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November 2005
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प्राचीन समय की बात है. एक नगर में अत्यंत समृद्ध सेठ रहता था. उसकी अत्यंत रुपवती विवाह योग्य कन्या ने अपने विवाह के लिए बड़ी विचित्र किस्म की शर्त रखी थी. शर्त यह थी कि जो युवक कीचड़ से भरे तालाब में नख-शिख तक डुबकी लगाने के उपरांत एक गिलास जल से अपने शरीर को भली प्रकार साफ कर लेगा, उसी से वह विवाह करेगी.

यूँ तो शर्त आसान सी प्रतीत होती थी, परंतु सैकड़ों युवक इस कोशिश में असफल रहे थे. एक गिलास पानी में समस्त शरीर का कीचड़ भला कैसे साफ हो सकता था. सेठ को अपनी कन्या के विवाह की चिन्ता सता रही थी. परंतु उस रुपवती कन्या का कहना था कि कोई न कोई बुद्धिशाली युवक किसी दिन आएगा और उसकी इस शर्त को पूरा कर उसे ब्याह ले जाएगा. अन्यथा, उसे कुंवारी रहना ही मंजूर है.

अंततः दूर देश के एक अत्यंत चतुर युवक को इस स्वयंवर के बारे में पता चला. वह उस रुपवती कन्या से ब्याह रचाने चल पड़ा. उसने कीचड़ भरे तालाब में डुबकी लगाई और धूप में खड़ा हो गया. फिर साथ लाए बांस की पतली कमचियों से कीचड़ को छीलकर-रगड़-रगड़ कर छुड़ाया. धूप में शरीर का बाकी बचा कीचड़ जब सूखकर महीन धूल में परिवर्तित हो गया तो उसने उसे भी रगड़ कर और झाड़कर साफ कर लिया. तदुपरांत एक गिलास जल से उसने अपने हाथ, और मुँह धो लिए. वह अत्यंत स्वच्छ, सद्यः स्नान किया हुआ प्रतीत हो रहा था.

रुपवती कन्या ने यह देखने के बाद अपने विवाह की स्वीकृति दे दी.

परंतु युवक ने कहा – नहीं. विवाह से पहले मैं भी इस कन्या की परीक्षा लूंगा. इसे भी मेरी परीक्षा में खरा उतरना होगा तभी मैं इससे विवाह करूंगा, अन्यथा नहीं. उसने उस रुपवती कन्या को एक सेर धान देते हुए कहा – अगर तुम सिर्फ इन्हीं और इतने ही धान का उपयोग कर मुझे छप्पन प्रकार के व्यंजन बनाकर मुझे भर पेट खिला सकती हो, तब तो तुम मेरी जीवनसंगिनी बनने के काबिल हो, अन्यथा नहीं.

उस रुपवती कन्या ने वह परीक्षा स्वीकार की और उसकी इस शर्त को पूरा करने के लिए उससे एक वर्ष का समय मांगा.

एक वर्ष बीतने के पश्चात् निश्चित समय पर वह युवक उस रुपवती कन्या के पास पहुँचा. उस रुपवती कन्या ने उसके लिए छप्पन प्रकार के विविध पकवान थालों में भर-भर कर सजा रखे थे. भोजन ग्रहण करने से पहले उस युवक ने आश्चर्य मिश्रित प्रसन्नता से पूछा – एक सेर धान से तुमने इतने सारे पकवान कैसे तैयार कर लिए?

उस रुपवती कन्या ने जवाब दिया – मैंने एक वर्ष का समय आपसे इसीलिए तो चाहा था. मैंने सेर भर धान को बढ़िया खेतों में बुआई करवाई और उसकी अच्छी फसल लेने के उपरांत उससे सौदा कर पकवानों की सामग्रियाँ ले लीं और इतने पकवान तैयार किए हैं. इन पकवानों में एक सेर धान और मेरी मेहनत के अलावा और कुछ भी नहीं लगा है.

इस प्रकार, उस चतुर युवक और रुपवती कन्या का बड़े ही धूमधाम से ब्याह हो गया.

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बीरबल की खिचड़ी

एक दफा शहंशाह अकबर ने घोषणा की कि यदि कोई व्यक्ति सर्दी के मौसम में नर्मदा नदी के ठंडे पानी में घुटनों तक डूबा रह कर सारी रात गुजार देगा उसे भारी भरकम तोहफ़े से पुरस्कृत किया जाएगा.

एक गरीब धोबी ने अपनी गरीबी दूर करने की खातिर हिम्मत की और सारी रात नदी में घुटने पानी में ठिठुरते बिताई और जहाँपनाह से अपना ईनाम लेने पहुँचा.

बादशाह अकबर ने उससे पूछा – तुम कैसे सारी रात बिना सोए, खड़े-खड़े ही नदी में रात बिताए? तुम्हारे पास क्या सबूत है?

धोबी ने उत्तर दिया – जहाँपनाह, मैं सारी रात नदी छोर के महल के कमरे में जल रहे दीपक को देखता रहा और इस तरह जागते हुए सारी रात नदी के शीतल जल में गुजारी.

तो, इसका मतलब यह हुआ कि तुम महल के दीए की गरमी लेकर सारी रात पानी में खड़े रहे और ईनाम चाहते हो. सिपाहियों इसे जेल में बन्द कर दो - बादशाह ने क्रोधित होकर कहा.

बीरबल भी दरबार में था. उसे यह देख बुरा लगा कि बादशाह नाहक ही उस गरीब पर जुल्म कर रहे हैं. बीरबल दूसरे दिन दरबार में हाजिर नहीं हुआ, जबकि उस दिन दरबार की एक आवश्यक बैठक थी. बादशाह ने एक खादिम को बीरबल को बुलाने भेजा. खादिम ने लौटकर जवाब दिया – बीरबल खिचड़ी पका रहे हैं और वह खिचड़ी पकते ही उसे खाकर आएँगे.

जब बीरबल बहुत देर बाद भी नहीं आए तो बादशाह को बीरबल की चाल में कुछ सन्देह नजर आया. वे खुद तफतीश करने पहुँचे. बादशाह ने देखा कि एक बहुत लंबे से डंडे पर एक घड़ा बाँध कर उसे बहुत ऊँचा लटका दिया गया है और नीचे जरा सा आग जल रहा है. पास में बीरबल आराम से खटिए पर लेटे हुए हैं.

बादशाह ने तमककर पूछा – यह क्या तमाशा है? क्या ऐसी भी खिचड़ी पकती है?

बीरबल ने कहा - माफ करें, जहाँपनाह, जरूर पकेगी. वैसी ही पकेगी जैसी कि धोबी को महल के दीये की गरमी मिली थी.

बादशाह को बात समझ में आ गई. उन्होंने बीरबल को गले लगाया और धोबी को रिहा करने और उसे ईनाम देने का हुक्म दिया.


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मासूम सज़ा

एक दिन बादशाह अकबर ने दरबार में आते ही दरबारियों से पूछा – किसी ने आज मेरी मूंछें नोचने की जुर्रत की. उसे क्या सज़ा दी जानी चाहिए.

दरबारियों में से किसी ने कहा – उसे सूली पर लटका देना चाहिए, किसी ने कहा उसे फांसी दे देनी चाहिए, किसी ने कहा उसका गर्दन धड़ से तत्काल उड़ा देना चाहिए.

बादशाह नाराज हुए. अंत में उन्होंने बीरबल से पूछा – तुमने कोई राय नहीं दी.

जहाँपनाह, खता माफ हो, इस गुनहगार को तो सज़ा के बजाए उपहार देना चाहिए – बीरबल ने जवाब दिया.

बादशाह हौले से मुसकराए – बोले क्या मतलब?

जहाँपनाह, जो व्यक्ति आपकी मूँछें नोचने की जुर्रत कर सकता है वह आपके शहजादे के सिवा कोई और हो ही नहीं सकता जो आपकी गोद में खेलता है. गोद में खेलते-खेलते उसने आज आपकी मूँछें नोच ली होंगी. उस मासूम को उसकी इस जुर्रत के बदले मिठाई खाने की मासूम सज़ा दी जानी चाहिए – बीरबल ने खुलासा किया.

बादशाह ने ठहाका लगाया और दरबारी बगलें झांकने लगे.

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 सारा जग बेईमान! एक बार अकबर बादशाह ने बीरबल से शान से कहा - ''बीरबल! हमारी जनता बेहद ईमानदार है और हमें कितना बहुत प्यार करती है''

बीरबल ने तुरन्त उत्तर दिया-’‘बादशाह सलामत! आपके राज्य में कोई भी पूरी तरह ईमानदार नहीं है, न ही वो आपसे ज्यादा प्यार करती है।

‘‘यह तुम क्या कह रहे हो बीरबल?'' ?
मैं अपनी बात को साबित कर सकता हूं बादशाह सलामत !’‘
‘‘ठीक है, तुम हमें साबित करके दिखाओ।’‘ बादशाह अकबर बोले।

बीरबल ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि बादशाह सलामत एक भोज करने जा रहे हैं। उसके लिए सारी प्रजा से अनुरोध है कि कल सुबह दिन निकलने से पहले हर आदमी एक-एक लोटा दूध डाल दे। कडाहे रखवा दिये गये हैं। उनमें हर आदमी दूध डाल जाये। हर आदमी ने यही सोचा कि जहां इतना दूध इकट्ठा होगा, वहां उसके एक लोटे पानी का क्या पता चलेगा? अत: हर आदमी कड़ाहों में पानी डाल गया।

सुबह जब अकबर ने उन कड़ाही को देखा, जिनमें जनता से दूध डालने को कहा गया था, तो दंग रह गये। उन कड़ाहों में तो केवल सफेद पानी था। अकबर को वस्तुस्थिति का पता चल गया.
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चोर की दाढ़ी में तिनका
बादशाह अकबर बीरबल से अकसर अजीब सवाल तो पूछते ही थे लेकिन एक दिन उन्होंने बीरबल को छकाने की एक तरकीब खोज निकाली। उन्होंने अपनी बेशकीमती अंगूठी छिपाकर एक सरदार को दे दी और उससे बात छुपाकर रखने के लिए कहा। जब बीरबल उनके पास आए तो बादशाह ने कहा-''आज हमारी अंगूठी खो गई है। सुबह तो वह हमारे पास ही थी। शौच जाते वक्त मेंने उतार कर रखदी और जब वापस लौटा तो देखा कि अंगूठी गायब है। बीरबल चुपचाप सुनते रहे।

बादशाह ने आगे कहा-''मुझे यकीन है कि यह काम महल के ही किसी व्यक्ति का हुए। बाहरी आदमी ऐसी हिम्मत नहीं कर सकता। बीरबल! तुम ज्योतिषशास्त्र बखूबी जानते हो अतः चोर का पता लगाओ।''
बीरबल ने उस जगह का पता पूछा, जहां उन्होंने शौच जाने से पहले अंगूठी रखी थी।

बादशाह अकबर ने एक अलमारी की ओर इशारा किया। बीरबल ने उस अलमारी के पास जाकर उससे कान लगाकर कुछ देर बाद हटा लेने का नाटक किया। देखने से यह लगता था, जैसे वह कोई बात सुनने की कोशिश कर रहा है।''
कुछ देर बाद बीरबल ने बादशाह की तरफ देखकर कहा-''अलमारी साफ बताती है कि जिसके पास अंगूठी है, उसकी दाढी में तिनका है।'' बीरबल की बात को जब पास ही बैठे सरदार ने सुना, जिसको बादशाह ने अंगूठी दी थी, तो यह घबराकर अपना मुंह और दाढ़ी टटोलने लगा। बीरबल पहले से ही चोकन्ते थे। सरदार की हरकत उनसे छिपी नहीं रह सकी। फौरन ही बीरबल ने उस सरदार को पकडकर बादशाह के सामने पेश किया और कहा ''जहांपनाह, आपकी अंपूठी के चोर यही है,'' यह बात बादशाह पहले से ही जानते थे। वह बीरबल की इस चतुराई से बेहद खुश हुए।
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आदमी एक रूप तीन एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल से पूछा- ‘‘क्या तुम हमें तीन तरह की खूबियां एक ही आदमी में दिखा सकते हो?''
‘‘जी हुजूर, पहली तोते की, दूसरी शेर की, तीसरी गधे की। परन्तु आज नहीं, कल। '' बीरबल ने कहा।
‘‘ठीक है, तुम्हें कल का समय दिया जाता है। '' बादशाह ने इजाजत देते हुए कहा।

अगले दिन बीरबल एक व्यक्ति को पालकी में डालकर लाया और उसे पालकी से बाहर निकाला। फिर उस आदमी को शराब का एक पैग दिया। शराब पीकर वह आदमी डरकर बादशाह से विनती करने लगा- ‘‘हुजूर! मुझे माफ कर दो। मैं एक बहुत गरीब आदमी हूं। ''
बीरबल ने बादशाह को बताया- ‘‘यह तोते की बोली है। ''

कुछ देर बाद उस आदमी को एक पैग और दिया तो वह नशे में बादशाह से बोला- '' अरे जाओ, तुम दिल्ली के बादशाह हो तो क्या, हम भी अपने घर के बादशाह हैं। हमें ज्यादा नखरे मत दिखाओ। ''
बीरबल ने बताया- ‘‘यह शेर की बोली है। '' कुछ देर बाद उस आदमी को एक पैग और दिया तो वह नशे में एक तरफ गिर गया और नशे में ऊटपटांग बड़बड़ाने लगा।

बीरबल ने उसे एक लात लगाते हुए बादशाह से कहा- ‘‘हुजूर! यह गधे की बोली है। ''
बादशाह बहुत खुश हुए। उन्होंने बीरबल को बहुत-सा इनाम दिया।
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लहरें गिनना

एक दिन अकबर बादशाह के दरबार में एक व्यक्ति नौकरी मांगने के लिए अर्जी लेकर आया। उससे कुछ देर बातचीत करने के बाद बादशाह ने उसे चुंगी अधिकारी बना दिया।

बीरबल, जो पास ही बैठा था, यह सब देख रहा था। उस आदमी के जाने के बाद वह बोला- ‘‘यह आदमी जरूरत से ज्यादा चालाक जान पड़ता है। बेईमानी किये बिना नहीं रहेगा। ''

थोड़े ही समय के बाद अकबर बादशाह के पास उस आदमी की शिकायतें आने लगीं कि वह प्रजा को काफी परेशान करता है तथा रिश्वत लेता है। अकबर बादशाह ने उस आदमी का तबादला एक ऐसी जगह करने की सोची, जहां उसे किसी भी प्रकार की बेईमानी का मौका न मिले। उन्होंने उसे घुड़साल का मुंशी मुकर्रर कर दिया। उसका काम था घोड़ों की लीद उठवाना।

मुंशीजी ने वहां भी रिश्वत लेना आरम्भ कर दिया। मुंशीजी साईसों से कहने लगे कि तुम घोड़ों को दाना कम खिलाते हो, इसलिए मुझे लीद तौलने के लिए भेजा गया है। यदि तुम्हारी लीद तौल में कम बैठी तो अकबर बादशाह से शिकायत कर दूंगा। इस प्रकार मुंशीजी प्रत्येक घोड़े के हिसाब से एक रुपया लेने लगे।
अकबर बादशाह को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने मुंशीजी को यमुना की लहरें गिनने का काम दे दिया। वहां कोई रिश्वत व बेईमानी का मौका ही नहीं था।

लेकिन मुंशीजी ने वहां भी अपनी अक्त के घोड़े दौड़ा दिये। उन्होंने नावों को रोकना आरम्भ कर दिया कि नाव रोको, हम लहरें गिन रहे हैं। अत: नावों को दो-तीन दिन रुकना पड़ता था। नाव वाले बेचारे तंग आ गए। उन्होंने मुंशीजी को दस रुपये देना आरम्भ कर दिया।

