की आदत तो तुम जानो ही हो, कित्ती खराब है? न…

वक्त की लकीरों से कुछ ग़ज़लें…

चित्र
- ब्रजमोहन झालानी
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आदमी

वक्त की लकीरों से कट गया है आदमी
अपने ही हाथों से बंट गया है आदमी

भीतर और बाहर उलझन ही उलझन है
प्रश्नों ही प्रश्नों से पट गया है आदमी

लुटते-लुटाते हँसी और खुशियाँ सब
रीत गई उम्र और घट गया है आदमी

दर्द पिघल बरसा है मन के आँगन में
अख़बारी कागज़-सा फट गया है आदमी

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लोग तुम्हारी बस्ती के...

कुछ लोग तुम्हारी बस्ती के सचमुच बहुत भले हैं
भीतर से बिल्कुल काले हैं ऊपर से उजले हैं

हाथ मिलाना सोच समझ कर, सावधान रहना
सुना है मैंने आस्तीनों में इनके सांप पले हैं

फूलों-कलियों को मत छूना बच के ही रहना
हम तो इनकी खुशबू से ही देखो आज जले हैं

आम, नीम, पीपल, तुलसी जाने कहाँ गए हैं
पग-पग हंसती नागफनी, हर ओर बबूल फले हैं

मतलब के रिश्ते नाते हैं, नकली अपनापन है
अपनों के हाथों अपनों के कटते रोज गले हैं

‘ब्रज’ ने देखी खासियत, इस बस्ती के लोगों की
समझदार हैं बहुत, सदा ये वक्त के साथ चले हैं
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पास जितनी सांस उतनी उलझनें...

खो गई सब कामनाएँ क्या करें
सो गई सम्भावनाएँ क्या करें

पास जितनी साँस उतनी उलझनें
यातना ही यातनाएँ क्या करें

रह गई है नाम की बस जिंदगी
मर रही है भावनाएँ क्या करें

क्या करें ‘ब्रज’ कोई सुन…

यथार्थ व्यंग्य : मुँदते ही मेरी आंखें

चित्र
- स्वामी वाहिद काज़मी

यह भला कैसे संभव है कि मैं भूल जाऊँ. कदापि नहीं !

मुझे ठीक मरते दम तक स्मरण रहेगा कि वह इक्कीसवीं शती में लुढ़कती बीसवीं शती के 96 वें साल के पांचवें मास की दसवीं तारीख़ थी. दोपहर के तीन बजे थे. महीना भर से रोग-पीड़ित मेरा शरीर मृत्यु की कामना एवं प्रार्थना करते-करते थक कर शान्त-क्लान्त पड़ा था.

अचानक कमरे में एक अजीब सी सुगन्ध भर गई महसूस हुई. बड़ी कठिनाई से पलकों से पलकें जुदा कीं तो क्या देखता हूँ कि बन्दों की रूह खींचने के कार्य पर नियुक्त अल्लाह मियाँ का ख़ास फ़रिश्ता इज़राईल मेरे दाँयी ओर, और हिन्दू धारणाओं के अनुसार, प्राणियों के प्राण हरण करने के ख़ास अधिष्ठाता यमराज बाँयी ओर मौजूद हैं. महीना भर पहले एकदम और अचानक बहरे हो गए कानों में पता नहीं कैसे श्रवण क्षमता भी पुनः लौट आई थी. उन दोनों में हुए संवाद के संपादित अंश यहाँ प्रस्तुत हैं :

इज़राईल - ‘यमराज जी, ख़ुद आपने क्यों ज़हमत फ़रमाई? आपके मातहतों का – यमदूतों तो पूरा स्टाफ़ है.’

यमराज - ‘इज़राईल भैया, आप सत्य कहते हैं. किन्तु अति सज्जन पुरुषों के प्राण हरने मेरे दूत नहीं, मैं स्वयं आता हूँ.’

इज़राईल - ‘अच्छा…

संजय विद्रोही की कहानी : इम्तिहान

चित्र
· संजय विद्रोही

अपने आप को सामान्य दिखाने की फ़िकर में मैं कुछ ज्यादा ही बन संवर कर निकला था, ऑफिस के लिए. लोग मेरे चेहरे से मेरी मनोदशा भांप न लें, सो शेव किए चेहरे पर अतिरिक्त मुस्कुराहट चस्पा करना भी नहीं भूला था. रास्ते में जो भी मिला उसने 'जंच रहे हो यार' या 'क्या बात है? आज तो!' या 'बिजली गिरा रहे हो गुरू, आज तो!' कह कर हाथ मिलाया और मैं मुस्कुरा कर 'बस यूं ही' के सिवा कुछ नहीं बोल पाया. अपनी आदत के विपरीत आज रास्ते में मिले जूनियरों के अभिवादन के जवाब में मेरी गर्दन तत्परता से हिल रही थी. अपने आप को सामान्य दिखाने की भरसक कोशिश कर रहा था मैं. किन्तु भीतर ही भीतर कुछ जोर जोर से हुड़क रहा था. तेज कदमों से आफिस में गया और सीधा जाकर अपने चैम्बर की कुशन वाली चेयर में धंस गया. भीतर बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था, जो शायद एकांत पा कर अब आंखों से भी झांकने लगा था. बाहर वालों के सामने मुस्कुराते रहना या अपने आप को व्यस्त दिखाना, खुद मुझको अपने आप में नाटकीय प्रतीत हो रहा था. किन्तु एकांत में अपने आप से अभिनय नहीं कर पा रहा था .
पूरी जिन्दगी मानो आंखों के सामने …

