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December 2005
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प्रिय तुम...

प्रिय तुम मेरे संग एक क्षण बाँट लो

वो क्षण आधा मेरा होगा

और आधा तुम्हारी गठरी में

नटखट बन जो खेलेगा मुझ संग

तुम्हारे स्पर्श का गंध लिये


प्रिय तुम ऐसा एक स्वप्न हार लो

बता जाये बात तुम्हारे मन की जो

मेरे पास आकर चुपके से

जब तुम सोते होगे भोले बन

सपना खेलता होगा मेरे नयनों में


प्रिय तुम वो रंग आज ला दो

जिसे तोडा था उस दिन तुमने

और मुझे दिखाये थे छल से

बादलों के झुरमुट के पीछे

छ: रंग झलकते इन्द्रधनुष के


प्रिय तुम वो बूंद रख लो सम्हाल कर

मेरे नयनों के भ्रम में जिस ने

बसाया था डेरा तुम्हारी आंखों में

उस खारे बूंद में ढूंढ लेना

कुछ चंचल सुंदर क्षण स्मृतियों के


प्रिय तुम...
********

चलो....

चलो हम आज
किसी सुनहरे सपनों के
रुपहले गाँव में
घर बसायें

झिलमिल तारों की बस्ती में
परियों की जादू छड़ी से
अपने इस कच्चे बंधन को
छूकर सोने का बनायें

तुम्हारी आशा की राहों पर
बाँधे थे जो ख्वाबों से पुल
चलो आज उस पुल से गुज़रें
और क्षितिज के पार हो आयें

हवा ने भी चुरायी थी
कुछ हमारी बातों की खनक
रिमझिम पडती बूँदों के संग
चलो उन स्मृतियों में घूम आयें

बाँधी थीं सीमायें हमने
अनकही कुछ बातों में जो
चलो एक गिरह खोल कर
आज बंधनमुक्त हो जायें

चलो हम आज
किसी सुनहरे सपनों के
रुपहले गाँव में
घर बसायें

*******.
स्वीकृति

स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारे हृदय को
मेरे हृदय्-स्पंदन
के साथ थिरकने की
स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारे स्म्रृति को
मेरे रक्तिम स्वर्ण गंगा
में बहने की
स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारी आत्मा को
मेरे अंत:करण के
तल में उतरने की
स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारे स्वर को
मेरे अपूर्ण रचित राग
में अंतिम श्रुति बनने की
स्वीकृति दी मैंने आज
तुम्हारे मन को
मेरे व्यथित मन के
पीडा को हरने की
है मेरे जीवन का ये
अनमोल क्षण कि
स्वीकृति दी मैंने आज
अपने आपको तुम्हे
अर्पण करने की

******.

मेरी व्यथा
चुप अधरों में बन्द शब्दों के भेद को कैसे पढ़ेगा
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

सुबह सिरहाने बैठ एक किरण चुनती है नींद नयन से
प्रतिदिन शाम की बाती भी जलती है चुपचाप नियम से
उस सुबह से शाम तक के वही पुराने रंग ढंग में
चुलबुलापन देख कर भी ढल गया सूरज चुपचाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

कुहरे की एक झीनी चूनर ने ढका ज्यों पर्वत का बदन
चंदा के मुख को चूम बदरी चली संग संग अपने सजन
खेल ऐसे देख दबे पांव आयी लाज छू गयी मेरा भी तन
आंखों के बिछौने में नींद लडती रही अपने आप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

चंचलता और अकुलाहट में फंसा मन कर रहा हाहाकार
एक निराकार स्वप्न को हृदय ने रूप दे दिया है साकार
सही गलत के ताने बाने में उलझ रह गया अहंकार
प्रेम सुधा में विष घुलेगा जब मन हो नहाया पाप से
मेरी व्यथा क्या समझेगा जो गुज़रा न हो उस ताप से

**********.

रचनाकार – मानसी चटर्जी उभरती हुई साहित्यकार हैं. आपकी अन्य ‘उत्ताप भरी प्रेम कविताएँ’ तथा अन्य रचनाएँ उनके व्यक्तिगत जाल स्थल
http://khallopapa.tripod.com/manoshihindipage/index.html पर तथा चिट्ठा स्थल
http://manoshichatterjee.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं.

***.
चित्र – उमा छत्रपति की कैनवस पर तैल रंग कलाकृति.


- जयप्रकाश मानस

सृष्टि का सबसे बड़ा चमत्कार है- हर कृति का अनन्य एवं अनुपम स्वभाव । सबकी अपनी-अपनी अर्थवत्ता, अपना-अपना माहात्म्य । निरुद्देश्य कदाचित् कुछ भी नहीं । एक सर्वमान्य तथ्य यह भी-सर्वगुण संपन्न संज्ञा संसार में कहाँ कोई-

जड़ चेतन गुन-दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ।
संत हंस गुन गहहि पय परिहरि वारि विकार ॥

वस्तुत: अभिमत, धारण, मंतव्य विचार या मूल्यांकन आदि भी निरपेक्ष नहीं होते । अर्थात् पूर्वाग्रह रहित स्थापना एक संभ्रम मात्र होता है । ऐसे में परस्पर सायास उपेक्षा-वृत्ति निजता की अस्वीकृति है और तथाकथित अवगुणों के तर्क पर किसी कृति विशेष का समग्रत:नकार सृष्टि का नकार भी है । समय की शृंखला को ही लीजिए-निशा जहाँ तिमिर का प्रतीक है, वहाँ वह साधकों के लिए निर्द्वंद्व एवं निस्संग वातावरण भी है । इतनी लम्बी भूमिका से सहमति के पश्चात् काग-प्रसंग में रस लेने का अवसर आप शायद ही खोना चाहेंगे । आपने तो कभी न कभी सुना होगा- 'काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी ।' चलिए कागराज जी की जन्मपत्री ढूँढते हैं ।

दादा जी को पक्षियों में कबूतर पर अति विश्वास है । दाना चुगाकर वे आत्मतृप्त हो लेते हैं । दादीमाँ सुग्गे का आश्रय लेती है, उसके साथ वह अपनी मुक्ति के गीत जो दुहराती है-'कमलाबर, पक्षी जनम रु पारी कर ।' पिताजी को पंडूक से गहरा लगाव है, वह भरी दुपहरी, सुनसान खेत में अपनी उपस्थिति से उन्हें आश्वस्त करता है और माँ का आलंबन कागा जी । एक वही तो हैं, जिनका नाम धरते ही माँ का सारा संशय छूमंतर हो जाता है और चंचल-चपल शिशु जादुई अंदाज से हठ बिसार कर ग्रास ग्रहण कर लेता है –

करिया कउंआ आजा रे,
बुधवा कउंआ आजा रे ।
जंगाय हे मुन्ना राजा रे,
ए पंँ वरा ला खाजा रे ॥

(काले कौए आ जाओ, विद्वान् कौए आ जाओ । मुन्ना राजा नाराज है, इस ग्रास को खा जाओ ।)

मै अब तक बूझ नहीं पाया हूँ कि ऐसी जटिल मनोदशा की घड़ी में माँओं का साथ निभाने कौवे ही क्यों चले आते हैं ? अन्य पंछी क्यों नहीं ? यह यों ही है या नैमित्तिक । जो भी हो, वे पंछियों में हैं सौभाग्यशाली, जिनके नाम 'मनुष्य के लिये प्रथम परिचित विहंग' का पदक सुरक्षित है । मेरे अपने देश पे संदर्भ में तो ऐसा कहा ही जा सकता है, पश्चिम के देशों के बारे में मुझे पता नहीं । पश्चिम में माँंओं को इतनी फुर्सत कहाँ । वहाँ तो शिशु मंथली पेमेन्ट वाली आया-मदर से पलते हैं । पेमेन्ट से जननी खरीदी जा सकती है, ममता नहीं । पेमेंट से आंगन बनाया जा सकता है, पर ऑंगन में कौवे कैसे आयेंगे ?

कागा को समर्पित सामाजिक पदक पर आपत्तियाँ उठ सकती हैं कि-बच्चों की किलकारी का पहला प्रस्तावक गौरेय्या होती है, कागा नहीं । भाई साहब ! अच्छा होगा, अम्मा जी से ही पूछ लें । तनिक गंभीर गृहस्थ होकर ऑंगन में बिलम कर तो देख लें। सबसे पहले इस कविता को गूँजते हुए न पाएँ, तो मुझे जरूर कहें । मुझे तो माँ से सुनी यह कविता अब भी याद है –

कीची-काची कौआ खाये
दूध-भात मोर बाबू खाये ।

जमाने को कौआ नहीं, कोकिल से अनुराग है कि कोकिल के निमंत्रण पर बसंत पधारता है कि कोकिल प्रेम की अमराई में मादकता घोलता है कि कोकिल उदास यौवन के लिए कामासव बाँटता है कि कोकिल के बिना सारी दुनिया संत हो जाये । कागा की बिसात ही क्या है कोकिल के सामने ? चलो मान भी लेते हैं -कोकिल प्रेमिल काव्य है । कोकिल राग-रंग का संगीत है, पर संत को भी बसंत बनाने वाले स्वयं कोकिल का प्रेम कितना विश्वसनीय है ? उसका सारा प्रेम भोग की परिणति तक पहुँचते-पहुँचते उतर जाता है । प्रेम दायित्वहीन नहीं होता । दायित्वहीन प्रेम काम की उत्तेजना मात्र है । अपनी ही संतानों को अनाथ बना देने का कलंक कोकिल पर है, कागा पर नहीं । कागा तो अनाथों का नाथ है । औरों की औलादों को भी पालते- पोसते उसका जातीय प्रेम कम नहीं होता । संकट की घड़ी में आवाज दे कर पक्षी जाति को इकट्ठा करने वाला एक वही है । जीवधारी समाज में जैसा सतर्क कोई ढूँढे न मिले । सतर्कता की भाषा कड़वी होती है । कोकिल मिठलबरा है और कागा खरा । चंद दिनों के लिए मिसरी घोलना फिर गायब हो जाना मिठलबरा का ही लक्षण है । समाज को खरा चाहिए या मिठलबरा ?

खरापन संत का गुण है । संत समाज का नमक है । संत सिर्फ अपने लिए नहीं जीता । वह सबका संरक्षक होता है । सिध्दार्थ जब तक अपनों में धँसे रहे केवल सिध्दार्थ बने रहे । एक छोटी-सी रियासत कपिलवस्तु के राजपुँ वर बनकर । अपने-पराये की देहरी लाँघते ही वे भगवान गौतम बुध्द बन गये, समूचे विश्व के कंठहार । हो न हो कागा ने विचरण करते-करते 'जोगी मारा' या नेतनागर के बौध्द कानन में कभी 'बुध्दम् शरणम् गच्छामि'का मुक्ति राग सुन लिया हो और फिर बुध्दिश्रेष्ठ काग ने बुध्द को मन ही मन गुरु मान लिया हो । कागा शब्द के लिये संस्कृत भाषा में 'श्रावक' प्रयुक्त होता है । 'श्रावक'अर्थात् श्रवण करने वाला ।'श्रावक ' का एक अर्थ बौध्द सन्यासी भी होता है।

यह पृथ्वी कभी रसातल के केंचुल राजा गिचना के गिरफ्त में थी । उसे गिचना के उदर से मुक्त कराने में ईश्वर के दूत कौवे ने जिस तरह बुध्दि-चातुर्य प्रदर्शित किया था, उसकी अनुगूँज वाचिक परंपरा में हम आज भी सुन सकते हैं । उदासीन तो शिष्ट साहित्य है, जिसने कौवे की घोर उपेक्षा की । क्या यह लोक-दृष्टि में शिष्ट साहित्य की अशिष्टता नहीं ?
देवभाषा संस्कृत का संपूर्ण वाङ्मय पिक, शुक, सारिका, कपोत आदि विहंगों के लिये अनुग्रह रचता है । कागा का पक्ष रखने में वह एकबारगी अनुत्साही हो जाता है। क्या काग राज इतने उपेक्षित हैं ? कविता क्यों उन तक नहीं पहुँच सकी ? कवियों की वैष्णवता इसे ही कहते हैं ?
कविता एक आग्रह भी है, वैष्णवी आग्रह, जिसे खरा वैष्णव बनकर ही साधा जा सकता है । वैष्णव चोला धारण कर कोई कवि-सा दीख सकता है । स्पष्ट है, कवि कोई अभिनय की मुद्रा नहीं, यदि ऐसा होता, तो वेशभूषा की श्रेष्टता से श्रेष्ठ कविता सृजित होती । कविता कवि का विज्ञान है और यह विज्ञान वैष्णव बुध्दि से ही संभव है । दरअसल हृदय में एक निरंकुश सर्प छुपा बैठा रहता है । अवसर पाते ही वह फूंफकारने लगता है । यह अवचेतन मन में रचे-पचे संस्कार का प्रतिफल ही है जो अभिजन का प्रलाप भी छंद घोषित हो जाता है और अंत्यज का छन्द भी प्रलाप । जहाँ निम्न के प्रति कुशंका, अविश्वास एवं घृणा अभिजातों का दंभ मात्र है, वहीं तज्जनित प्रासंगिक आक्रोश, सामाजिक विद्रोह एवं पंथ-परिवर्तन की उत्तेजना अंत्यजों की कूंठा के अलावा कुछ भी नहीं । रामकथा के अमर गायक कागभुशुंडि की श्रेष्ठता पर उपजा पार्वती का संदेह केवल पार्वती का संदेह नहीं, उनके संस्कार का संदेह भी है । दरअसल यह समाज का संदेह है –

बिरति ग्यान विग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह ।
वायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह ॥

कागभुशुंडि के अनुताप से तुलसी का वैष्णव मन संतप्त हो उठा । एक सच्चा वैष्णव ही सांसारिक संदेहों के निराकरण में भावनात्मक तटस्थता की भूमिका को परख सकता है । उन्होंने सामाजिक संरचना की अंतर्लय को बाधित किये बिना सर्वप्रथम पक्षी प्रवर गरुड़ को कौए के द्वार तक पहुँचाया, वह भी पार्वती-पति शंकर के समाधानी संकेतों में-

राम भगति पथ परम प्रवीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना ।
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहि विविध विहंगवर ।
जाइ सुनहु तहं गुन भूरी । होइ हि मोह जनित दु:ख दूरी ।

इस पर कागभुशुंडि की विनयशीलता तो देखिए, सदाशयता तो देखिए-वे उच्चपदधारी गरुड़ की न्यूनता स्वीकृति पर भी अपनी ज्येष्ठता को सर उठाने नहीं देते बल्कि गरुड़ की उपस्थिति को श्रीराम द्वारा सँजोया गया सत्संग का अवसर मान कर कृतकृत्य हो जाते हैं ।

जातीय या वर्गीय श्रेष्ठता तुच्छ होती है, सो तुलसीदास कागभुशुन्डि की प्रतिभा पर लोकनायक राम की मुहर लगाकर उसकी सामाजिक प्र्रतिष्ठा को परिपुष्ट कर देते हैं –

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । जोग चरित्र रहस्य विभागा ।
जानब तैं सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ।

कौए को सदा दलित, दीन-हीन, अस्पृश्य मानकर उसकी प्रज्ञा को प्रतिक्षिप्त किया जाता रहा है । कौए का प्रत्यय निर्हेतुक विवादास्पद होता रहा है । समूची कौआ- जाति को छल-छद्म से वर्चस्ववादियों और वर्ण-भेदवादियों ने अपयश का पात्र सिध्द करने में कोई मौका नहीं छोड़ा । त्रेता में इन्द्र-पुत्र जयंत कौए का रूप धारण कर के जगन्माता सीता के पैरों पर चंचु प्रहार किए जाने को क्या मानें ? वनवासी राम में ईश्वरत्व-परीक्षण हेतु मात्र जयंत की मूढ़ता ! उसकी मूढ़ता में कौए के चरित्र-हनन की गूढ़ता की संभावना किंचित् भी नहीं ?
महाभारत के शांति-पर्व में कवि का हृदय कितना अशांत हो उठा था-

भक्षार्थ क्रीडनार्थ वा नरा वांच्छन्ति पक्षिणम्
तृतीयो नास्ति संयोगो बध वंधाध्दते क्षम:

कौए आदि पक्षियों के रुदन में मनुष्य भला कब सम्मिलित हुआ है ?
इधर कौओं की उपस्थिति निरन्तर क्षीण हो रही है, मनुष्य में संवेदना की तरह, राजनीति में ईमानदारी की तरह, समाज में आत्मीयता की तरह । न वह कवि के जनपद में दीखता है, न ही कविता के जनपद में । यदि कहीं वह है तो बचपन के स्मृति-गाछ की किसी शाख में टुकुर-टुकुर निहारता हुआ । अपनी विभिन्न भाव-भंगिमाओं के साथ कभी वह ऑंगन में तुलसी-चौरे में उतर आता है, मेरे लिये खास तौर पर बनी पनपुरुवा रोटी की ताक में, तो कभी वह मुँडेर पर बैठकर मामा जी के आने की खबर बाँचता है। सुबह-सुबह घर की मुंडेर पर कौए का बोलना शुभ-सूचक माना जाता है । लोक- विश्वास है यदि कौआ बोले, तो उस दिन परदेश गये कि सी अपने का घर आगमन होता है ।'काँव-काँव' की धुन विरही के लिए सरस आश्वासन का गीत है । प्रियतम का बाट जोहती प्रिया कौए से निवेदन करती है –

पैजनी गढ़ाई चोंच सोन में मढ़ाइ दैहौं
कर पर लाई पर रुचि सुधिरहौं ।
कहे कवि तोष छिन अटक न लैहौं कवौ
कंचन कटोरे अटा खीर भरि धरिहौं ।
ए रे काग तेरे सगुन संजोग आजु
मेरे पति आवैं तो वचन ते न टरिहौ ।
करती करार तौन पहिले करौंगी सब
अपने पिया को फिरि पाछे अंक भरिहों ।

कौआ भविष्यवक्ता है । उसके पूर्वाभास-ज्ञान के सामने वैज्ञानिक भी गँवार बन जाते हैं । इस अगम-ज्ञानी पंछी के संकेतों से माँ कभी-कभी चिंतित हो उठती । तंग हालत में पहुनाई से भला कौन आनंदित हो उठेगा, पर मैने माँ को एक भी बार कौवों को दुत्कारते हुए नहीं देखा ।
पितृपक्ष में जब माँ पत्तल में काकबलि के खीर, पुरी, बरा, भात-दाल, आम्मिला आदि षडरस व्यंजन परोस कर इधर आह्वान करती उधर कौए सदल-बल टूट पड़ते । वे भरपेट जीमते, फिर चोंच से उच्छिष्ट हटाने के लिए जमीन पर चोंच ठोंकते । मानो मुख- प्रक्षालन कर रहे हों । बाड़ी के अमरूद पेड़ पर बैठ कर दो-चार बार काँव-काँव करते । जैसे वे कृतज्ञता-ज्ञापन कर रहे हों । माँ के साथ हम तीनों भाई -बहनों को विश्वास होने लगता, जैसे वे हमारा कुशल-क्षेम पितरों तक पहुँचाने अब विदा माँग रहे हों । देखते ही देखते वे उड़ जाते । हम आकाश में उनके नहीं दिखाई देने तक देखते रहते ।

अभी-अभी तो पाठशाला पहुँचा था कि लो एक कौआ फिर आ गया,अपने बुध्दि-चातुर्य की कहानी सुनाने । गरमी का मौसम था । सभी नदियाँ, ताल-तलैये सूख गये थे । मैं बहुत तृषित था । पानी की तलाश में इधर-उधर उड़ता रहा । थक-हार कर एक पेड़ पर जा बैठा । मुझे एक कलसा दिखाई दिया । कलसा में पानी बहुत नीचे था । मेरी चोंच पानी तक नहीं पहुँच पा रही थी । मानस ! अब तुम ही बताओ, मैंने क्या किया होगा ?

