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January 2006
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-कृश्न चंदर

नोबल पुरस्कार विजेता शोलोखोव मेरे प्रिय लेखकों में से हैं. लेकिन कभी-कभी वे भी विचित्र दकियानूसी की बात कर जाते हैं. इधर हाल में उनका एक वक्तव्य प्रकाशित हुआ है, जिसमें उन्होंने कहा है कि साहित्य का क्षेत्र पुरुषों के लिए है और यह कि साहित्य-सर्जन स्त्रियों के वश की बात नहीं. अब यदि वे होते भारत में तो हम मिलाते उन्हें उर्दू की अस्मत चुगताई से, रज़िया सज्जाद ज़हीर से, कर्तुलैन हैदर से, सलमा सिद्दीकी से, जीलानी बानो से. हिन्दी की महादेवी वर्मा से, ऊषा देवी मित्रा, कमला चौधरी और मन्नू भंडारी से. पंजाबी की अमृता प्रीतम और प्रभजोत कौर से. फिर ये स्त्रियाँ जो अपनी-अपनी भाषा की प्रथम श्रेणी की लेखिकाएँ हैं, स्वयं समझ लेतीं शोलोखोव महोदय से. या अगर वे होते जर्मनी में तो आना सीघर्स से मुठभेड़ हो जाती उनकी, जो आधुनिक जर्मन लेखकों में अग्रणी उपन्यासकार मानी जाती हैं. या अगर वे होते मीराबाई के काल में, जेन ऑस्टिन या एमली ब्रांटे के युग में या इससे बहुत पहले प्रसिद्ध कवयित्री सोफो के जीवन में तो वह जीना दूभर कर देती उनका. वास्तव में अब तक सन्तानोत्पत्ति की महत्वपूर्ण समस्या ने स्त्रियों को फुर्सत ही कब दी कि वे किसी अन्य काम के प्रति पूरा ध्यान दे सकतीं. फिर उन्हें इतना अधिक पिछड़ा हुआ रखा गया, इतना अनपढ़ रखा गया, इतना अधिक पर्दे में या घर की चारदीवारी में बन्द रखा गया कि जीवन के अन्य विभागों की तरह ज्ञान और साहित्य के क्षेत्र में भी वे अधिक संख्या में अपनी प्रतिभा न दिखा सकीं- तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए. और उनपर छींटाकशी की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है.

मैंने शोलोखोव और स्त्रियों की चर्चा इसलिए की कि ‘कहानी की कहानी’ का वर्णन करने के सिलसिले में इनकी चर्चा आवश्यक थी. बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि कहानी की कला का आरम्भ सबसे पहले स्त्री ने ही किया था. बाद में पुरुष अपनी धांधली और घपलेबाजी से उससे आगे बढ़ गया. लेकिन इस तथ्य पर अधिकतर वैज्ञानिक और अन्वेषक सहमत हैं कि कहानी कहने की कलाकार सबसे पहले स्त्री ही थी – खेती बाड़ी की तरह. शायद इस बात से आप भी सहमत होंगे कि खेती-बाड़ी करना पुरुष को सबसे पहले स्त्री ने सिखाया था. जब मानव जंगलों में रहते थे तो अधिकतर पुरुष शिकार के लिए चले जाते थे – और शिकार खेलना आज के शिकार की तरह आसान भी न था. न बन्दूक थी उन दिनों, न राइफल, न कारतूस. तीर-धनुष भी बाद के आविष्कार हैं. इससे पहले मनुष्य के लिए किसी जन्तु को मारना और उसका मांस प्राप्त करना जान जोखिम का काम था. कई बार अपने जाल में स्वयं आखेटक आ जाता था और किसी का मांस प्राप्त करने की बजाए स्वयं उसके खाने का मांस बन जाता था. इधर तो यह दुर्घटना हुई, उधर घर पर या किसी खोह में बीवी-बच्चे भूखे हैं. ऐसी स्थिति में स्त्री ने वे पौधे ढूंढे जिनके बीज खाकर जीवित रहा जा सकता था. स्त्री ने न केवल पुरुष को गेहूँ का दाना खाने पर प्रेरित किया, बल्कि उसे उगाना भी सिखाया. चावल भी स्त्रियों ही की खोज है. फिर पत्थर के हल या किसी जंगली पशु की हड्डी से भूमि खोदकर बीजों द्वारा नए पौधे उगाना – यह भी स्त्रियों ही की देन है. आज का किसान खेत में हल चलाता है और समझता है वह अपनी स्त्री को रोटी खिला रहा है, हालांकि रोटी पकाकर खिलाने की कला भी स्त्रियों का ही आविष्कार है.

आपने सबसे पहली कहानी अपनी नानी मां से सुनी होगी या दादी मां से या अपनी मां से. आज से हजारों वर्ष पहले की कहानी अर्थात् सबसे पहली कहानी भी इसी प्रकार रात के सन्नाटे में कही गई थी – अंधेरे के भय को मिटाने के लिए. बच्चे के मन में जीवन की सुखद कल्पना को जगाने के लिए. मां की मेहरबान गोद में सुलाने के लिए. इसी प्रकार लोरी, गीत, कविता और कहानी की कला का प्रारंभ हुआ. चेखोव, शोलोखोव, मोपासां, माम, प्रेमचन्द, मण्टो, राजेन्द्रसिंह बेदी बाद में आए. पहले तो एक स्त्री आई थी. आज की भी कोई कहानी स्त्री के बिना पूर्ण नहीं होती और नहीं दिलचस्प समझी जाती है.

जिस प्रकार खेती-बाड़ी की कला स्त्री के हाथ से निकलकर एक पेचीदा और मिश्रित क्रिया बन गई है, उसी प्रकार कहानी मां की लोरियाँ और परीकथाएँ आगे बढ़कर जीवन की व्याख्या बन गई हैं और बेहद पेचीदा और मिश्रित हो गई हैं.

बहुत समय तक कहानी की कला एशिया में भाटों के और योरुप में प्रोउबाडौर्ज के सुपुर्द रही. ये घुमक्कड़ गायक विभिन्न किस्से-कहानियों को काव्य का रुप देकर और उन्हें राग में ढालकर साज पर सुनाते थे. इन दिनों कहानियाँ गाई जाती थीं. कविता, संगीत और कहानी एक ही सांचे में ढल जाते थे – और क्या-क्या दिलचस्प किस्से होते थे. शूरवीरों के और बहादुरी के, नाईट्स के, राजाओं के और राजकुमारियों के, सफल और असफल प्रेमियों के, उन अप्राकृतिक दैत्यों के जो कोमलांगी सुन्दरियों को काठ के पिंजरे में या एक छोटी-सी डिबिया में बन्द करके अपनी जेब में रख लेते थे और ‘मानस गंध, मानस गंध’ कहते हुए मनुष्य के शिकार की तलाश में निकल पड़ते थे.

आज कहानी उस काल से बहुत दूर निकल आई है. प्रत्यक्ष रुप से उसका सम्बन्ध कविता से, संगीत से, राग और साज से कट गया है. अब कहानी गद्य की भाषा में ढल गई है, लेकिन आज की कहानी भी भीतरी संगीत, भीतरी राग और उसकी लय से वंचित नहीं हो सकती जो साहित्य और कला की हर शाखा में एक अच्छी रचना को एक बुरी रचना से विशिष्ट बतलाती है. आज की अच्छी कहानी भी उसी पहले उद्देश्य को पूरा करती है, जिसकी आवश्यकता मां ने अपने बच्चे के लिए समझी थी. अर्थात् अंधेरे के भय को मिटाने के लिए और जीवन की सुखद कल्पना को मानव-मन में जगाने के लिए आज भी कहानी प्रयोग में लाई जाती है, और भविष्य में लाई जाएगी. और यही इसका समुचित उद्देश्य भी होगा. क्योंकि मनुष्य यद्यपि बहुत उन्नति कर गया है तथापि वह आज भी जंगल में रहता है. चारों खूंट जंगल बसे हैं और उनमें दीवारों के वृक्ष उगे हुए हैं और दानव-शक्तियाँ जीवन के सुन्दर और मृदुल मूल्यों को काठ के पिंजर में कैद किए या जेब की किसी डिबिया में डाले ‘मानस गंध, मानस गंध’ करती हुई मनुष्य के शिकार की तलाश में घूम रही हैं. समुदायों, जातियों और देशों के सरदार, महाराजे और सुल्तान गए तो तेल के बादशाह आ गए. लोहे के शहनशाह और जूट के सुलतान. भाट यदि प्रशंसा-गायक नहीं हैं तो उनका सिर कलम होगा. घुमक्कड़ों, सफल और असफल प्रेमियों के लिए कहानी कहना आज भी उतना ही कठिन है चितना उन पिछले जमाने में था.

इधर कहानी के क्षेत्र में कुछ नए लोग आए हैं. ये लोग कहने को ‘नई पीढ़ी’ के हैं लेकिन हैं बिल्कुल हमारे जैसे. हमारे जैसे ही कपड़े पहनते हैं, उसी प्रकार शेव करते हैं. उसी भाषा में बातचीत करते हैं, जिसमें हम करते हैं. उसी प्रकार रोटी-रोजी की तलाश में मारे-मारे फिरते हैं. बिलकुल सामान्य लोगों की तरह उद्देश्य पूर्ति के लिए खुशामद भी करते हैं. इनके जीवन के प्रत्येक विभाग में व्यवस्था है, सन्तुलन है, उद्देश्य है, मार्ग है, मंजिल है – और अगर कहीं पर कुछ नहीं है तो केवल साहित्य के क्षेत्र में नहीं है. वे जीवन के प्रत्येक अंग में किसी न किसी उद्देश्य को सामने रखते हैं लेकिन साहित्य में नहीं. आप जब उनसे बात करेंगे तो उनकी बातचीत बिलकुल ठीक-ठीक आपकी समझ में आ जाएगी. लेकिन जब कहानी लिखेंगे तो आपके पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा. सिवाय ऊटपटांग, अनबूझ पहेली के. वे कॉफी हाउस का रास्ता जानते हैं लेकिन अपनी कहानी के नहीं. उन्हें अपनी नौकरी का उद्देश्य मालूम है, अपनी कहानी का नहीं. जब वे अपने घर जाते हैं तो दो टांगों के सहारे कदम उठाते हुए जाते हैं, लेकिन अपनी कहानी में सिर के बल रेंगते हैं, और उसे आर्ट कहते हैं. उन्हें कहानीकार नहीं, मदारी कहता हूँ. ये लोग रंगीन शब्दों के फीते अपने मुँह से निकालते हैं. अपनी झोली से खरगोश, अपनी जेब से अंडा – और आपको आश्चर्यचकित छोड़कर चल देते हैं. बाद में आप सोचते हैं कि आपकी जेब की आखिरी चवन्नी भी इसी तमाशे की भेंट हो गई और मिला कुछ भी नहीं. और आपको कुछ मिले भी क्यों? क्योंकि ये लोग आपसे केवल लेने के काइल हैं, बदले में कुछ देने के नहीं – और समाज में आप जानते हैं, लोग कुछ काम करते हैं. उस काम का कोई क्रम होता है, प्रबन्ध होता है, कोई उद्देश्य होता है. उस काम से किसी की सेवा की जाती है और उसका पारिश्रमिक भी मिलता है. लेकिन ये नए कहानीकार समाज को केवल इस सीमा तक मानते हैं कि समाज इनको कुछ दे और बराबर देता रहे. उसके एवज़ में ये समाज को क्या देते हैं, इसकी इन्हें कोई परवाह नहीं है. न ये इस प्रकार की बातों के काइल हैं. कहानी लिखते समय ये बिल्कुल निरूद्देश्य होंगे लेकिन कहानी छपते ही तुरन्त उद्देश्य के काइल हो जाएंगे – यानी पारिश्रमिक के, ख्याति के, सम्मान और प्रशंसा के – अर्थात् उन समस्त उद्देश्यों के, जिनके लिए सामान्य व्यक्ति प्रायः संघर्षशील रहते हैं.

मैंने अपनी बूढ़ी नानी मां से भी कहानियाँ सुनी हैं और स्वयं अपनी मां से भी. इसलिए मेरी कहानी की कला भी उतनी ही पुरानी है. अर्थात् कहानी सुनने वाले को कहानी का आनन्द आए. रात, मौत और अंधेरे का भय दूर हो. जीवन की सुखद और प्रकाशमान कल्पनाएँ जागें क्योंकि हम सूर्य की सन्तान हैं. यदि हम अंधकार की संतान होते तो हमारी आँखें न होतीं और हमारी अनुभूतियों की कुछ और ही स्थिति होती. लेकिन हम सूरज की संतान हैं. अग्नि हमारा देश है. प्रकाश हमारा भोजन है. चाँदनी हमारे प्रियतम का बदन है. हम आँखों में आँखें डालते हैं और प्रेम करते हैं क्योंकि हम अंधे नहीं हैं. इस संसार में आँखों से अधिक पवित्र कोई वस्तु नहीं है.

इसीलिए मेरी कहानियाँ आँखें रखती हैं. वे मार्ग देखती हैं और आसपास के मनोरंजक दृश्य भी, लेकिन प्रतिक्षण दृष्टि उधर ही रहती है जहाँ जाना है. जिसे उद्देश्य या गन्तव्य कुछ भी कह लीजिए. मैं उसे हाथीदांत का टावर कहता हूँ. सौ वर्ष से मेरे सपनों की सुन्दर राजकुमारी उस टावर में सो रही है. केवल वही नहीं सो रही, उसके आस-पास सौ-सौ मील तक सारा जंगल सो रहा है और मेरी नानी मां ने मुझे बताया था कि जब भी कोई व्यक्ति उस घने जंगल को पार करके और उस टावर का दरवाजा तोड़कर उस राजकुमारी की आँखों पर चुम्बन देने में सफल हो जाएगा राजकुमारी उसी क्षण जाग उठेगी और उसी क्षण सारा सोया हुआ जंगल भी जाग जाएगा और चारों ओर प्रकाश, प्रसन्नता फैल जाएगी.

क्या यह कहानी सचमुच इतनी पुरानी है कि आज की परिस्थिति से मेल नहीं खाती? क्या आज हाथीदांत के टावर में कोई राजकुमारी नहीं सोई हुई? क्या आस-पास सौ वर्ष से तो क्या कई वर्षों से कोई जंगल सोया हुआ नहीं – अंधकार में, भय में, निराशा के अंधेरे में और मृत्यु के भयानक सायों में, जिन्होंने जीवन पर जादू करके उस मायूस राजकुमार की आँखों में नींद भर दी है?

मैं उन मूर्खों में से हूँ जो घने अंधेरे जंगल को पार करके हाथीदांत के टावर का दरवाजा तोड़कर सोई हुई राजकुमारी की आँखों पर चुम्बन देने के इच्छुक हैं. मेरी कहानियाँ उसी इच्छा का प्रतीक होती हैं...


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रचनाकार - -कृश्न चंदर भारत के जाने माने कहानीकार-उपन्यासकार थे. एक गधे की आत्मकथा नामक उनका व्यंग्यात्मक उपन्यास खासा चर्चित रहा था. प्रस्तुत आलेख उन्होंने अपने कहानी संकलन – मेरी प्रिय कहानियाँ में प्रस्तावना स्वरुप लिखा था.

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चित्र – रज़ा की कैनवस पर एक्राइलिक रंगों से बनी कलाकृति.





-धनपतराय झा
मैं कलमकार
कलम की पंखों से उड़ता
अनंत आकाश में
अनुभूति खोद लाता हूँ

जीवन का जल
सागर की गहराई तक
जाकर ढूंढें मोती
कुछ असली, कुछ नकली

नाक से नहीं, नोक से सुंघा
समस्या का जल
जीवन की त्रासदी
अक्षर-ब्रह्म की साधना

शब्द ब्रह्म से याचना
कहीं मरा से राम हो जाए
तभी शुरु हुए जमाने के मखौल
कनखियां और फ़िकरे

सुनो, हो गया सूपकर्ण
फ़िकरे पचाते पचाते लंबोदर
फ़िकरे भी कैसे - कामसूत्र पर कुआरों ने
छेड़ी हो बहस जैसे

छोड़ पगले,
दुनिया ने किसी को छोड़ा है
तू क्यों फिर
प्रतिफल को दौड़ा है

क्या नहीं जानता?
साधना का पथ कंटीला है
ज्वाला का समन्दर है
डूबकर पार पहुंचना है

साधना है स्वान्तः सुखाय
तू दीपक है तुझे तो तिल-तिल जलना है
आंधी के दरख़्त पर
तूफ़ान का पलना है

जले तो जल
बुझे तो तेरा क्या जाना है?
तुझे सौन्दर्य बोध जगाना है
तमस को मिटाना है

कोयल के साथ
समवेत में गाना है
लहरों के साथ नाचना

और नाद को सजाना है ।

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रचनाकार – धनपतराय झा रचनाकारिता के नए आयाम गढ़ने को तत्पर प्रतीत होते हैं.आप शिक्षक की भूमिका में रहते हुए भी हिन्दी साहित्य में कई चर्चित-पुरस्कृत पुस्तकें लिख चुके हैं. आपको श्रेष्ठ अध्यापक का राज्यपाल पुरस्कार प्राप्त हो चुका है. आपकी कुछ चर्चित प्रकाशित पुस्तके हैं 'सत्य करे श्रृंगार', 'सर्मपण का देवता', 'तत्र श्री विजयोर्भूति', 'प्रणय निवेदन', 'दुर्ग नाशिनी दुर्गा', 'पार्वती परिणय', एवं 'कलजुगी भ्रमर गीत'.
दो पुस्तकें ‘मावजी महाराज की कथा’ एवं ‘रास रसेश्वर माव’ विमोचनार्थ तैयार हैं.
आपका ई-पत्र संपर्क पता है – dhanpatraijha [at] yahoo.co.in

चित्र- सौजन्य हेल्पेज-इंडिया


माफिया डॉन बबलू श्रीवास्तव का सद्यःप्रकाशित उपन्यास ‘बबलू श्रीवास्तव का अधूरा ख्वाब’ अंडरवर्ल्ड और भारतीय प्रशासन के क्रियाकलापों-संबंधों पर एक अत्यंत पठनीय, रोचक और ज्ञानवर्धक उपन्यास है. यूँ तो इसके डिस्क्लेमर में यह बताया गया है कि उपन्यास के पात्र व घटनाएँ काल्पनिक हैं, परंतु निश्चित ही वे वास्तविक घटनाओं से लिए गए प्रतीत होते हैं. उपन्यास को संवाद शैली में बहुत ही नए-निराले अंदाज में लिखा गया है और अगर एक बार पाठक उन संवादों के बीच फंस जाता है तो वह उपन्यास को अंततः खत्म करके ही छोड़ता है.

उपन्यास के चंद शुरुआती पृष्ठों में ही भारत में पनपते भयानक भ्रष्टाचार की कलई खोली गई है. वार्तालाप शैली में लिखी गई उपन्यास के कुछ दिलचस्प अंश-

....अच्छा ये बताओ, वे इतना पैसा कैसे कमाते हैं?

बेईमानी से. भाई वे लोग कस्टम में अपनी सेटिंग करके ड्यूटी बचाते हैं. ये जो केमिकल्स विदेशों से इम्पोर्ट करते हैं, यहाँ पर उसकी कीमत कम बताते हैं. यह सब इसलिए हो जाता है, क्योंकि पोर्ट पर ए.सी. इनका अपना होता है और कर्मचारी भी सेट होते हैं. भाई यहाँ तक ये लोग एक-एक असिस्टेन्ट कलेक्टर की नियुक्ति के लिए पच्चीस से पचास लाख तक खर्च कर उसका अपने पोर्ट पर स्थानान्तरण करवाते हैं, जहाँ इन लोगों का माल आता है. ये लोग स्टील का भी काम करते हैं. ये विदेश से नया स्टील का पाइप मंगवाते हैं और उसको पोर्ट पर पुराना दिखाकर ड्यूटी बचाते हैं. भाई, ये लोग एक-एक कन्टेनर पर 40 से 50 लाख कमाते हैं और लगभग हर महीने 10 से 15 कन्टेनर मंगवाते हैं....

..... नहीं जाएंगे. पुलिस के पास जाकर क्या बताएँगे, 5-10 करोड़ दिया है? पुलिस इन्हीं लोगों से पूछेगी कि इतना पैसा कहाँ से आया. नहीं, ये ऐसा कतई नहीं करेंगे. फिर इस बात से भी डरते हैं कि अख़बार में इनकी बात खुल जाएगी. ये इससे भी डरा करते हैं कि यदि कहीं लोगों को पता चल गया कि हमारे पास इतना पैसा है या हमने इतना दिया है तो और दूसरे गैंग भी इनके पीछे लग सकते हैं. फिर पैसा भी सारा दो नंबर का है इनके पास....


....देखो कक्कड़, हम ये मानते हैं कि अगर पचास करोड़ के आदमी से दस करोड़ मांगे जाएंगे तो वह जरूर पुलिस के पास भागेगा, मरने-मिटने को तैयार हो जाएगा, पर यही पैसा अरब पति से आराम से मिलेगा भी और वो कहीं जाएगा भी नहीं....


....नहीं, राजू, ऐसा होता नहीं है. हम हवाला पहली बार नहीं ले रहे हैं. फिर भी हम तुम्हें इसके विषय में सब कुछ बता देते हैं. ये प्राइवेट बैंक हैं और कई हैं. जैसे पटेल वॉल स्ट्रीट बैंक, विल्ली एक्सचेंज, सिंगापुर एक्सचेंज, अल जुबैर कम्पनी या अल मसरुक कम्पनी, ये सभी प्राइवेट बैंक हैं. इनकी हर देश में अपनी ब्रांच है. जब ये शक हो कि आदमी पैसा लेते वक्त पकड़ा जा सकता है, वैसे कोई भी पार्टी यह नहीं चाहेगी कि पैसा देते समय किसी को पकड़वा दें क्योंकि जो पकड़ा जाएगा, उसे तो ये पता नहीं होगा कि बम्बई में ‘पकड़’ किया गया आदमी रखा कहाँ गया है, फिर भी एहतियातन यह कर सकते हैं कि इन सभी बैंकों में अपना कहीं भी खाता खोल सकते हैं, क्योंकि ये सब प्राइवेट बैंक होते हैं. मान लो आपका एक सौ तेरह नम्बर का खाता पटेल वॉल स्ट्रीट में हैं. हम पार्टी से कहते हैं कि आप एक सौ तेरह नम्बर के खाते में पाँच खोखा जमा करा दें. अगर पार्टी जमा कर देती है तो हम फोन से पता कर लेते हैं कि एक सौ तेरह में कितना जमा हुआ है... साथ में हम वहां के नोट का नम्बर भी देते हैं कि फलां नोट वाला आदमी को वहां पैसा दे दो. बस, पटेल वॉल स्ट्रीट वाले अपना कमीशन काटकर जहाँ पैसा चाहें वहाँ देते हैं या जो भी बैंक डीलिंग में होगा, ये कर देगा....


वैसे, पूरी पुस्तक में अपहरण-फिरौती से संबंधित सफल-असफल ऑपरेशनों की ही कहानियाँ बताई गई हैं, जो एक दूसरे से कहीं कोई तारतम्य नहीं रखतीं. खल पात्रों वार्तालाप जो अपहरणों को अंजाम देते हैं, कभी-कभी घटनाओं को समझने में भ्रमित करते हैं. कहानियों में भी कोई तारतम्यता नहीं है, और न ही कोई नया पन. जिससे उपन्यास कहीं-कहीं बोझिल भी हो जाता है. और, चूंकि उपन्यास वार्तालाप शैली में है, इसलिए यह घोर एकरसता भी पैदा करता है. ऊपर से, वार्तालाप में पात्रों का परिचय भी नहीं है, जिससे अनुमान के आधार पर कथानक का खाका पाठक के मन में बनता है. हाँ, जैसा कि सबको पता है, बिहार का अपहरण उद्योग इधर कुछ दिनों से काफी फल फूल रहा है – तो संभवतः इसके पीछे अपहरण का अत्यंत आसान होना और अपहरणों से बिग रिटर्न मिलने वाला फ़ॉर्मूला ही काम आ रहा है, - जैसा कि पुस्तक में कई मर्तबा बताया गया है.

माफ़िया डॉन एक दूसरे के दुश्मन भी होते हैं और जब तब कोई न कोई प्रयास एक दूसरे को खत्म करने के होते रहते हैं. इस पुस्तक में ऐसे ही कुछ नाटकीय घटनाक्रमों के बारे में भी प्रकाश डाला गया है. एक माफ़िया डॉन ‘भाई’ को खत्म करने का किस्सा यूं बयां किया गया है कि पढ़ते-पढ़ते आप उस किस्से के हिस्से-से बन जाते हैं और चाहने लगते हैं कि जैसे भी हो, ‘भाई’ बच निकले. एक खल पात्र के प्रति उपज रही संवेदनशीलता उपन्यासकार को सफल होने का प्रमाण देती है.

सवा दो सौ से अधिक पृष्ठों वाले इस उपन्यास की कीमत- 85 रुपए भी वाजिब प्रतीत होती है. टाइपसेट भी पढ़ने में आसान है और काग़ज़ भी उत्तम कोटि का प्रयोग किया गया है.

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उपन्यास – बबलू श्रीवास्तव का अधूरा ख्वाब
लेखक – ओमप्रकाश श्रीवास्तव ‘बबलू’
प्रकाशक – नई सदी बुक हाउस, ए-7 कॉमर्शियल कॉम्प्लेक्स, मुखर्जी नगर, दिल्ली-110009
मूल्य – 85 रुपए
आईएसबीएन क्र. 81-87335-51-3
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मेरी किशोरावस्था की त्रासदियाँ बड़ी भयंकर हैं. यह वह वय है, जिसमें स्मरण शक्ति बड़ी प्रखर होती है. कुछ भुलाए ही नहीं भूलता. अभी याद करने बैठूँ तो मेरी स्मरण-शक्ति पाठकों के लिए त्रासदी हो जाए. एक से बढ़कर एक बढ़िया से बढ़िया त्रासदियाँ याद आने लगेंगीं. पर इतनी सारी त्रासदियाँ याद कर क्या करूं - जिनके आंकड़ों से लगने लगे कि मेरा जीवन अपने-आप में एक त्रासदी है, जबकि मैं जानता हूँ कि सत्य यह नहीं है. यदि ऐसा होता तो मैं भी कवियों के समान नारा लगाता - 'मैं अपने कंधों पर अपना सलीब ढो रहा हूँ -' या, 'मैं अपने कंधों पर अपनी लाश ढो रहा हूँ' - ढोने को चाहे, अपना थैला न ढोया हो. कुछ ऐसे ही तथ्यों के कारण मैंने आंकड़ा शास्त्र तथा कवि के निष्कर्षों को कभी गंभीरता से स्वीकार नहीं किया.

पर बात कवियों तथा आंकड़ाशास्त्र की नहीं, मेरी किशोरावस्था की त्रासदियों की थी. मेरी किशोरावस्था की सबसे बड़ी त्रासदी रंगमंच रहा है. रंगमंच से मेरा अभिप्राय सीधे-सीधे नाटक से ही है. नाटक में न चुना जाना मेरी त्रासदी नहीं रही - जैसा कि पाठक समझ रहे होंगे. मेरी त्रासदियाँ तो नाटक के लिए चुने जाने के बाद आरंभ होती हैं. आज कोसता हूँ उन घड़ियों को, जब मुझे नाटक में अभिनय करने के लिए चुना गया था.

कालेज में पहुँचा तो नाटक में अभिनय करने को बहुत व्याकुल था. मुझे व्याकुलता के भयंकर दौरे पड़ते हैं - कभी ग्रहण के, कभी त्याग के. पर ठीक समय पर ठीक दौरा मुझे कभी नहीं पड़ा. विवाह के पूर्व ग्रहण (सूर्य-ग्रहण नहीं, कन्या ग्रहण) का दौरा पड़ा था और विवाह के पश्चात् त्याग की व्याकुलता का दौरा अनेक बार पड़ चुका है, पर घर में एक ओझा निरंतर उपस्थित है, जो सारे दौरे झाड़ देता है.

तो कालेज में अभिनय करने की व्याकुलता का दौरा पड़ा था. किसी ने चेहरे से व्याकुलता भांप ली होगी, तभी तो मुझे चुन लिया गया और नाटक के अंत में मंच पर उपस्थित हो, एक वाक्य बोलकर लौट आने का महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिया. दौरे की स्थिति थी. मैंने प्रस्ताव तत्काल स्वीकार कर लिया. स्वयं को समझा लिया कि महान् बनना है तो किसी काम को छोटा मत समझो. तो उस भूमिका को ही क्यों छोटा मानता. नाटक की नायिका (जैसा कि होना ही चाहिए था) बी.ए. अंतिम वर्ष की छात्रा थी. मैं अभी प्रथम वर्ष में ही आया था, इसीलिए उसकी दृष्टि में नगण्य जीव था. उसके व्यवहार से स्पष्ट था कि मैं उसे तनिक भी पसंद नहीं आया था. वह उस नाटक में भी मुझे अपने भाई के रूप में भी स्वीकार नहीं कर पाई थी. पर त्रासदी यह नहीं थी...

मुझे अपनी मां से भरपूर वात्सल्य मिला है, इसलिए सीनियर लड़कियों से प्रेम-व्यवहार चलाने की तृष्णा मुझ में कभी नहीं रही. और जब कभी किसी सीनियर लड़की ने ऐसा प्रयत्न किया है, मुझे श्रृंगार के स्थान पर हास्य की अनुभूति हुई है. पर वे किस्से फिर कभी सुनाऊँगा. अभी तो नाटक की नायिका की चर्चा चल रही है. ... और इस नाटक की नायिका तो सुंदर भी नहीं थी. ईमानदारी की बात यह है कि मुझे भी उसके साथ का यह रिश्ता तनिक भी पसंद नहीं आया था. उसकी उपेक्षा मेरे लिए कुछ अर्थों में सुखद ही रही थी. पर त्रासदी यह भी नहीं थी...

इस नाटक की त्रासदी थर्ड-वर्ल्ड में घटित हो रही थी. नायक महोदय का व्यवहार मेरे प्रति अत्यन्त स्नेहपूर्ण था. उन्हें नायिका-ग्रहण की व्याकुलता का दौरा बड़े जोर से पड़ा हुआ था, इसलिए वे नायिका के साथ मेरे इस नाटकीय संबंध को पूर्णतः यथार्थ धरातल पर ग्रहण कर रहे थे. नाटक तो जैसे-तैसे समाप्त हो गया, पर उसके प्रभाव जीवन में बहुत दूर तक चलते गए. जैसा कि होना चाहिए था, नायिका का विवाह नायक महोदय से नहीं हो सका. (इसमें नायिका के पिता का कोई दोष नहीं था. उसने शायद चाहा भी था. नायिका को ही यह लार टपकाता नायक पसंद नहीं आया था. उसकी सहज इच्छा का सम्मान करते हुए उसका विवाह कहीं और कर दिया गया था.) इधर नायक महोदय, नायिका का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाए, मुझसे रुष्ट अवश्य हो गए. कह नहीं सकता, उसके मन में कौन-सी तर्क-श्रृंखला थी : क्या वह चाहते थे कि नायिका का नाटकीय भाई होने के नाते मैं उसका विवाह उनसे करवाने का सक्रिय प्रयास करता - जो मैंने नहीं किया? वे कदाचित् मेरी प्रकृति को नहीं समझते. मैंने तो सिवाय अपने, और किसी के भी विवाह में कभी रुचि नहीं ली. मेरा तो सिद्धांत ही है, न दूसरे के विवाह में हस्तक्षेप करो, न किसी को अपने विवाह में हस्तक्षेप करने दो. यह 'जिओ और जीने दो' की तर्कपूर्ण परिणति है. पर वे नायक महोदय न सिद्धांत को समझते थे, न तर्कशास्त्र को. न उस नायिका को और न मुझे. वे समझते थे कि नायिका की रुचि जितनी मुझमें होनी चाहिए थी, उससे अधिक हो गई थी. जो भी हो, नायक महोदय से मेरे संबंध आज तक उतने ही कटु चले आ रहे हैं. और इस कटुता के लिए वे ही पछता रहे हों तो पछता रहे हों, मझे संबंधों के पश्चाताप में अधिक विश्वास नहीं है. संबंधों की त्रासदी और किसे कहते हैं?

