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September 2005
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संजय विद्रोही

'सुनो कँवर साब आज एक अजीब बात सुनी है.' पापाजी ने आकर बैठते हुए कहा.
'क्या पापाजी?' परेश ने कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए मुस्कुराकर पूछा.
'पूरी कॉलोनी में सबने अपने घरों के मुख्य-द्वार पर दोनों ओर हल्दी और मेंहदी के थापे मार रखे हैं.' उन्होंने अचरज के साथ बताया.

'क्या?' सुनकर परेश अचम्भित रह गया.
'हाँ, मुझे तो सुबह विपिन ने बताया तो एकाएक मुझे तो विश्वास ही नहीं हुआ. मगर जब मैं शाम को टहलने गया तो देखा, वाकई सबने थापे लगा रखे हैं. जगह-जगह औरतें भी खड़ी खुसुर-फुसुर करती दिखीं' उन्होंने आगे बताया. हम दोनों की बातें सुनकर प्रतिभा भी पास आकर बैठ गई.

'देखो प्रतिभा पापाजी क्या बता रहे हैं?' परेश ने पत्नी की ओर मुखातिब होकर कहा.
'हाँ पापाÊ सुबह सामने वाली भी बता रही थी. कहते हैं तीन चार चुडैलें कहीं से छूटकर यहाँ आ गई हैं. घर-घर जाकर रोटी-प्याज माँगती हैं. यदि कोई तरस खाकर रोटी-प्याज दे देता है, तो रोटी तो वहीं फेंक देती हैं, प्याज को दरवाजे पर ही मुठ्ठी में भींचकर फोड़ देती हैं और उसका रस चूसकर पी जाती हैं. जिस-जिस घर में उन्होंने एसा किया है, उसी घर के बच्चे बीमार पड़ने लग जाते हैं. घर में भी तरह-तरह की मुसीबतें आने लगती हैं. प्रतिभा ने पूरी बात बताई. परेश जानकर हैरान रह गया कि हमेशा पढ़ाई-लिखाई में लगी रहने वाली उसकी पत्नी इस तरह की बातों में भी रुचि लेती है. उसने इस तरह से पूरी घटना का वर्णन किया कि वो देखता ही रह गया.

'अच्छा, इसलिए सबने अपने घरों के मुख्य-द्वार पर दोनों ओर हल्दी और मेंहदी के थापे मार रखे हैं. क्योंÆ लोग भी बस, बात का बतंगड़ बना लेते हैं और अंधविश्वास में कुछ भी करने लगते हैं. रोटी मांगने-खाने वाली आती ही रहती हैं. चाँस की बात है उसी दिन किसी के घर में कोई बच्चा बीमार पड़ गया होगा. बस फिर क्या था? अफवाह उड़ते देर लगती है भला. रोटी-प्याज का किस्सा लोगों ने घड़ लिया और बस शुरु हो गये हल्दी और मेंहदी के थापे.' परेश के गले नहीं उतर रही थी ये बातें.

'हाँ कँवर साब मैं तो खुद ये देखकर हैरान हूँ. आज जबकि आदमी चाँद पर जा रहा है. हम अब भी अंधविश्वासों से घिरे पड़े हैं.'
'और नहीं तो क्या?' परेश ने तुरन्त जोड़ दिया.
'लेकिन सुनो, कुछ तो जरूर होता होगा. तभी तो सबने ऐसा किया है. हम भी थापे लगा लें क्या? देखो, अपने भी छोटे-छोटे बच्चे हैं.' प्रतिभा के चेहरे पर भय के भाव स्पष्ट दिख रहे थे.माँ जो ठहरी.

'क्या बेवकूफों जैसी बातें करती हो? इन सबसे क्या होता है. तुम तो पढ़ी लिखी हो प्रतिभा. तुम ऐसी बातें करोगी?' परेश ने हल्के-से क्रोध के साथ कहा.
'देखो पापा, आप समझाओ ना. यहाँ भी रोटी माँगने वाली आती रहती हैं. एक तो कल ही आई थी.' प्रतिभा ने अपने पिता को एप्रोच किया. किन्तु पिता इस पशोपेश में थे कि दामाद की बात को कैसे काटें. हालाँकी उनके मनोभावों से भी लग तो एसा ही रहा था कि वो भी वही चाहते हैं जो प्रतिभा चाहती है. लेकिन वे कुछ कहते उससे पहले ही परेश बोल पड़ा - 'देखो पापाजी. कैसी बातें करती है?’

'नहीं प्रतिभा ऐसा नहीं करते बेटा. ऐसा कभी होता है क्या ये सब अफवाहें हैं. अंधविश्वास के सिवा कुछ भी नहीं. अच्छा कँवर साब मैं चलता हूँ.' कहकर वो उठ खड़े हुए. परेश बाहर तक उनको छोड़कर आया और वापस कुर्सी पर आ बैठा. अखबार देखने लगा. प्रतिभा जाकर बच्चों का होमवर्क कराने लगी.

रात को सोते समय अचानक प्रतिभा ने बात शुरू की 'देखो सब कह रहे हैं वो चुडैलें यहीं घूम रही हैं. कभी-कभार नजर आती हैं. अकसर नजर नहीं आतीं. सामने वाली कह रही थी, प्रतिभा तेरे तो छोटे-छोटे बच्चे हैं. तुझे तो अपने घर के बाहर जरूर लगाने चाहिए हल्दी और मेंहदी के थापे. आप समझते क्यों नहीं. कल को कुछ हो गया तो?' उसके स्वर में डर था.

'अरे पगली कुछ नहीं होगा. ऐसा कभी होता है?' परेश ने उसकी सामने झूलती लट को सम्हाल कर कान के पीछे करते हुए कहा.
'मुझे तो डर लग रहा है.'
'डरने की क्या बात है? मैं हूँ तो सही.'
'आप तो दिनभर ऑफिस में रहते हैं. मैं बच्चों के साथ घर में अकेले रहती हूँ. आपके पीछे से वो आ गई तो?’
'कोई नहीं आएगा. तुम तो बेवजह इतना डर रही हो. तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर कैसी बात करती हो?’
'माँ हूँ ना. ममता कब पढ़ी-लिखी होती है?'उसने बड़ी ही मासूमियत से कहा.
'पगली कहीं की.' लाड़ में परेश ने उसे गले से लगा लिया और वो बच्चों की तरह उससे लिपट कर सो गई. पास ही बच्चे भी सो रहे थेÊ निश्चिंत. परेश भी आँखें बन्द कर के लेट गया.

सुबह का समय. यानी भागदौड़ का समय. बच्चों को नहलाना धुलाना. फिर उनको नाश्ता कराना, दूध पिलाना. परेश को ऑफिस की जल्दी अलग. सबकुछ के बीच प्रतिभा बेचारी फिरकी हो जाती है. तिस पर बच्चों का खाने पीने मे नाक-भौं सिकोड़ना. प्रतिभा उनको डाँटती रहती है और बड़बड़ाती रहती है.
पम्मी तो ऐसी बदमाश है कि घण्टों मुँह में खाना लिए बैठी रहती है. खाती ही नहीं है. प्रतिभा बार-बार उसको टोकती रहती है' जल्दी खा ले. ऑटो वाला आने वाला है. जल्दी-जल्दी दूध पी फिर.' लेकिन वो है कि मुँह में रखे कौर को ही चिगलती रहती है.
'देखो आप कुछ कहते क्यों नहीं इसको? देखते रहते हो बैठे बैठे.' उसने परेश को डपट दिया.

'बेटा जल्दी-जल्दी खाओ. देखो बॉबी कितना अच्छा बच्चा है? फटाफट खा लेता है.' उसने तुरन्त बच्ची को टोक दिया. पास ही बैठा बॉबी मुस्कुरा दिया. परेश ने उसके गाल पर एक चपत लगा दी और झड़का कर मोजे पहनने लगा.
'ले - खा.' प्रतिभा ने पम्मी के मुँह में एक कौर और ठूँस दिया था. उसका मुँह बिल्कुल भर गया था. उसको चबाने में भी बड़ी दिक्कत हो रही थी. बॉबी अपना नाश्ता पूरा करके अपना बैग सम्हालने में लगा था. अचानक पम्मी ने जबरदस्त उल्टी कर दी. पूरी यूनिफॉर्म और डाइनिंग टेबिल गंदी हो गई. परेश ने दौड़ कर उसे सम्हाला,' 'क्यों तुम इसके साथ जबरदस्ती करती हो? जितना खाये खाने दो. बेकार क्यों ठूँसती हो?' प्रतिभा एकदम जैसे जड़ हो गई थी. उसको समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? 'कोई कपड़ा लाओ भई.' परेश ने जोर से कहा, तब उसकी चेतना लौटी. भागकर उसने कपड़ा दिया. बच्ची के हाथ-मुँह धुलवाए, कपड़े बदले. इतने में ही ऑटो वाला आ गया और बच्चे स्कूल चले गए. अनमनी- सी प्रतिभा काम में लगी रही. परेश भी खा-पीकर ऑफिस के लिए निकल गया.
लंच के समय उसको याद आया कि बच्चे स्कूल से आ गए होंगे. चलो, पम्मी की तबीयत पूछ लूँ. फोन मिलाया, घंटी बजने लगी उधर. काफी देर बाद प्रतिभा ने उठाया, 'हैलो.'
'मैं बोल रहा हूँ. बच्चे घर आ गए? पम्मी की तबीयत कैसी है?' इधर से परेश ने रूटीन टोन में पूछा.

'बच्चे तो आज घण्टे भर बाद ही आ गए थे. स्कूल की वैन छोड़ गई थी. पम्मी को स्कूल में भी दो-तीन बार उल्टी हो गई थी.'

'अब कैसी है उसकी तबीयत?' उसके मन में अजीब-सी घबराहट होने लगी .
'अभी तो सो रही है.'
'बॉबी क्या कर रहा है?' परेश घबरा रहा था. कहीं प्रतिभा की बात ही सच ना हो रही हो.
'वो भी सो रहा है.'
'ठीक है. मैं आज जल्दी निकलने की कोशिश करता हूँ.'

'नहीं, आप आराम से आओ. अब तो वो ठीक है.' क़हकर प्रतिभा ने फोन रख दिया. किन्तु परेश के मन में अजीब-सी अकुलाहट होने लगी थी. किसी काम में जी नहीं लग रहा था. बार-बार मेंहदी हल्दी को थापों वाली बात याद आ रही थी. रात को जिसे उसने अंधविश्वास कह कर प्रतिभा को समझाया था. बार-बार उसका ध्यान अब उसी दिशा में जा रहा था. जी उचाट होता देख, अपने सहयोगी को काम सम्हला कर 'सिरदर्द हो रहा, यार.' कह कर वो ऑफिस से जल्दी निकल गया.

कभी मन में खयाल आता कि 'कहीं प्रतिभा जो कह रही थी वे सच तो नहीं.' फिर अगले ही पल सोचता 'ऐसा होता है कहीं? खाने पीने में कोई गड़बड़ी हो गई होगी. बच्चे हैं, सौ चीजें खाते हैं दिनभर में.' बस इसी उधेड़-बुन में खोया वो घर की तरफ स्कूटर दौड़ा रहा था.
...... पता ही नहीं चला कि कब घर आ गया. जल्दी से उसने स्कूटर को स्टैण्ड पर लगाया और तेजी से भीतर की ओर दौड़ा. उसने देखा घर के दरवाजे के दोनों ओर मेंहदी और हल्दी के दो-दो थापे लगे थे. ना जाने क्यों, उन थापों को देखकर उसको एक अजीब-सा संतोष हुआ और उसकी चाल अपने आप धीमी पड़ गई.


रचनाकार- संजय विद्रोही की, एक अलग ट्रीटमेंट – एक अलग लहज़े की कहानी रचनाकार में आप यहाँ पर -http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_23.html पढ़ सकते हैं. इनकी विद्रोही स्वरों की कविताएँ और ग़ज़लें इनके ब्लॉग स्थल http://pratimanjali.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं
चित्र - सौजन्य, सृजन कैमरा क्लब, रतलाम.


-भारतेंदु हरिश्चंद्र

इस पूजा में अश्रु जल ही पाद्य है, दीर्घश्वास ही अर्ध्य है, आश्वासन ही आचमन है, मधुर भाषण ही मधुपर्क है, सुवर्णालंकार ही पुष्प है, धैर्य ही धूप है, दीपक है, चुप रहना ही चंदन है और बनारसी साड़ी ही विल्वपत्र है, आयु रूपी आँगन में सौंदर्य तृष्णा रूपी खूँटा है, उपासक का प्राण पुंज छाग उसमें बंध रहा है. देवी के सुहाग का खप्पर और प्रीति की तलवार है, प्रत्येक शनिवार की रात्रि इसमें महाष्टमी है, और पुरोहित यौवन है.

पदादि उपचार करके होम के समय यौवन पुरोहित उपासक के प्राण समिधाओं में मोहाग्नि लगाकर सर्वनाश तंत्र से मंत्रों से आहुति दे ‘मानखण्ड के लिए निद्रा स्वाहा’, ‘बात मानने के लिए मां बाप का बंधन स्वाहा’, ‘वस्त्रालंकारादि के लिए यथा सर्वस्व स्वाहा’ ‘मन प्रसन्न करने के लिए यह लोक परलोक स्वाहा’ इत्यादि, होम के अनन्तर हाथ जोड़कर स्तुति करें :

हे स्त्री देवी ! संसार रूपी आकाश में तुम गुब्बारा (बेलून) हो, क्योंकि बात-बात में आकाश में चढ़ा देती हो, पर जब धक्का दे देती हो तब समुद्र में डूबना पड़ता है अथवा पर्वत के शिखरों पर हाड़ चूर्ण हो जाते हैं. जीवन के मार्ग में तुम रेलगाड़ी हो. जिस समय रसना रूपी एन्जिन तेज करती हो, एक घड़ी भर में चौदह भुवन दिखला देती हो. कार्यक्षेत्र में तुम इलेक्ट्रिक टेलिग्राफ हो, बात पड़ने पर एक निमेष में उसे देशदेशांतर में पहुँचा देती हो. तुम भवसागर में जहाज हो, बस अधम को पार करो.

तुम इंद्र हो. श्वसुर-कुल के दोष देखने के लिए तुम्हारे सहस्त्र नेत्र हैं. स्वामी पर शासन करने को तुम वज्रपाणि हो. रहने का स्थान अमरावती है क्योंकि जहाँ तुम हो वहीं स्वर्ग है.

तुम चन्द्रमा हो. तुम्हारा हास्य कौमुदी है, उससे मन का अंधकार दूर होता है. तुम्हारा प्रेम अमृत है, जिसके प्रारब्ध में होता है वह इसी शरीर से स्वर्ग सुख अनुभव करता है और लोक में जो तुम व्यर्थ पराधीन कहलाती हो यही तुम्हारा कलंक है.

तुम वरूण हो क्योंकि इच्छा करते ही अश्रुजल से पृथ्वी आर्द्र कर सकती हो. तुम्हारे नेत्र जल की देखादेखी हम भी गल जाते हैं.

तुम सूर्य हो. तुम्हारे ऊपर आलोक का आवरण है पर भीतर अंधकार का वास है. हमें तुम्हारे एक घड़ी भर भी आँखों के आगे न रहने से दसों दिशा अंधकारमय मालूम होती है, पर जब माथे पर चढ़ जाती हो तब तो हम लोग उत्ताप के मारे मर जाते हैं. किम्बहुना देश छोड़कर भाग जाने की इच्छा होती है.

तुम वायु हो क्योंकि जगत की प्राण हो. तुम्हें छोड़कर कितनी देर जी सकते हैं? एक घड़ी भर तुम्हें देखे बिना प्राण तड़फड़ाने लगते हैं, जल में डूब जाने की इच्छा होती है, पर जब तुम प्रखर बहती हो, किस बाप की सामर्थ्य है कि तुम्हारे सामने खड़ा रहे.

तुम यम हो. यदि रात्रि को बाहर से आने में विलम्ब हो, तो तुम्हारी वक्तृता नरक है. यह यातना जिसे न सहनी पड़े वही पुण्यवान है, उसी की अनंत तपस्या है.

तुम अग्नि हो क्योंकि दिन रात्रि हमारी हड्डी-हड्डी जलाया करती हो.

तुम विष्णु हो. तुम्हारी नथ तुम्हारा सुदर्शन चक्र है. उसके भय से पुरुष-असुर माथा मुड़ाकर तटस्थ हो जाते हैं. एक मन से तुम्हारी सेवा करे तो सशरीर बैकुण्ठ को प्राप्त कर सकता है.

तुम हुमा हो. तुम्हारे मुख से जो कुछ बाहर निकलता है वही हम लोगों का वेद है और किसी वेद को हम नहीं मानते. तुमको चार मुख हैं क्योंकि तुम बहुत बोलती हो. सृष्टिकर्ता प्रत्यक्ष ही हो. पुरुष के मनहंस पर चढ़ती हो. चारों वेद तुम्हारे हाथ में हैं, इससे तुमको प्रणाम है.

तुम शिव हो. सारे घर का कल्याण तुम्हारे अधीन है. भुजंग बेनी धारिणी हो. त्रिशूल तुम्हारे हाथ में है. क्रोध में तुम्हारे कंठ में विष है तो भी आशुतोष हो.

इस दिव्य स्तोत्र पाठ से तुम हम पर प्रसन्न होओ. समय पर भोजनादि दो. बालकों की रक्षा करो. भृकुटी-धनु के सन्धान से हमारा वध मत करो और हमारे जीवन को अपने कोष से कंटकमय मत बनाओ.

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रचनाकार – भारतेंदु हरिश्चंद्र (1850-1885) – आधुनिक हिन्दी साहित्य जगत् के पितृपुरुष के रूप में जाने जाते हैं.

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चित्र आकल्पन : सौजन्य - सृजन कैमरा क्लब, रतलाम.

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रचनाकार में महज कुछ  वर्षों के दौरान हजारों हजार रचनाएं प्रकाशित हुई हैं जिनमें कई एक तो पूरे कहानी संग्रह, कविता संग्रह, यात्रा संस्मरण, संपूर्ण उपन्यास इत्यादि भी शामिल हैं. दर्जनों ई-बुक भी प्रकाशित किए गए हैं, जिन्हें मुफ़्त में डाउनलोड कर पढ़ा जा सकता है. रचनाकार को प्रतिमाह लाखों पाठक पढ़ते हैं. रचनाकार के इस बढ़ते कदम में आप भी अपना अमूल्य सहयोग प्रदान कर सकते हैं. 

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औसतन एक ए-4 आकार के पृष्ठ को टाइप करने का खर्च 10 रुपए ($1/4) के करीब आता है. कोई रचना यदि आप इंटरनेट पर देखना चाहते हैं, और उसके लिए इस रूप में सहयोग करना चाहते हैं व राशि दान करना चाहते हैं तो कृपया रचनाकार को rachanakar@gmail.com पर लिखें. यदि आपके पास पेपाल (PAYPAL) का खाता है तो आप raviratlami@yahoo.com खाते पर किसी भी राशि का अनुदान दे सकते हैं. यदि आप चाहेंगे तो आपका नाम अनुदान कर्ता के रूप में इन्ही पृष्ठों में शामिल किया जा सकेगा.