व्यंग्य : पटवारी को मत पकड़ो

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- लतीफ़ घोंघी

यह जानकर दुःख हुआ कि एक पटवारी साहब सौ रुपया घूस लेते हुए पकड़ लिए गए. आश्चर्य इस लिए हुआ कि देश में ऐसे पटवारी हैं जो घूस लेकर पकड़ में आ जाते हैं. यार पटवारी, सच कहें, तुमने तो पूरे पटवारी समाज की नाक काट कर रख दी. हमारे इधर से पटवारी पाँच सौ रुपया ले लेते हैं और पकड़ाई में भी नहीं आते. एक तुम हो कि सौ रुपट्टी में ही पकड़े गए. हम पूछते हैं, कहाँ ट्रेनिंग ली थी यार तुमने? किसने बना दिया तुमको पटवारी? यार तुम पकड़ में क्या आ गए, तुमने पूरे राष्ट्र को घूसखोर सिद्ध कर दिया. हमारा देश ईमानदार कर्मचारियों का देश है. तुम जैसे लोग ही देश पर घूसखोरी और भ्रष्टाचार का कलंक लगा रहे हैं. थू है तुम्हारी पटवारी गिरी पर. डूब मरो चुल्लू भर पानी में. धिक्कार है तुम्हें कि इस देश में रहकर भी तुमको घूस लेने का तरीका नहीं आया. तुम तो विदेश चले जाओ यार, तुम इस देश में रहने के काबिल नहीं हो. अरे भइया, तुमको घूस लेना नहीं आता तो रेवेन्यू इन्सपेक्टर से पूछ लेते, किसी तहसीलदार से पूछ लेते. हम कहते हैं तुम कब सीखोगे? राजस्व विभाग में इतने वरिष्ठ अधिकारी लोग हैं, उनके अनुभवों का लाभ क…

विश्व की सबसे लम्बी ग़ज़ल (दस हजार अश्आर) के कुछ अश्आर

चित्र
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- राजकुमार ‘चन्दन’

तीरगी बनके तू छुपा क्या है ?
रोशनी बनके भी दिखा क्या है ?

पाँच कुल हर्फ हैं, मुहब्बत के
न पढ़ें हों तो फिर पढ़ा क्या है ?

पड़ गया रंग पीला पत्तों का
मित्र इस गांव से गया क्या है ?

मैंने तो कर दिया, दीया रोशन
मैं नहीं जानता हवा क्या है ?

खंजरों को तमीज क्या होगी
पैर क्या चीज है गला क्या है ?

भाई नफ़रत को दफ़न कर डालें
जिन्दगी, प्यार के सिवा, क्या है ?

कोई मीरा हो या अरस्तु हो
सत्य पीकर कभी मरा क्या है ?

आग की राह में मुहब्बत है
मोम का दिल लिए चला क्या है ?

हाथ बेटी के पीले है करना
पास पूंजी तिरे जमा क्या है ?

मैं कलम को उठा चुका अपनी
तोप, तलवार तू उठा क्या है ?

जिन्दगी की तलाश में सब है
जिन्दगी का मगर पता क्या है ?

कश्तियों से कहीं भी कागज की
पार दरिया कभी हुआ क्या है ?

तेरे मस्तेशबाब से बढ़कर
ये मह्वेयास मयकदा क्या है ?

हो गया गर्क या तो तुझमें मैं
यू तू मुझमें उतर गया क्या है ?

दोस्त उठना है अगर दुनिया में
सर पे दुनिया जरा उठा क्या है ?

एक हिन्दू तो एक मुसलमाँ है
आदमी, आदमी रहा क्या है ?

फिर तिरे हुस्न ने ली अँगड़ाई
ईद का चाँद ये दिखा क्या है ?

गुजर जाने दे दर्द को हद से
दर्द का देख फिर मजा क्या…

कम्प्यूटरों की दुनिया से कुछ चुटकुले...

