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April 2006
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कि दश्ते-ग़म में कहीं गुलिस्तां भी होगा
ज़मीन होगी जहाँ, आसमान भी होगा

तलाश करते रहो पत्थरों में मोम का दिल
सितमगरों में कोई मेहरबान भी होगा

ज़बान काट ली जाएगी सच जो बोलोगे
कि हक़ की राह में ये इम्तिहान भी होगा

जहाँ में जुल्म के चेहरे कभी नहीं छुपते
अगर बहेगा लहू तो निशान भी होगा

बढ़ेगी चाहने वालों की भीड़भाड़ अगर
तो आसपास कोई बदगुमान भी होगा

ये जो जली हुई लाशें हैं इनके पास ‘मिराक़’
किसी ग़रीब का ख़ाली मकान भी होगा.

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रचनाकार – मिराक़ मिर्जा बॉलीवुड के जाने माने मूवी स्क्रिप्ट लेखक हैं



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वह फिर दिखाई दिया. उसके कान्धे पर छड़ियों का एक बड़ा गट्ठा था. वह झुका-सा लग रहा था, घर जाने का उसका समय अभी हुआ नहीं है. हालांकि अब आठ बजने वाले थे- रात के. कुछ बूंदाबांदी होने वाली थी. सैलानी कुछ खरीदारी तो कर रहे थे, पर संख्या बहुत कम थी. क्यों न कम हो, अब मौसम जो खत्म हो चला था. जो धुँआधार बारिश देखना चाहते थे, वे लोग ही महाबलेश्वर आए हुए थे. अनय ने जब उसे तीसरी या चौथी बार देखा तो ठिठक गया. वह भी अनय को अजीब निगाहों से ताक रहा था. अनय को बेटी ने गुड़ियों की दुकान में खींच लिया.


अनय का मन दुकान में नहीं लग रहा था. वह बार-बार मुड़कर बाहर झांकना चाहता और बेटी सिमरन मुड़कर कोई गुड़िया उठाकर पापा की ओर देखती.


“पापा, मुझे ये गुड़िया चाहिए...”
“बेटे, मम्मी से कहकर ले ले...”
“पापा कैसी है गुड़िया?”
“अच्छी है बेटे, तुझे पसन्द है.... ले ले...”


मम्मी जूट की एक बैग पसन्द करने में लगी थी. वह सिमरन की गुड़िया पर ध्यान नहीं दे पायी. सिमरन का भाई बारह साल का है. बहन की पसन्द पर उसकी मुहर लग गयी और सिमरन अपनी गुड़िया के साथ फुदकने लगी.


अनय दुकान में बेमन से खड़ा था. इधर-उधर किसी को तलाशता. परन्तु वह दुकान के भीतर क्यों मिलता? उसे याद आया कि ‘सनसेट प्वाइंट’ पर वह अधेड़ आदमी बुढ़ापे की ओर झुक गया था. वह अपनी छड़ियाँ बेचना चाहता था. शायद आज एक भी छड़ी नहीं बिकी.


“बाबूजी, ले लीजिए, बहुत बढ़िया है और एकदम किफ़ायती...”


“मुझे नहीं चाहिए...” अनय आगे बढ़ गया. परन्तु वह पीछा करता रहा, “साहब, केवल एक सौ बीस में.... इतनी सस्ती और मजबूत छड़ी आपको कहीं नहीं मिलेगी.”


अनय आगे बढ़ने लगा तो वह पीछे-पीछे चलने लगा, “साहब, दस रुपये कम दे देना...”


कुछ दूर तो वह पीछे-पीछे चला, पर जब उसे लगा कि ये साहब छड़ी नहीं खरीदेंगे तो पता नहीं कब वह नए ग्राहक की तलाश में पीछे मुड़ गया.


अनय ने पीछे मुड़कर देखा, पर वह भीड़ में कहीं खो गया था.


‘सनसेट प्वाइंट’ पर भीड़ बढ़ रही थी. युवा सैलानी आगे बढ़न की होड़ में. जुलाई में ‘सनसेट प्वाइंट’ पर इतनी भीड़ नहीं होती पर पिछले चार दिनों से बारिश नहीं हुई थी, इसलिए भीड़ यहाँ आ गई थी.


वह भीड़ के बीच अपने ग्राहक तलाश रहा था. फिर उसने दिशा बदली और बस स्टॉप की ओर बढ़ा. कुछ उम्रदराज लोग अपनी गाड़ियों में ही बैठे थे... अनय बच्चों के लिए पानी की बोतल लेने गया था. बोतल लेकर जैसे ही पीछे मुड़ा, फिर वही आदमी छड़ी लेकर आगे आया, “साहब सौ रुपये दे देना. बिलकुल खरीद भाव में...”


अनय ने एकबारगी उसे देखा और आगे बढ़ गया. सिमरन और सारंग प्यासे होंगे...सिमरन पानी पीने लगी. सूर्यास्त का समय था. सूर्यास्त का समय था. सारंग अपनी मां के साथ खड़ा था. अनय के सामने पन्द्रह साल पुराना समय पलक झपकते ही उभर आया.


इसी प्वाइंट पर वह नयी नवेली पत्नी श्वेता के साथ खड़ा था. सूर्यास्त के समय इस प्वाइंट तक पहुँचने की फिराक में वह टैक्सीवाले पर कितना बरसा था और टैक्सीवाले ने भी पूरी शिद्दत से ड्राइव कर सही समय पर यहाँ पहुँचाया था. कितना खुश था वह. सूर्यास्त देखने के सही समय पर श्वेता को ला सका वह. अपने कैमरे से वह सूर्यास्त को ‘क्लिक’ करता रहा. श्वेता के फोटो भी अलग-अलग ऐंगल से खींचता रहा. फिर श्वेता का हाथ थामकर तब तक एकाग्र खड़ा रहा जब तक सूर्य पूरी तरह डूब नहीं गया. बीच-बीच में श्वेता को निहार लेता. श्वेता से नजर मिलते ही उसकी आँखों में एक दुनिया उभर आती. दूर पहाड़ियों के चारों ओर लाली ही लाली थी. वह पता नहीं कब तक श्वेता के साथ खड़ा था. उसे लग रहा था सूरज की सारी ऊष्मा श्वेता की हथेलियों में उतर आई है और वह अपने आपको बहुत सुरक्षित और सुख से लबरेज महसूस कर रहा था.


एक छड़ीवाला उसके सामने से गुजरा. वह छड़ियों की ओर देखता रहा... “चालीस रुपये...चालीस रुपये...” चिल्लाता हुआ छड़ीवाला गुजर गया. छड़ीवाले ने अनय और श्वेता की ओर ऐसे देखा जैसे वे इसके ग्राहक हो ही नहीं सकते... वह चिल्लाता रहा... “चालीस रुपए...चालीस रुपए...”


अनय आँखों ही आँखों में एक छड़ी तय कर चुका था. बाबूजी का खयाल उसका पीछा कर रहा था. वह छड़ीवाले को पुकारने को हुआ. फिर एक व्यवहारिक खयाल ने उसे रोक दिया, ‘आखिरी दिन ले लेंगे, अभी से कौन संभालेगा.’ श्वेता ने गुमसुम पति को भरपूर निहारा और अपनी खास अदा में एक मुसकान बिखेरी. अनय का हाथ हथेली से छिटककर सिर पर एक हल्की-सी चपत के रुप में टपका और कान्धे पर आकर निढाल हो गया. फिर पता नहीं कब तक वे दोनों झूमते हुए सड़क पर चहलकदमी करते रहे. अचानक टैक्सीवाले को सामने पाकर वे सचेत हो गए. एक-दूसरे को देखकर हंस दिए और टैक्सी में बैठ गए. सीधे होटल न आकर वे बाजार में कहीं कॉफ़ी पीने उतर गए और यूँ ही टहलने लगे. ठीक-ठाक होटल देखकर वे बैठ गए. काफी देर तक कॉफ़ी की चुस्कियाँ लेते हुए बातें करते रहे. अनय की निगाह में अचानक कुछ चमका, ‘बाबूजी ने सपनों-सी यह जिन्दगी देने के लिए क्या नहीं किया...’ वह खयालों में खो गया. पर उसका खोना श्वेता की निगाहों से बच नहीं पाया.


“कहाँ खो गए?” श्वेता की शोखी अनय को बटोर लाई और वह एक घूँट में बची हुई कॉफी गले के नीचे उतार कर उठ खड़ा हुआ.

“चलो होटल चलते हैं.”


“ठहरो ना, ऐसी भी क्या जल्दी है?”


“चलो भई” ... श्वेता को अनय ने कुछ ऐसे अन्दाज से देखा कि श्वेता के मुँह से अनायास ही निकल गया “हट, शरारती कहीं के...”


“अच्छा ठीक है भई इसी सड़क पर टहलते हैं. सुना है, यहाँ का भुना चना बहुत मशहूर है.” फिर चने का एक पैकेट लेकर वे दूर तक यूँ ही भटकते रहे. बाद में, श्वेता ने ही कहा, “चलो अब होटल चलते हैं?” फिर श्वेता अनय की बाँह पकड़कर चलने लगी.


सारंग पता नहीं कब से अपने पापा को निहार रहा था. अनय खिलौनों के बीच नारियल की जटाओं से बने साधु को निहार रहा था. बाबूजी याद आए थे. आँखें भर आयी थीं. उसकी डबडबाई आँखों में बाबूजी मानों मुस्करा रहे थे, ‘बेटे तेरे परिवार को देखकर, तेरी सफलता देखकर मैं बहुत खुश हूं...’ फिर जैसे उन्होंने अनय की बुदबुदाहट सुनी, ‘बाबूजी बहुत कुछ छूट गया... बहुत कुछ करना छूट गया’ ... ‘कुछ नहीं छूटा बेटे...’ जैसे अनय को छूकर कह रहे हों, ‘सुखी रहो...’ ‘पर बाबूजी मैं आपके लिए छड़ी नहीं ला पाया था... तब. आपने याद से कहा था’ ... ‘कोई बात नहीं बेटे ... देखो मैं हूँ न तुम्हारे साथ... सारंग तुम्हें कैसे निहार रहा है?’


अनय ने आँखें पोंछी. साधु जटाओं के बीच से अनय को जैसे निहार रहा हो. सिमरन पापा का हाथ पकड़कर दुकान से बाहर चलने को कह रही थी. दुकान की भीड़ छंट चुकी थी. सारंग पापा की इस खोई-सी मूरत को निहार रहा था. श्वेता को मालूम था अनय को जरूर बाबूजी याद आ रहे होंगे.


अनय को बड़ा अजीब लगा अपना खो जाना. उसने दोनों बच्चों को भींच लिय़ा और श्वेता से बोला, ‘चलो...’


श्वेता से वह आँख नहीं मिला पाया था... श्वेता समझ रही थी अनय को, “कम आन, अनय...”


दुकान से बाहर निकलकर उस छड़ीवाले आदमी को अनय की निगाहें बेसब्री से खोज रही थीं.


बाहर हल्की-सी बारिश हो रही थी. वह छड़ीवाला उसी दुकान के बाहर बारिश रुकने का इन्तजार कर रहा था. उसने बड़ी आशाभरी निगाह अनय पर डाली, जैसे कह रहा हो, ‘आज एक भी छड़ी नहीं बिकी... घर क्या मुँह लेकर जाऊँ?’ अनय पलभर उसके सामने खड़ा रहा और एक छड़ी की ओर इशारा कर बोला, “ये वाली निकालो...”


“साहब, सिर्फ अस्सी रुपये में ही दे दूंगा. आज एक तो छड़ी बेचूं.”


अनय ने छड़ी ले ली और उसे एक सौ बीस रुपये देकर अकेला ही आगे बढ़ गया... छड़ी वाला देखता रह गया... अनय रह-रहकर छड़ी पर हाथ फेर रहा था. मानों बाबूजी से बातें कर रहा हो.


पीछे-पीछे तीनों आ रहे थे. छड़ीवाला हैरत से उन चारों को निहार रहा था. फिर उसने पैसे गिने और माथे से लगाने के बाद जेब में रख लिए... अनय का चेहरा वह कभी नहीं भूल पाएगा.


उसने झटके से छड़ियों का गट्ठर पीठ पर उठा लिया. उसकी कमर कुछ सीधी हो गयी थी. उसे लगा कुछ दिन और वह बिना छड़ी के चल सकता है. छड़ीवाले के पैर तेजी से अपने घर की ओर बढ़ रहे थे.


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(पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विशेष संदर्भ में, करीब ढ़ाई महीने के दौरान अनिल पांडेय ने सराय – सीएसडीएस दिल्ली के स्वतंत्र फ़ेलोशिप के तहत जो शोध किया है उसका संक्षिप्त व रोचक विवरण, साभार प्रस्तुत है.)


आपने मशहूर फिल्म शोले जरूर देखी होगी। क्या आपने वह 'शोले' देखी है जिसमें बसंती तांगे की बजाय बुग्गी (भैंसा गाड़ी) पर और गब्बर सिंह घोड़े के बजाय गधों पर आता है? वह 'धूम' फिल्म देखी हैजिसमें हाइटेक चोर सुपर रेसर मोटर साइकिल की बजाय साइकिल पर आते हैं? या फिर बंटी और बबली को भैंस चुराते देखा है? नहीं देखी है तो जरूर देखिए। आप हँसते-हँसते लोट पोट हो जाएंगे। इस फिल्म का नाम है 'देशी शोले', देशी धूम' और 'यूपी के बंटी और बबली'। इन फिल्मों की सीडी आपको देश की राजधानी दिल्ली सहित हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कहीं भी मिल जाएगी। इतना ही नहीं बालीवुड की तमाम सुपरहिट फिल्मों के देशी संस्करण भी आपको यहां मिल जाएंगे। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं देशी फिल्मों की।


संचार तकनीक के क्षेत्र में आई क्रांति ने लोगों को जन संचार माध्यमों के करीब लाने का काम किया है। अखबार, टेलीविजन और रेडियो तो घर-घर पहुंच ही चुका है, अब फिल्में भी लोगों के घरों तक पहुंच रही हैं। डीवीडी और वीसीडी ने घरों को 'होम थिएटरों' में तब्दील कर दिया है। संचारतकनीक के विकास ने देश भर में कई स्थानों पर 'नए बालीवुड' को जन्म दिया है। जहां अपनी भाषा और परिवेश को ध्यान में रखकर फिल्में बनाई जा रही हैं। देशी फिल्मों का यह सफर महाराष्ट्र के मालेगांव से शुरू होकर बाया दिल्ली मेरठ पहुंच गया है। इन देशी फिल्मों की खासियत यह होती हैकि मामूली बजट में तैयार ये फिल्में सिनेमाहाल में नहीं सीडी पर रीलीज होती हैं। यानी इन्हें सिर्फ सीडी प्लेयर के माध्यम से छोटे पर्दे पर देखा जा सकता है। ये फिल्में शहरों में कम गांवों में ज्यादा देखी जाती हैं।
देशी फिल्मों के लिहाज से बात करें तो ठेठ खड़ी हिंदी में संभवत: सबसे ज्यादा फिल्में बन रही हैं। इनमें से ज्यादातर फिल्में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनाई जाती हैं। कुछ फिल्मों का निर्माण हरियाणा में भी होता है। इनमें से ज्यादातर फिल्में हास्य प्रधान होती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की ठेठभाषा इसके लिए सबसे उपयुक्त होती है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भाषा गुदगुदी और चुटीली है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देशी फिल्मों का कारोबार देश के दूसरे हिस्सों से शायद कहीं ज्यादा है।


मेरठ के केबल चैनलों के लिए कार्यक्रम निर्माण करने वाले अनीस भारती कहते हैं, ''मेरठ में हर महीने तकरीबन दर्जन भर नई फिल्में बन जाती हैं। करीब पचास हजार लागत वाली ये फिल्में डेढ़ से दो लाख का कारोबार कर लेती हैं।''


तीन-चार वर्षों में मेरठ में एक 'नए बालीवुड' का अवतार हुआ है। यह है 'देशी बालीवुड'। हम यहां इसी देशी बालीवुड की चर्चा कर रहे हैं। दिल्ली से सटे होने और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के समृद्ध होने के कारण मेरठ में देशी फिल्म उद्योग के फलने-फूलने में मदद मिली है। देश की राजधानी दिल्ली में फिल्म निर्माण से संबंधित उपकरण व तकनीक आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। दूसरा कारण मेरठ का रंगमंच से गहरा जुड़ाव है। मेरठ के वरिष्ठ रंगकर्मी, फिल्म निर्माता, निर्देशक और सभासद जगजीत सिंह के मुताबिक मेरठ रंगकर्मियों का गढ़ रहा है। यहां के थिएटर से निकले तमाम कलाकारबालीवुड में काम कर रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से यहां नाटय गतिविधियां बंद सी हो गई हैं।लिहाजा थिएटर से जुड़े लोगों ने देशी फिल्मों का निर्माण शुरू कर दिया। मशहूर निर्देशक केदार शर्मा के शागिर्द रह चुके जगजीत ने 'दोस्ती के हाथ' नामक हिंदी फिल्म का निर्माण किया है जो जल्दी ही रीलीज होने वाली है।


देशी फिल्मों को चार श्रेणी में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे फिल्में आती हैं जो बालीवुडफिल्मों का देशी रूपांतरण होती हैं। ऐसी फिल्मों की भरमार है। मशहूर फिल्म शोले पर आधारित अब तक यहां तीन फिल्में बन चुकी हैं। देशी तेरे नाम, देशी युवा, देशी धूम, देशी गदर और देशी हीरो नंबर वन व यूपी के बंटी और बबली आदि फिल्मों ने अच्छा कारोबार किया है। दूसरी श्रेणी में हास्य प्रधान फिल्में आती हैं। जिनकी भाषा चुटीली व संवादों में हंसी के फौव्वारे होते हैं। हालांकि कई बार इन फिल्मों के संवाद द्विअर्थी व भाषा फूहड़ होती है। टी सीरीज की ताऊ रंगीला इस श्रेणी की सुपर-डुपर हिट फिल्म है। इसके अलावा इस श्रेणी की छिछोरों की बारात, ताऊ बहरा, ब्याह और गौंणा घोल्लू का, दुधिया हरामी, करे मनमानी रम्पत हरामी, बेवकूफ खानदान और सालीदिल्ली वाली जैसी फिल्में भी खूब देखी जाती हैं।
तीसरी श्रेणी में वे फिल्में आती हैं जो यहां के सांस्कृतिक ताने-बाने पर तैयार की जाती हैं। जिन्हें हम मौलिक देशी फिल्म कह सकते हैं। इनमें भी बम्बइया फिल्मों की तरह कई बार मसाला मिला दिया जाता है। ये फिल्में शालीन होती हैं। इसीलिए गांव के लोग इसे पसंद करते हैं। इन फिल्मों में सामाजिक उद्देश्य भी छिपा होता है।


'धाकड़ छोरा' इस श्रेणी की चर्चित और सुपरहिट फिल्म है। इसके अलावा निकम्मा, कर्मवीर और बुध्दूराम भी इसी श्रेणी की सुपरहिट फिल्में हैं। चौथी श्रेणी में धार्मिक फिल्में आती हैं। इनकी भी खूब मांग है। कृष्ण सुदामा, चारों धाम, माता-पिता के चरणों में, द्रौपदी चीर हरण, सतीसुनोचना और पिंगला भरथरी जैसी फिल्में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खूब देखी जाती हैं।देशी फिल्मों का सबसे मजबूत पक्ष चुटीली भाषा और किरदारों के संवाद अदायगी का खालिस देशी अंदाज है। बालीवुड की फिल्मों का देशी रूपांतरण तो बहुत ही रोचक होता है। कहानी और संवादोंका स्थानीयकरण कर दिया जाता है। यहां देशी शोले का उदाहरण दिया जा सकता है। फिल्म का एक प्रसिध्द सीन है। वह है जब 'कालिया' जय और बीरू के हाथों पिटकर वापस आता है तो ''अब तेरा क्या होगा कालिया'' की जगह देशी शोले का संवाद देखिए। गब्बर कहता है, ''के समझ रख्या था गब्बर तने पनीर के पकोड़े खिलावगा.... तने तो गब्बर का नाम मूत में लड़ा दिया।'' इसी फिल्म में एक जगह बीरू बसंती को गब्बर के समाने नाचने को मना करता है तो गब्बर का एक डायलाग बहुत प्रसिध्द हुआ था, ''बहूत याराना लगता है।'' तो देशी शोले के गब्बर की सुनिए। वह बसंती सेकहता है, ''घणी सेटिंग लग री है।''


ऐसी फिल्मों में एक और प्रयोग किया जाता है। बालीवुड फिल्मों के पात्रों और किरदारों में 'लोकल टच' डालकर फिल्म की कहानी का स्थानीयकरण कर दिया जाता है। मसलन गोविंदा की हीरो नंबर-वन पर आधारित फिल्म देशी नंबर वन की कहानी एक गांव के बनिए (लाला) और उसके नौकरकी कहानी है। लाला नौकरी देते हुए नौकर के सामने शर्त रखता है कि अगर वह नौकरी छोड़करजाएगा तो लाला उसके नाक कान काट लेगा। नौकर भी शर्त रखता है कि अगर लाला ने उसे नौकरी से निकाला तो वह भी मालिक के नाक कान काट लेगा और उसकी बेटी से ब्याह करेगा। नौकर के रूप में होता है 'देशी हीरो नंबर वन'। वह अपने कारनामों से लाला को परेशान कर दर्शकों को खूब हंसाता है। देशी हीरो की वेश भूषा असली फिल्म के हीरो गोविंदा की नकल है। हाफ पेंट और चमकीली शर्ट के साथ देशी हीरो ने गले में टाई व कंधो पर गमछा लटका रखा है। सिर पर गांधी टोपी पहने देशी हीरो देखते ही बनता है।


इसके अलावा फिल्मों को हास्य का पुट देने के लिए दृश्यों को रोचक बनाया जाता है। जैसे शोले में गब्बर चट्टान पर खड़ा होता है तो देशी शोले में वह गोबर के उपलों के ढेर पर खड़ा होता है। दूसरी बनी 'देशी शोले' में डाकू घोड़े की बजाय गधों पर आते हैं और बंदूक की बजाय उनके हाथों में लाठियां होती हैं। फिल्मों में गाने भी होते हैं उन्हें भी देशी भाषा में अनुवादित कर दिया जाता है।
कई बार कुछ फिल्में हास्य पैदा करने के चक्कर में फूहड़ता और अश्लीलता की हदों को पार कर जाती हैं। यहां फिल्मों का जिक्र लाजिमी है। ये हैं कलियुग की रामायण और कलियुग का महाभारत। इन दोनों फिल्मों पर धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने के कारण प्रतिबंध लगा दिया गया है। कलियुग की रामायण में सीता को बीड़ी पीते हुए और राम को मुजरा सुनते हुए दिखाया गया था तो कलियुग का महाभारत में कृष्ण रथ की बजाय मोटर साईकिल पर आते हैं और अर्जुन और दूसरे योद्धा तीर धनुष की बजाय हाकी लेकर युध्द करने जाते हैं। देशी फिल्मों में बढ़ती फूहड़ता से चिन्तित जगजीत सिंह कहते हैं, ''यह सब ज्यादा दिन नहीं चलने वाला। लोग ऐसी फिल्मों को देखना पसंद नहीं करते।''लेकिन सच्चाई यह है कि ऐसी फिल्में देखी भी खूब जाती हैं और कारोबार की दृष्टि से सफल भी मानी जाती हैं। टी सीरीज ने छिछोरों की बारात' नामक एक फिल्म बनाई और खूब बिकी। इस फिल्म केनिर्देशक एस. गोपाल टाटा ने फिल्म का नाम सुनकर पहले तो इसे बनाने से इनकार कर दिया। लेकिन बाद में व्यावसायिक मजबूरियों के चलते जब फिल्म बनाई तो यह चल निकली। बकौल श्री टाटा, ''इस फिल्म को देखकर जब लोग मेरी तारीफ करते हैं तो मुझे अपने आप पर हंसी आती है।''देशी फिल्मों का कारोबार निकटता के सिद्धांत पर आधारित है। अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त युवा निर्देशक यतीश यादव इसे भारतीय लोगों के अपनी संस्कृति से गहरे लगाव के रूप में देखते हैं। उनके मुताबिक, ''भारतीयों को अपनी जमीन और भाषा से बड़ा प्यार होता है। यही वजह है कि मेरठ का दूधिया या किसान अमोल पालेकर की 'पहेली' की बजाय 'धाकड़ छोरा' देखना ज्यादा पसंद करेगा। इसमें उन्हें अपनापन सा लगता है।