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इंटरनेट पर ‘रचनाकार’ में प्रकाशनार्थ रचनाओं के लिए नियम निम्न हैं-

रचनाओं के लिए अप्रकाशित-अप्रसारित जैसा कोई बंधन नहीं है. बल्कि प्रिंट मीडिया में पूर्व प्रकाशित श्रेष्ठ रचनाओं को रचनाकार पर प्रकाशनार्थ भेजें तो उत्तम होगा. कृपया ध्यान दें - इंटरनेट एक विशाल किताब की तरह है. यहाँ कंटेंट डुप्लीकेशन का कोई विशेष अर्थ नहीं है. अतः इस बात का विशेष ध्यान रखें कि कृपया अपने ब्लॉग या इंटरनेट पर अन्यत्र प्रकाशित रचनाओं को रचनाकार में प्रकाशनार्थ नहीं भेजें.

रचनाएँ ईमेल के ज़रिए भेजें तो हमें सुविधा होगी. रचना भेजने के लिए ईमेल पता है:rachanakar@gmail.com . रचना हिन्दी के किसी भी फ़ॉन्ट या फ़ॉर्मेट में भेज सकते हैं. ईमेल के जरिए रचना भेजना संभव न हो तो डाक के निम्न पते पर भी रचनाएँ सीडी में राइट करवाकर भेजी जा सकती हैं.

डाक का पता- रचनाकार, द्वारा- रविशंकर श्रीवास्तव, 101, आदित्य एवेन्यू, एयरपोर्ट रोड, द्रोणांचल के सामने, भोपाल मप्र भारत

रचनाकार का प्रकाशन अवैतनिक, अव्यावसायिक, सर्वजन हिताय किया जा रहा है, अत: किसी भी प्रकार का मानदेय इत्यादि प्रदान करना संभव नहीं होगा.
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अपनी रचना इंटरनेट पर प्रकाशित करते-करवाते समय निम्न बातों का ध्यान रखें –

हिन्द युग्म में एक पोस्ट प्रकाशित हुई है - "किसी अन्य की रचना को अपना कहने का जोखिम ना लें, इंटरनेट आपकी चोरी पकड़ लेगा". इसी तारतम्य में देखा जा रहा है कि इंटरनेट पर लगभग मुफ़्त में (आमतौर पर ब्लॉगों में) छपाई की सुविधा हासिल हो जाने के बाद अचानक हर कोई अपनी रचना हर संभव तरीके से इंटरनेट पर हर कहीं लाने को तत्पर दीखता है. देखने में आया है कि इंटरनेट पर रचनाकार अपनी रचना रचनाकार में प्रकाशित करने भेज रहा है तो साथ साथ साहित्य शिल्पी, हिन्द युग्म, अनुभूति-अभिव्यक्ति, सृजन-गाथा, शब्दकार और ऐसे ही दर्जनों अन्य जाल-प्रकल्पों पर भी अपनी वही रचनाएं प्रकाशनार्थ भेज रहा है. कुछ अति उत्साही किस्म के लोग अपनी ब्लॉग रचनाओं को एक-दो नहीं, बल्कि तीन-तीन, चार-चार जगह पर छाप रहे हैं. परंतु इसका कोई अर्थ, कोई प्रयोजन है? शायद नहीं. दरअसल, ऐसा करके हम इंटरनेट पर और ज्यादा कचरा फैला रहे होते हैं. आप सभी सुधी रचनाकारों से आग्रह है कि इंटरनेट पर रचनाएँ प्रकाशित करते समय निम्न बातों का ध्यान रखें तो उत्तम होगा -

(1) 
यदि आपका अपना स्वयं का ब्लॉग है, तो उसमें पूर्व प्रकाशित रचनाओं को फिर से प्रकाशनार्थ न भेजें. इंटरनेट एक बड़े खुले किताब की तरह है. जिसमें सर्च कर किसी विशेष पृष्ठ पर आसानी से व तुरंत जाया जा सकता है. एक ही रचना को कई-कई पृष्ठों पर प्रकाशित करने का कोई अर्थ नहीं है. इंटरनेट पर अप्रकाशित (प्रिंट मीडिया में पूर्व प्रकाशित का तो स्वागत है) रचनाओं को ही इंटरनेटीय पत्रिकाओं को प्रकाशनार्थ भेजें. रचना एक ही इंटरनेट पत्रिका को भेजें. एक पत्रिका में प्रकाशित रचना को, अपवादों को छोड़कर, अन्य दूसरी पत्रिका में प्रकाशित न करवाएँ. आमतौर पर रचनाएँ जल्द ही प्रकाशित हो जाती हैं क्योंकि इंटरनेटी पत्रिकाओं में पृष्ठ सीमा इत्यादि का बंधन नहीं होता. आपको ईमेल से त्वरित सूचना भी प्राप्त हो जाती है. रचना के प्रकाशन के उपरांत आप चाहें तो अपने ब्लॉग में संक्षिप्त विवरण देकर उसका लिंक लगा सकते हैं.

(2) 
यह अवधारणा गलत है कि जितनी ज्यादा जगह में एक रचना प्रकाशित होगी उतना ज्यादा लोग पढ़ेंगे. 5-10 प्रतिशत शुरूआती हिट्स भले ही ज्यादा मिल जाएं, परंतु अंतत: लंबे समय में खोजबीन कर बारंबार पठन पाठन में वही रचना प्रयोग में आएगी जिसमें स्तरीय, सारगर्भित सामग्री होगी. लोगबाग खुद ही ब्लॉगवाणी पसंद जैसे पुस्त-चिह्न औजारों (भविष्य में ऐसे दर्जनों औजारों के आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता) का प्रयोग आपकी रचना को लोकप्रिय बनाने में करेंगे. अत: रचना इंटरनेट पर एक ही स्थल में प्रकाशित करें. यदि आपका अपना स्वयं का ब्लॉग या जाल-स्थल है तो आपकी रचना के लिए इंटरनेट पर इससे बेहतर और कोई दूसरा स्थल नहीं. यदि आप अपना स्वयं का डोमेन लेकर रचनाएँ प्रकाशित कर रहे हैं तब भी यह अनुशंसित है कि वर्डप्रेस या ब्लॉगर जैसे सदा सर्वदा के लिए मुफ़्त उपलब्ध प्रकल्पों के जरिए अपनी रचना प्रकाशित करें, व डोमेन पते से रीडायरेक्ट करें. कल को हो सकता है कि आप डोमेन का नवीनीकरण करवाना भूल जाएं, या फिर कोई पचास साल बाद आपके वारिसों को आपका डोमेन फालतू खर्च वाला लगने लगे.

(3) 
रचना ईमेल से भेजने के पश्चात् एक सप्ताह का समय दें. आमतौर पर इतने समय में इंटरनेटी पत्रिकाओं से प्रकाशन बाबत सूचना रचनाकारों तक पहुँच जाती है. उसके पश्चात् ही रचनाएं दोबारा भेजें. यदि संभव हो तो रचना दोबारा भेजने से पहले पूछ-ताछ कर लें, ताकि बार बार बड़ी फाइलों को अपलोड-डाउनलोड करने से बचा जा सके. आमतौर पर अच्छी प्रकाशन योग्य रचना को त्वरित ही प्रकाशित कर दिया जाता है. यदि रचना स्मरण दिलाने के बाद भी प्रकाशित नहीं होती हो तो कृपया अन्यथा न लें, क्योंकि बहुधा फरमा में नहीं बैठ पाने के कारण रचना प्रकाशित नहीं हो पाती. साथ ही हर रचना के बारे में प्रत्युत्तर की आशा न रखें. आधुनिक इंटरनेटी युग में सबसे कीमती वस्तु है समय. समयाभाव और साधनाभाव में बहुधा प्रत्येक को प्रत्युत्तर दे पाना संभव नहीं होता. अतः कृपया कृपा बनाए रखें. धैर्य भी.

(4)
इंटरनेटी पत्रिका का स्वरूप, उसका तयशुदा फरमा, सामग्री इत्यादि को एक बार देख लेने के उपरांत ही अपनी रचनाएँ भेजें. इंटरनेट का प्रचार प्रसार चहुँओर फैलने से सामग्री की स्तरीयता में तेजी से कमी की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. साथ ही, आमतौर पर इंटरनेट के साहित्यिक प्रकल्प रचनाकार जैसे स्थल राजनीतिक आलेख व टिप्पणियाँ प्रकाशित नहीं करते हैं, अत: इन्हें प्रकाशनार्थ न भेजें. इस तरह की तमाम सामग्री आप अपने ब्लॉग में बेधड़क प्रकाशित कर सकते हैं. यदि आपका ब्लॉग नहीं है तो, यकीन मानिए, ब्लॉग बनाना और उसमें लिखना बेहद आसान है. बाजू पट्टी में दी गई कड़ियों से और जानकारी प्राप्त करें.

(5)
इंटरनेटी पत्रिकाओं के संपादकों से आग्रह है कि रचना के प्रकाशन से पूर्व वे रचना की कोई शुरूआती पंक्ति गूगल सर्च में डालकर देख लें कि वह कहीं पूर्व प्रकाशित तो नहीं है. यदि रचना पूर्व प्रकाशित है तो रचयिता को सूचित करें, और अपवाद स्वरूप कुछ विशिष्ट रचनाओं को छोड़ कर आमतौर पर इंटरनेट पर पूर्व प्रकाशित रचना को फिर से प्रकाशित न करें. पहले जब यूनिकोड प्रचलित नहीं था, तब एक ही रचना के शुषा, कृतिदेव, अर्जुन इत्यादि फोंटों में अलग अगल स्थलों पर प्रकाशित होने की बात तो ठीक थी, परंतु अब इसकी न तो जरूरत है, न ही प्रयोजन.

(6) 
यदि आप पुराने फ़ॉन्टों में लिख रहे हैं, तो इंटरनेट पर बहुत ही खूबसूरत ऑनलाइन फ़ॉन्ट कन्वर्टर यहाँ पर उपलब्ध है. उसमें अपनी रचना यूनिकोड में परिवर्तित करें, फिर गूगल डॉक में (यदि खाता नहीं है तो एक खाता खोल लें) हिन्दी वर्तनी की जांच (हालांकि यह उतना उन्नत नहीं है, मगर काम लायक तो है ही) कर लें. इस तरह से वर्तनी की जाँच कर ली गई, यूनिकोड में परिवर्तित रचना को प्रकाशनार्थ भेजें तो निश्चित तौर पर ऑनलाइन पत्रिकाओं के संपादक आपके अनुग्रही रहेंगे.

(7)

रचना भेजने से पहले कृपया वर्तनी, टाइपिंग की त्रुटि आदि भली भांति जांच लें. टाइपिंग की अत्यधिक त्रुटियों वाली रचनाओं को प्रकाशित करना संभव नहीं है.

(8)
कविता / ग़ज़ल स्तम्भ के लिए कृपया न्यूनतम 10 रचनाएँ एक साथ भेजें.

शुभकामनाओं के साथ,

आपका,
रवि रतलामी
(रविशंकर श्रीवास्तव)


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कहानी : मंगलसूत्र

- रामनारायण मिश्र

चिलचिलाती गर्मी के सन्नाटे ने एक रहस्यमयी उदासी की मानिन्द पूरे वातावरण को घेर रखा था. विचित्र सी उखड़ी-उखड़ी तनहाई... आसमान में बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े... हवा न चलने के तारण कहीं-कहीं स्थिर से चुपचाप पड़े थे. सूरज अत्यंत तेजी से चमक रहा था, ऐसा लग रहा था मानों आकाश मार्ग का यह जलता अग्नियात्री अत्यंत उग्र हो उठा हो. इस भयानक दहकते मौसम की गर्मी से दीपक के शरीर का प्रत्येक अंग झुलस-सा रहा था. उसे यह अहसास हो रहा था... इस झुलसती गर्मी से न सही, पर विषम परिस्थितियों से उत्पन्न खिन्नता से उसकी पत्नी व दो बच्चे अवश्य ही ग्रसित थे. ... दो साल से वह एक अर्ध-सरकारी प्रतिष्ठान में सुपरवाइजर के पद पर अस्थाई रूप से नौकरी कर रहा था. यह नौकरी उसे एक सिफारिसी-पत्र के आधार पर मिली थी. जिस समय वह इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कोर्स कर रहा था तभी उसके पिता ने उसका विवाह करवा दिया था, क्योंकि दीपक की मां की मृत्यु के पश्चात् कोई स्त्री घर में नहीं थी जो घर को संभाल लेती... परन्तु ट्रेनिंग पूरी होते-होते ही उसके पिता भी चल बसे थे. ... दो बच्चे और पत्नी, उसका परिवार... समस्याओं की दरिया में बहता डूबता दीपक लगातार प्रयासरत रहने पर भी उसकी नौकरी स्थाई नहीं हो पा रही थी. उसे लग रहा था कि संस्था के प्रबंधक की कार्यवाहियाँ कतई उसके विरोध में है. उसकी शर्तें न मारती है, न जिलाने के प्रति ही आश्वस्त करती है. बहुत चुपके से व्यवस्था उसका गला धीरे-धीरे लेत रही है और वह निरीह मुँह बाये पशु की मानिन्द चुपचाप अपनी हत्या होते देख रहा है. लगातार दो साल से वह मात्र आधे वेतन पर गुजर-बसर कर रहा था. जब एक सिफारिशी चिट्ठी लेकर प्रतिष्ठान के मैनेजर के पास पहुँचा था, तो मैनेजर साहब एक चालबाज बुद्धिजीवी की भांति सिर से पैर तक उसे देखते हुए बोले थे- “…देखिए, आज राज या मिस्री भले ही न मिल पाएँ, उन्हें ढूंढना पड़ सकता है, परन्तु .... ये डिग्री, सार्टिफिकेट वाले मारे मारे फिर रहे हैं. इनको नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं. ...बहुत बड़ी तादाद में आज हमारे देश में ये डिग्रीधारी बगल में डिग्रियाँ व सर्टिफिकेट दबाए नौकरी की तलाश में फिर रहे हैं, पर उन्हें नहीं मिल पाती नौकरी...”

बेकारी, बेरोजगारी ने उसे अच्छी तरह समझा दिया था कि डिग्रियाँ, सर्टिफिकेट्स, बिना नौकरी रे दो कौड़ी के बराबर भी नहीं होते... वह हारा-सा चुप खड़ा रहा था. मैनेजर साहब उसके चेहरे की दीनता से द्रवित होकर बोले थे – “आप फिक्र मत कीजिए. मैं व्यवस्था कर लूंगा. स्थाई होने का इन्टरव्यू तो केवल दिखावा है... बस डोनेशन के तौर पर दस हजार रुपए तो देने ही होंगे... आपको...”

उसके पैर तले की जमीन खिसकती मालूम हुई थी. दस हजार? दस हजार की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी और दो साल से लगातार मैनेजर की जेब में उसका आधा वेतन बड़ी आसानी से चला जाता रहा था. हर माह की तरह मैनेजर ने इस माह भी दीपक को अपने केबिन में बुला भेजा... होठों पर मुस्कुराहट बिखेरते हुए बड़े ही शांत लहजे में उन्होंने दीपक को सामने की कुर्सी पर बैठाते हुए अपनी मेज की दराज से एक रजिस्टर निकाल लिया और कुछ नोट उसे सौंपते हुए सहजता से बोलने लगे “यह लो भई अपना वेतन – और इस पर अपने हस्ताक्षर कर दो...”

दीपक ने इस बार फिर देखा – रजिस्टर पर दर्ज रकम उसके हाथ की रकम से दुगुनी है. उसे लगा वह किसी सामन्ती युग में जी रहा है.... उसने अब तक सोचा था कि चलो आधे वेतन में सही, स्थाई होने के लिए ग्राउन्ड तो बन रहा है. वैसे मैनेजर साहब अभी तक यही कोशिश करते रहे हैं कि कोई अस्थाई कर्मचारी स्थाई न होने पाए. वे आलाअधिकारियों को समझाते रहे हैं “काम तो चल ही रहा है – बेमतलब “फुल-पे-स्केल” देने से क्या फायदा...? प्रतिष्ठान की आर्थिक स्थिति वैसे ही खराब है...” आलाअधिकारियों को इतनी फुर्सत नहीं थी कि वे स्थाई-अस्थाई के झमेले में पड़ते. परंतु वह मैनेजर द्वारा निर्धारित ‘डोनेशन’ की राशि वह कहाँ से जुटाता?

दीपक को सोच-विचार में मग्न देख मैनेजर साहब बोले, “मुझे जो तजुर्बा है, तुम्हें नहीं है... समझो बात को... जो मिल रहा है उसे प्रभु का प्रसाद समझ कर ग्रहण करो. बोलो नहीं. नहीं तो यह अस्थाई नौकरी भी जाती रहेगी. यह समझ लो बस... समझदार को क्या कहते हैं... – इशारा ही बहुत है...” इतना कह कर मैनेजर शान्त हो गया, पर चश्मे के अन्दर से चमकती उसकी मोटी-मोटी आँखें दीपक के चेहरे को घूरती रहीं...

दीपक के चेहरे की उभरती नसों से बन्धी डोरियों से परेशानी की कितनी ही प्रतिक्रियाएँ बन्धी सी लगने लगी... उसके चेहरे का उड़ा हुआ रंग, बदहवासी, क्रोध तथा याचना की मिली-जुली भावनाएँ... और अन्त में परिस्थिति से लाचार समर्पण. कहीं ये टेम्परेरी जॉब भी हाथ से चला गया तो क्या होगा. बच्चे?पत्नी?... उसी समय मैनेजर ने धीरे से पेन खोलकर दीपक की तरफ बढ़ाते हुए मानो अपनी सारी दिरयादिली उंडेल दी – “यस, यस मिस्टर दीपक डोन्ट बी होपलेस... भई अभी तो बहुत कुछ करना है.... जॉब परमानेन्ट हो जाए, फिर लाइफ सेटल्ड हो जाएगी. देखो इस जॉब के लिए मैंने ही तुम्हारे लिए कोशिश की है. यह समझ लो सेक्रेटरी साहब के रिश्तेदार को मैने ही टाल दिया. और इसी वजह से वो मेरे से नाराज भी हो गए... पर क्या करें? सहयोग तो तुम्हें ही करना था मुझे... फिर जॉब परमानेंट करने के लिए भी ग्राउन्ड बना रहा हूँ... बस डोनेशन का प्रबन्ध तुम... यस, यस राइट, फिल द फुल अमाउन्ट हियर एण्ड साइन हियर... परमानेन्ट होते ही फुल पे तो लेना ही है आपको.”

दीपक ने बुझे मन से मैनेजर के निर्देश का पालन किया. उधर मैनेजर ने दराज में रखे बाकी नोटों को अपनी जेब के हवाले किया और कहा- “देखो, अब तुम परमानेंट होने के लिए प्रबन्ध कर ही लो. ऊपर पैसा देना पड़ेगा तभी स्थाई हो सकेंगे आप... मेरा सहयोग तो पूरा है ही आपको ... इसलिए चिन्ता की कोई बात नहीं. ऊपर वाले सब अपनी सुनते हैं, पर पैसे पर बात अटक जाती है आकर... हा... हा... हा... ”

मैनेजर के फूले हुए जेब में अपने परिश्रम की कमाई को निरीह भाव से देखता हुआ दीपक बाहर आ गया.

वह इस प्रकार बेजान-सा हो रहा था मानों कोई जबरदस्त लुटेरा किसी बेबस इन्सान का पिस्तौल की नोक पर सब कुछ लूट कर उसे आतंकित करके छोड़ देता है... उसे अब फिक्र सताने लगी परमानेन्ट होने की. वह इतनी बड़ी रकम कहां से लाएगा? उसे अपनी आँखों में जलन और सिर में चक्कर का अहसास हुआ और वह वहीं मैदान पर बिछी बेन्च पर सिर पकड़ कर बैठ गया.

