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October 2006
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व्यंग्य

उधारी का दर्शन

- श्याम सुंदर व्यास

उधारी, मध्यमवर्गीय मंहगाई के मारों के लिए सदैव से संकट-मोचक रही है. वेतनभोगियों की जेब एक तरफ से चील का घोंसला है. अगर हाथ खुला हो तो हमेशा तंग रहता है. चादर के अनुसार पाँव पसारने की आदत हो तो बात दूसरी है वरना उधारी वह ‘इलास्टिक' है जिसे खींच-खींचकर कभी अपना सिर ढका जा सकता है, कभी पाँव. साख बचाने का यही सहज मार्ग है.

उधारी को कभी मुहब्बत की कैंची कहा जाता था. आजकल इसे संबंध जोड़ने वाला ‘फ़ेवीकोल' समझा जाता है. ‘आज नगद, कल उधार' - वाला कधन घिस-पिट गया है. बाजार में उधारी का बोलबाला है. लुभावने विज्ञापन सामने आ रहे है. मकान खरीदना हो तो अर्थ की व्यवस्था है, गाड़ी या स्कूटर लेना हो तो आसान किस्तों पर सुलभ है. यह एक प्रकार की उधारी व्यवस्था है. व्यवसाय के पंगु -पाँव उधारी से थिरकने लगे हैं. विकास का दरवाजा उधारी की चाबी से खुलता है और अगर आपकी कुछ ‘साख' है तो उधारी के अनेक दरवाजे आपके लिए खुले पड़े हैं.

पान-बीड़ी और परचूनी की दुकाने से लगाकर वित्त निगमों तक आप अपनी ‘साख' को भुना सकते हैं. एक बार साख जमी कि आपकी पौ बारह. साख जमाने का सरल गणित है समय पर भुगतान. सामने वाला आपको परखता है और जब उसे विश्वास हो जाता है कि ‘आसामी' डूबत खाते वाला नहीं है, न रास्ता बदलने या नज़रें चुराने वाला तो आपकी सीमित चादर, उधारी के पैबन्द से लम्बी चौड़ी हो जाती है. उधारी आदमी को अपनी आय से कुछ ज्यादा ही छलांग लगाना सिखा देती है. जेब को देखकर मन मारना नहीं पड़ता. मुँह खुला की माल हाजिर. उधार लेने वाला महंगा सस्ता नहीं देखता और मोलभाव नहीं करता. उधार देने वाला एक का सवाया-डेढ़ा कर इसलिए दे देता है कि बकरी कसाई की बोटी हज़म नहीं कर सकती. पैसा एकदम नहीं तो धीरे-धीरे वसूला जा सकता है. उधारी का धंधा सहनशीलता पर चलता है. लेने वाला भी सहनशील, देने वाला भी सहनशील. न यह ताव खाकर उधार मांगता है और न वही देर-सबेर होने पर आंखें दिखाता है. महीन चुटकी, उधार लेने वाले को तिलमिलाती नहीं, गुदगुदाती है क्योंकि उधारी चमड़े को अकसर मोटा कर देती है. टोका-टोकी उधारी का प्रेमालाप है और झक्कूबाजी वह महीन डोर, जो दोनों पक्षों को जोड़े रखती है.

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उधारी का सबसे उज्जवल पक्ष है नीयत. अगर नीयत में खलल नहीं पड़े तो उधारी के राजमार्ग पर आप अपनी अर्थ-जर्जर गाड़ी को दौड़ा सकते हैं. नीयत बिगड़ी कि मामला बिगड़ा. जो ग्राहक चुकारे में चुस्त होता है उसका स्वागत देनदार अपने सगे-संबंधियों के समान करता है. नीयत डोलती है तो संबंधों में खटास पैदा हो जाती है. आपकी ‘धवलता' आपकी नीयत पर कायम है. व्यक्ति से लगाकर देश तक यह सिद्धान्त लागू होता है. साफ नीयत वालों के लिए उधारी साफ मैदान है और इसके आधार पर आपके विकास का रास्ता बन्द नहीं होता.

यह एकांगी डगर नहीं है. यहाँ ताली दोनों हाथ से बजती रहती है. हितोपदेश की कहानी की तरह कभी संकड़े पुल पर आपको बैठना पड़ता है तो कभी दूसरे पक्ष को. इस डगर के मार्ग का रोड़ा है ‘ऐंठ'. जो ‘व्यक्ति' या ‘देश' को ऐंठ को अपने से दूर रखता है, लेन-देन या विनिमय में उसे बाधा का सामना नहीं करना पड़ता. ऐंठ किसी भी पक्ष की क्यों न हो, बुरी होती है और उधारी ऐंठ से बचने का उपाय है.

सूत्र रुप में कहा जाए तो उधारी विपदाहरण है. अपनी सीमा से परे छलांग लगाने वालों के लिए ‘स्प्रिंग की छड़ी' है. सावधानी संतुलन रखने की है. संतुलन खोया कि सरे बाजार में औंधे मुँह गिरने की नौबत आ जाती है. कुछ लोगों की दृष्टि में यह सुरसा का मुँह है - बढ़ता ही जाता है. अगर आपके पास संकटमोचक कला नहीं है तो आप सुरसा-ग्रास हो सकते हैं. जरूरतों को पसारने के बजाए, अवसरानुकूल समेटना, सुरक्षा का समयोचित मार्ग है.

उधारी का दर्शन - द्वैतवादी है, बल्कि कहिए कि विशुद्धद्वैतवादी है. ‘दुई' का भेद तो यहाँ है. चाहत दोनों ओर है. माया का फेर भी है. विद्या - माया आपकी आकांक्षाओं की पूर्ति करती है. अविद्या-माया आपको गुमराह कर फज़ीहत में डाल सकती है. विधि-निषेधों की तरह वित्त-निषेधों का पालन करने वाला तर जाता है. और अवहेलना या अति करने वाला अपनी मिट्टी खराब करवाता है. इस साधना-पथ पर कदम रखने वालों को यह सावधानी बरतना चाहिए कि ‘भुंजाने' के पूर्व अपने ‘दाने' परख लें. अपनी सीमित आय वाली टिटहरी सी टांगों पर ‘आकाशी सपनों' को थामने की दुर्बुद्धि से दूर रहना, इस भवसागर से तरना है.

(साभार, मधुमती, अप्रैल, 1999)

चित्र: कागज पर जल रंग से बनी रेखा की अनाम कलाकृति.

*दीपावाली की मंगल कामनाएं*

- डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हर साल दीवाली पर बहुत सारे बधाई कार्ड आते हैं. आजकल कार्डों के अलावा ई मेल
और एस एम एस भी खूब आते हैं. ई मेल और एस एम एस तो खैर वैसे ही क्षण- भंगुर
होते हैं, कार्ड भी कुछ दिनों के बाद इधर- उधर हो जाते हैं, चाहे कितने ही
आकर्षक और अर्थ व्यंजक क्यों न हों! शायद सबके साथ ऐसा ही होता हो. हम लिखने -पढ़ने
के व्यसनी लोगों के पास तो वैसे भी डाक खूब आती है. आखिर कोई कब तक और कितना
सम्हाल कर रख सकता है? मैं तो अपनी नौकरी के अंतिम कुछ वर्षों में कई बार *'
तबा-दलित'* भी हुआ, अत: स्वाभाविक ही था कि *' पत्रं पुष्पं'* का बोझ ज़रा कम ही
रखता. एक और बात भी, जब चयन का अवसर आता है तो हम सब सार्वजनिक की तुलना में
वैयक्तिक को पहले बचाये रखना चाहते हैं. ऐसे में मुद्रित कार्डों की बजाय
हस्त-लिखित या व्यक्तिगत पत्र अधिक सुरक्षित रखे जाते हैं.


इधर सारे ही पर्व त्यौहारों की तरह दिवाली का भी घोर व्यावसायिकीकरण हुआ है.
अन्य बहुत सारी बातों के अतिरिक्त , शुभकामनाएं देना-लेना भी सम्पर्क
बनाने-बढाने का, वो जिसे आधुनिक शब्दावलि में पी आर (PR) कहते हैं उसका, माध्यम
बन गया है. परिणाम यह कि कोई सामान्य- से सम्पर्क वाला व्यक्ति भी दिवाली पर सौ
-डेढ़ सौ कार्ड तो भेजता ही है. और इतने कार्ड , स्वाभाविक ही है कि मुद्रित ही
होंगे. कमोबेश इतने ही कार्ड आते भी हैं. जब मैं नौकरी में था हर साल ढ़ाई तीन
सौ कार्ड आते थे , अब इससे आधे आते हैं. यह स्वाभाविक है. ऐसे कार्ड , जैसा मैं
ने पहले ही कहा, कितने ही आकर्षक, कलात्मक और उम्दा सन्देश वाले क्यों न हों, कुल
मिलाकर यह सन्देश देने के बाद कि अमुक जी ने हमें स्मरण रखा है, अपनी अर्थवत्ता
खो देते हैं , और इसलिए बहुत लम्बे समय तक उन्हें सम्हाल कर नहीं रखा जा सकता.

लेकिन यह सब कहने के बाद अगर मैं यह कहूं कि एक व्यक्ति ऐसा है जो हर तरह से इस
सबका अपवाद है, तो आपको आश्चर्य होगा न? हम दोनों के बीच उम्र का, कद और पद का
इतना अंतर है कि मैं उन्हें 'मित्र' तो नहीं कह सकता. उम्र में मुझसे
लगभग 15 वर्ष
बड़े, एक राज्य के विधायक, मंत्री और फिर राज्य सभा के सदस्य रहे, कवि सम्मेलनों
के अत्यधिक लोकप्रिय कवि.. बहुत उम्दा लेखक! यह उनका ही बड़प्पन है कि वे मुझे
अपना मानते हैं. सातवें दशक के मध्य उनसे सम्पर्क हुआ था. तब वे लालकिले में
अपनी कविताओं से धूम मच चुके थे , और मैं, कॉलेज का एक विद्यार्थी , उनकी
कविताओं का प्रशंसक! पत्र व्यवहार प्रारम्भ हुआ. कुछेक अवसर मिलने के मिले. कभी
कभार पत्राचार भी हो जाता. फिर वे अपनी दुनिया में और मैं अपनी दुनिया में
व्यस्त होते गए. लेकिन इस सबके बीच भी शायद ही कोई ऐसा साल बीता हो जब दिवाली
पर मैं ने उन्हें कार्ड न भेजा हो , और दिवाली पर उनका कार्ड न आया हो! चालीस
साल कम नहीं होते. और अपने सारे तबादलों, सारी अस्त व्यस्तता के बावज़ूद उनके
अधिकांश कार्ड मेरे पास सुरक्षित हैं.

मैं अभी तो यह कह रहा था कि कोई कब तक इतने सारे कागज़ों का बोझ सम्हाले, और अभी
यह कह रहा हूं कि उनके अधिकांश कार्ड मेरे पास सुरक्षित हैं. क्या खास है उनके
कार्डों में?

लेकिन इससे भी पहले यह कि *'वे '* हैं कौन ?

जी, मैं बात *बालकवि बैरागी* की कर रहा हूं. परिचय तो उनका दे ही चुका हूं.

बैरागी जी दिवाली पर पोस्टकार्ड भेजते हैं. पहले पूरा पोस्टकार्ड हस्तलिखित हुआ
करता था, अब उस पर उनका पता मुद्रित होता है. सन्देश पहले भी वे हाथ से लिखते
थे, अब भी हाथ से ही लिखते हैं. इतने वर्षों में न उनकी यह आदत बदली है , न
हस्तलिपि. अत्यधिक सधे अक्षर, जैसे किसी ने मोतियों की लड़ी सजा दी हो. और
सन्देश? उसका तो कहना ही क्या? मैं ने कहा न कि बैरागी जी कवि हैं. उनका
दिवाली सन्देश सदा एक छन्द के रूप में होता है. लेकिन ऐसा छन्द जिसे आप अपने
जीवन का मूल मंत्र बना लेना चाहें.

जैसा मैंने पहले कहा, बैरागी जी विधायक , मंत्री, सांसद सब कुछ रह चुके हैं. अब
भी हम लोगों से तो वे अधिक ही व्यस्त होंगे. सम्पर्क तो खैर उनके हैं ही.
राजनीति में भी , साहित्य में भी. इसके बावज़ूद उन्होंने दीपों के इस पर्व
को 'निजी'
और आत्मीय बनाये रखा है, यांत्रिक और निर्वैयक्तिक नहीं बन जाने दिया है, यह
बात मुझे बहुत महत्वपूर्ण लगती है.

इस दिवाली पर अपने सारे पाठकों, सहयोगियों और शुभ चिंतकों को
*'इंद्रधनुष'* परिवार की ओर से दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं
देते हुए मैं उपहार
स्वरूप अपने 'दादा ' बैरागी जी के कुछ छन्द सादर भेंट कर रहा हूं :

सूरज से कह दो बेशक अपने घर आराम करे

चांद सितारे जी भर सोयें नहीं किसी का काम करें

आंख मूंद लो दीपक ! तुम भी, दियासलाई! जलो नहीं

अपना सोना अपनी चांदी गला-गला कर मलो नहीं

अगर अमावस से लड़ने की ज़िद कोई कर लेता है

तो, एक ज़रा-सा जुगनू सारा अंधकार हर लेता है!

(1991)

*

रोम रोम करके हवन देना अमल उजास

कुछ भी तो रखना नहीं, अपना अपने पास

जलते रहना उम्र भर, अरुणिम रखना गात

सहना अपने शील पर तम का हर उत्पात

सोचो तो इस बात के होते कितने अर्थ

बाती का बलिदान यह चला न जाये व्यर्थ!

(1992)

*

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एक दीपक लड़ रहा है अनवरत अंधियार से

लड़ रहा है कालिमा के क्रूरतम परिवार से

सूर्य की पहिली किरन तक युद्ध यह चलता रहे

इसलिए अनिवार्य है कि दीप यह जलता रहे

आपकी आशीष का सम्बल इसे दे दीजिये

प्रार्थना-शुभकामना इस दीप की ले लीजिये!!

(1993)

*

आज मैंने सूर्य से बस ज़रा-सा यूं कहा

"आपके साम्राज्य में इतना अंधेरा क्यूं रहा ?"

तमतमा कर वह दहाड़ा - "मैं अकेला क्या करूं?

तुम निकम्मों के लिए मैं भला कब तक मरूं ?

आकाश की आराधना के चक्करों में मत पड़ो

संग्राम यह घनघोर है, कुछ मैं लड़ूं कुछ तुम लड़ो !"

(1994)

*

सूर्य की अनुपस्थिति में आयु भर मैं ही जला

टल गये दिग्पाल लेकिन मं नहीं व्रत से टला

सोचता था - तुम सबेरे शुक्रिया मेरा करोगे

फूल की एकाध पंखुरी, देह पर मेरी धरोगे

किंतु होते ही सवेरा छीन ली मेरी कमाई

इस कृपा (?) का शुक्रिया, खूब ! दीवाली मनाई !

(1997)

*

देखता हूं दीप को और खुद में झांकता हूं

छूट पड़ता है पसीना और बेहद कांपता हूं

एक तो जलते रहो और फिर अविचल रहो

क्या विकट संग्राम है यह युद्धरत प्रतिपल रहो

काश! मैं भी दीप होता, जूझता अंधियार से

धन्य कर देता धरा को ज्योति के उपहार से !

(1998)

*

दीप से बोला अंधेरा - "ठान मत मुझ से लड़ाई

व्यर्थ ही मर जाएगा - सोच कुछ अपनी भलाई

स्वार्थ वश कोई जलाए और तू जलने लगे

सर्वथा अनजान पथ पर उम्र भर चलने लगे"

दीप बोला - "बंधु! अच्छी राह पर सच्ची बधाई

(पर) फिक़्र मेरी छोड़ करके सोच तू अपनी भलाई!"

(1999)

*

मैं तुम्हारी देहरी का दीप हूँ, दिनमान हूं

घोर तम से मानवी संग्राम का प्रतिमान हूं

उम्र भर लड़ता रहा, मुंह की कभी खाई नहीं

आज तक तो हूं विजेता पीठ दिखलाई नहीं

दीनता औ' दम्भ से रिश्ता कभी पाला नहीं

आपका आदेश मैंने आज तक टाला नहीं !

(2000)

*

आप मुझको स्नेह देकर चैन से सो जाईये

स्वप्न के संसार में आराम से खो जाईये

आपकी खातिर लड़ूंगा मैं घने अंधियार से

रंच भर विचलित न हूंगा मौसमों की मार से

जानता हूं तुम सवेरे मांग ऊषा की भरोए

जान मेरी जायेगी पर ऋण अदा उसका करोगे !

(2003)

*

कर्तव्य मेरा है यही, मैं रात भर जलता रहूं

कालिमा के गाल पर लालिमा मलता रहूं

दांव पर सब कुछ लगे जब दीप के दिव्यार्थ का

तब कर्म यह छोटा नहीं जब पर्व हो पुरुषार्थ का

ज्योति का जयगीत हूं - आरोह का अलाप हूं

निर्माण आखिर आपका हूं इसलिए चुपचाप हूँ!