तुम बिलकुल ठीक कह रहे हो- मैं आसपास बिखरे पड़े कंकड़-पत्थर चोंच से ला-लाकर कलसे में डालने लगा । बस क्या था ! पानी धीरे-धीरे घड़े के मुँह तक आ गया । मैं पानी पीकर परितृप्त हो गया ।

अब मैं बालक नहीं रहा । बालक का पिता हो गया, यानी पालक हो गया, लेकिन चतुर कौए की कहानी आज भी मेरे अंतस् के पृष्ठों में आलोकित है । कल ही की बात है । प्रगति बिटिया की किताब देख रहा था । ज्ञात हुआ-कौए का पाठ अब बच्चों को नहीं पढ़ाया जाता । अब किसी भी कक्षा की पाठयपुस्तक में कौए या ऐसी कोई प्रेरणात्मक कहानी पढ़ा कर सरकार बच्चों को चतुर नहीं बनाना चाहती । हाँ ! कौए की जगह आलू ने अवश्य ले ली है, जिसका स्वाद आप भी लीजिए-

काटा आलू
निकला भालू
या फिर उलझिये यहाँ -
ककड़ी पर आई मकड़ी
ककड़ी ने कहा -भाग,
मकड़ी ने मारी-लात,

बहुत अफसोस होता है हमारे शिक्षाविदों पर । शिक्षा को प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया गया है । परिवर्तन के नाम सब कुछ बदल डालने में कौन-सी बुध्दिमत्ता है ? वायवी प्रसंगों वाली ऐसी तुकबंदियों से क्या भाषायी संस्कार या वैचारिक बुनियाद का गढ़ाव संभव है ? कल्पनाशक्ति को भोथरी करने वाली ऐसी पाठय-सामग्री का मतलब विद्यार्थी को उहापोह के गर्त में धकेलना है । ऐसी बिंबविहीन कविताओं से हमारे बच्चों के मन में कविता को हवामहल की चीज मानने का दृष्टिकोण विकसित नहीं होगा ? यह कविता के भविष्य को कूंठित करने का उपक्रम है और भविष्य की कविता को खंडित करने का अनुक्रम भी । कविता पर संकट सिर्फ कविता का संकट नहीं है, इसमें मानव जाति का संकट भी सम्मिलित है । मनुष्य तो होगा, पर नितांत एकांगी, अन्यमनस्क, मनहूस, स्वप्नविहीन और स्मृतिरहित ।
मुझे कोई आश्वस्त करेगा कि ब्रह्म-मुहूर्त का भान कराने को हमारे घरों की मुंडेर पर कौए आयेंगे ही और तब सारा पड़ोस जागेगा ही ?

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रचनाकार – जयप्रकाश मानस छत्तीसगढ़ के मूर्धन्य साहित्यकार हैं. जयप्रकाश मानस की अन्य रचनाएँ जालस्थल - http://www.jayprakashmanas.info/ पर आप पढ़ सकते हैं.


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प्रकृति ही कविता है - अज्ञात्


कविता क्या है ?
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है. सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं. वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं. उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती. कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं. तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है. यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता. कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है. हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं. कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है. हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है.

कार्य में प्रवृत्ति
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कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है. केवल विवेचना के बल से हम किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते हैं. केवल इस बात को जानकर ही हम किसी काम के करने या न करने के लिए प्रायः तैयार नहीं होते कि वह काम अच्छा है या बुरा, लाभदायक है या हानिकारक. जब उसकी या उसके परिणाम की कोई ऐसी बात हमारे सामने उपस्थित हो जाती है जो हमें आह्लाद, क्रोध और करूणा आदि से विचलित कर देती है तभी हम उस काम को करने या न करने के लिए प्रस्तुत होते हैं. केवल बुद्धि हमें काम करने के लिए उत्तेजित नहीं करती. काम करने के लिए मन ही हमको उत्साहित करता है. अतः कार्य-प्रवृत्ति के लिए मन में वेग का आना आवश्यक है. यदि किसी से कहा जाये कि अमुक देश तुम्हारा इतना रुपया प्रतिवर्ष उठा ले जाता है, इसी से तुम्हारे यहाँ अकाल और दारिद्र्य बना रहता है? तो सम्भव है कि उस पर कुछ प्रभाव न पड़े. पर यदि दारिद्र्य और अकाल का भीषण दृश्य दिखाया जाए, पेट की ज्वाला से जले हुए प्राणियों के अस्थिपंजर सामने पेश किए जाएँ, और भूख से तड़पते हुए बालक के पास बैठी हुई माता का आर्त्तस्वर सुनाया जाए तो वह मनुष्य क्रोध और करूणा से विह्वल हो उठेगा और इन बातों को दूर करने का यदि उपाय नहीं तो संकल्प अवश्य करेगा. पहले प्रकार की बात कहना राजनीतिज्ञ का काम है और पिछले प्रकार का दृश्य दिखाना, कवि का कर्तव्य है. मानव-हृदय पर दोनों में से किसका अधिकार अधिक हो सकता है, यह बतलाने की आवश्यकता नहीं.

मनोरंजन और स्वभाव-संशोधन
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कविता के द्वारा हम संसार के सुख, दुःख, आनन्द और क्लेश आदि यथार्थ रूप से अनुभव कर सकते हैं. किसी लोभी और कंजूस दुकानदार को देखिए जिसने लोभ के वशीभूत होकर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि मनोविकारों को दबा दिया है. और संसार के सब सुखों से मुँह मोड़ लिया है. अथवा किसी महाक्रूर राजकर्मचारी के पास जाइए जिसका हृदय पत्थर के समान जड़ और कठोर हो गया है, जिसे दूसरे के दुःख और क्लेश का अनुभव स्वप्न में भी नहीं होता. ऐसा करने से आपके मन में यह प्रश्न अवश्य उठेगा कि क्या इनकी भी कोई दवा है. ऐसे हृदयों को द्रवीभूत करके उन्हें अपने स्वाभाविक धर्म पर लाने का सामर्थ्य काव्य ही में है. कविता ही उस दुकानदार की प्रवृत्ति भौतिक और आध्यात्मिक सृष्टि के सौन्दर्य की ओर ले जाएगी, कविता ही उसका ध्यान औरों की आवश्यकता की ओर आकर्षित करेगी और उनकी पूर्ति करने की इच्छा उत्पन्न करेगी, कविता ही उसे उचित अवसर पर क्रोध, दया, भक्ति, आत्माभिमान आदि सिखावेगी. इसी प्रकार उस राजकर्मचारी के सामने कविता ही उसके कार्यों का प्रतिबिम्ब खींचकर रक्खेगी और उनकी जघन्यता और भयंकरता का आभास दिखलावेगी, तथा दैवी किंवा अन्य मनुष्यों द्वारा पहुँचाई हुई पीड़ा और क्लेश के सूक्ष्म से सूक्ष्म अंश को दिखलाकर उसे दया दिखाने की शिक्षा देगी.

प्रायः लोग कहा करते हैं कि कविता का अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन है. पर मेरी समझ में मनोरंजन उसका अन्तिम उद्देश्य नहीं है. कविता पढ़ते समय मनोरंजन अवश्य होता है, पर इसके सिवा कुछ और भी होता है. मनोरंजन करना कविता का प्रधान गुण है. इससे मनुष्य का चित्त एकाग्र हो जाता है, इधर-उधर जाने नहीं पाता. यही कारण है कि नीति और धर्म-सम्बन्धी उपदेश चित्त पर वैसा असर नहीं करते जैसा कि किसी काव्य या उपन्यास से निकली हुई शिक्षा असर करती है. केवल यही कहकर कि ‘परोपकार करो’ ‘सदैव सच बोलो’ ‘चोरी करना महापाप है’ हम यह आशा कदापि नहीं कर सकते कि कोई अपकारी मनुष्य परोपकारी हो जाएगा, झूठा सच्चा हो जाएगा, और चोर चोरी करना छोड़ देगा. क्योंकि पहले तो मनुष्य का चित्त ऐसी शिक्षा ग्रहण करने के लिए उद्यत ही नहीं होता, दूसरे मानव-जीवन पर उसका कोई प्रभाव अंकित हुआ न देखकर वह उनकी कुछ परवा नहीं करता. पर कविता अपनी मनोरंजक शक्ति के द्वारा पढ़ने या सुनने वाले का चित्त उचटने नहीं देती, उसके हृदय आदि अत्यन्त कोमल स्थानों को स्पर्श करती है, और सृष्टि में उक्त कर्मों के स्थान और सम्बन्ध की सूचना देकर मानव जीवन पर उनके प्रभाव और परिणाम को विस्तृत रूप से अंकित करके दिखलाती है. इन्द्रासन खाली कराने का वचन देकर, हूर और गिलमा का लालच दिखाकर, यमराज का स्मरण दिलाकर और दोजख़ की जलती हुई आग की धमकी देकर हम बहुधा किसी मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्य-परायण नहीं बना सकते. बात यह है कि इस तरह का लालच या धमकी ऐसी है जिससे मनुष्य परिचित नहीं और जो इतनी दूर की है कि उसकी परवा करना मानव-प्रकृति के विरुद्ध है. सदा-चार में एक अलौकिक सौन्दर्य और माधुर्य होता है. अतः लोगों को सदाचार की ओर आकर्षित करने का प्रकृत उपाय यही है कि उनको उसका सौन्दर्य और माधुर्य दिखाकर लुभाया जाए, जिससे वे बिना आगा पीछा सोचे मोहित होकर उसकी ओर ढल पड़ें.

मन को हमारे आचार्यों ने ग्यारहवीं इन्द्रिय माना है. उसका रञ्जन करना और उसे सुख पहुँचाना ही यदि कविता का धर्म माना जाए तो कविता भी केवल विलास की सामग्री हुई. परन्तु क्या हम कह सकते हैं कि वाल्मीकि का आदि-काव्य, तुलसीदास का रामचरितमानस, या सूरदास का सूरसागर विलास की सामग्री है? यदि इन ग्रन्थों से मनोरंजन होगा तो चरित्र-संशोधन भी अवश्य ही होगा. खेद के साथ कहना पड़ता है कि हिन्दी भाषा के अनेक कवियों ने श्रृंगार रस की उन्माद कारिणी उक्तियों से साहित्य को इतना भर दिया है कि कविता भी विलास की एक सामग्री समझी जाने लगी है. पीछे से तो ग्रीष्मोपचार आदि के नुस्खे भी कवि लोग तैयार करने लगे. ऐसी शृंगारिक कविता को कोई विलास की सामग्री कह बैठे तो उसका क्या दोष? सारांश यह कि कविता का काम मनोरंजन ही नहीं, कुछ और भी है.

चरित्र-चित्रण द्वारा जितनी सुगमता से शिक्षा दी जा सकती है उतनी सुगमता से किसी और उपाय द्वारा नहीं. आदि-काव्य रामायण में जब हम भगवान रामचन्द्र के प्रतिज्ञा-पालन, सत्यव्रताचरण और पितृभक्ति आदि की छटा देखते हैं, भारत के सर्वोच्च स्वार्थत्याग और सर्वांगपूर्ण सात्विक चरित्र का अलौकिक तेज देखते हैं, तब हमारा हृदय श्रद्धा, भक्ति और आश्चर्य से स्तम्भित हो जाता है. इसके विरुद्ध जब हम रावण को दुष्टता और उद्दंडता का चित्र देखते हैं तब समझते हैं कि दुष्टता क्या चीज है और उसका प्रभाव और परिणाम सृष्टि में क्या है. अब देखिए कविता द्वारा कितना उपकार होता है. उसका काम भक्ति, श्रद्धा, दया, करूणा, क्रोध और प्रेम आदि मनोवेगों को तीव्र और परिमार्जित करना तथा सृष्टि की वस्तुओं और व्यापारों से उनका उचित और उपयुक्त सम्बन्ध स्थिर करना है.

उच्च आदर्श
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कविता मनुष्य के हृदय को उन्नत करती है और उसे उत्कृष्ट और अलौकिक पदार्थों का परिचय कराती है जिनके द्वारा यह लोक देवलोक और मनुष्य देवता हो सकता है.

कविता की आवश्यकता
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कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य और असभ्य सभी जातियों में पाई जाती है. चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता अवश्य ही होगी. इसका क्या कारण है? बात यह है कि संसार के अनेक कृत्रिम व्यापारों में फंसे रहने से मनुष्य की मनुष्यता जाती रहने का डर रहता है. अतएव मानुषी प्रकृति को जागृत रखने के लिए ईश्वर ने कविता रूपी औषधि बनाई है. कविता यही प्रयत्न करती है कि प्रकृति से मनुष्य की दृष्टि फिरने न पावे. जानवरों को इसकी जरूरत नहीं. हमने किसी उपन्यास में पढ़ा है कि एक चिड़चिड़ा बनिया अपनी सुशीला और परम रुपवती पुत्रवधू को अकारण निकालने पर उद्यत हुआ. जब उसके पुत्र ने अपनी स्त्री की ओर से कुछ कहा तब वह चिढ़कर बोला, ‘चल चल! भोली सूरत पर मरा जाता है’ आह! यह कैसा अमानुषिक बर्ताव है! सांसारिक बन्धनों में फंसकर मनुष्य का हृदय कभी-कभी इतना कठोर और कुंठित हो जाता है कि उसकी चेतनता – उसका मानुषभाव – कम हो जाता है. न उसे किसी का रूप माधुर्य देखकर उस पर उपकार करने की इच्छा होती है, न उसे किसी दीन दुखिया की पीड़ा देखकर करूणा आती है, न उसे अपमानसूचक बात सुनकर क्रोध आता है. ऐसे लोगों से यदि किसी लोमहर्षण अत्याचार की बात कही जाए तो, मनुष्य के स्वाभाविक धर्मानुसार, वे क्रोध या घृणा प्रकट करने के स्थान पर रूखाई के साथ यही कहेंगे - “जाने दो, हमसे क्या मतलब, चलो अपना काम देखो.” याद रखिए, यह महा भयानक मानसिक रोग है. इससे मनुष्य जीते जी मृतवत् हो जाता है. कविता इसी मरज़ की दवा है.

सृष्टि-सौन्दर्य
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कविता सृष्टि-सौन्दर्य का अनुभव कराती है और मनुष्य को सुन्दर वस्तुओं में अनुरक्त करती है. जो कविता रमणी के रूप माधुर्य से हमें आह्लादित करती है वही उसके अन्तःकरण की सुन्दरता और कोमलता आदि की मनोहारिणी छाया दिखा कर मुग्ध भी करती है. जिस बंकिम की लेखनी ने गढ़ के ऊपर बैठी हुई राजकुमारी तिलोत्तमा के अंग प्रत्यंग की शोभा को अंकित किया है उसी ने आयशा के अन्तःकरण की अपूर्व सात्विकी ज्योति दिखा कर पाठकों को चमत्कृत किया है. भौतिक सौन्दर्य के अवलोकन से हमारी आत्मा को जिस प्रकार सन्तोष होता है उसी प्रकार मानसिक सौन्दर्य से भी. जिस प्रकार वन, पर्वत, नदी, झरना आदि से हम प्रफुल्लित होते हैं, उसी प्रकार मानवी अन्तःकरण में प्रेम, दया, करुणा, भक्ति आदि मनोवेगों के अनुभव से हम आनंदित होते हैं. और यदि इन दोनों पार्थिव और अपार्थिव सौन्दर्यों का कहीं संयोग देख पड़े तो फिर क्या कहना है. यदि किसी अत्यन्त सुन्दर पुरुष या अत्यन्त रूपवती स्त्री के रूप मात्र का वर्णन करके हम छोड़ दें तो चित्र अपूर्ण होगा, किन्तु यदि हम साथ ही उसके हृदय की दृढ़ता और सत्यप्रियता अथवा कोमलता और स्नेह-शीलता आदि की भी झलक दिखावें तो उस वर्णन में सजीवता आ जाएगी. महाकवियों ने प्रायः इन दोनों सौन्दर्यों का मेल कराया है जो किसी किसी को अस्वाभाविक प्रतीत होता है. किन्तु संसार में प्राय- देखा जाता है कि रूपवान् जन सुशील और कोमल होते हैं और रूपहीन जन क्रूर और दुःशील. इसके सिवा मनुष्य के आंतरिक भावों का प्रतिबिम्ब भी चेहरे पर पड़कर उसे रुचिर या अरुचिर बना देता है. पार्थिव सौन्दर्य का अनुभव करके हम मानसिक अर्थात् अपार्थिव सौन्दर्य की ओर आकर्षित होते हैं. अतएव पार्थिव सौन्दर्य को दिखलाना कवि का प्रधान कर्म है.