उसने अपना घर पहले ही पढ़ाई पूरी करने में तथा नौकरी की तलाश में गिरवी रख छोड़ा था. अब इतना पैसा फिर कहाँ से लाएगा? अरसे से पत्नी बीमार चल रही थी. वह नगर पालिका के अस्पताल में खैराती दवा से तो कभी वैद्य जी का चूर्ण गटक कर संतोष कर रही थी. दीपक यह सब देखता था, समझता था कि इस प्रकार इलाज कराना केवल मन को सांत्वना देना मात्र है.

इससे क्या होता है? पत्नी, पति तथा मासूम बच्चों के चलते अपनी असह्य पीड़ा को मानों पी जाती थी और कृत्रिम मुस्कुराहट के साथ पति की हिम्मत को बढ़ाने की कोशिश करती, ताकि उसका जॉब किसी तरह से स्थाई हो जाए, तो घर गृहस्थी को एक निश्चित दिशा मिल जाए... फिर आगे की तरक्की भी तो है... ये तंगी के दिन हैं, जो गुजर जाएंगे... फिर उनका परिवार निश्चय ही सुख और संतोष के दिन गुजार सकेगा. वह इ, तरह से विचार करते-करते आँगन में बिछी चारपाई पर जा पहुँचती और अपनी पीड़ा को दबाने का प्रयास करती.

परमानेंट जॉब के लिए मैनेजर की मांग, घर की टूटती आर्थिक स्थित, पत्नी का गिरता स्वास्थ्य... कम रौशनी में कमरे का माहौल बदलीग्रस्त दिख रहा था और उसकी पत्नी का चेहरा ग्रहण-ग्रस्त चाँद की मानिन्द. दीपक को लगा कि जैसे वह युवा होने से पहले ही बुढ़ा गया है.... टूटने लगा है... बुजुर्गों की तरह सोचने लगा है. उसने महसूस किया कि स्थाई नौकरी उसके लिए अलभ्य वस्तु थी, जो उसके पहुँच के बाहर थी.

अचानक दीपक को पत्नी का मंगल सूत्र और उसके हाथों के कंगन अंधेरे में कुछ ज्यादा ही चमकते दिखाई दिए. उसके जेहन में बिजली कौंधी. पर क्या पत्नी उसे मंगल सूत्र दे पाएगी? वह पत्नी से अपनी बात कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. उसे लगा मानों वह वर्षों से थका हुआ है और उसके मुंह से बोल भी नहीं फूट रहे हैं…

चारपाई पर लेटी पत्नी से जाने कब और कैसे वह जेवरों की मांग कर बैठा... उसे अपने ऊपर ही आश्चर्य हुआ था. पत्नी ने अपने हाथों के सोने के कंगन तो उसे दे दिए, परंतु मंगल-सूत्र सौंपते-सौंपते उसकी निस्तेज होती जा रही आँखों को वह सहन नहीं कर पाया. पत्नी की आंखों में असहायता, विवशता की स्पष्ट झलक महसूस करता वह मानों संज्ञाशून्य सा हो उठा था.... आखिर क्यों न इन से प्राप्त पैसों से वह पत्नी का उपयुक्त इलाज करवा दे, जिससे वह पीड़ा मुक्त तो हो सके. मंगलसूत्र सौंपते समय पत्नी इस तरह घबरा उठी थी जैसे उसकी इज्जत उतरी जा रही हो... वह फटी-फटी मुर्दे-की-सी आँखों से पति का मुंह ताकती रह गई थी.

बेचैनी तथा बदहवासी की सी स्थिति में उसने पत्नी से अप्रत्याशित प्रश्न किया था – “कितने तोले के होंगे” रुन्धे गले से कांपती-क्षीण-सी आवाज में पत्नी बड़ी देर में कह पाई थी- “छह-सात तोले के होंगे सब मिलाकर...”

इसके बाद दोनों के बीच संवाद खत्म से हो गए थे और दीपक चारपाई पर एक तरफ लुढ़क कर लेट गया था. बगल की खाट पर बीमार पत्नी कराहती पड़ी रही. दीपक जैसे अनिर्णय की स्थिति में फंस गया था कि क्या करना चाहिए, उसे अपने प्रतिष्ठान का चपरासी पन्नालाल अपने से कहीं बेहतर लग रहा था जो वर्षों से एक स्थाई नौकरी कर रहा था...उसने पन्नालाल से पत्नी की दवाई लाने के लिए एक-दो बार कुछ रुपए उधार भी लिए थे. एकाएक वह उठा और अपने सर्टिफिकेट और डिग्रियों के कागज़ात निकाले. उन्हें बार-बार देखते-सहेजते उसे गर्व हुआ – हाईस्कूल फर्स्ट डिवीजन, इन्टर फर्स्ट डिवीजन, बीए ऑनर्स, इंजीनियरिंग डिप्लोमा. उसे कुछ तसल्ली सी हुई कि अब वह मंगलसूत्र और कंगन के रुपयों से परमानेंट तो हो ही जाएगा, फिर तो आर्थिक स्थिति संभल ही जाएगी.

वह उठा और दीवार पर लगे छोटे से आइने में अपना चेहरा निहारने लगा. उसे लगा वह असमय बूढ़ा हो चला है... गालों में उभरी झुर्रियाँ, कनपटी पर सफेद बाल, बढ़ी हुई खिचड़ी दाढ़ी... ये सब गरीबी की सुपरिचित परिभाषा उसके चेहरे पर लिख रहे थे. उसे लगा कि उसका अपना व्यक्तित्व कहीं खो सा गया है और जो आइने में है वह कोई अजनबी है- अपरिचित है. वह घबरा कर वापस अपनी चारपाई पर पसर गया और करवटें बदलता रहा.

कंगन और मंगलसूत्र – रुपयों में रूपांतरित होकर चढ़ावे के रूप में मैनेजर के पास पंहुच चुके थे. नोटों की गड्डियाँ देख मैनेजर साहब मुस्कुरा कर चहक उठे थे. “दीपक, अब आगे मैं संभाल लूंगा... एक इंटरव्यू होगा... पर बस समझ लीजिए कि औपचारिकताएँ तो पूरी करनी पड़ती हैं... बस इसे डोनेशन ही समझिए... मेरा सहयोग आपके साथ हमेशा रहेगा... कल ही इंटरव्यू करवाए देता हूँ.”

मैनेजर के चेहरे से दीपक को नफरत हो गई और उसने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया. उसके मन में आया कि वह चिल्ला कर कह उठे- “साले बेईमान, घूसखोर, मक्कार, चरित्रहीन...” लेकिन उसने अपने अंदर जन्मी गालियों का गला घोंट दिया. पसीना-पसीना होते हुए वह केबिन से बाहर आ गया. परमानेंट होने का सुख, उसे लगा कि कभी नहीं मिल सकता.

स्थाई नियुक्ति पत्र मिलने पर दीपक को एक अरसे बाद अपने अन्दर पहली बार खुशी की लहर महसूस हुई. उसे इस समय कुछ रूपयों की आवश्यकता महसूस हुई. वह अपनी खुशी को बांटना चाहता था. कई दोस्तों से पहले ही इतने कर्ज वह ले चुका था कि कुछ मांगने का मुँह ही नहीं रह गया था उसका. अन्ततः उसे पन्नालाल याद आया. ऑफिस की छुट्टी होते ही वह पन्नालाल के पास पहुँचा और मिन्नत से उधार मांगा. उसे लगा कि कहीं पन्नालाल इनकार न कर दे. पन्नालाल से वह बोला- “दादा, कुछ रुपए मुझे अभी चाहिए... देखो अब मेरी नौकरी परमानेंट हो गई है, आपका उधार इसी वेतन पर चुका दूंगा.”

पन्नालाल भले ही अनपढ़ था, पर हृदयहीन नहीं था. उसे दीपक की आवाज में सच्चाई और आवश्यकता का प्रतिबिम्ब दिखाई दिया. वह बोला – “भइया, जब पिरमानेन्ट हो गए हो तो पइसा लौटा ही दोगे. लो अपना काम पूरा करो. समय सबके साथ ऊंच नीच करता है.”

दीपक उधार रुपयों को लेकर बछड़े की भांति कुलांचे मारता हुआ सुनार की दुकान पर पहुँचा और पत्नी के लिए एक छोटा-सा मंगलसूत्र खरीदा. मंगलसूत्र, जिसे देते वक्त उसकी पत्नी कातर-सी हो गई थी. अपने परमानेंट होने की खबर वह इस मंगलसूत्र को पहनाते हुए उसे देगा.

वह देर से घर पहुँचा तो उसने देखा कि उसके घर के बाहर कुछ लोग खड़े थे. सब चुपचाप थे. उसने प्रश्नवाचक नजरों से चारों ओर निगाह डाली. माहौल में सन्नाटा था. वह विद्युत गति से घर के भीतर पहुंचा. देखा कि उसकी पत्नी चारपाई पर स्पंदन हीन पड़ी थी. उसकी दोनों फटी हुई खुली आँखें मानों असह्य पीड़ा को सहते-सहते मुक्ति याचना कर रही थीं... पीड़ा की अन्तिम सीमा को पार करती उसकी आँखें मौन-मूक न जाने क्या तलाश कर रही थीं...

दीपक से यह सब नहीं देखा गया. वह एक हृदयविदारक चीत्कार के साथ मृत पत्नी के ऊपर गिर पड़ा. जिस संबल, आलम्बन के सहारे उसकी जीवन लतिका फैल रही थी, वही आलम्बन आज एकाएक धूल-धूसरित हो उठा था. उसके द्वारा लाया गया मंगलसूत्र उसके हाथ से छूटकर चिरनिद्रा में निमग्न उसकी पत्नी की गोद में जा पड़ा था...

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रचनाकार – रामनारायण मिश्र हिन्दी के जाने माने कथाकार, उपन्यासकार और कवि हैं. आपके अनेकों कथा संग्रह, कविता संग्रह तथा उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. हिन्दी के कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों-सम्मानों से नवाज़े जा चुके हैं.

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चित्र- दीपक चव्हाण, सौजन्य - सृजन कैमरा क्लब, रतलाम



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आत्म-कथ्य : हृदयेश ने हड्डियाँ निकलवा दी हैं, चोट नहीं लगती.
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-हृदयेश

हृदयेश ग्यारह बजे के आसपास बाहर आ गए थे, सड़क पर, डाक की प्रतीक्षा में. ऐसा वह रोज करते थे. इस आदत की लत से आदत लत की होती है- वह कभी-कभी अवकाश के दिन भी सड़क पर आ जाते थे. किन्तु फिर ध्यान आ जाने पर कि अरे, आज तो डाक बंटना नहीं है, वह अपनी बेवकूफ़ी पर हंसते, लज्जाते, अकसर झुंझलाते भी हुए हट आते थे. डाक उनको बहुत-कुछ साहित्य की अपनी दुनिया के करीब लाती थी, उससे उन्हें जोड़ती थी. पिछले तीन दिन से कोई डाक आई नहीं थी. प्रतीक्षा इसलिए भूखी थी.

पोस्टमैन आ गया था. उनकी डाक भी थी उनके पास.

वह डाक लेकर अन्दर आ गए.

डाक में एक पत्रिका थी, मोड़े मुखड़े और दुर्बल काया वाली. उन्होंने उसे एक ओर डाल
दिया. एक कार्ड था. किसी अपरिचित पत्रिका के संपादक ने रचनात्मक सहयोग के रूप में
कहानी की मांग की थी. पत्र इसी आशय का किसी नामचीन पत्रिका से भी आया होता तब भी वह
उससे नहीं जुड़ते. जो उन्होंने तय कर रखा था कि अब उनको उपन्यास ही लिखना है, उस पर
वह अडिग थे. कहानी या अन्य कुछ लिखने का मतलब होगा कि उपन्यास के प्रति अपनी चाहत
या प्यास को कम कर देना. कुछ छोटा थाम लेना बड़े लक्ष्य की प्राप्ति से विचलित हो
जाना क्या नहीं है? साहित्य और कला में पैशन यानी जुनून ही कुछ अति महत्वपूर्ण करा
लेता है.

एक लिफ़ाफ़ा था. उसमें रायल्टी का स्टेटमेण्ट था. साथ ही यह सूचना कि विगत वित्तीय वर्ष में विक्रित पाँच पुस्तकों की देय रायल्टी राशि 35 रुपये धनादेश द्वारा भेजी जा रही है. सात-आठ वर्ष पूर्व इस प्रकाशक ने उनका एक कहानी-संग्रह साया किया था. दो-तीन वर्षों से प्रकाशक बस एक दिन की साग-सब्जी लायक रायल्टी एक बार आ जाती थी. दहाई के अंकों में सिकुड़ जाने वाले रुपयों को राशि बताना ‘राशि’ की सरासर फजीहत करना है.

एक पत्र और भी था, अंतर्देशीय. बाहर प्रेषक का नाम नहीं था. अन्दर जो नाम था उसने
एकदम उत्कंठा जगा दी. जगा नहीं दी, भड़का दी. एक मुद्दत से वह चेतन वसिष्ठ नामक इस
व्यक्ति के पत्र की बाट जोह रहे थे. पूरा पत्र पढ़ डाला. पत्र में जो अनुकूल सूचना
होनी चाहिए थी, जिसकी उनको विश्वासगर्भित आशा थी, वह न होकर प्रतिकूल सूचना थी.
सूचना प्रतिकूल थी, इसीलिए उसे कारणों के बेलन से फैलाया गया था. फैलाना प्रतिकूलता
को नरम करना होता है.

सात-आठ माह पहले तीसरे पहर घंटी की आवाज से खिंचे हुए जब वह दरवाजे पर पँहुचे थे, तीस-पैंतीस वर्ष के एक व्यक्ति को उन्होंने मुस्कुराहट की रेशमी चमक के साथ उपस्थित पाया था. उस व्यक्ति के गोल साँवले चेहरे पर ठुड्डी तक सीमित दाढ़ी थी, व्यक्तित्व को पैनापन देती हुई. वह जींस के साथ रंगीन खादी का अधबांहा कुर्ता पहने था. कंधे पर शनील का झोला था. उसने यह पुष्टि कर कि वह इच्छित जन के ही सामने है उनको दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया था. वह चेतन वसिष्ठ नामक इस युवक को अन्दर ले आए थे.

चेतन वसिष्ठ दिल्ली का रहने वाला था. यों वह यू.टी.आई में सेवारत था, किन्तु उसे साहित्य में अच्छी खासी रुचि थी. उसने पत्रकारिता में डिप्लोमा कोर्स भी कर रखा था. उसका एक मित्र यहाँ जनरल इंश्योरेंस में ब्रांच मैनेजर था. मित्र एक सड़क दुर्घटना में घायल हो गया था. उसकी पत्नी भी थी. वह उन दोनों को देखने आया था. हाथ और पसलियों में जो फ्रैक्चर हुआ था, वह गंभीर किस्म का नहीं था. पंकज को जब पता चला कि वह शाहजहाँपुर जा रहा है तो बोले कि वह हृदयेश जी से जरूर मिलकर आए. अवसर का भी सदुपयोग होता है और वह सदुपयोग इस अवसर का भी होना चाहिए. वह हृदयेश जी का साक्षात्कार लेकर आए.

वसिष्ठ से लगभग दो माह पूर्व एक अन्य व्यक्ति उनका साक्षात्कार लेने विराजा था. वह अन्य व्यक्ति हलद्वानी का था और यहाँ अपने एक निकट संबंधी की बेटी की शादी में शिरकत करने आया था. हलद्वानी से निकल रही साहित्यिक पत्रिका ‘आधारशिला’ के लिए उसके उनका साक्षात्कार चाहिए था. वह व्यक्ति पी.टी. अध्यापक था और गीत, ग़ज़ल लिखता था. पत्रिका के संपादक भट्ट जी के साथ उसका उठना बैठना था. भट्ट जी ने उससे साक्षात्कार लेने के वास्ते कहा था.

उन्होंने उस व्यक्ति से जानना चाहा कि उसने उनकी कौन-कौन सी पुस्तक पढ़ी है. जब
उसने उनकी एक भी पुस्तक न पढ़ने की बात स्वीकार की और कहा कि कुछ समय पहले उसने
भट्ट जी के यहाँ ‘कथादेश’ में कहानी के साथ उनका फोटो देखा था और यह कि उस कहानी की
बहुत प्रशंसा सुनकर उसने बाद में उसे पढ़ना चाहा था, पर पत्रिका किसी और के पास चली
जाने पर वह उसको मिल नहीं पायी थी, उन्होंने साक्षात्कार देने से क्षमा मांग ली थी,
‘आप मेरी रचना धर्मिता से अवगत होते तो मुझे भी उस पर बात करना अच्छा लगता.
निरर्थकता कोशिश करने पर भी सार्थकता बन नहीं पाती है. औपचारिकता से मुझे गुरेज़
है.’


नारायण बाबू ने पता लगने पर उनकी इस इन्कारी को सही नहीं ठहराया था. हाथ आया अवसर गंवा दिया.

‘यार, उसने मेरा लिखा एक भी शब्द नहीं पढ़ा था. एकदम खाली डिब्बा था.’ ‘मानता हूँ कि अपने को पूरा खाली डिब्बा न साबित करने के लिए वह चालू किस्म के ही सवाल करता कि आपने लिखना कब प्रारम्भ किया, लिखने की प्रेरणा आपको कहाँ से प्राप्त हुई, परिवार में वैसा वातावरण था या नहीं, नए लिखने वालों के लिए आपका क्या संदेश है? ये और इन जैसे दो-चार और सवाल. लेकिन इनके आप जो भी उत्तर देते, उन उत्तरों के बहाने आपका प्रचार तो होता ही. प्रचार की सार्थकता, भाई साहब, न जाने आप क्यों बिसार देते हैं?’

नारायण बाबू ने यह कहने के तुरन्त बाद पूछा था, ‘आपने उन महानुभाव को खाली डिब्बा पाकर सूखा ही टरका दिया था या चाय, नाश्ता से तरमातर कर विदा किया?’

‘सो आपकी भाभी जी ने मेरे बिना कहे ही सत्कार में मिठाई, नमकीन और चाय रख गयी थीं.’

‘लीजिए, खर्चा भी हुआ और उसका लाभ भी नहीं लिया. ज्यादा सिद्धांतवादिता, भाई साहब, ठीक नहीं है वैसे ही जैसे ज्यादा भोजन स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. आपको थोड़ा व्यवहारिक भी होना चाहिए.’ व्यवहारिक होने को जानदार बनाने के लिए उन्होंने ‘बी प्रेक्टिकल’ का टुकड़ा भी जड़ दिया था.

वह, यानी हृदयेश, चेतन वसिष्ठ को साक्षात्कार देने के लिए तैयार हो गए थे. एक तो इसलिए की चेतन ने उनकी सब तो नहीं, फिर भी कई पुस्तकें पढ़ रखी थीं, पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित दो-तीन ताजा कहानियाँ भी. दूसरे इसलिए भी कि नारायण बाबू की व्यवहारिकता वाली पिलायी गयी घुट्टी का असर अभी पूरी तरह उतरा नहीं था.

चेतन अपने साथ जेबी टेपरिकार्डर लाया था. उसने लगभग डेढ़ घंटे तक साक्षात्कार लिया था. उसके प्रश्न उनकी साहित्यिक यात्रा, ‘साहित्य के लामबंद संगठनों की जरूरतों तथा समय-समय पर किए जाने वाले विभिन्न आन्दोलनों की सकारात्मकता और नकारात्मकता के साथ-साथ आज के सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल, माफिया के वर्चस्व और बढ़ते बाजारवाद जैसे अनेक ज्वलंत बिन्दुओं पर उनके विचारों, उनकी सोच को लेकर भी थे.