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ऑनलाइन हिन्दी पत्रिका इन्द्रधनुष के सम्पादक हैं.

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चुटकुला # 0751
नौकर (मालिक से)- अगर आप मुझ पर विश्वास नहीं करेगेे, तो मैं
नौकरी छोड़ दूंगा।
मालिक (नौकर से)- ऐसा क्यों कह रहे हो? मैंने तो तुम्हें घर की चाबियां
दे रखी है।
नौकर (मालिक से)-हां तभी तो कह रहा हूं, क्योंकि उनमें सेफ की चाबियां
नहीं है।


चुटकुला # 0752
एक महिला (भिखारी से)- तुम रोज दोपहर के वक्त ही मेरे घर खाना
मांगने क्यों आते हो?
भिखारी (महिला से) - दरअसल, मुझे डॉक्टर ने दोपहर के भोजन में
तीखी तली, मसालेदार और तेल वाली चीज खाने से मना किया है।


चुटकुला # 0753
बॉस (मुकेश से)- अरे मुकेश! फिर तीन दिन की छुट्टी? पिछले दो सालों
में तुमने न जाने कितनी बार छुट्टियां ली है। कभी सगाई, कभी हनीमून,
बच्चे की बीमारी, कभी नामकरण... अब क्या है?
मुकेश (बॉस से)- जी कल मेरी शादी है।


चुटकुला # 0754
मोटे राम एक शहर घूमने गए वहां प्लेटफार्म पर रखी वजन करने वाली
मशीन पर लिखा था ‘मैं आपका वजन कर सकती हूं।‘ कृपया रुपया
डालिए।
मोटे राम उस पर चढ़ गए और रुपया डाला।
मशीन से फौरन कार्ड निकला, जिस पर लिखा था- सावधान, कृपया
एक-एक करके खड़े हो एक साथ नहीं।


चुटकुला # 0755
शर्माजी (नेता दोस्त से)- यार आजकल मैं बहुत परेशान हूं।
नेताजी (शर्माजी से)- क्यों क्या हुआ?
शर्माजी (नेता दोस्त से)- दरअसल मेरे बच्चे का विकास रुक गया है।
खाने-पीने पर भी यह मोटा नहीं होता। किसी अच्छे डॉक्टर का नाम
बताओ।
नेताजी (शर्माजी से)- डॉक्टरो के पास जाने से कुछ नहीं होगा। इसका
नाम भ्रष्टाचार रखो। फिर देखना इसका विकास किस रफ्तार से होता है।


चुटकुला # 0756
शर्माजी (दुकानदार से)- कहां है मेरा गिफ्ट?
दुकानदार (शर्माजी से)- कौन सा गिफ्ट?
शर्माजी (दुकानदार से)- कल जो मैंने मिनरल वाटर की बोतल खरीदी थी
उस पर फ्री गिफ्ट था, वो कहां है?
दुकानदार (शर्माजी से)- उस पर कोई गिफ्ट नहीं है।
शर्माजी (दुकानदार से)- बेवकूफ समझते हो! बोतल पर साफ -साफ लिखा
था: 100 प्रतिशत बैक्टीरिया फ्री।


चुटकुला # 0757
मोहन (सोहन से)- तुमने तो कहा था कि तुम बहुत से नेताओ को जानते
हो। कही मेरी भी नौकरी लगवा दो।
सोहन (मोहन से)- लेकिन मैंने यह कब कहा था कि वे भी मुझे जानते है।


चुटकुला # 0758
राम (मोहन से)- क्या कर रहे हो?
मोहन (राम से)- अपने दोस्त को पत्र लिख रहा हूं।
राम (मोहन से)- लेकिन तुम्हें तो लिखना नहीं आता।
मोहन (राम से)- तो मेरे दोस्त को कौन सा पढ़ना आता है।


चुटकुला # 0759
एक बूढ़ा आदमी घने जंगल से जा रहा था। उसे एक शेर ने देख लिया।
शेर (बूढ़े आदमी से)- ठहरो मनुष्य, मैं तुम्हारा खून पीऊंगा।
बूढ़ा आदमी (शेर से)- अरे महाराज मेरा खून तो ठंडा पड़ गया है। किसी
नौजवान का गरम खून पिओ।
शेर (बूढ़े आदमी से)- चुप रहो, आज मेरा कोल्ड ड्रिंक पीने का मूड है।


चुटकुला # 0760
चींटी (हाथी से)- अरे हाथी भैया तुम्हारी उम्र क्या है?
हाथी (चीटी से)- चार साल।
चीटी (हाथी से)- क्या चार साल, तब भी तुम इतने बड़े!
हाथी (चीटी से)- आई एम कॉम्प्लॉन ब्वॉय!
हाथी (चीटी से)- चीटी बहन, तुम्हारी उम्र क्या है?
चीटी (हाथी से)- सात साल।
हाथी (चीटी से)- तब भी तुम इतनी छोटी?
चीटी (हाथी से)- मेरी खूबसूरत त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नहीं
चलता।

चुटकुला # 0761

मैंनेजर (युवक से)- हमें इस पद के लिए किसी जिम्मेदार आदमी की
तलाश है।
युवक (मैंनेजर से)- तब तो मैं इस पद के लिए पूरी तरह फिट हूं।
मैंनेजर (युवक से)- क्यों?
युवक (मैंनेजर से)- क्योंकि पिछले हर आफिस में मुझे ही हर गलती के
लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था।

चुटकुला # 0762

सुरेद्र (गोल्डी से): इंसान की नजर ज्यादा तेज है या जानवर की?
गोल्डी (सुरेद्र से): जानवर की नजर।
सुरेन्द्र (गोल्डी से): यह तुम कैसे कह सकती हो?
गोल्डी (सुरेद्र से): क्योंकि जानवर कभी चश्मा नहीं पहनते।


चुटकुला # 0763
दारोगा (रमेश से)- जब तुम्हारे यहां चोरी हुई, उस समय कितना बजा
था?
रमेश (दारोगा से)- हम पर चार लट्‌ठ और हमारे भाई पर दो लट्‌ठ बजे
थे।
दारोगा (रमेश से)- अरे मैं घड़ी का पूछ रहा हूं उसमें कितना बजा था?
रमेश (दारोगा से)- साहब घड़ी तो एक ही लट्‌ठ बजने पर टूट गई।


चुटकुला # 0764
पुजारी (शर्मा जी से)- तुम तो बड़े भक्त लगते हो। भगवान से क्या
मांगतेे हो?
शर्मा जी (पुजारी से)-मैं त्रिशंकु बनने की कामना करता हूं।
पुजारी (शर्मा जी से)- क्यों?
शर्मा जी (पुजारी से)- मेरी बीवी धरती पर अभी जिंदा है। लेकिन मेरी
सास इस धरती से जा चुकी है। मैं इन दोनो से दूर रहना चाहता हूं।


चुटकुला # 0765
एक बेरोजगार युवक का इंटरव्यू लेते हुए कंपनी के मैंनेजर ने पूछा- क्यों
साइकिल चलाना जानते हो?
युवक (मैंनेजर से)- जी हां।
मैंनेजर (युवक से)- क्या कभी हवाई जहाज चलाने का अनुभव है?
युवक (मैंनेजर से)- बिल्कुल है।
मैंनेजर (युवक से)- तुम्हें कंपनी में सैल्समैंन के पद पर नियुक्त किया
जाएगा, इसलिए यह बताओ कि क्या कभी जरूरत पड़ेगी तो झूठ बोल
सकते हो?
युवक (मैंनेजर से)- मैं इतनी देर से झूठ ही तो बोल रहा हूं।

चुटकुला # 0766

प्रेमिका (प्रेमी से)- तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?
प्रेमी (प्रेमिका से)- मुझे एक व्यक्ति की ओर से धमकी भरा पत्र मिला है
कि मैंने उसकी पत्नी से मिलना बंद नहीं किया तो वह मेरा खून कर देगा।
प्रेमिका (प्रेमी से)- तो फिर तुम उसकी पत्नी से मिलना बंद कर दो।
प्रेमी (प्रेमिका से)- पर धमकी भरा खत गुमनाम व्यक्ति ने लिखा है। मैं ये
कैसे जान सकता हूं कि उसकी पत्नी कौन सी है?


चुटकुला # 0767
विनय (राजेश से)- तुम्हारे हाथ इतने काले क्यों हो रहे है?
राजेश (विनय से)- मैं अपनी पत्नी को स्टेशन पर छोड़ने गया था।
विनय (राजेश से)- पर इससे तुम्हारे हाथ काले होने का क्या संबंध है?
राजेश (विनय से)- यार, मैंने गाड़ी के इंजन को शाबाशी दी थी।

(मेजबान से)- मैं कल वापस जा रहा हूं, आपको तो बुरा लग रहा होगा।
मेजबान (मेहमान से)- हां, बुरा तो लग रहा है, मुझे लग रहा था कि आप
आज ही जा रहे है।

चुटकुला # 0768

भिखारी (राहगीर से)-भगवान के लिए अंधे भिखारी को कुछ दे दो बाबा।
राहगीर (भिखारी से)-भीख तो दे दूं, पर कैसे मानूं कि तुम अंधे हो?
भिखारी (राहगीर से)- साहब, क्या सामने वाले लाल मकान के पीछे नीले
मकान की छत पर बैठा सफेद कबूतर आपको दिख रहा है।
राहगीर (भिखारी से)- हां, मुझे तो दिख रहा है।
भिखारी (राहगीर से)- लेकिन वह कबूतर मुझे दिखाई नहीं दे रहा है।


चुटकुला # 0769
अंधेरी रात में सुनसान सड़क पर श्यामू जा रहा था। एकाएक पीछे से एक
अजनबी आया और बोला- क्या आप मुझे एक रुपए का सिक्का देगे?
श्यामू (अजनबी से)- जरूर, लेकिन आप उसका करेगे क्या?
अजनबी (श्यामू से)- दरअसल, मैं और मेरा दोस्त फैसला करेगे कि आपसे
लूटा हुआ माल कौन लेगा।

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चुटकुला # 0770
राम (मोहन से)- मैंने बहुत मेहनत और अध्ययन के बाद पता लगा लिया
कि तलाक की वजह आखिर क्या है?
मोहन (राम से)- क्या है, मुझे भी तो बताओ?
राम (मोहन से)- विवाह।

चुटकुला # 0771

यात्री (बस कंडक्टर से)- क्या मैं बस में सिगरेट पी सकता हूं?
बस कंडक्टर (यात्री से)- नहीं, श्रीमान।
यात्री (बस कंडक्टर से)- लेकिन बस में तो सिगरेट के टुकड़े पड़े हुए है।
बस कंडक्टर (यात्री से)- यह उन लोगो ने फेके है, जिन्होने आपकी तरह
मुझसे पूछा नहीं था।


चुटकुला # 0772
एक सरकारी दफ्तर में दो नए कर्मचारी बात कर रहे थे।
पहला (दूसरे से)-अपना फेमिली अलाउंस बढ़वाने के लिए मैंने बच्चो की
संख्या तीन लिखवा दी है।
दूसरा (पहले से)- अरे, कम से कम पांच तो लिखवाते। मैंने तो सात
लिखवाई है।
पहला (दूसरे से)-भैया तुम्हारी बात और है, तुम तो शादीशुदा हो।


चुटकुला # 0773
थानेदार (सिपाहियों से)- तुम चार थे। फिर भी एक चोर को नहीं पकड़
सके?
सिपाही (थानेदार से)- चोर तो भाग ही गया, पर मैं उसकी उंगलियों के
निशान ले आया हूं।
थानेदार (सिपाही से)- कहां हैं?
सिपाही (थानेदार से)- मेरे गाल पर।


चुटकुला # 0774
मोहन (रमेश से)- मेरी बेटी का संगीत अभ्यास मेरे लिए लाभकारी सिद्ध
हुआ।
रमेश (मोहन से)- कैसे?
मोहन (रमेश से)- मेरा पड़ोसी इसी कारण मकान आधे दामों पर बेच गया
और मैंने उसे खरीद लिया।


चुटकुला # 0775
मैंनेजर (उम्मीदवार से)- अब तक तुमने कितने जगह काम किया है और
कितने-कितने समय तक वहां रहे हो?
उम्मीदवार (मैंनेजर से)- जी, ग्यारह जगह काम किया है और सब जगह
छह-छह महीने तक रहा हूं।
मैंनेजर (उम्मीदवार से)- आखिर इसका क्या कारण है कि किसी भी जगह
तुम छह महीने से ज्यादा नहीं टिके।
उम्मीदवार (मैंनेजर से)- आप नौकरी पर रखकर देख लीजिए, आपको भी
पता चल जाएगा।


चुटकुला # 0776
मैंनेजर (अपनी खूबसूरत टाइपिस्ट से)- रात सपने में मैंने दुनिया की
सबसे खूबसूरत लड़की से शादी कर ली।
टाइपिस्ट (शर्माते हुए) - तो क्या बॉस, हम दोनों खुश थे।
चुटकुला # 0777

रीता (अनीता से)- जब तुम किसी खूबसूरत लड़की को देखती हो तो
क्या करती हो।
अनीता (रीता से)- देखती रहती हूं और जब थक जाती हूं, तो शीशा पलट
कर रख देती हूं।

चुटकुला # 0778

महिला (ऑटो चालक से)- भैया तेज चलाओ, मेरा चित्रकार निकल जाएगा।
ऑटो चालक (महिला से) - बहन जी, अगर मैंने तेज चलाया तो आपके
चित्र पर हार पड़ जाएगा।


चुटकुला # 0779
महेश (संजय से) - मुझे खुशी इस बात की है कि मेरा बॉस एक डॉक्टर
है।
संजय (महेश से) - ऐसी क्या खासियत है आपके बॉस मे?
महेश (संजय से) - मैं थोड़ा भी बीमार पड़ता हूं, तो वह मुझे फौरन बेड
रेस्ट की सलाह दे देता है।


चुटकुला # 0780
कवि को नए-नए जूते पहने देखकर पड़ोसी ने पूछा-‘क्या बात है भाई,
आज तो आपने नया जूता पहना है। लाटरी निकल आई है क्या?‘
‘ऐसा ही समझ लो भाई, बरसो से कवि सम्मेलनो में जा रहा हूं, लेकिन
आज पहली बार किसी श्रोता ने दोनो पैर के जूतो से मारा है।‘ कवि ने
खुश होकर कहा।


चुटकुला # 0781
पहली पड़ोसन (दूसरी पड़ोसन से)- कल तुम्हारे कुत्ते ने मेरी सास के पैर
में काट लिया।
दूसरी पड़ोसन (पहली पड़ोसन से)- माफ करना कुत्ता है। उससे गलती हो
गयी, मैं हर्जाना देने के लिए तैयार हूं। बोल क्या दूं?
पहली (दूसरी पड़ोसन से)- हरजाने की बात कौन कर रहा है। मैं तो यह
पूछने आई थी कि उसे आप बेच सके तो कितने में बेचेगी?


चुटकुला # 0782
अदालत में सरकारी वकील ने कहा- मी लॉर्ड, अपराधी पर इल्जाम है कि
उसने अपनी पत्नी को चिड़ियाघर के गहरे तालाब में धक्का दे दिया,
जिसकी वजह से पत्नी को मगरमच्छ खा गया।
जज ने गरज कर कहा- क्या अपराधी यह बात नहीं जानता था कि
चिड़ियाघर में जानवरो को कुछ खिलाना मना है?


