रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

2006
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari


किस्से अदालतों के...


- रवीन्द्र नाथ त्यागी


सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फ़ैसले को रद्द करते हुए उन चार लोगों को दोषी ठहराया जिन्होंने एक पत्रकार युवती के साथ कभी सामूहिक बलात्कार किया था और जिसके फलस्वरूप उस निरीह युवती की मृत्यु हो गई थी. हाईकोर्ट ने उस युवती के पति को कायर बताया था पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को भी गलत करार दिया क्योंकि अकेला पति इतने लोगों के सामने कुछ भी नहीं कर सकता था. उस युवती के मात्र दो कसूर थे. पहला कसूर तो यह था कि वह रूपवती थी और दूसरा कसूर यह था कि उसने एक राजनीतिक पार्टी के खिलाफ एक अख़बार में अपनी रिपोर्ट छापी थी. दुःख की बात यह है कि इस फैसले तक पहुँचने में विभिन्न अदालतों को मात्र बाईस वर्ष लगे. ज्यादा जानकारी के लिए आप 25.4.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें.

न्यायपालिका प्राय: भ्रष्टाचार से मुक्त होती है पर कहीं-कहीं इस प्रथा के अपवाद भी पाए जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने जब यह कहा कि इस देश में बीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं तो एक जागरूक नागरिक ने राजस्थान हाईकोर्ट में उपरोक्त चीफ़-जस्टिस के खिलाफ न्याय-पालिका की मानहानि का दावा दायर कर दिया. हाईकोर्ट ने दावा खारिज कर दिया. इस संदर्भ में आप यदि 13.3.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें तो एकदम ठीक रहेगा.

अदालतों में बड़ी-बड़ी मजाक भी चलती हैं. मेरे काफ़ी मित्र और रिश्तेदार जज हैं और वे इतने लतीफ़े सुनाते हैं कि हँसते-हँसते पेट दुखने लगता है. एक बार मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज (मिस्टर जस्टिस जे डी शर्मा) के यहाँ खाने पर गया. खाना खाने के बाद जब हम लोग कॉफ़ी पीने ड्राइंग रूप में बैठे तो मैंने जज साहिब से कहा कि वे अपनी जिंदगी का कोई बेहतरीन मुकदमा हम लोगों को सुनाएँ. उन्होंने बताया कि जब वे डिस्ट्रिक्ट जज थे तब उनके सामने एक ऐसा मामला आया था कि वे पशोपेश में पड़ गए थे.

हुआ यह था कि किसी सेठ का काफ़ी बड़ा क्लेम रेल-विभाग के ख़िलाफ़ पडा था और सब कुछ करने के बावजूद, रेलवे उनका पैसा नहीं दे रही थी. मुंसिफ़ साहिब ने, तैश में आकर, कालका-मेल के इंजन को ही ‘अटैच' कर दिया. गाड़ी आई और अदालत के हरकारे ने ‘अटैचमेंट आर्डर' को इंजन के बॉयलर पर चिपका दिया और ऑर्डर की एक कॉपी स्टेशन-मास्टर को दे दी. अब हालत यह हो गई की गाड़ी उसी स्टेशन पर घंटों तक खड़ी रही. घंटों बाद स्टेशन-मास्टर ‘ईस्ट इंडियन रेलवे' के हैड क्वार्टर (जो कलकत्ता में था) से बात कर सके. हैडक्वार्टर के बैरिस्टर ने बताया कि अदालत से कहिए वह अटैच्ड इंजन को अपने मालखाने में ले जाएँ ताकि गाड़ी में दूसरा इंजन लगाया जाए और वह आगे चले. अब मुंसिफ़ साहिब घबराए और सलाह मांगने डिस्ट्रिक्ट जज के यहाँ पहुँचे. जज साहिब को गुस्सा भी आया और हँसी भी आई. इंजन पर चिपका ‘अटैचमेंट आर्डर' वहाँ से हटाया गया और ‘बुकिंग विंडो' पर लगाया गया. घंटों की प्रतीक्षा के बाद कालका-मेल आगे बढ़ी.

सरकारी काम के सिलसिले में मैं सेशन जज की अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, सभी अदालतों का चक्कर काट चुका हूँ और सभी की कार्यप्रणाली से काफ़ी परिचित हूँ. कुछ वारदातों का जिक्र मैंने अपने सरकारी संस्मरणों में किया भी है. मगर व्यक्तिगत रूप से मेरा अनुभव एक ही है जो काफ़ी दुखद है. बरसों पहिले मैं शिलांग गया था वहाँ सरकारी डाक बंगले में ठहरा था. मेरी पत्नी मेरे साथ थी और जब हम दोनों शाकाहारी भोजन की तलाश में मारवाड़ी होटल गए हुए थे, तभी एक चोर ने डाक बंगले में चोरी कर ली. चोर भी सनकी था और इसी कारण वह सब कुछ छोड़कर, मात्र सौ रुपए, एक सस्ता कैमरा और एक बिलक्रीम की शीशी ही ले गया. रिपोर्ट लिखाई गई और चोर पकड़ा गया. चोरी किया गया सामान भी मिल गया. यहाँ जब मामला अदालत क पहुँचा तो देखा गया कि कैमरा जो था वह अदालत के मालखाने से ही गायब हो चुका था. इस देश का यारों क्या कहना... यह देश है धरती का गहना...

अंग्रेजी में कानून को लेकर श्रेष्ठतम हास्य लिखने वाले लेखक का नाम है हेनरी सिसील जिनकी कृतियों को वुडहाउस तक पढ़ा करते थे. मैं सलाह दूंगा कि आप भी जस्टिस खोसला की लिखी ‘मर्डर ऑफ़ महात्मा एंड अदर केसेज़' व डॉ. कैलाशनाथ काटजू द्वारा लिखित ‘केसेज़ टु रिमेम्बर' जरूर जरूर पढ़ें. फिलहाल मैं ‘शहबाज़' की एक नज़्म लिखता हूँ और सारे मुकद्दमे को यहीं खत्म करता हूँ.

नज़्म

देखा जो मुझको कोर्ट में, कहने लगे क्लर्क

यारों शिकार आया है, इसको खसोट लो,


जमशेद जी बोले कि मोटा है यह किसान

रिश्वत में इससे बढ़िया सी बैलों की जोट लो,


फ़रमाया जैकसन ने कि झंझट में मत पड़ो

सीधी सी बात यह है कि सौ-सौ के नोट लो,


बोले ये शेरसिंह कि बुजदिल हैं आप लोग

मेरी तो राय यह है कि कफ़न भी खसोट लो,


जुम्मन ने कांप कर कहा, यारों करो न शोर

जो कुछ भी तुमको लेना है, पर्दे की ओट लो,


नत्थू कड़क के बोले कि डर की है बात क्या

अपना ही तो अब राज है, डंके की चोट लो.

**-**

साभार : व्यंग्य यात्रा : सार्थक व्यंग्य की रचनात्मक त्रैमासिकी - अंक: अक्तूबर मार्च 2006.

चित्र: कागज पर स्याही से बनी रेखा की कलाकृति.

टैग ,,,

जैसे को तैसा

- मोहिनी राव

एक जमींदार के लिए उसके कुछ किसान एक भुना हुआ मुर्गा और एक बोतल फल का रस ले आए. जमींदार ने अपने नौकर को बुलाकर चीजें उनके घर ले जाने को कहा. नौकर एक चालाक, शरीर लड़का था. यह जानते हुए जमींदार ने उससे कहा, "देखो, उस कपड़े में जिंदा चिड़िया है और बोतल में जहर है. खबरदार, जो रास्ते में उस कपड़े को हटाया, क्योंकि अगर उसने ऐसा किया तो चिड़िया उड़ जाएगी. और बोतल सूंघ भी ली तो तुम मर जाओगे. समझे?"

नौकर भी अपने मालिक को खूब पहचानता था. उसने एक आरामदेह कोना ढूंढा और बैठकर भुना मुर्गा खा गया. उसने बोतल में जो रस था वह भी सारा पी डाला. एक बूंद भी नहीं छोड़ा.

उधर जमींदार भोजन के समय घर पहुँचा और पत्नी से भोजन परोसने को कहा. उसकी पत्नी ने कहा, "जरा देर ठहरो. खाना अभी तैयार नहीं है." जमींदार ने कहा, "मैंने जो मुर्गा और रस की बोतल नौकर के हाथ वही दे दो. वही काफी है."

उसके गुस्से की सीमा न रही जब उसकी पत्नी ने बताया कि नौकर तो सुबह का गया अभी तक लौटा ही नहीं.

बिना कुछ बोले गुस्से से भरा जमींदार अपने काम की जगह वापस गया तो देखा नौकर तान कर सो रहा है. उसने उसे लात मारकर जगाया और किसान द्वारा लाई गई भेंट के बारे में पूछा.

लड़के ने कहा, "मालिक, मैं घर जा रहा था तो इतने जोर की हवा चली कि मुर्गे के ऊपर ढका कपड़ा उड़ गया और जैसा आपने कहा था, वह भी उड़ गया. मुझको बहुत डर लगा कि आप सज़ा देंगें और मैंने बचने के लिए बोतल में जो जहर था वह पी लिया. और अब यहाँ लेटा-लेटा मौत के आने का इंतजार कर रहा था."

**-**

साभार: आओ हँसें एक साथ, अनुवाद - मोहिनी राव, नेशनल बुक ट्रस्ट, ए-5, ग्रीन पार्क, नई दिल्ली, इंडिया- 110016. आईएसबीएन नं. ISBN 81-237-2012-2

मूल्य - रुपए 20.00 मात्र (संस्करण 1988)

(18 देशों की, 53 हास्य कथाओं, 54 पहेलियों और 23 कहावतों के संकलन वाली यह एक अत्यंत पठनीय, संग्रहणीय व वाजिब कीमत की पुस्तक है. - सं.)

टैग ,,,

.

हास्य - व्यंग्य

पति का मुरब्बा

-गीता शॉ पुष्प

यदि आपके पास पति है, तो कोई बात नहीं. न हो तो अच्छे, उत्तम कोटि के, तेज-तर्रार पति का चुनाव करें. क्योंकि जितना बढ़िया पति होगा, मुरब्बा भी उतना ही बढ़िया बनेगा. दागी पति कभी भी प्रयोग में न लाएँ. आवश्यकता से अधिक पके का चुनाव करने से भी मुरब्बा जल्दी खराब हो सकता है. नए ताजे पति का मुरब्बा डाल देने ठीक होता है. नहीं तो मौसम बदलते ही, अन्य सुन्दरियों के सम्पर्क में आने से उसके खराब होने की सम्भावना है.

अभी से मुरब्बा डालकर रखेंगी, तो जीवन भर उंगलियाँ चाटकर, चटखारे लेकर उसका आनन्द उठा सकेंगी. आपके घर की शोभा बढ़ेगी. भविष्य में आर्थिक दृष्टि से लाभ होगा. मुरब्बा डला पति मर्तबान के दायरे में ही रहता है. ट्रान्सपोर्टेशन में भी आसानी होती है. किसी भी मौसम में उसका उपयोग कर सकती हैं. पड़ोसियों और सहेलियों को जला सकती हैं.

आवश्यक सामग्री : प्रेम की चीनी, पति के बराबर तोल के मुस्कान की दालचीनी, हँसी की इलायची, जीवन के रंग, आवश्यकतानुसार नैनों की छुरी, एक मर्तबान.

विधि : पति को धो-पोंछकर साफ करें. मन के ऊपर लगी धूल अच्छी तरह रगड़कर दिल के कपड़े से पोंछ दें. पति चमकने लगेंगे. फिर प्रेम की तीन-तार चाशनी बनाएँ. इसमें पति को पूरा-का-पूरा डुबो दें. कम से कम हफ़्ते भर तक डुबोकर रखें. गरम सांसों की हल्की आंच पर पकने दें. सास-ननदों को पास न आने दें. पड़ोसिनों (विशेष कर जवान) के इनफ़ेक्शन से बचाकर रखें. इनके संपर्क में आने से खराब होने का भय रहता है. पति पूरी तरह प्रेम की चाशनी में सराबोर हो गए हैं, इसकी गारंटी कर लें. मुस्कान की दालचीनी, हँसी की इलायची, जीवन के रंग मिलाकर अच्छी तरह हिला लें.

लीजिए, आपके पति का मुरब्बा तैयार है. जब जी में आए इसके मधुर स्वाद का आनन्द लीजिए.

सावधानियाँ : बीच-बीच में नाराजगी की धूप गर्मी दिखाना जरूरी है, नहीं तो फफूंदी लग सकती है. पड़ोसिनों और सहेलियों की नज़रों से दूर रखें. यदा-कदा चल कर देखती रहें. अधिक चीनी हो गयी हो तो झिड़कियों के पानी का छिड़काव करें. कभी-कभी ज्यादा मिठास से भी मुरब्बा खराब हो जाता है. चीटिंयाँ लग सकती हैं.

विशेष सावधानियां :-

खाई-खेली औरतों से बचाकर रखें.

मर्तबान तभी खोलें जब मुरब्बा खाना हो

इसी तेवर की कुछ और हास्य व्यंग्य रचनाएँ पढ़ें - स्त्री स्तोत्र

तथा त्रासदियाँ प्रेम की

**-**

साभार - पति का मुरब्बा, गीता शॉ पुष्प, सन्मार्ग प्रकाशन, जवाहर नगर दिल्ली - 110007

**-**

चित्र : काग़ज पर स्याही से बनाई गई रेखा की कलाकृति

.

.



मुनव्वर हुसैन बलोच की दो ग़ज़लें

इस धरती पर कितना दुःख है

इस धरती पर कितना दुःख है प्यारे, देख

ऊँचे महलों के वासी दुखियारे , देख

भूक और बेचैनी का हर-सू राज यहाँ

ये मजदूरों की बस्ती है प्यारे, देख

सुर्खी, पाउडर और परफ़्यूमों के इनसान

बिलख रहे हैं बच्चे भूक के मारे, देख

आस न तोड़ मिलन की, मन को आशा दे

चाँद की राहें देखें कब से तारे, देख

बादल, सब्जा, फूल और पानी, सब यकजा

कुदरत की फनकारी के शहपारे देख

लफ़्जों में तस्वीर उतर सकती है कब

होंट कली से बढ़कर नैन नियारे देख

यार बलोच ये वक्त भी कितना जालिम है

हमसे बिछड़े कैसे यार हमारे देख

**-**

फीका-फीका सा है शहर का रंग

मैं मजबूर, तेरी चाहत और शहर का रंग

कब तक देखूं इक जलती दोपहर का रंग

लोगों बोझल आँखों के सब ख्वाब हवा

नींदें अपनी और न अपना दहर का रंग

कौन समय की आँखों में डूबा-उभरा

किसने देखा उस उठती हुई लहर का रंग

जख़्मों की गहराई नापने से हासिल?

क्या मतलब खंजर से, कैसा जहर का रंग

मर मिटना ही जब ठहरा अंजाम तो फिर

क्या घबराना जुल्म से, कैसा कहर का रंग

यार मुनव्वर इक मैं ही अफ़सुर्दा नहीं

फीका-फीका सा है सारे शहर का रंग

**-**

रिजाज़ साग़र की दो ग़ज़लें

मैं बिखर रहा हूँ

मैं जर्रा-जर्रा बिखर रहा हूँ

मैं लम्हा-लम्हा गुज़र रहा हूँ

अजीब मौसम है मुझपे हावी

न जी रहा हूँ न मर रहा हूँ

चराग़ रक्खे हथेलियों पर

दयारे-शब से गुजर रहा हूँ

जवाब देगा तो कैसा देगा

सवाल कर के मैं डर रहा हूँ

अजीब हैं बेचराग रातें

हवेली अपनी से डर रहा हूँ

मैं पैरहन हूं गयी रुतों का

शजर के तन से उतर रहा हूँ

नहीं मुकद्दर में मौत सागर

जनम-जनम से अमर रहा हूँ

**-**

कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

कोई इलजाम धरना चाहता हूँ

तेरे हाथों संवरना चाहता हूँ

शगूफ़े, फूल, फल, पत्ते, हवाएँ

मैं मौसम हूँ, बिखरना चाहता हूँ

लबों पर रख के खामोशी का पत्थर

मैं तुझसे बात करना चाहता हूँ

नहा कर शबनमे-रंजो-अलम में

बरंगे-गुल निखरना चाहता हूँ

अजब हैं तश्नगी की ख्वाहिशें भी

कि दरियाओं में मरना चाहता हूँ

मुक़द्दर गर्दिशें हैं फिर भी सागर

कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

**-**


.