अकबर बादशाह को जब इस बात का पता लगा तो उन्होंने लिखकर आज्ञा दी- ‘‘नावों को रोको मत, जाने दो?''
उस मुंशी ने उस लिखित में थोड़ा सुधार कर टंगवा दिया – नावों को रोको, मत जाने दो - और वसूली करने लगे.
अंततः बादशाह को उस मुंशी को सार्वजनिक सेवा से बाहर करना ही पड़ा.
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कौन किसका नौकरजब कभी दरबार में अकबर और बीरबल अकेले होते थे तो किसी न किसी बात पर बहस छिड़ जाती थी। एक दिन बादशाह अकबर बैंगन की सब्जी की खूब तारीफ कर रहे थे।
बीरबल भी बादशाह की हां में हां मिला रहे थे। इतना ही नहीं, वह अपनी तरफ से भी दो-चार वाक्य बैंगन की तारीफ में कह देते थे।

अचानक बादशाह अकबर के दिल में आया कि देखें बीरबल अपनी बात को कहां तक निभाते हैं- यह सोचकर बादशाह बीरबल के सामने बैंगन की बुराई करने लगे। बीरबल भी उनकी हां में हां मिलाने लगे कि बैंगन खाने से शारीरिक बीमारियाँ हो जाती हैं इत्यादि।

बीरबल की बात सुनकर बादशाह अकबर हैरान हो गए और बोले- ‘‘बीरबल! तुम्हारी इस बात का यकीन नहीं किया जा सकता। कभी तुम बैंगन की तारीफ करते हो और कभी बुराई करते हो। जब हमने इसकी तारीफ की तो तुमने भी इसकी तारीफ की और जब हमने इसकी बुराई की तो तुमने. भी इसकी बुराई की, आखिर ऐसा क्यों?''
बीरबल ने नरम लहजे में कहा- ‘‘बादशाह सलामत! मैं तो आपका नौकर हूं बैंगन का नौकर नहीं। ''

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किसकी नेमत बादशाह अकबर प्राय: भेष बदलकर सैर के लिए निकला करते थे। एक दिन वह बीरबल के साथ भेष बदलकर शहर से बाहर एक गांव में पहुंचे। वहां बादशाह ने. देखा कि एक कुत्ता रोटी के टुकड़े को, जो कई दिनों की हो जाने की वजह से सूख कर काली पड़ गई थी, चबा-चबाकर खा रहा था। अचानक बादशाह को दिल्लगी करने की सूझी। वह बोले- ‘‘बीरबल! देखा, वह कुत्ता काली को खा रहा है। ''
'काली' बीरबल की मां का नाम था। वह समझ गये कि आलमपनाह दिल्लगी कर रहे हैं। किन्तु इस भावना को दबाकर वे तुरन्त बोले- '' आलमपनाह, उनके लिए वही जिन्दगी और नेमत हैं। ''
नेमत बादशाह की मां का नाम था। बीरबल के जवाब को सुनकर बादशाह को चुप हो जाना पड़ा।
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कौन गधा तम्बाकू खाता है बीरबल तम्बाकू खाया करते थे, मगर अकबर बादशाह नहीं खाते थे। एक दिन अकबर बादशाह को लज्जित करने के लिए सैर का बहाना करके तम्बाकू के खेत में ले गए। वहां जाकर उन्होंने एक गधा खेत में चरने के लिए छुड़वा दिया। जब गधे ने तम्बाकू नहीं खाई तो अकबर बादशाह बोले- ‘‘बीरबल! देखो, तम्बाकू कैसी बुरी चीज है। इसे गधा तक नहीं खाता। ''

‘‘हां जहांपनाह! यह सच है, गधे तम्बाकू नहीं खाते, इनसान ही खाते हैं। '' बीरबल ने जवाब दिया।
बीरबल का यह कटाक्ष सुनकर बादशाह अकबर शर्म से पानी-पानी हो गए।
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किसका अफसर
एक बार वजीर अबुल' फजल ने अकबर बादशाह के सामने बीरबल से कहा- ‘‘बीरबल, तुम्हें अकबर बादशाह ने सुअर और कुत्तों का अफसर नियुक्त किया है। ''

इस पर बीरबल ने कहा- ‘‘बहुत खूब, तब तो आपको भी मेरी आज्ञा में रहना पड़ेगा। ''
यह सुनते ही अकबर बादशाह हंस पड़े और वजीर अबुल फजल ने लज्जित होकर अपना सिर सुका लिया।
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किसकी दाढ़ी की आगबादशाह अकबर की यह आदत थी कि वह अपने दरबारियों से तरह-तरह के प्रश्न किया करते थे। एक दिन बादशाह ने दरबारियों से प्रश्न किया- '' अगर सबकी दाढी में आग लग जाए, जिसमें मैं भी शामिल हूं तो पहले आप किसकी दाढी की आग बुझायेंगे?''
 
‘‘हुजूर की दाढी की। '' सभी सभासद एक साथ बोल पड़े।
मगर बीरबल ने कहा - ‘‘हुजूर, सबसे पहले मैं अपनी दाढी की आग बुझाऊंगा, फिर किसी और की दाढी की ओर देखूंगा। ''

बीरबल के उत्तर से बादशाह बहुत खुश हुए और बोले- ‘‘मुझे खुश करने के उद्देश्य से आप सब लोग झूठ बोल रहे थे। सच बात तो यह है कि हर आदमी पहले अपने बारे में सोचता है। ''

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ग़ज़ल 1
- परवीन फ़ना सैयद

सोचते हैं तो कर गुजरते हैं
हम तो मंझधार में उतरते हैं

मौत से खेलते हैं हम, लेकिन
ग़ैर की बंदगी से डरते हैं

जान अपनी तो है हमें भी अज़ीज़
फिर भी शोलों पे रक़्स करते हैं

दिल-फ़िगारों से पूछकर देखो
कितनी सदियों में घाव भरते हैं

जिनको है इंदिमाले-जख़्म अज़ीज़
आमदे-फ़स्ले-गुल से डरते हैं

छुपके रोते हैं सबकी नज़रों से
जो गिला है वो खुद से करते हैं
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ग़ज़ल 2

-फ़ातिमा हसन

किससे बिछड़ी कौन मिला था भूल गई
कौन बुरा था कौन था अच्छा भूल गई

कितनी बातें झूठी थीं और कितनी सच
जितने भी लफ़्जों को परखा भूल गई

चारों ओर थे धुंधले-धुंधले चेहरे-से
ख़्वाब की सूरत जो भी देखा भूल गई

सुनती रही मैं सबके दुःख ख़ामोशी से
किसका दुःख था मेरे जैसा भूल गई

भूल गई हूं किससे मेरा नाता था
और ये नाता कैसे टूटा भूल गई

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ग़ज़ल 3

- शहनाज़ परवीन सहर

मेरी वफ़ाएँ पड़ी हुई हैं तेरे रस्ते-रस्ते में
तुझको ही ये माल मिलेगा और फिर वो भी सस्ते में

यूँ ही बस वो मुझको छोड़ के सबसे मिलता रहता है
बच्चा भी तो ग़लत किताबे रख लेता है बस्ते में

उसका ठंडा नाम लिया है और भी जान जलाने को
हाथ में सूरज थाम लिया है हमने आज झुलसते में

उससे बिछड़ कर मैं भी कितनी आसूदा सी रहती हूं
वो भी कितना खुश लगता है रोते और तरसते में

दिल मुँहजोर तमन्नाओं के नरग़े में यूँ रहा ‘सहर’
जैसे इक जी-छोड़ सिपाही लड़े बहादुर दस्ते में

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ग़ज़ल 4

- शहनाज परवीन सहर

मुझसे अलग इक अपने लिए घर बनाएगा
अब वो बग़ैर सांस के, जी कर दिखाएगा

मैं संग तो नहीं हूँ मगर फिर भी बच के चल
तू आईना नहीं है मगर टूट जाएगा

मुझको अज़ीयतों से सजाना है उसका शगल
नाराज भी करेगा, मनाता भी जाएगा

अब खुद जमीं न थामेगी उठ कर फ़लक का हाथ
अब आसमाँ जमीं की तरफ झुक के आएगा

खुद जुस्तजू तराशेगी मंजिल के खद्दो-खाल
एहसास आप चेहरे पे आँखें बनाएगा

मत उसके बचपने को बुरा मानना ‘सहर’
वो तुमको तोड़-फोड़ के फिर से बनाएगा

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ग़ज़ल 5

- सहबा अख़्तर

सुना है प्यार की नदी है गहरी
मगर रोके से कब रुकते हैं लहरी

कोई अमृत के सागर तक न पहुँचा
किनारों पर पड़े हैं नाग जहरी

चली जब बात सीनों में तड़प की
मुहब्बत चौधवीं का चाँद ठहरी

अजब वहशत मिली है तुझसे इनको
ग़ज़ालों की तरह हैं तेरे शहरी

कड़क कर बोलना भी सीख ‘सहबा’
कि ये दुनिया है दोनों कान बहरी

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-अनूप शुक्ल

--१०१ प्रार्थनाएँ++

वर दे,
मातु शारदे वर दे!
कूढ़ मगज़ लोगों के सर में
मन-मन भर बुद्धि भर दे।

बिंदु-बिंदु मिल बने लाइनें
लाइन-लाइन लंबी कर दे।
त्रिभुज-त्रिभुज समरूप बना दो
कोण-कोण समकोण करा दो
हर रेखा पर लंब गिरा दो
परिधि-परिधि पर कण दौड़ा दो
वृत्तों में कुछ वृत्त घुसा दो
कुछ जीवायें व्यास बना दो
व्यासों को आधार बना दो
आधारों पर त्रिभुज बना दो
त्रिभुजों में १८० डिग्री धर दो।

वर दे,
वीणा वादिनी वर दे।

--वृत्त वृत्तांत++

हेरी मैं तो वृत्त दीवानी
मेरो दरद न जाने कोय।
नैन लड़े हैं वृत्त देव से
किस विधि मिलना होय।

बस एक बिंदु पर छुआ-छुई है
केहिं विधि धंसना होय ?
जबसे छुआ है मैंने प्रिय को
मन धुकुर-पुकुर सा होय।

पर प्रियतम पलटा है नेता सा
मुझसे बस दूर भागता जाता
बस छुअन हमारी परिणति है
वह बार-बार चिल्लाता ।

जुड़वा बहना भी संग चली थी
उसको भी ये भरमाता है।
मैं इधर पड़ी वो उधर खड़ी
ये भी कैसा सा नाता है।

अनगिन रेखाओं को स्पर्शित कर
इस मुये वृत्त ने भरमाया ।
खुद बैठा है मार कुंडली
पता नहीं किस पर दिल आया।

मैं भी होती जीवा जैसी
इसके आर-पार हो जाती।
भले न पाती इस बौढ़म को
छेद, चाप दे जाती ।

शायद दूर पहुंचकर लगता
मैंने जीवन में क्या पाया!
हाय उसी को छेदा मैंने
जिस पर मेरा दिल आया।

इसी सोच की बंदी हूं मैं
बनी अहिल्या ऐंठी हूं।
स्पर्श बिंदु पर वृत्त देव के
मीरा बनकर बैठी हूं।

कभी प्रेम की ज्वाला से मैं
पिघल-पिघल भी जाऊँगी।
जिसे चाहती उसी परिधि पर
कभी विलीन हो जाऊँगी ।

--सपटीली रपटीली सर्किल बानी++

ये राह बड़ी रपटीली है
रपटन से चढ्‌ढी ढीली है।

हर लाइन छेड़ती है मुझको
मानों मैं कोई मजनूँ हूं।
छू-छूकर खिल-खिल जाती हैं
गोया मैं कोई जुगनू हूं।

कुछ मुई लाइने हैं ऐसी
जो बर्छी सी चुभ जाती हैं।
प्रियतम मैं तेरी जीवा हूं
अन्दर ले लो कह धंस जाती हैं।

थोड़ा कहकर अंदर धंसती
फिर उथल-पुथल कर जाती हैं,
इधर काटती-उधर फाड़ती
सब बेशर्मी बहुत मचाती हैं।

कुछ त्रिभुज बनाती ,चाप काटती
सब घमासान मच जाता है,
इन लाइनों पर लाइन मारने
कोई वृत्त बेशरम घुस आता।

कुछ रेखाओं के छूने से
मन गुदगुदी मचाता है,
ये छुअन-बिंदु पर बनी रहें
ये ही अरमान जगाता है।

छुआ-छुऔव्वल से आगे
करने की मुझमे चाह नहीं,
छुअन-छुअन भर बनी रहे,
दुनिया की मुझको परवाह नहीं।

बस एक केंद्र ही ऐसा है
जो किंचित भी नहीं सनकता है,
कोई आये कोई जाये
ध्रुवतारे सा अविचल रहता है।

ये परिधि राह पर चलने वाले
बौढ़म भी बहुत भटकते हैं,
अनगिन चक्कर लगाकर भी
थे जहां वहीं पर रहते हैं।

इन बेढब चालों की चिंता ने
मेरी सारी निद्रा हर ली है,
ये राह बड़ी रपटीली है,
रपटन में मेरी चढ्ढी ढीली है।

--पहाड़ा का पहाड़++

तुम दो दूनी चार पढ़ो
हम एक और एक ग्यारह
वे ३६ उलट गये ६३ में
अब तो उनकी भी पौ बारह।

नौ दो ग्यारह ही होते हैं
काहे को घर से भगते हो!
ये तीन में थे न तेरह में
काहे को इनसे डरते हो?

नौ की लकड़ी लाकर तुम
नब्बे का खर्च दिखाओगे,
निन्न्यानबे के चक्कर में
कौड़ी के तीन हो जाओगे।

हम नौ हैं उनकी तिकड़ी है,
पकड़ेंगे उनको बीन-बीन,
रगड़-रगड़ कर मारेंगे,
चढ़ एक-एक पर तीन-तीन।

--ज्यामितीय जुर्रतें++

हे ज्यामिति देवी नमस्कार
अपनी सभी भुजाओं के संग
करता हूं तुमको बहुत प्यार।

सब देशों की सीमाओं सा
मैं रेखायें जोड़े रहता हूं,
ये इधर भागतीं उधर भागतीं
मैं इनके सब नखरे सहता।

ये तीनों कोण संभाले हैं,
लालच में कभी नहीं आता,
१८० डिग्री में गुजारा करता हूं,
उतने में ही मन भर जाता।

अनुशासित रहता आया हरदम,
रेखाओं को हरदम हटका ,
एक-दूजे पर कभी मत लेटो,
बाकी सब कुछ करो बेखटका।

तीन तिगाड़ा ,काम बिगाड़ा
कह सबने मुझे चिढ़ाया है,
इतिहास जानता है लेकिन
मैंने जनहित में कितना खून बहाया।

जब पड़ी जरूरत तुमको है,
मैंने अपने कोने कटवाये हैं,
त्रिभुजों का वेतन लेकर के
बड़े बहुभुजों के काम कराये हैं।

जब पड़ी आफतें वृत्तों पर,
अपने अंदर कर लाड़ किया,
जब-जब उनने भौंहें ऐंठीं
अन्दर घुस उनको फाड़ दिया।

समबाहु-द्विबाहु,सम-विषमकोण,
चाहे जैसा हो मेरा आकार,
जब पड़े जरूरत बुलवाना,
दौड़ा आऊंगा सुनकर पुकार।

हे ज्यामिति देवी नमस्कार,
अपनी सभी भुजाओं के संग
करता हूं तुमको बहुत प्यार।

--रेखाओं की रचना++

हे मेरे देव,
किये बढ़िया सेव,
पास आओ न!

तुमको देखा
अंखियां तर गईं
दूर जाओ न!

रेखायें बोलीं,
चलो करें ठिठोली
गोले पे चढ़ें।

त्रिभुज बोला
ये भैया मेरे गोला
छानोगे गोला!