टेपरिकार्डर का स्विच ऑफ करने के बाद बोला था, ‘पूछने को तो दिमाग में अभी कई और भी प्रश्न हैं, मगर आपको अब अधिक कष्ट दूंगा नहीं. जो पा लिया वह भी काफी महत्वपूर्ण है. इसके आलोक में आपके कृतित्व और व्यक्तित्व का मूल्यांकन सहजता से किया जा सकता है.’ यह भी कहा था कि पूरा साक्षात्कार तो किसी पत्रिका में ही दिया जाएगा, कुछ चुने हुए अंश वह किसी राष्ट्रीय दैनिक पत्र के रविवारीय अंक में भी देगा. ऐसा सब बताते हुए उसके चेहरे पर आश्वस्ति का भाव था.

वह अपने साथ कैमरा भी लाया था, जिससे उसने तीन-चार विभिन्न कोणों से फोटो भी खींचे थे.

हल्द्वानी वाले व्यक्ति ने साक्षात्कार की बात चलाते हुए कहा था कि उनके पास अपने फोटोग्राफ के कुछ फालतू प्रिन्ट्स होंगे. फोटो नया हो तो ज्यादा अच्छा रहेगा नहीं तो पुराने से भी काम चल जाएगा.

उन्होंने सब कुछ निपट जाने का बाद चेतन से इच्छा प्रकट की थी कि साक्षात्कार की पाण्डुलिपि कहीं प्रकाशन से पूर्व वह एक बार देखना चाहेंगे. टेपरिकार्डर के सामने उत्तर देते हुए कई स्थानों पर उन्हें लगता है कि उनका वाक्य विन्यास या तो गड़बड़ा गया है या वाक्य खंडित हो गए हैं. दो-एक प्रश्नों के उत्तर जिस तरह खुलना चाहिए था, वे भी उस तरह खुले नहीं हैं. स्पष्टता के लिए वह कुछ और जोड़ सकते हैं.

चेतन ने एक पखवाड़े के अन्दर लिपिबद्ध साक्षात्कार अवलोकनार्थ भेज दिया था. उसने
बाद में पढ़े गए उनके एक उपन्यास पर भी एक प्रश्न सम्मिलित किया था जिसका उत्तर भी
उन्होंने लिख दिया था. लिपिबद्ध रूप में साक्षात्कार दस पृष्ठों का हो गया था. इस
साक्षात्कार को उन्होंने अगले ही दिन अनुमोदित कर लौटा दिया था. उधर से यथाशीघ्र
लौटा देने का निवेदन था भी.

इसके बाद चेतन की ओर से एक लम्बी खामोशी रही थी. उन्होंने जो दो पत्र माह, डेढ़ माह के अन्तराल से डाले थे, वे भी इस खामोशी के शिकार हो गए थे.

अब चेतन का जो पत्र आया था उसमें साक्षात्कार प्रकाशित होने की सूचना के बजाय साक्षात्कार प्रकाशित न होने के पीछे की स्थितियों और कारणों से उनको अवगत कराया गया था. साक्षात्कार चेतन ने ‘जनसत्ता’ को तुरन्त दे दिया था. उसके बाद वह छह सप्ताह के लिए मुम्बई ट्रेनिंग के वास्ते चला गया था. मुम्बई से वह पंकज जी व ‘जनसत्ता’ के साहित्य संपादक से सम्पर्क बनाए रहा. मुम्बई से वापस आने पर साहित्य संपादक ने अपनी विवशता जाहिर कर दी कि साहित्यकारों के साक्षात्कारों को विराम दिया जा चुका है. अब दूसरे कला-अनुशासनों की चुनी हुई हस्तियों को पाठकों के सामने लाने की योजना है. चेतन ने तब साक्षात्कार ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ को दे दिया था. काफी समय तक वहां आश्वासन दिया जाता रहा कि वह शीघ्र ही प्रकाश में आएगा. उसके बाद बताया गया कि वह कहीं खो गया है. इस खो जाने की बात से चिढ़कर उसने साक्षात्कार में से कुछ अंश पुनः चुनकर ‘नवभारत टाइम्स’ को दे दिए थे. उस पत्र में साहित्य की डेस्क वाले व्यक्ति ने कुछ दिनों बाद यह सलाह दी कि हृदयेश हिन्दी कथा-साहित्य का एक सुपरिचित नाम है. उनके तथा पाठकों के साथ न्याय तभी होगा जब उनका पूरा साक्षात्कार प्रकाशित हो. पूरा साक्षात्कार किसी पत्रिका में ही स्थान पा सकता है. पंद्रह-बीस पंक्तियों का अंश निकालना निरी औपचारिकता ही होगी.

चेतन ने साक्षात्कार लेते समय दिल्ली से प्रकाशित होने वाले इन तीनों राष्ट्रीय दैनिक पत्रों के केवल नाम ही नहीं लिए थे, वहाँ कार्यरत पंकज जी, सलिल जी, मानव जी, नागर जी कई पत्रकारों से अपने घनिष्ठ संबंध होने की बात भी कही थी.

चेतन ने इस पत्र में फिर जिस अनियतकालीन पत्रिका में वह पूरा साक्षात्कार
प्रकाशनार्थ पड़ा हुआ है, उसका तज्किरा किया था. साथ में अनुरोध भी कि वह इस
पत्रिका को अपनी एक ताज़ा कहानी अवश्य भेज दें. पत्रिका के संपादक को यह शिकायत है
कि कई बार मांगने पर भी हृदयेश जी ने अपनी कोई कहानी अभी तक उनको नहीं दी है. उस
अनुरोध के साथ इस अनुरोध का भी पुछल्ला जोड़ा गया था, जो अनुरोध से अधिक सलाह थी,
कि कहानी भेजते हुए वह सम्पादक जी को यह लिख दें ज्यादा सही स्थिति यह होगी कि
साक्षात्कार और कहानी पत्रिका में एक साथ स्थान पाएँ.

उन्होंने पत्र को गुड़ी-मुड़ी किया. संपादक ने साक्षात्कार छापने के लिए कहानी दी जाने की शर्त लगाई है. बल्कि माना जाए कि साक्षात्कार वाला काम तभी होगा जब कहानी की घूस दी जाएगी. उनको इस तरह घुटने टेकना कभी स्वीकार नहीं है. उन्होंने फिर गुड़ीमुड़ी किया वह पत्र फाड़ डाला.

सन् 1998 में भगवान सिंह शाहजहाँपुर आए थे. वह सुप्रसिद्ध इतिहासकार के साथ-साथ उपन्यासकार और आलोचक भी हैं. उनके छोटे भाई इस शहर में नहर विभाग में अधिशासी अभियन्ता थे, जिनके पास कैन्टुनमेंट क्षेत्र में अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ कई एकड़ में विस्तृत सरकारी बँगला था, ऐसा बँगला जिसमें आम, जामुन, बेल जैसे फलों के पचासों दरख्त थे और साग-सब्जी व अनाज उगाने के लिए पर्याप्त खाली जमीन भी. ऐसे बंगलों में फूल और फूल की बिरादरी में आदर पाने वाले रंग-बिरंगे पौधों के लिए जैसी सुव्यवस्था रहती है, वह वहाँ थी ही. भगवान सिंह को दिल्ली के मुकाबले में, जहाँ वह रहते थे, यह जगह अपने सर्जनात्मक लेखन के लिए आदर्श लगी थी- शोर शराबे, धुआँ-धूल, जुलूस-धरना जैसे कुछ नहीं. दिल्ली में वह अपने नए उपन्यास ‘उन्माद’ को आधा-पौना लिख चुके थे. शेष भाग को लिखने के लिए वह शाहजहाँपुर में ही रुक गए.

भगवान सिंह की भिजवायी सूचना पाकर कि वह अब उनके ही शहर में हैं, हृदयेश मिलने गए
थे. फिर यह जाना सात-आठ दिन के अंतराल से होने लगा था. अंतराल लंबा खिंच जाने पर
भगवान सिंह का फोन आ जाता था कि स्वास्थ्य तो ठीक है? अधिक व्यस्तता है क्या? बँगला
दूर था, श्रद्धा पगी आत्मीयता रखने वाला मित्र चन्द्रमोहन दिनेश वाहन की व्यवस्था
कर देता था और वह पहुँच जाते थे.

भगवान सिंह से उनका परिचय सन् 1993 में हुआ था, शाहजहाँपुर में ही. उनको ‘पहल सम्मान’ देने वाले आयोजन में वह भी सम्मिलित हुए थे और दिल्ली वापस होने से पहले सात-आठ घंटे उनके निवास स्थान पर ही ठहरे थे. वह भगवान सिंह की बेबाकी, स्पष्टवादिता और अपने लेखकीय दायित्व के प्रति उनकी ईमानदारी से प्रभावित थे. वह सम्मान देने वाले सत्र में अध्यक्ष मंडल के एक सदस्य के रूप में मंच पर बैठे थे, किन्तु अन्य सदस्यों की भांति उन्होंने कोई वक्तव्य नहीं दिया था. बाद में सफाई देते हुए बताया था कि वह उनके तब तक प्रकाशित उपन्यासों से प्रभावित नहीं हैं और वह उस औपचारिक प्रशंसा, जो मंच से ऐसे अवसरों पर बढ़ा-चढ़ाकर की जाती है, उससे करने से बचते हैं. उन्होंने यह भी कहा था कि उनके मित्र आयकर अधिकारी विनोद कुमार श्रीवास्तव ने, जो उनके लेखकीय व्यक्तित्व का आदर करते हैं, उन पर उस सम्मान आयोजन में भाग लेने का दबाव बनाया था. इसके साथ वह गोपनीय सूचना भी दी थी कि उस वर्ष के सम्मान की दौड़ में काशीनाथ सिंह भी शामिल थे, किन्तु जूरी के सदस्यों ने बहुमत से उनके नाम की संस्तुति की थी.

भगवान सिंह बंगले पर उनका सोत्साह मेवा, मिठाई और चाय से स्वागत करते थे. आम की फसल तैयार हो जाने पर तरह-तरह के स्वाद वाले आम खिलाते थे. उनको अगर अंगूर की बेटी से परहेज नहीं होता तो वह उनको उसकी संगत से हसीन हो जाने वाली शाम के शबाब का पुरलुत्फ आनन्द उठाने का भी मौका देने में कोताही न करते. लेकिन सकल पदारथ हैं जग मांही, करम हीन नर पावत नाहीं. भगवान सिंह के अन्दर उनके प्रति तरस का कुछ ऐसा ही भाव होता, मगर वह उस भाव पर स्वयं तरस खाने से अपने को बचाते थे. मदिरा से हृदयेश का कैसा रिश्ता है, इसको एक वाक़या से अच्छी तरह समझा जा सकता है. वाक़या का बयान ठोस होता है बिला मिलावट का. और यह वाक़या भगवान सिंह से ही जुड़ा हुआ है. अवसर था ‘पहल-सम्मान’ का जब भगवान सिंह उनके घर ठहरे हुए थे. अँधेरा घिर आने पर वह बोले थे, ‘हृदयेश जी, आप तो शौक करते नहीं, लेकिन मेरी शाम बिना शराब का साथ पाए गुजर नहीं सकती है. आसपास कही दुकान होगी. चलिए वहां से ले आते हैं.’ हृदयेश अपने ही चौक क्षेत्र में स्थित उनको अंग्रेजी शराब की दुकान पर ले गए थे. बदनामी के डर से वह दूर दूसरी पटरी पर खड़े रहे थे. भगवान सिंह ने अपने ही पैसों से रम का एक क्वार्टर खरीदा था. घर लौटकर गिलास और पानी की जरूरत बताए जाने पर उन्होंने वे दोनों चीज़ें मुहैया करा दी थीं. रम की चुस्कियाँ लेते-लेते भगवान सिंह उखड़ गए थे. आवाज में तमक आ गयी थी, ‘शराब के साथ चीखना भी जरूरी होता है. क्या पापड़ या नमकीन चने तक की भी व्यवस्था यहाँ नहीं हो सकती है?’ नीचे दुकान से तली मूंगफली के दाने ले आए गए. हृदयेश बाद में आदरणीय मेहमान के साथ अपने उस भदेस रवैये पर कई बार सोचकर हँसे थे. यह हंसना अपनी अबोधता पर तरस खाना भी होता था, साथ ही बेवकूफी की सीमा को छूती अपनी अव्यावहारिकता की खिल्ली उड़ाना भी.

बंगले पर होने वाली बातचीत में भगवान सिंह बात पर कब्जा स्वयं जमाए रहते थे. बोलने का धर्म वह निभाते और सुनने का हृदयेश और अपना-अपना धर्म निभाने में दोनों सुख पाते थे. वह उपन्यास के पूरा कर लिए गए अध्याय को भी सुनाते थे और उनकी प्रतिक्रिया चाहते थे. जब वह कहते थे कि हर बिन्दु पर अध्याय में लम्बे-लम्बे विमर्श हैं और वह बौद्धिकता से बोझिल है, तो वह हँस देते थे, ‘मैं बौद्धिक तो हूँ ही.’ उनका वह दावा असत्य नहीं है;, हृदयेश ऐसा अनुभव करते थे. साहित्य के अलावा भी विभिन्न सामाजिक अनुशासनों पर उनकी पुख्ता पकड़ थी. वह पढ़े और गुणे हुए दोनों थे.

उन्होंने दिल्ली से अपना कंप्यूटर मंगवा लिया था और सीधे उसी पर लिखते थे. वह छह-सात घंटे कम्प्यूटर पर बैठकर दस-पन्द्रह पृष्ठ तक का लेखन मजे से कर लेते थे.

हृदयेश अपनी मेज पर इतने समय तक बैठकर एक-एक वाक्य को कलम से जोड़ते-बैठाते हुए बमुश्किल एक या डेढ़ पृष्ठ लिख पाते थे. भगवान सिंह को आश्चर्य होता था, इतना कम.

‘भाई साहब, आप पेट्रोल पीकर लिखते हैं जबकि मैं पानी पीकर. रफ्तार में फर्क तो होगा ही.’

भगवान सिंह का उपन्यास ‘अपने अपने राम’ उन्होंने पढ़ रखा था. उसमें लोग मानस में
गहरी पैठ बना चुके राम, भरत, वसिष्ठ जैसे देव-पात्रों से संबंधित मिथकों को खंडित
किया गया था, किन्तु कथा-प्रवाह को संवेदनात्मक बनाए रखकर. वह बातचीत में जब तब उस
उपन्यास की सराहना करते थे. भगवान सिंह ने उनको इसके बाद का अपना लिखा दूसरा
उपन्यास ‘परमगति’ पढ़ने को दिया था, एकदम उसे नए शिल्प में रचा हुआ बताते हुए. वह
पूरा पद्य में लिखा गया था. उसकी सार्थक प्रयोगधर्मिता को लेकर वह आत्मसंतुष्ट थे.
प्रौढ़ रचनाकार भी अपने लिखे हुए का सही मूल्यांकन करने से प्रायः चूक जाता है भले
ही वह दूसरों का सही-सही करता हो. उन्होंने पढ़कर प्रतिक्रिया में कहा था, यह अपने
से केवल अतिसहिष्णु, अति उदार और अति धैर्यवान पाठक ही जोड़ सकता है.

भगवान सिंह को अपने को ताजा रखने के लिए उनके साथ की जरूरत थी और उनको अपने ज्ञान के संवर्धन के लिए उनकी.

‘उन्माद’ पूरा कर भगवान सिंह दिल्ली लौट गए थे. पोढ़ी लेखकीय हैसियत व अपने मानीखेज रसूखों की वजह से उन्होंने प्रथम पंक्ति के प्रकाशकों में से एक से उपन्यास के प्रकाशन की बात पहले ही पक्की कर ली थी.

आठ-नौ माह बाद भगवान सिंह शाहजहाँपुर फिर आए थे. भाई अभी यहीं तैनात थे. इस बार वह विदेश में बस गए अपने एक मित्र के लिए अप्रकाशित उपन्यास की पुनःरचना करने के उद्देश्य से आए थे. उनके अपने शब्दों में ‘उद्धार करने.’

उनके दुबारा आगमन की सूचना पाकर हृदयेश का उनके पास बैठने, गपियाने, कुछ अर्जित करने का सिलसिला फिर शुरू हो गया था. वह आम का ही मौसम था, जून-जुलाई का महीना. भगवान सिंह ने बताया था कि आम खिलाने के वास्ते वह साथ में नामवर सिंह को भी लाना चाहते थे. बात तय हो चुकी थी. किन्तु नामवर सिंह के इस बीच एकाएक बन गए कुछ महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के कारण उनका यहाँ आना रद्द हो गया. नामवर सिंह जाते तो वह उनकी भी उनसे भेंट-मुलाकात कराते. नामवर सिंह की बौद्धिकता उनकी कद्दावर शख्सियत को लेकर हृदयेश में आतंक था. नामवर सिंह से मिलते, बात करते हुए वह सहज नहीं रह पाते.

भगवान सिंह को, जो उनके तब तक पढ़े गए उपन्यासों से संतुष्ट नहीं थे, और जिन्होंने उनमें से कई के अच्छे बनते-बनते रह जाने के लिए दो-बार चूकों या कुछ जरूरी तत्वों, सावधानियों की अनदेखियों की ओर इशारा किया था, उनको उन्होंने अपना बाद में प्रकाशित उपन्यास ‘पगली घंटी’ पढ़ने को दिया था. पढ़ चुकने के बाद बोले थे, ‘यह बेहतर रचना है. हिन्दी में जेल जीवन पर लिखा गया कोई उपन्यास है भी नहीं.’ उन्होंने अपने भाई से उस उपन्यास की पढ़ने की सिफारिश की थी और उसे रोक भी लिया था.

प्रतिक्रिया से उत्साहित होकर उन्होंने अपना ताजा निकाला कहानी-संग्रह ‘सम्मान’ पढ़ने को दिया. उनकी कहानियाँ उन्होंने बहुत कम पढ़ी थीं. संग्रह पर उनकी प्रतिक्रिया और भी सराहना लगी थी, ‘उपन्यासकार के मुकाबले आपका कहानीकार कही अधिक वयस्क, कहीं अधिक समझदार है. संग्रह की कई कहानियों में औपन्यासिक विस्तार है.’

इस बार वह दिल्ली जल्द ही लौट गए थे.

कुछ समय बाद भगवान सिंह का पत्र आया था, ‘आपकी कहानियों पर मेरा लिखने का मन बना है’

उन्होंने उनको अपना वह विचार कुछ समय के लिए स्थगित करने की सलाह दी थी, ‘मेरा किताबघर से नयी कहानियों का संग्रह दो-एक माह में आने वाला है. कृपया इस संग्रह की कहानियों पर भी आप पहले नजर डाल लें.’

उत्तर आया, ‘लिखने का ताप मुझमें अभी है. ताप ठंडा नहीं होना चाहिए. आप प्रकाशक से कहकर मुझे संग्रह की डमी तुरन्त भिजवा दें.’

डमी उनको भिजवा दी गयी.

हृदयेश ने उससे पूर्व नेशनल पब्लिशिंग हाउस से निकला संग्रह ‘नागरिक’ भी प्रकाशक को लिखकर भिजवा दिया. फिर अपनी चार-पाँच प्रतिनिधि कहानियों की छाया प्रतियाँ भी. उनका मानना था कि सही और पूर्ण मूल्यांकन के लिए पर्याप्त सामग्री सामने होनी चाहिए.

