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लघुकथा : बीच का दिन

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-अम्बिका दत्त

_अब चुप कर कटुए. दोगले.

_ओ...य, ओ...य...बामणी के. कमीणजात गरुड्ए. आगे मत बोलियो...नींतो.

_नीं तो? नीं तो?? क्या कर लेगा तू...क्या 'उपाड़' लेगा?

_अरे देख गुस्सा मत दिला मुझे. गुस्सा खराब है मेरा. ब्होत खराब इन्सान हूं मैं गुस्से के बाद.

ये कोई नया मामला नहीं है. रोज़ की बात है. दोनों के बीच कहा-सुनी. ये तो कुछ भी नहीं. इससे भी ज्यादा 'छोत'. पढ़े-लिखे लोग सुन लें तो बलवा हो जाए. पर इन दोनों के लिए तो रोज़मर्रा की बात है.
मानो दिन ब दिन सर्द होती जा रही ज़िंदगी में गरमाहट बचाए रखने के लिए इनके पास सिवा इसके कुछ भी नहीं था. कौमी कोसने. जिन्हें ये लकड़ी के कुंदों की तरह अपने ताल्लुक़ात की भट्ठी में झोंकते रहते थे.

इस अजीब रिश्ते में एक अजीब बंदिश ये भी कि बात बोला चाली से आगे कभी नहीं बढ़ती.
और इन दोनों के बीच तीसरा कोई आ गया तो...

दोनों साथ रहते हैं. किराए का रिक्शा चलाते हैं. रहम-तुल्ला और दीनबंधु. रमजू और दीनू नाम हैं इनके.
रिक्शे का धंधा कमजोर है इन दिनों. मजूरी कभी मिलती है कभी नहीं. रिक्शे का किराया भी भारी पड़ता है.

जिसकी जो ही जानता है. मजूर को एक दिन मजूरी न मिले तो उस प…

माँ

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लघुकथा

- यश मालवीय

माँ को सब-कुछ धुंधला-सा नजर आता है, उनकी आँखों में गहरा मोतियाबिंद है. माँ कायदे से कुछ भी खा नहीं पातीं. उनका दाँतों का सेट पुराना पड़ गया है. माँ ऊँचा सुनने लगी हैं, उनके लिए कान की मशीन भी जरुरी हो गई है.

माँ का लायक बेटा परेशान है. माँ से कहता है कि इन सर्दियों में आँख का आपरेशन करा लें, डाक्टर के पास चली चलें, दाँतों का नया सेट लगवा लें, एक अच्छी-सी कान की मशीन भी लेती आएँ. यह सब-कुछ हो जाए तो वह आराम से टी.वी. देख-सुन सकती हैं, अच्छे-से- अच्छा खाना चबा-चबाकर खा सकती हैं. बावजूद बहुत-बहुत समझाने के वह टालमटोल करती हैं, किसी तरह डाक्टर के पास चलने को तैयार ही नहीं होतीं.

एक दिन बेटा जिद पर अड़ जाता है. मां को जब बचने का कोई चारा समझ नहीं आता तो बुझी-बुझी मगर वत्सलता में भीगी आँखों से बेटे की ओर देखती हैं और बोल पड़ती हैं, “बेटा, मेरा मोतियाबिंद कट भी गया तो क्या मैं सपना हो गए तेरे पिता को फिर से देख पाऊँगी और फिर अगर तू ले ही चलना चाहता है तो मुझे डाक्टर के पास नहीं, किसी ज्योतिषी के पास ले चल और पता कर कि कितनी बची है मेरी जिंदगी? फ़ालतू में दो-चार बरस के लिए मैं …

कहानी: प्रायश्चित्

-प्रेमचंद

दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उत्तरी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड़ के हेड क्लर्क बाबू मदारीलाल ग्यारह बजे दफ्तर आये, तब मानो दफ्तर नींद से जाग उठा। चपरासी ने दौड़ कर पैरगाड़ी ली, अरदली ने दौड़कर कमरे की चिक उठा दी और जमादार ने डाक की किश्त मेज जर ला कर रख दी। मदारीलाल ने पहला ही सरकारी लिफाफा खोला था कि उनका रंग फक हो गया। वे कई मिनट तक आश्चर्यान्वित हालत में खड़े रहे, मानो सारी ज्ञानेन्द्रियॉँ शिथिल हो गयी हों। उन पर बड़े-बड़े आघात हो चुके थे; पर इतने बहदवास वे कभी न हुए थे। बात यह थी कि बोर्ड़ के सेक्रेटरी की जो जगह एक महीने से खाली थी, सरकार ने सुबोधचन्द्र को वह जगह दी थी और सुबोधचन्द्र वह व्यक्ति था, जिसके नाम ही से मदारीलाल को घृणा थी। वह सुबोधचन्द्र, जो उनका सहपाठी था, जिस जक देने को उन्होंने कितनी ही चेष्टा की; पर कभरी सफल न हुए थे। वही सुबोध आज उनका अफसर होकर आ रहा था। सुबोध की इधर कई सालों से क…

स्वभाव

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-बालकवि बैरागी

डराओ मत
बिजली को बादल से
सोने को आग से
शून्य को अंक से
और मछली को पानी से

मुक्त कर लो अपने आपको
इस डरावनी मानसिकता
और पागल परेशानी से

बादल ही तो है बिजली का घर
आग ही परखती है सोने को
शून्य क्यों डरेगा अंक से?
और मछली?
मछली पानी से नहीं तो
क्या प्यार करेगी पंक से?