कविता का दुरूपयोग
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जो लोग स्वार्थवश व्यर्थ की प्रशंसा और खुशामद करके वाणी का दुरुपयोग करते हैं वे सरस्वती का गला घोंटते हैं. ऐसी तुच्छ वृत्ति वालों को कविता न करना चाहिए. कविता का उच्चाशय, उदार और निःस्वार्थ हृदय की उपज है. सत्कवि मनुष्य मात्र के हृदय में सौन्दर्य का प्रवाह बहाने वाला है. उसकी दृष्टि में राजा और रंक सब समान हैं. वह उन्हें मनुष्य के सिवा और कुछ नहीं समझता. जिस प्रकार महल में रहने वाले बादशाह के वास्तविक सद् गुणों की वह प्रशंसा करता है उसी प्रकार झोंपड़े में रहने वाले किसान के सद् गुणों की भी. श्रीमानों के शुभागमन की कविता लिखना, और बात बात पर उन्हें बधाई देना सत्कवि का काम नहीं. हाँ जिसने निःस्वार्थ होकर और कष्ट सहकर देश और समाज की सेवा की है, दूसरों का हित साधन किया है, धर्म का पालन किया है, ऐसे परोपकारी महात्मा का गुण गान करना उसका कर्तव्य है.

कविता की भाषा
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मनुष्य स्वभाव ही से प्राचीन पुरुषों और वस्तुओं को श्रद्धा की दृष्टि से देखता है. पुराने शब्द हम लोगों को मालूम ही रहते हैं. इसी से कविता में कुछ न कुछ पुराने शब्द आ ही जाते हैं. उनका थोड़ा बहुत बना रहना अच्छा भी है. वे आधुनिक और पुरातन कविता के बीच सम्बन्ध सूत्र का काम देते हैं. हिन्दी में ‘राजते हैं’ ‘गहते हैं’ ‘लहते हैं’ ‘सरसाते हैं’ आदि प्रयोगों का खड़ी बोली तक की कविता में बना रहना कोई अचम्भे की बात नहीं. अँग्रेज़ी कविता में भी ऐसे शब्दों का अभाव नहीं जिनका व्यवहार बहुत पुराने जमाने से कविता में होता आया है. ‘Main’ ‘Swain’ आदि शब्द ऐसे ही हैं. अंग्रेज़ी कविता समझने के लिए इनसे परिचित होना पड़ता है. पर ऐसे शब्द बहुत थोड़े आने चाहिए, वे भी ऐसे जो भद्दे और गंवारू न हों. खड़ी बोली में संयुक्त क्रियाएँ बहुत लंबी होती हैं, जैसे – “लाभ करते हैं,” “प्रकाश करते हैं” आदि. कविता में इनके स्थान पर “लहते हैं” “प्रकाशते हैं” कर देने से कोई हानि नहीं, पर यह बात इस तरह के सभी शब्दों के लिए ठीक नहीं हो सकती.

कविता में कही गई बात हृत्पटल पर अधिक स्थायी होती है. अतः कविता में प्रत्यक्ष और स्वभावसिद्ध व्यापार-सूचक शब्दों की संख्या अधिक रहती है. समय बीता जाता है, कहने की अपेक्षा, समय भागा जाता है कहना अधिक काव्य सम्मत है. किसी काम से हाथ खींचना, किसी का रुपया खा जाना, कोई बात पी जाना, दिन ढलना, मन मारना, मन छूना, शोभा बरसना आदि ऐसे ही कवि-समय-सिद्ध वाक्य हैं जो बोल-चाल में आ गए हैं. नीचे कुछ पद्य उदाहरण-स्वरूप दिए जाते हैं –

(क) धन्य भूमि वन पंथ पहारा ।
जहँ जहँ नाथ पाँव तुम धारा ।। -तुलसीदास
(ख) मनहुँ उमगि अंग अंग छवि छलकै ।। -तुलसीदास, गीतावलि
(ग) चूनरि चारु चुई सी परै चटकीली रही अंगिया ललचावे
(घ) वीथिन में ब्र में नवेलिन में बेलिन में बनन में बागन में बगरो बसंत है। -पद्माकर
(ङ) रंग रंग रागन पै, संग ही परागन पै, वृन्दावन बागन पै बसंत बरसो परै।

बहुत से ऐसे शब्द हैं जिनसे एक ही का नहीं किन्तु कई क्रियाओं का एक ही साथ बोध होता है. ऐसे शब्दों को हम जटिल शब्द कह सकते हैं. ऐसे शब्द वैज्ञानिक विषयों में अधिक आते हैं. उनमें से कुछ शब्द तो एक विलक्षण ही अर्थ देते हैं और पारिभाषिक कहलाते हैं. विज्ञानवेत्ता को किसी बात की सत्यता या असत्यता के निर्णय की जल्दी रहती है. इससे वह कई बातों को एक मानकर अपना काम चलाता है, प्रत्येक काम को पृथक पृथक दृष्टि से नहीं देखता. यही कारण है जो वह ऐसे शब्द अधिक व्यवहार करता है जिनसे कई क्रियाओं से घटित एक ही भाव का अर्थ निकलता है. परन्तु कविता प्राकृतिक व्यापारों को कल्पना द्वारा प्रत्यक्ष कराती है- मानव-हृदय पर अंकित करती है. अतएव पूर्वोक्त प्रकार के शब्द अधिक लाने से कविता के प्रसाद गुण की हानि होती है और व्यक्त किए गए भाव हृदय पर अच्छी तरह अंकित नहीं होते. बात यह है कि मानवी कल्पना इतनी प्रशस्त नहीं कि एक दो बार में कई व्यापार उसके द्वारा हृदय पर स्पष्ट रीति से खचित हो सकें. यदि कोई ऐसा शब्द प्रयोग में लाया गया जो कई संयुक्त व्यापारों का बोधक है तो सम्भव है, कल्पना शक्ति किसी एक व्यापार को भी न ग्रहण कर सके, अथवा तदन्तर्गत कोई ऐसा व्यापार प्रगट करे जो मानवी प्रकृति का उद्दीपक न हो. तात्पर्य यह कि पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग, तथा ऐसे शब्दों का समावेश जो कई संयुक्त व्यापारों की सूचना देते हैं, कविता में वांछित नहीं.

किसी ने ‘प्रेम फ़ौजदारी’ नाम की श्रृंगार-रस-विशिष्ट एक छोटी-सी कविता अदालती काररवाइयों पर घटा कर लिखी है और उसे ‘एक तरफा डिगरी’ आदि क़ानूनी शब्दों से भर दिया है. यह उचित नहीं. कविता का उद्देश्य इसके विपरीत व्यवहार से सिद्ध होता है. जब कोई कवि किसी दार्शनिक सिद्धान्त को अधिक प्रभावोत्पादक बना कर उसे लोगों के चित्त पर अंकित करना चाहता है तब वह जटिल और पारिभाषिक शब्दों को निकाल कर उसे अधिक प्रत्यक्ष और मर्म स्पर्शी रुप देता है. भर्तृहरि और गोस्वामी तुलसीदास आदि इस बात में बहुत निपुण थे. भर्तृहरि का एक श्लोक लीजिए-

तृषा शुष्य्तास्ये पिबति सलिलं स्वादु सुरभि
क्षुधार्त्तः संछालीन्कवलयति शाकादिवलितान्।
प्रदीप्ते रागाग्रौ सुदृढ़तरमाश्ल्ष्यिति वधूं
प्रतीकारो व्याधैः सुखमिति विपर्यस्यति जनः।।

भावार्थ – प्यासे होने पर स्वादिष्ट और सुगन्धित जल-पान, भूखे होने पर शाकादि के साथ चावलों का भोजन, और हृदय में अनुरागाग्नि के प्रज्वलित होने पर प्रियात्मा का आलिंगन करन वाले मनुष्य विलक्षण मूर्ख हैं. क्योंकि प्यास आदि व्याधियों की शान्ति के लिए जल-पान आदि प्रतीकारों ही को वे सुख समझते हैं. वे नहीं जानते कि उनका यह उपचार बिलकुल ही उलटा है.

देखिए, यहाँ पर कवि ने कैसी विलक्षण उक्ति के द्वारा मनुष्य की सुखःदुख विषयक बुद्धि की भ्रामिकता दिखलाई है.

अंग्रेज़ों में भी पोप कवि इस विषय में बहुत सिद्धहस्त था. नीचे उसका एक साधारण सिद्धान्त लिखा जाता है-

“भविष्यत् में क्या होने वाला है, इस बात की अनभिज्ञता इसलिए दी गई है जिसमें सब लोग, आने वाले अनिष्ट की शंका से, उस अनिष्ट घटना के पूर्ववर्ती दिनों के सुख को भी न खो बैठें.”

इसी बात को पोप कवि इस तरह कहता है-

The lamb thyariot dooms to bleed to day
Had he thy reason would he skip and play?
Pleased to the last he crops the flow’ry food
And licks the hand just raised to shed his blood.
The blindness to the future kindly given. Essay on man.

भावार्थ – उस भेड़ के बच्चे को, जिसका तू आज रक्त बहाना चाहता है, यदि तेरा ही सा ज्ञान होता तो क्या वह उछलता कूदता फिरता? अन्त तक वह आनन्दपूर्वक चारा खाता है और उस हाथ को चाटता है जो उसका रक्त बहाने के लिए उठाया गया है. ... भविष्यत् का अज्ञान हमें (ईश्वर ने) बड़ी कृपा करके दिया है.

‘अनिष्ट’ शब्द बहुत व्यापक और संदिग्ध है, अतः कवि मृत्यु ही को सबसे अधिक अनिष्ट वस्तु समझता है. मृत्यु की आशंका से प्राणिमात्र का विचलित होना स्वाभाविक है. कवि दिखलाता है कि परम अज्ञानी पशु भी मृत्यु सिर पर नाचते रहते भी सुखी रहता है. यहाँ तक कि वर प्रहारकर्ता के हाथ को चाटता जाता है. यह एक अद्भुत और मर्मस्पर्शी दृश्य है. पूर्वोक्त सिद्धान्त को यहाँ काव्य का रूप प्राप्त हुआ है.

एक और साधारण सा उदाहरण लीजिए. “तुमने उससे विवाह किया” यह एक बहुत ही साधारण वाक्य है. पर “तुमने उसका हाथ पकड़ा” यह एक विशेष अर्थ-गर्भित और काव्योचित वाक्य है. ‘विवाह’ शब्द के अन्तर्गत बहुत से विधान हैं जिन सब पर कोई एक दफ़े दृष्टि नहीं डाल सकता. अतः उससे कोई बात स्पष्ट रूप से कल्पना में नहीं आती. इस कारण उन विधानों में से सबसे प्रधान और स्वाभाविक बात जो हाथ पकड़ना है उसे चुन कर कवि अपने अर्थ को मनुष्य के हृत्पटल पर रेखांकित करता है.

श्रुति सुखदता
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कविता की बोली और साधारण बोली में बड़ा अन्तर है. “शुष्को वृक्षस्तिष्ठत्यग्रे” और “नीरसतरुरिह विलसति पुरतः” वाली बात हमारी पण्डित मण्डली में बहुत दिन से चली आती है. भाव-सौन्दर्य और नाद-सौन्दर्य दोनों के संयोग से कविता की सृष्टि होती है. श्रुति-कटु मानकर कुछ अक्षरों का परित्याग, वृत्त-विधान और अन्त्यानुप्रास का बन्धन, इस नाद-सौन्दर्य के निबाहने के लिए है. बिना इसके कविता करना, अथवा केवल इसी को सर्वस्व मानकर कविता करने की कोशिश करना, निष्फल है. नाद-सौन्दर्य के साथ भाव-सौन्दर्य भी होना चाहिए. हिन्दी के कुछ पुराने कवि इसी नाद-सौन्दर्य के इतना पीछे पड़ गए थे कि उनकी अधिकांश कविता विकृत और प्रायः भावशून्य हो गई है. यह देखकर आजकल के कुछ समालोचक इतना चिढ़ गए हैं कि ऐसी कविता को एकदम निकाल बाहर करना चाहते हैं. किसी को अन्त्यानुप्रास का बन्धन खलता है, कोई गणात्मक द्वन्द्वों को देखकर नाक भौं चढ़ाता है, कोई फ़ारसी के मुखम्मस और रुबाई की ओर झुकता है. हमारी छन्दोरचना तक की कोई कोई अवहेलना करते हैं- वह छन्दो रचना जिसके माधुर्य को भूमण्डल के किसी देश का छन्द शास्त्र नहीं पा सकता और जो हमारी श्रुति-सुखदता के स्वाभाविक प्रेम के सर्वथा अनुकूल है. जो लोग अन्त्यानुप्रास की बिलकुल आवश्यकता नहीं समझते उनसे मुझे यही पूछना है कि अन्त्यानुप्रास ही पर इतना कोप क्यों? छन्द (Metre) और तुक (Rhyme) दोनों ही नाद-सौन्दर्य के उद्देश्य से रखे गए हैं. फिर क्यों एक को निकाला जाए दूसरे को नहीं? यदि कहा जाए कि सिर्फ छन्द से उस उद्देश्य की सिद्धि हो जाती है तो यह जानने की इच्छा बनी रहती है कि क्या कविता के लिए नाद-सौन्दर्य की कोई सीमा नियत है. यदि किसी कविता में भाव-सौन्दर्य के साथ नाद-सौन्दर्य भी वर्तमान हो तो वह अधिक ओजस्विनी और चिरस्थायिनी होगी. नाद-सौन्दर्य कविता के स्थायित्व का वर्धक है, उसके बल से कविता ग्रंथाश्रय-विहीन होने पर भी किसी न किसी अंश में लोगों की जिह्वा पर बनी रहती है. अतएव इस नाद-सौन्दर्य को केवल बन्धन ही न समझना चाहिए. यह कविता की आत्मा नहीं तो शरीर अवश्य है.

नाद-सौन्दर्य संबंधी नियमों को गणित-क्रिया समान काम में लाने से हमारी कविता में कहीं-कहीं बड़ी विलक्षणता आ गई है. श्रुति-कटु वर्णों का निर्देश इसलिए नहीं किया गया कि जितने अक्षर श्रवण-कटु हैं, वे एकदम त्याज्य समझे जाएँ और उनकी जगह पर श्रवण-सुखद वर्ण ढूंढ-ढूंढ कर रखे जाएँ. इस नियम-निर्देश का मतलब सिर्फ इतना ही है कि यदि मधुराक्षर वाले शब्द मिल सकें और बिना तोड़ मरोड़ के प्रसंगानुसार खप सकें तो उनके स्थान पर श्रुति-कर्कश अक्षर वाले शब्द न लाए जाएँ. संस्कृत से सम्बन्ध रखने वाली भाषाओं में इस नाद-सौन्दर्य का निर्वाह अधिकता से हो सकता है. अतः अंगरेज़ी आदि अन्य भाषाओं की देखा-देखी जिनमें इसके लिए कम जगह है, अपनी कविता को भी हमें इस विशेषता से वंचित कर देना बुद्धिमानी का काम नहीं. पर, याद रहे, सिर्फ श्रुति-मधुर अक्षरों के पीछे दीवाने रहना और कविता को अन्यान्य गुणों से भूषित न करना सबसे बड़ा दोष है. एक और विशेषता हमारी कविता में है. वह यह है कि कहीं कहीं व्यक्तियों के नामों के स्थान पर उनके रूप या कार्यबोधक शब्दों का व्यवहार किया जाता है. पद्य के नपे हुए चरणों के लिए शब्दों की संख्या का बढ़ाना ही इसका प्रयोजन जान पड़ता है, पर विचार करने से इसका इससे भी गुरूतर उद्देश्य प्रगट होता है. सच पूछिए तो यह बात कृत्रिमता बचाने के लिए की जाती है. मनुष्यों के नाम यथार्थ में कृत्रिम संकेत हैं जिनसे कविता की परिपोषकता नहीं होती. अतएव कवि मनुष्यों के नामों के स्थान पर कभी कभी उनके ऐसे रूप, गुण या व्यापार की ओर इशारा करता है जो स्वाभाविक होने के कारण सुनने वाले के ध्यान में अधिक आ सकते हैं और प्रसंग विशेष के अनुकूल होने से वर्णन की यथार्थता को बढ़ाते हैं. गिरिधर, मुरारि, त्रिपुरारि, दीनबन्धु, चक्रपाणि, दशमुख आदि शब्द ऐसे ही हैं. ऐसे शब्दों को चुनते समय प्रसंग या अवसर का ध्यान अवश्य रखना चाहिए. जैसे, यदि कोई मनुष्य किसी दुर्घर्ष अत्याचारी के हाथ से छुटकारा पाना चाहता हो तो उसके लिए - ‘हे गोपिकारमण!’ ‘हे वृन्दावनबिहारी!’ आदि कहकर कृष्ण को पुकारने की अपेक्षा ‘हे मुरारि!’ ‘हे कंसनिकंदन’ आदि सम्बोधनों से पुकारना अधिक उपयुक्त है. क्योंकि श्रीकृष्ण के द्वारा मुर और कंस आदि दुष्टों को मारा जाना देख कर उसे उनसे अपनी रक्षा की आशा हुई है न कि उनकी वृन्दावन में गोपियों के साथ विहार करना देख कर. इसी तरह किसी आपत्ति से उद्धार पाने के लिए कृष्ण को ‘मुरलीधर’ कह कर पुकारने की अपेक्षा ‘गिरिधर’ कहना अधिक तर्क-संगत है.

