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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मानसी चटर्जी की कुछ प्रेम कविताएँ

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प्रिय तुम...

प्रिय तुम मेरे संग एक क्षण बाँट लो

वो क्षण आधा मेरा होगा

और आधा तुम्हारी गठरी में

नटखट बन जो खेलेगा मुझ संग

तुम्हारे स्पर्श का गंध लिये


प्रिय तुम ऐसा एक स्वप्न हार लो

बता जाये बात तुम्हारे मन की जो

मेरे पास आकर चुपके से

जब तुम सोते होगे भोले बन

सपना खेलता होगा मेरे नयनों में


प्रिय तुम वो रंग आज ला दो

जिसे तोडा था उस दिन तुमने

और मुझे दिखाये थे छल से

बादलों के झुरमुट के पीछे

छ: रंग झलकते इन्द्रधनुष के


प्रिय तुम वो बूंद रख लो सम्हाल कर

मेरे नयनों के भ्रम में जिस ने

बसाया था डेरा तुम्हारी आंखों में

उस खारे बूंद में ढूंढ लेना

कुछ चंचल सुंदर क्षण स्मृतियों के


प्रिय तुम...
********

चलो....

चलो हम आज
किसी सुनहरे सपनों के
रुपहले गाँव में
घर बसायें

झिलमिल तारों की बस्ती में
परियों की जादू छड़ी से
अपने इस कच्चे बंधन को
छूकर सोने का बनायें

तुम्हारी आशा की राहों पर
बाँधे थे जो ख्वाबों से पुल
चलो आज उस पुल से गुज़रें
और क्षितिज के पार हो आयें

हवा ने भी चुरायी थी
कुछ हमारी बातों की खनक
रिमझिम पडती बूँदों के संग
चलो उन स्मृतियों में घूम आयें

बाँधी थीं सीमायें हमने
अनकही कुछ बातों में जो
चलो एक गिरह खोल कर
आज बंधनमुक्…

आलेख : काग के भाग

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- जयप्रकाश मानस

सृष्टि का सबसे बड़ा चमत्कार है- हर कृति का अनन्य एवं अनुपम स्वभाव । सबकी अपनी-अपनी अर्थवत्ता, अपना-अपना माहात्म्य । निरुद्देश्य कदाचित् कुछ भी नहीं । एक सर्वमान्य तथ्य यह भी-सर्वगुण संपन्न संज्ञा संसार में कहाँ कोई-

जड़ चेतन गुन-दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ।
संत हंस गुन गहहि पय परिहरि वारि विकार ॥

वस्तुत: अभिमत, धारण, मंतव्य विचार या मूल्यांकन आदि भी निरपेक्ष नहीं होते । अर्थात् पूर्वाग्रह रहित स्थापना एक संभ्रम मात्र होता है । ऐसे में परस्पर सायास उपेक्षा-वृत्ति निजता की अस्वीकृति है और तथाकथित अवगुणों के तर्क पर किसी कृति विशेष का समग्रत:नकार सृष्टि का नकार भी है । समय की शृंखला को ही लीजिए-निशा जहाँ तिमिर का प्रतीक है, वहाँ वह साधकों के लिए निर्द्वंद्व एवं निस्संग वातावरण भी है । इतनी लम्बी भूमिका से सहमति के पश्चात् काग-प्रसंग में रस लेने का अवसर आप शायद ही खोना चाहेंगे । आपने तो कभी न कभी सुना होगा- 'काग के भाग बड़े सजनी, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी ।' चलिए कागराज जी की जन्मपत्री ढूँढते हैं ।

दादा जी को पक्षियों में कबूतर पर अति विश्वास है । दाना चुगाकर वे आत्मतृप्त …

आलेख : कविता क्या है?