अगर ये
डरने लगे एक-दूसरे से
तो हो गया काम
एक-दूसरे की बाहों में ही
मिलता है इन्हें आराम.

ये बात मुझे तब सूझी
जब लोग डरा रहे थे
उन्हें चुनाव से

शायद लोग परिचित नहीं हैं
बिजली, सोने, शून्य
और मछली के स्वभाव से.


रचनाकार – बालकवि बैरागी – नीमच मप्र के प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ-कवि हैं.

शब्दों में कहाँ रहती है कविता?

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-हितेश व्यास

कविता में शब्द आते हैं जैसे, शब्दों में आती है कविता
तारों में बहता है करेंट, ऐसे आती है शब्दों में कविता
रमाशंकर फेंकता है, 5.20 पर अख़बार
लपक कर उठाता हूँ.

उठाता हूँ मैं, कविता के लिए शब्द
डाकिया डालता है चिट्ठियाँ लेटरबॉक्स में
जाली से देखता हूँ.
एक झुरझुरी-सी होती है
महसूस करना चाहता हूँ, कुछ वैसा ही
कविता लिखने से पहले
सुबह, बाहर तो बाद में होती है
पहले होती है भीतर

कविता शब्दों में आती है बाद में
पहले होती है भीतर, बिना शब्दों के
जैसे आता है दुःख अचानक, कविता आती है.
जैसे लौटते हैं बच्चे स्कूल से, बस्ता और मुँह लटकाए हुए
लौटते हैं शब्द कविताओं में
बाजरी के दानों पर उतरती है चिड़ियाएँ
और चौंक के उड़-उड़ जाती हैं.

उतरते हैं शब्द और उड़-उड़ जाते हैं
कविता में रहते हैं शब्द जैसे ब्रह्म रहता है शब्द में
जैसे चीजें रहती हैं आलों में
जैसे चावल के पिण्ड रहते हैं श्राद्ध में
जैसे कपड़े रहते हैं अलगनी पर
मनके रहते हैं मालाओं में
कविताओं में शब्द रहते हैं.

घटनाएँ रहती हैं जीवन में, बेतरतीब और बेसिलसिलेवार
बहुत सारे काम रह जाते हैं बाकी
शब्द रह जाते हैं शेष
कविताओं में रहते हैं शब्द, जैसे शब्दों में रहता है…

इकराम राजस्थानी की ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
कैसा वातावरण हो गया
रात दिन जागरण हो गया

शब्दों से वाक्य बनते नहीं
व्यर्थ सब व्याकरण हो गया

झूठ पाखंड धोखा-धड़ी
आज का आचरण हो गया

युग की परिभाषाएँ देखिए
अब तो जीवन मरण हो गया

स्वर्णमृग जब भी आ जाएगा
समझो सीताहरण हो गया

ग़ज़ल 2
हर तरह के रंग में फिट हो गए
लोग अब दुनिया में गिरगिट हो गए

अफसरों से वो मिलेंगे सिर्फ जो
गेट पर लटकी हुई चिट हो गए

चोर-डाकू और लुटेरे लोग भी
सब के सब संसद में परमिट हो गए

सच हर युग में सदा सूली चढ़ा
झूठ के भोंपू मगर हिट हो गए

**-**

चित्र - अमित अम्बालाल की कैनवस पर तैल रंग से बनी 42x54 इंच की कलाकृति.

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानी – संकट तृण का

जमींदार के नायब गिरीश बसु के घर में प्यारी नाम की एक नौकरानी काम पर नई-नई लगी. कमसिन प्यारी अपने नाम के अनुरूप रुप और स्वभाव में भी थी. वह दूर पराए गांव से काम करने आई थी. कुछ ही दिन हुए थे उसे इस स्थान पर काम करते हुए कि एक दिन वह अपनी मालकिन के पास आकर रोने लगी. वृद्ध नायब की वासना दृष्टि उसे हलाकान कर रही थी. मालकिन ने उसे दिलासा दिया, बोली – ‘बेटी, तू अन्यत्र चली जा. तू भले विचारों वाली है, यहाँ तुझे परेशानी होगी.’ मालकिन ने उसे कुछ पैसे चुपचाप देकर उसे विदा कर दिया.

प्यारी के लिए उस गांव से भाग जाना आसान नहीं था. हाथ में पैसे भी थोड़े से ही थे. अतएव प्यारी ने गांव के ही एक भद्र पुरुष हरिहर भट्टाचार्य के घर पर आश्रय मांगा. उसके समझदार पुत्रों ने समझाना चाहा, ‘बाबूजी, फजूल किसलिए विपत्ति मोल ले रहे हैं?’ हरिहर सिद्धांतवादी थे – ‘स्वयं विपत्ति भी अगर आकर मुझसे आश्रय मांगे तो मैं उसे लौटा नहीं सकता...’

