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February 2006
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-अम्बिका दत्त

_अब चुप कर कटुए. दोगले.

_ओ...य, ओ...य...बामणी के. कमीणजात गरुड्ए. आगे मत बोलियो...नींतो.

_नीं तो? नीं तो?? क्या कर लेगा तू...क्या 'उपाड़' लेगा?

_अरे देख गुस्सा मत दिला मुझे. गुस्सा खराब है मेरा. ब्होत खराब इन्सान हूं मैं गुस्से के बाद.

ये कोई नया मामला नहीं है. रोज़ की बात है. दोनों के बीच कहा-सुनी. ये तो कुछ भी नहीं. इससे भी ज्यादा 'छोत'. पढ़े-लिखे लोग सुन लें तो बलवा हो जाए. पर इन दोनों के लिए तो रोज़मर्रा की बात है.
मानो दिन ब दिन सर्द होती जा रही ज़िंदगी में गरमाहट बचाए रखने के लिए इनके पास सिवा इसके कुछ भी नहीं था. कौमी कोसने. जिन्हें ये लकड़ी के कुंदों की तरह अपने ताल्लुक़ात की भट्ठी में झोंकते रहते थे.

इस अजीब रिश्ते में एक अजीब बंदिश ये भी कि बात बोला चाली से आगे कभी नहीं बढ़ती.
और इन दोनों के बीच तीसरा कोई आ गया तो...

दोनों साथ रहते हैं. किराए का रिक्शा चलाते हैं. रहम-तुल्ला और दीनबंधु. रमजू और दीनू नाम हैं इनके.
रिक्शे का धंधा कमजोर है इन दिनों. मजूरी कभी मिलती है कभी नहीं. रिक्शे का किराया भी भारी पड़ता है.

जिसकी जो ही जानता है. मजूर को एक दिन मजूरी न मिले तो उस पर क्या गुज़रती है. ये सब थोड़े ही जानते हैं. मगर दोनों इससे वाकिफ़ हैं. कई बार गुज़रा है वक्त ऐसा.

कल शहर (क़स्बा) बंद था. आज भी बंद है. कल भी रहेगा. फ़िल्मी गाने की तरह (सौ साल पहले...).
माइक से ऐलान हो चुका है. मामला वही है हस्बे मामूल हिंदू-मुस्लिम...ज़ाहिर सी बात, कसूर किस कौम का ज्यादा और बड़ा है, इसी बात पर 'अड़बा-ठेस' शुरू हुई थी दोनों में जो कौमी कोसनों की हद तक आ चुकी थी.

दोनों अपनी-अपनी आत्मा के आख़िरी पलीते को एक-दूसरे की तरफ़ फेंक चुके थे.पर आज का दिन बीते हुए कल और आने वाले कल के बोझ से, भारी था.दोनों ने अपनी-अपनी बजाई और थोड़ी देर बाद बुझने लगे.

बुझते हुए दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ सूनी आंखों से देखा. फिर पता नहीं क्या हुआ.

दोनों के हाथ एक-दूसरे की गरदन में झूल गए. दोनों के सिर एक-दूसरे के कंधो पर टिक गए. दोनों रोने लगे.
फूट-फूट कर. फफक-फफक कर.जैसे बुझते हुए अलाव पर पानी बरस गया हो.
**-**

2

लघुकथा

- यश मालवीय

माँ को सब-कुछ धुंधला-सा नजर आता है, उनकी आँखों में गहरा मोतियाबिंद है. माँ कायदे से कुछ भी खा नहीं पातीं. उनका दाँतों का सेट पुराना पड़ गया है. माँ ऊँचा सुनने लगी हैं, उनके लिए कान की मशीन भी जरुरी हो गई है.

माँ का लायक बेटा परेशान है. माँ से कहता है कि इन सर्दियों में आँख का आपरेशन करा लें, डाक्टर के पास चली चलें, दाँतों का नया सेट लगवा लें, एक अच्छी-सी कान की मशीन भी लेती आएँ. यह सब-कुछ हो जाए तो वह आराम से टी.वी. देख-सुन सकती हैं, अच्छे-से- अच्छा खाना चबा-चबाकर खा सकती हैं. बावजूद बहुत-बहुत समझाने के वह टालमटोल करती हैं, किसी तरह डाक्टर के पास चलने को तैयार ही नहीं होतीं.

एक दिन बेटा जिद पर अड़ जाता है. मां को जब बचने का कोई चारा समझ नहीं आता तो बुझी-बुझी मगर वत्सलता में भीगी आँखों से बेटे की ओर देखती हैं और बोल पड़ती हैं, “बेटा, मेरा मोतियाबिंद कट भी गया तो क्या मैं सपना हो गए तेरे पिता को फिर से देख पाऊँगी और फिर अगर तू ले ही चलना चाहता है तो मुझे डाक्टर के पास नहीं, किसी ज्योतिषी के पास ले चल और पता कर कि कितनी बची है मेरी जिंदगी? फ़ालतू में दो-चार बरस के लिए मैं तेरे ढेर सारे पैसे खर्च करवाऊँ, यह मुझसे नहीं होगा.”

माँ का तर्क सुनकर बेटा छटपटाता हुआ-सा माँ को देखता रह जाता है.

***-***

रचनाकार – यश मालवीय हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ रचनाकार हैं.

चित्र – छायांकन – रविशंकर श्रीवास्तव

-प्रेमचंद

दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उत्तरी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड़ के हेड क्लर्क बाबू मदारीलाल ग्यारह बजे दफ्तर आये, तब मानो दफ्तर नींद से जाग उठा। चपरासी ने दौड़ कर पैरगाड़ी ली, अरदली ने दौड़कर कमरे की चिक उठा दी और जमादार ने डाक की किश्त मेज जर ला कर रख दी। मदारीलाल ने पहला ही सरकारी लिफाफा खोला था कि उनका रंग फक हो गया। वे कई मिनट तक आश्चर्यान्वित हालत में खड़े रहे, मानो सारी ज्ञानेन्द्रियॉँ शिथिल हो गयी हों। उन पर बड़े-बड़े आघात हो चुके थे; पर इतने बहदवास वे कभी न हुए थे। बात यह थी कि बोर्ड़ के सेक्रेटरी की जो जगह एक महीने से खाली थी, सरकार ने सुबोधचन्द्र को वह जगह दी थी और सुबोधचन्द्र वह व्यक्ति था, जिसके नाम ही से मदारीलाल को घृणा थी। वह सुबोधचन्द्र, जो उनका सहपाठी था, जिस जक देने को उन्होंने कितनी ही चेष्टा की; पर कभरी सफल न हुए थे। वही सुबोध आज उनका अफसर होकर आ रहा था। सुबोध की इधर कई सालों से कोई खबर न थी। इतना मालूम था कि वह फौज में भरती हो गया था। मदारीलाल ने समझा—वहीं मर गया होगा; पर आज वह मानों जी उठा और सेक्रेटरी होकर आ रहा था। मदारीलाल को उसकी मातहती में काम करना पड़ेगा। इस अपमान से तो मर जाना कहीं अच्छा था। सुबोध को स्कूल और कालेज की सारी बातें अवश्य ही याद होंगी। मदारीलाल ने उसे कालेज से निकलवा देने के लिए कई बार मंत्र चलाए, झूठे आरोज किये, बदनाम किया। क्या सुबोध सब कुछ भूल गया होगा? नहीं, कभी नहीं। वह आते ही पुरानी कसर निकालेगा। मदारी बाबू को अपनी प्राणरक्षा का कोई उपाय न सूझता था।

मदारी और सुबोध के ग्रहों में ही विरोध थां दोनों एक ही दिन, एक ही शाला में भरती हुए थे, और पहले ही दिन से दिल में ईर्ष्या और द्वेष की वह चिनगारी पड़ गयी, जो आज बीस वर्ष बीतने पर भी न बुझी थी। सुबोध का अपराध यही था कि वह मदारीलाल से हर एक बात में बढ़ा हुआ थां डी-डौल,

रंग-रूप, रीति-व्यवहार, विद्या-बुद्धि ये सारे मैदान उसके हाथ थे। मदारीलाल ने उसका यह अपराध कभी क्षमा नहीं कियां सुबोध बीस वर्ष तक निरन्तर उनके हृदय का कॉँटा बना रहा। जब सुबोध डिग्री लेकर अपने घर चला गया और मदारी फेल होकर इस दफ्तर में नौकर हो गये, तब उनका चित शांत हुआ। किन्तु जब यह मालूम हुआ कि सुबोध बसरे जा रहा है, जब तो मदारीलाल का चेहरा खिल उठा। उनके दिल से वह पुरानी फॉँस निकल गयी। पर हा हतभाग्य! आज वह पुराना नासूर शतगुण टीस और जलन के साथ खुल गया। आज उनकी किस्मत सुबोध के हाथ में थी। ईश्वर इतना अन्यायी है! विधि इतना कठोर!