.


चंद बाल पहेलियाँ

1 चार पाँव पर चल न पाए

चलते को भी वह बैठाए


2 मारे से वह जी उठे

बिन मारे मर जाए


3 चल पड़ती तो चल जाती

बिना सहारे ठहर न पाती


4 छोटे से मियाँ जी

दाढ़ी सौ गज की


5 एक घर में राजा सोएँ

दूसरे में पाँव पसारें


6 दिन में मुर्दा

रात में जिंदा


7 मुंह पर पानी छिड़का क्यों

सुनार खाली बैठा क्यों


8 मेरा भाई बड़ा शैतान

बैठे नाक पर पकड़े कान


9 साथ-साथ मैं जाती हूँ

हाथ नहीं मैं आती हूँ


10 हरा आटा लाल पराँठा

सखियों ने मिलकर बांटा


11 दिन में लटकी

रात में अटकी


12 सिर पर पत्थर

पेट में अंगुलि


13 सदा करूं चौकीदारी

मेरे दम पे दुनियादारी


14 एक लड़का जनम का हीना

जिन देखा तिन थू-थू कीना


15 गोल मोल और छोटा मोटा

हर दम वह जमीन पर लोटा

खुसरो कहे यह नहीं झूठा

जो न बूझे अक्ल का खोटा


16 आगे-आगे बहना आई

पीछे-पीछे भइया

दाँत निकाले बाबा आए

बुरका ओढ़े मइया


17 अचरज बँगला एक बनाया

ऊपर नींव तरे घर छाया

बांस न बल्ला बंधन घने

कह खुसरो घर कैसे बने

**-**

उत्तर - मेहँदी, परछाईं, कुर्सी, ताला, ढोलक, भुट्टा, सांकल, साइकिल, अंगूठी, बया का घोंसला, सुई-धागा, दीपक की रौशनी, लोटा पीकदान, दीपक, सोना न था, चश्मा (उत्तर अनुक्रम में नहीं हैं)

(साभार : बाल पहेली कोश, संकलन - चित्रा गर्ग, बाल सभा प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली 110030)

चित्र - रेखा की डिजिटल कलाकृति.

.

.


व्यंग्य : सूट कथा




- पूरन सरमा

सूट सर्दी का पहनावा है. हर आदमी की इच्छा होती है कि वह सूट पहने. कुछ लोगों को शादी के मौके पर सूट नसीब हो जाता है और वे पूरे जीवन उसे सीने से लगाए फिरते हैं. कुछ लोग सूट बनवा भी लेते हैं, लेकिन पहन नहीं पाते. वे सूट को लेकर पेशोपेश में रहते हैं. इस तरह सूट पूरी सर्दी परेशान करता है. मेरी परेशानी फिलहाल यह है कि मेरे पास सूट नहीं है. हिसाब से तो मेरे पास सूट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसके पहनने का कोई कारण मेरे पास नहीं है, लेकिन बावजूद इसके मेरे पास इसकी एक महत्वाकांक्षी योजना है कि मेरे पास काश! एक सूट हो तो मेरे बराबर वाली सीट पर सूट पहन कर बैठे आदमी को मैं किसी क्षेत्र में परास्त कर देता. यह बराबर वाली सीट मेरे दफ़्तर में ही नहीं, बस में, रेल में, सिनेमा में, सांस्कृतिक संध्या में या फिर किसी आशीर्वाद समारोह में, कहीं भी हो सकती है.

लोगों का मानना है कि सूट पहनने के लिए अच्छी आय या पद का होना अपेक्षित नहीं है. क्योंकि अच्छे पद वाले सूट नहीं पहन पाते और उधर उनके अधीनस्थ लिपिकीयकर्मी रोज सूट बदलते हैं. इस तरह सूट यहाँ फिर धर्मसंकट बन जाता है मेरे लिए. मैंने सूट ज्यादातर उन लोगों के पास देखे हैं जिनकी या तो शादी हो गई है अथवा वे जो भ्रष्टाचार करते हैं. अब वे लोग जिनके पास इन दोनों कारणों को छोड़ कर भी सूट है, उन्हें नाराज इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे अभी तक अपने गरेबान में नहीं झांक सके हैं. वैभवशाली लोगों के लिए तो खैर सूट पहनावा हो सकता है. लेकिन वे लोग अवश्य इस बारे में सोचें जो बिना वैभव के सूट को शरीर पर टांगकर घूम रहे हैं.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि चाहे उनके कृतित्व कैसे भी हों, लेकिन सूट व्यक्तित्व को निखारता है. व्यक्तित्व का निखार शादी के अवसर तक तो मुनासिब है लेकिन शादी के बाद या तो आदमी व्यक्तित्व निखारने की पोजीशन में नहीं रहता अथवा शादी के बाद भी व्यक्तित्व निखार रहा है तो अवश्य दाल में काला है. आजकल दाल में काला का प्रतिशत और औसत आंकड़ा बढ़ रहा है यह चिंताजनक है. शायद बढ़ते तलाकों में सूट भी कोई भूमिका निर्वाह कर रहा हो, यह प्रश्न सूट पहनने वाले खुद तोलें, हो सकता है उनका सच्चाई से मुकाबला हो जाए. इसलिए व्यक्तित्व निखारने की होड़ अथवा आफत उठाने से पहले तीन बार सोच लें, क्योंकि निखरा हुआ व्यक्तित्व सदा घातक सिद्ध हुआ है. मेरा सूट नहीं पहनने का एक मुख्य कारण यह भी रहा है. मैंने कई बार देखा है कि जब भी मेरा व्यक्तित्व निखरा और मित्र और सहकर्मी ‘न्यू पिंच' कहकर मोटी दावत की मांग उठाते हैं. कुछ मित्र यह भी कह डालते हैं - ‘अरे भाई शर्मा क्या चक्कर है, नंबर दो की कमाई में अंगुलियाँ तर हैं.' कुछ मित्र यह भी कहते हैं - ‘अरे भाई यह सजना संवरना कैसे, क्या भाभी जी पीहर गयी हैं या फिर कोई सुदर्शना पड़ोसिन को रिझाने में लगे हो.' मेरे कहने का आशय यह है कि सूट कई संकटों की जड़ है. बताइये मैं कैसे धारण करूं. जो लोग ये बातें करते हैं वे सोचते हैं जैसे कोई चक्कर बिना सूट के चल ही नहीं सकता. अब उन्हें यह कौन बताए कि हम बिना सूट के भी सभी प्रकार के चक्कर चला देते हैं.

मेरे एक अधिकारी मित्र हैं. हल्की सी गुलाबी सर्दी शुरू होते ही सूट पहन लेते हैं, केवल इसलिए कि उनके व्यक्तित्व को देखकर उनके अधीनस्थकर्मी कम से कम सर्दी सर्दी तो डरे रहेंगे. सूट से डराने की परम्परा हमारे यहाँ आदिकाल से चली आ रही है. सामान्य सा आदमी या गरीब आदमी सूट पहनने वाले को जो अदब पेश करता है, वह मात्र उनका डर ही है. कम पढ़ा लिखा या निरक्षर व्यक्ति भी एक बार सूट पहनकर चेहरे पर तेल लगाले (नहाले तो और भी बढ़िया) तो भाईजान क्या पूछते हो. अंधों का राजा वही बन जाता है. सफर में और पूरे जीवन में कभी इस बात को आजमा कर देख लें. लेकिन इसके लिए बनवाना पड़ेगा एक अदद सूट, जो आपके वश की बात है नहीं. इस डराने की दृष्टि से सूट बनवाना चाहता हूँ क्योंकि इस डराने से अनेक काम अपने आप निकल जाते हैं. किसी दफ़्तर में किसी काम से जाओ. बाबू सूट वाले से पहले बात करता है, सामान्य आदमी को तो पीछे धकिया देता है. इस पोशाक में वह व्यक्ति गंभीर तथा पढ़ा लिखा बौद्धिक दिखाई देता है, चाहे वह है नहीं. कई बार मुझे लगता है कि मैं बात-बात पर हंसने वाला आदमी यदि सूट पहन लूंगा तो यह सूट की तौहीन होगी, क्योंकि मैं ज्यादा लंबे समय तक गंभीरता को चेहरे पर मेंटेन नहीं कर पाऊंगा. इसलिए सोचता हूं कि सूट नहीं भी है तो चलेगा. लेकिन फिर कोई आदमी खामख्वाह नहीं डरे यह खेदजनक लगता है. मेरी भी अपनी इच्छा है कि कोई मुझसे डरे तो भाई इस सफेद स्वेटर के पहनने से तो कोई डरने वाला है नहीं, सूट में जो गंभीरता है वह भला स्वेटर में कहाँ, इसलिए सूट की यादें लिए तड़पता रहता हूँ.

.

.

वैसे सूट की भारतीय पोशाक नहीं है. यह पश्चिम की नकल है. लेकिन नकल में हमारा कोई मुकाबला नहीं है और बिना अक्ल के नकल का कारवां बढ़ाते चलते हैं. सूट में भी यही हो रहा है. ऐसे-ऐसे विदूषक देखे हैं, जो सूट में जँचे या न जँचे, वे इसे धारण कर चार्ली चैपलिन की मूंछों में इतराते हैं. मैंने सुना है सूट खोलकर सोना चाहिए - लेकिन भारतवर्ष में लोग सूट पहनकर सो जाते हैं. इसका कारण यह भी हो सकता है कि उन्होंने जैसे तैसे करके सूट तो बनवा लिया और जब रज़ाई की बारी आई तो वे खाली हो चुके थे. इस तरह सूट उनको रात में रज़ाई का विकल्प बनकर रह गया. कुछ लोग सूट के साथ बूट के महत्व को न समझ कर हवाई चप्पलों में ही घूम रहे हैं उनसे पूछा कि भाई ढंग सा देसी जूता ही ले आओ तो वे तड़ से बोले - ‘कृपया आप सूट को देखें.' भारत में जो लोग सूट पहन रहे हैं, वे इसके धुलाई महात्म्य को भी नहीं समझ पाए हैं. चिकनाई से सूट एक अलग ही रंग की आभा से दमकने लगा है लेकिन वे बेफिक्री से मैल को ढो रहे हैं. क्योंकि उनके पास सूट है. अनेक लोगों को सूट के पेंट को डोरे से बांधे देखा है वे बेल्ट नहीं ला सके हैं. सूट को लेकर अनेक विसंगतियाँ हैं लेकिन उनके अपने अपने निजी कारण हैं और इस भारतीय आबोहवा में सूट परिहास का कारण बन गया है.

वैसे सूट की महत्ता को देखकर इसके कुछ मापदंड तय होने चाहिए. जैसे कि जिसकी मासिक कमाई अमुक राशि से कम नहीं हो, वह सूट नहीं पहन सकता. सूट कहाँ पहना जाए. शादी विवाह में सूट कौन पहने? दफ़्तरों में किस रेंक का आदमी सूट पहने या नहीं. सूट पहनने वालों पर हैलमेट न लगाने वालों की तरह पूछताछ हो तथा यदि वे मापदंडों से इधर उधर पाए जाएँ तो बाकायदा चालान हो. इससे सोसायटी में अफरातफरी नहीं होगी तथा सोसाइटी में लोगों का क्रेज और स्तर बना रहेगा. वरना अब तो सब्जी के ठेले वाला, चाय पान की धड़ी लगाने वाला या गजक बेचने वाला भी सूट पहन रहा है. वह सूट पहनना ही चाहे तो अपने घर में पहने, बाहर दूसरों का स्टेटस क्यों खराब करता है. पहले वह अपना स्टेटस बनाए फिर सूट पहने तब किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होगी. अब यह दीगर बात है कि प्रायः बहुत से बड़े लोग, बड़े अफ़सर जिनके पास तथाकथित बड़ा स्टेटस होता है, बस स्टेटस में बड़े होते हैं - मानवता या दूसरे अर्थों में नहीं.

महिलाएँ सूट नहीं पहनती हैं लेकिन वे जो भी पहनती हैं उन पर भी मापदंड प्रभावी हो ताकि सूट वाले अपने स्तर की महिला को पहचान सकें. वैसे ही महिलाओं के वस्त्र कीमती होते हैं लेकिन इसमें भी सीमा रेखा तय हो जाए तो भेदभाव घटेगा तथा समाज में सद्भाव बनेगा. हाँ, जो महिलाएँ सलवार सूट पहनती हैं उन्हें भी पाबंद किया जाना चाहिए - क्योंकि सूट पुरूषों का पहनावा है इसलिए सूटधारी सज्जनों के हित में उन्हें अपनी पोशाक भी उन्हें ही समर्पित कर देनी चाहिए, तब देखना भारतीय संस्कृति के किस तरह से चार चाँद लग जाएंगे. महिलाओं को इसके लिए आगे आना चाहिए तथा पुरुषों के हित में सूट का त्याग करना चाहिए. वैसे महिलाओं को सूट के मामले में स्वतंत्र रखना भी ठीक है ताकि वे जो लोग सूट पहन रहे हैं उनके बारे में सही राय दे सकें.

सूटधारी सज्जनों सर्दी बहुत बढ़ रही है और आपने यदि सूट अभी तक बक्सों में से नहीं निकाला हो तो इस अंग्रेजी पहनावे को अविलम्ब निकालें और धारण कर लें, हो सकता है यह आपके व्यक्तित्व को निखारने में अथवा लोगों को व्यर्थ डराने में कोई न कोई महती भूमिका निभावे. सूट जैसा भी है सूट है. चाहे वह बीस बरस तीस बरस पहले का होने से छोटा हो गया है लेकिन है तो सूट. सूट कई मानसिक व्याधियों का हरता है तथा बराबरी का दर्जा दिलाता है. इसलिए इस मनभावन बेला में पहन लें अपना सूट. सूट में आप अभिनेताओं जैसे लगते हैं. विश्वास नहीं हो तो सूट पहनकर दस बीस मिनट फुल साइज के आइने के सामने खड़े होकर अपने आपको निहारें तथा हमशक्ल हीरो से तुलना करें. थोड़ी देर में आप पाएँगे कि आप वह हो गए हैं. हीरो बनने की ऋतु आ गई है. सूट नहीं हो तो बनवा लें. चाहे आईसीआईसीआई बैंक से ऋण ही क्यों न लेना पड़े. सूट ऐसा बनवाओ कि बराबर वाले की आँख खुली की खुली रह जावे. सूट की इतनी ही कथा नहीं है, वह तो भगवान की कथा की तरह अनंत है. अतः बाकी कथा फिर कभी.

**-**

(साभार: मधुमती, दिसम्बर 1996)

चित्र - रेखा की डिजिटल कलाकृति

.

