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October, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

व्यंग्य : उधारी का दर्शन

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व्यंग्यउधारी का दर्शन- श्याम सुंदर व्यासउधारी, मध्यमवर्गीय मंहगाई के मारों के लिए सदैव से संकट-मोचक रही है. वेतनभोगियों की जेब एक तरफ से चील का घोंसला है. अगर हाथ खुला हो तो हमेशा तंग रहता है. चादर के अनुसार पाँव पसारने की आदत हो तो बात दूसरी है वरना उधारी वह ‘इलास्टिक' है जिसे खींच-खींचकर कभी अपना सिर ढका जा सकता है, कभी पाँव. साख बचाने का यही सहज मार्ग है.उधारी को कभी मुहब्बत की कैंची कहा जाता था. आजकल इसे संबंध जोड़ने वाला ‘फ़ेवीकोल' समझा जाता है. ‘आज नगद, कल उधार' - वाला कधन घिस-पिट गया है. बाजार में उधारी का बोलबाला है. लुभावने विज्ञापन सामने आ रहे है. मकान खरीदना हो तो अर्थ की व्यवस्था है, गाड़ी या स्कूटर लेना हो तो आसान किस्तों पर सुलभ है. यह एक प्रकार की उधारी व्यवस्था है. व्यवसाय के पंगु -पाँव उधारी से थिरकने लगे हैं. विकास का दरवाजा उधारी की चाबी से खुलता है और अगर आपकी कुछ ‘साख' है तो उधारी के अनेक दरवाजे आपके लिए खुले पड़े हैं.पान-बीड़ी और परचूनी की दुकाने से लगाकर वित्त निगमों तक आप अपनी ‘साख' को भुना सकते हैं. एक बार साख जमी कि आपकी पौ बारह. साख जमान…

तमसो मा ज्योतिर्गमय:

*दीपावाली की मंगल कामनाएं*- डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल हर साल दीवाली पर बहुत सारे बधाई कार्ड आते हैं. आजकल कार्डों के अलावा ई मेल
और एस एम एस भी खूब आते हैं. ई मेल और एस एम एस तो खैर वैसे ही क्षण- भंगुर
होते हैं, कार्ड भी कुछ दिनों के बाद इधर- उधर हो जाते हैं, चाहे कितने ही
आकर्षक और अर्थ व्यंजक क्यों न हों! शायद सबके साथ ऐसा ही होता हो. हम लिखने -पढ़ने
के व्यसनी लोगों के पास तो वैसे भी डाक खूब आती है. आखिर कोई कब तक और कितना
सम्हाल कर रख सकता है? मैं तो अपनी नौकरी के अंतिम कुछ वर्षों में कई बार *'
तबा-दलित'* भी हुआ, अत: स्वाभाविक ही था कि *' पत्रं पुष्पं'* का बोझ ज़रा कम ही
रखता. एक और बात भी, जब चयन का अवसर आता है तो हम सब सार्वजनिक की तुलना में
वैयक्तिक को पहले बचाये रखना चाहते हैं. ऐसे में मुद्रित कार्डों की बजाय
हस्त-लिखित या व्यक्तिगत पत्र अधिक सुरक्षित रखे जाते हैं.
इधर सारे ही पर्व त्यौहारों की तरह दिवाली का भी घोर व्यावसायिकीकरण हुआ है.
अन्य बहुत सारी बातों के अतिरिक्त , शुभकामनाएं देना-लेना भी सम्पर्क
बनाने-बढाने का, वो जिसे आधुनिक शब्दावलि में पी आर (PR) कहते हैं उसका, माध्…

चुटकुले - 751 से 800

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चुटकुला # 0751
नौकर (मालिक से)- अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं करेगेे, तो मैं
नौकरी छोड़ दूंगा।
मालिक (नौकर से)- ऐसा क्यों कह रहे हो? मैंने तो तुम्हें घर की चाबियां
दे रखी है।
नौकर (मालिक से)-हां तभी तो कह रहा हूं, क्योंकि उनमें सेफ की चाबियां
नहीं है।