अलंकार
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कविता में भाषा को खूब जोरदार बनाना पड़ता है- उसकी सब शक्तियों से काम लेना पड़ता है. कल्पना को चटकीली करने और रस-परिपाक के लिए कभी कभी किसी वस्तु का गुण या आकार बहुत बढ़ाकर दिखाना पड़ता है और कभी घटाकर. कल्पना-तरंग को ऊँचा करने के लिए कभी कभी वस्तु के रूप और गुण को उसके समान रूप और धर्म वाली और वस्तुओं के सामने लाकर रखना पड़ता है. इस तरह की भिन्न भिन्न प्रकार की वर्णन-प्रणालियों का नाम अलंकार है. इनका उपयोग काव्य में प्रसंगानुसार विशेष रूप से होता है. इनसे वस्तु वर्णन में बहुत सहायता मिलती है. कहीं कहीं तो इनके बिना कविता का काम ही नहीं चल सकता. किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि अलंकार ही कविता है. ये अलंकार बोलचाल में भी रोज आते रहते हैं. जैसे, लोग कहते हैं ‘जिसने शालग्राम को भून डाला उसे भंटा भूनते क्या लगता है?’ इसमें काव्यार्थापत्ति अलंकार है. ‘क्या हमसे बैर करके तुम यहाँ टिक सकते हो?’ इसमें वक्रोक्ति है.

कई वर्ष हुए ‘अलंकारप्रकाश’ नामक पुस्तक के कर्ता का एक लेख ‘सरस्वती’ में निकला था. उसका नाम था- ‘कवि और काव्य’. उसमें उन्होंने अलंकारों की प्रधानता स्थापित करते हुए और उन्हें काव्य का सर्वस्व मानते हुए लिखा था कि ‘आजकल के बहुत से विद्वानों का मत विदेशी भाषा के प्रभाव से काव्य विषय में कुछ परिवर्तित देख पड़ता है. वे महाशय सर्वलोकमान्य साहित्य-ग्रन्थों में विवेचन किए हुए व्यंग्य-अलंकार-युक्त काव्य को उत्कृष्ट न समझ केवल सृष्टि-वैचित्र्य वर्णन में काव्यत्व समझते हैं. यदि ऐसा हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या?’ रस और भाव ही कविता के प्राण हैं. पुराने विद्वान रसात्मक कविता ही को कविता कहते थे. अलंकारों को वे आवश्यकतानुसार वर्णित विषय को विशेषतया हृदयंगम करने के लिए ही लाते थे. यह नहीं समझा जाता था कि अलंकार के बिना कविता हो ही नहीं सकती. स्वयं काव्य-प्रकाश के कर्ता मम्मटाचार्य ने बिना अलंकार के काव्य का होना माना है और उदाहरण भी दिया है- “तददौषौ शब्दार्थौ सगुणावनलंकृती पुनः क्वापि.” किन्तु पीछे से इन अलंकारों ही में काव्यत्व मान लेने से कविता अभ्यासगम्य और सुगम प्रतीत होने लगी. इसी से लोग उनकी ओर अधिक पड़े. धीरे-धीरे इन अलंकारों के लिए आग्रह होने लगा. यहाँ तक कि चन्द्रालोककार ने कह डाला कि-

अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती।।

अर्थात् – जो अलंकार-रहित शब्द और अर्थ को काव्य मानता है वह अग्नि को उष्णता रहित क्यों नहीं मानता? परन्तु यथार्थ बात कब तक छिपाई जा सकती है. इतने दिनों पीछे समय ने अब पलटा खाया. विचारशील लोगों पर यह बात प्रगट हो गई कि रसात्मक वाक्यों ही का नाम कविता है और रस ही कविता की आत्मा है.

इस विषय में पूर्वोक्त ग्रंथकार महोदय को एक बात कहनी थी, पर उन्होंने नहीं कही. वे कह सकते थे कि सृष्टि-वैचित्र्य-वर्णन भी तो स्वभावोक्ति अलंकार है. इसका उत्तर यह है कि स्वभावोक्ति को अलंकार मानना उचित नहीं. वह अलंकारों की श्रेणी में आ ही नहीं सकती. वर्णन करने की प्रणाली का नाम अलंकार है. जिस वस्तु को हम चाहें उस प्रणाली के अन्तर्गत करके उसका वर्णन कर सकते हैं. किसी वस्तु-विशेष से उसका सम्बन्ध नहीं. यह बात अलंकारों की परीक्षा से स्पष्ट हो जाएगी. स्वभावोक्ति में वर्ण्य वस्तु का निर्देश है, पर वस्तु-निर्वाचन अलंकार का काम नहीं.

इससे स्वभावोक्ति को अलंकार मानना ठीक नहीं. उसे अलंकारों में गिनने वालों ने बहुत सिर खपाया है, पर उसका निर्दोष लक्षण नहीं कर सके. काव्य-प्रकाश के कारिकाकार ने उसका लक्षण लिखा है-

स्वभावोक्तिवस्तु डिम्भादेः स्वक्रियारुपवर्णनम्

अर्थात्- जिसमें बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है. बालकादिकों की निज की क्रिया या रूप का वर्णन हो वह स्वभावोक्ति है. बालकादिक कहने से किसी वस्तुविशेष का बोध तो होता नहीं. इससे यही समझा जा सकता है कि सृष्टि की वस्तुओं के व्यापार और रुप का वर्णन स्वभावोक्ति है. इस लक्षण में अतिव्याप्ति दोष के कारण अलंकारता नहीं आती. अलंकारसर्वस्व के कर्ता राजानक रूय्यक ने इसका यह लक्षण लिखा है-

सूक्ष्मवस्तु स्वभावयथावद्वर्णनं स्वभावोक्तिः।

अर्थात्- वस्तु के सूक्ष्म स्वभाव का ठीक-ठीक वर्णन करना स्वभावोक्ति है.

आचार्य दण्डी ने अवस्था की योजना करके यह लक्षण लिखा है-

नानावस्थं पदार्थनां रुपं साक्षाद्विवृण्वती।
स्वभावोक्तिश्च जातिश्चेत्याद्या सालंकृतिर्यथा।।

बात यह है कि स्वभावोक्ति अलंकार के अंतर्गत आ ही नहीं सकती, क्योंकि वह वर्णन की शैली नहीं, किन्तु वर्ण्य वस्तु या विषय है.

जिस प्रकार एक कुरूपा स्त्री अलंकार धारण करने से सुन्दर नहीं हो सकती उसी प्रकार अस्वाभाविक भद्दे और क्षुद्र भावों को अलंकार-स्थापना सुन्दर और मनोहर नहीं बना सकती. महाराज भोज ने भी अलंकार को ‘अलमर्थमलंकर्त्तुः’ अर्थात् सुन्दर अर्थ को शोभित करने वाला ही कहा है. इस कथन से अलंकार आने के पहले ही कविता की सुन्दरता सिद्ध है. अतः उसे अलंकारों में ढूंढना भूल है. अलंकारों से युक्त बहुत से ऐसे काव्योदाहरण दिए जा सकते हैं जिनको अलंकार के प्रेमीलोग भी भद्दा और नीरस कहने में संकोच न करेंगे. इसी तरह बहुत से ऐसे उदाहरण भी दिए जा सकते हैं जिनमें एक भी अलंकार नहीं, परंतु उनके सौन्दर्य और मनोरंजकत्व को सब स्वीकार करेंगे. जिन वाक्यों से मनुष्य के चित्त में रस संचार न हो – उसकी मानसिक स्थिति में कोई परिवर्तन न हो – वे कदापि काव्य नहीं. अलंकारशास्त्र की कुछ बातें ऐसी हैं, जो केवल शब्द चातुरी मात्र हैं. उसी शब्दकौशल के कारण वे चित्त को चमत्कृत करती हैं. उनसे रस-संचार नहीं होता. वे कान को चाहे चमत्कृत करें, पर मानव-हृदय से उनका विशेष सम्बन्ध नहीं. उनका चमत्कार शिल्पकारों की कारीगरी के समान सिर्फ शिल्प-प्रदर्शनी में रखने योग्य होता है.

अलंकार है क्या वस्तु? विद्वानों ने काव्यों के सुन्दर-सुन्दर स्थलों को पहले चुना. फिर उनकी वर्णन शैली से सौन्दर्य का कारण ढूंढा. तब वर्णन-वैचित्र्य के अनुसार भिन्न-भिन्न लक्षण बनाए. जैसे ‘विकल्प’ अलंकार को पहले पहल राजानक रुय्यक ने ही निकाला है. अब कौन कह सकता है कि काव्यों के जितने सुन्दर-सुन्दर स्थल थे सब ढूंढ डाले गए, अथवा जो सुन्दर समझे गए – जिन्हें लक्ष्य करने लक्षण बने- उनकी सुन्दरता का कारण कही हुई वर्णन प्रणाली ही थी. अलंकारों के लक्षण बनने तक काव्यों का बनना नहीं रुका रहा. आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि ने - “मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः” का उच्चारण किसी अलंकार को ध्यान में रखकर नहीं किया. अलंकार लक्षणों के बनने से बहुत पहले कविता होती थी और अच्छी होती थी. अथवा यों कहना चाहिए की जब से इन अलंकारों को हठात् लाने का उद्योग होने लगा तबसे कविता कुछ बिगड़ चली.

(सरस्वती, 1909 में प्रथम प्रकाशित)

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रचनाकार – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल – प्रेमचन्द युगीन साहित्यकार थे. आपके द्वारा लिखे गए अनेक सारगर्भित हिन्दी निबंध आज भी प्रासंगिक हैं. हिन्दी कविता के ऊपर लिखा गया प्रस्तुत निबंध सर्वाधिक चर्चित तो रहा ही, इसे सर्वाधिक उपयुक्त निबंध भी माना जाता रहा है.


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अंतर्आत्मा की जलेबियाँ
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मैं लोकतंत्र में रहता हूँ
और किसी एक लोकतांत्रिक पार्टी में रहते हुए
किसी एक लोकतांत्रिक-अनुशासन को सहर्ष सहता हूँ
मेरी आत्मा की आवाज मर चुकी है
मेरी अंतर्आत्मा की बन चुकी है जलेबियाँ
और जलेबियाँ खा रहे हैं गधे.


दूसरी दुनिया में
************.

मैं ही रहता हूँ दूसरी दुनिया में
मुझे ही जागना है रात भर
सुबह होने तक
मेरे विश्वास का जवाब मेरी कविता है
जिसमें बख़ूबी उपलब्ध हैं मेरे अनिवार्य कर्तव्य
कोई भी मांग नहीं है मेरी आपसे.


जानता नहीं हूँ मैं
*************.

जानता नहीं हूँ मैं
कि कब होगी सुबह, कब खुलेंगे द्वार?
फिर भी जागता हूँ.
मुझे जागने से
चिड़ियों को उड़ने से
वृक्ष को हरा होने से
कौन रोक सकता है?

तट नहीं तूफ़ान है
**********.

तट नहीं, तूफ़ान है
मेरे और उसके बीच संभवतः
अतिरिक्त इसके अन्य कुछ भी नहीं
मैं ढूंढ रहा हूँ समुद्र में सीपियाँ
और वह शंख.

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रचनाकार – राजकुमार कुम्भज की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-

http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_10.html
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- नरेन्द्र कोहली

सवेरे नींद खुली तो देखा, काफी देर हो चुकी है. समझ गया, गीता का कर्म-सिद्धांत एकदम सत्य है. रात को देर से सोया था, इसलिए प्रातः देर से उठा. पर कर्म-श्रृंखला यहीं पूरी नहीं हुई. उसका प्रभाव दूर तक चलता चला गया. कुछ सिर भारी था और कुछ समय अधिक खिसक गया था.

आँखों में प्रेम के सागर उंडेलकर पत्नी से कहा, “प्रिये! आज दूध लेने नहीं जा सकूंगा.”

पर यहाँ कर्म-सिद्धांत ने काम नहीं किया, प्रेम के बदले मुझे प्रेम नहीं मिला. पत्नी की आँखों में मुझे न्यूटन का क्रिया और विपरीत क्रिया का सिद्धांत कार्य करता दिखाई पड़ा.

वह नाराज होकर बोली, “तो क्या बच्चे भूखे रहेंगे?”

मन में आया कि कह दूँ कि दूध न पीने का अर्थ भूखे रहना नहीं होता, और यदि रह भी लेंगे तो आसमान नहीं गिर पड़ेगा- संसार के लाखों-करोड़ों बच्चे प्रतिदिन एक समय भूखे रहने को बाध्य हैं. यह वैज्ञानिक सत्य है. पर मैं यह भी जानता था कि वैज्ञानिक सत्य पत्नी के सम्मुख कभी नहीं कहना चाहिए. और फिर उसमें कहीं अधिक राष्ट्रीय भावना है. देश की अगली पीढ़ी को भूखे रखने की सलाह मैं कैसे दे सकता था!

दूसरा मार्ग ढूंढा, “वे भूखे नहीं रह सकते, तो क्या मैं अपने प्राण दे दूँ?”

“अगली पीढ़ी के निर्माण के लिए प्राण देना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है.” वह बोली, “ऐसे लोग ही शहीद कहलाते हैं.”

“तो मैं हड़ताल पर हूँ.” मुझे वह शोषक उद्योगपति दिखाई पड़ने लगी थी.

“तुम दूध लाने की हड़ताल नहीं कर सकते.” वह टस-से-मस नहीं हुई.

“क्यों?”

“दूध अनिवार्य सेवा के अंतर्गत आता है.”

मुझे याद आ गया कि फेरों से पहले ही उसने कैकेयी के समान मुझसे वरदान ले लिया था कि घर में अनिवार्य सेवाओं को अस्त-व्यस्त करने का अधिकार मुझे नहीं होगा. मैं वरदान देने को, दशरथ और स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेताओं के समान आतुर था- उसकी वरमाला जो चाहिए थी. पर, वरमाला गले में पहन लेने के बाद मैं उन्हीं दोनों के समान, वरदान को भूल गया था. ‘वर’ द्वारा दिया गया ‘दान’ ही ‘वरदान’ है, और कहते हैं न, कि दान करके भूल जाना चाहिए, सो मैंने यही किया था.

“मेरे ही वरदान में बांधकर मेरी जान लोगी क्या?” मेरी आँखों के सामने कैकेयी के चरणों पर सिर पटकते हुए दशरथ का चित्र उभर आया था.

“तुम्हारी जान तो मैं हूँ.” वह रसिक कूटनीति से मुस्कराई, “जान लेने और देने का प्रश्न ही कहाँ है?”

“अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं. क्या हम अपने घर के संविधान में परिवर्तन नहीं कर सकते?” मैं कातर हो आया था.

“संशोधन तो देशों के संविधान में होते हैं.” वह तनिक भी विचलित नहीं हुई, “घरेलू संविधान इतना कच्चा और अपूर्ण नहीं होता.”

“यहाँ गणतंत्र नहीं है क्या?” मैंने विवाद उठाया.

“गणतंत्र ही है.” वह बोली, “दो तिहाई बहुमत से संशोधन हो सकता है.”

दो सदस्यों के सदन में दो-तिहाई बहुमत नहीं हो सकता था. मैं पत्नी के अध्यादेश की शक्ति को समझ गया था.

मैं बंधा-बंधाया, जाकर दूध ले आया. अपनी खीझ को चाय के कप और ताज़ा समाचारों में डुबोने का प्रयत्न करने के लिए समाचार-पत्र उठाया ही था कि आदेश हुआ, “बच्चों को बस-स्टैंड पर पहुँचाकर आओ. स्कूल बस के आने का समय हो गया है.”

जला-भुना मैं बच्चों को बस-स्टैंड तक पहुँचाकर ही नहीं आया, बल्कि लौटते हुए बाजार से साग-भाजी भी लेता आया- जानता था, यह भी अनिवार्य सेवा ही है और संविधान में बड़ी शक्ति है.

कहते हैं न कि भगवान के घर में देर है अंधेर नहीं. मैंने जो अपनी आंखों में प्यार के महासागर भर कर पत्नी की ओर देखा था, उस कर्म का फल अगले दिन फला.

दफ्तर से लौटकर देखा- आज न केवल पत्नी की आँखों में प्रेम के महासागर की शरद्पूर्णिमा का स्वरूप उमड़-घुमड़ रहा था, बल्कि अपने प्रेम को रेखांकित करने के लिए वह सोलहों-श्रृंगार किए बैठी थी. यह तो निष्काम की तरह फला, अर्थात् मूल के साथ ब्याज भी मिल रहा था.

“कहीं जाने की तैयारी है क्या?” मैंने पूछा.

उसकी मुस्कान सरकारी प्रचार के समान चारों ओर शांति बरसा गई.

“आज मेरा जन्म-दिन है न!”

“ओह! मेनी हैप्पी रिटर्न्स ऑफ़ द डे.” मैं बोला, “सोलह वर्षों की हो गईं तुम?”

“हाँ! आज तीन सोलह पूरे किए हैं.”

“तो?” मैंने अपनी त्रि-षोडशी प्रिया की ओर देखा.

“आज खाना बाहर खाएँगे.” वह बोली.

मुझे लगा, कर्म-सिद्धांत केवल मेरे लिए ही नहीं है. वह उस पर भी लागू होता है. उसके भी कर के कर्म आज फल रहे थे.

“मैं बाहर खाना नहीं खाऊँगा.” मैं अपना सत्याग्रह ध्वनित करता हुआ बोला, “बाहर के खाने से मेरा पेट खराब हो जाता है.”

शूर्पणखा के ही समान अपना वास्तविक रूप प्रकट करने में उसे क्षण-भर भी नहीं लगा, “तो आज भूखे ही रहना पड़ेगा!”

“क्यों मेरी अन्नपूर्णा?”

“घर में खाना नहीं पकेगा.”

“हड़ताल?”

“हाँ! हड़ताल!”

“यह अनिवार्य सेवा है.” मैं अत्यंत निश्चिंत स्वर में बोला, “इसे तुम अस्त-व्यस्त नहीं कर सकतीं.” मैंने उसी के अध्यादेश में उसे बाँध लिया था.

पर वह बंधी नहीं. वह खिलखिलाकर हंस बड़ी, “बड़े भोले हो! वर तुमने मुझे दिया था, मैंने तुम्हें नहीं दिया था.”