हिंदी मीडिया की दिशा बदल सकता है यूनिकोड

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

हाल ही में राजधानी में 'मीडिया में यूनिकोड की प्रासंगिकता' पर अमेरिकन इन्स्टीटयूट ऑफ इंडियन स्टडीज की ओर से आयोजित एक गोष्ठी में मैंने किसी बड़े मीडिया संस्थान को पूरी तरह यूनीकोड समर्थित करने में आड़े आने वाली वित्तीय उलझनों का जिक्र किया था। इस पहलू ने यूनिकोड के प्रति उत्साहित लोगों को थोड़ा उद्वेलित किया। लेकिन यूनिकोड अपनाने की अनिवार्य आवश्यकता के साथ-साथ व्यावसायिक और वित्तीय पहलुओं पर व्यावहारिक दृष्टि डालना जरूरी है।

किसी अखबार के यूनिकोडीकरण की तीन श्रेणियां हो सकती हैं- उसकी वेबसाइट या पोर्टल को यूनिकोड युक्त किया जाना, वेबसाइट के साथ-साथ अखबार के निर्माण तंत्र (जिसमें कम्पोजिंग, डिजाइनिंग, समाचार वितरण व संकलन व्यवस्था, ग्राफिक्स आदि आते हैं) को यूनिकोडित किया जाना और वेबसाइट व अखबार के साथ-साथ उस समाचार संस्थान की सम्पूर्ण व्यवस्था (विज्ञापन संकलन, वितरण व्यवस्था, प्रबंधन, अकाउंटिंग, ईआरपी, डेटाबेस, ईमेल प्रणालियां आदि) का भी यूनिकोडित किया जाना। इन तीनों श्रेणियों में यूनिकोडित होने वाले कम्प्यूटरों और सॉफ्टवेयरों की संख्या अलग-अलग है और इस प्रक्रिया में होने वाला खर्च भी इसी तथ्य पर आधारित है। एक बड़ी समस्या यह है कि हिंदी अखबारों में पारंपरिक रूप से इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर यूनिकोड का समर्थन नहीं करते। इनमें से जो सॉफ्टवेयर अंतरराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा तैयार किए गए हैं, उनके ताजा संस्करण खरीदकर यूनिकोड में काम शुरू किया जा सकता है लेकिन जिन सॉफ्टवेयरों का भारत में विकास हुआ है (मसलन समाचार संकलन और प्रबंधन सॉफ्टवेयर, ईआरपी प्रणालियां आदि) उनका नए सिरे से विकास किए जाने की जरूरत है। जहां खरीदे जाने वाले सॉफ्टवेयरों को लेकर तो कोई उलझन नहीं है लेकिन जिन सॉफ्टवेयरों का नए सिरे से विकास होना है, उन पर होने वाला खर्च काफी अधिक हो सकता है क्योंकि विकास की यह प्रक्रिया कई महीनों तक चल सकती है।

यदि कोई बड़ा भाषायी अखबार पुराने फॉरमेट में चल रही अपनी डाइनेमिक वेबसाइट या पोर्टल को यूनीकोडित करना चाहता है तो इस प्रक्रिया में दो से पांच लाख रुपए तक की लागत आ सकती है। हो सकता है कि कुछ अखबार फिलहाल सिर्फ इतना ही कर इंटरनेट पर अपनी उपस्थिति को मजबूत करने भर के इच्छुक हों। ऐसी स्थिति में उनका खर्च काफी सीमित हो सकता है। लेकिन यदि उस मीडिया संस्थान का प्रबंधन अपने पूरे अखबार की निर्माण प्रणाली को यूनीकोडित करना चाहे तो इस प्रक्रिया में जरूरी हार्डवेयर व सॉफ्टवेयर पर आने वाला खर्च वहां प्रयुक्त कम्प्यूटरों की संख्या, कम्प्यूटरों की क्षमताओं (यूनीकोड सक्षम हैं या नहीं), कर्मचारियों की संख्या, सॉफ्टवेयरों की लाइसेंसिंग प्रणाली, ऑटोमैशन और सेवाओं के स्तर आदि पर निर्भर करेगा। अखबार के आकार और आवश्यकताओं के अनुसार यह राशि पांच लाख रुपए से पंद्रह लाख रुपए तक हो सकती है। बहुत से हिंदी अखबारों में अब भी 486 या पेंटियम सीरीज के शुरूआती कंप्यूटर इस्तेमाल हो रहे हैं। उनमें हार्डवेयर का अपग्रेडेशन जरूरी होगा। लेकिन जिनमें पहले से ही कम से कम विंडोज एक्सपी या 2000 ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कंप्यूटर मौजूद हैं, उनमें हार्डवेयर पर होने वाला खर्च बहुत कम होगा।

यदि अखबार का प्रबंधन यूनीकोडीकरण को सिर्फ विषय-वस्तु (कॉन्टेंट) से संबंधित विभागों तक सीमित न रखना चाहे और उसे अपने संस्थान की सम्पूर्ण व्यवस्था (ईआरपी, विज्ञापन, वितरण, डेटाबेस, संदेश-प्रणालियां आदि) में लागू करना चाहे तो उसे पांच से दस लाख रुपए तक की अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ सकती है। यहां यह बात ध्यान में रखने योग्य है कि बहुत कम भाषायी अखबार गैर-संपादकीय विभागों में इस तरह के आधुनिक सॉफ्टवेयरों का इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर वे टैली या बिजी जैसे अकाउंटिंग पैकेज से काम चला लेते हैं। यदि संबंधित अखबार इस श्रेणी में आता है तो उसमें इस विभाग के यूनीकोडीकरण पर होने वाला खर्च भी इन सॉफ्टवेयरों तक ही सीमित होगा। इस तरह अलग-अलग मीडिया संस्थान के लिए यूनीकोडीकरण पर खर्च होने वाली धनराशि अलग-अलग हो सकती है।

प्रश्न उठता है कि क्या मीडिया संस्थानों को यह अतिरिक्त खर्च करना चाहिए? जी हां, पूरी तरह 'विश्वानुकूल' (वर्ल्ड रेडी) बनने के लिए दो से तीस लाख रुपए के बीच होने वाला यह खर्च अनुचित नहीं है। भले ही, शुरूआत में उन्हें यह खर्च अनावश्यक महसूस हो लेकिन आगे चलकर इससे होने वाले लाभ इस वित्तीय कष्ट को निष्प्रभावी बना सकते हैं। गूगल जैसे सर्च इंजनों में दृश्यता (विजिबिलिटी) बढ़ने से अखबार के दायरे में होने वाले विस्तार और उससे मिलने वाले प्रचार को यदि वित्तीय लाभ में बदलकर देखा जाए तो भी यह खर्च बहुत छोटा लगेगा। वैसे भी एक बार सर्वत्र यूनीकोडीकरण का तकनीकी वातावरण होने पर यूनीकोड समर्थक उत्पादों की कीमतें घट जाएंगी।

.

.

यूनिकोड का सबसे बड़ा लाभ मानकीकरण है जो भारतीय भाषाओं के संस्थानों द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी के आधुनिकतम अनुप्रयोगों का मार्ग प्रशस्त कर देगा। मानकीकरण की स्थिति में सभी संस्थानों में टेक्स्ट एक ही फारमेट में इस्तेमाल होगा। यानी भाषायी प्रकाशन संस्थान फ़ॉन्ट और कुछ हद तक कीबोर्ड लेआउट की सीमा से मुक्त हो जाएंगे। जो पाठ एजेंसी की खबरों में इस्तेमाल होता है, उसे फ़ॉन्ट बदले बिना जस का तस अखबार में इस्तेमाल किया जा सकेगा और इंटरनेट पोर्टल या ई-न्यूजपेपर पर भी भेजा जा सकेगा।

समान तकनीकी वातावरण से भारतीय भाषाओं में काम करने वाले सॉफ्टवेयर डवलपर्स का समय और श्रम अलग-अलग फ़ॉन्ट आधारित उत्पाद तैयार करने की बजाए एक ही मानक वाले अधिक प्रभावी और कल्पनाशीलता से भरे उत्पाद तैयार करने में लगेगा। तब एक ही डेटा या विषय वस्तु का विभिन्न रूपों में विभिन्न माध्यमों में असीमित और सहज उपयोग संभव होगा। उदाहरण के लिए, एक यूनीकोड आधारित अखबार का प्रबंधन यदि चाहे तो सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से बिना किसी अतिरिक्त प्रयास या खर्च के उसकी विषय वस्तु को इंटरनेट पोर्टल में भी बदल सकता है, ई समाचार पत्र की शक्ल दे सकता है (अब ई समाचार पत्रों की सदस्यता अखबारों के सर्कुलेशन में गिनी जाने लगी है इसलिए यह एक बड़े लाभ का विषय है), अन्य भारतीय भाषाओं में स्वचालित ढंग से अनूदित कर नए संस्करण निकाल सकता है, अन्य मीडिया में (जैसे ध्वनि आधारित मीडिया) बदल सकता है, सिंडीकेटिंग कर सकता है और पुस्तकाकार रूप प्रदान कर सकता है। फिलहाल हमारे अखबार स्वचालन (ऑटोमेशन), कृत्रिम मेधा (आर्टीफिशियल इंटेलीजेंस) और विभिन्न माध्यमों के सम्मिलन (कनवर्जेंस) जैसे सूचना प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों से वंचित है। समग्र यूनिकोडीकरण के बाद इस तरह के आधुनिकतम अनुप्रयोगों का इस्तेमाल अपेक्षाकृत अधिक आसान और सुलभ हो सकता है।

यूनिकोड सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में एक ऐसी तकनीकी परिघटना है जो एकाध दशक में घटित होती है और सम्पूर्ण परिदृश्य की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। भारतीय भाषायी मीडिया को इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए क्योंकि आईटी क्षेत्र में आगे आने वाले आधुनिकतम अनुप्रयोगों की बुनियाद इसी पर रखी जाएगी।

(बालेंदु शर्मा दाधीच, प्रभासाक्षी.कॉम से सम्बद्ध हैं)

.

भूमंडलीकरण में आईटी का योगदान है यूनिकोड

- बालेन्दु शर्मा दाधीच

सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास और सुधार की निरंतर प्रक्रिया चलती रहती है और इसी संदर्भ में पिछले कुछ वर्षों से सूचनाओं के भंडारण की एक आधुनिकतम पद्धति लोकप्रिय हो रही है जिसे यूनिकोड कहते हैं। यूनिकोड के माध्यम से पहली बार सूचना प्रौद्योगिकी पर अंग्रेजी की अनिवार्य निर्भरता से मुक्ति की संभावनाएं दिख रही हैं क्योंकि यह पद्धति एक आम कम्प्यूटर को विश्व की सभी भाषाओं में काम करने में सक्षम बना सकती है। जाहिर है, आईटी के क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को विकसित होते देखने की आकांक्षा रखने वाले लोग यूनिकोड में छिपी संभावनाओं को देखकर उत्साहित हैं क्योंकि कई दशकों के बाद अब हम बिना अंग्रेजी जाने कंप्यूटर की क्षमताओं का प्रयोग करने की स्थिति में आ रहे हैं। मीडिया में कम्प्यूटर टेक्नॉलॉजी की असंदिग्ध रूप से महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए कहा जा सकता है कि वह भी आने वाले कुछ वर्षों में इस काल-विभाजक परिघटना से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।

हालांकि यूनिकोड है तो सिर्फ डेटा के स्टोरेज संबंधी एनकोडिंग मानक, लेकिन इसके प्रयोग से कंप्यूटरों की कार्यप्रणाली और उनके इस्तेमाल के तौर-तरीकों में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है क्योंकि डेटा ही कंप्यूटरों के संचालन का केंद्र बिन्दु है। भले ही हम कंप्यूटर का किसी भी काम के लिए प्रयोग करें, मसलन लेखन कार्य के लिए, ध्वनि रिकॉर्डिंग के लिए या फिर वीडियो प्रोसेसिंग के लिए, हमें इसके लिए कंप्यूटर को या तो कुछ सूचनाएं प्रदान करनी पड़ती हैं (जैसे टाइपिंग के माध्यम से या रिकॉर्डिंग के जरिए) या फिर हम कुछ सूचनाएं कंप्यूटर से ग्रहण करते हैं (मसलन पहले से रिकार्डेड वीडियो को देखना या पहले से मौजूद फाइलों को खोलना)। इन्हें क्रमश: इनपुट और आउटपुट के रूप में जाना जाता है। इन दोनों प्रक्रियाओं में जिन सूचनाओं (डेटा) का प्रयोग होता है उसे कंप्यूटर पर अंकों के रूप में स्टोर किया जाता है क्योंकि वह सिर्फ अंकों की भाषा जानता है, और वह भी सिर्फ दो अंकों- 'शून्य' तथा 'एक' की भाषा। इन दो अंकों का भिन्न-भिन्न ढंग से पारस्परिक बाइनरी संयोजन कर अलग-अलग डेटा को कंप्यूटर पर रखा जा सकता है। मिसाल के तौर पर 01000001 का अर्थ है अंग्रेजी का कैपिटल ए अक्षर और 00110001 से तात्पर्य है 1 का अंक।

अक्षरों या पाठ्य सामग्री और कंप्यूटर पर स्टोर किए जाने वाले बाइनरी डिजिट्स के बीच तालमेल बिठाने वाली प्रणाली को एनकोडिंग कहते हैं। एनकोडिंग टेबल के माध्यम से कंप्यूटर यह तय करता है कि फलां बाइनरी कोड को फलां अक्षर या अंक के रूप में स्क्रीन पर प्रदर्शित किया जाए। किस एनकोडिंग में कितने बाइनरी अंक प्रयुक्त होते हैं, इसी पर उसकी क्षमता और नामकरण निर्भर होते हैं। उदाहरण के तौर पर अब तक लोकप्रिय एस्की एनकोडिंग को 7 बिट एनकोडिंग कहा जाता है क्योंकि इसमें हर संकेत या सूचना के भंडारण के लिए ऐसे सात बाइनरी डिजिट्स का प्रयोग होता है। एस्की एनकोडिंग के तहत इस तरह के 128 अलग-अलग संयोजन संभव हैं यानी इस एनकोडिंग का प्रयोग करने वाला कम्प्यूटर 128 अलग-अलग अक्षरों या संकेतों को समझ सकता है। अब तक कंप्यूटर इसी सीमा में बंधे हुए थे और इसीलिए भाषाओं के प्रयोग के लिए उन भाषाओं के फ़ॉन्ट पर सीमित थे जो इन संकेतों को कंप्यूटर स्क्रीन पर अलग-अलग ढंग से प्रदर्शित करते हैं। यदि अंग्रेजी का फ़ॉन्ट इस्तेमाल करें तो 01000001 संकेत को ए अक्षर के रूप में दिखाया जाएगा। लेकिन यदि हिंदी फ़ॉन्ट का प्रयोग करें तो यही संकेत ग, च या किसी और अक्षर के रूप में प्रदर्शित किया जाएगा।

यूनिकोड एक 16 बिट की एनकोडिंग व्यवस्था है, यानी इसमें हर संकेत को संग्रह और अभिव्यक्त करने के लिए सोलह बाइनरी डिजिट्स का इस्तेमाल होता है। इसीलिए इसमें 65536 अद्वितीय संयोजन संभव हैं। इसी वजह से यूनिकोड हमारे कंप्यूटर में सहेजे गए डेटा को फ़ॉन्ट की सीमाओं से बाहर निकाल देता है। इस एनकोडिंग में किसी भी अक्षर, अंक या संकेत को सोलह अंकों के अद्वितीय संयोजन के रूप में सहेज कर रखा जा सकता है। चूंकि किसी एक भाषा में इतने सारे अद्वितीय अक्षर मौजूद नहीं हैं इसलिए इस स्टैंडर्ड (मानक) में विश्व की लगभग सारी भाषाओं को शामिल कर लिया गया है। हर भाषा को इन 65536 संयोजनों में से उसकी वर्णमाला संबंधी आवश्यकताओं के अनुसार स्थान दिया गया है। इस व्यवस्था में सभी भाषाएं समान दर्जा रखती हैं और सहजीवी हैं। यानी यूनिकोड आधारित कम्प्यूटर पहले से ही विश्व की हर भाषा से परिचित है (बशर्ते ऑपरेटिंग सिस्टम में इसकी क्षमता हो)। भले ही वह हिंदी हो या पंजाबी, या फिर उड़िया। इतना ही नहीं, वह उन प्राचीन भाषाओं से भी परिचित है जो अब बोलचाल में इस्तेमाल नहीं होतीं, जैसे कि पालि या प्राकृत। और उन भाषाओं से भी जो संकेतों के रूप में प्रयुक्त होती हैं, जैसे कि गणितीय या वैज्ञानिक संकेत।

यूनिकोड के प्रयोग से सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि एक कंप्यूटर पर दर्ज किया गया पाठ (टेक्स्ट) विश्व के किसी भी अन्य यूनिकोड आधारित कम्प्यूटर पर खोला जा सकता है। इसके लिए अलग से उस भाषा के फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करने की अनिवार्यता नहीं है क्योंकि यूनिकोड केंद्रित हर फ़ॉन्ट में सिध्दांतत: विश्व की हर भाषा के अक्षर मौजूद हैं। कंप्यूटर में पहले से मौजूद इस क्षमता को सिर्फ एक्टीवेट (सक्रिय) करने की जरूरत है जो विंडोज एक्सपी, विंडोज 2000, विंडोज 2003, विंडोज विस्ता, मैक एक्स 10, रेड हैट लिनक्स, उबन्तु लिनक्स आदि ऑपरेटिंग सिस्टम्स के जरिए की जाती है। विश्व भाषाओं की यह उपलब्धता सिर्फ देखने या पढ़ने तक ही सीमित नहीं है। हिंदी जानने वाला व्यक्ति यूनिकोड आधारित किसी भी कम्प्यूटर में टाइप कर सकता है, भले ही वह विश्व के किसी भी कोने में क्यों न हो। सिर्फ हिंदी ही क्यों, एक ही फाइल में, एक ही फ़ॉन्ट का इस्तेमाल करते हुए आप विश्व की किसी भी भाषा में लिख सकते हैं। इस प्रक्रिया में अंग्रेजी कहीं भी आड़े नहीं आती। विश्व भर में चल रही भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी का यह अपना अलग ढंग का योगदान है।

.

.