जब जरा चित शांत हुआ, तब मदारी ने दफ्तर के क्लर्को को सरकारी हुक्म सुनाते हुए कहा—अब आप लोग जरा हाथ-पॉँव सँभाल कर रहिएगा। सुबोधचन्द्र वे आदमी नहीं हें, जो भूलो को क्षम कर दें?

एक क्लर्क ने पूछा—क्या बहुत सख्त है।

मदारीलाल ने मुस्करा कर कहा—वह तो आप लोगों को दो-चार दिन ही में मालूम हो जाएगा। मै अपने मुँह से किसी की क्यों शिकायत करूँ? बस, चेतावनी देदी कि जरा हाथ-पॉँव सँभाल कर रहिएगा। आदमी योग्य है, पर बड़ा ही क्रोधी, बड़ा दम्भी। गुस्सा तो उसकी नाक पर रहता है। खुद हजारों हजम कर जाय और डकार तक न ले; पर क्या मजाल कि कोइ्र मातहत एक कौड़ी भी हजम करने जाये। ऐसे आदमी से ईश्वर ही बचाये! में तो सोच राह हूँ कि छुट्टी लेकर घर चला जाऊँ। दोनों वक्त घर पर हाजिरी बजानी होगी। आप लोग आज से सरकार के नौकर नहीं, सेक्रटरी साहब के नौकर हैं। कोई उनके लड़के को पढ़ायेगा। कोई बाजास से सौदा-सुलुफ लायेगा और कोई उन्हें अखबार सुनायेगा। ओर चपरासियों के तो शायद दफ्तर में दर्शन ही न हों।

इस प्रकार सारे दफ्तर को सुबोधचन्द्र की तरफ से भड़का कर मदारीलाल ने अपना कलेजा ठंडा किया।



इसके एक सप्ताह बाद सुबोधचन्द्र गाड़ी से उतरे, तब स्टेशन पर दफ्तर के सब कर्मचारियों को हाजिर पाया। सब उनका स्वागत करने आये थे। मदारीलाल को देखते ही सुबोध लपक कर उनके गले से लिपट गये और बोले—तुम खूब मिले भाई। यहॉँ कैसे आये? ओह! आज एक युग के बाद भेंट हुई!

मदारीलाल बोले—यहॉँ जिला-बोर्ड़ के दफ्तर में हेड क्लर्क हूँ। आप तो कुशल से है?

सुबोध—अजी, मेरी न पूछो। बसरा, फ्रांस, मिश्र और न-जाने कहॉं-कहॉँ मारा-मारा फिरा। तुम दफ्तर में हो, यह बहुत ही अच्छा हुआ। मेरी तो समझ ही मे न आता था कि कैसे काम चलेगा। मैं तो बिलकुल कोरा हूँ; मगर जहॉँ जाता हूँ, मेरा सौभाग्य ही मेरे साथ जाता है। बसरे में सभी अफसर खूश थे। फांस में भी खूब चैन किये। दो साल में कोई पचीस हजार रूपये बना लाया और सब उड़ा दिया। तॉँ से आकर कुछ दिनों को-आपरेशन दफ्तर में मटरगश्त करता रहा। यहॉँ आया तब तुम मिल गये। (क्लर्को को देख कर) ये लोग कौन हैं?

मदारीलाल के हृदय में बछिंया-सी चल रही थीं। दुष्ट पचीस हजार रूपये बसरे में कमा लाया! यहॉँ कलम घिसते-घिसते मर गये और पाँच सौ भी न जमा कर सके। बोले—कर्मचारी हें। सलाम करने आये है।

सबोध ने उन सब लोगों से बारी-बारी से हाथ मिलाया और बोला—आप लोगों ने व्यर्थ यह कष्ट किया। बहुत आभारी हूँ। मुझे आशा हे कि आप सब सज्जनों को मुझसे कोई शिकायत न होगी। मुझे अपना अफसर नहीं, अपना भाई समझिए। आप सब लोग मिल कर इस तरह काम कीजिए कि बोर्ड की नेकनामी हो और मैं भी सुखर्रू रहूँ। आपके हेड क्लर्क साहब तो मेरे पुराने मित्र और लँगोटिया यार है।

एक वाकचतुर क्लक्र ने कहा—हम सब हुजूर के ताबेदार हैं। यथाशक्ति आपको असंतुष्ट न करेंगे; लेकिनह आदमी ही है, अगर कोई भूल हो भी जाय, तो हुजूर उसे क्षमा करेंगे।

सुबोध ने नम्रता से कहा—यही मेरा सिद्धान्त है और हमेशा से यही सिद्धान्त रहा है। जहॉँ रहा, मतहतों से मित्रों का-सा बर्ताव किया। हम और आज दोनों ही किसी तीसरे के गुलाम हैं। फिर रोब कैसा और अफसरी कैसी? हॉँ, हमें नेकनीयत के साथ अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए।

जब सुबोध से विदा होकर कर्मचारी लोग चले, तब आपस में बातें होनी लगीं—
‘आदमी तो अच्छा मालूम होता है।‘
‘हेड क्लर्क के कहने से तो ऐसा मालूम होता था कि सबको कच्चा ही खा जायगा।‘
‘पहले सभी ऐसे ही बातें करते है।‘
‘ये दिखाने के दॉँत है।‘



सुबोध को आये एक महीना गुजर गया। बोर्ड के क्लर्क, अरदली, चपरासी सभी उसके बर्वाव से खुश हैं। वह इतना प्रसन्नचित है, इतना नम्र हे कि जो उससे एक बार मिला हे, सदैव के लिए उसका मित्र हो जाता है। कठोर शब्द तो उनकी जबान पर आता ही नहीं। इनकार को भी वह अप्रिय नहीं होने देता; लेकिन द्वेष की ऑंखों मेंगुण ओर भी भयंकर हो जाता है। सुबोध के ये सारे सदगुण मदारीलाल की ऑंखों में खटकते रहते हें। उसके विरूद्ध कोई न कोई गुप्त षडयंत्र रचते ही रहते हें। पहले कर्मचारियों को भड़काना चाहा, सफल न हुए। बोर्ड के मेम्बरों को भड़काना चाहा, मुँह की खायी। ठेकेदारों को उभारने का बीड़ा उठाया, लज्जित होना पड़ा। वे चाहते थे कि भुस में आग लगा कर दूर से तमाशा देखें। सुबोध से यों हँस कर मिलते, यों चिकनी-चुपड़ी बातें करते, मानों उसके सच्चे मित्र है, पर घात में लगे रहते। सुबोध में सब गुण थे, पर आदमी पहचानना न जानते थे। वे मदारीलाल को अब भी अपना दोस्त समझते हैं।