चुटकुला # 0752
एक महिला (भिखारी से)- तुम रोज दोपहर के वक्त ही मेरे घर खाना
मांगने क्यों आते हो?
भिखारी (महिला से) - दरअसल, मुझे डॉक्टर ने दोपहर के भोजन में
तीखी तली, मसालेदार और तेल वाली चीज खाने से मना किया है।


चुटकुला # 0753
बॉस (मुकेश से)- अरे मुकेश! फिर तीन दिन की छुट्टी? पिछले दो सालों
में तुमने न जाने कितनी बार छुट्टियां ली है। कभी सगाई, कभी हनीमून,
बच्चे की बीमारी, कभी नामकरण... अब क्या है?
मुकेश (बॉस से)- जी कल मेरी शादी है।


चुटकुला # 0754
मोटे राम एक शहर घूमने गए वहां प्लेटफार्म पर रखी वजन करने वाली
मशीन पर लिखा था ‘मैं आपका वजन कर सकती हूं।‘ कृपया रुपया
डालिए।
मोटे राम उस पर चढ़ गए और रुपया डाला।
मशीन से फौरन कार्ड निकला, जिस पर लिखा था- सावधान, कृपया
एक-एक करके खड़े हो एक साथ नहीं।


चुटकुला # 0755
शर्माजी (नेता दोस्त से)- यार आजकल मैं बहुत परेशान …

बाबा नागार्जुन की चंद कविताएँ

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बाबा नागार्जुन की कुछ कविताएँ1 इन घुच्ची आँखों मेंक्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!**-**चन्दू मैंने सपना देखा... चन्दू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से हूं पटना लौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबूचन्दू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डरचन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से पटना आए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए होचन्दू, मैंने सपना देखा, फैल गया …

धूमिल की चंद कविताएँ....

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धूमिल की कुछ कविताएँ1 दिनचर्यासुबह जब अंधकार कहीं नहीं होगा,
हम बुझी हुई बत्तियों को
इकट्ठा करेंगे और
आपस में बांट लेंगे.दुपहर जब कहीं बर्फ नहीं होगी
और न झड़ती हुई पत्तियाँ
आकाश नीला और स्वच्छ होगा
नगर क्रेन के पट्टे में झूलता हुआ
हम मोड़ पर मिलेंगे और
एक दूसरे से ईर्ष्या करेंगे.रात जब युद्ध एक गीत पंक्ति की तरह
प्रिय होगा हम वायलिन को
रोते हुए सुनेंगे
अपने टूटे संबंधों पर सोचेंगे
दुःखी होंगे.2 नगर-कथासभी दुःखी हैं
सबकी वीर्य-वाहिनी नलियाँ
सायकिलों से रगड़-रगड़ कर
पिंची हुई हैं
दौड़ रहे हैं सब
सम जड़त्व की विषम प्रतिक्रिया :
सबकी आँखें सजल
मुट्ठियाँ भिंची हुई हैं.व्यक्तित्वों की पृष्ठ-भूमि में
तुमुल नगर-संघर्ष मचा है
आदिम पर्यायों का परिचर
विवश आदमी
जहाँ बचा है.बौने पद-चिह्नों से अंकित
उखड़े हुए मील के पत्थर
मोड़-मोड़ पर दीख रहे हैं
राहों के उदास ब्रह्मा-मुख
‘नेति-नेति' कह
चीख रहे हैं...
3 गृहस्थी : चार आयाममेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)मेरी भुजाओं …