यूनिकोड आधारित कम्प्यूटरों में हर काम किसी भी भारतीय भाषा में किया जा सकता है, बशर्ते ऑपरेटिंग सिस्टम या कंप्यूटर पर इन्स्टॉल किए गए सॉफ्टवेयर यूनिकोड व्यवस्था का पालन करें। मिसाल के तौर पर माइक्रोसॉफ्ट के ऑफिस संस्करण, सन माइक्रोसिस्टम्स के स्टार ऑफिस या फिर ओपनसोर्स पर आधारित ओपनऑफिस.ऑर्ग जैसे सॉफ्टवेयरों में आप शब्द संसाधक (वर्ड प्रोसेसर), तालिका आधारित सॉफ्टवेयर (स्प्रैडशीट), प्रस्तुति संबंधी सॉफ्टवेयर (पावर-प्वाइंट आदि) तक में हिंदी और अन्य भाषाओं का बिल्कुल उसी तरह प्रयोग कर सकते हैं जैसे कि अब तक अंग्रेजी में किया करते थे। यानी न सिर्फ टाइपिंग बल्कि शॉर्टिंग, इन्डेक्सिंग, सर्च, मेल मर्ज, हेडर-फुटर, फुटनोट्स, टिप्पणियां (कमेंट) आदि सब कुछ। कंप्यूटर पर फाइलों के नाम लिखने के लिए भी अब अंग्रेजी की जरूरत नहीं रह गई है। यदि आप अपनी फाइल का नाम हिंदी में 'मेरीफाइल.डॉक' भी रखना चाहें तो इसमें कोई अड़चन नहीं है। इंटरनेट पर भी अब यूनिकोड का मानक खूब लोकप्रिय हो रहा है और धीरे-धीरे लोग पुरानी एनकोडिंग व्यवस्था की सीमाओं से निकल कर यूनिकोड अपनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। गूगल, विकीपीडिया, एमएसएन आदि इसके उदाहरण हैं जिनमें हिंदी में काम करना उसी तरह संभव है जैसे कि अंग्रेजी में। यूनिकोड आधारित भारतीय भाषाओं की वेबसाइटों की विषय वस्तु (कॉन्टेंट) सर्च इंजनों द्वारा भी सहेजा जाता है यानी विश्व स्तर पर उनकी उपस्थिति और दायरा बढ़ता है। फिलहाल सर्च इंजनों पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की वेबसाइटों की स्थिति दयनीय है क्योंकि हर वेबसाइट में अलग-अलग फ़ॉन्ट का इस्तेमाल होने के कारण सर्च इंजनों के लिए उनकी विषय वस्तु को समझना संभव नहीं है। यूनिकोड के प्रयोग से यही काम उनके लिए बहुत आसान हो जाता है।

यूनिकोड आधारित वेबसाइटों या पोर्टलों को देखने के लिए पाठक के पास संबंधित फ़ॉन्ट होने की अनिवार्यता भी नहीं है। अगर कोई वेबसाइट यूनिकोड में है तो उसे विश्व में किसी भी स्थान पर फ़ॉन्ट डाउनलोड किए बिना न सिर्फ देखा जा सकता है बल्कि उसके लेखों को अपने कंप्यूटर पर सहेजा भी जा सकता है। डाइनेमिक फ़ॉन्ट नामक टेक्नॉलॉजी के जरिए यह सुविधा सीमित अर्थों में पहले भी मौजूद थी लेकिन कंप्यूटर पर सहेजे गए लेख तभी पढ़े जा सकते थे यदि कंप्यूटर में संबंधित फ़ॉन्ट मौजूद हो। अब यह सीमा नहीं रही।

कंप्यूटर अब अंग्रेजी का मोहताज नहीं रहा और इसीलिए यूनिकोड ने उसकी सम्पूर्ण कार्यप्रणाली भी बदल दी है। डेटा के भंडारण के साथ-साथ उसकी प्रोसेसिंग और प्रस्तुति के तरीके भी बदल गए हैं। चूंकि यूनिकोड सोलह बिट की एनकोडिंग व्यवस्था है और विश्व के अधिकांश सॉफ्टवेयर पुरानी एनकोडिंग व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए विकसित किए गए थे इसलिए ऐसे सॉफ्टवेयर यूनिकोड टेक्स्ट को समझ नहीं पाते। नतीजतन विश्व भर में सॉफ्टवेयरों को यूनिकोड समर्थन युक्त बनाने की प्रक्रिया चल रही है। किसी कंप्यूटर पर यूनिकोड का पूरा लाभ लेने के लिए न्यूनतम आवश्यकता है ताजातरीन विन्डोज, लिनक्स या मैक ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रयोग। चूंकि इन ऑपरेटिंग सिस्टम्स के संसाधनों की अपनी जरूरतें हैं इसलिए इस बात की काफी संभावना है कि संबंधित कम्प्यूटर कम से कम पी-4, 2 गीगाहर्त्ज श्रेणी का हो और कम से कम 40 जीबी हार्ड डिस्क और 256 एमबी रैम (रैंडम एक्सेस मेमरी) से युक्त हो। इन्हीं कारणों से यूनिकोड की ओर प्रस्थान करने में कुछ आर्थिक बिंदुओं पर विचार करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

(बालेंदु शर्मा दाधीच, प्रभासाक्षी.कॉम से सम्बद्ध हैं)

.

किस्सा बी सियासत भठियारिन और एडीटर बुल्लेशाह का


-अमृतलाल नागर

जाड़े की रात. नया जंगल. एक डाल पर तोता, एक डाल पर मैना. हवा जो सनसन चली तो दोनों कांप उठे. मैना अपने पैरों को समेटकर बोली की अय तोते, तू भी परदेशी, मैं भी दूसरे देश की. न यहाँ तेरा आशियाना और न मेरा बसेरा. किस्मत ने हमारा घर बार छुड़ाया, लेकिन मुसीबत ने हमें साथी बनाया, इसलिए अय तोते, अब तू ही कोई जतन कर कि जिससे रात कटे, कोई किस्सा छेड़ कि मन दूसरा हो.

तोता बोला कि अय-मैना, सुन! मैं देश-परदेश उड़ा और सरायफानी देखी. उसके भठियारे का नाम इलाही, और भठियारिन हैं बी सियासत, जो जिन्दगी की सेज से उतरने का नाम ही नहीं लेती. उन्हें ढली जवानी में नयी नवेली बनने का शौक चर्राया है कि अल्लाह अल्लाह! उनके साज सिंगार की फरमाइशों ने मियाँ इलाही की सरायफानी को सुनार की दुकान बना रखा है. चारों ओर भट्टियाँ धधक रही हैं, दिमाग का सोना गलाया जा रहा है. हर तरफ ठक-ठक का शोर इस कदर कि भठियारे मियाँ इलाही के हुक्के की गुड़गुड़ाहट ही दब गई. ग्राहकों की तौबातिल्ला और शिकायतों से सरायफानी का छप्पर उड़ने लगा. मगर ऐ मैना, अजब ढंग हैं बी सियासत के कि कल का ख्याल ही नहीं, उन्हें तो आजी में कल नहीं पड़ती. घड़ी में सुनारों की छाती पर सवार और दम-दम में जाम आजादी का दौर. ढली जवानी का बगूला इस जोर से भड़का कि कत्तालेआलम बन गईं. और अब तो जानेजहाँ इस बात पर मचली हैं कि हम आग से आग को बुझाएंगे.

भनक एडीटर बुल्लेशाह को पड़ी. अक्ल की फरीरी पर शक्ल की अमीरी अपनाई, खुदा के नूर पर मेहँदी रचाई, जुल्फ़ों में तेल डाला, और फिर जो सुरमीली नजरों को तिरछा घुमा के फेंक दिया तो जहान में आग लग गई. सीना-चाक, दहन फाड़कर बुल्लेशाह चिल्लाए कि ऐ बी सियासत, जाने-मन!

उल्फत का जब मजा है

कि दोनों हो बेकरार,

दोनों तरफ हो आग

बराबर लगी हुई.

...लो आओ, बुझाओ!

गमक के उठीं बी सियासत, भठियारे से बोलीं, ले मर्दुए, अपनी दुनिया सम्हाल, मैं तो चली.

बन ठन के चली मैं पी की गली

मुए काहे को शोर मचावत है.

हरजाई बनी, तोसे नाहीं बनी,

तू तो दीन की बीन बजावत है!

...ऐ निगोड़े, मैं ठहरी सियासत, मुझे तेरे चरम-ईमान से क्या काम? तेरे ग्राहकों के चैन-आराम से क्या निस्बत? मुझे बगलें गरमाने में मजा आता है, आज इसकी, कल उसकी हुई.

भठियारा बोला कि ऐ बीवी, शरीफों का चलन चल, नेकबख्त बन. बदी में मजा नहीं प्यारी, रग-रग, पोर-पोर में चुभन होगी, दामन चाक-चाक हो जाएगा.

मैना ने पूछा, तब!

तोता बोला : तब खूने-आशिक की हिना से रंगी उंगलियों को नचाकर, भंवें मटका, मुंह बिचकाकर बोली बी सियासत की ऐ मुए दाढ़ीजार, तुझे शायर का कलाम याद नहीं, कि गुलों से खार बेहतर हैं जो दामन थाम लेते हैं. फिर तेरे पास धरा ही क्या है? तेरे नाम की माला जपने से क्या हासिल? उधर बुल्लेशाह के लाखों मुरीद हैं, हिन्दी में, उर्दू में, तमिल, गुजराती, मराठी, बंगाली में, चीनी, जापानी में, अंग्रेजी में, रूसी, फ्रांसीसी में, गर्जे कि हर जबान में बुलबुले फूटते हैं. शाह का मंतर जमाने के सिर पर चढ़ के बोलता है. सुफेद कागज पर स्याह हुरूफों से ढलकर उनकी आवाज बुलन्द होती है. जिस पर उनकी मेहर की नज़र हो जाती है, वह तिल से ताड़ बन जाता है, और जिससे उनकी नज़र फिर जाती है वह सूरज की तरह रोशन होकर भी बुझा चिराग माना जाता है. ऐसे सनम के गले में बाहें डालकर मैं जो एक आह करूं तो गली-कूचों में शोर मच जाए, जो चाह करूं वह पूरी हो, जो गुनाह करूं वह छिप जाए, मेरी वाहवाही हो, मेरी धूम मच जाए. इसलिए ऐ निगोड़े मुए भठियारे मैं तुझे छोड़ चली, मुँह मोड़ चली...

जाके घर-घर में आग लगाऊंगी मैं.

तेरे खल्क को खाक बनाऊंगी मैं.

.

.

कहके बी सियासत ने अपनी ओढ़नी सम्हाली... तिरंगी छटा छहरी, सातों सितारे चमके, हिलाले ईद उगा, पट्टियाँ और धारियाँ लहराईं, हंसिया-हथौड़ा ठमका ... नजर जिसकी भी पड़ी उसी ने हाय भरी, कसके कलेजे को थामा, दुनिया दीवानी बनी, बी सियासत की ओढ़नी के गुन गाने लगी.

बोली मैना कि अय तोते, तेरा किस्सा आला है, तर्जेबयां निराला है, मगर यह क्या बात है कि हर वार बेचारी औरतजात पर है? अरे कुछ तो इन्साफ कर. मर्दों के कसूर को तू मर्द होने से मत माफ कर. कुछ तो बता कि बुल्लेशाह ने क्या किया?

तोता बोला कि अय मेरी प्यारी मैना, उतावली न दिखा, बेचैन न हो. सुन...

बोला बुल्लेशाह कि ऐ परी पैकर. फोटू तुम्हारी देखकर दिल पर हुआ असर. मैं भूल गया गैली प्रूफ, प्रेस का मैटर. अब तो रहम कर. मैं तोड़ता हूँ आज से नाता जहान से कलचर से, लिटरेचर से, दीनो ईमान से. तेरे ही गुण गाऊंगा ऐ बीवी सियासत. कदमों पे लुटा दूंगा मैं कुल अपनी रियासत. तू चल के बैठ तो जरा टाइपों के केस में, हर फ़ॉन्ट में, पैका मैं, हर पुर्जे के प्रेस में. फिर देख मेरे जौहर कि तेरे शौहर को नाकों चने न चबवा दूं तो मेरा नाम बुल्लेशाह नहीं, झब्बू!

सुन के बी सियासत मुसकराई, बुलाक की लटकन ने बल खाया. चितवन ने बांका वार किया, बुल्लेशाह के गले में बाहें डालकर बोलीं,

हमें तो अब किसी पहलू नहीं आराम आता है.

तुम्हीं इस दिल को ले लो ये तुम्हारे काम आता है.

अभी तो इब्तदाए इश्क है, अय हजरते ‘फरहत'

तुम्हारे समाने क्या देखना, अन्जाम आता है.

मगर अंजाम की परवा किसको है. तोते ने कहा कि अय मैना, यह हौसला मर्द का ही होता है, जिसने तिरछी नजर से वार किया उस पर दिलो जान सब निसार किया. एडीटर बुल्लेशाह की एड़ी जो तर हुई तो जोशेजुनूं में दहन फाड़कर चीखे कि ऐ मेरी प्यारी, तू देख मेरा करिश्मा. यों कहके गले लगाया. नाक पे चश्मा और कलम को म्यान से निकाल लिया. पश्चिम में बैठे और पूर्व में टांगें फैलाईं, उत्तर की ओर मुँह किया और दक्खिन में आग लगाई. यों चारों कोने जीतकर बोले वो एडीटर, अब तेरे लिए क्या करूं बोल ऐ मेरी जिगर. तू कह तो इलाही की मैं मूंछें उखाड़ लूं. दुनिया सरायफानी को पल में उजाड़ दूं. सूरज की राह रोक करूं चाँद को फना. दरिया को सोख लूं कि करूं आग को मना. तांबे में तेरे कर दिए प्रेसट्रस्ट-रायटर. तेरे गुलाम हो गए मेरे रिपोर्टर.

यह सुनकर सियासत की भठियारिन मुसकराई. पनडब्बा निकाला, दो बीड़े आप जमाए और जूठन बुल्लेशाह को इनायत की. बुल्लेशाह के सात पुरखे और आने वाली सात पीढ़ियाँ निहाल हो गईं. फिर कलम चूम के बी सियासत बोलीं कि ऐ मेरे पालतू बन्दर. बस मेरे इशारे पर चला कर. मैं जो कहूँ वही लिखा कर. गर सच को कहूँ झूठ तो तू झूठ बोल दे. हक के खिलाफ बोल... बस जिहाद बोल दे. मैंने भठियारे इलाही से बदला लेने की ठानी है. सरायफानी के मुसाफिरों को मिस्मार करने की मन्नत मानी है. तवारीव के वर्क यह साबित करते हैं कि सराय इलाही की है, औ' मुसाफिरों की बस्ती है. मगर मेरी निगाह में औकात हक की सस्ती है. मैं दौलत की बहन हूँ, उसकी अजीज हूँ. सोने की आब देख बनी मैं कनीज हूँ. इसीलिए ऐ प्यारे बुल्ले, तू फूट, हजार बार फूट. झूठ से अपने तन को काला कर. बहन दौलत बोलबाला कर. मैं हक का नाम ले के नाहक करूंगी शोर. मगर इस शोर को तू सच न समझना मेरे भोले बालम. यह मेरी चाल है, मेरी अदा है, मेरा चकमा है. मेरा दफ़्तर तो बस झूठ का महकमा है. दुनिया सरायफानी के गरीब मुसाफ़िरों के लिए मैं पकवान बनाऊंगी, मगर उन्हें दौलत के चहेतों को खिलाऊंगी. रिपब्लिक का नाच नाचूंगी, मगर पब्लिक को अंगूठा दिखाऊंगी. दौलत का हो गुलाम दुनिया का हर बशर. बस आज सियासत को है कोरी यही फिकर. तू एक काम कर. जो मेरी राह के रोड़े हैं उनको तबाह कर. कल्चर और लिटरेचर, आर्ट औ' साइन्स, हिस्ट्री और हक का फलसफा... ये मुए मेरी पोल खोलते हैं. तू इनकी कमर तोड़ दे ऐ मेरे प्यारे बुल्ले, इनकी खबरें न छाप, इनकी आँख फोड़ दे. इनमें से जो मेरे गुलाम बन जाएँ, उनकी वाह-वाह कर, बाकी को तबाह कर.

मैना बोली कि ऐ तोते, इसके बाद क्या हुआ. तोते ने आह भर कर कहा कि इसके बाद जो होना था वही हुआ. बी सियासत ने कमर लचकाकर तेगेनजर का वार किया और झुककर बुल्लेशाह को चूम लिया.