देशी फिल्मों के निर्माण और प्रचलन का एक महत्वपूर्ण कारण गांवों से मनोरंजन के पारंपरिक साधानों मसलन लोक नृत्य, लोक गीत व नाटकों का लुप्त होना है। गांव के लोक कलाकार रोजी रोटी कीतलाश में शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। ऐसे में शाम को चौपालों पर 'गवइयों' की जगह अब देशी फिल्मों ने ले ली है। सचार क्रांति ने इसे और भी आसान बना दिया है।

बालीवुड की पहुंच शहरों तक है। देशी बालीवुड ने मुंबई और गांव की दूरी को कम कर दिया है। इसनेफिल्मों को गांवों तक और सही कहें तो आम लोगों तक पहुंचा रहा है। देशी बालीवुड ने साबित करदिया है कि फिल्म जनसंचार का एक सशक्त माध्यम है। अभी तक इसका उपयोग केवल मनोरंजन के लिएकिया जा रहा है। जबकि सामाजिक चेतना पैदा करने और लोगों को जागरुक करने में इस माध्यम को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
कैसे बनती हैं फिल्में


तकनीक और गुणवत्ता के आधार पर देशी फिल्मों को दो श्रेणी में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी में वे फिल्में आती हैं जो गुणवत्ता व तकनीकी दृष्टि से बेहतर होती हैं। इन फिल्मों की समयावधि 2 से 3 घंटे होती है। प्रोफेशनल कलाकारों के साथ यह फिल्म बनाई जाती है। इसे बनाने में 2 से 3 लाख रूपए खर्च होते हैं। 20 से ज्यादा देशी फिल्मों के निर्देशक के रूप में काम कर चुके एस.गोपाल टाटा के मुताबिक, ''अच्छी फिल्म बनाने में करीब एक महीने का वक्त और करीब तीन लाख रूपये खर्च होते हैं। 10 दिन शूटिंग में लगते हैं और करीब 15 दिन पोस्ट प्रोडक्शन में।''


दूसरी श्रेणी की फिल्में गुणवत्ता और तकनीक के हिसाब से कमतर होती हैं। ये फिल्में 50-60 हजार रूपये में तैयार कर ली जाती हैं। कई लोग तो 30 से 40 हजार रूपए के बजट में भी फिल्में बना लेते हैं। कई बार तो फिल्मों का निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक, गीतकार व अभिनेता एक ही व्यक्तिहोता है। ये फिल्में 'वन मैन शो' की तरह होती हैं। शादी वाले कैमरे से पूरी फिल्म शूट कर ली जाती है। कई बार कुछ लोग मिलकर पैसा इकट्ठा कर भी फिल्में बना लेते हैं। मेरठ के पास स्थित सरधाना में एक सिनेमाहाल के मालिक जीसान कुरैशी बताते हैं कि उनके यहां के चार लड़कों ने आपस में पैसा इकट्ठा कर फिल्म बनाई है। हीरो भी उनमें से एक है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आजकल यह आम बात है।


कैसे होता है देशी फिल्मों का कारोबार

देशी फिल्में सीडी के जरिए लोगों तक पहुंचती हैं। एक फिल्म के सीडी की कीमत 25 से 50 रूपए के बीच होती है। यह फिल्म की गुणवत्ता और समयावधि पर निर्भर करती है। देशी फिल्में ज्यादातरग्रामीण इलाकों में देखी जाती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली देहात और हरियाणा, जहां येफिल्में देखी जाती हैं, के किसानों की गिनती समृध्द लोगों में होती है। यहां के गांवों में बिजली पहुंच चुकी है। लोगों के घरों में टीवी और सीडी प्लेयर तो आम बात है। वीडियो पार्लर भी यहां खूब फल फूल रहे हैं। देशी फिल्मों के मशहूर निर्देशक एस. गोपाल टाटा के मुताबिक, ''चाइनीज सीडी वडीवीडी प्लेयर ने देशी फिल्म उद्योग को फलने-फूलने में बड़ी सहायता की है। काफी सस्ता होने की वजह से यह आम लोगों के घरों तक पहुंच चुका है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में तो देशी फिल्मों की सीडी तो मिलती ही है। दिल्ली केपालिका बाजार और लाजपत राय मार्केट में भी इनकी सीडी खूब बिकती है। पालिका बाजार में सीडी बेचने वाले दुकानदार प्रमोद के मुताबिक वह हर रोज पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनने वाली देशीफिल्मों की 60-70 सीडी बेच लेता है। प्रमोद कहते हैं, ''ये फिल्में केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा के लोग ही नहीं खरीद कर ले जाते, क्योंकि इनमें ज्यादातर फिल्में हंसने हंसाने की होती हैं, इसलिए दूसरे लोग भी इन फिल्मों को खूब देखते हैं।


देशी फिल्म उद्योग भी उसी संकट से गुजर रहा है जिससे बालीवुड। देशी फिल्मों की भी 'पायरेटेड सीडी' काफी सस्ते में बाजार में उपलब्ध हो जाती है।देशी फिल्मों के निर्माण व विपणन से जुड़ी सोनोटे कंपनी के मालिक व निर्माता-निर्देशक हंसराज के मुताबिक इससे फिल्म निर्माताओं को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। नकली सीडी असली सीडी के मुकाबले आधी कीमत पर बाजार में उपलब्ध हो जाती है।


कहां से आते हैं कलाकार

देशी फिल्मों में काम करने वाले ज्यादातर कलाकार स्थानीय होते हैं। इनमें से ज्यादातर कलाकारों को कोई मेहनताना नहीं दिया जाता है। ये कलाकार बस पर्दे पर किसी तरह दिख जाएं, इसी उद्देश्य से काम करते हैं। देशी फिल्मों के अभिनेता भूपेंद्र तितारिया की मानें तो कई लोग उलटे पैसे देकर इन फिल्मों में काम करते हैं। श्री तितारिया के मुताबिक ग्लैमर और फिल्मी दुनिया की चकाचौंध लोगों को आकर्षित करती है और हर कोई अपने को पर्दे पर देखना चाहता है। यही वजह है किपश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिसके पास थोड़ा पैसा हुआ वह बतौर हीरो अपनी फिल्में बनाने लगता है। ऐसी फिल्में सफल भी नहीं होती। लेकिन इनका उद्देश्य मुनाफा कमाना कम अपने आपको परदे पर दिखाना ज्यादा होता है।


देशी फिल्मों में काम करने वाले प्रोफेशनल कलाकारों की संख्या सीमित है। ज्यादातर कलाकार स्थानीय होते हैं। निर्देशक रोल के मुताबिक उन्हें ट्रेंड करता है। देशी फिल्मों के मशहूर निर्देशक एस. गोपाल टाटा के मुताबिक, ''शूटिंग शुरू करने से पहले उन्हें कलाकारों को अभिनय के गुर भी सिखाने पड़ते हैं। यह देशी फिल्मों के निर्देशकों के लिए एक चुनौती होती है। फिल्म की सफलता इस पर निर्भर करती है कि कलाकारों ने पात्रों को कितना जीवंत किया है।''


ऐसा भी नहीं है कि सारे कलाकार मुफ्त में ही काम करते हैं। कई कलाकारों ने शुरुआत तो मुफ्त या फिर मामूली मेहनताने से की थी लेकिन नाम और शोहरत मिलने से अब उन्हें 50 हजार रूपये से लेकर एक लाख रूपए तक मेहनताना मिलता है। सुमन नेगी प्रत्येक फिल्म के लिए एक लाख रूपए की मांग करती है तो भूपेंद्र तितोरिया का कहना है 'बुध्दूराम' फिल्म में बतौर नायक काम करने का मेहनताना 51 हजार रूपए मिला था। वैसे आमतौर पर कलाकारों को प्रत्येक फिल्म 5 से 10 हजार रूपए मेहनताना मिलता है। देशी फिल्मों में नायक के मुकाबले नायिकाओं को ज्यादा मेहनताना मिलता है। यह ट्रेंड बालीवुड के विपरीत है। वहां नायकों को नायिकाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा मेहनताना मिलता है।


पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बनने वाली देशी फिल्मों में काम करने वाले जाने माने कलाकारों में उत्तर कुमार, संतराम बंजारा, कमल आजाद, मुन्ना बाज, भूपेंद्र तितोरिया, सुमन नेगी, पुष्पा गुसाईं, राजू प्रिन्स और पूनम त्यागी के नाम प्रमुख हैं। देशी फिल्मों में काम करने कलाकारों की भी बालीवुड के कलाकारों की तरह स्थानीय स्तर पर पहचान और ग्लैमर कायम रहता है। बकौल सुमन नेगी, ''अक्सर लोग उन्हें पहचान जाते हैं और आटोग्राफ मांगते हैं।''


देशी फिल्मों के कलाकारों का सपना भी बालीवुड पहुंचना होता है। सुमन नेगी और भूपेंद्र तितोरियाबाया मेरठ बालीवुड पहुंच चुके हैं। ये फिल्में देशी कलाकारों के बालीवुड पहुंचने की सीढ़ी भी है।

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रचनाकार – अनिल पांडेय सराय सीएसडीएस (सेंटर फ़ॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़) के स्वतंत्र शोध फ़ैलो रहे हैं.


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सीडी तथा सीडी-प्लेयरों और डिज़िटल कैमकार्डरों के जमीन चाटते भावों ने निसंदेह नई रचनात्मकता को जन्म दिया है. छत्तीसगढ़ जैसे छोटे प्रदेशों में भी क्षेत्रीय भाषा की फ़िल्मों का कारोबार बुलंदियों पर है. कुछ समय पहले छत्तीसगढ़ी फ़िल्म लपरहा टूरा (बकबक करने वाला लड़का) मैंने देखी थी, जिसमें किसी गांव में शूटिंग की गई थी और महज चार-पाँच लोगों ने मिलकर पूरे एक घंटे की मज़ेदार फ़िल्म बना डाली थी – जिसमें न कोई स्क्रिप्ट था, न ढंग के संवाद और न ही स्टोरी लाइन. परंतु गम्मत (छत्तीसगढ़ी नाचा – या गीत संगीत युक्त नाटक) शैली में बनाई गई यह फ़िल्म दर्शकों को मनोरंजन प्रदान करने में किसी भी आम बॉलीवुड की फ़िल्म से टक्कर लेती प्रतीत हो रही थी. - रविरतलामी


''जीबन''

जीबन का ह?

जीबन का ह?
रहस्य बा ई अनोखा
चलत रहे का
मंतर इम्मे
कौउन है फूँका?

अजब बा
ई पहेली
एक को खोलौ
तो दूजा उलझे
जीवन का
ई गुत्थी,
भवा सुलझाये न
सुलझै।

का बताई,
अब तोहके,
हुयै लोग
बहुत ज्ञानी,
बोलत हैं
विज्ञान की बानी।

पर जीवन केबुझै में,
बन गयो
भवा यो
भी अज्ञानी।

पढ़ा रहे
किताबन में,
जीवन बा,
सूरज का रोषनी में,
पानी की बूंदन में,
माटी में बा
आग और अकाषो
में बा,
हवो में बहत
ह जीवन,
पर भवा!


हम हई
निपट मूढ़
औउर अज्ञानी
समझ नइखे आवत
बड़े लोगन क
इ बानी।

हमरे समझ से
त करत जा
तू आपन काम
निभावा आपन
जिम्मेवारी,
कहिला जे के
हम करम
करत जा
हो लोगन
जब तक ह
दम में दम।

के हू का
जी न दु:खावा
भवा ऐसन
तू निभावा।

जौन काम आवे
औरन के
वो ही के
जानिला भवा
हम जीवन
कहे जमनवा
चाहे ऐके हमार
नादानी
पर भइया
ई हे बा
हमरी बानी।


रचनाकार -अमित कुमार सिंह की अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें:


http://rachanakar.blogspot.com/2006/03/blog-post_15.html

http://rachanakar.blogspot.com/2006/01/blog-post_02.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post.html



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- एन. के. राय


उस जिले के कप्तान साहब आंग्ल-भारतीय सज्जन थे. उनका रहन-सहन राजा-महाराजों-जैसा था. अंग्रेज तो भारत छोड़ गए थे, परन्तु उनका तौर-तरीका अँग्रेज़ों जैसा ही था. वे अपने को सामान्य जनता का शासक और प्रभु समझा करते थे. उसी प्रकार अहमन्य थे. तनख्वाह के रुपयों में गुजारा होना संभव नहीं था, इसलिए उत्कोच लेने में सकुचाते न थे.

उनकी मेम साहब तो और भी भयानक थीं. ...वे अकसर बाजार में जाकर सामान खरीदा करती थीं. साथ कोतवाल रहा करता. कीमत न देकर महीन स्वर में कहा करतीं, ‘बिल साहब को भेज देना...’

साहब उन मूर्खों में से नहीं थे जो बिल का भुगतान करते! मामला फैल रहा था. मेम साहब की गाड़ी जिस दुकान पर रुकती, उसका दुकानदार सोंठ हो जाता – अब देखो, कितना सामान लेती हैं.

एक बार वे एक ऐसी गली में खरीददारी कर रही थीं जो संकरी थी और जहाँ सर्राफ़े की दुकानें भी थीं. वहां सवारियों के आने-जाने में बड़ी परेशानी होने लगी. मगर मेम साहब को गाड़ी हटाने के लिए कौन कहे?

वहीं से एक दो पन्ने का संवादपत्र निकलता था. उनके पत्रकार संपादक और प्रकाशक एक सज्जन थे. उन्हें जर्नलिज्म का खब्त था. पत्र-प्रकाशन का खर्च अदालती सम्मन और विज्ञापन से निकलता था.

स्थानीय समाचार वे छापा करते थे. विशेष रूप से लच्छेदार समाचार – वे जानते थे, उनका अख़बार इसी प्रकार की खबरें छापने से बिकेगा. इसलिए खोजकर मनोरंजक समाचार एकत्र किया करते थे. जिले के विभिन्न विभागों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों को उपयुक्त टिप्पणी के साथ वे अवश्य छापते!

एक बार उन्होंने अपने पत्र में लिखा- स्थानीय कप्तान साहब की मेम साहिबा अकसर सरकारी गाड़ी पर हीरा-मोती खरीदने जाया करती हैं, और गाड़ी इस तरह सड़क पर खड़ी करती हैं कि यातायात रुक जाए.

कप्तान साहब तो ‘गटर प्रेस’ की हिम्मत देखकर बौखला उठे. “अभी ऐक्शन मांगता – साला गटर प्रेसवाला हमारा मेम साहब का इनसल्ट करेगा और हम चुप रहेगा? – हरगिज नहीं.”

सम्पादकजी स्थानीय राजा ओयल साहब के सर्वेन्ट क्वार्टर में किराएदार थे. किसी जमाने में जब राजा-रजवाड़ों का बोलबाला था तो असंख्य नौकर-चाकर थे और कदाचित् वे सब उन क्वार्टरों में रहा करते थे. जमींदारी – उन्मूलन के बाद राजा-रजवाड़ों ने नौकर – चाकरों को विदा करके व्यय संकोच किया और उन परित्यक्त क्वार्टरों को भाड़े पर उठा दिया.

चार-पाँच साल से सम्पादकजी उसमें रहा करते थे. और राजा साहब को किराया अदा करते थे. छपी हुई रसीद मिलती थी. दिन भर समाचार संग्रह करने, पेपर छपवाने और बेचने में लग जाया करता. केवल रात को चन्द घण्टे घर पर विश्राम करते थे. इसलिए आसपास के लोगों से विशेष परिचय नहीं था, अन्तरंगता कौन कहे!

उस दिन रात को थका-मांदा वह लौटा तो देखा, उसका क्वार्टर खुला है और उसमें कोई औरत बैठी है! उसे आश्चर्य हुआ – कौन है यह औरत? उसका ताला किसने खोला? आगे बढ़कर उसने उस रमणी से पूछा, “तुम कौन हो जी?” उस औरत ने उखड़कर प्रश्न किया, “तू कौन है? अकेली औरत से बतियाने आता है!”

अपने ही घर में बाहरी औरत और उसी से पूछती है कि वह कौन है? वाह री हिम्मत! सम्पादकजी उखड़ गए. दिन-भर मेहनत के बाद घर लौटकर विश्राम करेंगे कि यह बवाल! वे बड़े नाराज हुए. कठोर स्वर में बोले, “मेरे घर के अन्दर तुम घुसी कैसे? मैं तुमको पुलिस के हवाले करूंगा.”

वह भला पुलिस के नाम से क्यों डरती! उसने भी बौखलाकर जवाब दिया, “हरामी, पुलिस का डर दिखाता है मुझे?” कर्कश स्वर ध्वनित हो उठा.

गाली सुनकर सम्पादक जी तिलमिला उठे, बोले, “ठहर जा, मैं अभी तुझे गर्दन पकड़ कर निकाल बाहर करता हूँ.” – कहते हुए अकड़ कर सम्पादकजी जो आगे बढ़े कि वह मुसम्मात चिल्ला पड़ी, “अरे कोई बचइहो – यह मुआ मेरी इज्जत लूट लिया...” और अंधेरे में पहले से आत्मगोपन किए हुए सिपाही फौरन ‘मार’ ‘मार’ कहते हुए निकल आए और सम्पादकजी को पकड़कर पिटाई शुरू कर दी, “साला, बहू-बेटी छेड़ता है. घर में घुसकर औरतबाजी करेगा” - प्रभूति टिप्पणियों के साथ निर्मम पिटाई आरंभ की. हल्ले गुल्ले में सम्पादकजी की कौन सुनता! पीटने के बाद उन्हें थाने ले जाकर बन्द कर दिया.

मुकदमा कायम हो गया – शीलभंग के इरादे से अनधिकार प्रवेश!

उस बेचारे के खिलाफ चार्जशीट पुलिस ने लगा दी. उसकी बातों पर दारोग़ाजी ने रंचमात्र ध्यान नहीं दिया कि बहुत दिनों से वह राजा साहब के किराएदार के रूप में रह रहा है, जाँच कर ली जाए! उस औरत से मकान का कोई मतलब नहीं था. उसे वे जानते तक नहीं थे. उस रमणी ने इल्जाम लगाया कि वह उस घर की मालकिन है – यह आदमी रात को घुसकर उससे छेड़खानी करना चाहता था – लोगों ने बचाया.

पर मुक़दमे के दौरान रमणी लापता थी. पुलिसवाले दिन-भर के बाद शाम को तारीख लेकर चले जाया करते थे. कचहरी में हज़ारों आदमी आया-जाया करते थे. पत्रकार महोदय को देखकर पूछा करते, कैसे वहाँ हैं? और यह कहने में वे लज्जा से गड़ जाते कि औरत छेड़ने के केस में उनका चालान हुआ है. उसके बाद जब वे विस्तार में अपनी बेगुनाही सिद्ध करने को उद्यत होते तो श्रोता बहाना बनाकर खिसक जाता, शायद यह सोचकर कि सभी लम्पट सफाई दिया करते हैं. साला आवारा, पत्रकारिता की आड़ में मौज कर रहा है!

उनका कामधाम बन्द हो गया. मुक़दमे की पैरवी करे कि पत्रकारिता करे? मैं समझ गया, मुकदमा झूठा है! उनकी परेशानी देखकर मैं पसीजा. यद्यपि क़ानूनन मुझे साक्ष्य सुनने से पहले निर्णय करने का अधिकार नहीं था – फिर भी मैंने उन्हें दोषमुक्त कर दिया.

मैंने उनसे कहा कि वह कहीं और चले जाएं, क्योंकि कप्तान की दुश्मनी.... अधिक नहीं कहना पड़ा. छूटने के बाद नगर छोड़कर वे खुद ही चले गए.

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रचनाकार – एन.के.राय प्रसिद्ध कानून विद् रहे हैं. प्रस्तुत संस्मरण उनकी प्रकाशित पुस्तक ‘पुलिसनामा’ से साभार.

हिन्दी में माहिए

उर्दू में आजकल बहुत माहिए लिखे जा रहे हैं। यह पंजाबी का लोक गीत है जिस की तीन पंक्तियों में पहली तथा तीसरी में तुक होता है व दूसरी पंक्ति छोटी होती है। हिन्दी तो नहीं, हिन्दुस्तानी में सबसे पहले शायद फ़िल्म परदेसी में हिम्मत राय शर्मा ने पहला माहिया दिया था, रफ़ी व लता के गाए गीत में जिस के मुखड़े के बोल में पूरा माहिया था, व अंतयरों में भी। यह गीत थाः

 

तुम रूठ के मत जाना

दिल का क्या शिकवा

दीवाना है दीवाना


 

इसको हिन्दी का पहला माहिया इस लिए नहीं माना जा सकता कि बादमें हिम्मत शर्मा जी ने अपने माहिए उर्दू पत्रिकाओं में छपवाए और सक कारण उर्दू में उन्हीं को पहला माहिया शायर कहा जाता है।

कम से कम मेरे ज्ञान में तो हिन्दी के माहिए अब तक नहीं लिखे गए। किसी को कुछ पता हो तो मुझे सूचित कतें। वरना मैं यह ऐलान करने जा रहा हूं कि प्रस्तुत है हिंदी का पहला माहिया, इसे मैं ने पिछले माह हमारे विभाग के हिंदी पखवाड़े के कवि सम्मेलन में प्रस्तुत किया था।

 

 

फिर मां को फ़ोन करूं

झूठ कहूं उससे

मैं बिल्कुल अच्छा हूं

अन्य दो माहिएः

 

पलकों पर हैं मोती

जिसकी, वही आंखें

मेरे नयनों की हैं ज्योती

 

रहे धूप कि हों बादल

प्यार का एक मौसम

रिम झिम रिम झिम हर पल

एज़ाज अख़्तर का हिन्दी चिट्ठा यहाँ पढ़ें -
http://blog.360.yahoo.com/blog-4r0ico88eqv0hprmqeH3tdM-?cq=1


दृश्य-1



कच्ची मस्जिद के पीछे
थूहर की लम्बी कतार
रस्ते में कुछ गोलियां खेलते
बच्चे भी दो-चार
रस्ते के उस ओर पड़ा घूरे का बड़ा अम्बार
कुछ चुनती, कुछ चुगती मुरगी और उसके चूज़े
ताल के बांध पर फैले रंग बिरंगे कई कपड़े
फूस की छत पर फैले उपले, लौकी की बेलें
जूहड़ के गंदे पानी में नहाती दो भैंसें
घड़े लिए कुछ सांवरिया पनघट के रस्ते में
मंदिर की कलशी पर बैठी कुछ बूढ़ी चीलें
दूर शहर के रस्ते में जाती हुई एक बरात
और इधर कांडों की बाढ़ के पीछे हिलते हाथ
नन्हे-नन्हे उजले-उजले दानों की बरसात
चुप-चुप गिरती, सूप में किंतु छन-छन करती ज्वार
रुक-रुक कर त्रिशूल चुभोती एक सोच हर बार
कितना गल्ला घर में बचे,
क्या जाएगा बाज़ार




दृश्य-2



दरवाज़े पर एक पुराना चेहरा दिखता है

खटिया पर बूढ़े हुक्क़े की गुड़ गुड़ गुड़ गुड़
एक पल को थमती है
हाथ भौंहों तक उठते हैं

उपले छत पर रखती लड़की सुन्न सी रह जाती है
नांद के पास खड़ी औरत
टक देखती रहती है

काँपते हाथ
चमकती आँखें
थर-थर करते ओंठ
सारे शरीर से "बेटा" कह कर
बढ़ती – गिर जाती है



दृश्य-3



नारियल के दरख्तों में पागल हवा
सीटियां सी बजाती रही सारा दिन
कुंज में अपने मोहन की प्रतीक्षा में
सांझ के ध्यान में सोच कर क्या-क्या कुछ
एक लड़की लजाती रही सारा दिन

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रचनाकार – एज़ाज अख़्तर लिनक्स के उर्दूकरण प्रयासों से जुड़े रहे हैं. आपका उर्दू साहित्य के साथ-साथ कम्प्यूटर तकनॉलाज़ी में भी ख़ासा दखल है. संप्रति भारतीय भूसर्वेक्षण संस्थान, नागपुर में अभियांत्रिकी विभाग के निदेशक हैं.
आपका (उर्दू में) जाल स्थल है - http://www.urduweb.org/mehfil/



***-***

तलाश गुमशुदा की

तलाश है .....
गुमशुदा की
तीन जुड़वां बेटे
मिज़ाज एक सा / और
ऊँचाई एक सी

बड़े का नाम ईमान
मझले का कर्म / और
छोटे का धर्म है.

