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जनप्रिय लेखक : ओमप्रकाश शर्मा : बौनों का देश

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- यादवेंद्र शर्मा चंद्र महान जासूसी लेखक ओमप्रकाश शर्मा की अपनी अलग पहचान थी - ज़नप्रिय लेखक! यह शत-प्रतिशत सही है कि ओमप्रकाश जन-जन का ले...



- यादवेंद्र शर्मा चंद्र

महान जासूसी लेखक ओमप्रकाश शर्मा की अपनी अलग पहचान थी - ज़नप्रिय लेखक! यह शत-प्रतिशत सही है कि ओमप्रकाश जन-जन का लेखक था. वह केवल भारतीय पाठकों का ही नहीं था बल्कि चीनी पाठक भी उसके बेशुमार थे. मैं जब मेरठ स्थित उसके घर गया तो देखा कि हज़ारों पाठकों के प्रेम, सम्मान, प्रश्न भरे पत्र उसके आस-पास बिखरे थे. इतनी ज़बरदस्त लोकप्रियता प्राप्त करने के बाद भी उसमें वही सादगी और सरलता थी.
मेरी मित्रता उससे बहुत पुरानी थी. जब ओमप्रकाश दिल्ली के पहाड़ी धीरज के एक मकान में किराए पर रहता था और दिल्ली क्लॉथ मिल में कामगार था. मैंने उससे पूछा था कि तुम्हें लेखन की प्रेरणा कैसे मिली? उसके पास भारी भरकम साहित्यिक उत्तर नहीं था. उसका संकेत आत्मप्रेरित-सा ही था. मुझे लगा कि तब भी उसकी संगत बुध्दिजीवियों से थी. जवाहर चौधरी उसका विशेष दोस्त था. चौधरीजी कुशल संपादक, श्रेष्ठ प्रकाशक और लेखक भी थे. चौधरी, चौधरी ज़रूर थे पर उनका रहन-सहन अभिजात वर्ग का था. बात के पक्के थे. उन्होंने एक बार कहा था. ओमप्रकाश केवल जासूसी लेखक ही नहीं है अपितु उसमें विलक्षण प्रतिभा है और वह अध्ययनशील व्यक्ति है. वह श्रेष्ठ ऐतिहासिक व सामाजिक लेखक भी हैं.

ओमप्रकाश की मकान मालकिन बड़ा शोर मचाने वाली थी. किसी हवलदार की पत्नी थी. प्रेमपूर्वक बोलना उसके वश का रोग नहीं था. वैसे ओमप्रकाश की पत्नी में भी ग्रामीण सौंदर्य था पर बोलती वह भी अपने तरीके से. झटका देकर.

तब मैं देखता कि ओमप्रकाश डी.सी.एम. की नौकरी के अलावा जासूसी उपन्यास 'गुप्ता पुस्तक भंडार' खारी बावली के लिए लिखता था. वे रंगमहल नामक पुस्तक साइज की एक मासिक पत्रिका निकालते थे. कहानी के तीन-पांच रुपए देते थे. मैंने भी उसमें पांच रुपयों में एक कहानी लिखी थी.

उन दिनों ओमप्रकाश के ख़ास मित्रों में प्रकाशक बृजमोहन पंडया, ओमप्रकाश और एक सरदारजी थे. ये तीनों पार्टनर थे और ओमप्रकाश की बड़ी इज्ज़त करते थे. इन तीनों ने मिलकर बैंग्लों रोड, जवाहर नगर में 'दिल्ली पुस्तक सदन' की शुरुआत की थी. इसी दिल्ली पुस्तक सदन ने आगे चलकर ओमप्रकाश का बहुचर्चित उपन्यास सांझ का सूरज छापा था. यह उपन्यास अंतिम मुगल सम्राट बहादुरशाह जफ़र पर था और इससे ओमप्रकाश की प्रतिभा और लेखन की अलग पहचान बनी. वह काफ़ी प्रसिध्द हुआ.

मैं दिल्ली में उसके यहां भोजन के समय ही जाता था. कारण स्पष्ट था कि वहां से भोजन करके मैं सदर बाज़ार स्थित 'राजहंस प्रकाशन' चला जाता. वे मेरे प्रकाशक थे. उसके बाद पहाड़गंज जहां 'नव साहित्य' प्रकाशक था. दिन भर दिल्ली की सड़कों पर भटकता था.
जब भी जाता ओमप्रकाश कच्छा और बनियान पहने मिलता था. कुछ लिखता रहता था. उसके पास अख़बार होते थे. कभी-कभी कोई पुस्तक. उसकी लिखने की स्टाइल भी अलग थी. जब मैं मेरठ था तब भी वह कच्छा और नंगे बदन गर्मियों में उलटा लेटकर लिखता था. इस तरह लिखने में उसे आत्मसंतोष मिलता था.

ओमप्रकाश उस समय किसी न किसी अभाव से घिरा रहता था पर उसमें अखूट जीवट था. अभाव के दंशों से वह घबराता नहीं था.