समांतर हूं
मिलूंगी नहीं भाई
दूरी निभाओ।

बिंदु बिंदु से
लाइन निकली है
दूर भागतीं।

छुओ मत रे
गुदगुदी होती है
रेखा बिंहसी।

अच्छा चलो
आंख दो चार करे
पियार करें।

मिट जाऊंगी
रोशनी बनकर
तुम्हारे नाम।

लोग कहेंगे
बेकार में हो गया
काम तमाम।

यही होता है,
भंवर देखा,कूदे
व डूब गये।

--गोल की गोल कहानी++

मैं गोलमटोल बना बैठा
सबको गोली दे जाता हूं।
सब गोली में जब होंय टुन्न
मैं कहीं लुढ़क सा जाता हूं।

मैं धक्कामुक्की से डरता हूं
बस एक बिंदु पर लड़ता हूं
हर ओर एक सा रहता हूं
चिकने पर सरपट भगता हूं।

हैं मेरे कितने रूप अनेक
मैं अब तक खुद न समझ पाया,
मूझे बुलाया था आपने यहां
या खुद ही चलता फिरता आया?

ये सम्मेलन लंबा चलेगा तो
मैं यहीं लुढ़क गिर जाऊँगा,
मैं यहीं समापन करता हूं
फिर आगे कभी सुनाऊंगा।

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कविता : सुनो रे संतों - देवेन्द्र आर्य
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जिसका नाम उचारा प्रभु ने
वो तो गया बेचारा संतों।

रैन अंधेरी, पूरनमासी
सुबह के सपने शाम को बासी
दिशा भरम का मरम न जानूं
दिल्ली लूं या मथुरा काशी।

चाहे कुछ भी ले लो फिर भी
कुछ भी नहीं तुम्हारा संतों।

क्या तो बाभन, क्या तो पासी
खेत बेच के हुए खलासी
कहो प्रवासी, मजे में हो ना
हम निरगुनियाँ मूल निवासी।

कभी ब्रह्म सा कभी प्रेत सा
हमको गया उभारा संतों।

गोरखपुर, आजमगढ़, आरा
डूब रहा हर जगह किनारा
डग्गामार बसों सी कविता
धक्का ही रह गया सहारा।

किलक रही है नीम उदासी
बिलख रहा उजियारा संतों।

इस यमुना से आमी बेहतर
बिकने से गुमनामी बेहतर
ऐसी मलिकाई क्या होगी
हमसे कहीं असामी बेहतर।

नमक हरामी मीठी लगती
और पसीना खारा संतों।

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ग़ज़ल : रमेशचन्द्र श्रीवास्तव

धर्म क्या है यह न पूछो कर्म से ग़ाफ़िल नहीं
ईश्वर की सब दया है मैं किसी काबिल नहीं

सिर्फ जन सेवा मेरा उद्देश्य था, उद्देश्य है
एक ही मंजिल है मेरी, दूसरी मंजिल नहीं

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे होठों पे हँसी
तेरे सीने में कोई पत्थर है शायद, दिल नहीं

तुझको धन-दौलत मिली है और मुझको शांति
हाँ मुझे संतोष हासिल है, तुझे हासिल नहीं

कौन इस सागर में उतरे हीरे मोती ढूंढने
‘रचश्री’ सागर है वो, जिसका कोई साहिल नहीं

**--**
कविता : शब्द – देवेन्द्र आर्य

घाटियों में नींद के बिखराव सा
अटपटेपन में कसेले चाव सा
जाने क्या कुछ रच रहे हैं शब्द।

हाथ के घट्ठों में पलते थे कभी
बन्द मुट्ठी में पिघलते थे कभी
दौड़ कर आगे निकल भी जाते थे
उंगलियाँ पकड़े टहलते थे कभी।

रक्त कणिकाओं के जैसे घट रहे
आधुनिकता आधुनिकता रट रहे
जिंदगी से कट रहे हैं शब्द।

पेट से गहरी दिलों की खाइयां
आत्मा धुंधली, चटक परछाइयाँ
जिन गए गहरे, वे खाली हाथ हैं
जिन किनारे पर रहे तिन पाइयाँ।

आलसी डरपोक जाँगर चोर हैं
शब्द अब पक्के कमीशन-खोर हैं
डमरुओं से बज रहे हैं शब्द।

है समय का शब्द से अब सामना
शब्द के बाजार की परिकल्पना
ठण्डा मतलब कोका कोला हो गया
यह है देशी प्यास की आलोचना।

कौन सा कन्सर्न, कैसा मोर्चा
मस्त है कविता लगा के खोंचा
पत्तलों पर सज रहे हैं शब्द।

*-**-*
ग़ज़ल : रमेश चन्द्र श्रीवास्तव

जगाओ सोई हुई प्रेम की ज्योति फिर से
जो खो गई है वह खुशी मिल जाएगी फिर से

किसी की प्यास ने बारिश की फिर दुआ माँगी
वह देख झूम के काली घटा उठी फिर से

जिसे भुला के निहायत सुकून था मुझको
वह दास्तान मुझे याद आ गई फिर से

जनम-जनम से सताता है एक अन्देशा
फ़रेब दे न मुझे मेरी जिन्दगी फिर से

अज़ीज़ दोस्त यह साजिश न हो हवाओं की
उड़ा-उड़ा सा है कुछ रंगे दोस्ती फिर से

तू ‘रचश्री’ की अक़ीदत भी और इमाँ भी
करीब आ कि उतारूँ मैं आरती फिर से

**-**
ग़ज़ल 1
--.--
यह भी हो सकता है अच्छा हो, मगर धोखा हो
क्या पता गर्भ में पलता हुआ कल कैसा हो

भाप उड़ती हुई चीज़ें ही बिकेंगी अब तो
शब्द हो, रेह हो, सपना हो या समझौता हो

यूँ तो हर मोड़ पे मिल जाता है मुझसे लेकिन
इस तरह मिलता है जैसे कि कभी देखा हो

जाने कितनों ने लिखी अपनी कहानी इस पर
फिर भी लगता है मेरे दिल का वरक सादा हो

रौशनी इतनी ज़ियादा भी नहीं ठीक मियाँ
ये भी हो सकता है आँखों में कोई सपना हो

**--**
ग़ज़ल 2
मेरी भी आँख में गड़ता है भाई
मगर रिश्तों में वो पड़ता है भाई

जमाने की नहीं परवाह लेकिन
वही आरोप जब मढ़ता है भाई

खरी खोटी सुनाके लड़के मुझसे
फिर अपने आप से लड़ता है भाई

जिसे मैं भूल जाना चाहता हूँ
बराबर याद क्यों पड़ता है भाई

भले कितना ही सुन्दर हो, सफल हो
मगर सपना भी तो सड़ता है भाई

मुझे लगता है मैं ही बढ़ रहा हूँ
मेरे बदले में जब बढ़ता है भाई

जिसे तुम शान से कहते हो ग़ैर
वो अव्वल किस्म की जड़ता है भाई

ये मामूली सा दिखता भाई चारा
बहुत मंहगा कभी पड़ता है भाई
**-**

ग़ज़ल 3
--.--
आयो घोष बड़ो व्यापारी
पोछ ले गयो नींद हमारी

कभी जमूरा कभी मदारी
इसको कहते हैं व्यापारी

रंग गई मन की अंगिया-चूनर
देह ने जब मारी पिचकारी

अपना उल्लू सीधा हो बस
कैसा रिश्ता कैसी यारी

आप नशे पर न्यौछावर हो
मैं अब जाऊँ किस पर वारी

बिकते बिकते बिकते बिकते
रुह हो गई है सरकारी

अब जब टूट गई ज़ंजीरें
क्या तुम जीते क्या मैं हारी

भूख हिकारत और गरीबी
किसको कहते हैं खुद्दारी?

दुनिया की सुंदरतम् कविता
सोंधी रोटी, दाल बघारी

**-**
ग़ज़ल 4
--.--
किसी को सर चढ़ाया जा रहा है
कोई रक्तन रुलाया जा रहा है

ये आँखें आधुनिक दिखने लगेंगी
नया सपना मंगाया जा रहा है

जो पहले से खड़ा है हाशिए पर
वही बाँए दबाया जा रहा है

कथाओं में नहीं अंट पा रहा जो
उसे कविता में लाया जा रहा है

बुजुर्गों ने जिसे पोसा है अब तक
वो रिश्ता अब भुनाया जा रहा है

हमारे बीच में जो अनकहा था
वो शब्दों से मिटाया जा रहा है

मैं कुर्बानी का बकरा तो नहीं हूँ?
बड़ी इज्जत से लाया जा रहा है

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- रचनाकार – देवेन्द्र आर्य की पहचान उनकी नए तेवर, नए अंदाज़ की ग़ज़लें हैं. रचनाकार में देवेन्द्र की कुछ अन्य विप्लवी किस्म की गज़लें आप यहां -
http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_06.html , यहाँ - http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_16.html तथा यहाँ - http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_20.html पर पढ़ सकते हैं.

2
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1 रहै निरोगी जो कम खाय
बिगरे न काम जो गम खाय

2 प्रातकाल खटिया ते उठि के पियइ तुरते पानी
कबहूँ घर में वैद न अइहैं बात घाघ के जानी

3 मार के टरि रहू
खाइ के परि रहू

4 ओछे बैठक ओछे काम
ओछी बातें आठो जाम
घाघ बताए तीनो निकाम
भूलि न लीजे इनकौ नाम

5 ना अति बरखा ना अति धूप
ना अति बक्ता न अति चूप

6 माघ-पूस की बादरी और कुवारा घाम
ये दोनों जो कोऊ सहे करे पराया काम

7 चींटी संचय तीतर खाय
पापी को धन पर ले जाय

8 धान पान अरू केरा
तीनों पानी के चेरा

9 बाड़ी में बाड़ी करे करे ईख में ईख
वे घर यों ही जाएंगे सुने पराई सीख

10 जेकर खेत पड़ा नहीं गोबर
वही किसान को जानो दूबर

11 जेठ मास जो तपे निरासा
तो जानो बरखा की आसा

12 दिन में गरमी रात में ओस
कहे घाघ बरखा सौ कोस

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शहंशाह अकबर के दरबार के शान घाघ विद्वान पुरुष थे. घाघ अपनी कहावतों के लिए प्रसिद्ध हैं. घाघ ने मानव जीवन के अनुभवों का सूक्ष्म निरीक्षण कर बहुत सी प्रासंगिक बातें अपनी कहावतों के रूप में कहीं जो समाज में चलती रहीं. घाघ के द्वारा कही गई बहुत सी कहावतें आज भी विज्ञान सम्मत और सही प्रतीत होती हैं.


-संजय विद्रोही

" बाजार तो जाने को धर्म ही ना रह्यो, आजकल तो. इतनो ट्रेफ़िक, इतनो धुँआ और इतनो शोर. बाप रे बाप. इससे तो अपनो घर ही भलो. पर, बगैर जाय सरतो भी तो ना है. गली वालो बनियो, एक रुपय्या की चीज के सवा रुपय्या ले लेवे है मरो. बजार में ये तो है कि रिपिया की चीज रिपिया में मिल जावै है. गिरस्ती में इन सब बातन को भी तो ख्याल करनो पडे है लाली." विमला मौसी साड़ी के पल्लू से पसीने पोंछती हुई बोले जा रही थी.

"हाँ, सो तो है." मैंने छोटा-सा उत्तर देकर निजात पा ली. रिक्शेवाला हम दोनों की बातों से बे-खबर अपने काम में लगा था.

" तुम्हारी कसम लाली, ना ना करते पाँच हजार को तो राशन आ ही जातो है घर में महिना पै. अब तुम ही कहो, दूध ना पीयें, या घी ना खायें. साग सब्जिन कू भी मरिन कू आग लगि पडी है. कोई सब्जी दस रिपिया पाव से कम है ही ना मण्डी में. तुम्हारे अंकल कहेंगे, दाल बनाओ. तो दाल क्या मुफ़्त में आवै है? वाके भाव भी तो आसमान पै हैं."

" हाँ मौसी, सो तो है."

" अब तुम ही कहो शक्कर कितनी मंहगी है आजकल? और तुम्हारे अंकल की आदत तो तुम जानो ही हो, कित्ती खराब है? ना जाने कहाँ कहाँ से यार-भायले पकड़ के ले आवें हैं चाय पीने कूं? दिन भर गैस पे पतीली चढ़ी रहे घर में. जिस पर यूं और कहें मुझ से, कि तू खरचा जादा करती है. तुम ही बताओ शक्कर क्या मेरे पीहर से लाऊँ?" मौसी ने होठों में भर आए थूक को हाथ से पोंछते हुए मन की व्यथा कह सुनाई. लाल बत्ती हो गई थी. सारे ट्रैफ़िक के साथ हमारा रिक्शा भी रुक गया था. मैं भी सोच रही थी कि आज विमला मौसी के साथ बुरी फ़ंसी. मम्मी से मिलने आई थी. जाने लगी तो बीच ही में इन्होंने पकड़ लिया. "चल लाली, नेक बजार चली चल मेरे संग" ओर मैं मना नहीं कर पाई. बाजार में जिस भी दुकान पर गई, उल्टा सीधा कह-सुन कर उठी मौसी और नाहक माफी मांगते-मांगते थक गई मैं.....

.....अचानक एक मोटर बाइक तेजी से हमारे रिक्शे के ऐन बगल में आकर झटके से रुकी. बाइक पर एक लड़का और एक लड़की बैठे थे. लड़की, लड़के से बिल्कुल सटकर बैठी थी. बाइक के रुकते ही पीछे बैठी हुई लड़की पूरी की पूरी , बाइक चला रहे लड़के पर आ पड़ी. लड़की ने पीले रंग की पटियाला सलवार कमीज वाला शॉर्ट-सूट पहन रखा था और गले में मैचिंग का दुपट्टा डाले थी. चेहरे पर उसने हरे रंग का स्कार्फ़ इस तरह से लपेट रखा था कि वो धूप से बचने के लिए कम , पहचान छुपाने के लिए लपेटा गया ज्यादा प्रतीत हो रहा था. आँखों के अलावा चेहरा जरा भी नहीं दिख रहा था. मौसी ने उनकी ओर घूर कर देखा तो लड़की थोड़ा सकुचा कर संभलकर बैठ गई. मौसी धीरे से मेरे कान में फ़ुसफ़ुसाई- " देख लाली, लड़किन कैसा कैसा चरितर करें हैं आजकल? मुँह पर फ़ेंटो बाँध लेवैं हैं, जा मारे कि कोई पहचान ना ले मिलने वालो और छोरा के साथ फ़टफ़टिया पर चिपक चिपक के बैठे हैं. बता का गिरस्ती बसायेंगी ये आगले घर जाकर? सबकछु तो ये अभी ही कर लेंगी, बाद में तो निरी फ़ोर्मल्टी रह जाएगी ब्याह के बाद. देख, मरी कैसी बैठी है भिड़के?" मैंने भी देखा, वाकई लड़की बाइक पर लड़के से चिपक कर बैठी थी. किन्तु अब थोड़ा सलीके से थी. थोड़ा असहज भी. शायद वो समझ गई थी कि हम उसी की बात कर रहे हैं. इतने में ही हरी बत्ती हो गई और वो फ़र्रररर...से निकल गए. हमारा रिक्शा भी सरकने लगा.........

" याने जैसो सूट पहन रखो ना, एसो को एसो हमारी सीला के पास भी है. आजकल फ़ैसन है, इनको. पटियाला सलवार और सोर्ट सूट कहें हैं इन कूं." मौसी यूं आँखें घुमाई, मानो मेरे सम्मुख किसी रहस्य का उदघाटन किया हो. वो बोलती जा रही थी," पन देख लाली, हमारी सीला कू. मजाल, बिना काम नेक भी घर से बाहर रहती हो. बस, घर से कालेज और कालेज से घर. गर में भी वा भली, वाको कमरो भलो. बंद करके पढ़ाई करती रहे. एक इन लड़किन कूं देख, कैसो बेसरमपनो उठा रखो है? मान- मर्यादा कछु है ही नाय."