एक के बाद एक
छोड़ गए हैं अपना घर
जो भी इन्हें वापिस लाएगा / या
पता बताएगा / वह
बूढ़ी माता के हाथों
आशीर्वाद पाएगा.


**-**


नागफनी

जिसे मैं / खुशबूदार
फूल का पौधा समझ
सींचता रहा... पोसता रहा

वहीं खड़ा हो गया
पौधा कंटीला हँसता हुआ
अपनी नागफनी हँसी
चुभाता हुआ भीतर तक
खटकती हुई.
**-**

पुरस्कार

गोद में बच्चा लिए / वह
मांग रही थी भीख
कोख की जिंदगी के नाम,
दाता ने ....
बुलाया उसे घर में / और ...
एक और बच्चा डाल दिया
उसकी कोख में.


***-***

सदाबहार

दोस्तों!
मेहरबानों कद्रदानों
इन्हें आप जान लीजिए
ठीक से पहचान लीजिए
ये हैं... नेताजी सदाबहार
आज ये हाथ जोड़
ठिठुर-ठिठुर कर
बटोर रहे हैं.... वोट
जब / नेताजी जीत जाएंगे
ठंड के मौसम में भी / ये
गरमा जाएंगे / और
जब आएगी बरसात
वे / बारिश की बूंदें
बरसा लेंगे
अपने ही खेत में
ऐसे ही ये
सूखा भगाएंगे
राहत दिलवाएंगे
जनता को अपने
वादों के नाम

**-**

रचनाकार – सदाशिव कौतुक के दस कविता संग्रह, तीन उपन्यास, दो कहानी संग्रह और एक पत्र संग्रह प्रकाशित हैं. भारत की तमाम प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित हैं. दर्जन भर से अधिक राज्य / राष्ट्र स्तरीय विभिन्न साहित्यिक पुरस्कार आपको प्राप्त हो चुके हैं.

प्रस्तुत कविताएँ – उनके कविता संग्रह “स्याह धब्बों के बीच”, प्रकाशक प्रगतिशील लेखक संघ, इन्दौर इकाई, में से चयनित.


परिकथाओं सी मोहक तारों भरी वह रात-इतनी संपूर्ण और जादूभरी थी कि उसके आकर्षण की डोर में बंधे हम सभी गोल-गोल घेरा बनाकर बैठ गए. मंद-मंथर बहती हवा, महकते बेला फूल और देवदारू के झुटपुटों से छनकर आती चांदनी ..हम पर अलौकिकता का वह दौरा पड़ा कि हम सभी रोटी-लंगोटी की बात भूल जीवन और अनुभूतियों की बातें करने लगे. एकाएक श्यामली दी ने मुझसे पूछा, जानते हो दुनिया का सबसे बड़ा सुख क्या है? मैं गोबर गणेश की तरह आसमान की ओर ताकने लगा, जैसे वहीं से उतरेगा कोई जवाब. वे मुसकराई और बोली, दुनिया का सबसे बड़ा सुख है निस्वार्थ सात्विक सुख.

हमारी टोली के सबसे छोटे सदस्य श्रीकांत के माथे पर सिलवटें गहराई, यह किस चिड़िया का नाम?
ज़िंदगी का सारा रहस्य जान लेने वाले आत्मविश्वास के साथ वे मुस्कराई, 'जिसने यह नहीं जाना, जानो उसका जीवन डस्टबिन पर मंडराते आत्मतृप्त कॉकरोच-सा.'श्रीकांत ताव खा गया, 'तो बताइए, आपने ही कब भोगा इसे?' कुछ उस रात का तिलिस्म, कुछ हमारा आग्रह..रफ्ता-रफ्ता श्यामली दी पीछे घूम गई. रसीले फानूस आम की तरह टप-टप टपकती स्मृतियां. चांदनी सी एक उज्ज्वल रेखा उनके अधरों पर उभरी.सरसराते पत्तों की आवाज़ों के बीच गूंजने लगी उनकी आवाज़-


''मेरे जीवन के सबसे मचलते हुए दिन थे वे. पक्षी की पहली उड़ान की तरह ही रोमांचित. मैं उन दिनों सिनी आशा में थी.''सिनी आशा? वह क्या?'' मैंने और श्रीकांत ने एक साथ पूछा.''कोलकाता में रहते हो और 'सिनी आशा' का नाम नहीं जानते?''स्ट्रीट चिन्ड्रेन के लिए सबसे नामी- स्वयं-सेवी संस्था है यह सिनी आशा. उन्होंने दाएं हाथ की चूड़ियां ऊपर खिसकाई और फिर प्रवाह में बहने लगी-

हां, तो मैं बता रही थी कि अनुभवों की पूंजी बटोरने के वे मेरे सबसे समृद्ध दिन थे..हर दिन कुछ-न-कुछ अजूबा देखने को मिलता. पहले दिन ही मज़ा आ गया. जैसे ही सिनी आशा की दहलीज पार करने लगी कि देखा बाहरी दीवाल पर किसी मसखरे ने लिख मारा था, 'देखो, देखो, गधा मूत रहा है.' मैं अवाक् इतनी साफ़-सफ़ाक सफेद दीवाल पर कोयले से यह किसने लिख मारा? सुरक्षा गार्ड ने हँसते हुए बताया, 'यह 'तपती' दी की खोपड़ी से निकला है. जिसको देखो जीप खोलता और गंगाजल बहा देता..रात को मारे बदबू के हम लोग सोने न सकता. कितनी ही बार लिखा, 'पिसाब' करना मना..पर कौन सुनता..सो तपती दी ने गुस्साकर ऐसा लिख मारा.' बहुत ख़ूब. मैं ऊपर पहुंची तो देखा झुंड के झुंड में पसीने की गंध से बजबजाती, उठंग साड़ी पहने क़रीब चालीस-पचास महिलाएं एक बड़े से कमरे में उजबक की तरह बैठी हुई हैं. पता चला सियालदह प्लेटफार्म, झुग्गी-झोंपड़ियों और फुटपाथों पर रहने वाली ये वे महिलाएं हैं जिनके बच्चे सिनी आशा द्वारा किसी चैरिटेबिल या अर्द्ध चैरिटेबिल हॉस्टल में भेज दिए गए हैं. इन सबके बीच तृप्ति दी बड़े तृप्त भाव से उन्हें समझा रही थी-दया करके आपलोग महीने में कम-से-कम एक बार अपने बच्चों से अवश्य मिलने जाएं..आपको ताकते-ताकते आंखें बाहर निकल आती है बेचारों की.


इधर माताएं मुड़ीं कि उधर तृप्ति दी फिर चालू-अब इन्हें भी क्या दोष दूं..यहां हर चीज़ का टोटा, अब बच्चों को मुफ्त हॉस्टल में डाल भी दिया तो जाने-आने के भाड़े का जुगाड़ मुश्किल..और किसी के पास भाड़े का जुगाड़ हो गया तो दिन-भर की खटनी से समय निकाल पाना और भी मुश्किल. तो यह तो है हाल..कमर में पल्लू खोंसते हुए तृप्ति दी ने चिंता भरे स्वर में कहा.'यह तो है हाल' तृप्ति दी का, सबसे प्यारा जुमला था, जिसे वे गाहे-बगाहे जब-तब हर व्यक्ति और स्थिति पर जड़ दिया करती थी. उस दिन शाम को वे घर के लिए मेरे साथ ही निकली. मौक़ा पाकर मैंने पूछा-यह सिनी आशा क्या किसी बंगाली बाबू की देन है. वे फिर चालू हो गई-अरे नहीं, यह तो किसी आयरलैंडवासी ने बनवाया था. अब देखो, यह तो है हाल, आया तो था यहां तफरीह करने, आत्मा-परमात्मा, जन्म-पूर्वजन्म, मंदिरों और विभिन्न आस्थाओं वाले इस देश को जानने-बूझने, पर मन रमा यहां की कालाहांडी में. कहते हैं कि धूल में रेंगते-रिसते, फुटपाथों पर रोते-कलपते, बच्चों, नशे एवं कुटेवों के शिकार किशोरों और लालबत्ती इलाक़ों की ज़ख्म खाई किशोरियों को देख वह विचलित हो उठा और और उसने इस संस्था की नींव डाली और जाते-जाते कह गया..जिस परम तत्व और परमात्मा की खोज में मैं आया था, उसके मर्म को पा लिया..
पान की गिलौरी को दाएं से बाएं घुमाते हुए वे फिर चालू हो गई-अब तुम्हीं देखो, इतने बड़े कोलकाता में जितने भी नशेड़ियों, फुटपाथियों और अनाथ बच्चों, दबे-कुचले बच्चों या वासना की शिकार हुई युवतियों के लिए स्वयंसेवी संस्थान हैं वे सब ईसाइयों द्वारा स्थापित हैं, तो यह है हाल..हम भारतीयों को तो पूजा-पाठ, धर्मशालाएँ, तीर्थ-यात्रा और मंदिर-निर्माण से ही कहां फुरसत है.'इन्हें विदेशों से फंड मिल जाता है' मैं बीच में ही बोल पड़ी थी.

मुझे तेजी से काटते हुए कहा, न..न..ऐसी बात नहीं, वरना मुझे तो लगता है कि यह इसलिए है कि इन्होंने धर्म को जीवन और रोटी से सीधा जोड़ इसे फुटपाथों और झुग्गी-झोपड़ियों तक पहुंचाया है जबकि हमने धर्म की ऊंची उड़ानें भरी है. अपने परिष्कृत रूप में हमारे यहां धर्म की शुरुआत अंतर्यात्रा से होती हुई अंत:करण की शुद्धता और परम तत्व की प्राप्ति पर ख़त्म हो जाती है. अब तुम्हीं देखो..उस आयरलैंडवासी के हृदय में कितनी मानवीय और महीन बात आई कि जिन किशोरियों को हम भविष्य नहीं दे सकते कम-से-कम रात भर के लिए नाईट-शेल्टर की व्यवस्था कर उन्हें भविष्य के लिए बचाकर तो रख सकते हैं.

पान की गिलौरी को बाएं से दाएं घुमाते हुए किसी तत्व-दर्शक की तरह फिर उन्होंने एक पते की बात कही-जानती हो श्यामली, मैं कई बार सोचती हूं कि हमारे यहां क्रिश्चिएनिटी जैसे स्थूल धार्मिक सिध्दांतों की ज़रूरत है क्योंकि हम तो अभी तक रोटी और लंगोटी की ज़रूरत से ही ऊपर नहीं उठ पाए हैं और उनको चेतना, अन्तरात्मा, वेदान्त और उपनिषद् की..जिससे अतिभोग और अतिचार के मारे वे यहां की त्याग और तपस्या की अवधारणा से संतुलित और अनुशासित हो सकें.

बात पूरी कर भी नहीं पाई थी तृप्ति दी कि तभी हल्का सा हो-हल्ला सुनाई दिया. एक फील्ड वर्कर दौड़ती आई-तृप्ति दी-तृप्ति दी, झुनिया और मंगला के माई-बाप आए हैं.कमर में पल्लू खोंसे जीवन से झल्लाई किसी बूढ़ी की तरह तृप्ति दी फिर बड़बड़ाई-जीना हराम कर रखा है इन लोगों ने. सीढ़ी की रेलिंग को पकड़े किसी बोरी की तरह लुढ़कते-ठुमकते तृप्ति दी नीचे ऑफ़िस में.

जिंदगी का बोझ लिए झुनिया के पिता ने हाथ जोड़े. थोड़ी ही देर बाद खोखले तने की तरह सूखी एक मरगिल्ली स्त्री भीतर आई और उस पुरुष के पार्श्व में सहमी-सी सिमटी बैठ गई. हवा में कडघवे तेल और पसीने की मिली-जुली गंध फैल गई.अपनी भेदती तिरछी आंखों से तृप्ति दी ने दोनों का ऊपर से नीचे तक का मुआयना किया. उनकी बदहवासी और घबड़ाहट देख तृप्त हुई और फिर कड़कती आवाज़ में गरजी-बेटियां हैं या शैतान की औलाद! क्या खाकर पैदा किया था? दुर्गा-दुर्गा, हमारे तो स्टाफ की जान ही चली जाती..आपनि एक्खुन ही निये जान..दरकार नहीं बाबा (आप अभी तुरंत ले जाइए इन्हें..हमें ज़रूरत नहीं इनकी) मांगो कि, दुस्साहस! (बाप रे! कितना दुस्साहस).

दोनों के चेहरों पर काली रात का अंधेरा पसर गया. आख़िर उस पुरुष ने हिम्मत कर हाथ जोड़ते हुए मुंह खोला, माई-बाप बस एक बार दया करें. इन लड़कियों का उतना दोष नहीं, हम लोगन ने ही उन्हें समझाया था कि किसी भी अनजान आदमी के साथ मत निकलना-वे बच्चा-चोर होते हैं, बच्चों को मार डालते हैं..बोलते-बोलते वह अपनी उठंग धोती के छोर से माथे पर उग आए पसीनों को पोंछने लगा.सामने से टूटा हुआ दांत और चेहरे का पिलपिलापन उसे अजीब बना रहा था...


क़िस्सा कोताह यह कि मंगला और झुनिया का पिता रंग मिस्त्री था और मां सब्जी बेचती थी. दोनों बच्चियां घर में अकेली रहती थीं, इस कारण उनके पिता ने उन्हें समझाया था कि वे किसी भी अनजान स्त्री-पुरुष के साथ नहीं हो लें. इस बीच पाड़े (मुहल्ले) के किसी ने रंग-मिस्त्री को सिनी आशा के बारे में बताया. सिनी आशा द्वारा उसकी दोनों बेटियों को लक्खीपुर स्थित काकदीप हॉस्टल (सियालदह से 90 किलोमीटर दूर, अर्ध्द चैरिटेबल हॉस्टल) में भेज दिया गया. मां-बाप भी हॉस्टल साथ गए. मां-बाप को वापस लौटते देख दोनों फूट-फूटकर रोने लगीं तो रंग मिस्त्री ने दोनों बेटियों के हाथ में दस-दस का एक-एक नोट थमा दिया और खुद सियालदह लौट आए.


आज़ाद परिन्दे की तरह दिन भर सड़क पर गश्त लगाने की दोनों की आदत..और हॉस्टल की नियमों वाली सख्त ज़िदगी. उस पर वार्डन की मार-पीट, डांट-फटकार और चौबीस घंटों की झिकझिक-झिकझिक. दोनों बच्चियों को घर बुरी तरह पुकारता और उस पर हाथ में बीस रुपए की पूंजी का भोला विश्वास. एक शाम दोनों हिम्मत कर हॉस्टल से भाग खड़ी हुई. जैसे-तैसे वे स्टेशन तक पहुंची, पर स्टेशन पर भीड़-भाड़ और ट्रेनों की कतार देख रोने लगीं.

बच्चियों को रोता देख किसी ने उन्हें थाने तक पहुंचा दिया. थाने वालों ने बच्चियों से पूछताछ की. उन्हें सिनी आशा की हॉट लाईन की जानकारी थी. पिछले बीस वर्षों में सिनी आशा ने अच्छा-खासा नेटवर्क तैयार कर लिया था. ओ. सी. ने नंबर घुमाया-1098 और झुनिया और मंगला के बारे में जानकारी दी. सिनी आशा वालों ने लड़कियों को थाने में ही रुकवा कर रखा और अपनी एक महिला स्टाफ को भेज दिया उन्हें लाने के लिए. महिला कार्यकर्ता दोनों लड़कियों को लेकर ट्रेन में बैठी, जैसे ही ट्रेन छूटी दोनों लड़कियां भयभीत हो गला फाड़ने लगीं-हम इस मैडम को नहीं जानते, पता नहीं ये हमें कहां ले जाएंगी. ये हमें बदमाशों को बेच देंगी. ट्रेन यात्रिायों ने भी अपना 'यात्राी-धर्म' निभाते हुए 'बच्चा चोर' 'बच्चा चोर' का हल्ला मचाया और देखते-देखते महिला की जूते-चप्पलों और घूसों से ठुकाई होने लगी. उत्तोजित और विचार-शून्य भीड़ से महिला ने हाथ जोड़कर विनती की-मुझे थाने ले चलिए. सच्चाई का पता चल जाएगा.-थाने वाने में कुछ नहीं होता, वहां तो कुर्सी पर चोर-डकैतों की मांएं बैठी हैं. जो होना है यहीं हो जाए, फेंक दो साली को चलती ट्रेन से.

पर उसी भीड़ में एक-दो का विवेक भी उनके साथ था. उन्हें लगा, महिला निर्दोष है. उन्होंने किसी प्रकार बीच-बचाव करते हुए महिला को थाने तक जिंदा रखा.घटना का बखान करते-करते तृप्ति दी फिर अपने मूल एजेंडे पर आ गई और मुझसे कहने लगी-श्यामली, तुम इन सब बच्चों की केस हिस्ट्री लिखो. कुछ की तो लगभग तैयार है, बस तुम्हें उन्हें फिर से टाईप करवाकर फाइल करनी है. पर कुछेक की केस हिस्ट्री आधी परती है. तुम्हें उनकी फाइल पूरी करनी है. पर इन बच्चों में सबसे टेढ़ी लकीर है पिंकी. बाप रे! साल भर हो गया उसे यहां आए पर उसकी फाइल अभी तक आगे नहीं बढ़ी. अरे, पलक झपकते जितना आसान नहीं है उसकी फाइल तैयार करना.पिंकी? पिंकी कौन? वही घुंघरूवाली?

तृप्ति हँस पड़ी. आंखों में मद झलका-हां, हां शेई, घुंघरूवाली (हां, हां, वही घुंघरूवाली).ध्यान आया, जब पहली बार पिंकी के दीदार हुए तो उसके पांवों में घुंघरू बंधे हुए थे. नृत्य और संगीत जैसे उसकी रगों में था. दिन में एक बार वह नृत्य अवश्य करती थी और तब पूरा सिनी आशा उसकी रुनझुन की मादक-मादक झंकार से गूंज उठता था. यहां के फुटपाथी बच्चों के बीच किसी दूसरे सौर मंडल की नक्षत्रा सी अलग से झिलमिलाती थी वह. हरेक हृदय में यौवन और सौंदर्य के स्वप्न जगाती वह जिधर से भी गुजरती, दिलचस्प आंखें उठ जाती थीं उसकी ओर.वह मूक-मौन, पर चेहरा बोलता हुआ.

थोड़ी देर बाद ही किसी भारी-भरकम बोरी की तरह लुढ़कते-ठुमकते तृप्ति दी फिर मेरे पास आई और गुलाबी रंग की एक फ्लैट फाइल पकड़ाते हुए मुझसे बोली-लो पढ़ लो इसे, पिंकी के बारे में हम लोगों ने जो कुछ भी जाना है, वाया दिस फाइल.वे फिर फुसफुसाई-यह लड़की अपने कूल-किनारे छूने तक नहीं देती, बहुत सावधानी से बात करना इससे. भई, सभी अपने हगे-मूते पर मिट्टी डालते हैं. पिंकी भी क्या करे. इसकी मां सोनागाछी में रहती है. अरे मां क्या मां के नाम पर कलंक है. खुद रंडी बनी और पिंकी को भी उसी नरक में घसीटा. पिंकी की फाइल में स्पष्ट लिखा है कि 11 वर्ष से 14 वर्ष की उम्र तक उसके साथ कई बार बलात्कार हुआ और वह भी उसकी मां के ग्राहकों द्वारा ही. सबसे पहले वह 'ऑल बंगाल चिल्ड्रेन वेल्फेयर होम' में थी. वहां पर उसकी किसी सहेली को पिंकी की मां के बारे में पता चल गया था. एक दिन उसने पिंकी से पूछ डाला-तोर मां की वेश्या छीलो. (तुम्हारी मां क्या वेश्या थी) बस पिंकी के चोले को फाड़कर एक नई पिंकी निकली और गुस्से में उस लड़की का सिर दीवाल से भिड़ा दिया. इस घटना के बाद उसकी फाइल में लिख दिया गया-मेंटल केस और उसी आधार पर उसे अंताराग्राम मेंटल हास्पिटल में भेज दिया गया. वहां उसे विक्षिप्तों और मंदबुध्दियों के साथ रखा जाता. पर पिंकी मानसिक रोगी तो थी नहीं. फिर भी कुछ दिनों तक खामोशी ओढ़ी रखी उसने, पर जब स्थिति नाकाबिले बर्दाश्त हो गई तो उसने चेक करने आए डॉक्टर से कहा-मुझे नहीं रहना इन पागलों के बीच. दिन भर ये लोग लड़ती-झगड़ती हैं और मेरे बिस्तर कपड़ों पर थूक देती हैं.

एक-एक शिफ्ट में दर्जनों विक्षिप्तों को निपटानेवाले डॉक्टर की सारी संवेदनाएं सूख चुकी थी. उसका सिर्फ़ दो ही काम था, हर महीने वेतन का चेक उठाना और पागलों को नियंत्रिात रखना..इस कारण जब-जब पिंकी कहती-वह उसे डपट देता-बेशी कोथा कोरले चेने बेंदे दिवो. (अधिक बक-झक किया तो चेन से बांध दूंगा.) एक बार गुस्से में आकर पिंकी ने डॉक्टर का हाथ काट लिया. उस दिन उसे दिन भर कुत्तों की तरह चेन से बांधकर रखा गया.फिर किसी चमत्कार की तरह जाने किस बुध्दिमान और सहृदय साईकियास्ट्रिस्ट की मेहरबानी से उसे हमारे यहां भेज दिया गया.


मैं अवाक्. यह जानकारी की नई परत थी और अभी जाने कितनी परतें और खुलनेवाली थी. एकाएक मैंने पूछा-आपने क्या कभी उसमें कोई पागलपन का लक्षण देखा?अपने दाएं हाथ के पंजे निकाल- निकालकर तृप्ति दी ने कहा-अरे नहीं, वह तो खुद मानसिक रोगियों को ठीक कर दे. उसका नृत्य, उसका सेवा-भाव, उसका व्यवहार देख सभी निहाल हैं यहां. बस ज़रा सी प्रॉब्लम चाईल्ड है..विशेषकर यदि कोई उसके अतीत को छूना भी चाहे तो काटने दौड़ती है. मां का तो नाम तक सुनना नहीं चाहती..इसीलिए उसकी फाइल अभी तक अधूरी पड़ी है. इस संस्था का नियम है-जितने बच्चे उतनी फाइलें. वे फिर मेरी ओर आशा भरी निगाहों से देखने लगी तूमि पारबी तो (तुम सकोगी तो)


मैंने आत्म-विश्वास से सिर हिलाया-अरे, इतने उग्रवादियों का, नक्सलवादियों का, साधुओं का, तवायफों का-इंटरव्यू लिया तो यह किस खेत की मूली.वे आश्वस्त हुई-खूब भालो (बहुत अच्छा).और ग्रहों की अंगूठीवाली अपनी उंगलियों से मेरे गाल को हल्के से थपथपाया.उस दिन अपने विलक्षण रूप में थी पिंकी.