व्यंग्य क्षणिकाएँ

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- मिश्रीलाल जायसवालजनसेवकथानेदार साहब
जनसेवा को
समर्पित हैं
जिससे कुछ मूर्छित
कुछ काल कलवित कवलित हैंभवसागरस्वामी जी ने
भव सागर
पार कराना तय किया
जो इस तरह साकार हुआ
मलमत्ता
पार हुआबजटजब
घाटे का
बजट आया
महँगाई ने
वित्तमंत्री के पास
अपना सलाम भिजवाया..
गणितवे अपना गणित
हमेशा ठीक रखते हैं
पाँच हजार फंड में देकर
पांचों उँगली घी में करते हैंधंधावे अपने धंधे में
तरक्की की उड़ान भर रहे हैं
पहले ब्लैक करते थे
अब ब्लैकमेल कर रहे हैं----.
साभार - कहानीकार, अंक 134, वर्ष 29.

चुटकुले - 701 से 750

चुटकुला # 0701
रमेश (अपनी सास से)- आपने तो कहा था कि आपकी लड़की शाकाहारी
है।
सास (रमेश से)- पक्की शाकाहारी है बेटा।
रमेश (सास से) - घर पर तो दो-दो घंटे तक मेरा दिमाग खाती रहती है,
फिर शाकाहारी कैसे हुई?चुटकुला # 0702
पति (पत्नी से)- पता नहीं, क्यों आजकल रात में मुझे बड़े मीठे-मीठे सपने
आ रहे है?
पत्नी (पति से)- खबरदार जो अब तुमने कभी मीठे सपने देखे। तभी मैं
कहूं कि तुम्हारी डॉयबिटीज बार-बार क्यों बढ़ जाती है।


चुटकुला # 0703
पति (पत्नी से)- ‘आज तुम्हें मेरा बांसुरी बजाना बुरा लगता है लेकिन एक
दिन मेरे बांसुरी बजाने पर रीझ कर तुमने मुझसे शादी की थी।'
पत्नी गुस्से से, ‘हां की थी लेकिन बांसुरी बजाने पर रीझकर नहीं बल्कि
यह सोचकर की थी कि जिस तरह तुम बांसुरी में फूंक मारते हो उसी तरह
चूल्हा भी अच्छी तरह फूंकोगे।'


चुटकुला # 0704
मुकेश (राजेश से)- ‘तुम्हें बंदूक अधिक सावधानी से चलानी चाहिए।
तुम्हारी गोली मेरी पत्नी को लगते-लगते बची।'
राजेश (मुकेश से)- ‘मुझे माफ कर दो भाई।' ये लो मेरी बंदूक आप मेरी
पत्नी पर एक नहीं, दो-दो गोलियां चला दो।

चुटकुला # 0705पति (पत्नी से)- डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हें कोई बी…

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की तीन कविताएँ

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.1 दुःख सगा है
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'जब से यह दुःख
रात-दिन मेरे पीछे
लगा है ,
तब से मैंने जाना
गैर हैं सब
एक यही तो मेरा सगा है.सगे जो होते हैं
जरा जरा सी बात पर
मुँह मोड जाते हैं ,
हम चाहें उन्हें मनाना
पर वे साथ छोड़ जाते हैं.
इन सुखों ने और सगों ने
मौका मिलने पर
मुझको बार बार ठगा है,
यह दुःख ही है बेचारा
जो मेरे हर दर्द में
सिरहाने बैठा रहा है
रात -रात भर
साथ -साथ जगा है.
****
2 इस धरती परधरो पैर इस धरती पर
तब आगे बढ़ पाओगे.
नभ में इतना नहीं उड़ो
जाने कब गिर जाओगे.आंखों पर पट्टी बांधे
क्या पर्वत चढ़ पाओगे.
सावधान किसी दिन बड़े
गड्ढे में गिर जाआगे.हमने माना नोटों के
बिस्तर तुम बिछवा सकते.
पर क्या इन नोटों से तुम
नींद घड़ी भर लाओगे?किया आचमन धोखे का
मंत्र कपट के खूब पढ़े.
माना ऊंचे अम्बर में
कटी पतंग से खूब चढ़े.तेज हवा का झोंका जब
जिस पल भी रुक जाएगा.
बिना डोर की पतंग को
धरती पर ले आएगा.इसीलिए मैं कहता हूँ
मत मन में अभिमान करो.
अच्छे काम करो जी-भर
बुरे काम से सदा डरो.****..
.3 चांद-सा माथातुम्हारा चांद -सा माथा,
जो दो पल छू लिया मैंने.
कहें क्या बात जनमों की ,
पूरा युग जी लिया मैंने.करें अभिशाप का वंदन,
म…