ऐसी ही त्रासदी एक अन्य नाटक में भी हुई. दूसरे नाटक के समय तक मैं पर्याप्त उन्नति कर चुका था, अर्थात् नायिका के भाई से स्वयं नायक बन चुका था. इस नाटक की नायिका उस समय तो काफी आकर्षक ही लगी थी- उस समय तक सावन के अंधे को हरा-ही-हरा सूझने लगा था - अर्थात् हर युवती अच्छी लगने लगी थी. आज पंद्रह वर्षों बाद उनमें से कोई दिख जाती है तो अपनी युवावस्था का नेगेटिव ही दिखाई पड़ती है और मैं अपनी पीठ ठोंकता हूँ कि भले बचे, इससे विवाह नहीं किया. आज जाने वह नायिका कैसी लगे. पर इस नायक-नायिका संबंध में बड़ी त्रासदी है साहब! लोगों ने हमसे पूछे बिना ही हमें प्रेमी-प्रेमिका मान लिया. मुझे नायिका के साथ देखते तो मुस्करा कर दूर हट जाते. अकेला देखते तो मुस्करा कर पूछते, "आज अकेले ही हो? वह साथ छोड़ गई?" नायक बनने के चक्कर में हम एकदम अकेले हो गए. नायक क्या बने, यार-दोस्तों को खलनायक दिखाई पड़ने लगे. न कोई हमें साथ बैठाए, न हमारे साथ बैठे : "तुमको फुर्सत कहाँ होगी? तुम्हारी तो हीरोइन आती होगी."

और इधर, नायिका थी कि एकांत होते ही अपने मंगेतर की कहानियाँ इस प्रकार सुनाने लगती जैसे मच्छरों को भगाने के लिए 'फ्लिट' छिड़का जाता है. ...वह देखने में कैसा है, क्या काम करता है, क्या चाहता है... मैं नायिका को समझाना चाहता था कि मुझे उसके मंगेतर में कोई रुचि नहीं है, पर हरिनारायण आप्टे ने ठीक कहा है: 'कौन ध्यान देता है.' वह पूरी नायिका थी - अर्थात् वन-वे-ट्रैफिक! बोलती धारा प्रवाह थी. सुनने वाला चैनल वह थी ही नहीं. मित्रों को समझाना चाहता था कि मुझे इस नायिका में कोई रुचि नहीं है - पर उधर भी कौन सुनता था. नायक बनकर, मुझ पर दोहरी त्रासदी घट रही थी और मैं था कि किसी को हाले-दिल समझा ही नहीं पा रहा था - उन्हीं दिनों मैं समझ पाया कि ट्रैजिक हीरो किसे कहते हैं.

उस समय तो मैं इतनी ही त्रासदी से परेशान था - यह नहीं समझ रहा था कि वह तो रिहर्सल-मात्र था - असल नाटक तो आगे आने वाला था. - हुआ यह कि मैं बी.ए. कर पंजे झाड़ कर निकल गया. कालेज छूटा तो छूटा, एम.ए. करने के चक्कर में नगर भी छोड़ दिया. उस प्रवास में हमारी भूतपूर्व नायिका के जो पत्र आए, वे और बड़ी नायकीय त्रासदी लिए हुए थे. उसने लिखा था, उसे अकेली देखकर लोग आवाज़ें कसते हैं. कुछ तो सहानुभूति भी दिखाते हैं कि मैं उसे छोड़ भागा. बेवफा कहीं का. यह भी कोई तरीका है. उसने लिखा था कि मुझ पर बेवफाई के ये आरोप उसे अच्छे नहीं लगते. उसे मुझसे सहानुभूति थी और मैं सोचता रहता कि कृष्ण मथुरा चले गए तो राधा भी उन्हें ऐसे ही पत्र लिखा करती होगी.

मैं भी बहुत परेशान रहा, बेवफाई की त्रासदी से. अब मैं बैठा हूँ दिल्ली में और बदनाम हो रहा हूँ जमशेदपुर में. किसे-किसे समझाने जाऊँ, कि इसमें बेवफाई का कण भी नहीं है. जिसे लोग हमारा प्रेम समझ बैठे थे, वह तो अपने अध्यापकों के निर्देशन में की गई हमारी एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटी थी. भला एक्स्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटी में बेवफाई का क्या काम! बेवफाई तो एक्स्ट्रा करिकुलम में ही नहीं है. पर वापस लौट कर अपनी वफा का प्रमाण देने का प्रयत्न करता तो नाटक में नहीं - जीवन में भयंकर त्रासदी घट जाने की संभावना थी....

यह त्रासदी यहीं रुक जाती, तो भी रो-धोकर मैं उसे भूल ही जाता. जब इतनी झेली हैं, तो इसी की उपेक्षा क्यों करते हो? पर करनी विधाता की यह हुई कि उसी नाटक में एक खलनायक महोदय भी थे. जब तक नाटक-वाटक होते रहे, तब तक तो वे खासे भले मानस बने रहे, पर जब मेरे साथ सारी त्रासदियाँ घट चुकीं, तो उन्होंने ताबूत में अंतिम कील ठोंकी. उन महाशय ने हमारी नायिका से विवाह रचा लिया. अब साहब, लगी दुनिया हम पर थू-थू करने. "देखो! साला कैसे हीरो है, विलेन इसकी हीरोइन को उड़ा ले गया और यह खड़ा देखता रहा. न मैं उसे गोली मार सका, न स्वयं मर सका." मैंने बहुत चाहा कि उन्हें समझाऊँ, "यारो! वह नाटक में विलेन था तो क्या हुआ! वैसे तो भला आदमी है. देश के संविधान से अन्तर्गत दी गई स्वतंत्रताओं के अनुसार वह किसी भी कन्या से प्रेम करने अथवा विवाह करने को स्वतंत्र है." पर किसी ने मेरी नहीं सुनी. अपना ही बैंड बजाते रह गए...

तब से आज तक, घोर आस्तिक भक्तों के समान ईश्वर से एक ही प्रार्थना करता रहा हूँ कि "हे प्रभु! ऐसी नाटकीय त्रासदी मुझ पर तो ढाई सो ढाई, अब और किसी पर मत ढाना."

पर कहाँ मानता है वहा! हम नाटक के प्रांप्टर के समान अपने डायलॉग प्राम्प्ट करते रहे हैं, पर वह सुनता ही नहीं. पता नहीं, उसने कोई स्क्रिप्ट याद कर रखी है, या इम्प्रोवाइज़ करता चलता है.

हुआ यह कि हमारी नाटकीय प्रसिद्धि ने दिल्ली में भी हमारा साथ नहीं छोड़ा. मैं तो एम.ए. में पढ़ाई कर अच्छा परीक्षा-फल लाने के चक्कर में था, पर यारों ने धर पकड़ा. पकड़ा क्या साहब, नायक ही बना दिया. इस बार नायिका थी भयंकर तुनकमिजाज. अच्छा-खासा जानती थी कि मेरा प्रेम कहीं और चल रहा है, फिर भी मुझसे लड़ती ही रहती थी कि कहीं मैं उसके निकट जाने का प्रयत्न न करुं. बस, यहीं से दोहरी त्रासदी प्रारंभ हो गई. ...जिन्होंने उसे मुझसे झगड़ते देख लिया, उन्होंने मुझे झगड़ालू घोषित कर दिया, "साला! अपनी हीरोइन से भी झगड़ा करता है." और जिन्होंने उसे मुझसे झगड़ते नहीं देखा - वे दूसरा भ्रम पालने लगे. इसी वर्ग में मेरी अपनी सगी प्रिया भी थी. एक ओर नाटक के रिहर्सल चल रहे थे- दूसरी ओर मेरे जीवन की नाटकीय त्रासदियाँ. दिन भर मैं रिहर्सल में नायिका से लड़ता और शाम को कहीं एकांत ढूंढकर अपनी प्रिया के सामने नाक रगड़ता. बस साहब! हम अब दुइ पाटन के बीच पिस रहे थे और साबत बचने की कोई आशा नहीं थी.

मेरी प्रिया मुझ पर बेवफाई का आरोप लगा मुझसे दूर भाग रही थी और नायिका के प्रेमी महोदय, मुझसे अपनी प्रिया की रक्षा करने के लिए मुझसे चिपकते जा रहे थे. परिणामतः जब वे नाटक में और कुछ नहीं कर सके तो प्राम्प्टर बन गए. इससे कुछ तो निर्देशक महोदय संतुष्ट हुए और कुछ संतोष मुझे भी हुआ कि नायिका स्वयं को सुरक्षित पाकर मुझसे झगड़ा नहीं करेगी. उसके प्रेमी महोदय स्वयं घटना-स्थल पर उपस्थित रहेंगे तो हमसे बदगुमानी नहीं पालेंगे. फिर प्रेमी के साक्षात् उपस्थित रहने पर, रिहर्सलों के पश्चात् न तो हमें नायिका को चाय पिलाने का दायित्व ढोना पड़ेगा और न उसे घर छोड़ने जाने का नैतिक कर्तव्य निभाना होगा. जिसकी ड्यूटी है, वह स्वयं बजाता फिरेगा. हम क्यों बंदर की बला अपने सिर लें...

पर हम क्या जानते थे कि यह नाटक फिर मेरे साथ, हार्डी के उपन्यासों की त्रासदी करने जा रहा है.

एम.ए. करते-करते ही नायिका और उसके प्रेमी का विवाह हो गया. और साहब! मित्रों ने फिर मुझे शोक-संदेश भेजने प्रारंभ कर दिए, "भाई क्या जमाना है. लोगों को दोस्ती का भी खयाल नहीं रहता." कुछ लोगों ने मुझे ही दोषी पाया, "तुम साले! फिसड्डी ही रह गए. तुमसे तो प्राम्प्टर ही प्राम्प्ट निकला." जब कभी मैंने किसी को समझाने का प्रयत्न किया, तो उसने प्रखर वक्रता से उत्तर दिया, "हाँ! हाँ! अंगूर खट्टे हैं."

तंग आकर मैंने सोचा कि कुछ ऐसा करूं कि फिर नाटकीय त्रासदी मुझे न छू पाए. एक ही मार्ग सूझा कि जीवन की त्रासदी को अंगीकार कर लूँ! बस - झटपट विवाह कर लिया. मैं अपनी ओर से बहुत संतुष्ट था कि मैंने नाटकीय नायिकाओं से मुक्त हो, अपने जीवन की नायिका को पा लिया है. पर यारों का दृष्टिकोण ही और था. उनका विचार था कि नाटक के प्राम्प्टर की नियुक्ति कर ली है... अब स्थिति यह है कि घर के भीतर जो कुछ बोलता हूँ, मेरी पत्नी मानी है कि मैं नाटक कर रहा हूँ, और घर से बाहर जो कुछ बोलता हूँ, उसे यार लोग मेरी प्राम्प्टर की वाणी मानते हैं....

लिखते-लिखते कलम रुकने लगी है... इसलिए नहीं कि रचना लंबी हो गई है... आशंका जाग उठी है , नाटकीय त्रासदियों की चर्चा करते-करते कहीं जीवन की त्रासदी का मार्ग तो प्रशस्त नहीं कर रहा... जब पत्नी इन कन्फैशंस को पढ़ेगी तो बखेड़ा नहीं मचाएगी, 'पहले तो कबी चोंच नहीं खोली. मुझे खोले में रख विवाह कर लिया. और अब बुढ़ापे में ससुर अपनी प्रेमकथाएँ लिखने बैठे हैं.' ... इस आशंका के मारे इसी क्षण निर्णय कर लिया है कि संपादक महोदय से प्रार्थना करूंगा कि इस कन्फैशन को प्रकाशित करें तो नीचे यह अवश्य छापें कि रचना के सारे पात्र काल्पनिक हैं. पर अपने संपादक भी क्या कम हैं? संपादकीय त्रासदियों को विषय में फिर कभी लिखूंगा. पर इस समय तो यही भय सता रहा है कि अपनी टिप्पणी में उन्होंने यदि लिख दिया कि 'नरेन्द्र कोहली की इसी रचना के सारे पात्र काल्पनिक हैं, अन्य रचनाओं के विषय में हम कुछ नहीं कह सकते' तो मैं अपनी अन्य प्रेम-कथाओं के बारे में क्या सफाई दूंगा. या उन्होंने अधिक कृपा की और लिख दिया कि "इस रचना के, लेखक समेत सारे पात्र काल्पनिक हैं" तो मैं अपने अस्तित्व की रक्षा कैसे करूंगा?...

मुझे अपने जीवन की त्रासदियों का अंत नहीं दीखता...

******.
रचनाकार - नरेन्द्र कोहली की अन्य त्रासदियों के मज़े लेना चाहेंगे? नीचे कुछ कड़ियाँ हैं, उन्हें झटपट क्लिक करें:

http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_05.html
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चित्र - रेखा श्रीवास्तव की पेंसिल कलाकृति.



मैं सन् 1973 कोटपूतली (राजस्थान) में पैदा हुआ. वहीं पला, पढ़ा, बढ़ा. लगातार पढ़ते हुए डॉक्टरेट किया. मन की विवशताओं के चलते छोटी उम्र में ही कविताएँ लिखना शुरू कर दिया. संजय विद्रोही नाम मैंने खुद रखा, कोई सत्रह वर्ष पहले और तभी से शुरू हुआ लेखन, प्रकाशन और मंच पर काव्यपाठ. अचानक एक कहानी 'गोदनामा' ने मेरे भीतर के काव्य अनुभूति को कहानी की ठोस, उबड़-खाबड़ एवं पथरीली जमीन की ओर मोड़ दिया.



समाज और परिवार से मिले खट्टे-मीठे अनुभवों ने मेरे विद्रोह को निरंतर धार दी. इस नाते मेरे सभी सगे सम्बन्धी और परिचित धन्यवाद के पात्र हैं. प्रथम कहानी संग्रह 'गोदनामा' एक बड़े पाठक समुदाय द्वारा पढ़ा और सराहा गया. फिलहाल एक ग़ज़ल संग्रह प्रकाशन में व्यस्त हूँ. शायद 'एक तन्हा सफर' शीर्षक से छपे.



पत्रकार बनना चाहता था, अध्यापक हो गया. ग़ज़लें लिखीं तो कहानियाँ छपीं. गीत लिखे, तो वक्ता हो गया. कहानियाँ लिखीं, तो कैमेस्ट्री की किताबें छपीं. ऐसा ही कुछ सिलसिला अब तक जारी है...



कृतित्व:

गोदनामा (कहानी संग्रह)

बक्खड़ (कहानी संग्रह - सं. यशवंत व्यास)

Engineering Chemistry

Practical Engineering Chemistry



इसके अलावा अनेकों संपादित संग्रहों में ग़ज़लें, http://www.abhivyakti-hindi.org http://www.hindinest.com पर कहानियाँ एवम् ग़ज़लें प्रकाशित.



विगत 15 वर्षों से देश भर में कवि सम्मेलनों में काव्य-पाठ और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियों, ग़ज़लों एवं कविताओं का सतत् प्रकाशन.



आकाशवाणी, दूरदर्शन, एनडीटीवी इन्डिया आदि पर कविताओं का प्रसारण.



इसके अतिरिक्त राजस्थानी भाषा में भी ‘जागती जोत’ जैसी पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन.



सम्प्रति: एसोशिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, रसायन शास्त्र विभाग, इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंजीनियरिंग एण्ड टेकनोलॉज़ी, अलवर.



संपर्क sanjayvidrohi at yahoo dot co dot in

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रचनाकार – संजय विद्रोही का 15 तीक्ष्ण, चुभती कहानियों का संपूर्ण कहानी संग्रह – ‘कभी यूँ भी तो हो’ रचनाकार में सद्यः प्रकाशित हुआ है जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं –

http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_14.html



इस कहानी संग्रह को इंटरनेट पर ई-बुक के रूप में पीडीएफ़ फ़ॉर्मेट में भी प्रकाशित किया गया है, जिसे डाउनलोड कर आप किसी भी प्लेटफ़ॉर्म में (विंडोज 95/98 में भी) एक्रोबेट/पीडीएफ़ रीडर के जरिए पढ़ सकते हैं. इंटरनेट पर हिन्दी में ई-बुक सहित सम्पूर्ण कहानी संग्रह प्रकाशन का संभवतः प्रथम प्रयास. ई-बुक यहाँ से डाउनलोड करें -

(टीप : पूरी पुस्तक बहुत बड़ी है, अतः पृष्ठ लोड होने में समय ले सकता है. अतः कृपया धैर्य बनाए रखें.)

कभी यूँ भी तो हो



रोज मरने का शौक है किसको?
रोज जीने का हौसला किसमें?
एक गुच्छा-सा साँस का अटका,
ज़िस्त उलझी है आजतक जिसमें।

तुम निकल पाओ तो बतला देना...

-संजय विद्रोही.

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अनुक्रम



1 हम एक-से
2 झूठ के सहारे
3 कब तक आखिर?
4 कम्बल
5 झुलसे सपने
6 वह
7 अनकही
8 कभी यूँ भी तो हो
9 डिस्गस्टिंग
10 विश्वासघात
11 उसके लिए
12 ये कहानी नहीं
13 नई सुबह
14 इन्वेस्टमेण्ट
15 कॉकटेल



अभिमत - यशवंत व्यास
आख्यान सन्दर्भ - से.रा. यात्री
'एक आत्मीय पत्र' - डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल


1 हम एक-से



रेडियो स्टेशन से रिकॉर्डिंग के बाद ऑफिस के लिए निकला था। मोड़ से देखा बस आ रही है। मैं दौड़ पड़ा। बड़ी मुश्किल से बस पकड़ पाया। बस खचाखच भरी थी। लेकिन बस को छोड़ने का अभिप्राय था, अगले एक घण्टे तक तपती दोपहर में बीच सड़क बेबस खड़े रहना और चूँकि मैं ऑफिस से छुट्टी लिए बिना रिकॉर्डिंग के लिए आया था, इसलिए भी मेरा इसी बस से जाना आवश्यक था। नाहक किसी को कुछ कहने का अवसर देने से अच्छा है, थोड़ा कष्ट सह कर टाईम से पहुँच लिया जाए। जैसे-तैसे, भीड़ में घुसा और एक जगह छत का पाइप पकड़कर खड़ा हो गया। खचाखच भरी बस में गर्मी के मारे लोगों का बुरा हाल हो रहा था।

मुझसे कुछ दूरी पर एक पतली-दुबली युवती, खिड़की का सहारा लिए खड़ी थी। उसके एक हाथ में पॉलिथीन का एक बैग था और दूसरे हाथ से उसने खिड़की को कसके पकड़ा हुआ था। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि वो लोगों की बीच बुरी तरह फंसकर खड़ी थी। कोई और स्थान होता तो शायद वो इस तरह नहीं खड़ी होती, परन्तु महानगरीय बस सेवाओं में सफर करना इतना कष्टकर हो गया है कि वर्जनाएँ आप से आप टूट गयी हैं और व्यक्ति अति समझौतावादी हो गया है।

मैं भीड़ में से किसी तरह बार-बार उचक कर बस से बाहर झाँक रहा था, ये देखने के लिए कि अभी और कितना दूर है ऑफिस? तभी उस पास खड़ी युवती की आवाज मेरे कानों में पड़ी 'एक्सक्यूज मी प्लीज, टाईम क्या हुआ है?' मैंने इधर-उधर देखा, ये देखने के लिए कि ये टाइम किससे पूछा गया है? सभी को अपने-अपने में व्यस्त पाकर जब मैंने उस लड़की कि तरफ देखा तो वह मेरी ओर ही प्रश्नभरी निगाह से देख रही थी। मैं अभिप्राय समझ गया और भीड़ में से कलाई को ऊपर खींच कर टाइम बताया, 'पौने दो'। उसने मुस्कुराकर 'थैंक्यू' बोल दिया। अब, मेरा ध्यान उसकी ओर गया। यूँ भी अभी ऑफिस आने में देर थी। सो मैं नजर बचा-बचा कर उसे देखने लगा। उसने पीले रंग का सलवार-सूट पहन रखा था। गले में हल्के नीले रंग का दुपट्टा पड़ा था। चेहरे पर अजब सौम्यता मिश्रित सुन्दरता थी, ऑंखें बड़ी-बड़ी और नाक नुकीला था। गेहुँआ रंग के चेहरे पर दोनों भौहों के बीच छोटी-सी काली बिन्दिया आकर्षक लग रही थी। पसीने की बारीक-बारीक बूँदों से सजा उसका चेहरा किसी ओस नहाये फूल जैसा लग रहा था। मैं 'उसी' में खोया था कि उसने मुझे इस तरह 'ताकते हुए' देख लिया। दोनों की नजरें मिली, वो मुस्कुरा दी। मैं बुरी तरह झेंप गया। 'क्या सोचती होगी? टाईम क्या पूछ लिया, लगा घूरने। बदतमीजों की तरह।' मैं पुनः बस के बाहर झाँकने लगा। लेकिन उसका आकर्षण ऐसा था कि बार-बार ध्यान दौड़कर उसी की ओर चला जाता। मैं उसे देखता तो उसको अपनी ही ओर देखता पाता, नजर मिलते ही वो मुस्कुरा देती और नजरें घुमा लेती। दो-एक बार इस तरह हुआ, तो मन से झिझक जाती रही, और हम रह-रह कर एक-दूसरे को देखने लगे।

अचानक कण्डक्टर चिल्लाया 'सैकेट्रेट ... सैकेट्रेट वाले आ जाओ।' मैं जैसे चौंक कर बोला, 'हाँ-हाँ ... रोको। बस की रफ्तार धीमी हुई और होते-होते बस रुक गई। मैं भीड़ को धकेलता हुआ बस से उतर पड़ा। उतर कर देखा तो 'वो' भी मेरे पीछे-पीछे ही उतर आई थी। मैं चकित रह गया। मैं कुछ और सोचता उससे पहले ही वो बोल पड़ी, 'आप, क्या यहीं काम करते हैं?'

'जी हाँ, इसी ऑफिस में अदना-सा मुलाजिम हूँ' मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।

'तब तो आप रामगोपाल त्रिपाठी जी को जानते होंगें' उसने जरा जिज्ञासा से पूछा।

'हाँ, हाँ, त्रिपाठी जी के ऑफिस में ही तो मैं हूँ' मैंने अवगत कराया। फिर जरा रुककर पूछा 'आप त्रिपाठी जी को कैसे जानती हैं?'

'जी, वो मेरे अंकल लगते हैं।'
'लेकिन अभी तो लंच टाईम है, वो घर गये होंगें' चलते-चलते मैंने बताया।
'क्या? कितनी देर में आ जाएँगे, लगभग?' उसके स्वर में त्रिपाठी जी से नहीं मिल सकने का अफसोस साफ नजर आ रहा था।

'बस आने ही वाले होंगे' मैंने घड़ी देखते हुए कहा। दो बज कर दस मिनट हो चुके थे। त्रिपाठी जी अमूमन ढाई, पौने तीन तक आ जाते हैं। 'चलिए तब तक एक-एक कप कॉफी हो जाए' मैंने साथ ही जोड़ दिया। वो स्वीकृति में मुस्कुरा दी। हम एक चौड़े दालान को पार करके केण्टीन की ओर बढ़ गये।

पहाड़ी छोकरा दो कॉफी दे गया था। धीरे-धीरे कॉफी पीते-पीते हम बातें कर रहे थे। उसने पूछा, 'मैंने आपको रेडियो स्टेशन से निकलते हुए देखा था। वहाँ कैसे?'

'कुछ नहीं, वहाँ मेरी एक रिकॉर्डिंग थी। छुट्टी लेने की बजाए, लंच-टाईम से कुछ पहले निकल गया था।' मैंने टालने के-से अंदाज में जवाब दिया।

'रिकॉर्डिंग? आप गाते हैं?' वो चकित थी।
'जी नहीं, गाता नहीं हूँ। लिखता हूँ। मेरी कविताओं की रिकॉर्डिंग थी।'
'आप लिखते हैं? कब से लिख रहे हैं?' वो अब धीरे-धीरे अनौपचारिक हो रही थी।
'यूँ ही थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ। पहले शौकिया लिखता था, फिर आदतन लिखने लगा और अब मजबूरन लिखता हूँ।' मैंने कॉफी का एक घूँट भरते हुए कहा। बात कहीं भीतर से निकली थी, सुनते ही 'वो' गम्भीर हो गई।

'मजबूरन क्यों?' उसने पूछा। प्रश्न में गम्भीर जिज्ञासा थी।
'क्लर्क की पगार कितनी होती है? जानती ही होंगी। उसमें घर चलाना बहुत ढेढ़ी-खीर होती है, मैडम। रेडियो स्टेशन में कुछ मिलने-जुलने वाले लोग हैं, उनके जरिये महीने-दो महीने में एक दो कार्यक्रम हो जाते हैं। थोड़ा कुछ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन से मिल जाता है। बस गुजारा हो जाता है। इसे 'मजबूरन लिखना' नहीं कहूँ तो क्या कहूँ?' मैं हँसने की चेष्टा करने लगा। मगर मैं जानता था कि मैं विफल हो रहा हूँ। क्योंकि मेरी हँसी मेरे चेहरे के भावों से कतई मेल नहीं खा रही थी। वो अभी भी पहले जैसी गम्भीर बैठी थी।
'घर में कौन-कौन हैं?'

'बूढे माँ-बाप हैं और दो बहिनें हैं।'
'आपकी शादी ... ' उसने थोड़ा झिझकते हुए प्रश्न किया।
'जिस भाई की दो-दो जवान बहिनें घर में बैठी हों, उसकी शादी करना ना तो उचित है और ना ही आवश्यक।' वेटर कप लेने आ गया था, उसको दस का नोट थमाते हुए मैंने कहा।
'ऐसा क्यों सोचते हैं आप? ये क्यों नहीं सोचते कि माँ-पिताजी को बेटियों के जाने के बाद अकेलापन नहीं खलेगा। उनका मन बहला रहा करेगा।' इस बार वो हल्का-सा मुस्कुरायी भी।

'ये सब कहने की बातें हैं। घर में खाने वाला एक पेट और बढ़ जाएगा, ये नहीं दिखता आपको? उसके पीछे फिर और कितने खाने वाले बढते हैं, ये नहीं नजर आता? यूँ भी देश की आबादी कम नहीं है। मेरा शादी नहीं करना मेरे साथ साथ देश के हित में भी है, ये क्यों नहीं सोचती आप?' मैंने बात को मजाक में उड़ाने का प्रयास किया और इस बार सफल भी हो गया।

'आप तो ... ' वो हँस पड़ी।
'त्रिपाठी जी से क्या काम था?' मैंने तुरन्त बात का रुख मोड़ दिया।
'त्रिपाठी जी मेरे पापा के दोस्त हैं। एक ट्राँसफर कैंसिल करवाना है। उसी सिलसिले में त्रिपाठी जी से मिलना था' उसने प्रयोजन बताया। तभी मुझे दूर से त्रिपाठी जी आते हुए दिखाई दे गये। मैंने ईशारे से उसको बता दिया। वो उठकर उस और चल पड़ी। त्रिपाठी जी ने उसे गले से लगा लिया और अपने साथ लेकर अन्दर की ओर बढ़ गए। मैं उन्हें जाता हुआ देखता रहा, उसने पलट कर नहीं देखा।

कुछ देर बैठे रहने के बाद उठकर मैं भी ऑफिस की ओर बढ़ गया। वो त्रिपाठी जी के सामने वाली कुर्सी पर बैठी थी। दरवाजा खुलने की आवाज से चौंक कर दोनों का ध्यान मेरी तरफ गया। त्रिपाठी जी यथावत थे, अभ्यस्त जो थे। हाँ, वो धीरे से मुस्कुरा दी। मैं चुपचाप जाकर अपनी टेबिल पर बैठ गया और कुछ देर फाईलें इधर-उधर करने के बाद एक कागज टाईप करने लगा। हालाँकि मेरी उंगलियाँ टाईपराइटर पर चल रही थी, मगर मेरे कान उनकी बातों पर लगे हुए थे।

'अंकल, काम तो यहाँ भी करना है और वहाँ भी। बस फिक्र है तो माँ की। आजकल उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं रहती।'
'क्या भाभी जी की तबियत में कोई सुधार नहीं है?' त्रिपाठी जी चिन्तित हो उठे।
'पहले से तो बेहतर है, अंकल। लेकिन अभी भी पूरी तरह से ठीक नहीं है। हो भी नहीं सकती, आप तो जानते ही हैं। पता नहीं भगवान को क्या मंजूर है?' उसका स्वर उदास था।

'नहीं, बेटे। यूँ हिम्मत नहीं हारा करते। भगवान पर भरोसा रखो, सब ठीक हो जाएगा, और फिर जिस माँ की तुम जैसी बहादुर बेटी हो उसको कभी कुछ हो सकता है भला?'
'बस, ये ही वजह है अंकल। वरना काम तो काम है, जहाँ मिलेगा करना ही पड़ेगा। फिर सरकारी नौकरी में तो यूँ भी बिस्तर बाँधे रहना चाहिए। पापा को तो आप जानते ही हैं। वो और उनके मरीज बस उनकी दुनिया तो वहीं तक है। भैया अहमदाबाद के होकर रह गये हैं। उन्हें घर परिवार से शायद कुछ लेना-देना नहीं है। अनुश्का अभी छोटी है। पढ रही है, उस पर अभी से क्या जिम्मेदारी डालें। वो अपना कर लेती है, वही बहुत है। ऐसे में माँ की देखभाल करने वाला घर में कोई नहीं है, अंकल।' वो रुँआसी हो गई थी। मैंने नजर उठा कर देखा, वो रूमाल से ऑंखें पौंछ रही थी।

'बस, बस, ऐसे दिल छोटा नहीं करते। तुम तो बहुत बहादुर लड़की हो, तुम्ही यूँ भावुक हो उठोगी तो भाभी जी को कौन सम्हालेगा? बेटे, अपने दुख को छुपाकर दूसरों के दुख को भोगना ही तो सच्चा पुण्य है। मैं क्या नहीं जानता किस तरह अभिषेक शादी के बाद अलग होकर अहमदाबाद जा बसा। क्या उसका यही फर्ज बनता था, एकलौता बेटा होने के नाते? तेरे पापा, बेटे जानती हो बहुत महान हैं। वो खुद क्या दुरूखी नहीं हैं बेटे के व्यवहार से? उसने क्या इसी दिन के लिए सपने सजाये थे? अब जब सेवा करने के लिए घर में बहू होनी चाहिए, उस वक्त बेटी पर आश्रित माँ का पति कितना विवश होता है? तुम समझ सकती हो। हालाँकि रुपये पैसे की कोई परेशानी नहीं है, मगर अपनों की देखभाल भी तो कुछ माने रखती है जिन्दगी में। ऐसे में वो मरीजों को स्वस्थ करने में अपने को झौंके हुए है और खुद एक अदेखे रोग का मरीज होता जा रहा है, भीतर ही भीतर। उसके जैसा आदमी कहाँ पाओगी, बेटा?तुमको गर्व होना चाहिए अपने पापा पर, जो इतना कुछ सहने के बावजूद भी कुछ कहते नहीं हैं। बस, चुपचाप खून के घूँट पीते रहते हैं।' त्रिपाठी जी भी भावुक हो उठे थे।

'मै समझती हूँ, अंकल। पापा अपनी जगह सही हैं। तभी तो उनसे कुछ कहते नहीं बन पड़ता। उन्होंने तो मुझे ट्राँसफर कैंसिल करवाने को भी नहीं कहा। कह रहे थे कि अनुश्का देख लेगी माँ को। पर अंकल अनुश्का का अब के अन्तिम वर्ष है, बीण्एण् का। उसकी परिक्षाएँ भी सिर पर हैं। उसकी पढ़ाई में हर्ज होगा। मैं उसको इस समय पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं करने देना चाहती।'

'मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करता हूँ, बेटे। तुम जैसी समझदार और गुणी बेटी भगवान सभी को दे। तुम अपनी एप्लीकेशन दे आओ। मैं 'डिजायर' करवाकर तुम्हारा ट्रांसफर कैंसिल करवा दूँगा। बेफिक्र रहो। दो चार दिन में तुम्हें ऑर्डर पहुँच जाएँगे।' कहकर वो मेरी तरफ मुखातिब हुए। वो ऐसा ही करेंगें, मैं जानता था इसलिए मैं और अधिक ध्यान से टाईप करने लगा। 'संदीप, सुनो जरा' उन्होंने पुकारा, युवती भी घूमकर मेरी ओर देखने लगी।

मैं उठकर त्रिपाठी जी की टेबिल के पास आकर खड़ा हुआ। मेरे हाथ में नोटबुक और पेन था, 'जी, सर।' मैंने धीरे से कहा। 'संदीप, ये प्रतीक्षा है। मेरी बेटी जैसी है। नगर निगम में जूनियर इंजिनियर की पोस्ट पर है। इसका ट्राँसफर किसी कारणवश अलवर से उदयपुर कर दिया गया है। लेकिन इसकी माँ सीरियस है। सो ये उदयपुर जाने में असमर्थ है। इसके ट्रांसफर को कैंसिल करना है। इस आशय की एक एप्लीकेशन टाईप कर लाओ जल्दी से।' उन्होंने संक्षिप्त में काम समझाया।
'हाँ' कहते हुए मैंने एक नजर उसको देखा और चल दिया।

थोड़ी ही देर बाद मैंने टाईप्ड़ एप्लीकेशन ला कर त्रिपाठी जी को दे दी। त्रिपाठी जी ने उस पर उसके दस्तखत कराये, कुछ 'रिमार्क' लिखा और अपने पास ही रख लिया। अब उसके चेहरे पर संतोष के भाव थे। त्रिपाठी जी ने उसको घर चलने के लिए कहा, तो उसने माँ की तबियत का हवाला देते हुए असमर्थता जता दी। त्रिपाठी जी ने अधिक जोर नहीं दिया। जाते हुए वो मेरे पास आकर रुके और बोले, 'संदीप, प्रतीक्षा को जरा बस स्टैण्ड तक छोड़ आओगे?'