समय और सृष्टि के बाहर खड़ी प्रेम पुजारिन मीरा की तरह नाच रही थी वह. सिनी आशा में वार्षिकोत्सव की तैयारियां चल रही थीं. मैं भी फाइलों को परे खिसकाकर नृत्य देखने पहुंच गई.ऐसा स्वाभिमानी सौन्दर्य! ओस बूंद की तरह शीतल और अग्नि की तरह दहकती हुई. लगा जैसे कोणार्क के सूर्य मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण कोई रूपसी ज़मीन पर उतर आई है. उसके प्रभा-मंडल से चौंधियाए पास ही हैपी होम और सिक विंग के कई बच्चे बुखार में भी आकर खड़े हो गए. मस्त मोरनी की तरह अपने मन के मधुवन में नाच-नाचकर पूरे वातावरण को मीरामय बनाने के बाद जब वह थककर बैठ गई तो जाने किसर् ईष्यालु लड़की ने गुस्ताखी से पूछ डाला-बिना नृत्य स्कूल में दाखिला लिए इतना भव्य नृत्य तो तुमने अपनी मां से सीखा होगा..बस देखते ही देखते उल्लास, सौंदर्य और उमंग की वह देवी जंगली बिल्ली बन चीं चीं करने लगी. श्वेत कण से चमकता उसका चेहरा गोबर के अधजले उपले की तरह बदरंग हो गया. उसकी गुलाबी आंखों से चिनगारियां फूटने लगीं. वह अपनी सहेली पर टूट पड़ी और उसका बायां हाथ इतनी जोर से मरोड़ा कि यदि पास में ही बैठी गिटारवादिका ने उसे नहीं छुड़ा लिया होता तो हड्डी ही टूट जाती उसकी.


इस घटना के बाद पिंकी फिर सिकुड़ती गई. खामोशी उसके भीतर फैलती गई. आहिस्ता-आहिस्ता.उसे फिर मानसिक अस्पताल में भेजने की बात होने लगी.तृप्ति दी के घोड़ा छाप लम्बोतरे चेहरे पर विषाद की हल्की परत फैल गई. उन्होंने फिर मुझे आगाह किया-अभी तक आपने पिंकी की फाइल पर काम करना शुरू नहीं किया..यह तो है हाल पिंकी का..कभी भी उसे मेंटल हॉस्पिटल में भेजा जा सकता है. नहीं, यदि दूसरे बच्चों को उससे ख़तरा हो तो उसे कैसे रखा जा सकता है?

कुछ दिनों बाद ही दुर्गापूजा आ गई. कोलकाता का सबसे बड़ा जातीय त्यौहार. पूरे चार दिनों तक दुल्हन की तरह सजा-धजा कोलकाता और रोशनी के झालरों से झिलमिल-झिलमिल करते यहां के पंडाल. कोई पंडाल ताजमहल की अनुकृति तो कहीं दिल्ली का संसद भवन तो कहीं हाईकोर्ट तो कहीं जयपुर का हवा महल. पूजा की वह धूम कि जिसने पूजा नहीं देखी वह अजन्मा. कोलकाता ही नहीं, आसपास के गांवों क़स्बों से भी लोग बहते हुए चले आते यहां, ज़िंदगी का स्वाद लूटने के लिए.


हमारी सिनी आशा के भी अधिकांश बच्चे घर चले गए थे, अपने परिवार के साथ पूजा मनाने. घने पेड़ों के झुरमुटों के बीच इक्के-दुक्के ठूंठ की तरह गिने-चुने वे ही बच्चे रह गए थे जो या तो बेहद बीमार थे या जिन्होंने दुनिया में अपने लिए बहुत ही कम जगह घेरी थी. ऐसे बे-ठौर-ठिकानों वाले बच्चों को संभालना बहुत जानलेवा होता था, क्योंकि सावन की घटाओं की तरह हर पल इनके भीतर अपने उजड़े घर की धुंधली यादें उमड़ती-घुमड़ती रहतीं. ये छुट्टियां उन्हें खुशनसीबों से अलग कर लहर-दर-लहर इनकी उदासी बढ़ाती जाती. सिनी आशा के बरामदे में खड़े ये बच्चे पथरीली आंखों से अपने हमउम्र बच्चों को अपने मां-बाप और भाई-बहनों के साथ जश्न मनाते देखते और लहूलुहान होते रहते थे. हम चाहकर भी उन दिनों उनके चेहरे पर हँसी नहीं उगा पाते थे.


ज़िंदगी के जाने कितने रहस्यों को अपने भीतर समेटे पिंकी भी अपनी वीरान आंखें और ग़मगीन चेहरा लिए बरामदे में खड़ी थी.मैंने पीछे से उसके कंधों पर हाथ रखा-वह चिहुंकी.-ओह, आंटी.-चलो पूजा दिखा लाती हूं.


पूजा? क्षण भर के लिए उसकी आंखें चमकीं, पर अगले ही क्षण उनमें सयानापन भर आया.-नहीं आंटी, आज मैं खाली नहीं हूं..उसने किसी बेहद व्यस्त गृहस्थिन के अंदाज़ में कहा.-तुम्हें क्या काम है?
उसने उंगली 'सिक विंग' की ओर उठाई. जहां कोई नया परिंदा जगह घेर रहा था. भोला. सिनी आशा के फिल्ड वर्कर उसे सियालदह स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर पांच से उठा लाए थे. उसके घुटने फूले हुए थे. वह दर्द के मारे ऐंठ रहा था. वह पत्ताखोर (नशेबाज) था. उसके पिता वैन चलाते थे. सियालदह स्टेशन के पास ही पुल के नीचे उसकी खोलाबाड़ी थी, जहां उसकी मां पांच-पांच रुपयों में पत्ताखोरों को नशे के सेवन के लिए खोलाबाड़ी किराए पर देती थी. भोला-पत्ताखोर को पन्नी, ब्लेड, मोमबत्ती, दियासलाई पकड़ाते-पकड़ाते स्वयं कब नशे की टान मारने लगा, उसे भी पता नहीं चला. देखते-देखते यह लत बन गई. पत्ता (नशे की एक डोज) नहीं मिलता तो वह नशे की तलब मिटाने के लिए डेनड्राइट का सॉल्युशन ही खाने लगा.
ओ मां, मांगो, भोला दर्द से ऐंठ रहा था. पिंकी उसे प्यार से डांट पिला रही थी-और टान पत्ता. कर टपोरिगिरी. (और कर नशा और कर टपोरिगिरी)पिंकी ने हाथ के सहारे से उसे उठाया और उसे पेन किलर दी और फिर उसे सुलाते हुए डांट पिलाई-चोक मूंदे सुए थाक (आंख बंद कर पड़ा रह).-तो तुम कब चलोगी?-जब तक इसका दर्द कम नहीं हो जाता.चीं चीं कर दरवाज़ा बंद हुआ और मैं झल्लाती हुई बाहर.

तीसरे दिन भोला को आराम मिल गया था और पेन किलर के प्रभाव से वह जमकर सो रहा था. उसके सिरहाने बैठी थी पिंकी-उदास और अवसन्न. आंखों से टपकते टप-टप आंसू- जैसे महाकाल के कपोल पर लुढ़कती कुछ बूंदें.

मुझे देखते ही वह फफक पड़ी. आप मुझे पूजा दिखाने ले चलने वाली थीं न. मुझे पूजा नहीं देखनी. मुझे अपनी ठाकुर मां से मिलना है, वे बहुत बूढ़ी हैं. मुझसे मिलने नहीं आ सकतीं. आप मुझे मेरी ठाकुर मां के पास ले चलिए..मुझे मिलना है उनसे. उन्हें देखे चौदह महीने हो गए. जाने किस हाल में होंगी वे.

पिंकी के दिल में अपनी ठाकुर मां की यादों का इकतारा बज रहा था. पर मैं उसे कैसे समझाती कि तृप्ति दी ने मुझे पिंकी को ठाकुर मां के पास भी ले जाने को मना किया है. उसकी ठाकुर मां के घर के पास ही उसकी मां का भी घर है. उसकी मां को भनक पड़ते ही वह पिंकी को लेने वहां आ सकती थी. तृप्ति दी की चेतावनी मेरे कानों में गूंज रही थी.आप नहीं जानती उसकी मां को, किसी भी प्रकार बहला-फुसलाकर वह वापस पिंकी को उसी गंदगी में धकेल सकती है. आप नहीं जानती उसकी मां को. यदि सप्ताह भर भी पिंकी रह जाए अपनी मां के साथ तो, उसीकी भाषा बोलने लगेगी. यहां आई थी पिंकी तो बड़ी गंदी जुबान और आदतें थीं उसकी. बिना भोंसड़ी के और मादर..के बात ही नहीं करती थी. और कमीज के गले तो इतने गहरे पहनती थी कि आधा माल बाहर से ही दिखे. हमने उसे सरस्वती वन्दना सिखाई. उसे अच्छे भावों के नृत्य सिखाए.

पिंकी लगातार झंझोड़ रही थी मुझे. आंटी मुझे ले चलिए अपनी ठाकुर मां के यहां. एकाएक मुझे एक उपाय सूझा. मैंने सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए कि पिंकी भी खुश हो जाए और मुझे भी इस खूबसूरत शाम की कुछ मलाई हाथ लगे.

मैंने पिंकी से कहा. पिंकी, नहीं मामा थेके काना मामा भालो (बिना मामा से काना मामा अच्छा). मैं ऐसा करती हूं कि टैक्सी में तुम्हारी ठाकुर मां को ही लेकर यहां आ जाती हूं, क्योंकि मुझे तुम्हें वहां ले जाने की इजाजत नहीं है. तुमसे मिलवाकर मैं तुम्हारी ठाकुर मां को वापस वहां छोड़ आऊंगी. पर इसके बदले तुम्हें भी मेरा एक काम करना होगा.


हां, हां क्यों नहीं बोलिए मुझे क्या करना होगा?
पिंकी मचल उठी थी.

मैंने कहा. पिंकी मैं जो कुछ भी तुमसे पूछूं, तुम्हें उसका जवाब देना होगा..देखो, मुझे तुम्हारी फाइल तैयार करनी है. तुम्हारी पूरी केस हिस्ट्री..ई..
मैं बात पूरी कर भी नहीं पाई थी कि उसकी आवाज़ अकस्मात रामपुरी चाकू की तरह धारदार हो गई. क्या फाइल?

और देखते-देखते लोकगीत सी लुभावनी पिंकी शोक-गीत में बदल गई.
मैंने हिम्मत कर कहा. तुम्हारी भलाई के लिए ही तो तैयार की जा रही है यह फाइल.
वह धम्म से बैठ गई, जैसे कोई बुलंद इमारत
ज़ाहिर था ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते वह जैसे थक गई थी.
उसे बात समझ में आती है पर इन फाइलों ने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा.

मेरी बात सुन रेत पर पड़ी सोन मछली सी वह तड़पी. सुरमा सजी उसकी आंखें मिचमिचाईं. एक दीर्घ निश्वास छोड़ते हुए उसने कहा.अब कैसे समझाऊं आपको कि जितना नुकसान मेरी मां ने मेरा नहीं किया उससे ज्यादा फाइलों के इन खुले जबड़ों ने किया है. निगल ली है इसने मेरी सारी खुशियां. आप इज्ज़त की डाल पर झूलते लोग क्या कभी सोच भी सकते हैं यह सत्य कि 11 से 14 वर्ष तक मेरा कई बार बलात्कार हुआ, जब तक इन फाइलों में दर्ज रहेगा, समझ लीजिए यह मेरे माथे पर दर्ज रहेगा. जो मेरे साथ हुआ उसके लिए मैं दोषी नहीं, यह सोच मैं अपने अतीत को भूल ज़िंदगी में रुचि लेने लगी थी. एक लड़के से प्रेम भी करने लगी थी. वह सचमुच मेरी ज़िंदगी का उजाला था. उसे देख मैंने पहली बार महसूसा कि आदमी जीना तभी सीखता है जब किसी से प्यार करता है. वह भी मुझे बेइंतहा चाहने लगा था. मैंने उसे बताया कि मेरी मां सोनागाछी में रहती अवश्य है पर वह बुरा काम नहीं करती..वह आसपास के घरों में खाना पकाती है. मेरी ठाकुर मां (दादी) बहुत बूढ़ी हैं, इस कारण मां ने मुझे सिनी आशा में रख रखा है. वह मुझे प्यार भी करता रहा, पर भीतर ही भीतर मेरे बारे में खोज-ख़बर भी करता रहा. एक दिन मेरी अनुपस्थिति में उसने ऑफ़िस के क्लर्क को घूस-वूस देकर पटा लिया और मेरी फाइल पढ़ डाली. उसके बाद से उसने मुझसे मिलना छोड़ दिया.

कई दिन की छटपटाहट के बाद एक बार मैं उसके घर पहुंची तो उसने मुझे बाहर से ही चलता किया. मैंने जब इस बेरुखी का कारण पूछा तो उसने मुझे ऐसी नज़र से देखा जैसे मैं कितनी गंदी और घिनौनी जानवर हूं. उसके शब्द-शब्द मेरी आत्मा को दाग गया. उसने मुझसे कहा. मैंने तुम पर कितना विश्वास किया..पर तुम..रंडी की बेटी रंडी ही निकली.

उसके बाद वह मुझे फिर कभी नहीं मिला. मेरे जीवन में काली रात का अंधेरा भर वह सदा के लिए चला गया.

भीगे कबूतर की तरह मैं बैठी रही. मूक-मौन. कनखियों से देखा मैंने, बूंद-बूंद उदासी पिंकी के चेहरे से टपकते हुए अनंत में डूबती जा रही थी. लगा जैसे यह पिंकी नहीं, कोई आदिम शकुंतला थी. फ़र्क़ बस इतना ही कि वह अपनी अंगूठी और यह अपनी फाइल वापस मांग रही थी मुझसे.

पिंकी से बिना कुछ कहे मैं वहां से खिसक गई. धीरे-धीरे और बेआवाज़. पतझड़ के सूखे पत्तों की तरह.

पूजा की छुट्टियां अभी चल ही रही थीं.

दूसरे दिन मैं फिर पिंकी के पास. पर आज मुझे देख उसमें कुछ भी नहीं जागा. उसके भीतर की बुलबुल मर गई थी. वह वैसे ही बैठी रही. खामोश, अडोल. मैंने फिर उसके कंधे पर हाथ रखा और उसे उत्तोजित करने को कहा. मैंने तो तुम्हें होशियार समझा था, पर तुम तो मूर्ख निकली. महामूर्ख.
वह सचमुच भड़क उठी जैसे वामपंथी कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से भड़क उठते हैं.
.क्या..क्या मतलब?
.यह देखो तुम्हारी फाइल..बताओ कहां लिखा है इसमें तुम्हारे या तुम्हारी मां के बारे में.
क्षण भर के लिए पिंकी सोच में पड़ गई..पर दूसरे ही पल उसने फिर पलटवार किया. यदि इसमें नहीं लिखा होता तो समीर, हां वही लड़का, को मेरी मां का नाम, मेरे पाड़े (मुहल्ले) का नाम का पता कैसे चलता? उसे यह भी पता कैसे चलता कि 11 वर्ष से 14 वर्ष के बीच..
.बताओ कहां लिखा है?. मैंने फिर उसे कुरेदा.

पिंकी ने फाइल उलटाई. और एक जगह उंगली दिखाई. बैक ग्राउंड हिस्ट्री..देखिए आंटी यहीं कहीं लिखा होगा..उतनी अंग्रेज़ी मुझे नहीं आती.
कहां..और देखते- देखते मेरे फाउंटेन पेन की स्याही ने उसकी पूरी बैक ग्राउंड हिस्ट्री को काली स्याही में बदल दिया.
पिंकी भौंचक्की? यह क्या किया आंटी?

कुछ नहीं? ज़िंदगी की जंग ऐसे भी लड़ी जाती है. यह भी एक दुर्घटना थी. ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारे साथ हुई थी. अब तुम्हीं बताओ..दुर्घटनाओं के लिए कोई भी दोषी हो सकता है क्या?
.पर तृप्ति दी को आप क्या जवाब देंगी? पिंकी मेरी चिंता में फूं-फा करने लगी थी.

मन ही मन मैं अपनी पीठ थपथपा रही थी. भले ही तृप्ति दी के समक्ष मैं लाजवाब हो जाऊं..पर इतिहास ने मेरे सिरहाने खड़ा होकर कभी यदि पूछा कि तुमने क्या किया? तो मैं उसे कुछ जवाब दे पाऊंगी. पर प्रत्यक्षत: यही कहा. जवाब क्या देना है, फाइलों का यह देश, यहां फाइलें सिर्फ़ तैयार की जाती हैं, पढ़ी कहां जाती हैं. पहले भी तीन बच्चों की फ़ाइल निपटा चुकी हूं. उन्होंने पलटकर भी नहीं देखा, मैंने कह दिया..पूरी हो गई और फ़ाइल को रैक में लगा दिया.. तुम्हारे साथ भी वैसा ही होगा.

बतलाते-बतलाते श्यामली दी का चेहरा भोर की किरणों सा जगमगा उठा था.. भाव-विभोर हो वे बोली..वह एक अतीन्द्रिय अनुभव था. लगा, जैसे मैंने धरती के एक घिनौने धब्बे को साफ़ कर दिया है. और पिंकी..वह तो जैसे सेमल के फूल की तरह हल्की हो आसमान में उड़ रही थी.
हम सब उठ गए थे पर श्यामली दी के मन का पर्दा अब भी उन्हीं चित्रों से भरा हुआ था.
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रचनाकार - चर्चित लेखिका मधु कांकरिया के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगभग पचास कहानियां प्रकाशित हैं. 'खुले गगन के लाल सितारे', 'सलाम आखिरी', 'पत्ताखोर' (उपन्यास), 'बीतते हुए', 'अंतहीन मरुस्थल' (कहानी-संग्रह) प्रकाशित हैं.
***.
चित्र: रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति



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आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे


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ग़ज़ल 1

घर बिना छत

घर बिना छत बनाए जायेंगे
लोग, जिनमें बसाये जायेंगे।

आपका राज हो या उनका हो
हम तो सूली चढ़ाये जायेंगे।

साल-दर-साल बाढ़ आयेगी
आप दौरों पे आये जायेंगे।

हम तो होते रहेंगे यूँ ही हवन
लोग, उत्सव मनाये जायेंगे।

बूढ़े बरगद पे देखना जाकर
अब भी 'दो नाम' पाये जायेंगे।

***--***

ग़ज़ल 2

आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे।

जिन्दगी टूटी हुई तलवार हो जैसे
आदमी रद्दी हुआ अखबार हो जैसे।

हाथ बांधे, सिर झुकाए भीड़ चारों ओर
हर जगह कोई लगा दरबार हो जैसे।

हर नया अनुभव हमें यूँ तोड़ जाता है
काटती तट को नदी की धार हो जैसे।

दर्द के एकान्त क्षण हमने जिये कुछ यूँ
कोई उत्सव हो, कोई त्यौहार हो जैसे।

रही है तुम से निकटता आत तक कुछ यूँ
बीच में इक कांच की दीवार हो जैसे।
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ग़ज़ल 3
चंद ख़्वाबों की जिन्दगी के लिए

राजपथ जिनसे जगमगाए हैं
वो फ़कत रौशनी के साए हैं।

चंद ख़्वाबों की जिंदगी के लिए
हमने खुद ही फरेब खाए हैं।

रौशनी की यहाँ तिजारत ने
हाय! कितने ही घर जलाए हैं।

छोड़ बैठे हैं खुद को लहरों पर
जब से साहिल पे घर बनाए हैं।

आजकल देखिए अंधेरों ने
हर तरफ दायरे बढ़ाए हैं।

झुक गए और बंदगी में हम
आप जब से 'हुजूर' आए हैं।
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रचनाकार - अखिलेश अंजुम की लिखी असंख्य बाल कविताएँ, अन्य काव्य रचनाएँ एवं लेख विविध पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. अखिल भारतीय काव्य-मंचों में सक्रिय भागीदारी.
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चित्र- डॉ. रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति

असग़र वजाहत का सम्पूर्ण कहानी संग्रह: मैं हिन्दू हूँ

टीप –
1-संपूर्ण संग्रह की फ़ाइल बड़ी है, अतः पृष्ठ लोड होने में समय लग सकता है, अतः कृपया धैर्य बनाए रखें.
2-इस संग्रह के फ़ॉन्ट का रूपांतरण मशीनी रूप से किया गया है, अतः वर्तनी की अशुद्धियाँ हो सकती हैं. कृपया अशुद्धियों की खबर रचनाकार को दें ताकि उन्हें ठीक किया जा सके.




अनुक्रम

१ केक

२ सरगम-कोला

३ दिल्ली पहुंचना है

४ राजा

५ योद्धा

६ बंदर

७ चन्द्रमा के देश में

८ हरिराम गुरू संवाद

९ स्विमिंग पूल

१० ज़ख्म़

११ मुश्किल काम

१२ होज वाज पापा

१३ तख्त़ी

१४ विकसित देशों की पहचान

१५ मुर्गाबियों के शिकारी

१६ लकड़ियां

१७ मैं हिंदू हूं

१८ शाह आलम कैम्प की रूहें













कहानी लिखने का कारण

कहानी हम क्यों लिखते हैं? कुछ बताने के लिए? कुछ कहने के लिए? कह कर संतोष पाने के लिए? दूसरों या समाज के सुख-दुख में हिस्सेदारी करने के लिए? मजबूरी में कि और कुछ नहीं कर सकते? आदत पड़ गयी है इसलिए? कुछ यादें कुछ बातें छोड़ने के लिए? समाज को बदलने के लिए? अपनी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी करने के लिए? अपनी विद्वता दिखाने के लिए? भाषा और शिल्प के चमत्कार दिखाने के लिए?


मेरे ख्य़ाल में कहानी लिखने से पहले अगर कहानीकार के मन में सवाल उठता है कि मैं कहानी क्यों लिखने जा रहा हूं तो शायद वह इस सवाल का जवाब नहीं दे पायेगा और आख़िरकार कहानी भी नहीं लिख पायेगा। इसलिए कहानीकार को भी बहुत बाद में ही पता चलता है कि वह कहानी क्यों लिख रहा है।


इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी रोचक बात यह है कि कहानीकार को अगर यह लग जाये कि उसे आज तक लिखी गयी कहानियों से अच्छी या कम से कम वैसी ही कहानी लिखनी चाहिए तो व शायद कहानी नहीं लिख पायेगा। अब चेख़व से अच्छी कहानी तो लिख नहीं पायेगा। इसलिए सोचेगा कि अगर चेख़व से अच्छी कहानी मैं नहीं लिख सकता तो क्यों लिखूं? मतलब यह कि सौ साल पहले जो कहानी लिखी गयी थी उससे मेरी कहानी अच्छी ही होना चाहिए, अगर नहीं तो क्या फ़ायदा?


