संदेश

April, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मिराक़ मिर्जा की ग़ज़ल

चित्र
--*--

कि दश्ते-ग़म में कहीं गुलिस्तां भी होगा
ज़मीन होगी जहाँ, आसमान भी होगा

तलाश करते रहो पत्थरों में मोम का दिल
सितमगरों में कोई मेहरबान भी होगा

ज़बान काट ली जाएगी सच जो बोलोगे
कि हक़ की राह में ये इम्तिहान भी होगा

जहाँ में जुल्म के चेहरे कभी नहीं छुपते
अगर बहेगा लहू तो निशान भी होगा

बढ़ेगी चाहने वालों की भीड़भाड़ अगर
तो आसपास कोई बदगुमान भी होगा

ये जो जली हुई लाशें हैं इनके पास ‘मिराक़’
किसी ग़रीब का ख़ाली मकान भी होगा.

**-**
रचनाकार – मिराक़ मिर्जा बॉलीवुड के जाने माने मूवी स्क्रिप्ट लेखक हैं

दामोदर खड़से की कहानी: छड़ी

चित्र
**-**
वह फिर दिखाई दिया. उसके कान्धे पर छड़ियों का एक बड़ा गट्ठा था. वह झुका-सा लग रहा था, घर जाने का उसका समय अभी हुआ नहीं है. हालांकि अब आठ बजने वाले थे- रात के. कुछ बूंदाबांदी होने वाली थी. सैलानी कुछ खरीदारी तो कर रहे थे, पर संख्या बहुत कम थी. क्यों न कम हो, अब मौसम जो खत्म हो चला था. जो धुँआधार बारिश देखना चाहते थे, वे लोग ही महाबलेश्वर आए हुए थे. अनय ने जब उसे तीसरी या चौथी बार देखा तो ठिठक गया. वह भी अनय को अजीब निगाहों से ताक रहा था. अनय को बेटी ने गुड़ियों की दुकान में खींच लिया.


अनय का मन दुकान में नहीं लग रहा था. वह बार-बार मुड़कर बाहर झांकना चाहता और बेटी सिमरन मुड़कर कोई गुड़िया उठाकर पापा की ओर देखती.


“पापा, मुझे ये गुड़िया चाहिए...”
“बेटे, मम्मी से कहकर ले ले...”
“पापा कैसी है गुड़िया?”
“अच्छी है बेटे, तुझे पसन्द है.... ले ले...”


मम्मी जूट की एक बैग पसन्द करने में लगी थी. वह सिमरन की गुड़िया पर ध्यान नहीं दे पायी. सिमरन का भाई बारह साल का है. बहन की पसन्द पर उसकी मुहर लग गयी और सिमरन अपनी गुड़िया के साथ फुदकने लगी.


अनय दुकान में बेमन से खड़ा था. इधर-उधर किसी को तलाशता. परन्तु व…

अनिल पांडेय का आलेख : देशी फिल्मों का कारोबार

(पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विशेष संदर्भ में, करीब ढ़ाई महीने के दौरान अनिल पांडेय ने सराय – सीएसडीएस दिल्ली के स्वतंत्र फ़ेलोशिप के तहत जो शोध किया है उसका संक्षिप्त व रोचक विवरण, साभार प्रस्तुत है.)


आपने मशहूर फिल्म शोले जरूर देखी होगी। क्या आपने वह 'शोले' देखी है जिसमें बसंती तांगे की बजाय बुग्गी (भैंसा गाड़ी) पर और गब्बर सिंह घोड़े के बजाय गधों पर आता है? वह 'धूम' फिल्म देखी हैजिसमें हाइटेक चोर सुपर रेसर मोटर साइकिल की बजाय साइकिल पर आते हैं? या फिर बंटी और बबली को भैंस चुराते देखा है? नहीं देखी है तो जरूर देखिए। आप हँसते-हँसते लोट पोट हो जाएंगे। इस फिल्म का नाम है 'देशी शोले', देशी धूम' और 'यूपी के बंटी और बबली'। इन फिल्मों की सीडी आपको देश की राजधानी दिल्ली सहित हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कहीं भी मिल जाएगी। इतना ही नहीं बालीवुड की तमाम सुपरहिट फिल्मों के देशी संस्करण भी आपको यहां मिल जाएंगे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देशी फिल्मों की।