'हाँ' मैंने हामी भरी।
'नहीं, कोई जरूरत नहीं है इसकी। बेवजह इनको तकलीफ होगी, अंकल'। उसने विरोध किया।
'कोई तकलीफ नहीं होगी, ये तुम्हें बिठा आएगा।' त्रिपाठी जी ने कहा।
वो कुर्सी से उठ खड़ी हुई, 'थैंक्यू अंकल, थैंक्यू वैरी मच फॉर दिस प्रोम्प्ट हैल्प।' त्रिपाठी जी ने उसको सीने से लगा लिया, 'इसमें थैंक्यू की क्या बात है? नीलिमा में और तुम में कोई अन्तर है क्या? मेरे लिए तुम दोनों ही बेटियाँ हो। आराम से जाना, संदीप तुम्हें बिठा देगा। पहुँच का पत्र देना और तेरे बाप को कहना कि कभी कभार एकाध फोन कर लिया करे।' कहते कहते वो उसकी पीठ थपथपाने लगे।

बस के जाने में काफी देर थी अभी, हम एक तरफ बैंच पर बैठ गए। स्थान हालाँकि एकान्त तो नहीं था पर कम भीड़भाड़ वाला अवश्य था। मैंने बैठने के कुछ देर बाद बात शुरू की, 'आपने उस वक्त बताया क्यों नहीं कि आप नगर निगम में जूनियर इंजिनियर हैं और अपना ही ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हैं।'

'ये तो मैंने बताया था ना कि मैं ट्राँसफर कैंसिल करवाने आई हूँ। हाँ, जूनियर इंजिनियर हूँ और अपने ही ट्राँसफर के सिलसिले में आई हूँ, ये जरूर नहीं बताया था मैंने। सो, उससे क्या फर्क पड़ता है?' उसने मुस्कुराते हुए कहा।

'फर्क क्यों नहीं पड़ता? मैं अनजाने में ना जाने क्या-क्या बकता रहा?' मैंने अपनी हथेली को गौर से देखते हुए कहा, शायद उससे नजरें बचाकर। 'ऐसा तो कुछ आपने कहा नहीं, जिससे मैं बुरा मानूँ।' उसने ऐसे लहजे में कहा कि मैं हँस दिया। 'हाँ, कहते तो शायद बुरा मान जाती।' वो भी हँस पड़ी। कैसी निर्मल हँसी? मैं देखता रह गया।

'आपकी माँ की तबियत को क्या हुआ है?' मैंने विषय बदलते हुए पूछा तो वो एकाएक गम्भीर हो गई, बिल्कुल ठहरी हुई झील-सी। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा 'कैंसर ... ब्लड कैंसर है, मम्मी को।' मैं एकदम चौंक पड़ा, 'क्या?'
'जी हाँ, मम्मी को ब्लड़ कैंसर है।' वो बेहद शान्त थी। कौन कह सकता था कि यही लड़की कुछ देर पहले खिलखिलाकर हँस रही थी? मैं, निर्वाक्।

'पापा डॉक्टर हैं, अपने काम में व्यस्त। बड़े भैया अहमदाबाद में रहते हैं, छोटी बहिन पढ़ रही है बीण्एण् में। ऐसे में मम्मी की देखरेख के लिए मेरा वहाँ होना बहुत आवश्यक है इसीलिए त्रिपाठी अंकल से ट्राँसफर कैंसिल करवाने की रिक्वेस्ट की है।' वो मुस्कुराने की कोशिश करती हुई बोली। 'प्रतीक्षा जी, आप वाकई बहुत हिम्मत वाली हैं। हर किसी के वश का नहीं है इतना त्याग।' बरबस ही मेरे मुँह से निकल पड़ा।

'क्यों नहीं है? आप जो हैं, जीते जागते उदाहरण। जो अपने परिवार और परिवार वालों के लिए इतना कष्ट झेल रहे हैं। अपनी भावनाओं का दमन किए हुए हैं। ये क्या कम त्याग है?'
'मैं पुरुष हूँ, प्रतीक्षा जी। मेरी भावनाओं का होना, नहीं होना कुछ खास अर्थ नहीं रखता। आप स्त्री हैं। जीवन की विषमताओं को अकेले सहन कर पाना स्त्री के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होता है, जानती हैं? ऐसे में इतनी पीड़ा अकेले सहना, और वो भी निरूशब्द। वन्दनीय हैं, निस्संदेह।'

'दुःख कभी स्त्री और पुरुष का भेद नहीं करता संदीप जी। मेरा दु:ख ये नहीं है कि मुझे अपनी भावनाओं की कीमत पर अपनी माँ को बचाना है, बल्कि ये है कि मेरा भाई अपनी माँ की कीमत पर अपनी भावनाओं को जिलाए है। क्या उसका कोई फर्ज नहीं था? मैं इसीलिए ही शादी-ब्याह के झंझट में नहीं पड़ना चाहती। क्योंकि, अगर मैं भी पराये घर चली गई तो मेरे माँ-बाप का क्या होगा? बस अनुश्का के हाथ पीले हो जाएँ ... यही मेरी खुशी है ... ' कहते-कहते उसका गला भर आया, ऑंखें नम हो गई।

'प्रतीक्षा ... प्रतीक्षा ... क्या हुआ? ऐसे नहीं करते। सब ठीक हो जाएगा।' मैंने उसे चुप कराने को उसके सिर पर हाथ रखा, उसने चेहरा मेरे कंधे पर टिका दिया। मैंने चुपचाप उसे अपनी बाँहों में सहेज लिया और वो अबोध बच्चे की तरह फफकने लगी। ना जाने वो कितनी देर रोती रही, मैं जड़ बना बैठा रहा।

... उसकी बस जाने वाली थी, वो खिड़की वाली सीट पर बैठी थी। मैं बाहर खड़ा था। दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे। निरूशब्द एक-दूसरे को देख रहे थे। उसकी ऑंखों की नमी में मुझे किसी आश्वासन की चाह तैरती दिखी। मैंने मुस्कुराकर धीरे से पलकें झुकाकर उसे आश्वस्त किया, मानो कह दिया हो कि 'प्रतीक्षा मैं तुम्हारे साथ हूँ।' वो जैसे जी उठी हो। उसने दुपट्टे से ऑंखें पौंछ ली और अनुग्रह भरी निगाहों से मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी। तभी बस चल पड़ी। मैं खड़ा रह गया, बस बढ़ गई। दो हाथ हवा में एक-दूसरे की ओर हिलते रह गये।
(समाप्त)

2 झूठ के सहारे



जब कोई पास नहीं होता तो जाम पास होता है। दिसम्बर की सर्द शामें यूँ भी अकेलापन कहाँ बर्दाश्त कर पाती हैं? बस ग्लास मेज पर सजाकर बैठा ही था कि डोरबेल जोर से घन्ना उठी। उठकर दरवाजा खोला, सामने सक्सेना खड़ा था। देखते ही देखते गले लग गये हम। मैंने हाथ पकड़कर मेज की ओर खेंच लिया 'सक्सेना बड़े सही समय पर आए हो, यार।'

'नहीं। मैं नहीं लूँगा, चौहान।'
'क्यों भाई? काफिर कब से रोजे रखने लगे?' मैं जोर से ठहाका मार कर हँसा। सारा कमरा हिल गया। ठहाका उछल कर जोर से सिर पर आ गिरा। धप्प्। मैं झूम उठा।

'अभी, परसों हैंग ऑवर हो गया था यार। उसी का खुमार अभी तक नहीं उतरा।'
'ऐसा कौन हमप्याला मिल गया मेरे सौदाई को, जिसने हैंग कर डाला?' मैंने पीटर स्कॉच की नई बोतल की सील तोड़ते हुए पूछा।
'नशा शराब का नहीं था दोस्त, सोहबत का था।' वो जरा शरारत से मुस्कुरा दिया। मैंने एक ग्लास उसकी ओर बढाया और 'चियर्स' के साथ दोनों ने धीरे से एक सिप ली।

'किसकी सोहबत फरमा रहे थे जनाब?' मैंने सिगरेट सुलगाकर उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।
'बस पूछ मत, चौहान। महीने के आखिरी शनिवार को तो बस ... ' वो किसी स्वप्नलोक में खोने लगा।
'कहाँ जा रहा है? धरती पर ही रह।' मैंने चुटकी बजाते हुए कहा।
'जन्नत को याद कर रहा था ।'

'क्या बात करता है?'
'तुमको पता है मैंने एक क्लब ज्वॉईन कर रखा है?' उसने बात शुरू की।
'तुम रईसों के पास और काम भी क्या है? रुपया कमाते हो तो उसे ठिकाने तो लगाओगे ही, कहीं ना कहीं।'
'मेरे भाई, उस क्लब में बिजनेसमैन ही नहीं हैं, फौजी अफसर भी हैं। एडवोकेट भी हैं। लेखक भी हैं। यहाँ तक कि प्रोफेसर्स भी हैं।'
'सभी हैं तो पैसे वाले ना?'

'तुम तो एक जगह अटक जाते हो। अच्छा चलो सब पैसे वाले हैं। अब बात तो सुनो' उसने जरा रुक कर एक घूँट खेंचा।
'हाँ, अब बता' मैंने भी गिलास खाली करके सिगरेट थाम लिया और धुँआ उड़ाने लगा। कमरे में धुँए के बादल मँडराने लगे।
'हमारे क्लब की हर महीने के आखिरी शनिवार को एक पार्टी होती है। जहाँ यार लोग अपनी-अपनी बीवियों को लेकर आते हैं और दूसरों की बीवियों को देख-देख कर लार टपकाते रहते हैं। बिवियाँ भी दूसरे मर्दों की निगाहों को हँस-हँस कर पीती हैं, नजरों ही नजरों में। कोई जानबूझकर अपने लो-कट ब्लाऊज पर से साड़ी ढलकाती है, तो कोई बात-बेबात नीचे झुक-झुककर कभी कुछ उठाती है, कभी साड़ी की सलवटें ठीक करती है। कोई इतने टाइट कपड़े पहन कर आती है कि बस कुछ भी देखने के लिए कोशिश ही नहीं करनी पड़ती ... सब कुछ अपने आप ही बाहर झाँकता रहता है।'

'ऐसा क्या?' मेरी ऑंखें फैलने लगी।
'... ये तो कुछ नहीं दोस्त। पिछले दिनों से क्लब में हमने एक नया खेल शुरू किया है। बीवियों की अदला-बदली ... '
'अदला-बदली? किसलिए? डाँस-वाँस के लिए?' मैंने सहजता से पूछा।
'सबकुछ के लिए। शनिवार की पूरी रात के लिए' सक्सेना ने ऑंख मारते हुए कहा। 'क्या?' सुनकर मेरी जान हलक में आ गई।
'नहीं यार। ऐसा कभी होता है?' थूक गटकते हुए मैंने पूछा। मैं अब भी मानने को तैयार नहीं था। मेरे आश्चर्य का ठौर नहीं था।

'होता है? भाई मैंने कई बार खेला है ये खेल।' सक्सेना तरंग में था।
'क्या?'
'हाँ।'
'फिर?' मैंने जल्दी से पैग खत्म किया। उसने भी। नए पैग तैयार कर के हम फिर डट गए।
'शनिवार की रात खूब दारु-शारु, डाँस-वाँस, हो-हल्ला होता है। आखिर में सभी मर्द अपनी-अपनी गाडियों की चाबियाँ एक बड़े बीयर से भरे जग में डाल देते हैं और फिर एक-एक की पत्नी को एक-एक चाबी निकालने को कहा जाता है। जिसके हाथ जिस मर्द की चाबी आ गई, वो रात भर उसके साथ रहेगी ... ' सक्सेना ने चटखारे लेते हुए खेल का महात्म्य समझाया।

'फिर?' मैं हक्का-बक्का था।
'फिर क्या? वही जो रात में मर्द औरत के बीच होता है ... ' वो ऑंखों को गोल-गोल घुमाने लगा।
'क्या भाभी भी जाती है तेरे साथ यह खेल खेलने?' सशंकित-सा मैं असमंजस में था।
'क्यों नहीं?' वो तपाक से बोला।
'उनको कोई आपत्ति नहीं होती?'

'क्यों भला? उसका भी तो भई स्वाद बदल जाता है कि नहीं? घर का खाना खाते-खाते ऊब होती है, तो बाहर खाने जाते हैं या नहीं? बताओ। आखिर कोई औरत कब तक एक ही आदमी को बर्दाश्त कर सकती है? चाहे वो फिर मैं ही क्यों ना हूँ ... ' सक्सेना मुस्कुरा रहा था।
'किन्तु सामाजिक वर्जनाओं का क्या? कैसे रविवार की सुबह तुम एक-दूसरे से नजरें मिला पाते होंगें? एक छत के नीचे कैसे रह पाते होंगें?' मैं ठेठ गँवई आदमी, चकरा गया था। मेरे भीतर के संस्कार अभी भी ये मानने को तैयार नहीं थे।

'एक छत के नीचे कैसे रह सकते हैं? झूठ के सहारे।'
'झूठ के सहारे? कैसे?'

'तुम्हें एक बार का किस्सा सुनाता हूँ। ऐसी ही एक शाम, मेरी पत्नी के हाथ में आई एक टिपिकल बीमा एजेन्ट की चाबी। भारी भरकम कमीशन खाने वाला मालदार बीमा एजेन्ट और हमारी चाबी पहुँच गई एक बैंक मैनेजर की पत्नी के हाथ में। गजब की साँचे में ढली काया वाली मैनेजरनी, खुद भी कहीं नौकरी करती थी। बड़ा उत्तेजक माहौल था। हर कोई अलमस्त और बहका हुआ था। उस वक्त हम भी उत्तेजना में ऐसे डूबे थे मिसेज मैनेजर की कलाई पकड़कर, कि हमें होश ही नहीं था कि हमारी स्वयं की पत्नी का क्या हुआ? किधर गई? और चौहान, सच यार ... ' सक्सेना ने मेरी उत्सुकता को भाँपते हुए थोड़ा रुक कर फिर कहना शुरू किया '... बड़ी मादक रात थी वो मैनेजरनी क्या थी? बस बला थी। ऐसा संगमरमरी जिस्म ... मैंने पहले कभी नहीं देखा था। इतना चिकना और शफ्फाक बदन, ऐसी नपीतुली गोलाईयाँ ... ऐसा सपाट पेट ... इतने मासूम और पतले होंठ ... इतनी गहरी काली जुल्फें कि बस पूछ मत यार। लग रहा था, मानो सितारे टूट-टूट कर मेरे चारों ओर गिर रहे हैं। शी वाज वेरी मच कोआपरेटिव लेडी ... दोनों ही मानों कई जन्मों के प्यासे थे ... '

'फिर?' मेरा हलक सूख गया था, मैंने थोड़ा-सा थूक निगला और फिर एकटक सक्सेना का मुँह ताकने लगा।
'... दूसरा दिन, रविवार का दिन। मैं सोया पड़ा था। उधर हमारी पत्नी की पलकें भी नींद से भारी थी, शायद रात भर वो भी जगती रही। करीब साढ़े दस बजे हाथ में चाय का प्याला लेकर, वो मेरे पास आई और बड़े प्यार से सिर पर हाथ फिरा कर मुझे जगाने लगी। मैं थोड़ी देर की ना नुकुर के बाद उठा और चाय पीने लगा। अभी दो एक घूँट ही ली थी कि पत्नी ने मुस्कुराते हुए व्यंग्य बाण छोड़ दिया, 'कैसी रही कल की रात? क्या-क्या हुआ?'

बड़ा संवेदनशील प्रश्न पूछ बैठी पत्नी सुबह ही सुबह। मैं सोच में पड़ गया, 'क्या जवाब दूँ?' फिर अचानक खेंचकर पत्नी को बिस्तर पर भींच लिया और तड़ाक से एक चुम्बन जड़ दिया 'जाने भी दो रात की बात को। रात गई बात गई।'

'टालते क्यों हैं? बताओ ना।' बीवी ने मचलते हुए अपने को मेरी बाहों में लटका दिया। मेरी रात की स्मृति एकाएक ताजा होकर मस्तिष्क में जाग उठी। सफेद मखमल की सैर ... वाह! किन्तु मैंने जाहिर ना करते हुए तुरन्त रुख बदला, 'अब आगे से हम इस तरह के बेहूदा खेल में शरीक नहीं होंगें डॉर्लिंग।'

'पर उस मैनेजरनी के हाथ में अपनी चाबी आई देखकर तो उछल पड़े थे तुम। मानो कई जन्मों के भूखे को छत्तीस पकवान एक साथ दिख गए हों ... गजब की सैक्सी थी ना वो ... मन-मन भावै मुँडी हिलावै ... बेहूदा खेल में शरीक नहीं होंगें!' पत्नी ने मुँह बनाते हुए मेरा मखौल उड़ाया।
'लेकिन ये सच नहीं है, सविता।'

'जो सच है, वही कह रही हूँ। कैसे भूखे भेड़िये की तरह होठों पर जीभ फिरा रहे थे तुम उस समय?'
'क्यों तिल का ताड़ बना रही हो? पिनक में थे सब। माहौल में मस्ती थी। हम क्या अकेले थे? और सच कहूँ सवि, अजीब औरत थी, वो मैनेजरनी। दिखने की ही चमक दमक थी उसमें। मुँह से तो ऐसी बांस मार रही थी, मानो गटर का ढक्कन खुल गया हो।' मैंने सफाई देनी चाही।

'किसको बेवकूफ बना रहे हो तुम? मैं सब जानती हूँ, जैसे तुम हो। अच्छा चलो, मुँह से बदबू आ रही थी, बाकी का शरीर तो खुशबूदार था कि नहीं?' पत्नी ने पतली गली में पकड़ लिया था हमें।
मैंने फिर पलटी मारी, पत्नी के गालों को सहलाते हुए बोला, 'सवि, सच मानों, तुम्हें लगा होगा कि वो गजब की 'सैक्सी' थी। मुझे तो जरा भी नहीं लगी। लाख लीपापोती कर ले कोई, लोकट ब्लाऊज पहन ले या कुछ भी ना पहने ... तो भी तुम जैसी मासूमियत कहाँ से लाती भला वो? जैसी सहज, सुघड़, सुरुचिपूर्ण तुम हो, वो कतई नहीं थी। कोई भी औरत नहीं हो सकती।'

'सच?' पत्नी आत्मप्रशंसा सुनकर मुग्ध हो गई। तीर सही निशाने पर लगा था।
'बिल्कुल सच' मैंने पुनः एक चुम्बन जड़ दिया उसके होंठों पर। स्मृति में पुनः पँखुडियों से 'वो' दो होंठ हिल उठे।
'तो, क्या तुमने कुछ नहीं किया रात भर?' ...'ना' ...'फिर रात कैसे कटी?' वो भी शातिर खिलाड़िन थी। खोद-खोद कर पूछ रही थी। पर हम भी तो कुछ कम नहीं थे।

'इधर-उधर की बातें करते रहे। वो अपने लैक्चरशिप के अनुभव सुनाती रही ... मैं अपने सैल्समैनशिप के। बहुत बोलती थी वो ... '
'कुछ नहीं किया? पकड़ा-धकड़ी? किस-विस? नोंच-खसोंट?'
'तुम्हारे सिवा किसी और को छू भी लूँ, ऐसा गिरा हुआ मैं नहीं। मेरी हिम्मत भी नहीं, तुम तो जानती हो।'
' ... झूंठ ... '

'तुम्हारी कसम, सच।'
'रखो मेरे सिर पर हाथ ... '
'लो' मैंने धप्प् से उसके सिर पर हाथ रख दिया। उसके चेहरे पर अब संतोष की झलक थी। मैंने भी चैन की साँस ली।
'मेरे बारे में तो तसल्ली कर ली तुमने, जरा अपनी भी तो बताओ। बीमा एजेन्ट के साथ खूब मौज मस्ती मारी होगी। क्यों? कहाँ ले गया था, तुम्हें?' अब मेरी बारी थी और पत्नी फँस गई थी।

'कैसा उल्लू का पट्ठा था, क्या बताऊँ? जानते हो उसने पहले ही से एक होटल में कमरा बुक करवा रखा था। मैं तो बिल्कुल डरी हुई थी। कमरे में पाँव धरते ही जैसे मानो पावों के नीचे से जमीन खिसक गई हो। जगमग करते कमरे में बैड़ के पास शराब की बोतलें रखी थी और सिगरेट के पैकेट पड़े थे। मैं तो मन ही मन भगवान को याद करने लगी। भगवान ने तुरन्त मंत्र दिया, 'इसकी पत्नी के बारे में बात करो।' वही किया। बैठते ही उसकी पत्नी का जिक्र छेड़ बैठी, मानो किसी ताजा घाव में उंगली घुसेड दी हो। कैसे-कैसे पत्नी उसे परेशान करती है? सब बखान करने लगा। रोता जाए, पीता जाए। पीता जाए, रोता जाए ... बस पीते-पीते और रोते-रोते कब लुढ़क गया, कुछ पता ही नहीं चला और मैं पौ फटते ही टैक्सी ले यहाँ चली आई, तुम्हारे पास।' ...मैं सब ताड़ रहा था। जैसा सच मेरा, वैसा सच उसका। खैर, मैंने चुटकी ली, 'फिर तो तुम भी मेरी बुराईयाँ गिना गिना कर रोने लगी होगी। क्यों?'

'ऐसी लगती हूँ मैं तुम्हें?' वो जरा-सा नाराज हो गई।
'तुम तो ऐसी नहीं लगती। पर वो साला बीमे वाला इतना शरीफ नहीं लगता मुझे, जो हाथ में आए शिकार को छोड़ दे, रोने-धोने में।'
'तुम्हारी कसम डार्लिंग। कुछ भी तो नहीं किया उस बीमा एजेण्ट ने और अगर करना भी चाहता तो तुम क्या सोचते हो, मैं करने देती? भारतीय नारी हूँ ... जान दे दूँगी पर आंचल नहीं सरकने दूँगी, किसी के सामने ...-'

'पर तुम्हारे हाथ में अपनी चाबी आ गई जानकर कैसे लपक कर तुम्हारी कमर में हाथ डालकर अपनी ओर खेंच लिया था उसने। तुम भी तब शरमाकर मुस्कुराई थी। कहो। नहीं?'

'हाँ ... लेकिन यकीन मानो इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ ... '
'तुम्हारे जिस्म के पेचोखम नहीं देखे उसने? तुम्हारी ऑंखों के सुर्ख डोरे तो चुगली कर रहे हैं कि रात भर बड़ी तेज ऑंधी में खड़ी रही हो ऑंखें फाड़े ... ये गंदुमी गुदाज जिस्म उस साले के नीचे से यूँ ही सरक आया हो, यकीं नहीं आता ... ' मैं मुस्कुरा रहा था।
'कैसी बातें करते हो तुम?' वो नजरें मिलाने से कतरा रही थी। 'दो जवान बदन रात भर एक कमरे में, एक बिस्तर पर रहें और बिस्तर पर सिलवटें तक ना आई हों ... मैं नहीं मान सकता।'

'छिरू कैसी बातें करते हो अपनी पत्नी से। शर्म नहीं आती तुम्हें। तुम्हारे अलावा किसी ओर के बारे में सोच भी नहीं सकती मैं। और तुम हो कि ... ' इस बार पत्नी रूँआसी हो गई।
'इसका मतलब जनाब केवल रोते रहे और पीते रहे, पीते रहे और रोते रहे ... बस।'
'हाँ ... ' उसने जोर देकर कहा।
'खाओ मेरी कसम ... ' उसने भी धप्प से अपना हाथ मेरे सिर पर रख दिया। पूरा माहौल मानो व्यंग्य से मुस्कुराने लगा। और हम दोनों आलिंगनबध्द हो गए। ... पूरा कमरा घूमने लगा।

'मैंने कसम तो उठवा ली थी चौहान, पर मैं जानता था कि वो भी मेरी तरह झूठी कसम खा रही थी। तन्हाई, जो गुनाहों की हिम्मत बढाती है। कितनी देर पत्नी को 'स्त्री' होने से रोक सकी होगी। जब मैं ही पत्नीव्रत नहीं निभा पाया, तो वो कब तक पतिव्रत निभा पाई होगी? बदला हुआ जायका किसको बुरा लगता है? और फिर एक पंचसितारा होटल के तन्हा अकेले कमरे में एक मर्द के साथ सारी रात सत्यनारायण की कथा तो सुनी नहीं जा सकती ... क्यों?' कहकर सक्सेना ने जोर का ठहाका लगाया और एक ही घूँट में पूरा पैग गटक गया। मैं उसके मुँह की तरफ देखता रह गया, अवाक्।
(समाप्त)

3 कब तक आखिर


'नवाब लेन ... चलोगे?' एक रिक्शेवाले से पूछा।
'चलेंगे बाबू ... बैठो' कहकर रिक्शेवाले ने अपने मैले-कुचैले गमछे से रिक्शे की सीट पौंछी और जोर से सीट पर हाथ मार कर बैठने का ईशारा किया। मैं एक हाथ से अपनी धोती सम्हालते हुए सावधानी से रिक्शे में बैठ गया। रिक्शेवाले ने उसी गमछे से माथे का पसीना पौंछा और जुट गया अपने काम में। आदमी ढोने का काम। मेरे दाँये हाथ की अंगुलियों ने कँधे पर लटके थैले में रखे डब्बे को कस कर पकड़ रखा था।

मैं अजीब कौतूहल से सड़क के दोनों ओर गर्दन घुमा-घुमा कर देख रहा था। हालाँकि यह कलकत्ता मेरा बखूबी देखा भाला था। किन्तु हर बार इस शहर में एक नयापन लगता है। हर बार पहले से अधिक जीवन्त, अधिक तेज रफ्तार प्रतीत होता है।

रिक्शा मुख्य सड़क से उतर कर अब एक संकरे रास्ते पर चला जा रहा था। रास्ते में एक ओर कुछ औरतें टोकरों में मछलियाँ लिए बैठी थी। ग्राहक मछलियों के मोल भाव कर रहे थे। कुछ ग्राहक सिर्फ मछली वाली के ऑंचल में झाँक लेने की गरज से झुक कर नाहक ही मछलियों को उलट-पलट कर देख रहे थे। गंदुमी त्वचा, किन्तु गठीले बदन वाली एक पाट की धोती कमर में बैठी वो औरतें अपनी उघड़ी हुई पिंडलियों पर चिपकी, ग्राहकों की बेधती नजरों से बेखबर मछली तोलने और पैसे लेने में व्यस्त थी और ग्राहक अपने 'काम' में। मैं ये सब देखकर मुस्कुरा दिया। इतने में रिक्शा उस छोटे से मछली बाजार को पीछे छोड़कर आगे निकल चुका था।

अब मार्ग में अधिक चहल-पहल नहीं थी। रिक्शा तेज रफ्तार से चल रहा था। मैंने अब भी थैले में रखे डिब्बे को कसकर पकड़ा हुआ था। अचानक मैंने गौर किया कि ये तो वह रास्ता नहीं है जो हवेली को जाता है। 'अरे भाई इधर कहाँ लिए जा रहे हो? नवाब लेन का ये कौन सा रास्ता है? बताओ तो।' मन के विचार मुँह से निकल पड़े। 'बाबू, मेन रास्ते पर सड़क मरम्मत हो रही है सो हम आपको इधर से ले आये हैं। रास्ता लम्बा जरूर है लेकिन पहुँचेगा नवाब लेन ही। आप चिन्ता ना करें। आप हमें किराया उसी छोटे रास्ते का दे दीजिएगा।' हाँफते हुए पैड़ल मारता रिक्शाचालक बोला। हालाँकि उसके जवाब से आंशिक संतुष्टि तो हो गई थी, फिर भी एक धड़का-सा था हृदय में। 'किसी की अमानत, वो भी बेटी के ब्याह का गहना लेकर जा रहा हूँ मैं, कुछ ऊँच-नीच हो जाये तो सेठ जी की इज्जत का क्या होगा? क्या जाने रिक्शा वाले की नियत कैसी हो? मन किसने देखा है? सोच रहा था कि अपनी तसल्ली के लिए पास से गुजर रहे एक आदमी से पूछा 'सुनिए साहब, क्या नवाब लेन को यही रास्ता जायेगा।' 'जी हाँ' कहकर वह आगे बढ़ गया। रिक्शेवाले ने पलट कर देखा और अर्थपूर्वक मुस्कुरा दिया, शायद वह मेरी मनोदशा भाँप गया था। मैं स्वयं में बहुत शर्मिन्दा हुआ और सिर घुमाकर सड़क के एक ओर देखने लगा।

पिछली बार जब जमीन के कागजों पर सेठ जी के दस्तखत लेने कलकत्ता आया था तब उनके यहाँ दो व्यक्ति बैठे थे। एक तो बूढ़ा था। जिसके चेहरे पर गजब की चमक थी। सफेद धोती कमीज शरीर पर, सिर पर काली महाजनी टोपी, पाँव में चमड़े के जूते और हाथ में बेंत लिए वह, सेठजी से कोई गम्भीर चर्चा कर रहा था। बगल में एक सुदर्शन युवक बैठा था। काली पतलून सफेद कमीज, करीने से कंॅघी किये गये बाल और सीधा सादा खानदानी प्रतीत होने वाला युवक जो जमाने की हवा से अभी तक अनछुआ था। गर्दन झुकाए बेवजह अपनी अंगुलियों' की अकड़न निकाल रहा था। बीच-बीच में नजर उठाकर सामने के बरामदे में खुलने वाले कमरे के दरवाजे की ओर भी देख लेता था और तुरन्त संकोच से दृष्टि झुका लेता था। वहाँ सत्या काँधे पर ऑंचल डाले इस तरह छुप कर खड़ी बातें सुन रही थी मानो उसे कोई ना देख रहा हो। लेकिन वह युवक उसे देख रहा है, वो नहीं जानती थी। 'तो फिर तय रहा कांतिलाल जी, हमें यह सम्बन्ध मँजूर है। अब आप उस बात का ध्यान रखना। वैसे आप खुद भी खानदानी हैं, समझदार हैं।' वृध्द ने उठते हुए कहा। उधर सत्या और युवक की ऑंखें मिली तो सत्या शरमाकर ऊपर दौड़ गई। सेठजी और वह युवक भी खड़े हो गये। सेठजी ने वृध्द का हाथ अपने हाथों में लेते हुए विनम्र लहजे में कहा 'घोषाल बाबू, वैसे तो लड़की वाले कभी भी वरपक्ष की बराबरी नहीं कर सकते ... सम्भव भी नहीं है, किन्तु आपकी इज्जत का पूरा ख्याल रखने का प्रयास करूँगा।'

'अरे सेठ जी कैसी बातें करते हैं आप? सेठ कान्तिलाल के मुँह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। आपको रुपये पैसे की क्या कमी? आप तो कई शादियाँ एक साथ कर दें और साँस तक ना निकालें।' हँसकर घोषाल बाबू ने कहा।

'ये तो आपका बड़प्पन है। वरना, अब वो पहले वाली बात कहाँ रही है, घोषाल बाबू? हाँ, जमींदारी के वहम से पुरानी शानोशौकत जिन्दा है, बस।' एक लम्बी साँस निकल पड़ी सेठ जी के मुँह से।
'अरे जाने दीजिए साहब ... बेटा अजीत ... सेठ जी के पाँव छुओ ये तुम्हारे होने वाले ससुर हैं।' घोषाल बाबू ने बेटे के कंॅधे पर हाथ रखते हुए कहा। बेटे ने बढ़कर चरण छुए और सेठजी ने आशीर्वाद में अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रख दिये।
उनको बाहर तक विदाकर के लौटे तो निढाल होकर सोफे पर गिर पड़े। मैं पास ही बैठा उन कागजों को छाँटकर अलग कर रहा था जिन पर सेठजी के दस्तखत लेने थे। उनको इस तरह निढाल होकर गिरते देखा तो उठ कर दौड़ पड़ा।

'क्या बात है मालिक, क्या हुआ?'
'कुछ नहीं अखिलेश बाबू ... यूँ ही। ... सत्या का ब्याह करना है। ... खरीदना है लड़का ... ' कहते हुए सम्हल कर सेठ जी बैठे। मैंने बढ़कर उनकी कमर के नीचे तकिया लगा दिया।
'आप चिन्ता क्यों करते हैं सेठ जी ... भगवान ने चाहा तो सत्या बेटी राजी-खुशी परायी हो जायेगी ... फिर जमींदारी तो है ... ब्याह की चिन्ता आप क्यों करते हैं?'