उसने एक दिन कहा, ''यार! तनाव से किसी भी समस्या का कोई हल निकला है? यदि तुम्हें पैसे चाहिए तो पैसे कमाओ. जैसे मुझे पैसों की ज़रूरत होती है तो पच्चीस रुपए में अपना उपन्यास बेच देता हूं....और ज्यादा ज़रूरत हो तो उससे भी कम में?...या फिर किसी से उधार लाता हूं. शरीफ आदमी पैसा तो इन्हीं दो तरीकों से ला सकता है. मेरे जैसा लेखक चोरी नहीं कर सकता, जेब नहीं काट सकता, कपट नहीं कर सकता....हम नैतिक मूल्यों को जीते हैं न?''

वह काफ़ी हद तक नैतिक मूल्यों को जीता था. एक कामगार का आक्रोश और विद्रोह उसके स्वर में फूटता था. सर्वहारा वर्ग के प्रति उसमें गहन सहानुभूति थी. ट्रेड यूनियन के कार्यों में भाग लेता था. निष्ठा और विश्वास था उसे कम्यूनिज्म में.

कई बार उसके यहां डी.सी.एम. के वर्कर्स भी मिल जाते थे. तब उनमें पूंजीवादी व्यवस्था विरोधी वार्तालाप चलता था. हड़ताल से कितना लंबा संघर्ष लड़ा जा सकता है, उस पर विचार-विमर्श होता था.

मैं बैठा हुआ सोचता रहता कि यह खालिस जासूसी उपन्यास लिखने वाला मज़दूर नेताओं की तरह कितनी अर्थपूर्ण बातें करता है? तब मुझे यह भी लगता था कि यह जासूसी लेखन उसकी जीने की विवशता तो नहीं? नौकरी के अलावा कुछ उपार्जन करना है और यह इसी माध्यम से कमा रहा है.

मैंने उससे एक बार पूछा, ''तुम्हें कौन साहित्यकार पसंद है?'' उसने तपाक से उत्तर दिया, ''सबसे ज्यादा शरतचंद्र चटर्जी, अमृतलाल नगर, आनंदप्रकाश जैन, भगवतीचरण वर्मा आदि. नागरजी की टकसाली भाषा पर मैं मोहित हूं. इसके अलावा रवींद्र्रनाथ ठाकुर, भैरप्पा, गोर्की और सी वर्जिल जारजो का पच्चीसवां घंटा बहुत पसंद है जिसके अनुवादक भदंत आनंद कौत्यायन हैं. इतिहास के प्रति मेरी गहरी रुचि है.''

मैंने उसे पूछा, ''जासूसी उपन्यास लिखने के लिए तुम किन बातों का सहारा लेते हो?''
तब ओमप्रकाश शर्मा का नाम जासूसी उपन्यासकारों में चल पड़ा था. वह इस दिशा का सिरमौर लेखक हो गया था. उसके रेट 25 रुपयों से तीन सौ रुपए तक पहुंच गए थे. अब वह 'रतन एंड कंपनी' के लिए भी उपन्यास लिखने लगा था.

उसने मेरे प्रश्न का उत्तर सोचकर दिया. कहा, ''मैं जासूसी उपन्यास लिखने के लिए अख़बार की घटनाओं और कल्पनाओं का अधिक सहारा लेता हूं.''

मैंने उससे पूछा, ''चंद्रकांता की शैली का प्रयोग तुम अपने जासूसी उपन्यासों में करते हो?''
उसने अपने नंगे बदन पर हाथ फेरकर कहा, ''चंद्रकांता संतति में जो सस्पेंस है, उत्सुकता है, उसका प्रयोग मैं करता हूं....यदि कथानक में पाठकों को आगे क्या होगा वाली उत्सुकता न हो तो हमारा पाठक उसे पढ़ेगा नहीं. आम पाठक को सबसे पहले रोचकता चाहिए.''

''इसलिए तुमने कई चरित्रों को उपन्यासों में घसीटा है?''

''सही है. वे चरित्र पाठकों को आकर्षित करते हैं.'' ओमप्रकाश ने तपाक से कहा, ''हिंदी के आम पाठक की इच्छाएं काफ़ी अधूरी और अपूर्ण हैं. वह जैसे सिनेमा के हीरो में अपने को आरोपित करता है कि मैं ही वह हीरो हूं, उसी तरह मेरे चरित्रों में वह अपने को आरोपित करता है. यह भी सफलता का एक तरीका है.''

''तुम जेम्स हेडली चेज़ को नहीं पढ़ते?''

उसने झट से कहा, ''पढ़ता हूं पर हिंदी में मेरा तरीका उससे भिन्न है. वह सस्पेंस ज्यादा रखता है और हम रोमांच ज्यादा. पाठकों की मानसिकता हमारे देश में अलग है.''

वह अंग्रेज़ी नहीं जानता था. शायद पढ़ा-लिखा अधिक नहीं था. लेकिन उसमें अजीब प्रतिभा थी. जैसी जयशंकर 'प्रसाद' में थी. कोई कॉलेज की डिग्री नहीं लेकिन वह कथानक का ताना-बाना इतनी कुशलता से बुनता था कि पाठक इसकी रो में मंत्रमुग्ध-सा बह जाता था. वह कई बार अपने उपन्यासों में रामायण-महाभारत के चरित्रों को जासूसी बनाकर प्रस्तुत करता था. वह ऐसे वर्तमान को बताता था जो हमें प्रिय था. श्री वेदप्रकाश काम्बोज कहते हैं कि वह किसी भी विचित्र वस्तु, स्थिति और घटना को देख लेता तो उस पर उपन्यास लिख देता.