मैना ने फिर पूछा कि तब बुल्लेशाह ने क्या किया?

तोते ने जवाब दिया कि बुल्ला जवानी का मारा करता क्या! सियासत के जोबन से मख़मूर हुआ. हक से बहुत दूर हुआ. ईमान उनका चूर हुआ.

यह कहकर तोते ने एक ठंडी सांस ली, और दरख़्त की डाल पर अपनी गर्दन डाल दी. मैना से उसकी यह हालत देखी न गई. फुदककर उसके पास आई, चोंच से चोंच मिलाई और बोली कि न रो मेरे साथी, न रो मेरे हरदम. हक का दर्जा ऊँचा है. सराय इलाही की है, मुसाफिरों की बस्ती है. बी सियासत और बुल्ले की ये दास्ता निहायत सस्ती है. वक्त आएगा जब अक्ल आएगी. दुनिया में फिर से बहार आएगी. ये देख भोर हुआ. परिन्दों का शोर हुआ. आओ, हम इनके साथ हों. एक होकर आवाज़ बुलन्द करें. बी सियासत और बुल्लेशाह की हस्ती क्या है जो हमारी आवाज़ को दबा सकें.

यह कहके मैना ने तोते को उठाया, नया जोश दिया. फिर दोनों पंख फैलाकर ऊँचे आसमान में तेजी से उड़ चले.

***-***

(साभार, एक दिल हजार अफ़साने - अमृतलाल नागर की सम्पूर्ण कहानियाँ, प्रकाशक राजपाल एण्ड संज, कश्मीरी गेट, दिल्ली )

(चित्र - डॉ. प्रीति निगोरकर की कलाकृति. कैनवस पर तैलरंग)

चुटकुला # 0851

शर्मा जी अपने पड़ोसी के घर पहुंचे और बोले- देखिए आपके लड़के ने मेरे

कमरे का शीशा ईट मारकर तोड़ दिया।

पड़ोसी (शर्मा जी से)- आप उसकी हरकतो पर ध्यान मत दीजिए वह तो

पागल है।

शर्मा जी (पड़ोसी से) - तो फिर अपने मकान का शीशा क्यों नहीं तोड़ता?

पड़ोसी (शर्मा जी से)- क्योंकि वह इतना पागल भी नहीं है।

चुटकुला # 0852

एक कैदी (दूसरे कैदी से)- तुमसे कोई मिलने क्यों नहीं आता,क्या तुम्हारा

कोई रिश्तेदार नहीं है।

दूसरा कैदी- है तो, बहुत पर सारे इसी जेल में है।

चुटकुला # 0853

मां (बेटे से)- ‘तुम्हारा ऑफिस में काम कैसा चल रहा है?‘

बेटा (मां से)- ‘मेरे नीचे 25 आदमी काम करते है।‘

मां - ‘तो क्या तू अभी से अफसर हो गया?‘

बेटा- मां, ‘मैं ऊपर की मंजिल में काम करता हूं।‘

चुटकुला # 0854

प्रेमिका (प्रेमी से)- तुम इतने घबराये क्यों हो?

प्रेमी (प्रेमिका से)- मुझे एक व्यक्ति की ओर से धमकी भरा खत मिला है

कि मैंने उसकी पत्नी से मिलना नहीं छोड़ा तो वह मेरा खून कर देगा।

प्रेमिका (प्रेमी से)- तो फिर तुम उसकी पत्नी से मिलना क्यों नहीं छोड़

देते?

प्रेमी (प्रेमिका से)- पर धमकी भरा खत गुमनाम व्यक्ति ने लिखा है। मैं

कैसे जान सकता हूं कि उसकी पत्नी कौन है?

चुटकुला # 0855

मालिक (नौकर से)- ‘देखो मैं बाजार जा रहा हूं तुम दुकान का ध्यान

रखना। अगर कोई व्यक्ति आकर कोई आर्डर दे तो उसे पूरा करना।‘ कुछ

देर के बाद मालिक आया तो उसने नौकर से पूछा, ‘कोईर् आया था?‘

नौकर (मालिक से)- ‘जी हां आया था। उसने कहा कि दोनो हाथ ऊपर

उठाकर कोने में खड़े हो जाओ। मैंने ऑर्डर मान लिया और वह गल्ला

उठाकर चला गया।

चुटकुला # 0856

सेठ जी (नौकर से)- ‘तुमने आज मुझे नदी में डूबने से बचाया है। यह लो

दस रूपए का नोट। भुनाकर पांच रूपए तुम ले लो और पांच मुझे लौटा

दो।‘

नौकर - सेठ जी, यहां तो कोई दुकान भी नहीं है नोट कहां भुनाया जाए।

आप इसे अपने ही पास रख लीजिए। जब दोबारा डूबे तो मुझे दस रूपए

का नोट दे दीजिएगा।

चुटकुला # 0857

मोहन (अपने दोस्तो से शेखी बघारते हुए)- मैंने एक ही दिन में शेर की

गर्दन तोड़ दी, चीते के दो टुकड़े कर दिये और एक हाथी की टांग तोड़ दी।

दोस्त (हैरानी से)- फिर क्या हुआ?

मोहन - हुआ क्या? दुकानदार ने अपने खिलौनो की तोड़फोड़ के जुर्म में

मुझे जेल भिजवा दिया।

चुटकुला # 0858

पत्नी (पति से)- कितनी बार कहा है कि अपने बालों में खिजाब लगाओ,

बुड्‌ढे नजर आते हो।

पति (पत्नी से)- अरे भाग्यवान! अगर मैंने बालों में खिजाब लगा लिया तो

लड़कियो से बेधड़क बात नहीं कर पाऊंगा।

चुटकुला # 0859

भिखारी (राहगीर से) - जनाब मैं कोई मामूली भिखारी नहीं हूं। मैंने ‘रूपए

कमाने के 100 तरीके‘ नामक किताब लिखी है।

राहगीर (भिखारी से)- तो फिर तुम भीख क्यों मांगते हो?

भिखारी (राहगीर से)- क्योंकि यह उस किताब में बताया गया सबसे

आसान तरीका है।

चुटकुला # 0860

जज (चोर से) - तुम्हारी जेब में जो कुछ है, उसे निकालकर मेज पर रख

दो।

चोर (जज से)- यह तो सरासर नाइंसाफी है हुजूर। माल का आधा-आधा

होना चाहिए।

चुटकुला # 0861

प्रेमी (प्रेमिका से)- क्या तुम मुझसे शादी करोगी?

प्रेमिका (प्रेमी से)- नहीं मेरे यहां तो शादी घर वालो से ही होती है- मम्मी

की पापा से, भैया की भाभी से, चाचा की चाची से।

चुटकुला # 0862

मालिक (नौकर से)- ‘देखो मैं बाजार जा रहा हूं तुम दुकान का ध्यान

रखना। अगर कोई व्यक्ति आकर कोई आर्डर दे तो उसे पूरा करना।‘ कुछ

देर के बाद मालिक आया तो उसने नौकर से पूछा, ‘कोईर् आया था?‘

नौकर (मालिक से)- ‘जी हां आया था। उसने कहा कि दोनो हाथ ऊपर

उठाकर कोने में खड़े हो जाओ। मैंने ऑर्डर मान लिया और वह गल्ला

उठाकर चला गया।

चुटकुला # 0863

लड़की देखने गए एक परिवार के सामने लड़की के गुणो की प्रशंसा की जा

रही थी- ‘हमारी लड़की की आवाज कोयल जैसी है, उसकी गर्दन मोरनी

जैसी है, चाल हिरणी जैसी है और स्वभाव में गऊ जैसी है।‘

इस पर लड़के ने कहा- ‘जी इसमें कोई इंसानी गुण भी है क्या?‘

चुटकुला # 0864

वकील (गवाह से)- तुम गीता पर हाथ रखकर कहो, जो भी कहोगे सच

कहोगे, इसके सिवा कुछ भी नहीं कहोगे।

गवाह (वकील से)- नहीं वकील साहब, मैं गीता पर हाथ नहीं रखूंगा। मुझे

डर लगता है।

वकील - क्यों भई, गीता पर हाथ रखकर तुम्हें तो कसम खानी ही पड़ेगी।

गवाह - वकील साहब, दो वर्ष पूर्व मैंने पड़ोस में रहने वाली सीता पर हाथ

रखा था तो मुझे तीन साल की जेल की हवा खानी पड़ी थी। अब कही

गीता पर हाथ रखने पर मुझे उम्र कैद न हो जाये।

चुटकुला # 0865

एक पुलिस वाले ने रात के वक्त एक शराब पिए व्यक्ति को रोका और पूछा

कहां जा रहे हो?

व्यक्ति - मैं नशे से होने वाले नुकसान पर एक लेक्चर सुनने जा रहा हूं।

इस वक्त इतनी रात गए किसका लेक्चर है? पुलिस वाले ने पूछा।

व्यक्ति - ‘मेरी पत्नी और सास का।‘

चुटकुला # 0866

मैंनेजर ने अपने एक कर्मचारी के पिता को बुलाकर कहा- आपका लड़का

ऐसे काम कर रहा है, जैसे दस वर्ष से नौकरी कर रहा हो।

कर्मचारी के पिता ने पूछा- क्या वह इतने कम दिनो में ही अच्छा काम

करना सीख गया है?

‘जी नहीं, वह इतना अधिक आलसी हो गया है।‘ मैंनेजर ने जवाब दिया।

चुटकुला # 0867

आगरा से पागलो को हवाई जहाज में बिठाकर दिल्ली लाया जा रहा था।

पागल जहाज में हुड़दंग मचा रहे थे। उनमें से एक तो पायलट के कैबिन

में घुस गया और बोला, उठो जहाज मैं चलाऊंगा। पायलट ने हट्टे-कट्टे

पागल से उलझना ठीक न समझा और उससे कहा, ‘अगर तुम शोर मचा

रहे इन लोगो को शान्त कर दो तो मैं तुम्हें जहाज चलाने दूंगा।‘ पागल

कैबिन में चला गया और तीन-चार मिनट बाद आकर बोला, ‘लो शान्ति

हो गई है अब मुझे जहाज चलाने दो।‘ पायलट ने देखा सचमुच कोई

आवाज नहीं आ रही थी। उसने पागल से पूछा, ‘यह तुमने कैसे किया?‘

पागल बोला, ‘कुछ खास नहीं। जहाज उड़ रहा था मैंने उसका दरवाजा

खोलकर उनसे कहा उतरो हवाई अड्‌डा आ गया है और वे सब उतर गए।‘

चुटकुला # 0868

शराबी (अजय से ) - शराब से ज्यादा नुकसान तो पानी ने पहुंचाया है।

अजय (शराबी से)- नहीं भाई, आप गलत कह रहे है।

शराबी (अजय से)- क्यों भाई साहब, क्या पिछले साल बाढ़ से हजारो लोग

मरे नहीं थे?

चुटकुला # 0869

बॉस (स्टैनो से)- आज तुम फिर आधे घंटे देर से आयी। क्या तुम्हें मालूम

नहीं कि यहां पर काम कितने बजे से शुरू होता है।

स्टैनो (बॉस से)- मालूम नहीं सर दरअसल मैं जब भी यहां आती हूं लोगो

को काम करते हुए ही पाती हूं।

चुटकुला # 0870

बेटे को हाथो के बल घर में घुसते देखकर

बाप (बेटे से)- ‘बेवकूफ! यह क्या कर रहा है?‘

बेटा (बाप से)- आपकी आज्ञा का पालन कर रहा हूंं, पापा। आपने कहा

था न, अगर तू फेल हो गया, तो घर में कदम नहीं रखने दूंगा।

चुटकुला # 0871

मालिक (नौकर से)- ‘देखो मैं बाजार जा रहा हूं तुम दुकान का ध्यान

रखना। अगर कोई व्यक्ति आकर कोई आर्डर दे तो उसे पूरा करना।‘ कुछ

देर के बाद मालिक आया तो उसने नौकर से पूछा, ‘कोईर् आया था?‘

नौकर (मालिक से)- ‘जी हां आया था। उसने कहा कि दोनो हाथ ऊपर

उठाकर कोने में खड़े हो जाओ। मैंने ऑर्डर मान लिया और वह गल्ला

उठाकर चला गया।

चुटकुला # 0872

प्रेमी (प्रेमिका से) - तुम कितनी भोली हो क्या तुम मेरी आखाेे में मेरे

दिल का हाल नहीं पढ़ सकती?

प्रेमिका (प्रेमी से) - प्रेमिका ने शरारत भरे लहजे में कहा क्या तुम्हें पता

नहीं कि मैं अनपढ़ हूं।

दुकानदार (कारीगर से)- ‘क्या राय साहब के घर के दरवाजे की घंटी ठीक

कर आए?‘

कारीगर (दुकानदार से)- ‘कैसे करता? मैं काफी देर तक घंटी बजाता रहा,

पर किसी ने दरवाजा ही नहीं खोला।‘

चुटकुला # 0873

चित्रकार (ग्राहक से)- ‘साहब, मैं बेगम साहिबा की ऐसी तस्वीर बनाऊंगा,

जो बोल उठेगी।‘

ग्राहक (चित्रकार से)- ‘माफ करो भाई, इसने तो वैसे ही नाक में दम कर

रखा है। अगर इसकी तस्वीर भी बोलने लगेगी, तो जीना मुश्किल हो

जाएगा।‘

.

.

चुटकुला # 0874

एक औरत (राह चलते एक लड़के को सिगरेट पीते देखकर बोलती है) क्या

तुम्हारे मां बाप को पता है कि तुम सिगरेट पीते हो?

लड़का (औरत से) क्या आपके पति को पता है कि आप सड़क चलते किसी

भी अजनबी से बात करती है?

चुटकुला # 0875

मोहन (बॉस से) - सर मुझे अपनी बीबी के काम में हाथ बंटाना है।

इसलिए मुझे छुट्टी चाहिए।

बॉस (मोहन से) - छुट्टी बिल्कुल नहीं मिलेगी।

मोहन (बॉस से) - धन्यवाद सर, मैं जानता था कि मुसीबत में आप ही

मेरी मदद करेगे।

चुटकुला # 0876

बबलू (मम्मी से) - मम्मी प्लीज ये रस्सी अपनी जीभ से काट दो।

मम्मी (बबलू से) - बेवकूफ रस्सी जीभ से कैसे कट सकती है?

बबलू (मम्मी से) - क्यों? कल ही तो पापा कह रहे थे कि आपकी जुबान

कैची की तरह चलती है।

चुटकुला # 0877

जज (चोर से) - तुम्हारी जेब में जो कुछ है, उसे निकालकर मेज पर रख

दो।

चोर (जज से)- यह तो सरासर नाइंसाफी है हुजूर। माल का आधा-आधा

होना चाहिए।

चुटकुला # 0878

दो दोस्तो में किसी बात पर तू-तू-मैं-मैं हो गई। एक दोस्त दूसरे से बोला-

‘मैं अपनी बेइज्जती कराने यहां नहीं आया हूं।‘

दूसरे ने कहा- ‘तो आमतौर पर आप कहां जाते है?‘

चुटकुला # 0879

युवा फिल्म अभिनेता (प्रेमिका से)- आज तक मुझसे शादी के सैकड़ो

निवेदन किए जा चुके है।

प्रेमिका (अभिनेता से)- अच्छा, किस-किस ने निवेदन किया?

अभिनेता (प्रेमिका से) - ‘मेरे मम्मी और डैडी ने।‘ अभिनेता मुस्कराते हुए

बोला।

चुटकुला # 0880

शराबी (अजय से ) - शराब से ज्यादा नुकसान तो पानी ने पहुंचाया है।

अजय (शराबी से)- नहीं भाई, आप गलत कह रहे है।

शराबी (अजय से)- क्यों भाई साहब, क्या पिछले साल बाढ़ से हजारो लोग

मरे नहीं थे?