" हाँ, मौसी." मैं और क्या कहती?

" मैं तो कहूँ, या में इन्के घर वारन की भी गलती है. उनकी आँख फ़ूट जायें हैं क्या, पतो ही ना? तुम्हारे अंकल ने तो या मारे ही सीला कू कोई लूना-वूना नय दिलाई. छोरिन के पास लूना हो तो, घूमती फ़िरैं इत-उत कू. तेरे अंकल ने साफ़ कह दी, बस से आओ- बस से जाओ. ठीक है ना, लाली. बस में आए जाए तो टेम से आ जाए चली जाए. अब या लड़किन कूं ही देख, मरी कैसी लदी जा रही छोरा पर. छोरन को का जाए? खा-पीकर,मुँह पूंछ कर चल देवें. लड़की जात की तो लाज चली जाये, तो का बचे फ़िर? बोल."

" सही बात है मौसी. जमान ही एसा है. लड़के लडकियाँ कहाँ सुनते हैं किसी की?"

" ये बात ना है लाली. सुनते क्यूं ना हैं? हमारी सीला सुनै है कि ना? घर वालन को कंटरोल होनो चाहिए, बस. छोरिन कूं क्यूं इत्ती आजादी देवें कि नाक कटाती डोलें बजार में. तुम्हारे अंकल तो सख्त खिलाफ़ हैं, इन सब के."

घर आने ही वाला था. तीन बज चुके थे. मैंने सोचा, आज रात मम्मी के पास ही रुक जाती हूँ. 'वो' इन्तजार ना करें, सो तुरन्त मोबाईल मिलाया.

"हैलो! मैं बोल रही हूँ.......एसा है आज मैं मम्मी के यहाँ ही रुक जाती हूँ, आप कहें तो."
"ठीक है, मुझे भी आफ़िस में आज देर हो जाएगी."

"खाने का?"

"ऑफ़िस में ही कुछ मँगवा लूँगा, चिन्ता मत करना. ओके." कह कर 'उन्होंने' फ़ोन बंद कर दिया.

थोड़ी ही देर में घर आ गया. हमारा घर गली में मुड़ते ही और नुक्कड़ से ही नजर आता है जबकि मौसी का घर थोड़ा अन्दर चलके है, जो कि नुक्कड़ से नजर नहीं आता है.
....मम्मी के घर में शाम हमारी छत पर ही गुज़रती है. मेरी शादी से पहले भी और आज भी. वहीं चाय बनाकर दे जाती है भाभी. बच्चे भी वहीं धमाचौकड़ी मचाते रह्ते हैं. मम्मी- पापा भी वहीं बैठे बतियाते रहते हैं. मम्मी उन्हें दिन भर के समाचार देती रहती है और वो जवाब में "हाँ-हूँ" करते-करते अपना अखबार पढ़ते रहते हैं. आज भी ऐसा ही हुआ. भाभी चाय दे गई, सब व्यस्त हो गए. मैं छत पर घूम-घूम कर चाय पीने लगी. मेरी पुरानी आदत है.

अचानक मैंने देखा कि दूर नुक्कड़ से थोड़ा पहले ही एक मोटर बाइक आकर रुकी . 'अरे! ये तो वो ही लड़का-लड़की हैं सुबह वाले' बरबस ही मेरे मुँह से निकल पड़ा और उत्सुकता वश मैं खड़ी होकर दीवार की ओट से उनको देखने लगी. लड़की ने उतर कर लड़के को "बाय" किया और लड़का हाथ हिलाता हुआ चला गया. इसके बाद लड़की ने इधर-उधर देखते हुए अपना स्कार्फ़ खोला और तहाकर उसे पर्स के सुपुर्द किया. अब वो जरा नॉर्मल लग रही थी, किन्तु अभी भी उसका मुँह दूसरी तरफ ही था. फिर उसने हाथों से अपने बालों को ठीक किया और संयमित कदमों से गली की तरफ घूमी.

"शीला!!?" मैं एकदम चौंक पड़ी.

(समाप्त)

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रचनाकार – संजय विद्रोही की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें: बहाने से, इम्तिहान , चंद ग़ज़लें


- ब्रजमोहन झालानी
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आदमी

वक्त की लकीरों से कट गया है आदमी
अपने ही हाथों से बंट गया है आदमी

भीतर और बाहर उलझन ही उलझन है
प्रश्नों ही प्रश्नों से पट गया है आदमी

लुटते-लुटाते हँसी और खुशियाँ सब
रीत गई उम्र और घट गया है आदमी

दर्द पिघल बरसा है मन के आँगन में
अख़बारी कागज़-सा फट गया है आदमी

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लोग तुम्हारी बस्ती के...

कुछ लोग तुम्हारी बस्ती के सचमुच बहुत भले हैं
भीतर से बिल्कुल काले हैं ऊपर से उजले हैं

हाथ मिलाना सोच समझ कर, सावधान रहना
सुना है मैंने आस्तीनों में इनके सांप पले हैं

फूलों-कलियों को मत छूना बच के ही रहना
हम तो इनकी खुशबू से ही देखो आज जले हैं

आम, नीम, पीपल, तुलसी जाने कहाँ गए हैं
पग-पग हंसती नागफनी, हर ओर बबूल फले हैं

मतलब के रिश्ते नाते हैं, नकली अपनापन है
अपनों के हाथों अपनों के कटते रोज गले हैं

‘ब्रज’ ने देखी खासियत, इस बस्ती के लोगों की
समझदार हैं बहुत, सदा ये वक्त के साथ चले हैं
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पास जितनी सांस उतनी उलझनें...

खो गई सब कामनाएँ क्या करें
सो गई सम्भावनाएँ क्या करें

पास जितनी साँस उतनी उलझनें
यातना ही यातनाएँ क्या करें

रह गई है नाम की बस जिंदगी
मर रही है भावनाएँ क्या करें

क्या करें ‘ब्रज’ कोई सुनता नहीं
लौट आई प्रार्थनाएँ क्या करें

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सोच सोचकर हैरान हैं...

सोच सोचकर हम हैरान हैं
हम क्यों इतने परेशान हैं

बहुत अजीब है आपकी बस्ती
इनसान कम ज्यादा शैतान हैं

अपने घर अपनी ही बस्ती में
हम हो गए जैसे मेहमान हैं

वक्त कैसा आ गया मेरे दोस्त
जीना मुश्किल मरना आसान है

दुआ देकर वापस चले जाएंगे
हम तो कुछ दिनों के मेहमान हैं

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रचनाकार – ब्रजमोहन झालानी मालवा क्षेत्र के प्रसिद्ध समाजसेवी हैं. प्रकाशित ग़ज़लें उनकी सद्यः प्रकाशित कविता संकलन – ‘वक्त की लकीरों से’ चुनी गई हैं.


- स्वामी वाहिद काज़मी

यह भला कैसे संभव है कि मैं भूल जाऊँ. कदापि नहीं !

मुझे ठीक मरते दम तक स्मरण रहेगा कि वह इक्कीसवीं शती में लुढ़कती बीसवीं शती के 96 वें साल के पांचवें मास की दसवीं तारीख़ थी. दोपहर के तीन बजे थे. महीना भर से रोग-पीड़ित मेरा शरीर मृत्यु की कामना एवं प्रार्थना करते-करते थक कर शान्त-क्लान्त पड़ा था.

अचानक कमरे में एक अजीब सी सुगन्ध भर गई महसूस हुई. बड़ी कठिनाई से पलकों से पलकें जुदा कीं तो क्या देखता हूँ कि बन्दों की रूह खींचने के कार्य पर नियुक्त अल्लाह मियाँ का ख़ास फ़रिश्ता इज़राईल मेरे दाँयी ओर, और हिन्दू धारणाओं के अनुसार, प्राणियों के प्राण हरण करने के ख़ास अधिष्ठाता यमराज बाँयी ओर मौजूद हैं. महीना भर पहले एकदम और अचानक बहरे हो गए कानों में पता नहीं कैसे श्रवण क्षमता भी पुनः लौट आई थी. उन दोनों में हुए संवाद के संपादित अंश यहाँ प्रस्तुत हैं :

इज़राईल - ‘यमराज जी, ख़ुद आपने क्यों ज़हमत फ़रमाई? आपके मातहतों का – यमदूतों तो पूरा स्टाफ़ है.’

यमराज - ‘इज़राईल भैया, आप सत्य कहते हैं. किन्तु अति सज्जन पुरुषों के प्राण हरने मेरे दूत नहीं, मैं स्वयं आता हूँ.’

इज़राईल - ‘अच्छा.’

यमराज - ‘यह बड़ा सज्जन पुरुष था. जब यह आठवीं कक्षा में पढ़ता था तभी से इसने हिन्दू धर्मशास्त्रों का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था और शायद आप जानते हों कि सबसे पहले इसने जो धर्म ग्रन्थ पढ़ा उसे कोई आम मुसलमान कदाचित स्पर्श करना भी पसंद न करे. वह था – सत्यार्थ प्रकाश. आगे चलकर तो गीता, वेद, पुराण, मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्रों में इसकी इतनी अधिक रुचि रही कि क्या किसी आधुनिक हिन्दू को होगी. हिन्दू धर्मशास्त्रों का इत्र निकाल कर अपने वस्त्र बसाता था. अभी कोई एक वर्ष पूर्व इसने गीता पर जो रेडियो वार्ता प्रसारित की थी उसे सुनकर तो देवलोक में भगवान् विष्णु भी हर्षित हो उठे थे.’

इज़राईल - ‘सच फ़रमाते हैं आप. वो वार्ता हम ने भी सुनी थी. उसमें इसने श्रीकृष्ण जी को पैग़म्बर के दर्जे की हस्ती बताया था. जिस तरह उर्दू और हिन्दी इसे अपनी दोनों आँखों की तरह अजीज थीं उसी तरह इसके खून में हिन्दू-मुसलिम तेहज़ीब के रंग घुले हुए थे. शायद आपको याद हो, सूफ़ी संतों और सूफ़ी दरवेशों पर इसने ढेरों मज़मून लिखे थे जो एक तरह से इसके ज़मीर की आवाज़ थे. इसके लिखे वो मज़मून और मक़ाले आसमानों पर पढ़े जाते थे तो कितने ही दरवेश और वली अल्लाह इसकी तारीफ़ करते अघाते नहीं थे.’

यमराज - ‘मुझे ज्ञात है भाई. यह भी पता है कि परलोक वासी उन्हीं संतों-ज्ञानियों की परोक्ष छाया इसके सिर पर कवच की भान्ति सतत रही. अन्यथा इसके भितरघाती परिजन तथा विरोधियों ने तो इसकी तिक्का-बोटी करने में तनिक कसर नहीं छोड़ी थी.’

इज़राईल - ‘जी हाँ, हर मोर्चे पर इसने बड़ी सख्त जद्दोजहद की.’

यमराज - ‘चलिए, अब हम इसे सारे संतापों से मुक्ति दिलाएँ.’

इसके पश्चात् दोनों ने मिलकर मेरे प्राण निकाले और एक सुनहरी डिबिया में बंद कर मेरे सिर के ऊपर लगी खूंटी में टाँग दिया. फिर वे बाहर इस मंत्रणा के लिए चले गए कि मेरे मृत शरीर का अंतिम संस्कार किस विधि से सम्पन्न किया जाए. क्योंकि मैंने तो हिन्दू-मुसलमान के भेद-भाव से परे केवल एक इन्सान की भान्ति जीवन व्यतीत किया था इसलिए मेरा अपना कोई ऐसा आग्रह या इच्छा ही नहीं थी कि मेरा अंतिम संस्कार किस विधि से किया जाए. जलाया जाने अथवा दफ़नाया जाने, दोनों से बेन्याज़ था. अतः उन दोनों फ़रिश्तों ने यह उचित ही इरादा किया कि कोई मध्यम मार्ग सोचकर मेरे मित्रों के मन में चुपके से ऐसी प्रेरणा जमा देंगे कि बिना किसी कठिनाई के राज़ी-खुशी मेरा अन्तिम संस्कार सम्पन्न हो सके.

अचानक भड़ाक से द्वार खुला और एक युवक ने धड़धड़ाते हुए भीतर प्रवेश कर बड़े जोर से मानो नारा मारा - ‘स्वामी ऽ ऽ जी, नमस्ते ऽ ऽ !’

यह वही युवक था जो अकसर मेरे पास भेजा चाटने आया करता था और उसका व्यवहार कुछ छिछोरपन, कुछ असभ्यता का मिश्रित रूप होता था. हस्बे आदत धम्म-से सोफे पर बैठते-बैठते पता नहीं उसे कैसे यह आभास हो गया कि यह सामने पलंग पर खुली आँखें लिए स्वामी जी नहीं उनकी लाश पड़ी है. मानों साक्षात् कोई भूत देख लिया हो ऐसी बदहवासी के साथ वह उठा और तीर की तरह कमरे से बाहर चला गया.

थोड़ी देर बाद खुले दरवाजे से मेरे एक हिन्दू मित्र ने प्रवेश किया जिसके चेहरे पर गिलहरी की दुम जैसी बेतरतीब बड़ी घनी मूंछें थीं. मैं उन्हें मुच्छड़ कहना अब भी पसन्द करूंगा. ये एक तथाकथित डॉक्टर थे. भीतर घुसते ही उन्होंने होठों से अलग कर सिगरेट बाहर फेंकी और झुककर मेरे मृत शरीर का मुआयना किया. जब यक़ीन हो गया कि मेरा शरीर वाक़ई निष्प्राण है तो उन्होंने हस्बे आदत पुलिसिया ऐँठ व स्वाभाविक ठसक से चारों ओर दृष्टि घुमाकर कमरे का जायज़ा लिया, फिर एक अलमारी खोलकर कुछ उठाया-धरी करनी चाही.

अभी मुच्छड़ साहब ने अपने इरादे को क्रियान्वित नहीं किया था कि नीली लुंगी, ढीला कुर्ता, गंजी चाँद वाले एक मुल्ला टाइप मियाँ जी ने मानों हाँफते हुए भीतर प्रवेश किया और मुच्छड़ साहब को देखकर मानो चौंकते हुए उन पर सीधा सवाली प्रहार किया - ‘आप यहाँ क्या कर रहे हैं ? मैं खलील खां हूँ.’

मुच्छड़ साहब ने उन्हें घूरते हुए मोर्चा सँभाला और सख्त तेवरों के साथ जवाब दाग़ा - ‘मैं स्वामी जी का इस शहर में इकलौता दोस्त हूँ. चूंकि इनका कोई वली वारिस नहीं है और ये बहुत महान् साहित्यकार थे. तन, मन, धन क्या सारा जीवन उन्होंने साहित्य सेवा के लिए अर्पित कर दिया था. उनकी इच्छा थी कि उनके सारे संग्रह को सुरक्षित कर एक स्मारक बनवाया जाए. वह योजना मेरी ही थी. अतः उनका सारा संग्रह यहाँ से उठा ले जाने के लिए आया हूँ, पूर्व इसके कि उनकी मृत देह यहाँ से उठे.’

ख़लील ख़ां पैर पटकते हुए भन्नाए - ‘ये एक लावारिस मुसलमान का माल है. इसे कोई ग़ैर-मुसलिम नहीं ले सकता. आपकी योजना की ऐसी तैसी ! मैं पुलिस में रिपोर्ट कराके आया हूँ. खैरियत इसी में है कि चुपचाप सिधार जाओ वरना अभी पुलिस आकर सारा दिमाग दुरुस्त कर देगी. ’

मुच्छड़ साहब ने गुस्से से मूंछे फड़काते डपटकर कहा - ‘ऐ मुल्ले ! जबान संभालकर बात कर वरना एक घूंसे में बत्तीसी बाहर आ जाएगी.’