“तो क्या संविधान दोनों पर लागू नहीं होता?” मैंने विवश जनता के-से याचना भरे स्वर में पूछा.

“कभी सरकार भी अपने अध्यादेशों में बंधी है?” उसने मुस्कराकर पूछा.

मैंने अपील नहीं की. उस शाम का खाना हमने बाहर ही खाया.

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रचनाकार – नरेन्द्र कोहली की यह त्रासदी आपने भी कभी भुगती है? आपकी अन्य त्रासदियाँ रचनाकार में यहां पढ़ें-
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_23.html

चित्र: - अलेक्स मैथ्यू की कलाकृति – ए ब्लो अप ऑफ़ हर्ट, लकड़ी के रिलीफ़ कार्य पर एक्राइलिक रंग.


- कालीचरण प्रेमी

एक बार देवलोक के राजा इंद्र ने पृथ्वी लोक की यात्रा की योजना बनाई.

अगले दिन वे नारद मुनि के साथ पुष्पक विमान द्वारा आकाश से पृथ्वी के सौंदर्य का आनन्द ले रहे थे.

फ्रांस के ऊपर से गुजरते हुए इंद्र ने पूछा – “यह देश तो हमारे देवलोक से भी सुंदर है. क्या नाम है इसका?”

“फ्रांस”, नारद का संक्षिप्त उत्तर था.

“अरे! यहाँ की इमारतें तो हमारे पुष्पक विमान से अड़ी जा रही हैं! ” इन्द्र इंग्लैंड की छटा देखकर दंग रह गए.

“नारद, यहाँ कितने काले-बादल छाए हैं. कुछ स्पष्ट नजर नहीं आता?”

“महाराज! ये काले बादल नहीं हैं. अमेरिका के कल कारखानों, वाहनों का धुआँ तथा उसके द्वारा अन्य देशों में किए जा रहे बमबारी का गुबार है” नारद ने स्थिति स्पष्ट की.

तभी हिन्दुस्तान में प्रवेश करते ही नारद जी खुश होकर बताने लगे - “महाराज! यह वह देव भूमि है जहाँ हर काल में अनेक ऋषियों, मुनियों, साधुओं, संतों, देवियों और देवताओं ने जन्म लिया है. महापुरुषों ने इस भूमि को अपने खून से सींचा है. यह पृथ्वी का सबसे पवित्र स्थल खंड है.”

महाराज इंद्र ने पुष्पक विमान की खिड़की से अपनी गर्दन बाहर निकाली और हिन्दुस्तान के दर्शन करने लगे. चहुँ और धर्मस्थलों पर भजन-कीर्तन-प्रवचन-तक़रीरें हो रही थीं. नगर-नगर गांव-गांव में डगर-डगर पर धर्मस्थलों और उनमें पूजापाठ-प्रार्थना करते लोगों की भीड़ देखकर इंद्र खुश हो रहे थे.

अचानक तभी कई लंबे-लंबे हाथ इंद्र की तरफ बढ़े और उनके सिर का बहुमूल्य रत्नजटित मुकुट उतार कर ग़ायब हो गए.

इंद्र ने नारद से पूछा - “क्या यही है हिंदुस्तान?”

“जी, यही है.” नारद ने सहमते हुए कहा.

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रचनाकार - चर्चित लघु-कथाकार कालीचरण प्रेमी की रचनाएँ सैकड़ों प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं, जिनमें से अनेक पुरस्कृत भी हो चुकी हैं. आपकी कुछ रचनाओं का बांग्ला, पंजाबी व मराठी में भी अनुवाद किया गया है. कई पत्रिकाओं में आपका संपादन सहयोग भी है. कालीचरण प्रेमी की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें
http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_30.html
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चित्रः साभार, कालीचरण प्रेमी


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- नरेन्द्र कोहली

कहां तो वह मेरी बात भी नहीं सुनती थी और कहाँ उस दिन बोली, “मैं तैयार हूँ. जहाँ तुम्हारा मन चाहे, ले चलो.”

मेरे मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली दिल्ली टेलिफोन-व्यवस्था से बहुत साम्य रखती है. उसकी स्वीकृति पाई और इधर गलत लाइन मिल गई. मेरे मन में अपनी मां का चेहरा उभरा. कब से मां कह रही है, “बेटा! वह कौन-सा दिन होगा जब तू एक चाँद-सी बहू मुझे ला देगा.” मेरे मन ने कहा, “यही अवसर है नरेन्द्र कोहली. दोनों की इच्छाएँ पूरी कर दे. इसकी इच्छा है कि इसे कहीं ले चल और मां की इच्छा है कि उसे बहू ला दे. बस! अब सोच मत. सास-बहू का मिलाप करा दे.”

ऐसा सुखी भी कौन होगा, जैसा कि उस समय मैं था : एक ओर प्रिया तैयार खड़ी थी - ‘ले चल जहाँ चाहे.’ और दूसरी ओर मां बाहें फैलाए खड़ी थी- ‘ले आ बेटा, जिसे चाहे.’

“जी तो चाहता है,” मैं बोला, “तुम्हें अपनी मां के पास ले चलूं.”

“मुझे अपने लिए रिजर्व कल लेना चाहते हो?” वह मुसकराई.

“हाँ! ताकि फिर तुम कहीं और न जा सको.”

“अच्छा, इस कार्यक्रम को कुछ दिनों के लिए अभी स्थगित ही रखो,” वह बोली, “मुझे एक काम याद आ गया है.”

मैं एक सहृदय प्रेमी के समान उसकी बात मान गया और वह चली गई. गई तो ऐसी गई कि भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास का नाम हो गई, अर्थात् – वह फिर नहीं आई.

तब समझ नहीं पाया था, पर आज मैं समझता हूँ कि वह क्या था. वस्तुतः श्रृंगार और वात्सल्य का मिश्रण बड़ी भयंकर भूल है. श्रृंगार और वात्सल्य का संबंध – बहू और सास का संबंध है. काव्य-शास्त्र की इसी भ्रांति में मार खा गया. भला बहू जाकर सास के पास रहना क्यों चाहेगी?

नारी-मनोविज्ञान का मेरा ज्ञान खासा अधकचरा और आउट-ऑफ़-डेट है. उसके इस वाक्य का अर्थ दस वर्ष बाद मेरी समझ में आया, और वह भी यारों के समझाने पर आया. वह कह रही थी कि किसी होटल में ले चलो, किसी रेस्ट्रां में ले चलो, किसी थियेटर में ले चलो, किसी पार्क में ले चलो. मैंने उसके सम्मुख सास के पास ले चलने का प्रस्ताव रख दिया. साहित्य के रसराज श्रृंगार रस के विषय में पढ़-पढ़ाकर आंखें फोड़ लीं और जीवन में व्यवहार का अवसर आया तो वात्सल्य जोर मार गया. यह रसों की त्रासदी भी...
पर मेरे साथ प्रेम के क्षेत्र में एक यही त्रासदी हुई हो – ऐसी बात नहीं है. ऐसी कुछ त्रासदियाँ और भी हैं.
हम कालेज के टूर पर निकले हुए थे. वह अकसर मेरे साथ ही घूमती थी. मेरे साथ ही बातें करती थी. अब बस में भी वह मेरे साथ ही बैठी थी. थोड़ी देर तो मेरी टाई और मेरे बालों की प्रशंसा करती रही, फिर बोली, “मुझे नींद आ रही है. जरा सीधे होकर बैठ जाओ.”
मैंने भौंचक हो उल्लू के समान उसकी ओर देखा - ‘सीधे बैठ जाओ’ तक तो ठीक था. मां भी यही कहा करती थी कि मैं झुककर बैठता हूँ. ऐसे में कमर झुक जाती है. मुझे सीधे होकर बैठना चाहिए. बाद में ड्रिल-मास्टर से लेकर क्लास-टीचर तक सबने यही कहा था - ‘सीधे बैठो !’ आज भी वह यही चाहती थी कि मैं सीधा बैठा करूं तो हर्ज क्या है ? दिन भर के घूमने-फिरने से थका हुआ तो था, पर उसकी बात मानकर सीधे बैठना श्रेयस्कर था. किंतु उसकी नींद से मेरे सीधे बैठने का क्या सम्बन्ध ? मन तर्कशास्त्र की ओर भागने की जगह पर काव्यशास्त्र की ओर भागा. समझ गया कि यह असंगति अलंकार है- कारण कहीं होता है, कार्य कहीं और होता है. नींद उसे आ रही थी और सीधा मुझे बैठना था. असंगति अलंकार का ऐसा सुन्दर, जीवन्त और आधुनिक उदाहरण सामने देख मैं गद् गद हो उठा. मेरा ध्यान उसकी ओर से हटकर परीक्षा की ओर चला गया. परीक्षा में यदि असंगति अलंकार के विषय में पूछा गया तो यही उदाहरण लिखूंगा. परीक्षक भी चित हो जाएगा...

अभी तो मेरा ध्यान परीक्षा-फल और उसके आधार पर मिलने वाली नौकरी तक जाता, पर उसकी हरकत से मेरी चिन्तन-प्रक्रिया में बाधा पड़ी, विचारों की शृंखला टूट गई और मेरा ध्यान पलट आया. हुआ यह कि मेरे सीधे बैठते ही उसने अपना सिर मेरे कंधे से टिका दिया था और सोने के लिए आँखें बन्द कर ली थीं...

मेरा मस्तिष्क काव्यशास्त्र के खेत को चरना छोड़, सरपट भागता हुआ नागरिकशास्त्र में जा घुसा ! यह कैसा शिष्टाचार है. इसे नींद आई है तो मैं तन कर रात-भर ड्यूटी पर बैठा रहूँ कि कहीं मेमसाब की नींद में विघ्न न पड़े. यह कैसा समाज है – स्वार्थी. केवल अपनी ही सुविधा का ध्यान है, दूसरे के आराम की तनिक भी चिन्ता नहीं. एक आदमी को आराम से सोने के लिए दूसरे का कंधा चाहिए, और दूसरे को जरा ढीले होकर बैठने की भी सुविधा नहीं...

पर मैं न तो उसे इस अशिष्टता के लिए फटकार सका, न नागरिक शास्त्र पर व्याख्यान दे सका. मरे कंधे से टिकी वह बड़ी प्यारी लग रही थी. मन भी पिघल रहा था और वह कंधा भी, जिससे लगी वह सो रही थी. दूसरा कंधा अपने भाग्य पर आठ-आठ आँसू रो रहा था... पर तभी मेरी आत्मा ने मुझे धिक्कार दिया, ‘दुष्ट ! तू मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है. एक अबला नारी, सैर-सपाटे से थकी-हारी, यदि तेरे सहारे से कुछ विश्राम कर लेना चाहती है तो तेरे मन में दूषित विचारों का मेला लग रहा है. तेरे घर में मां-बहन नहीं हैं क्या ? यह मानव-तन क्यों पाया है तूने, यदि कष्ट में किसी की तनिक सहायता भी तू नहीं कर सकता...’

आत्मा के धिक्कार का तत्काल प्रभाव हुआ. मेरे भीतर का सोया हुआ सामाजिक कार्यकर्ता जाग उठा और प्रेमी पुरूष सो गया. मैंने अपनी चेतना को जगाया और उसे याद दिलाया – यह शरीर दूसरों की सेवा के लिए ही था. विशेषकर यह कंधा तो बना ही इसीलिए था. मैंने वहीं बैठे-बैठे भीष्म प्रतिज्ञा की कि यह कंधा आज से जन-कल्याण के लिए ही अर्पित है- चाहे किसी कन्या के सोने के काम आए, या किसी की अर्थी उठाने के. आज से जो भी मेरा कंधा मांगेगा- यह उसी को अर्पित होगा...

पर उसे शायद नींद नहीं आ रही थी. वह सीधी होकर बैठ गई और ध्यान से मेरा चेहरा देखने लगी. कदाचित् देख रही थी कि उसके द्वारा मेरे कंधे का उपयोग मुझे बुरा तो नहीं लगा. सामान्यतः तो ऐसी हरकत मुझे बुरी ही लगती है. मैं अपना शेविंग सेट तो किसी और को देता नहीं, अपना कंधा कैसे दे देता ! पर उस क्षण मेरी आत्मा उदात्तता और उदारता के ऊँचे-से-ऊँचे शिखरों पर उड़ रही थी, इसलिए उसके द्वारा अपने कंधे के इस दुरूपयोग के लिए मैंने अपनी अप्रसन्नता नहीं जताई. बड़ी उदारता से बोला, “सो जाओ. सो जाओ. मैं बुरा नहीं मानूंगा.”

उसकी आँखों में मेरे प्रति प्रशंसा का भाव नहीं जागा. वह मुझे ऐसे देख रही थी जैसे मैं आदमी न होकर छछूंदर या ऊदबिलाव होऊँ. फिर स्वयं को बलात् संयत कर बोली, “मुझे नींद नहीं आ रही.”
जी में आया, उससे कहूँ कि नींद नहीं आ रही तो थोड़ी देर के लिए किसी और सीट पर जा बैठे, मैं ही अपनी कमर सीधी कर लूँ. पर तत्काल ही मेरे विवेक ने मुझे धिक्कारा. वह स्त्री है, कोमल है. मैं पुरूष हूँ, कठोर हूँ. मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए-

“क्यों ? नींद क्यों नहीं आ रही ?” मैंने पूछा.

“सिर में कुछ दर्द है.” वह बोली, “लगता है, ज्वर भी हो गया है. तुम मेरा सिर दबा दोगे ?”

इच्छा हुई कि उसे बता दूँ कि अभी-अभी मैंने स्वयं को दूसरों के कष्ट-निवारण के लिए समर्पित किया है और थोड़ा-बहुत ज्ञान अपने जीवन के आदर्शों का भी दे दूं. पर उसके सामने जुबान खुल नहीं पाई. मन में जाने कैसी गुदगुदी हो रही थी. वह मुझसे अनुचित लाभ उठा रही थी, फिर भी अच्छी लग रही थी.

हल्के से बोला, “दबा दूंगा.”

“थैंक यू.” वह बोली.

और इससे पहले कि मैं कुछ समझ सकता, वह अधलेटी-सी हो गई और अपना सिर मेरी गोद में रख दिया. मुझे अपनी दादी और अपने पिताजी याद आ गए. बचपन से ही वे लोग मुझसे सिर दबवाते रहे हैं. मेरी घंटे-घंटे की मेहनत के पश्चात् हल्की-सी प्रशंसा कर देते, “तुम बहुत अच्छा सिर दबाते हो.”
अपनी गोद में लेटी वह मुझे अपनी दादी लग रही थी. मैं अब इसका सिर दबाता रहूँगा और यह आराम से सो जाएगी. मेरी दादी भी यही किया करती थी. मैं उसका सिर दबाता रहता और वह खर्राटे लेती रहती. मेरी कलाइयाँ दुःख जातीं और उसके कान पर जूँ तक नहीं रेंगती. अपने कोमल और भीरू बच्चे को इस शोषण से बचाने के लिए मेरी मां अपनी सास से डरती-डरती, दरवाजे के पीछे से ही मुझे उठ आने का इशारा करती तो मैं उठने का साहस करता. पर मेरे उठते ही किसी जादू से मेरी सोई हुई दादी की नींद उचट जाती और वह करवट बदल कर कहती, “कहाँ जा रहा है ?”

मैं चिंतित हो उठा : मैं सिर दबाता रहा और यह सो गई, तो मेरा क्या होगा ? यहाँ तो मेरी मां भी नहीं है जो अपनी सास के पंजे से मुझे छुड़ाने का प्रयत्न करती और यह मेरी दादी की दादी मेरी गोद में सिर रखे आराम से लेटी हुई थी...

मैंने मन को समझाया. अपने आदर्शों को याद किया और उसका सिर दबाना आरम्भ किया. पर थोड़ी ही देर में मैं अपने मन के पाप को पहचानने लगा. उसका सिर दबाते-दबाते मेरी अंगुलियाँ बहक-बहक कर उसके गालों तक जाने लगी थीं. मैंने भयभीत दृष्टि से उसकी ओर देखा: कहीं उसे मालूम तो नहीं हो गया ? पर नहीं ! उसकी नींद, मेरी दादी की नींद से बहुत भिन्न थी. उसे मालूम नहीं हो रहा था कि मैंने उसके गालों को छुआ था. वह बड़ी सन्तुष्ट मुद्रा में, आँखें बन्द किए निश्चिंत पड़ी थी.

मैंने अपने मन को धिक्कारा : एक पराई स्त्री ज्वरग्रस्त हो, उसके सिर में पीड़ा हो रही हो, वह मुझसे सहायता मांग रही हो और मुझ में पाप जाग रहा है. धिक्कार है मुझे ! किसी की विपत्ति का लाभ उठाना कहाँ की मानवता है ! ... बस, इतना ही धिक्कार पर्याप्त हुआ. फिर मेरे सात्विक मन में तनिक भी पान नहीं जागा. मैं पूरी निष्ठा से उसकी दवा करता रहा और वह चुपचाप पड़ी रही. पर जब उसकी नींद मेरी दादी की नींद से भी लम्बी हो गई और मैं रोगी की सेवा-सुश्रूषा से ऊब गया तो सहायता के लिए मैंने अपने साथियों की ओर याचना-भरी दृष्टि से देखा. किन्तु, उनमें से किसी को भी मेरी स्थिति पर दया नहीं आई, न लड़कों को, न लड़कियों को (कितना कठोर है यह समाज और कितने दुष्ट होते हैं लोग.) उलटे वे लोग परिहास की मुद्रा में मुसकराते जा रहे थे. अन्ततः मुझे कहना ही पड़ा, “भई ! कोई आ जाओ. इसकी तबीयत ठीक नहीं है.”

पर तभी वह उठ कर सीधी बैठ गई. घूर कर यूँ देखा, जैसे मेरी कठोर भर्त्सना करने वाली हो. किन्तु वह इतनी कृतघ्न कैसे हो सकती थी ? क्रोध में भी उसके मुख से मेरे लिए प्रशंसा का वाक्य निकला, “तुम्हें काव्यशास्त्र ही समझ में आ सकता है.”