एक बार उसने कटी उंगलियां देख लीं. उसने उन्हें लेकर एक उपन्यास लिख डाला. फ़िल्मी दुनिया के संपादक और ओमप्रकाश शर्मा के प्रमुख प्रकाशक श्री नरेंद्र कुमार बताते हैं कि हम उनके उपन्यास निरंतर छापते रहते. ओमप्रकाश जी ने कहा हुआ था कि वे नए उपन्यास के नाम की घोषणा कर सकते हैं. हम कोई आकर्षक नाम की घोषणा कर देते और वह उस शीर्षक से रोचक व सटीक उपन्यास लिख देता. सोचिए, विचित्र प्रतिभा थी न उसमें.

वह अपने आप से कहता था उपन्यास ऐसा लिखो जो अंततोगत्वा मानव का कल्याण करें. बेईमानी को पराजित करें. ज्यादा तो नहीं पर पाठक थोड़ी देर तो सोचें.

ओमप्रकाश दिल्ली छोड़कर मेरठ आ गया था. वहां उसने आलीशान मकान बना लिया था. उसके बेटे महेंद्र, नरेंद्र और बिल्लू बड़े हो गए थे. बिटियां भी बड़ी हो गई थीं.

जनप्रिय प्रकाशन के नाम से उसके बेटों ने एक प्रकाशन संस्था खोल ली थी. ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक के रूप में सारे देश में विख्यात हो गया था. पैसा ख़ूब आने लगा. उसके नाम से पुस्तकें बिकती थी. पचास हज़ार का प्रथम संस्करण छपता था. उसने फिर दिल्ली की ओर नहीं देखा.

मैं उन दिनों अपनी पत्नी शांति भट्टाचार्य और दोनों पुत्रा विजय कुमार और कृष्ण कुमार बिस्सा के साथ मेरठ गया था. इतना नामीगिरामी जासूसी लेखक होने पर भी ओमप्रकाश के रहन-सहन और ताम-झाम में कोई तब्दीली नहीं आई थी. वही सादगी और मस्तानापन. हां, मकान काफ़ी बड़ा बना लिया था. उसमें कोई आधुनिक साजो-सामान नहीं था.

आज की सजावट भी नहीं थी. केवल सुविधाओं की चीज़ें. ज़रूरतें तुरंत पूरी होती थीं.
घर में प्रवेश के पास ही वही ओमप्रकाश शर्मा उसी कच्छा-बनियान में चटाई पर उलटा लेटा हुआ लिख रहा था. मुझे देखते ही उठकर खड़ा हो गया. गले लगाकर वह हठात बोला, ''कोई ख़बर नहीं, घर मिलने में कोई दिक्क़त तो नहीं हुई?''

मैंने प्रसन्नता से मुस्कराते हुए कहा, ''ओमप्रकाश! मेरठ में तुम्हें कौन नहीं जानता? एक दुकानदार को पूछा तो उसने ही चौंककर कहा वो ओमप्रकाश शर्मा जो जासूसी उपन्यास लिखता है.''...उसने पूरा भूगोल बता दिया.

तभी ओमप्रकाश की पत्नी आ गई. उसने झटकों के स्वर में कहा, ''चंद्रजी! पत्र तो लिखते....भाभीजी को ले आए, बहुत अच्छा लगा.'' फिर उन्होंने बच्चों पर दुलार का हाथ फेरा. वे उन्हें भीतर ले गईं.

हम दोनों बैठकर स्वास्थ्य पर चर्चा करने लगे. अर्थ के बारे में मैंने कोई प्रश्न नहीं किया कि तुम्हारे पास कितना धन है? जबकि मेरी आर्थिक स्थिति में जीवन-निर्वाह के उतार- चढ़ाव थे. उससे मेरी कोई बराबरी नहीं थी.

चाय आ गई थी.
ओमप्रकाश ने पूछा, ''क्या लिख रहे हो?''
''यही कहानी उपन्यास. कभी-कभी रेडियो-नाटक.''

''और तुम...?''
''खूब लिख रहा हूं...मेरी पुस्तकों की कई सीरीजें चल रही हैं. कई चरित्र नायकों की मैंने स्थापना कर दी है. विक्रांत...
मेजर...इंसपेक्टर....''

''यार! इतना तुम कैसे लिख लेते हो?''
''चंद्र! लिखना जैसे मेरी फ़ितरत हो गया है. तुम आश्चर्य करोगे कि एक के बाद एक प्लाट मेरी खोपड़ी में आते रहते हैं. जैसे कोई कहानी कहने वाला कंप्यूटर हो दिमाग़ में. कभी कोई नायक या खलनायक दिमाग़ में आ जाता है और कभी घटनाएं और कभी रहस्य. तुम्हें शायद विश्वास नहीं होगा कि मैं लिखता भी अजीब से कभी भी भूल नहीं होती.''

''दुबारा पढ़ते हो?''
''नहीं भाई, नहीं, लिखा और छपने को दे दिया.''
ओमप्रकाश में यह विलक्षण प्रतिभा थी. अविश्वसनीय, मुझे उसके पास रहने पर पता चला. वह जो भी साहित्य पढ़ता था, वह श्रेष्ठ हिंदी साहित्य होता था. लिखता जासूसी उपन्यास और पढ़ता साहित्यिक-ऐतिहासिक उपन्यास!