डॉ. कान्ति प्रकाश त्यागी की हास्य कविता

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देशी फ्लाइट १८डॉ. कान्ति प्रकाश त्यागीदेशी फ्लाइट १८ में ड्राइवर हरभजन की सलाम,सतश्री अकाल और नमस्ते
मुझे पूरा विश्वास तथा आशा है कि, आपका सफर कटेगा हँसते हँसते मुझे खेद है कि,यह फ्लाइट केवल दो दिन देरी से चल रही है
भगवान का शुक्रिया करो, किसी तरह आखिर चल तो रही हैइस विमान में चार आंटियां थीं, चारों को ही निकाल दिया है
दो निकम्मी थी,एक मैके चली गयी,चौथी ने भाग कर ब्याह किया हैइस का असली ड्राइवर कम पायलट सुखीराम कारणवश नहीं आया है
इसलिए सिर्फ आज की उड़ान मुझे उडाने का परमिट दिलाया हैजिस किसी को टायलट जाना है,अभी निपट लो,बीच में नहीं रुकेगी
गदंगी के कारण टायलट निकाल दिये ,अतः असुविधा सहनी पड़ेगीअन्तर्राष्ट्रीय नियमों के कारण हम आपको सुरक्षा के नियमों से अवगत करायेंगे
यदि बीच में कुछ मुसीबत आई,अन्य बातें उसी समय विस्तार से बतायेंगेइस विमान में भागने के चार द्वार हें,अतः नामी भगोडे ही इनके पास बैठें
जिनको द्वार खोलकर भागना नहीं आता ,वे किसी हालत में इनके पास न बैठेंयदि विमान में किसी तरह का डिप्रेशन है,तो पीले गुब्बारे अपने आप लटकेंगे
आप गुब्बारे से धीरे धीरे सांस लेते रहें,आप बिलकुल नहीं भटकेगे…

कैलाश बनवासी की कहानी

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बाज़ार में रामधन





-कैलाश बनवासी
यह बालोद का बुधवारी बाज़ार है. बालोद इस ज़िले की एक तहसील है. कुछ साल पहले तक यह सिर्फ़ एक छोटा-सा गांव हुआ करता था. जहां किसान थे, उनके खेत थे, हल-बक्खर थे, उनके गाय-बैल थे, कुएं और तालाब थे, उनके बरगद, नीम और पीपल थे. पर अब यह एक छोटा शहर है. शहर की सारी खूबियां लिए हुए. आसपास के गांव-देहातों को शहर का सुख और स्वाद देने वाला. इसी बालोद के हफ्तावार भरने वाले बुधवारी बाज़ार की बात है. रामधन अपने एक जोड़ी बैल लेकर यहां बेचने पहुंचा था.रामधन और उसकी पत्नी मेहनत-मजूरी करके ही अपना पेट पाल सकते हैं और पाल रहे हैं. लेकिन मुन्ना क्या करे? वह तो यहां गांव का पढ़ा-लिखा नौजवान है, जिसे स्कूली भाषा में कहें तो देश को आगे बढ़ानेवालों में से एक है. वह पिछले दो सालों से नौकरी करने के या खोजने के नाम पर इधर-उधर घूम रहा है. परंतु अब वह इनसे भी ऊब चुका है और कोई छोटा-मोटा धंधा करने का इच्छुक है. लेकिन धंधा करने के लिए पैसा चाहिए. और पैसा?''भइया, बैलों को बेच दो!''
मुन्ना ने यह बात किसी खलनायक वाले अंदाज़ में नहीं कही थी. उसने जैसे बहुत सोच-समझकर कहा था. इसके बावजूद…

