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-कृष्ण कुमार यादव
कश्मीर
भारतीय कश्मीर, आजाद कश्मीर
पर कश्मीरी अवाम कहीं नहीं
चंद भर मुट्ठी के लोग
लाखों अवाम की जिन्दकी के
फैसले का दावा करते हैं
पर कोई उस स्वर्ग से
कश्मीर की बात नहीं करता
एक कश्मीर को लेकर
खींची गई नफरत की रेखाएँ
तुम सिर्फ कश्मीर को लेने की
बात क्यों करते हो
पूरा भारत ही क्यों नहीं
तुम्हारा हो सकता
अतीत की परछाइयों से क्या डरना
चाहे भारत पाक में जाए
या पाक भारत में आए
पर हम एक तो होंगे
फिर यह तो अवाम तय करेगी
शासकों का भविष्य क्या है?
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प्रकृति की लड़ाई
नहीं लड़े जाते अब लम्बे-लम्बे युद्ध
लड़ती है प्रकृति अब खुद की लड़ाई
जनसंख्या - पर्यावरण असंतुलन, भ्रष्टाचार
और न जाने क्या-क्या
लो भुगतो इन सबका कहर
कभी सुनामी लहरें
कभी कैटरीना और रीटा
इन सबके बीच
नष्ट होती सभ्यताएँ
शायद प्रलय का संकेत है.
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वातायन
खोल दो इन वातायनों को
आने दो खुली हवा
इस बंद कमरे में
मुझे घुटन सी होती है.
मैं उड़ना चाहता हूँ
दूर कहीं
कोई मुझे पंख लाकर दे दे.
मैं बहना चाहता हूँ
नदी के अविरल जल की तरह
क्योंकि ठहरे हुए पानी में
सड़ांध की बू आती है.
मैं लिखना चाहता हूँ
वेदव्यास के गणेश की तरह
क्योंकि लेखनी ही वह ताकत है
जो व्यवस्था में क्रांति
पैदा कर सकती है.
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रचनाकार - कृष्ण कुमार यादव की कविताएँ, कहानियाँ, व आलेख भारत के विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. एक काव्य संग्रह प्रकाशित तथा एक निबंध संग्रह व एक कहानी संग्रह प्रकाशन में. हिन्दी के कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित.
संप्रति - भारतीय डाक सेवा, कानपुर में वरिष्ठ डाक अधीक्षक.
रवि जी,
प्रत्युत्तर देंहटाएंसाधारण भाषा में बिना किसी cliche का इस्तेमाल किये हुये कृष्णकुमार यादव ने सीधी बात कही है। अति सुन्दर। प्रस्तुति के लिये धन्यवाद।