मैंने पूछा, ''आजकल कितने उपन्यास लिख लेते हो?''
उसने बेहिचक बताया कि एक माह में दो. हम निरंतर लिखने वालों पर चाहे कोई हल्का-फुल्का फतवा जारी कर दें, पर ओमप्रकाश ने यह निर्विवाद रूप से कहा कि वही निरंतर लेखन कर सकता है जो केवल लेखक है, प्रतिभावान है और जिसमें लिखने की क्षमता है. लिखना हर कोई के वश की बात नहीं है.

खाने के लिए उसने मेरी पत्नी को बुलाकर कहा, ''भाभीजी! खाना आप बनाएंगी. दाल-बाटी. जिस चीज़ की दरकार है, वह आप मंगवा लीजिए.''

पत्नी ने कहा ठीक है. मैं दैनिक कार्यों से निवृत होने के लिए चला गया. वह फिर लेखन में डूब गया.

भोजन स्वादिष्ट बना था. पंचमेल की दाल और बाटी. बाटी का मीठा-चूरमा ऊंधावणा घी यानी घी से थाली तरबतर.

इतना खाया कि तृप्ति हो गई. उसने मेरी पत्नी का आभार माना.

तीन दिन हम रहे. इन तीन दिनों में मैंने देखा कि कितने ही अख़बारों और पत्रा-पत्रिकाओं में उस पर आलेख छपे हैं. उसके लेखन की प्रशंसाएं ज्यादा छपी हैं. अनेक पाठकों ने उन्हें प्रशंसा के पत्रा लिखे थे. पाठकों में वृध्द, युवा और युवतियां तक थीं. उन पत्रों को पढ़कर मुझे भी सुखद अहसास हुआ. उनमें कुछ पत्र सुझावात्मक भी थे.

ओमप्रकाश में किसी बात की हड़बड़ी नहीं थी. मैंने पूछ लिया कि तुम्हारे समकक्ष जो दूसरे लेखक उभरने लगे हैं वे क्या तुम्हारी पुस्तकों की सेल कम नहीं करेंगे?

उसने उत्तर देने में कोई हड़बड़ी नहीं की. शांत स्वर में कहा, 'किसी समय चांदनी चौक में घंटेवाला एक मिठाई वाला था, अब कितने हैं. हल्दीराम की दुकान पर भीड़ लगी रहती है. इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे दुकानदारों की मिठाई नहीं बिकती? माल के अनुसार बिक्री होती है. हम लोग महान साहित्यकार नहीं हैं. लोकप्रिय साहित्यकार हैं. जन-जन के प्रिय साहित्यकार हैं....जो जासूसी लेखक अभी उभरे हैं, प्राय: वे मेरे शिष्य हैं....एक बात और कहूंगा, आज गुलशन नंदा की लोकप्रिय लेखकों में तूती बोलती है पर यह भी सच है कि प्यारेलाल आवारा, रानू, गोविंद सिंह, दत्त भारती भी बिकते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि ट्रेड नाम जैसे कर्नल रंजीत, राजवंश मनोज और रणजीत भी बहुत बिकते हैं.

''इनका भविष्य?''
वह हँस पड़ा. विश्वासपूर्वक बोला, ''भविष्य को मैं तो नहीं देखता. मेरा वर्तमान शानदार है.''

''लोग कहते हैं, आपको लोग भुला देंगे?''

''मरने के बाद भुलाते हैं तो भुला दें. मरने के बाद अमरता और समृध्दि किसने देखी है? प्रेमचंद के बेटे आज धन्ना सेठ हैं. पर प्रेमचंद तो देखने नहीं आता. शरतचंद्र देश के महान लेखक हो गए, शरतचंद्र की आत्मा को भला इसका क्या अहसास है? यह भी मृगमरीचिका है. लेखक अमर होता है पर उस अमरता का फायदा बेचारा लेखक क्या जाने? आप बता सकते हैं कि हिंदी में कोई भी ऐसा लेखक है जिसने लाखों रुपयों की रायल्टी ली हो और जो दिल्ली आता है मुंबई से, तो बड़े-बड़े प्रकाशक एरोड्रम पर उपस्थित होते हों? वह केवल गुलशन नंदा है....मेरी हर पुस्तक की पचास हज़ार प्रतियां छपते ही बिकती हैं. हम अपने को प्रेमचंद और शरत्चंद्र नहीं कहते. हम लोकप्रिय लेखक हैं. हमारा 'आज' बहुत ही सुखी और सुंदर है.''

ओमप्रकाश उत्तोजित हो गया था. बोलकर वह ख़ामोश हो गया. सन्नाटा पसर गया. बोला, ''चलो, फ़िल्म देखकर आएं.''

हम दोनों कपड़े बदलकर फ़िल्म देखने चले. मुझे आश्चर्य हुआ कि वह मुझे अंग्रेज़ी फ़िल्म दिखाने के लिए ले गया. मुझे आज भी उसका नाम याद हैक़िलर्स.

वह भूत-प्रेतों की भयानक और प्रभावशाली फ़िल्म थी. डरावनी ज़रूर थी पर रोमांचित करती थी बार-बार. वह फ़िल्मों के संवाद नहीं समझा पर कहानी का अनुमान ज़रूर लगा लिया.
रात को आकर भोजन किया और सो गए.