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प्रकृति ही कविता है - अज्ञात्


कविता क्या है ?
- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
कविता से मनुष्य-भाव की रक्षा होती है. सृष्टि के पदार्थ या व्यापार-विशेष को कविता इस तरह व्यक्त करती है मानो वे पदार्थ या व्यापार-विशेष नेत्रों के सामने नाचने लगते हैं. वे मूर्तिमान दिखाई देने लगते हैं. उनकी उत्तमता या अनुत्तमता का विवेचन करने में बुद्धि से काम लेने की जरूरत नहीं पड़ती. कविता की प्रेरणा से मनोवेगों के प्रवाह जोर से बहने लगते हैं. तात्पर्य यह कि कविता मनोवेगों को उत्तेजित करने का एक उत्तम साधन है. यदि क्रोध, करूणा, दया, प्रेम आदि मनोभाव मनुष्य के अन्तःकरण से निकल जाएँ तो वह कुछ भी नहीं कर सकता. कविता हमारे मनोभावों को उच्छवासित करके हमारे जीवन में एक नया जीव डाल देती है. हम सृष्टि के सौन्दर्य को देखकर मोहित होने लगते हैं. कोई अनुचित या निष्ठुर काम हमें असह्य होने लगता है. हमें जान पड़ता है कि हमारा जीवन कई गुना अधिक होकर समस्त संसार में व्याप्त हो गया है.

कार्य में प्रवृत्ति
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कविता की प्रेरणा से कार्य में प्रवृत्ति बढ़ जाती है. केवल विवेचना के बल से हम किसी कार्य में बहुत कम प्रवृत्त होते…

राजकुमार कुम्भज की कुछ कविताएँ

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अंतर्आत्मा की जलेबियाँ
******************.

मैं लोकतंत्र में रहता हूँ
और किसी एक लोकतांत्रिक पार्टी में रहते हुए
किसी एक लोकतांत्रिक-अनुशासन को सहर्ष सहता हूँ
मेरी आत्मा की आवाज मर चुकी है
मेरी अंतर्आत्मा की बन चुकी है जलेबियाँ
और जलेबियाँ खा रहे हैं गधे.


दूसरी दुनिया में
************.

मैं ही रहता हूँ दूसरी दुनिया में
मुझे ही जागना है रात भर
सुबह होने तक
मेरे विश्वास का जवाब मेरी कविता है
जिसमें बख़ूबी उपलब्ध हैं मेरे अनिवार्य कर्तव्य
कोई भी मांग नहीं है मेरी आपसे.


जानता नहीं हूँ मैं
*************.

जानता नहीं हूँ मैं
कि कब होगी सुबह, कब खुलेंगे द्वार?
फिर भी जागता हूँ.
मुझे जागने से
चिड़ियों को उड़ने से
वृक्ष को हरा होने से
कौन रोक सकता है?

तट नहीं तूफ़ान है
**********.

तट नहीं, तूफ़ान है
मेरे और उसके बीच संभवतः
अतिरिक्त इसके अन्य कुछ भी नहीं
मैं ढूंढ रहा हूँ समुद्र में सीपियाँ
और वह शंख.

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रचनाकार – राजकुमार कुम्भज की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-

http://rachanakar.blogspot.com/2005/09/blog-post_10.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_20.html

हास्य-व्यंग्य : त्रासदियाँ अनिवार्य सेवा की

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- नरेन्द्र कोहली

सवेरे नींद खुली तो देखा, काफी देर हो चुकी है. समझ गया, गीता का कर्म-सिद्धांत एकदम सत्य है. रात को देर से सोया था, इसलिए प्रातः देर से उठा. पर कर्म-श्रृंखला यहीं पूरी नहीं हुई. उसका प्रभाव दूर तक चलता चला गया. कुछ सिर भारी था और कुछ समय अधिक खिसक गया था.

आँखों में प्रेम के सागर उंडेलकर पत्नी से कहा, “प्रिये! आज दूध लेने नहीं जा सकूंगा.”

पर यहाँ कर्म-सिद्धांत ने काम नहीं किया, प्रेम के बदले मुझे प्रेम नहीं मिला. पत्नी की आँखों में मुझे न्यूटन का क्रिया और विपरीत क्रिया का सिद्धांत कार्य करता दिखाई पड़ा.

वह नाराज होकर बोली, “तो क्या बच्चे भूखे रहेंगे?”