'अखिलेश बाबू ... आप तो असलियत जानते हैं ... फिर क्यों सब लोगों जैसी बातें करते हैं? आप जानते हैं कि उस जमींदारी के भरोसे रहा तो हो चुकी सत्या अपने घरबार की। कुछ एकड़ बंजर जमीन को आप जमींदारी कहते हैं?' सेठजी का लहजा दीन और परेशान था।

'आपने कितने ही लोगों पर अहसान कर रखे हैं। कितनों ही की लड़कियों के ब्याह में दान-दहेज दे चुके हैं। कितनों ही के लगान माफ कर चुके हैं। क्या वो सभी इस आड़े वक्त हमारे काम नहीं आयेंगें? आप तो नाहक ही चिन्तित होते हैं। हौसला रखें भगवान भला ही करेंगें।' कहकर मैं वापस मुड़कर जाने को हुआ कि लौटकर धीमे से पूछा, 'कुछ कागजों पर दस्तखत करने थे, अभी ... या बाद में?'ए 'लाओ अभी क्या और बाद क्या? अब तो सिर्फ दस्तखत करने तक ही की जमींदारी बाकी रह गई है।' मैंने चुपचाप लाकर कागज उनके सामने की मेज पर रख दिये और उन्होंने चुपचाप सभी पर अपने हस्ताक्षर कर दिये। मैं कागज समेट कर कमरे से बाहर चला गया।
'सच तो है, अब कैसी जमीन और कैसी जमींदारी? बंजर जमीन और भूखे काश्तकार क्या दे पाते हैं? जिसके भरोसे बेटी ब्याहने का हौसला किया जा सके। और 'अच्छे' लड़के आजकल सस्ते कहाँ? बिना माँ की बच्ची को पालने में वैसे ही आदमी पूरा हो जाता है, उस पर उसके ब्याह की चिन्ता। सयानी बेटी को ज्यादा दिन घर बिठाया भी तो नहीं जा सकता। फरिश्ता समान आदमी हैं, सेठजी। कभी काश्तकारों, जुलाहों पर सख्ती नहीं की। जब तक पास में रुपया रहा, जरूरतमँदों को हाथ भर-भर के देते रहे और आज वही दाता खुद इस सलीके में है कि बेटी को कैसे डोली चढ़ाये? उस पर झूठी शानोशौकत के रहते सामने वालों की ना बुझने वाली भूख-प्यास, सो अलग। भगवान जो भी करे लेकिन सत्या को सही सलामत इज्जत सहित ब्याही जाने दे।' सोचता हुआ मैं अपने कमरे में आ पहुँचा। चश्मा उतारकर एक ओर रखा और धोती के छोर से पसीना पौंछते हुए चारपाई पर लेट गया। कुछ ही देर हुई थी कि सत्या कमरे में आई 'दादा ... बाऊजी बुला रहे हैं।'ए 'चलो मैं आता हूँ' मैंने उठते हुए कहा और चश्मा लेने को मेज की ओर गया। लेकिन वो अभी तक खड़ी थी। 'चलो सत्या ... क्या है, कुछ कहना है?' सुनते ही सत्या मुझसे लिपट गई और रोने लगी। 'अरे पगली रोती क्यों है? ब्याह करवाकर पराये घर तो एक दिन सभी को जाना होता है? इसमें रोने की क्या बात है? और मैं जो हूँ, बाऊजी की चिन्ता ना कर ... तू तो अपना घर बसा।' मैंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। 'दादा ... मैं ये शादी नहीं करूँगी ... ' 'क्या कहती हो सत्या ... क्यों नहीं करोगी ये शादी ... कोई और है, जिससे तुम? ... ' 'नहीं दादा ... ऐसी बात नहीं है ... लेकिन ... मैं अपनी शादी के लिए बाऊजी की इज्जत नीलाम होते नहीं देख सकती। इससे तो अच्छा होता, मैं मर जाती। कम से कम बाप की इज्जत खाक में मिलने का कारण तो ना बनती।' वो सुबकने लगी थी। 'पागल हुई है क्या ... किसने ऑंख उठायी बाऊजी की इज्जत पर? बताओ। और गृहस्थ में तेजी-मंदी तो चलती रहती है। इसके लिए तुझे रो-रोकर हलकान करने की क्या पड़ी है? पागल कहीं की' सत्या को हिचकियाँ आने लगी थी। हिचकियों के बीच जब उसने कहा, 'हवेली गिरवीं' तो सुनकर मुझे धक्का-सा लगा। 'चलो ... तुम भीतर जाओ मैं देखता हूँ। कुछ बेजा हरकत की तो मुझसे बुरा मत जानना। बाऊजी को दुख होगा।' कहता हुआ मैं तेज कदमों से बैठक की ओर बढ़ा। सत्या ऑंसू पोंछती हुई भीतर चली गई।

बैठक में सेठजी के पास दो महाजन बैठे थे। मैं चुपचाप जाकर सेठजी के पास खड़ा हो गया। सेठजी ने कलम मेरी ओर बढ़ाते हुए कहा 'अखिलेश बाबू ... गवाह की जगह दस्तखत कर दीजिए' मैंने सवालिया दृष्टि उनकी ओर घुमायी तो उन्होंने धीरे से मेरा हाथ छू लिया और हौले से पहलें झुकाकर उठाली। उन ऑंखों में मजबूरी तैर रही थी। मैंने चुपचाप कागज पर हस्ताक्षर कर दिये। महाजन एक छोटी सी संदूकची वहीं छोड़कर उठ गये। मैं उन्हें बाहर तक छोड़ने गया और लौटते हुए वहीं से अपने कमरे की ओर मुड़ने लगा कि सेठजी ने आवाज दी, 'अखिलेश ... यहाँ आओ।' मैं चुपचाप उनके पास आ गया,

'हाँ' 'नाराज हो हवेली के सौदे से? ... लेकिन और कोई रास्ता नजर नहीं आया।'
'हम कहीं ओर से इन्तजाम कर सकते थे ण्ण् हवेली गिरवी रखने की क्या जरूरत थी?' मैंने तनिक ऊँचे स्वर में, किन्तु अपनापे के साथ कहा। 'देखो बेटा ... जो आदमी उम्र भर दोनों हाथों से देता ही रहा हो ना, उसका हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता और यकीनन फैला हुआ वो हाथ खाली ही लौटता है। क्योंकि कुछ लोग तो नजर चुरा लेते हैं और कुछ ये सोचते हैं कि इतना बड़ा रईस ... माँग रहा है? अजी जाने दीजिए मजाक की होगी। इज्जत पर परदा पड़ा रहे ... बेटी ब्याही जाये ... तो हवेली क्या चीज है ... ?' कहते हुए उनकी ऑंखों से दो ऑंसू टप्प से टपक पड़े। मेरी भी ऑंखें नम हो आयी।

संदूकची खोलकर दो तीन रुपयों के बंडल दोनों हाथों से मुझे थमाते हुए बोले, 'अखिलेश ... बेटा तुम मेरे मातहत ही नहीं हो ... सत्या के बड़े भाई भी हो। सारा इंतजाम तुम्हें ही देखना है। जो मुनासिब समझो खानदान की इज्जत को देखते हुए, सत्या के लिए गहने खरीद लाओ ... और ये बाकी के रुपये भी अपने पास रखो ... सभी कुछ तुम्हें ही करना है ... वैसे भी बाप ना रहे तो बेटा ही बहन को डोली में विदा करता है ... मुझे हुआ ना हुआ ... बराबर ही मानो।' आवाज में असीम निराशा और दुरूख था। मैं घुटनों के बल गिर पड़ा। मुझ अनाथ को आज पहली बार इतना स्नेह एक साथ मिला था कि ऑंखों में समा नहीं पा रहा था। कदमों में सिर टिका कर रो पड़ा 'बाऊजी ... बाऊजी' और सेठजी ने मेरे सिर पर अपना हाथ रख दिया।

'बाबू ... बाबू आपका ठिकाना आ गया।' जैसे किसी ने सोते से जगा दिया हो। मैं रिक्शे से उतरा और किराया चुकाकर घर की ओर बढ़ा 'क्या बात है ...? कल शादी है ... ना कोई रंगरोगन ... ना रोशनी ... ना साज सजावट ... ना चहल पहल ... कुछ अनहोनी ना हो गई हो मेरे पीछे? ... सत्या ना कुछ कर बैठी हो ... सेठजी को ना कुछ हो गया हो? ... ' अनिष्ट की आशंका ने कदमों की रफ्तार तेज कर दी थी। भीतर गया तो बैठक में जमीन पर सत्या गुमसुम सी घुटनों पर सिर टिकाये बैठी थी। पास ही जरूरत का कुछ सामान एक पोटली में बँधा रखा था। मेरा दिल धक्क से करके रह गया। कदमों की आहट सुनकर सत्या ने नजर उठाकर देखा। सामने मुझे पाकर दौड पड़ी और लिपट कर बिलख-बिलखकर रोने लगी। मेरे हाथों से जेवरों वाला थैला छूटकर जमीन पर गिर पड़ा। सारे शरीर को जैसे काठ मार गया था। ना कुछ कहते बनता था और ना ही सत्या को चुपकर पाने की कोशिश कर रहा था। कुछ देर बाद सत्या के ऑंसू मेरी कमीज पर गिरे और एक अनाथ बेटी के असीम दुख की तपत मेरे सीने से छुयी तो मुझे मेरे होने का अहसास हुआ। मैं चौंक कर नींद से उठा, मानो।

'सत्या ... कब हुआ ये सब?' धीमे से पूछा मैंने।
'आप गये, उसके दूसरे दिन ... वो दरिन्दे फिर आये थे। कहने लगे इतने दान-दहेज से क्या होगा ... रकम थोड़ी और बढ़ाइये ... बाऊजी की उनसे काफी जिद्द-बहस हुई ... अन्त में वो रिश्ता तोड़ कर चले गये ... बाऊजी की तो जैसे जीवन डोर ही तोड गये वो नीच ण्ण् सारा दिन बाऊजी बैचेन रहे, और ... उसी रात उनके दिल की धड़कन बन्द हो गयी।' सत्या फूट-फूटकर रो रही थी। मेरी ऑंखें भी बहने लगी थी। 'दादा ... कल वो महाजन भी आये थे ... कहने लगे दो चार दिन में हवेली खाली कर देना ... अब हवेली के तिनके-तिनके पर हमारा अख्तियार है ... मैं कहाँ जाऊंगी दादा? ... मैं भी क्यों ना मर गई? ... ये सारी मुसीबत मेरे कारण ही तो है ... ' हिचकियाँ बँध गई थी सत्या की।

'कहाँ जाऊँगी, मतलब? क्या तेरे दादा का घर तेरा नहीं है ... क्या बाऊजी मुझे अपना बेटा नहीं मानते थे? अब जो हो गया सो भूल जा ... सामान उठा ... हम आज ही इस जलील शहर को छोड़ जायेंगें, जहाँ बेटों के मोल तय करते-करते लोग बेटियों को अनाथ कर देते हों। जहाँ बूढ़े लाचार बाप को अपनी इज्जत तक दहेज में दे देने को मजबूर कर दिया जाता हो। जहाँ रुपये के लिए किसी कुँआरी के अरमानों का कत्ल कर दिया जाता हो। ऐसी कत्लगाह में हम और नहीं रहेंगें। ... बिल्कुल नहीं रहेंगें ... आज ही चले जायेंगें ... अभी और इसी वक्त।'

सत्या मेरे सीने से मुँह सटाये थी। उसकी बगल में एक छोटी-सी गठरी थी। ऑंसू अब भी बह रहे थे। कदमों में मौत की सी उदासी थी। हम दोनों धीरे-धीरे बाहर की ओर जा रहे थे। मुडकर एक बार हवेली, बैठक, वो सोफा जिस पर अन्तिम बार सेठ जी को बैठे देखा था, सब कुछ देखा और सब कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ गये। मेरा एक हाथ सत्या के सिर को अपनी सीने पर सम्हाले सहला रहा था। उसकी हिचकियाँ धीरे-धीरे धीमी हो गयी थी। पर उसके अन्दर का दर्द तीव्र होता जा रहा था, ऑंखों के डोरे सुर्ख हो चले थे और गालों पर ऑंसुओं की सूखी लकीरों से दहेज की दरिन्दगी टपक रही थी, बेहिसाब, लगातार।

(समाप्त)

4 कंबल



दिसम्बर का महीना, कड़ाके की सर्दी, और फुटपाथ पर रहने वालों का दर्द। सब कुछ मानों एक-दूसरे से जुड़ा हुआ आता है, कलैण्डर में। हर साल की तरह आती हैं सर्दियाँ और हर बार हमें अपना कद चादर से बड़ा होने की पीड़ा महसूस होने लगती है। घुटनों को कलेजे से लगाकर खुद को चादर में समेटे पड़े रहना और राम-राम करके उजाला हो जाने की आस करना कैसा पीड़ादायक होता है? कोई हमसे पूछे। तिस पर आए दिन पुलिस के डण्डे और मवालियों की वसूली। दो वक्त पेट में कुछ डालने भर को कुछ नहीं बचता पास में। भीख माँगना, जूता पॉलिश करना या पॉलीथीन बीनते फिरना। ये दो तीन ही रोजगार हम लोगों की नियति हैं। भीख माँगने को आसान समझने वाले पॉलीथीन बीनना नहीं स्वीकारते और पॉलीथीन झडका-झडका के उठाने वाले, भीख माँग कर जलील नहीं होना चाहते। बहरहाल मैं ना भीख माँगता हूँ, ना पॉलीथीन बीनता हूँ, मैं अपनी पोर्टेबल सन्दूकची उठाकर घूमता हूँ, बूट-पॉलिश करने को। सबके अपने-अपने तर्क हैं, सबकी अपनी-अपनी पसंद। लेकिन एक बात जो सबमें एक-सी है, वो है कृ जाड़े की रातों में कहर को झेलना, नंगे बदन।

फुटपाथ के जिस टुकड़े पर मेरा आधिपत्य है, उसी के बगल में राधे रहता है और अगल में भीखू। राधे अकेला है, भीखू के बाल-बच्चे हैं। भीखू की घरवाली और दो बच्चे पॉलीथीन बीनते हैं और भीखू भीख माँगता है। भीखू की औरत मैलेकुचैले कपड़ों में जैसे-तैसे अपने नारीत्व को ढके रखने की कोशिश करती है। पर बच्चे अधनंगे ही रहने को मजबूर हैं। जाड़े की रात को एक फटे से कंबल में चार जने एक-दूसरे में जकड़ कर जैसे तैसे काटते हैं। राधे और मैं दोनों ही बूट पॉलिश करते हैं। कभी-कभी अच्छी ग्राहकी हो जाती है तो रात को एक-एक थैली भी पी लेते हैं। उस रात, ठण्ड थोड़ी कम लगती है। पर एसी रातें महीने में एकाध ही होती हैं। वरना, ज्यादातर तो खाने के ही लाले पड़े होते हैं और भूखे पेट रात भर कुकुड़-कुकुड़ करते रहना पड़ता है।

एक दिन सुबह-सुबह देखा नगरपालिका के सफाई कर्मचारी हाथ में बड़े-बड़े झाडू लेकर हमारी ओर बढ़े आ रहे हैं। साथ में दो तीन पुलिसिए भी थे। हम कुछ समझ पाते उससे पहले ही उनमें से एक मुच्छड़-से आदमी ने जोर से हाँक लगाई, 'ए! हटो यहाँ से ... उठाओ अपने टीन-टप्पर ...-' मुच्छड आदमी शायद दारोगा था।
लोग अपना-अपना सामान सट्टा समेटने लगे। अचानक वहाँ भगदड़-सी मच गई। अफरा-तफरी में लोग अपना सामान लेकर इधर-उधर तितर-बितर होने लगे। किसी ने भी ये नहीं पूछा कि 'क्यों?' झाडूवाले जोर-जोर से झाडुएँ फटकारने लगे और फुटपाथ पर धूल के गुबार उठने लगे। फुटपाथ पर रहने वाले कुछ लोग तो भाग गए। मगर ज्यादातर ने गोर्मेण्ट हॉस्टल के पिछवाड़े वाली दीवार के सहारे-सहारे अपना सामान टिका दिया और झुण्ड में बैठ कर फुटपाथ की सफाई का नजारा देखने लगे।

श्रवण बोला, 'साले, सुबह पैले आ गए, इनकी माँ की ... '
'जरूर कोई लीडर-शीडर आ रहा होगा, आज।' राधे ने जोड़ा।
'लीडर यहाँ फुटपाथ पर क्या मराने आएगा, ठण्ड में?' मैंने चाय का कुल्लड़ एक ओर लुढ़काते हुए पुकारा। सब जोर से हँस पड़े। ठहाका सुनकर एकबार तो सफाई कर्मचारियों ने झाडू रोक कर हमारी ओर देखा और हमें खीसें निपोरते देख फिर झाडू फटकारने लगे। हम फिर एकबार जोर से ठहाका लगा उठे।

'यार, गोपी एक बात बता। ये सुसरे सफाई करन लाग रहे। कंबल-कुंबल क्यों ना बंटवाते मादरजात? जाड़े में ... ऐसी-तैसी हुई पड़ी हम सबन की' देवा ने मुझसे पूछा।
'देख भई देवा, ये लीड़र साले दिन में गुजरते हैं इन रास्तों से। रात में साले लगे पड़े होते हैं, रजाइयों में। रात में कभी आएँ साले, तो पता चले। हलक में साँस ना जम जाए तो कहना।'

'सुनो-सुनो ... गोपी चाचा ... सुनो तो।' भीखू का लड़का हाँफता हुआ आया। बटन टूटी कमीज, बगैर चड्डी-हाफपैण्ट के वो अजीब सा लग रहा था। उसके हाथ, पैर, मुँह, घुटने पर मैल की मोटी परत चढ़ी थी। लड़का चूँकि सुबह की तेज हवाओं में दौड़ कर आया था। सो उसकी ऑंख और नाक दोनों अनवरत बह रहे थे। उसने कमीज की बाँह से ऑंख, नाक एक साथ पौंछे और बताने लगा, 'चाचा, सुना है आज मंत्री जी आएंगे, इहाँ रैन-बसेरा का उद्धाटन करने ...। '
' रैन-बसेरा का हुई है भाई? ' देवा समझ नहीं पाया।
'रैन-बसेरा माने रात का ठिकाना। दो-चार रुपये लेकर वहाँ रात बिताने दी जाएगी गरीबों को।' मैंने समझाया।

'... और कंबल भी बाँटेंगे मंत्री जी ... ' लड़के की आवाज में उल्लास था। पास ही बैठी भीखू की घरवाली अपने छोरे को चपर-चपर बोलता देखके निहाल हुई जा रही थी। 'कैसी बढ़िया खबर लेकर आया है, छोरा? कहो, किसी और को पता थी ये बात?' उसने पास बैठी सन्तों से कहा।
'कौन कह रहा है, ये सब?' मैंने लड़के से पूछा।
'ऊहाँ वो मुच्छड़ दारोगा है ना, वो ही बता रहा था, किसी को। मैंने सुन ली।' लड़का सगर्व अपनी उपलब्धि बताने लगा।

'पर ई बताओ गोपी भैया, ई ससुर रात सोबे खातिर दुई-चार रुपया आई कहाँ से? दुई चार-रुपया तो दिर भर की कमाई होय। ऊ भी दे दइबे तो खाइबे का? ऊ दरोगा का सिर। ... कहो तो' घनसी काका ने पूछा।

'काका, ये सब तो पालटिक्स है इन ससुर लीडरन की। कहबे को रैन बसेरा, धरम का काम और हुइबे को कमाई का धन्धा। अरे! गरीब जोन दुई-चार रुपया ही दे सकता तो रैन-बसेरा ही मैं क्यो सोने आता भला।' मैंने भी काका की बात का ही समर्थन किया।
'ई से बढ़िया तो, ई हुई जाए कि कंबल दे दियो हमें, सो लईहें हम फुटपाथ पर ही।' भीखू ने सुझाव दिया, पास बैठे लोगों ने हामी भर दी।

देखते ही देखते सड़क के किनारे-किनारे कनात लग गई। अस्थाई टैण्ट लग गया। दो बाई तीन के लट्ठे पर 'रैन-बसेरा' लिखकर टाँग दिया गया। धीरे-धीरे धुंध छँटने लगी थी और सूरज देवता का परसाद बिखरने लगा था। गाड़ी मोटरों की चिल्लपौं बढ़ने लगी थी और लोगों की आवा-जाही शुरू हो गई थी। हम सब अपने-अपने धन्धे पर निकलने लगे थे। भीखू, देवा, घनसी काका आदि भीख माँगने, श्रवण, राधे और मैं बूट पालिश करने, बाकी लोग पॉलीथीन बीनने निकल पड़े थे। भीखू की औरत और बच्चे भी पीठ पर मैलाकुचैला बोरा लटकाये अपनी दिनचर्या के लिए निकल पड़े थे। सब लोग अपनी-अपनी जल्दी में थे। मैं भी निकल गया।

दिनभर की अपनी नौकरी करके शाम को जब हम लौटे तो अपने ही फुटपाथ को पहचान नहीं पाये। सड़क पर टैण्ट हाऊस की कुर्सियाँ सजी थी। एक तरफ से रास्ता बंद कर दिया गया था। माईक लगा था। कुछ संभ्रान्त से लोग वहाँ बैठे थे। कुछ ही देर में मंत्री जी आने वाले थे। रैन-बसेरा वाले तम्बू के दरवाजे पर एक लाल रिबन बाँधा गया था। देश में अब रैन बसेरों का उद्धाटन भी फीता काटकर होने लगा है। देश की प्रगति देखकर सभी को आश्चर्य हो रहा था। दूर, दीवार के सहारे हम लोगों की गिरस्ती पड़ी थी। हम लोग अपने-अपने सामान के पास जा बैठे। सभी को आज उम्मीद थी कि आज हमें जरूर कंबल मिलेंगे और रात को चैन से भी सो सकेंगे। शायद, इसी आस में आज हम लोग और दिनों की बजाय कुछ जल्दी लौट आए थे। बच्चों के चेहरे आज खिले हुए थे, औरतों के चेहरे पर मुस्कान थी और बूढी ऑंखों में चमक झूल रही थी।

तभी एक टैक्टर ट्राली आकर ऐन तम्बू के सामने रुकी और उसमें से कई सारे मैले कुचैले, आदमी, औरत, बच्चे, बूढे उतारे गये। सब के सब लाईन लगा कर बैठ गये। सब कुछ जैसे पूर्वनियोजित एवं साठ-गाँठ से हुआ जान पड़ता था। 'ना जाने कहाँ से आ गए ये लोग?' हम सबकी ऑंखों में एक ही प्रश्न था। दरोगा, एक-एक के पास जाकर कुछ पूछ रहा था और आगे बढ़ता जा रहा था। उसके चेहरे पर अलग-सा कुटिल रौब था। अचानक उसने नजर उठाकर हमारी ओर देखा और बुलाने का ईशारा किया। एक साथ कई सारे लोग लपके। वो जोर से दहाड़ा, 'अबे तू आ ... तू ... सारे नहीं।' उसका ईशारा भीखू की तरफ था। सभी की नजरें भीखू की ओर उठी। वो खुद भी इधर-उधर देखने लगा। उसको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब दरोगा फिर चिल्लाया, 'हाँ-हाँ ... तू ही। इधर-उधर क्या ताकता है? इधर आ ...-' भीखू सहमा-सहमा उठा और दरोगा के पास जा पहुँचा, 'हुजूर?'
'हुजूर के बच्चे, कंबल चाहिए कि नहीं?'

'चाहिए हुजूर' भीखू तपाक से बोल पड़ा। उसकी ऑंखों में कुछ चमकने लगा।
'तो चल लाईन में बैठ, जा।' दरोगा ने डपटते हुए कहा। भीखू चुप लगाकर लाईन में बैठ गया। हम लोगों के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। भीखू बीच-बीच में मुड़-मुड़ कर हमारी ओर देख लेता था। उसके चेहरे पर गर्व के-से भाव थे। इतने सारे गरीबों में से भाग्यशाली गरीब चुन लिया जाना, गर्व ही की तो बात थी।

मंत्री जी आए, तम्बू का फीता काटा, कंबल बाँटे, फोटो खिंचवाये, भाषण झाड़ा, चले गये। टैक्टर आया, कुर्सियाँ उठाई, धूल उड़ाई, चला गया। बाहर से लाकर खडे कर दिये गये गरीबों से 'किसी' ने कम्बल वापस ले लिए, दस बीस रुपये दे दिये और उन्हें भगा दिया। कुछेक अपने मैले कुचैले चादरों और फटे-पुराने कम्बलों के साथ रैन-बसेरे में सोने को रुक गये। बाकी चले गये। लेकिन कुछ लोगों के पास अब भी नये कंबल नजर आ रहे थे। वो लोग कम्बल लेकर इस तरह इतराते फिर रहे थे मानो वी.आई.पी. हों। शायद कोई विशेष बात थी। बड़ा रहस्य था। उनमें हमारा भीखू भी एक था।

भीखू, हमें अपना कंबल उलट-पलट कर दिखा रहा था। सब लोग हसरत भरी नजरों से उसके कंबल को देख रहे थे। कोई छू कर देखता, कोई ओढ़ कर। भीखू के बच्चे मानो आज खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। कंबल की तह लगाकर दोनों बच्चे उसके पास बैठ गये थे। मानो किसी खजाने की चौकीदारी कर रहे हों। भीखू खुश था। कोई पूछता, 'भीखू तेरी पहचान है क्या, दरोगा से?' कोई कहता, 'तू तो बड़ा भागी निकला रे भीखू।' कोई कहता, 'चल अबके जाड़े तो चैन से निकल जायेंगे, तेरे।' कई तरह के लोग, कई तरह के सवाल, कई तरह की बातें। सबके जवाब में भीखू बस मुस्कुरा रहा था और सिर हिला हिलाकर बस गर्वित हुआ जा रहा था।

... रात गहराने लगी थी, सब फुटपाथिए अपने-अपने चीथड़ों में दुबके पूर्ववत् सड़क किनारे के फुटपाथ की शोभा बढ़ाने के लिए अपनी-अपनी जगह पर आ जमे थे। मैं बैठा अभी बीड़ी ही सुड़क रहा था कि भीखू का छोरा दौड़ा-दौड़ा आया, 'चाचा, चाचा ... माई को देखा क्या तुमने?'
'नहीं तो ... ' मैंने अनभिज्ञता जताई। रात के लगभग दस बज रहे थे। कहाँ गई होगी इस समय? रह-रह कर विचार आ रहा था।

कुछ ही क्षणों बाद भीखू बदहवास सा दौड़ता हुआ आया। 'औरत को देखा क्या?' उसकी ऑंखें पूछ रही थी। मैंने ऑंखों ही ऑंखों में मना कर दिया। भीखू के कंधे पर अभी भी 'वो' नया कंबल लटक रहा था। बड़े ही जतन से भीखू ने उसे सम्हाल रखा था और रह-रह कर उसे कंधे पर सहेज रहा था। वो भी जरा इधर-उधर देखकर लौट गया।

रात के लगभग पौने दो बजे होंगे अभी। मैं उनींदा-सा अपनी फटी लोई में खुद को दुबकाए पड़ा था। तभी, मैंने देखा दूर अंधेरे में सड़क की दूसरी ओर एक टैम्पो रिक्शा रुका और उसमें से भीखू की औरत उतरी। उतर कर वो जरा देर टैम्पो के पास ही खड़ी रही। टैम्पो के भीतर शायद कोई बैठा था, उसने औरत के हाथ में कुछ दिया और शायद हाथ को दबाया भी। औरत ने झट-से अपनी लूगड़ी के पल्लू में कुछ बाँध लिया था। टैम्पो चल दिया। मेरी नजर टैम्पो ही में लगी थी, जैसे ही टैम्पो दाहिने हाथ को मुड़ा, मैंने देखा टैम्पो की पिछली सीट पर सुबह वाला मुच्छड़ दारोगा बैठा था, पसर कर।

मैंने देखा भीखू अपनी औरत से हवा में हाथ हिला-हिलाकर तेज-तेज बातें कर रहा है। वो, उसको कुछ समझा रही है। धीरे-धीरे भीखू का पारा गिर रहा है। औरत ने पल्लू में बँधी गाँठ खोलकर भीखू के हाथ में कुछ रख दिया। वो अब खुश नजर आ रहा था। दोनों हँसी-खुशी रैन बसेरे में चले गये।
दूसरे दिन, सुबह। मैंने भीखू से पूछा, 'अरे! औरत मिल गई थी क्या?'
'हाँ ' , भीखू ने चहक कर जवाब दिया था।
'किधर हो ली थी?' मेरा दूसरा प्रश्न।

'कहीं ना, उसको कल किसी ब्याह की लाईट हाँडे उठाने का काम मिल गया था। बीस रुपये लेकर आई है।' वो खुश था।
मैं निरुत्तर। ... टैम्पों की पिछली सीट पर मुच्छड़ दारोगा क्या कर रहा था?
(समाप्त)

5 झुलसे सपने



शाम के पाँच बज चुके थे। अहमदाबाद मेल ने अन्तिम सीटी दे दी थी। तुषार लपक कर अपने आरक्षित कम्पार्टमेंट में चढ़ गया था। उसके हाथ में अंग्रेजी की एक मासिक पत्रिका थी। अपनी सीट पर सामान व्यवस्थित करके वो जरा प्लेटफार्म पर उतर गया था। कुछ खरीदने की मंशा से नहीं, बल्कि यूँ ही। पर फिर समय काटने के लिए ये पत्रिका खरीद ली थी। वैसे भी रात के सफर में वो सोता तो है नहीं।

कम्पार्टमेन्ट में उसके अतिरिक्त एक सज्जन और थे, दुर्गेश भाई पटेल। सामने वाली बर्थ पर बैठे हथेली पर तम्बाकू रगड़ रहे थे। परिचय हुआ, जाना कि यहीं से चढ़े हैं और अहमदाबाद तक साथ ही हैं। वहाँ ट्राँसपोर्ट का व्यवसाय हैं। औपचारिक बातचीत के बाद वो अपनी एक फाईल में खो गये और तुषार पत्रिका को उलटने-पलटने में। गाड़ी गति पकड़ चुकी थी। उजाला धीरे-धीरे मध्दम होता जा रहा था। पक्षियों की चहचहाट में दिन भर की थकान के बाद अपने घोंसलों में लौटने की उत्सुकताजन्य खुशी स्पष्ट समझी जा सकती थी।

तुषार ने देखा सामने वाली सीट पर एक लेडीज बैग भी रखा है। जिसके पास ही एक लिपिस्टिक और एक छोटा सा शीशा भी अव्यवस्थित-सा पड़ा है। लगता था सामने वाली सीट पर कोई महिला सहयात्री भी है। महिला यात्री का ख्याल आते ही वो मुस्कुरा दिया। हो सकता है पटेल साहब की पत्नी ही हों। पर वो है कहाँ? दिखाई नहीं दीं। शायद बाथरूम में हों।

खैर, तुषार पुनः पत्रिका के पन्ने उलटने लगा। तभी एक युवती के आगमन ने अचानक उसका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। युवती और पटेल साहब में मुस्कुराहटों का आदान-प्रदान हुआ। पटेल साहब ने ऑंखों से उसकी ओर इस तरह का शरारत भरा ईशारा किया कि तुषार पुनः पत्रिका के पन्ने उलटने को बाध्य हो गया। उसको लगा कि पति-पत्नी के बीच चल रहे कार्यकलाप को बैठकर नहीं घूरना चाहिए। शिष्टता नहीं है। किन्तु उस युवती को देखकर पटेल साहब के और उसके बेमेल साथ पर मन ही मन तुषार बड़ा आश्चर्यचकित था। कहाँ यह कमसिन सौन्दर्य की मूर्ति? और कहाँ यह थुलथुल पटेल।

पटेल ने युवती का तुषार से परिचय नहीं करवाया। किन्तु तुषार शिष्टतावश पत्रिका को एक ओर रखता हुआ तुरन्त खड़ा हो गया और धीरे से गर्दन झुकाते हुए बोला 'नमस्कार, मैं तुषार चतुर्वेदी।' उत्तर में एक मोहक मुस्कान उस युवती के होठों पर फैल गयी। वह बहुत आकर्षक दिख रही थी। गौरवर्ण, चेहरे पर मेकअप की हल्की परत, माथे पर छोटी चमकीली बिन्दिया और कसकर जूडे के रूप में बाँधे गये बाल। किन्तु माँग में सिन्दूर और गले में मंगल सूत्र आदि विवाह के कोई चिह्न उसके शरीर पर नहीं थे वैसे भी आजकल ये सब नहीं करना फैशन में गिना जाता है। किन्तु सिल्क की साडी बाँधे वो बहुत सुन्दर दिखाई पड़ती थी और चेहरे का लावण्य बरबस अपनी ओर खींचता था। हाव भाव से लगता था कि वह अपने जीवन से बहुत संतुष्ट है।

'क्या आप भी जयपुर से ही चढ़े हैं?' खनकती आवाज में उसने पूछा।
'जी हाँ' तुषार ने गर्दन हिलाई, 'मैं अहमदाबाद जा रहा हूँ। एक बिजनेस मिटिंग है।'
'रुपये का आकर्षण खेंच रहा है जनाब को।' दुर्गेश बीच में बोला।
'हाँ, ऐसा ही कुछ समझ लीजिए। मगर आप कहाँ से आ रहे हैं? लगता है काफी दिनों बाद घर-व्यापार से समय निकाल पाये हैं घूमने फिरने का।' तुषार ने किंचित मुस्कुराते हुए कहा।
'हाँ कुछ यूँ ही समझ लीजिए। कुछ काम था जयपुर में सो साथ ही चले आये।' दुर्गेश ने कहते हुए उस युवती पर एक प्रेमभरी चितवन डाली। वो लजा गयी।

'कितना समय हुआ आपकी शादी को?' तुषार ने अचानक पूछ डाला।
'शादी?' कुछ कहने को था दुर्गेश, कि बीच में ही वो युवती बोल पड़ी, 'क्या आप की शादी हो चुकी है?' तुषार का प्रश्न अनुत्तरित रह गया। 'जी नहीं अभी तक भाग्यशाली हूँ।' मुस्कुराते हुए तुषार ने कहा और तीनों जोर से हँस पड़े।
कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। तब तुषार ने पैकेट से सिगरेट निकालते हुए खामोशी तोड़ी। 'यदि आप बुरा ना मानें तो क्या मैं एक सिगरेट पी लूँ?'