एक दिन मदारीलाल सेक्रटरी साहब के कमरे में गए तब कुर्सी खाली देखी। वे किसी काम से बाहर चले गए थे। उनकी मेज पर पॉँच हजार के नोट पुलिदों में बँधे हुए रखे थे। बोर्ड के मदरसों के लिए कुछ लकड़ी के सामान बनवाये गये थे। उसी के दाम थे। ठेकेदार वसूली के लिए बुलया गया थां आज ही सेक्रेटरी साहब ने चेक भेज कर खजाने से रूपये मॅगवाये थे। मदारीलाल ने बरामदे में झॉँक कर देखा, सुबोध का कहीं जता नहीं। उनकी नीयत बदल गयी। र्दर्ष्या में लोभ का सम्मिश्रण हो गया। कॉँपते हुए हाथों से पुलिंदे उठाये; पतलून की दोनों जेबों में भर कर तुरन्त कमरे से निकले ओर चपरासी को पुकार कर बोले—बाबू जी भीतर है? चपरासी आप ठेकेदार से कुछ वसूल करने की खुशी में फूला हुआ थां सामने वाले तमोली के दूकान से आकर बोला—जी नहीं, कचहरी में किसी से बातें कर रहे है। अभी-अभी तो गये हैं।

मदारीलाल ने दफ्तर में आकर एक क्लर्क से कहा—यह मिसिल ले जाकर सेक्रेटरी साहब को दिखाओ।

क्लर्क मिसिल लेकर चला गया। जरा देर में लौट कर बोला—सेक्रेटरी साहब कमरे में न थे। फाइल मेज पर रख आया हूँ।

मदारीलाल ने मुँह सिकोड़ कर कहा—कमरा छोड़ कर कहॉँ चले जाया करते हैं? किसी दिन धोखा उठायेंगे।
क्लर्क ने कहा—उनके कमरे में दफ्तवालों के सिवा और जाता ही कौन है?

मदारीलाल ने तीव्र स्वर में कहा—तो क्या दफ्तरवाले सब के सब देवता हैं? कब किसकी नीयत बदल जाय, कोई नहीं कह सकता। मैंने छोटी-छोटी रकमों पर अच्छों-अच्छों की नीयतें बदलते देखी हैं।इस वक्त हम सभी साह हैं; लेकिन अवसर पाकर शायद ही कोई चूके। मनुष्य की यही प्रकृति है। आप जाकर उनके कमरे के दोनों दरवाजे बन्द कर दीजिए।

क्लर्क ने टाल कर कहा—चपरासी तो दरवाजे पर बैठा हुआ है।
मदारीलाल ने झुँझला कर कहा—आप से मै जो कहता हूँ, वह कीजिए। कहने लगें, चपरासी बैठा हुआ है। चपरासी कोई ऋषि है, मुनि है? चपरसी ही कुछ उड़ा दे, तो आप उसका क्या कर लेंगे? जमानत भी है तो तीन सौ की। यहॉँ एक-एक कागज लाखों का है।

यह कह कर मदारीलाल खुद उठे और दफ्तर के द्वार दोनों तरफ से बन्द कर दिये। जब चित् शांत हुआ तब नोटों के पुलिंदे जेब से निकाल कर एक आलमारी में कागजों के नीचे छिपा कर रख दियें फिर आकर अपने काम में व्यस्त हो गये।

सुबोधचन्द्र कोई घंटे-भर में लौटे। तब उनके कमरे का द्वार बन्द था। दफ्तर में आकर मुस्कराते हुए बोले—मेरा कमरा किसने बन्द कर दिया है, भाई क्या मेरी बेदखली हो गयी?

मदारीलाल ने खड़े होकर मृदु तिरस्कार दिखाते हुए कहा—साहब, गुस्ताखी माफ हो, आप जब कभी बाहर जायँ, चाहे एक ही मिनट के लिए क्यों न हो, तब दरवाजा-बन्द कर दिया करें। आपकी मेज पर रूपये-पैसे और सरकारी कागज-पत्र बिखरे पड़े रहते हैं, न जाने किस वक्त किसकी नीयत बदल जाय। मैंने अभी सुना कि आप कहीं गये हैं, जब दरवाजे बन्द कर दिये।

सुबोधचन्द्र द्वार खोल कर कमरे में गये ओर सिगार पीने लगें मेज पर नोट रखे हुए है, इसके खबर ही न थी।
सहसा ठेकेदार ने आकर सलाम कियां सुबोध कुर्सी से उठ बैठे और बोले—तुमने बहुत देर कर दी, तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था। दस ही बजे रूपये मँगवा लिये थे। रसीद लिखवा लाये हो न?
ठेकेदार—हुजूर रसीद लिखवा लाया हूँ।

सुबोध—तो अपने रूपये ले जाओ। तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश नहीं हूँ। लकड़ी तुमने अच्छी नहीं लगायी और काम में सफाई भी नहीं हे। अगर ऐसा काम फिर करोंगे, तो ठेकेदारों के रजिस्टर से तुम्हारा नाम निकाल दिया जायगा।

यह कह कर सुबोध ने मेज पर निगाह डाली, तब नोटों के पुलिंदे न थे। सोचा, शायद किसी फाइल के नीचे दब गये हों। कुरसी के समीप के सब कागज उलट-पुलट डाले; मगर नोटो का कहीं पता नहीं। ऐं नोट कहॉँ गये! अभी तो यही मेने रख दिये थे। जा कहॉँ सकते हें। फिर फाइलों को उलटने-पुलटने लगे। दिल में जरा-जरा धड़कन होने लगी। सारी मेज के कागज छान डाले, पुलिंदों का पता नहीं। तब वे कुरसी पर बैठकर इस आध घंटे में होने वाली घटनाओं की मन में आलोचना करने लगे—चपरासी ने नोटों के पुलिंदे लाकर मुझे दिये, खूब याद है। भला, यह भी भूलने की बात है और इतनी जल्द! मैने नोटों को लेकर यहीं मेज पर रख दिया, गिना तक नहीं। फिर वकील साहब आ गये, पुराने मुलाकाती हैं। उनसे बातें करता जरा उस पेड़ तक चला गया। उन्होंने पान मँगवाये, बस इतनी ही देर र्हु। जब गया हूँ तब पुलिंदे रखे हुए थे। खूब अच्छी तरह याद है। तब ये नोट कहॉँ गायब हो गये? मैंने किसी संदूक, दराज या आलमारी में नहीं रखे। फिर गये तो कहॉँ? शायद दफ्तर में किसी ने सावधानी के लिए उठा कर रख दिये हों, यही बात है। मैं व्यर्थ ही इतना घबरा गया। छि:!

तुरन्त दफ्तर में आकर मदारीलाल से बोले—आपने मेरी मेज पर से नोट तो उठा कर नहीं रख दिय?
मदारीलाल ने भौंचक्के होकर कहा—क्या आपकी मेज पर नोट रखे हुए थे? मुझे तो खबर ही नहीं। अभी पंडित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे, तब आपको कमरे में न देखा। जब मुझे मालूम हुआ कि आप किसी से बातें करने चले गये हैं, वब दरवाजे बन्द करा दिये। क्या कुछ नोट नहीं मिल रहे है?
सुबोध ऑंखें फैला कर बोले—अरे साहब, पूरे पॉँच हजार के है। अभी-अभी चेक भुनाया है।
मदारीलाल ने सिर पीट कर कहा—पूरे पाँच हजार! हा भगवान! आपने मेज पर खूब देख लिया है?
‘अजी पंद्रह मिनट से तलाश कर रहा हूँ।‘

‘चपरासी से पूछ लिया कि कौन-कौन आया था?’
‘आइए, जरा आप लोग भी तलाश कीजिए। मेरे तो होश उड़े हुए है।‘

सारा दफ्तर सेक्रेटरी साहब के कमरे की तलाशी लेने लगा। मेज, आलमारियॉँ, संदूक सब देखे गये। रजिस्टरों के वर्क उलट-पुलट कर देंखे गये; मगर नोटों का कहीं पता नहीं। कोई उड़ा ले गया, अब इसमें कोइ्र शबहा न था। सुबोध ने एक लम्बी सॉँस ली और कुर्सी पर बैठ गये। चेहरे का रंग फक हो गया। जर-सा मुँह निकल आया। इस समय कोई उन्हे देखत तो समझता कि महीनों से बीमार है।