एक शौक ओमप्रकाश शर्मा में और था : फुटबाल देखने का. दिल्ली में डूरंड फुटबॉल मैचों को वह लगातार देखता था. उसके साथ अन्य जासूसी लेखक वेदप्रकाश कांबोज होता था. कभी-कभार मैं.

हम सब मूंगफलियां तोड़-तोड़कर खाते रहते थे और फुटबॉल के खेल पर अपनी अपरिपक्व टिप्पणियां करते रहते थे. परिणाम प्राय: हमारे क़यास के विरुध्द ही निकलता था.
मैंने उससे पूछा, ''आजकल दिल्ली फुटबॉल देखने जाते हो?''

''नहीं भाई. मेरठ आने के बाद दिल्ली जाना छोड़ ही दिया. मैच देखना तो दूर रहा, कभी दिल्ली के प्रकाशक का कार्यालय ही नहीं देखा. महानगर की ओर मुख करने का मन ही नहीं करता.'' वह महानगर की आपाधापी और आत्मीय अजनबीपन से घबरा गया था. वह शांत चित्ता और कछुआ चाल जीवन जीना चाहता था अत: मेरठ में मस्त था.

मैंने उससे पूछा, ''तुम जिस छुरें भोंकने वाली महानगरी संस्कृति की संबंधहीनता से भागते हो, वह तुम्हारे उपन्यासों में फिर क्यों होती है?''

वह हँस पड़ा...नि:शब्द हँसी. बोला, ''यह मेरे लेखन-पेशे की मजबूरी है. आज पाठकों को किसमें मज़ा आता है, उसे क्या परोसा जाए, इस नब्ज को पहचानकर हम लिखते हैं. मैं सच कहता हूं कि मैं अपने लेखन के प्रति जितना ईमानदार हूं उतना ही पाठकों के प्रति भी अपने दायित्व को समझता हूं....दोस्त! मेरे पास समस्त सुविधाएं जुटाने के साधन हैं पर मुझे जिसमें सुख मिलता है, मैं वही करता हूं.'' वास्तव में तब ओमप्रकाश काफ़ी संपन्न हो गया था. पर वही चटाई, कच्छा और बनियान. कभी-कभी नंगे बदन!

मेरठ से लौट आने के बाद मैं अपने जीवन-संघर्ष में इतना व्यस्त हो गया कि उससे संपर्क नहीं रख सका.

हालांकि दिल्ली के कई पॉकेट बुक्स वाले उसकी चर्चा करते रहते थे. विशेषत: फ़िल्मी दुनिया का संपादक और सुमन पॉकेट बुक्स का स्वामी नरेंद्र कुमार. वह प्राय: ओमप्रकाश शर्मा के बारे में कहा करता था, ''वह जासूसी लेखक है पर उसका अन्य ज्ञान ग़ज़ब का है. वह विश्व की अच्छी पुस्तकें पढ़ता है. वह किसी से पैसे लेकर हज़म नहीं करता. लेन-देन में सच्चा है. ऐसी ईमानदारी संपर्क में आए लेखकों में मैंने कम देखी है.''

उसकी पुस्तकें धड़ाधड़ छप रही थीं. उसने लगभग चार सौ पचास पुस्तकें लिखीं. हिंदुस्तान के कोने-कोने में उसके पाठक थे.

सारे सिलसिले समाप्त हो जाते यदि मेरे लेखक-पुत्र यानी विजयकुमार-कृष्णकुमार उन्हें फोटोफेयर 1998 का आमंत्राण नहीं भेजते. वैसे वे अब खालिस व्यापारी हैं पर व्यापारी होने के पूर्व विजयकुमार बिस्सा बाल-साहित्य का लेखन कर रहा था और कृष्ण कुमार बिस्सा 'चंद्र' की 'साठोत्तारी हिंदी उपन्यासों में राजनैतिक चेतना' पुस्तक काफ़ी लोकप्रिय हुई. तो ओमप्रकाश शर्मा को आमंत्राण-पत्र मिला. यह फ़ेयर मुंबई में होना था. न जाने ओमप्रकाश मुंबई का नाम सुनते ही क्यों अजीब-सी बौखलाहट से घिर गया.

उसने मुझे 21-3-98 को पत्र लिखा कि यह श्रेय युवा पीढ़ी को ही जाता है कि उसने दो बूढ़ों के बीच संपर्क करा दिया. मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि जब इंसान बूढ़ा हो जाता है तो वह अपने आप में सिमट जाता है या स्वयं अपने से लड़ने लगता है. मैंने विजयकुमार को जो पत्र भेजा था, वह उसके द्वारा फोटोफेयर का निमंत्रण पत्र भेजे जाने पर लिखा था. वैसे मैंने सच ही लिखा है कि बंबई (मुंबई) मेरे कई मित्रों को निगल गई. उर्दू के लोकप्रिय उपन्यासकार आदिल रशीद मुंबई में अपने बेटों को जमाने गए थे क्योंकि उन्होंने लखनऊ में आठ कमरों का मकान अपने साले की तिकड़म से मात्रा अट्ठाइस रुपयों में कबाड़ लिया था....मैं भी आदिल रशीद को जानता था. वह अपने को लोकप्रिय लेखकों में बड़ा समझता था और पॉकेट बुक्सवालों के चक्कर निकाला करता था. वह एक बार हिंदी में भी खूब छपा था. फिर वह मुबई चला गया जहां ओमप्रकाश शर्मा के शब्दों में एक रात दारू-मांस खाकर लौटते समय उसे हार्ट-अटैक हुआ. रात को लगभग एक-दो बजे थे. उसने टैक्सी वाले से के.ई.एम. हस्पताल चलने के लिए कहा. उसने मना कर दिया. इसी उहापोह में उसका देहांत हो गया. अमृतलाल नागर के भाई रतनलाल नागर जो साउंड स्टूडियो में फोटोग्राफर थे, तीन दिनों की बीमारी में चल बसे. उसने अपने कई और मित्रों के नाम गिनाए.