जहां तक मेरा सवाल है मैंने आज से कोई तीस साल पहले एक कहानी लिख मारी थी जिसका नाम था 'वह बिक गयी` उस ज़माने में मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. कर रहा था। यह कहानी उर्दू लिपि में लिखी थी। वहां के विश्वविद्यालयी अख्ब़ार 'शहरे तमन्ना` में छपी थी जिसके सम्पादक जैद़ी साहब थे जिनके युवा चेहरे पर बड़ी काली और घनेरी दाढ़ी हुआ करती थी। कहानी लिखकर दोस्तों को सुनाई थी और सबकी यह राय बनी थी कि जैद़ी साहब का दे दो। जैद़ी साहब ने छाप दी थी और हॉस्टल के लड़कों में मैं थोड़ा जाना जाने लगा था। पता नहीं क्यों यह कहानी लिखने के बाद दिमाग में बैठ गया था कि अगली कहानी नहीं लिख सकता क्योंकि कहानी को किस शब्द से शुरू किया जाये या बहुत मुश्किल लगता था, 'वह बिक गयी` कहानी केवल संवादों पर आधारित नहीं हो सकती। इसलिए अगली कहानी का पहला शब्द कया होना चाहिए? शायद इस मुश्किल में ती-चार महीने फंसा रहा। फिर कोई कथानक मिल गया और पहले शब्द की समस्या दूर हो गयी। इस कहानी का नाम याद नहीं।


कहानियां लिखने के साथ-साथ कहानियां पढ़ने और चीज़ों को जानने समझने और लड़कियों से एकपक्षीय प्रेम करने के सिलसिले चल पड़े। चीज़ों को कार्यकलापों को, आदमियों को, समाज को, सरोकारों को, पड़ताल ने कहानी को बदलना शुरू कर दिया। और एक कहानी शायद नाम था 'उनके हिस्से का आकाश` यह सन् १९६८ के आसपास 'धर्मयुग` में छप गयी थी जो उस ज़माने में कहानीकारों के लिए मील का पत्थर माना जाता था। यह कहानी भावुक, संबंधों के तनाव पर केन्द्रित थी लेकिन कोई तिकोना प्रेम वगैरा नहीं था। बहरहाल जल्दी ही भावुकता के इस दौर से निकला क्योंकि कुछ मार्क्सवादी विचारों वगैरा की सुगंध मिलने लगी थी। समाजवादी राजनीति और उस पर बेलाग आलोचना- ये दोनों ही बातें एक साथ सामने आती चली गयीं। सोचा आंखें खुली रहे अंध भक्ति जब धार्मिक विश्वासों की नहीं की तो किसी भी 'वाद` की क्यों जी जाये? हालात उलटते-पलटते रहे। चीजें बनती बिगड़ती और बिगड़ कर बनती रहीं और कहानी भी उसी के साथ-साथ हिचकोले खाती रही।


आज तीस साल सोचता हूं कि कहानी क्यों लिखता हूं तो ईमानदारी से कई बातें सामने आती हैं। पहली तो यह कि अपने परिवेश की विसंगतियों पर गुस्सा बहुत आता है जिसे दबाया नहीं जा सकता। दूसरे यह इच्छा बनी रहती है कि 'शहर को यहां से देखो` तीसरा यह कि और ऐसा क्या कर सकता हूं जो कहानी का 'बदला हो? शायद कुछ नहीं? चौथा यह कि गवाही रहे कि मैंने या मेरी पीढ़ी ने क्या देखा और भोगा। पांचवां यह कि पढ़कर शायद किसी की संवेदना को हल्की सी चोट पहुंचे और छटवां यह कि दिल की भड़ास निकल जाये और रात कुछ चैन की नींद आये, सातवां यह कि यार लेखक हैं तो लिखें। न लिखने की कोई वजह भी तो नहीं है। हमारा माध्यम कितना प्यारा है कि क़लम है और कागज़ है और मानव सभ्यता की प्राचीनतम अभिव्यक्ति विध यानी शब्द है। कोई बीच में नहीं है, कोई मजबूरी नहीं है। बाहरी दबाव नहीं है। कहीं-न-कहीं छप तो जाता ही है। लोगों को रचना पसंद आती है, तारीफ करते हैं तो अच्छा लगता है।


प्रस्तुत चयन में कोई प्रांरभिक कहानी नहीं है। पर १९७१ से लेकर आज तक की कहानियां हैं पढ़ने वालों को सहज ही पता लग सकता है कि मैंने क्या खोया है, क्या पाया है? वैसे आलोचक क्या कहते हैं इस पर तो मुझे बहुत विश्वास है नहीं।
असग़र वज़ाहत

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1 केक
उन्होंने मेज़ पर एक ज़ोरदार घूंसा मारा और मेज़ बहुत देर तक हिलती रही। 'मैं कहता हूं जब तक ऐट ए टाइम पांच सौ लोगों को गोली से नहीं उड़ा दिया जायेगा, हालात ठीक नहीं हो सकते।' अपनी खासी स्पीकिंगपावर नष्ट करके वह हांफने लगे। फिर उन्होंने अपना ऊपरी होंठ निचले होंठ से दबाकर मुझे घूरना शुरू किया। वह अवश्य समझ गये थे कि मैं मुस्करा रहा हूं। फिर उन्होंने घूरना बंद कर दिया और अपनी प्लेट पर पिल पड़े।

रोज़ ही रात को राजनीति पर बात होती है। दिन के दो बजे से रात आठ बजे तक प्रूफ़रीडिंग का घटिया काम करते-करते वह काफ़ी खिसिया उठते हैं।

मैंने कहा, 'उन पांच सौ लोगों में आप अपने को भी जोड़ रहे हैं?'
'अपने को क्यों जोडूं? क्या मैं क्रुक पॉलिटीशियन हूं या स्मगलर हूं या करोड़ों की चोरबाज़ारी करता हूं?' वह फिर मुझे घूरने लगे तो मैं हंस दिया। वह अपनी प्लेट की ओर देखने लगे।
'आप लोग तो किसी भी चीज़ को सीरियसली नहीं लेते हैं।'
खाने के बाद उन्होंने जूठी प्लेटें उठायीं और किचन में चले गये। कुर्सी पर बैठे-ही-बैठे मिसेज़ डिसूजा ने कहा, 'डेविड, मेरे लिये पानी लेते आना।'

डेविड जग भरकर पानी ले आये। मिसेज़ डिसूजा को एक गिलास देने के बोले, 'पी लीजिए मिस्टर, पी लीजिए।'
मेरे इनकार करने पर जले-कटे तरीके से चमके, 'थैंक्स टू गॉड! यहां दिन-भर पानी तो मिल जाता है। अगर इंद्रपुरी में रहते तो पता चल जाता। ख़ैर, आप नहीं पीते तो मैं ही पिये लेता हूं,' कहकर वह तीन गिलास पानी पी गये।

खाने के बाद इसी मेज पर डेविड साहब काम शुरू कर देते हैं। आज भी वह प्रूफ़ का पुलिंदा खोलकर बैठ गये। उन्होंने मेज़ साफ की। मेज़ के पाये की जगह इसी ईंटों को हाथ से ठीक किया, ताकि मेज़ हिल न सके। फिर टूटी कुर्सी पर बैठे-बैठे अचानक अकड़ गये और नाक का चश्मा इस तरह फिट किया जैसे बंदूक में गोलियां भर ली हों। होंठ खास तरह से दबा लिये। प्रूफ़ पांडुलिपि से मिलाने लगे। गोलियां चलने लगीं। इसी तरह डेविड साहब रात बारह बजे तक प्रूफ़ देखते रहते हैं। इसी बीच से कम-से-कम पचास बार चश्मा उतारते और लगाते हैं। बंदूक में कुछ खराबी हैं। पांच साल पहले आंखें टैस्ट करवायी थीं और चश्मा खरीदा था। अब आंखें ज्यादा कमज़ोर हो चुकी हैं, परंतु चश्मे का नंबर नहीं बढ़ पाया है। हर महीने की पंद्रह तारीख को वह अगले महीने आंखें टैस्ट करवाकर नया चश्मा खरीदने की बात करते हैं। बंदूक की कीमत बहुत बढ़ चुकी है। प्रूफ़ देखने के बीच पानी पीयेंगे तो वह 'बासु की जय` का नारा लगायेंगे। 'बासु` उनका बॉस है जिससे उन्हें कई दर्जन शिकायतें मुझे भी हैं। ऐसी शिकायतें पेश्तर छोटा काम करने वालों को होती हैं।


'बड़ा जान लेवा काम है साहब।' वे दो-एक बार सिर उठाकर मुझसे कहते हैं। मैं 'हूं-हां` में जबाव देकर बात आगे बढ़ने नहीं देता। लेकिन वह चुप नहीं होते। चश्मा उतार कर आंखों की रगड़ाई करते हैं, 'बड़ी हाईलेविल बंगलिंग होती है। अब तो छोटे-मोटे करप्शन केस पर कोई चौंकता तक नहीं। पूरी मशीनरी सड़-गल चुकी है। ये आदमी नहीं, कुत्ते हैं कुत्ते. . .। मैं भी आजादी से पहले गांधी का स्टांच सपोर्टर था और समझता था कि नॉन-वाइलेंस इज द बेस्ट पॉलिसी। लटका दो पांच सौ आदमियों को सूली पर। अरे, इन सालों का पब्लिक ट्रायल होना चाहिए, पब्लिक ट्रायल!'


'पब्लिक ट्रायल कौन करेगा, डेविड साहब,' मैं झल्ला जाता हूं। इतनी देर से लगातार बकवास कर रहे हैं।

वे दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर बैठ जाते हैं।
'मासेज में अगर लेफ़्ट फोर्सेज. . .', वे धीरे-धीरे बहुत देर तक बड़बड़ाते रहते हैं।
मैं जासूसी उपन्यास के नायक को एक बार फिर गोलियों की बौछार से बचा देता हूं।
वह कहते हैं, 'आप, भी क्या दो-ढाई सौ रुपये के लिए घटिया नॉवल खिला करते हैं!' मैं मुस्कराकर उनके प्रूफ़ के पुलिंदे की तरफ़ देखता हूं और वह चुप हो जाते हैं। गंभीर हो जाते हैं।

'मैं सोचता हूं ब्रदर, क्या हम-तुम इसी तरह प्रूफ़ पढ़ते और जासूसी नॉवल लिखते रहेंगे? सोचो तो यार! दुनिया कितनी बड़ी है। यह हमें मालूम है कि कितनी अच्छी तरह से जिंद़गी गुजारी जा सकती है। कितना आराम और सुख है, कितनी ब्यूटी है. . .।'
'परेशानी तो मेरे लिए है, डेविड साहब। आप तो बहुत से काम कर सकते हैं। मुर्गी-खाना खोल सकते हैं। बेकरी लगा सकते हैं. . .।'

वह आंखें बंद करके अविश्वास-मिश्रित हंसी हंसने लगते हैं। और कमरे की हर ठोस चीज़ से टकराकर उनकी हंसी उनके मुंह में वापस चली जाती है।
अक्सर खाने के बाद वे ऐसी ही बात छेड़ देते हैं। काम में मन नहीं लगता और वक्त बोझ लगने लगता है। जी में आता है कि लोहे की बड़ी-सी रॉड लेकर किसी फैशनेबुल कॉलोनी में निकल जाऊँ। डेविड साब तो साथ चलने पर तैयार हो जायेंगे। वह फिर बोलने लगते हैं और उनके प्रिय शब्द 'बिच`, 'क्रूक`, 'नॉनसेंस`, 'बंगलिंग`, 'पब्लिक ट्रायल`, 'एक्सप्लॉइटेशन`, 'क्लास स्ट्रगल` आदि बार-बार सुनायी पड़ते हैं। बीच-बीच में वह हिंदुस्तानी गालियां फर्राटे से बोलते हैं।


'अब क्या हो सकता है! पच्चीस साल तक प्रूफ़रीडरी के बाद अब और क्या कर सकता हूं। सन् १९४८ में दिल्ली आया था। अरे साब, डिफेंस कॉलोनी की ज़मीन तीन रुपये गज मेरे सामने बिकी है, जिसका दाम आज चार सौ रुपये है। निजामुद्दीन से ओखला तक जंगल था जंगल। कोई शरीफ़ आदमी रहने को तैयार ही नहीं होता था। अगर उस वक्त उतना पैसा नहीं था और आज. . .। सीनियर कैम्ब्रिज में तेरे साथ पॉटी पढ़ता था। अब अगर आप आज उसे देख लें तो मान ही नहीं सकते कि मैं उसका क्लासफेलो और दोस्त था। गोरा-चिट्टा रंग, ए-क्लास सेहत, एक जीप, एंबेसेडर और एक ट्रैक्टर है उसके पास। मिर्जापुर के पास फार्मिंग करवाता है। उस जमाने में दस रुपये बीघा ज़मीन खरीदी थी उसने। मुझसे बहुत कहा था कि तुम भी ले लो डेविड भाई, चार-पांच सौ बीघा। बिलकुल उसी के फार्म के सामने पांच सौ बीघे का प्लाट था। ए-क्लास फर्टाइल ज़मीन। लेकिन उस ज़माने में मैं कुछ और था।' वह खिसियानी हंसी हंसे, 'आज उसकी आमदनी तीन लाख रुपये साल है। अपनी डेयरी, अपना मुर्गीखाना-ठाठ हैं, सब ठाठ।' डेविड साहब खुश हो गये जैसे वह सब उन्हीं का हो। प्रूफ़ के पुलिंदे को उठाकर एक कोने में रखते हुए बोले, 'मेरी तो किस्मत में इन शानदार कमरे में मिसेज़ डिसूजा का किरायेदार होना लिखा था।'


मिसेज़ डिसूजा को पचास रुपये दो, कमरा मिल जायेगा। पच्चीस रुपये और दो तो सुबह नाश्ता मिल जायेगा और तीस रुपये दो रात का खाना, जिसे मिसेज़ डिसूजा अंग्रेज़ी खाना कहती हैं, मिल जायेगा। मिसेज़ डिसूजा के कमरे से लगी तस्वीरों को, जो प्राय: उनकी जवानी के दिनों की हैं, किरायेदार हटा नहीं सकता। किसी तस्वीर में वह मोमबत्ती के सामने बैठी किताब पढ़ रही हैं, तो किसी में अपन बाल गोद में रखे शून्य में देखने का प्रयत्न कर रही हैं। कुछ लोगों का परिचय अंग्रेज़ अफ़सर के रूप में करवाती हैं, पर देखने में वे सब हिन्दुस्तानी लगते हैं। एक चित्र मिसेज़ डिसूजा की लड़की का भी है, जो डेविड साहब की मेज़ पर रखा रहता है। लड़की वास्तव में कंटाप है। छिनालपना उसके चेहरे से ऐसा टपकता है कि अगर सामने कोई बर्तन रख दे तो दिन में दसियों बार खाली करना पड़े। उसे सिर्फ देखकर अच्छे-अच्छे दोनों हाथों से दबा लेते होंगे। कुछ पड़ोस वालों का यह भी कहना है कि इसी तस्वीर को देख-देखकर डेविड साहब ने शादी करने और बच्चा पैदा करने की क्षमता से हाथ धो लिये हैं। मिसेज़ डिसूजा देसी ईसाइयों की कई लड़कियां उनके लिए खोज चुकी हैं। परंतु सब बेकार। वह तो ढाई सौ वोल्टेज ही के करंट से जल-भुनकर राख हो चुके थे और एक दिन तंग आकर मिसेज़ डिसूजा ने मोहल्ले में उनको नामर्द घोषित कर दिया और उनके सामने कपड़े बदलने लगीं।


सुबह का दूसरा नाम होता है। जल्दी-जल्दी बिना दूध की चाय के कुछ कप। रात के धेये कपड़ों पर उलटा-सीधा प्रेस। जूते पर पॉलिश। और दिन-भर फ्रूफ़ करेक्ट करते रहने के लिए आंखों की मसाज। फ्रूफ़ के पुलिंदे। करेक्ट किये हुए और प्रेस से आये हुए। फिर करेक्ट किये हुए फिर आये हुए। धम्! साला ज़ोर से गाली दे मारता है, 'देख लो बाबू, जल्दी दे दो। बड़ा साहब कॉलम देखना मांगता है।' पूरी जिंद़गी घटिया किस्म के कागज पर छपा प्रूफ़ हो गयी है, जिसे हम लगातार करेक्ट कर रहे हैं।

घर से बाहर निकलकर जल्दी-जल्दी बस स्टॉप की तरफ़ दौड़ना, जैसे किसी को पकड़ना हो, हम दोनों एक ही नंबर की बस पकड़ते हैं। रास्तें में डेविड साहब मुझसे रोज़ एक-सी बातें करते हैं, 'हरी सब्जियों से क्या फायदा है, किस सब्जी में कितना स्टार्च होता है। अंडे और मुर्गे खाते रहो तो अस्सी साल की उम्र में भी लड़का पैदा कर सकते हो।` बकरी और भैंस के गोश्त का सूक्ष्म अंतर उन्हें अच्छी तरह मालूम है। अंग्रेजी खाने के बारे में उनकी जानकारी अथाह है। केक में कितना मैदा होना चाहिए। कितने अंडे डाले जायें। मेवा और जेली को कैसे मिलाया जाये। दूध कितना फेंटा जाये। केक की सिकाई के बारे में उनकी अलग धरणाएं हैं। क्रीम लगाने और केक को सजाने के उनके पास सैकड़ों फार्मूले हैं जिन्हें अब हिंदुस्तान में कोई नहीं जानता। कभी-कभी कहते, 'ये साले धोती बांधने वाले, खाना खाना क्या जानें! ढेर सारी सब्जी ले ली, तेल में डाली और खा गये बस, खाना पकाना और खाना मुसलमान जानते हैं या अंग्रेज। अंग्रेज़ तो चले गये, साले मुसलमानों के पास अब भैंसे का गोश्त खा-खाकर अकल मोटी करने के सिवा कोई चारा नहीं है। भैंसे का गोश्त खाओ, भैंसे की तरह अकल मोटी हो जायेगी और फिर भैंसे की तरह ही कोल्हू में पिले रहो। रात घर आकर बीवी पर भैंसे की तरह पिल पड़ो।`

आज फिर घूम-फिर कर वह अपने विषय पर आ गये।
'नाश्ता तो हैवी होना ही चाहिए।'
मैंने हामी भरी। इस बात से कोई उल्लू का पट्ठा ही इनकार कर सकता है।

'हैवी और एनरजेटिक?' चलते-चलते वह अचानक रुक गये। एक नये बनते हुए मकान को देखकर बोले, 'किसी ब्लैक मार्किटियर का मालूम होता है। फिर उन्होंने अकड़कर जेब से चश्मा निकाला, आंखों पर फिट करके मकान की ओर देखा। फ़ायर हुआ ज़ोरदार धमाके के साथ, और सारा मकान अड़-अड़ धड़ाम करके गिर गया।'

'बस, एक गिलास दूध, चार-टोस्ट और मक्खन, पौरिज और दो अंडे।' उन्होंने एक लंबी सांस खींची, जैसे गुब्बारे में से हवा निकल गयी हो।
'नहीं, मैं आपसे एग्री नहीं करता, फ्रूट जूस बहुत ज़रूरी है। बिना. . .।'
'फ्रूट जूस?' वह बोले? 'नहीं अगर दूध हो तो उसकी ज़रूरत नहीं है।'
'पराठे और अंडे का नाश्ता कैसा रहेगा?'

'वैरी गुड, लेकिन परांठे हलके और नर्म हों।'
'और अगर नाश्ते में केक हो?' वह सपाट और फीकी हंसी हंसे।

कई साल हुए। मेरे दिल्ली आने के आसपास। डेविड साहब ने अपनी बर्थ डे पर केक बनवाया था। पहले पूरा बजट तैयार कर लिया गया था। सब खर्च जोड़कर कुल सत्तर रुपये होते थे। पहली तारीख को डेविड साहब मैदा, शक्कर और मेवा लेने खारीबावली गये थे। सारा सामान घर में फिर से तौला गया था। फिर अच्छे बेकर का पता लगाया गया था। डेविड साहब के कई दोस्तों ने दरियागंज के एक बेकर की तारीफ़ की तो वह उससे एक दिन बात करने गये बिलकुल उसी तरह जैसे दो देशों के प्रधनमंत्री गंभीर समस्याओं पर बातचीत करते हैं। डेविड साहब ने उसके सामने एक ऐसा प्रश्न रख दिया किया वह लाजवाब हो गया, 'अगर तुमने सारा सामान केक में न डाला और कुछ बचा लिया तो मुझे कैसे पता चलेगा?` इस समस्या का समाधान भी उन्होंने खुद खोज लिया। कोई ऐसा आदमी मिले जो बेकर के पास उस समय तक बैठा रहे, जब तक कि केक बनकर तैयार न हो जाये। डेविड साहब को मिसेज़ डिसूजा ने इस काम के लिए अपने-आपको कई बार 'ऑफ़र` किया। मगर वास्तव में डेविड साहब को मिसेज़ डिसूजा पर भी एतबार नहीं था। हो सकता है बेकर और मिसेज़ डिसूजा मिलकर डेविड साहब को चोट दे दें। जब पूरी दिल्ली में 'मोतबिर` आदमी नहीं मिला तो डेविड साहब ने एक दिन की छुट्टी ली। मैंने इस काम में कोई रुचि नहीं दिखायी थी, इसलिए उन दिनों मुझसे नाराज़ थे और पीठ पीछे उन्होंने मिसेज़ डिसूजा से कई बार कहा कि जानता ही नहीं 'केक` क्या होता है। मैं जानता था कि 'केक` बन जाने के बाद किसी भी रात को खाने के बाद मुर्गी खाना खोलने वाली बात करके डेविड साहब को खुश किया जा सकता है या उनके दोस्त के बारे में बात करके उन्हें उत्साहित किया जा सकता है, जिसका मिर्जापुर के पास बड़ा फार्म है और वह वहां कैसे रहता है।


केक बर्थ डे से एक दिन पहले आ गया था। अब उसे रखने की समस्या थी। मिसेज़ डिसूजा के घर में चूहे ज़रूरत से ज्यादा हैं। इस आड़े वक्त में मैंने उनकी मदद की। अपने टीन के बक्स में से कपड़े निकालकर तौलिये में लपेटकर मेज़ पर रख दिये और बक्स में केक रख दिया गया। मेरा बक्स पूरे एक महीने घिरा रहा।

हम सबको उस केक के बारे में बातचीत कर लेना बहुत अच्छा लगता है। डेविड साहब तो उसे अपना सबसे बड़ा 'एचीवमेंट` मानते हैं। और मैं अपने बक्स को खाली कर देना कोई छोटा कारनामा नहीं समझता। उसके बाद से लेकर अब तक केक बनवाने के कई प्रोग्राम बन चुके हैं। अब डेविड साहब की शर्त यह होती है कि सब 'शेयर` करें। ज्यादा मूड में आते हैं तो आध खर्च उठाने पर तैयार हो जाते हैं।

उन्हीं के अनुसार, बचपन से उन्हें दो चीज़ें पंसद रही हैं जॉली और केक। जॉली की शादी किसी कैप्टन से हो गयी, तो वह धीरे-धीरे उसे भूलते गये। पर केक अब भी पसंद है। केक के साथ कौन शादी कर सकता है? लेकिन खारी-बावली के कई चक्कर लगाने पर उन्होंने महसूस किया कि केक की भी शादी हो सकती है। फिर भी पसंद करना बंद न कर सके।