मदारीलाल ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा— गजब हो गया और क्या! आज तक कभी ऐसा अंधेर न हुआ था। मुझे यहॉँ काम करते दस साल हो गये, कभी धेले की चीज भी गायब न हुई। मैं आपको पहले दिन सावधान कर देना चाहता था कि रूपये-पैसे के विषय में होशियार रहिएगा; मगर शुदनी थी, ख्याल न रहा। जरूर बाहर से कोई आदमी आया और नोट उड़ा कर गायब हो गया। चपरासी का यही अपराध है कि उसने किसी को कमरे में जोने ही क्यों दिया। वह लाख कसम खाये कि बाहर से कोई नहीं आया; लेकिन में इसे मान नहीं सकता। यहॉँ से तो केवल पण्डित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे; मगर दरवाजे ही से झॉँक कर चले आये।

सोहनलाल ने सफाई दी—मैंने तो अन्दर कदम ही नहीं रखा, साहब! अपने जवान बेटे की कसम खाता हूँ, जो अन्दर कदम रखा भी हो।
मदारीलाल ने माथा सिकोड़कर कहा—आप व्यर्थ में कसम क्यों खाते हैं। कोई आपसे कुछ कहता? (सुबोध के कान में)बैंक में कुछ रूपये हों तो निकाल कर ठेकेदार को दे लिये जायँ, वरना बड़ी बदनामी होगी। नुकसान तो हो ही गया, अब उसके साथ अपमान क्यों हो।

सुबोध ने करूण-स्वर में कहा— बैंक में मुश्किल से दो-चार सौ रूपये होंगे, भाईजान! रूपये होते तो क्या चिन्ता थी। समझ लेता, जैसे पचीस हजार उड़ गये, वैसे ही तीस हजार भी उड़ गये। यहॉँ तो कफन को भी कौड़ी नहीं।
उसी रात को सुबोधचन्द्र ने आत्महत्या कर ली। इतने रूपयों का प्रबन्ध करना उनके लिए कठिन था। मृत्यु के परदे के सिवा उन्हें अपनी वेदना, अपनी विवशता को छिपाने की और कोई आड़ न थी।



दूसरे दिन प्रात: चपरासी ने मदारीलाल के घर पहुँच कर आवाज दीं मदारी को रात-भर नींद न आयी थी। घबरा कर बाहर आय। चपरासी उन्हें देखते ही बोला—हुजूर! बड़ा गजब हो गया, सिकट्टरी साहब ने रात को गर्दन पर छुरी फेर ली।

मदारीलाल की ऑंखे ऊपर चढ़ गयीं, मुँह फैल गया ओर सारी देह सिहर उठी, मानों उनका हाथ बिजली के तार पर पड़ गया हो।
‘छुरी फेर ली?’
‘जी हॉँ, आज सबेरे मालूम हुआ। पुलिसवाले जमा हैं। आपाके बुलाया है।‘
‘लाश अभी पड़ी हुई हैं?
‘जी हॉँ, अभी डाक्टरी होने वाली हैं।‘

‘बहुत से लोग जमा हैं?’
‘सब बड़े-बड़ अफसर जमा हैं। हुजूर, लहास की ओर ताकते नहीं बनता। कैसा भलामानुष हीरा आदमी था! सब लोग रो रहे हैं। छोडे-छोटे दो बच्चे हैं, एक सायानी लड़की हे ब्याहने लायक। बहू जी को लोग कितना रोक रहे हैं, पर बार-बार दौड़ कर लहास के पास आ जाती हैं। कोई ऐसा नहीं हे, जो रूमाल से ऑंखें न पोछ रहा हो। अभी इतने ही दिन आये हुए, पर सबसे कितना मेल-जोल हो गया था। रूपये की तो कभी परवा ही नहीं थी। दिल दरियाब था!’

मदारीलाल के सिर में चक्कर आने लगा। द्वारा की चौखट पकड़ कर अपने को सँभाल न लेते, तो शायद गिर पड़ते। पूछा—बहू जी बहुत रो रही थीं?
‘कुछ न पूछिए, हुजूर। पेड़ की पत्तियॉँ झड़ी जाती हैं। ऑंख फूल गर गूलर हो गयी है।‘
‘कितने लड़के बतलाये तुमने?’
‘हुजूर, दो लड़के हैं और एक लड़की।‘
‘नोटों के बारे में भी बातचीत हो रही होगी?’

‘जी हॉँ, सब लोग यही कहते हें कि दफ्तर के किसी आदमी का काम है। दारोगा जी तो सोहनलाल को गिरफ्तार करना चाहते थे; पर साइत आपसे सलाइ लेकर करेंगे। सिकट्टरी साहब तो लिख गए हैं कि मेरा किसी पर शक नहीं है।‘
‘क्या सेक्रेटरी साहब कोई खत लिख कर छोड़ गये है?’

‘हॉँ, मालूम होता है, छुरी चलाते बखत याद आयी कि शुबहे में दफ्तर के सब लोग पकड़ लिए जायेंगे। बस, कलक्टर साहब के नाम चिट्ठी लिख दी।‘
‘चिट्ठी में मेरे बारे में भी कुछ लिखा है? तुम्हें यक क्या मालूम होगा?’

‘हुजूर, अब मैं क्या जानूँ, मुदा इतना सब लोग कहते थे कि आपकी बड़ी तारीफ लिखी है।‘
मदारीलाल की सॉँस और तेज हो गयी। ऑंखें से ऑंसू की दो बड़ी-बड़ी बूँदे गिर पड़ी। ऑंखें पोंछतें हुए बोले—वे ओर मैं एक साथ के पढ़े थे, नन्दू! आठ-दस साल साथ रहा। साथ उठते-बैठते, साथ खाते, साथ खेलते। बस, इसी तरह रहते थे, जैसे दो सगे भाई रहते हों। खत में मेरी क्या तरीफ लिखी है? मगर तुम्हें क्या मालूम होगा?
‘आप तो चल ही रहे है, देख लीजिएगा।‘

‘कफन का इन्ताजाम हो गया है?’
‘नही हुजूर, काह न कि अभी लहास की डाक्टरी होगी। मुदा अब जल्दी चलिए। ऐसा न हो, कोई दूसरा आदमी बुलाने आता हो।‘
‘हमारे दफ्तर के सब लोग आ गये होंगे?’
‘जी हॉँ; इस मुहल्लेवाले तो सभी थे।

‘मदारीलाल जब सुबोधचन्द्र के घर पहुँचे, तब उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि सब लोग उनकी तरफ संदेह की ऑंखें से देख रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर ने तुरन्त उन्हें बुला कर कहा—आप भी अपना बयान लिखा दें और सबके बयान तो लिख चुका हूँ।‘

मदारीलाल ने ऐसी सावधानी से अपना बयान लिखाया कि पुलिस के अफसर भी दंग रह गये। उन्हें मदारीलाल पर शुबहा होता था, पर इस बयान ने उसका अंकुर भी निकाल डाला।

इसी वक्त सुबोध के दोनों बालक रोते हुए मदारीलाल के पास आये और कहा—चलिए, आपको अम्मॉँ बुलाती हैं। दोनों मदारीलाल से परिचित थे। मदारीलाल यहॉँ तो रोज ही आते थे; पर घर में कभी नहीं गये थे। सुबोध की स्त्री उनसे पर्दा करती थी। यह बुलावा सुन कर उनका दिल धड़क उठा—कही इसका मुझ पर शुबहा न हो। कहीं सुबोध ने मेरे विषय में कोई संदेह न प्रकट किया हो। कुछ झिझकते और कुछ डरते हुए भीतर गए, तब विधवा का करुण-विलाप सुन कर कलेजा कॉँप उठाा। इन्हें देखते ही उस अबला के ऑंसुओं का कोई दूसरा स्रोत खुल गया और लड़की तो दौड़ कर इनके पैरों से लिपट गई। दोनों लड़को ने भी घेर लिया। मदारीलाल को उन तीनों की ऑंखें में ऐसी अथाह वेदना, ऐसी विदारक याचना भरी हुई मालूम हुई कि वे उनकी ओर देख न सके। उनकी आत्मा अन्हें धिक्कारने लगी। जिन बेचारों को उन पर इतना विश्वास, इतना भरोसा, इतनी अत्मीयता, इतना स्नेह था, उन्हीं की गर्दन पर उन्होंने छुरी फेरी! उन्हीं के हाथों यह भरा-पूरा परिवार धूल में मिल गया! इन असाहायों का अब क्या हाल होगा? लड़की का विवाह करना है; कौन करेगा? बच्चों के लालन-पालन का भार कौन उठाएगा? मदारीलाल को इतनी आत्मग्लानि हुई कि उनके मुँह से तसल्ली का एक शब्द भी न निकला। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि मेरे मुख में कालिख पुती है, मेरा कद कुछ छोटा हो गया है। उन्होंने जिस वक्त नोट उड़ये थे, उन्हें गुमान भी न था कि उसका यह फल होगा। वे केवल सुबोध को जिच करना चाहते थें उनका सर्वनाश करने की इच्छा न थी।

शोकातुर विधवा ने सिसकते हुए कहा। भैया जी, हम लोगों को वे मझधार में छोड़ गए। अगर मुझे मालूम होता कि मन में यह बात ठान चुके हैं तो अपने पास जो कुछ था; वह सब उनके चरणों पर रख देती। मुझसे तो वे यही कहते रहे कि कोई न कोई उपाय हो जायगा। आप ही के मार्फत वे कोई महाजन ठीक करना चाहते थे। आपके ऊपर उन्हें कितना भरोसा था कि कह नहीं सकती।

मदारीलाल को ऐसा मालूम हुआ कि कोई उनके हृदय पर नश्तर चला रहा है। उन्हें अपने कंठ में कोई चीज फॅंसी हुई जान पड़ती थी।

रामेश्वरी ने फिर कहा—रात सोये, तब खूब हँस रहे थे। रोज की तरह दूध पिया, बच्चो को प्यार किया, थोड़ीदेर हारमोनियम चाया और तब कुल्ला करके लेटे। कोई ऐसी बात न थी जिससे लेश्मात्र भी संदेह होता। मुझे चिन्तित देखकर बोले—तुम व्यर्थ घबराती हों बाबू मदारीलाल से मेरी पुरानी दोस्ती है। आखिर वह किस दिन काम आयेगी? मेरे साथ के खेले हुए हैं। इन नगर में उनका सबसे परिचय है। रूपयों का प्रबन्ध आसानी से हो जायगा। फिर न जाने कब मन में यह बात समायी। मैं नसीबों-जली ऐसी सोयी कि रात को मिनकी तक नहीं। क्या जानती थी कि वे अपनी जान पर खेले जाऍंगे?

मदारीलाल को सारा विश्व ऑंखों में तैरता हुआ मालूम हुआ। उन्होंने बहुत जब्त किया; मगर ऑंसुओं के प्रभाव को न रोक सके।

रामेश्वरी ने ऑंखे पोंछ कर फिर कहा—मैया जी, जो कुछ होना था, वह तो हो चुका; लेकिन आप उस दुष्ट का पता जरूर लगाइए, जिसने हमारा सर्वनाश कर लिदया है। यह दफ्तर ही के किसी आदमी का काम है। वे तो देवता थे। मुझसे यही कहते रहे कि मेरा किसी पर संदेह नहीं है, पर है यह किसी दफ्तरवाले का ही काम। आप से केवल इतनी विनती करती हूँ कि उस पापी को बच कर न जाने दीजिएगा। पुलिसताले शायद कुछ रिश्वत लेकर उसे छोड़ दें। आपको देख कर उनका यह हौसला न होगा। अब हमारे सिर पर आपके सिवा कौन है। किससे अपना दु:ख कहें? लाश की यह दुर्गति होनी भी लिखी थी।

मदारीलाल के मन में एक बार ऐसा उबाल उठा कि सब कुछ खोल दें। साफ कह दें, मै ही वह दुष्ट, वह अधम, वह पामर हूँ। विधवा के पेरों पर गिर पड़ें और कहें, वही छुरी इस हत्यारे की गर्दन पर फेर दो। पर जबान न खुली; इसी दशा में बैठे-बैठे उनके सिर में ऐसा चक्कर आया कि वे जमीन पर गिर पड़े।


तीसरे पहर लाश की परीक्षा समाप्त हुई। अर्थी जलाशय की ओर चली। सारा दफ्तर, सारे हुक्काम और हजारों आदमी साथ थे। दाह-संस्कार लड़को को करना चाहिए था पर लड़के नाबालिग थे। इसलिए विधवा चलने को तैयार हो रही थी कि मदारीलाल ने जाकर कहा—बहू जी, यह संस्कार मुझे करने दो। तुम क्रिया पर बैठ जाओंगी, तो बच्चों को कौन सँभालेगा। सुबोध मेरे भाई थे। जिंदगी में उनके साथ कुछ सलूक न कर सका, अब जिंदगी के बाद मुझे दोस्ती का कुछ हक अदा कर लेने दो। आखिर मेरा भी तो उन पर कुछ हक था। रामेश्वरी ने रोकर कहा—आपको भगवान ने बड़ा उदार हृदय दिया है भैया जी, नहीं तो मरने पर कौन किसको पूछता है। दफ्तर के ओर लोग जो आधी-आधी रात तक हाथ बॉँधे खड़े रहते थे झूठी बात पूछने न आये कि जरा ढाढ़स होता।

मदारीलाल ने दाह-संस्कार किया। तेरह दिन तक क्रिया पर बैठे रहे। तेरहवें दिन पिंडदान हुआ; ब्रहामणों ने भोजन किया, भिखरियों को अन्न-दान दिया गया, मित्रों की दावत हुई, और यह सब कुछ मदारीलाल ने अपने खर्च से किया। रामेश्वरी ने बहुत कहा कि आपने जितना किया उतना ही बहुत है। अब मै आपको और जेरबार नहीं करना चाहती। दोस्ती का हक इससे ज्यादा और कोई क्या अदा करेगा, मगर मदारीलाल ने एक न सुनी। सारे शहर में उनके यश की धूम मच गयीं, मित्र हो तो ऐसा हो।

सोलहवें दिन विधवा ने मदारीलाल से कहा—भैया जी, आपने हमारे साथ जो उपकार और अनुग्रह किये हें, उनसे हम मरते दम तक उऋण नहीं हो सकते। आपने हमारी पीठ पर हाथ न रखा होता, तो न-जाने हमारी क्या गति होती। कहीं रूख की भी छॉँह तो नहीं थी। अब हमें घर जाने दीजिए। वहॉँ देहात में खर्च भी कम होगा और कुछ खेती बारी का सिलसिला भी कर लूँगी। किसी न किसी तरह विपत्ति के दिन कट ही जायँगे। इसी तरह हमारे ऊपर दया रखिएगा।

मदारीलाल ने पूछा—घर पर कितनी जायदाद है?
रामेश्वरी—जायदाद क्या है, एक कच्चा मकान है और दर-बारह बीघे की काश्तकारी है। पक्का मकान बनवाना शुरू किया था; मगर रूपये पूरे न पड़े। अभी अधूरा पड़ा हुआ है। दस-बारह हजार खर्च हो गये और अभी छत पड़ने की नौबत नहीं आयी।
मदारीलाल—कुछ रूपये बैंक में जमा हें, या बस खेती ही का सहारा है?

विधवा—जमा तो एक पाई भी नहीं हैं, भैया जी! उनके हाथ में रूपये रहने ही नहीं पाते थे। बस, वही खेती का सहारा है।
मदारी0—तो उन खेतों में इतनी पैदावार हो जायगी कि लगान भी अदा हो जाय ओर तुम लोगो की गुजर-बसर भी हो?
रामेश्वरी—और कर ही क्या सकते हैं, भेया जी! किसी न किसी तरह जिंदगी तो काटश्नी ही है। बच्चे न होते तो मै जहर खा लेती।
मदारी0—और अभी बेटी का विवाह भी तो करना है।

विधवा—उसके विवाह की अब कोइ्र चिंता नहीं। किसानों में ऐसे बहुत से मिल जायेंगे, जो बिना कुछ लिये-दिये विवाह कर लेंगे।
मदारीलाल ने एक क्षण सोचकर कहा—अगर में कुछ सलाह दूँ, तो उसे मानेंगी आप?
रामेश्वरी—भैया जी, आपकी सलाह न मानूँगी तो किसकी सलाह मानूँगी और दूसरा है ही कौन?

मदारी0—तो आप उपने घर जाने के बदले मेरे घर चलिए। जैसे मेरे बाल-बच्चे रहेंगें, वैसे ही आप के भी रहेंगे। आपको कष्ट न होगा। ईश्वर ने चाहा तो कन्या का विवाह भी किसी अच्छे कुल में हो जायगा।
विधवा की ऑंखे सजल हो गयीं। बोली—मगर भैया जी, सोचिए.....मदारीलाल ने बात काट कर कहा—मैं कुछ न सोचूँगा और न कोई उज्र सुनुँगा। क्या दो भाइयों के परिवार एक साथ नहीं रहते? सुबोध को मै अपना भाई समझता था और हमेशा समझूँगा।

विधवा का कोई उज्र न सुना गया। मदारीलाल सबको अपने साथ ले गये और आज दस साल से उनका पालन कर रहे है। दोनों बच्चे कालेज में पढ़ते है और कन्या का एक प्रतिष्ठित कुल में विवाह हो गया हे। मदारीलाल और उनकी स्त्री तन-मन से रामेश्वरी की सेवा करते हैं और उनके इशारों पर चलते हैं। मदारीलाल सेवा से अपने पाप का प्रायश्चित कर रहे हैं।
****


-बालकवि बैरागी

डराओ मत
बिजली को बादल से
सोने को आग से
शून्य को अंक से
और मछली को पानी से

मुक्त कर लो अपने आपको
इस डरावनी मानसिकता
और पागल परेशानी से

बादल ही तो है बिजली का घर
आग ही परखती है सोने को
शून्य क्यों डरेगा अंक से?
और मछली?
मछली पानी से नहीं तो
क्या प्यार करेगी पंक से?

अगर ये
डरने लगे एक-दूसरे से
तो हो गया काम
एक-दूसरे की बाहों में ही
मिलता है इन्हें आराम.

ये बात मुझे तब सूझी
जब लोग डरा रहे थे
उन्हें चुनाव से

शायद लोग परिचित नहीं हैं
बिजली, सोने, शून्य
और मछली के स्वभाव से.


रचनाकार – बालकवि बैरागी – नीमच मप्र के प्रतिष्ठित राजनीतिज्ञ-कवि हैं.


-हितेश व्यास

कविता में शब्द आते हैं जैसे, शब्दों में आती है कविता
तारों में बहता है करेंट, ऐसे आती है शब्दों में कविता
रमाशंकर फेंकता है, 5.20 पर अख़बार
लपक कर उठाता हूँ.

उठाता हूँ मैं, कविता के लिए शब्द
डाकिया डालता है चिट्ठियाँ लेटरबॉक्स में
जाली से देखता हूँ.
एक झुरझुरी-सी होती है
महसूस करना चाहता हूँ, कुछ वैसा ही
कविता लिखने से पहले
सुबह, बाहर तो बाद में होती है
पहले होती है भीतर

कविता शब्दों में आती है बाद में
पहले होती है भीतर, बिना शब्दों के
जैसे आता है दुःख अचानक, कविता आती है.
जैसे लौटते हैं बच्चे स्कूल से, बस्ता और मुँह लटकाए हुए
लौटते हैं शब्द कविताओं में
बाजरी के दानों पर उतरती है चिड़ियाएँ
और चौंक के उड़-उड़ जाती हैं.

उतरते हैं शब्द और उड़-उड़ जाते हैं
कविता में रहते हैं शब्द जैसे ब्रह्म रहता है शब्द में
जैसे चीजें रहती हैं आलों में
जैसे चावल के पिण्ड रहते हैं श्राद्ध में
जैसे कपड़े रहते हैं अलगनी पर
मनके रहते हैं मालाओं में
कविताओं में शब्द रहते हैं.

घटनाएँ रहती हैं जीवन में, बेतरतीब और बेसिलसिलेवार
बहुत सारे काम रह जाते हैं बाकी
शब्द रह जाते हैं शेष
कविताओं में रहते हैं शब्द, जैसे शब्दों में रहता है मौन
खिड़कियाँ रहती हैं दीवारों में
दीवारें रहती हैं दरवाजों को घेरे हुए
घन्टियाँ रहती हैं बन्द दरवाजों पर
प्रतीक रहते हैं शब्दों में, आदमी रहते हैं घरों में


शब्द रहते हैं कविताओं में
सब कविताओं में कहाँ रहते हैं शब्द
सब शब्दों में कहाँ रहती है कविता?

***-***
रचनाकार – हितेश व्यास की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें-
http://rachanakar.blogspot.com/2006/02/blog-post.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_22.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_113422217462821692.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_09.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html

चित्र: फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा की तैलरंगों से बनी कलाकृति - मेन इन ब्लू


ग़ज़ल 1
कैसा वातावरण हो गया
रात दिन जागरण हो गया

शब्दों से वाक्य बनते नहीं
व्यर्थ सब व्याकरण हो गया

झूठ पाखंड धोखा-धड़ी
आज का आचरण हो गया

युग की परिभाषाएँ देखिए
अब तो जीवन मरण हो गया

स्वर्णमृग जब भी आ जाएगा
समझो सीताहरण हो गया

ग़ज़ल 2
हर तरह के रंग में फिट हो गए
लोग अब दुनिया में गिरगिट हो गए

अफसरों से वो मिलेंगे सिर्फ जो
गेट पर लटकी हुई चिट हो गए

चोर-डाकू और लुटेरे लोग भी
सब के सब संसद में परमिट हो गए

सच हर युग में सदा सूली चढ़ा
झूठ के भोंपू मगर हिट हो गए

**-**

चित्र - अमित अम्बालाल की कैनवस पर तैल रंग से बनी 42x54 इंच की कलाकृति.

जमींदार के नायब गिरीश बसु के घर में प्यारी नाम की एक नौकरानी काम पर नई-नई लगी. कमसिन प्यारी अपने नाम के अनुरूप रुप और स्वभाव में भी थी. वह दूर पराए गांव से काम करने आई थी. कुछ ही दिन हुए थे उसे इस स्थान पर काम करते हुए कि एक दिन वह अपनी मालकिन के पास आकर रोने लगी. वृद्ध नायब की वासना दृष्टि उसे हलाकान कर रही थी. मालकिन ने उसे दिलासा दिया, बोली – ‘बेटी, तू अन्यत्र चली जा. तू भले विचारों वाली है, यहाँ तुझे परेशानी होगी.’ मालकिन ने उसे कुछ पैसे चुपचाप देकर उसे विदा कर दिया.

प्यारी के लिए उस गांव से भाग जाना आसान नहीं था. हाथ में पैसे भी थोड़े से ही थे. अतएव प्यारी ने गांव के ही एक भद्र पुरुष हरिहर भट्टाचार्य के घर पर आश्रय मांगा. उसके समझदार पुत्रों ने समझाना चाहा, ‘बाबूजी, फजूल किसलिए विपत्ति मोल ले रहे हैं?’ हरिहर सिद्धांतवादी थे – ‘स्वयं विपत्ति भी अगर आकर मुझसे आश्रय मांगे तो मैं उसे लौटा नहीं सकता...’

गिरीश बसु को प्यारी के पनाह की बात पता चली तो वह हरिहर भट्टाचार्य के पास पहुँचे, साष्टांग दंडवत किया और कहा, ‘भट्टाचार्य महोदय, आपने मेरी नौकरानी किसलिए फुसला ली? घर में काम की बहुत असुविधा हो रही है.’ प्रत्युत्तर में हरिहर भट्टाचार्य ने चंद खरी बातें कड़े स्वर में कह दीं. हरिहर सम्मानित, साफ व्यक्ति थे, किसी बात को लाग-लपेट में कहने के बजाए सीधे कहते थे. नायब गिरीश बसु को यह बात अत्यधिक अपमानजनक लगी. परंतु बड़े आडम्बर से हरिहर की चरण-धूलि लेकर वह बिदा हुआ.

इस घटना के कुछ दिनों के बाद ही हरिहर भट्टाचार्य के घर पुलिस का छापा पड़ गया. शयनकक्ष में तकिए के नीचे से नायब की पत्नी के कानों का एक जोड़ झुमका मिला जो कुछ समय पूर्व चोरी हो गया था. नौकरानी प्यारी को चोर प्रमाणित किया जाकर जेल भेज दिया गया. हरिहर भट्टाचार्य महाशय को अपनी प्रतिष्ठा के कारण ले-देकर चोर एवं चोरी के माल के संरक्षण के अभियोग से मुक्ति मिल सकी. नायब ने भट्टाचार्य की इस संकट-घड़ी में मिलकर संवेदना प्रकट की और चरण-धूलि ली. भट्टाचार्य ने जान लिया कि उनके द्वारा एक अभागिन को नायब की इच्छा के विरुद्ध आश्रय देने के कारण ही प्यारी पर यह घोर संकट आया. उनके मन में कांटा चुभ गया. हरिहर के पुत्रों ने फिर समझाने की कोशिश की- ‘जमीन जायदाद बेचकर कलकत्ता चलें, यहाँ तो बड़ी समस्या नजर आ रही है.’ हरिहर दृढ़ प्रतिज्ञ थे - ‘पैतृक घर मुझसे छोड़ा नहीं जाएगा, विपत्ति अगर भाग्य में बदी है तो वह कहीं भी रहो, आएगी ही.’

इस बीच, नायब ने गांव में अत्यधिक कर वृद्धि कर दी. जिसके कारण जनता विद्रोही हो उठी. हरिहर की जमीन माफ़ी की थी, जमींदार के क्षेत्र में नहीं आती थी और कोई कर नहीं देना होता था. नायब ने जमींदार को भड़काया – हरिहर भट्टाचार्य ने ही जनता को कर नहीं देने हेतु बरगलाया है. जमींदार से आदेश मिला- ‘जैसे भी हो भट्टाचार्य को ठीक करो.’

नायब गिरीश बसु ने हरिहर भट्टाचार्य की चरण-धूलि लेकर जमींदार का आदेश सुनाया - ‘आपकी सामने की वह जमीन परगना की सीमा में है, अब उसे छोड़ना होगा.’ हरिहर ने प्रतिवाद किया - ‘यह क्या कह रहे हो? वह तो मेरी बहुत दिनों से दान स्वरूप प्राप्त जमीन है.’

परंतु हरिहर के आँगन से लगी उस जमीन को जमींदार के परगने में शामिल बताकर नालिश दायर कर दी गई. हरिहर ने अपने पुत्रों से कहा- ‘अब तो इस जमीन को छोड़ना पड़ेगा. मैं बुढ़ापे में अदालतों के चक्कर नहीं काट सकता.’ सदा की तरह विद्रोही स्वरों वाले पुत्रों ने कहा - ‘घर से लगी पैतृक जमीन ही यदि छोड़नी पड़ जाए तो फिर इस घर में रहने का क्या अर्थ?’

वृद्ध हरिहर पैतृक सम्पत्ति को प्राण से भी अधिक चाहते थे. उसे बचाने के मोह में अदालत में हाजिर हुए. मुंसिफ़ नवगोपाल बाबू ने जो हरिहर की प्रतिबद्धताओं को जानते थे, उनकी गवाही को ही साक्षी मान मुकदमा खारिज कर दिया. गांव में भट्टाचार्य के प्रशंसकों ने इस बात को लेकर धूमधाम से उत्सव मनाना चाहा, परंतु हरिहर ने उन्हें रोका. नायब हरिहर से मिले, उन्हें बधाईयाँ दीं और विशेष आडम्बर के साथ उनकी चरण-धूलि ली, उसे सारी देह और सिर-माथे लगाई. और नायब ने अगले दिन ही इस निर्णय के खिलाफ अपील दायर कर दी.

न्यायालय के वकील सिद्धान्तवादी, ब्राह्मण हरिहर से पैसा नहीं लेते थे. वे ब्राह्मण को बारंबार आश्वासन देते, इस मुकदमें में कोई दम नहीं है- हारने की कोई संभावना नहीं है. दिन क्या कभी रात हो सकती है? ऐसी बातें सुनकर हरिहर निश्चिंत-से बैठे रहे.

एक दिन जमींदार के घर में ढोल बज उठे. भैंस की बलि के साथ नायब के मकान में काली मैया की पूजा होने की खबर मिली. भट्टाचार्य को खबर मिली की इस आयोजन का कारण – अपील में हुई उनकी हार है.

भट्टाचार्य ने सिर पीटते हुए अपने वकील से पूछा- ‘बसंत बाबू यह आपने क्या कर दिया? अब मेरी क्या दशा होगी?’

दिन किस तरह रात में बदल गई, बसंत बाबू ने इसका रहस्य हरिहर को कुछ यूँ समझाने की कोशिश की- ‘हाल ही में जो नए अतिरिक्त न्यायाधीश आए हैं, वे जब मुंसिफ थे तो मुंसिफ नवगोपाल बाबू के साथ उनकी बड़ी दुश्मनी थी. आज कुर्सी पर बैठे तो नवगोपाल बाबू की दी हुई राय को उन्होंने देखते ही पलट दिया, इसलिए आप हार गए.’

व्याकुल हरिहर ने पूछा- ‘उच्च न्यायालय में अपील करें?’ बसंत बाबू ने समझाया- ‘न्यायाधीश ने अपील से फल पाने की संभावना नहीं छोड़ी है. उन्होंने आपके गवाह पर संदेह प्रकट कर दिया और विरोधी पक्ष के गवाह का विश्वास किया है. उच्च न्यायालय में गवाह पर विचार नहीं होगा. अतः अपील व्यर्थ ही होगी.’

वृद्ध की आँखों में आँसू थे. पूछा - ‘मेरे लिए कोई उपाय?’

वकील उखड़े स्वर में बोले - ‘उपाय तो एक भी नज़र नहीं आता.’

दूसरे दिन नायब गिरीश बसु समारोह पूर्वक हरिहर भट्टाचार्य के घर आए, ब्राह्मण की चरण-धूलि ग्रहण की और जाते-जाते उच्छवासित गहरी सांस लेते हुए कह गए-‘प्रभु, जैसी तुम्हारी इच्छा!’

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- चंद्र प्रकाश यादव

मेरे सपने, शीशे की मीनारों से थे
कल्पना की चाँदनी जब उनसे लिपटती
मानों इन्द्रधनुष का कारवाँ
जिन्दगी के रेगिस्तान में झूमने लगता था

पर यथार्थ ने
अपने पत्थर के ठोस होठों से उन्हें चूमा
तो शीशे की मीनारें
जागृत से भंग होने वाले स्वप्न की तरह
झनझना कर टूट कर बिखर गए

उसके टुकड़े मेरी रग रग में गिरे
और उसकी किरचें
मेरी पलकों में समा गए
मेरी नींद मर गई

मैं जिन्दा रहा
मेरी आह और आँसू भी मर गए
मैं अकेला जिन्दा रहा

आम रास्ते में पड़े उस पत्थर की तरह
ठोकर खाना और चुप रहना.

**-**
रचनाकार –चन्द्र प्रकाश यादव पेशे से बैंकर हैं और यदा कदा इनकी कलम बैंक की खाताबही से उचटकर कविताओं के पन्ने रंगने लगती हैं...


-कालीचरण प्रेमी

दो बजे होंगे. मैं अपने नर्सिंग होम में बैठा यही सोच रहा था कि अब लंच कर लिया जाए. मैं लंच के लिए अपने चेम्बर से बाहर निकला तो देखा एक ग्रामीण एक औरत को रिक्शे से उतारा और कंधे पर लादकर अंदर ले आया. उसके साथ दो लोग और भी थे. महिला के सिर से खून बह रहा था. उस ग्रामीण ने बताया, यह उसकी पत्नी है. काम करते समय सीढ़ियों से सिर के बल गिर कर घायल हो गई है. आनन-फानन में नर्सिंग होम का सारा स्टाफ उपचार में जुट गया. अत्यधिक रक्तस्राव के कारण महिला के शरीर में खून की कमी हो गयी थी. अतः मैंने उसके पति से कहा कि आप अपनी पत्नी के लिए एक यूनिट खून दे दें.

इतनी बात सुनते ही उस महिला का पति तड़पते हुए बोला – “अजी थैं कोई बात करे सा, महूं तो इस औरत के कारणों ना तो अपना खून देऊं. म्हारे पास कहाँ खून से. खून ही देना पड़े तो म्हे तो दूंगा नीं... काल मरती हुई आज मरि जाए... म्हने तो दुसरी औरत मिल जाए.”

इतना कहकर वह व्यक्ति वहाँ से तुरंत गायब हो गया. हमारी अनवरत कोशिशों से हमें सफलता मिली और अंततः वह महिला बच गई. शीघ्र ही उस महिला की स्थिति डिस्चार्ज करने लायक सामान्य हो गई.

उस महिला के मां-बाप उसे डिस्चार्ज करवा कर अपने घर ले जा रहे थे. क्योंकि पूरे इलाज के दौरान उसका पति फिर कभी दिखाई नहीं दिया था.

मृत्यु के मुँह से वापस खींच लाया गया मरीज उसके डाक्टर के अंतःकरण में जुड़ सा जाता है. मैं उस महिला को बाहर तक छोड़ने आया – वह मौत के मुँह से लौटकर वापस स्वस्थ जीवन जीने जा रही थी.

मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब मैंने देखा कि नर्सिंग होम के मुख्य दरवाजे पर उसका पति खड़ा था. पति को देखते ही वह महिला अपने माता-पिता को छोड़कर अपने पति की ओर बढ़ते हुए बोली – “म्हूं तो म्हारा आदमी के साथ ही जाऊँगी और कद्दे भी ना जाऊँ...”

**-**

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चित्र – सौजन्य, कालीचरण प्रेमी.


पिता की स्मृति
*****.

याद किया जा सकता है पिता को
उनकी पिचहत्तरवी वर्षगांठ पर भी
पिता की स्मृति के लिए आवश्यक नहीं है
उनका स्वर्गीय होना
स्वर्गीय हो जाते हैं पिता कई बार जीवित रहते हुए
लोग लिखने लग जाते हैं
कविताएँ धड़ाधड़ पिता के स्वर्गीय होने पर
कई तो लिख मारते हैं कविता की किताब
पिता की स्मृति में

कवि!
तुम पिता को पुनः पारिभाषित करो
पिता चिर परिभाषेय है कवियों के लिए
समाजशास्त्रियों की परिभाषाएँ
पाठ्यक्रमों में लग जाने के कारण मृत हो गई हैं
तुम्हारे पास आंसुओं का बैंक बैलेन्स कितना है
कितना एफ़.डी. करवा रखी है आंसुओं की
पिता के लिए
पिता अकेले नहीं होते हैं अकेले रहते हुए जितने
कि वे अकेले पड़ जाते हैं
पुत्रों के बावजूद
दृष्टि के साथ धुंधलाता जाता है
पिता का भविष्य

क्या पिता का कोई भविष्य होता है
पिता तो होते हैं स्वयं भविष्य
पिता का तो होता है वर्तमान
पहाड़ की मानिन्द भारी ओर नदी की तरह लम्बा
जितने अधिक नम्बर का चश्मा चढ़ता जाता है
पिता की आँखों पर उतना बारीक होता जाता है पुत्र
आँखों का पका हुआ मोतियाबिन्द
मोती जैसे पुत्र का बन्द होना है
जितना प्रकाशवान होता जाता है पुत्र
उतने तमसावृत्त होते जाते हैं पिता
जितना समृद्ध होता जाता है पुत्र
उतने खाली होते जाते हैं पिता
पुत्र के प्रसन्न रहने मात्र से
कैसे प्रसन्न रह सकते हैं पिता
पिता की प्रसन्नता तो पिता की प्रसन्नता है
पिता की स्मृति गुमशुदा की तलाश है
दरअसल बुढ़ापे में खो जाते हैं पिता
जब पुत्र का नजदीक आता है बुढ़ापा
उसे अपने खोए हुए पिता की आती है स्मृति
याद किया जा सकता है पिता को
उनकी पिचहत्तरवीं वर्षगांठ पर भी.

***-***

प्रेम कविता
---*---
मैं एक प्रेम कविता लिखना चाहता हूँ
नहीं जानता कि वो
प्रेम कविता होगी भी या नहीं
सुन्दर और कोमल
क्योंकि नहीं लिखी मैंने कभी
प्रेम कविता क्यों नहीं लिखी गई
अब तक?
क्यों लिखना चाहता हूँ उसे
अब?

दरअसल हुआ यह कि
जिसे मैं प्रेम करता रहा जीवन भर
उसने कहा-
मैं तो तुम्हारी इच्छाएँ पूरी करती हूँ
बस उसने मेरी इच्छाएँ पूरी की
उसकी इच्छाओं का क्या हुआ.

वह इच्छाएँ पूरी करती रही
उसके प्रेम का क्या हुआ?
मैं प्रेम करता रहा
मेरी इच्छाओं का क्या हुआ?
दरअसल हुआ यह भी कि
एक और भी था प्रेम
जो कइयों से इकतरफा किया
वो मेरी ओर से इकतरफा था
उनकी तरफ से दुतरफा
लेकिन दूसरी तरफ मैं न था

क्यों नहीं था मैं दूसरी तरफ
किनसे किया जाता है प्रेम
मुझसे क्यों नहीं हुआ
कौन करते हैं प्रेम, कैसे हो जाता है-
मुझसे क्यों नहीं हुआ.
बावजूद इन तमाम प्रश्नों के
मैं लिखना चाहता हूँ

एक अदद प्रेम कविता.

***-***

ग़ज़ल

तू कोई सिक्का हवा में उछाल और अब देख
रगों में अपनी लहू को उबाल और देख

हमेशा कुछ अंजाम होगा आलम का
जरा मशीन में सिक्के को डाल और अब देख

बहुत करीब से होता है दोस्त हमला यहाँ
जो हो सके तो इज्जत संभाल और अब देख

ये खेल जरूरी है भाई जीने को
तू हाथ झोली से बाहर निकाल और अब देख

तुझे घिन आएगी खुद अपनी शक्ल से भी हितेश
हकीकतों को तू शीशे में ढाल और अब देख

---*---

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**-/**
चित्र – रेखा श्रीवास्तव की काग़ज़ पर पेंसिल कलाकृति.

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