मैंने अपने पत्र में उसे लिखा कि मुंबई महानगर केवल निगलती नहीं बल्कि कई बार ऐसे वरदान देती है कि आदमी कहां से कहां पहुंच सकता है. क्या दिल्ली-मेरठ में आदमी गुमनामी के अंधेरे में नहीं खोता? यह सब परिस्थितिजन्य है. मैं इसे अंधविश्वास मानता हूं.
मैंने जब उससे पूछा कि तुम भी बहुत लोकप्रिय हो पर तुम्हारे उपन्यासों पर फ़िल्में क्यों नहीं बनतीं?

उसने बताया कि वह इस ओर ज़रा भी प्रयत्नशील नहीं है. कई लोग चाहते भी हैं कि वे मेरे उपन्यासों पर काम करें पर उस समय मुझमें अजीब-सी उदासीनता भर जाती है और साहित्यिक रचनाकारों वाली अकड़ जाग्रत हो जाती है. ऐसे मत काटो, इस चरित्र को मत बदलो, क्लाइमेक्स यही रहने दो.

मेरठ के एक धन्ना सेठ सत्येन पाल चौधरी ज़ो प्रकाश मेहरा को फाइनेंस किया करते थे, उन्होंने मेरे उपन्यास धड़कन पर फ़िल्म बनना तय कर लिया. मुंबई बुलाया. मैं नहीं गया. इजाजत दे दी. अनुबंध नहीं किया. चैक आया ले लिया. एक दिन वासु चटर्जी आए. उन्होंने पटकथा बताई. उन्होंने पटकथा व अतिरिक्त डायलॉग लिखे थे. मुझे बासु चटर्जी की फ़िल्में पसंद थीं. एक निर्देशक के रूप में मैं उनका सम्मान करता था. मैंने स्वीकृति दे दी. उस उपन्यास पर 'चमेली की शादी' नाम से फ़िल्म बनी. चली भी फिर टी.वी. चैनलों पर आती रही.

''गुलशन नंदा की तो कितनी ही फ़िल्में बनीं. फिर तुम्हारे उपन्यासों पर धड़ाधड़ फ़िल्में क्यों नहीं बनीं?''

ओमप्रकाश गंभीर हो गया. बोला, ''बन जाती. यदि मैं नंदा की तरह मार्केटिंग करना जानता. कई बातें तो मेरी इसलिए फ़ेल हो गईं कि मैंने मुंबई जाने से साफ़ इंकार कर दिया. चंद्र! दिल्ली छोड़ने के बाद मैंने एक लेजी-जीवन जिया है. कहा न, दिल्ली भी जाना छोड़ दिया.''

उसने सोचकर फिर कहा, ''एक बात बताऊं कि जासूसी उपन्यास लिखने के बावजूद मुझमें एक श्रेष्ठ साहित्यकार की आदतें हैं. अच्छा लेखक, वह भी हिंदी का, फ़िल्म लाइन में ज्यादा क्या, पचास प्रतिशत भी सफल नहीं हुआ...तुम्हें बताऊं नंदा एकदम फ़िल्मी हो गया. जो लिखा उसमें वह निर्देशक कहे अनुसार बदलाव करता रहेगा. मुझे यह भी अधिक पसंद नहीं. दिमाग़ केवल लिखना ही चाहता है. धन...धन...धन...बनिए टाइप के आदमी को क्या पता, वह क्या छोड़कर जा रहा है. सात पीढ़ी के लिए धन...छोड़ जाना क्या महत्तवपूर्ण है? या कुछ इतिहास. कुछ अच्छे कर्म.''

मैंने उससे दुबारा मेरठ जाने पर पूछा, ''प्रेमचंद और शरतचंद के बीच तुम किसे महान समझते हो?''

मैंने सोचा कि वही रटारटाया उत्तार कि दोनों. पर मैं स्वयं तनिक स्तब्ध रह गया, उसका उत्तार सुनकर. उसने कहा प्रेमचंद को ध्यान से पढ़ोगे तो जानोगे कि वह एक
ऐसा कायस्थ था जिसका संपूर्ण साहित्य ब्राह्मण विरोधी था जबकि ब्रिटिश युग में ब्राह्मण भी साधारण प्रजा था. आज तो कुछ है ही नहीं.''

फिर मैंने उसे एक पत्रा लिखा कि मैं प्रेमचंद पर तुम्हारे विचार से सहमत नहीं हूं. उसने 27-4-98 के पत्र में मुझे लिखा प्रेमचंद के बारे में जो मैंने लिखा, वह एकदम सत्य है. पर सिलसिला बहुत पहले शुरू हो गया था. गंगा पुस्तक माला के संचालक दुलारेलाल भार्गव ने प्रेमचंद को छापा था. उनकी पुस्तकों के कॉपीराइट उनके पास थे. अंधेरे के दीप उपन्यास पढ़कर वे मेरा एक उपन्यास रॉयल्टी पर छापना चाहते थे. उन्होंने दिल्ली से भी रंगभूमि छापा था. वे एक दिन साइकिल पर गट्ठर बांधकर जा रहे थे. रंगभूमि भेंट की...पढ़ रखी थी मैंने.