संचार तकनीक के क्षेत्र में आई क्रांति ने लोगों को जन संचार माध्यमों के करीब लाने का काम किया है। अखबार, टेलीव…

अमित कुमार सिंह की भोजपुरिया फ़िलॉसफ़ी

चित्र
''जीबन''

जीबन का ह?

जीबन का ह?
रहस्य बा ई अनोखा
चलत रहे का
मंतर इम्मे
कौउन है फूँका?

अजब बा
ई पहेली
एक को खोलौ
तो दूजा उलझे
जीवन का
ई गुत्थी,
भवा सुलझाये न
सुलझै।

का बताई,
अब तोहके,
हुयै लोग
बहुत ज्ञानी,
बोलत हैं
विज्ञान की बानी।

पर जीवन केबुझै में, बन गयो
भवा यो
भी अज्ञानी।

पढ़ा रहे
किताबन में,
जीवन बा,
सूरज का रोषनी में,
पानी की बूंदन में,
माटी में बा
आग और अकाषो
में बा,
हवो में बहत
ह जीवन,
पर भवा!


हम हई
निपट मूढ़
औउर अज्ञानी
समझ नइखे आवत
बड़े लोगन क
इ बानी।

हमरे समझ से
त करत जा
तू आपन काम
निभावा आपन
जिम्मेवारी, कहिला जे के
हम करम
करत जा
हो लोगन
जब तक ह
दम में दम।

के हू का
जी न दु:खावा
भवा ऐसन
तू निभावा।

जौन काम आवे
औरन के
वो ही के
जानिला भवा
हम जीवन
कहे जमनवा
चाहे ऐके हमार
नादानी
पर भइया
ई हे बा
हमरी बानी।


रचनाकार -अमित कुमार सिंह की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें:


http://rachanakar.blogspot.com/2006/03/blog-post_15.html

http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_02.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post.html

यथार्थ व्यंग्य : पुलिस कप्तान बनाम पत्रकार

चित्र
**-**
- एन. के. राय


उस जिले के कप्तान साहब आंग्ल-भारतीय सज्जन थे. उनका रहन-सहन राजा-महाराजों-जैसा था. अंग्रेज तो भारत छोड़ गए थे, परन्तु उनका तौर-तरीका अँग्रेज़ों जैसा ही था. वे अपने को सामान्य जनता का शासक और प्रभु समझा करते थे. उसी प्रकार अहमन्य थे. तनख्वाह के रुपयों में गुजारा होना संभव नहीं था, इसलिए उत्कोच लेने में सकुचाते न थे.

उनकी मेम साहब तो और भी भयानक थीं. ...वे अकसर बाजार में जाकर सामान खरीदा करती थीं. साथ कोतवाल रहा करता. कीमत न देकर महीन स्वर में कहा करतीं, ‘बिल साहब को भेज देना...’

साहब उन मूर्खों में से नहीं थे जो बिल का भुगतान करते! मामला फैल रहा था. मेम साहब की गाड़ी जिस दुकान पर रुकती, उसका दुकानदार सोंठ हो जाता – अब देखो, कितना सामान लेती हैं.

एक बार वे एक ऐसी गली में खरीददारी कर रही थीं जो संकरी थी और जहाँ सर्राफ़े की दुकानें भी थीं. वहां सवारियों के आने-जाने में बड़ी परेशानी होने लगी. मगर मेम साहब को गाड़ी हटाने के लिए कौन कहे?