गिरीश बसु को प्यारी के पनाह की बात पता चली तो वह हरिहर भट्टाचार्य के पास पहुँचे, साष्टांग दंडवत किया और कहा, ‘भट्टाचार्य महोदय, आपने मेरी नौकरानी किसलिए फुसला ली? घर में काम की बहुत असुव…

मेरे सपने और मैं

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- चंद्र प्रकाश यादव

मेरे सपने, शीशे की मीनारों से थे
कल्पना की चाँदनी जब उनसे लिपटती
मानों इन्द्रधनुष का कारवाँ
जिन्दगी के रेगिस्तान में झूमने लगता था

पर यथार्थ ने
अपने पत्थर के ठोस होठों से उन्हें चूमा
तो शीशे की मीनारें
जागृत से भंग होने वाले स्वप्न की तरह
झनझना कर टूट कर बिखर गए

उसके टुकड़े मेरी रग रग में गिरे
और उसकी किरचें
मेरी पलकों में समा गए
मेरी नींद मर गई

मैं जिन्दा रहा
मेरी आह और आँसू भी मर गए
मैं अकेला जिन्दा रहा

आम रास्ते में पड़े उस पत्थर की तरह
ठोकर खाना और चुप रहना.

**-**
रचनाकार –चन्द्र प्रकाश यादव पेशे से बैंकर हैं और यदा कदा इनकी कलम बैंक की खाताबही से उचटकर कविताओं के पन्ने रंगने लगती हैं...

लघुकथा – पतिव्रता

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-कालीचरण प्रेमी

दो बजे होंगे. मैं अपने नर्सिंग होम में बैठा यही सोच रहा था कि अब लंच कर लिया जाए. मैं लंच के लिए अपने चेम्बर से बाहर निकला तो देखा एक ग्रामीण एक औरत को रिक्शे से उतारा और कंधे पर लादकर अंदर ले आया. उसके साथ दो लोग और भी थे. महिला के सिर से खून बह रहा था. उस ग्रामीण ने बताया, यह उसकी पत्नी है. काम करते समय सीढ़ियों से सिर के बल गिर कर घायल हो गई है. आनन-फानन में नर्सिंग होम का सारा स्टाफ उपचार में जुट गया. अत्यधिक रक्तस्राव के कारण महिला के शरीर में खून की कमी हो गयी थी. अतः मैंने उसके पति से कहा कि आप अपनी पत्नी के लिए एक यूनिट खून दे दें.

इतनी बात सुनते ही उस महिला का पति तड़पते हुए बोला – “अजी थैं कोई बात करे सा, महूं तो इस औरत के कारणों ना तो अपना खून देऊं. म्हारे पास कहाँ खून से. खून ही देना पड़े तो म्हे तो दूंगा नीं... काल मरती हुई आज मरि जाए... म्हने तो दुसरी औरत मिल जाए.”

इतना कहकर वह व्यक्ति वहाँ से तुरंत गायब हो गया. हमारी अनवरत कोशिशों से हमें सफलता मिली और अंततः वह महिला बच गई. शीघ्र ही उस महिला की स्थिति डिस्चार्ज करने लायक सामान्य हो गई.

उस महिला के मां-बाप उ…

हितेश व्यास की कुछ रचनाएँ

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पिता की स्मृति
*****.

याद किया जा सकता है पिता को
उनकी पिचहत्तरवी वर्षगांठ पर भी
पिता की स्मृति के लिए आवश्यक नहीं है
उनका स्वर्गीय होना
स्वर्गीय हो जाते हैं पिता कई बार जीवित रहते हुए
लोग लिखने लग जाते हैं
कविताएँ धड़ाधड़ पिता के स्वर्गीय होने पर
कई तो लिख मारते हैं कविता की किताब
पिता की स्मृति में

कवि!
तुम पिता को पुनः पारिभाषित करो
पिता चिर परिभाषेय है कवियों के लिए
समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ
पाठ्यक्रमों में लग जाने के कारण मृत हो गई हैं
तुम्हारे पास आंसुओं का बैंक बैलेन्स कितना है
कितना एफ़.डी. करवा रखी है आंसुओं की
पिता के लिए
पिता अकेले नहीं होते हैं अकेले रहते हुए जितने
कि वे अकेले पड़ जाते हैं
पुत्रों के बावजूद
दृष्टि के साथ धुंधलाता जाता है
पिता का भविष्य

क्या पिता का कोई भविष्य होता है
पिता तो होते हैं स्वयं भविष्य
पिता का तो होता है वर्तमान
पहाड़ की मानिन्द भारी ओर नदी की तरह लम्बा
जितने अधिक नम्बर का चश्मा चढ़ता जाता है
पिता की आँखों पर उतना बारीक होता जाता है पुत्र
आँखों का पका हुआ मोतियाबिन्द
मोती जैसे पुत्र का बन्द होना है
जितना प्रकाशवान होता जाता है पुत्र
उतने तमसावृत्त होते जाते हैं पिता
जितना समृ…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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