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March, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मोहनदास नैमिशराय की कहानी: आग ऐसे लगी

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आधी रात तक मुखी के शरीर में प्राण थे. कुछ लोग सोने के लिए चले गए थे और कुछ अभी तक जाग रहे थे. उनकी आंखों में नींद से अधिक चिंता थी. चिंता घनी होती तो चिता के निर्मोही चित्र सामने तैर उठते. वे चित्र कच्चे धागे पर नहीं तैरते बल्कि उन्हें भीतर बाहर से उद्वेलित करते. मृत्यु चित्रों से वे सब घिरे थे. कोई मुखी की आँखों में झांकता तो कोई उसकी सांस लेने की प्रक्रिया को महसूस करता. स्वयं मुखी बारी-बारी से अपने आस-पास बैठे परिजनों की ओर देखता और ताकता! जैसे सांस अटक गई थी उसकी. एक-एक पल का हिसाब-किताब उन सभी के बीच था. मुखी असहाय था. थोड़ा बहुत वह हिलडुल सकता था. अपने नजदीक के लोगों को देख सकता था. लेकिन कुछ बोल नहीं सकता था. कुछ कहने के लिए होंठ बार-बार कांपते थे, पर कंपन से स्वर बाहर नहीं आ पाता था.

परिवेश में गर्मी थी और उमस भी. छत का पंखा धीमी गति से चल रहा था. जैसे पंखे और मुखी में सभी कुछ तो समानता हो. मुखी और पंखे की उम्र बिलकुल एक जैसी थी. मुखी का जब जन्म हुआ था तब पंखा खरीदा गया था. घर में पहली बार बिजली से चलने वाला पंखा आया था. इसलिए आस-पड़ोस में उसे मुखी का पंखा लोग कहते थे. इस बीच म…

लघुकथा: उच्च पद

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- प्रशस्यमित्र शास्त्री

बुद्धिमती रमा के लिए पण्डित एक रिश्ता लेकर आए. उस समय मैं भी वहाँ उपस्थित था.

रमा के पिताजी का स्वर्गवास हो गया था, इसलिए उसके चाचा श्री रामदत्त को ही उसका विवाह करना था. पण्डितजी ने उन्हीं के साथ बातचीत की. रमा का भावी वर बैंक में अधिकारी था.

रमा के चाचा उच्चकोटि के ब्राह्मण थे. उन्होंने रमा की मां के समक्ष ही पण्डितजी को कहा कि “लड़का उच्चकोटि का ब्राह्मण नहीं है. चूंकि विवाह-कार्य आदि से जुड़ा सारा खर्च मुझे ही करना है, इसलिए मैं अधम ब्राह्मण के साथ उसका विवाह कैसे कर सकता हूँ?” उसके बाद रामदत्त ने वहीं एकान्त में जाकर पण्डित से पता नहीं क्या मंत्रणा की.

कुछ समय बाद रामदत्त ने अपनी भतीजी का विवाह किसी उच्चवर्गीय ब्राह्मण लिपिक के साथ कर दिया.

एक वर्ष बाद मुझे पं. रामदत्त की पुत्री के विवाह का निमण्त्रण-पत्र प्राप्त हुआ. यथा समय विवाह हो गया. वहाँ यह देखकर मुझे अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि उनकी बेटी का वर वही निम्नवर्गीय, किन्तु उच्चपदस्थ ब्राह्मण युवक था, जिसे उन्होंने रमा के लिए ठुकरा दिया था.

मेरा आश्चर्यचकित मुख देखकर रामदत्त भी समझ गया कि मैं उसकी चालाकी भांप गया हू…

चाँद ‘शेरी’ की लहू बरसाती चंद ग़ज़लें...