रांगेय राघव से बाद में भेंट हो गई. वे मुझसे नाराज थे. क्योंकि उन्होंने एक लेख में भगवतीचरण वर्मा के टेढ़े-मेढ़े रास्ते का विरोध किया. तब मैंने उन्हें लिखा कि वर्माजी की कोई भी राजनैतिक आस्था नहीं. उन्होंने तो कांग्रेस और कम्यूनिस्टों दोनों को लताड़ा है.
रांगेय राघवजी ने मजाक में कहा, ''अब मैं जासूसी उपन्यास लिखूंगा.''

''अभी तो मैं अंधों में काना सरदार हूं. आप इस क्षेत्र में आएंगे तो मुझे किसी और काम की तलाश करनी होगी.''

हम एक रेस्त्रां में आ गए. रांगेय राघव ने पूछा ओम! रंगभूमि पढ़ोगे. उसने कहा पढ़ा हुआ है.

डॉक्टर साहब ने कहा उस उपन्यास में औद्योगीकरण का विरोध है. क्या भारत बैलगाड़ी युग में सदैव रहेगा. फिर बात बदलकर बोले पूरा हिंदी साहित्य जाति भेद के ऊपर है परंतु प्रेमचंद की क्या ब्राह्मण भैंस खोलकर ले गए जो वह ब्राह्मण विरोधी हैं.

ओमप्रकाश ने लिखा कि डॉ. रांगेय राघव की मृत्यु पर उनकी बात याद आई. संपूर्ण प्रेमचंद साहित्य ख़रीदकर पढ़ा. बात सौ फीसदी सही थी. आप चाहें तो प्रेमचंद को दुबारा पढ़ लें. या केवल कहानी 'सद्गति' और 'मोटेराम शास्त्री' पढ़ लें.

इससे यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि ओमप्रकाश शर्मा लिखता ज़रूर था ज़ासूसी उपन्यास, पर उसे श्रेष्ठ साहित्य का ज्ञान था. उसने एक बार बताया कि शरतचंद्र के बारे में पुनर्विचार होना चाहिए. हालांकि उनमें भी प्रेमचंद वाली एक कमजोरी रही कि बंगाल में बिहारी और उड़िया लोगों को केवल नौकर के रूप में देखा. जैसा देखा वैसा लिख दिया. पर मैंने काफ़ी सोचा-समझा तब पाया कि उनमें दुर्भावना बिल्कुल नहीं थी. यह भ्रम शायद श्रीकांत के चरित्र के रूप में टूटता है जब वह साधु बनकर इलाहाबाद की ओर जाता है. उसे शीतला बुखार होता है और बंगाली परिवार जगह नहीं देता और बिहारी रेलवे कर्मचारी उसे रहने के लिए जगह देता है. वस्तुत: शरतचंद्र अपने परिवार और परिवेश की सच्चाई और उसके भविष्यवक्ता के रूप में दूरगामी निर्णय ले लेता था, अन्य के मामले में वह असफल था.
वह कई बार सैध्दांतिक चर्चा कर लेता था. एक बार समाजवाद पर चर्चा चली तो उसने कहा, ''यथार्थ और समाजवादी यथार्थ में अंतर है. सन् 61 में सोवियत लिटरेचर मास्को से प्यौत्रा ज्दानोव का एक लेख छपा थायथार्थ जो वह हुआ और समाजवादी यथार्थ वह है जो होना चाहिए था. इस कथन का स्वागत किया....यहां ज्दानोव के समर्थन में वाराणसी के कथाकार जिसे द्विजेंद्रनाथ मिश्र निर्गुण ने लेख लिखा तो वाराणसी में मैंने उन्हें कहा, आपको ज्दानोव याद रहे और शरतचंद्र को भूल गए! जो बहुत समय पूर्व अपने साहित्य में यह साबित कर चुके हैं.

निर्गुणजी ने बुझे स्वर में कहा आप ठीक कहते हैं.

ओमप्रकाश शर्मा शरत के फ़ैन थे. शरत साहित्य के अलावा वह बंगाल की सामाजिकता का भी ध्यान रखता था. उसने मुझे लिखा बंगाल (तब बंगलादेश भी शामिल था) से प्रकाशित गजेटियर के अनुसार पुरुषों की संख्या चालीस प्रतिशत और स्त्रियों की संख्या साठ प्रतिशत है. डॉक्टर ग्रेवाल्टर के अनुसार बंगाल में ऐसा इस कारण है कि मच्छर का प्रभाव इतना स्त्रियों पर नहीं होता जितना जानलेवा पुरुषों पर होता है.

मैंने उसे लिखा है कि भाई तुम्हें बड़ा ज्ञान है.
वस्तुत: ओमप्रकाश में पढ़ने की भयंकर आदत थी.