मन में आया कि कह दूँ कि दूध न पीने का अर्थ भूखे रहना नहीं होता, और यदि रह भी लेंगे तो आसमान नहीं गिर पड़ेगा- संसार के लाखों-करोड़ों बच्चे प्रतिदिन एक समय भूखे रहने को बाध्य हैं. यह वैज्ञानिक सत्य है. पर मैं यह भी जानता था कि वैज्ञानिक सत्य पत्नी के सम्मुख कभी नहीं कहना चाहिए. और फिर उसमें कहीं अधिक राष्ट्रीय भावना है. देश की अगली पीढ़ी को भूखे रखने की सलाह मैं कैसे दे सकता था!

दूसरा मार्ग ढूंढा, “वे भूखे नहीं रह सकते, तो क्या मै…

लघुकथा : पहचान

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- कालीचरण प्रेमी

एक बार देवलोक के राजा इंद्र ने पृथ्वी लोक की यात्रा की योजना बनाई.

अगले दिन वे नारद मुनि के साथ पुष्पक विमान द्वारा आकाश से पृथ्वी के सौंदर्य का आनन्द ले रहे थे.

फ्रांस के ऊपर से गुजरते हुए इंद्र ने पूछा – “यह देश तो हमारे देवलोक से भी सुंदर है. क्या नाम है इसका?”

“फ्रांस”, नारद का संक्षिप्त उत्तर था.

“अरे! यहाँ की इमारतें तो हमारे पुष्पक विमान से अड़ी जा रही हैं! ” इन्द्र इंग्लैंड की छटा देखकर दंग रह गए.

“नारद, यहाँ कितने काले-बादल छाए हैं. कुछ स्पष्ट नजर नहीं आता?”

“महाराज! ये काले बादल नहीं हैं. अमेरिका के कल कारखानों, वाहनों का धुआँ तथा उसके द्वारा अन्य देशों में किए जा रहे बमबारी का गुबार है” नारद ने स्थिति स्पष्ट की.

तभी हिन्दुस्तान में प्रवेश करते ही नारद जी खुश होकर बताने लगे - “महाराज! यह वह देव भूमि है जहाँ हर काल में अनेक ऋषियों, मुनियों, साधुओं, संतों, देवियों और देवताओं ने जन्म लिया है. महापुरुषों ने इस भूमि को अपने खून से सींचा है. यह पृथ्वी का सबसे पवित्र स्थल खंड है.”

महाराज इंद्र ने पुष्पक विमान की खिड़की से अपनी गर्दन बाहर निकाली और हिन्दुस्तान के दर्शन करने …

व्यंग्य : त्रासदियाँ प्रेम की

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- नरेन्द्र कोहली

कहां तो वह मेरी बात भी नहीं सुनती थी और कहाँ उस दिन बोली, “मैं तैयार हूँ. जहाँ तुम्हारा मन चाहे, ले चलो.”

मेरे मस्तिष्क की कार्य-प्रणाली दिल्ली टेलिफोन-व्यवस्था से बहुत साम्य रखती है. उसकी स्वीकृति पाई और इधर गलत लाइन मिल गई. मेरे मन में अपनी मां का चेहरा उभरा. कब से मां कह रही है, “बेटा! वह कौन-सा दिन होगा जब तू एक चाँद-सी बहू मुझे ला देगा.” मेरे मन ने कहा, “यही अवसर है नरेन्द्र कोहली. दोनों की इच्छाएँ पूरी कर दे. इसकी इच्छा है कि इसे कहीं ले चल और मां की इच्छा है कि उसे बहू ला दे. बस! अब सोच मत. सास-बहू का मिलाप करा दे.”

ऐसा सुखी भी कौन होगा, जैसा कि उस समय मैं था : एक ओर प्रिया तैयार खड़ी थी - ‘ले चल जहाँ चाहे.’ और दूसरी ओर मां बाहें फैलाए खड़ी थी- ‘ले आ बेटा, जिसे चाहे.’