चुटकुला # 0783
नेताजी (भिखारी बच्चे से)- तुम यहां क्यों हो । इस समय तो तुम्हें स्कूल
में होना चाहिए।
भिखारी बच्चा (नेताजी से)- वहां भी गया था पर वहां किसी ने भीख नहीं
दी।


चुटकुला # 0784
एक सहेली (नाराज होकर)- जानती हो, किसी ने सच ही कहा है कि जिसे
शक्ल मिलती है उसे अक्ल नहीं मिलती।
दूसरी सहेली (शरारत से)- वाकई तुम बहुत सुंदर हो।


चुटकुला # 0785
लड़की की मां- हमारी बिटिया को नाचना-गाना, घुड़सवारी करना, तैरना
और कार चलाना सब कुछ आता है।
लड़के की मां- पर बहन, हमारे बेटे को सीना-पिरोना, बच्चे पालना, कपड़े
धोना और खाना बनाना बिल्कुल नहीं आता है।


चुटकुला # 0786
महफिल में गायिका आंखे बंद कर गाना गा रही थी और वहीं बैठे दो श्रोता
उसके गायन से बोर होकर आपस में बातचीत करने लगे।
पहला श्रोता (दूसरे से)- भैया जी, गायिका गाते समय आंख क्यों बंद कर
रही है?
दूसरा श्रोता (पहले से)- लगता है, बहुत दयालु स्वभाव की है। श्रोताओ का
दुख देख नहीं पा रही।

चुटकुला # 0787
प्रेमिका (प्रेमी से)- जो लड़कियां आपस में हमेशा बोलती रहती हैं उन्हें कैसे
चुप कराया जा सकता है?
प्रेमी (प्रेमिका से)- बहुत आसान सा तरीका है।
प्रेमिका (प्रेमी से)- वह क्या?
प्रेमी (प्रेमिका से)- उनसे कहो कि सबसे बड़ी उम्र वाली पहले बोले।


चुटकुला # 0788
प्रेमिका (प्रेमी से)- जो लड़कियां आपस में हमेशा बोलती रहती हैं उन्हें कैसे
चुप कराया जा सकता है?
प्रेमी (प्रेमिका से)- बहुत आसान सा तरीका है।
प्रेमिका (प्रेमी से)- वह क्या?
प्रेमी (प्रेमिका से)- उनसे कहो कि सबसे बड़ी उम्र वाली पहले बोले।


चुटकुला # 0789
मुवक्किल (वकील से)- वकील साहब, आपकी फीस बहुत ज्यादा है।
वकील (मुवक्किल से)- यह बात तुम किस आधार पर कह रहे हो?
मुवक्किल (वकील से)- जी, पंडित जी ने मेरी शादी मात्र दो सौ रुपए में
करवायी थी और तलाक के लिए आप दो हजार रुपए मांग रहे है?
वकील (मुवक्किल से मुस्कराते हुए )- सस्ते काम का नतीजा तुम्हारे
सामने है।


चुटकुला # 0790
पिता (अध्यापक से)- मेरा लड़का इतिहास में कैसा है? दरअसल, मैं जब
स्कूल में था, तो इस विषय में बहुत कमजोर था।
अध्यापक (पिता से)- मैं तो यही कहूंगा कि इतिहास खुद को दोहरा रहा
है।


चुटकुला # 0791
अफसर (रामलाल से)- मैंने कहा न, कोई जगह खाली नहीं है। नौकरी के
लिए इतनी अर्जियां आती है कि संभाले नहीं संभलती।
रामलाल - तो साहब! ऐसा करे कि मुझे इन अर्जियो को संभालने की
नौकरी दे दे।


चुटकुला # 0792
पहला जेलर (दूसरे जेलर से)- क्या तुम्हारी पत्नी अभी भी कैदियो के लिए
गाना गाती है।
दूसरा जेलर (पहले जेलर से)- नहीं यार कैदियो ने मना कर दिया।
पहला जेलर (दूसरे जेलर से)- क्यों?
दूसरा जेलर (पहले जेलर से)- उन्होने कहा कि यह हमारी सजा में शामिल
नहीं है।


चुटकुला # 0793
रेशमा (रीता से)- मैंने ‘टाइटेनिक‘ पांच बार देखी थी। तुमने कितनी बार
देखी।
रीता (रेशमा से)- मुझे तो एक ही बार में समझ में आ गई थी।


चुटकुला # 0794
थाने के बाहर सिपाही ऑटोरिक्शा वाले से लड़ रहा था।
इतने में अंदर से इंसपेक्टर आया और चिल्ला कर बोला - यह सब क्या
हो रहा है?
सिपाही ने जवाब दिया - साहब यह गुडागर्दी करता है। मुझसे किराया
मांग रहा है।


चुटकुला # 0795
कर्मचारी (अधिकारी से)- सर मेरी शादी हो गई है, अब तो मेरी सैलरी
बढ़ा दीजिए।
अधिकारी (कर्मचारी से)- देखिए कंपनी के बाहर होने वाले हादसे के
जिम्मेदार हम नहीं है।


चुटकुला # 0796
एक व्यापारी ने एक लड़के को नौकरी पर रखा। लड़का मेहनती तो बहुत
था लेकिन दिन भर फिल्मी धुन में सीटी बजाता रहता था।
एक दिन मालिक ने कहा- अब कोई नई धुन निकालकर सुनाओ।
लड़का तुनक कर बोला- मालिक 300 रुपए महीने में शास्त्रीय संगीत सुनने
को नहीं मिलेगा।

चुटकुला # 0797
एक प्रख्यात राजनीतिज्ञ का निधन विमान दुर्घटना में हुआ। इसके थोड़े
दिनो के पश्चात एक कर्मठ समाजसेवी का निधन राज्य परिवहन निगम की
बस दुर्घटना में हुआ।
जब वे दोनो स्वर्ग में मिले तो राजनीतिज्ञ साहब बोले- अरे आप भी आ
गये। यहां आप जैसे समाजसेवी की सख्त आवश्यकता थी, जो आज पूरी
हुई, लेकिन आपको यहां आने में इतनी देर क्यों हुई?
समाजसेवी मृदुभाव से बोले- हां साहब, आप विमान से आये है और मैं
राज्य परिवहन निगम की बस से आ रहा हूं।


चुटकुला # 0798
प्रोफेसर साहब किसी काम के सिलसिले में शहर से बाहर गए तो उन्हें एक
होटल में रुकना पड़ा। काम निपटाकर जब वे वापसी के लिए रेलवे स्टेशन
जा रहे थे कि अचानक याद आया, छतरी तो वे होटल के कमरे में ही छोड़
आए है। होटल पहुंचने पर पता चला कि अब उसमें एक प्रेमी युगल आकर
ठहर चुका है।
भीतर से प्रेमी का स्वर सुनाई दे रहा था- प्रिय, ये जुल्फे किसके लिए है?
‘सिर्फ तुम्हारे लिए। ‘ प्रेमिका की खनकती आवाज आई।
‘ये दो मतवाले नयना किसके लिए है?‘
‘सिर्फ तुम्हारे लिए। ‘
‘ये गालो की गुलाबी रंगत?‘
‘तुम्हारे लिए ही। ‘
प्रोफेसर साहब से अब रहा न गया वे बाहर से ही चिल्लाए ‘बेटी, जब
छतरी की बारी आए तो याद रखना वह मेरी है।‘


चुटकुला # 0799
एक लड़की ने मनचले युवक को डांटते हुए कहा- अगर तुम्हें जरा भी शर्म
है तो डूब मरो।
उस युवक ने बेशर्मी से हंसते हुए कहा- मुझे अफसोस है कि मैंआपके हुक्म
पर अमल नहीं कर सकता क्योंकि मुझे तैरना आता है।


चुटकुला # 0800
भिखारी (एक साहब से)- साहब आपका पर्स तो नहीं खो गया।
साहब (भिखारी से)- नहीं तो।
भिखारी (साहब से)- तो फिर मुझे एक रुपया दे दीजिए।

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बाबा नागार्जुन की कुछ कविताएँ

1 इन घुच्ची आँखों में

क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में
इन शातिर निगाहों में
मुझे तो बहुत कुछ
प्रतिफलित लग रहा है!
नफरत की धधकती भट्टियाँ...
प्यार का अनूठा रसायन...
अपूर्व विक्षोभ...
जिज्ञासा की बाल-सुलभ ताजगी...
ठगे जाने की प्रायोगिक सिधाई...
प्रवंचितों के प्रति अथाह ममता...
क्या नहीं झलक रही
इन घुच्ची आँखों से?
हाय, हमें कोई बतलाए तो!
क्या नहीं है
इन घुच्ची आँखों में!

**-**

चन्दू मैंने सपना देखा...

चन्दू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हरनौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से हूं पटना लौटा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू
चन्दू, मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू

चन्दू, मैंने सपना देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर

चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, भभुआ से पटना आए हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो

चन्दू, मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो
चन्दू, मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो

चन्दू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, पुलिस-वैन में बैठे हो तुम
चन्दू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ बाहर
चन्दू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कलेण्डर

***-***

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गुपचुप हजम करोगे

कच्ची हजम करोगे
पक्की हजम करोगे
चूल्हा हजम करोगे
चक्की हजम करोगे


बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

वरदान भी मिलेगा
जयगान भी मिलेगा
चाटोगे फैक्स फेयर
दिल के कमल खिलेंगे

फोटे के हित उधारी
मुस्कान रोज दोगे
सौ गालियाँ सुनोगे
तब एक भोज दोगे

फिर संसदें जुड़ेंगी
फिर से करोगे वादे
दीखोगे नित नए तुम
उजली हँसी में सादे

बोफ़ोर्स की दलाली
गुपचुप हजम करोगे
नित राजघाट जाकर
बापू-भजन करोगे

**-**

(चित्र - डॉ. माणिक साम्भरे की तैल रंग से बनी कलाकृति)

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धूमिल की कुछ कविताएँ

1 दिनचर्या

सुबह जब अंधकार कहीं नहीं होगा,
हम बुझी हुई बत्तियों को
इकट्ठा करेंगे और
आपस में बांट लेंगे.

दुपहर जब कहीं बर्फ नहीं होगी
और न झड़ती हुई पत्तियाँ
आकाश नीला और स्वच्छ होगा
नगर क्रेन के पट्टे में झूलता हुआ
हम मोड़ पर मिलेंगे और
एक दूसरे से ईर्ष्या करेंगे.

रात जब युद्ध एक गीत पंक्ति की तरह
प्रिय होगा हम वायलिन को
रोते हुए सुनेंगे
अपने टूटे संबंधों पर सोचेंगे
दुःखी होंगे.

2 नगर-कथा

सभी दुःखी हैं
सबकी वीर्य-वाहिनी नलियाँ
सायकिलों से रगड़-रगड़ कर
पिंची हुई हैं
दौड़ रहे हैं सब
सम जड़त्व की विषम प्रतिक्रिया :
सबकी आँखें सजल
मुट्ठियाँ भिंची हुई हैं.

व्यक्तित्वों की पृष्ठ-भूमि में
तुमुल नगर-संघर्ष मचा है
आदिम पर्यायों का परिचर
विवश आदमी
जहाँ बचा है.

बौने पद-चिह्नों से अंकित
उखड़े हुए मील के पत्थर
मोड़-मोड़ पर दीख रहे हैं
राहों के उदास ब्रह्मा-मुख
‘नेति-नेति' कह
चीख रहे हैं.

.

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3 गृहस्थी : चार आयाम

मेरे सामने
तुम सूर्य - नमस्कार की मुद्रा में
खड़ी हो
और मैं लज्जित-सा तुम्हें
चुप-चाप देख रहा हूँ
(औरत : आँचल है,
जैसा कि लोग कहते हैं - स्नेह है,
किन्तु मुझे लगता है-
इन दोनों से बढ़कर
औरत एक देह है)

मेरी भुजाओं में कसी हुई
तुम मृत्यु कामना कर रही हो
और मैं हूँ-
कि इस रात के अंधेरे में
देखना चाहता हूँ - धूप का
एक टुकड़ा तुम्हारे चेहरे पर
रात की प्रतीक्षा में
हमने सारा दिन गुजार दिया है
और अब जब कि रात
आ चुकी है
हम इस गहरे सन्नाटे में
बीमार बिस्तर के सिरहाने बैठकर
किसी स्वस्थ क्षण की
प्रतीक्षा कर रहे हैं

न मैंने
न तुमने
ये सभी बच्चे
हमारी मुलाकातों ने जने हैं
हम दोनों तो केवल
इन अबोध जन्मों के
माध्यम बने हैं


धूमिल की अंतिम कविता

"शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो
क्या तुमने सुना की यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग"

लोहे का स्वाद
लोहार से मत पूछो
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है.

**-**

(साभार - कविता संग्रह - कल सुनना मुझे, युगबोध प्रकाशन, वाराणसी, 1977)

चित्र - रोमिका भसीन की तैल-रंग से बनी कलाकृति.

.

- मिश्रीलाल जायसवाल

जनसेवक

थानेदार साहब
जनसेवा को
समर्पित हैं
जिससे कुछ मूर्छित
कुछ काल कलवित कवलित हैं

भवसागर

स्वामी जी ने
भव सागर
पार कराना तय किया
जो इस तरह साकार हुआ
मलमत्ता
पार हुआ

बजट

जब
घाटे का
बजट आया
महँगाई ने
वित्तमंत्री के पास
अपना सलाम भिजवाया

.

.

गणित

वे अपना गणित
हमेशा ठीक रखते हैं
पाँच हजार फंड में देकर
पांचों उँगली घी में करते हैं

धंधा

वे अपने धंधे में
तरक्की की उड़ान भर रहे हैं
पहले ब्लैक करते थे
अब ब्लैकमेल कर रहे हैं

----.
साभार - कहानीकार, अंक 134, वर्ष 29.

चुटकुला # 0701
रमेश (अपनी सास से)- आपने तो कहा था कि आपकी लड़की शाकाहारी
है।
सास (रमेश से)- पक्की शाकाहारी है बेटा।
रमेश (सास से) - घर पर तो दो-दो घंटे तक मेरा दिमाग खाती रहती है,
फिर शाकाहारी कैसे हुई?

चुटकुला # 0702
पति (पत्नी से)- पता नहीं, क्यों आजकल रात में मुझे बड़े मीठे-मीठे सपने
आ रहे है?
पत्नी (पति से)- खबरदार जो अब तुमने कभी मीठे सपने देखे। तभी मैं
कहूं कि तुम्हारी डॉयबिटीज बार-बार क्यों बढ़ जाती है।


चुटकुला # 0703
पति (पत्नी से)- ‘आज तुम्हें मेरा बांसुरी बजाना बुरा लगता है लेकिन एक
दिन मेरे बांसुरी बजाने पर रीझ कर तुमने मुझसे शादी की थी।'
पत्नी गुस्से से, ‘हां की थी लेकिन बांसुरी बजाने पर रीझकर नहीं बल्कि
यह सोचकर की थी कि जिस तरह तुम बांसुरी में फूंक मारते हो उसी तरह
चूल्हा भी अच्छी तरह फूंकोगे।'


चुटकुला # 0704
मुकेश (राजेश से)- ‘तुम्हें बंदूक अधिक सावधानी से चलानी चाहिए।
तुम्हारी गोली मेरी पत्नी को लगते-लगते बची।'
राजेश (मुकेश से)- ‘मुझे माफ कर दो भाई।' ये लो मेरी बंदूक आप मेरी
पत्नी पर एक नहीं, दो-दो गोलियां चला दो।

चुटकुला # 0705

पति (पत्नी से)- डॉक्टर ने कहा है कि तुम्हें कोई बीमारी नहीं है। फिर तुम
इतनी दुखी क्यों लग रही हो?
पत्नी (पति से)- इसलिए कि फीस के 150 रुपये यूं ही बेकार चले गए।


चुटकुला # 0706
अपने कमरे में पहुंचकर पत्नी ने देखा कि उसका पति बड़ी तेजी से कुछ
ढूंढ रहा है। उसने कमरे की हर चीज को उलट-पुलट कर रख दिया है।
पत्नी (पति से) ‘क्या ढूंढ रहे है, आप?'
पति (पत्नी से)- ‘यहां कही न कही कैमरा छुपा हुआ है!'
पत्नी (पति से)- ‘आपको कैसे पता चला कि यहां कोई कैमरा छुपा हुआ
है!'
पति (पत्नी से)- टीवी पर आने वाला यह लड़का जानता है कि मैं क्या देख
रहा हूं। हर पंद्रह मिनट में वह कहता है कि आप देख रहे है स्टार टीवी
अब तुम्हीं बताओ बिना कैमरे के वह कैसे जान सकता है कि मैं क्या देख
रहा हूं?