‘मेरे भी हाथ बंधे नहीं हैं मुच्छड़ !’ ख़लील मियाँ भभके- ‘उधर हाथ उठा नहीं कि इधर से धोबी पाट के एक ही वार में कमर टूट जाएगी.’

इस हंगामें की पृष्ठभूमि स्पष्ट करनी आवश्यक है.

मुच्छड़ का एक शिष्य – खुश लिबास, गोरा-चिट्ठा, खूबसूरत आदमी था. पुरानी धुरानी चीज़ों, किताबों, चित्रों आदि का संग्रह करने का उसे शौक़ था. वह मुच्छड़ साहब की नीयत भली प्रकार जानता था कि स्वामी जी के नाम पर स्मारक बनाने की हवाइयाँ उड़ाकर वे सारा संग्रह अपने घर ले जाएंगे और फिर कहाँ का स्मारक कैसा स्मारक. वह यह चाहता था कि स्मारक, बने या न बने किन्तु संग्रह बरबाद न हो. मुच्छड़ साहब की सम्पत्ति नहीं बनना चाहिए. उसकी हार्दिक इच्छा थी और इस आशय की वसीयत लिख देने को उसने मुझसे कई बार संजीदगी से कहा भी था – कि मेरे मरने के बाद सारा संग्रह उसके खाली पड़े एक कमरे में पहुँचा दिया जाए, फिर बाद में यह तय किया जाए कि क्या करना चाहिए. उसे यह भी पता था कि मुच्छड़ साहब के सामने न उसकी दाल गलेगी और न कोई बात बनेगी. मुझे मरा पाकर वर युवक बदहवास-सा भागा. उसने इस गोरे चिट्टे डाक्टर से जाकर फूंक दिया कि स्वामी जी तो इस संसार से कूच कर गए. गोरे-चिट्टे डाक्टर के बंगले के निकट ही इस शहर की सबसे बड़ी मस्जिद थी. एकदम से उसे कुछ और तो उपाय सूझा नहीं, मस्जिद में जाकर उसने वहां के मुल्ला जी को सूचित किया कि एक लावारिस मुसलमान फलां जगह अल्लाह को प्यारा हो गया है और उसके सामान पर एक हिन्दू आदमी कब्जा करना चाहता है. नतीजा यह कि इधर डाक्टर मुच्छड़ भागे आए उधर से ख़लील मियाँ चले आए. अब आगे चलें.

‘देखिए मुल्ला जी’ डाक्टर मुच्छड़ ने, हस्बे आदत, चालाकी के साथ नर्मी घोलकर कहा - ‘स्वामी जी का मुसलमानों से कोई सम्बन्ध नहीं था. वे जीवन भर हिन्दी में पढ़ते, हिन्दी में लिखते, हिन्दी की रोटी खाते रहे. उर्दू में उन्होंने कभी एक पंक्ति भी नहीं छपवाई. उनका उठना-बैठना उनकी मित्रता, उनका सम्पर्क हिन्दुओं से रहा. न वे गोश्त खाते थे. न उन्हें कभी मस्जिद में जाते देखा गया. क़ुरान पढ़ते या रोज़े रखते भी नहीं देखा गया. वे एक हिन्दू संत के विधिवत् दीक्षा प्राप्त मुरीद थे. जितनी भी स्त्रियों से उनकी मेल-मुलाकात रही वे हिन्दू थीं और तो और, वे कपड़े तक हिन्दू सन्यासियों जैसे गेरुआ रंग के पहनते थे. यह देखिए.’

इतना कहकर डाक्टर मुच्छड़ ने खूंटी पर टंगा मेरा गेरुआ चोग़ा उतारा और ख़लील मियाँ के आगे लहराते हुए बोले - ‘यह गेरुआ चोग़ा उनका पसंदीदा लिबास था और पता है पिछली ईद पर यह चोग़ा उन्हें मैंने बनवाकर सादर-सप्रेम-भेंट किया था.’ उन्होंने हस्बे आदत बड़े फ़ख्र से पहले तो सीना फुलाकर मियाँ जी को देखा फिर उस चोग़े को मेरे मृत शरीर पर पैरों से गर्दन तक आहिस्ता से इस प्रकार ढंक दिया मानों फूलों की चादर हो. फिर सिगरेट सुलगा ली.

ख़लील ख़ां ने इस कल्ले में दबा पान उस कल्ले में घुमाकर अपनी आँखें कमरे में घुमाईं और संयत स्वर में बोले - ‘यह हमें भी पता है कि काज़मी साहब नमाज़-रोजे की पाबन्दी नहीं करते थे. मुसलमानों के मुल्लापन की जमकर खिल्ली उड़ाते थे. स्वामी जी कहलाते थे. पर साहब ! थे तो असल सैयदज़ादे, अपनी असलियत तो नहीं भूले, नाम तो वाहिद काज़मी ही रहा. कोई शुद्धि तो नहीं कराई थी. माना कि वो इस्लाम की राह से भटक गए थे. बे-दीन हो गए थे. मगर इससे हमें क्या. इसका यानी उनके आमालों का अज़ाब-सवाब अल्लाह मियाँ जाने. रहा उनके लिबास का सवाल तो यह देखिए.’

इतना कह कर वे लपके और गेरुए चोग़े के पास टंगे सफेद चोगे को डाक्टर मुच्छड़ के चेहरे पर लहराते हुए बोले - ‘वो ये सफेद चोग़ा भी पहनते थे. ये सफेद चोग़ा सूफ़ी दरवेशों के रंग का है. अब कह दीजिए कि यह सफेद चोग़ा उन्हें किसी हिन्दू औरत ने पेश किया होगा.’ इन शब्दों के साथ उन्होंने क़ुराने-पाक के एक अंश का सस्वर पाठ करते हुए सफेद चोग़ा, मेरी मृत देह को ढंके गेरुई चोग़े पर आहिस्ता से ओढ़ा दिया.

‘ख़लील ख़ां’, डाक्टर मुच्छड़ भन्नाए - ‘जीते जी इस आदमी को एक धज्जी तक नहीं दी, अब इसका संग्रह हथियाने चले आए. हद है बेशर्मी की.’

‘बेशर्मी क्यों, यह तो हमारा फ़र्ज है.’ ख़लील ख़ां बोले - ‘कुछ भी सही, मरहूम वाहिद काज़मी साहब हमारे भाई थे. क्या हुआ अगर अपने भाइयों से नाराज़ रहे. रहा धज्जी का सवाल, जीते जी हम उनके लिए कुछ नहीं कर सके तो क्या. अब हम पूरा चौबीस गज बढ़िया टैरीकॉट का कपड़ा लाकर उनका कफ़न तैयार कराएँगे और बड़ी धूम से जनाज़ा उठाएँगे. उनके सामान को हिन्दुओं के हाथों में नहीं पड़ने देंगे.’

अब तक दस-पाँच हिन्दू भाई और इतने ही मुसलमान बिरादर कमरे में आ चुके थे और ख़लील खां व मुच्छड़ को अपना अघोषित मुखिया मान उनके चेहरों को इस प्रकार ताक रहे थे मानों अलादीन के चराग़ से प्रकट जिन्न अपने आक़ा के आदेश की प्रतीक्षा में हो.

डा. मुच्छड़ ने झपटकर एक आलमारी का पट खोला और ऊपर से नीचे तक ख़ानों में चुनी पुस्तकों में से जल्दी-जल्दी दस-पाँच पुस्तकें निकाल उन्हें खोल-खोल कर मियाँ जी को दिखाते हुए दहाड़े - ‘ये सारी किताबें, आँखें खोल कर देख लो, हिन्दी में हैं जिसका एक अक्षर भी तुम्हारे फ़रिश्ते तक नहीं पढ़ सकते. ऐसे अनपढ़ों के हाथ स्वामी जी का संग्रह लगे यह नहीं हो सकता.’

ख़लील खां पहले तो थोड़ा सिटपिटाए फिर पता नहीं क्या सोचकर दूसरी अलमारी की ओर बढ़े और उसमें ऊपर से नीचे तक चुनीं पुस्तकों को खोलकर डा. मुच्छड़ को दिखाते हुए चीखे - ‘जरा चश्मा लगाकर देख लो! ये सारी किताबें उर्दू में, फारसी में, हैं और ये देखो यह तो अरबी में है.’ एक नन्हीं-सी कितबिया – जो वास्तव में क़ुरान की कुछ विशेष दुआओं का संक्षिप्त संग्रह मात्र था – बड़े सम्मान से चूमते हुए कहा - ‘ये ज़बानें आपके देवता भी नहीं बांच सकते, समझे! नहीं, क़तई नहीं! ऐसी पाकीज़ा और मुक़द्दस किताबें हिन्दुओं के नापाक हाथों में पहुँचें, यह नहीं हो सकता.’

डा. मुच्छड़ ने मानों खा जाने वाली आँखों से खलील खां को घूरा. ख़लील ख़ां ने क़हर बरसाती नज़रों से डा. मुच्छड़ को घूरा.

सहसा डा. मुच्छड़ ने अपने हिन्दू साथियों को मानो ललकार कर कहा - ‘उठाओ सारा सामान, देखते हैं कोई साला क्या करता है?’

ख़लील ख़ां ने अपने मुसलमान साथियों को उकसाया - ‘जल्दी करो! आज देखना है कोई हरामजादा कैसे एक मुसलमान की मिल्कियत पर क़ाबिज़ होता है?’

अब दोनों दल मेरा असबाब उठाने के लिए पिल पड़े. जो जिसके हाथ लगा उठा-उठाकर बाहर बरामदे में रखने लगा. मेरा बिस्तरा किसी के हाथ में था तो होल्डाल मात्र दूसरे के कब्जे में. किसी ने सोफा उठाया, किसी ने टेबल झपटी. एक ने कुर्सी उठाई तो दूसरे ने तिपाई. इसने टेबल फ़ैन उठाया तो उसने ट्यूब लाइटें खींच लीं. कपड़ों के बक्स और बर्तनों का भी यही हश्र हुआ. इसके हाथ मेरे बाएँ पैर का तो उसके हाथ मेरे दाएँ पैर का जूता पड़ा. एक ने पीकदान उठाया तो दूसरे ने गुलदान. साबुनदानी और सुराही एक दल के कब्जे में पहुँची तो बाल्टी और मग दूसरे दल के कब्जे में. देखते ही देखते बेहद क़रीने से रखा मेरा सारा सामान तहस-नहस होकर बरामदे में ढेर हो गया. ग़नीमत यह थी कि सारी पुस्तकें आदि चूंकि कमरे की दीवारों में बनी अलमारियों में थीं इसलिए उनकी छीना-झपट नहीं हो सकी थी.

बाहर बरामदे में तहस-नहस हुए सामान के दोनों ढेरों के दरम्यान पता नहीं किसने एक चाक से रेखा भी खींच दी और वहाँ अपने-अपने दल के दो लठैत भी तैनात कर दिए.

यह सब देखकर मेरे प्राण रो उठे. इसलिए नहीं कि मेरा सारा असबाब बरबाद हो गया था. बल्कि इस लिए कि यह मेरी दृष्टि में लगभग वैसा ही बेहद हृदय विदारक दृश्य था जब अमानवीय पागलपन के हाथों एक खुशहाल सरजमीन की छाती चीरकर दो टुकड़े कर दिए गए थे और आपसी प्रेम, एकता, भाईचारे, सद् भाव, खुलूस आदि तमाम मानवीय गुणों का शैतानी ताक़तों ने एक साथ झटका कर डाला था. फिर धरती माँ के दोनों टुकड़ों पर अपना-अपना क़ब्जा करके शैतानी ताक़तों ने संगीनों से ख़ून की गहरी रेखा बनाकर इस टुकड़े को एक मुल्क दूसरे टुकड़े को दूसरा मुल्क क़रार देकर चिरस्थाई वैरभाव का बीज बो दिया था जिसके कड़वे फल दोनों टुकड़ों के निवासियों को खाने पड़ रहे थे.

यह दृश्य कुछ और रूप धारण करे इसके पूर्व ही शिष्ट, शालीन व्यक्ति ने कमरे में प्रवेश किया. उसे देखते ही डा. मुच्छड़ और ख़लील ख़ां ने मानों चकित भाव से अभिवादन किया. आगन्तुक ने संकेत से उनके अभिवादन का उत्तर दिया और ताजे फूलों की एक माला मेरे मृत शरीर पर चढ़ा कर हाथ जोड़कर प्रणाम किया फिर कमरे में मौजूद लोगों से सम्बोधित होकर बोला - ‘स्वामी जी के स्वर्गवास की सूचना जिला प्रशासन तक पहुँच चुकी है. नगर में कुछ ऐसा वातावरण बन गया कि उनके अन्तिम संस्कार को लेकर साम्प्रदायिक दंगा होने की आशंका है. अभी थोड़ी देर में पुलिस आकर लाश को ले जाएगी फिर बाद में तय किया जाएगा कि अन्तिम संस्कार किस प्रकार किया जाए. तब तक आप लोग शान्ति बनाए रखें.’ यह कहकर वह कमरे से निकल गया.

यह व्यक्ति कुछ वर्ष पूर्व इस शहर में सिटी मजिस्ट्रेट होकर आया था. साहित्यिक अभिरुचि का होने से मेरा बहुत सम्मान करता था और अकसर मिलने आया करता था. अब वह जिला प्रशासन का बड़ा पदाधिकारी था.

उसके साथ नामी गरामी अख़बारों के कुछ पत्रकार भी आए थे जो सब कमरे के बाहर बालकनी में खड़े, नीचे सड़क के दोनों ओर हिन्दू मुसलमानों की बढ़ती जा रही भीड़ को बड़ी रूचिपूर्वक देख रहे थे.

मैंने देखा कि कमरे के रोशनदान पर मौत के फ़रिश्ते इज़राईल और यमराज मौजूद थे. वे डिबिया में बंद मरे प्राण लेने के लिए आए थे किन्तु सारा मामला भांप कर वहीं से कूच कर गए.

डा. मुच्छड़ ने राष्ट्रीय स्तर के एक पत्र के जिला संवाददाता से चुपके-चुपके कुछ कहा. पत्रकार ने बेहयाई से अट्टहास कर उनके हाथ पर हाथ मारकर मानों शाबासी दी.

डा. मुच्छड़ ने अपने दल को कोई संकेत किया और दो मुसटंडे जवान हिन्दी वाली पुस्तकों की ओर बढ़े. मियाँ जी ने अपने दल वालों को इशारा किया तो उधर से भी दो पहलवान उर्दू वाली अलमारी की ओर बढ़े. देखते ही देखते दोनों दलों के चारों व्यक्ति आपस में गुत्थम-गुत्था होकर एक दूसरे की माँ बहनों से अशोभनीय सम्बन्धवाचक किस्म की गालियाँ बकने लगे.

अब हालत यह थी कि छीना-झपटी और नोच-खसोट में एक-एक पुस्तक की जिल्द ऐसे उतर रही थी मानों कसाई जानवर की खाल उतारे. पन्नों की चिंदियाँ हुई जा रही थीं. पांडुलिपियाँ नीचे पड़ी पैरों तले रौंदी जा रही थीं. पत्र-पत्रिकाओं के ढेर बिखर गए थे और मेरे बनाए तमाम रेखाचित्र मियाँ जी और डाक्टर मुच्छड़ के जूतों तले फट रहे थे. पिस रहे थे.

पता नहीं किसने पत्रकारों से मिनमिना कर कहा - ‘आप तमाशा देख रहे हैं. इस बरबादी को रोकते क्यों नहीं हैं.’

राष्ट्रीय स्तर के अख़बार के जिला संवाददाता ने उपस्थित पत्रकारों के अघोषित प्रतिनिधि के रूप में बड़ी जहरीली हँसी उछालते हुए जवाब दिया - ‘हम कौन होते हैं जी! स्वामी जी हम से तो कोई सरोकार ही नहीं रखते थे. अपने स्तर और अपने ज़ौक का कोई लेखन या पत्रकार उन्हें लगता ही न था. हमेशा दिमाग़ आसमान पर रहता था. बहुत बड़े साहित्यकार थे न.’