“जी तो चाहता है,” मैं बोला, “तुम्हें अपनी मां के पास ले चलूं.”

“मुझे अपने लिए रिजर्व कल लेना चाहते हो?” वह मुसकराई.

“हाँ! ताकि फिर तुम कहीं और न जा सको.”

“अच्छा, इस कार्यक्रम को कुछ दिनों के लिए अभी स्थगित ही रखो,” वह बोली, “मुझे एक काम याद आ गया है.”

मैं एक सहृदय प्रेमी के समान उसकी बात मान गया और…

हितेश व्यास की दो नई कविताएँ

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छोटी छोटी बात

छोटी छोटी बातों पर
मोटा मोटा ध्यान दिया
और तुमने क्या किया
मोटी मोटी बातों को सहन कर गए
मोटे मोटे भार को वहन कर गए
छोटे छोटे बोझ को उठा न सके
छोटे छोट बोझ से बार बार थके
जीवन को टुकड़ों में जिया
और तुमने क्या किया
छोटी छोटी बातों पर
मोटा मोटा ध्यान दिया.

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खो खो

खो खो
खो खो कर पा
पर जो पा
उसे मत गँवा
बहुत अधिक खो
बहुत कम पा
पर जो पा
उसे बचा.

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रचनाकार – हितेश व्यास की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :-
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_09.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_113422217462821692.html

व्यंग्य : शिष्ट बनने के लिए भ्रष्ट बनिए

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- राजकुमार कुम्भज

भ्रष्टाचार में ही शिष्टाचार है. नो भ्रष्टाचार नो शिष्टाचार. नित नए नारागढ़ू, हमारे नेताओं को चाहिए कि वे अपने नागरिकों के लिए ‘भ्रष्ट बनो शिष्ट बनो’ का नया नारा देना चाहिए. वैसे भी, ‘आराम हराम है’, ‘जय जवान जय विज्ञान’ जैसे नारे तो आउट-ऑफ डेट और आउट-ऑफ़ फ़ैशन हो गए हैं. फ़ैशनेबुल बनना है तो फ़ैशनेबुल नारे भी चाहिएँ.

हम सदा-सच बोलो और सत्यमेव जयते का पाठ पढ़ते पढ़ाते आ रहे हैं. पर दुनिया अब तरक्की कर चुकी है, लिहाज़ा इन पाठों में कोई अर्थ अब नहीं रहा. अतः अब हमें आधुनिक युग के श्री श्री 1008 श्री भ्रष्ट ऋषि का लिखा भ्रष्ट पुराण पढ़ना-पढ़ाना चाहिए या भ्रष्टनारायण की कथा बांचना चाहिए जिसमें भ्रष्ट बनने के तरीके, उससे फ़ायदे इत्यादि के बारे में सभी तरह की जानकारियां दी गई हैं. और, यह भी बताया गया है कि आधुनिक युग में बिना भ्रष्ट बने या तो कोई पागल या कोई बेवक़ूफ़ ही जिंदा रह सकता है.

स्व. गुलजारी लाल नंदा ने अपने जमाने में एक भ्रष्टाचार विरोधी मोर्चा बनाया था. तब उन्होंने बड़ी ही मार्मिक बात कही थी, कि मैं किसी से भी किसी काम के लिए कोई पैसा नहीं लूंगा, इसकी …

कैदी कविराय की कुंडलियाँ

*--*

- अटल बिहारी वाजपेयी

न्यूयॉर्क

मायानगरी देख ली,
इन्द्रजाल की रात;
आसमान को चूमती,
धरती की बारात;
धरती की बारात,
रूप का रंग निखरता;
रस का पारावार,
डूबता हृदय उबरता;
कह कैदी कविराय,
बिकाऊ यहां जिंदगी;
चमक-दमक में छिपी,
गरीबी और गन्दगी!
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पुनः बन्धन ने जकड़ा

पहले पहरेदार थे,
अब भी पहरेदार;
तब थे तेवर तानते,
अब झुकते हर बार;
अब झुकते हर बार,
वक्त की है बलिहारी;
नजर चढ़ाने वालों ने ही,
नजर उतारी;
कह कैदी कविराय,
पुनः बंधन ने जकड़ा;
पहले मद ने और आजकल,
पद ने जकड़ा.