दफ़्त़र से लौटकर आया तो सारा बदन इस तरह दर्द कर रहा था, जैसे बुरी तरह से मारा गया हो। बाहरी दरवाज़ा खोलने के लए मिसेज़ डिसूजा आयीं। वह शायद किचन में अपने खटोले पर सो रही थीं। अंदर आंगन में उनके गुप्त वस्त्र सूख रहे थे। 'गुप्त वस्त्र` शब्द सोचकर हंसी आयी। कोई अंग गुप्त ही कहां रह गया है! डी.टी.सी. की बसों में चढ़ते-उतरते गुप्त अंगों के भूगोल का अच्छा-खासा ज्ञान हो गया है। उनकी गरमाहट, चिकनाई, खुदरेपन, गंदेपन और लुभावनेपन के बारे में अच्छी जानकारी है। 'आज जल्दी चले आये।` मिसेज़ डिसूजा 'गुप्त वस्त्र` उतारने लगीं, 'चाय पीयोगे?` मैंने अभी तक नहीं पी है।`

'हां, जरूर।' सोचा अगर साली ने पी ली होती तो कभी न पूछती।
कमरे के अंदर चला आया। पत्थर की छत के नीचे खाने की मेज़ है। जिसके एक पाये की जगह ईंटें लगी हैं। दूसरे पायों को टीन की पट्टियों से जकड़ कर कीलें ठोंक दी गयी हैं। रस्सी, टीन, लोहा, तार और ईंटों के सहारे खड़ी मेज़ पहली नज़र में आदिकालीन मशीन-सी लगती है। मेज़ के उपर मिसेज़ डिसूजा की सिलाई मशीन रखी है। खाना खाते समय मशीन को उठाकर मेज़ के नीचे रख दिया जाता है। खाने के बाद मशीन फिर मेज़ पर आ जाती है। रात में डेविड साहब इसी मेज पर बैठकर प्रूफ़ देखते हैं। कई गिलास पानी पीते हैं और एक बजते-बजते उठते हैं तो कमरा अकेला हो जाता है। मैं कमरे में रखी सिलाई मशीन या मेज़ की तरह कमरे का एक हिस्सा बन जाता हूं।

'ये लो टी, ग्रीनलेबुल है!' मिसेज़ डिसूजा ने चाय की प्याली थमा दी। वह खानों के नाम अंग्रेज़ी में लेती है। रोटी को ब्रेड कहती है, दाल को पता नहीं क्यों उन्होंने सूप कहना शुरू कर दिया है। तरकारी को 'बॉयल्ड वेजिटेबुल्स` कहती हैं। करेलों को 'हॉटडिश` कहती हैं। मिसेज़ डिसूजा थोड़ी बहुत गोराशाही अंग्रेज़ी भी बोल लेती हैं, जिससे मोहल्ले के लोग काफ़ी प्रभावित होते हैं। मैंने टी ताजमहल ले ली। मिसेज़ डिसूजा आज के जमाने की तुलना पहले जमाने से करने लगीं। उन्हें चालीस साल तक पुराने दाम याद हैं। इसके बाद अपने मकान की चर्चा उनका प्रिय विषय है, जिसका सीधा मतलब हम लोगों पर रोब डालना होता है। वैसे रोब, डालते वक्त यह भूल जाया करती हैं कि दोनों कमरे किराये पर उठा देने के बाद वह स्वयं किचन में सोती हैं। मैं उनकी बकवास से तंग आकर बाथरूम में चला गया। अगर डेविड साहब होते तो मजा आता। मिसेज़ डिसूजा मुंह खोलकर और आंखें फाड़कर मुर्गी-पालन की बारीकियों को समझने का प्रयत्न करतीं। ' याद नहीं, सिर्फ दो हज़ार रुपये से काम शुरू करे कोई। चार सौ मुर्गियों से शानदार काम चालू हो सकता है। चार सौ अंडे रोज़ का मतलब है कम-से-कम सौ रुपये रोज़। एक महीने में तीन हज़ार रुपये और एक साल में छत्तीस हज़ार रुपये। मैं तो आंटी, लाइफ में कभी-न-कभी ज़रूर करूंगा कारोबार। फायदा. . .? मैं कहता हूं चार साल में लखपति। फिर अंडे, मुर्गीखाने का आराम अलग। रोज़ एक मुर्गी काटिये साले को। बीस अंड़ों की पुडिंग बनाइए। तब यह मकान आप छोड़ दीजिएगा, आंटी। यह भी कोई आदमियों के रहने लायक मकान है। फिर तो महारानी बाग या बसंत विहार में कोठी बनवाइएगा। एक गाड़ी ले लीजिएगा।`


तब थोड़ी देर के लिए वे दोनों 'बसंत विहार` पहुंच जाया करते। बड़ी-सी कोठी के फाटक की दाहिनी तरफ़ पीतल की चमचमाती हुई प्लेट पर एरिक डेविड और मिसेज़ जे. डिसूजा के अक्षर इस तरह चमकते जैसे छोटा-मोटा सूरज।

मैं लौटकर आया तो डेविड साहब आ चुके थे। कपड़े बदलकर आंगन में बैठे वह बासु को थोक में गालियां दे रहे थे, 'यह साला बासु इस लायक है कि इसका 'पब्लिक ट्रायल` किया जाये।' उनकी आंखों में नफ़रत और उकताहट थी। चश्मा थोड़ा नीचे खिसक गया था। उन्होंने अपनी गर्दन अकड़ाकर चश्मा चेहरे पर फिट किया। मैंने तिलक ब्रिज के सामने एक पेड़ की बड़ी-सी डाल पर रस्से के सहारे बासु की लाश को झूलते हुए देखा। लहरें मारती भीड़-अथाह भीड़। और कुछ ही क्षण बाद डेविड साहब को एक नन्हें से मुर्गीखाने में बंद पाया। चारों ओर जालियां लगी हुई हैं। और उसके अंदर दो सौ मुर्गियों के साथ डेविड साहब दाना चुग रहे हैं। गर्दन डालकर पानी पी रहे हैं और अंडे दे रहे हैं। अंडों के एक ढेर पर बैठे हैं। मुर्गीखाने की जालियों से बाहर 'बसंत विहार` साफ दिखाई पड़ रहा है।


मैंने कहा, 'आप क्यों परेशान हैं डेविड साहब? छोड़िए साली नौकरी को। एक मुर्गीखाना खोल लीजिए। फिर बसंत विहार में मकान।'

'नहीं-नहीं, मैं बसंत विहार में मकान नहीं बनवा कसता। वहां तो बासु का मकान बन रहा है। भाई साहब, यह तो दावा है कि इस देश में बगैर चार सौ बीसी किये कोई आदमी की तरह नहीं रह सकता। आदमियों की तरह रहने के लिए आपको ब्लैक मार्केर्टिंग करनी पड़ेगी लोगों को एक्सप्लायट करना पड़ेगा. . .अब आप सोचिए, मैं किसी साले से कम काम करता हूं। रोज़ आठ घंटे ड्यूटी और दो घंटे बस के इंतजार में. . .।'

'तुम बहुत गाली बकते हो,' मिसेज़ डिसूजा बोलीं।
'फिर क्या करूं आंटी? गाली न बकूं तो क्या ईशू से प्रार्थना करूं, जिसने कम-से-कम मेरे साथ बड़ा 'जोक` किया है?'

'छोड़िए यार डेविड साहब। कुछ और बात कीजिए। कहीं प्रूफ़ का काम ज्यादा तो नहीं मिला।'

'ठीक है, छोड़िए। दिल्ली में अभी तीन साल हुए हैं न! कुछ जवानी भी है। अभी शायद आपने दिल्ली की चमक-दमक भी नहीं देखी? क्या हमारा कुछ भी हिस्सा नहीं है उसमें? कनाट प्लेस में बहते हुए पैसे को देखा है कभी?' वह हाथ चला-चलाकर पैसे के बहास के बारे में बताने लगे, 'लाखों-करोड़ों रुपये लोग उड़ा रहे हैं। औरतों के जिस्मों पर से बहता पैसा। कारों की शक्ल में तैरता हुआ।' वह उत्तेजित हो गये, और उन्होंने जेब से चश्मा निकाला, गर्दन अकड़ायी और चश्मा आंखों पर फिट कर लिया।

मुझे उकताहट होने लगी। तबीयत घबराने लगी, जैसे उमस एकदम बैठ गयी हो। सांस लेने में तकलीफ होने लगी। लोहे का सलाखोंदार कमरा मुर्गीखाना लगने लगा जिसमें सख्त बदबूभर गयी हो। मिसेज़ डिसूजा कई बार भविष्यवाणी कर चुकी हैं कि डेविड साहब एक दिन हम लोगों को एरेस्ट करवायेंगे और डेविड साहब कहते हैं कि मैं उस दिन का 'वेलकम` करूंगा।

गुस्से में लगातार होंठ दबाये रहने के कारण उनका निचला होंठ काफी मोटा हो गया है। चेहरे पर तीन लकीरें पड़ जाती हैं। बचपन में सुना करते थे कि माथे पर तीन लकीरें पड़ने वाला राजा होता है।

कुछ ही देर में वह काफ़ी शांत हो चुके थे। खाने की मेज़ पर उन्होंने 'बासु की जय` पर नारा लगाया और दो गिलास पानी पी गये। मिसेज़ डिसूजा की 'हॉटडिश`, 'सूप` और 'ब्रेड` तैयार थी।

'करेले की सब्जी पकाना भी आर्ट है, साब!' डेविड साहब ने जोर-जोर से मुंह चलाया।

'तीन डिश के बराबर एक डिश है।' मिसेज़ डिसूजा ने एहसान लादा।

डेविड उनकी बात अनसुनी करते हुए बोले, 'करेले खाने का मज़ा तो सीतापुर में आता था आंटी। कोठी के पीछे किचन गार्डन में डैडी तरह-तरह की सब्जी बुआते थे। ढेर सारी प्याज के साथ इन केरेलों में अगर कीमा भरकर पकाया जाये तो क्या कहना!'

हम लोग समझ गये कि अब डेविड साहब बचपन के किस्से सुनायेंगे। इन किस्सों के बीच नसीबन गवर्नेस का ज़िक्र भी आयेगा जो केवल एक रुपया महीना तनख्व़ाह पाकर भी कितनी प्रसन्न रहा करती थी। और जिसका मुख्य काम डेविड बाबा की देखभाल को दीपक बाबा ही कहती रही। इसी सिलसिले में उस पिकनिक पार्टी का जिक्र आयेगा जिसमें डेविड बाबा ने जमुना के स्लोप पर गाड़ी चढ़ा दी थी। तजुर्बेकार ड्राइवर इस्माइल खां को पसीना छूट आया था। खां को डांटकर गाड़ी से उतार दिया था। सब लड़के और लड़कियां उतर गये। अंग्रेज़ लड़के की हिम्मत छूट गयी थी। परंतु जॉली ने उतरने से इंकार कर दिया था। डेविड बाबा ने गाड़ी स्टार्ट की। दो मिनट सोचा। गियर बदलकर एक्सीलेटर पर दबाव डाला और गाड़ी एक फर्राटे के साथ उपर चढ़ गयी। इस्माइल खां ने उपर आकर डेविड बाबा के हाथ चूम लिये थे। वह बड़े-बड़े अंग्रेज़ अफ़सरों को गाड़ी चलाते देख चुका था मगर डेविड बाबा ने कमाल ही कर दिया था। जॉली ने डेविड बाबा को उसी दिन 'किस` देने का प्रामिस किया था।

इन बातों को सुनाते समय डेविड साहब की बिटरनेस गायब हो जाती है। वह डेविड साहब नहीं, दीपक बाबा लगते हैं। हलकी-सी धूल उड़ती है और सीतापुर की सिविल लाइंस पर बनी बड़ी-सी कोठी के फाटक में १९३० की फोर्ड मुड़ जाती है। फाटक के एक खंभे पर साफ अक्षरों में लिखा हुआ है पीटर जे. डेविड, डिप्टी कलेक्टर। कोठी की छत खपरैलों की बनी हुई है। कोठी के चारों ओर कई बीघे का कंपाउंड। पीछे आम और संतरे का बाग। दाहिनी तरफ़ टेनिस कोर्ट की बायीं तऱफ बड़ा-सा किचन गार्डन, कोठी के उंचे बरामदे में बावर्दी चपरासी उंघता हुआ दिखाई पड़ेगा। अंदर हाल में विक्टोरियन फ़र्नीचर और छत पर लटकता हुआ हाथ से खींचने वाला पंखा। दोपहर में पंखा-कुली पंखा खींचते-खींचते उंघ जाता है तो मिस्टर पीटर जे.डेविड डिप्टी कलेक्टर अपने विलायती जूतों की ठोकरों से उसके काले बदन पर नीले रंग के फल उगा देते हैं। बाबा लोग टाई बांधकर खाने की मेज़ पर बैठकर चिकन सूप पीते हैं। खाना खाने के बाद आइसक्रीम खाते हैं और मम्मी-डैडी को गुडनाइट कहकर अपने कमरे में चले जाते हैं। साढ़े नौ बजे के आस-पास १९३० की फोर्ड गाड़ी फिर स्टार्ट होती है। अब वह या तो क्लब चली जाती है या किसी देशी रईस की कोठी के अंदर घुसकर आधी रात को डगमगाती हुई लौटती है।

मिसेज़ डिसूजा के मकान की छत के उपर से दिल्ली की रोशनियां दिखाई पड़ती हैं। सैकड़ों जंगली जानवरों की आंखें रात में चमक उठती है। पानी पीने के लिए नीचे आता हूं तो डेविड साहब प्रूफ़ पढ़ रहे हैं। मुझे देखकर मुस्कराते हैं, कलम बंद कर देते हैं और बैठने के लिए कहते हैं। आंखों में नींद भरी हुई है। वह मुझे धीरे-धीरे समझाते हैं। उनके इस समझाने से मैं तंग आ गया हूं। शुरू-शुरू में तो मैं उनको उल्लू का पट्ठा समझता था, परंतु बाद में पता नहीं क्यों उनकी बातें मेरे उपर असर करने लगीं। 'भाग जाओ इस शहर से। जितनी जल्दी हो सके, भाग जाओ। मैं भी तुम्हारी तरह कॉलेज से निकलकर सीधे इस शहर में आ गया था राजधनी जीतने। लेकिन देख रहे हो, कुछ नहीं है इस शहर में, कुछ नहीं। मेरी बात छोड़ दो। मैं कहां चला जाउं! गांड़ के रास्ते यह शहर मेरे अंदर घुस चुका है।'


'लेकिन कब तक कुछ नहीं होगा, डेविड साहब?'
'उस वक्त तक, जब तक तुम्हारे पास देने के लिए कुछ नहीं है। और मैं जानता हूं, तुम्हारे पास वह सब कुछ नहीं है जो लोगों को दिया जा सकता है।'

मैं लौटकर उपर आ जाता हूं। मेरे पास क्या है देने के लिए? उंची कुर्सियां, कॉकटेल पार्टियां, लंबे-चौड़े लान, अंग्रेज़ी में अभिवादन, सूट और टाइयां, लड़कियां, मोटरें, शॉपिंग! तब ये लोग, जो तंग गलियारों में मुझसे वायदे करते हैं, मुस्कुराते हैं, कौन हैं? इसके बारे में फिर सोचना पड़ेगा। और काफ़ी देर तक फिर मैं सोचने का साहस जुटाता हूं। परंतु वह पीछे हटता जाता है। मैं उसकी बांहें पकड़कर आगे घसीटता हूं। एक बिगड़े हुए खच्चर की तरह वह अपनी रस्सी तुड़ाकर भाग निकलता है।


मैं फिर पानी के लिए नीचे उतरता हूं। अपनी मेज़ पर सिर रखे वह सो रहे हैं। प्रूफ़ का पुलिंदा सामने पड़ा है। मैं उसका कंधा पकड़कर लगा देता हूं। 'अब सो जाइए। कल आपको साइट देखने जाना है।` उनके चेहरे पर मुस्कराहट आती है। कल वह मुर्गीखाना खोलने की साइट देखने जा रहे हैं। इससे पहले भी हम लोग कई साइट देख चुके हैं। डेविड साहब उठकर पानी पीते हैं। फिर अपने पलंग पर इस तरह गिर पड़ते हैं जैसे राजधनी के पैरों पर पड़ गये हों। मैं फिर उपर आकर लेट जाता हूं। 'मैंने कॉलेज में इतना पढ़ा ही क्यों? इतना और उतना की बात नहीं है, मुझे कॉलेज में पढ़ना ही नहीं चाहिए था और अब दो साल तक ढाई सौ रुपये की नौकरी करते हुए क्या किया जा सकता है? क्यों मुस्कराता और क्यों शांत रहा? दो साल से दोपहर का खाना गोल करते रहने के पीछे क्या था?` नीचे से भैंस के हगने की आवाज़ आती है। एक परिचित गंध फैल जाती है। उस अर्द्धपरिचित कस्बे की गंध, जिसे मैं अपना घर समझता हूं, जहां मुझे बहुत ही कम लोग जानते हैं। उस छोटे से स्टेशन पर यदि मैं उतरूं तो गाड़ी चली जाने के बाद कई लोग मुझे घूर कर देखेंगे। और इक्का-दुक्का इक्के वाले भी मुझसे बात करते डरेंगे। उनका डर दूर करने के लिए मुझे अपना परिचय देना पड़ेगा। अर्थात अपने पिता का परिचय देना पड़ेगा। तब उनके चेहरे पर मुस्कराहट आयेगी और वे मुझे इक्के पर बैठने के लिए कहेंगे। इस मिनट इक्का चलता रहेगा तो सारी बस्ती समाप्त हो जायेगी। उस पार खेत हैं जिनका सीधा मतलब है उस पर गरीबी है। वे गरीबी के अभ्यस्त हैं। पुलिस उनके लिए सर्वशक्तिमान है और अपनी हर होशियारी में वे काफी मूर्ख हैं. . .उपर आसमान में पालम की ओर जाने वाले हवाई जहाज की संयत आवाज सुनाई पड़ती है। नीचे सड़क पार बालू वाले ट्रक गुजर रहे हैं। लदी हुई बालू के उपर मजदूर सो रहे हैं, जो कभी-कभी किसान बन जाने का स्वप्न देख लेते हैं, अपने गांव की बात करते हैं, अपने खेतों की बात करते हैं, जो कभी उनके थे। ट्रक तेजी से चलता हुआ ओखला मोड़ से मथुरा रोड पर मुड़ जायेगा। फ्रेंड्स कालोनी और आश्रम होता हुआ 'राजदूत` होटल के सामने से गुजरेगा जहां रात-भर कैबरे और रेस्तरां के विज्ञापन नियॉनलाइट में जलते बुझते रहते हैं। उसी के सामने फुटपाथ पर बहुत से दुबले-पतले, काले और सूखे आदमी सोते हुए मिलेंगे, जिनकी नींद ट्रक की कर्कश आवाज़ से भी नहीं खुलती। उपर तेज बल्ब की रोशनी में उनके अंग-प्रत्यंग बिखरे दिखाई पड़ते हैं। मैं अक्सर हैरान रहता हूं कि वे इस चौड़े फुटपाथ पर छत क्यों नहीं डाल लेते। उसके चारों ओर, कच्ची ही सही, दीवार तो उठाई जा सकती है। इन सब बातों पर सरसरी निगाह डाली जाये, जैसी कि हमारी आदत है, तो इनका कोई महत्व नहीं है। बेवकूफी और भावुकता से भरी बातें। परंतु यदि कोई उपर से कीड़े की तरह फुटपाथ पर टपक पड़े तो उसका समझ में सब कुछ आ जायेगा।


दिन इस तरह गुजरते हैं जैसे कोई लंगड़ा आदमी चलता है। अब इस महानगरी में अपने बहुत साधरण और असहाय होने का भाव सब कुछ करवा लेता है। और अपमान, जो इस महानगर में लोग तफरीहन कर देते हैं, अब उतने बुरे नहीं लगते, जितने पहले लगते थे। ऑफिस में अधिकारी की मेज़ पर तिवारी का सुअर की तरह गंदा मुंह, जो एक ही समय में पक्का समाजवादी भी है और प्रो-अमरीकन भी। उसकी तंग बुशर्ट में से झांकता हुआ हराम की कमाई का पला तंदुरुस्त जिस्म और उसकी समाजवादी लेखनी जो हर दूसरी पंक्ति केवल इसलिए काट देती है कि वह दूसरे की लिखी हुई है। उसका रोब-दाब, गंभीर हंसी, षड्यंत्र-भरी मुस्कान और उसकी मेज़ के सामने उसके साम्राज्य में बैठे हुए चार निरीह प्राणी, जो कलम घिसने के अलावा और कुछ नहीं जानते। उन लोगों के चेहरे के टाइपराइटरों की खड़खड़ाहट। इन सब चीज़ों को मुट्ठी में दबाकर 'क्रश` कर देने को जी चाहता है। भूख भी कमबख्त लगती है तो इस जैसे सोरे शहर का खाना खाकर ही खत्म होगी। शुरू में पेट गड़गड़ाता है। यदि डेविड साहब होते तो बात यहीं ये झटक लेते, 'जी, नहीं, भूख जब ज़ोर से लगती है तो ऐसा लगता है जैसे बिल्लियां लड़ रही हों। फिर पेट में हलका-सा दर्द शुरू होता है जो शुरू में मीठा लगता है। फिर दर्द तेज़ हो जाता है। उस समय यदि आप तीन-चार गिलास पानी पी लें तो पेट कुछ समय के लिए शांत हो जायेगा और आप दो-एक घंटा कोई भी काम कर सकते हैं। इतना सब कुछ कहने के बाद वह अवश्य सलाह देंगे कि इस महानगरी में भूखों मरने से अच्छा है कि मैं लौट जाउं। लेकिन यहां से निकलकर वहां जाने का मतलब है एक गरीबी और भुखमरी से निकलकर दूसरी भुखमरी में फंस जाना। इसी तरह की बहुत सारी बातें एक साथ दिमाग में कबड्डी खेलती रहती हैं। तंग आकर ऐसे मौके पर डेविड साहब से पूछता हूं, 'ग्रेटर कैलाश की मार्केट चल रहे हैं?' वह मुस्कराते हैं और कहते हैं, 'अच्छा, तैयार हो जाउं।' मैं जानता हूं उनके तैयार हाने में काफ़ी समय लगेगा। इसलिए मैं बड़े प्रेम से जूते पॉलिश करता हूं। एक मैला कपड़ा लेकर जूते की घिसाई करता हूं। जूते में अपनी शक्ल देख सकता हूं। टिपटाप होकर डेविड साहब से पूछता हूं, 'तैयार हैं?'