चुटकुला # 0707
पत्नी (पति से) - सुनो जी मैं मर जाऊंगी तो क्या तुम दूसरी शादी
करोगे?
‘विकट प्रश्न है।' पति विचलित स्वर में बोला, ‘इसका जवाब देना ठीक
नहीं होगा।'
पत्नी (पति से)- क्यों भला?
पति (पत्नी से)- क्योंकि मेरे ‘हां' करने पर तुम नाराज हो जाओगी और
‘न' करने पर ‘वह' नाराज हो जाएगी।'

चुटकुला # 0708

पत्नी (पति से)- ‘यदि किसी दिन मैं भीड़ में गुम हो जाऊं तो आप क्या
करेगे?'
पति (पत्नी से) - ‘अखबार में विज्ञापन दूंगा।'
पत्नी (उत्सुकता से)- ‘अच्छा! क्या विज्ञापन देगे?'
पति (पत्नी से)- ‘यही कि जहां भी रहो, खुश रहो।'


चुटकुला # 0709
क्लिनिक से लौटते हुए पत्नी ने पति से शिकायती लहजे में पूछा- डॉक्टर
के पूछने के बावजूद तुमने अपने सिरदर्द का कारण नहीं बताया क्यों?
पति (पत्नी से)- क्योंकि मैं डॉक्टर के सामने तुम्हें शर्र्मिंदा नहीं करना
चाहता था।


चुटकुला # 0710
पत्नी (पति से)- आज हमारे क्लब में एक कंपटीशन है, जिसमें हर औरत
को अपने साथ एक-एक फालतू चीज लानी है।
पति (पत्नी से)- अच्छा, तो तुम क्या ले जा रही हो?
पत्नी (पति से)- अब तक तो मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मैं सोच
रही थी कि अगर तुम ही मेरे साथ चलते तो अच्छा रहता।


चुटकुला # 0711
एक नवविवाहित जोड़ा एक बार बस से मेरठ जा रहा था। बस में भीड़
बहुत थी। मियां बार-बार एक खूबसूरत लड़की से सटे जा रहे थे। बीवी को
उनकी हरकत बुरी लगी। थोड़ी देर बार लड़की तेजी से घूमी और मियां को
एक जोरदार चांटा मारते हुए बोली, ‘लो लड़कियो को चुटकी काटने का
मजा चखो।' मियां हक्के-बक्के रह गए। जब वे बस से उतरे तो बीवी से
बोले, ‘सुनो, उसे चुटकी मैंने नहीं काटी थी।'
‘हां, मैं जानती हूं क्योंकि वो चुटकी मैंने काटी थी।' बीवी मुस्कराते हुए
बोली।

चुटकुला # 0712
नवविवाहित जोड़े ने शादी के बाद यह तय किया कि जब कभी उनके बीच
एक दूसरे को धोखा देने की नौबत आएगी तो वे बक्से में अपनी गोल्फ
की एक बॉल रख दिया करेगे। तीस साल बाद जब बक्सा खोला गया तो
उसमें तीन गोल्फ की बॉल और दस हजार रूपये मिले। पति ने पत्नी को वे
तीनों गोल्फ बॉल देते हुए कहा, ‘सॉरी, तीस साल में मुझे तीन बार तुम्हें
धोखा देना पड़ा।'
‘कोई बात नहीं, उम्मीद है तुम भी मुझे माफ कर दोगे।' पत्नी ने कहा।
‘लेकिन क्यों? तुम्हारी तो कोई भी बॉल यहां नहीं है।' पति ने पूछा।
‘नहीं बॉल तो मेरी भी थी लेकिन वे सब इस बक्से में नहीं आ रही थी
इसलिए मैंने उन्हें बेचकर ये रुपये रख दिये थे।' पत्नी बोली।


चुटकुला # 0713
शर्मा जी के बचने की अब कोई संभावना नहीं थी। डॉक्टरो ने भी जवाब दे
दिया था। एक दिन शर्मा जी अपनी बीवी से बोले, ‘सुनो, तुम्हारे पास इस
वक्त जो सबसे अच्छी साड़ी और गहने हों, सब पहनकर आ जाओ।'
शर्मा जी की बात पर बीवी को गुस्सा आया बोली, ‘सजने संवरने का ये
कौन सा मौका है?'
शर्मा जी बोले, ‘तुम नहीं समझोगी भाग्यवान, मैं चाहता हूं कि मुझे लेने
जब यमराज आएं तो तुम इतनी खूबसूरत लगो कि यमराज मेरी जगह
तुम्हें ही ले जाएं।'


चुटकुला # 0714
एक अभिनेता रोज शराब पीकर घर आता था। एक दिन जब वह शराब
पीकर घर आया तो उसकी पत्नी बिगड़ कर बोली- तुम फिर शराब पीकर
आ गए हो। मैंने कितनी बार कहा है कि शराब पीकर आए तो मैं खुदकुशी
कर लूंगी।
अभिनेता (पत्नी से)- तुम मुझे रोज-रोज यही धमकी देती हो लेकिन न तो
तुम अपना वादा पूरा करती हो और न मैं शराब छोड़ता हूं।


चुटकुला # 0715
चिंता में डूबे पति को पत्नी ने सीख दी- स्वस्थ रहना चाहते हो तो
सोच-विचार और चिंता छोड़ो।
तुम क्या जानो, सोच-विचार के लिए बुद्धि की जरूरत होती है। पति ने
सफाई दी।
वही तो कह रही हूं! जो बुद्धिमान होगा, वह तुम्हारी तरह अपन स्वास्थ्य
चौपट क्यों करेगा? पत्नी झल्लाकर बोली।


चुटकुला # 0716
पति (पत्नी से)- अगर मैं मर जाऊं तो तुम क्या करोगी?
पत्नी (पति से)- वही अगर मैं मर जाऊं तो जो आप करते।
इस पर पति आगबबूला होते हुए बोला- मुझे मालूम था कि तुम दोबारा
शादी किये बिना नहीं रहोगी।


चुटकुला # 0717
अपनी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह की पार्टी में एक गायक को बात-बात
पर हंसते देख उसके दोस्त ने उससे कहा, ‘यार, तुम जितने अच्छे गायक
हो, उतने ही अच्छे अभिनेता भी।'
गायक (दोस्त से)- ‘यह आपने कैसे जाना?'
दोस्त (गायक से)- ‘जो आदमी शादी की पच्चीसवीं सालगिरह पर भी हंस
सकता है उससे बढ़िया अभिनेता भला और कौन होगा।'


चुटकुला # 0718
पत्नी (पति से)- आप कितना बदल गए है। कुछ साल पहले तो आप कहा
करते थे कि आप स्वर्ग में मेरे बिना रहने के बजाय नरक में मेरे साथ
रहना पसंद करेगे।
पति (पत्नी से)- हां दुर्भाग्य से मेरी वही इच्छा पूरी हो गई।


चुटकुला # 0719
एक व्यक्ति घबराया हुआ पुलिस स्टेशन आया और थानेदार से बोला- मुझे
गिरफ्तार कर लीजिए, मैंने अपनी पत्नी के सिर पर लाठी मारी है।
थानेदार - तो क्या तुम्हारी पत्नी मर गई?
पति - जी नहीं मेरी पत्नी मरी नहीं बल्कि वही लाठी लिए मेरे पीछे आ
रही है।


चुटकुला # 0720
सिपाही की पत्नी ने अपने पति के पर्स में से कुछ रुपये निकाले ही थे कि
सिपाही की नजर उस पर पड़ गयी। उसने आगे बढ़कर पत्नी की कलाई
पकड़ी और गुस्से से बोला- ‘मैं तुम्हें अरेस्ट कर सकता हूं।'
पत्नी ने उन रुपयो में एक पांच रुपये का नोट सिपाही के हाथ पर रखते
हुए कहा- ‘चलो भी, बात यही खत्म कर दो।'


चुटकुला # 0721
चुनाव के टिकट के लिए एक सप्ताह से डेरा डाले नेता से उसकी पत्नी ने
कहा- ‘रेल में तो आप बिना टिकट ही सफर तय कर लेते है, क्या चुनाव
के लिए टिकट वाकई जरूरी है।

पति (पत्नी से)- मैंने ऑफिस से कई बार फोन मिलाया, पर हर बार इंगेज
जा रहा था। फोन खराब है क्या?
पत्नी (पति से)- आश्चर्य की बात है, मैंने दिन भर में 30 फोन मिलाए और
कोई भी लाइन व्यस्त नहीं थी।


चुटकुला # 0722
एक कंजूस ने अपनी पत्नी से कहा, ‘तुम कुछ पढ़ने जा रही हो?' पत्नी ने
जवाब दिया, ‘नहीं।'
कंजूस ने फिर पूछा, ‘कुछ सिलने-बुनने जा रही हो?' कंजूस की पत्नी ने
कहा, ‘अरे नहीं।'
कंजूस ने झुंझलाकर पूछा, ‘तो फिर बेवजह चश्मा पहन कर फिजूलखर्ची
क्यों कर रही हो।'


चुटकुला # 0723
पति शराब पीकर रात को घर लौटा तो पत्नी भड़ककर बोली, ‘देखो, मैं कहे
देती हूं, अगर फिर तुम कभी शराब पीकर आए तो मैं फांसी लगाकर जान
दे दूंगी, समझे!'
पति लड़खड़ाते हुए स्वर में बोला, ‘बस, यही सब तो मेरी किस्मत में है-
वादे, वादे और सिर्फ वादे।'


चुटकुला # 0724
पति (पत्नी से)- अरी भागवान, देखो कभी-कभार गुस्सा भी लाभदायक
होता है।
पत्नी (पति से)- अरे नहीं, ये कैसे हो सकता है?
पति (पत्नी से)- कल तुम गुस्से में थी और तुमने सारा गुस्सा मेरे कपड़ो
पर उतार दिया। देखो मेरे सारे कपड़े कितने साफ और उजले हो गये है।


चुटकुला # 0725
किसी बात पर अनबन होने पर पति ने गुस्से में आकर अनपढ़ पत्नी को
एक तमाचा जड़ दिया।
पत्नी की आंखो में आंसू देखकर पति को उस पर दया आ गई। वह पत्नी
को प्यार से समझाते हुए बोला, ‘प्रिये! हाथ उसी पर उठता है जिसे हम
प्यार करते है।'
इतना सुनते ही दोगुने उत्साह के साथ पति को तमाचा मारते हुए पत्नी ने
कहा, ‘आप क्या समझते है, मेरा प्यार आपसे कम है।'

.


.

चुटकुला # 0726
पति अपनी बीमार पत्नी के बिस्तर के पास बैठा उसे दिलासा दे रहा था।
एकाएक पत्नी ने पति का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘प्रिय, मैं तुमसे
एक वादा चाहती हूं।'
‘कैसा वादा?' पति ने घबराकर पूछा!
पत्नी ने कहा, ‘यदि मैं मर जाऊं और तुम दूसरी शादी करो तो मेरे कपड़े
अपनी दूसरी पत्नी को मत पहनने देना।'
‘मैं वादा करता हूं कि ऐसा ही होगा। वैसे भी रेखा तुमसे दुबली है, उसे
तुम्हारे कपड़े आएंगे ही नहीं।'
पति ने विश्वास दिलाते हुए कहा।


चुटकुला # 0727
पत्नी (पति से)- देखो जी, मेरी जीभ पर छाले निकल आए है।
पति (पत्नी से)- तुम कभी इसे आराम तो करने नहीं देती। आखिर यही
होना था।


चुटकुला # 0728
पत्नी (पति से)- ‘मेरी तो किस्मत ही खराब थी जो मैंने तुमसे शादी की।
मुझे तो तुमसे अच्छे और ज्यादा अक्लमंद लड़के मिल रहे थे।'
पति (पत्नी से) ‘तुम ठीक कह रही हो वो सब मुझसे ज्यादा अक्लमंद होगे
तभी तो तुम्हारे चंगुल में नहीं फंसे।'


चुटकुला # 0729
बच्चे से परेशान पत्नी (पति से)- जब देखो मुन्ना इधर-उधर भागता रहता
है। एक पल भी चैन से नहीं बैठता।
पति (पत्नी)- और खिलाओ फास्ट फूड....! मैं हमेशा मना करता हूं मगर
तुम मेरी बात मानो तब न।


चुटकुला # 0730
पत्नी (पति से)- सुनो! ऑफिस जाने से पहले पांच सौ रूपये देते जाना,
मुझे साड़ी खरीदनी है।
पति (पत्नी से)- तुम्हें रकम की नहीं अक्ल की जरूरत है।
पत्नी (पति से)- लेकिन तुमसे वह चीज मांगने से क्या फायदा जो तुम्हारे
पास है ही नहीं।

चुटकुला # 0731
पति-पत्नी स्टेशन पहुंचे तो ट्रेन छूट चुकी थी और दूसरी ट्रेन देर से आने
वाली थी। पति ने अपनी पत्नी को गुस्से से कहा, ‘अगर तुमने
सजने-संवरने में इतनी देर न लगाई होती तो यह ट्रेन हमें मिल जाती।'
पत्नी ने तुनककर कहा, ‘ये क्यों नहीं कहते कि अगर तुमने जल्दी-जल्दी
की रट न लगाई होती, तो अगली ट्रेन के लिए हमें इतना इंतजार न
करना पड़ता।'


चुटकुला # 0732
पीसीओ पर एक आदमी काफी देर से फोन पकड़े खड़ा था। उसे देखकर
दूसरे लोग खिसिया रहे थे। अचानक उनमें से एक व्यक्ति गुस्से से बोला,
‘क्यों भाई साहब आप इतनी देर से रिसीवर पकड़े खड़े है और एक भी
शब्द आपके मुंह से नहीं निकल रहा। अच्छा हो कि आप फोन छोड़ दे तो
मैं बात कर लूं।'
इस पर पहला आदमी बोला, ‘भाई साहब, आप समझते क्यों नहीं, मैं फोन
पर अपनी बीवी से बात कर रहा हूं।'


चुटकुला # 0733
अफसर (उम्मीदवार से)- देखो, हमें ऐसा चौकीदार चाहिए जो सेहतमंद हो,
चुस्त, चालाक और चौकन्ना हो, जरूरत पड़ने पर धमकी भी दे सके ।
यदि तुम्हारे अंदर ये गुण है तभी तुम्हें ये नौकरी मिल सकती है।
उम्मीदवार (अफसर से)- साहब ये गुण मुझमें तो नहीं है, पर मेरी बीवी में
ये सभी गुण है। मैं अभी उसे बुलाता हूं।


चुटकुला # 0734
एक आदमी की आदत थी कि जब भी कोई कार उसके पास से गुजरती तो
वह बिदक जाता। उसके दोस्त ने इसकी वजह पूछी तो उसने कहा, ‘दो
महीने पहले मैं अपनी बीवी के साथ सड़क पार कर रहा था, तभी कार से
आए दो-तीन आदमी मेरी बीवी को उठाकर ले गए। मैं इस ख्याल से
बिदक जाता हूं कि कही वे मेरी बीवी को वापस न ले आएं हो।'


चुटकुला # 0735
मीना ने अपनी मां से पति की शिकायत की, ‘मैं तो इनकी आवारगी से
तंग आ गई हूं।'
‘क्यों, क्या हुआ? मां ने पूछा।'
‘क्या बताऊं, अभी कल ही मैंने इन्हे सिनेमाहॉल में एक लड़की के साथ
बैठे देखा था।' मीना ने कहा।
‘तो तुमने उसे रंगे हाथो क्यों नहीं पकड़ा।' मां ने फिर पूछा। मीना ने इस
पर एक गहरी सांस ली और अफसोस जताते हुए कहा, ‘कैसे पकड़ती मां,
मैं भी तो उस समय अपने दोस्त के साथ फिल्म देख रही थी।'


चुटकुला # 0736
पत्नी (पति से)- क्यों जी, शादी से पहले तो तुम कहा करते थे कि मेरी
छोटी से छोटी इच्छा भी पूरी करोगे। अब क्या हुआ?
पति (पत्नी)- हां, जरूर कहा करता था। अब तक मैं यही जानने की
कोशिश कर रहा हूं कि तुम्हारी कौन सी इच्छा इतनी छोटी है कि मैं उसे
पूरा कर सकूं।


चुटकुला # 0737
पति (पत्नी से) : आजकल रात में मुझे अजीब-अजीब से सपने दिखने लगे
है। कभी मैं तुम्हारे लिए हीरे जड़े जेवरो का सेट खरीदता हूं तो कभी
बेशकीमती साड़ियां।
पत्नी (पति से): इसका मतलब तुम केवल सपनो में ही ठीकठाक सोच पाते
हो।


चुटकुला # 0738
पत्नी (पति से)- तुम्हें तो नरक में भी जगह नहीं मिलेगी।
पति (पत्नी से)- अच्छा है, वरना सब जगह तुम्हारे साथ रहते-रहते तो मैं
पागल ही हो जाता।

पत्नी (पति से) : जो आदमी चोरी करता है, वह कभी न कभी जरूर
पछताता है।
पति (पत्नी से): हां, ठीक कहती हो। शादी से पहले मैंने तुम्हारा दिल
चुराया था, इसलिए अब तक पछता रहा हूं।


चुटकुला # 0739
नई-नवेली दुल्हन (अपने पति से)- यदि मैं रसोइए को हटाकर पूरे एक
महीने आपको अपने हाथो से खाना बनाकर खिलाऊं तो मुझे क्या मिलेगा?
पति - मेरे जीवन बीमा की पूरी रकम।

टी.वी.मेकैनिक (ट्रैफिक पुलिसमैंन से)- साहब आपका टी.वी. ठीक हो गया।
ट्रैफिक पुलिसमैंन (टी.वी.मेकैनिक से)-क्या ठीक किया है तुमने, टी.वी.पर
फोटो आती है तो आवाज नहीं आती, और आवाज आती है तो फोटो नहीं
आती।
मैंकेनिक (ट्रैफिक पुलिसमैंन से)- साहब, आपको देखकर वन-वे ट्रैफिक ही
चलेगा न।

चुटकुला # 0740

मालिक (नौकर से)-तुम शराब पीते हो?
नौकर (मालिक से)-जी नहीं।
मालिक (नौकर से)-तुम सट्टा खेेलते हो?
नौकर (मालिक से)-जी नहीं।
मालिक (नौकर से)- और कोई खराब आदत।
नौकर (मालिक से)-जी बस झूठ बोलने की आदत है।


चुटकुला # 0741
पहला दोस्त (दूसरे दोस्त से)- क्या तुम कोई ऐसा शब्द बता सकते हो,
जिसमें 1000 से भी ज्यादा लेटर हो?
दूसरे दोस्त (पहले दोस्त से)- अरे इसका जवाब तो बिल्कुल आसान है
‘पोस्ट ऑफिस‘।

तीन व्यक्ति गप्पें मार रहे थे कि वह मरने के बाद किस तरह दफनाया
जाना पसंद करेगे।
पहला बोला- अगर मुझे अरस्तु के पड़ोस में दफनाया जाएगा, तो मुझे
ज्यादा अच्छा लगेगा।
दूसरा बोला- आइंस्टीन के पड़ोस में दफनाया जाना पसंद करूंगा।
तीसरा बोला - काश, मैं रेखा कीपड़ोस की कब्र में दफनाया जाऊं।
इस पर पहले ने सवाल किया- लेकिन रेखा तो अभी जिंदा है?
तीसरा बोला- तो मैं ही कौन सा मर गया हूं।


चुटकुला # 0742
एक आदमी रेल के डिब्बे में एक बड़े से संदूक को ऊपर वाले बर्थ पर रखने
लगा तो नीचे बैठी महिला बोली- इसको किसी और जगह रखिए कही यह
मेरे सिर पर न आ गिरे।
आदमी ने जवाब दिया- चिंता न कीजिए, इसमें टूटने वाली कोई चीज नहीं
है।


चुटकुला # 0743
मालकिन (रामू से)- रामू मैंने कहा था, पूजा के लिए धूप ले आना।
रामू (मालकिन से)- लाता कहां से मालकिन,आज तो दिनभर बादल छाए
रहे।


चुटकुला # 0744
यात्री (ड्राइवर से)- क्यों भाई ड्राइवर साहब आप बस में कितने घंटे रहते
है?
ड्राइवर (यात्री से)- चौबीस घंटे।
यात्री (ड्राइवर से)- यह कैसे संभव है।
ड्राइवर (यात्री से)- आठ घंटे सरकारी बस में और सोलह घंटे अपनी बीवी
के बस में।


चुटकुला # 0745
दुकान का मालिक (सेल्समैंन से)- कोई भी चीज बेचते हुए उसके गुणो का
बार-बार बखान करो। एक बार से काम न चले, तो दूसरी बार करो। फिर
तीसरी... चौथी बार बताओ। यहां तक दोहराओ कि ग्राहक के दिमाग में
तुम्हारी बात बैठ जाए। अच्छा बताओ, तुम क्या कहना चाहते हो।
सेल्समैंन (मालिक से)- मैं चाहता हूं कि आप मेरा वेतन बढ़ा दीजिए...
बढ़ा दीजिए।


चुटकुला # 0746
ग्राहक (दुकानदार से)- तुम्हारी ब्रेड बहुत खराब होती है।
दुकानदार (ग्राहक से)- जनाब, मैं तब से ब्रेड तैयार कर रहा हूं, जब आप
पैदा भी नहीं हुए होगे।
ग्राहक (दुकानदार से)- यह तो ठीक बताया आपने, पर तब की ब्रेड अब
क्यों बेच रहे है?