'जी हाँ, शौक से।' मुस्कुराकर उसने जवाब दिया।
तुषार कुछ आराम से बैठ गया। पत्रिका पढ़ते-पढ़ते बीच-बीच में वो नजर उठाकर देख लेता। दुर्गेश अपनी फाईल में व्यस्त था और वो युवती, जिसका नाम तक तुषार को नहीं पता था, खिड़की के बाहर दूर तक फैली अंधेरी काली चादर को एकटक देख रही थी, निर्निमेष।

'अरे भाई, खाना-वाना खाओगी या नहीं?' दुर्गेश की आवाज ने उसकी तन्द्रा भंग की। उसने खिड़की से अन्दर मुँह किया तो उसकी ऑंखें नम थी।
'अरे रो क्यों रही हो?' दुर्गेश ने चिंतित स्वर में पूछा। तुषार की नजरें भी एकाएक उस ओर उठी। 'कुछ नहीं। कुछ भी तो नहीं ... कोयले का दाना गिर गया है ऑंख में शायद ... ' पल्लू से ऑंखें पौंछते हुए वो टिफिन कैरियर खोलने लगी। तुषार ने देखा, मगर फिर अनदेखा करके पत्रिका में खो गया। युवती ने उसकी ओर भी एक प्लेट बढ़ा दी, 'लीजिए, तुषार बाबू।'

'अरे आप तकलीफ क्यों करती हैं? मैं रात के सफर में खाकर ही चलता हूँ।'
'ना नुकर मत करो भाई, इनका गुस्सा बड़ा खराब है?' दुर्गेश ने छेड़ते हुए कहा।
'आप चुप करिये। लीजिए ना, तुषार बाबू।'
तुषार उसके आग्रह को टाल नहीं सका और किंचित् संकोच के साथ प्लेट ले ली। किन्तु मन ही मन तुषार यही सोच रहा था कि 'वो' रो क्यों रही थी? बहुत कहने पर भी तुषार ने एक पंराठे से अधिक नहीं खाया।

'आप तो बहुत कम खाते हैं, क्या बात है?' युवती कौर मुँह में रखते हुए तुषार से कहा।
'बस यूँ ही। मेरी छोटी बहन भी यही कहती है। पर क्या करूँ? अधिक खाया ही नहीं जाता' सिगरेट सुलगाते हुए वो बोला।
'क्या उम्र है आपकी बहन की?'
'आपसे उन्नीस-इक्कीस होगी, बस। पर सुन्दरता में आपसे उन्नीस ही है।' सुनकर वो लजा गयी।
' क्षमा करें, मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं? ' तुषार ने प्लेट नीचे रखते हुए पूछा। ' जी, नेहा। ' उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया।
'क्या अभी शादी करने का विचार नहीं है?' नेहा का अगला प्रश्न था। 'अभी वो पढ़ रही है, फिर आज कल सुयोग्य वर भी तो बातों में नहीं मिल जाता।'

'सो तो है। सुयोग्य वर कहाँ मिल पाता है?' उसने कुछ उदास लहजे में कहा। उसके स्वर में अजीब-सी पीड़ा थी। तुषार समझ नहीं पाया कि उसने ये बात क्यूँ कही? क्या वो अपने पति दुर्गेश से खुश नहीं है? या कि वो दुर्गेश की पत्नी ही नहीं है? तो?
कुछ देर इधर-उधर की गपशप के बाद दुर्गेश भाई चादर तानकर सो गये। साड़ी ठीक करती हुई वह भी पैरों को ऊपर की ओर समेट कर आराम से बैठ गयी थी। किन्तु बिल्कुल मौन। सामने वाली सीट पर लेटा तुषार अपनी पत्रिका में खोया था। तुषार ने जब उसे चुपचाप बैठे देखा तो पत्रिका को एक ओर पटक-कर गोद में तकिया रखकर पालती मार कर उसकी ओर मुँह करके बैठ गया।

'बच्चे तो अभी ... हैं कि नहीं?' तुषार ने पूछा। सुनते ही झटके के साथ उसने गर्दन उठायी। उसके चेहरे पर अनचाहे प्रश्न पूछ लिए जाने के से भाव थे। फिर फीकी मुस्कान के साथ बोली, 'हर किसी के भाग्य में बच्चों का सुख कहाँ?' कहती हुई वो पुनः बाहर पसरे हुए अंधेरे को घूरने लगी। मानो उसमें कुछ खोज रही हो। शायद अपना ही कुछ अमूल्य, जो कहीं छूट गया था। लगता था वो उखड़ी-उखड़ी सी है और बातचीत करने के मूड में नहीं है। मगर उसके इस अचानक बदले व्यवहार को देखकर तुषार ये भली प्रकार समझ गया था कि कुछ दुरूखद अवश्य है। जिसे वो व्यक्त नहीं होने देना चाहती।

कुछ देर जागने के बाद वो अपनी सीट पर लेट गया और ना जाने कब उसे नींद आ गई। वो ना जानें कितनी देर तक जागती रही उस अंधेरे के साथ।
प्रातः दुर्गेश और नेहा तैयार हो चुके थे। अहमदाबाद प्लेटफार्म आने ही वाला था। तुषार उठा, हल्की मुस्कुराहट के साथ उसने दोनों को 'गुडमॉर्निंग' कहा। फिर उठकर कुछ कपड़े लेकर बाथरूम की ओर चला गया।

कुछ देर बाद लौटा। अब वो भी तैयार था। आकर अपनी सीट पर बैठ गया, 'अरे। आप ये तो बताईये, आप रहते कहाँ हैं?' प्रश्न सुनकर नेहा तो जैसे चौंक पड़ी। उसने दुर्गेश की तरफ देखा। दुर्गेश तपाक से बोला, 'अभी तो ड्राईव-ईन में हैं। जल्दी ही बुध्द विहार में शिफ्ट हो जायेंगें।'
'ये लीजिए मेरा कार्ड। फिर कभी जयपुर आना हो तो याद जरूर कीजियेगा।' तुषार ने अपना कार्ड नेहा की ओर बढ़ाते हुए कहा। दुर्गेश ने बीच ही में कार्ड को लपक लिया। तुषार को दुर्गेश का ऐसा करना कुछ ठीक नहीं लगा।

गाड़ी अहमदाबाद आ पहुँची। तीनों गाड़ी से उतर गये। अलविदा नमस्कार आदि हुआ और अपने-अपने रास्ते हो लिए। तुषार उनको दूर ओझल होने तक देखता रहा। एक बार नेहा ने भी मुड़कर देखा। बदले में तुषार ने उसकी ओर हाथ हिला दिया और वो मुस्कुरा दी। उसकी मुस्कुराहट में एक 'फीकापन' था।

दूसरे दिन लाल दरवाजा पर तुषार अपने एक मित्र के साथ कुछ खरीददारी कर रहा था। वो एक रेडीमेड गारमेन्ट के शोरूम पर खड़ा अपनी बहन के लिए सूट खरीद रहा था कि तभी उसने देखा कि सडक के दूसरी ओर नेहा चली जा रही है। उसके लम्बे बाल उसके कंधों पर झूल रहे थे। स्लीवलैस ब्लाऊज और चटख लाल साड़ी पहने अपनी कमर को लचकाती वो चली जा रही थी। उसके साथ एक तीस-पैतींस साल उम्र का अच्छे कदकाठी वाला धनाठय-सा पुरुष भी चल रहा था। दोनों हँसते हुए बतिया रहे थे। वह पुरुष दुर्गेश नहीं था। तुषार एकटक उन्हें जाते हुए देख रहा था। 'अरे यार। किसे देखने लगे?' फिर मेरी दृष्टि के लक्ष्य को देखने के बाद 'तुम भी इस चीज का शौक रखते हो क्या?' मित्र ने ऑंखें घुमाते हुए शरारत से कहा। 'तुम्हारा मतलब? क्या तुम इसको जानते हो?' तुषार ने क्षणांश को उसकी ओर देखकर फिर उन्हीं को देखते हुए पूछा।

'इसे कौन नहीं जानता दोस्त? आधा अहमदाबाद शहर इसके हुस्न का आचमन कर चुका है। ये शहर की मशहूर नुमाईशी चीज है - नेहा पाटनी। अमीरों की 'मौज' का मशहूर साधन।' कहकर दोस्त जोर से हँस पड़ा।
'नहीं यार ... ये तो ... ' शब्द झटके से आकर अटक गये थे, तुषार के गले में। फटी-फटी नजरों से तुषार उसे जाते हुए देख रहा था।
(समाप्त)

6 वह



'यह रास्ता कहाँ को जाता है, साब?' खादी का कुर्ता पाजामा पहने एक नवयुवक ने एक सफारी सूट पहने व्यक्ति से पूछा।
'तुझे कहाँ जाना है?'
'जिधर इन कदमों की प्यास बुझ सके।'
'शायर है क्या?'
'कदमों का इस्तेमाल क्या शायर ही करते हैं?'
'चल जा, पागल कहीं का।'

'आप भी जाइये, समझदार कहीं के।'
दोनों अपनी-अपनी राह हो लिए। मैं चाय की थड़ी पर बैठा उन दोनों का वार्तालाप सुन रहा था। वेशभूषा से सादा-सा लगने वाले उस आदमी की बातें सुनकर, सफारी सूट वाले 'साब' की साहबियत पर मुझे तरस आ गया।
वह खादी का पाजामा कुर्ता पहने, हल्की-हल्की दाढ़ी-मूछों और बढ़े हुए बालों वाला 'पागल कहीं का' ना जाने एकदम किधर गुम हो गया। मैंने उठकर इधर-उधर देखा। किन्तु दूर-दूर तक वो दिखाई नहीं दिया। जी में उससे मिलने-बतियाने की तीव्रता थी। किन्तु उसको कहीं भी ना पाकर मन मसोस कर रह जाना पड़ा। घड़ी देखी पौने नौ बज रहे थे। जल्दी से चाय का अंतिम घूँट उँडेला और स्कूटर स्टार्ट करके प्रेस की तरफ बढ़ गया।

जाकर पहुँचा ही था कि पियून आकर कह गया, 'मैडम बुला रही हैं।'
मेरा कहा 'ठीक है, चलो आता हूँ' भी उसने रुक कर नहीं सुना। मैं खीझकर रह गया। भीतर गया तो प्रेस की मालिक सरला दीवान सामने ही बड़ी-सी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठी थी और एक व्यक्ति दरवाजे की तरफ पीठ किए उनके सामने बैठा था। मैंने उसको देखा भर। पहचानने या जानने की जिज्ञासा के बिना। क्योंकि रोज यहाँ कोई ना कोई लेखक या शायर आता रहता है। पुस्तक छपवाने या अपनी पुस्तकों की खरीद का अल्पाँश बटोरने। शान से जिसे रॉयल्टी कहते फिरा जाए। अपने लेखकीय दम्भ को सहलाते रहने के लिए।

'जी मैम?' मैंने बुलवाने का कारण जानने को कहा।
'संचेती जी! अभी अपनी प्रेस में लगभग कितनी पुस्तकों की छपाई चल रही होगी। बता सकते हैं आप?'
'जी मैम। ठीक-ठीक तो नहीं। पर हाँ करीब पाँच सात तो चल ही रही होंगी।'
'उनमें से किसी एक के प्रूफ इन साहब को देखने को दे दीजिएगा।'
मैं अभी तक 'उस' व्यक्ति के प्रति निरपेक्ष भाव से खड़ा था। सरला जी के कहने पर पहली बार आगे की तरफ झाँक कर देखा और बेसाख्ता मेरे मुँह से निकल पड़ा 'आप?' व्यक्ति हैरान। मैडम हैरान।
'आप जानते हैं इन्हें संचेती जी।' सरला जी ने विस्मय से पूछा।
'नहीं मैम। लेकिन मिल चुका हूँ आज सुबह ही।' व्यक्ति वही 'पागल कहीं का' था।

'कहाँ?' उस व्यक्ति की निगाहों और मैडम दीवान ने एक साथ पूछा।
'आज सुबह ही शालीमार के पास वाले नुक्कड़ पर।'
वह व्यक्ति सुबह का वाकया याद करके हँस दिया। मैंने देखा कि उस के गालों में हँसते समय गड्ढ़े पड़ जाते हैं। सरला मैडम के भी गालों में ऐसे ही गङ्ढे पडते हैं। उठी हुई नाक और दबा हुआ माथा भी ठीक मैडम जैसा ही जान पड़ता है। दोनों में गजब का साम्य था।
'अच्छा ठीक है, इन्हें ले जाईए और काम समझा दीजिए।'

'जी मैम।' कहकर मैं दरवाजे की ओर मुड गया और वो मेरा अनुसरण करता हुआ बाहर चला आया।
मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठकर वह नजरें घुमा-घुमा कर ऑफिस का जायजा लेने लगा।
'चाय लेंगे आप? क्या नाम है आपका?'
'लूँगा। अनुराग'
'बड़ा अच्छा नाम है।'

'खराब भी लगा हो तो अच्छा ही कहना पड़ता है। विवशता है हमारे समाज की। औपचारिक शिष्टता का तकाजा जो ठहरा।' मुस्करा दिया वो।
'जी नहीं, ऐसी बात नहीं है। वाकई नाम अच्छा है। अरे, योगेश दो चाय भिजवाना।' मैंने जोर से हाँक लगाई।
'कहाँ के रहने वाले हैं आप?'
'इस शहर में नया हूँ, क्या इतना काफी नहीं है?'
'फिर भी बताने में क्या हर्ज है?'

'गटर का रहने वाला हूँ।'
'क्या?'
'हैरान क्यों होते हैं? क्या फर्क पड़ता है अगर मैं मंदसौर का हूँ और आप इलाहाबाद के? हैं तो आखिर हम सभी गटर के कीड़े। देखा नहीं आपने सुबह मैंने उसको 'साब' कहा और उसने मुझे 'पागल'। क्या फर्क पड़ता है संचेती जी? शहर का नाम बड़ा होने से वहाँ के बाशिंदे भी बड़े हो जाएँए ये जरूरी तो नहीं।'
'आप ठीक फरमा रहे हैं। मैं देख रहा था उस आदमी का रवैया बिल्कुल बेहूदा था।'
'शायरों और पागलों में क्या कोई फर्क नहीं माना जाता आपके इलाहाबाद में? मेरे मंदसौर में अभी भी लोगों को ये फर्क करना आता है।'

मैं निरुत्तर हो गया।
'चलिए छोड़िए उस वाकये को। आप मुझे बताइये कि मुझे क्या काम करना होगा?' इस बीच चाय आ चुकी थी। उसने एक प्याला मेरी ओर सरका दिया और दूसरा खुद ने उठा लिया था।
'ये लीजिए ये पाण्डुलिपी है और ये इसके प्रूफ। आपको बस इन्हें ध्यान से पढ़कर त्रुटिनिवारण करना है बस।'
'त्रुटिनिवारण ही करूँ या संशोधन भी?'
'संशोधन लेखक के अधिकार की बात है। हम-तुम नहीं कर सकते।'
'चलिए साहब। ऐसा ही सही।'

'ठीक है।'
'मुझे इजाजत दीजिए। नमस्कार' कहता हुआ वो उठकर बाहर की ओर चला गया। मैं उसको जाते हुए देखता रहा। अजीब आग भरी दिखी उस आदमी में। 'अनुराग' तो नाम को भी नहीं था, उसके नेचर में। विराग ही विराग जान पड़ता था, भीतर। मन में सोचा और पुनः अपने काम में लग गया।

अनुराग को प्रेस में काम करते हुए दो तीन महीने गुजर गए थे। धीरे-धीरे उसकी मुझसे और मेरी उससे एक अजीब किस्म की आत्मीयता हो गई थी। वो फक्खड़पने में कुछ भी कह देता था, तो भी मैं उसकी बातों को हंसी में टाल देता था। एकाध बार वो मेरे घर भी आ चुका था। कभी प्रूफ देने, तो कभी यूँ ही। एक दिन अनुराग को दफ्तर में देर हो गई थी, सो मैं ही उसको अपने साथ स्कूटर पर ले गया था। उस दिन पहली बार उसके एक कमरे के घर में बैठ कर चाय भी पीयी थी। ऐसे ही धीरे-धीरे हम दोनों काफी घुल-मिल गए।

शाम ढलते ही पूरा का पूरा इलाहाबाद खुशगवार हो उठता है। हरियाली से ढका शहर हवा के साथ गुनगुनाने लगता है। कुछ सड़कें घरों की ओर मुड़ जाती है। कुछ मयखानों की ओर तो कुछ इधर-उधर। सूरज जाता जाता सारे माहौल पर बादामी रोगन पोत गया जान पड़ता है। ट्रैफिक के शोर में अजीब-सा संगीत सुनाई पड़ता है। 'प्रेस' से निकलकर घर जाने की बजाए अनुराग की राह तट के किनारे-किनारे चलती हुई एक झोंपड़ीनुमा रेस्टोरेण्ट में जा लगी। अन्दर छोटा-सा लॉन। जिस पर जगह-जगह गोल मेजें और उसके चारों ओर छोटी-छोटी मोढ़ियाँ। माहौल में कोई रिकार्ड धीमा-धीमा बज रहा है। '... अपना गम लेके कहीं ओर ना जाया जाए ... घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए ... ।' सुनकर उसे अपना एक कमरे का घर याद आ गया। जिसमें दरी बिछी एक चारपाई, एक मेज-कुर्सी के साथ पड़ी विलाप करती रहती है। खूँटी पर गंदे कपड़े लटके होते हैं और फर्श पर सिगरेट के टोंटे और दारु की खाली बोतलें बिखरी पड़ी रहती हैं। किस सामान को सजाया जाए? उसके 'ज्ञं' के सामान की तो सजावट ही बिखरेपन में है। सजा के उसकी इस सजावट को क्यों बिखेरा जाए? सलीके से सजाना या करीने से रखना तौहीन होगी उसके 'घर' की। यही सब सोचता हुआ वो दूर कोने की एक टेबिल पर बैठ गया।

बैरा आया, 'क्या लाऊँ सर? जिन, व्हिस्की, रम, स्कॉच।'
'जिसको पीकर मैं, मैं ना रहूँ। वो ले आ।'
'व्हिस्की चलेगी सर।'
'ले आ। चला हम लेंगे।' सुनकर बैरा लौट गया।

... शाम पूरे शबाब पर थी। अनुराग अभी तक चार पाँच पैग ले चुका था। टेबिल पर रखी नमकीन की तश्तरी लगभग खाली थी। मेज पर इधर-उधर प्याज के टुकड़े छितरे पड़े थे। धीमे-धीमे बज रहे संगीत पर वो बीच-बीच में तान में आकर मेज पर थाप दे मारता था और साथ-साथ गुनगुनाले लगताथा '... शराब चीज ही ऐसी है जो छोड़ी ना जाए ... ये मेरे यार के जैसी है जो छोड़ी ना जाए ... वाह ... वाह वाह ... ये मेरे यार के जैसी है ... वाह ... ' बड़बड़ाते हुए उसने एक ही घूंट में पूरा पैग हलक में उंडेल लिया और जोर से ऑंख मींच कर 'आह' के साथ चटखारा लिया।

मेरे घर का रास्ता भी उधर से ही होकर जाता है और जाते हुए यहाँ से मैं कोई ना कोई सब्जी पैक करवा के ले जाता हूँ। रोटी खुद सेंकता हूँ। मेरा यह रोज का काम है। रेस्टोरेण्ट का पूरा स्टॉफ इसीलिए मुझे जानता है। साथ ही 'प्रेसवाला' होने के कारण अतिरिक्त आदर और उधार खाता, दोनों सुविधाएँ लम्बे समय से मिलती चली आ रही हैं। ना कभी होटल वाले ने तकादा किया, ना मैंने ऐसी नौबत आने दी। महीने की दूसरी तीसरी तारीख को हिसाब चुकता कर देना मेरी आदत में है। रोज की तरह आज भी स्कूटर यहाँ आकर अपने आप रुक गया। भीतर पैर रखा तो जोर-जोर से चिल्लाने की, आवाजें सुनाई पड़ी। मालूम देता है कोई पियक्कड़ दारू पीकर फैल गया है। मैं आगे बढ़ गया।

'तुम जानते हो मैं कहाँ से आया हूँ ... मंदसौर से।' सुनते ही मैं झटके के साथ पलटा। मैंने देखा, अनुराग बदहवाश हुआ चिल्ला रहा है और दो तीन बैरे उसे घेर कर खड़े हैं। आसपास बैठे लोग उचक-उचक कर उसे देख रहे हैं।

'छोड़, कॉलर छोड़ बददिमाग। जानता नहीं किसी पढ़े-लिखे आदमी से कैसे बात करनी चाहिए? क्या यही तमीज है इस शहर की ... ' मैंने सुना तो लपक कर उस टेबिल पर पहुँच गया। बैरों ने सम्मान के साथ मुझे नमस्कार किया और अनुराग को लगभग घसीटते हुए उठाने लगे।
'छोड़ दो इसे' मैंने लगभग चीखते हुए कहा। अनुराग को होश नहीं था। पर फिर भी मुझको आ गया जानकर वो मुस्कुरा दिया था और नए हौसले के साथ गरजा, 'छोड़ो मुझे।'

'सर! इस आदमी ने दो सौ चालीस रुपये की शराब पी ली है और देने के नाम पर इसकी जेब में कुल तेइस रुपये ही हैं। उस पर गाली-गलौज और कर रहा है।' एक बैरे ने बढ़कर मुझे सारा वाकया बताया।
'ठीक है। इनका हिसाब मेरे खाते में जोड़ दो और जाओ इनको परेशान ना करो। आगे भी कभी ऐसा हो तो मेरे खाते में लिख लिया करो।' कहता हुआ मैं पास पड़ी मुढ्ढी पर बैठ गया। बैरे अचरज से मेरी ओर देखकर आपस में खुसुर-पुसुर करते हुए लौट गये।
'अनुराग'
'हुँह ... ? मुझे पुकारते हो?'
'चलो घर छोड़ दूँ तुम्हें।'

'क्यूँ? यहाँ बैठने पर पाबन्दी है क्या?'
'नहीं, ऐसा नहीं है। पर अभी तुम होश में नहीं हो। अकेले जाओगे, तो कहीं गिर पड़ोगे। चोट लग जाएगी। इसलिए कहता हूँ, चलो छोड़ दूँ।'
'चोट से कौन कमबख्त घबराता है संचेती?'
मेरा नाम सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ। इस हालत में भी वो मुझे पहचानता है।
'चोट से तुम तो नहीं घबराते किन्तु तुम्हारे घरवाले तो घबराते होंगे कि नहीं?'
'किस के घरवाले? कहा तो था कि मैं गटर की पैदाईश हूँ। गटर वालों का कोई घर होता है? घरवाले होते हैं?'

उसकी कही बात को याद करके मैं अचानक गम्भीर हो गया।
'... फिर भी। क्यों पीते हो इतनी?' मैंने कहा
'संचेती। ये देखो'ए उसने जोर-जोर से जमीन पर पैर मारना शुरू कर दिया, 'जितनी भारी चोट पडेगी उतना ही गहरा निशान बनेगा और जितना गहरा निशान होगा उसको भुलाने की कोशिश में उतनी ही ज्यादा शराब खपेगी ... ' वो पिनक में था पर बात पते की कर रहा था।
'अच्छा, चलो ठीक है। लेकिन, यहाँ से तो उठो।'

जैसे-तैसे उसे उठाकर उसके कमरे तक छोड़ कर आया तो घड़ी की सूईयाँ रात के सवा ग्यारह बता रही थी। अब कैसा खाना और कैसी रोटियाँ? सुबह की पड़ी ब्रेड को सब्जी के साथ खाकर सो गया। जेहन में थोड़ी देर अनुराग रहा। फिर ना जाने कब नींद आ गई।
... अलसुबह दरवाजे के खटखटाने की आवाज से नींद खुली। दरवाजा खोलकर देखा तो मैं भौंचक्का रह गया। सामने अनुराग खड़ा था। नहाया धोया साफ सुथरा अनुराग। कहीं से भी नहीं जान पड़ता था कि ये वही अनुराग है जो रात गये तक बदहवाश और मदहोश था।
'...मॉर्निंग संचेती साहब।'

'मार्निंग।' मुझे अभी भी अपनी ऑंखों पर भरोसा नहीं हो रहा था।
'ऐसे क्या देख रहे हैं आप?'
'कुछ नहीं। आओ, आओ भीतर आओ।' कहते हुए मैंने उसको अन्दर आने के लिए रास्ता दिया और दरवाजा भेड़कर खुद भी चला आया। वो चारपाई पर बैठा मेज पर फैली मेरी किताबों को उलट-पलट कर देख रहा था। मुझे देखकर मुस्कराया और पुनः किताबों के पन्ने पलटने लगा।
'कैसे हो अनुराग?'
'जैसा आपने छोड़ा था। सिवा इसके कि मदहोश नहीं हूँ।'

'चाय पिओगे?'
'पीऊँगा। मगर बनाऊँगा मैं। कहकर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए वो कोने में पड़े एक मेज पर चाय पानी के सामान की तरफ बढ़ गया। मैंने उसे रोका नहीं। कुछ देर बाद वो हाथ में काँच के दो गिलास लिए लौटा। उसने बिना मुझसे किसी भी चीज के बारे में पूछे, चाय बना डाली। वो अब भली प्रकार जान गया था कि मेरे कमरे में कहाँ, क्या रखा है?
'आप सोच रहे होंगे कि रात गए तो मैं कुछ और था, अलस्सुबह कुछ और। क्यों?' वो मुस्कुराया।
'हाँ' मैंने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया।

'संचेती जी, मैं पियक्कड़ नहीं हूँ। पर जब कभी भी पीने लगता हूँ तो फिर पीता ही जाता हूँ। रुकता नहीं।'
'पर, इसकी जरूरत क्यों पड़ती है तुम्हें?'
'लम्बा किस्सा है साहब। जाने दीजिए।'
'अगर बताना चाहो, तो मैं सुनना चाहूँगा।' मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा। चाय बिल्कुल बढ़िया। तेज पत्ती, कम चीनी, कम दूध वाली। ठीक बुध्दिजीवियों के अनुकूल।

'संचेती जी। उस दिन उस आदमी ने मुझे पागल कहा था। तो कुछ गलत नहीं कहा था। वाकई मैं पागल हो चुका हूँ एकबार। कुछ दिनों पागलखाने में रह भी चुका हूँ। इलैक्ट्रिक शॉक भी खा चुका हूँ। पर हर शॉक मुझे मेरे अपने झटकों से कमतर ही लगा। इसलिए इलैक्ट्रिक झटकों का कुछ खास फर्क नहीं पड़ा, मुझपर। हाँ, जैसे बिना किसी को पता चले पागल हुआ था। उसी तरह बिना किसी को बताए ठीक हो गया ... ' ठहर कर उसने चाय की एक बड़ी सी घूँट ली और फिर बताने लगा, '... मेरा बाप ना जाने कौन था। पर मेरी एक माँ जरूर थी। जो मुझे जनने की पीड़ा तो सह गई पर मुझे रखने का हौसला ना कर पाई ... शहर के किसी कचरे के डिब्बे में डालकर ... '

'ऐसा?' मैं आश्चर्यचकित।
'अक्सर ऐसा ही होता है। कचरे के ढ़ेर में पड़े नवजात शिशु को या तो चील-कौवे खा जाते हैं या कुत्ते घसीट-घसीट कर चिथड़े कर देते हैं। माँ, अक्षत यौवना रह जाती है और बाप सफेदपोश शरीफ। ना कोई केस बनता है, ना मुकदमा। ना वारिस, न बवाल ... '
'तुम कैसे बच गए पर?'