मुझे यह अधूरी प्रशंसा अच्छी नहीं लगी. आत्मप्रशंसा को दोष मानते हुए भी शालीनता की सीमा के भीतर से बोला, “नहीं, भाषा-विज्ञान में भी अधिकतम अंक मेरे ही थे.”

उसने सिर पीट लिया, “कौन सी भाषा समझते हो तुम ! मैं तुम्हारे निवेदन की प्रतीक्षा में हृदय थामे, बेशर्मों के समान तुम्हारी गोद में पड़ी थी और तुम अपने मित्रों को मेरा सिर दबाने के लिए बुला रहे थे... बौड़म कहीं के !”

और, तब हमारी समझ में आया कि हमारे जीवन में प्रेम की एक और त्रासदी घट गई है...
मेरे साथ प्रेम की एक छोटी-सी त्रासदी और भी घटी है- पर वह बस में नहीं, रेलगाड़ी में घटी थी. इस त्रासदी को उसकी पूर्ण समग्रता में समझने के लिए आपको थोड़ा-सा वातावरण का वर्णन भी सुनना पड़ेगा.

उन दिनों भी अभी मैं कालेज में ही पढ़ता था. उस दिन कहीं बाहर जाना पड़ रहा था... जब बात इतनी खुलकर हो रही है, तो फिर आपसे क्या छुपाना. भैया के साथ भी प्रेम की त्रासदी घट रही थी. भाभी मायके जाकर बैठ गई थीं और भैया के पत्रों का उत्तर नहीं दे रही थीं, इसलिए मुझे जाना पड़ रहा था. मुझे जाकर देखना था कि भाभी स्वस्थ तो हैं.

वह यात्रा भी बड़ी त्रासद थी साहब ! बिना आरक्षण का रेल का डिब्बा और कुंभ के मेले जैसी भीड़. अभी तो संध्या का ही समय था, पर यात्रा रात भर की थी. सोच रहा था कि रात कैसे कटेगी कि प्लेटफ़ॉर्म पर वह आती दिखाई दी. जैसा कि प्रेमकथाओं में होता है- वह हमारे कालेज में पढ़ती थी. पर साहब ! मैं अपनी रचना को घटिया रोमानी रचना नहीं बनाना चाहता इसलिए पहले से ही स्पष्ट कर दूं कि वह मेरी कक्षा में नहीं थी. मुझसे दो साल पीछे थी, और जब तक मैं पढ़ता रहा, वह मुझसे दो साल पीछे ही रही, अर्थात् हमारी दूरी निरन्तर बनी ही रही. पर उस दिन वह निकट आ गई. जिस खिड़की की सीट के साथ मैं तना बैठा था, उसी के पास आकर वह रुक गई और मुझे देखकर मुसकराई.

मैंने पहले तो गर्दन घुमाकर इधर-उधर देखकर पुष्टि की कि वह मुझे देखकर ही मुसकुरा रही है न ! जब पुष्टि हो गई कि मुस्कान मेरे लिए ही थी तो मेरे कान गर्म होने आरम्भ हो गए.

वह मुसकुराकर ही नहीं टली. बोली, “नमस्ते !”

शिष्टाचार का मारा मैं बोला, “नमस्ते !”

उसने परिचय कराया, “ये मेरे पिताजी हैं.”

समझ नहीं पाया कि यदि उसके साथ उसके पिताजी हैं तो मैं क्या करूँ. मैंने तो उससे पूछा भी नहीं था कि उसके साथ यह पुरूष कौन है. उसे मुझको स्पष्टीकरण देने की क्या आवश्यकता थी कि वह कोई पर-पुरूष नहीं- उसके पिताजी हैं. कोई किसी के साथ घूमता रहे, मुझे किसी से क्या लेना-देना. मैं कोई फिल्मों में चित्रित समाज हूँ कि दूसरों के निजी मामलों में हस्तक्षेप करता फिरूं. कोई अपने पिता के साथ घूमे या अपने बच्चों के पिता के साथ- मुझे किसी से क्या लेना-देना...

इससे पहले कि मैं कठोर स्वर में पूछूं कि ये तुम्हारे पिताजी हैं, तो मैं क्या करूं- ‘राम की शक्ति-पूजा’ की दुर्गा के समान मेरी मां की मूर्ति मेरे मन में उदित हुई और वह वाक्य बोली, जो ऐसे प्रत्येक अवसर पर मैं बचपन से सुनता आ रहा हूँ, ‘नमस्ते करो !’

“नमस्ते जी !” मैंने आज्ञा का पालन किया.

इस बार उसके पिताजी बोले, “बेटा ! बड़ा अच्छा हुआ, तुम मिल गए. गाड़ी में इतनी भीड़ है और ये बच्चे अकेले जा रहे हैं.”

और तब पहली बार मेरा ध्यान उसके साथ खड़े एक छोटे लड़के और लड़की की ओर गया.

“इन्हें जरा अपने पास बैठा लो.” उसके पिताजी ने कहा, “ये लोग अपनी अटैची पर ही बैठ जाएंगे. तुमको कष्ट नहीं देंगे.”

एक बार तो मन में भारतीय यात्री जागा. इच्छा हुई, डांट कर कह दूं- ‘यहाँ भी कोई जगह नहीं है. मैं स्वयं भी बड़ी कठिनाई से फंसा बैठा हूँ. आप इन्हें कहीं और ले जाइए.’

पर कह देना क्या सरल था ? वह मुझसे एक फुट की दूरी पर खड़ी मुझे देख-देख कर निरन्तर मुस्कराए जा रही थी. उसके छोटे भाई-बहन याचना-भरी दृष्टि से मुझे देख रहे थे. कालेज में जब से उसे देखा था, बात करने का कोई बहाना ढूंढता रहता था. आज अवसर मिला है तो रेल का भारतीय यात्री बन जाऊँ ?

अवसर से चूकना मूर्खता है और अवसर के पीछे भागना अवसर वादिता. समझ नहीं पा रहा था कि मूर्खता तथा अवसरवादिता में से श्रेष्ठ क्या है.... लगता है कि उसके पिदाजी मेरे द्वन्द्व को समझ गए थे. वे नहीं चाहते थे कि मैं अन्तर्द्वन्द्व की इस भयानक यातना में पड़ा अधिक देर तक कष्ट पाऊँ. वे दयानिधान बन कर मुझे इस पीड़ा से उबारने के लिए आगे बढ़े.

उन्होंने अटैची उठा कर मेरी ओर बढ़ाई, “लो बेटा ! पकड़ो.”

मन में एक बड़ा मधुर चित्र जागा कि मेरा और उसका विवाह हो गया है. उसके पिता हमें विदा करने आए हैं और उसके कपड़ों की अटैची मुझे पकड़ा रहे हैं.

मैंने आपसे कहा न कि मुझे ठीक समय पर ठीक बात कभी नहीं सूझती.

ऐसे रोमानी क्षणों में मेरा समाज-सुधारक जाग उठा. जी में आया कि चीख ही नहीं पड़ूं, बल्कि उन्हें डांट कर कहूँ, “मैं दहेज का कट्टर विरोधी हूँ. मैं दहेज में कुछ नहीं लूंगा. यदि आप बाध्य करेंगे तो मैं दहेज के साथ-साथ आपकी लड़की को भी छोड़ जाऊँगा...”

यह तो अच्छा हुआ कि उसकी मुस्कान की उपस्थिति में मेरी वाचालता हवा हो गई थी और मैं कुछ बोल नहीं पा रहा था. यदि कहीं कुछ बोल पड़ता तो अनर्थ हो जाता. मैं होश में आया. अपने भीतर के समाज-सुधारक के सिर पर एक चपत जमाई और चुपचाप हाथ बढ़ाकर अटैची थाम ली. उसके पश्चात् उसका हाथ भी थामा (जीवन भर के लिए नहीं, खिड़की के मार्ग से गाड़ी में आने के लिए, सहायतार्थ).
फिर उसके पिताजी चले गए. अब उसका और उसके भाई-बहन का अभिभावक मैं ही था. तब पहली बार मुझे ज्ञात हुआ कि और अनेग गुणों के साथ-साथ मुझमें एक बहुत अच्छे अभिभावक के भी गुण हैं. मैं सतर्क हो गया मुझे उनके लिए स्थान बनाना था. चाहे मुझे कितना ही कष्ट क्यों न हो.

पर उसने मुझे अधिक कष्ट नहीं करने दिया. उसने पैरों के पास अपनी अटैची बिछा दी और उस पर अपने छोटे भाई-बहन को बैठा दिया. स्वयं वह दीवार से टिक कर खड़ी हो गई.

मैं यह कैसे सहन करता ! उसे बैठने के लिए जगह न मिले और मैं आराम से बैठा रहूँ. मैं उठ कर खड़ा हो गया.

“यहाँ बैठ जाओ”

उसने मुझे देखा और मुसकराई. ऐसी मुस्कान मैंने पहले कभी नहीं देखी थी. लगा, मेरे शरीर का सारा रक्त सनसनाने लगा है. वह आगे बढ़ी. उसने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे मेरी सीट पर बैठाया और स्वयं खिड़की की ओर मुझसे सट कर बैठ गई.

यह तो अद् भुत अनुभव था- जिससे दो बातें करने को सारा कालेज तरसता था, वह यहाँ मुझसे इस प्रकार सटी बैठी थी. इस दृश्य को कालेज का कोई लड़का देख ले, तो जल कर घटना-स्थल पर ही मर जाए.

कालेज का लड़का तो कोई मरा नहीं, मेरे भीतर का समाज-सुधारक जल मरा. उसने बिना चेतावनी दिए ही लाठी-चार्ज कर दिया, ‘साले ! शर्म से डूब क्यों नहीं मरते ? उस भली लड़की को बैठने की जगह नहीं मिल रही है. वह तुम्हें कष्ट नहीं देना चाहती, इसलिए तुम्हारे साथ बैठ गई और तुम उससे सटे जा रहे हो. किसी की मजबूरी का ऐसे लाभ उठाना चाहिए. छिः... !’

दुत्कार इतनी बढ़ी कि मैं डर गया. कहीं ऐसा न हो कि इससे परेशान होकर मैं चलती गाड़ी से कूद जाऊँ.

मैंने स्वयं को सँभाला और यथासंभव दूसरी ओर खिसकता गया. पर मुझे लगा कि मेरे साथ बैठी हुई वह ठोस नहीं, तरल पदार्थ है. जितना मैं खिसकता था, उतनी वह फैल जाती थी. उसका स्पर्श इतना मादक था कि सिर भन्नाने लगा था. एक ओर मन पिघलता जा रहा था और दूसरी ओर विवेक लताड़ता जा रहा था. परिणाम जाने क्या होता कि उसकी छोटी बहन कुनमुनाई, “हम दीदी के साथ बैठेंगे.”
मेरा जाग्रत विवेक आगे बढ़ा. मैं उठ खड़ा हुआ. बच्ची को उठाया और उसके साथ सीट पर बैठा दिया. किंतु, उसकी ओर देखा तो जानने में क्षण भी नहीं लगा कि फिर त्रासदी हो गई थी. अपनी नन्हीं बहन को सुविधाजनक स्थान पर बैठी देखकर वह तनिक भी प्रसन्न नहीं दीख रही थी. उसकी आँखों में मेरे लिए इतनी लताड़ थी, जितनी मेरे विवेक की कल्पना से बाहर थी...

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रचनाकार की टीपः
· व्यंग्य संकलन – त्रासदियाँ, संस्करण 1982, राजपाल एण्ड सन्ज़, कश्मीरी गेट, दिल्ली से चयनित.
· इस त्रासदी कथा में आपको आनंद आया? वैसे भी मनुष्य दूसरे की त्रासदी में ही आनंद लेता है. अगर हाँ, तो नरेन्द्र कोहली की अन्य त्रासदी-व्यंग्य-कथाएँ रचनाकार के अगले अंकों में पढ़िए, जिसके रचनाकार में पुनर्प्रकाशन की विशेष अनुमति नरेन्द्र कोहली ने दी है.
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रचनाकार – नरेन्द्र कोहली हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार हैं. विस्तृत जानकारी के लिए देखें आपका व्यक्तिगत जालस्थल – http://www.narendrakohli.org/


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छोटी छोटी बात

छोटी छोटी बातों पर
मोटा मोटा ध्यान दिया
और तुमने क्या किया
मोटी मोटी बातों को सहन कर गए
मोटे मोटे भार को वहन कर गए
छोटे छोटे बोझ को उठा न सके
छोटे छोट बोझ से बार बार थके
जीवन को टुकड़ों में जिया
और तुमने क्या किया
छोटी छोटी बातों पर
मोटा मोटा ध्यान दिया.

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खो खो

खो खो
खो खो कर पा
पर जो पा
उसे मत गँवा
बहुत अधिक खो
बहुत कम पा
पर जो पा
उसे बचा.

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रचनाकार – हितेश व्यास की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :-
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_09.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_113422217462821692.html

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- राजकुमार कुम्भज

भ्रष्टाचार में ही शिष्टाचार है. नो भ्रष्टाचार नो शिष्टाचार. नित नए नारागढ़ू, हमारे नेताओं को चाहिए कि वे अपने नागरिकों के लिए ‘भ्रष्ट बनो शिष्ट बनो’ का नया नारा देना चाहिए. वैसे भी, ‘आराम हराम है’, ‘जय जवान जय विज्ञान’ जैसे नारे तो आउट-ऑफ डेट और आउट-ऑफ़ फ़ैशन हो गए हैं. फ़ैशनेबुल बनना है तो फ़ैशनेबुल नारे भी चाहिएँ.

हम सदा-सच बोलो और सत्यमेव जयते का पाठ पढ़ते पढ़ाते आ रहे हैं. पर दुनिया अब तरक्की कर चुकी है, लिहाज़ा इन पाठों में कोई अर्थ अब नहीं रहा. अतः अब हमें आधुनिक युग के श्री श्री 1008 श्री भ्रष्ट ऋषि का लिखा भ्रष्ट पुराण पढ़ना-पढ़ाना चाहिए या भ्रष्टनारायण की कथा बांचना चाहिए जिसमें भ्रष्ट बनने के तरीके, उससे फ़ायदे इत्यादि के बारे में सभी तरह की जानकारियां दी गई हैं. और, यह भी बताया गया है कि आधुनिक युग में बिना भ्रष्ट बने या तो कोई पागल या कोई बेवक़ूफ़ ही जिंदा रह सकता है.

स्व. गुलजारी लाल नंदा ने अपने जमाने में एक भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा बनाया था. तब उन्होंने बड़ी ही मार्मिक बात कही थी, कि मैं किसी से भी किसी काम के लिए कोई पैसा नहीं लूंगा, इसकी कसम खाता हूँ, पर इसकी कसम नहीं खाता कि मैं अपना कोई काम करवाने के लिए किसी को कोई पैसा नहीं दूंगा. इस देश की जनता ने तभी से समझ लिया था कि उनके कल्याण का रास्ता भ्रष्टाचार की अंधी गली से ही गुजरता है.

अब हमें - ‘हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे’ जैसे गबन-राग छेड़ते हुए भ्रष्टाचार बढ़ाने के आंदोलन करने चाहिएँ. हमें चाहिए कि हम अधिकतम भ्रष्टाचार करें और अपने देश को इस मामले में सिरमौर का दर्जा दिलवाएँ. यदि हम थोड़ा सा भी अधिक प्रयास करें तो हम एक मजबूत भ्रष्ट राज्य बना ही सकते हैं. वैसे भी भ्रष्टाचार धर्म-जाति-वर्ग निरपेक्ष होता है, और भारत की धर्म-जाति-और वर्ग में बंटी जनता को एकीकृत करने में बहुत काम आएगी.

इसी लिए भ्रष्टाचार को हमें और तेजी से अपनाना चाहिए. शिष्टता की आधुनिक पहचान भ्रष्टाचार बन चुकी है तो आइए, अतिभ्रष्ट बनकर अतिशिष्ट बनें.

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रचनाकार – राजकुमार कुम्भज – वरिष्ठ, स्थापित लेखक हैं और प्रायः हर विधा की रचना भारत की सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. आप नित्यप्रति और नियमित लिखते हैं. राजकुमार कुम्भज की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_10.html

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- अटल बिहारी वाजपेयी

न्यूयॉर्क

मायानगरी देख ली,
इन्द्रजाल की रात;
आसमान को चूमती,
धरती की बारात;
धरती की बारात,
रूप का रंग निखरता;
रस का पारावार,
डूबता हृदय उबरता;
कह कैदी कविराय,
बिकाऊ यहां जिंदगी;
चमक-दमक में छिपी,
गरीबी और गन्दगी!
**-**

पुनः बन्धन ने जकड़ा

पहले पहरेदार थे,
अब भी पहरेदार;
तब थे तेवर तानते,
अब झुकते हर बार;
अब झुकते हर बार,
वक्त की है बलिहारी;
नजर चढ़ाने वालों ने ही,
नजर उतारी;
कह कैदी कविराय,
पुनः बंधन ने जकड़ा;
पहले मद ने और आजकल,
पद ने जकड़ा.

**-**
गूंजी हिन्दी विश्व में

गूंजी हिन्दी विश्व में,
स्वप्न हुआ साकार;
राष्ट्र संघ के मंच से,
हिन्दी का जयकार;
हिन्दी का जयकार,
हिन्दी हिन्दी में बोला;
देख स्वभाषा – प्रेम,
विश्व अचरज से डोला;
कह कैदी कविराय,
मेम की माया टूटी;
भारत माता धन्य,
स्नेह की सरिता फूटी!

**-**

बेचैनी की रात

बेचैनी की रात,
प्रात भी नहीं सुहाता;
घिरी घटा घनघोर,
न कोई पंछी गाता;
तन भारी, मन खिन्न,
जागता दर्द पुराना;
सब अपने में मस्त,
पराया कष्ट न जाना;
कह कैदी कविराय,
बुरे दिन आने वाले;
रह लेंगे जैसा,
रखेगा ऊपर वाले!