चुटकुला # 0881

मियां-बीवी में धन-दौलत की मिल्कियत को लेकर जबरदस्त कहा-सुनी हो

गई। बीवी ने गुस्से से कहा, ‘तुम्हारा इस घर में है क्या, जो कुछ है, सब

मेरे पिता ने दहेज में दिया है।‘

संयोगवश उसी रात घर में चोर घुस गए। बीवी की आंख खुल गई। वह

मियां को जगाने लगी, ‘जल्दी उठो, घर में चोर घुस आए है।‘

मियां ने करवट बदलते हुए कहा, ‘मैं क्यों उठूं, मेरा इस घर में है ही

क्या?‘

रेल के डिब्बे में एक सज्जन ने अपने सामने वाले व्यक्ति को चुपचाप बैठे

देखकर बातचीत करने के इरादे से कहा- भाई साहब आपका रूमाल नीचे

गिर गया है।

इस पर उस व्यक्ति ने कहा- मेरा रूमाल गिर गया है, इससे आपको क्या

मतलब? आपका कोट सिगरेट से जल रहा है, पर मैंने तो कुछ नहीं कहा।

चुटकुला # 0882

चार व्यक्तियो को अदालत में पेश किया गया। इल्जाम था कि वे पार्क में

बैठे जुआ खेल रहे थे। मजिस्ट्रेट ने बारी-बारी से उनसे पूछा। पहले ने

कहा, मैं उस दिन यहां था ही नहीं। सबूत के तौर पर अपने ट्रैवल एजेट से

रेल टिकट की रसीद दे सकता हूं।

दूसरा बोला - ‘उस दिन मैं घर पर बुखार में पड़ा था। डॉक्टर का

सर्टीफिकेट पेश कर सकता हूं।‘

तीसरे का जवाब था, ‘मैंने आज तक कभी जुआ नहीं खेला, ताश को हाथ

तक नहीं लगाया।‘

चौथा चुपचाप खड़ा रहा।

उससे पूछा, और तुम भी जुआ नहीं खेल रहे थे?

वह बोला, जी मैं अकेला जुआ कैसे खेल सकता हूं।

चुटकुला # 0883

एक छाताधारी सैनिक से उनके अफसर ने पूछा, ‘तुमने कितनी बार हवाई

जहाज से छलांग लगाई है।‘

‘केवल एक बार।‘ सैनिक ने उत्तर दिया।

‘लेकिन तुम्हारे सर्विस रिकार्ड में तो पन्द्रह बार लिखा हुआ है।‘

‘शेष चौदह बार तो मुझे धकेला गया था।‘ सैनिक ने कहा।

चुटकुला # 0884

जज (अभियुक्त से)- तुम्हारी पहली पत्नी की मौत कार दुर्घटना से हुई थी,

जबकि दूसरी पत्नी जहर खाकर मर गई। ऐसा क्यों हुआ?

अभियुक्त (जज से)- दूसरी पत्नी कार चलाना नहीं जानती थी।

चुटकुला # 0885

एक ग्राहक होटल के बैरे से- अरेे इस गिलास में पत्ता गिरा है।

बैरा (ग्राहक से) - इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है साहब, इस शहर में

हमारे होटल की कई शाखाएं है।

चुटकुला # 0886

एक शराबी बार में बैठा जोर-जोर से रो रहा था। पास बैठे रमेश को उस

पर दया आयी। पास आकर उसने सहानुभूति जतायी और शराबी से पूछा-

‘आप क्यों रो रहे है?‘

शराबी बोला ‘कल मुझसे एक बहुत बड़ी गलती हो गयी, मैंने अपनी पत्नी

को शराब की एक बोतल की एवज में बेच डाला।‘

रमेश - ‘तो तुम अब अनुभव कर रहे हो कि पत्नी को तुम्हारे पास होना

चाहिए?‘

शराबी - ‘हां, मैं उसकी कमी महसूस कर रहा हूं।‘

रमेश - उसे बेचने के बाद तुम्हें पता लगा होगा कि तुम उससे कितना

प्यार करते हो?‘

शराबी - ‘नहीं, नहीं, दरअसल अब मुझे फिर शराब की जरूरत महसूस हो

रही है।‘

चुटकुला # 0887

सड़क पर दो मजदूर काम कर रहे थे। एक गड्ढा खोदता दूसरा पीछे से

भर देता। एक आदमी बहुत देर से देख रहा था, उससे रहा नहीं गया।

उसने कहा- ‘ये आप लोग क्या कर रहे है?‘

गड्ढा खोदने वाला- ‘हम लोग सरकारी कर्मचारी है। अपना काम कर रहे

है।‘

मुसाफिर, ‘लेकिन यह कैसा काम है एक गड्ढा करता है दूसरा भर देता

है।‘

गड्ढा खोदने वाला- ‘दरअसल हमारी तीन लोगो की ड्‌यूटी है। मैं गड्ढा

खोदता हूं दूसरा पेड़ लगाता है तीसरा उसे बंद करता है। आज दूसरा यानी

पौधे रखने वाला व्यक्ति छुट्टी पर है।‘

चुटकुला # 0888

टिकट चैकर (यात्री से)- टिकट दिखाओ।

यात्री (झट जेब से निकाल कर)- यह लीजिए।

टिकट चैकर - यह तो प्लेटफार्म टिकट है।

यात्री- जहां मैं उतरूंगा वहां प्लेटफार्म तो होगा ही।

चुटकुला # 0889

रामनाथ बहुत घबराया हुआ थाने पहुंचा। थानेदार ने जब घबराहट का

कारण पूछा तो बोला, ‘मेरी पत्नी मायके गई हुई है। मैं आज सुबह जब

सोकर उठा तो देखा मेरे कमरे की अलमारी खुली थी, मेरा कीमती सामान

और रुपए चोरी हो चुके थे। सामान अस्त-व्यस्त था, संदूक टूटे हुए मिले।

मेरे ताेे हाथो के तोते ही उड़ गए......।‘

थानेदार ने कलम उठाई और तुरंत पूछा, ‘कुल कितने तोते थे?‘

चुटकुला # 0890

मालिक (नौकर से)- ‘देखो मैं बाजार जा रहा हूं तुम दुकान का ध्यान

रखना। अगर कोई व्यक्ति आकर कोई आर्डर दे तो उसे पूरा करना।‘ कुछ

देर के बाद मालिक आया तो उसने नौकर से पूछा, ‘कोईर् आया था?‘

नौकर (मालिक से)- ‘जी हां आया था। उसने कहा कि दोनो हाथ ऊपर

उठाकर कोने में खड़े हो जाओ। मैंने ऑर्डर मान लिया और वह गल्ला

उठाकर चला गया।

एक आदमी कब्रिस्तान से गुजर रहा था। उसने एक आदमी को कब्र पर

बैठे देखा। उसने कब्र पर बैठे व्यक्ति से पूछा, ‘तुम्हें यहां पर डर नहीं

लगता?‘

कब्र पर बैठा व्यक्ति बोला, डरने की क्या बात है। अंदर गर्मी लग रही थी

इसलिए बाहर आ गया।

चुटकुला # 0891

दिल्ली के सेठ जी के इकलौते बेटे को बहुत तेज रफ्तार से कार चलाने की

आदत थी। एक बार वह अपने दोस्तो के साथ पिकनिक मनाने आगरा

जाने लगा, तो सेठ जी से बोला- पिताजी, मेरी सलामती के लिए दुआ

कीजिएगा।

‘हां बेटा, लेकिन इस बात का ध्यान रखना कि मेरी दुआ की स्पीड 45

किमी. प्रति घंटे से ज्यादा की नहीं है।‘ सेठ जी बोले।

चुटकुला # 0892

थानेदार (देहाती से) - क्या तुम्हारे गांव में आग लग गई थी?

देहाती (थानेदार से) - जी हां, हजूर सारा गांव जल कर राख हो गया था।

थानेदार (देहाती से) - कुछ बचा भी?

देहाती (थानेदार से) - बस आग बुझाने वाली गाड़ी क्योंकि वह देर से आई

थी।

चुटकुला # 0893

पंकज (मीनू से)- मुझसे शादी करोगी?

मीनू (पंकज)- नहीं! हमारे यहां तो परिवार में ही शादी होती है....मम्मी

की पापा से.....भैया की भाभी से.....मामा की मामी से.......

रमेश (नेता जी से)- अरे, आपका लड़का फेल हो गया है और आप मिठाई

खिला रहे हो?

नेता जी - पास, फेल क्या मायने रखता है, बहुमत तो इसके साथ है।

पचास की कक्षा में पैतीस बच्चे इसके साथ फेल हुए है।

चुटकुला # 0894

रमा (हेमा से)- मैंने निश्चय कर लिया है कि जब तक मैं पच्चीस वर्ष की

नहीं हो जाती, शादी नहीं करूंगी।

हेमा (रमा से)- और मैंने भी निश्चय कर लिया है कि जब तक मेरी शादी

नहीं हो जाती, मैं पच्चीस वर्ष की ही नहीं होऊंगी।

चुटकुला # 0895

लेखक (मित्र से)- ‘दस साल लिखते रहने के बाद मुझे पता चला है कि

मुझमें साहित्य सृजन की प्रतिभा बिल्कुल नहीं है।‘

मित्र (लेखक से)- तो फिर तुमने लिखना छोड़ दिया?

लेखक (मित्र से)- ‘नहीं तब तक मैं काफी मशहूर हो चुका था।‘

चुटकुला # 0896

मालिक गुस्से में नौकर से- ‘मैं एक घंटे से घंटी बजा रहा हूं।'

नौकर तुरंत बोला- आप मालिक है। एक घंटे तो क्या आप सारे दिन घंटी

बजा सकते है।

चुटकुला # 0897

एक बॉस दूसरे बॉस से- तुम्हारा कर्मचारी इतना ईमानदार है, लेकिन तुम

हमेशा उसकी बुराई क्यों करते रहते हो?

बॉस - ताकि कोई उसे फुसलाकर न ले जाए।

चुटकुला # 0898

राकेश ने मुकेश से पूछा तुमने वाकई उस लड़की से शादी करने का पक्का

फैसला कर लिया है?

मुकेश - हां यार, अब मजबूरी है।

राकेश - कैसी मजबूरी है?

मुकेश -वह लड़की इतनी मोटी हो गई है कि मंगनी में जो अगूठी मैंने उसे

दी थी, वह उतरती ही नहीं है।

ड्राइंग रूम में सजे शेर को देखकर मेहमान ने मेजबान से पूछा, ‘बड़ा

सुन्दर शेर है। इसे कहां से लाये हो?'

मेजबान बोला, ‘श्रीलंका से, जब वहां मैं और चाचा शिकार खेलने गए थे।'

मेहमान - ‘इसके पेट में क्या भरा है?'

‘मेरे चाचा।' मेजबान बोला।

चुटकुला # 0899

एक सेठ जी अपने बेटे को स्कूल में दाखिल कराने गए तो प्रिंसीपल ने

कहा, ‘सेठ जी, आपने देर कर दी, अब तो कोई भी सीट खाली नहीं है।'

‘आप चिंता मत करे लड़के को दाखिल कर ले, बैठने के लिए कुर्सी मैं घर

से भेज दूंगा।'

चुटकुला # 0900

सेठ (खाने की थाली देखकर)- ‘इतनी महंगाई में रोटी पर इतना घी?'

नौकर (सेठ से)- ‘मालिक, माफ करे। शायद गलती से मेरी रोटी आपके

पास आ गई।'

.

प्रिय श्री कंप्यूटरजी

- गोपाल चतुर्वेदी

प्रिय श्री कंप्यूटरजी,

परलोकीप्रसाद का सादर वंदे स्वीकार हो.

आगे समाचार यह है कि परमेश्वर की कृपा से यहाँ सब आनंद-मंगल है. ऐसी ही कामना आपके लिए भी है. भारत ज्योतिष संघ ने अपनी साधारणसभा की अत्यावश्यक बैठक में यह निश्चय किया है कि मैं आपसे तत्काल संपर्क करूं. आपको पत्र लिखने के मूल में विशुद्ध ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' की भावना है. जैसा आपको विदित है, भारत अर्वाचीन और आधुनिक जीवन-शैली के सह-अस्तित्व का सबसे सशक्त उदाहरण है.

दिल्ली में जहाँ एक ओर परांठेवाली गली है, वहीं चाइनीज भोजन के पाँच-सितारा रेस्तरां भी हैं. कहीं कैबरे चल रहा है, कहीं कथा. तकनीकी कारखानों की आधारशिला भी शुभमुहूर्त के समय पूजा-पाठ के बाद, नारियल फोड़कर रखी जाती है. यह मिली-जुली संस्कृति हमारी सबसे महत्वपूर्ण धरोहर है. हजारों वैज्ञानिकों का अथक परिश्रम और लगन इसके लिए जिम्मेदार है, साथ ही हम पंडितों का संस्कार-प्रेम भी.

हाल ही में हमारे शांतिप्रिय देश में एक रक्तहीन क्रांति हुई है. नई सरकार और नए नेतृत्व का प्रादुर्भाव हुआ है. सुना है, इसमें आपकी बहुत चलती है. प्रत्याशियों के चयन से लेकर उनकी विजय तक पर आपका अदृष्ट प्रभाव है. ऐसे हमारे वर्ग ने भी हर आमचुनाव में यही काम सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. हमारे नियत क्षेत्र में आपके अचानक प्रवेश से हमें आशंका है कि कहीं इस देश की मिश्रित सांस्कृतिक विरासत पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े.

सदियों से हम निर्धन और धनवानों में समान रूप से आशा बांट रहे हैं और सटोरियों में नंबर. हमारी दरें देनेवाले की क्षमता के आधार पर लचीली अर्थात् समाजवादी है. समय के साथ हम भविष्यवक्ताओं, तांत्रिकों और पूजा-पाठियों का विशिष्ट वर्ग बन गया है. ऐसे में हमारा एकमात्र लक्ष्य जनता की सेवा है. संभव है, आप भी लोक कल्याण की भावना से प्रेरित होकर हमारे देश में पधारे हों. यदि ऐसा है तो आपकी उपस्थिति से हमें कोई एतराज नहीं. ‘अतिथि देवो भव'. आपका हम हृदय से स्वागत करते हैं.

जरूरी सिर्फ यह है कि हम व्यर्थ की पेशेवर प्रतियोगिता में न उलझें. एक डॉक्टर कभी भी दूसरे की भांजी नहीं मारता. एक के पास रोगी फंसा तो वह अपनी फीस सीधी कर दूसरे डॉक्टर के पास उसे अवश्य भेजता है. बहाना खून की जाँच का हो या एक्सरे का. यदि मरीज संपन्न हो तो चार-पाँच चिकित्सकों की टोली उस पर शोध करने लगती है. यह अपने पेशे के प्रति निष्ठा और सहयोगी भावना का आदर्श उदाहरण है. हमें भी ऐसा ही पारस्परिक सहयोग और सौहार्द बढ़ाना चाहिए. हम भी तो हम-पेशेवर लोग हैं. डॉक्टरों की आपसदारी श्लाघनीय और अनुकरणीय है. इससे आप भी पनपेंगे और हम भी फूलेंगे-फलेंगे. हमारा महत्व हमारे प्रतीक होने में है. हम अंजान आगत के, अज्ञान के जानकार होने का दम भरते हैं, आप तथ्यों के ज्ञान से भगवान होने का भ्रम. कभी-कभी आप जब वर्षा की भविष्यवाणी करते हैं तो दिन-भर सूरज चमकता है.

हमने अष्टग्रह योग में प्रलय की आशंका व्यक्त की. पर भारत को विनाश से बचाना था. निरंतर पूजा-पाठ से आसन्न संकट को टाल भी दिया. इसी कारण अलग-अलग हम आधे-अधूरे हैं. सिर्फ आपसी सहयोग से पूरे हो सकते हैं. मेरा विनम्र सुझाव है कि हम लोग आपस में अपने प्रभाव-क्षेत्र बांट लें और अपने निर्धारित दायरों में बिना समय खोए, कार्यरत हो जाएँ.

यों भी आप गरीबों की पहुँच के बाहर हैं. उनकी समस्याएँ और भाषा समझने के लिए हमारा अनुभव आवश्यक है. ऐसे देश का जन साधारण जीवन की कटु वास्तविकताओं से त्रस्त है. उसकी सेवा हम बेहतर कर सकते हैं, क्योंकि आप तथ्यों की नीरस गिनती गिनाते हैं जबकि हम सपने भुनाते हैं. इस परिप्रेक्ष्य में मेरा सुझाव है कि आप दफ़्तरों की देखभाल करें या प्रबंधकों और उनकी संस्थाओं की. व्यक्ति की उलझनें हम सुलझा लेंगे. यदि आप मेरे विचार से सहमत हों तो जन्म-पत्री बनाने और भविष्यफल देने का कार्य तत्काल रोक दीजिए. यह आपकी असाधारण प्रतिभा का सरासर दुरूपयोग है. अपने प्रस्तावित बंटवारे के अनुसार व्यक्ति हमारे हिस्से आते हैं और संस्थाएँ आपके.