उन्हीं दिनों डॉ. प्रदीप सक्सेना का अलीगढ़ से पत्र आया था कि ‘समय माजरा’ पत्रिका से उन्होंने उसमें एक लेख देने का वादा कर रखा है. वह चाहते हैं कि उनकी कहानियों पर लिखकर इस वादे को वह पूरा कर दें. एक वादा उन्होंने उनसे भी कर रखा है कि वह उनकी कहानियों पर लिखेंगे. उनके कहानीकार को विषय बनाने से दोनों ही वादे एक साथ पूरे हो जाएंगे.

प्रदीप सक्सेना ने उनके उपन्यासों पर ‘गांठ’ से लेकर ‘सांड’ तक पर, जो तब तक प्रकाशित हुए थे, एक आलोचनात्मक आलेख लिखा था. इस आलेख में उनके सोच व सरोकार की सकारात्मकता के साथ उनकी नकारात्मकता पर भी अंगुलि रखी गयी थी. विकास-क्रम का ग्राफ कहाँ नीचे गिरा इसको भी बेबाकी से बताया गया था. उस आलेख में सब-कुछ पक्ष में नहीं था. फिर भी ‘आलोचना’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका में उन पर लिखा जाना उनकी लेखकीय सेहत के लिए वह टॉनिक था. फोकस डाला जाना उनके अंधेरे से निकालना जैसा था. प्रदीप सक्सेना और उनके बीच खुलापन था, कुछ इतना कि संकोचता निस्संकोचता में बदली जा सकती थी. उन्होंने ही प्रदीप सक्सेना से कहा था कि उपन्यासों के बाद वह अब उनकी कहानियों पर भी कहीं लिखें. तीन-बार अपनी इस इच्छा का स्मरण भी कराया था. प्रदीप सक्सेना ने वैसा मन बना लिया है, यह जानकर उन्होंने प्रदीप सक्सेना को उनके पास गैर मौजूद संग्रहों को यथाशीघ्र मौजूद करवा दिया था. कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित नई कहानियों की जीराक्स कापियाँ भी रवाना कर दी थीं.

फिर इसी के आसपास एक और प्रस्ताव, वैसा ही सुहावना, मनभावना और उत्साहवर्धक. बल्कि कहा जाए अपने में पारस पत्थर जैसा बहुमूल्यवान. यह प्रस्ताव इलाहाबाद से विद्याधर शुक्ल का आया था, जिन्होंने अपनी पत्रिका ‘लेखन’ के कुछ अंक निकाले थे, जिनमें से निराला स्मृति अंक अति महत्वपूर्ण था. विद्याधर ने पत्र में लिखा था कि ‘लेखन’ के 6,7 व 8 सामान्य अंक होंगे. वह ‘लेखन’ 6 से नयी कहानी के बाद के जनधर्मी कहानीकारों पर मूल्यांकनपरक एक लेखमाला शुरू कर रहे हैं. अंक 6 में इसराइल पर और अंक 7 में उनपर उनके लम्बे लेख होंगे. वह उनके चहेते कहानीकार हैं, एक मुद्दत से. वह सही को सही और गलत को गलत कहे बिना रह नहीं सकते हैं. उनको साहित्य से कुछ पाना नहीं है, देना ही देना है. ‘वर्तमान साहित्य’ के कहानी महाविशेषांक में प्रकाशित उनकी कहानी ‘मनु’ ही सर्वश्रेष्ठ थी, लेकिन खंजड़ी बजी ‘ए लड़की’ की. ‘ए लड़की’ यानी खाए अघाए लोगों की आत्मरति.

विद्याधर शुक्ल ने पत्र के अंत में लिखा था कि उनकी सम्पूर्ण कहानियों से गुजरना अब उनके लिए अत्यावश्यक हो गया है. उनके पास बस दो ही संग्रह हैं. अकिंचनता के चलते उनके लिए अन्य संग्रह खरीदना सम्भव नहीं हो पाया है. यदि उनके पास संग्रहों की अतिरिक्त प्रतियां हों तो वह उनको भिजवा दें.

उन्होंने विद्याधर शुक्ल को भी संग्रहों की प्रतियां जुटाकर भिजवा दी थीं.

पाँच-छह माह के समय के छोटे से टुकड़े में आगे-पीछे तीन महती संभावना गर्भित प्रस्तावों का द्वार पर आकर मुखर थापें देना उनको लगा था कि उनके भाग्य की शुभ रेखाएँ जाग्रत हो गयी हैं, या शनि जैसे उत्पाती ग्रहों ने भी अनुकूल ग्रहों में स्थान ग्रहण कर लिया है. उन्होंने अपनी हस्तरेखाएँ कभी किसी सामुद्रिक से परखवायीं नहीं थीं यों बड़े भाई के परिवार में इस विषय में गहरी आस्था होने के कारण जब-तब इस विद्या के पंडित बने व्यक्ति पधारते रहते थे. उनका जन्म-पत्र एक मुद्दत से गुम था, चालीस-पचास वर्षों से और इसको लेकर उनको कभी कोई खास मलाल नहीं हुआ था. उनकी राशि क्या है, इसका उन्होंने कभी पता नहीं लगाया. उनके नाम के आद्याक्षर के आधार पर किसी ने राशि मिथुन निश्चित की थी. उसे यदि उन्होंने सही नहीं माना था तो गलत भी नहीं. हस्तरेखाओं या ग्रहों के प्रभावों पर उन्होंने कभी विश्वास नहीं किया. उनके पत्रकार पुत्र ने उनको बताया था कि जब कभी उसके दैनिक-पत्र में साप्ताहिक भविष्यफल के लिए संबंधित ज्योतिषी से किसी कारणवश समय पर सामग्री नहीं आ पाती है, कभी पहले प्रकाशित हो चुकी सामग्री को पच्ची कर दिया जाता है. बावजूद इस सबके कभी-कभी घिर आयीं एकदम प्रतिकूल या अनुकूल स्थितियों ने हस्तरेखाओं या ग्रहों की भूमिका के बारे में उनमें एक जिज्ञासा भाव कुनमुनाया था. गूढ़ संस्कारों से मुक्त हो जाने के बाद भी उसके कुछ रग-रेशे अन्दर बने जो रहते हैं.

फिर प्रस्तावों का मात्र प्रस्ताव रह जाना या उनका मरीचिका बन जाना या उनमें गर्भित महत्ती संभावनाओं का भ्रूणपात हो जाना.

विद्याधर शुक्ल की ओर से एक लम्बी चुप्पी की ओट खड़ी कर ली गयी. दीवार में सेंघ लगाने के लिए उन्होंने तीन-चार माह बाद पत्र लिखा. मगर सेंघ लग नहीं सकी. फिर बड़े अंतराल के बाद प्रयास किया, मगर सफलता नहीं मिली. ठहर-ठहर कर किए गए कई प्रयासों के बाद ईंट हिली.

‘हृदयेश जी, लघु-पत्रिका निकालने के लिए जिन साधनों की जरूरत होती है, विशेषकर धन की, उसकी व्यवस्था अभी कर नहीं सका हूँ. अंक निकालने में अभी समय लगेगा.’

उन्होंने सुझाव दिया, ‘क्या यह ठीक नहीं रहेगा कि इन स्थितियों में आप अपना प्रस्तावित लेख किसी उस दूसरी पत्रिका को दे दें जिसे आप सही समझते हों.’

हिली ईंट को मजबूती से जड़ दिया गया.

दो वर्ष बाद ‘लेखन’ का अंक आया. उत्सुकता से लौटने पर देखने को मिली उनके अपने एक कहानी-संग्रह पर मात्र छोटी-सी समीक्षा, वह भी थी आलोचना का ककहरा सीख रहे किसी विद्यार्थी की लिखी हुई.

प्रदीप सक्सेना ने भी चुप्पी की ओट ले ली थी. पत्र डालने पर उत्तर आया, ‘भाई साहब, मैं अपने बेटे को लेकर मानसिक विचलन में हूँ. ट्यूशन लगवा देने के बावजूद बेटे की पढ़ाई की गाड़ी ठीक से बढ़ नहीं पा रही है.’

इसके बाद डाले गए पत्र का उत्तर था, ‘मकान बन रहा है. इधर सारी शिक्षेत्तर गतिविधियां उसी को लेकर हैं.’

अगले पत्र का उत्तर था, ‘कुछ बड़ी योजनाएँ हाथ में ले ही हैं. अभी उन्हीं पर काम करना है.’

नारायण बाबू ने हस्तक्षेप किया, ‘भाई साहब, आप अपने मित्र प्रदीप सक्सेना की विवशताओं को समझदारी से समझिए. उनके पास करने को जो अब काम आ गए हैं, वे आप वाले काम से ज्यादा जरूरी होंगे. आपने ही एक बताया था कि लेनिन को किसी पत्रिका के लिए गोर्की के एक लेख की आवश्यकता थी. गोर्की से उसके लिए आग्रह करते हुए लेनिन ने लिखा था कि यदि उनकी संलिप्तता किसी अधिक महत्वपूर्ण कार्य में हो तो वह उनकी मांग को निस्संकोच नजर अन्दाज कर सकते हैं. लेनिन जैसा आचरण, भाई साहब, आप भी अपनाइए.’

भगवान सिंह के सान्निध्य से प्राप्त अपने अनुभवों के आधार पर वह उनको सहज ही ईमानदार मान सकते थे बतौर एक लेखक और व्यक्ति दोनों. उनके व्यवहार में खरेपन की खुरखुराहट थी, पर साथ ही वहां बनी पारदर्शिता उस खुरखुराहट को महसूस नहीं होने देती थी. प्रदीप सक्सेना में भी यों ये ही विशेषताएँ थीं, पर स्थितियाँ जन्य विवशताएँ वहां बड़ी बन गयी थीं. भगवान सिंह अपनी वचनबद्धता निभाएंगे, उनसे ऐसी आशा अधिक थी. इसलिए भी कि ढांचों में वही अंतिम व्यक्ति थे.

भगवान सिंह को यथास्थिति जानने के लिए पत्र डाला गया. उत्तर आया, ‘ताप जाता रहा है. उसके वापस आने की प्रतीक्षा है.’

एक बड़े वक्फे के बाद फिर पत्र डाला, ‘ताप वापस आया या अभी दूरस्थ है?’

उत्तर, ‘इधर एक पुस्तक की समीक्षा करने को आ गई थी. दो-एक लेख भी लिखने पड़े. आ गया दूसरा काम पहले वाले काम को पीछे ठेल देता है.’

एक और बड़े वक्फे के बाद फिर पत्र डाला. इस बार उत्तर की बजाय खामोशी. नारायण बाबू ने कहा कि हो सकता है आपका पत्र कहीं रास्ते में गुम हो गया हो. आपको मुद्दे पर सीधे लिखते हुए अगर संकोच होता हो तो दीपावली, नववर्ष पर शुभकामनाएँ भेजिए. ये शुभकामनाएँ भी उनको आप वाले काम का स्मरण कराती रहेंगी.

भेजी गयी शुभकामनाओं की एवज में कभी प्रतिशुभकामनाएँ आ जाती थीं, कभी वे भी नहीं.

चन्द्रमोहन दिनेश ने भगवान सिंह को फोन किया था. भगवान सिंह के शाहजहाँपुर प्रवास
के दिनों में चन्द्रमोहन प्रायः उनके साथ भगवान सिंह से मिलने जाते थे और उनका
बताया हुआ कोई काम भी सोत्साह कर देते थे. वह जिलाधीश के वैयक्तिक सचिव थे.
उन्होंने यह फोन अपनी ओर से किया था, यो ही हालचाल लेने के लिए. उनको इस बात का
इल्म भी नहीं था कि भगवान सिंह ने कोई लेख लिखने का वादा हृदयेश से कर रखा है. फोन
पर हुई बातचीत में भगवान सिंह ने चन्द्रमोहन से कहा कि वह हृदयेश जी को बता दें कि
उनपर उनको लेख लिखना है, पर वह लेख कब लिखा जाएगा इसे वह स्वयं भी नहीं जानते हैं.
संदेश पाने पर मन बसा रहे दूध से दही बन गया. भगवान सिंह ने फोन के चोंगे के पीछे
उनकी उपस्थिति पायी थी.

उन्होंने नारायण बाबू से कहा, ‘आप सलाह देंगे तब भी मैं इस विषय में अब किसी भी प्रकार का कोई सम्पर्क नहीं साधूंगा. वैसा करने पर मैं खुद अपनी निगाह से गिर जाऊँगा.’

उनकी ओर से भी खामोशी.

नहीं, उन्होंने फिर पत्र लिखा ता, कई माह बाद और एक दूसरे संदर्भ में. रवीन्द्र वर्मा का उपन्यास ‘पत्थर ऊपर पानी’ पूरा का पूरा ‘कथादेश’ के एक अंक में प्रकाशित हुआ था. भगवान सिंह ने पत्रिका में पाठकीय प्रतिक्रिया स्वरूप उस उपन्यास की जमकर प्रशंसा की थी. उतनी प्रशंसा उनको सही नहीं लगी थी. उन्होंने पत्रिका को न लिखकर सीधे भगवान सिंह को लिखा था कि वह उनकी धारणा से असहमत हैं क्योंकि उपन्यास में दर्शन की बघार ज्यादा है. इसने उसे पाठकीय स्वाद की दृष्टि से कुछ बेस्वाद कर दिया है. भगवान सिंह ने उत्तर देते हुए लिखा था कि कृति में दर्शन का होना बुरा नहीं होता है. असल में जैसे हमारी रुचि, प्रकृति, अनुभव, की भिन्नता हमारी सर्जना को प्रमाणित करती है और हमें एक खास तरह का लेखक बनाती है, उसी तरह हमें एक खास तरह का पाठक भी बनाती है. फिर इसी पत्र में उन्होंने उनपर न लिख सकने का स्वतः स्पष्टीकरण दिया था कि वह अभी निष्क्रियता के दौर से गुजर रहे हैं. उनपर जो कुछ लिखना शुरू किया था वह अभी वहीं ठहरा हुआ है जहाँ व्यवधान आया था. लिखा हुआ अंश वह साथ में भेज रहे हैं. पर यह इस बात का संकेत नहीं कि इसकी यहीं इतिश्री है. संकेत यह कि इसे लिखने की भीतर से उठी उमंग अभी स्थगित है.

उनपर लिखा वह अंश पाँच-छह सौ शब्दों का था. शीर्षक दिया गया था ‘मिट्टी के भी होते हैं अलग-अलग रंग.’ भगवान सिंह ने लेख की शुरूआत यह बताते हुए की थी कि हृदयेश हिन्दी के उन रचनाकारों में हैं जिनका अपना रंग है और इसके बाद भी वह बहुतों के इतने करीब पड़ते हैं कि उनका अलग रंग पहचान में नहीं आता. इस प्रसंग में अन्य रचनाकारों के साथ प्रेमचंद का नाम भी लिया गया है. यदि हृदयेश किसी परम्परा में आने का प्रयत्न करते तो वह हृदयेश नहीं हो सकते थे. खुदा जैसा बनने का प्रयत्न करने पर खुदी को गंवाना पड़ता है.

फिर उन्होंने हृदयेश की ओर लोगों का उचित ध्यान न देने के लिए इसका एक कारण उनके शहर शाहजहाँपुर का बताया था जो भारत के मुख्य भू-भाग से अलग छिटके हुए एक द्वीप जैसा है. यह भी संभावना उनके नाम के आधार पर प्रकट की थी कि उन्होंने अपने लेखन का प्रारम्भ कविता से किया होगा.

अगले पैराग्राफ में उनका कथन था कि यदि हृदयेश अधिक पढ़े होते तो वह जो कुछ लिखते
उसमें हृदयेश की दुनिया से लेकर किताबों की वह दुनिया भी समाई होती जिसके होने से
उनका रचा हुआ संसार फैलने के अनुपात में ही बेगाना भी होता जाता. संभाल न पाने पर
कुछ बोझिल और अनगढ़ भी. उनकी कहानियाँ जिन्दगी से, खासकर उस जिन्दगी से, जिसमें
मुक्तिबोध के मुहावरे के अनुसार आदमी जमीन में धंसकर भी जीने की कोशिश करता है,
पैदा हुई हैं. कुछ लेखक सीधे जमीन फोड़कर निकलते हैं. उसी में अपनी जड़ों का
विस्तार करते हैं और नम्र भाव से अपने रेशे से उस जमीन से ही अपनी शक्ति, खाद-पानी
लेकर बढ़ते हैं और अपने और जमीन के बीच आसमान को नहीं आने देते हैं. वे इस सत्य को
बखूबी समझते हैं कि आसमान जितना भी ऊँचा हो, उस पर किसी के पाँव नहीं टिकते. औंधा
लटका हुआ बिरवा तो किसी को छाया तक नहीं दे सकता. मंटो हों या हृदयेश या छेदीलाल
गुप्त, ये कलम से लिखते हैं तो भी लगता है जैसे कोई जमीन पर धूल बिछाकर उस पर अपनी
उँगली घुमाता हुआ कोई तस्वीर बना रहा हो. उनकी उंगलियों के स्पर्श में ही कुछ होगा
कि आंधियां तक वहाँ आकर विराम करने लगती हैं और उनकी लिखत, जिसने भांड लेख होने तक
का भ्रम नहीं पाला था, शिलालेख बनने के करीब आ जाता है.

फिर इसके आगे यह बताते हुए कि हृदयेश ने बीच-बीच में आने वाले तमाम आंदोलनों को गुजर जाने दिया बिना अपने लेखकीय तेवर या प्रकृति में बदलाव लाए हुए, कि वह चुनाव पूर्वक अपनी जमीन पर टिके रहे न दैन्यं न पलायनम्, कि हृदयेश एक साथ कई परम्पराओं से जुड़ते हैं क्योंकि प्रत्येक रचानाकार अपने वरिष्ठों, समवयस्कों, यहाँ तक कि अल्पवयस्कों की कृतियों के प्रभाव को अपनी अनवधानता में सोख लेता है जैसे पौधे की जड़ें खाद के रस को सोख लेती हैं, लेख को असमाप्त छोड़ दिया था, कोई व्यवधान आ जाने के कारण.

अंश को पढ़कर उनमें हूक उठी थी गर्म उसांसों से भरी हुई. काश भगवान सिंह लेख को पूरा कर डालते भले ही उसे अधिक न बढ़ाते. उन्होंने जो लिखा है सराहना भरा, उनको जमीन से दो इंच नहीं पूरे दो मीटर ऊँचा करता हुआ, सिद्धों की पंक्ति में बैठाने वाला, उनका वह अभिमत उन्हीं तक रह गया है, केवल उन्हीं तक, किसी बंद कमरे में दो मौजूद व्यक्तियों में से एक के द्वारा दूसरे के बारे में कोई उम्दा टिप्पणी की गयी जैसा. लेख प्रकाशित होने पर दूसरे उनके लेखन की विशेषताओं के बारे में जानते. आलोचकों, संपादकों और प्रकाशकों के बीच उनकी स्वीकार्यता सुदृढ़ हो जाती. तब मोर जंगल में न नाचकर बस्ती में नाचता.

अंश वह दुबारा-तिबारा पढ़ लेते और हर बार यह चाहना बेचैनी भरी हो जाती. किन्तु उन्होंने भगवान सिंह को लेख पूरा कर लेने के लिए लिखा नहीं. पहले लिखे गए अपने किसी पत्र में उन्होंने उनको उस वचनबद्धता से मुक्त कर दिया था, ‘बाप अपने को उस वादे से बंधा हुआ न मानिए. सहज भाव से अन्य महत्वपूर्ण कार्य करिए.’