हम दोनों बस स्टाप की तरफ़ जाते हुए एक-दूसरे के जूते देखकर उत्साहित होते हैं। एक अजीब तरह का साहस आ जाता है।

ग्रेटर कैलाश की मार्किट की हर दूकान का नाम हमें जबानी याद है। बस से उतरकर हम पेशाबखाने में जाकर अपने बाल ठीक करते हैं। वह मेरी ओर देखते हैं। मैं फर्नीचर की ओर देखता हूं। दो जोड़ा चमचमाते जूते बरामदे में घूमते हैं। मैं फर्नीचर की दूकान के सामने रुक जाता हूं। थोड़ी देर तक देखता रहता हूं। डेविड साहब अंदर चलने के लिए कहते हैं और मैं सारा साहब बटोर कर अंदर घुस जाता हूं। यहां के लोग बड़े सभ्य हैं। एक वाक्य में दो बार 'सर` बोलते हैं। चमकदार जूते दूकान के अंदर टहलते हैं। डेविड साहब यहां कमाल की अंग्रेज़ी बोलते हैं कंधे उचकाकर और आंखें निकालकर। चीज़ों को इस प्रकार देखते हैं जैसे वे काफी घटिया हों। मैं ऐसे मौकों पर उनसे प्रभावित होकर उन्हीं की तरह बिहेव करने की कोशिश करता हूं।


कंफेक्शनरी की दूकान के सामने वह बहुत देर तक रुकते हैं। शो-विंडो में सब कुछ सजा हुआ है। पहली बार में भ्रम हो सकता है कि सारा सामान दिखावटी है, मिट्टी का, परंतु निश्चय ही ऐसा नहीं है।


'जल्दी चलिए। साला देखकर मुस्करा रहा है।'
'कौन?' डेविड साहब पूछते हैं, मैं आंख से दूकान के अंदर इशारा करता हूं और वह अचानक दूकान के अंदर घुस जाते हैं। मैं हिचकिचाहट बरामदे में आगे बढ़ जाता हूं। 'पकड़े गये बेटा! बड़े लाटसाहब की औलाद बने फिरते हैं। उनकी जेब में दस पैसे का बस का टिकट और कुल साठ पैसे निकलते हैं। सारे लोग हंस रहे हैं। डेविड साहब ने चमचमाता जूता उतारकर हाथ में पकड़ा और दूकान में भागे।` मैं साहस करके दूकान के अंदर जाता हूं। डेविड साहब दूकानदार से बहुत फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोल रहे हैं और वह बेचारा घबरा रहा है। मैं खुश होता हूं। 'ले साले, कर दिया न डेविड साहब ने डंडा! बड़ा मुस्करा रहे थे।` डेविड साहब अंग्रेजी में उससे ऐसा केक मांग रहे हैं जिसका नाम उसके बाप, दादा, परदादा ने भी कभी न सुना होगा।

बाहर निकलकर डेविड साहब ने मेरे कंधे पर हाथ रख दिया।
रोज़ की तरह खाने की मेज़ पर यहां से वहां तक विलायती खाने सजे हुए हैं। मिसेज़ डिसूजा का मूड़ कुछ आफ है। कारण केवल इतना है कि मैं इस महीने की पहली तारीख को पैसा नहीं दे पाया हूं। एक-आध दिन मुंह फला रहेगा। फिर वे महंगाई के किस्से सुनाने लगेंगी। चीजों की बढ़ती कीमतें सुनते हम लोग तंग जा जायेंगे।

बात करने के लिए कुछ जरूरी था और चुप टूटती नहीं लग रही थी, तो मिसेज़ डिसूजा ने पूछा, 'आज तुम डिफेंस कॉलोनी जाने वाले थे?'

'नहीं जा सकता,' डेविड साहब ने मुंह उठाकर कहा।

'अब तुम्हारा सामान कैसे आयेगा?' मिसेज़ डिसूजा बड़बड़ायीं, 'बेचारी कैथी ने कितनी मुहब्बत से भेजा है।'

'मुहब्बत से भिजवाया है आंटी?' डेविड साहब चौंके, 'आंटी, उसका हस्बैंड दो हज़ार रुपये कमाता है। कैथी एक दिन बाज़ार गयी होगी। सवा सौ रुपये की एक घड़ी और दो कमीजें खरीद ली होंगी। और डीनू के हाथ दिल्ली भिजवा दीं। इसमें मुहब्बत कहां से आ गयी?'

'मगर तुम उन्हें जाकर ले तो जाओ।'

'डीनू उस सामान को यहां ला सकता है।'
डीनू का डिफेंस कालोनी में अपना मकान है। कार है। डेविड साहब का बचपन का दोस्त है। वह उस शिकार पार्टी में भी था, जिसमें हाथी पर बैठकर डेविड साहब ने प्लाइंग शॉट में चार गाजें गिरा दी थीं।

'डिफेंस कॉलोनी से यहां आना दूर पड़ेगा। और वह बिजी आदमी है।'
'मैं बिज़ी प्रूफ़रीडर नहीं हूं?' वह हंसे, 'और वह तो अपनी काम से आ सकता है, जबकि मुझे दो बसें बदलनी पड़ेंगी।' वह दाल-चावल इस तरह खा रहे थे, जैसे 'केक` की याद में हस्तमैथुन कर रहे हों।

'जैसी तुम्हारी मर्जी।'

खाना खत्म होने पर कुछ देर के लिए महफिल जम गयी। मिसेज़ डिसूजा पता नहीं कहां से उस बड़े जमींदार का जिक्र ले बैठीं जो जवानी के दिनों में उन पर दिलोजान से आशिक था, और उनके अवकाश प्राप्त कर लेने के बाद भी एक दिन पता लगाता हुआ दिल्ली के उनके घर आया था। वह पहला दिन था जब इस मकान के सामने सेकेंड-हैंड एंबेसडर खड़ी हुई थी और डेविड साहब को किचन में सोना पड़ा था। उस जमींदार का जिक्र डेविड साहब को बड़ा भाता है। मैं तो फौरन उस जमींदार की जगह अपने-आपको 'फिट` करके स्थिति का पूरा मज़ा उठाने लगता हूं।

कुछ देर बाद इधर-उधर घूम-घामकर बात फिर खानों पर आ गयी। डेविड साहब सेंवई पकाने की तरकीब बताने लगे। फिर सबने अपने-अपने प्रिय खानों के बारे में बात की। सबसे ज्यादा डेविड साहब बोले।

खाने की बात समाप्त हुई तो मैंने धीरे से कहा, 'यार डेविड साहब, इस गांव में कोई लड़की ऐसी नज़र पड़ जाती है कि पांव कांपने लगते हैं।'
'कैसी थी, मुझे बताओ? छिद्दू की बहू होगी या. . .।'

'बस डेविड, तुम लड़कियों की बात न किया करो। मैंने कितनी खूबसूरत लड़की से तुम्हारा 'इंगेजमेंट` तय किया था।'
'क्या खूबसूरती की बात करती हैं आंटी! अगर जॉली को आपने देखा होता. . .।'

'जॉली? खैर, उसको तो मैंने नहीं देखा। तुमने अगर मेरी लड़की को देखा होता।' उनकी आंखें डबडबा आयीं, 'मगर वह हज. . .' कुछ देर बाद बोलीं, 'अगर अब वह होती तो यह दिन न देखना पड़ता। मैं उसकी शादी किसी मिलिटरी अफ़सर से कर देती। उससे तो कोई भी शादी कर सकता था।'

कुछ ठहर कर डेविड साहब से बोली, 'तुम शादी क्यों नहीं कर लेते डेविड?'

'मैं शादी कैसे कर लूं आंटी? दो सौ पचहत्तर रुपये इक्कीस पैसे से एक पेट नहीं भरता। एक और लड़की की जान लेने से क्या फायदा। मेरी जिंदगी तो गुजर ही जायेगी। मगर मैं यह नहीं चाहता कि अपने पीछे एक गरीब औरत और दो तीन प्रूफ़रीडर छोड़कर मर जाउं जो दिन-रात मशीनों की कान फाड़ देने वाली आवाज़ बैठकर आंखें फोड़ा करें।' वह कुछ रुके, 'यही बात मैं इनसे कहता हूं।' उन्होंने मेरी ओर संकेत किया, 'इस आदमी के पास गांव में थोड़ी-सी ज़मीन है जहां गेहूं और धन की फसल होती है। इसको चाहिए कि अपने खेत के पास एक कच्चा घर बना ले। उसके सामने एक छप्पर डाल ले, बस, उस पर लौकी की बेल चढ़ानी पडेग़ी। देहात में आराम से एक भैंस पाली जा सकती है। कुछ दिनों बाद मुर्गीखाना खोल सकते हैं। खाने और रहने की फिक्र नहीं रह जायेगी। ठाठ से काम करे और खायें।'

'उसके बाद आप वहां आइएगा तो 'केक` बनाया जायेगा। बहुत से अंडे मिलाकर'
मैंने मजाक किया।
दीपक बाबा हंसने लगे। बिलकुल बच्चों की-सी मासूम हंसी।
***-***

2 सरगम-कोला

जैसे कुत्तों के लिए कातिक का मौसम होता है वैसे ही कला और संस्कृति के लिए जोड़ का मौसम होता है दिल्ली में, गोरी चमड़ी वाले पर्यटक भरे रहते हैं खलखलाते, उबलते, चहकते, रिझाते, लबालब हमारी संस्कृति से सबसे बड़े खरीदार और इसीलिए पारखी। बड़े घरों की महिलाएं लिपी-पुती कलैंडर आर्ट जिससे घृणा करने का कोई कारण नहीं है, जाड़े की शामें किसी आर्ट गैलरी और नाटक देखने में गुजारना पसंद करती हैं। जाड़ा कला और संस्कृति का मौसम है।


सूरज जल्दी डूब जाता है और नर्म मुलायम गर्म कपड़ों से टकराती ताजगी देने वाली हवा आर्ट गैलरियों और आडीटोरियमों के आसपास महक जाती है? ऐसी सुगंध जो नामर्द को मर्द बना दे और मर्द को नामर्द। लोग कला और संस्कृति में डूब जाते हैं। कला और संस्कृति लोगों में डूब जाती है।

म्यूज़िक कांफ्रेंस के गेट पर चार सिपाही खड़े थे। ऊबे, उकताये डंडे लिये। उनके पीछे दो इंस्पेक्टर खड़े थे, गर्दन अकड़ाये क्योंकि उनके सामने चार सिपाही खड़े थे। फिर दो सूटधरी थे। सूटधरियों के सूट एक से थे। बनवाये गये होंगे। सूटधरी काफी मिलती-जुलती शक्ल के थे। काफी मुश्किल से खोजे गये होंगे।

गेट के सामने बजरी पड़ा रास्ता था। बजरी भी डाली गयी होगी। फलों के गमले जमीन के अंदर गाड़ दिये गये थे। न जानने वालों को अचंभा होता था कि ऊसर में फल उग आये हैं। उपर कागज के सफेद फलों की चादर-सी तानी गयी थी जो कुछ साल पहले तक-कागज के फलों की नहीं, असली फलों की, पीरों, फकीरों की मज़ारों पर तानी जाती थी। फिर शादी विवाह में लगायी जाने लगी। दोनों तरफ गिलाफ चढ़े बांस के खंभे थे। इन गिलाफ चढ़े बांसों पर ट्यूब लाइटें लगीं थीं। इसी रास्तें से अंदर जाने वाले जा रहे थे। दासगुप्ता को गेट के बिलकुल सामने खड़े होने पर केवल इतना ही दिखाई दे रहा था। जाने वाले दिखाई दे रहे थे, जो ऊंचे-ऊंचे जूतों पर अपने कद को और ऊंचा दिखाने की नाकाम कोशिश में इस तरह लापरवाही से टहलते अंदर जा रहे थे जैसे पूरा आयोजन उन्हीं के लिए किया गया हो। अधेड़ उम्र की औरतें थीं जिनकी शक्लें विलायती कास्मेटिक्स ने वीभत्स बना दी थीं। लाल साड़ी, लाल आई शैडो, नीली साड़ी, नीली आई शैडो, काली के साथ काला. . .पीली के साथ पीला। जापानी साड़ियों के पल्लू को लपेटने की कोशिश में और अपने अधखुले सीने दिखाती, कश्मीरी शालों को लटकने से बचाती या सिर्फ सामने देखती. . .या जीन्स और जैकेट में खट-खट खट-खट। सम्पन्नता की यही निशानियां हैं। दासगुप्ता ने मन-ही-मन सोचा। गंभीर, भयानक रूप से गंभीर चेहरे, आत्म संतोष से तमतमाये. . .गर्व से तेजवान्, धन, ख्याति, सम्मान से संतुष्ट. . .दुराश से मुक्त। 'साला कौन आदमी इस कंट्री में इतना कान्फीडेंस डिजर्व करता है?' दासगुप्ता अपनी डिजर्व करने वाली फिलासफी बुदबुदाने लगे। सामने से भीड़ गुजरती रही। हिप्पी लड़कियां. . .अजीब-अजीब तरह के बाल. . .घिसी हुई जीन्स. . .मर्दमार लड़कियां। उनको सूंघते हुए कुत्ते. . .कुत्ते-ही-कुत्ते. . .डागी. . .डागीज. . .स्वीट डागीज।

प्रोग्राम शुरू हो गया। भीमसेन जोशी का गायन शुरू हो चुका था, लेकिन दासगुप्ता का कोई जुगाड़ नहीं लग पाया था, बिना टिकट अंदर जाने का जुगाड़।

गेट, बजरी पड़े रास्ते, सूटधारी स्वागतकर्ताओं, पुलिस इंस्पेक्टरों और सिपाहियों से दूर बाहर सड़क पर दाहिनी तरफ़ एक घने पेड़ के नीचे अजब सिंह अपना पान-सिगरेट को खोखा रखे बैठा था। ताज्जुब की बात है, मगर सच है कि इतने बड़े शहर में दासगुप्ता और अजबसिंह एक-दूसरे को जानते हैं। दासगुप्ता गेट के सामने से हटकर अजबसिंह के खोखे के पास आकर खड़े हो गये। सर्दी बढ़ गयी थी और अजब सिंह ने तसले में आग सुलगा रखी थी।

'दस बीड़ी।'
'तीस हो गयीं दादा।'
'हां, तीस हो गया। हम कब बोला तीस नहीं हुआ।. . .हम तुमको पैसा देगा।' दासगुप्ता ने बीड़ी ले ली। ऐ बीड़ी तसले में जलती आग से सुलगायी। और खूब लंबा कश खींचा।


'जोगाड़ नहीं लगा दादा?'
'लगेगा, लगेगा।'
'अब घर जाओ। ग्यारा बजने का हैं।'
'क्यों शाला घर जाये। हमको भीमसेन जोशी को सुनने का है. . .।'
'दो सादे बनारसी।'

उस्ताद भीमसेन जोशी की आवाज़ का एक टुकड़ा बाहर आ गया।
'विल्स।'
'किंग साइज, ये नहीं।'


दासगुप्ता खोखे के पास से हट आये। अब आवाज़ साफ सुनायी देगी।. . लेकिन आवाज़ बंद हो गयी।. . .एक आइडिया आया। पंडाल के अंदर पीछे से घुसा जाये। बीड़ी के लंबे-लंबे कश लगाते वे घूमकर पंडाल के पीछे पहुंच गये। अंधेरा। पेड़। वे लपकते हुए आगे बढ़े। टॉर्च की रोशनी।

'कौन है बे?' पुलिस के सिपाही के अलावा ऐसे कौन बोलेगा।
दासगुप्ता जल्दी-जल्दी पैंट के बटन खोलने लगे 'पिशाब करना है जी पिशाब।' टॉर्च की रोशनी बुझ गयी। दासगुप्ता का जी चाहा इन सिपाहियों पर मूत दें। साले यहां भी डियूटी बजा रहे हैं।. . .पिशाब की धर सिपाहियों पर पड़ी। पंडाल पर गिरी। चूतिये निकल-निकलकर भागने लगे।. . .दासगुप्ता हंसने लगे।

वे लौटकर फिर खोखे के पास आ गये। पास ही में एक छोटे-से पंडाल के नीचे कैन्टीन बनायी गयी थी। दो मेज़ों का काउंटर। काफी प्लांट। उपर दो सौ वाट का बल्ब। हाट डॉग, हैम्बर्गर, पॉपकार्न, काफी की प्यालियां। दासगुप्ता ने कान फिर अंदर से आने वाली आवाज़ की तरफ़ लगा दिये. . .सब अंदर वालों के लिए है। जो साला म्यूजिक सुनने को बाहर खड़ा है, चूतिया है। लाउडस्पीकर भी साला ने ऐसा लगाया है कि बाहर तक आवाज़ नहीं आता। और अंदर चूतिये भरे पड़े हैं। भीमसेन जोशी को समझते हैं? उस्ताद की तानें इनज्वाय कर सकते हैं? इनसे अगर यह कह दो कि उस्ताद जोशी तानों में मंद सप्तक से मध्य और मध्यम सप्तक से तार सप्तक तक स्वरों का पुल-सा बना देते हैं, तो ये साले घबराकर भाग जायेंगे. . .ये बात भीमसेन जोशी को नहीं मालूम होगा? होगा, जरूर होगा। साले संगीत सुनने आते हैं। अभी दस मिनट में उठकर चले जायेंगे. . .डकार कर खायेंगे और गधे की तरह पकड़कर सो जायेंगे।

'दादा सर्दी है,' अजब सिंह की उंगलियां पान लगाते-लगाते ऐंठ रही थीं।
'शर्दी क्यों नहीं होगा। दिशम्बर है, दिशम्बर।'
'ईंटा ले लो दादा, ईंटा।' अजब सिंह ने दासगुप्ता के पीछे एक ईंटा रख दिया और वे उस पर बैठ गये।

जैसे-जैसे सन्नाटा बढ़ रहा था अंदर से आवाज़ कुछ साफ आ रही थी। उस्ताद बड़ा ख्याल शुरू कर रहे हैं। दासगुप्ता ईंटें पर संभलकर बैठ गये।. . .पग लगाने दे. . .घिं-घिं. . .धगे तिरकिट तू ना क त्ता धगे. . .तिरकिट धी ना. . .ये तबले पर संगत कर रहा है? दासगुप्ता ने अपने-आपसे पूछा। वाह क्या जोड़ हे।


'ये तबले पर कौन है?' उन्होंने अजब सिंह से पूछा।
'क्या मालूम कौन है दादा।'
कितनी गरिमा और गंभीरता है। अंदर तक आवाज़ उतरती चली जाती है।. . .तू ना क त्ता. . .।

'तुम्हारे पास कैम्पा हैय?' तीन लड़कियां थीं और चार लड़के। दो लड़कियों ने जींस पहन रखी थीं और उनके बाल इतने लंबे थे कि कमर पर लटक रहे थे। तीसरी के बाल इतने छोटे थे कि कानों तक से दूर थे। एक लड़के ने चमड़े का कोट पहन रखा था और बाकी दो असमी जैकेट पहने थे। तीसरे ने एक काला कम्बल लपेट रखा था। एक की पैंट इतनी तंग थी कि उसकी पतली-पतली टांगे फैली हुई और अजीब-सी लग रही थीं। लंबे बालों वाली लड़कियों में से एक लगातार अपने बाल पीछे किये जा रही थी, जबकि उसकी कोई जरूरत नहीं थी। तीसरी लड़की ने अपनी नाक की कील पर हाथ फेरा।

'तुम्हारे पास कैम्पा हैय?' लंबी और पतली टांगों वाले लड़के ने कैंटीन के बैरे से पूछा। उसका ऐक्सेंट बिलकुल अंग्रेजी था। वह 'त` को 'ट` और 'ह` को 'य` के साथ मिलाकर बोल रहा था। 'ए` को कुछ यादा लंबा खींच रहा था।

'नहीं जी अभी खतम हो गया. . .'
'ओ हाऊ सिली,' छोटे बालों वाली लड़की ठुनकी।
'हाऊ स्टूपिड कैन्टीन दे हैव।'
'वी मस्ट कम्पलेन्ट।'
'लेट्स हैव काफी स्वीटीज,' लंबी टांगों वाले ने अदा से कहा।
'बट आइ कान्ट हैव काफी हियर,' जो लड़की अपनी नाक की कील छूए जा रही थी और शायद इन तीनों में सबसे ज्यादा खूबसूरत थी, बोली।

'वाये माई डियर,' लंबी टांगों वाला उसके सामने कुछ झुकता हुआ बोला और वह बात बाकी दो लड़कियों को कुछ बुरी लगी।
'आई आलवेज हैव काफी इन माई हाउस ऑर इन ओबरॉयज।'
'फाइन लेट्स गो टु द ओबरॉय देन,' लंबी टांगों वाला नारा लगाने के से अंदाज़ में चीखा।

'सर. . .सर कैम्पा आ गया,' कैन्टीन के बैरे ने सामने इशारा किया। एक मजदूर अपने सिर पर कैंपा का क्रेट रखे चला आ रहा था।
'ओ, कैम्पा हेज कम,' दूसरी दो लड़कियों ने कोरस जैसा गाया। अंदर से भीमसेनी जोशी की आवाज़ का टुकड़ा बाहर आ गया।

'ओ कैम्पा {{{{ हैज कम,' सब सुर में गाने लगे, 'के ए ए ए म पा {{{{. . . .पार करो अरज सुनो ओ. . .ओ. . .पा {{{{. . .कैम्पा {{{ पार करो. . .पा {{{{ र. . .कैम्पा {{{{. . .'
'बट नाउ आई वांट टु हैव काफी इन ओबरॉय,' खूबसूरत चेहरे वाली लड़की ठुनकी।
'बट वी केम हियर टु लिसन भीमसेनी जोशी।'

'ओ, डोन्ट बी सिली. . .ही विल सिंग फॉर द होल नाइट. . .हैव कॉफी इन ओबरॉय देन वी कैन कम बैक. . .इविन वी कैन हैव स्लीप एण्ड कम बैक. . .' लंबी टांगों वाला चाबियों का गुच्छा हिलाता आगे बढ़ा. . .भीमसेन जोशी की दर्दनाक आवाज़ बाहर तक आने लगी थी. . .आत्मनिवेदन की, दुखों और कष्टों से भरी स्तुति. . .अरज सुनो {{{{. . . .मो{{{{. . .खचाक. . .खचाक. . .कार के दरवाजे एक साथ बंद हुए और क्रिर्रर क्रिर्ररर क्रिर्र. . .भर्र{{{{ भर्र {{{{. . .।'


बारह बज चुका था। सड़क पर सन्नाटा था। सड़क के किनारों पर दूर-दर तक मोटरों की लाइनें थीं। लोग बाहर निकलने लगे थे। ज्यादातर अधेड़ उम्र और गंभीर चेहरे वाले- उकताये और आत्मलिप्त. . .मोटी औरतें. . .कमर पर लटकता हुआ गोश्त. . .जमहाइयां आ रही हैं। साले, नींद आने लगी. . .टिकट बर्बाद कर दिया। अरे उस्ताद तो दो बजे के बाद मूड़ में आयेंगे। बस टिकट लिया. . .मंगवा लिया ड्राइवर से। घंटे-दो घंटे बैठे। पब्लिक रिलेशन. . .ये टिकट ही नहीं डिजर्व करते. . .पैसा वेस्ट कर दिया. . .उस्ताद को भी वेस्ट कर दिया. . .ऐसी रद्दी आडियन्स। जो लोग जा रहे हैं उनकी जगह खाली. . .उसमें शाला हमको नहीं बैठा देता. . .बोलो, पैशा तो तुमको पूरा मिल गया है। अब क्यों नहीं बैठायेगा।


दासगुप्ता को सर्दी लगने लगी और उन्होंने एयरफोर्स के पुराने ओवरसाइज कोट की जेबों में हाथ डाल दिये। अजब सिंह कुछ सूखी पत्ती उठा लाया। तसले की आग दहक उठी।. . .ये साला निकल रहा है 'आर्ट सेंटर` का डायरेक्टर। पेंटिंग बेच-बेचकर कोठियां खड़ी कर लीं। अब सेनीटरी फिटिंग का कारोबार डाल रखा है। यही साले आर्ट कल्चर करते हैं। क्योंकि इनको पब्लिक रिलेशन का काम सबसे अच्छा आता है। पार्टियां देते हैं। एक हाथ से लगाते हैं, दूसरे से कमाते हैं। अपनी वाइफ के नाम पर इंटीरियर डेकोरेशन का ठेका लेता है। अमित से काम कराता है। उसे पकड़ा देता है हज़ार दो हज़ार. . .लड़की सप्लाई करने से वोट खरीदने तक के धंधे जानता है. . .देखो म्युजिक कान्फ्रेंस की आर्गनाइजर कैसे इसकी कार का दरवाजा खोल रही है. . .ब्रोशर में दिया होगा एक हजार का विज्ञापन। जैसे सुअर गू पर चलता है और उसे खा भी जाता है वही ये आर्ट-कल्चर के साथ करते हैं। फैक्ट्री न डाली 'कला केन्द्र` खोल लिया।. . .विदेशी कार का दरवाजा सभ्य आवाज़ के साथ बंद हो गया। कुसुम गुप्ता. . .साली न मिस है, न मिसेज़ है. . .दासगुप्ता सोचने लगे। क्यों न इससे बात की जाये। वह तेजी से गेट की तरफ बढ़ रही थी। इससे अंग्रेजी ही में बात की जाये।

'कैन यू प्लीज. . .'