**--**

मंत्रिपद तभी सफल है

बस का परमिट मांग रहे हैं,
भैया के दामाद;
पेट्रोल का पंप दिला दो,
दूजे की फरियाद;
दूजे की फरियाद,
सिफारिश काम बनाती;
परिचय की परची,
किस्मत के द्वार खुलाती;
कह कैदी कविराय,
भतीजावाद प्रबल है;
अपनों को रेवड़ी,
मंत्रिपद तभी सफल है!

**-**

कार्ड महिमा

पोस्ट कार्ड में गुण बहुत,
सदा डालिए कार्ड;
कीमत कम, सेंसर सरल,
वक्त बड़ा है हार्ड;
वक्त बड़ा है हार्ड,
सम्हल कर चलना भैया;
बड़े-बड़ों की फूंक सरकती,
देख सिपहिया;
कह कैदी कविराय,
कार्ड की महिमा पूरी;
राशन, शासन, शादी-
व्याधी, कार्ड जरूरी.

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घर में दासी

बनने चली विश्व भाषा जो,
अपने घर में दासी;
सिंहासन पर अंगरेज़ी है,
लखकर दुनिया हाँसी;
लखकर दुनिया हाँसी,
हिन्दीदां बनते चपरासी;
अफसर सारे अंगरेज़ीमय,
अवधी हों, मद्रासी;
कह कैदी कविराय,
विश्व की चिन्ता छोड़ो;
पहले घर में
अंगरेज़ी के गढ़ को तोड़ो!

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रचनाकार – कवि हृदय राजनीतिज्ञ - अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधान मंत्री रह चुके हैं. आपात् काल के दौरान हुए अपने कड़वे अनुभवों को आपने ‘कैदी कविराय की कुंडलियाँ’ नाम से कलमबद्ध किया था.



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उस दिन शरद अचानक भड़क उठा. एकदम अचानक गालियाँ बकने लगा, ‘सारी व्यवस्था चोर है. सब साले कुत्ते हैं.’ इससे पहले सारी बहसों में वह नई व्यवस्था का सबसे बड़ा समर्थक होता था. वह तर्क देता था- ‘एक मेघावी आदमी और अयोग्य के बीच फर्क तो रखना ही होगा. सरकार नहीं रख रही है इसी लिए तो रसातल को जा रही है. इससे बचने का नाम ही नई व्यवस्था है.’ हर तरह से पूंजी, भोग और शोषण को जायज ठहराने के लिए वह तर्क गढ़ देता था.

उस समय उस महाजोट में शामिल पत्रकार उदितनाथ ‘घायल’ बहुत घायल हो जाते थे. उन्हें लगता था कि यह लड़का दुनिया के बदलाव से नावाकिफ एक ऐसी दुनिया में जी रहा है जिसे सपनों और खालिस सपनों की दुनिया कहा जाए तो गैर मुनासिब नहीं होगा. बकौल घायल जी ऐसे लोग फूल्स पैराडाइज में जीने वाले लोग हैं और जब तक लात नहीं खाते इन्हें अक्ल नहीं आती.

तब की बात है जब उदितनाथ घायल बिहार के एक छोटे से कस्बे से दुनिया बदलने की हसरत और हौसले के साथ दिल्ली की भीड़ में अपनी पहचान खड़ी करने आए थे. घायल कवि थे और उनकी कविताएँ कुछेक जगहों पर छप चुकी थीं. हिन्दी साहित्य उन्होंने पढ़ा था और उन्हें विश्लेषण करना आता था. एक अख़बार में बतौर रिपोर्टर काम करने का भी अनुभव था और उस अख़बार में इज्जत के साथ छप चुके थे. उन्हें भरोसा था कि उनकी प्रतिभा के कायल लोग उन्हें ‘जगह’ दिला देंगे, लेकिन यहाँ आकर मालूम हुआ कि इस पेशे का बाजार क्या है और यहाँ किस प्रकार की प्रतिभाओं की दरकार है?

जीने के लिए उन्होंने एक बिल्डर के अख़बार की नौकरी कर ली और संघर्ष का मोर्चा खोल दिया. उस अख़बार में बस इतना ही मिल पाता था कि या तो कमरा ले सकते थे या फिर खाना खा सकते थे. दोनों सुविधाएँ एक साथ मिल पाना असम्भव था. इस अवस्था ने घायल जी जैसे अड़ियल आदमी में एक परिवर्तन ला दिया. उन्होंने सामंजस्य से काम लेने का फैसला लिया.

घायल जी ने कामरेड वीआई लेनिन को पढ़ा था. रूसी क्रान्ति के दस्तावेज़ से बावस्ता थे. ऐसे में कम्यूनिस्टों के सौ कदम पीछे, एक कदम आगे वाले फ़ॉर्मूले पर उन्होंने अमल किया और महाजोट में शामिल हो गए. रहने और खाने के लिए. वैसे उन्होंने कभी महाजोट को अपने काबिल नहीं माना. वे यह मानकर चलते थे कि यह टोली बुद्धिहीनों का जमावड़ा है. यही वजह थी कि वे मुद्दों पर बात करने से कतराते थे.

उस टोली में शरद ही एक ऐसा लड़का था जिसके पास कलेक्टर बनने का सपना था. वह पढ़ाकू था और खुद को महान मानता था. घायल जी से वही उलझता था और घायल तमाम उदाहरणों के जरिए उस पर हावी होने का प्रयत्न करते, लेकिन हर बार वह रूसी समाजवाद के बिखराव और रोमानियाँ के कम्यूनिस्ट शासक चाउसेस्कू जैसों को उनके सामने ला पटकता.

महाजोट के लड़के मजा लेने के लिए कभी-कभार बहस में शामिल होते थे. उनके पल्ले बहस नहीं पड़ती थी इसलिए इससे बाहर रहना उनकी मजबूरी थी. उनके लिए तो यह बहस एक फालतू और बिलावजह बकवास थी.

उन्हीं दिनों की बात है एक दिन घायल जी ने झल्लाकर शरद से कह दिया - ‘अभी सड़कें नहीं नापे हो बबुआ जब नापनी पड़ेगी और निजी क्षेत्र की कारगुजारियाँ झेलनी पड़ेंगी तब समझोगे कि निजीकरण और भूमंडलीकरण गरीब लोगों को छलने के शाब्दिक मायाजाल के सिवाय कुछ भी नहीं है. नयी व्यवस्था कुछ और नहीं है, बस यह चन्द लुटेरों की लूट को जायज बनाने की साजिश है. दुनिया बाजार हो रही है. लोग या तो खरीदार हो रहे हैं या फिर बिकाऊ. जो दोनों में से कुछ भी होने के काबिल नहीं हैं, बाजार उन्हें निकाल बाहर कर रहा है. वे कहीं के नहीं हैं.’

तब शरद ने व्यंग्य भरे लहजे में कहा था ‘घायल जी अव्वल तो दुनिया में वही सरवाइव करते हैं जो दुनिया के हिसाब से फिट हैं, और फिर ऐसे लोगों की फिक्र करने के लिए आप जैसे घायल तो हैं ही. हम जैसे एडमिनिस्ट्रेटर माइंडेड यह सब नहीं सोचते. हमारा काम तो बस स्मूथली सिस्टम को चलाना होगा.’

उसने उनकी औकात बताते हुए कहा था ‘और घायल जी सच तो यह है कि आप जिस अख़बार में अपनी कलम घसीट रहे हैं वह भी किसी ‘मन्दिर के महन्त’ का या आपके किसी कामरेड का नहीं है. खालिस पूंजीवादी आदमी का अख़बार है. आपके आदि कामरेड मार्क्स को भी उनके पूंजीपति मित्र एंजेल्स का सहारा नहीं मिला होता तो आपका समाजवाद उन्हीं के साथ दफन हो गया होता.’

यह सुनकर घायल जी बहुत घायल हो गए थे. उन्हें लगा था ऐसे ही संवेदना से रहित लोग व्यवस्था चला रहे हैं और ऐसे ही लोगों के दम पर यह व्यवस्था टिकी है. मध्यम वर्ग का यही हिस्सा अपनी दोगली सोच और मक्कारी से किसी भी देश के वंचितों को और वंचित और शोषकों के हितों का पोषण करता है. तब घायल जैसे नास्तिक ने भी भगवान को याद किया था और यह प्रार्थना की थी कि यह सात जन्म में भी प्रशासनिक अधिकारी नहीं हो पाए.

उस समूह में घायल जी के अलावा तीन और लड़के थे. सभी का पेशा अलग-अलग था. एक देश के सबसे बड़े कम्प्यूटर संस्थान का छात्र था. उसका नाम प्रवीण था और वह बस अमेरिका की समृद्धि और वैभव का बखान करता था. भारत में रहते हुए भी वह अमेरिका में जी रहा था. वह कुछ इस अन्दाज में बातें करता मानों दर्जनों बार अमेरिका हो आया हो. उसके सपने में पैसा और लड़की के अलावा और कुछ था ही नहीं. उसे इस बात से कोई लेना-देना नहीं था कि दुनिया कहाँ जा रही है.

तीसरे सज्जन चन्दन कुमार एक थ्री स्टार होटल में ट्रेनी मैनेजर थे. एक कपड़े की दुकान के मुंशी के बेटे चन्दन कुमार ने खातों की लीपापोती का पुश्तैनी ज्ञान हासिल कर लिया था और वाणिज्य की कामचलाऊ पढ़ाई ने उसके इस ज्ञान को और माँज दिया था. महाजोट में उसकी बड़ी चलती थी. उसके कई कारण थे. वह अकसर होटल से खाना और किसी विदेशी-देशी सम्पन्न ग्राहक से बख़्शीश में मिली शराब मुहैया करा देता था. घायल उसे बात करने के लायक नहीं समझते थे. हालांकि वह उनकी बड़ी इज्जत करता था.

महाजोट में रोजगार में आने वाला तीसरा सदस्य प्रवीण बना. देश की नामी बिल्डिंग कन्सट्रक्शन कम्पनी में कम्प्यूटर ऑपरेटर का ओहदा मिला था. प्रवीण ने इस नौकरी को टाइम पास कहा था. उसकी दृष्टि में भारत वह देश ही नहीं जहाँ आदमी काम कर सके. उसकी बातों से यही लगता था कि उसे इस देश में पैदा होने का दुःख है. प्रवीण को नौकरी लगे कुछ ही दिन हुए थे. सभी के किस्से पुराने थे. चन्दन के होटल में आने वाले यात्रियों और उनकी अय्याशी, यहाँ तक कि किस तरह की लड़कियाँ उन देशी-विदेशी कस्टमरों के लिए बिछती हैं, इसके सिवाय कुछ नहीं होता था.

प्रवीण के नौकरी में आने के बाद दफ़्तरी संस्मरणों में थोड़ा रस आ गया था. प्रवीण के एक साहब थे. उन साहब के भी साहब थे और इन सबकी बड़ी फौज थी. ढेर सारे कर्मचारी थे. एक बड़ी बिल्डिंग में पूरा दफ़्तर था. रोज कम्पनी की बस से आते-जाते थे. प्रवीण ने एक दिन खुलासा किया कि दफ़्तर के कम्प्यूटर पर कैसे-कैसे काम होते हैं. उसने बताया कि दफ़्तर के कम्प्यूटर पर उन फ़िल्मों को आसानी से देखा जाता था, जिसे देखना नैतिक और क़ानूनी तौर पर गलत माना जाता है. इस काम में उसके बॉस मेहरा साहब तो सबसे आगे रहते थे.

प्रवीण के साथ उस कम्पनी में एक लड़की को भी नौकरी मिली थी. यह संयोग था कि दोनों के सरनेम एक जैसे थे और एक दिन एक ही समय दोनों का साक्षात्कार हुआ था. दोनों को एक साथ नौकरी पर बहाल किया गया था और साथी कर्मचारी से लेकर उसके बॉस तक को यह लगता था कि दोनों पूर्व परिचित हैं और दोनों के बीच कुछ है. एक सप्ताह बाद ही दफ़्तर के एक बुजुर्ग साथी ने प्रवीण को टोक दिया था - ‘और भाई, कब तक शादी-वादी कर रहे हो. अभी रोमांस का ही इरादा है या फिर यूँ ही मजे ले रहे हो.’ इस सवाल ने प्रवीण जैसे मॉड दिमाग के लड़के को थोड़ी देर के लिए निरूत्तर कर दिया था. उसने बहुत कोशिश करके पूछा और तब उसे मालूम हुआ कि उसके बारे में कैसी कथा चल रही है.

सिर्फ प्रवीण को ही नहीं, उस लड़की को भी महिला साथियों ने पूछा था. एक दिन दोपहर को खाने की छुट्टी में दोनों कैंटीन में एक ही टेबल पर मिले. दोनों दफ़तर में चल रही चर्चाओं पर खूब हँसे. प्रवीण को यह जानकर आश्चर्य हुआ कि उसके कम्प्यूटर पर जो कुछ होता है वही सब कुछ लड़की के कम्प्यूटर पर भी होता है.

महाजोट में यह विवरण काफी रोचक था. सिर्फ घायल जी को छोड़ सभी ने मजा लिया. घायल जी ने इसे तकनीक के अनैतिक उपभोग के तहत वर्गीकृत किया था. इसके अलावा घायल जी इस नतीजे पर भी पहुँचे कि बाजार आदमी को दिमागी रुप से पंगु बनाने के लिए हर चीज का इस्तेमाल करता है. उनके अनुसार आदमी को सीयर रोमांटिसिज्म में डुबोना और फिर उसे किसी लायक नहीं छोड़ना व्यवस्था के कायम रहने की पहली और आखिरी शर्त होती है. उन्होंने यह भी माना कि असन्तोष और कुव्यवस्था के खिलाफ एकजुट और एकमुश्त आवाज नहीं उठने देने के लिए सिर्फ लोगों को खेमों में बांटना ही जरूरी नहीं है. बल्कि उनके बीज इतने सपने पलने चाहिए कि लोग उन्हें पूरी करने के जायज-नाजायज तरीके ही आजमाते रह जाएँ. व्यवस्था इस बात को अच्छी तरह जानती है और उसे बड़ी सावधानी से आजमाया जा रहा है, ताकि लोगों में विरोध की ताकत ही न रहे.

स्थितियाँ तेजी से बदल रही थीं. नई तकनीक के नाम पर नई तरकीब सामने आ रही थी. नौकरी से छंटनी के लिए वी.आर.एस की तरकीब से लोग निकाले जा रहे थे. बीमार बताकर उद्योगों में तालाबन्दी हो रही थी. बीमार बनाने के लिए तरकीब आजमाई जाती थी फिर विनिवेश के नाम पर उनका निजीकरण किया जा रहा था. छोटे-छोटे घपले बड़े घपलों की आंधी में छिपते जा रहे थे. इन सबके बीच ईमानदारी और कानून के शासन का ढोंग चल रहा था. उदारीकरण के विरोधी सत्ता में आते ही इसके प्रबल समर्थक बन गए थे और धीमी गति से चल रही पूंजीकरण की प्रक्रिया तेज हो गई थी. निजी क्षेत्र में छोटी मछलियों को बड़ी मछलियाँ निगल रही थीं. कमजोर अर्थव्यवस्था उदारीकृत होकर मजबूत अर्थव्यवस्था को और मजबूत बना रही थी और खुद का अस्तित्व मिटा रही थी.

इस बदलाव ने सबसे पहले घायल जी का रोजगार छीना. एक दिन उनके मालिक ने उन्हें बुलाकर कहा, ‘घायल जी, आप तो योग्य आदमी हैं. आपके पास योग्यता है, कहीं भी नौकरी मिल जाएगी. मेरे यहाँ काम ही कितना है. सच पूछिए तो मेरे अख़बार की हैसियत ही क्या है. आप जैसे प्रतिभावान व्यक्तियों को सहारा मिल जाता है यही इस अख़बार का गौरव है.’ घायल जी जैसे सीधे-साधे आदमी को बात बहुत सम्मानजनक लगी थी. उन्हें लगा था कि यह आदमी उन्हें अपने से ज्यादा आंकता है. पर महाजोट में शामिल लड़कों ने उनकी सोच की धज्जियाँ उड़ा दी थीं.

शरद ने कहा था, ‘घायल जी दुनिया को अक्ल देने से पहले खुद अक्ल से काम लेना सीखिए.’ तब घायल जी भी बुद्धू बन गए थे. घायल जी का मालिक एक छोटा सा बिल्डर था, इसलिए सबसे पहले उनका मालिक ही धराशायी हुआ था. सरकारी जमीनों की हेराफेरी और फिर उस पर बड़े भवन बनाकर बेचने के धन्धे में बड़ी मन्दी छा गई और इस धन्धे में कुछ और बड़ी फर्में कूद गई थीं. जिन जमीनों की हेराफेरी वह निचले स्तर के नेता और अफसरों से सांठगांठ कर लेता था, उसमें ऊपर से ही डीलिंग शुरू हो गई थी. इसलिए आमदनी कम हो गई थी. मालिक की माली हालत खराब हो गई थी इसलिए वह अख़बार नहीं चला पा रहा था.

घायल जी बुद्धू बनकर उस अख़बार से बाहर हो गए थे. वैसे भी वह अख़बार घायल जी जैसे ‘मिशनरी’ आदमी के लिए था ही क्या? सिर्फ ठहराव का एक साधन. बेरोजगारी की दौड़ शुरू होते ही घायल जी ने देखा सबसे पहले उनके जिगरी अलग हो गए. उन्हें लगा कि लोग बस रस्मी तौर पर उनसे मिल रहे हैं. एक दिन घर के लोगों को मालूम पड़ा और सबसे खास पत्नी का जो पत्र मिला उससे घायल जी ‘रिश्तों का अर्थशास्त्र’ जैसे गम्भीर विषय पर सोचने के लिए मजबूर हुए और अन्ततः उन्होंने एक सिद्धान्त प्रतिपादित किया - ‘संवेदनशील रिश्तों तक बाजार की दखल.’