वहीं से एक दो पन्ने का संवादपत्र निकलता था. उनके पत्रकार संपादक और प्रकाशक एक सज्जन थे. उन्हें जर्नलिज्म का खब्त था. पत्र-प्रकाशन का खर्च अदालती…

एज़ाज अख्तर के माहिए...

हिन्दी में माहिए

उर्दू में आजकल बहुत माहिए लिखे जा रहे हैं। यह पंजाबी का लोक गीत है जिस की तीन पंक्तियों में पहली तथा तीसरी में तुक होता है व दूसरी पंक्ति छोटी होती है। हिन्दी तो नहीं, हिन्दुस्तानी में सबसे पहले शायद फ़िल्म परदेसी में हिम्मत राय शर्मा ने पहला माहिया दिया था, रफ़ी व लता के गाए गीत में जिस के मुखड़े के बोल में पूरा माहिया था, व अंतयरों में भी। यह गीत थाः



तुम रूठ के मत जाना

दिल का क्या शिकवा

दीवाना है दीवाना



इसको हिन्दी का पहला माहिया इस लिए नहीं माना जा सकता कि बादमें हिम्मत शर्मा जी ने अपने माहिए उर्दू पत्रिकाओं में छपवाए और सक कारण उर्दू में उन्हीं को पहला माहिया शायर कहा जाता है।

कम से कम मेरे ज्ञान में तो हिन्दी के माहिए अब तक नहीं लिखे गए। किसी को कुछ पता हो तो मुझे सूचित कतें। वरना मैं यह ऐलान करने जा रहा हूं कि प्रस्तुत है हिंदी का पहला माहिया, इसे मैं ने पिछले माह हमारे विभाग के हिंदी पखवाड़े के कवि सम्मेलन में प्रस्तुत किया था।





फिर मां को फ़ोन करूं

झूठ कहूं उससे

मैं बिल्कुल अच्छा हूं

अन्य दो माहिएः



पलकों पर हैं मोती

जिसकी, वही आंखें

मेरे नयनों की हैं ज्योती



रहे धूप कि हों बादल

प्य…

दृश्यावली : एजाज़ अख्त़र की तीन कविताएँ

चित्र
दृश्य-1



कच्ची मस्जिद के पीछे
थूहर की लम्बी कतार
रस्ते में कुछ गोलियां खेलते
बच्चे भी दो-चार
रस्ते के उस ओर पड़ा घूरे का बड़ा अम्बार
कुछ चुनती, कुछ चुगती मुरगी और उसके चूज़े
ताल के बांध पर फैले रंग बिरंगे कई कपड़े
फूस की छत पर फैले उपले, लौकी की बेलें
जूहड़ के गंदे पानी में नहाती दो भैंसें
घड़े लिए कुछ सांवरिया पनघट के रस्ते में
मंदिर की कलशी पर बैठी कुछ बूढ़ी चीलें
दूर शहर के रस्ते में जाती हुई एक बरात
और इधर कांडों की बाढ़ के पीछे हिलते हाथ
नन्हे-नन्हे उजले-उजले दानों की बरसात
चुप-चुप गिरती, सूप में किंतु छन-छन करती ज्वार
रुक-रुक कर त्रिशूल चुभोती एक सोच हर बार
कितना गल्ला घर में बचे,
क्या जाएगा बाज़ार




दृश्य-2



दरवाज़े पर एक पुराना चेहरा दिखता है

खटिया पर बूढ़े हुक्क़े की गुड़ गुड़ गुड़ गुड़
एक पल को थमती है
हाथ भौंहों तक उठते हैं

उपले छत पर रखती लड़की सुन्न सी रह जाती है
नांद के पास खड़ी औरत
टक देखती रहती है

काँपते हाथ
चमकती आँखें
थर-थर करते ओंठ
सारे शरीर से "बेटा" कह कर
बढ़ती – गिर जाती है



दृश्य-3



नारियल के दरख्तों में पागल हवा
सीटियां सी बजाती रही सारा दिन
कुंज में अपने मोहन की प्रतीक्षा में
सांझ के ध्यान में सोच कर क्या…

सदाशिव कौतुक की व्यंग्य कविताएँ

चित्र
***-***

तलाश गुमशुदा की

तलाश है .....
गुमशुदा की
तीन जुड़वां बेटे
मिज़ाज एक सा / और
ऊँचाई एक सी

बड़े का नाम ईमान
मझले का कर्म / और
छोटे का धर्म है.

एक के बाद एक
छोड़ गए हैं अपना घर
जो भी इन्हें वापिस लाएगा / या
पता बताएगा / वह
बूढ़ी माता के हाथों
आशीर्वाद पाएगा.


**-**


नागफनी

जिसे मैं / खुशबूदार
फूल का पौधा समझ
सींचता रहा... पोसता रहा

वहीं खड़ा हो गया
पौधा कंटीला हँसता हुआ
अपनी नागफनी हँसी
चुभाता हुआ भीतर तक
खटकती हुई.
**-**

पुरस्कार

गोद में बच्चा लिए / वह
मांग रही थी भीख
कोख की जिंदगी के नाम,
दाता ने ....
बुलाया उसे घर में / और ...
एक और बच्चा डाल दिया
उसकी कोख में.


***-***

सदाबहार

दोस्तों!
मेहरबानों कद्रदानों
इन्हें आप जान लीजिए
ठीक से पहचान लीजिए
ये हैं... नेताजी सदाबहार
आज ये हाथ जोड़
ठिठुर-ठिठुर कर
बटोर रहे हैं.... वोट
जब / नेताजी जीत जाएंगे
ठंड के मौसम में भी / ये
गरमा जाएंगे / और
जब आएगी बरसात
वे / बारिश की बूंदें
बरसा लेंगे
अपने ही खेत में
ऐसे ही ये
सूखा भगाएंगे
राहत दिलवाएंगे
जनता को अपने
वादों के नाम

**-**

रचनाकार – सदाशिव कौतुक के दस कविता संग्रह, तीन उपन्यास, दो कहानी संग्रह और एक पत्र संग्रह प्रकाशित हैं. भारत की तमाम प्रतिष्ठित …

मधु कांकरिया की कहानी : फ़ाइल

चित्र
परिकथाओं सी मोहक तारों भरी वह रात-इतनी संपूर्ण और जादूभरी थी कि उसके आकर्षण की डोर में बंधे हम सभी गोल-गोल घेरा बनाकर बैठ गए. मंद-मंथर बहती हवा, महकते बेला फूल और देवदारू के झुटपुटों से छनकर आती चांदनी ..हम पर अलौकिकता का वह दौरा पड़ा कि हम सभी रोटी-लंगोटी की बात भूल जीवन और अनुभूतियों की बातें करने लगे. एकाएक श्यामली दी ने मुझसे पूछा, जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा सुख क्या है? मैं गोबर गणेश की तरह आसमान की ओर ताकने लगा, जैसे वहीं से उतरेगा कोई जवाब. वे मुसकराई और बोली, दुनिया का सबसे बड़ा सुख है निस्वार्थ सात्विक सुख.

हमारी टोली के सबसे छोटे सदस्य श्रीकांत के माथे पर सिलवटें गहराई, यह किस चिड़िया का नाम?
ज़िंदगी का सारा रहस्य जान लेने वाले आत्मविश्वास के साथ वे मुस्कराई, 'जिसने यह नहीं जाना, जानो उसका जीवन डस्टबिन पर मंडराते आत्मतृप्त कॉकरोच-सा.'श्रीकांत ताव खा गया, 'तो बताइए, आपने ही कब भोगा इसे?' कुछ उस रात का तिलिस्म, कुछ हमारा आग्रह..रफ्ता-रफ्ता श्यामली दी पीछे घूम गई. रसीले फानूस आम की तरह टप-टप टपकती स्मृतियां. चांदनी सी एक उज्ज्वल रेखा उनके अधरों पर उभरी.सरसराते पत्तों…