'जिसकी किस्मत में ठोकरें लिखी हों उसे हालात मरने नहीं देते। जिन्दा रहना जिसके लिए मरते रहने की आवश्यक शर्त हो उसे भगवान भी कैसे मरने देता ... ' वो गम्भीर हो चला था। चाय खत्म हो चुकी थी। मैंने सिगरेट सुलगाकर उसको ऑफर की। उसने ले ली। एक लम्बा कश खेंचने के बाद धुँआ छोड़ता हुआ वो फिर बताने लगा, '... जूठन खा-खाकर, फटे-पुराने पहन पहन कर ... जूता-पॉलिश करके ... भाँडे घिस-घिसकर ... उम्र आगे सरकती रही। कद निकल आया तो अखबार बेचना शुरू कर दिया। एक दयालु आदमी ने पढने में मदद कर दी। थोड़ा बहुत पढ़ लिख गया ... घिसते-घिसाते आज आपके सामने हूँ ... ' वो मुस्कुरा दिया।

'तुमने जानने की कोशिश नहीं की, कि तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं? कहाँ है? क्या करते हैं?' मैंने पूछा।
'कोशिश करने से हासिल क्या होगा? और पता चल भी गया तो ... तो क्या होगा?'
'कम से कम तुम्हें तुम्हारा खोया हुआ अधिकार तो वापिस मिल जाएगा।' मैंने खाली कप एक ओर सरकाते हुए कहा।

'गया हुआ समय भी मिलेगा क्या?' मैं सुनकर अवाक रह गया।
मैं कुछ कहता उससे पहले ही वो उठकर बाहर की तरफ चल दिया।
... अनुराग को प्रेस में काम करते लगभग छ:सात महिने होने को था। प्रेस भर में उसके फक्खड़पन और मुँहफट नेचर के चर्चे होने लगे थे। पर सभी उसको 'मन का साफ' भी करार देते थे। पिछले कुछ दिनों से मैं नोट कर रहा था, कि वो कुछ बुझा-बुझा सा रहता है और ज्यादा बातचीत भी नहीं करता है किसी से। किन्तु किसी के व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप ना करने की मेरी आदत के चलते मैंने उससे कभी कुछ नहीं पूछा।

सरला जी के ऑफिस में मैं काफी सालों से हूँ। बड़ी भली महिला है। जीवन में जिसके आगे कोई, ना पीछे। एक पति था, वो बहुत साल हुए उसको और इस प्रेस को छोड़कर दुनिया से कूच कर गया। तब से ये हैं और प्रेस है। पूरा समय प्रेस को देना और खाली समय में कुछ ना कुछ पढते रहना बस ये ही दो काम थे इस भद्र महिला के। आफिसकर्मियों के साथ भी उसका बड़ा स्नेहिल मेल-मिलाप था। मैं चूँकि काफी पुराना मुलाजिम हूँ, इसलिए जब-तब बिना पूछे उनके ऑफिस में घुस जाया करता था और वो हँसकर कह उठती कि 'आइये, संचेती साहब।'

एक रोज अपनी आदत से मजबूर मैं धड़धड़ाता हुआ मैडम के ऑफिस में घुस गया। मेरे हाथ में एक जरूरी फाईल थी। अन्दर पाँव धरते ही मैं सन्न रह गया। मैडम अपनी रिवॉल्विंग चेयर पर बैठी रो रही थी और अनुराग आक्रोशित मुद्रा में दीवार की तरफ मुँह किए खड़ा था। मुझे आया देखकर मैडम ने जल्दी से ऑंसू पौंछे और बोली, 'आईये, संचेती साहब।'

'सॉरी मैडम मैं फिर आऊँगा।' मैं जाने को हुआ।
'अरे, आईये-आईये। कहिए क्या काम था?' मैडम ने रोक लिया।
'मैडम ये पेपर मिल के ऑर्डर पर आपके साईन चाहिये थे।' मैंने फाईल आगे बढ़ाते हुए धीरे से कहा।
मैडम ने चुपचाप साईन करके फाईल मुझे लौटा दी। मैं बिना एक भी शब्द बोले, वापस बाहर की ओर मुड गया। जाते हुए मेरी नजर अनुराग से मिली। देखकर मेरी रुह काँप गई, उसका चेहरा अजब कठोरता लिए था और ऑंखें विचित्र भयावह। मैं चुपचाप चला आया। मन में अजीब-सी ऊहापोह थी। 'क्या बात थी? मैडम क्यों रो रही थी?' अनुराग क्यों क्रोधित था? आदि आदि ...। कुछ देर सोचते रहने के बाद मैं अपने काम में लग गया। महिलाओं का छोटी-छोटी बातों पर रो पड़ना और अनुराग का अक्खड़पने में गुस्सा जाना, दोनों ही स्वाभाविक बातें थी। असामान्य कुछ नहीं था। किसी बात को लेकर कहासुनी हुई होगी। और क्या? बात आई गई हो गई।

दूसरे दिन, अनुराग ऑफिस नहीं आया। तीसरे दिन भी। चौथे, पाँचवे, छठे दिन भी। 'शायद मंदसौर गया होगा, छुट्टी लेकर' मैंने मन ही मन कयास लगाया। उधर मैडम भी बड़ी अनमनी-सी रहने लगी थी। ना किसी से पहले-सा हँसना बोलना, ना कोई बातचीत। एकाएक बड़ा परिवर्तन आ गया था, मैडम के व्यवहार में। हो सकता है, अनुराग ने कोई बदतमीजी कर दी हो, किन्तु उसके लिए मैडम क्यों उदास होती हैं? अब मुझे ये भी लगने लगा था कि हो सकता है मैडम ने गुस्से में आकर अनुराग को निकाल बाहर किया हो और अब बेचारे की हालत के बारे में सोच सोचकर परेशान हुई जाती हों।

करीब दस दिन बाद मेरे पास एक पत्र आया। लिखावट से ही मैं पहचान गया कि पत्र अनुराग का है। मैंने जल्दी-जल्दी पत्र को खोला और पढ़ने लगा। पत्र बढ़कर मैं सन्न रह गया।

भाई संचेती जी,
नमस्कार।
बिना आपको बताए, बगैर कुछ कहे-सुने इस तरह चुपचाप शहर छोड़ आने के लिए क्षमा चाहता हूँ। कुछ कहने-सुनने का अवसर ही नहीं मिला। ना ही हौसला हुआ। भाई, कई दफा जिस चीज के लिए इन्सान उम्रभर तड़फता है, अचानक ही उसे पा लेने पर उससे विमुख हो उठता है। तब उस चीज की महत्ता अपने स्वाभिमान के सम्मुख तुच्छ जान पड़ती है। कुछ ऐसा ही मेरे साथ हुआ कि मुझे इलाहाबाद छोड़ना पड़ा।
क्योंकि मैं अनुराग दीवान होकर जी नहीं सकता था।
आपका - अनुराग, बस।

सरला दीवान और अनुराग दोनों का चेहरा एक साथ मेरे मस्तिष्क में कौंध गया। दोनों में गजब का साम्य था ...।
(समाप्त)

7 अनकही



कहने को शहर में अलग घर है। घर का सारा सामान है। सुविधा की सारी चीजें हैं। किन्तु फिर भी खुद को बेघर पाता हूँ। घर में रहता कहाँ हूँ? दूसरे शहर में नौकरी और इस शहर में बीवी, बच्चे, घर। सब कुछ होते हुए भी, ना कुछ का हकदार मैं। रात गए चोरों की तरह आना और पौ फटते ही भाग जाना। या हफ्ते में सिर्फ एक दिन, रविवार के लिए आना और वो रविवार भी स्वेच्छा से नहीं जी पाना। दुर्दैव इससे कुछ भिन्न होता है क्या? पत्नी की नौकरी और बच्चे की परवरिश दोनों कारणों से 'ज्ञं' तो मकान होकर रह गया और ससुराल में रहना नियति। सारे-सारे दिन और कई-कई दिन ससुराल में रहते रहने पर 'जंवाईपन' कहाँ रह जाता है? आस-पड़ौस, गली-मोहल्ले वाले भी सोचते होंगे कि 'ये यहीं पड़ा रहता है।' किन्तु गरिमा का रुऑंसा चेहरा और भोली ऑंखें, अपने बच्चे को देखने की चाह, सारे सब के बावजूद भी हँसते-हँसते जीने की पैरवी करती हैं। तब विवश हो जाता हूँ। जी रोता है, पर बेबसी कुछ करने नहीं देती। तिस पर इसी शहर में आकर नौकरी करने का आग्रह मुझे बार-बार मेरी कातरता का अहसास करा जाता है। पहली बात तो यहाँ नौकरी होती, तो मैं क्यूँ परदेस में पड़ा होता? दूसरे, नई नौकरी के लिए पुरानी और स्थायी नौकरी को छोड़ना कौनसी समझदारी है भई? किन्तु पत्नी की नौकरी और बच्चे का ननिहाल में होता पालन-पोषण दोनों विचार एक साथ मेरी सोच को अपाहिज बना देते हैं। ऐसे में पत्नी का स्वाभाविक प्यार 'कहीं मत जाओ। यहीं रहो ना। कितने-कितने दिन में मिलते हैं। आपसे बातें करने का जी नहीं करता क्या?' भी तब स्वाभिमान को तमाचे मारता-सा जान पड़ता है। घर के सभी सदस्य काम-धंधे पर निकल जाएँ, औरतें घर के काम में व्यस्त हो जाएँ। तब 'जँवाईराजा' घर पर बैठकर क्या करे? अधिक से अधिक टीवी ऑन कर के बैठा रहे। यही न? कैसी तड़प होती है, तब भीतर।

कई बार जोर से रोने का मन होता है। कई बार सब कुछ छोड़-छाड़ कर, पत्नी की नौकरी छुड़वाकर बच्चे सहित अपने साथ ही ले जाने को जी करता है। पर तभी पढ़ी-लिखी पत्नी की नौकरी और उसे छोड़ने के बाद उसके मन में आने वाले 'नारी-उत्पीड़न' के विचारों के बारे में सोचकर हथियार डालने पड़ते हैं। बच्चे की परवरिश का सदका भी बीच में आकर खड़ा हो जाता है। मेरे घरवाले पहले ही पल्ला झाड़ चुके हैं। नौकरीपेशा पत्नी कैसे बच्चा पाले, तब?

तिस पर यूँ भी चुप्पी साधे रहता हूँ कि कहीं मेरे कुछ भी कहने को पत्नी अन्यथा ना ले जाए 'ये सब इतना करते हैं? फिर भी आप ऐसा सोचते हो। ज्यादा सोचते हो तो अपनी माँ को क्यों नहीं बुला लेते? कोई आए तब ना? ले चलो मुझे तो अपने घर। बेचारे परेशानी उठाकर ही रख रहे हैं मुझे, और आप हैं कि ... ।'

दिन भर मैला-कुचैला सा कुर्ता पाजामा पहने घर में पड़े रहना। पत्नी के पास भी बैठना तो इस खटके के साथ कि कहीं कोई आ ना जाए। तिस पर ससुराल में रहते हुए अपनी और अपने रिश्ते की गरिमा का ख्याल रखने की अतिरिक्त सावधानी, सा अलग। इतने मानसिक तनाव में प्यार किया जा सकता है भला? तब पत्नी कहे कि, 'आप गुमसुम क्यों रहते हो?' तो क्या जबाव दूँ? कोई बताए।

मैं आज की तारीख में कहीं का भी तो नहीं हूँ। माँ बाप का घर, जो नौकरी के लिए निकलते ही छोड़ दिया। छोड़ना ही पड़ता है। स्वाभाविक है। जहाँ नौकरी है वहाँ का घर, जो अक्सर बंद ही रहता है। वहाँ मैं रहता ही कितना हूँ? जिस शहर में पत्नी-बच्चे हैं, वहाँ का घर। जिसका बंद का किराया देना मेरे सिसकते स्वाभिमान को जिंदा रखने का झूंठा दंभ है और कुछ नहीं। तथा मेरी पत्नी का घर, यानि मेरा ससुराल। किन्तु मेरा घर कोई-सा भी नहीं है। क्या यूँ बेघर होने को घर 'बसाया' था? इससे अच्छा तो मैं अकेला ही था। मेरा जीवन या तो डेली अप डाऊन करता ट्रेन में बीत रहा है या रात के अंधेरे में ससुराल आकर सोने और पौ फटे ही निकल जाने में। ऐसे में रात को पत्नी के पास भी रहते हुए अपनेर् कत्तव्य का निर्वाह ठीक से नहीं कर पाता, जानता हूँ। मन की कोमल भावनाओं पर तन की थकन और दिमाग का तनाव ही हावी रहता है। तब पत्नी के सवाल 'आप हमसे प्यार नहीं करते?' का क्या जवाब दूँ? ईश्वर बताए।

अपने लिए, सोचता हूँ तो समय ही नहीं बचा। अपनी रुचियों, अपने दोस्तों, अपनी बातों के लिए अब कहाँ समय रहा? घर से निकलते समय 'जल्दी आ जाना। देखो एक दिन को तो आते हो, उसमें भी घूमते रहते हो।' सुनकर इतनी कोफ्त होती है कि कहीं जाकर मर जाने का मन करता है। शहर में हूँ तो क्या मुझे चौबीसों घण्टे ससुराल में ही रहना होगा? क्योंकि वहाँ मेरी पत्नी है। या घर से दो घड़ी भी बाहर अपनी सुविधा या अपने काम से बिना बताये जाना नहीं हो सकेगा? जाना होगा तो पक्का टाईम टेबिल बताकर। वरना नहीं। इतनी पाबंदी और ऐसी तनावयुक्त जिन्दगी दरम्यान की दूरियाँ बढ़ा सकती है, प्यार नहीं। प्यार, कोई तिल का लड्डू थोड़े ही है जो चाहे जब खा लिया जाए या दिनभर खाते रहा जाए।

किन्तु पत्नी के भोलेपन और निहायत निश्चछलता के सम्मुख सारे गुस्से को पीकर 'जल्दी आ जाऊँगा' कहने के अलावा कुछ और सूझता ही नहीं। थोड़ा-सा मुस्कुराना भी नहीं भूलता मैं ...।
'इतने हिस्सों में बँट गया हूँ मैं - मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं।'

... सोचते-सोचते अखिल को पता ही नहीं चला कि कब स्टेशन आ गया। पैसेंजर के यात्रियों के शोर-शराबे और ईंजन की सीटी ने मिलकर उसकी तन्द्रा भंग की। उसने अपना छोटा सा बैग, जिसमें एक पानी की बोतल, सुबह का अखबार और चश्मे के अलावा कुछ नहीं होता, उठाया और डब्बे के गेट पर आ गया। घिसटती ट्रेन आखिरी एक जोरदार ब्रेक के साथ रुकी। चढ़ने-उतरने वालों के बीच जोर आजमाईशें होने लगी और इसी धक्का-मुक्की में से रास्ता बनाते हुए अखिल जैसे-तैसे स्टेशन पर उतरा। उतरते ही उसने इधर-उधर देखा और तेज कदमों से स्टेशन से बाहर की ओर चल दिया। सामने ही एक टैम्पू वाला चिल्ला रहा था, 'मोदी, मन्डी, कैम्प, सदर ... ' अखिल ने रुकने को हाथ दिया और '... मोदी?' कहता हुआ टैम्पों में लटक गया, टैम्पो चल पड़ा।

'मोदी मिनरल' वो कम्पनी है, जहाँ, अखिल जूनियर इंजीनियर की हैसियत से काम करता है। मन्डी, कैम्प, सदर ... आदि उस मार्ग में पड़ने वाले अन्य स्टॉपेज हैं। मोदी में अखिल को सुबह नौ से पाँच बजे तक काम करने की ग्यारह हजार रुपये पगार मिलती है। देखने में पगार कम नहीं है। उस पर पत्नी की पगार तथा थोड़ा बहुत इधर-उधर का लेना देना आदि मिल-मिला कर एक अच्छी खासी रकम महिने पर हाथ में आती है। पर ना जाने कहाँ चली जाती है? इतनी जगह बँटी है जिन्दगी कि खर्चे भी बहुत बढ़ गये हैं। जिस पर माँ बाप के प्रति उसकार् कत्तव्य, अलग। कई बार तो दो-दो महिने तक एक पैसा तक नहीं भेज पाता घर। बड़ा अपराध बोध होता है तब 'सारा पैसा उड़ा क्यों देता हूँ मैं?' बचत के नाम पर भी शून्य। बैंक-बैलेंस के नाम पर चार पाँच हजार रुपये मात्र। कलाई उठाकर घड़ी, देखी पौने नौ बज रहे हैं। 'समय पर पहुँच जाऊँगा वरना तो डाँट सुनने को मिलेगी।' वैसे अब अखिल डाँट सुनने का भी अभ्यस्त हो चुका है।' उसकी जगह कोई और होता तो अब तक निकाल दिया गया होता। किन्तु वह रुका है - उसके काम के कारण। काम से मालिक खुश हैं।

... पाँच बजे का सायरन बजते ही अपना झोला उठाकर सड़क की तरफ दौड़ना, किसी टैम्पो को हाथ देकर रोकना और पुनः चल पड़ना रेल्वे स्टेशन की तरफ। छरू बजे वाली पैसेन्जर पकड़ने के लिए। या कभी अपने बंद पड़े एक कमरे के मकान में जा रुकने के लिए। अखिल का यहाँ वाला मकान मालिक भी उस से बड़ा खुश है। बंद मकान का किराया जो मिलता रहता है उसे। तिस पर बिजली पानी का कोई खर्चा नहीं। पाखाना खराब होने की कोई खिच्-खिच् नहीं और रोज-रोज की हिल-हुज्जत नहीं। अखिल के इस 'बेघरपन' का फायदा अगर किसी को हो रहा है तो वो उसके मकान मालिकों को। यहाँ वाले भी और वहाँ वाले भी। उसकी बड़ी तारीफें करते हैं 'बड़ा भला आदमी है। इतनी बड़ी नौकरी करता है, पर जरा भी गुमान नहीं। वगैरह-वगैरह।'

रात को चारपाई पर पड़ते ही पुनः अपने दुर्भाग्य का ख्याल आ जाता है उसे। पत्नी से दूर, बच्चे से दूर। कैसा गृहस्थ है? किसके लिए कर रहा हूँ, हाड़तोड़ परिश्रम? ये रोज की भागदौड़, ये नित का तनाव। सबकुछ छोड़छाड़ कर चल देने का जी करता है। किन्तु अगले ही पल वह 'आगे की' सोचकर रह जाता है। मन भावुक होने लगता है तो मस्तिष्क क्रियाशील हो उठता है। 'सब ठीक हो जाएगा' कहकर खुद को सान्त्वना देता है और सो जाता है। सुबह उठकर पुनः दौड़ने के लिए ...

(समाप्त)

8 कभी यूँ भी तो हो



पूस की घनी सर्द रात थी। दिल्ली से लौटते हुए लक्सरी बस की फोम वाली सीटों पर बेसुध आफिसर्स हिचकोले खाते और खर्राटे खेंचते भारी बोरों की तरह पड़े थे। सर्द झोंके लाख चाहकर भी बस के मोटे कांच को परास्त नहीं कर पा रहे थे। जुगल की शादी से लौटते हुए सारे अफसर और कर्मचारी अपनी-अपनी निद्रा में मग्न, गर्म कपड़ों से खुद को लादे यूँ पड़े थे, मानों लाशें पड़ी हों। बस उनके खर्राटों की आवाजें ही उनके जिन्दा होने का प्रमाण दे रही थी।

सभी ऑफिसरों के वे नाम और ओहदे जो दिन की रोशनी में एक-दूसरे को बड़ा-छोटा मानते हैं, वो भी इस कड़कड़ाती ठंड में कहीं किसी निवाये से कोने में दुबक गए थे, शायद। इस वक्त सब एक जैसे थे - सिर्फ धुँआ उगलती, खर्राटे लेती लाशें।

... सारी बस में, ड्राइवर के अलावा अगर कोई जाग रहा था तो वो थीकृदीक्षा। दीक्षा ने मुट्ठी में कुछ दबा रखा था, शायद परिमल का पत्र था। जिसे वो कई बार पढ़ चुकी थी ... मगर निर्णय नहीं कर पा रही थी। क्या करे? क्या ना करे? असमंजस के चौराहे पर खड़ी दीक्षा इस बर्फीली रात में भी जागी ऑंखों से बस वही सब सोच रही थी ... जिसको सोचने का उसके घर में किसी और के पास वक्त नहीं था। उसने एक बार फिर परिमल का पत्र खोला और बस की मध्दिम नीली रोशनी में ऑंखों के बहुत पास लाकर पढने लगी, '... दीक्षा, बहुत प्रतिक्षा कर ली तुमने। अब और समय शेष नहीं रहा, गँवाने को। ... हम कोर्ट में शादी कर लेंगे। मेरे घरवालों को तो शायद मोटे दहेज के लालच ने इस विवाह के विरुध्द कर रखा है। किन्तु लगता है कि तुम्हारे माँ-बाप को भी लड़की की कमाई का चस्का लग गया है ... वरना घर में बैठी विवाह-योग्य लड़की को यूँ अनदेखा ना करते। ... तुम चाहो तो इसी हफ्ते एक दिन ही की केजुअल ले लो, हम लोग शादी कर लेते हैं ... वैसे भी स्वार्थी लोगों की दुआएँ बेअसर होती हैं, इसलिए तुम्हारे और मेरे घरवालों की उपस्थिति-अनुपस्थिति का कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा ... अगर मँजूर हो तो फोन करना ... तुम्हारा-परिमल।'

अचानक दीक्षा को जुगल की शादी का दृश्य याद हो आया। कैसे सुन्दर लग रहे थे, दोनों शादी वाली कुर्सियों पर बैठे? वह कल्पनालोक में खो गई। सोचने लगी, उन कुर्सियों पर वो और परिमल बैठे हैं ... सोचते-सोचते उसके कानों की लवें तपने लगी। विचार तब टूटे जब ब्रेकर पर बस जोर से उछली और सारी सवारियों के साथ वो भी उछल पड़ी।

... दीक्षा जब इण्टर में थी और शिखा बी.ए. में, तभी अचानक उनके पिताजी किसी जरा-सी कहासुनी पर नौकरी से निकाल दिए गए। तंगी के दिन शुरू हो गए थे। घर में गुजारा चलाने के भी लाले पड़ गए थे। शिखा, दीक्षा, निशा और प्रदीप चारों की पढ़ाई का खर्च अलग। बड़ा कठिन समय आ गया था। किसी जान-पहचान वाले की सिफारिश से शिखा दीदी को एक प्राईमरी स्कूल में टीचरी मिल गई। दीक्षा भी पढ़ाई छोड़कर छोटे-मोटे टयूशन पढ़ाने लगी। घर की गाड़ी जैसे-तैसे सरकने लगी। प्रदीप तब दसवीं में था और गुड्डी (निशा) छठी में। बेटियों की कमाई से घर चलने लगा। लोग बातें बनाने लगे।
पिताजी को बेटियों की रोटियाँ कचोटने लगी। लोगों ने नसीहतें दे-देकर जीना दूभर कर दिया था। पिताजी ने बहुत भागदौड़ की, पर किसी अन्य नौकरी का जुगाड़ नहीं बैठ पाया। एकाध जगह काम किया भी तो वहाँ उनकी पटरी मेल नहीं खा पाई। इस बीच दो बार उनको दिल का दौरा भी पड़ चुका था। जिसने परिवार की माली हालत को और भी चकनाचूर कर दिया था। महँगा ईलाज ही एक उपाय था, जीवन रक्षा का।

शिखा और दीक्षा दोनों दिन-रात खटने लगी ... घर का काम चलता रहा। इस बीच शिखा करीब-बत्तीस साल की हो गई। किन्तु माँ और पिताजी ने कभी भी उसके विवाह की चिन्ता नहीं दिखाई। पिताजी तो शायद मजबूर थे और माँ, किस बूते पर विवाह की चिन्ता जगाती मन में? इन लड़कियों की कमाई से ही तो घर चल रहा है। ये भी जाती रही, तो? पास-पड़ौस की औरतें बातें बनाती, तो माँ चुपचाप वहाँ से उठकर चली आती। पिताजी को दिल के दौरे से अधिक यही घुन खाये जा रहा था। वो दिन-ब-दिन सूखते जा रहे थे।

जब सारे रिश्तेदार भी टोकने लगे तो, पिताजी ने भागदौड़ करनी शुरू की। किन्तु सब जगह मोटे दहेज की माँग के सम्मुख बेबस होकर रह गये। अंत में हार कर या शायद रस्म आदायगी की तरह भार उतारने भर की गर्ज को उन्होंने शिखा का हाथ एक दूजबर, दो बच्चों के बाप के हाथ में देकर मुक्ति पा ली और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ा। शिखा ने भी नियति के सम्मुख समर्पण कर दियाथा। शायद भाग्य में इससे ज्यादा था भी नहीं।

शिखा के चले जाने के बाद गृहस्थी का बोझ अकेली दीक्षा के कंधों पर आ गया। दीक्षा इस बीच प्राइवेट बी.ए. कर गई सो शासन सचिवालय में अस्थाई क्लर्क हो गई। घर और घरवालों को शिखा के जाने का अहसास ज्यादा नहीं खला।

... समय गुजरता रहा। दीक्षा स्थाई हो गई। प्रदीप को उसने बी.ए. तक पढ़ा दिया। अपने सम्पर्कों से उसकी नौकरी का भी बंदोबस्त करा दिया। चार हजार रुपये महावार उसे मिलने लगे। किन्तु दीक्षा को कोई राहत नहीं मिली। बेटा कमाने लगा। किन्तु माँ बाप को फिर भी बेटी का ख्याल नहीं आया। दीक्षा भी उम्र के ढलान की तरफ चल पड़ी ... ठीक शिखा की तरह। किन्तु किसी की इस ओर कोई तवज्जो नहीं जान पड़ती थी।

उधर माँ, अब दिन-रात प्रदीप की बहू लाने के सपने सजाने लगी थी। खाती-कमाती लड़की लाना चाहती थी। थोड़ा बहुत दान-दहेज भी आ जाए, ये मंशा भी उनके भीतर कहीं छुपी थी। दीक्षा का ख्याल तब भी उनके जेहन से नदारद था। कभी कभार कह जाती, 'प्रदीप का ब्याह हो जाए तो दीक्षा के भी फेरे फिरा दूँ।' दीक्षा जब यह सुनती तो मानो भीतर तक सुलग उठती। उसको अपने साथ-साथ गुड्डी का भविष्य भी दिखाई देने लगता।

इस बीच दीक्षा का परिचय विद्युत भवन में जूनियर इंजीनियर के पद पर कार्यरत परिमल से हुआ। परिचय मेल-मिलाप में बदल गया और दीक्षा परिमल के ख्वाब सजाने लगी। परिमल भी उसे चाहने लगा। एक बार वो किसी बहाने परिमल को घर भी ले आई। उसकी खूब बढ़-चढ़कर तारीफें भी की माँ से। किन्तु माँ के कान पर जूँ नहीं रेंगी।
यही सब सोचते हुए उसने परिमल का पत्र मोड़ कर पर्स में रख दिया। पर्स बंद करते समय ध्यान आया पिताजी की दवाओं का पर्चा भी रह रहा है। कल सबसे पहले दवाएँ लेगी। सुबह ही तो माँ ने बड़े, संकोच के साथ परचा दिया था 'दीक्षा, दवा ले आएगी?'

'प्रदीप से कहा था?' दीक्षा ने पूछा था। क्योंकि वो जानती थी कि परचे में महंगी-महंगी दवाईयाँ लिखी हैं।
'वो कब सुनता है? उसके भरोसे तो परचा तीन दिन से पड़ा ही है।' उसने परचा चुपचाप मोड़कर पर्स के हवाले किया था और अपना बैग उठाकर चल पड़ी थी।

जुगल की शादी में जाने का यूँ तो उसका कोई पूर्वनियोजित कार्यक्रम नहीं था। पर घर की घुटन से कुछ समय को दूर जाने की गरज से वो चल पड़ी थी। कुछ घण्टों की ही सही ताजी हवा तो मिले। अब तो वो बुरी तरह तंग आ चुकी थी अपनी हालत से। अपने जीवन से। वह नहीं जान पा रही थी कि कब तक, आखिर कब तक माँ बाप उसकी भावनाओं को इसी तरह कुचलते रहेंगें? परिमल भी कब तक मनुहारें करेगा? कब तक प्रतीक्षा करेगा? दीक्षा सोचते-सोचते दृढ़ होती गई। मन ही मन एक निश्चय करने लगी। बस के बाहर धीरे-धीरे उजास फैल रहा था, चहचहाटें जागने लगी थी। कुछ ही देर में जयपुर आने वाला था। ऑफिसर्स में भी हलचल होने लगी थी ... सब धीरे-धीरे हिलने- डुलने लगे थे।

बस ने उसे सीविल लाईन्स स्टॉप पर उतार दिया। ... घर जाने के लिए जब वो बाईस गोदाम वाली पुलिया चढ़ रही थी तो एक-एक कदम उसका ठोस था। एक-एक साँस दृढ़ थी। मन का निश्चय अब मस्तिष्क का निश्चय भी हो गया था। घर पहुँचते ही उसने एक कागज लिया और अगले दिन की केजुअल लीव की दरख्वास्त लिख डाली।
... और एक गहरी साँस छोड़ती हुई कुर्सी की टेक पर गर्दन पीछे की ओर लटका कर बैठ गई। ओऽऽफ्फ्।
(समाप्त)

9 डिस्गस्टिंग



गर्ल्स कॉलेज के हॉस्टल में अजीब-सा तनाव और खामोशी पसरी पड़ी थी। अहाते में खड़ी लड़कियाँ कानाफूसी कर रही थी। गेट पर खड़ा गार्ड मुस्तैदी से अपनी बन्दूक सम्हाले खड़ा था। हॉस्टल वार्डन वीणा मैडम छुट्टी पर थी, इस बात का सभी लड़कियों को बेहद अफसोस था। वो होती तो जरूर कुछ करती। लड़कियाँ उनकी बहुत इज्जत करती थीं। पास ही मैटर्न ऑंटी खड़ी थी, जो अचम्भित-सी इधर-उधर देख रही थी।

रिक्की अकेली अहाते में पड़े सोफे पर बैठी किसी अंग्रेजी मैग्जीन के पन्ने पलट रही थी। उसके चेहरे पर कोई परेशानी नहीं थी। बल्कि थी, वही मुस्कुराहट। कलेक्टर की बेटी, वाली ठसक भरी मुस्कुराहट। हॉस्टल के सारे दरवाजे बंद करवा दिये गये थे। और कैम्पस में हर किसी से कड़ी पूछताछ की जा रही थी।

आमतौर पर ऐसा कभी नहीं होता। सभी लड़कियाँ सम्पन्न खाते-पीते परिवारों से हैं। पढ़ी-लिखी मैच्योर लड़कियों को कभी इस दृष्टि से देखा भी नहीं गया। किस पर शक करें? और किस पर नहीं? बड़ी कठिन उलझन थी। चूँकि पहली बार इस तरह की घटना घटी थी, सो कोई भी कुछ भी कहने, करने में समर्थ नहीं जान पड़ता था। चीफ वार्डन, प्रिंसिपल, सीनियर प्रोफेसर्स आदि के साथ कॉलेज मैनेजमेण्ट की दो घण्टे तक चली मीटिंग में किसी एकमत निर्णय पर कोई नहीं पहुँच पा रहा था।

'लड़कियों को बारी-बारी से कमरे में बुलाकर पूछताछ की जानी चाहिए' एक अधेड़ प्रोफेसर का सुझाव।
'पूछताछ से कुछ हासिल नहीं होगा मिसेज भादुड़ी। सब एक-दूसरे को बचा जाएँगी' प्रिंसीपल बोली थी।
'पुलिस बुलवा ली जाए' मिसेज अवस्थी बोली।

'नहीं भई, बदनामी हो जाएगी। लडकी का मामला है, समझा करो। कोई ऊँच नीच हो गई तो?' प्रिंसीपल फिर बोली।
'फिर किया क्या जाए?' कॉलेज प्रबंधक ने झल्लाते हुए कहा।
'सर आप कहें तो मैं एक सजेशन देना चाहूँगी।' एक दुबली-पतली सी नयी आयी लेक्चरर बोली। उसके विभाग में कोई और उपलब्ध नहीं था सो वो मिटिंग में आयी थी। सभी ने एक साथ घूर कर उसकी ओर देखा मानो पूछ रहे हों 'कल की लौंडिया क्या बताएगी?'
'हाँ, हाँ बोलो रूपा' प्रबंधक ने कहा।

'सर क्यों ना टीचर्स की कुछ टोलियाँ बना दी जाएँ और एक-एक कमरे की तलाशी ले ली जाए।' उसने धीरे से अपनी बात कही।
'एक्सीलेण्टश् प्रबंधक उछल पड़ा, 'पुलिस वाला लफड़ा भी नहीं होगा और काम भी हो जाएगा। तुरन्त सिक्योरिटी ऑफिसर को कहो कि कुछ गार्डस् लेकर टीचर्स के साथ हॉस्टल में तलाशी के लिए जाए। शाबास रूपा ... ' सभी बूढ़ियाँ बैठी खीसें निपोरती रह गयी। हॉस्टल वार्डन वीणा मीटिंग में मौजूद नहीं थी और कॉलेज प्रशासन का मानना था कि उसी की लापरवाही से लड़कियाँ अधिक स्वच्छंद हुई हैं और उसी की परिणति है, ये घटना। वो छुट्टी पर थी। उसकी गैर माजूदगी में उससे एक्सप्लेनेशन माँग लिया गया था।

पूरे कॉलेज में यह बात फैल गई थी कि गर्ल्स हॉस्टल में रहने वाली रिक्की ग्रेवाल का मोबाईल फोन चोरी हो गया है और वो पुलिस में रिपोर्ट लिखवाना चाहती थी, पर कॉलेज वालों ने रोक लिया। तिस पर यह तुर्रा और कि रिक्की फलाने कलेक्टर साहब की लड़की है, सो तो फिर मामला गंभीर होगा ही। हालाँकि कलेक्टर के लिए पाँच सात हजार का मोबाइल खो जाना कोई बड़ी बात नहीं थी। बात थी, इस बहाने अपनी गिनती वीवीआईपी में करवाने की और वार्डन वीणा मैडम से बदला लेने की। बहुत टोका-टाकी करती थी साली, 'रिक्की, लड़कों के साथ मत घूमो। ये मत करो वो मत करो। ये पहनो, वो मत पहनो। टाईट मत पहनो। लोकट मत पहनो। यहाँ जाओ, वहाँ मत जाओ ... साली के पास खुद के पास तो कुछ 'सामान' है नहीं। सपाट छाती लेकर कहाँ जाए? हमें ज्ञान देती है ... ।' वीणा, प्रिंसिपल से और प्रबँधक से कई दफा रिक्की की शिकायतें कर चुकी थी। पर हर दफा कलेक्टर की लडकी होना उसका कवच हो जाता था। हॉस्टल से मोबाइल चोरी होने से वार्डन की लापरवाही साबित होती है, रिक्की खुश थी। अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे।

रिक्की ग्रेवाल, एक कलेक्टर बाप की एक बिगडैल लड़की। नये फैशन के कपड़े, मँहगे परफ्यूम, पेंसिल हील सेंडल्स, भडकीले नेल पेन्टस् और ना जाने क्या-क्या? उसकी आदतें बन चुके हैं। ऑंखों में नीले रंग के कांटेक्ट ग्लासेज और कानों में चार-चार बालियाँ पहनने वाली रिक्की देखने में गेहुँआ रंग की, गदरायी देहयष्टि वाली, तीखे नैननक्श और चंचल ऑंखों वाली एक शोख लड़की थी। लोकट गले वाली टाईट टीशर्ट और स्किन टाइट जीन्स पहनना और जानबूझ कर इस तरह से उठना-बैठना, झुकना, चलना कि लोगों की आहें खुद-ब-खुद होठों पर आ जाएँ। कॉलेज के लड़के भद्दे-भद्दे ईशारे करते रहते हैं। पर वो है कि इस सब से बेखबर मुस्कुराती रहती है। दो, तीन या चार, या ज्यादा लडके उसकी अदाओं के चाबुक खाते थे और बारी-बारी से शाम को बाईक लेकर उसकी हाजरी में मेनगेट पर खड़े रहते थे। रिक्की आती, सनग्लासेज लगाती, लड़के की कमर पकड़ कर चिपक कर बैठती, बाईक का एक्सीलेटर खुद-ब-खुद दब जाता। कुल मिलाकर गजब की सैक्स अपील वाली मॉडर्न लड़की थी, रिक्की। जो ब्वॉय फ्रेन्ड्स भी कपड़ों की तरह बदलती थी।

... दिन का समय था। एक गार्ड को गेट पर तैनात करके तथा सभी लड़कियों को अहाते में इकट्ठा करने के बाद। टीचर्स की दो-तीन टोलियाँ हॉस्टल में धड़धड़ाती हुई आई और छापामार पध्दति से एक-एक कमरे की तलाशी लेने लगी।

एक कमरे में लडकी का बैड़ हटाकर देखा तो गद्दे के नीचे फैंटेसी मैग्जीन निकल कर पड़ी। सुमित्रा जी जो कि गृहविज्ञान की प्रोफेसर थी और काफी उम्रदराज महिला थी, ने उस पुस्तक के पन्ने पलटे तो उनके होश ही उड़ गए। अश्लील मुद्राओं में नग्न स्त्री-पुरुषों की कामुक तस्वीरों से मैग्जीन अटी पड़ी थी। पता करने पर पता चला कि यह कमरा तो आशा का है। सुनकर और अधिक धक्का लगा। दब्बू-सी दिखने वाली, हॉस्टल की सबसे सीधी लड़की माने जाने वाली के कमरे से इस तरह की सामग्री का निकलना? हे भगवान!