जब एक लम्बा समय बीत जाने पर भी व्यवधान को परे ढकेल देने वाली उमंग उधर न उठी, उन्होंने मान लिया कि उस लेख की वही नियति थी.

और पीछे. काफी पीछे, यानी सन् 1968 या 69 का वर्ष.

आहत प्रसंग मानव-स्मृति में अपने निशान गहरे छोड़ते हैं, वर्षों-वर्षों तक बने रहने वाले. उन प्रसंगों की छटपटाहट, खड़क अन्तस के कोमल पटल को रगड़ती, छीलती जो रहती है. या फिर यह कि मानव-स्मृति दुःखी, पीड़ित प्रसंगों को संरक्षा देने में अधिक सचेत, अधिक उदार रहती है.

हृदयेश को कहानियाँ लिखते लम्बा समय हो गया था, पन्द्रह-सोलह वर्ष का. प्रकाशित
कहानियों की संख्या पचास-साठ हो गई थी, जिसमें से अनेक ‘कल्पना’, ‘कहानी’
‘ज्ञानोदय’ ‘धर्मयुग’ जैसी प्रथम पंक्ति की पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी थीं.
किन्तु उनका कोई कहानी संग्रह आया नहीं था. उनमें इसको लेकर बेकली थी, कुछ तेज ही.
कई प्रकाशकों को लिखा था. या तो उधर से मौन साधकर मनाही या लिखित शब्दों द्वारा.
जारी प्रयासों के क्रम में उन्होंने इलाहाबाद के अभिव्यक्ति प्रकाशन से सम्पर्क
किया था. प्रकाशक नया है किन्तु सही पुस्तकें सही ढंग से निकाल रहा है, ऐसा पता चला
था. लिखते हुए उन्होंने यह भी लिखा था कि अपने ‘लेखकीय अवदान की दृष्टि से वैसा
हकदार होते हुए भी उनकी अभी तक कोई पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई है और बहुत जरूरी होने
पर वह पाँच-सौ रुपए तक बतौर सहयोग राशि दे सकते हैं. प्रकाशक का तुरन्त उत्तर आ गया
कि उनकी यह बात उसको छुई है कि पुस्तक निकालने के हकदार होते हुए भी वह अभी तक यह
हक पा नहीं सके हैं. वह उनकी पुस्तक अवश्य प्रकाशित करेगा. सवा-सौ से डेढ़ सौ
पृष्ठों के संग्रह के लिए वह चुनकर अपनी कहानियाँ भेज दें. साथ में पाँच सौ रूपए का
ड्राफ़्ट भेजना वक्त का तकाजा ही मानें.’


उन्होंने वह सब भेज दिया था. उस समय पाँच-सौ रुपए एक बड़ी रकम होती थी. उन जैसी दुर्बल आर्थिक स्थिति वालों के लिए और भी बड़ी. उन रुपयों का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने उधार लेकर जुटाया था.

संग्रह छह माह के भीतर निकलना था, मगर निकला नहीं था. पत्र डालने पर उत्तर आया कि प्रकाशन शिड्यूल गड़बड़ा गया था. व्यवस्था ठीक होते ही संग्रह निकल जाएगा.

गड़बड़ाया शिड्यूल ठीक हो नहीं रहा था. समय बीतता जा रहा था.

उनका इलाहाबाद जाना हुआ था. प्रकाशक से मिले. प्रकाशक ने बताया कि पाण्डुलिपि खो गई है. उनके यह जाहिर करने पर कि पाण्डुलिपि तैयार कर दुबारा सौंपी जा सकती है, प्रकाशक ने पूर्व प्रकाशित पुस्तकें न उठने और कागज व मुद्रण के बढ़ते खर्चे का रोना रोकर अपनी असमर्थता प्रकट कर दी. उदारता यह दिखाई की दिए गए पाँच सौ रूपए की एवज में वह अपनी पसंद की पुस्तकें ले जा सकते हैं. इस उदारते में यह उदारता और जोड़ी कि पुस्तकों पर बीस प्रतिशत जो छूट दूसरों को देते हैं, उस छूट के प्रति सौ रुपए की पुस्तकें वह और उठा सकते हैं.

मिली पुस्तकों को साइकिल पर झोला लटकाकर उन्होंने बेचा था. दो छोटे भाइयों के शिक्षा संस्थानों में होने के कारण इस सेल्समैनी को करने में उनको जितनी दिक्कत होनी चाहिए थी, उतनी हुई नहीं थी.

और फिर एक अन्य बिंधी हुआ प्रसंग. पहले का नहीं, कुछ बाद का, यानी सन् 1971 के आसपास का. ‘गांठ’ के बाद उन्होंने अपना दूसरा उपन्यास ‘हत्या’ लिखा था. उन दिनों सारिका पत्रिका ने अपने अंकों में पूरा लघु उपन्यास देने की योजना बनाई थी और दो एक उपन्यास वह प्रकाशित भी कर चुकी थी. उन्होंने भी ‘हत्या’ को इस योजना के अंतर्गत भेजा था. उन्हीं दिनों समानांतर कथा-आंदोलन का सम्मेलन मुम्बई में हुआ था, शायद पहला. इस आंदोलन के जनक और नायक कमलेश्वर थे, वही ‘सारिका’ के उस समय संपादक भी. मित्र से. रा. यात्री ने उस सम्मेलन में शिरकत की थी. यात्री ने पत्र द्वारा सूचना दी थी कि टाइम्स ऑफ इंडिया बिल्डिंग की एक-एक ईंट बोल रही है कि हृदयेश का उपन्यास ‘हत्या’ छपना है. कमलेश्वर को उनका उपन्यास बेहद पसंद आया है. उनको अग्रिम बधाई, बहुत-बहुत.

बाद में दिल्ली जाना हुआ था. राजेन्द्र यादव ने भी मुलाकात के दौरान यही बताया था कि पहले ‘हत्या’ ‘सारिका’ में प्रकाशित हो जाए, उसके बाद ही वह पुस्तकाकार अक्षर प्रकाशन से आए, ऐसा कमलेश्वर उनसे कह गए थे. राजेन्द्र यादव ने जानना चाहा था कि आखिर फिर ‘सारिका’ में उपन्यास क्यों नहीं आया?

क्यों नहीं आया का कारण वह नहीं जानते थे. साहित्य की राजनीति से वह बहुत दूर थे.
कारण को लेकर वह बस इस सोच के इर्द-गिर्द भटक सकते थे कि आमंत्रण आने पर भी वह
मुम्बई सम्मेलन में नहीं गए थे या यह मान लिया गया था कि हृदयेश समानांतर आंदोलन के
एक अंध समर्पित और विश्वसनीय सिपाही नहीं बन सकते हैं.

और फिर एक ओर चुभता, वेधता, नश्तर लगाता प्रसंग. पहले के आसपास का. कुछ माह पश्चात् का. मुम्बई से एक सज्जन महेन्द्र विनायक का पत्र मिला, साथ में राम अरोड़ा का भी कि विनायक उनके उपन्यास ‘गांठ’ पर फिल्म बनाना चाहते हैं. इससे पहले इस संभावना की जानकारी यात्री और ‘सारिका’ में कमलेश्वर के संपादन सहयोगी सुदीप से भी प्राप्त हो चुकी थी. फिर कमलेश्वर का भी पत्र आया था. कमलेश्वर ने लिखा था कि चूँकि वह इस क्षेत्र की स्थितियों और दांव पेंचों से अनभिज्ञ हैं, बेहतर होगा कि विनायक से फिल्मीकरण की शर्तों के संबंध में वही बातचीत करें ताकि पारिश्रमिक की राशि आदि को लेकर उनके साथ पूर्ण न्याय हो सके. उनकी ओर से बात करने की उन्होंने सहमति मांगी थी. सहमति तो उन्होंने तुरन्त भेज दी थी. महेन्द्र विनायक एक ओर तो कमलेश्वर से भेंट कर बात आगे बढ़ा रहे थे, दूसरी ओर उनसे भी पत्रों द्वारा बराबर संपर्क बनाए हुए थे. विनायक चाहते थे कि बात सीधे उन्हीं से हो पर उन्होंने साफ जता दिया था कि शर्तें कमलेश्वर ही तय करेंगे. ऐसा फिर लगा था कि शर्तों को पक्की शक्ल लेने के लिए बस कागज पर उतरना है. लेकिन फिर विनायक ने उनको एक ओर परे खिसका कर जैनेन्द्र कुमार से उनके उपन्यास ‘त्यागपत्र’ पर फिल्म बनाने का अनुबंध कर लिया था.

‘सारिका’ में ‘गर्दिश के दिन’ स्तम्भ के अंतर्गत उन्होंने आत्मकथ्य में कुछ और
हादसों का जिक्र करते हुए लिखा था कि जब-तब उन्हें लोग चोटी पर ले जाकर नीचे ढकेल
देते हैं. किन्तु पूर्व अनुभवों से हासिल सीख से उन्होंने अपने जिस्म से हड्डियाँ
निकलवा दी हैं. उन्हें अब चोट नहीं लगती है.

चोट न लगने का वह कथन सही भी था और गलत भी. सही इस अर्थ में कि अपने साहित्यिक संघर्षों से उन्होंने पलायन नहीं किया था. गलत इस अर्थ में कि ऐसे हादसे टीस देते थे ही और दिनों तक.

रचनाकार – हृदयेश के कई उपन्यास और कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. प्रतिबद्ध सृजन यात्रा के लिए उप्र हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत हो चुके हैं तथा ‘पहल’ सम्मान से सम्मानित भी.


वही है धर्म-ईमान

-स्वामी वाहिद काज़मी

मुमकिन है शीर्षक पढ़ते ही कुछ पाठकों के मन में विचार उठे कि आगे शायद कुछ कविता जैसी चर्चा होगी। नहीं, मैं कविता-चर्चा करने नहीं बैठा बल्कि अब जिस माहौल में एक-एक सांस कठिनाई से लेकर जीने को अभिशप्त हूँ, उससे उपजी मानसिक पीड़ा सहृदय पाठकों के साथ शेयर करने के इरादे से बैठा हूँ। कहाँ से शुरू करूं? जब यह सोचता हूँ तो एकदम से कोई सिरा तो लेखनी की नोक पकड़ नहीं पाती। आँसुओं की रुकी हुई धारा अवश्य आँखों से फूट पड़ना चाहती है।

कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन
वैसे तो शायद मन्ना डे का गाया हुआ किसी फिल्मी गीत का यह मुखड़ा है। न मैंने वह फिल्म देखी, न फ़िल्में देखता हूँ। किन्तु जब भी यह पंक्ति मेरे कानों में पड़ती है, तत्क्षण थोड़ी देर के लिए जैसे मैं इस दुनिया में नहीं रह जाता हूँ। इस पंक्ति के बहाने मुझे अतीत के स्वर्णिम दिन बेसाख्ता स्मरण हो आते हैं। विशेष रूप से उस जमाने का सामाजिक एवं धार्मिक व्यवहार, वह पूरा वातावरण जिसमें किसी प्रकार की जातिगत द्वेष भावना तो दूर, संकीर्णता और भेद-भाव भी नहीं था। बेशक इसे आज कोई यह कहे कि मैं अतीत-जीवी या माजीपसंद हूँ, पर क्या किया जाए? जिन संस्कारों से मेरे व्यक्तित्व के एक-एक रेशे का निर्माण हुआ, उनकी जड़ें अतीत में ही हैं। आँधी-तूफ़ानों में भी जड़ों से न उखड़ पाना मेरी कमजोरी ही है।

ग्वालियर (मध्य प्रदेश) से कोई तीस किलोमीटर के फासले पर शेरशाह सूरी राष्ट्रीय राजमार्ग उर्फ जी.टी. रोड के किनारे एक छोटा-सा ऐतिहासिक कस्बा है-आंतरी. दरबारे-अकबरी के एक मशहूर रत्न अबुल फज़्ल यहाँ चिर विश्राम की निद्रा में लीन हैं। अबुल फज़्ल की आखिरी आरामगाह इसी कस्बे आंतरी में मेरा जन्म हुआ। अबुल फज़्ल की मज़ार पर खेलते-कूदते और वहाँ की ख़ाक में लोट-पोट होते हुए, बाल्यावस्था पार कर उसी खुशगवार फ़िज़ा में तरूणाई की चौखट पर कदम रखा। मिडिल स्कूल मैंने यहीं से पास किया था। इस लिहाज से मेरे मनो-मस्तिष्क पर, संस्कार रूप में, आंतरी के बहुत अहसान हैं। सबसे खास है वह सुखद माहौल जिसमें स्वाभाविक भाई-चारे की सुगंध बहती थी और हकीकी अपनत्व तथा सद्भाव दूध-मिसरी की भांति घुले-मिले रहते थे। कहना न होगा कि मेरे भीतर बहते लहू की एक-एक बूंद उन्हीं रंगों व रसायनों से रची-बसी है. मेरे रोम-रोम का निर्माण उसी आब-ओ-हवा ने किया है। उसे कैसे भूल सकता हूँ।

न कोई अफसर, न कोई चाकर

ग्वालियर हाई कोर्ट से संबद्ध एक छोटी सी अदालत वहाँ थी। एक मजिस्ट्रेट रहता था। पाँच वकील थे- विद्याधर शर्मा, विश्वेश्वर दयाल, जयनारायण सक्सेना, मनोहर लाल और मेरे पिताजी सैयद इम्तियाज़ अली। जो वकील उनके हम उम्र थे, वे सब हमारे चाचा थे और मनोहर लाल जी उम्र में बड़े होने से बाबा थे। ग्रामवासियों के साथ इस सभी का अपनापन रहता था। घनिष्ठता ऐसी कि जब कचहरी की इमारत में अदालत लगी होती, तो वे ही लोग जो अपनी-अपनी कुर्सियों पर मजिस्ट्रेट, वकील, पेशकार, अहलकार थे; अदालत उठ जाने के बाद सिर्फ एक इंसान रह जाते थे। कहीं बैठकर गपशप करते। बैडमिंटन खेलते। गर्मियों में तरबूज़-खरबूजों और ठंडाई की, बरसात में आमों की और सर्दियों में कबाब-पकौड़ों की पार्टियाँ उड़ाते। कभी शिकार पर जाते तो कभी जंगल में सहभोज (गोठ) के लुत्फ़ उठाए जाते। ग्राम उत्सवों में पूरे मन और उत्साह से शरीक होते।

प्रतिपक्षियों का याराना

मुवक्किल के हित को सर्वोपरि रख सभी वकील पूरी मेहनत, ईमानदारी तथा नेकनीयती से काम करते, आपस में मिल बांटकर। यदि किसी वकील के पास काम कम रहता तो दूसरे वकील अपने पास आया मुकदमा खुद उसे दे देते थे। आज की भांति दलालों की तिकड़म से मुवक्किल को फांस कर लाने या छल-प्रपंच से दूसरे को मिलता मुकदमा खुद हथिया लेने की हीन मनोवृत्ति उन्हें छूकर भी नहीं गुजरती थी। आज तो इस बात पर मुश्किल से ही यकीन आएगा कि कभी-कभी आंतरी के मुवक्किल लश्कर (ग्वालियर) जाकर वकील कर आते थे। फिर जब वे वकील तारीख पेशी पर आंतरी आते तो बिना किसी भेदभाव के सिर्फ हमारे यहाँ ठहरते। यहाँ तक कि जब पिताजी के विपक्षी वकील आते तो वे भी हमारे ही मेहमान होते थे। अदालत में जिरह-बहस के दौरान दौनों की कट्टर प्रतिद्वंद्विता मानों गजब ढाती थी, पर अदालत से बाहर आते ही उनका याराना – क्या पूछना!

कहाँ खो गया आदमी?


होली के वे हसीन रंग आज भी मेरे मन से धुल-पुँछ नहीं गए हैं कि बस्ती में सभी छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, हिन्दू-मुसलमान, रंगों-गुलालों से सराबोर एक मंडली बनाकर ढोलकी-मंजीरे की ताल-बेताल पर थिरकते-झूमते, स्वांग बनाए, होली खेलते घूमते थे। जब हमारे यहाँ आते तो बड़े तो बड़े, घर के बच्चे तक उनके साथ बेढब शरारतों के साथ होली खेलते! भीतर जनानखाने में औरतों का तो जिक्र क्या, नाइनें व धोबिनें तक हमारे परिवार की पर्देनशीन महिलाओं से होली खेलकर निहाल हो जाती थीं। मेरे इन्हीं हाथों ने एक बार गोलमटोल थानेदार साहब की आधे तरबूज जैसी मोटी तोंद पर गाढ़ा कोलतार (डामर) लेस दिया था। थानेदार, वकील, न्यायाधीश, डॉक्टर आदि अब पहले से कई गुना अधिक हैं, पर आदमी पता नहीं कहाँ खो गया। आँखें तलाश करती हैं और तरस कर रह जाती हैं।

देव-विग्रह की मुस्कानें

मुहर्रम पर बड़े-बड़े ताज़ियों का जुलूस निकाला जाता। सबके आगे बड़ा पंचायती ताज़िया रहता। इसके निर्माण पर पूरी बस्ती का धन व श्रम लगा होता। जुलूस वाले दिन बाजार में दिनभर उस्ताद जंगीखां रंगरेज और गुरु परमानंद दुबे के अखाड़ों में तैयार पट्ठे लाठी, बिनौट, पटा, चक्र, बल्लम, तलवार के खेल दिखाते। गयासीराम तेली मलखंभ पर कलाबाजी के कौशल पेश करते। हिन्दू-मुसलमान दोनों ही बड़े जोश-खरोश से ढोल-ताशे बजाते। गंगाबाई के पंचायती मंदिर के ठीक सामने जुलूस ठहरता। सामूहिक स्वरों में हजरत हसन हुसैन की शान में मर्सिये गाए जाते। यह आवाज केवल एक इंसानी आवाज होती थी, जिसमें हिन्दू-मुसलिम दोनों के सुर गले मिलते थे। मंदिर में प्रतिष्ठापित श्रीराम और हनुमान की प्रतिमाएं मानों मुस्कानें बिखेरने लगती थीं। आज के भक्तों, सुना तुमने!

मंदिर में मुसलमान

हिन्दू-मुसलमान में हमारे यहाँ कभी रंचमात्र भी भेदभाव नहीं बरता गया। वालिद साहब जिस श्रद्धाभाव से मीलाद शरीफ (पैगम्बर हजरत मुहम्मद के जीवन चरित्र का सस्वर सामूहिक पाठ जो गद्य-पद्य दोनों में होता है) में शरीक होते, उसी श्रद्धा भाव से हिन्दू-मित्रों के यहाँ अखंड रामायण पाठ, भागवत सप्ताह अथवा अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में शरीक रहते। आंतरी में जितने देव मंदिर हैं उनमें सबसे बड़ा मंदिर ‘महन्त साहब वाला मंदिर’ कहलाता है। इस मंदिर की संपत्ति व जायदाद से संबंधित तमाम मुकदमे पिता जी के ही पास थे। मंदिर के वयोवृद्ध महंत गुसाईं गोकुलदास और उनके प्रमुख शिष्य श्री राधिका दास में किसी बात पर उग्र मतभेद हो जाने से जब नौबत अदालत तक जाने की आई, तो पिताजी ने ही दोनों में सुलह-सफाई कराई थी। जब पिताजी यों ही कभी टहलते हुए उधर जा पहुँचते तो महंत जी प्रसन्नवदन उनकी आगवानी में सादर खड़े हो जाते और आग्रहपूर्वक अपनी गद्दी पर ही बिठाते। मंदिर में दो बार विशेष पर्वों पर विशाल सामूहिक भोज का आयोजन होता। बस्ती भर की सातों जात जिमाई जाती। आज के मंदिर वालों को शायद झूठ प्रतीत हो कि मंदिर के भीतर ठीक गर्भगृह के सामने आसन देकर पिताजी (एक मुस्लिम) को वृद्ध महंतजी स्वयं पत्तल परोसकर भोजन कराते थे!