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गूंजी हिन्दी विश्व में

गूंजी हिन्दी विश्व में,
स्वप्न हुआ साकार;
राष्ट्र संघ के मंच से,
हिन्दी का जयकार;
हिन्दी का जयकार,
हिन्दी हिन्दी में बोला;
देख स्वभाषा – प्रेम,
विश्व अचरज से डोला;
कह कैदी कविराय,
मेम की माया टूटी;
भारत माता धन्य,
स्नेह की सरिता फूटी!

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बेचैनी की रा…

नरेन्द्र अनिकेत की कहानी : अनंत यात्रा

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उस दिन शरद अचानक भड़क उठा. एकदम अचानक गालियाँ बकने लगा, ‘सारी व्यवस्था चोर है. सब साले कुत्ते हैं.’ इससे पहले सारी बहसों में वह नई व्यवस्था का सबसे बड़ा समर्थक होता था. वह तर्क देता था- ‘एक मेघावी आदमी और अयोग्य के बीच फर्क तो रखना ही होगा. सरकार नहीं रख रही है इसी लिए तो रसातल को जा रही है. इससे बचने का नाम ही नई व्यवस्था है.’ हर तरह से पूंजी, भोग और शोषण को जायज ठहराने के लिए वह तर्क गढ़ देता था.

उस समय उस महाजोट में शामिल पत्रकार उदितनाथ ‘घायल’ बहुत घायल हो जाते थे. उन्हें लगता था कि यह लड़का दुनिया के बदलाव से नावाकिफ एक ऐसी दुनिया में जी रहा है जिसे सपनों और खालिस सपनों की दुनिया कहा जाए तो गैर मुनासिब नहीं होगा. बकौल घायल जी ऐसे लोग फूल्स पैराडाइज में जीने वाले लोग हैं और जब तक लात नहीं खाते इन्हें अक्ल नहीं आती.

तब की बात है जब उदितनाथ घायल बिहार के एक छोटे से कस्बे से दुनिया बदलने की हसरत और हौसले के साथ दिल्ली की भीड़ में अपनी पहचान खड़ी करने आए थे. घायल कवि थे और उनकी कविताएँ कुछेक जगहों पर छप चुकी थीं. हिन्दी साहित्य उन्होंने पढ़ा था और उन्हें विश्लेषण करना आता था. एक अख…

हितेश व्यास की दो कविताएँ

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सम्बन्ध
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सम्बन्ध मिट्टी के घरौंदे होते हैं
लेकिन अब कहाँ होते हैं मिट्टी के घरौंदे
कहावतों के सिवाय
वे पाँव जो घरौंदे बनाते थे
घरौंदे नहीं बनाते
उन्हें चुरा ले गई हैं अंग्रेज़ी माध्यम की स्कूलें
जहाँ भर्ती तो होते हैं ढाई साल के पाँव
इंटरव्यू देते हैं साब और मेमसाब
मिट्टी की जगह ले ही है सीमेन्ट ने
सीमेन्ट में जड़ें नहीं होतीं
फिर भी उग आते हैं जंगल के जंगल
सम्बन्ध पहाड़े होते हैं जिन्हें दोहराना
और रटना होता है
फिर भी जो रहते हैं पराए के पराए
गिनती नहीं होते सम्बन्ध सहज
और अपनत्व से पूर्ण.