उसने कहा कि जब शरत लिखना आरंभ करते हैं तब बंगाल कुरीतियों व दोषों से भरा हुआ था. मेरा मानना है कि जो कुछ भी उन्होंने लिखा तथ्य के विपरीत लिखा और खूब लिखा. बंगाली समाज को एक आदर्श और पवित्रा सुगंध से भर दिया. उसने यह भी बताया कि श्रध्देय अमृतलाल नागर ने बताया कि वे शरत से मिलने कलकत्ता पहुंचे. तब वे वहां नहीं मिले. उन्होंने रूपनारायण नदी के किनारे गांव में मकान बना लिया था. कीचड़ भरा रास्ता और सात मील पालकी का रास्ता, परंतु उनसे जब भेंट हुई तो सफ़र की सारी थकावट दूर हो गई. सहज और खुलेपन का सम्मान. सच हम सब शरत के देश के लेखक हैं.

मैंने उससे चाय पीते हुए पूछा, ''ओमप्रकाश! अन्य लेखकों के बारे में तुमहारी क्या राय है?''
''अज्ञेयजी विचारशील लेखक हैं, पर उनके लेखन का आरंभ अनुवाद से हुआ. शरत के उपन्यास श्रीकांत का जर्नी ऑफ श्रीकांत और जैनेंद्रजी के त्यागपत्र रेजीग्नेशन से....नागार्जुन अक्खड़ कवि है. मुक्तिबोध दुरूह हैं. नरेश मेहता की शैली मुझे पसंद है. अमृतलाल नागर मुझे बेहद प्रभावित करते हैं. तुम बुरा मत मानना राजेंद्र यादव और नामवर सिंह को मैं किसी भी गिनती में नहीं गिनता....अब 74 का हो रहा हूं. 14 मई को विवाह की 54वीं वर्षगांठ है, किसी पुराने मित्र को बुलाता हूं....पूरा दिन पुरानी यादों व ठहाकों से बिताता हूं.''

''हम सब जीवन से दूर और मृत्यु के नज़दीक जा रहे हैं. क्या यह बात तुम्हें उदास नहीं करती?''

''कतई नहीं. मृत्यु सत्य है. उसे हमारी क्या, समस्त संस्कृतियों में पर्व की तरह मनाते हैं. कहानी है, छोटी-सी कहानी नगर शीराज में एक सूफ़ी रहता था. एक बार ज्योतिषी ने उसे आकर कहा कि तुम्हारे जीवन के चार दिन शेष हैं. यह सुनकर वह व्यक्ति नाचने लगा. ज्योतिषी चौंका...यह क्या? मृत्यु की ख़बर सुनकर तुम नाच रहे हो?

नाचते हुए सूफ़ी ने कहा, मैंने जीवन में हर सुख का आनंद लिया है तो क्या जीवन का अंत सुखद घटना नहीं? कौन ऐसा है जो संसार में आकर गया नहीं? जीवन के अंत को उल्लासमय बनाना चाहिए.

''राजनेताओं के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है?''

ओमप्रकाश कुछ देर तक सोचता रहा. फिर बोला, ''नेहरू संवेदनशील व साहित्यिक व्यक्ति था. उसके बाद कोई लेखक व भारत का प्रधानमंत्री संभवत: नहीं होगा.''

मैंने पूछा, ''वाजपेयीजी?''
''मैं उसे कवि नहीं तुक्कड़ मानता हूं. कवि बनने के लिए जो साधना, चिंतन-मनन चाहिए, वह वाजपेयीजी के पास कहां? उपन्यासकार बनने के लिए नरसिंहराव के पास वह श्रम साधना कहां? हां, भूतपूर्व शिक्षा मंत्री प्रतापचंद्र 'चंद्र' ज़रूर सही मायनों में उपन्यासकार थे (हैं).''

वह अत्यंत भावुक हो गया. अनगिनत विभिन्न तबके के लोगों के प्रशंसा-पत्रों से घिरा ओमप्रकाश अपने आपसे अजनबी होता हुआ बोला, ''मैं तो भाई लिखने की फैक्टरी हूं. कुल मिलाकर उपन्यासों की संख्या 450 है. हिंदी व अंग्रेज़ी समालोचनाओं की कटिंगें भी हैं. कभी रूसी पाठक भी मिला....लेकिन इसके बाद क्या? फिर भी सोचता हूंवैरी गुड.''

आज इस संसार में ओमप्रकाश नहीं है. लेकिन जिसने इतना लिखा है, जिसके अनगिनत पाठक हैं, उसकी स्मृति को आप सदा-सदा के लिए नहीं मिटा सकते.

उसने अत्यंत ही पीड़ा से कहा था ओमप्रकाश शर्मा की यादें मिट भी जाएंगी तो क्या? वह अमर भी नहीं हुआ तो क्या? अरे दोस्त चंद्र, आज का पाठक तो पहाड़ी, इलाचंद्र, प्रताप नारायण मिश्र, मानव, भैरवप्रसाद गुप्त जैसी हस्तियों को कहां याद करता है?

यहां आउट ऑफ साइट तो आउट ऑफ माइंड. यह देश बौना है.''

उसकी यह बात विचारणीय है.

****.

रचनाकार – यादवेंद्र शर्मा चंद्र हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकार हैं. आपने भी हिन्दी साहित्य में धुँआधार लिखा है. वर्तमान रचनाकारों में, हिन्दी में सर्वाधिक लिखने वालों में पहला नाम संभवतः यादवेंद्र का ही होगा.

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