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ग़ज़ल एक
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वहाँ पर अमन क्या होगा सुकून की बात क्या होगी,
जहाँ बारिश लहू की हो वहाँ बरसात क्या होगी ।

कभी मेरठ कभी दिल्ली कभी पंजाब में कर्फ़्यू,
भला इससे भी बिगड़ी सूरते-हालात क्या होगी ।

जहाँ इनसाफ़ बिकता हो जहाँ दौलत की पूजा हो,
वहाँ ज़िक्रे वफ़ा इनसानियत की बात क्या होगी ।

ग़रीबों को मयस्सर अब न रोटी है न कपड़ा है,
ऐ आज़ादी तेरी इससे बड़ी सौग़ात क्या होगी ।

तुझे ‘शेरी’ लहू देकर भी इसकी लाज रखनी है,
वतन की आबरू पर जान की औक़ात क्या होगी ।

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ग़ज़ल दो
--.—

राही बैठे लुटकर कितने
रहज़न निकले रहबर कितने ।

पूछे उस क़ातिल से कोई
जालिम काटेगा सर कितने ।

ये फिकरेबाज़ी रहने दो
मारोगे अब कंकर कितने ।

उछले-कूदे फिर नाचे जो
संसद में थे बंदर कितने ।

हैराँ हैं मंदिर-मस्जिद भी
उनकी ख़ातिर खंजर कितने ।

सोने-चाँदी की दुनिया में
असली निकले ज़ेवर कितने ।
‘शेरी’ इन जख़्मों से पूछो
हम पर बरसे पत्थर कितने ।
**.**

ग़ज़ल तीन

ले के खंजर
निकला रहबर ।

मंदिर-मस्जिद
दिल के अंदर ।

आंखों में है
सारा मंजर ।

बिना पानी के
धरती बंजर ।

सच बोला तो
खाए पत्थर ।

तुझमें-मुझमें
क्या है अंतर ।

‘शेरी’ ग़ज़लें
जादू मंतर ।

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चित्र : अनु की डिजिटल कलाकृति

कहानी: 'ड्रेन' में रहने वाली लड़कियां

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-असग़र वजाहत

संसार से लड़कियां ग़ायब हो गई हैं. पूरी दुनिया में अब कोई लड़की नहीं है. यह विचित्र स्थिति पैदा कैसे हुई? सुनिए : रात का दो बजा है. शीतल बाज़ार, पहाड़ी धीरज की गली नंबर बारह के मकान नंबर सात में रहने वाली सरला सफदरजंग अस्पताल के जनरल वार्ड में लेटी है. यहां से वहां तक औरतें ही औरतें हैं. छत पर नंगे बल्ब जल रहे हैं. मरीज़ औरतों के पास तीमारदार औरतें बेड के पास दरी बिछाए पड़ी हैं. झोलों में ख़ाली बर्तन हैं. पानी की आधी ख़ाली बोतले हैं और कभी-कभी कराहने तथा सिसकने की आवाज़ें हैं.


सरला कल दोपहर से छत के पंखे को देखे जा रही है. उसे दोपहर को होश आया था और नर्स ने बताया था कि उसे लड़की हुई है. नर्स को नहीं मालूम था कि सरला के यहां यह तीसरी लड़की है. नर्स बताकर चली गई थी. सरला से मिलने कोई नहीं आया था. न सास, न ससुर, न पति, न देवर, न ननद. सरला चाहती भी न थी कि वे आएं. दस साल यानी शरीर पर निकले दस बड़े-बड़े फोड़े. पहली लड़की का जन्म, फिर दूसरी और अब3तीसरी.

रात में नर्स लड़की को लाई कि मां का दूध पी ले.

सरला ने लड़की को गोद में ले लिया उसे लगा बच्ची तपता हुआ लावा है.
बच्ची को उसने दूध पिलाया और इन चंद मिन…

डॉ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल की लघुकथाएँ

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तख़्तियाँ

बेचारी तख़्तियाँ! कोने वाले कमरे में कार्यालय का टूटा-फूटा सामान रखा जाता था, वहीं पर वे रखी रहती थीं. आज उन्हें वहाँ से निकाला जा रहा था. महापुरुषों के राष्ट्रभाषा संबंधी उद्- गारों से सजी उन तख़्तियों को नौकर पोंछ रहे थे और उन्हें सभागार की ओर ले जा रहे थे.

कार्यक्रम शुरू होने के एक घंटा पूर्व सभागार के चारों ओर वे सुशोभित हो गयी थीं.

कार्यक्रम सम्पन्न होते ही साहब ने अपने सहायक को बुलाया और उसे चाभी देते हुए बोले, “सुनो! उन्हें अच्छी तरह पैक करके उसी कमरे में रखवा दीजिएगा...”

तख़्तियाँ उतारी जाने लगीं और अपने पुराने स्थान पर पहुँचा दी गईं.

ऐसा लग रहा था मानों वे कुछ घंटों के लिए ही ‘पेरोल’ पर छूटी हों.

बेचारी तख़्तियाँ!

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टीस

... चाचाजी! ये ड्राइंग रुम... ये बेडरूम... इस टॉयलेट का संगमरमर मैंने राजस्थान से मंगवाया है... चाचाजी, ये मूर्ति मैंने विदेश से मंगवायी है....!

उनके मित्र का पुत्र रमेश बहुत प्रसन्नता के साथ उन्हें नवनिर्मित भवन दिखा रहा था. वे पूरे भवन का निरीक्षण इस प्रकार कर रहे थे मानों उनकी आँखों को किसी चीज़ की खोज हो. एक वर्ष पूर्व का एक दृश्य उनके मन में खलबली मचा…

सलीम अख़्तर की मौसमी ग़ज़लें

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-सलीम अख़्तरग़ज़ल 1
हवा सी, मौसमों की, पानियों कीसमझता है तू मन्शा तितलियों की
मुझे लिखना, मुझे ईजाद करनामैं जुंबिश में हूँ तेरी उंगलियों की
भटकते रहना घर की जुस्तजू मेंहै बंजारों सी क़िस्मत मकड़ियों की
सहम जाती हैं डर कर बस्तियाँ भीज़रा हिम्मत तो देखो तीलियों की
मुहब्बत से दिलों को जीत लेतेज़रूरत क्या तुम्हें थी फ़ौजियों की
**-**ग़ज़ल 2
दस्तकों के सिलसिले किस के लिएदिल का दरवाज़ा खुले किसके लिए
नींद सारी पहले ही दे दी उसेआँख में सपना पले किसके लिए
शक्ल कोई साफ बनती ही नहींज़हन का पर्दा हिले किसके लिए
धूप की गठरी लिए बैठा है वोरात आँखों में ढले किसके लिए
मौसमों के ख़त अभी आए नहींपाँव में मेहँदी जले किसके लिए
**-**चित्र: सतीश गुजराल का मूर्तिशिल्प

नदीम अहमद ‘नदीम’ की लघुकथाएँ

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वक़्त देख रहा है!

वक़्त देख रहा है कि नन्हा बच्चा बीमार है. ख़ून टेस्ट के लिए कम्पाउण्डर शरीर में सुई चुभो रहा है. बच्चा मां की गोदी में, बाप पास में खड़ा है. दोनों की आँखों में अविरल अश्रुधारा बह रही है.

वक़्त देख रहा है –

वही नन्हा बालक आज एक बड़ा अफ़सर है, लेकिन मां-बाप वृद्ध-आश्रम में दिन काट रहे हैं.

वक़्त देख रहा है –

उसी अफ़सर का बेटा उच्च शिक्षा के लिए विदेश गया था. अब वहीं बस गया.

वक़्त देख रहा है –

रिटायर्ड अफ़सर पत्नी के साथ अकेला बंगले में दिन काट रहा है.

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पब्लिक पॉवर

बड़े सरकारी अस्पताल के आपातकालीन विभाग से रात के समय एक मरीज़ लाया गया है. मरीज़ के साथ दो व्यक्ति और भी हैं. कम्पाउण्डर से बात करने पर वह एक कमरे की ओर इशारा करता है और कहता है कि उसमें ड्यूटी डॉक्टर है.

एक व्यक्ति कमरे में पहुँचता है, डॉक्टर साहब आराम फ़रमा रहे हैं. आहट पाकर आँखें खोलते हैं. व्यक्ति की बात सुनकर कहते हैं, “कम्पाउण्डर से बात करो, अभी आता हूँ.” लेकिन डॉक्टर साहब नहीं आते हैं. दो, तीन बार व्यक्ति कमरे में जाता है, तो डॉक्टर साहब झल्ला जाते हैं.