खोजबीन में लड़कियों के पास से मँहगे-मँहगे परफ्यूम, ब्वॉय फ्रेन्ड्स के साथ खिंचवाये उनके फोटो, अनगिनत प्रेम पत्र, सूखे फूल और ना जाने क्या-क्या निकलने लगा। मोबाइल को अब टीचर्स भूल गईं और निकलने वाली विस्मयकारी चीजों के बारे में कानाफूसी करने लगीं। क्योंकि ये तलाशी अभियान अप्रत्याशित रूप से, अचानक और दिन में हुआ था, अतरू लड़कियों को आपत्तिजनक चीजें छुपाने का अवसर नहीं मिल पाया था।

सभी के कमरे से कुछ ना कुछ गैरमामूली चीजें निकल रही थी। एक कमरे की अलमारी से बीयर की कुछ बोतलें और सिगरेट के खाली डिब्बे निकले। अश्लील फोटो वाले ताश के कई पैकेट निकले। आश्चर्य तब हुआ जब तलाशी टीम रिक्की के कमरे में आई। अन्य फैशनेबल चीजों के अलावा, रिक्की की मेज की दराज में माला-डी का पत्ता मिला। जिसमें से कुछ गोलियाँ खाई जा चुकी थी। सुलक्षणा मैडम ने देखकर वापस पैकट को दराज में डाल दिया। पर सोचने लगी, 'रिक्की को इसकी क्या जरूरत पड़ती होगी?' फिर अगले ही पल सोचा 'हो भी सकता है, बिगडैल तो है ही, बदचलन भी हो क्या पता?' और आगे बढ़ गई।

लगभग तीन घण्टे तक चले इस हँगामाखेज तलाशी अभियान के बाद सारी टीचर्स आपस में खुसफुसाती हुई और अहाते में खड़ी लड़कियों को घूरती हुई हॉस्टल से निकलने लगी। सभी लड़कियाँ नजरें झुकाए अपराधी की भाँति खड़ी थी। तभी रिक्की ने पीछे से पुकारा 'प्रिंसिपल मैम'।

प्रिंसिपल पलटी '?'
'मैम, हम चाहते हैं कि वार्डन मैम के कमरे की भी तलाशी ली जाए' रिक्की ने बेझिझक कह डाला।
'क्या?' सब अवाक् एक-दूसरे की ओर देखने लगी। 'तुम्हारा क्या मतलब है रिक्की? तुम जानती हो, ये तुम क्या कह रही हो?' प्रिंसिपल ने डपटते हुए कहा।

'मैं अच्छी तरह से जानती हूँ कि मैं क्या कह रही हूँ। जब हॉस्टल के एक-एक कमरे को छाना गया है तो वार्डन के कमरे को क्यों छोड़ दिया गया, बताईये?'
'पहली बात तो इस समय वीणा यहाँ है नहीं। उसकी गैरहाजरी में ताला कैसे खुल सकता है? दूसरी बात, वो एक अच्छी अध्यापिका है, उसके खिलाफ ऐसी-कार्यवाही करने से पहले हमें एक बार सोचना पड़ेगा।' प्रिंसिपल ने सफाई दी। सारी लड़कियाँ भी रिक्की के प्रस्ताव से अचम्भित थी। वीणा मैम चुरायेंगी इसका मोबाइल?

'हमारे रुम्स की तलाशी भी हमारी गैरहाजरी में ही हुई है। दूसरी बात, मैडम कमरे की चाबी तो एस्टेट ऑफीसर को जमा करा जाती हैं। उनसे चाबी लेकर रूम खोला जा सकता है।' रिक्की ने ढीठता से कहा। बेशर्मी उसके चेहरे पर हिल्लोरें मार रही थी।

... वीणा का कमरा खोला गया। प्रिंसिपल और दो अन्य अध्यापिकाएँ अन्दर गई बाकी सभी बाहर रहे। कमरे के दरवाजे पर हुजूम लग गया। वीणा के कमरे की एक-एक चीज को उलट पटक कर देखा जाने लगा। सामान के नाम पर चंद कपड़े, कुछ किताबें, दो जोड़ी चप्पल, एक दीवार पर टंगा छोटा शीशा और उसके साथ ही कील पर अटका कंघा, एक बिस्तर और कुछ बर्तन। साधारण घर की गरीब लड़की थी, वीणा। सभी के मन में उसके प्रति सहानुभूति थी। किन्तु इस बेशर्म लड़की ने जिद्द पकड़ ली, सो बेमन से कमरे की तलाशी करनी पड़ रही थी, उन्हें। तभी, सुलक्षणा मैडम ने वीणा की मेज की दराज खोली तो अचानक चौंक गई और दराज खुली छोड़कर पीछे हट गई। प्रिंसिपल ने आगे बढ कर देखा तो वो भी अचम्भित रह गई। बाकी टिचर्स भी घिर आई। सबके चेहरे फक्क्। प्रिंसिपल ने उठाया तो दराज से मोबाइल फोन निकला। लड़कियाँ सित्कार कर उठी। कानाफूसियाँ तेज हो गई। प्रिंसीपल हाथ में मोबाईल फोन लिए तेजी से कमरे से बाहर निकल गई। टीचर्स भी। पीछे गहरा सन्नाटा और भौंचक्का असमंजस मुँह बाए खड़े थे। लड़कियों के बीच भारी मतभेद था। कोई-कहती, 'मैं ना कहती थी, ये मैडम दिखाने की सख्त है।' कोई कहती, 'नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। जरूर कोई चाल है।' जितने मुँह उतनी बातें।

रिक्की खुद हैरान थी। रिक्की ने तलाशी ये सोचकर नहीं करवाई थी कि उसे वीणा मैड़म पर चोरी का शक था। बल्कि इसलिए कराई थी ताकि उसके कमरे से मामूली चीजें, सस्ते कपड़े और सूखी नेल पालिश निकलेगी तो बड़ा मजा आएगा। लड़कियों के बीच मजाक बनेगी। मन से तो वो भी जानती थी कि वीणा मैडम ऐसी नहीं हैं। अब, लेकिन वो भी अचम्भित थी, ये क्या हो गया?

वीणा, घर से लौटी उसे नौकरी से निकालने का आदेश थमा दिया गया था। किसी ने उसकी एक ना सुनी। सफाई तो दूर किसी ने उसको ये तक कहने का अवसर नहीं दिया कि 'मैं बेकसूर हूँ।' वीणा चुपचाप अपना सामान लेकर चली गई। जाती हुई वीणा को सभी संदेह और असम्मान की नजर से देख रहे थे। जिस वीणा को स्टेशन से लेने छोड़ने कॉलेज की गाडी जाती थी। उसी वीणा को छोड़ने मेनगेट तक भी कोई नहीं आया। टैम्पो में बैठकर वीणा चली गई। पीछे तरह-तरह की बातें होती रही।

समय धीरे-धीरे बीतता गया। एक दिन ... दोपहर का समय था, डाकिये ने आकर सारी डाक मैटर्न ऑंटी को सम्हला दी। सभी लड़कियाँ अपनी-अपनी चिट्ठियाँ दौड़-दौड़ कर पकड़ने लगी और एक-दूसरे को चिल्ला-चिल्ला कर बताने लगी 'लैटर्स आ गए।'

रिक्की भी अपनी चिट्टियाँ ले गई। और बिस्तर पर बैठकर लापरवाही से एक-एक लिफाफे को फाड़-फाड़ कर देखने लगी। किसी में कुछ था किसी में कुछ। उनमें से एक पत्र उसके एक प्रेमी तथा सहपाठी रहे विशाल सलूजा का भी था। जो पिछले दिनों उससे मिलने भी आया था। दोनों ने खूब ऐश की थी। वो आजकल अहमदाबाद में मैनेजमेंट का कोर्स कर रहा है। रिक्की ने विशाल का खत खोला और लगी पढ़ने। पत्र में हाल ही बिताये गये मस्ती भरे दिनों का ही जिक्र मुख्य रूप से लिखा था। पढ़तें पढ़ते अचानक वह, ठिठक गई और खड़ी हो गई ... '... रिक्की याद है हमने लेक में बोटिंग की थी तो बोट वाला क्या कह रहा था? तुम्हारा जोड़ा बहुत सुन्दर है। उस दिन जो फिल्म देखी थी उसकी स्टोरी मुझे कुछ पता ही नहीं चली ... पूरे समय तो मैं तुममें खोया रहा। और हाँ, उस दिन थियेटर में पता है तुम अपना मोबाईल सीट पर गिरा आई थी। मैंने उठा लिया था और जानबूझ कर तुम्हें नहीं बताया था। सोचा था खूब परेशान हो लोगी तब बताऊँगा। आते हुए मैं वो मोबाईल वीणा मैम को दे आया था ... उम्मीद है मिल गया होगा ...।'
(समाप्त)

10 विश्वासघात


अच्छा खासा कमा-खा रहा था। बैठे-बिठाये एक कॉलेज में आवेदन कर दिया और लौटती डाक से साक्षात्कार के लिए बुला लिया गया था।
इन्टरव्यू में बहुत से लोग आए हुए थे। कोई कहीं से, कोई कहीं से। कई विषयों के लिए एक साथ साक्षात्कार बुलाया गया था। अजीब चहल-पहल थी। हर तरफ नौकरी के उम्मीदवार ही घूमते फिर रहे थे। अजब तनाव भरी रेलमपेल थी। मैं अपनी बारी के इन्तजार में इधर-उधर टहलता रहा, कॉलेज में घूमता रहा। निश्चिंत था, क्योंकि मेरे हाथ में ऑलरेडी एक नौकरी थी। सो, बेधड़क इधर-उधर घुस-घुस कर देख रहा था। सुबह जल्दी का आया हुआ था और दोपहर के दो बज रहे थे, सो पेट भी दुहाई देने लगा था। सोचा, चलो कैंटीन में जाकर कुछ खा लिया जाए, तब तक नम्बर भी आ जाएगा। अपना बैग उठाकर कैंटीन की ओर चल दिया।

लौटकर आया और पता किया तो मालूम हुआ कि हमारा नाम कई दफा पुकारा जाकर अनुपस्थित घोषित कर दिया गया है और हमारे विषय का साक्षात्कार समाप्त हो गया है। मन में ये मलाल तो हुआ कि इंटरव्यू नहीं दे पाये, किन्तु ये तसल्ली भी थी कि 'कौन से बेरोजगार हैं?' तभी देखा कि एक छोटे कद की लड़की बड़ी व्यस्त-सी कभी इधर, कभी उधर बार-बार भागी दौडी फिर रही है। हमें लगा हो ना हो, यह किसी महत्त्वपूर्ण पद पर है और इंटरव्यू की अधिकृत जानकारी इससे मिल सकती है। हमने तेजी से पुकारा 'एक्सक्यूज मी प्लीज' वो पलटी और बड़ी तत्परता से हमारी नजर के इशारे पर हमारी ओर बढ़ने लगी। नजदीक आकर बोली 'जी, कहिए।'

'मैडम, क्या इतिहास विषय के साक्षात्कार खत्म हो चुके हैं?'
'हाँ, कभी के।'
'मैं ... विश्वास ... डॉ. विश्वास'
'अरे! आप हैं डॉ. विश्वास? कब से पुकार रही हूँ मैं? कहाँ चले गये थे आप?'

'जी नाश्ता-पानी करने चला गया था, जरा। खैर, कोई बात नहीं, चलता हूँ।' कहते हुए मैंने मुस्कुराते हुए अपना थैला उठाया।
'जरा ठहरिए, मैं जरा भीतर पूछ कर आती हूँ। शायद, आपका इंटरव्यू हो जाए।' वो थोड़ा 'हैल्पिंग' लगी।

'नहीं, जाने दीजिए। अब क्या फायदा? सलेक्शन तो हो ही चुका होगा।'
'ठहरिए तो जरा। हो सकता है, आप अधिक उपयुक्त निकल आएँ'ए वो मुस्कुराई थी इस दफा। मैं खड़ा रह गया।
थोड़ी देर बाद वह फिर लौटी 'चलिए विश्वास जी, आपको भीतर बुला रहे हैं।' सुनकर एक बार को आश्चर्य हुआ और मन ही मन लड़की का महत्त्व भी महसूस हुआ। 'जरूर मैनेजमेन्ट की खास होगी' मन में सोचा और भीतर की ओर बढ गया।

जो कुछ आता था, बताया। जो नहीं आता था, नहीं बताया। कहसुन कर बीस मिनट में बाहर निकल आया। चलते-चलते ये कह आया था कि बन्दा 'नौकरीशुदा' है। 'आंक' सको तो ठीक, वरना हम चले। बाहर आकर भीतर जाने की अपनी बारी का इन्तजार कर रही भीड़ पर नजर पड़ी तो मैं मुस्कुरा दिया। कैसी बेरोजगारी है? ना जाने मेरे जैसे कितने 'नौकरीशुदा' किसी और के अवसर पर लात मारने के लिए इस भीड़ में बैठे होंगें?

शायद, पीछे-पीछे ही वो लड़की बाहर निकल आई, और लगभग पुकारते हुए बोली, 'डॉण् विश्वास ... सुनिए।' मैं पलटा, '... आप अपॉइन्टमेण्ट लेटर लेकर जाइयेगा ... ।' मैं अचम्भित रह गया। मेरे आसपास के लोग मुझे बधाई देने लगे। सार्वजनिक रूप से घोषित यह पहला सलेक्शन था, बाकी सबकी फेहरिस्त शाम को लगाई जानी थी। जिसके इन्तजार में बहुत से उम्मीदवार बैठे हुए थे।

'धन्यवाद ... ' मैंने शिष्टतावश उस लड़की को कहा।
'केवल धन्यवाद से नहीं चलेगा। पार्टी होनी चाहिए।' लड़की बड़ी बेतकल्लुफी से बोली। सहसा कोई जवाब देते नहीं बना। सभी हमीं को देख रहे थे।
'जरूर' मैंने किंचित् विनम्रता से कहा।

'मेरा नाम काजल है ... पर्सनल असिस्टेण्ट टू चेयरमैन।' कहकर चहकती हुई वो दूसरी ओर बढ़ गई। मुझे अब भी अपने चयन पर आश्चर्य हो रहा था।
मेरे ही साथ का सलेक्शन था, राजीव गुप्ता का। बुलन्दशहर का रहने वाला था, इकनॉमिक्स में आया था। उसकी सिफारिश एक अन्य लेक्चरर दीपक दुआ ने लगाई थी। दीपक का बाप राजीव का रिसर्च गाईड था।

राजीव का जो हैड था, बड़ा चलता पुर्जा था। नाम था, अरविन्द आचार्य और काम था, अपनी सिनियोरिटी बखारते फिरना। हम ठहरे ठेठ गंवई, किसी को माना तो दिल से माना। नहीं माना तो नहीं माना। बस, मन ही मन भाई से हमारी ठन गई। दूसरा, उस आचार्य की एक 'सह- आचार्या और थी, वहाँ। नाम था 'सुश्री' नीलम। 'सुश्री' इसलिए कि लोगों के अनुसार कहने भर को वह कुँआरी थी, अभी तक। बड़े किस्से थे दोनों के। स्टॉफ तो स्टॉफ, छात्रों में भी बड़े मशहूर थे, दोनों। नीलम और अरविन्द दोनों आमतौर पर साथ देखे जाते थे। काजल और नीलम दोनों अच्छी सहेलियाँ थी।

एक दिन बातों ही बातों में हमें हमारे सलेक्शन का राज पता चला। हुआ यूँ कि मैं अकेला लाइब्रेरी में बैठा अखबार देख रहा था। तभी वहाँ काजल और नीलम आ बैठी। औपचारिक हाय-हैलो के बाद मैं पुनः अखबार में व्यस्त हो गया।
'डॉ. विश्वास, आपको हमारा कॉलेज कैसा लगा?' काजल ने पूछा।
'अच्छा है' मैंने जवाब दे दिया।

'और कॉलेज के लोग?' उसका दूसरा सवाल।
'अच्छे हैं'ए मैंने नीलम की ओर देखा, वो शरमा-सी गई।
'पता है विश्वास सर, आपका कॉल लेटर मैंने ही पोस्ट किया था। आपने जो फोटो लगाया था, अपनी बायोडाटा के साथ, वो बड़ा ही इंप्रेसिव था और मैं नीलम से ये ही कह रही थी बार-बार, कि वो फोटो वाला नहीं आया क्या?'

'अच्छा? धन्यवाद। असल में वो फोटो खिंचवाया तो था शादी-वादी के लिए, पर काम आता है अक्सर नौकरी के लिए। वैसे ये रहस्य आज जाकर खुला है कि मेरा सलेक्शन मेरी फोटो के कारण हुआ है। मेरे कारण नहीं।' मैं हँस पड़ा था। नीलम अब भी नीचे नजरें किए बैठी थी। कुछ देर इधर- उधर की बातों के बाद दोनों चली गई। जाते वक्त दो पल को नीलम की नजरें मुझसे मिली और फिर झुक गई।

नीलम, बीकानेर की रहने वाली, एक मध्यमवर्गी परिवार की चार लड़कियों में से दूसरे नम्बर की बेटी थी। जो नौकरी करने सुदूर इस पर्वतीय क्षेत्र में चली आईं थी। अकेली कमरा लेकर रहती है। लम्बी, पतली, साँवली-सी इस लड़की में अजीब-सा आकर्षण महसूस होने लगा था, मुझे। किन्तु उसकी चुप्पी में अजीब-सा रहस्य छुपा जान पड़ता था। जब कभी वो हँसती-बोलती थी, तो केवल अरविन्द के साथ। अन्यथा, सर्वदा चुप। इससे ये तो साफ जाहिर था कि उसके कोई अगर सबसे करीब है, तो वह अरविन्द है। किन्तु अब मन ये मानने को तैयार नहीं था कि लोग जो उसको दबी जुबान से 'सुश्री' कहते हैं, वो सच है। ऐसा नहीं हो सकता कि इतनी शालीन दिखने वाली लड़की का चरित्र 'ऐसा' हो। प्रेम की संभावना से मेरा इन्कार नहीं था, किन्तु दैहिक-स्तर पर उसके और अरविन्द के बीच कुछ है, मुझे नहीं लगता था। खैर, वह कुल मिलाकर एक अच्छी लड़की है।

... शाम का वक्त था। कॉलेज बन्द होने वाला था। सभी लोग अपने-अपने बैग लेकर बाहर की तरफ बढ रहे थे। लड़के-लड़कियाँ सभी पहले ही जा चुके होते थे। सो कॉलेज में केवल प्राध्यापकों की चहल थी। मैं अपने केबिन से निकल कर स्टॉफ रूम की तरफ से होकर बाहर की ओर जा रहा था कि अचानक किसी 'खुसफुसाहट' ने मेरे कदमों को धीमा कर दिया। मैं बड़े दबे कदमों से आगे बढने लगा। आवाजें इकनॉमिक्स विभाग के कमरे से आ रही थी। दरवाजा बंद था। मैंने कान लगाकर सुनने की कोशिश की तो महज खुसफुसाहट-सी ही सुनाई दी, कुछ स्पष्ट सुनाई नहीं दिया। कॉरिडोर चूँकि खाली पड़ा था, सो मैंने धीरे से एक झिराख में ऑंख लगाई। देखा, अंदर अरविन्द और काजल आलिंगनबध्द थे। दोनों एक-दूसरे के चुम्बन ले रहे थे और एक-दूसरे के शरीर को भेंट कर जकड़े हुए थे। मुझे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। मैं ठगा-सा रह गया। पुनः देखा, काजल ही तो थी। बड़े भारी कदमों से आगे बढ़ा। मन में अजब उथल-पुथल थी। एक ओर अरविन्द की नीलम से नजदीकियाँ और दूसरी ओर उसके काजल से ऐसे सम्बन्ध।

अब, जब भी नीलम मुझे दिखाई देती तो मन एकाएक उदास हो उठता। सोचता, इस लड़की के साथ कोई 'धोखा' ना हो रहा हो। अब मन में उसके लिए सहानुभूति मिश्रित आकर्षण जागने लगा था।
एक दिन मैं टहलता हुआ इकनॉमिक्स विभाग की ओर चला गया। देखा नीलम अकेली बैठी है, उसकी पीठ थी दरवाजे की तरफ। मैं भीतर दाखिल हो गया और जाकर उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया। देखकर अचम्भित था, वो रो रही थी। मुझे देखकर, ऑंसू पौंछने लगी। मैंने पूछा, 'क्या हुआ नीलम?'

'कुछ नहीं, सर।'
'कुछ तो हुआ है। बताओ, बताने से जी हल्का हो जाता है।'
'बताने जैसा कुछ नहीं है, सर।' उसकी आवाज में परेशानी अलग ही नजर आ रही थी।
'फिर भी। अगर तुम बताना चाहो तो ... ' मैंने एक बार फिर कोशिश की।
'सुनकर क्या कीजिएगा, सर?' इस बार उसके स्वर में पीड़ा थी। वो सुबक पड़ी।

'चुप हो जाओ। देखो, रोना किसी भी समस्या का हल नहीं है। धैर्य से काम लो। हर परिस्थिति का मुकाबला हिम्मत के साथ करना चाहिए।' मैंने उसको ढ़ाढस बँधाने की कोशिश की।
'ये परिस्थितियाँ मेरे ही साथ क्यों आती हैं?' उसकी आवाज में कम्पन्न था।

'देखो नीलम, परिस्थिति क्या है? कुछ भी नहीं। जब वस्तुस्थिति, मनरूस्थिति के अनुकूल नहीं होती है, तो परिस्थिति हो जाती है।' मैंने समझाते हुए कहा। वो मेरी भाषा को समझने की कोशिश में हल्का-सा मुस्कुरा दी। मैं जीत गया। 'घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें - किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए' किसी शायर की पंक्तियां बरबस ही जेहन में आ गयी। थोड़ी बहुत औपचारिक बातचीत के बाद मैं चला आया। हालांकि रोने का कारण उसने तब भी नहीं बतायाथा ।
अगले दिन पता चला कि अरविन्द आचार्य की सगाई हो गई है और जनवरी में शादी है। लड़की, अलीगढ़ की रहने वाली है। नाम है, अदिति। वाकई, जब वस्तुस्थिति मनरूस्थिति के अनुकूल नहीं होती है, तो वही परिस्थिति हो जाती है ...।
(समाप्त)

11 उसके लिए



ऑफिस से लौटते ही सबसे पहले अपनी मेल चैक करने की जल्दी में रहता हूँ। फटाफट कम्प्यूटर ऑन किया। इनबॉक्स में देखा 'मृदुल' की मेल थी। इसी का तो इन्तजार था, मुझे। जल्दी से खोलकर पढने लगा,
'पापा, कैसे हो?'

मैं जानता हूँ कि मेरे बिना आप बहुत लोनली फील करते होंगे। मैं भी आपको यहाँ बहुत मिस करता हूँ। सारा दिन अपने दोस्तों को अपने प्यारे पापा की कहानियाँ सुनाता रहता हूँ। मेरे कई दोस्त तो आपके जबरदस्त फैन हो गए हैं और आप से मिलना भी चाहते हैं।

पापा मैंने जो सॉफ्टरवेयर डिजाईन किया था ना वो बड़ा कामयाब साबित हो रहा है। उसी की कामयाबी से खुश होकर कम्पनी की तरफ से मुझे नया फ्लैट दिया गया है। अब तो आप मेरे पास आकर रह सकते हैं कि नहीं? वहाँ इण्डिया में आपका अकेले मन कैसे लगता होगा?

मैं कल रात की फ्लाईट से फ्रैंकफर्ट जा रहा हूँ। आप लिखें आपके लिए क्या भेजूँ?
लव यू वेरी मच।
आपका बेटा - मृदुल।'
तुरन्त जवाब लिखने लगा -

'बेटा मृदुल,
तुमको नये सॉफ्टवेयर की कामयाबी पर पापा की तरफ से ढेर सारी बधाईयाँ। तुमको कम्पनी ने नया फ्लैट दिया है, जानकर बड़ी खुशी हुई। बेटा मैं तुमसे और तुम्हारे दोस्तों से मिलने जरुर आऊंॅगा। लेकिन तुम्हारे साथ वहाँ सैटल नहीं हो पाऊँगा बेटा। यहाँ इण्डिया में तुम्हारी माँ की यादें हैं। उनको कैसे छोड़ पाऊँगा?
ढेर सारा प्यार।

तुम्हारा - डैडी।'

बेटे की मेल पढना, उसका जवाब देना। रो लेना, खुश हो लेना, ये ही दिनचर्या रह गई है अब मेरी। मृदुल को पढ़ाई करने अमेरिका भेजा था, वहाँ उसका मन लग गया। नौकरी लग गई। वो वहीं ठहर गया। उसकी तरक्की से मैं बहुत खुश हूँ। कम से कम मृदुला मुझे उलाहना तो नहीं दे पायेगी कि 'मेरे बेटे का ध्यान नहीं रखा आपने।' अब तो बस एक ही साध है कि उसका घर बस जाए .. चाहे तो वो वहीं अपनी पसंद से शादी करले या यहाँ इण्डिया आ जाए तो मैं अपने अरमानों से उसकी शादी कर लूँ। तब कहीं जाकर मृदुला को दिया वचन पूरा होगा। सोचते-सोचते ना जाने ख्यालों में कहाँ निकल गया ...।

... मेरे कमरे के पिछवाड़े वाले घर में देखता, एक लड़की सुबह सवेरे तैयार होकर निकल पड़ती और शाम ढले वापस लौटती। कई दिनों जब मैंने नोट किया तो मन में उस घर में झाँक कर देखने की इच्छा हुई। चूँकि मेरा कमरा दूसरे तल्ले पर था, सो खिड़की से झाँकने पर उस मकान का ऑंगन और दो कमरों का भीतरी दृश्य सुगमता से दिखता था। फिर भी मैंने ऐहतियात के तौर पर एक दूरबीन खरीद डाली। बस, अब सवेरे से मेरा एक ही काम। चाय का प्याला लेकर खिड़की पर आ ड़टना और उस लड़की के घर से निकल जाने के बाद तक डटे रहना। लड़की खासी आकर्षक और सादगी पसन्द थी। पता लगाने पर मालूम हुआ कि उसका नाम 'मृदुला' है। हालाँकि मैंने उससे बात करके उसके स्वभाव की मृदुता को परखा नहीं था, किन्तु फिर भी ना जाने मन ने क्यों उसको 'मृदुल' मान लिया था। शायद युवा मन का पूर्वाग्रह रहा हो। खैर, जो भी हो, लड़की भली जान पड़ती थी। उसके घर में झाँका तो पाया कि घर में एक बूढ़ी माँ है और एक छोटी बहन, बस। बहन की देह उठान लिए है और छोटी होने के बावजूद भी बड़ी बहन के समक्ष बड़ी जान पड़ती है। 'लड़की के पिता नहीं है शायद' सोचकर मैं ये मान चुका था कि हो ना हो लड़की बाहर नौकरी करने जाती है और उसी की कमाई से घर चल रहा है। देखने से घर की माली हालत ज्यादा अच्छी नहीं जान पड़ती थी, सो मन का विचार और ज्यादा दृढ़ हो गया था। तब ना जाने भीतर क्योंकर एक संकल्प-सा कर डाला मन ही मन कि जैसे भी हो इस परिवार की मदद करनी चाहिए। युवा मन यूँ भी संकल्प उठाने में जल्दबाज होता है। बस, कार्यशैली का निर्धारण करने लगा। कैसे मेलजोल बढ़ाया जाए? कैसे बिना प्रत्यक्ष हुए उनकी मदद की जाए? वगैरह, वगैरह। इस सारे सोच विचार के पीछे मृदुला के प्रति मेरे आकर्षण का बहुत बड़ा हाथ था, मैं मानता हूँ। वो लड़की मन ही मन मुझे पसन्द थी और उसको खटते देखकर मैं दुरूखी हुआ करता था और बार-बार ये विचार अधिक तीव्र हो जाता था कि 'इनकी मदद करनी चाहिए।'