मस्जिद में हिन्दू नमाजी

होली, दीपावली, ईद, बक़र-ईद आदि बड़े त्यौहार बिना किसी भेदभाव के सभी एकसाथ, एक समान हुँसी-खुशी से मिलकर मनाते थे। ईद और बक़र-ईद के वे दृश्य मुझसे कभी भुलाए नहीं जा सकते, जब कस्बे की एकमात्र ईदगाह में (जो कभी एक मुसलमान नाई ने बनवाई थी) सामूहिक नमाज़ पढ़ने के लिए मुसलमान विधिवत पंक्तिबद्ध खड़े होते, तो उनके पीछे हिन्दू भाई भी अपनी एक पंक्ति बना लेते और न केवल नमाज़ की अदायगी में शरीक रहते, बल्कि जब नमाज़ के बाद सामूहिक प्रार्थना (दुआ) की जाती, तो वे भी सबके स्वर में स्वर मिलाए ‘आमीन’ (अर्थात् कुबूल हो) बोलते जाते थे। वह आवाज़ न किसी हिन्दू न किसी मुसलमान की, बल्कि एक इंसानी हृदय से बुलंद होती आवाज़ होती थी।

वह चाहे अयोध्या-कांड से उपजे आँसुओं की चीत्कारें हों या हृदयविदीर्ण रहम की भीख मांगती गोधरा-नरसंहार की दर्दनाक गुहारें, जब मुझे सुनाई पड़ती हैं, तो अतीत की वही एक इंसानी आवाज़ रात गए सन्नाटे में कानों में गूँजती है और आँखों में नमी भर देती है। किसने उस इंसानी आवाज का गला घोंटकर खून कर दिया? धर्म-ईमान के मेरे समकालीन रखवालों, बोलो!

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चर्चित, जुनूनी लेखक - स्वामी वाहिद काज़मी की कई कहानियाँ, वैचारिक लेख, व्यंग्य एवं अन्य रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।



हास्य - व्यंग्य कविताएँ
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पीर हरो नेताजी!
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भूखी आँखें सूखे ओंठ देख रहे हैं तेरी ओर,
इनकी पीर हरो नेताजी।।

शादी को है घर में बाला,
नहीं निवाला इतना ठाला।
यह तो है गरीब का कम्बल,
जितना धोता उतना काला।

तू भी काला फिर भी माला फेंक रहे सब तेरी ओर,
अब तो शरम करो नेताजी।।

हम गुदड़ी में जीने वाले,
नहीं चाहिए शाल दुशाले।
जी.डी.पी. को हम क्या जानें,
हमको तो रोटी के लाले।

वर्षों से प्यासी धरती पर मचा रही मानवता शोर,
कुछ तो रहम करो नेताजी।।

कमर लँगोटी हाथ लकुटिया,
घर क्या है बस टूटी टटिया।
बिखरे बर्तन बुझता चूल्हा,
द्वार पड़ी पुश्तैनी खटिया।

आंखों में अंधियारी छाई घूर रहे कब होगी भोर,
कितनी धीर धरें नेताजी।।

सब हाथों को काम चाहिए,
और नहीं आराम चाहिए।
बेसुर की सब तानें छोड़ो,
आशा को अंजाम चाहिए।

बहुत हो गया कुछ तो सोचो मुड़कर देखो मेरी ओर,
दूर अभी दिल्ली नेताजी।

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जेब की महिमा
**-**
एक दिन राह में, कुछ पाने की चाह में, भटक रहा था...
सहसा, खोपड़ी में कोई बात खटकी,
सीधे जेब में आकर अटकी. मैं सोचने लगा...
आदमी की जेब भी क्या चीज़ होती है?
कभी पाती है, कभी खोती है, कभी जागती है, कभी सोती है,
कभी हँसती है, कभी रोती है।

नरम हो या गरम, हल्की हो या भारी, प्राइवेट हो या सरकारी,
अमीर हो या गरीब यह रहती है दिल के करीब।
प्रारम्भ में जिसने भी जेब बनाई होगी,
आइंस्टीन से भी ज्यादा बुद्धि लगाई होगी।
यदि जेब न होती, सारी दुनिया सोती,
भविष्य की चिन्ताएँ मुँह मोड़ चुकी होतीं,
बहुत सी कलाएँ और प्रतिमाएँ दम तोड़ चुकी होतीं।

राजनीति का फन्दा न होता, परेशान कोई बन्दा न होता,
आँख वाला अंधा नहीं होता, जेबकतरों का धंधा न होता,
हाथ की सफाई न होती, देवर की भौजाई न होती,
मर्द की लुगाई न होती, कुंवारे की सगाई न होती,
आपस में बुराई न होती, अमीर और गरीब के बीच खाई न होती।

जेब सर्दी में ठंड से बचाती है, गर्मी बढ़ाती है, झिझक मिटाती है,
हाथों को टिकाती है, सिद्धांतों को डिगाती है।
रेलगाड़ी में, बस में, खाली में-ठसाठस में,
जाने-अनजाने में, कचहरी में-थाने में, नाच और गाने में,
स्टेशन में, दुकान में, सार्वजनिक स्थान में,
जहाँ भी जाता हूँ, लिखा हुआ पाता हूँ-
‘मेरा भारत महान’, ‘जेब कतरों से सावधान’।

पढ़ते ही दिमाग गड़बड़ाता है, हाथ हड़बड़ाता है,
सीधे जेब में जाता है, टटोल कर पता लगाता है,
बची है कि कट गयी, उतनी ही है कि घट गयी।

अकसर मेरे साथ यह होता है, जब कहीं जाता हूँ,
लोगों की निगाह बचाकर, हाथ जेब में घुसाता हूँ,
हाथ से तुड़े-मुड़े नोट का अनुमान लगाता हूँ,
थोड़ी-थोड़ी देर में यही क्रिया दोहराता हूँ।
बिना कटे, बिना लुटे जब घर आता हूँ,
पत्नी को जेब की ओर झांकते पाता हूँ.

जेब के अनुसार, होता है पत्नी का व्यवहार,
जेब नरम तो पत्नी गरम, जेब गरम तो पत्नी नरम।
जेब पर निर्भर है अपना दाना-पानी,
कटु या मीठी बानी, बुढ़ापा या जवानी।
पत्नियाँ भी जेब के मामले में समझदार होती हैं,
हल्की हो तो बेवफा, भारी हो तो स्वामीभक्त होती हैं।
कुछ बेचारों की मजबूरी है, पत्नी की डांट से बचने हेतु,
जेब गरम रखना जरूरी है।

आपकी जेब से आपकी ज्ञानेंद्रियों का नजदीकी संबंध है,
चेहरे की चमक, मस्तिष्क में उत्साह, पैरों की चाल, हाथ का कमाल
आँखों में शुरूर, मन में गुरूर का जेब से अनुबंध है।
भरी जेब भूख कम करती है, तनाव घटाती है, ब्लडप्रेशर नीचे लाती है,
खाली जेब भूख बढ़ाती है, आदमी को ईमानदार बनाती है,
उसे साहित्यकार – रचनाकार बनाती है।

जहाँ तक दफ़्तरों का सवाल है भाई,
खाली जेब देखकर बाबू लेता है जम्हाई,
काम, कल पर टालता है, फ्री में झंझट कौन पालता है?
कुछ अनुभवी आँखें जेब का वज़न आँक लेती हैं,
बिना स्केल मोटाई नाप लेती हैं। इशारा पाते ही...
होंठ मुस्कराते हैं, हाथ खुजलाते हैं, बिना रुके आपको निपटाते हैं।

आप कहते हैं भ्रष्टाचार है, मैं कहता हूँ स्वदेशी व्यापार है,
आपसी सद्व्यवहार है।
जेब ही असली समाजवाद है, मिल बांट कर खाने का रिवाज है।
आपका पैसा है, चाहे ऊपर वाली जेब में रखें चाहे नीचे वाली,
चाहे टिकिट पैकेट में, चाहे पीछे वाली,
देश का पैसा है, देश की जेब में - चाहे मेरी – चाहे आपकी जेब में।

बड़ी-बड़ी जगहों पर यही जेब अटैची बन जाती है,
एसी कार से आती है, एसी कमरे में समा जाती है.
यह अमीर की अटैची है, गरीब की थैली है,
किसी की सफेद है, किसी की मैली है,
किसी की विकराल है, किसी की फटेहाल है,
किसी की काल है और किसी की ढाल है,
जेब के पीछे सारी दुनिया बेहाल है,
अपना भी यह जो हाल है, इस जेब का ही कमाल है।

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रचनाकार – टेक्नोक्रेट मोहन द्विवेदी की कविताएँ, गीत एवं कथा साहित्य देश की प्रतिष्ठित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. आपको अनेकों साहित्यिक सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं. आप काव्य मंचों में काव्यपाठ भी करते हैं.

मोहन द्विवेदी की दो कविताएँ :

जब चला था छोड़कर
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उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर
संबंध अभिशापित हुए अनुबंध सारे तोड़कर।

धूल पगडंडी की पूछी लौटकर कब आओगे?
दौड़ नंगे पाँव मुझको देह से लिपटाओगे।
खिलखिलाकर हँस रहा था चन्दा मामा गांव में,
लोरियाँ नानी की छोड़ा श्वेत आँचल छांव में।

सब दूरियाँ बढ़ती गयीं मजबूरियों को जोड़कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

खो गयी सावन की कजरी और होरी-फाग भी,
छिन गयीं अगहन की सांझें और साझी आग भी।
हो गयी हैं मौन, गलियों की मधुर किलकारियाँ,
मन के उपवन में हमेशा चल रहीं अब आरियाँ।

संवेदना आहत हुई अभिव्यंजना झकझोर कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

शान्त था चौखट पुराना रो रही थीं ड्योढ़ियाँ,
पग बढ़े तो पास आ पूछीं पुरानी पीढ़ियाँ।
रह गयी थी क्या कमी मेरी कमाई में बता?
कौन है अपना सहारा इस बुढ़ाई में बता?

तब कल्पना कुंठित हुई करूणा चली मुँह मोड़कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।

छीनकर अंधे की लाठी भाग आया गांव से,
ठोकरें खाने लगा हूँ अब शहर के पाँव से।
स्वप्न-सी लगने लगीं अनुभूतियाँ अब प्यार की,
यंत्रवत् जीने लगा हूँ जिन्दगी औज़ार सी।

सुख-चैन निद्रा में रमे दुःख-दर्द सारे ओढ़कर।
उस रास्ते के मोड़ को जब मैं चला था छोड़कर।।


**-/**
गीतः रे! मन

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तुम वेदना के तीर का, कब तक सहोगे वार रे मन,
इस निर्दयी संसार को, कितना करोगे प्यार रे मन।

वीरान हो जाएंगी ये, खिलते कुसुम की घाटियाँ,
छूट जाएंगी धरा पर, धर्म की परपाटियाँ।
सहज तो इतना नहीं है, फूल काँटों को बनाना,
रोक पाओगे न उनको, काम जिनका है सताना।

अज के गले में फूल का, कब तक बनोगे हार रे मन।।
इस निर्दयी संसार को, कितना करोगे प्यार रे मन।

पथ छोड़कर तुम सत्य का, भटकोगे कब तक राह में,
मरते रहोगे हर घड़ी तुम, जिन्दगी की चाह में।
सुनसान रह जाएंगी ये, कोमल हृदय की धड़कनें,
कुछ न कर पाओगे तुम, आती रहेंगी अड़चनें।

इस मदभरी मझधार को, कैसे करोगे पार रे मन।।
इस निर्दयी संसार को, कितना करोगे प्यार रे मन।

भूल जाओ वह दुपहरी, कूप बट की छांव में,
नाचती गाती थी परियाँ, जब क्षितिज के गांव में।
खो गई वह हवन ज्वाला, चिमनियों के गर्भ में,
अब नहीं चर्चा घरों में, ज्ञान के सन्दर्भ में।

तुम गीत फागुन का लिखे थे, आ गया है क्वार रे मन।।
इस निर्दयी संसार को, कितना करोगे प्यार रे मन।

उड़ रहे जो पास तेरे, छुद्र भौरों की तरह,
चूस रस ये भी तो, हट जाएंगे औरों की तरह।
शेष रह जाएंगी बस, बीते जनम की ठठरियाँ,
आवागमन होता रहेगा, ढोते रहोगे गठरियाँ।

मूर्ति जो उर में बसाए आँखें करो अब चार रे मन।।
तुम वेदना के तीर का, कब तक सहोगे वार रे मन।।

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रचनाकार – टेक्नोक्रेट मोहन द्विवेदी की कविताएँ, गीत एवं कथा साहित्य देश की प्रतिष्ठित शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं. आपको अनेकों साहित्यिक सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं. आप काव्य मंचों में काव्यपाठ भी करते हैं.

- राजकुमार कुम्भज

अपने आका को ‘सर’ कहने की प्रथा का आविष्कार अंग्रेज़ों ने किया. हम भारतीयों में अपने आकाओं को ‘सर’ कहने की प्रथा को प्रतिष्ठित करने का श्रेय भी अंग्रेजों को ही जाता है. अंग्रेज़ों ने हम भारतीयों पर बड़ा उपकार किया, जो वे यहाँ आए, दो सौ बरस तक हमें दास बनाए रखा और अपने आकाओं-चाकरों को ‘सर’ कहने-कहलाने की सीख दे गए. अगर अंग्रेज भारत नहीं आते, हमें दास नहीं बनाते, हम पर कोड़े नहीं बरसाते, तो हम अपने सिर में ‘सर’ कैसे घुसा पाते? अब तो हर तरफ़ ‘सर’ ही ‘सर’ दिखाई देते हैं. ऐसे में कभी किसी को लगता नहीं क्या कि अब ‘सर’ का सर कलम करने का समय आ चुका है.

हमारे प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ऑक्सफ़ोर्ड जाकर अंग्रेजों की प्रशंसा कर आए. हमें भी करना चाहिए. हमारे प्रधान मंत्री हमारे ‘सर’ हैं. उधर हमारे ‘सर’ के भी कई-कई ‘सर’ हैं. जैसे – लालू ‘सर’, पासवान ‘सर’, सुरजीत ‘सर’, येचुरी-करात ‘सर’ वग़ैरा वग़ैरा. ‘सर’ कहते रहने के अनेकानेक लाभ हैं. पाँव में रहने का दासत्व स्वीकारने वाला जूता कभी क्रांतिकारी बन कर किसी ‘सर’ के सिर की कपाल क्रिया कर सकता है. अतः जो महानुभाव अपनी कपाल क्रिया करवाने से बचे रहना चाहते हैं वे अपने आकाओं को अदब से ‘सर’ कहना न छोड़ें. इस मूल मंत्र का ध्यान हमेशा रखें-

सौ बला की एक बला
‘सर’ कहा तो सब भला
और इसी में भाई बाबा-
बोतलदास का भी भला

मनुष्यता का अस्तित्व कहीं हो या न हो, किंतु ‘सर’ का अस्तित्व हर कहीं सहज ही उपलब्ध है. मुंशी मुनीम को ‘सर’ कहता है, मुनीम मालिक को ‘सर’ कहता है, मालिक ग्राहक को ‘सर’ कहता है, ग्राहक बैंक-मैनेजर को ‘सर’ कहता है, बैंक-मैनेजर, म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के दारोग़ा को ‘सर’ कहता है, दारोग़ा अपने बॉस को सर कहता है और बॉस, इलेक्शन में जीते मुंशी को ‘सर’ कहता है. सर कहने का यह चक्र बड़ा लंबा और सर्वव्यापी है. ‘सर’ आदि है, अनादि है. ‘सर’ अनंत है. ‘सर’ अमर है. संसार भले ही असत्य लगे, मिथ्या लगे, परंतु ‘सर’ अकाट्य सत्य है- वैसे ही- जैसे राम नाम सत्य है.

‘सर’ कहना आधुनिकता है या पिछड़ापन? गांव का पिछड़ा ‘सर’ को नहीं जानता. लिहाजा, ‘सर’ कहना अवश्य ही आधुनिकता है. जो पिछड़े हैं वे अपने आका को ‘सर’ नहीं कहते हैं- पर जो आधुनिक हैं वे ‘सर’ कह-कह कर अपने आकाओं का सिर खा जाते हैं. ‘सर’ कहने कहलाने वालों का कर्तव्य है कि वे इससे मुक्ति पाने का प्रयास कभी नहीं करें. ऑस्ट्रेलिया के लोग तो पिछड़े हैं जिन्होंने ‘सर’ कहने-कहलाने से मुक्ति पा ली है. वहाँ ‘सर’ की बजाए ‘मेट’ बोला जाता है, जिसका अर्थ होता है ‘साथी’. किसी समय वहां के कुछ आधुनिक सांसदों-मंत्रियों तथा अन्य नौकरशाहों को अपने सुरक्षा कर्मियों – ड्राइवरों द्वारा ‘मेट’ पुकारा जाना चुभने लगा तो आदेश जारी कर दिया गया कि ‘मेट’ नहीं ‘सर’ पुकारा जाए. पर इस आदेश के विरूद्ध समूचा ऑस्ट्रेलिया सिर के बल खड़ा हो गया. हंगामा खड़ा हो गया कि क्यों किसी को ‘सर’ कहे? यह तो औपनिवेशिक मानसिकता है, जिसमें ‘सर’ सुनने वाला मालिक है और ‘सर’ कहने वाला ‘दास’. तब झख़ मारकर ऑस्ट्रेलियन सरकार को अपना आदेश वापस लेना पड़ा. वो तो पिछड़े लोग थे, ऑस्ट्रेलिया के, इसी लिए इस आदेश को वापस ले लिए. देखो, अपना भारत, कितना आधुनिक है, अभी भी ‘सर’ को सर पर पहने हुए शान से चल रहा है.
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रचनाकार - राजकुमार कुम्भज जाने माने कवि-व्यंग्यकार हैं. आपकी कविताएँ तथा व्यंग्य रचनाएँ तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

हिन्दी साहित्य के पितामह भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दो हास्य ग़ज़लें
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(भारतेन्दु हरिश्चन्द्र संस्कृत, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बँगला के भी विद्वान थे तथा संगीत, धर्म, दर्शन सब में माहिर थे. मात्र 35 वर्षों के जीवन काल में ही (9 सितंबर 1850- 6 जनवरी 1885) भारतेन्दु ने इतना कुछ साहित्यिक सृजन कर लिया, वह भी उस दौर में जब साहित्यिक-सहूलियतों का घोर अकाल था – ऐसी मिसाल कम ही मिलती है. उस जमाने में भी भारत की दशा संभवतः वही थी जो आज है- बानगी देखिए –चूरन साहब लोग जो खाता, सारा हिन्द हजम कर जाता.)