मैं बहुत सोच-विचार के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ कि भारत की शहरी जनता क्रिकेट और राजनीति में बराबर की रूचि लेती है. दोनों अनिश्चय के खेल हैं और शायद यही उनकी लोकप्रियता का रहस्य हो. पता नहीं कब कपिलदेव बाहर हों और अब्दुल गफ़ूर अंदर. भारत ज्योतिष संघ भारतवाषियों के यह दोनों प्रमुख मनोरंजक शौक आपको सौंपने को प्रस्तुत है. आप ही अपनी असामान्य प्रतिभा से पता लगा सकते हैं कि क्या भारतीय क्रिकेट का भविष्य भी प्रमुख विरोधी दलों के समान है और अब अगले पाँच वर्ष तक जीत की आशा व्यर्थ है?



.

.

जहाँ तक राजनीतज्ञों का प्रश्न है, हमें सम्मिलित प्रयास करना चाहिए. प्रजातंत्र में स्वस्थ विरोध का होना आवश्यक है. इस संदर्भ में हम विरोधी नेताओं को निराश न होने देने का जिम्मा लेते हैं. प्रधान-मंत्री के करीब होने के कारण सत्ता पक्ष आपका दायित्व है. उनकी नियति के निर्णय की जैसी सूचना आप देंगे, हम उनका वैसा ही भविष्य बताएंगे. यह ‘चढ़ावा' भी अच्छा खासा देते हैं. जो भी मिलेगा, उसमें फ़िफ़्टी-फ़िफ़्टी पक्का रहा. फ़ायदे के सौदे का बराबर बंटवारा करने के प्रस्ताव को आप हमारी नेकनीयती का सबूत मान सकते हैं. यकीनन आप हमारे मित्रता के बढ़े हाथ को स्वीकार करेंगे. यह निर्विवाद है कि पढ़े लिखे लोग आपकी बौद्धिक प्रतिभा के कायल हैं. हमारी सरकार भी आपको आधुनिक प्रगति का पर्याय मानती है. पर भारत गांवों में बसता है. जनमानस में स्थापित होने के लिए आपको हमारी सहायता की आवश्यकता है. यदि आप हमसे सहयोग करे तो हम पूरे देश में आपका डंका बजवा देंगे. भारत ज्योतिष संघ हर गांव में एक कंप्यूटर-मंदिर बनवाने को प्रस्तुत है. लोग आज जैसे हनुमानजी की शरण में जाते हैं, वैसे ही आपके दर्शन को जाएंगे. मन्नतें मानेंगे, चढ़ावा चढ़ाएंगे. हमारा पुजारी प्रसाद पाएगा. नाम आपका, नामा हमारा! आप करोड़ों देवताओं की श्रेणी में आ जाएंगे.

हमारे देश में बरसात में बाढ़ अनिवार्य है और गर्मियों में सूखा. वर्षा कितनी होनी चाहिए, सामूहिक भविष्य के दायित्व के अंतर्गत आप निर्धारित करेंगे. कृषि मंत्रालय को दिए गए आपके आंकड़ों को पूजा-पाठ-हवन आदि से हम सच करेंगे. देश की तरक्की ऐसे ही टीम-वर्क पर निर्भर है. आप हमारी ओर से प्रधानमंत्री को सुझाव दे सकते हैं कि आपको देश में लाने में जितनी विदेशी मुद्रा खर्च होगी, हम अर्थात् ज्योतिषियों, तांत्रिकों और पंडितों को बाहर भेजकर कमाई जा सकती है. जैसा आप जानते ही हैं, अधिकतर पाँच सितारा होटलों में एक ज्योतिषी रहता है. सब विदेशी पर्यटक उसके आगे हाथ फैलाते हैं. यदि हम विदेशों में भविष्य बताने के कैंप लगाएँ तो कमाई की कल्पना की जा सकती है. देश का भविष्य बन जाएगा, अपना और आपका भी. हमारे पास देश की प्रगति की कई योजनाएं हैं. गैस कांड और जासूसी न दोहराई जाए इसकी भी. हम सरकार के साथ अवैतनिक सलाहकार के रूप में जुड़ने को तैयार हैं. सब सरकारी कर्मचारियों की कुंडली बाँचेंगे और पाप ग्रहवालों की छुट्टी करवा देंगे. आम शिकायत है कि सरकारी नौकर कार्यकुशल नहीं हैं. यदि चयन में हमें शामिल किया जाए तो हम जन सेवा की भावना से ओतप्रोत लोगों को छांट देंगे. शुभ ग्रहों से प्रभावित व्यक्ति क्या खाक जन-सेवा करेंगे.

आप विश्वास मानिए, ऐसे लोकोपयोगी कार्यों के लिए हमारी सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध हैं. यदि आप हमसे सहयोग करना चाहते हैं तो सूचित करें. शुभ मुहूर्त में हम साथ बैठकर विचार-विमर्श कर सकते हैं.

उत्तर की प्रतीक्षा में,

आपका हमपेशा

परलोकीप्रसाद

****-****

साभार- दुम की वापसी - व्यंग्य संकलन, गोपाल चतुर्वेदी, प्रकाशक - प्रभात प्रकाशन, चावड़ी बाजार दिल्ली 110006.

बगिया


- कुसुम लता त्यागी

बगिया में कोयल कूके है ,

कुहु कुहु ओहो कुहु कुहु

ये मंत्र कानों में फूंके है ,

तु ही तु है ओहो तु ही तु है


आकाश में पंछी डोले हैं ,

फुर फुर फुर ओहो फुर फुर फुर

संगीत मिलन का बोले है ,

तू ही तू है ओहो तू ही तू है


पपिहा ये बूंद को तरसे है ,

कहे पिया पिया ओहो पिया पिया

ये तुझसे मिलन के नगमें हैं ,

कहे मोरा जिया ओहो मोरा जिया


फूलों पर भौंरे गूंजे हैं ,

गुन गुन गुन ओहो गुन गुन गुन

ओंकार की सुन्दर की गूंजें हैं ,

सुन सुन सुन ओहो तू भी तो सुन


आकाश में बादल गरजें हैं ,

उमड़ घुमड़ ओहो उमड़ घुमड़

वो भी तो पी से मिलने का ,

सुर है सुन्दर ओहो अति सुन्दर


बादल से पानी बरसे है ,

छम छम छ म ओहो छम छम छम

भक्तिन देवालय जाए है ,

कहे थम थम थम ओहो थम थम थम

**-**


चित्र : रवि

.

.


बैंक लोन
डा कान्ति प्रकाश त्यागी

खाने के बाद सोया ही था, अचानक बजने लगा टेलिफ़ोन ,
घबरा कर उठा, फ़ोन उठा कर पूछा, हैलो ! आप हैं कौन ?
नमस्कार, मैं हूँ, यूनियन बैंक आफॅ इंडिया से के के ज़ोन,
कहिए मि ज़ोन !, हम बैंक से दिलाते हैं सस्ती दर पर लोन


यदि आप कवारे हैं, तो मैरिज़ के लिए लोन ले सकते हैं
हनीमून के लिए, विलिगंटन अथवा वाशिंगटन जा सकते हैं
ग्रीष्म अवकाश के लिए, होनूलूलू एवं टिम्बकटू जाइए,
पर्यटन के लिए, ओसाका और लूसाका जाइए


तलाकशुदा से शादीशुदा, शादीशुदा से तलाकशुदा बनायेंगे ,
बैंक से लोन दिलाकर, आपका जीवन सुखी बनायेंगे
आपको कुछ नहीं करना है ,
घर बैठे ही फार्म भरना है


यदि आपकी कन्या विवाह योग्य है, तो "कन्या विवाह लोन" लीजिए,
यदि विवाह योग्य नहीं, तो विवाह योग्य बनाने के लिए लोन लीजिए
बच्चों को दिलानी हो, प्रसिद्ध संस्थानों की उच्च शिक्षा ,
राष्ट्रीय अथवा अंतर्राष्ट्रीय स्थानों की पूर्ण दीक्षा


तुमको क्या मतलब ?, हमें उनको चोर बनाना है,
उसके लिए भी तो जनाब आपको लोन लेना है
आजकल गली नुक्कड़ के चोर उचक्कों से काम नहीं चलना है,
प्रतिस्पर्धा के युग में, अंडरवर्ल्ड का बहुत बड़ा डॉन बनना है


चाकू, तमंचे बेकार हो गए, AK-४७ एवं बंब चाहिए,
इनको प्राप्त करने के लिए धन, धन के लिए, लोन चाहिए
चाहे आप नेता हो अथवा अभिनेता, बेहरूपियेपन की ट्रेनिंग चाहिए
ट्रेनिंग व शिक्षा के लिए भी धन , धन के लिए लोन चाहिए


हमारे अनेक विदेशों से सम्पर्क हैं ,
नई तकनीक के विषय में सतर्क हैं
आपको हथियारों की ट्रेनिंग व लाइसैन्स दिलायेंगे ,
बैंक से सस्ती से सस्ती दर पर लोन दिलायेंगे


यदि आपको, नया मकान, दुकान,टी वी, फ़्रिज़,कार, AC लेना है,
तो देर किस बात की, आपको सिर्फ़ एक फ़ोन ही घुमाना है
यदि उपरोक्त सामान का रिनोवेशन कराना है,
उसके लिए भी हमको लोन उपलब्ध कराना है


हां तो त्यागी साहब, आप क्यों हैं बिल्कुल मौन ?
आप ही बोलते रहे, मौक़ा ही कब दिया मि जौन
ईश्वर की कृपा है, बस इस जन्म में कुछ नहीं चाहिए,
अगले जीवन का क्या भरोसा, उसके लिए लोन चाहिए

.

.

डॉ. कान्ति प्रकाश त्यागी की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें :

1 बीवी

2 हास्य कविता

.
1001 चुटकुले - पीडीएफ़ ई-बुक डाउनलोड
सुहैब ने रचनाकार के कुछ पुराने चुटकुलों की कड़ियों के बारे में पूछा था. दरअसल, अनुगूंज के एक आयोजन के तहत 1001 चुटकुलों के संग्रह की कवायद की गई थी, जिसे रचनाकार में समय समय पर प्रकाशित किया गया था. इसे आप नीचे सीधे ही पढ़ सकते हैं -

.
इन 1001 चुटकुलों की ई-बुक पीडीएफ़ ई-बुक को आप यहां से डाउनलोड कर सकते हैं:
http://issuu.com/ravishankarshrivastava/docs/1001-hindi-jokes-e-book?mode=window&viewMode=singlePage&backgroundColor=%23222222

रचनाकार के चुटकुले
.

.

चुटकुला # 0801

(एक यात्री ट्रेन से यात्रा कर रहा था, तभी टिकट चेकर आता है...)

टिकट चेकर (यात्री से)- टिकट दिखाओ?

यात्री (टिकट चेकर से)- नहीं है।

टिकट चेकर (यात्री से)- कहां जाना है?

यात्री (टिकट चेकर से)- वही जहां राम पैदा हुए थे।

टिकट चेकर (यात्री से)- अब चलो मेरे साथ।

यात्री (टिकट चेकर)- कहां?

टिकट चेकर (यात्री से)- जहां श्रीकृष्ण पैदा हुए थे।

चुटकुला # 0802

अभिनेता (डायरेक्टर से)- डायरेक्टर साहब, इस फिल्म में मेरा किरदार

एक पागल का है। मुझे इसमें जान डालने के लिए क्या करना चाहिए?

डायरेक्टर (अभिनेता से)- कुछ नहीं, तुम बिल्कुल वैसे ही हो, जैसा तुम्हें

रोल मिला है।

चुटकुला # 0803

एक साहब कपड़े की दुकान पर कपड़ा लेने आए और वह कपड़े की

क्वालिटी तथा उसकी गारंटी के बारे में पूछताछ कर रहे थे। दुकानदार ने

उनसे पूछा भाई साहब आखिर आपको कितना कपड़ा चाहिए।

साहब बोले- मुझे केवल आधा मीटर कपड़ा टोपी बनाने के लिए चाहिए।

दुकानदार ने उनको आधा मीटर कपड़ा दे दिया तो साहब फिर बोले- इस

कपड़े की गारंटी क्या है?

दुकानदार झल्लाकर बोला- आपका सिर फट सकता है पर इस कपड़े की

बनी टोपी नहीं फट सकती।

चुटकुला # 0804

मच्छर का खून करने के इल्जाम में चीटी को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस वाले चीटी से पूछते है, तुमने रात को ऐसा क्या किया कि मच्छर

मर गया?

चीटी बड़ी मासूमियत से कहती है, कुछ भी नहीं। मैं तो बस रात को

मोर्ट्रीन जलाकर सोई थी।

चुटकुला # 0805

मुकेश की पत्नी उसकी शराब पीने और जुआ खेलने की आदत से काफी

परेशान थी। एक रोज दोनो बाजार से गुजर रहे थे कि तभी एक भिखारी

उनके पास आया और एक रुपया मांगने लगा।

मुकेश- क्या तुम जुआ खेलते हो, शराब पीते हो?

भिखारी- जी नहीं साहब।

मुकेश (अपनी पत्नी की ओर देखते हुए)- देखा जो लोग सिगरेट शराब नहीं

पीते और जुआ नहीं खेलते हैं उनकी यही हालत होती है।

चुटकुला # 0806

एक भोले भाले ग्रामीण ने गांव के पंच को दावत देनी चाही। वह पंच के

पास पहुंचा और बोला- आपको खाने में क्या पसंद है?

पंच ने कहा- मछली।

लेकिन मेरी बीवी को तो मछली पकाने की विधि नहीं आती। ग्रामीण ने

कहा।

इस पर पंच ने एक कागज पर मछली पकाने की विधि लिख दी। वह

आदमी मछली खरीद कर घर जा रहा था। रास्ते में एक चील मछली को

झपट ले गयी।

इस पर वह बोला- ले जा, ले जा। विधि तो मेरे पास है, पकायेगी कैसे?

साधू- हे भगवान! तू मुझे दर्द दे, दुख दे, सारे संसार का गम दे।

चेला- बाबा, इतनी सारी डिमांड की क्या जरूरत है। इन शॉर्ट एक अदद

बीवी मांग लीजिए।

चुटकुला # 0807

बांकेलाल (प्यारेलाल से)- यार मैं सोचता था कि इस दुनिया में सिर्फ मैं

ही उल्लू हूं।

प्यारेलाल (बांकेलाल से)- क्यों क्या हुआ?

बांकेलाल (प्यारेलाल से)- कल मैंने अपनी पत्नी को कश्मीरी सेब लाने को

कहा था।

प्यारेलाल (बांकेलाल से)- तो क्या हुआ?

बांकेलाल (प्यारेलाल से)- आज कश्मीर से फोन आया कि उसने सेब खरीद

लिए है।

चुटकुला # 0808

जज (फरियादी से)- एक जैसी सैकड़ो भैसो में से तुमने अपनी भैस को

किस तरह पहचान लिया?

फरियादी (जज से)- यह कौन सी बड़ी बात है मालिक! आपकी कचहरी में

सैकड़ो काले कोट पहने वकील है, फिर भी मैं अपने वकील को पहचान

लेता हूं।

चुटकुला # 0809

ज्योतिषी (एक स्त्री से)- तुम अपने पति का भविष्य जानना चाहती हो?

स्त्री (ज्योतिषी से)- नहीं, इनका भविष्य तो मेरे हाथ में है। फिलहाल तो

आप उनका भूतकाल बताइए।

चुटकुला # 0810

एक दुकानदार ने अपने सेल्समैंन को बुलाया और पिछले दिन की बिक्री

देखकर बोला- कल एक ही दिन में सिर दर्द की दो हजार गोलियां कैसे

बिक गई?

सेल्समैंन (दुकानदार से)- जी, कल दुकान के सामने वाले मैंदान में कवि

सम्मेलन का आयोजन था।

चुटकुला # 0811

एक पंडित जी, सेठजी और चोर एक वक्त में चल बसे। भगवान ने तीनो

को फिर से धरती पर भेजने से पहले उनकी इच्छा पूछी।

पडित जी बोले - मुझे तो किसी बड़े से मंदिर में भेज दीजिए।

सेठ जी बोले- मुझे ढेर सारी दौलत देकर बड़े शहर में भेज दीजिए।

चोर ने भगवान जी से धीरे से कहा - आप तो इस सेठ काेे जहा भी

भेजे, बस....वहां का पता मुझे बता दीजिएगा।

चुटकुला # 0812

थानेदार (थाने में आने वाले व्यक्ति से)- कहिए जनाब आपका क्या खो

गया?

व्यक्ति-पहले याददाश्त खो गई। अब घर नहीं मिल रहा है।

चुटकुला # 0813

राम (श्याम से)- जब पिछले साल हम मुंबई गए थे तब कौन से होटल में

ठहरे थे?