चुटकुला # 0747
होटल में खाना खाते ही एक साहब का मूड बिगड़ गया। उन्होने मैंनेजर
को बुलवाया। मैंनेजर ने आते ही पूछा- सर! क्या बात है?
साहब गुस्से से बोले- आपके यहां ऐसा खाना बनता है, जिसे गधे भी नहीं
खा सकते।
मैंनेजर ने बैरे को बुलाकर कहा- फौरन ऐसा खाना लाओ, जिसे गधे भी
खा सकें।


चुटकुला # 0748
पत्नी (पति से)- जानते हो संगीत में कितनी शक्ति होती है?
पति (पत्नी से)- कितनी?
पत्नी (पति से)- संगीत में इतनी शक्ति है कि पानी गरम हो सकता है।
पति (पत्नी से)- अरे भई, जब तुम्हारा गाना सुन कर मेरा खून खौल
सकता है,तो पानी क्या चीज है।


चुटकुला # 0749
पहली महिला (दूसरी महिला से)- हमारा कुत्ता बहुत समझदार है। वह
रोज सवेरे हमारा अखबार उठाकर हमारे घर लाता है।
दूसरी महिला (पहली महिला से)- लेकिन हमारा कुत्ता उससे भी ज्यादा
समझदार है। वह अपना नहीं,बल्कि दूसरो का अखबार उठाकर लाता है।


चुटकुला # 0750
शेर (बूढ़े व्यक्ति से)- आज मैं तुम्हारा खून पी जाऊंगा।
बूढ़ा व्यक्ति (शेर से)- मेरा खून तो ठंडा हो गया है। देखो एक नौजवान आ
रहा है, उसका गर्म खून पिओ।
शेर (बूढ़े व्यक्ति से)- आज गर्मी बहुत है। मैं कोल्ड ड्रिंक पीना चाहता हूं।


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1 दुःख सगा है


- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जब से यह दुःख
रात-दिन मेरे पीछे
लगा है ,
तब से मैंने जाना
गैर हैं सब
एक यही तो मेरा सगा है.

सगे जो होते हैं
जरा जरा सी बात पर
मुँह मोड जाते हैं ,
हम चाहें उन्हें मनाना
पर वे साथ छोड़ जाते हैं.
इन सुखों ने और सगों ने
मौका मिलने पर
मुझको बार बार ठगा है,


यह दुःख ही है बेचारा
जो मेरे हर दर्द में
सिरहाने बैठा रहा है
रात -रात भर
साथ -साथ जगा है.
****


2 इस धरती पर

धरो पैर इस धरती पर
तब आगे बढ़ पाओगे.
नभ में इतना नहीं उड़ो
जाने कब गिर जाओगे.

आंखों पर पट्टी बांधे
क्या पर्वत चढ़ पाओगे.
सावधान किसी दिन बड़े
गड्ढे में गिर जाआगे.

हमने माना नोटों के
बिस्तर तुम बिछवा सकते.
पर क्या इन नोटों से तुम
नींद घड़ी भर लाओगे?

किया आचमन धोखे का
मंत्र कपट के खूब पढ़े.
माना ऊंचे अम्बर में
कटी पतंग से खूब चढ़े.

तेज हवा का झोंका जब
जिस पल भी रुक जाएगा.
बिना डोर की पतंग को
धरती पर ले आएगा.

इसीलिए मैं कहता हूँ
मत मन में अभिमान करो.
अच्छे काम करो जी-भर
बुरे काम से सदा डरो.

****.

.


.

3 चांद-सा माथा

तुम्हारा चांद -सा माथा,
जो दो पल छू लिया मैंने.
कहें क्या बात जनमों की ,
पूरा युग जी लिया मैंने.

करें अभिशाप का वंदन,
मिलते वरदान फिर कैसे.
जब पूजा से दुआ गायब,
मिटे शैतान फिर कैसे.

बनारस जा नहीं पाया,
संगम नहा नहीं न पाया.
घर के द्वार पर ही आज ,
वह प्रियतम पा लिया मैंने.

पूजा उपवास ना जाना,
नाम का दान कब पाया.
न ओढ़ी रामनामी ही,
न घंटा- घड़ियाल बजाया.

कभी तप करना न आया
मुझे जप करना कब भाया.
जब चिड़िया भोर में चहकी,
कुछ गुनगुना लिया मैंने.

नरक का द्वार मिल जाए,
स्वर्ग का सार छिन जाए.
मुझे दोनों बराबर हैं,
रात आए या दिन जाए.

सबकी हर पीर मैं हर लूं,
उजाले प्राण में भर लूं.
थे जब गीले नयन पोंछे,
सभी कुछ पा लिया मैंने.

*****.
रचनाकार - रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु' संप्रति केंद्रीय विद्यालय ओईएफ, हजरतपुर जि. फिरोजाबाद 283103, उप्र में प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं.

चित्र: जवा मेहता की तैल रंग से बनी अनाम कलाकृति.

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देशी फ्लाइट १८

डॉ. कान्ति प्रकाश त्यागी

देशी फ्लाइट १८ में ड्राइवर हरभजन की सलाम,सतश्री अकाल और नमस्ते
मुझे पूरा विश्वास तथा आशा है कि, आपका सफर कटेगा हँसते हँसते

मुझे खेद है कि,यह फ्लाइट केवल दो दिन देरी से चल रही है
भगवान का शुक्रिया करो, किसी तरह आखिर चल तो रही है

इस विमान में चार आंटियां थीं, चारों को ही निकाल दिया है
दो निकम्मी थी,एक मैके चली गयी,चौथी ने भाग कर ब्याह किया है

इस का असली ड्राइवर कम पायलट सुखीराम कारणवश नहीं आया है
इसलिए सिर्फ आज की उड़ान मुझे उडाने का परमिट दिलाया है

जिस किसी को टायलट जाना है,अभी निपट लो,बीच में नहीं रुकेगी
गदंगी के कारण टायलट निकाल दिये ,अतः असुविधा सहनी पड़ेगी

अन्तर्राष्ट्रीय नियमों के कारण हम आपको सुरक्षा के नियमों से अवगत करायेंगे
यदि बीच में कुछ मुसीबत आई,अन्य बातें उसी समय विस्तार से बतायेंगे

इस विमान में भागने के चार द्वार हें,अतः नामी भगोडे ही इनके पास बैठें
जिनको द्वार खोलकर भागना नहीं आता ,वे किसी हालत में इनके पास न बैठें

यदि विमान में किसी तरह का डिप्रेशन है,तो पीले गुब्बारे अपने आप लटकेंगे
आप गुब्बारे से धीरे धीरे सांस लेते रहें,आप बिलकुल नहीं भटकेगें

सीट बेल्ट नहीं हैं,जरुरत पड़ने पर अपनी बेल्ट तथा चुनरी से स्वयं को बांधे रखे
थोडी बहुत मुसीबत आने पर अपना तथा अपने साथियों का साहस बाँधे रखें

महिलाओं के लिए स्वीमिंग सूट,पुरुषों के शार्टस, आपकी सीट के नीचे रखे हैं
भोजन के लिए मक्का की रोटी,सरसों का साग,सामने की सीट के पीछे रखे है

बच्चे बीच की गैलरियों में,आराम से क्रिकेट खेल सकते हैं
बूढ़े टी वी रिकार्डिंग, पिक्चर,बुठ्ठा मिल गया " देख सकते हैं

इस फ्लाइट में वैसे तो धूम्रपान नहीं कर सकते हैं
सहयात्री को एतराज नहीं,चुपचाप कर सकते हैं

यात्रियों से अनुरोध है,उड़ान के समय सीट सीधी रखें,तथा सामान के लॉकर न खोलें
फिर भी यदि किसी को छोटी मोटी चोट लग जाए,आपस में ही सुलह, सुलट लें

उड़ान के दौरान ,मोबाइल फोन बिलकुल बन्द करें
इमरजैन्सी में ,पायलट के केबिन से फोन से, फोन करें

उड़ान में महिलाओं के लिए,साड़ियों की सेल लगेगी
पुरुषों को पीने के लिए,ड्किन्स बार खुलेगीं

कुछ ही घण्टों में,आपका विमान दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरेगा
कौन से टर्मिनल पर उतरेगा, पता, उतरने के बाद ही चलेगा

यदि आपको,टैक्सी व आटो की जरुरत पडे, तो हमारी देशी रोडवेज से सम्पर्क करें
कुली चाहते हैं तो,फौरन बतलाएं, हम चाहते हैं, हमारे यात्री चिंता मुक्त सफर करें

हमें पूरी आशा है कि,आपकी यात्रा सफल एवम् सुखद रही होगी
आपके मन में,दोबारा देसी एयरलाईन्स से यात्रा करने की इच्छा होगी

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बाज़ार में रामधन







-कैलाश बनवासी


यह बालोद का बुधवारी बाज़ार है.

बालोद इस ज़िले की एक तहसील है. कुछ साल पहले तक यह सिर्फ़ एक छोटा-सा गांव हुआ करता था. जहां किसान थे, उनके खेत थे, हल-बक्खर थे, उनके गाय-बैल थे, कुएं और तालाब थे, उनके बरगद, नीम और पीपल थे. पर अब यह एक छोटा शहर है. शहर की सारी खूबियां लिए हुए. आसपास के गांव-देहातों को शहर का सुख और स्वाद देने वाला. इसी बालोद के हफ्तावार भरने वाले बुधवारी बाज़ार की बात है. रामधन अपने एक जोड़ी बैल लेकर यहां बेचने पहुंचा था.

रामधन और उसकी पत्नी मेहनत-मजूरी करके ही अपना पेट पाल सकते हैं और पाल रहे हैं. लेकिन मुन्ना क्या करे? वह तो यहां गांव का पढ़ा-लिखा नौजवान है, जिसे स्कूली भाषा में कहें तो देश को आगे बढ़ानेवालों में से एक है. वह पिछले दो सालों से नौकरी करने के या खोजने के नाम पर इधर-उधर घूम रहा है. परंतु अब वह इनसे भी ऊब चुका है और कोई छोटा-मोटा धंधा करने का इच्छुक है. लेकिन धंधा करने के लिए पैसा चाहिए. और पैसा?

''भइया, बैलों को बेच दो!''
मुन्ना ने यह बात किसी खलनायक वाले अंदाज़ में नहीं कही थी. उसने जैसे बहुत सोच-समझकर कहा था. इसके बावजूद रामधन को गुस्सा आ गया, ''ये क्या कह रहा है तू?''
''ठीक ही तो कह रहा हूं मैं! बेच दो इनको. मैं धंधा करूंगा!''
रामधन को एक गहरा धक्का लगा था, अब यह भी मुंह उठाकर बोलना सीख गया है मुझसे. लेकिन इससे भी ज्यादा दु:ख इस बात का हुआ कि मुन्ना उसे बेचने को कह रहा है जो उनकी खेती का आधार है. रामधन ने बात गुस्से में टाल दी, ''अगर कुछ बनना है, कुछ करना है तो पहले उतना कमाओ! इसके लिए घर की चीज़ क्यों ख़राब करता है? पहले कमा, इसके बाद बात करना! हम तेरे लिए घर की चीज़ नहीं बेचेंगे. समझे?''

लेकिन बात वहीं ख़त्म नहीं हुई. झंझट था कि दिन-पर-दिन बढ़ता जा रहा था.
''आख़िर ये दिन भर यहां बेकार में बंधे ही तो रहते हैं. खेती-किसानी के दिन छोड़कर कब काम आते हैं? यहां खा-खाकर मुटा रहे हैं ये!'' मुन्ना अपने तर्क रखता.
''अच्छा, तो हमारा काम कैसे चलेगा?''
''अरे, यहां तो कितने ही ट्रैक्टर वाले हैं, उसे किराए से ले आएंगे. खेत जुतवाओ, मिंजवाओ और किराया देकर छुट्टी पाओ!''

''वाह! इसके लिए तो जैसे पइसा-कौड़ी नहीं लगेगा? दाऊ क्या हमारा ससुर है जो फोकट में ट्रैक्टर दे देगा?''
''लगेगा क्यों नहीं? क्या इनकी देखभाल में खरचा नहीं लगता?''
''लगता है, मगर तेरे ट्रैक्टर से कम! समझे? बात तो ट्रैक्टर की कर रहा है तू, मालूम भी है उसका किराया?''
''मालूम है इसीलिए तो कह रहा हूं. यहां जब बैल बीमार पड़ते हैं तो कितना ही रुपया उनके इलाज-पानी में चला जाता है, तुम इसका हिसाब किए हो? साला पैसा अलग और झंझट अलग!''

''मगर किसी की बीमारी को कौन मानता है?''
''तभी तो मैं कहता हूं, बेचो और सुभीता पाओ!''
बातचीत हर बार अपनी पिछली सीमा लांघ रही थी. कहने को तो मुन्ना यहां तक कह गया था कि इन बैलों पर सिर्फ़ तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी हक़ है.
इस बात ने लाजवाब कर दिया था रामधन को. और अवाक्! कभी नहीं सोचा था उसने कि मुन्ना उसके जैसे सीधे-सादे आदमी से हक़ की बात करेगा. मुन्ना को क्या लगता है, मैं उसका हिस्सा हड़पने के लिए तैयार बैठा हूं? रामधन खूब रोया था इस बात पर...अकेले में.
बैल उसके पिता के ख़रीदे हुए हैं, यह बात सच है. जाने किस गांव से भागकर इस गांव में आ गए थे बैल, तब ये बछड़े ही थे और साथ में बंधे हुए थे. किसी ने पकड़कर कांजी हाउस के हवाले कर दिया था उन्हें. नियम के मुताबिक़ कुछ दिनों तक उनके मालिक का रास्ता देखा गया ताकि जुर्माना लेकर छोड़ सकें. लेकिन जब इन्तज़ार करते-करते ऊब गए और कोई उन्हें छुड़ाने नहीं पहुंचा तो सरपंच ने इनकी नीलामी करने का फ़ैसला किया था. यह संयोग ही था कि रामधन के गंजेड़ी बाप के हाथ में कुछ रुपए थे. और सनकी तो वह था ही. जाने क्या जी में आया जो दोनों बछड़े वहां से ख़रीद लाया. तब से ये घर में बंध गए और रामधन की निगरानी में पलने लगे. खेत जोतना, बैलगाड़ी में फांदना, उनसे काम लेना और उनके दाना-भूसा का ख़याल रखना, उनको नहलाना-धुलाना और उनके बीमार पड़ने पर इलाज के लिए दौड़-भाग करना. सब रामधन का काम था. तब से ये बैल रामधन से जुड़े हुए हैं. इनके जुड़ने के बाद रामधन इतना ज़रूर जान गया कि भले ही बेचारों के पास बोलने के लिए मुंह और भाषा नहीं है, लेकिन अपने मालिक के लिए भरपूर दया-माया रखते हैं. इनकी गहरी काली तरल आंखों को देखकर रामधन को यह भी लगता है, ये हमारे सुख-दु:ख को खूब अच्छी तरह समझते हैं. बिल्कुल अपने किसी सगे की तरह. तभी तो वह उन्हें इतना चाहता है. इतना लगाव रखता है.

इन्हें बेचने की बात उठी, तबसे ही उसे लग रहा है, जैसे उसकी सारी ताक़त जाने लगी है.
रामधन मुन्ना को समझा नहीं पा रहा था. वह समझा भी नहीं सकता था. अब कैसे समझाता इस बात को कि बैल हमारे घर की इज्ज़त है...घर की शोभा है. और इससे बढ़कर हमारे पिता की धरोहर है. उस किसान का भी कोई मान है समाज में, जिसके घर एक जोड़ी बैल नहीं हैं! कैसे समझाता कि हमारे साथ रहते-रहते ये भी घर के सदस्य हो गए हैं. जो भी रुखा-सूखा, पेज-पसिया मिलता है, उसी में खुश रहते हैं. वह मुन्ना से कहना चाहता था, तुमको इनका बेकार बंधा रहना दिखता है मगर इनकी सेवा नहीं दिखती? इनकी दया-मया नहीं दिखती?

और सचमुच मुन्ना को कुछ दिखाई नहीं देता. उसके सिर पर तो जैसे भूत सवार है धन्धा करने का. रोज़-रोज़ की झिक-झिक से उसकी पत्नी भी तंग आ चुकी है_रोज़ के झंझट से तो अच्छा है कि चुपचाप बेच दो. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!
मुन्ना कहने लगा है - अगर तुम नहीं बेच सकते तो मुझसे कहो. मैं बेच दूंगा उन्हें बढ़िया दाम में!
...बाज़ार की भीड़ अब बढ़ रही है. चारों तरफ़ शोरगुल और भीड़भाड़. यहां की रौनक देखकर रामधन को महादेव घाट के मेले की याद आई. हर साल माघी पुन्नी के दिन भरने वाला मेला. वहां भी ऐसी ही भीड़ और रौनक होती है. पिछले साल ही तो गया था उसका परिवार. और पास-पड़ोस के लोग भी गए थे. जितने उसकी बैलगाड़ी में समा जाएं. सब चलो! पूरी रात भर का सफ़र था. और जाड़े की रात. फिर भी मेले के नाम पर इतना उत्साह कि सब अपना कथरी-कंबल संभाले आ गए थे. रामधन को आज भी वह रात याद है_अंजोरी रात का उजाला इतना था कि हर चीज़ चांदनी में नहा-नहा गई थी, खेत, मेंड़, नहर, पेड़, तालाब...जैसे दिन की ही बात हो.

उनके हँसने-खिलखिलाने से जैसे बैलों को भी इसका पता चल गया था, रात भर पूरे उत्साह और आनंद से दौड़ते रहे...खन्-खन् खन्-खन्...!
...गाय-बैलों का एक मेला-सा लग गया है यहां. हर क़िस्म के बैल. काले-सफेद, लाल, भूरे और चितकबरे और अलग-अलग काठी के बैल_नाटे, दुबले, मोटे...ग्राहकों की आवाजाही और पूछताछ शुरू हो चुकी है. बैलों के बाज़ार में धोती-पटका वाले किसान हैं. सौदेबाजी चल रही है.

रामधन के बैलों को भुलऊ महाराज परख रहे हैं. आस-पास के गांवों में उनकी पण्डिताई ख़ूब जमी है. चाहे ब्याह करना हो, सत्यनारायण की कथा कराना हो, मरनी-हरनी पर गरुड़-पुराण बांचना हो_सब भुलऊ महाराज ही करते हैं. कुछ साल पहले तक तो कुछ नहीं था इनके पास. अब पुरोहिती जम गई तो सब कुछ हो गया. खेती-बाड़ी भी जमा चुके हैं अच्छी-खासी.
महाराज बैलों के पुट्ठों को ठीक तरह से ठोंक-बजाकर देखने के बाद बोले,
''अच्छा रामधन, ज़रा इनको रेंगाकर दिखाओ. चाल देख लूं.''

रामधन ने बीड़ी का धुआं उगलकर कहा, ''अरे, देख लो महाराज...तुमको जैसे देखना है, देख लो! हम कोई परदेसी हैं जो तुम्हारे संग धोखाधड़ी करेंगे.''
रामधन ने बैलों को कोंचकर हकाला, ''हो...रे...रे...च्चल!'' दोनों बैल आठ-दस डग चले फिर वापस अपनी जगह पर.

भुलऊ महाराज बगुला भगत बने बड़े मनोयोग से बैलों का चलना देख रहे थे. कहीं कोई खोट तो नहीं है! कहने लगे, ''देखो भइया, मैं तो कुछ भी चीज़ लेता हूं तो जांच-परखकर लेता हूं.''
''देखो न महाराज, रोकता कौन है? न मैं कहीं भाग रहा हूं न मेरे बैल. अच्छे-से देख लो. धोखाधड़ी की कोई बात नहीं है. फिर बाम्हन को दगा देकर हमको नरक में जाना है क्या?''
भुलऊ महराज, के चेहरे से लगा, रामधन के उत्तार से संतुष्ट हुए. बोले, ''अच्छा, अब ज़रा इनका मुंह खोलकर दिखाओ. मैं इनके दांत गिनूंगा.''

''अभी लो. ये कौन बड़ी बात है.'' रामधन ने बीड़ी फेंककर अपने बैलों के मुंह खोल दिए. भुलऊ महाराज अपनी धोती-कुरता संभालते हुए नजदीक आए और बैलों के दांत गिनते लगे.
दांत गिरने हुए महाराज ने पूछा, ''तुम्हारे बैल कोढ़िया तो नहीं हैं?''
''तुम भी अच्छी बात करते हो महाराज! विश्वास नहीं है तो गांव में पुछवा लो पांच-परगट. सब पंच गवाही देंगे!''
''ठीक है भई, ठीक है. मान लिया. अब तुम कहते हो तो मान लेते हैं.'' महाराज व्यर्थ ही हँसे, फिर अपने बंद छाते की नोक को कसकर ज़मीन में धांसा. मानो अब सौदे की बात हो जाए. महाराज ने अपने को थोड़ा खांस-खंखारकर व्यवस्थित किया, फिर पूछा, ''तो बताना भाई, कितने में दोगे?''

रामधन विनम्र हो गया, ''मैं तो पहले ही बता चुका हूं मालिक...''
नाराजगी से भुलऊ महाराज का चंदन और रोली का तिलक लगा माथा सिकुड़ गया, ''फिर वही बात! वाजिब दाम लगाओ, रामधन.''
''बिल्कुल वाजिब लगा रहा हूं महाराज. भला आपसे क्या फ़ायदा लेना.'' रामधन ने उसी नम्रता से कहा.

ज़ाफ़रानी ज़र्दा वाले पान का स्वाद महाराज के मुंह में बिगड़ गया. पीक थूककर खीजकर बोले, ''क्या यार रामधन! जान-पहचान के आदमी से तो कुछ कम करो. आख़िर एक गांव-घर होने का कोई मतलब है कि नहीं? आंय!''
रामधन का जी हुआ कह दे, 'तुम तो लगन पढ़ने के बाद एक पाई कम नहीं करते. आधा-अधूरा बिहाव छोड़कर जाने की धमकी देते हो अगर दक्षिणा तनिक भी कम हो जाए. गांव-घर जब तुम नहीं देखते तो भला मैं क्यों देखूं?' लेकिन लगा इससे बात बिगड़ जाएगी. उसने सिर्फ़ इतना ही कहा, ''नहीं पड़ेगा महाराज, मेरी बात मानो. अगर पड़ता तो मैं दे नहीं देता.''

भुलऊ महाराज अब बुरी तरह बमक गए और गुस्से से उनके पतले लम्बूतरे चेहरे की नरम झुर्रियां लहरा उठीं, ''तो साले, एक तुम्हीं हो जैसे दुनिया में बैल बेचने वाले? बाक़ी ये सब तो मुंह देखने वाले हैं! इतना गुमान ठीक नहीं है, रामधन!''
महाराज की तेज़ आवाज़ से आसपास के लोगों का ध्यान इधर ही खिंच गया. रामधन ने इस समय ग़ज़ब की शांति से काम लिया, ''मैं कब कह रहा हूं महाराज. तुमको नहीं पोसाता तो झन खरीदो, दूसरा देख लो. यहां तो कमी नहीं है जानवरों की.'' इतना तो रामधन भी जानता था कि ग्राहक भले ही गुस्सा हो जाए, बेचने वाले को शान्त रहना चाहिए.

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महाराज गुस्से से थरथराते खड़े रहे. कुछ लोग आसपास घेरा बनाकर जमा हो गए, गोया कोई तमाशा हो रहा हो.
इधर-उधर घूमकर सहदेव फिर वापस आकर खड़ा हो गया था और सारा माजरा देखता रहा था चुपचाप. बोला, ''देखो रामधन, तुमको पोसा रहा है तो बोलो, मैं अभी खड़े-खड़े ख़रीद लेता हूं.''

रामधन जानता है सहदेव को. यह गांव-गांव के बाज़ार-बाज़ार घूमकर गाय-बैलों की ख़रीदारी में दलाली करता है. ख़रीदार के लिए विक्रेता को पटाता है और विक्रेता के लिए ग्राहक. ये बैल के पारखी होते हैं. सहदेव कुथरेल गांव के भुनेश्वर दाऊ के लिए दलाली कर रहा है.
रामधन अपने बैलों की तरफ़ पुआल बढ़ाता हुआ बोला, ''नहीं भाई, इतने कम में नहीं पोसाता सहदेव.''

रामधन का वही सधा हुआ और ठहरा हुआ टका-सा जवाब सुनकर जैसे महाराज की देह में आग लग गई, ''देख...देख...इसको! कैसा जवाब देता है? मैं कहता हूं, अरे, कैसे नहीं पोसाएगा यार? सब पोसाएगा! देख सब जगे सौदा पट रहा है...'' झल्लाहट में महाराज के कत्था से बुरी तरह रचे काले-भूरे दांत झलक गए.
''मैं तो कह रहा हूं महाराज. हाथ जोड़कर कह रहा हूं.'' रामधन ने सचमुच हाथ जोड़ लिए. ''आप वहीं ख़रीद लो!''
अब सहदेव भी बिदक गया, हालांकि वह शांत स्वभाव का आदमी है. बोला, ''ले रे स्साले! ज्यादा नखरा झन मार! तेरे बैल बढ़िया दाम में बिक जाएंगे. देख, तेरे बैल ख़रीदने भुनेसर दाऊ ख़ुद आए हैं.''

रामधन ने कुथरेल के भुनेश्वर दाऊ को देखा, जो सामने खड़े थे, सौदेबाजी देखते. अधेड़ दाऊ की आंखों में धूप का रंगीन चश्मा है, सुनहरी फ्रेम का. वे बड़े इत्मीनान और बेहद सलीके से पान चबाते खड़े हैं. भुलऊ महाराज की तरह गंवारूपन के साथ नहीं, जिनके होंठों से पान की पीक लगातार लार की तरह चू रही है.
रामधन को बहुत असहज लग रहा था...इस भीड़ के केंद्र में वही है. और ऐसा बहुत कम हुआ है. सब पीछे पड़े हैं. एक क्षण को गर्व भी हुआ उसे अपने बैलों पर. उसने बैलों को पुचकार दिया और बैलों की गले की घंटियां टुनटुना उठीं.

अब दाऊ ने अपना मुंह खोला, ''देखो भाई, मुझको तो हल-बैल का कुछ नहीं मालूम. मैं तो नौकरों के भरोसे खेती करने वाला आदमी हूं. बस, हमको बैल बढ़िया चाहिए. ख़ूब कमाने वाला. कोढ़िया नहीं होना चाहिए बैल...''
रामधन ने अपने बैलों को दुलारा, ''शक-सुबो की कोई बात नहीं है दाऊ. मैं अपने मुंह से इनके बारे में क्या कहूं, गांव के किसी भी आदमी से पूछ लो, वह बता देगा आपको. आप चाहो तो इनको दिन भर दौड़ा लो, पानी छोड़कर कुछ और नहीं चाहिए इनको.''

वहां खड़े-खड़े भुलऊ महाराज का धैर्य और संयम अब चुकने लगा था. बोले, ''तीन हज़ार दो सौ दे रहा हूं! नगद! और कितना दूंगा?...साले दो-टके के बैल!...आदमी और कितना देगा?''
रामधन अटल है, ''नहीं पड़ेगा महाराज! चार हज़ार माने चार हज़ार!''
अब महाराज के चेहरे पर गुस्सा, क्षोभ, तिलमिलाहट और पराजय का भाव देखने लायक़ था. लगता था भीतर ही भीतर क्रोध से दहक रहे हों और उनका बस चले तो रामधन को भस्म करके रख दें.

अब सहदेव ने कहा, ''देखो भाई, तुमको तुम्हारी आमदनी मिल जाए, तुमको और क्या चाहिए फिर?''
''अरे आमदनी की ऐसी की तैसी! मेरा तो मुद्दस नहीं निकलता मेरे बाप.'' रामधन भी चिल्ला उठा.
भुलऊ महाराज को इस बीच जैसे फिर मौक़ा मिल गया. अपना क्रोध निगलकर बोले, ''ले यार, मैं नगद दे रहा हूं तीन हज़ार तीन सौ! एक सौ और ले लो. ले चल. तुम्हीं खुश रहो. चल अब क़िस्सा ख़तम कर...'' भुलऊ महाराज अपनी रौ में रस्सी पकड़कर बैलों को खींचने लगे, ज़बरदस्ती...

महाराज की इस हरक़त पर जमा लोग हँस पड़े. सहदेव तो ठठाकर हँस पड़ा, ''महाराज, ये दान-पुन्न का काम नहीं है. मैं इनके भाव जानता हूं. जितना तुम कह रहे हो उतने में तो कभी नहीं देगा! अरे घंटा भर पहले मैं साढ़े तीन हज़ार बोला था. एक घंटा तक इसके कुला में लेवना (मक्खन) लगाया. मुझको नहीं दिया तो तुमको कैसे दे देगा तीन हज़ार तीन सौ में?''

जमा लोग फिर हँस पड़े. भुलऊ महाराज अपमानित महसूस करके क्षण भर घूरते रहे. फिर गुस्से से अपना गड़ा हुआ छाता उठाया और चलते बने.
महाराज के खिसकते ही भीड़ के कुछ लोगों को लगा, अब मज़ा नहीं आएगा. सो कुछ सरकने को हुए. लेकिन अधिकांश अभी डटे हुए थे, किसी नए ग्राहक और तमाशे की उम्मीद में, उन तगड़े सफेद और भूरे बैलों को मुग्ध होकर निहारते हुए.

तभी भीड़ को चीरता हुआ चइता प्रकट हो गया. चइता इधर का जाना-माना दलाल है. विकट ज़िद्दी और सनकहा. अपने इस ज़िद्दी स्वभाव के भरोसे ही वह जीतता आया है. ऐसे सौदे कराने की कला में वह माहिर माना जाता है. सौदेबाजी में सफलता के लिए वह साम-दाम-दंड-भेद, हर विधि अपना सकता है. पैर पड़ने से लेकर गाली बकने तक की क्रिया वह उसी सहज भाव से निपटाता है.

उसके आते ही ठर्रे का तीखा भभका आसपास भर गया. वह सिर में लाल गमछा बांधे हुए था. अधेड़, काला किंतु गठीले शरीर का मालिक चइता.
आते ही दाऊ को देखकर कहेगा, ''राम-राम दाऊ, का बात है?'' वह अपनी आदत के मुताबिक़ जल्दी-जल्दी बात कहता है.
दाऊ ने अपनी शिकायत चइता के सामने रखी, ''अरे देख ना चइता, साढ़े तीन हज़ार दे रहा हूं, तब भी नहीं मान रहा है.''

''तुम हटो तो सहदेव, मैं देखता हूं.'' सहदेव को एक किनारे करता हुआ चइता आगे बढ़ गया. उसने बैलों को देखा और उनके माथे को छूकर प्रणाम किया. और बोला, ''ठीक है दाऊ. मैं पटा देता हूं सौदा. अब चिंता की कोई बात नहीं है, मैं आ गया हूं.''
रामधन ने कहना चाहा कि इतने में नहीं पोसाएगा. लेकिन चइता इससे बेख़बर था. उसे जैसे रामधन के हां अथवा ना की कोई परवाह ही नहीं थी. वह अपनी रौ में इस समय सिर्फ़ दाऊ से मुखातिब था, ''दाऊ...तुम दस रुपया दो...बयाना...मैं सब बना लूंगा, तुम देखते भर रहो.''
दाऊ ने दूसरे ही पल अपने पर्स से सौ का एक नोट निकाल लिया, ''अरे दस क्या लेते हो, सौ रखो.''

रुपए लेकर चइता अब रामधन की तरफ़ बढ़ा. उसे ज़बरदस्ती रुपया पकड़ाने लगा, ''अच्छा भाई, चल जा. बैलों के पैर छू ले. ये बयाना रख और सौदा मंजूर कर...''
''कितने में?'' रामधन ने गहरे संशय से पूछा.
''साढ़े तीन हज़ार में.''
''ऊं हूं...नहीं जमेगा.'' रामधन ने स्पष्ट कहा.

अब चइता अपने वास्तविक फ़ार्म में उतर आया, ज़िद करने लगा, ''अरे, रख मेरे भाई और मान जा.''
रामधन ने विनम्र होने की कोशिश की, ''नहीं भाई, नहीं पोसाता. देख, मेरी बात मान और ज़िद छोड़...मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं.''
लेकिन चइता भभक गया, ''अरे ले ले साले! कितने ही देखे हैं तेरे जैसे! चल रख और बात खतम कर!''

''नहीं नहीं. चार हज़ार से एक पाई कम नहीं.'' रामधन अपनी बात पर अटल था.
रामधन को परेशानी में फंसा देखकर सहदेव बचाव के लिए आया और चइता को समझाने लगा, ''चइता, जब उसको नहीं पोसाता तो कैसे दे देगा. कुछ समझाकर!''
''देगा! ये देगा और तेरे सामने देगा! तुम देखते तो रहो.'' चइता ने जमी हुई नज़रों से सहदेव को देखा. वह फिर अपनी ज़िद पर उतर आया, ''ले रख यार और मान जा! जा बैलों के पैर छू ले.'' कोई प्रतिक्रिया रामधन के चेहरे पर नहीं देखकर वह फिर शुरू हो गया, ''अच्छा, चल ठीक है! तुम मुझको एक पैसा भी दलाली मत देना. ये लो! तेरे बैलों की कसम! बस्स! एक पैसा मत देना मेरे को! और जो कोई तेरे से पैसा मांगेगा उसकी महतारी के संग सोना! मंजूर? चल...''

अब रामधन को भी गुस्सा आ गया, ''मैं तुम्हारे को कितने बार समझाऊंगा, स्साले! तुमको समझ नहीं आता क्या? नहीं माने नहीं. तू जा यार यहां से...जा...!''
लेकिन चइता भी पूरा बेशरम आदमी ठहरा. वह इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था, ''अच्छा, आख़िर मुझको सौ-दो सौ रुपया देगा कि नहीं? आंय? मत देना मेरे को! मैं समझूंगा जुए में हार गया या दारू में फूंक दिया. अरे, मैं पिया हुआ हूं इसका ये मतलब थोड़ी है कि ग़लत-सलत भाव करने लगूंगा. मेरी बात मान, इससे बढ़िया रेट तेरे को और कोई नहीं देगा, मां क़सम! धरती दाई की क़सम! कोई नहीं देगा!'' उसने ज़मीन की मुट्ठी भर धूल उठाकर माथे पर लगा ली.

लेकिन चइता के इतने हथियार आज़माने के बावजूद वह बेअसर रहा. अपनी ज़िद पर क़ायम रहा, चार हज़ार बस्स...
अब चइता ने हार मान ली. वह गुस्से में फुंफकारता और रामधन को अंड-बंड बकता हुआ चला गया. और भीड़ में खो गया.
चइता के जाते ही भीड़ छंटने लगी. अब वहां किसी दूसरे तमाशे की उम्मीद नहीं रही, क्योंकि शाम धीरे-धीरे उतर रही थी. इस समय पश्चिम का सारा आकाश लालिमा से भर उठा था और सूरज दूर पेड़ों के झुरमुट के पीछे छुपने की तैयारी में था.
बाज़ार की चहल-पहल धीरे-धीरे कम हो रही थी.

रामधन ने अपनी बंडी की जेब से बीड़ी निकालकर सुलगा ली. वह आराम से गहरे-गहरे कश लेने लगा. तभी सहदेव उसके पास आ गया. उसकी बीड़ी से अपनी बीड़ी सुलगाई. फिर धीरे-धीरे कहने लगा, ''ठीक किए रामधन. बिल्कुल ठीक किए. इन साले दाऊ लोगों को गाय-बैल की क्या क़दर? साला दाऊ रहे चाहे कुछु रहे_अपने घर में होगा. हम आख़िर बैल बेचने आए हैं, किसी बाम्हन को बछिया दान करने नहीं आए हैं. ठीक किया तुमने.''

सुनकर अच्छा लगा रामधन को. उसने सहदेव से विदा मांगी, ''अब जाता हूं भइया, दूर का सफ़र है. गांव पहुंचते तक रात-सांझ हो जाएगी. चलता हूं.'' और अपने बैलों को लेकर चल पड़ा.
यह लगातार तीसरा मौक़ा है जब रामधन हाट से अपने बैलों के साथ वापस लौट रहा है_ उन्हें बिना बेचे. रामधन जानता है, गांव वाले उसके इस उजबकपने पर फिर हँसेंगे. घर में पत्नी अलग चिड़चिड़ाएगी और मुन्ना फिर गुस्साएगा.

गांव के लोगों को जब से इसका पता चला है, वे अक्सर उससे पूछ लेते हैं, ''कैसे जी रामधन, तुम तो कल बैल लेकर हाट गए थे, क्या हुआ? बैल बिके के नहीं?''
वे रामधन पर हँसते हैं, ''अच्छा आदमी हो भाई तुम भी. इतने बड़े बाज़ार में तुमको एक भी मन का ग्राहक नहीं मिला!'' कुछेक अनुमान लगाते हैं, शायद रामधन को बाज़ार की चाल-ढाल पता नहीं.
प्रिय पाठको, अब आप यह दृश्य देखिए. और सुनिए भी!

रामधन अपने बैलों की रस्सी थामे, बीड़ी पीते हुए चुपचाप लौट रहा है. पैदल. सांझ ख़ूब गहरा चुकी है और अंधेरा चारों ओर घिर आया है. वह किसी गांव के धूल अटे कच्चे रास्ते से गुज़र रहा है. जब आप ध्यान से देखेंगे तो पाएंगे, वे दो बैल और रामधन नहीं, बल्कि आपस के तीन गहरे साथी जा रहे हैं. हां, तीन गहरे साथी. बैलों के गले की घंटियां आसपास की ख़ामोशी को तोड़ती हुई, उनके चलने की लय में आराम से बज रही हैं_टुन-टुन- टुन-टुन...क्या आप सिर्फ़ यही सुन रहे हैं? तो फिर ग़लत सुन रहे हैं. आप ध्यान से सुनिए, वे आपस में बातें कर रहे हैं...जी नहीं, मैं कोई कविता या क़िस्सा नहीं गढ़ रहा हूं. आपको विश्वास नहीं हो रहा होगा. लेकिन आप मानिए, इस समय सचमुच यही हो रहा है. यह तो समय की बात है कि आपको यह कोई चमत्कार मालूम हो रहा है.
उसके बैल पूछ रहे हैं, ''मान लो अगर दाऊ या महाराज तुम्हें चार हज़ार दे रहे होते तो तुम क्या हमें बेच दिए होते?''
रामधन ने जवाब दिया, ''शायद नहीं. फिर भी नहीं बेचता उनके हाथ तुमको.''
''बेचना तो पड़ेगा एक दिन!'' बैल कह रहे हैं, ''आख़िर तुम हमें कब तक बचाओगे, रामधन? कब तक?''
जवाब में रामधन मुस्करा दिया_एक बहुत फीकी और उदास मुस्कान...अनिश्चितता से भरी हुई. रामधन अपने बैलों से कह रहा है, ''देखो...हो सकता है अगली हाट में मुन्ना तुम्हें लेकर आए.''
बीड़ी का यह आख़िरी कश था और वह बुझने लगी.

रचनाकार - कैलाश बनवासी के 'लक्ष्य तथा अन्य कहानियां', 'बाज़ार में रामधन' कहानी-संग्रहों के अलावा समसामयिक विषयों पर लेख व समीक्षाएं प्रकाशित हैं तथा कई पुरस्कारों से सम्मानित हैं.

दो लघुकथाएँ -

रमेश चन्द्र श्रीवास्तव

इंसान कौन है?

किसी बात पर मालिक ने अपने नौकर को डांटा - "तू इंसान है या बैल?"

नौकर पढ़ा-लिखा, समझदार था. विनम्रता से बोला - "मालिक, यहाँ इंसान कौन है, मैं तो नौकर हूँ. और आप मालिक हैं."

मालिक समझा नहीं, बोला - "क्या मतलब?"

"मेरे मालिक, क्षमा करें, आज आदमी आदमी नहीं रह गया है. वह या तो हिन्दू है, मुसलिम, सिख, ईसाई या कोई और हो गया है. वह घूसखोर, गद्दार, आतंकवादी, भ्रष्ट, चोर, नेता इत्यादि हो गया है. काश! मैं बैल ही होता."

मालिक को फिर समझ नहीं आया. बोला - "चल चल, अपना काम कर, भाषण मत झाड़."

.

.

**--**
स्वप्न का सत्य

छुट्टी का दिन था. दोपहर के भोजनोपरांत उसे झपकी सी आ गई. उसने सपना देखा - "सारा जहाँ खुशहाल है - सब एक हैं - जाति-धर्म, ऊँच-नीच आदि का कोई भेद नहीं है - लोग बड़ी शान्ति से जी रहे हैं."

उसने सुन रखा था - दिन में देखा गया सपना सच होता है. स्वप्न का सत्य परखने के लिए वह तैयार हुआ और कमरे से बाहर निकला.

गली में सन्नाटा था. हमेशा भरी रहने वाली मुख्य सड़क भी खाली थी और पुलिसवालों से भरी पड़ी थी. वह पार्क की ओर चला.

एक पुलिसिया ने उसे टोका - "भाई साब कहां चल दिए?"

और, इससे पहले कि वह कुछ बोलता, पुलिस वाले ने आगे कहा - "किस दुनिया में रहते हो? क्या आपको पता नहीं कि शहर में दंगा भड़क गया है और चौबीस घंटे का कर्फ्यू लागू है?"

*-*

रचनाकार रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की अन्य रचनाएं रचनाकार पर यहाँ पढ़ें -



रचना 1 रचना 2 रचना 3

चुटकुला # 0651

सेठ जी (पत्नी से)- ‘कल तुम मायके गई थी कि रात घर में चोर घुस
आए। उन्होने मुझे खूब मारा-पीटा, यहां तक कि मुझे मुर्गा भी बना
दिया।‘
पत्नी - ‘क्या आपने शोर नहीं मचाया?‘
सेठ जी - ‘मैं कोई डरपोक था जो शोर मचाता।‘

चुटकुला # 0652

पत्नी से तंग आकर रामलाल एक साधु के पास गया। रामलाल ने साधु से
कहा, ‘महाराज, बीवी ने परेशान कर रखा है। इसका कोई उपाय बताइए।‘
साधु (रामलाल से)- अबे, अगर बीवी से बचने का तरीका मालूम होता, तो
मैं ही साधु क्यों बनता।

चुटकुला # 0653

मोहन लाल एक बुक देखते हुए बुरी तरह रोने लगा। तभी उसकी पत्नी आ
गई और बोली, ‘क्या हुआ इस तरह क्यों रो रहे हो, शर्म नहीं आती?‘
मोहन लाल (अपनी पत्नी से)- ‘कुछ नहीं हुआ दरअसल इस बुक का अंत
ही इतना दुखदाई है कि मैं अपनी रुलाई न रोक सका।‘
पत्नी तेजी से बोली, ‘कौन सी बुक है जी?‘
मोहन लाल ने धीरे से कहा, - ‘पासबुक।‘


चुटकुला # 0654
पत्नी (पति से) - कुछ साल पहले तुमने मुझसे कहा था कि तुम स्वर्ग में
मेरे बिना रहने की बजाय मेरे साथ नर्क में रहना पसद करोगे।
पति (पत्नी से) - बदकिस्मती से मेरी इच्छा पूरी हो गई।

चुटकुला # 0655

पति (पत्नी से) - शादी से पहले मैं काफी आवारागर्दी किया करता था।
क्या तुम भी ऐसा ही करती थी?
पत्नी (पति से) - ‘अब बिना गुण मिले शादी थोड़े ही होती है।‘ पत्नी
शरमाते हुए बोली।

चुटकुला # 0656

पत्नी (पति से) - आप नींद में बहुत बोलते है इस वजह से मेरी नींद
खराब हो जाती है।
पति (पत्नी से) - तो क्या अब मैं अब नींद में भी नहीं बोल सकता, उसमें
भी केवल तुम्हारी सुनूं।

पति (पत्नी से)- तुम इतनी अच्छी रोटियां नहीं बना सकती, जितनी अच्छी
मेरी मां बनाती थी।
पत्नी (पति से)- और तुम भी उतना अच्छा आटा नहीं गूंथ सकते, जितना
अच्छा मेरे पिताजी गूंथते थे।

चुटकुला # 0657

पत्नी (पति से) - शादी के पहले तो तुम कहा करते थे कि मैं तुम्हारे लिए
आसमान से तारे तोड़कर ला दूंगा। अब लाकर क्यों नहीं देते।
पति (पत्नी से) - अब आसमान के तारे कहां से ला सकता हूं। शादी के
बाद सारे तारे गर्दिश में जो चले गए।

चुटकुला # 0658

एक कंजूस व्यक्ति की पत्नी मरणासन्न अवस्था में थी। इतने में घर की
बत्ती चली गई। कंजूस व्यक्ति शिकायत दर्ज करवाने बिजली घर गया।
जाते-जाते पत्नी से बोला, ‘मैं बाहर जा रहा हूं, यदि तुम मरने लगो, तो
मोमबत्ती बुझा देना।‘

चुटकुला # 0659

मियां-बीवी में धन-दौलत की मिल्कियत को लेकर जबरदस्त कहा-सुनी हो
गई। बीवी ने गुस्से से कहा, ‘तुम्हारा इस घर में है क्या, जो कुछ है, सब
मेरे पिता ने दहेज में दिया है।‘
संयोगवश उसी रात घर में चोर घुस गए। बीवी की आंख खुल गई। वह
मियां को जगाने लगी, ‘जल्दी उठो, घर में चोर घुस आए है।‘
मियां ने करवट बदलते हुए कहा, ‘मैं क्यों उठूं, मेरा इस घर में है ही
क्या?‘

चुटकुला # 0660

पत्नी (पति से)- ‘शादी पर जो तुमने सोने की अंगूठी दी थी, वह आज
कही गिर गई।‘
पति (पत्नी से)- ‘आज ही मेरे कोट की जेब से सौ रूपए चोरी हुए, खैर
कोई बात नहीं।‘
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- तुम्हारी अंगूठी मिल गई।
पत्नी (खुश होकर)- सच कहां मिली?
पति (पत्नी से)- उसी जेब में से, जिसमें से सौ रूपए गायब हुए है।


चुटकुला # 0661
एक साहब ने कैमिस्ट से दवाइयां खरीदते समय उससे कहा, ‘दवाइयो को
अलग-अलग लिफाफे में रखकर उस पर लिख दीजिए कि कौन सी मेरी
बीवी की है और कौन सी मेरे कुत्ते की।
मैं नहीं चाहता कि दवाएं बदल जाएं और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाये।‘

एक बार शर्मा जी के पेट के ऊपर से चूहा निकल गया तो वह उठकर
चिल्लाने लगे।
शर्मा जी की पत्नी (पति से)- ‘इसमें इतना चिल्लाने की क्या बात है?‘
शर्मा जी (पत्नी से)- ‘आज तो चूहा गुजरा है। कल हाथी, घोड़े, बैल, मोटर
सभी गुजरेगे। इस तरह तो मेरा पेट आम रास्ता बन जाएगा।‘


चुटकुला # 0662
पति-पत्नी शॉपिंग के लिए बाजार गये तो पत्नी बोली- कितनी अजीब सी
बात है कि मेरे पास साड़ी का बार्डर है पर साड़ी नहीं, शीशी है पर सैट
नहीं, अंगूठी है पर नेकलेस नहीं।
यह सुनकर शांत स्वभाव से पति महोदय ने कहा- मेरा भी यही हाल है।
मेरे पास पर्स है पर पैसे नहीं।

चुटकुला # 0663

पत्नी (पति से)- ‘वह कौन सी चीज है जो औरतों को पसंद नहीं पर मर्दो
को पसंद है?
पति (पत्नी से)- ‘खामोशी।'
* * *
तेज-तर्रार पत्नी ने पति से पूछा- यदि तुम साड़ी पहनकर घर में रहो तो
क्या होगा?
दब्बू पति का जवाब था- कुछ भी नहीं।
पत्नी ने आंखे तरेर कर पूछा- क्यों?
पतिदेव ने जरा धीरे से कहा- क्योंकि मैं घर के कपड़े और बर्तन आज भी
धोता हूं और तब भी धोऊंगा।

चुटकुला # 0664

पति (पत्नी से)- पिछले एक घंटे से चाय का इंतजार कर रहा हूं। इतनी देर
तक तुम बालकनी में क्या कर रही थी?
पत्नी (पति से)- पड़ोस वाली मिसेज शर्मा से बातें कर रही थी।
पति (पत्नी से)- इतनी देर तक जब बात करनी थी तो उन्हें घर ही क्यों
नहीं बुला लिया?
पत्नी (पति से)- मैंने उनसे कहा था, पर वह बोली मेरे पास समय नहीं है।

चुटकुला # 0665
पत्नी (पति से)- इस बस के कन्डक्टर ने मेरी बेइज्जती की है।
पति (पत्नी से)- भला वह कैसे?
पत्नी (पति से)- जब मैं बस से उतरी तो कंडक्टर ने कहा, तीन सवारियां
इस सीट पर आ जाए।

चुटकुला # 0666

पत्नी ने अपने पिता को घर आया देख पति से पूछा, क्यों जी मेरे पिताजी
अचानक घर कैसे आ गए कही आपने तो नहीं बुलाया।
पति (पत्नी से)- नहीं।
पत्नी (पति से)- तो फिर क्यों आए है?
पति (पत्नी से)- मैंने कुछ दिन पहले आपके घर जो पत्र लिखकर डाला था,
उसे पढ़वाने के लिए क्योंकि मेरी लिखाई मेरे अलावा कोई नहीं पढ़
सकता।

चुटकुला # 0667

पत्नी (पति से)- प्रिय कुछ साल पहले तुमने कहा था कि तुम स्वर्ग में मे
ेरे बिना रहने के बजाय मेरे साथ नरक में रहना पसंद करोगे।
पति (पत्नी से)- बदकिस्मती से मेरी यह इच्छा पूरी हो गई है।

चुटकुला # 0668

एक व्यक्ति थाने आया और थाना इंचार्ज से बोला- जी, मेरी लड़ाकू बीवी
एक साल पहले कही गुम हो गई थी। उसी की रिपोर्ट लिखानी है।
एक साल पहले? और आप अब रिपोर्ट लिखा रहे है? थाना इंचार्ज ने
आश्चर्यचकित होकर पूछा।
‘जी, वास्तव में मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था कि मैं इतना भाग्यवान
भी हो सकता हूं।‘ व्यक्ति ने जवाब दिया।

चुटकुला # 0669

पत्नी (पति से)- ‘आप बहुत देर से घर आए हो।‘
पति ने भी पत्नी पर इल्जाम लगाते हुए कहा, ‘और तुम इतनी रात तक
जाग कर क्या कर रही हो।
पत्नी (पति से)- मैं पांच घंटे से आपके इंतजार में जाग रही थी।
पति (पत्नी से)- और मैं पांच घंटे से इसी इंतजार में बाहर खड़ा था कि
तुम सो जाओ तो मैं अंदर आऊं।

.

.

चुटकुला # 0670

पत्नी ने अपने पति से शिकायती अंदाज में कहा, ‘आप नींद में बहुत बोलते
है, कई बार तो मेरी नींद ही खुल जाती है........‘
‘तो क्या मैं नींद में भी न बोलूं, तुम्हारी ही सुनता रहूं।‘

चुटकुला # 0671

पत्नी (पति के हाथ से एक पैकेट छीनते हुए)- ‘अच्छा तो तुम इस पैकेट
में सोने की चीज लाए हो। जरा देखूं तो तुम मेरे लिए क्या बनवा कर
लाए हो?‘
पति (झल्लाकर)- ‘अरे भाग्यवान। इसमें सोने की गोलियां है। सोने के
जेवर नहीं।‘

चुटकुला # 0672

राकेश खाना खाते वक्त अचानक रुक गया और अपनी पत्नी से पूछने लगा,
‘आज का खाना क्या तुम्हारी मां ने बनाया है?‘
पत्नी खुश होकर बोली, ‘हां, खाना बड़ा स्वाद बना है ना?‘
राकेश (पत्नी से)- ‘नहीं रोज खाने में काले बाल मिलते थे लेकिन आज
सफेद मिल रहे है।‘

चुटकुला # 0673

पति (पत्नी से)- ‘अभी मीना की शादी की क्या जल्दी है? बहुत समय पड़ा
है। जब तक कोई अच्छा लड़का न मिले तब तक हमें बाट देखनी चाहिए।'
पत्नी (पति से)- ‘बाट भी कब तक देखी जा सकती है? जब मैं शीला की
उम्र की थी तो मेरे घरवालों ने ही अच्छा लड़का मिलने का इंतजार कहां
किया था?'


चुटकुला # 0674
पति (गुस्से से)- मैं पूछना चाहता हूं कि इस घर में मेरा हुक्म चलता है
या तुम्हारा?
पत्नी (पति से)- यह बात न ही पूछे तो अच्छा है क्योंकि इसका जवाब
सुन कर आपको कोई खास खुशी नहीं मिलेगी।

एक साहब नशे में चूर रात को तीन बजे घर पहुंचे। घर पहुंचते ही वे
देखते है कि उनकी पत्नी किसी दूसरे आदमी के साथ बैठी बातें कर रही है।
वे कुछ बोलते उससे पहले ही पत्नी उन पर बरस पड़ी। ‘कहां थे अब तक?
ये कोई घर आने का समय है? आवारागर्द कही के ।'
पति (पत्नी से)- ‘लेकिन तुम्हारे साथ ये आदमी कौन है?'
पत्नी (पति से)- ‘चुप रहो, टॉपिक बदलने की कोशिश मत करो।'

चुटकुला # 0675

अपनी नवविवहिता पत्नी से पति ने पूछा- शादी से पहले कितने आदमियों
से तुम्हारी दोस्ती थी?
पत्नी की खामोशी देखकर पति ने फिर पूछा- क्या उत्तर नहीं दोगी।
मैं अभी गिन ही रही हूं- पत्नी ने जवाब दिया।

चुटकुला # 0676

आपके शो-केस में जो साड़ी टंगी है, क्या आप इसे मेरे लिए निकाल सकते
है? एक युवक ने दुकानदार से कहा।
दुकानदार- ‘क्यों नहीं, मैं अभी निकलवाकर आपके लिए पैक करवा देता
हूं।'
युवक - ‘जी, पैक करवाने के लिए नहीं, मैं तो वहां से निकलवाने के लिए
कह रहा था। दरअसल जब भी हम यहां से गुजरते है मेरी पत्नी उस साड़ी
को खरीदने की जिद करने लगती है।'


चुटकुला # 0677
मंजीत ने मोहिनी को पुरानी बातें याद दिलाते हुए कहा, ‘तुम तो कहा
करती थी कि शादी के बाद तुम मेरे जीवन में हरियाली ला दोगी।'
मोहिनी - अरे, ‘वही तो कर रही हूं।' ये जो ढेर सारे गमले मैं लाई हूं, वे
सब हरियाली के लिए ही तो है।


चुटकुला # 0678
एक सज्जन ने अपने मित्र से पूछा- बताओ, शादी के बाद चैन की नींद
कौन सोता है- पति य पत्नी?
मित्र - दोनो। फर्क सिर्फ इतना सा है कि पत्नी घर में सोती है और पति
ऑफिस में।


चुटकुला # 0679
ज्योतिषी ने एक खूबसूरत युवती का हाथ देखकर कहा- तुम्हारी शादी एक
ऐसे युवक से होगी, जो सुंदर तो होगा ही साथ ही, पैसे वाला भी होगा।
यह सुनकर युवती खुश होकर बोली- अब यह भी बता दीजिए कि मैं अपने
वर्तमान पति से छुटकारा कैसे पा सकती हूं।


चुटकुला # 0680
एक लेखक की शादी हो गई। पत्नी थी संपादक। कुछ समय बाद पत्नी
मायके चली गई। लेखक ने पत्नी को पत्र लिखा और साथ में टिकट लगा
लिफाफा भी भेज दिया। लेखक का एक मित्र यह सब देख रहा था। उसने
पूछा- ‘पत्र के साथ यह लिफाफा क्यों भेजा है?'
लेखक महोदय बोले- ‘आप नहीं जानते, पत्र के साथ टिकट लगा लिफाफा
न लगा हो, तो संपादक जवाब नहीं देते।'


चुटकुला # 0681
पति (अपनी नवविवाहिता पत्नी से)- प्रिय जरा अपना चंद्रमा रूपी चेहरा तो
दिखाओ।
चेहरा देखते ही पति आग बबूला हो गया और गुस्से से बोला- अरे तुम्हारे
चेहरे पर तो काले धब्बे और गड्डे है। तुम्हारे मां-बाप ने हमें धोखा दिया
है।
पत्नी (पति से)- डियर, नई खोजे चंद्रमा का यही रूप सामने लाई है।


चुटकुला # 0682
मृत पति की कब्र पर पत्नी ने संगमरमर का पत्थर लगवाया और उस पर
खुदवाया- ‘शांति से सोओ।'
परंतु दो दिन बाद जब वसीयत खुली तो पत्नी को पता चला कि पति
उसके नाम कुछ नहीं छोड़ गया है। तब वह कब्रिस्तान गयी और पत्थर
पर आगे खुदवाया- ‘जब तक मैं नहीं आती।'


चुटकुला # 0683
हेमा (राकेश से)- शादी से पहले तो तुम कहा करते थे कि मैं तुम्हारे लिए
आसमान के तारे तक तोड़ कर ला दूंगा, अब लाकर क्यों नहीं देते?
राकेश (हेमा से)- अब आसमान के तारे तोड़ कर कैसे ला सकता हूं? शादी
के बाद सारे तारे गर्दिश में जो चले गए है।

पत्नी (ताना मारते हुए)- ‘मैं यदि न होती तो आपकी यह फटी कमीज
कौन सिलता?'
पति (पत्नी)- ‘तब इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती। मैं ढेर सारी कमीजें
सिलवा लेता।'


चुटकुला # 0684
पत्नी (पति से)- मैं तुमसे जो भी कहती हूं, तुम एक कान से सुनकर दूसरे
कान से निकाल देते हो।
पति (पत्नी से)- किंतु मैं जो तुमसे कहता हूं वो तुम दोनो कानो से
सुनकर मुंह से निकाल देती हो।

चुटकुला # 0685

पति (पत्नी से)- ‘तुम हमेशा मुझे बेकार की चीजे खरीदने का ताना देती
हो। मैंने ऐसी क्या चीज खरीदी है, जो बेकार है?'
पत्नी (पति से)- ‘पिछले साल आग बुझाने का सिलेंडर लाए थे वो अभी
तक बेकार ही तो पड़ा है।'


चुटकुला # 0686
पति-पत्नी चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पढ़ रहे थे। पत्नी को एक
चटपटी खबर दिखी तो उसने पति से कहा, ‘देखो खबर छपी है कि एक
अस्सी साल के कुंवारे बूढ़े ने शादी कर ली।'
पति ठंडी सांस भरते हुए बोला, ‘बेचारे ने लगभग पूरी जिंदगी समझदारी
दिखाई पर बुढ़ापे में बेवकूफी कर ही दी।'


चुटकुला # 0687
पत्नी (शर्माते हुए)- सुनो जी! तुम्हें मुझमें सबसे ज्यादा क्या अच्छा लगता
है? मेरा खूबसूरत चेहरा या मेरी अक्लमंदी।
पति (पत्नी को देखते हुए)- मुझे तो तुम्हारी मजाक करने की आदत
ज्यादा अच्छी लगती है।


चुटकुला # 0688
झगड़े के आखिर में पत्नी ने थककर कहा, ‘मैं कितनी बड़ी मूर्ख थी कि
मैंने तुमसे शादी की।'
पति ने शांत भाव से कहा, ‘हां! पर मैं तुम्हारे प्यार में इतना पागल था
कि यह भी न देख पाया।'

चुटकुला # 0689

पत्नी मर रही थी। उसने पति को अपने पास बुलाया और भर्राए स्वर में
बोली- प्राणनाथ, मैं जा रही हूं। मैंने ही आपके सेफ से दस हजार रूपये
चुराये थे। मैं आपके दोस्त से छुप-छुपकर मिला करती थी। मैंने ही आपके
काले धन की सूचना इनकम टैक्स विभाग को दी थी। मैंने ही......।
पति (प्यार से)- छोड़ो डार्र्लिंग, अब बीती बातों को बिसार दो। जो हो
गया सो हो गया। वैसे, मैंने ही तुम्हें जहर दिया है जिसकी वजह से तुम
मर रही हो।

चुटकुला # 0690

पति - ‘ऐसे जीवन से तो अच्छा है कि मैं मर जाऊं प्रभु, तू मुझे उठा
ले।'
पत्नी - ‘भगवान इनसे पहले मुझे उठा ले।'
पति - ‘प्रभु, तू इसकी सुन, मैं अपनी अर्जी वापस लेता हूं।'


चुटकुला # 0691
पत्नी ने पति से शिकायत की- ‘आप नींद में बहुत बोलते है।'
पति (पत्नी से)- ‘तो क्या तुम चाहती हो कि मैं नींद में भी तुम्हारी ही
सुनता रहूं।'


चुटकुला # 0692
राकेश (मनोवैज्ञानिक से)- ‘कोई ऐसा उपाय बताइए कि मेरा और मेरी
पत्नी की आपस में कहां सुनी न हो।'
मनोवैज्ञानिक (राकेश)- ‘इसका सबसे अच्छा उपाय यह है कि आपकी बीवी
जो कहती रहे आप उसे सुनते रहिए।

नवविवाहिता ने अपने पति से पूछा- आपने पड़ोसियों से यह क्यों कहा कि
मेरे अच्छा खाना बनाने की वजह से ही आपने मुझसे शादी की, मुझे तो
ठीक से चाय बनानी भी नहीं आती है।
‘प्रिय, कोई न कोई वजह तो बतानी ही थी न।' पति महोदय गंभीर होकर
बोले।


चुटकुला # 0693
एक कुएं के बारे में मशहूर था कि उसमें एक सिक्का डालने से मन की
मुराद पूरी होती है। पति-पत्नी भी उस कुएं पर जा पहुंचे। सबसे पहले पति
ने एक सिक्का डाला और कुएं में झांककर कुछ बुदबुदाया।
फिर पत्नी सिक्का डालकर ज्यों ही झुकी, संतुलन बिगड़ने के कारण कुएं में
जा गिरी। पति शांत स्वर में बोला, ‘हे भगवान, ऐसी मान्यताओं पर मुझे
तो विश्वास ही नहीं था, पर अब करना पड़ रहा है।'


चुटकुला # 0694
ज्योतिषी ने खूबसूरत रमा का हाथ देखकर कहा- तुम्हारी शादी एक ऐसे
युवक से होगी, जो सुंदर तो होगा ही साथ ही, पैसे वाला भी होगा।
यह सुनकर रमा खुश होकर बोली- अब यह भी बता दीजिए कि मैं अपने
वर्तमान पति से छुटकारा कैसे पा सकती हूं।


चुटकुला # 0695
अब तो मुझे पक्का यकीन हो गया है कि आपको मुझसे पहले जैसी
मोहब्बत नहीं रही। पत्नी ने पति से शिकवा किया।
पति (पत्नी से)- ‘तुम्हें यह गलतफहमी कैसे हुई?'
पत्नी (पति से)- ‘गलतफहमी नहीं असलियत है। पहले जब आप खाना
खाने बैठते थे तो खुद कम खाते थे और मुझे ज्यादा खिलाते थे लेकिन
अब.....'
पति (पत्नी से)- ‘बात दरअसल यह है कि अब तुम पहले जैसा बे-स्वाद
खाना नहीं बनाती।'


चुटकुला # 0696
पत्नी (वकील पति से)- तुम इतने सालों से वकालत कर रहे हो। मुझे
बताओ कि उम्रकैद से बड़ी सजा क्या होती है?
वकील पति (पत्नी से)- वही तो काट रहा हूं।


चुटकुला # 0697
पति ने अपनी नई-नवेली पत्नी से कहा- शादी से पहले मैं काफी
आवारागर्दी किया करता था। क्या तुम भी ऐसा ही करती थी?
‘अब बिना गुण मिले शादी थोड़े ही होती है।' पत्नी शरमाते हुए बोली।


चुटकुला # 0698
पति ने पत्नी को समझाते हुए कहा- ‘प्रिये! देखो, इस बार अपने जन्मदिन
पर सामान कम मंगवाना। महंगाई बहुत बढ़ गई है। इसलिए हमें अपने
खर्चो में कमी करनी चाहिए।'
पत्नी (पति से)- ‘आपने तो मेरे मुंह की बात छीन ली। मैं भी यही सोच
रही हूं कि इस बार जन्मदिन पर मोमबत्तियां कुछ कम मंगवाऊं।'


चुटकुला # 0699
पति (पत्नी से)- तुम इतनी अच्छी रोटियां नहीं बना सकती, जितनी अच्छी
मेरी मां बनाती थी।
पत्नी (पति से)- और तुम भी उतना अच्छा आटा नहीं गूंथ सकते, जितना
अच्छा मेरे पिताजी गूंथते थे।


चुटकुला # 0700
पत्नी (पति से)- सुनो जी, तुम मेरा नाम मत लिया करो, मुन्ना भी मुझे
नाम लेकर पुकारने लगा है।
पति (पत्नी से)- इसका मतलब, क्या मैं तुम्हें मम्मी कहकर पुकारूं?

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