**-**
हज़ल
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नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से
तंग आया हूँ मैं इस पुरसोज़ दिल के साज से

दिल पिसा जाता है उनकी चाल के अन्दाज़ से
हाथ में दामन लिए आते हैं वह किस नाज़ से

सैकड़ों मुरदे जिलाए ओ मसीहा नाज़ से
मौत शरमिन्दा हुई क्या क्या तेरे ऐजाज़ से

बाग़वां कुंजे कफ़स में मुद्दतों से हूँ असीर
अब खुलें पर भी तो मैं वाक़िफ नहीं परवाज़ से

कब्र में राहत से सोए थे न था महशर का खौफ़
वाज़ आए ए मसीहा हम तेरे ऐजाज़ से

बाए गफ़लत भी नहीं होती कि दम भर चैन हो
चौंक पड़ता हूँ शिकस्तः होश की आवाज़ से

नाज़े माशूकाना से खाली नहीं है कोई बात
मेरे लाश को उठाए हैं वे किस अन्दाज़ से

कब्र में सोए हैं महशर का नहीं खटका ‘रसा’
चौंकने वाले हैं कब हम सूर की आवाज़ से

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ग़ज़ल जबानी शुतुरमुर्ग परी हसब हाल अपने के
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गाती हूँ मैं औ नाच सदा काम है मेरा
ए लोगो शुतुरमुर्ग परी नाम है मेरा

फन्दे से मेरे कोई निकलने नहीं पाता
इस गुलशने आलम में बिछा दाम है मेरा

दो-चार टके ही पै कभी रात गंवा दूं
कारुं का खजाना तभी इनआम है मेरा

पहले जो मिले कोई तो जी उसका लुभाना
बस कार यही तो सहरो शाम है मेरा

शुरफा व रूज़ला एक हैं दरबार में मेरे
कुछ खास नहीं फ़ैज तो इक आम है मेरा

बन जाएँ चुगद तब तो उन्हें मूड़ ही लेना
खाली हों तो कर देना धता काम है मेरा

ज़र मज़हबो मिल्लत मेरा बन्दी हूँ मैं ज़र की
ज़र ही मेरा अल्लाह है ज़र राम है मेरा

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बन्द गली का द्वार

-पुष्पा रघु

‘ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन’ फोन की घंटी बजी तो सुजाता यह कहते हुए लपकी - ‘लंबी घंटी है. लगता है कहीं दूर का फोन है’ - “हलो! हाँ, सुशांत, सुनाओ क्या हाल है?” उसका अनुमान ठीक ही था. लखनऊ से उसके भाई सुशांत का फोन था- “दीदी यहाँ उर्वी के लिए एक लड़का है – बैंक मैनेजर, परिवार भी सुशिक्षित, संस्कारित है.” सुजाता ने कहा- “पर उर्वी के लिए तो सुरेश के पोते से बात हो गई है. कैप्टन है. हां हां, वही अपनी गली वाला सुरेश.”

“नई दिल्ली की खुली हवा में रही उर्वी को कहाँ भेज रही हो दीदी? बंद गली के अंतिम छोर पर उनका वह सीलन भरा अँधेरा मकान! कैसे रह पाएगी वह?” सुशांत बोला.

“तुम तीस-पैंतीस साल पहले की बात कर रहे हो. सुशांत! उस गली और उस मकान को तुम अब देखो तो पहचान ही न पाओ. क्या आलीशान बँगला बनवाया है सुरेश ने! गली के अंत में जो खंडहर था, उसे तुड़वाकर उधर भी द्वार खुलवा दिया है.” सुजाता ने उत्तर दिया.

“फिर भी दीदी कहाँ हमारा परिवार और कहाँ एक दूध वाले का परिवार! पैसा होने से संस्कार तो नहीं बदल जाते.” चिंता जताई सुशांत ने.

“नहीं सुशांत! मैं नहीं मानती इन बातों को. सुरेश को मैं बचपन से ही जानती हूँ. कोई कमी नहीं है उसमें. देखाभाला परिवार, सुंदर-योग्य लड़का और क्या चाहिए? बीते कल को पकड़कर क्यों बैठें? फिर हमें तो मानता भी बहुत है.” सुजाता बोली. फिर सोचने लगी- यह बात तो सत्य है कि सुरेश दूधवाले का लड़का है, पर लगन-परिश्रम, बुद्धि, विनम्रता से कितनी ऊँचाई पर पहुँच गया! – सुजाता स्मृति के पंखों पर सवार हो पहुँच गई अतीत के उपवन में – सुजाता का घर और सुरेश का घर था तो एक ही गली में, पर सुजाता का घर था गली के मुख्य द्वार से सटा, जहाँ गली बहुत खुली और चौड़ी थी. खूब बड़ा आलीशान मकान था और बाहर था एक चौड़ा चबूतरा. सारे दिन वहाँ बच्चे खेलते. सर्दी की दोपहरी में दादियों-ताइयों की पंचायत जुड़ती थी वहाँ और शाम को सजती सुजाता के ताऊ जी की हुक्का महफिल! सुजाता को आज भी वह सोंधी सुगंध याद है, जब गर्मियों में शाम को नौकर के चबूतरे पर छिड़काव करने से उठती थी. ठंडक करने के बाद वहाँ मूढ़े और चारपाई डाल दी जातीं. गली के बुजुर्ग वहाँ बैठ गपशप करते, हुक्का गुड़गुड़ाते और बैठक में बजते रेडियो से समाचार अथवा देहाती कार्यक्रम सुनते.

सुरेश का घर गली के अंतिम सिरे पर था. वहाँ गली बहुत संकरी और बंद थी. छोटा सा मकान था – दो-तीन कोठरी, एक कोठा, दो खटिया का आँगन. न सूर्य का प्रकाश न बिजली का. उस घर के साथ एक टूटा-फूटा गुम्बज था, जिसने गली का अन्तिम सिरा बंद कर रखा था. बड़ा ही डरावना और रहस्यमय था वह गुम्बज का खंडहर!

सभी बुजुर्गों की वर्जना थी - ‘खंडहर में मत जाना, भूत रहते हैं.’ वैसे सुरेश के परिवार के प्रति सुजाता के घरवालों तथा गली के अन्य परिवारों की राय अच्छी न थी. परंतु गली के बच्चों का विशेष रूप से सुजाता का सुरेश के साथ खेले बिना काम न चलता. सुरेश की छठीं बहन मनभरी से भी सुजाता का बहुत मेल था. सुरेश छह बहनों का इकलौता सबसे छोटा लड़का था. उसके पिता दूध बेचकर परिवार पालते थे. थोड़ी खेती भी थी, पर पैदावार कम ही थी. बड़ी गरीबी व अभाव में पला था सुरेश, परंतु पढ़ाई में तेज होने के कारण निरंतर प्रथम आता तथा छात्रवृत्ति पाता था.

सुरेश और सुजाता दसवीं कक्षा में थे शायद जब मनभरी का विवाह हो गया. सुजाता को घर से निकलने के अवसर अब कम ही मिलते थे. दादी जी का आदेश था - “बहुत हो गए खेल तमाशे. अब घर के काम-काज, लक्खन-शऊर सीखो! दूसरे घर जाना है.”

अतीत की ग़लियों में न जाने सुजाता कितनी देर घूमती, किन्तु अनुपम ऑफ़िस से आ गया और बोला - “क्या हुआ मम्मी, किस सोच में डूबी हो?”

“कुछ नहीं, बस यूँ ही अपने और सुरेश के बचपन को याद कर रही थी. तुम्हारे मामा जी का फोन आया था – उर्वी के लिए लड़का बता रहा था. मैंने कह दिया कि उसका रिश्ता तो सुरेश के पोते अनुरूद्ध से पक्का हो गया है.”

‘मम्मी अभी तो बात ही की है आपने, पक्का कहाँ से हो गया? मामा जी से भी पूछ लेना चाहिए था. एक दो लड़के निगाह में रहें तो बुरा क्या है?’

‘अनिरुद्ध जैसा सुयोग्य लड़का कहाँ मिलेगा? सुरेश जैसा भलामानस आज की दुनिया में मिलेगा कहाँ? कितना संघर्ष किया, कितनी उन्नति की है! तूने तो देखी है न वह शुगर मिल जिसका वह जी. एम. था. उसके दोनों बेटे नरेश और प्रवेश स्थापित डॉक्टर हैं, दामाद एक्जीक्यूटिव इंजीनियर है, पोता चौबीस साल की उम्र में ही कैप्टन बन गया. शानदार महल सा बँगला, चार-चार गाड़ियाँ, आम-अमरूद के लाखों की आय देने वाले बाग़. फिर भी कितना विनम्र है बंदा! उड़द पर सफेदी जितना भी घमण्ड नहीं है उसे.’ सुजाता एक ही सांस में कह गई.

“यही तो सोचना है कि अब वे इतने पैसे वाले हैं, इतने ठाठ-बाट हैं उनके तो...” अनुपम ने कहा, पर सुजाता उसकी बात काटती हुई बोली - “तो क्या? तू तो जानता है कि सुरेश कितना मानता है हमें! अपने यहाँ के हर फंक्शन में कितने आदर-प्यार से बुलाता है. हर होली-दीवाली मिलने आता है. कई बार कह चुका है- ‘सुजाता मैं तो चाहता हूँ कि हमारी बचपन की मित्रता रिश्तेदारी बनकर आगे भी चलती रहे.”

“मम्मी, सुरेश मामा जी की बात और है पर उनके बेटे-पोते तो अमीरी में ही पले-बढ़े हैं. उनके विचार भी अपने पिता या दादा जी जैसे हों, यह आवश्यक तो नहीं.”

अनुपम ने अपना सन्देह जाहिर किया. पर सुजाता ने यह कह कर बात समाप्त कर दी -“अरे तो मेरी पोती क्या ऐसी-वैसी है? रूप में लक्ष्मी, बुद्धि में सरस्वती, जे.एन.यू से एम.एस.सी किया है उर्वी ने. कोई भी उसे पाकर स्वयं को कृतार्थ समझेगा.”

अमिता पति और सास की मीठी नोंक-झोंक पर पटाक्षेप करती हुई बोली- “अब आप लोग चाय-पकौड़ों का आनन्द लीजिए. लो पापा भी आ गए.”

बसंत पंचमी का दिन था. सुजाता का बँगला बासंती फूलों और पर्दों से सजा था. सुरेश का परिवार उर्वी की मंगनी करने को आ रहा था. सुजाता के निकट संबंधी रात को ही आ गए थे. क्योंकि वर पक्ष ने ग्यारह बजे का समय बताया था आने का. पहले नाश्ता फिर लंच. सभी बड़े उत्साहित-उत्कंठित थे. प्रतीक्षा की घड़ियां वैसे ही लम्बी होती हैं, पर यहाँ तो दो बज गए. सभी बेचैन हो रहे थे. सुजाता के पति झुंझला रहे थे- “यार! भारत के लोग समय का मूल्य कब समझेंगे? ये नवकुबेर तो किसी की परवाह करना जानते ही नहीं. आने दो सुरेश को, कहूँगा- क्यों बे साले!...”

अनुपम घबराकर बोला-‘पापा प्लीज, ऐसा कुछ मत कहिएगा. अब हम लड़की वाले हैं.’

उसकी घबराहट देख सभी हँस पड़े. तनाव के बादल कुछ छंटे. तभी गेट पर गाड़ी रूकती दिखाई दी. सभी लपककर अगवानी के लिए पंहुचे. आठ-दस गाड़ियाँ थीं. नरेश-प्रवेश का परिवार, नरेश के ससुराल वाले. सुरेश और उसकी पत्नी प्रमिला नहीं थे. सुजाता ने कहा-“बड़ी देर कर दी नरेश! पापा-मम्मी और भी देर से आएंगे क्या?”

“आंटी, पापा की तबीयत खराब थी, मम्मी उन्हें छोड़कर कैसे आतीं?”

उत्तर दिया नरेश की पत्नी, अनिरुद्ध की मां ने. सुजाता को अच्छा नहीं लगा, पर क्या उपाय था. अतिथियों को हाल में बिठा दिया. बैरे ड्रिंक्स स्नैक्स सर्व कर रहे थे. परिचय का दौर चल रहा था. सुजाता को बोलना पड़ा- “पहले आप लोग भोजन कर लें. काफी देर हो चुकी है.”

लॉन में ही मेजें लगाई गईं थीं. बड़े नखरे से वे लोग बाहर पधारे. हालांकि बाहर मौसम बहुत खुशगवार था. हवा में शीतलता थी, पर गुनगुनी धूप सुहावनी लग रही थी. पुरूष पर्ग सूट-बूट में डटा था, पर महिलाएँ! वे प्रायः सभी अजीबोगरीब परिधान, केश सज्जा व प्रसाधन में किसी पिक्चर के प्रीमियर का सा दृश्य उपस्थित कर रही थीं. उनकी भड़कीली पोशाकें आभिजात्य को उजागर करने में असमर्थ थीं. हाँ, उनके अंगों को अनावृत कर उनकी अभिरूचि व मनोवृत्ति को अवश्य दर्शा रही थीं.

अनिरूद्ध अपने मित्रों के साथ अपनी मौसी की बगल में बैठा था. मौसी ने कटस्लीव व डीप गले की शर्ट और पैरेलल पहना हुआ था. भांजे के इशारे पर अंग्रेजी नुमा हिन्दी में बोली- “हे! पहले ब्राइड को तो बुलाओ. काहां छीपा के रखा हय?”

किसी ने दहला फेंका- “शायद अभी वो ब्यूटी पार्लर से नहीं आई.”

सुजाता ने क्रोध दबाकर इतना ही कहा- “उर्वी ब्यूटी पार्लर नहीं जाती न ही उसे वहाँ जाने की आवश्यकता है. प्रज्ञा, जाओ उर्वी को ले आओ.” उर्वी आ गई तो जैसे बसंत ऋतु सशरीर उपस्थित हो गई. मैरून किनारे की बाती साड़ी, नितंब चुंबी केशों की ढीली-सी बेरी में पीले गुलाबों का गजरा, न कोई मेकअप न आभूषण, मंद मंद पग धरती सबके बीच में आ खड़ी हुई. अपनी सलज्ज सीपी-सी पलकों को उठा, कोमल हाथों को जोड़कर जब उसने ‘नमस्कार’ कहा तो जैसे वीणा के तार झंकृत हो उठे. एक बारगी सभी जैसे पलकें झपकाना भूल गए, परंतु सुजाता ने नोट किया- अनिरुद्ध के मुख पर मुग्धता का भाव नहीं था. क्रीम रंग का सूट पहने यद्यपि वह स्वयं भी राजकुमार-सा जंच रहा था, परंतु उर्वी तो स्वर्ग से उतरी अप्सरा को भी मात दे रही थी. उस मौन को तोड़ा अनिरुद्ध के मित्र की आवाज ने- “यार केप्टन! अब तो तुझे तपोवन में जाना पड़ेगा.”

हल्का सा हंसी का फव्वारा छूटा. बार-बार आग्रह करने पर खाना शुरू हुआ. अनिरूद्ध की मौसी-मामियों को जैसे कुछ भा ही नहीं रहा था. व्यंजनों से भरी-भरी प्लेटें टेबल के नीचे सरकाई जा रही थीं. अनुपम ने सबसे मंहगे व बढ़िया होटल से खाने की व्यवस्था कराई थी. सुजाता के शिक्षित सुसंस्कारित परिवार को यह गंवारपन देख कर बड़ी कोफ्त हो रही थी. सुजाता का संवेदनशील हृदय कह रहा था- ‘हजारों लोग यहाँ भूखे सो जाते हैं और कुछ बेरहम अन्न का ऐसा अनादर करते हैं.’ पर अवसर की नजाकत को देख मौन साधना पड़ रहा था.

एक कमरे में काफी देर तक विचार-विमर्श करने के पश्चात् नरेश की पत्नी ने एंगेजमेंट की रस्म पूरी की. नरेश बहुत गम्भीर था और अनिरूद्ध उखड़ा-उखड़ा. ऐसे मूड में ही उसने अंगूठी पहनी व पहनाई. महिलाएँ सब व्यंग्य-विद्रूप से भरी हुई थीं. उनके व्यवहार में अमीरी का फूहड़ दिखावा था. सुजाता परिवार के महंगे व सुरूचिपूर्ण उपहारों को भी बड़ी उपेक्षा से स्वीकार किया उन्होंने.

उनको विदा करते-करते सुजाता तन-मन से थककर चूर हो चुकी थी. औरों की हालत भी ऐसी ही थी. सभी के दिलों में कुछ खटक रहा था, पर उस अव्यक्त को कोई व्यक्त नहीं कर पा रहा था, अथवा करना नहीं चाह रहा था.

सुजाता सोच रही थी कि सुरेश अपने न आ सकने का कारण बताने की औपचारिकता तो निभाएगा ही. वह तब कहेगी- “हाँ भई! अब तुम लड़के वाले हो, वर के दादा हो, नखरे तो दिखाओगे ही.” तभी विवाह की तिथि के विषय में भी बात कर लेगी. परंतु दो-तीन दिन बीत गए, सुरेश के यहाँ से फोन नहीं आया. कई विचार उसके मन-मष्तिष्क को मथने लगे. उसने फोन किया. उधर नरेश ने फोन उठाया. सुजाता ने कहा- “जरा सुरेश को फोन दो नरेश!”

“आंटी पापा को तो हार्ट-अटैक हो गया है.” सुजाता को झटका लगा-“कब? कहाँ? घर पर हैं या हॉस्पिटल में? आते हैं हम लोग.”

“नहीं नहीं, प्लीज आप लोग मत आइए.” नरेश जैसे घबराकर जल्दी से बोला.

“क्या कह रहे हो तुम? सुरेश को हार्ट-अटैक हुआ है और हम आएं भी नहीं.” सुजाता चकरा कर बोली.

“क्या बताएँ? आंटी आपको तो बताना ही पड़ेगा.” अटकते रुकते नरेश ने कहना प्रारंभ किया- “बात यह है कि पापा अनिरूद्ध के रिश्ते को लेकर बहुत अपसेट हैं. आपसे कुछ कह नहीं सकते. आप तो जानती हैं कि आजकल के बच्चे अपने फैसले आप करते हैं. वे मां-बाप को ही नहीं गिनते, दादा-दादी की कौन कहे? अनिरूद्ध मिलिट्री में कैप्टन है, वह कहता है मुझे तो मॉड लड़की चाहिए, कोई शकुंतला नहीं. वेरी सॉरी आंटी! आप कभी आकर अपना सामान ले जाएं, हमारा दे जाएं. पापा से कुछ मत कहिएगा- हम खाने-पीने का खर्चा भी दे देंगे.”

सुजाता के हाथ से फोन छूट गया और वह गिरा वहीं मेज पर सजे उर्वी के बनाए मॉडल पर. छनाक की आवाज के साथ मॉडल टूट गया और कांच बिखर गया. सुजाता के मुँह से निकला - “हाय राम! ये क्या हो हुआ?”

उर्वी दौड़ी आई- “दादी मां, जाने दो! कांच का था, टूट गया. और बन जाएगा. यह बताओ आपको कांच चुभा तो नहीं?”

कैसे कहे सुजाता- एक मॉडल, एक आदर्श जिसे वह बचपन से सहेजती आ रही थी, संजोती आ रही थी, बेशकीमती था उसके लिए, वह टूटकर बिखरा ही नहीं, उसकी किरचें चुभकर आहत कर गई हैं उसे कहीं बहुत गहरे तक!

सुशांत ठीक कहता था- संस्कार नहीं बदलते. सुरेश ने गुम्बज का खंडहर तो तुड़वा दिया, परंतु फिर भी संस्कारों की गली का बंद द्वार नहीं खुलवा सका- सुजाता ने सोचा. एक दीर्घ सांस निकल गई उसके मुख से.
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कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित रचनाकार पुष्पा रघु के बहुत से कहानी संग्रह / बाल-कथा संग्रह तथा बालगीत संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं.
पुष्पा रघु की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर पढ़ें – श्रद्धांजलि – (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_13.html ) तथा बूढ़ा बचपन (http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_08.html )

चित्र सौजन्य- सृजन कैमरा क्लब, रतलाम

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