एक दिन मैं थोड़ा विलम्ब से उठा, क्योंकि रात देर तक पढ़ता रहा था। सो भाग कर मेज पर से दूरबीन उठाई और लपक कर खिड़की पर आ डटा। मन ही मन खुद पर बड़ा क्रोध आ रहा था 'इतनी देर से उठा हूँ। वो तो अब तक चली गई होगी ... ' किन्तु तभी क्रोध गायब भी हो गया। मैंने देखा कि वो ऑंगन में टहल रही है और टहलते-टहलते तौलिए से अपने भीगे हुए बालों को सुखा रही है। बड़ा पवित्र लग रहा था, उसका वह धुला-धुला निश्चल रूप। मैं मोहित हुआ उसे निहारता रहा और मुझे ये भी ध्यान नहीं रहा कि मैं कब खिड़की की ओट से बाहर निकल आया हूँ और राह चलता कोई भी व्यक्ति मुझे इस तरह देख सकता था। फिर आगे क्या-क्या हो सकता, था? सोचते हुए आज डर लगता है। किन्तु उस समय ना जाने मैं कहाँ खो गया था। तभी मृदुला ने झटके से अपनी केशराशि पीछे को उछाली और उसकी नजर मुझ पर पड़ गई। मेरे हाथ से दूरबीन छूटते-छूटते रह गई। मैं झट से पलट गया और फिर तेजी से खिड़की बन्द करके जड़वत पलंग पर बैठ गया। फिर उठकर कमरे में टहलने लगा। 'ना जाने अब क्या होगा?' सोच-सोच कर मन बुझा जा रहा था। 'मकान तो बस अब खाली करना पड़ेगा ... बदनामी होगी से अलग ... ।' थोड़ी ही देर बाद दरवाजे पर खटखटाने की आवाज आई, मैं सकपका गया। 'खोलूँ या ना खोलूँ' अजीब उलझन में था। खटखटाहट और अधिक अधीर हो गई थी। मैंने उठकर दरवाजे की झिरांख में से देखा 'मृदुला' खड़ी है। मेरे पाँव तले से जमीन खिसक गई। हालत ये हो गई जैसे काटो तो खून न हो। बड़े ही ड़रते ड़रते धीरे से दरवाजे की कुन्दी सरकाई और धीरे-धीरे दरवाजा अपनी ओर खेंचा। उसका तमतमाया चेहरा देखते ही मन में ऐसा आया कि 'काश! ये धरती फट जाये और मै उसमें समा जाऊँ।' जिस प्रकार रंगे हाथों आज मैं पकड़ा गया था। ऐसी स्थिति में मेरी जगह कोई और भी होता तो यही सोचता शायद। हिम्मत जुटाकर हौले से कह पाया 'आईये'। वो कमरे को चारों तरफ से देखती हुई भीतर प्रविष्ट हो गई। मैंने भी उसके साथ-साथ अपने कमरे का निरीक्षण कर डाला। पहली बार आज लग रहा था कि मैं कितना लापरवाह और बदमिजाज हूँ। कहीं पतलून पटक रखी है, तो कहीं लूंगी। बिस्तर का हाल ऐसा हो रहा है, मानो उन्हें तहाकर रखे जाने की आदत ही ना हो। खुद पर बड़ा गुस्सा आने लगा, 'क्या सोचती होगी ये लड़की?' फिर धीरे से बाला 'बैठिए ना!' वो यंत्रवत एक मुढ्ढ़े पर जा बैठी। मैं भी किताबें सहेजता हुआ, विस्तर पर बिखरे समानात को थोड़ा खिसका कर बैठ गया। वो अभी तक कुछ नहीं बोली थी। और अभी भी इधर उधर ही देख रही थी। अपने अधभीगे बालों को उसने दुपट्टे से बाँध रखा था और दुपट्टे के दोनों सिरे आगे की ओर लटक रहे थे। ओस नहाये फूल जैसा उसका गुलाबी चेहरा बड़ा ही मोहक लग रहा था। ऐसा, मानो छूते ही मैला हो जाएगा। मैं चोर नजर से बार-बार उसे देखे जा रहा था। जब वह कुछ नहीं बोली तो मैं सोचकर कि 'जो भी होगा देखा जाएगा' मैं ही बोल पड़ा, 'कहिए? ' सुनकर वह थोड़ा चौंकी और फिर प्रकृतिस्थ होकर मेरी ओर देखने लगी, मैं संकोच वश नजर बचाने लगा।

'लीजिए' कहकर उसने हाथ आगे बढ़ा दिया। घबराहट में मैंने ये तो देखा ही नहीं था कि उसके दाँये हाथ में कुछ है। देखता भी कैसे? मेरी तो यूँ ही सिट्टी पिट्टी गुम हो रही थी। प्रश्निल दृष्टि से देखते हुए पूछा क्या है? 'आपके नाम की चिट्ठी है। दो-तीन दिन पहले गलती से डाकिया हमारे ऑंगन में डाल गया था, क्योंकि आपका नाम तो जानते नहीं थे, सो यही सोचकर कि 'होगी किसी की' पड़ी रहने दी। डाकिए से भी तस्दीक नहीं कर पाए, क्योंकि वो दोपहर में कब आकर चला जाता है, कुछ तय नहीं। फिर कल जब आपके मित्र को नीचे से आपका नाम लेकर पुकारते सुना तो पता चला आपका नाम ... लेकिन सुयोग ही नहीं बन पाया कि आकर दे जाऊँ। अभी आप दिखाई पड़े तो लेकर चली आई ... उसने पूरी बात बताई। उसके आने का कारण सुनकर मैंनें थोड़ी राहत की साँस ली। 'थैंक्स' कहकर मैंने लिफाफा खोला। देखा, मेरा एमण्एण् परीक्षा का प्रवेश पत्र था। गुम जाता, तो नाहक परेशानी होती। मैंने दुबारा शुक्रिया अदा किया और चाय के लिए भी लगे हाथ पूछ डाला। उसने मना कर दिया, किन्तु फिर भी मैं सौजन्यवश एक कोने में रखे स्टोव की ओर बढ़ गया और झटपट चाय बनाने लगा।

स्टील के दो ग्लासों में चाय उंडेल कर पलटा तो देखा उसके हाथ में मेरी डायरी है। मुझे देखकर वह जरा-सा अचकचा गई, 'माफ कीजिए, आपकी अनुमति के बगैर आपकी डायरी देख ली ... अच्छी कविताएँ लिखते हैं आप।' 'जी, अच्छा क्या? बस वक्त काटने की गरज से कागज काले करता रहता हूँ।' कहकर एक गिलास उसकी ओर बढ़ा दिया। उसके बाद बिना कुछ बोले चाले हम दोनों ने अपनी-अपनी चाय पीयी। लाख मना करने पर भी उसने अपना गिलास धोकर रखा और हल्का-सा मुस्कराकर 'चलती हूँ, नमस्ते।' कह कर दरवाजे की ओर बढ़ गई। मैंने राहत की साँस ली, 'चलो जान बची और लाखों पाए।' तभी वह पलटी 'हमारा घर बिना दूरबीन के भी साफ नज़र आता है आपकी खिड़की से। दो-दो जवान बेटियों वाले घर में अगर कोई आपको दूरबीन से झाँकते देखेगा तो क्या सोचेगा, ... जरा सोचिए' कहकर वह तेज कदमों से चली गई। मैं सन्न रह गया मानो किसी ने घुमाकर तेज तमाचा मेरे गाल पर मार दिया हो। कई दिनों तक फिर मैं खिड़की में नहीं बैठा, दूरबीन भी दूर खूंटी पर टंगी रही। और नज़रों के सामने वो पवित्र चेहरा बार-बार आता जाता रहा। मन म्लान हो गया था, ऊपर से परीक्षाएँ भी नज़दीक आ गई थी। सो सब कुछ भूलाभाल कर अपने आपे को पढ़ाई में झोंक दिया था। खिड़की उस दिन ऐसी बन्द की कि फिर खोली ही नहीं। कई बार उसको देखने का मन किया किन्तु हर बार मन मार कर रह गया और किसी अन्य कार्य में खुद को व्यस्त कर लिया। दिन गुजरते रहे।

एक दिन बाहर से लौटा तो कमरे में देखा एक चिड़िया ना जाने किधर से आ गई थी। सारे कमरे में तिनके ही तिनके बिखेरती इधर उधर उड़ रही है। लाख कोशिश करने पर भी बाहर नहीं निकली। हार कर मैंने खिड़की खोली 'शायद खिड़की से ही निकल जाए।' अनायास ही मेरी नजर उस घर पर पड़ी। जी धक् से रह गया। उस घर पर ताला पड़ा था। 'कहाँ गए होंगे सब? कहीं घर तो खाली नहीं कर दिया? कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई? आदि-आदि' अनेकों ख्याल एक साथ मन में आए और उत्तर ढूँढ़ने की कोशिश में एक-दूसरे से उलझते चले गए। चिड़िया ता खिड़की से निकल गई थी। किन्तु एक प्रश्न 'ताला?' खिडकी के रास्ते मेरे कमरे में आ गया था।

कुछ दिनों तक इस बारे में सोचता रहा और धीरे-धीरे बात पुरानी हो गयी। अन्य बातों की तरह याद बनकर रह गई। इस बीच मेरी एमए पूरी हो गई और मैं शिलांग के एक कॉलेज में प्राध्यापक होकर चला गया। लिखने-लिखाने का शौक बदस्तूर जारी था, सो छपने छपाने का क्रम भी नियमित था और इस प्रकार कॉलेज स्टॉफ में मैं ही एक ऐसा प्राध्यापक था जिसकी सर्वाधिक चिट्ठियाँ आती थी। लेखक मित्रों की, प्रशंसकों की, अखबार के सम्पादकों की आदि। इस बात के लिए मैं स्टॉफ में खासी चर्चा का विषय था। एक बार मेरी चिट्ठियाँ ये सोचकर खोल डाली गई थी कि कहीं कोई प्रेमिका-वेमिका का चक्कर तो नहीं है। किन्तु उस बात पर मैं प्रिन्सिपल पर ऐसा बिगड़ा था कि तब के बाद से प्रिन्सिपल मेरी चिट्ठियाँ मेज पर पड़ी ना छोड़कर अपनी दराज में सम्हाल कर रखने लगा था और मुझे ही सौंपता था। ऐसे ही एक दिन जब मैं अपनी डाक लेने प्रिन्सिपल के पास गया तो उस ने एक लिफाफा मेरे हाथ में थमा दिया। लिफाफे पर लिखे हर्फों से लिखावट बिल्कुल ही अपरिचित लगी। 'किसी प्रशंसक का होगा' सोचकर कोट की जेब में डाल लिया और क्लास लेने चला गया।

शिलांग रोड़ की बाँई ओर पहाड़ पर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बने हैं और पहाड़ पर भव्य इमारतों की कतारें। ऊपर चढ़ने उतरने के लिए चौड़ी-चौड़ी सड़कें पहाड़ को लपेटे थी। आधे से अधिक रास्ता तय करने के बाद जू रोड़ शुरू हो जाता है। वहीं से एक सीधी पगडण्डी नीचे उतरती हुई जा पहुँचती है हमारे कॉलेज। कॉलेज के पिछवाड़े पर एक बस्ती है गढ़वालियों की। उसी में एक छोटा-सा दो कमरों का फ्लैट लेकर रह रहा था मैं। घर जाकर सबसे पहला काम था चाय बनाकर पीना। फिर थोड़ा-सा लेटना फिर खाना खाकर एक सिगरेट पीना और फिर कोई छोटा-मोटा काम करने में खुद को व्यस्त कर लेना। उस दिन भी ठीक ऐसा ही सब हुआ। सोफे पर बैठा जब सिगरेट का कश ले रहा था तब अचानक उस खत की याद हो आई। जेब से निकाला, बिना किसी उत्साह के खोलने लगा और वही कई बार की पढ़ी-पढ़ाई बातें '... आपकी रचना दिल को छू गई, आपके पात्रों में समीपता नज़र आती है ... परिवेश अपने आसपास का जान पड़ता है ... मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों की सूक्ष्मता का सटीक चित्रण देखने को मिलता है ... आदि-आदि' पुनः एक बार और पढ़ने के खयाल से थोड़ा अधलेटा हो गया आराम से। लेकिन जैसे ही पत्र खोला झटके के साथ खड़ा हो गया। हाथ की सिगरेट ऐश ट्रे में डाल कर कुचल दी। पत्र बड़ा संक्षिप्त था -

सत्येन साहब!
यदि सम्भव हो तो एक बार आ जाइये। मरने तक, शुक्रगुजार रहूँगी।
आपकी,
मृदुला, दूरबीन वाली

... जिस्म को चीरती हुई सर्द हवाएँ देखने सहने का यह पहला अवसर हो, ऐसा नहीं था। किन्तु राजस्थान की सर्दियाँ इतनी भयानक होती हैं, ये सोचा भी नहीं था। कोई और अवसर होता तो शायद मैं इस यात्रा के पर्यटन अनुभवों को अपने लेखन के लिए संचित सुरक्षित करके रखता। किन्तु अभी मेरी मानसिकता ना लेखन की थी ना लेखन के लिए परिवेश बनाने-गढ़ने-संचित करने की। अभी तो मुझे जल्द से जल्द मृदुला के पास पहुँचना था। आखिर ग्यारह बरस बाद भी किसी ने मुझे याद रखा है तो उसके बुलावे का मान तो रखना ही चाहिए। किन्तु ऐसी क्या जरूतर आन पड़ी जो पत्र लिखकर बुलाना पड़ा। यही विचार भीतर से खाये जा रहा था मुझे। शिलांग से चल कर राजस्थान की सरहद को छूने में ही दो दिन लग गए। अभी और ना जाने कितने दिन और लग जाएंगे उस तक पहुँचने में। चुरू जिले के किसी राजगढ़ गाँव का पता लिखा था उसने पत्र के पीछे। दिल्ली से मैं सीधा जयपुर आ गया था। जयपुर आकर रेल का पता किया तो पता चला कि राजगढ़ जाने वाली गाड़ी रात एक बजे है। 'पूरे दिन का इन्तजार' सोचने पर ही अत्यधिक लम्बा जान पड़ा। रेल्वे स्टेशन से तुरन्त बस अड्डे आया। दौड़ता हुआ पूछताछ खिड़की पर लपका। पता चला कि सीधे राजगढ़ तो नहीं। हाँ, चुरू तक जाने वाली बस कुछ ही देर में जाने वाली है। टिकिट लेकर बस में जा चढ़ा। सामान के नाम पर बस एक छोटा सा ब्रीफकेस था। जिसमें दो जोड़े कपड़े के अलावा थोड़े रुपये थे। ये सोचकर रखे थे कि ना मालूम क्या जरूतर आन पड़े? इस वक्त बजे थे दोपहर के साढ़े चार। रात के दस बजे तक बस चुरू पहुँच जाएगी। जहाँ से दो घण्टे और लगेंगे राजगढ़ पहुँचने में। बारह बजते नहीं बजते राजगढ़ पहुँच जाएंगे। मन में सोचा और समय की तस्दीक करने को पुनः एक बार घड़ी देखी -चार पैंतीस।

मन फिर दस साल पुरानी स्मृतियों में खो गया। कैसे खिड़की में बैठकर दूरबीन से उस लड़की को देखा करता था? कैसे उस परिवार की मदद करने का संकल्प किया था। कैसे मृदुला से पहली मुलाकात हुई और फिर कैसे अचानक वो परिवार सहित गुम हो गई थी। ... सब जैसे कल की ही बात हो ... चलचित्र की भाँति सब कुछ सामने से गुजर गया। पर कहीं भी, कहीं से भी यह सम्भावना नहीं नजर आती, ना ही उस वक्त नजर आई थी कि मृदुला इतना विश्वास करती होगी मुझ पर। कितना-सा परिचय है हमारा? एक मुलाकात भर था। कितना लम्बा? साथ बैठकर एक कप चाय पीने भर जितना। कितना गहरा? दूर बैठ कर दूरबीन से ताकने जितना। सोचते सोचते ना जाने कब मेरी ऑंख लग गई। ऑंख तब खुली जब थोड़ा शोर शराबा कान में पड़ा। देखा तो चुरू आ गया था। घड़ी पर नजर डाली पौने दस बज रहे थे। 'समय से आ पहुँचे' सोचकर सन्तोष हुआ। उतर कर एक ठेले पर चाय पीयी और ठेले वाले से पूछ कर ही एक बस जिस पर लिखा था 'राजगढ़ डीपो' में जा बैठा। सर्दी कड़ाके की पड़ रही थी। हाथ पैर ठिठुरकर गल गए जान पड़ते थे। सड़क पर लोग जगह-जगह आग जलाए ताप रहे थे। मैंने भी अपने शॉल को और अधिक कस कर लपेट लिया था और थोड़ी गरमी पाने के इरादे से सिगरेट पर सिगरेट फूँके जा रहा था। बस के शीशे जरा भी खिसक जाने पर आने वाली हवा तीखे बाणों-सी शरीर को बेध-बेध जाती थी। कोहरा गहराने लगा था और अब दूर की चीजें धुँधली होने लगी थी। ड्राइवर बड़े ही कौशल से बस चला रहा था। शिलांग में भी सर्दी को कभी इतना भयानक हुआ नहीं जाना, जैसा यहाँ लग रहा था।

....रात डेढ़ बजे बस राजगढ बस स्टैण्ड पर आ लगी। अब इसके आगे का रास्ता और भी मुश्किल था। क्योंकि यहाँ के किस इलाके का पता मृदुला ने लिखा है, क्या पता? 'रात बस स्टैण्ड पर ही गुजार कर सुबह किसी से पूछताछ करना ही ठीक होगा' सोचकर एक रेस्टोरेन्ट में चला गया और चाय का आर्डर दे डाला। चाय रखने आये लड़के को पास बुलाकर उसको बीस का नोट देकर कहा, 'छोटू! जरा पास की दुकान से विल्स सिगरेट का एक पैकेट तो ला दे यार।' लड़का चला गया और कुछ देर बाद सिगरेट का पैकेट और बचे हुए पैसे मेज पर रखकर जाने लगा। मैंने रोक कर उसके हाथ पर दो रुपये रख दिए और धीरे से एक ऑंख दबा दी। वो खुश हो गया और हँसता हुआ लौट गया।

... बाहर से देखने पर मकान छोटा किन्तु आरामदायक जान पड़ता था। गली के नुक्कड़ पर होने के कारण दोनों तरफ के रास्तों के मिलान बिन्दु पर स्थित यह मकान किसी सुरुचिपूर्ण व्यक्ति का सुरुचिपूर्ण घर लगता था। किन्तु मैं यहाँ मृदुला से मिलने आया हूँ, घर की सुरुचि को परखने नहीं। घण्टी का बटन दबाया कुछ देर बाद दरवाजा खुला। एक सामान्य सी नवयुवती ने दरवाजा खोला। मैंने अपना परिचय देते हुए कहा, 'मैं सत्येन आचार्य हूँ। शिलांग से आया हूँ ... ' 'आप कहानियों वाले सत्येन आचार्य हैं ना?' युवती बीच ही में बोल पड़ी। 'जी हाँ' कह कर मुस्करा दिया था, मैं। अब तो मेरा परिचय 'कहानियों वाला' सत्येन आचार्य होकर रह गया जान पड़ता है।

'आईये' कहकर वो एक ओर हट गई। दरवाजा खुला छोड़ गई। मैं भीतर प्रविष्ट हो गया। घर में घुसते ही थोड़ा चलने पर एक बरामदा-सा था, जहाँ बैठक की व्यवस्था थी। बरामदे में एक चार पाँच साल का बच्चा खिलौनों से खेल रहा था। मुझको देखकर मुस्कुरा दिया। मुस्कुराहट बिल्कुल मृदुला जैसी लगी। मुझे उसका ही बेटा लगा। दो-चार कुर्सियाँ रखी थी। एक सेण्ट्रल टेबिल। जिस पर अखबार पड़ा था। दीवारों पर एकाध तस्वीर लगी थी, पेण्टिंगनुमा। घर, बाहर से छोटा दिखाई पड़ रहा था। पर भीतर आकर देखा कि घर की लम्बाई काफी थी। थोड़ी देर में वही युवती हाथ में पानी का गिलास लेकर लौटी। मैंने गिलास लेते हुए, 'मृदुला जी हैं?'

'जी हाँ' अभी कुछ देर बाद ...। बात को अधूरा छोड़कर वह वापस चली गई। मैं उसकी अधूरी बात को समझ नहीं पाया। बैठा रहा जस का तस। 'ग्यारह साल बाद आज पुनः मृदुला को देखूँगा' सोच-सोच कर मन रोमांचित हो रहा था। कैसी लगती होगी? बाल जरूर पक गए होंगे। मेरे भी तो कितने ही सफेद बाल नजर आने लगे हैं। कनपटियाँ तो बिल्कुल ही सफेद हो गई होंगी। पर फिर भी चेहरे की कमनितया ऑंखों की गहराई, मुस्कुराहट की सादगी और चाल का स्वाभिमान तो वैसा ही होगा अब भी। कैसा तमाचा मार कर गई थी उस दिन ... दो-दो जवान बेटियों वाले घर में अगर कोई आपको दूरबीन से झाँकते देखेगा तो क्या सोचेगा? सोचिए ... ' निर्वाक रह गया था मैं। अभिभूत हो गया था उसको देखकर। तभी वह युवती पुनः आई। शायद, इस बार भीतर चलने का बुलावा लाई हो। किन्तु वह ऐसा कुछ करने नहीं आई थी। खाली गिलास लेने आई थी।

'आप सफर से थके हारे आए हैं। मुँह हाथ धो लीजिए, थोड़ा आराम कर लीजिए ... मैं चाय लाती हूँ ... ' कह कर वह फिर पलट गई।
'सुनिए! मैं इतनी दूर से यहाँ चाय पीने या आराम करने नहीं आया हूँ। बुलवाया गया हूँ ... ' मैंने पीछे से हाँक लगाई। 'जानती हूँ ... ' उसने पलट कर जवाब दिया, और चली गई। 'फिर? मृदुला जी से कहिए सत्येन आया है, मिलने को।' मैं पुकारता रह गया।

कुछ पल यूँ ही बैठा रहा। फिर ना जाने क्या सोच कर स्वयं उठा और अन्दर की ओर बढ़ गया। गैलेरी पार करने के बाद एक छोटा-सा चौक था जिसके चारों ओर चार कमरे थे। सभी के दरवाजे चौक में खुलते थे। ऊपर खुला आकाश नजर आ रहा था और कमरों के भीतर घुटा-घुटा अन्धेरा। सीलन-सी महसूस हो रही थीं, रह-रह कर।

हल्की आहट का अनुसरण करता हुआ मैं एक कमरे के द्वार पर पहुँचा भीतर धुँधला धुँधला उजाला था। कुछ साफ दिखाई नहीं पड़ रहा था। भीतर घुसते ही तेज बदबू का एक झौंका मेरे नथुनों में समा गया। सामने का दृश्य देखा तो एकदम मानो सिर पर बिजली टूट पड़ी हो। मैंने देखा मृदुला चारपाई पर लेटी है और वो युवती उसको कमर से सहारा देकर अधलेटा किए है और धीरे से एक पात्र उसकी चादर के नीचे से निकाल रही हैं। दोनों ही मुझे यूँ एकदम आ गया जान कर झेंप गई, किन्तु फिर प्रकृतिस्थ होकर कातर निगाहों से मेरी ओर देखने लगी। युवती ने मृदुला के हाथ पाँव पौंछकर कपड़े वगैरह ठीक करके उसे पुनः बिस्तर पर लिटा दिया और सारा सामान समेट कर बाहर चली गई। मैं अभी भी अवाक् खड़ा था। 'क्या इसी रूप की कल्पना लिए मैं पहाड़ों से भागा आ रहा हूँ?' क्या हालत हो गई है उस रूपराशी की? जिसे मैं ओस नहाया फूल कहा करता था, अपने मन में। मृदुला मुझे देखकर मुस्कुराने का यत्न कर रही थी। किन्तु ऑंखों के कोरों से ढ़लक आए ऑंसू मुस्कुराहट का साथ नहीं दे रहे थे। उसने कुर्सी की ओर ईशारा करते हुए आर्त स्वर में कहा 'बैठिए ... ।'

मैं आज्ञाकारी शिशु की तरह कुर्सी खींचकर बैठ गया। मेरी ऑंखें अब भी उसके चेहरे पर ही टिकी थी। वो मेरी नजर की उदासी को शायद बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। सो हल्का सा हँसते हुए पूछा 'कहिए, वो दूरबीन अब भी इस्तेमाल करते हैं क्या?'
मैं कुछ नहीं बोला बस एकटक उसी को देखता रहा। 'सफर काफी लम्बा रहा होगा। थक गए होंगे, जाइये जरा आराम कर लीजिए फिर बाते करेंगे ... ।'

अब मुझसे और अधिक जज्ब नहीं किया गया। मैं फट पड़ा, 'ये क्या हाल बना रखा है तुमने?' सीधे 'तुम' कहने लगा। लिहाज का ख्याल ही नहीं रहा। 'कुछ नहीं। कर्मों का फल है। आप सुनाइये, खूब प्रसिध्दि पा रहे हैं आजकल। चारों तरफ धूम मची है आपके नाम की ...।' उसने बात टालनी चाही।

'बात मत टालो मृदुला। ये सब क्या है? क्या हुआ है तुम्हें? कहाँ है तुम्हारे घरवाले?' मैं अधीर था सब कुछ जानने को।
'... ' वो खामोश रही।
'बोलो। कुछ तो कहो' मेरे स्वर में दीन आग्रह था। 'सत्येन जी! वक्त जब जो कर दे, कर दिखाए कम है। बस ये समझिये, वक्त ने ही आज इस चारपाई तक ला पहुँचाया है ... । ' वह पहेली-सी बुझाने लगी।

'किन्तु तुम चली कहाँ गई थी अचानक। कई दिनों बाद जब अचानक मैंने अपनी खिड़की खोली तो तुम्हारे घर पर ताला लगा देखा। पहले सोचा कहीं शादी ब्याह में गए होंगे सारे घर वाले। लेकिन फिर जब कई दिनों तक भी वह ताला ही लटकता दिखता रहा तो मुझसे रहा नहीं गया। पूछताछ करने पर सभी ने ये तो बताया कि तुम लोग हमेशा के लिए घर छोड़ कर चले गए हो, किन्तु ये नहीं बताया कि कहाँ गए हो? फिर एक नया परिवार आकर उस घर में रहने लगा ... ' मैंने शुरू से सब पूछना प्रारम्भ किया।

इस बीच वो नवयुवती चाय का एक प्याला रख गई थी। मेरे उस ओर कोई ध्यान नहीं देने पर मृदुला ने ही याद दिलाया 'चाय लीजिए। ठण्डी हो जाएगी। माफ कीजिएगा, पहली बार आप यहाँ आए और घर में आपकी खातिर करने लायक कुछ भी नहीं है। बुरा तो नहीं मानेंगे?'

मैंने इन्कार में धीरे से पलकें मूँद कर 'ना' में गर्दन हिला दी। और पुनः अपने प्रश्नों के उत्तर की आशा में उसकी ओर देखने लगा।

'... आपके यहाँ से जिस दिन होकर गई उसी दिन पता चला कि हमारे घर को गिरवी रखवाकर जो कर्जा पिताजी ने लिया हुआ था, उसकी मियाद पूरी हो गई है, और अब साहूकार कभी भी कुर्की लेकर आ सकता है। जब मुझे ये पता चला तो मैं खुद उस साहूकार से मिलने गई। इसलिए कि वो कुर्की लेकर ना आए। हम खुद ही जल्दी कहीं और इन्तजाम कर लेंगे ... जरा दम लेकर वह फिर बताने लगी, 'क्योंकि मेरे पिता की शहर में बड़ी अच्छी इज्जत थी। कुर्की के नाम से वो खाक में मिल सकती थी। उनके मरने के बाद उनके नाम को मिट्टी में मिलने दें तो क्या नरक नहीं मिलता हमें? वह इस बात को राजी हो गया। पर इसकी ऐवज में वो कुछ और भी चाहता था ... ।'

मैं बिल्कुल चुपचाप बैठा गौर से सुन रहा था, 'क्या?' 'वो इस हाडमाँस के पंजर को नोचना चाहता था' कहते हुए उसकी ऑंखें नम हो गई थी।
'तब?'

'पिताजी की इज्जत के लिए मैंने अपनी इज्जत दे देना कबूल कर लिया। जिसकी एवज में उसने हम लोगों को घर में रहते रहने की इजाजत दे दी। एकाध बार और उसने मेरे शरीर पर अपनी हवस की कालिख मली। अब वो गाहे-बगाहे हमारे घर आने लगा। मैं उसकी नीयत को जानती थी। अब उसकी नजर मेरी छोटी बहन शीला पर थी। मेरी अनुपस्थिति में वो कई बार आकर उसको परेशान भी कर चुका था। माँ मजबूर थी, बेचारी क्या करती? उसको तो ये भी नहीं पता था कि उसकी बड़ी बेटी अपनी 'इज्जत' गँवा चुकी है। शायद मालूम चलता, तो वो मर ही जाती। एक दिन साहूकार ने मुझसे ही कह डाला 'जरा छोटी वाली को भी तो चखा।' मैंने जोर से उसके मुँह पर झापड़ मार दिया। उस दिन वो चीखता-चिल्लाता लौटा था और जल्दी से जल्दी घर खाली कर देने की धमकी भी दे गया था। मैंने भी उस दिन ठान लिया था कि जल्द ही यह मकान छोड़ देंगे। भगवान ना करे अगर किसी दिन मेरी गैर-मौजूदगी में उसने शीला को 'पकड' लिया तो? क्या मुँह दिखाऊँगी पिताजी की आत्मा को ...'

मेरे मन में मृदुला का स्थान आकाश से भी ऊँचा हो गया। कैसी अद्भुत त्यागमूर्ति है यह नारी? वह आगे बताती रही '... कुछ दिन बाद ही हम यहाँ आ गए। यहाँ थोड़ी-सी जमीन थी। सब्जी वगैरह बो कर गुजारा करने लगे। कुछ थोड़ा बहुत मैं गाँव के दो-चार बच्चों को पढ़ा दिया करती थी। बस इस तरह से दिन गुजर रहे थे। लेकिन शायद भगवान को अभी कुछ और बुरे दिन दिखाने थे, हमें। इसी दौरान हार्ट अटैक से माँ गुजर गई। अब मैं और मेरी छोटी बहन शीला, बस दो जने रह गये थे परिवार में। अचानक मुझे पता चला कि हमारे घर के पिछवाड़े वाले दर्जियों का सबसे छोटा लड़का ना जाने कैसे शीला से दोस्ती गाँठ बैठा है और दोस्ती का उपहार भी उसकी कोख में डाल दिया है। कहते-कहते वह रो पड़ी। मेरी ऑंखें भी छलक पड़ी। मैंने उसको धीरज बँधाते हुए कहा, 'मृदुला, जी छोटा नहीं करते। लो पानी पी लो ... ' पास रखा पानी का गिलास उठा कर उसकी ओर बढ़ाया। पर अगले ही पल अपनी गलती महसूस हुई। उठा और सहारा देकर उसे उठाया। उसका सारा शरीर मेरी बाँई बाँह में घिरा था, अपने पूरे भार सहित। वह छलछलाती निगाहों से मुझे देखे जा रही थी। उसकी ऑंखों में विवशता थी। दाएँ हाथ से उसे पानी पिलाया। दो घूँट पीकर ही उसने मुँह फेर लिया। मैंने गिलास को पकड़े पकड़े ही धीरे से उसे पूर्ववत् लिटा दिया।

मन में उथल-पुथल मची थी कि 'क्या क्या गुजर गया इस बेचारी की जिन्दगी में? भगवान इतना निष्ठुर भी हो सकता है, कभी कल्पना ही नहीं की थी मैंने। ना जाने अभी और क्या-क्या और सुनना पड़ेगा ... ' मैं वापस कुर्सी पर बैठ गया। वो थोड़ा संयत हो गई तो बोलने लगी, 'छोटी बहिन बिन ब्याही माँ बनने जा रही है, सुनकर दुनिया वाले क्या-क्या नहीं कहेंगे? सोच-सोच कर दिल बैठा जा रहा था। उसी समय मैंने एक तरीका खोज निकाला और छोटी बहिन की गति सुधारने के लिए मैंने एक बार पुनः एक कठोर निर्णय लेना स्वीकार कर लिया। हलधर मौर्य, हमारे गाँव का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति था। काफी दबदबा था उसका। कई लठैत पाल रखे थे उसने और कोई भी उससे राड़ लेकर चैन से नहीं जी सकता था। सभी उसको 'हल्ला भाई' कहते थे। हम लोग गाँव में आए उसी दिन से वह मुझ पर आसक्त था और मतलब-बेमतलब तरह-बेतरह हमारी मदद करने को आतुर रहता था। लेकिन हर बार उसको मुझसे निराशा ही हाथ लग रही थी। वो चाहता तो शायद बलपूर्वक मुझे प्राप्त कर सकता था और हम लोग उसका बाल भी बाँका नहीं कर सकते थे। पर उसने ऐसा कुछ नहीं किया। मैंने उसी की आसक्ति को इस्तेमाल करने का निश्चय किया ... आप सोचेंगे कितनी घिनौनी हूँ मैं? है ना? पर बताइये क्या छोटी बहिन को बेइज्जत हो जाने देती? यूँ भी इस जहान में जवान बेटियों के घर पर सैकड़ों की नज़रें लगी रहती हैं ... ' सुनकर मुझे खुद पर लज्जा हो आई, मैं भी तो दूरबीन लेकर बैठा करता था, खिड़की में। लेकिन वो मेरी इस लज्जा को लक्ष्य नहीं कर पाई और आगे बताने लगी, '... मैंने एक रोज हलधर को बुलवाया ... वो दौड़ कर आया।