श्याम (राम से)- जरा रुको, चम्मच देखकर बताता हूं।

चुटकुला # 0814

भिखारी (शर्मा जी से) -दो दिन से भूखा हूं साहब कुछ मदद करो।

शर्मा जी (भिखारी से)- तुम भिखारी तो नहीं लगते। ये लो दस का नोट

और बताओ तुम्हारी ये हालत कैसे हुई?

भिखारी (शर्मा जी से)-जी मैं भी आपकी तरह फिजूलखर्च था।

चुटकुला # 0815

नगर परिषद चुनाव में एक उम्मीदवार का चुनाव चिह्न साइकिल था। रात

के समय घरो में वोट मांगते समय एक बुढ़िया को घर के दरवाजे में बैठे

देखकर कहा, ‘माता जी साइकिल का ध्यान रखना।

बुढ़िया ने कहा, ‘बेटा दरवाजे के अंदर खड़ी कर दो, बाहर से कोई उठा न

ले जाये।

किरायेदार (मकान मालिक से)- इस महीने मैं आपको मकान का किराया

नहीं दूंगा।

मकान मालिक - यही बात तुमने पिछले महीने भी कही थी।

किरायेदार - तो क्या हुआ, मैं तो अपना वचन निभा रहा हूं।

चुटकुला # 0816

न्यायधीश (चोर से)- ‘ठीक-ठीक बताओ कि तुमने चोरी की या नहीं?‘

चोर (न्यायधीश से)- ‘पर सरकार, मैं कैसे बता सकता हूं?‘

न्यायधीश (चोर से)- ‘क्यों नहीं बता सकते?‘

चोर (न्यायधीश से)- ‘यह तो मेरा वकील ही बताएगा। इसी काम के लिए

ही तो मैंने फीस भरी है।‘

चुटकुला # 0817

यात्री (रेल के गार्ड से)- ‘मैं चाय पीना चाहता हूं। कोई ऐसा उपाय बताइए

कि मेरे आने तक गाड़ी न चले।‘

गार्ड (मुस्कराकर)- ‘बड़ा सरल उपाय है। मुझे भी अपने साथ ले चलिए।‘

चुटकुला # 0818

जज (अभियुक्त से)- ‘अपने को निर्दोष साबित करने के लिए तुम्हारे पास

अब क्या बचा है?‘

अभियुक्त - ‘सच है हुजूर, मेरे पास जो था, वह वकील साहब को मैंने फीस

में दे दिया।‘

चुटकुला # 0819

मालिक (नए चपरासी से)- तुम्हें मैंनेजर ने काम समझा दिया है न?

चपरासी (मालिक से)- जी हां, उन्होने समझा दिया है कि जब आप दफ्तर

में आएं तब मैं उन्हें जगा दिया करूं।

चुटकुला # 0820

दो मूर्ख वार्तालाप कर रहे थे।

पहला बोला- ‘यदि वृक्ष पर हाथी चढ़ जाए और वहां से नीचे उतरना चाहे

तो उसे क्या करना चाहिए?‘

दूसरा मूर्ख बोला- ‘हाथी को वृक्ष की टहनी पर बैठकर पतझड़ के आने की

प्रतीक्षा करनी चाहिए।‘

चुटकुला # 0821

एक ग्राहक ने होटल के मैंनेजर से शिकायत की- ‘बाथरूम में यह तौलिया

तो बहुत गंदा है आपको इतना गंदा तौलिया यहां नहीं रखना चाहिए था।‘

मैंनेजर हैरान होकर बोला- ‘कमाल है, अब तक बीसियो आदमी इससे हाथ

पोंछ चुके है। किसी ने शिकायत नहीं की। और आप कहते है कि यह

तौलिया गंदा है!‘

चुटकुला # 0822

भाभी (देवर से)- तुम कुंवारे हो। तुम भला महिलाओ के बारे में क्या

जानो।

देवर (भाभी से)- मैं महिलाओ के बारे में सब कुछ जानता हूं। इसीलिए तो

अभी तक कुंवारा हूं।

चुटकुला # 0823

मच्छर का खून करने के इल्जाम में चीटी को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस वाले चीटी से पूछते है, तुमने रात को ऐसा क्या किया कि मच्छर

मर गया?

चीटी बड़ी मासूमियत से कहती है, कुछ भी नहीं। मैं तो बस रात को

मोर्ट्रीन जलाकर सोई थी।

चुटकुला # 0824

चोर एक घर का ताला तोड़ रहा था जैसे ही ताला टूटा चोर के पीछे एक

आहट हुई। चोर ने जैसे ही मुड़कर देखा घर का मालिक उसके पीछे खड़ा

था। चोर घबरा गया।

मकान मालिक उसे तसल्ली देता हुआ बोला, ‘मैं तुम्हारा बहुत आभारी हूं

क्योंकि इस ताले की चाबी मुझसे कही खो गई थी।

सेठानी ने नौकरानी से परेशान होकर कहा, ‘अपनी तनख्वाह से ज्यादा के

तो तू बर्तन तोड़ देती है। बता अब मैं क्या करूं?‘

नौकरानी ने कहा- ‘मेरी तनख्वाह बढ़ा दे मालकिन।‘

.

.

चुटकुला # 0825

मालिक (नए चपरासी से)- तुम्हें मैंनेजर ने काम समझा दिया है न?

चपरासी (मालिक से)- जी हां, उन्होने समझा दिया है कि जब आप दफ्तर

में आएं तो मैं उन्हें जगा दिया करूं।

चुटकुला # 0826

भाभी (देवर से)- तुम कुंवारे हो। तुम भला महिलाओ के बारे में क्या

जानो।

देवर (भाभी से)- मैं महिलाओ के बारे में सब कुछ जानता हूं। इसीलिए तो

अभी तक कुंवारा हूं।

चुटकुला # 0827

किरायेदार (मकान मालिक से)- इस महीने मैं आपको मकान का किराया

नहीं दूंगा।

मकान मालिक (किरायेदार से)- यही बात तुमने पिछले महीने भी कही

थी।

किरायेदार - तो क्या हुआ, मैं अपना वचन ही तो निभा रहा हूं।

चुटकुला # 0828

अफसर ने रामलाल से कहा, ‘मैंने कहा न, कोई जगह खाली नहीं है।

नौकरी के लिए इतनी अर्जियां आती है कि संभाले नहीं संभलती।‘

रामलाल, ‘तो साहब! ऐसा करे कि मुझे इन अर्जियो को सम्भालने की

नौकरी दे दे।

चुटकुला # 0829

मालिक (नौकर से)- ‘इन सारे मच्छरो को मार दो।' फिर थोड़ी देर बाद

बोला, ‘तुमने इनको मारा नहीं इनकी भिनभिनाहट सुनकर मेरे कान पक

गए है।'

नौकर (मालिक से)- ‘मच्छरो को तो मैंने कभी का मार दिया। ये तो

उनकी विधवाएं है जो उनकी याद में विलाप कर रही है।'

चुटकुला # 0830

एक व्यक्ति अपने घर में चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंचा, तो

दरोगा बोला- ‘कितने बजे थे?‘

उस व्यक्ति ने जवाब दिया- ‘जी चार लट्‌ठ मुझ पर बजे थे और पांच मेरे

भाई पर।‘

दरोगा ने झल्लाते हुए कहा- ‘मैं यह पूछ रहा हूं कि घड़ी में कितने बजे

थे?‘

वह व्यक्ति फिर बोला- जी घड़ी तो एक लट्ठ पड़ते ही टूट गई थी।

चुटकुला # 0831

मोहन (रमेश से)- मेरी बेटी का संगीत अभ्यास मेरे लिए लाभकारी सिद्ध

हुआ।

रमेश (मोहन से)- वह कैसे?

मोहन (रमेश से)- मेरा पड़ोसी इसी कारण मकान आधे दामो पर बेच गया

और मैंने उसे खरीद लिया।

चुटकुला # 0832

एक कैदी (दूसरे कैदी से)- तुमसे कोई मिलने नहीं आता है, क्या तुम्हारा

कोई रिश्तेदार नहीं है।

दूसरा कैदी- है तो बहुत, मगर सारे इसी जेल मेे है।

चुटकुला # 0833

संपादक (उम्मीदवार से)- तो तुमने प्रूफरीडर के पद के लिए अप्लाई किया

है। जानते हो, यह कितनी बड़ी जिम्मेदारी है?

उम्मीदवार (संपादक से)- जी सर, अच्छी तरह जानता हूं। आप जो भी

गलती करेगे, उसका दोष मेरे माथे मढ़ेगे और मैं चुप रहूंगा।

जज (चोर से) - अच्छा बताओ, तुमने चोरी की या नहीं?

चोर (जज से)- पर साहब, मैं कैसे बताऊं? यह तो मेरे वकील ही बताएंगे।

इसी के लिए तो मैंने उन्हें फीस दी है।

चुटकुला # 0834

मशीन पर काम कर रहे एक आदमी की उंगली कट गई तो वह चिल्लाने

लगा। वहां भीड़ इकट्ठी हो गई।

तभी उस फैक्टरी का मालिक वहां आया व पूरा मामला देखकर बोला,

‘कमाल है! एक उंगली कट गई तो इतना हंगामा खड़ा कर दिया, जबकि

पिछले महीने ही एक मजदूर की गर्दन मशीन में आ गई थी तो उसने तो

चूं तक नहीं की थी।‘

चुटकुला # 0835

मालिक (नौकर से)- देखो मैं बाजार जा रहा हूं तुम दुकान का ध्यान

रखना। अगर कोई व्यक्ति आकर कोई आर्डर दे तो उसे पूरा करना। कुछ

देर के बाद मालिक आया तो उसने नौकर से पूछा, ‘कोई आया था?‘

नौकर (मालिक से)- जी हां आया था। उसने कहा कि दोनो हाथ ऊपर

उठाकर कोने में खड़े हो जाओ। मैंने आर्डर मान लिया और वह गल्ला

उठाकर चला गया।

चुटकुला # 0836

एक भिखारी ने घर में आवाज लगायी- बाबू जी रोटी मिल जाएगी?

अंदर से आवाज आयी- बीबी घर में नहीं है।

भिखारी - बाबू जी मुझे बीबी नहीं, रोटी चाहिए।

चुटकुला # 0837

महेश (मुकेश से)- मुकेश तुम अपनी कंपनी के एक सफल एजेट हो।

तुम्हारी सफलता का राज क्या है?

मुकेश (महेश से)- जी, जब भी मैं किसी के दरवाजे पर दस्तक देता हूं तो

अंदर से किसी भी उम्र की महिला निकले मैं उससे यही कहता हूं कि मिस

आपकी मम्मी घर में हैं?

चुटकुला # 0838

राकेश (महेश से)- अखबार में पढ़ा है कि तुम्हारी सेठानी मर गई है।

महेश (राकेश से)- हां भई, मर गई। पिछले पांच वर्ष से मैं बुढ़िया की

बिल्लियो पर प्यार लुटा रहा था ताकि वसीयत लिखते समय उसे मेरा

ध्यान भी रहे।

राकेश (महेश से)- तब तो मालामाल हो गए होगे। क्या मिला तुम्हें?

महेश (राकेश से)- उसकी सारी बिल्लियां।

चुटकुला # 0839

जेबकतरा (अपने दोस्त से)- यार मुझे सर्दी का मौसम बिल्कुल अच्छा नहीं

लगता।

दोस्त (जेबकतरे से)- क्यों?

जेबकतरा (दोस्त से)- क्योंकि सभी लोग अपनी जेबो में हाथ डालकर

चलते है।

चुटकुला # 0840

एक महिला (पड़ोसन से)- अरे बहन जरा जल्दी अपना बेलन तो देना।

‘वो‘ आ गए है।

पड़ोसन (बेलन देते हुए)- अच्छा ले जाओ! लेकिन जल्दी वापस कर देना

क्योंकि चिंटू के पापा के भी आने का वक्त हो गया है।

चुटकुला # 0841

ज्योतिषी (महिला से) - तीन माह बाद आपके पति का साया आपके सिर

से उठ जाएगा।

महिला (ज्योतिषी से)- लेकिन उन्हें मरे हुए चार वर्ष बीत गए है।

ज्योतिषी (महिला से)- तब आप बड़े भाई की छाया से वंचित हो जाएंगी।

महिला (ज्योतिषी से)- लेकिन मैं तो इकलौती संतान हूं।

ज्योतिषी (महिला से)- ‘तो फिर आपका छाता जरूर खो जाएगा।‘

ज्योतिषी ने खीझकर कहा।

चुटकुला # 0842

मैंनेजर (अपनी खूबसूरत टाइपिस्ट से)- रात सपने में मैंने दुनिया की

सबसे खूबसूरत लड़की से शादी कर ली।

इतना सुनते ही टाइपिस्ट ने झेपते हुए पूछा- तो क्या बॉस, हम दोनो खुश

थे।

चुटकुला # 0843

दो महिलाएं आपस में बातचीत कर रही थीं।

पहली बोली- मेरे पति दिन भर में बहुत से भूखे लोगो को खाना खिला

देते है।

हां बहन, आजकल देवता जैसे लोग मिलते ही कहां है। तू बहुत ही

भाग्यवान है, जो तुझे ऐसे पति मिले है। वैसे तेरे पति करते क्या है?

दूसरी महिला ने कहते हुए पूछा।

‘वे एक होटल में वेटर है।‘ पहली महिला ने जवाब दिया।

चुटकुला # 0844

संता (बंता से)- बताओ स्वर और व्यंजन में क्या अंतर है?

बंता (संता से)- यही कि स्वर मुंह से बाहर निकलते है और व्यंजन अंदर

जाते है।

चुटकुला # 0845

एक बहरा अपने बीमार मित्र को देखने जा रहा था। रास्ते में वह मन ही

मन सोचने लगा कि ज्यादा बातें करूंगा तो कुछ का कुछ सुनाई देगा

इसलिए कम से कम बोलूंगा। सबसे पहले पूछूंगा कि तबीयत कैसी है?

मित्र कहेगा ठीक है। फिर पूछूंगा कि किसकी दवा चल रही है? वह डॉक्टर

का नाम बता देगा। सोचते-सोचते बीमार का घर आ गया। मित्र से मिलते

ही बहरा बोला, ‘कहो कैसी तबीयत है?‘

बीमार- ‘मर रहा हूं।‘

बहरा - अच्छा ही है। भगवान करे ऐसा ही हो। दवा किसकी चल रही है।

बीमार - यमराज की।

बहरा - अच्छा डॉक्टर है, खाने को क्या बताया है?

बीमार - पत्थर।

बहरा - ठीक है, पचने में हल्के होते है।

चुटकुला # 0846

महिला कैशियर- मुझे कुछ दिन की छुट्टी चाहिए, क्योंकि मुझे ऐसा लग

रहा है कि मेरी सुंदरता कुछ कम हो रही है।

बैक मैंनेजर - क्या मतलब?

महिला कैशियर - क्योंकि अब पुरूषो ने मुझसे पैसे गिनकर लेने शुरू कर

दिये है।

चुटकुला # 0847

सोनू (मोनू से)- आदमी के मुकाबले घोड़े ज्यादा समझदार होते है।

मोनू (सोनू से)- वह कैसे?

सोनू (मोनू से)- क्योंकि जब घोड़ो की दौड़ होती है तो हजारो आदमी वहां

उनकी दौड़ देखने पहुंचते है, लेकिन जब आदमियो की दौड़ होती है तो वहां

एक भी घोड़ा नहीं पहुंचता।

चुटकुला # 0848

दूध वाला- बीबी जी, कल से दूध पचास पैसे महंगा हो जायेगा।

महिला - क्यों, दूध के दाम क्यों बढ़ा रहे हो?

दूध वाला - क्योंकि मुझे भी अब पानी का बिल भरना पड़ता है।

चुटकुला # 0849

एक भिखारी को बैक में घुसते देख चौकीदार बोला, ‘अरे-अरे बाबा आगे

जाओ यहां कुछ नहीं मिलेगा।‘

भिखारी (चौकीदार से)- अरे भैया, मैं यहां कुछ लेने नहीं अपना पैसा जमा

कराने आया हूं।

चुटकुला # 0850

मोहन (बॉस से)- सर! अब तो मेरी सेलरी बढ़ा दीजिए। मेरी शादी हो गई

है।

बॉस (मोहन से)- ऑफिस के बाहर हुई दुर्घटनाओ के लिए हम जिम्मेदार

नहीं है।

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget