लखनऊ से अलीगढ़ का सफर
लोग जब अपने बारे में लिखते हैं तो सबसे पहले यह बताते हैं कि वो किस शहर के रहने वाले हैं मैं किस शहर को अपना शहर कहूँ? पैदा होने का जुर्म ग्वालियर में किया लेकिन होश संभाला लखनऊ में, पहली बार होश खोया अलीगढ़ में, फिर भोपाल में रहकर कुछ होशियार हुआ, लेकिन बम्बई आकर काफी दिनों तक होश ठिकाने रहे, तो आइए ऐसा करते हैं कि मैं अपनी जिंदगी का छोटा-सा फ्लैशबैक बना लेता हूं। इस तरह आपका काम यानी पढ़ना भी आसान हो जाएगा और मेरा काम भी, यानी लिखना।

शहर लखनऊ... किरदार मेरे नाना-नानी, दूसरे घरवाले और मैं... मेरी उम्र आठ बरस है। बाप बम्बई में है, मां कब्र में।

दिनभर घर के आंगन में अपने छोटे भाई के साथ क्रिकेट खेलता हूं। शाम को टयूशन पढ़ाने के लिए एक डरावने से मास्टर साहब आते हैं। उन्हें पंद्रह रुपए महीना दिया जाता है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है इसलिए कि रोज बताई जाती थी)

सुबह खर्च करने के लिए एक अधन्ना और शाम को एक इकन्नी दी जाती है, इसलिए पैसे की कोई समस्या नहीं है। सुबह रामजीलाल बनिए की दुकान से रंगीन गोलियां खरीदता हूं और शाम को सामने फुटपाथ पर खोमचा लगाने वाले भगवती चाट पर इकन्नी लुटाता हूं। ऐश ही ऐश है।

अमीर बनने का सपना
स्कूल खुल गए हैं। मेरा दाखिला लखनऊ के मशर स्कूल कॉल्विन ताल्लुकेदार कॉलेज में छठी क्लास में करा दिया जाता है। पहले यहां सिर्फ ताल्लुकेदारों के बेटे पढ़ सकते थे, अब मेरे जैसे कमजातों को भी दाखिला मिल जाता है।

अब भी बहुत महंगा स्कूल है... मेरी फीस सत्रह रुपए महीना है (यह बात बहुत अच्छी तरह याद है, इसलिए कि रोज..जाने दीजिए)

मेरी क्लास में कई बच्चे घड़ी बांधते हैं। वो सब बहुत अमीर घरों के हैं। उनके पास कितने अच्छे अच्छे स्वेटर हैं। एक के पास तो फाउंटेन पेन भी है।

ये बच्चे इंटरवल में स्कूल की कैंटीन से आठ आने की चॉकलेट खरीदते हैं (अब भगवती की चाट अच्छी नहीं लगती) कल क्लास में राकेश कह रहा था- 'उसके डैडी ने कहा है कि वो उसे पढ़ने के लिए इंग्लैंड भेजेंगे। कल मेरे नाना कह रहे थे... 'अरे कमबख्त! मैट्रिक पास कर ले तो किसी डाकख़ाने में मोहर लगाने की नौकरी तो मिल जाएगी।

इस उम्र में जब बच्चे इंजन ड्राइवर बनने का ख़्वाब देखते हैं, मैंने फैसला कर लिया है कि बड़ा होकर अमीर बनूंगा...

अलीगढ़ में
शहर अलीगढ़... किरदार मेरी खाला, दूसरे घर वाले और मैं... मेरे छोटे भाई को लखनऊ में नाना के घर में ही रख लिया गया है और मैं अपनी खाला के हिस्से में आया हूं जो अब अलीगढ़ गई हैं।

ठीक ही तो है। दो अनाथ को कोई एक परिवार तो नहीं रख सकता।

मेरी खाला के घर के सामने दूर जहां तक नजर जाती है मैदान है। उस मैदान के बाद मेरा स्कूल है... नौवीं क्लास में हूं, उम्र चौदह बरस है।

अलीगढ़ में जब सर्दी होती है तो झूठमूठ नहीं होती। पहला घंटा सात बजे होता है। मैं स्कूल जा रहा हूं।

सामने से चाकू की धार की जैसी ठंडी और नुकीली हवा रही है। छूकर भी पता नहीं चलता कि चेहरा अपनी जगह है या हवा ने नाककान काट डाले हैं। वैसे पढ़ाई में तो नाक कटती ही रहती है।

पता नहीं कैसे, बस, पास हो जाता हूं। इस स्कूल में, जिसका नाम मिंटो सर्किल है, मेरा दाखिला कराते हुए मेरे मौसा ने टीचर से कहा- 'ख्याल रखिएगा इनका, दिल पढ़ाई में कम, फ़िल्मी गानों में ज्यादा लगता है।

दिलीप कुमार की 'उड़न खटोला, राजकपूर की 'श्री चार सौ बीस देख चुका हूं। बहुत से फ़िल्मी गाने याद हैं, लेकिन घर में ये फ़िल्मी गाने गाना तो क्या, सुनना भी मना है इसलिए स्कूल से वापस आते हुए रास्ते में जोर जोर से गाता हूं (माफ कीजिएगा, जाते वक्त तो इतनी सर्दी होती थी कि सिर्फ पक्के राग ही गाए जा सकते थे)

भोपाल में भूखे रहने के दिन
मेरा स्कूल यूनिवर्सिटी एरिया में ही है। मेरी दोस्ती स्कूल के दो चार लड़कों के अलावा ज्यादातर यूनिवर्सिटी के लड़कों से है। मुझे बड़े लड़कों की तरह होटलों में बैठना अच्छा लगता है। अकसर स्कूल से भाग जाता हूं। स्कूल से शिकायतें आती हैं।

कई बार घर वालों से काफी पिटा भी, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। कोर्स की किताबों में दिल नहीं लगा तो नहीं लगा। लेकिन नॉवेल बहुत पढ़ता हूं। डांट पड़ती है लेकिन फिर भी पढ़ता हूं।

मुझे शेर बहुत याद हैं। यूनिवर्सिटी में जब भी उर्दू शेरों की अंताक्षरी होती है, मैं अपने स्कूल की तरफ से जाता हूं और हर बार मुझे बहुत से इनाम मिलते हैं।

यूनिवर्सिटी के सारे लड़के-हड़किया मुझे पहचानते हैं। लड़के मुझे पहचानते हैं, मुझे इसकी खुशी है, लड़कियां मुझे पहचानती हैं, इसकी थोड़ी ज्यादा खुशी है।

पहला प्रेमपत्र
...अब मैं कुछ बड़ा हो चला हूं...मैं पंद्रह साल का हूं और जिंदगी में पहली बार एक लड़की को खत लिख रहा हूं, मेरा दोस्त बीलू मेरी मदद करता है।

हम दोनों मिलकर यह खत तैयार करते हैं। दूसरे दिन एक खाली बैडमिंटन कोर्ट में वो लड़की मुझे मिलती है और हिम्मत करके मैं यह खत उसे दे देता हूं।

यह मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी प्रेमपत्र है। (उस खत में क्या लिखा था, यह भूल गया लेकिन वो लड़की आज तक याद है)

मैट्रिक के बाद अलीगढ़ छोड़ रहा हूं। मेरी खाला बहुत रो रही हैं और मेरे मौसा उन्हें चुप कराने के लिए कह रहे हैं कि तुम तो इस तरह रो रही हो, जैसे यह भोपाल नहीं 'वार फ्रंट यानी युद्ध के मैदान में जा रहा हो (उस वक्त वो जानते थे, मैं जानता था कि मैं सचमुच 'वार फ्रंट पर ही जा रहा था)

शहर भोपाल... किरदार अनगिनत मेहरबान, बहुत से दोस्त और मैं... अलीगढ़ से बम्बई जाते हुए मेरे बाप ने मुझे भोपाल या यूं कहिए आधे रास्ते में छोड़ दिया है।

कुछ दिनों अपनी सौतेली मां के घर में रहा हूं। फिर वो भी छूट गया।

दोस्त और भोपाल
सोफिया कॉलेज में पढ़ता हूं और दोस्तों के सहारे रहता हूं। दोस्त, जिनकी लिस्ट बनाने बैठूं तो टेलीफोन डायरेक्ट्री से मोटी किताब बन जाएगी।

आजकल मैं बीए सेकंड ईयर में हूं। अपने दोस्त एजाज के साथ रहता हूं। किराया वो देता है। मैं तो बस रहता हूं।

वो पढ़ता है और टयूशन करके गुजर करता है। सब दोस्त उसे मास्टर कहते हैं... मास्टर से मेरा किसी बात पर झगड़ा हो गया है। बातचीत बंद है, इसलिए मैं आजकल उससे पैसे नहीं माँगता, सामने दीवार पर टंगी हुई उसकी पैंट में से निकाल लेता हूं। वो बगैर मुझसे बात किए मेरे सिरहाने दो एक रुपए रखकर चला जाता है।

मैं बीए फाइनल में हूं, यह इस कॉलेज में मेरा चौथा बरस है। कभी फीस नहीं दी... कॉलेज वालों ने मांगी भी नहीं, यह शायद सिर्फ भोपाल में ही हो सकता है।

कॉलेज के कम्पाउंड में एक खाली कमरा, वो भी मुझे मुफ्त दे दिया गया है, जब क्लास खत्म हो जाती है तो मैं किसी क्लास रूम से दो बेंच उठा कर इस कमरे में रख लेता हूं और उन पर अपना बिस्तर बिछा लेता हूं। बाकी सब आराम है, बस बेंचों में खटमल बहुत हैं।

जिस होटल में उधार खाता था, वो मेरे जैसे मुफ़्तख़ोरों को उधार खिलाखिलाकर बंद हो गया है। उसकी जगह जूतों की दुकान खुल गई है।

अब क्या खाऊं। बीमार हूं, अकेला हूं, बुखार काफी है, भूख उससे भी ज्यादा है। कॉलेज के दो लड़के, जिनसे मेरी मामूली-सी जान-पहचान है मेरे लिए टिफिन में खाना लेकर आते हैं... मेरी दोनों से कोई दोस्ती नहीं है, फिर भी... अजीब बेवकूफ हैं।

लेकिन मैं बहुत चालाक हूं, उन्हें पता भी नहीं लगने देता कि इन दोनों के जाने के बाद मैं रोऊंगा।

मैं अच्छा हो जाता हूं। वो दोनों मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो जाते हैं... मुझे कॉलेज में डिबेट बोलने का शौक हो गया है।

पिछले तीन बरस से भोपाल रोटरी क्लब की डिबेट का इनाम जीत रहा हूं।

इंटर कॉलेज डिबेट की बहुत सी ट्रॉफियां मैंने जीती हैं। विक्रम यूनिवर्सिटी की तरफ से दिल्ली यूथ फेस्टिवल में भी हिस्सा लिया है।

कॉलेज में दो पार्टियां हैं और चुनाव में दोनों पार्टियां मुझे अपनी तरफ से बोलने को कहती हैं... मुझे चुनाव से नहीं, सिर्फ बोलने से मतलब है, इसलिए मैं दोनों की तरफ से तकरीर कर देता हूं।

मुश्ताकसिंह की दोस्ती और बंबई का संघर्ष

कॉलेज का यह कमरा भी जाता रहा। अब मैं मुश्ताक सिंह के साथ हूं। मुश्ताक सिंह नौकरी करता है और पढ़ता है। वो कॉलेज की उर्दू एसोसिएशन का सदर है।

मैं बहुत अच्छी उर्दू जानता हूं। वो मुझसे भी बेहतर जानता है। मुझे अनगिनत शेर याद हैं। उसे मुझसे ज्यादा याद हैं। मैं अपने घर वालों से अलग हूं। उसके घर वाले हैं ही नहीं। ...देखिए हर काम में वो मुझसे बेहतर है।

साल भर से वो मुझसे दोस्ती खाने कपड़े पर निभा रहा है यानी खाना भी वही खिलाता है और कपड़े भी वही सिलवाता है पक्का सरदार है लेकिन मेरे लिए सिगरेट खरीदना उसकी जिम्मेदारी है।

अब मैं कभी कभी शराब भी पीने लगा हूं। हम दोनों रात को बैठे शराब पी रहे हैं। वो मुझे विभाजन और उस जमाने के दंगों के किस्से सुना रहा है।

वो बहुत छोटा था लेकिन उसे याद है कैसे दिल्ली के करोलबाग में दो मुसलमान लड़कियों को जलते हुए तारकोल के ड्रम में डाल दिया गया था और कैसे एक मुसलमान लड़के को...

मैं कहता हूं, 'मुश्ताकसिंह! तू क्या चाहता है जो एक घंटे से मुझे ऐसे किस्से सुनासुनाकर मुस्लिम लीग बनाने की कोशिश कर रहा है जुल्म की ये ताली तो दोनों हाथों से बजी थी अब जरा दूसरी तरफ की भी तो कोई वारदात सुना।

मुश्ताकसिंह हँसने लगता है...'चलो सुना देता हूं जग बीती सुनाऊं या आप बीती। मैं कहता हूं 'आप बीती और वो जवाब देता है, 'मेरा ग्यारह आदमियों का खानदान था दस मेरी आंखों के सामने कत्ल किए गए हैं...

मुश्ताकसिंह को उर्दू के बहुत से शेर याद हैं। मैं मुश्ताकसिंह के कमरे में एक साल से रहता हूं। बस एक बात समझ में नहीं आती'मुश्ताकसिंह तुझे उन लोगों ने क्यों छोड़ दिया? तेरे जैसे भले लोग चाहे किसी जात, किसी मजहब में पैदा हों हमेशा सूली पर चढ़ाए जाते हैं, तू कैसे बच गया?

...
आजकल वो ग्लासगो में हैं। जब हम दोनों अलग हो रहे थे तो मैंने उसका कड़ा उससे लेकर पहन लिया था और वह आज तक मेरे हाथ में है और जब भी उसके बारे में सोचता हूं, ऐसा लगता है कि वो मेरे सामने हैं और कह रहा है,
'
बहुत नाकामियों पर आप अपनी नाज करते हैं
अभी देखी कहां हैं आपने नाकामियां मेरी

बंबई में...
शहर बंबई...किरदार फिल्म इंडस्ट्री, दोस्त, दुश्मन और मैं...

4
अक्टूबर 1964, मैं बंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा हूं। अब इस अदालत में मेरी जिंदगी का फैसला होना है।

बंबई आने के छह दिन बाद बाप का घर छोड़ना पड़ता है।

जेब में सत्ताईस नए पैसे हैं। मैं खुश हूं कि जिंदगी में कभी अट्ठाईस नए पैसे भी जेब में गए तो मैं फ़ायदे में रंगा और दुनिया घाटे में।

बंबई में दो बरस होने को आए, रहने का ठिकाना है खाने का।

यूं तो एक छोटी सी फिल्म में सौ रुपए महीने पर डायलॉग लिख चुका हूं। कभी कहीं असिस्टेंट हो जाता हूं, कभी एक आध छोटा मोटा काम मिल जाता है, अकसर वो भी नहीं मिलता।

दादर एक प्रोडयूसर के ऑफिस अपने पैसे मांगने आया हूं, जिसने मुझसे अपनी पिक्चर के कॉमेडी सीन लिखवाए थे। ये सीन उस मशर राइटर के नाम से ही फिल्म में आएंगे जो ये फिल्म लिख रहा है। ऑफिस बंद है।

एक फिल्म में डायलॉग लिखने का काम मिला है। कुछ सीन लिखकर डायरेक्टर के घर जाता हूं। वो बैठा नाश्ते में अनानास खा रहा है, सीन लेकर पढ़ता है और सारे कागज मेरे मुंह पर फेंक देता है और फिल्म से निकालते हुए मुझे बताता है कि मैं जिंदगी में कभी राइटर नहीं बन सकता।

वापस बांदरा जाना है जो काफी दूर है। पैसे बस इतने हैं कि या तो बस का टिकट ले लूं या कुछ खा लूं, मगर फिर पैदल वापस जाना पड़ेगा। चने खरीदकर जेब में भरता हूं और पैदल सफर शुरू करता हूं।

कोहेनूर मिल्स के गेट के सामने से गुजरते हुए सोचता हूं कि शायद सब बदल जाए लेकिन ये गेट तो रहेगा। एक दिन इसी के सामने से अपनी कार से गुजरूंगा।

तपती धूप में एक सड़क पर चलते हुए मैं अपनी आंख के कोने में आया एक आंसू पोंछता हूं और सोचता हूं कि मैं एक दिन इस डायरेक्टर को दिखाऊँगा कि मैं... फिर जाने क्यों ख्याल आता है कि क्या ये डायरेक्टर नाश्ते में रोज अनानास खाता होगा?

कभी धूप कभी छांव के दिन
...रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है। मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढ़ियों पर एक कमजोर से बल्ब की कमजोर-सी रोशनी में बैठा हूं। पास ही जमीन पर इस आंधी तूफान से बेखबर तीन आदमी सो रहे हैं।

दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है। बारिश लगता है अब कभी नहीं रुकेगी। दूर तक खाली अंधेरी सड़कों पर मूसलधार पानी बरस रहा है। खामोश बिल्डिंगों की रोशनियां कब की बुझ चुकी हैं।

लोग अपने अपने घरों में सो रहे होंगे। इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है। बंबई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूं, जैसे कुछ नहीं हूं। आदमी कितनी भी हिम्मत रखे, कभी कभी बहुत डर लगता है।

...
मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो (जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूं। कंपाउंड में कहीं भी सो जाता हूं। कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरीडोर में। यहां मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोजगार इसी तरह रहते हैं।

उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है। वो रोज एक नई तरकीब सोचता है कि आज खाना कहां से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है। जगदीश ने बुरे हालात में जिंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है।

मेरी जानपहचान अंधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है। इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है। रात रात भर कम्पाउंड में जहां भी थोड़ी रोशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूं।

दोस्त मजाक करते हैं कि मैं इतनी कम रोशनी में अगर इतना ज्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊंगा... आजकल एक कमरे में सोने का मौका मिल गया है।

स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ दीवारों में लगी बड़ी बड़ी अलमारियां हैं जिनमें फिल्म पाकीजा के दर्जनों कॉस्टयूम रखे हैं।

मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं, इसलिए इन दिनों फिल्म की शूटिंग बंद है। एक दिन मैं एक अलमारी का खाना खोलता हूं, इसमें फिल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फिल्मफेयर अवॉर्ड भी पड़े हैं।

मैं उन्हें झाड़ पोंछकर अलग रख देता हूं। मैंने जिंदगी में पहली बार किसी फिल्म अवॉर्ड को छुआ है।

रोज रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफ़ी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूं और सोचता हूं कि जब ये ट्रॉफ़ी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूंजते हुए हॉल में बैठे हुए लोगों की तरफ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराऊंगा और कैसे हाथ हिलाऊंगा।

इसके पहले कि इस बारे में कोई फैसला कर सकूं, स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते।

यह वह दौर था जब कामयाबी मिलने लगी थी। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतजाम नहीं होता, हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे (महाकाली अंधेरी से आगे एक इलाका है जहां अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है।

उस जमाने में वहां सिर्फ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी छोटी पहाड़ियां जिनमें बौद्ध भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएं थीं, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरसगांजा पीने वाले साधु पड़े रहते थे।

महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की जरूरत नहीं, आपके तन पर सिर्फ बैठ जाएं तो आंख खुल जाती है। एक ही रात में ये बात समझ में गई कि वहां चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता। तीन दिन जैसेतैसे गुजारता हूं।

बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है। मैं बांदरा जा रहा हूं। जगदीश कहता है दो एक रोज में वो भी कहीं चला जाएगा (ये जगदीश से मेरी आखिरी मुलाकात थी)

आने वाले बरसों में जिंदगी मुझे कहां ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफाओं में चरस और कच्ची दारू पीपीकर मर गया और वहां रहने वाले साधुओं और आसपास के झोंपड़पट्टी वालों ने चंदा करके उनका क्रियाकर्म कर दिया किस्सा खतम।

मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की खबर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूं कि मुझमें कौन से लाल टंके हैं और जगदीश में ऐसी क्या खराबी थी।

ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी कभी सब इत्तफाक लगता है। हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं।

मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूं वो पेशेवर जुआरी है। वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं। मुझे भी सिखा देते हैं। कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुजारा होता है, फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा।

एक मशर और कामयाब राइटर मुझे बुलाकर ऑफर देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूं (जिन पर जाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रुपए महीना देंगे।

सोचता हूँ ये छह सौ रुपए इस वक्त मेरे लिए छह करोड़ के बराबर हैं, ये नौकरी कर लूं, फिर सोचता हूं कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, जिंदगी भर यही करता रह जाऊंगा, फिर सोचता हूं अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूं देखा जाएगा।

तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूं। दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुजरते हैं। बंबई में पांच बरस होने को आए, रोटी एक चांद है, हालात बादल, चांद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है।

ये पांच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सिर नहीं झुका सके। मैं नाउम्मीद नहीं हूं। मुझे यकीन है, पूरा यकीन है, कुछ होगा, कुछ जरूर होगा, मैं यूं ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूं और आखिर नवंबर, 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फिल्म वालों की जबान में सही 'ब्रेक कहा जाता है।

कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग है। अचानक देखता हूँ कि दुनिया खूबसूरत है और लोग मेहरबान। साल डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है।

हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूं अपना पहला घर, अपनी पहली कार। तमन्नाएं पूरी होने के दिन गए हैं मगर जिंदगी में एक तनहाई तो अब भी है।

'
सीता और गीता के सेट पर मेरी मुलाकात हनी ईरानी से होती है। वो एक खुले दिल की, खरी जबान की मगर बहुत हंसमुख स्वभाव की लड़की है। मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है।

मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं (कुछ जख्मों को भरना अलादीन के चिराग के देव के बस की बात नहीं ये काम सिर्फ वक्त ही कर सकता है) दो साल में एक बेटी और एक बेटा, जोया और फरहान होते हैं।

अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फिल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बारों और मैगजीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियां, दुनिया के सफर, चमकीले दिन, जगमगाती रातें जिंदगी एक टेक्नीकलर ख्वाब है, मगर हर ख्वाब की तरह यह ख्वाब भी टूटता है।

पहली बार एक फिल्म की नाकामी (फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी, मगर कामयाबी की वो खुशी और खुशी की वो मासूमियत जाती रही)

शेर लिखकर सुलह की एक बागी बेटे ने
18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है (मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आखिरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी। उस पर लिखा था'जब हम रहेंगे तो बहुत याद करोगे। (उन्होंने ठीक लिखा था)

अब तक तो मैं अपने आपको एक बागी और नाराज बेटे के रूप में पहचानता था, मगर अब मैं कौन हूं। मैं अपने आपको और फिर अपने चारों तरफ, नई नज़रों से देखता हूं कि क्या बस यही चाहिए था मुझे जिंदगी से।

इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे खुशी देती थीं, झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं।

अब मेरा दिल उन बातों में ज्यादा लगता है जिनसे दुनिया की जबान में कहा जाए तो, कोई फायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूं कि चहूँ तो शायरी कर सकता हूं मगर आज तक की नहीं है।

ये मेरी नाराजगी और बगावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शेर कहता हूं और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है।

इसी दौरान मेरी मुलाकात शबाना से होती है। कैफी आजमी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ लौट रही है। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था।

कोई हैरत नहीं कि हम करीब आने लगते हैं। धीरेधीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फ़िल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी, टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होने वाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं।

(
हनी से मेरी शादी जरूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सका। और अगर मांबाप के अलग होने से रिश्तों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ बहुत ज्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फिल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज्जत करता हूं जितनी इज्जत मेरे दिल में हनी के लिए है।)

मैंने एक कदम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी जिंदगी कटी उम्र होटलों में, मरे अस्पताल जाकर जैसी हो गई।

शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ही ज्यादा पीने लगा। ये मेरी जिंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूं।

इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है। बहुत मुमकिन था कि मैं यूं ही शराब पीते पीते मर जाता। मगर एक सवेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊंगा।

आज इतने बरसों बाद जब अपनी जिंदगी को देखता
हूं तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चट्टानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूंती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भंवर बनाती, तेज चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।

मेरे ब
च्चे जोया और फरहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला कदम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आंखों में आने वाले कल के हसीन ख्वाब हैं।

सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुतसी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत जहीन बच्चों का बाप है। जिंदगी के रास्ते उसके लिए कम कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंजिल पा ली है। और आज भी आगे ब
ढ़ रहा है।

मैं खुश
हूं और शबाना भी, जो सिर्फ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक खूबसूरत दिल भी है और एक कीमती जहन भी। मैं जिस दुनिया में रहता हूं वो उस दुनिया की औरत है ये पंक्ति अगर बरसों पहले मजाज ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।

आज यूं तो जिंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है।

जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर
रोती हुई मेरी खाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढ़े छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहां फर्श पर बहुत-सी औरतें बैठी हैं।

तख्त पर सफेद कफन में लेटी मेरी मां का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढी नानी थकी
-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं।

मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आखिरी बार देख लो। मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार
हूं। जानता हूं मौत क्या होती है।

मैं अपनी मां के चेहरे को बहुत गौर से देखता
हूं कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी खाला कह रही हैं इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करो कि तुम जिंदगी में कुछ करोगे। मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूं और फिर कोई औरत मेरी मां के चेहरे पर कफन ओढ़ा देती है

ऐसा तो नहीं है कि मैंने जिंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख्याल आता है कि मैं जितना कर सकता
हूं, उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं।

रचनाकार जावेद अख़्तर जाने माने फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर हैं प्रस्तुत अंश उनके काव्य संग्रह तरकश से साभार.