काफ़ी दिनों तक घायल जी बाजार की मारामारी में शामिल रहे. जीने के लिए इस बीच फुटकर काम से काम चलाते रहे. कुछ समय बाद एक अख़बार में नौकरी मिल गई. इस अख़बार की खूबी अपनी थी. जिस अख़बार में घायल जी काम कर रहे थे उसका मालिक 32 अख़बार निकाला करता था. विज्ञापन के दम पर वह अख़बार निकालता था. उस अख़बार ने यह ज्ञान दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता पैसे कमाने की स्वतन्त्रता के सिवाय कुछ नहीं है.

यह संयोग ही था कि घायल जी के फिर से रोजगार में आने के चन्द रोज पहले जिस शख्स की नौकरी गई वह प्रवीण था. नौकरी जाने के दिन तो प्रवीण बिल्कुल निस्पृह दिखा था, पर एक सप्ताह बाद ही उसमें अजीबो-गरीब परिवर्तन दिखने लगे थे. भारत को नौकरी के लायक नहीं समझने वाले लड़के में एक समझदार परिवर्तन था. वह घायल जी के जैसा शब्दों का जाल बुनने में उस्ताद नहीं था और नहीं शरद के जैसा वाक चातुर्य सम्पन्न व्यक्ति कि वह कुछ ज्यादा कह पाता. वह सपाट भाषा में सब कुछ बयान करने वाला आदमी था अतः उसकी व्यथा सपाट थी.

उसके एक साथ कई दुःख थे. नौकरी जाने का दुःख. बैठे रहने का दुःख. और सबसे ज्यादा उसकी प्रेम कहानी अधूरी रहने का दुःख. शुरू में उसने यही जाहिर किया था कि उसे कोई गम नहीं है, पर धीरे-धीरे उसमें परिवर्तन आते गए. उसे यह मालूम नहीं हो सका था कि कब और कैसे वह उस लड़की से प्यार कर बैठा था. दोनों अकसर दोपहर की छुट्टी में मिलते थे और दफ़्तरी प्रेम कथा के नए संस्करणों का मजा लेते थे. यह क्रम नौकरी जाने से पहले तक जारी रहा. नौकरी जाते ही यह घनिष्ठता सिर्फ परिचय तक सिमटकर रह गई. यही प्रवीण के दुःख का कारण था.

प्रवीण की कम्पनी एक बड़ी निर्माण कम्पनी थी. बड़े ठेके और गगन चुम्बी भवनों का निर्माण करने में उसका बड़ा नाम था. उदारीकरण की इस व्यवस्था में उसके डूबने का कोई खतरा नहीं था, लेकिन उसकी प्रतिद्वन्द्वी कम्पनियों ने पूर्व के एक ठेके में हुई गड़बड़ी के आधार पर उसकी जमीन खिसकानी शुरू कर दी. इस खेल में राजनीति से लेकर सबसे तेज बढ़ते अख़बार और सबसे पहले सूचना देने का दावा करते हुए टीवी चैनल भी शामिल हुए. मीडिया वार के इस कुचक्र को प्रवीण की कम्पनी भेद नहीं पाई. नई कम्पनियों ने ठेके हथियाने के लिए और भी कई हथकंडे आजमाए थे. कई नेताओं को भागीदारी दी थी या उन्हें दूसरी तरह का लाभ पहुँचाया था. नए काम के नहीं मिलने और पुराने के विवाद ने कम्पनी की हालत पतली कर दी.

इन सारी सूचनाओं को पाकर घायल जी ने एक निष्कर्ष निकाला कि पूँजीवाद अन्ततः अपने ही अन्तर्विरोधों का शिकार होगा. उनके हिसाब से अंश, हिस्सेदारी और वर्चस्व की लड़ाई इस व्यवस्था के लिए वाटलरू साबित होगी. यह व्यवस्था भी अपने प्रतिद्वन्द्वियों से भिड़ने में उसी तरह तबाह होगी जिस तरह उपनिवेशवाद का खात्मा हुआ.

यह न्यायिक सक्रियता का दौर था. भ्रष्ट व्यवस्था में अदालती फैसलों की गूंज सुनाई दे रही थी. देश की राजनीति में मंडल-कमंडल के अलावा और कोई मुद्दा नहीं था. घायल जी को लगता था कि उनके सारगर्भित लेखों का जमाना अभी है ही नहीं, इसलिए उन्हें उन अखबारों में काम मिलता है जिनकी पहुँच नदी-नाले से लेकर भाजी बेचने वाले की दुकान या फिर कूड़ेदान तक है. इसके विपरीत सर्वाधिक प्रसार वाले अखबारों में या तो अमेरिका या फिर पश्चिमि दुनिया की नकल छपती है या फिर मुद्दाहीन राजनीति की बकवास. इन सबके अलाबा जनता के वाजिब सवालों को बड़ी बेदर्दी से दबाया जा रहा था. आंकड़े छप रहे थे. अमुक राज्य ने नई आर्थिक नीतियाँ अपनाकर अमुक क्षेत्र में इतना प्रतिशत तरक्की की है. अमुक राज्य ने सूचना-तकनीक से अपने शासन में इतना सुधार किया है. तब यह समाचार कहीं बिसूर रहा होता था कि उन्हीं अगुआ राज्यों में कितने किसान घाटे नहीं सह पाने के कारण आत्महत्या कर बैठे. तब यह खबर सिर्फ चौंकाऊ अन्दाज में आती और गुम हो जाती कि उड़ीसा के अमुक जिले में आदिवासी जहरीले पौधे का व्यंजन खाकर मर गए. जैसे ही इन खबरों की विक्रय क्षमता खत्म हो जाती थी वैसे ही खबर भी लापता हो जाती थी. अलबत्ता हालीवुड और बालीवुड की खबरों से लेकर दिल्ली के पंचसितारा संस्कृति की खबरें प्रमुखता पाती जा रही थीं. घायल जी को लगा कि समाचारों का भी उदारीकरण हो चुका है और पत्रकारिता अपना वैश्विक रूप ले चुकी है.

उसी दौरान घायल जी के जीवन में एक और युगान्तरकारी घटना घटी. उन्हें पता चला कि उनका मालिक जिन लड़कियों को नौकरी पर रखता है, उन्हीं की बदौलत विज्ञापन पाता है. इतना ही नहीं मालिक की बीवी और साली भी विज्ञापन हासिल करने की इस नायाब विद्या में साझीदार थीं. इस स्थिति में खुद को नैतिक रूप से छल पाने में असमर्थ घायल जी ने एक दिन नौकरी छोड़ दी.

महाजोट अब भी कायम था. नौकरशाह बनने का सपना लिए शरद जी घूमते-घामते जमीन पर आ गए थे. उनके पास प्रबन्धन की डिग्री थी और इन्जीनियर थे ही. तैयारी करने के दौरान इतिहास और सामान्य ज्ञान भी हासिल कर लिया था. इतनी योग्यता उन्हें जीने-खाने लायक तो दिला ही देती, पर उन्हें इतने से सन्तोष नहीं था. फिर नौकरशाही की एक मानसिकता होती है. सब मिलाकर शरद जी नई व्यवस्था में मिसफिट महसूस कर रहे थे और सरकारी नौकरियों के भाव के हिसाब से दाम न दे पाने की मजबूरी ने उन्हें हिलाकर रख दिया था. इसके अलावा निजी क्षेत्र की नौकरी के पचड़े अब दिख रहे थे. इसीलिए अब वे मुद्दों पर चुप हो गए थे. उनकी चुप्पी शराब के प्याले से टूटती थी और फिर उसमें डूब जाती थी.

महानगरीय जीवन में प्रेम का दर्शन पढ़कर प्रवीण जी सूफ़ियाना अन्दाज में बातें करने लगे थे. महाजोट में एक ही आदमी नहीं बदला था वह था चन्दन. उसके होटल व्यवसाय में कोई मन्दी नहीं थी. भला हो सरकार की विनिवेश नीति का कि कई सरकारी होटल भी उसके मालिक के कब्जे में आ गए थे. चन्दन की कमाई बढ़ गई थी और फिर भी वह महाजोट में ही था.

सड़क पर आने के बाद घायल जी ने एक बार फिर अपने मन के लायक अख़बार की तलाश शुरू कर दी थी. जिन्दगी में रास्तों की तलाश में घायल जी एक शाम को दिल्ली के कनाट प्लेस में थे. हर रोज की तरह आज भी फुटपाथ से सड़क पर भागती हुई जिन्दगी थी. सड़क के किनारे अपनी दुनिया की तलाश कर ठिकाने की ओर भागते लोगों की भीड़ का हिस्सा वह भी थे. नौकरी में रहते हुए घायल जी को दिल्ली की शाम कभी ऐसी नहीं लगी थी. पटरी की दूसरी ओर एक लड़का एक लड़की से चिपटा चला जा रहा था. एक जोड़ा जोरदार चुम्बन लेते हुए दिखा, पर इससे बेखबर एक भीड़ सबको रौंदते हुए आगे बढ़ने को उतावली दिख रही थी. घायल जी इसी भीड़ का हिस्सा थे. उन्हें लगा इस भीड़ में वे लोग शामिल हैं जो सपने की तलाश में हैं. मगर वह सपना क्या है? वे लोग जो दूसरी और किनारे पर दिख रहे हैं क्या वही सपना है? क्या वही मंजिल है? या फिर पंचसितारा होटलों के कमरे या पॉश कॉलोनियों की कोठियाँ? मंजिल क्या है, सपना क्या है? ये लोग क्या पाना चाहते हैं? यह पहला मौका था जब घायल जी को किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में कठिनाई हुई. उन्हें लगा कि सभी एक अन्तहीन यात्रा में शामिल हैं. वह, प्रवीण, शरद और चन्दन सभी इसी भागती हुई भीड़ का हिस्ता हो गए हैं.

वे तेज कदमों से बस स्टैंड की तरफ बढ़ने लगे जहाँ से उन्हें हौजख़ास के लिए बस पकड़नी थी.

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रचनाकार – नरेन्द्र अनिकेत के विभिन्न विषयों पर आलोचनात्मक आलेख देश की विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. संप्रति दैनिक भास्कर के सेंट्रल डेस्क पर उप-सम्पादक हैं.


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सम्बन्ध
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सम्बन्ध मिट्टी के घरौंदे होते हैं
लेकिन अब कहाँ होते हैं मिट्टी के घरौंदे
कहावतों के सिवाय
वे पाँव जो घरौंदे बनाते थे
घरौंदे नहीं बनाते
उन्हें चुरा ले गई हैं अंग्रेज़ी माध्यम की स्कूलें
जहाँ भर्ती तो होते हैं ढाई साल के पाँव
इंटरव्यू देते हैं साब और मेमसाब
मिट्टी की जगह ले ही है सीमेन्ट ने
सीमेन्ट में जड़ें नहीं होतीं
फिर भी उग आते हैं जंगल के जंगल
सम्बन्ध पहाड़े होते हैं जिन्हें दोहराना
और रटना होता है
फिर भी जो रहते हैं पराए के पराए
गिनती नहीं होते सम्बन्ध सहज
और अपनत्व से पूर्ण.

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मैं सीधी रेखा पर चलता हुआ
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मैं सीधी रेखा पर चलता हुआ
तुम्हारी वक्रता से मुकाबला करूँगा
बढ़ती ही जाएगी सीधी रेखा अनन्त तक
वक्रता की सांस बीच ही में टूट जाएगी
तुम अपने सारे छद्म काम में ले लेना
मैं सादगी से तुम्हें परास्त कर दूंगा
तुम कुटिलता से सफलताएँ हासिल करते रहना
मैं सरलता से प्रयत्न करता हुआ
संतोष के साथ समाप्त हो जाऊँगा
तुम लोमड़ी की तरह चालाक बने रहना
मैं कबूतर की तरह गुटरगूं करता रहूँगा
तुम काई की तरह काइयाँ बने रहना उम्र भर
बचते रहकर लोग संभलकर तुम पर चलते रहेंगे
उनमें से कुछ फिसल कर गिरेंगे
कुछ को ठहाके का मसाला मिल जाएगा
मैं सड़क की तरह सपाट बना रहूँगा
आखिरशः जिसे अंधे भी बेखौफ़ पार कर सकेंगे
तुम कृत्रिम व्यक्तित्व का चोगा धारण कर
अपनी चकाचौंध के साथ लोगों पर
रौब ग़ालिब करते रहना
खोखलेपन के बावजूद संजीदगी का मुलम्मा लगाकर
विद्वता का भ्रम पैदा करते रहना
मैं मज़ाकिया बनकर अपनी हँसी उड़ाने के
तुम्हें कई मौक़े दूँगा
तुम उन्हें बटोर कर समृद्ध होते रहना
सुनहरे फ्रेम में मंडवाकर तुम कसीदे बांटते रहना
मैं जेब से चिन्दियाँ निकालकर
महफ़िल की वाह-वाह लूट लूँगा.
**-**

रचनाकार – हितेश व्यास के दो कविता संग्रह समानधर्मा और उत्तर समानधर्मा प्रकाशित हैं. हितेश व्यास की अन्य रचनाएँ यहाँ पढ़ें:
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_09.html

http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html

चित्र: हिम्मत शाह की अनाम मृदा कलाकृति, साभार, आर्ट इंडिया (http://www.artindiamag.com )

- हितेश व्यास

जब संस्कृत काव्य शास्त्रियों ने गद्य को कवियों की कसौटी कहा तो उन्हें पता नहीं था कि एक समय गद्य में ही कविता लिखी जाएगी. लेकिन क्या सम्पूर्ण गद्य काव्य है? नहीं, जो विद्युतीकृत गद्य है वह काव्य है. मैंने काव्य विधा ही क्यों चुनी? कहानी क्यों नहीं लिखी? नाटक क्यों नहीं लिखा? नाटक तो उसके विन्यास को छोड़कर कविता ही है. कविता के सबसे करीब नाटक है. कहानी व्याकरण से बंधी होती है. उपन्यास भी निबन्ध भी. कविता व्याकरण का अतिक्रमण करती है. तो क्या कविता का व्याकरण नहीं होता? शास्त्रकार तो चेष्टा करते हैं कविता का व्याकरण हो जाए.

कभी युग का नाम देते हैं, कभी प्रवृत्ति का, कभी दशक का, कभी सदी का. कविता जब व्याकरण में बंधती है, पुनरावृत्ति करती है. जब यह कहा जाता है कि सब कवि मिलकर एक ही कविता लिख रहे हैं, तो यह कविता की पुनरावृत्ति है. कविता तो परम स्वतंत्रता का दूसरा नाम है. कविता को कोई बन्धन स्वीकार्य नहीं. हर बड़ा कवि अतिक्रमण करता है. हर ताकतवर कवि पुरानी कविता का भी अतिक्रमण करता है. कविता, कविता का अतिक्रमण करती है. अतिक्रमण का दूसरा नाम कविता है.

तो क्या कविता का कोई अनुशासन नहीं? सबसे अनुशासित विधा है कविता. किन्तु बाह्य अनुशासन नहीं. कविता का अन्तः अनुशासन. स्वानुशासन. कविता असंयमित नहीं हो सकती. कविता संयम का चरम है.

सियाराम शरण गुप्त ने लिखा है – कवि तो हज़ारों वर्षों में कोई एक पैदा होता है. बाकी सब उस कवि के लिए रास्ता बनाते हैं.

हम सब रास्ता बना रहे हैं जिस पर चलकर कोई कवि आएगा.

**-**रचनाकार – हितेश व्यास कवि हैं. इनकी कविता यहाँ पढ़ें http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html


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मोबाइल में तबदील

सब कुछ पैसे में और पैसा बाज़ार में बदल गया है
बाज़ार बदल गया है चीज़ों में
आदमी हो गया है चीज़ों में एक चीज़
शब्द दृश्य में बदल गए हैं
दृश्य अवास्तविकता में
अवास्तविकता आदत में
आदत अभ्यास में
अभ्यास दिनचर्या में
और दिनचर्या जीवन में परिवर्तित हो गई है
साहित्य हाशिए में बदल गया है
और हाशिया है कि पेज में वह है ही नहीं
फ्रेम काम में बदल गया है
काम बलात्कार में
बलात्कार, खबर में
और खबर जब प्रवाह है तो हम तटस्थ कैसे रह सकते हैं
हम खबर के साथ बहते जा रहे हैं
और हमारी कोई खबर नहीं है
हम खबर नहीं हैं
सम्बन्ध, बोझ में तबदील हो गए हैं
और बोझ आज कौन ढोता है
चिट्ठियाँ फ़ोन में तबदील हो गई हैं,
फ़ोन मोबाइल में
और मोबाइल कान में बदल गया है
और कान ने जगह ले ही है दिल की.

**-**
कविता का विषय

मैं जब कविता रचने जा रहा था
विषय बीच में आ गया
कविता से महत्वपूर्ण हो गया
कविता का विषय
कविता के बीच में जब लोगों ने कहा
वाह!
तो यह वाह कविता के लिए थी
या विषय के अद्भुत वर्णन के लिए
क्या कविता के लिए विषय अनिवार्य है
और विषय के लिए वर्णन
कविता और विषय के बीच
रिश्ता क्या है
जब कविता के बिना रह सकते हैं विषय बख़ूबी
क्यों नहीं हो सकती कविता विषय के बिना.

**-**

वसन्त ने कहा

ज़्यादा से ज़्यादा तुम क्या कर सकते हो?
हजामत! कर दो, रुण्ड मुण्ड कर दो
मैं आऊँगा पेड़ों के विग लगाता हुआ
इससे अधिक तुम्हारी औक़ात क्या है
तुम पत्तियों की रही रोशनी बुझाकर
पीली कर सकते हो, क्रमशः अँधेरा
मैं आऊँगा पत्तियों को लाल करता हुआ
मैं जानता हूँ तुम करना चाहोगे प्रकृति को नंग-धड़ंग
मैं आऊँगा कृष्ण की तरह बासन्ती साड़ी बनता हुआ
पतझड़ ! मैं तुम्हें कोई चाल चलने नहीं दूँगा
मैं यौवन हूँ, जीवन को ढलने नहीं दूँगा.

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रचनाकार – हितेश व्यास के दो कविता संग्रह – समानधर्मा तथा उत्तर समानधर्मा प्रकाशित हैं.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
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