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मैं सीधी रेखा पर चलता हुआ
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मैं सीधी रेखा पर चलता हुआ
तुम्हारी वक्रता से मुकाबला करूँगा
बढ़ती ही जाएगी सीधी रेखा अनन्त तक
वक्रता की सांस बीच ही में टूट जाएगी
तुम अपने सारे छद्म काम में ले लेना
मैं सादगी से तुम्हें परास्त कर दूंगा
तुम कुटिलता से सफलताएँ हासिल करते रहना
मैं सरलता से प्रयत्न करता हुआ
संतोष के साथ समाप्त हो जाऊँगा
तुम लोमड़ी की तरह चालाक बने रहना
मैं कबूतर की तरह गुटरगूं करता रहूँगा
तुम काई की तरह काइयाँ बने रहना उम्र भर
बचते रहकर लोग संभलकर तुम पर चलते रहेंगे
उनमें से कुछ फिसल कर गिरेंगे
कुछ को ठहाके …

आलेख : कविता तो परम स्वतंत्रता का दूसरा नाम है.

- हितेश व्यास

जब संस्कृत काव्य शास्त्रियों ने गद्य को कवियों की कसौटी कहा तो उन्हें पता नहीं था कि एक समय गद्य में ही कविता लिखी जाएगी. लेकिन क्या सम्पूर्ण गद्य काव्य है? नहीं, जो विद्युतीकृत गद्य है वह काव्य है. मैंने काव्य विधा ही क्यों चुनी? कहानी क्यों नहीं लिखी? नाटक क्यों नहीं लिखा? नाटक तो उसके विन्यास को छोड़कर कविता ही है. कविता के सबसे करीब नाटक है. कहानी व्याकरण से बंधी होती है. उपन्यास भी निबन्ध भी. कविता व्याकरण का अतिक्रमण करती है. तो क्या कविता का व्याकरण नहीं होता? शास्त्रकार तो चेष्टा करते हैं कविता का व्याकरण हो जाए.

कभी युग का नाम देते हैं, कभी प्रवृत्ति का, कभी दशक का, कभी सदी का. कविता जब व्याकरण में बंधती है, पुनरावृत्ति करती है. जब यह कहा जाता है कि सब कवि मिलकर एक ही कविता लिख रहे हैं, तो यह कविता की पुनरावृत्ति है. कविता तो परम स्वतंत्रता का दूसरा नाम है. कविता को कोई बन्धन स्वीकार्य नहीं. हर बड़ा कवि अतिक्रमण करता है. हर ताकतवर कवि पुरानी कविता का भी अतिक्रमण करता है. कविता, कविता का अतिक्रमण करती है. अतिक्रमण का दूसरा नाम कविता है.

तो क्या कविता का कोई …

हितेश व्यास की कविताएँ

चित्र
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मोबाइल में तबदील

सब कुछ पैसे में और पैसा बाज़ार में बदल गया है
बाज़ार बदल गया है चीज़ों में
आदमी हो गया है चीज़ों में एक चीज़
शब्द दृश्य में बदल गए हैं
दृश्य अवास्तविकता में
अवास्तविकता आदत में
आदत अभ्यास में
अभ्यास दिनचर्या में
और दिनचर्या जीवन में परिवर्तित हो गई है
साहित्य हाशिए में बदल गया है
और हाशिया है कि पेज में वह है ही नहीं
फ्रेम काम में बदल गया है
काम बलात्कार में
बलात्कार, खबर में
और खबर जब प्रवाह है तो हम तटस्थ कैसे रह सकते हैं
हम खबर के साथ बहते जा रहे हैं
और हमारी कोई खबर नहीं है
हम खबर नहीं हैं
सम्बन्ध, बोझ में तबदील हो गए हैं
और बोझ आज कौन ढोता है
चिट्ठियाँ फ़ोन में तबदील हो गई हैं,
फ़ोन मोबाइल में
और मोबाइल कान में बदल गया है
और कान ने जगह ले ही है दिल की.

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कविता का विषय

मैं जब कविता रचने जा रहा था
विषय बीच में आ गया
कविता से महत्वपूर्ण हो गया
कविता का विषय
कविता के बीच में जब लोगों ने कहा
वाह!
तो यह वाह कविता के लिए थी
या विषय के अद्भुत वर्णन के लिए
क्या कविता के लिए विषय अनिवार्य है
और विषय के लिए वर्णन
कविता और विषय के बीच
रिश्ता क्या है
जब कविता के बिना रह सकते हैं विषय बख़ूबी
क्यों नहीं हो स…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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