बाकी पत्रकारों ने भी हँसी उड़ाते हुए उसकी बात का समर्थन कर दिया.

मेरे मृत शरीर का चेहरा खुला हुआ था. आँखें तक अभी किसी ने बन्द नहीं की थीं. मेरी पानीदार आँखों की नम पुतलियों को मक्खियों का एक समूह बड़े स्वाद से चाट रहा था. दूसरा समूह पलकों पर जमा था. चींटियों को भी भनक लग गई थी. वे अलग-अलग दल बनाकर नाक के नथुनों और कानों में निःसंकोच घुस रही थीं. काले रंग के बड़े मोटे-मोटे चींटों तक यह सूचना ‘प्रसारित’ हो चुकी थी कि एक इन्सान की नर्म-गर्म लाश यहाँ असुरक्षित पड़ी है. चींटों के प्रमुख अपनी-अपनी मूंछ रूपी एंटीना से मेरी पिंडलियाँ स्पर्श करके कोई उपयुक्त मार्ग ऐसा खोज रहे थे जिसे पाकर इन्सान के नर्म गोश्त की दावत उड़ाई जा सके.

अपने शरीर की मुझे जीते-जी भी कोई खास परवाह नहीं थी. अब जब वह मिट्टी हो गया था तो भला उसकी दुर्गति की क्या परवाह करता. पर हाँ, डिबिया में बन्द मेरे प्राण अवश्य मेरी खिल्ली उड़ा रहे थे - ‘स्वामी वाहिद काज़मी साहिब! ये है आपके जिस्म की असलियत. इसी मिट्टी के बल पर बहुत ऐश उड़ाए थे. अच्छे भोजन से इसका पोषण और लिबास से सजाया था. बहुत इतराते थे इस पर. अब शीघ्र ही यह कीड़ों का भोजन बनेगा.’

तो मृत देह की क़तई नहीं किन्तु आधी शती की लम्बी मुद्दत में जाने कहाँ-कहाँ से खोज-खोजकर संग्रह किए गए दुर्लभ ग्रन्थों-चित्रों, पेट काट कर जोड़ी गई पसीने की कमाई से खरीदी गई पुस्तकों आदि की ऐसी दुर्दशा मुझे असह्य थी. संग्रह की ऐसी बरबादी पर मेरे प्राण बुरी तरह छटपटाने और तड़पने लगे. इसी छटपटाहट में डिबिया जोर से हिली और पता नहीं कैसे मेरी ठोढ़ी पर गिर कर खुल गई. –डिबिया का खुलना था कि मेरे प्राण सर्र से नाक के नथुनों में घुस गए. प्राणों का प्रवेश होते ही नस-नस में जीवन का संचार हो गया. मुझे एक इतने जोर की छींक आई कि छींक के वेग से मैं आधा उठ कर बैठ गया. अजीब बात थी कि अब फिर से जीवित होते ही मेरी रोगी काया में शक्ति एवं ऊर्जा का मानों दरिया लहराने लगा. मैं जल्दी जल्दी चींटे-चींटियों-मक्खियों को भगाने-उड़ाने लगा.

डा. मुच्छड़ और ख़लील ख़ां को मेरी छींक की आवाज़ मानो बम फटने से कम नहीं लगी. दोनों ने बदहवास सा होकर पहले तो मुझे देखा और फिर एक दूसरे को देखते हुए मानों घबराकर कहा - ‘भूत!’

डा. मुच्छड़ ने जल्दी से हनुमान चालीसा का सस्वर पाठ शुरू कर दिया - ‘भूत पिशाच निकट नहीं आवे...’

ख़लील ख़ां ने क़ुरआन की एक सूरह पढ़नी शुरू कर दी - ‘कुल आउजो बि रब्बिन नास...’ जो दुष्ट आत्माओं से रक्षा के निमित्त कारगर समझी जाती है.

दोनों के समर्थक जहां के तहाँ जड़वत रह गए.

मैंने दोनों को विषैली मुस्कान के साथ देखते हुए कहा - ‘शैतान की औलादो! मेरी आँखें बंद होते ही तुमने पचास साल से कण-कण जोड़ी मेरी सारी सम्पदा तो बरबाद कर ही डाली. मेरी लाश पर भी हिन्दू या मुसलमान का लेबल चिपकाना चाहा जबकि मैं ऐसे तमाम लेबलों से निर्लिप्त एक जन्मा था. हिन्दू-मुसलमान नहीं मात्र इन्सान की तरह जीवन गुज़ार कर इन्सान की तरह मर गया था. मानवता ही मेरा धर्म और मानव-प्रेम ही मेरा ईमान रहा है. यही इबादत है मेरे लिए और यही साधना भी. अब अपनी कुशल चाहो तो फौरन यहाँ से सिधार जाओ और फिर कभी इधर का रुख़ मत करना. जाते हो या उठ कर एक-एक का कचूमर बनाऊँ.’

यह सुनते ही सारे तमाशबीन दफा हो गए. ख़लील ख़ां और डा. मुच्छड़ को मानों काठ मार गया. कुछ पल बाद –

हस्बे आदत डा. मुच्छड़ ने मन ही मन पेचोताब खाकर ऊपर से नर्मी जतलाते हुए कहा- ‘स्वामी जी! आपकी तबीयत ठीक है न?’

ख़लील ख़ां ने बड़ी हमदर्दी से पूछा- ‘काज़मी साहब, आपकी हालत ठीक है न?’

‘गेट आऊट!’ मैं दाँत पीसकर चीखा और उठ कर खड़ा हो गया.

डा. मुच्छड़ और ख़लील ने ऐसे दोस्ताना अंदाज में एक दूसरे का हाथ थाम लिया और जैसे जिगरी मित्र हों और फिर मुझे घूरते हुए कमरे से निकल गए. जाते-जाते एक खीझ भरा स्वर डा. मुच्छड़ का मेरे कानों तक पहुँचा - ‘अजब बेहया है मरा-मराया जीवित हो गया.’

दूसरा स्वर ख़लील मियां का था - ‘अजी डाक्टर साहब, ऐसा तो कभी देखा न सुना. कमबख़्त मरकर फिर जिंदा हो गया.’

इसकी तफ़सील में जाना व्यर्थ है कि किस प्रकार मैंने अपना असबाब समेटा और सारा संग्रह कैसे सहेजा.

काबिले-जिक्र बात यह है कि अगले दिन के चार स्थानीय अख़बारों में मेरी दुःखद मृत्यु की सूचनाप्रद खबर बाकायदा मौजूद थी.

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सुधी पाठकों से रचनाकार का एक विनम्र आग्रह : आपको पता ही है कि रचनाकार में प्रकाशित बहुत से रचनाकारों के पास उनकी अपनी रचनाओं को कम्प्यूटर-इंटरनेट पर देख-पढ़ पाने का कोई जरिया उनकी पँहुच में नहीं है. वे सिर्फ महसूस कर सकते हैं – कयास लगा सकते हैं – कल्पना कर सकते हैं कि उनका लिखा इंटरनेट पर कैसा प्रतीत होता होगा... शायद दाँतों तले उँगली दबाने जैसा - कि कहानी और उपन्यास भी इंटरनेट पर प्रकाशित हो सकते हैं ! और इन्हें तमाम दुनिया में कहीं भी – कभी भी पढ़ा जा सकता है!

स्वामी जी भी अपनी रचनाएँ इंटरनेट पर देख-पढ़ नहीं पा रहे. दरअसल उनके आसपास ऐसा कोई जरिया ही नहीं है. अगर आपको इनकी रचनाओं में और खासकर उनकी इस रचना में जिसमें उन्होंने अपने विचारों और व्यक्तित्व का आईना इस व्यंग्यात्मक-आत्मकथात्मक रूप में प्रस्तुत किया है, कुछ अच्छाइयाँ नज़र आती हैं, कुछ मूल्य नजर आते हैं, तो कृपया उनके लिए थोड़ा सा वक्त निकाल कर उन्हें एक पोस्टकार्ड अवश्य प्रेषित करें. यह सत्य है कि पोस्ट कार्ड की कीमत कुछ नहीं है- पचास पैसै, परंतु हर एक का समय कीमती है – और आपके विचार तो निश्चित ही बेशकीमती हैं – जो स्वामी जी जैसे लेखकों-चिंतकों-विचारकों और व्यक्तित्वों को संबल प्रदान करेंगे. आपके पोस्टकार्ड के लिए रचनाकार का आपको अग्रिम धन्यवाद.

स्वामी जी का डाक का पता है-

10, राज होटल, पुल चमेली, अम्बाला छावनी (हरियाणा) – 133001 भारत.

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रचनाकार – चर्चित साहित्यकार स्वामी वाहिद काज़मी की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :

रसूल गलबान की कहानी
आलेख : तहज़ीब की पहचान कहानी : लानत कहानी : चिराग़ तले

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· संजय विद्रोही

अपने आप को सामान्य दिखाने की फ़िकर में मैं कुछ ज्यादा ही बन संवर कर निकला था, ऑफिस के लिए. लोग मेरे चेहरे से मेरी मनोदशा भांप न लें, सो शेव किए चेहरे पर अतिरिक्त मुस्कुराहट चस्पा करना भी नहीं भूला था. रास्ते में जो भी मिला उसने 'जंच रहे हो यार' या 'क्या बात है? आज तो!' या 'बिजली गिरा रहे हो गुरू, आज तो!' कह कर हाथ मिलाया और मैं मुस्कुरा कर 'बस यूं ही' के सिवा कुछ नहीं बोल पाया. अपनी आदत के विपरीत आज रास्ते में मिले जूनियरों के अभिवादन के जवाब में मेरी गर्दन तत्परता से हिल रही थी. अपने आप को सामान्य दिखाने की भरसक कोशिश कर रहा था मैं. किन्तु भीतर ही भीतर कुछ जोर जोर से हुड़क रहा था. तेज कदमों से आफिस में गया और सीधा जाकर अपने चैम्बर की कुशन वाली चेयर में धंस गया. भीतर बहुत कुछ उमड़ घुमड़ रहा था, जो शायद एकांत पा कर अब आंखों से भी झांकने लगा था. बाहर वालों के सामने मुस्कुराते रहना या अपने आप को व्यस्त दिखाना, खुद मुझको अपने आप में नाटकीय प्रतीत हो रहा था. किन्तु एकांत में अपने आप से अभिनय नहीं कर पा रहा था .
पूरी जिन्दगी मानो आंखों के सामने सिनेमा के रील की तरह चलने लगी.
'वो' एकाध बार सामने भी पड़ी, किन्तु बगैर नजर उठा के देखे तेज कदमों से आगे निकल गयी. मैं भीतर तक तिलमिला गया. किन्तु चेहरे पर वही रोज-सी गंभीरता ओढ़े रहा.
परसों अचानक मैंने उसके व्यवहार में बदलाव देखा. कोई 'गुड मार्निंग' नहीं. कोई बातचीत नहीं. कोई छेड़छाड़ नहीं.. एकाध बार मैंने बात करने की कोशिश भी की, तो कोई 'रिस्पांस' नहीं मिला.
मैंने फोन किया, 'क्या बात है ?’
'कुछ नहीं.' उसका नीरस- सा जवाब था.
'कुछ तो है.'
'कहा ना, कुछ भी नहीं.'
'फिर क्यों इस तरह कटी कटी हो?’
'बस यूं ही'
'अचानक?’
' ..... ' मौन दूसरी तरफ.
'अचानक?' - मैं, फिर से.
'आपको पता है, दफ्तर में सब हमारी ही बारे में बातें कर रहे हैं … ' - वो सुबक पडी.
'क्या बातें ? कैसी बातें?’
'यही कि हमारे बीच कुछ चल रहा है.'
'कौन कहता है ?’
'कौन नहीं कहता ये पूछिए? अब तो लोगों में ये ह्यूमर है कि आप अपनी पत्नी से 'सेपरेट' हो गए हैं और आजकल आपका और मेरा चक्कर चल रहा है.' वो सुबकती जा रही थी.
'सारिका, लेकिन इन सब बातों से क्या फर्क पडता है?' मैंने समझाने की गरज से कहा.
'पड़ता है रोहित, मुझे पड़ता है. अब आप शादीशुदा हैं और मैं अपना नाम किसी शादीशुदा आदमी के साथ जुड़वाना पसंद नहीं करती.'
'मुझे पसन्द करती हो ?’
'उससे क्या फर्क पड़ता है ? आप तो पुरुष हैं , उंगली तो सदा स्त्री की तरफ ही उठती है.'
'किसने उठाई उंगली? कोई मेरे सामने बोले.'
'जरूरी नहीं है कि आपके सामने आकर ही हरेक बात बोली जाए….' वो बार बार हिचकी ले रही थी.
'मुझसे प्यार करती हो?’
'हुं….च्च' उसकी हां हिचकी में फंस कर रह गई.
मैंने दुबारा पूछा, 'बोलो. करती हो?’
'हां'
'फिर किस बात का डर है ?’
'आपके साथ पहले भी मेरा नाम जुड़ चुका है. तब और बात थी. आप बैचलर थे. लेकिन अब आप शादीशुदा हैं और मैं भी उस पुराने सम्बन्ध को एक सपना मान कर लगभग भुला चुकी हूं.'
'जीवन में प्यार सिर्फ एक बार ही हो आवश्यक है क्या?’
'नहीं. किन्तु आपकी पत्नी है, एक बच्ची है. कुछ फायदा है क्या इस रिश्ते को हवा देने का ?' उसके स्वर में दूर तक बस सन्नाटा सुनाई दे रहा था.
'क्या शादी ही सबकुछ होता है जीवन में ? माना मेरी पत्नी है बच्चा है. तो क्या मुझे प्यार करने का हक नहीं ? ’
' .... ' - मौन उस तरफ.
'क्या आज मैं वो रोहित नहीं रहा जिसे तुमने कभी दिल की गहराईयों से चाहा था? बोलो ?' - मैं पुन: .
'लोग हमारे बीच शारीरिक सम्बन्ध होने की कानाफूसी करते हों , तो बताइए मैं क्या करूं ?’
'कुछ नहीं.'
'कुछ कैसे नहीं?' वो चीख पड़ी.
' तो क्या करें ? कहो.' मैं असमंजस में था.
'हम अब मिलना बंद कर देंगे. बातें करना बंद कर देंगे बस.'
'उससे क्या होगा जानती हो? उससे ये बात और अधिक पुख्ता हो जाएगी कि हम प्रीकाशन लेकर चल रहे हैं. हमारे बीच जरूर कुछ केमिस्ट्री है.'
'लोगों को बातें बनाने का मौका तो नहीं मिलेगा, कम से कम.'
'कुछ तो लोग कहेंगे लोगों का काम है कहना' माहौल को सामान्य करने की गरज से मैं गुनगुनाने लगा.
'आपके लिए तो सब मजाक है. आपको क्या फर्क पड़ता है ?' उसका स्वर तल्ख था. मैं स्तब्ध रह गया.
' अच्छा बताओ तुम क्या चाहती हो ?' मैं एकाएक गंभीर हो गया था.
'हमें अब मिलना बंद कर देना चाहिए.'
'पक्का ?’
'हां.'
'कब से ?’
'अभी से.'
'ठीक है.... मगर क्या तुम मुझ से दूर रह पाओगी ?’
'हां………' कह कर वो पुनः सुबक पड़ी. मैंने उसका 'हां' नहीं सुन उसकी सुबकी सुनी. मुझे अपना उत्तर मिल गया था. बगैर एक भी शब्द बोले मैंने रिसीवर रख दिया.
दूसरे ही दिन से मैं 'इनडिफरेंट' हो गया. अपने काम से काम. खाली समय में प्लांट विजिट करना और शाम को कमरे में लेट कर सिगरेट फूंकना. रात के करीब आठ बज रहे थे . मुझे ना जाने क्या सूझा, मैंने उसके घर के फोन पर दो बार घंटी दी. ये हमारा 'कोड' था. उसका रिएक्शन क्या होता है? इंतजार में मैं इधर उधर टहलने लगा .
'सारी आजमाईशें मेरी ही क्यों? वो भी तो इम्तिहान दे मालिक.' किसी शायर की पंक्तियां बार-बार जेहन में आ जा रही थी.
अचानक मेरा फोन घनघनाया. देखा, कालर आईडी पर 'उसका' नम्बर था. पढ़कर मैं उसकी बेबसी पर मुस्कुरा दिया और तत्काल फोन उठाया 'हैलो.'
'हां ,बोलो' वही हमेशा वाला स्वर. हमेशा वाले चिरपरिचित अंदाज में. एक पल को लगा जैसे कुछ नहीं बदला हमारे बीच. वही तत्परता वही अधीरता और वही प्यार. सबकुछ वैसा ही तो था उसकी आवाज में.
'कौन ?' मैं अनजान बन गया.
'मैं सारिका.'
'हां, बोलो.'
'आपने घंटी दी थी अभी ?' उसने मुझसे 'हां' सुनने की उम्मीद में पूछा.
'नहीं.' मेरा सपाट सा उत्तर था.
'दो बार घंटी बजी. मैंने सोचा आप हैं. बात करना चाहते हैं.'
'नहीं, मैंने नहीं दी घंटी.'
'आप अपसेट हो ना?’
'नहीं तो. अपसेट होने की क्या बात है ?’
'नहीं ,आप अपसेट हो. पता है, आपकी आवाज बता रही है. इतना तो मैं भी जानती हूं आपको.'
'ऐसा कुछ भी नहीं है. तुम ख़्वामख़्वाह परेशान हो रही हो. ठीक है रखता हूं.' कहकर बिना कुछ सुने मैंने फोन काट दिया. उसके जी की तड़फ देखकर मन रो पड़ा. वाकई मैं तो परूष हूं किन्तु उसका क्या……
……..मन ही मन एक प्रण ले लिया. अब कभी उससे नहीं बोलूंगा, नहीं मिलूंगा, नहीं छुऊंगा.
…….. आज पन्द्रहवाँ दिन है. उससे बगैर बोले, बगैर नजरें मिलाए, बगैर उसको छुए….
कड़ा इम्तिहान है. पर शायद यूं ही सही… धीरे-धीरे प्यार मिट जाएगा. अचानक घड़ी पर नजर गई साढ़े बारह हो रहे थे. एक बजे बोर्ड की मीटिंग थी. तुरन्त चश्मा संभाला और तेज कदमों से गाड़ी की तरफ बढ़ गया.
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रचनाकार- संजय विद्रोही की, एक अलग ट्रीटमेंट – एक अलग लहज़े की कहानी रचनाकार में आप यहाँ पर -http://rachanakar.blogspot.com/2005/08/blog-post_23.html पढ़ सकते हैं. इनकी विद्रोही स्वरों की कहानियाँ, कविताएँ और ग़ज़लें इनके ब्लॉग स्थल http://pratimanjali.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं

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- लतीफ़ घोंघी

यह जानकर दुःख हुआ कि एक पटवारी साहब सौ रुपया घूस लेते हुए पकड़ लिए गए. आश्चर्य इस लिए हुआ कि देश में ऐसे पटवारी हैं जो घूस लेकर पकड़ में आ जाते हैं. यार पटवारी, सच कहें, तुमने तो पूरे पटवारी समाज की नाक काट कर रख दी. हमारे इधर से पटवारी पाँच सौ रुपया ले लेते हैं और पकड़ाई में भी नहीं आते. एक तुम हो कि सौ रुपट्टी में ही पकड़े गए. हम पूछते हैं, कहाँ ट्रेनिंग ली थी यार तुमने? किसने बना दिया तुमको पटवारी? यार तुम पकड़ में क्या आ गए, तुमने पूरे राष्ट्र को घूसखोर सिद्ध कर दिया. हमारा देश ईमानदार कर्मचारियों का देश है. तुम जैसे लोग ही देश पर घूसखोरी और भ्रष्टाचार का कलंक लगा रहे हैं. थू है तुम्हारी पटवारी गिरी पर. डूब मरो चुल्लू भर पानी में. धिक्कार है तुम्हें कि इस देश में रहकर भी तुमको घूस लेने का तरीका नहीं आया. तुम तो विदेश चले जाओ यार, तुम इस देश में रहने के काबिल नहीं हो. अरे भइया, तुमको घूस लेना नहीं आता तो रेवेन्यू इन्सपेक्टर से पूछ लेते, किसी तहसीलदार से पूछ लेते. हम कहते हैं तुम कब सीखोगे? राजस्व विभाग में इतने वरिष्ठ अधिकारी लोग हैं, उनके अनुभवों का लाभ कब उठाओगे? किसने कहा था तुमको कि सौ रुपये का नोट लो? एक बोरा चावल ले लेते. फिर कैसे पकड़ में आते? नोट पर तो नम्बर होता है, चावल पर थोड़े होता है नम्बर. पुलिस वाले पूछते तो कह देते ससुराल वालों ने भेजा है. यार पटवारी भी तुम कच्चे हो.

सुनो हो पटवारी, तुम घूस लेते हुए पकड़ में क्या आ गए, हम इधर तकलीफ में पड़ गए. अपने हल्का पटवारी से नकल लेने जाते हैं तो पटवारी कहता है, मेरे पास खसरा फार्म नहीं है.

हम बाजार से फार्म ला देते हैं तो वह कहता है, ट्रेसिंग पेपर नहीं है. वो भी ला देते हैं तो कहता है, बी-वन का फार्म नहीं है. वो भी ला देते हैं तो कहता है – हमको फुरसत नहीं है.

हम कहते हैं – पटवारी साहब, लगे तो दस-बीस रुपया ले लो लेकिन हमको खसरा बी-वन की नकल दे दो. वह कहता है देखो, आज से हम ईमानदार हो गए हैं. हमारा एक भाई पकड़ में आ गया है. उसके बाल-बच्चे भूखे मर रहे हैं. उसे पकड़कर शासन ने पूरे पटवारी समाज का अपमान किया है. इसलिए आज से हम कोई घूस नहीं लेंगे और जब हमको फुरसत होगी तभी आप लोगों का काम करेंगे.

हमने कहा – तो यही बता दीजिए कि आपको कब फुरसत मिलेगी.

पटवारी साहब ने हमको ऊपर से नीचे तक देखा और बोले- ये नहीं बता सकते. पटवारी को कब फुरसत मिलेगी यह कैसे बताएँ तुमको.

हमने कहा- फिर भी... साल... दो साल.. पाँच साल... कभी तो मिलेगी फुरसत.

वह बोले- फुरसत का क्या है. कहो तो अभी मिल सकती है फुरसत और नहीं तो दस साल तक भी नहीं मिल सकती. हम सरकारी काम पहले देखेंगे कि तुम्हारी नकल बनाते रहेंगे. कल के दिन तहसीलदार सिर पर चढ़ेगा तो तुम आओगे हमको बचाने?

- फिर क्या करें? देखो पटवारी साहब, हमको तो बैंक से कर्ज लेना है. आप जब हमारे खाते की नकल देंगे तभी हमको बैंक से कर्जा मिलेगा.

- तो हम क्या करें, बोलो?
- आप तो कुछ मत करो, बस हमसे बीस रूपया ले लो और फुरसत निकाल लो तो हमारा कल्याण हो जाएगा. बैंक से कर्जा मिलेगा तो हम उसी रकम में से गुड्डी की शादी निपटा देंगे.

पटवारी हँसता है. उसके चेहरे पर मुस्कान है. कहता है- देखोजी, हम तो तुमको बता देते हैं कि हम नियम से काम करेंगे... तुमसे एक पैसा नहीं लेंगे. और तुम तो जानते हो कि हम नियम से काम करेंगे तो कम से कम इस जन्म में तो तुमको नकल मिल ही नहीं सकती. तुमने हमारे पटवारी भाई को सौ रुपया देकर पकड़वा दिया है तो इसका बदला तो हम नियम से काम करके ही लेंगे. इसलिए अब तुम जाओ. जब नकल बन जाएगी तो हम तुमको बुलवा लेंगे – ईश्वर की कृपा से तुम जिन्दा रहे तो आ जाना नहीं अपने बाल-बच्चों को समझा के जाना कि वे आकर नकल ले जाएँ.

तो भइया, हम तो नकल का आवेदन दे आए और घर आकर मन्नत माँगी की हमको नकल मिल जाएगी तो हम पाँच फकीरों को खाना खिला देंगे. लेकिन आपको भी आश्चर्य होगा कि आज पाँच साल हो गए. इस बीच हमारे दो बच्चे भी पैदा हो गए लेकिन पटवारी साहब ने खसरा पाँच साला और बी-वन की नकल हमको बनाकर ही नहीं दी. जब जाते हैं उनको फुरसत ही नहीं मिलती. पहले फुरसत का रेट बीस रुपया था लेकिन जव से सरकार ने इस पटवारी को सौ रुपया लेते पकड़ा है तब से यह रेट बदल गया है. किसको बताएँ कि हमको यह असुविधा हो रही है. गम तो उस अफसर से भी पूछते हैं कि तुमने तो उस पटवारी को पकड़ लिया लेकिन अब ये तो बताओ कि हम क्या करें? पहले तो बीस रुपया देते थे तो पटवारी को फुरसत मिल जाती थी लेकिन अब तो सौ रूपया भी देते हैं तो वह कहता है, हमको फुरसत नहीं – हम नाजायज कब्जे वालों का काम कर रहे हैं.

सरकार से हमारा निवेदन है पटवारियों को मत पकड़ो. ये इस देश के कर्णधार हैं, व्यवस्था के भू-स्वामी हैं. इनको पकड़ोगे तो हम भू-स्वामी होकर भी अनाथ हो जाएंगे.

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रचनाकार – लतीफ़ घोंघी को हिन्दी व्यंग्य क्षेत्र के पाँच पांडवों हरिशंकर परसाईं, श्रीलाल शुक्ल, शरद जोशी और रवीन्द्र नाथ त्यागी समेत, गिना जाता है.

इनकी व्यंग्य रचनाएँ ऐसी हैं कि पाठक पढ़ता जाता है तो उसे चोट भी लगते रहती है, और वह मुसकराता भी रहता है.

साभार, नीर क्षीर, किताबघर, दरियागंज, नई दिल्ली. आईएसबीएन नं. 81-7016-057-x


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- राजकुमार ‘चन्दन’

तीरगी बनके तू छुपा क्या है ?
रोशनी बनके भी दिखा क्या है ?

पाँच कुल हर्फ हैं, मुहब्बत के
न पढ़ें हों तो फिर पढ़ा क्या है ?

पड़ गया रंग पीला पत्तों का
मित्र इस गांव से गया क्या है ?

मैंने तो कर दिया, दीया रोशन
मैं नहीं जानता हवा क्या है ?

खंजरों को तमीज क्या होगी
पैर क्या चीज है गला क्या है ?

भाई नफ़रत को दफ़न कर डालें
जिन्दगी, प्यार के सिवा, क्या है ?

कोई मीरा हो या अरस्तु हो
सत्य पीकर कभी मरा क्या है ?

आग की राह में मुहब्बत है
मोम का दिल लिए चला क्या है ?

हाथ बेटी के पीले है करना
पास पूंजी तिरे जमा क्या है ?

मैं कलम को उठा चुका अपनी
तोप, तलवार तू उठा क्या है ?

जिन्दगी की तलाश में सब है
जिन्दगी का मगर पता क्या है ?

कश्तियों से कहीं भी कागज की
पार दरिया कभी हुआ क्या है ?

तेरे मस्तेशबाब से बढ़कर
ये मह्वेयास मयकदा क्या है ?

हो गया गर्क या तो तुझमें मैं
यू तू मुझमें उतर गया क्या है ?

दोस्त उठना है अगर दुनिया में
सर पे दुनिया जरा उठा क्या है ?

एक हिन्दू तो एक मुसलमाँ है
आदमी, आदमी रहा क्या है ?

फिर तिरे हुस्न ने ली अँगड़ाई
ईद का चाँद ये दिखा क्या है ?

गुजर जाने दे दर्द को हद से
दर्द का देख फिर मजा क्या है ?

जिन्दगी एक हकीकत प्यारे
और तू सोच में लगा क्या है ?

तू समन्दर है समन्दर जैसा
और कतरे में भी छुपा क्या है ?

दीप है आँख के, मेरी रौशन
शम्आ सा तू पिघल रहा क्या है ?

हम फरिश्तों के हक का हैं खाते
हक में इन्सान के बचा क्या है ?

तेरी तह में है इक सदफ प्यासा
ऐ समन्दर तुझे पता क्या है ?

इस जमीं पर कहीं रफ़्ता रफ़्ता
सीढ़ियों से उतर रहा क्या है ?

एक मिट्टी का खिलौना प्यारे
हुस्न पर नाज कर रहा क्या है ?

नफ़रतों से जले हैं घर ‘चन्दन’
प्रीत से आज तक जला क्या है ?

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रचनाकार – राजकुमार चन्दन चित्रकार, मूर्तिकार, कार्टूनकार, साहित्यकार, शिक्षक – सर्वमुखी प्रतिभा के धनी, यानी आल-इन-वन हैं. विश्व की सबसे लंबी ग़ज़ल – 10 हजार अश्आरों की एक ग़ज़ल लिखने का विश्व रेकॉर्ड आपने बनाया है जिसे बाकायदा लिम्का बुक ऑफ रेकॉर्ड में स्थान मिला है. सात वर्षों में लिखी गई इस एक ग़ज़ल में 10 हजार अश्आर, 300 मतके, 400 मक्ते, 20 हजार मिसरे, 60 हजार नुक्ते, 1 लाख 20 हजार लफ़्ज और 3 लाख 40 हजार हर्फ हैं. इन्हें अगर एक साथ पुस्तकाकार रूप में प्रकाशित किया जाए तो सामान्य आकार की सत्रह सौ पृष्ठों की किताब बनती है. इस ग़ज़ल की पाँच अलग-अलग धुनें भी बन चुकी हैं, जिन्हें विविध गायकों ने गाया है.

विश्व की सबसे लंबी ग़ज़ल लेखन के अपने अनुभवों को वे यूँ समेटते हैं – मैंने पाँच सौ एक बार प्रसव वेदना सही तब यह एक ग़ज़ल बनी...

विश्व की सबसे लंबी ग़ज़ल को वे विश्व शांति और सद् भावना को समर्पित करते हैं.

शायर राजकुमार चन्दन के बारे में अधिक जानकारी जालस्थल पर यहाँ (अ-यूनिकोडित) उपलब्ध है:
http://www.webdunia.com/literature/personality/0111/13/1011113060_1.htm

(चित्र साभार – सृजन कैमरा क्लब, रतलाम.)