अखिलेश अंजुम की खिड़कियाँ खोलती ग़ज़लें

चित्र
**-**
आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे


**-**

ग़ज़ल 1

घर बिना छत

घर बिना छत बनाए जायेंगे
लोग, जिनमें बसाये जायेंगे।

आपका राज हो या उनका हो
हम तो सूली चढ़ाये जायेंगे।

साल-दर-साल बाढ़ आयेगी
आप दौरों पे आये जायेंगे।

हम तो होते रहेंगे यूँ ही हवन
लोग, उत्सव मनाये जायेंगे।

बूढ़े बरगद पे देखना जाकर
अब भी 'दो नाम' पाये जायेंगे।

***--***

ग़ज़ल 2

आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे।

जिन्दगी टूटी हुई तलवार हो जैसे
आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे।

हाथ बांधे, सिर झुकाए भीड़ चारों ओर
हर जगह कोई लगा दरबार हो जैसे।

हर नया अनुभव हमें यूँ तोड़ जाता है
काटती तट को नदी की धार हो जैसे।

दर्द के एकान्त क्षण हमने जिये कुछ यूँ
कोई उत्सव हो, कोई त्यौहार हो जैसे।

रही है तुम से निकटता आत तक कुछ यूँ
बीच में इक कांच की दीवार हो जैसे।
**-**

ग़ज़ल 3
चंद ख़्वाबों की जिन्दगी के लिए

राजपथ जिनसे जगमगाए हैं
वो फ़कत रौशनी के साए हैं।

चंद ख़्वाबों की जिंदगी के लिए
हमने खुद ही फरेब खाए हैं।

रौशनी की यहाँ तिजारत ने
हाय! कितने ही घर जलाए हैं।

छोड़ बैठे हैं खुद को लहरों पर
जब से साहिल पे घर बनाए हैं।

आजकल देखिए अंधेरों ने
हर तरफ दायरे बढ़ाए हैं।

झुक गए और बंदगी में हम
आप जब …

असग़र वजाहत का सम्पूर्ण कहानी संग्रह: मैं हिन्दू हूँ

चित्र
असग़र वजाहत का सम्पूर्ण कहानी संग्रह: मैं हिन्दू हूँ

टीप –
1-संपूर्ण संग्रह की फ़ाइल बड़ी है, अतः पृष्ठ लोड होने में समय लग सकता है, अतः कृपया धैर्य बनाए रखें.
2-इस संग्रह के फ़ॉन्ट का रूपांतरण मशीनी रूप से किया गया है, अतः वर्तनी की अशुद्धियाँ हो सकती हैं. कृपया अशुद्धियों की खबर रचनाकार को दें ताकि उन्हें ठीक किया जा सके.




अनुक्रम

१ केक

२ सरगम-कोला

३ दिल्ली पहुंचना है

४ राजा

५ योद्धा

६ बंदर

७ चन्द्रमा के देश में

८ हरिराम गुरू संवाद

९ स्विमिंग पूल

१० ज़ख्म़

११ मुश्किल काम

१२ होज वाज पापा

१३ तख्त़ी

१४ विकसित देशों की पहचान

१५ मुर्गाबियों के शिकारी

१६ लकड़ियां

१७ मैं हिंदू हूं

१८ शाह आलम कैम्प की रूहें













कहानी लिखने का कारण

कहानी हम क्यों लिखते हैं? कुछ बताने के लिए? कुछ कहने के लिए? कह कर संतोष पाने के लिए? दूसरों या समाज के सुख-दुख में हिस्सेदारी करने के लिए? मजबूरी में कि और कुछ नहीं कर सकते? आदत पड़ गयी है इसलिए? कुछ यादें कुछ बातें छोड़ने के लिए? समाज को बदलने के लिए? अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए? अपनी विद्वता दिखाने के लिए? भाषा और शिल्प के चमत्कार दिखाने के लिए?


मेरे ख्य…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.