***
भारत में एक दफा अमरीकी प्रतिनिधि मंडल भ्रमण के लिए आया. वे राजधानी दिल्ली में सरकारी कामकाजों का जायजा ले रहे थे. उन्हें एक स्थानीय शासकीय कार्यालय में ले जाया गया. वहाँ ढेर सारे अधेड़ और रिटायर होने की उम्र के बाबू पुराने 286 – 386 श्वेत-श्याम मॉनीटर युक्त कम्प्यूटरों पर कार्य कर रहे थे.
ये लोग कौन हैं – प्रतिनिधि मंडल के मुखिया ने पूछा.
ये इस देश के आम आदमी हैं , प्रजातंत्र के असली राजा – भारतीय गाइड ने बताया.
बाद में प्रतिनिधि मंडल को संसद भवन ले जाया गया. वहाँ उन्होंने राजनेताओं तथा उनके व्यक्तिगत सहयोगियों को नए नवेले लैपटॉप, पॉमटॉप, पीडीए और पावर एपल मॅक इत्यादि के साथ पाया.
और ये कौन हैं – प्रतिनिधि मंडल में से किसी ने पूछा.
ये तो जनता के सेवक हैं – जवाब मिला.
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यमराज ने एक दिन अपने दूत को बुलाया और आदेश दिया – धरती पर जाओ और हीरालाल की आत्मा को ले आओ. उसके दिन पूरे हो गए हैं.
यमदूत धरती पर गया और हीरालाल की खोजबीन की. उसे हीरालाल तो मिल गया परंतु हीरालाल के शरीर में उसकी आत्मा ढूंढे से भी नहीं मिली.
यमदूत ने वस्तुस्थिति से यमराज को अवगत कराया.
यमराज नाराज होते हुए बोले…

2 जातक कथाएँ

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बंटवारा
---*---
एक जंगल में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था. एक दिन उसकी पत्नी को ताज़ी मछली खाने की तीव्र इच्छा हुई. सियार अपनी पत्नी से वादा कर नदी किनारे पहुँचा ताकि मछलियों का कुछ जुगाड़ किया जा सके.

उसने वहां देखा कि दो ऊदबिलाव एक बड़ी मछली को नदी में से खींचकर बाहर ला रहे हैं. वह ऊदबिलावों के पास पहुँचा और उनसे कहा – मित्रों तुम दोनों ने मिलकर यह मछली पकड़ तो ली है, परंतु इसका बंटवारा तुम कैसे करोगे. ज्यादा अच्छा हो यदि तुम किसी तीसरे से इसका बंटवारा करवाओ.

दोनों ऊदबिलाव को यह बात जमी. आसपास कोई तीसरा था नहीं लिहाजा उन्होंने सियार से ही बटवारा करने को कहा.

सियार ने मछली के तीन हिस्से किए. सिर एक ऊदबिलाव को दिया. पूंछ दूसरे को. बीच का पूरा हिस्सा लेकर वह अपने घर की ओर चलने लगा.

ऊदबिलावों ने उसे रोका और पूछा – अरे, ये क्या करते हो. तुम तो मछली का बंटवारा हम दोनों में कर रहे थे.

सियार ने जवाब दिया – मूर्खों, तुम दोनों का बराबर का हिस्सा तो तुम्हें मिल चुका है. यह जो मैं ले जा रहा हूँ वह तो मेरा मेहनताना है. यह कह कर वह मछली के बड़े हिस्से को लेकर चला गया.

ऊदबिलावों ने अपना सिर धुन …

संजय ग्रोवर की चंद ग़ज़लें

चित्र
- संजय ग्रोवर
ग़ज़ल 1

जो गया उससे निकलना चाहता हूँ
आते लमहों में धड़कना चाहता हूँ

मेरा दुख लाएगा सुख तेरे लिए
मुझको करने दे जो करना चाहता हूँ

प्यार से भर दो मेरा जामे-हयात
हश्र तक भर कर छलकना चाहता हूँ

जान जाए प्यार गर जी भर मिले
ऐसी सूली पर लटकना चाहता हूँ

ये भी सच्चाई है पर कैसे कहूँ
तुझसे मैं बचके निकलना चाहता हूँ

मंज़िलों को पा के ही समझा हूँ ये
मैं अभी कुछ दिन भटकना चाहता हूँ



ग़ज़ल 2
बह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिला
फिर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिला

खो के पाना पा के खोना खेल जैसा हो गया
लुत्फ जीने की सजाओं में कोई ऐसा मिला

खो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापिस मिले
एक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिला

हमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी था
दर्द मीठा-सा दवाओं में कोई ऐसा मिला

रेत में भी बीज बो देने का मन होने लगा
मेघ आशा का घटाओं में कोई ऐसा मिला

ग़ज़ल 3

कब तक मुझे दबाओगे
इक दिन खुद शरमाओगे

भीड़ को तो भरमा लोगे
खुदको क्या समझाओगे

जब-जब भीतर जाओगे
मुझको बैठा पाओगे

बाहर-बाहर चमकोगे
भीतर से जल जाओगे

राग पुराने टूटी डफली-
पर कब तक दोहराओगे

मैं भी सर के बल हो लूँ
तब तो गले लगाओगे

ग़ज़ल 4

चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फि…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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