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भारत में एक दफा अमरीकी प्रतिनिधि मंडल भ्रमण के लिए आया. वे राजधानी दिल्ली में सरकारी कामकाजों का जायजा ले रहे थे. उन्हें एक स्थानीय शासकीय कार्यालय में ले जाया गया. वहाँ ढेर सारे अधेड़ और रिटायर होने की उम्र के बाबू पुराने 286 – 386 श्वेत-श्याम मॉनीटर युक्त कम्प्यूटरों पर कार्य कर रहे थे.
ये लोग कौन हैं – प्रतिनिधि मंडल के मुखिया ने पूछा.
ये इस देश के आम आदमी हैं , प्रजातंत्र के असली राजा – भारतीय गाइड ने बताया.
बाद में प्रतिनिधि मंडल को संसद भवन ले जाया गया. वहाँ उन्होंने राजनेताओं तथा उनके व्यक्तिगत सहयोगियों को नए नवेले लैपटॉप, पॉमटॉप, पीडीए और पावर एपल मॅक इत्यादि के साथ पाया.
और ये कौन हैं – प्रतिनिधि मंडल में से किसी ने पूछा.
ये तो जनता के सेवक हैं – जवाब मिला.
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यमराज ने एक दिन अपने दूत को बुलाया और आदेश दिया – धरती पर जाओ और हीरालाल की आत्मा को ले आओ. उसके दिन पूरे हो गए हैं.
यमदूत धरती पर गया और हीरालाल की खोजबीन की. उसे हीरालाल तो मिल गया परंतु हीरालाल के शरीर में उसकी आत्मा ढूंढे से भी नहीं मिली.
यमदूत ने वस्तुस्थिति से यमराज को अवगत कराया.
यमराज नाराज होते हुए बोले – ऐसा कैसे हो सकता है? कोई भी जीवित प्राणी बिना आत्मा के तो धरती पर रह ही नहीं सकता. जाओ और ठीक से देखो. आजकल काम-धाम में मन नहीं लगता क्या तुम्हारा?
यमदूत वापस धरती पर परंतु उसे हीरालाल की आत्मा अब भी नहीं मिली. वह बिना हीरालाल की आत्मा लिए यमराज के पास जाने का साहस नहीं कर पाया. अचानक उसे नारद मुनि याद आए, जिन्हें संसार की समस्त बातों-घटनाओं का ज्ञान रहता है. यमदूत नारद मुनि की शरण में पँहुचा.
यह आदमी खाने कमाने के लिए करता क्या है? नारद मुनि ने यमदूत से पूछा.
वह किसी किस्म का कम्प्यूटर नर्ड है - यमदूत ने बताया.
तो यह बात है. इसीलिए तुम्हें उसकी आत्मा उसके शरीर में नहीं मिली. जाओ और उसके पीसी में ढूंढो. एक नर्ड की आत्मा वहीं होती है.
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कम्प्यूटर प्रोफ़ेसनल्स की सम्पन्नता से जलते-भुनते-कुढ़ते एक आईएएस ऑफ़ीसर ने फर्स्ट क्लास एसी कम्पार्टमेंट में चल रहे अपने साथी यात्री से कहा – यार बुरा मत मानना, परंतु लोग तो ये कहते हैं कि तुम कम्प्यूटर प्रोग्रामर रात दिन अपने कम्प्यूटर की-बोर्ड में प्रोग्राम लिखने और उसके बग फिक्स करने में लगे रहते हो और तुम्हारी बीवियाँ बच्चे पैदा करती रहती हैं. क्या यह सही है? तुम अपनी बीवियों द्वारा लाए हुए रेडीमेड बच्चों को कैसे अपना लेते हो?
नर्ड ने अत्यंत शांति पूर्वक जवाब दिया – वैसे तो ऐसा होता कम ही है, परंतु जब भी ऐसी कोई घटना होती है तो हम कम्प्यूटर प्रोफ़ेसनल अपने बच्चों को आईएएस ऑफ़ीसर बना देते हैं.
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एक परिवार में चतुर्ज (क्वाड्रप्लेट) लड़कियाँ थीं जो शादी की उम्र में पहुंच गई थीं. एक संभावित वर उन्हें देखने पहुँचा. चारों लड़कियाँ प्रायः सभी मामलों में एक जैसी थीं – दिखने में, पहनावे में, चाल-ढाल और व्यवहार में. इस कारण से उस वर को उन चारों में से किसी एक का चुनाव अपनी पत्नी के रूप में करने में अच्छी खासी कठिनाई आई. अंततः उसने उसमें से एक को पसंद कर ही लिया.
उसके दोस्तों ने पूछा – क्यों तुमने उसे ही क्यों पसंद किया? क्या दूसरी बहनों में कोई खराबी थी.
ऐसी बात नहीं है, उसने जवाब दिया – उसकी एक बहन जो टेलिफोन ऑपरेटर है, हमेशा वेट प्लीज कहती थी, दूसरी वाली जो बैंक क्लर्क है, कतार में आइए कहती रहती थी और तीसरी - जो नर्स है, वह आराम से शांति से कहती रहती थी. मैंने अंततः कम्प्यूटर ऑपरेटर को पसंद किया जो हमेशा कहती रहती है – क्या आप सचमुच बंद करना चाहते हैं?
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किसी जमाने में बहुत बड़ा कम्प्यूटर महाराजा – विल सेठ रहता था. एक दिन उसने अपने सिंहासन पर बैठे ही बैठे अपने दरबारी से कहा – इस लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम का कर्नेल भी गजब का है. इसकी स्टैबिलिटी और मेमोरी हैंडलिंग कैपेसिटी तो सचमुच लाजवाब है!
हुजूर-ए-आला, दरबारी ने कहा – आप बजा फ़रमाते हैं. लिनक्स सचमुच दुनिया का सर्वश्रेष्ठ ऑपरेटिंग सिस्टम है.
होगा, परंतु इस ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए अनुप्रयोगों का अकाल तो है ही और यह सभी हार्डवेयर को समर्थित भी तो नहीं करता. यह तो बिलकुल बेकार, इस्तेमाल के लायक ही नहीं है – महाराजा ने कहा.
बिलकुल बजा फ़रमाया हुजूर-ए-आला, दरबारी ने कहा.
ऐ तुम कैसे आदमी हो – महाराजा ने दरबारी की ओर अप्रसन्नता से देखते हुए कहा – जब मैंने लिनक्स की थोड़ी तारीफ की तो तुमने तारीफ़ों के पुल बाँध दिए और जब मैंने थोड़ी सी आलोचना की तो तुम उसे सबसे घटिया बताने लगे.
हुजूर-ए-आला, दरबारी ने कहा – खता माफ हो, हम आपका नमक खाते हैं, लिनक्स का नहीं.
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नर्ड से नाई ने आश्चर्य से पूछा – बाल भी कटवाने हैं और शेव भी करनी है? क्या बात है? प्रोग्रामिंग करना छोड़ दिया क्या?
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एक कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर डेवलपमेंट कम्पनी में एक ऑफिस बॉय काम करता था. वह सभी कर्मचारियों को चाय, कॉफ़ी इत्यादि पिलाया करता था. वह समर्पित इंसान था, परंतु वह अनपढ़ था, जिससे कभी कभी उसे मुश्किलों का सामना भी करना पड़ जाता था. अपने कठिन परिश्रम से वह लोगों का दिल जीत कर काम कर रहा था. एक दिन कंपनी में एक सर्कुलर जारी हुआ जिसमें प्रॉडक्टिविटी बढ़ाने के नाम पर उन सभी कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई जो पढ़े लिखे नहीं थे. लिहाज़ा उस ऑफ़िस बॉय की नौकरी भी जाती रही. उसने जीवन यापन के लिए पुराने कम्प्यूटरों को खरीदने-बेचने का धंधा शुरू कर दिया.
उसका यह धंधा चल निकला और वह देखते ही देखते देश का सबसे बड़ा सेकण्ड हैण्ड हार्डवेयर दुकानों की शृंखला का मालिक बन गया. उसने अपने धंधे को डाइवर्सिफ़ाई करने के इरादे से ताबड़तोड़ सॉफ़्टवेयर कंपनियाँ खरीदने लगा. उसने वह सॉफ़्टवेयर कंपनी भी खरीद ली जिसमें से उसे ऑफ़िस बॉय के रूप में निकाल दिया गया था.
उस कंपनी के काग़ज़ात उसके पास दस्तखत के लिए लाए गए. उसके होठों पर विद्रूपता की क्षीण सी मुस्कान उभरी. वह बोला – अगर मुझे दस्तखत करना आता होता तो इस कंपनी में मैं अभी भी ऑफ़िस बॉय ही बना रहता...

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बंटवारा
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एक जंगल में एक सियार अपनी पत्नी के साथ रहता था. एक दिन उसकी पत्नी को ताज़ी मछली खाने की तीव्र इच्छा हुई. सियार अपनी पत्नी से वादा कर नदी किनारे पहुँचा ताकि मछलियों का कुछ जुगाड़ किया जा सके.

उसने वहां देखा कि दो ऊदबिलाव एक बड़ी मछली को नदी में से खींचकर बाहर ला रहे हैं. वह ऊदबिलावों के पास पहुँचा और उनसे कहा – मित्रों तुम दोनों ने मिलकर यह मछली पकड़ तो ली है, परंतु इसका बंटवारा तुम कैसे करोगे. ज्यादा अच्छा हो यदि तुम किसी तीसरे से इसका बंटवारा करवाओ.

दोनों ऊदबिलाव को यह बात जमी. आसपास कोई तीसरा था नहीं लिहाजा उन्होंने सियार से ही बटवारा करने को कहा.

सियार ने मछली के तीन हिस्से किए. सिर एक ऊदबिलाव को दिया. पूंछ दूसरे को. बीच का पूरा हिस्सा लेकर वह अपने घर की ओर चलने लगा.

ऊदबिलावों ने उसे रोका और पूछा – अरे, ये क्या करते हो. तुम तो मछली का बंटवारा हम दोनों में कर रहे थे.

सियार ने जवाब दिया – मूर्खों, तुम दोनों का बराबर का हिस्सा तो तुम्हें मिल चुका है. यह जो मैं ले जा रहा हूँ वह तो मेरा मेहनताना है. यह कह कर वह मछली के बड़े हिस्से को लेकर चला गया.

ऊदबिलावों ने अपना सिर धुन लिया. अगर वे बंटवारे के चक्कर में न पड़ते तो उन्हें मछली का सारा हिस्सा मिलता और इस तरह सियार मछली को हड़प नहीं जाता.

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जहरीले फल
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एक गांव के किनारे, रास्ते पर ज़हरीले फलों का एक वृक्ष लगा हुआ था. मुसाफिर उस पेड़ की छांव में विश्राम करते और ज़हरीले फलों की ओर लालच भरी नजर से देखते. फल रसीले और सुस्वादु थे, मगर ज़हरीले थे. यदा कदा कोई मुसाफिर अज्ञानता वश उन जहरीले फलों को खा कर मर जाता था तो कुछ लुटेरे जो वहीं घात लगाकर इंतजार करते रहते थे उसका माल असबाब ले उड़ते थे.

एक दिन एक मुसाफिरों का एक बड़ा काफ़िला उस पेड़ के नीचे विश्राम के लिए रुका. कुछ लोग उस पेड़ के रसीले फलों को तोड़ने लगे. इतने में काफिले के सरदार की नजर उन पर पड़ी. सरदार ने उन्हें रोका और कहा इन फलों को मत खाओ. ये ज़हरीले हैं. लोगों ने उससे पूछा कि कैसे?

सरदार ने बताया – यह पेड़ गांव के किनारे है, परंतु फिर भी फलों से लदा है. इसका अर्थ है कि यह जरूर अनुपयोगी और जहरीला होगा. इसे मुसाफिर अज्ञानता वश खाकर मर भी जाते होंगे.

ऐसा कह कर उसने उस पेड़ को काटने का आदेश दे दिया ताकि भूल-वश कोई अन्य मुसाफिर उन फलों को खाकर मुसीबत में न आ जाए.

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- संजय ग्रोवर
ग़ज़ल 1

जो गया उससे निकलना चाहता हूँ
आते लमहों में धड़कना चाहता हूँ

मेरा दुख लाएगा सुख तेरे लिए
मुझको करने दे जो करना चाहता हूँ

प्यार से भर दो मेरा जामे-हयात
हश्र तक भर कर छलकना चाहता हूँ

जान जाए प्यार गर जी भर मिले
ऐसी सूली पर लटकना चाहता हूँ

ये भी सच्चाई है पर कैसे कहूँ
तुझसे मैं बचके निकलना चाहता हूँ

मंज़िलों को पा के ही समझा हूँ ये
मैं अभी कुछ दिन भटकना चाहता हूँ



ग़ज़ल 2
बह गया मैं भावनाओं में कोई ऐसा मिला
फिर महक आई हवाओं में कोई ऐसा मिला

खो के पाना पा के खोना खेल जैसा हो गया
लुत्फ जीने की सजाओं में कोई ऐसा मिला

खो गए थे मेरे जो वो सारे सुर वापिस मिले
एक सुर उसकी सदाओं में कोई ऐसा मिला

हमको बीमारी भली लगने लगी, ऐसा भी था
दर्द मीठा-सा दवाओं में कोई ऐसा मिला

रेत में भी बीज बो देने का मन होने लगा
मेघ आशा का घटाओं में कोई ऐसा मिला

ग़ज़ल 3

कब तक मुझे दबाओगे
इक दिन खुद शरमाओगे

भीड़ को तो भरमा लोगे
खुदको क्या समझाओगे

जब-जब भीतर जाओगे
मुझको बैठा पाओगे

बाहर-बाहर चमकोगे
भीतर से जल जाओगे

राग पुराने टूटी डफली-
पर कब तक दोहराओगे

मैं भी सर के बल हो लूँ
तब तो गले लगाओगे

ग़ज़ल 4

चार दिन तो आप मेरे दिल में भी रह लीजिए
पाँचवें दिन फिर मेरे घर में बसेरा कीजिए

राज़े-दिल दुनिया से कहने खुद कहाँ तक जाओगे
बात फैलानी ही हो तो दोस्त से कह दीजिए

आपका-मेरा ताल्लुक अब समझ आया मुझे
कीजिए सब आप और इल्जाम मुझको दीजिए

दोस्त बनके जब तुम्हारे पास ही वो आ गया
खुद को अपने आपसे अब तो अलग कर लीजिए

मय मयस्सर गर नहीं क्यूं मारे-मारे फिर रहे
जिनका दम भरते थे उन आंखों से जाकर पीजिए


ग़ज़ल 5


आज मुझे ज़ार-ज़ार आँख-आँख रोना है
सदियों से गलियों में जमा लहू धोना है

रिश्तों के मोती सब बिखर गए दूर-दूर
प्यार का इक तार कोई इनमें पिरोना है

इंसां बनके आए थे इंसां बनके जाएंगे
हिन्दू या मुसलमान होना भी कोई होना है

माना तू हकीकत है और खूबसूरत है
मेरे ख्वाबों वाला मुखड़ा भी सलोना है

प्यार बनके जब चाहो मेरे घर चले आओ
आंखों में आँगन है, दिल मेरा बिछौना है

ग़ज़ल 6

जीवन में इक जंगल था
पर जंगल में मंगल था

दुनिया पागल लगती है
अच्छा था जब पागल था

पंख मिले, वो दूर हुआ
मैं क्या करता, पैदल था

मैं जिसको सावन समझा
इक आवारा बादल था

तू बाहर की भगदड़ था
मैं भीतर की हलचल था

जहाँ कहीं भी पाँव रखा
इच्छाओं का दलदल था


ग़ज़ल 7


हिन्दुस्तान में हिन्दी जैसी उसकी हालत अपने घर में
जैसे शीशा देख रहा हो अपनी सूरत इक पत्थर में

अपने-अपने समय को देखो अपनी-अपनी घड़ी चलाओ
यारों धोखा खा जाओगे देखोगे गर घंटाघर में

अपने पुरखे नहीं रहे अब ऐसा कहना ठीक न होगा
हमने अकसर देखा उनको घुड़की देते उस बंदर में

देश का सौदा करने वाले सारे लोग नहीं इक जैसे
बेच रहे कुछ इसे थोक में बेच रहे हैं कुछ फुटकर में

मंज़िल भी थी आंख के आगे और इरादे भी थे पक्के
फिर भी भटक गया मन यारों रस्ते इतने मिले सफर में

**-**
रचनाकार – संजय ग्रोवर की भारत भर की लगभग समस्त पत्र-पत्रिकाओं, वेब पत्रिकाओं व फीचर एंजेंसियों में व्यंग्य-लेख, ग़ज़लें, कविताएं, बालगीत, कार्टून व नारी-मुक्ति पर लेख प्रकाशित/प्रसारित हैं. कुछ ग़ज़ल संग्रह और एक व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हैं.

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