व्यक्ति के साथ आया व्यक्ति उस के कान में कुछ फुसफुसाता ह…

हैदराबाद के अनवर सलीम की रेशमी ग़ज़ल

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-ग़ज़ल

- अनवर सलीम

तुझसे मिलने के हैं आज पल रेशमी
क्या पता मेरा होगा भी फल रेशमी

ख़त बदन के तेरे सब नुमायां करूं
खींचूं तस्वीर ऐसी सजल रेशमी

तेरे रुख़्सार हैं दू-ब-दू मेरे जब
क्यूं न दिल में खिलें फिर कंवल रेशमी

ज़ेहनो-दिल पर है क़ब्ज़ा मुकम्मल तेरा
ख़्वाब आते भी हैं आजकल रेशमी

तेरा गुस्सा तेरा रुठना भी ग़ज़ब
तेरे माथे का हर एक बल रेशमी

तेरे आँचल में सारी थक दूर हो
छांव भी रेशमी तेरे फल रेशमी

ख़ैर लहजे की मेरे नहीं आज तो
चार सू इसके हैं दल के दल रेशमी

ये ‘सलीम’ एक चेहरे का एहसान है
वरना लिखी न मैंने ग़ज़ल रेशमी

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चित्र – वसीम अहमद की कलाकृति – बुरक़ा . 14 इंच x 10 इंच, काग़ज़ पर गोशे, 2001

हम फिर मिलेंगे - हितेश व्यास

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हितेश व्यास की कुछ नई ग़ज़लें
***.***
ग़ज़ल 1

देगा समय गर साथ तो हम फिर मिलेंगे
होगी कभी बरसात तो हम फिर मिलेंगे ।

हमने उजालों के लिए ओढ़ा अँधेरा
ढल जाएगी रात तो हम फिर मिलेंगे ।

हमको प्रयोजन ही नहीं है उत्तरों से
होगी सवाली जात तो हम फिर मिलेंगे ।

दुःख दर्द का अभ्यस्त वैसे तो बदन है
गर हुआ आघात तो हम फिर मिलेंगे ।

जीतेंगे दोनों गर अभी बाजी उठालें
देने लगेंगे मात तो हम फिर मिलेंगे।

**-**

ग़ज़ल 2
चप्पलों के अनुसार पाँव हो गए
शहर के भीतर गांव हो गए।

न माझी का पता न कोई हम सफर
हम तो उलटी हुई नाव हो गए।

बाजी लगाकर पछताना पड़े
सब इस तरह के दांव हो गए।

पेड़ों पर पड़ गया आदमी का असर
अब तो किराए के छांव हो गए।

**-**
ग़ज़ल 3

मेरी जरूरियात को आप अन्यथा न लें
इस दोस्ती के हाथ को आप अन्यथा न लें।

आदत ये बोलने की है, बचपन से ही मेरी,
मेरी किसी भी बात को आप अन्यथा न लें

पूछा मकाम आपने, मैंने बता दिया,
अब इस तनिक से साथ को आप अन्यथा न लें।

नानी की वो कहानियाँ अब मैं सुनाता हूँ
ऐसे में मेरी जात को आप अन्यथा न लें।

कहती है मां ‘हितेश’ तू आँखें झुका के चल
अब मेरे झुकते माथे को आप अन्यथा न लें।

**-**

रचनाकार - हितेश व्यास की कुछ अन्य रचना…

''आज की होली''

