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लोककथा : एक सेर धान


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प्राचीन समय की बात है. एक नगर में अत्यंत समृद्ध सेठ रहता था. उसकी अत्यंत रुपवती विवाह योग्य कन्या ने अपने विवाह के लिए बड़ी विचित्र किस्म की शर्त रखी थी. शर्त यह थी कि जो युवक कीचड़ से भरे तालाब में नख-शिख तक डुबकी लगाने के उपरांत एक गिलास जल से अपने शरीर को भली प्रकार साफ कर लेगा, उसी से वह विवाह करेगी.

यूँ तो शर्त आसान सी प्रतीत होती थी, परंतु सैकड़ों युवक इस कोशिश में असफल रहे थे. एक गिलास पानी में समस्त शरीर का कीचड़ भला कैसे साफ हो सकता था. सेठ को अपनी कन्या के विवाह की चिन्ता सता रही थी. परंतु उस रुपवती कन्या का कहना था कि कोई न कोई बुद्धिशाली युवक किसी दिन आएगा और उसकी इस शर्त को पूरा कर उसे ब्याह ले जाएगा. अन्यथा, उसे कुंवारी रहना ही मंजूर है.

अंततः दूर देश के एक अत्यंत चतुर युवक को इस स्वयंवर के बारे में पता चला. वह उस रुपवती कन्या से ब्याह रचाने चल पड़ा. उसने कीचड़ भरे तालाब में डुबकी लगाई और धूप में खड़ा हो गया. फिर साथ लाए बांस की पतली कमचियों से कीचड़ को छीलकर-रगड़-रगड़ कर छुड़ाया. धूप में शरीर का बाकी बचा कीचड़ जब सूखकर महीन धूल में परिवर्तित हो गया तो उसने उसे भी रगड़ कर और झाड़कर साफ कर लिया. तदुपरांत एक गिलास जल से उसने अपने हाथ, और मुँह धो लिए. वह अत्यंत स्वच्छ, सद्यः स्नान किया हुआ प्रतीत हो रहा था.

रुपवती कन्या ने यह देखने के बाद अपने विवाह की स्वीकृति दे दी.

परंतु युवक ने कहा – नहीं. विवाह से पहले मैं भी इस कन्या की परीक्षा लूंगा. इसे भी मेरी परीक्षा में खरा उतरना होगा तभी मैं इससे विवाह करूंगा, अन्यथा नहीं. उसने उस रुपवती कन्या को एक सेर धान देते हुए कहा – अगर तुम सिर्फ इन्हीं और इतने ही धान का उपयोग कर मुझे छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाकर मुझे भर पेट खिला सकती हो, तब तो तुम मेरी जीवनसंगिनी बनने के काबिल हो, अन्यथा नहीं.

उस रुपवती कन्या ने वह परीक्षा स्वीकार की और उसकी इस शर्त को पूरा करने के लिए उससे एक वर्ष का समय मांगा.

एक वर्ष बीतने के पश्चात् निश्चित समय पर वह युवक उस रुपवती कन्या के पास पहुँचा. उस रुपवती कन्या ने उसके लिए छप्पन प्रकार के विविध पकवान थालों में भर-भर कर सजा रखे थे. भोजन ग्रहण करने से पहले उस युवक ने आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता से पूछा – एक सेर धान से तुमने इतने सारे पकवान कैसे तैयार कर लिए?

उस रुपवती कन्या ने जवाब दिया – मैंने एक वर्ष का समय आपसे इसीलिए तो चाहा था. मैंने सेर भर धान को बढ़िया खेतों में बुआई करवाई और उसकी अच्छी फसल लेने के उपरांत उससे सौदा कर पकवानों की सामग्रियाँ ले लीं और इतने पकवान तैयार किए हैं. इन पकवानों में एक सेर धान और मेरी मेहनत के अलावा और कुछ भी नहीं लगा है.

इस प्रकार, उस चतुर युवक और रुपवती कन्या का बड़े ही धूमधाम से ब्याह हो गया.

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बहरहाल, बूंद बूंद से घट भरे वाली नीति पर चल रहे हैं...

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