दो लघुकथाएँ

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दो लघुकथाएँ -रमेश चन्द्र श्रीवास्तवइंसान कौन है?किसी बात पर मालिक ने अपने नौकर को डांटा - "तू इंसान है या बैल?"नौकर पढ़ा-लिखा, समझदार था. विनम्रता से बोला - "मालिक, यहाँ इंसान कौन है, मैं तो नौकर हूँ. और आप मालिक हैं."मालिक समझा नहीं, बोला - "क्या मतलब?""मेरे मालिक, क्षमा करें, आज आदमी आदमी नहीं रह गया है. वह या तो हिन्दू है, मुसलिम, सिख, ईसाई या कोई और हो गया है. वह घूसखोर, गद्दार, आतंकवादी, भ्रष्ट, चोर, नेता इत्यादि हो गया है. काश! मैं बैल ही होता." मालिक को फिर समझ नहीं आया. बोला - "चल चल, अपना काम कर, भाषण मत झाड़."..
**--**
स्वप्न का सत्यछुट्टी का दिन था. दोपहर के भोजनोपरांत उसे झपकी सी आ गई. उसने सपना देखा - "सारा जहाँ खुशहाल है - सब एक हैं - जाति-धर्म, ऊँच-नीच आदि का कोई भेद नहीं है - लोग बड़ी शान्ति से जी रहे हैं."उसने सुन रखा था - दिन में देखा गया सपना सच होता है. स्वप्न का सत्य परखने के लिए वह तैयार हुआ और कमरे से बाहर निकला.गली में सन्नाटा था. हमेशा भरी रहने वाली मुख्य सड़क भी खाली थी और पुलिसवालों से भरी पड़ी थी. वह…

चुटकुले - किश्त 651 से 700

चुटकुला # 0651सेठ जी (पत्नी से)- ‘कल तुम मायके गई थी कि रात घर में चोर घुस
आए। उन्होने मुझे खूब मारा-पीटा, यहां तक कि मुझे मुर्गा भी बना
दिया।‘
पत्नी - ‘क्या आपने शोर नहीं मचाया?‘
सेठ जी - ‘मैं कोई डरपोक था जो शोर मचाता।‘

चुटकुला # 0652पत्नी से तंग आकर रामलाल एक साधु के पास गया। रामलाल ने साधु से
कहा, ‘महाराज, बीवी ने परेशान कर रखा है। इसका कोई उपाय बताइए।‘
साधु (रामलाल से)- अबे, अगर बीवी से बचने का तरीका मालूम होता, तो
मैं ही साधु क्यों बनता।

चुटकुला # 0653मोहन लाल एक बुक देखते हुए बुरी तरह रोने लगा। तभी उसकी पत्नी आ
गई और बोली, ‘क्या हुआ इस तरह क्यों रो रहे हो, शर्म नहीं आती?‘
मोहन लाल (अपनी पत्नी से)- ‘कुछ नहीं हुआ दरअसल इस बुक का अंत
ही इतना दुखदाई है कि मैं अपनी रुलाई न रोक सका।‘
पत्नी तेजी से बोली, ‘कौन सी बुक है जी?‘
मोहन लाल ने धीरे से कहा, - ‘पासबुक।‘


चुटकुला # 0654
पत्नी (पति से) - कुछ साल पहले तुमने मुझसे कहा था कि तुम स्वर्ग में
मेरे बिना रहने की बजाय मेरे साथ नर्क में रहना पसद करोगे।
पति (पत्नी से) - बदकिस्मती से मेरी इच्छा पूरी हो गई।

चुटकुला # 0655पति (पत्नी से) - शादी से पहले मैं …

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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