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--अमित कुमार सिंहकहीं खेल रहे हैंखून से होली,कहीं पर खेली जा रही हैइंसानियत से होली।कहीं जल रही हैईमान की होलिका,न्याय का दहनहो रहा है,दे रहे हैं लोगसद्भावनाओं की आहुति।कहकहों की गूँज हैस्वार्थ का चटक है रंग,पहन जिसे हो रहा हैगरीबों का दहन।बोल रे होली!क्या इसके लिएही तू आयी?ये सब देखकरइसपर खुश होऊँ,या हो जाऊँ दु:खी?किस रंग में रंग जाऊँ?क्या करुँ, समझनहीं आ रहा दोस्तों!मेरी बेबसी देखकर,मेरी ऑंखें भी खेलने लगीं हैं,खुद ही के ऑंसुओंकी होली।***-***रचनाकार – अमित कुमार सिंह की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_02.htmlhttp://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post.html

श्यौराजसिंह बेचैन का बेचैन कर देने वाला आत्मकथांश

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बेवक़्त गुज़र गया माली

-श्यौराजसिंह बेचैन

तब मेरी उम्र क़रीब पांच-छह साल की रही होगी. मेरी सब से बड़ी बुआ 'कलावती' डिबाई के पास भीमपुर में, उससे छोटी 'मानों' अतरौली के पास पाली मुकीमपुर में और सबसे छोटी बुआ 'छोटी'_नरौरा के पास धुर्रा प्रेमनगर में ब्याही गई थीं. छोटी बुआ के सगे देवर गंगावासी से डोरी लाल के बड़े भाई गंगासाय की इकलौती संतान 'मानती' की शादी हो चुकी थी. चूंकि, जाति-बिरादरी से गंगासाय ताऊ चाचा (पिता) के भाई लगते थे, इसलिए छोटी बुआ और 'मानती' गांव के रिश्ते से बुआ-भतीजी और ससुराल के रिश्ते से देवरानी-जेठानी लगती थीं. डोरी ताऊ के घर में चन्दौसी की 'स्यामनियां' उर्फ़ 'भूरी' थी. ताई जावित्री और अम्मा सूरजमुखी सहित ये तीनों एक ही मुहल्ले की थीं.


गंगावासी और बीधो यानी दोनों फूफा लगभग तीस साल पहले मुर्दा मवेशी उठाने, चर्म शोधन करने और चर्बी बेचने का मामूली व्यवसाय किया करते थे. गंगावासी आज यानी लगभग चालीस साल बाद 21वीं सदी में भी वही काम कर रहे हैं और उसी कच्चे मकान में रह रहे हैं, जहां मेरे घर-परिवार रूपी बाग के माली ने अंतिम सांस …

लघुकथा : फ़ोटो

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- डॉ. पूरन सिंह

सुनीता भाभी की मृत्यु के बाद भइया लगभग पागल से हो गए थे. अकेले में बातें करते, कभी बात के तो कभी बिना बात के रोते हँसते. दोनों बच्चों की कोई चिंता नहीं. अम्मा-पिताजी ने ही अपने प्रयासों से दोनों बच्चों की देखभाल की थी. तभी एक दिन अम्मा की सलाह पर उन्होंने दूसरी शादी के लिए हाँ कर दी और कुछ दिनों बाद दूसरी पत्नी शारदा ले आए थे जो भाग्य के प्रहसन से अब तक विधवा का जीवन जी रही थी. शारदा भाभी नेक और ईमानदार हैं और उन्हीं की ईमानदारी का परिणाम है कि भइया के दोनों बच्चे आज बड़े-बड़े ओहदों पर हैं. बेटा बड़ी कंपनी में इंजीनियर है तो बेटी डॉक्टर. शारदा भाभी ने अपना कोई बच्चा पैदा नहीं किया और उन्होंने इन्हीं दोनों बच्चों में अपनी ममता खोज ली.

भइया हमेशा सुनीता भाभी के गुणों को बखान करते रहते हैं. मेरी सुनीता ऐसी थी, मेरी सुनीता वैसी थी. भाभी ने कभी कोई शिकायत नहीं की. भइया ने घर बनवाया तो सुनीता भाभी के नाम पर ही घर का नाम “सुनीता महल” रखा. भाभी को कोई शिकायत नहीं हुई. भइया की जेब में हमेशा सुनीता भाभी की फोटो रहती है. घर में मंदिर भी है जिसमें सुनीता भाभी की फोटो है जिसके सामने …

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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