उसने बात पूरी नहीं सुनी। मतलब समझ गयी। गंधे उचकाये।
'नो आइ एम सॉरी. . .वी हैव स्पेंट थर्टी थाउजेंड टू अरैंज दिस. . .' आगे बढ़ती चली गयी।
थर्टी थाउजेंड, फिफ्टी थाउजेंड, वन लैख. . .फायदे, मुनाफे के अलावा वह कुछ सोच ही नहीं सकती। वे आकर ईंट पर बैठ गये।
'विल्स।'
'मीठा पान।'
'नब्बे नंबर डाल, नब्बे. . .'

'ओ हाउ मीन यू आर।' औरतनुमा लड़की को कमसिन लड़का अपना हैम्बर्गर नहीं दे रहा था। औरतनुमा लड़की ने अपना हाथ फिर बढ़ाया और कमसिन लड़के ने अपना हाथ पीछे कर लिया। उनके साथ की दूसरी दो लड़कियां हंसे जा रही थीं।
'मीन,' लड़की अदा से बोली।

मीन? मीन का मतलब तो नीच होता है। लेकिन ये साले ऐसे बोलते हैं जैसे स्वीट। और स्वीट का मतलब मीन होगा।

कमसिन लड़का और औरतनुमा लड़की एक ही हैम्बर्गर खाने लगे। उनके साथ वाली लड़कियां ऐसे हंसने लगीं जैसे वे दोनों उनके सामने संभोग कर रहे हों।
'डिड यू अटेंड दैट चावलाज पार्टी?'
'ओ नो, आई वानटेड टु गो बट. . .'

'मेहराज गिव नाइस पार्टी।'
'हाय बॉबी!'
'हाय लिटी!'
'हाय जॉन!'
'हाय किटी!'

'यस मेहराज गिव नाइस पार्टीज. . .बिकाज दे हैव नाइस लॉन. . .लास्ट टाइम देयर पार्टी वाज टिर्रेफिक. . .देयर वाज टू मच टू ईट एंड ड्रिंक. . .वी केम बैक टू थर्टी इन द मॉर्निंग. . .यू नो वी हैड टू कम बैक सो सून? माई मदर इनला वाज देयर इन अवर हाउस. . . डिड यू मीट हर? सो चार्मिंग लेडी दैड द एज आफ सेवेन्टी थ्री. . .सो एट्ट्रेक्टिव आइ कांट टेल यू।'

'डिड यू लाइक द प्रोग्राम?'
'ओ ही इस सो हैंडसम।'
'डिड यू नोटिस द रिंग ही इज वियरिंग?'
'ओ यस, यस. . .ब्यूटीफुल।'
'मस्ट बी वेरी एक्सपेन्सिव।'
'ओ श्योर।'

'माइ मदर्स अंकल गाट द सेम रिंग।'
'दैट इज प्लैटिनम।'
'हैय वेटर, टू काफी।'

सुनने नहीं देते साले। अब अंदर से थोड़ी-बहुत आवाज़ आ रही थी। दासगुप्ता ने ईंट खिसका ली और अंगीठी के पास खिसक आये।

'ही हैज जस्ट कम बैक फ्राम योरोप।'
'ही हैज ए हाउस इन लण्डन।'
'मस्ट बी वेरी रिच।'
'नेचुरली ही टेस्ट टेन थाउजेंड फार ए नाइट।'

'देन आइ विल काल हिम टु सिंग इन अवर मैरिज।' कम उम्र लड़के ने औरतनुमा लड़की की कमर में हाथ डाल दिया।

साले के हाथ देखो। कलाइयां देखो। दासगुप्ता ने सोचा। अपने बल पर साला एक पैसा नहीं कमा सकता। बाप की दौलत के बलबूते पर उस्ताद को शादी में गाने बुलायेगा।
अजब सिंह ने फिर अंगीठी में सूखे पत्ते डाल दिये। बीड़ी पीता हुआ एक ड्राइवर आया और आग के पास बैठ गया। उसने खाकी वर्दी पहन रखी थी।
'सर्दी है जी, सर्दी।' उसने हाथ आग पर फैला दिये। कोई कुछ नहीं बोला।

'देखो जी कब तक चलता है ये चुतियापा। डेढ़ सौ किलोमीटर गाड़ी चलाते-चलाते हवा पतली हो गयी। अब साले को मुजरा सुनने की सूझी है। दो बजने. . .'
'सुबह छ: बजे तक चलेगा।'
'तब तो फंस गये जी।'
'प्राजी कोई पास तो नहीं है?' अजब सिंह ने ड्राइवर से पूछा।
'पास? अंदर जाना है?'
'हां जी अपने दादा को जाना है,' अजब सिंह ने दासगुप्ता की तरफ इशारा किया।
'देखो जी देखते हैं।'

ड्राइवर उठा तेजी से गेट की तरफ बढ़ा। लंबा तडंग़ा। हरियाणा का जाट। गेट पर खड़े सिपाहियों से उसने कुछ कहा और सिपाही स्वागतकर्ता को बुला लाया।
ड्राइवर जोर-जोर से बोल रहा था, 'पुलिस ले आया हूं जी। एस.पी. क्राइम ब्रांच, नार्थ डिस्ट्रिक्ट का ड्राइवर हूं जी। डी.वाई.एस.पी. क्राइम ब्रांच और डी.डी.एस.पी. ट्रैफिक की फैमिली ने पास मंगाया है जी,' वह लापरवाही से एक सांस में सब बोल गया।

सूटधारी स्वागतकर्ता ने सूट की जेब से पास निकालकर ड्राइवर की तरफ बढ़ा दिये। वह लंबे-लंबे डग भरता आ गया।

'सर्दी है जी, सदी है।' हाथ आगे बढ़ाया 'ये लो जी पास।'
'ये तो चार पास हैं।'
'ले लो जी अब, नहीं तो क्या इनका अचार डालना है।'
दासगुप्ता ने एक पास ले लिया, 'हम चार पास का क्या करेगा?'

हरियाणा का जाट को काफी ऊब चुका था, इस सवाल का कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहता था। उसने बचे हुए तीन पास तसले में जलती आग में डाल दिये। ड्राइवर और अजबसिंह ने तसले पर ठंडे हाथ फैला दिये। दासगुप्ता गेट की तरफ लपके। अंदर से साफ आवाज़ आ रही थी. . .जा{ गो{. . .उस्ताद अलाप लेकर भैरवी शुरू करने वाले हैं. . .जा{ गो{ मो{ ह न प्या{{{{रे {{. . .ध धिं धिं ध ध तिं तिं ता. . .जा{ गो{ मो{ ह{ न प्या{ {{ {{ {{ रे {{ {{{. . .

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3 दिल्ली पहुंचना है

रात के दो बजे थे और कायदे से इस वक्त स्टेशन पर सन्नाटा होना चाहिए था। इक्का-दुक्का चाय की ठेलियों को छोड़कर या दो-चार उंघते हुए कुलियों या सामान की गांठों और गट्ठरों या प्लेटफार्म पर सोये गरीब फटेहाल लोगों के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए था। पर ऐसा नहीं था। पूरे स्टेशन पर ऐसी चहल-पहल थी, जैसे रात के दो नहीं, सात बे हों। आठ-आठ दस-दस की टुकड़ियों में लोग प्लेटफार्म पर इधर-उधर खड़े थे या किसी कोने में गोले बनाये बैठे थे या पानी के नल के पास बैठे चिउड़ा खा रहे थे।

ये सब एक ही तरह के लोग थे। मैली, फटी, उंची धोतियां या लुंगियां और उलटी, बेतुकी, सिलवटें पड़ी कमीजें या कपड़े की सिली बनियानें पहने। नंगे सिर, नंगे पैर, सिर पर छोटे-छोटे बाल। एक हाथ में पोटली और दूसरे हाथ में लाल झंडा।

बिपिन बिहारी शर्मा, मदनपुर गांव, कल्याणपुर ब्लाक, मोतिहारी, पूर्वी चंपारन आज सुबह गांव से उस समय निकले थे जब पूरब में आम के बड़े बाग के उपर सूरज का कोई अता-पता न था। सूरज की हलकी-हलकी लाली उन्हें खजुरिया चौक पहुंचने से कोई एक घंटा पहले दिखाई दी थी, जहां आकर सब जनों ने दातुन-कुल्ला किया था।

इमली, आम और नीम के बड़े-बड़े पेड़ों के नीचे दुबका गांव सो रहा था। इन पेड़ों की अंधेरी परछाइयां इधर-उधर खपरैल के घरों, गलियारों, कच्ची दीवारों पर पड़ रही थीं। बड़े बरगद के पेड़ के पत्ते हवा में खड़खड़ाते तो सन्नाटा कुछ क्षण के लिए टूटता और फिर पूरे गांव को छाप कर बैठ जाता। उपर आसमान के सफेद रुई जैसे बादल उत्तर की ओर भागे चले जा रहे थे। चांद पीला पड़ चुका था और जैसे सहमकर एक कोने में चला गया था।

कुएं में किसी ने बाल्टी डाली और उसकी आवाज़ से कुएं के पास लगे नीम के पेड़ से तोतों का एक झुंड भर्रा मारकर उड़ा और गांव का चक्कर लगाता हुआ उत्तर की ओर चला गया। धीरे-धीरे इधर-उधर के बगानों से कुट्टी काटने की आवाजें आने लगीं। गंडासा चारा काटता हुआ लकड़ी से टकराता और आवाज़ दूर तक फैल जाती। कुट्टी काटने की दूर से आती आवाज़ के साघ्थ कुछ देर बाद घरों से जांता पीसने की आवाज़ भी आने लगी। कुछ देर तक यही दो आवाजें इधर-उधर मंडराती रहीं, फिर बलदेव के घर में आती बाबा बकी फटी और भारी आवाज़, 'भये प्रकट क्रिपाला दीनदयाला. . .' भी कुट्टी काटने और पीसने की आवाजों के साथ मिल गयी। अंधेरा ही था, पर कुछ परछाइयां इधर-उधर आती-जाती दिखायी पड़ने लगी थीं।

सुखवा काका की घर की ओर से एक परछाइयाँ भागी चली आ रही थी। पास आया तो दिखायी पड़ा दीनदयाला। उसने कमीज कंधे पर रखी हुई थी, एक हाथ में जूते, दूसरे में चिउड़ा की पोटली थी। माई के थान पर कई लोग लगा थे। दीनदयाला भी माई के थान पर खड़ी परछाइयों में मिल गया। नीचे टोली से 'ललकारता` रघुबीरा चला आ रहा था। अब इन लोगों की बातें करने की आवाज़ों में दूसरी आवाज़ें दब गयी थीं।


खजुरिया चौक से सिवान स्टेशन के लिए बस मिलती है, पर बस के पैसे किसके पास थे? दातुन-कुल्ला के बाद वे फिर चल पड़े थे। अब सिवार रह ही कितना गया है, बस बीस 'किलोमीटर`! बीस किलोमीटर कितना होता है। चलते-चलते रफ़्तार सुस्त पड़ने लगी तो बिपिनजी कहते, 'लगाइए ललकारा।' ललकारा लगाया जाता और सुस्त पड़े पैर तेज जो जाते। ग्यारह बजते-बजते सिवान स्टेशन पहुंच गये तो गाड़ी मिलेगी। और फिर पटना।

ट्रेन दनदनाती हुई प्लेटफार्म के नजदीक आती जा रही थी। इंजन के उपर बड़ी बत्ती की तेज रोशनी में रेल की पटरियां चमक रही थी। ट्रेन पूरी गरिमा और गंभीरता के साथ नपे-तुले कदम भरती स्टेशन के अंदर घुसती चली आयी। रफ़्तार सुस्त पड़ने लगी और दरवाजों पर लटके हुए आदमी प्लेटफार्म की सफेद रोशनी में नहा गये।


इंतजार करते लोगों में इधर-से-उधर तक बिजली-सी दौड़ गयी कि अगर यह ट्रेन निकल गयी तो कल शाम तक दिल्ली नहीं पहुंच पायेंगे। कल शाम तक उसको दिल्ली पहुंचना है, किसी भी हालत में। पोटली में बंधे मकई के सत्तू, चिउड़ा और भूजा इसी हिसाब से रखे गये हैं। ऐसा नहीं है कि दस-पन्द्रह दिन चलते रहेंगे और ऐसा भी नहीं कि गाड़ी नहीं पकड़ पाने का बहाना लेकर लौट जायेंगे। कल शाम दिल्ली जरूर पहुंचना है। सबको। हर हालत में।


ट्रेन खड़ी हो गयी। इस्पात, बिजली के तारों और लकड़ी के टुकड़ों से बनी ट्रेन एक चुनौती की तरह सामने खड़ी थी। यहां से वहां तक ट्रेन देख डाली गयी। पर बैठने क्या, खड़े होने क्या, सांस लेने तक की जगह नहीं है। सेकेंड क्लास के डिब्बे उसी तरह के लोगों से भरे हैं। उनको भी कल किसी भी हालत में दिल्ली पहुंचना है।

'अब क्या होगा बिपिनजी?' यह सवाल बिपिन बिहारी शर्मा से किसी ने पूछा नहीं, पर उन्हें लग रहा था कि हज़ारों बार पूछा जा चुका है।

'बैठना तो है ही। काहे नहीं प्रथम श्रेणी में जायें।'
प्रथम श्रेणी का लंबा-सा डिब्बा बहुत सुरक्षित है। इस्पात के दरवाजे पूरी तरह से बंद। अंदर अलग-अलग केबिनों के दरवाजे पूरी तरह से बंद।

'दरवाजा खुलवा बाबूजी!' धड़-धड़-धड़।
'बाबूजी दरवाजा खोलवा!' धड़-धड़-धड़।
'नीचे बैठ गइले बाबूजी!' धड़-धड़-धड़।
'बाबूजी दिल्ली बहुत जरूरी पहुंचना बा!' धड़-धड़-धड़।

तीन-सौ आदमी बाहर खड़े दरवाजा खोलने के लिए कह रहे थे और जवाब में इस्पात का डिब्बा हंस रहा था। समय तेजी से बीत रहा था। अगर यह गाड़ी भी निकल गयी तो कल शाम तक दिल्ली पहुंच सकेंगे।

'दरवाजे के पास वाली खिरकी तोरते हैं।' बिपिनजी खिड़की के पास आ गये और फिर पता नहीं कहां से आया, किसने दिया, उनके हाथ में एक लोहे का बड़ा सा टुकड़ा आ गया। पूरा स्टेशन खिड़की की सलाखें तोड़ने की आवाज़ से गूंजने लगा।

'कस के मार-मार दरवाजा तोड़े का पड़ी। हमनी बानी एक साथ मिलके चाइल जाई तो. . .' भरपूर हाथ मारने वालों में होड़ लग गयी। दो। सलाखें टूट गयीं तो उनसे भी हथौड़े का काम लिया जाने लगा।

'अरे, ये आप क्या करता हे, फर्स्ट क्लास का डिब्बा है,' काले कोट वाले बाबू ने बिपिन का हाथ पकड़ लिया। बिपिनजी ने हाथ छुड़ाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने पूरी ताकत से नारा लगाया।

'हर जोर जुल्म की टक्कर में'
तीन सौ आदमियों ने पूरी ताकत से जवाब दिया:
'संघर्ष हमारा नारा है।'

काले कोट वाले बाबू को जल्दी ही अपने दोनों कानों पर हाथ रखने पड़े।
'संघर्ष हमारा नारा है' प्रतिध्वनियां इन लोगों के चेहरों पर कांप रही थी।
काले कोट वाले बाबू को समझते देर न लगी कि स्थिति विस्फोटक है। वे लाल झंड़ों और अधनंगे शरीरों के बीच से मछली की तरह फिसलते निकल गये और सीधे स्टेशन मास्टर के कमरे में घुस गये।

कुछ देर बाद उधर से एक सिपाही डंडा हिलाता हुआ आया और सामने खड़ा हो गया।
'क्या तुम्हारे बाप की गाड़ी है?' सिपाही ने बिपिनजी से पूछा।
'नहीं, तुम्हारे बाप की है?' सिपाही ने बिपिन शर्मा को उपर से नीचे तक देखा। चमड़े की घिसी हुई चप्पल। नीचे से फटा पाजामा, उपर खादी का कुर्ता और कुर्ते की जेब में एक डायरी, एक कलम।

'तुम इनके नेता हो?'
'नहीं।'
'फिर कौन हो?'
'इन्हीं से पूछिए।'

सिपाही ने बिपिन बिहारी शर्मा को फिर ध्यान से देखा। उम्र यही कोई तेईस-चौबीस साल। अभी दाढ़ी-मूंछ नहीं निकली है। आंखों में ठहराव और विश्वास।
'तुम्हारा नाम क्या है?'
'अपने काम से काम रखिए। हमारा नाम पूछकर क्या करेंगे?'

बातचीत सुनने के लिए भीड़ खिसक आयी थी। रामदीन हजरा ने चिउड़ा की पोटली बगल में दबाकर सोचा, यही साली पुलिस थी जिसने उसे झूठे डकैती के केस में फंसाकर पांच-सौ रुपये वसूल कर लिये थे। बलदेव तो पुलिस को मारने की बात बचपन से सोचता है। जबसे उसने अपने पिता के मुंह पर पुलिस की ठोकरें पड़ती देखी हैं, तबसे उसके मन में आता है, पुलिस को कहीं जमके मारा जाये। आज उसे मौका मिला है। उसने डंडे मे लगे झंडे को निकालकर जेब में रख लिया और अब उसके हाथ में डंडा-ही-डंडा रह गया।

'ठीक से जवाब नहीं देंगे तो तुम्हें बंद कर देंगे साले,' सिपाही ने डंडा हवा में लहराते हुए कहा।

'देखो भाई साहब, बंद तो हमें तुम कर नहीं सकते। और ये जो गाली दे रहे हैं, तो हम आपको मारे-पीटेंगे नहीं। आपको वर्दी-पेटी उतारकर वैसे ही छोड़ देंगे।'

सिपाही ने सिर उठाकर इधर-उधर देखा। चारों तरफ काले, अधनंगे बदनों और लाल झंड़ों की अभेद्य दीवार थी। अब उसके सामने दो ही रास्ते थे, नरम पड़ जाता या गरम। नया-नया लगा था, गरम पड़ गया।

'मादर. . .कानून. . .' फिर पता नहीं चला कि उसकी टोपी, डंडा, कमीज, हाफ पेंट, जूते और मोजे कहां चले गये, क्योंकि यदि बीस हाथ डंडा, कमीज, हाफ पेंट, जूते और मोजे कहां चले गये, क्योंकि यदि बीस हाथ डंडा छीनने के लिये बढ़े हों, दस हाथों ने टोपी उतारी हो, सात-आठ आदमी कमीज पर झपटे हों, तीन-चार लोगों ने जूते और मोजे उतारे हो, तो इस काम में कितना समय लगा होगा? अब सिपाही, सिपाही से आदमी बन चुका था। उसके चेहरे पर न रोब था, न दाब। सामने खड़ा था बिलकुल नंगा। इस छीना झपटी में उसकी शानदार मूंछ छोटी, बहुत अजीब लग रही थी। लोग हंस रहे थे।

पता नहीं कहा से विचार आया बहरहाल एक बड़ा-सा लाल झंडा सिपाही के मुंह और सिर पर कसकर लपेटा और फिर पतली रस्सी से पक्का करके बांध दिया गया। उसी रस्सी के दूसरे कोने से सिपाही के हाथ बांध दिये गये।

खोपड़ा और चेहरा लाल, शरीर नंगा। दु:ख, भुखमरी और जुल्म से मुरझाये चेहरों पर हंसी पहाड़ी झरनों की तरह फट पड़ी। उन चेहरों पर हंसी कितनी अच्छी लगती है, जिन पर शताब्दियों से भय, आतंक के कांटे लगे हों।

फिर सिपाही के नंगे चूतड़ पर उसी का डंडा पड़ा और वह प्लेटफार्म पर भागता चला गया।
इन मनोरंजन के बाद काम में तेजी आयी। बाकी बची दो सलाखें जल्दी ही टूट गयीं। शीशा टूटने में कितनी देर लगती है? अब रास्ता साफ था। एक लड़का बंदर की तरह खिड़की में से अंदर कूद गया। अंदर से उसने दरवाजे के बोल्ट खोल दिये।

सारे लोग जल्दी-जल्दी अंदर चढ़े। बत्ती हरी हो चुकी थी और ट्रेन रेंगने लगी थी। लंबे डिब्बे की पूरी गैलरी खचाखच भर गयी। और अब भी लोग दरवाजे के डंडे पकड़े लटक रहे थे। अब केबिन भी खुलना चाहिए। अंदर बैठने की ज्यादा जगह होगी।

बिपिनजी पहले केबिन के बंद दरवाजे के सामने आये।
'देखिए, हमने आपके डिब्बे का बड़ा लोहा वाला दरवाजा तोर दिया है, भीतर आ गइले। केबिन का दरवाजा खोल दीजिए। नहीं तो इसे तोड़ने में क्या टैम लगेगा।'
अंदर से कोई साहब नहीं आया।

'आप अपने से खोल देंगे तो हम केवल बैठभर जायेंगे। और जो हम तोर कर अंदर आयेंगे तो आप लोगों को मारेंगे भी।'
केबिन का दरवाजा खुला। धरीदार कमीज-पाजामा पहने-आदमी ने खोला था। अंदर मद्धिम नीली बत्ती जल रही थी, पर तीनों लोग जगे हुए थे और इस तरह सिमटे-सिकुड़े बैठे थे कि सीटों पर बैठने की काफी जगह हो गयी थी।
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4 राजा

उन दिनों शेर और लोमड़ी दोनों का धंधा मंदा पड़ गया था। लोमड़ी किसी से चिकनी-चुपड़ी बातें करती तो लोग समझ जाते कि दाल में कुछ काला है। शेर दहाड़कर किसी जानवर को बुलाता तो वह जल्दी से अपने घर में घुस जाता।

ऐसे हालात से तंग आकर एक दिन लोमड़ी और शेर ने सोचा कि आपस में खालें बदल लें। शेर ने लोमड़ी की खाल पहन ली और लोमड़ी ने शेर की खाल। अब शेर को लोग लोमड़ी समझते और लोमड़ी को शेर। शेर के पास छोटे-मोटे जानवर अपने आप चले आते और शेर उन्हें गड़प जाता।

लोमड़ी को देखकर लोग भागते तो वह चिल्लाती 'अरे सुनो भाई. . .अरे इधर आना लालाजी. . .बात तो सुनो पंडितजी!' शेर का यह रंग-ढंग देखकर लोग समझे कि शेर ने कंठी ले ली है। वे शेर, यानी लोमड़ी के पास आ जाते। शेर उनसे मीठी-मीठी बातें करता और बड़े प्यार से गुड़ और घी मांगता। लोग दे देते। खुश होते कि चलो सस्ते छूटे।


एक दिन शेर लोमड़ी के पास आया और बोला, 'मुझे अपना दरबार करना है। तुम मेरी खाल मुझे वापस कर दो। मैं लोमड़ी की खाल में दरबार कैसे कर सकता हूं?' लोमड़ी ने उससे कहा, 'ठीक है, तुम परसों आना।' शेर चला गया।

लोमड़ी बड़ी चालाक थी। वह अगले ही दिन दरबार में चली गई। सिंहासन पर बैठ गई। राजा बन गई।

दोस्तो, यह कहानी बहुत पुरानी है। आज जो जंगल के राजा हैं वे दरअसल उसी लोमड़ी की संतानें हैं, जो शेर की खाल पहनकर राजा बन गई थी।
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5 योद्धा

किसी देश में एक बहुत वीर योद्धा रहता था। वह कभी किसी से न हारा था। उसे घमंड हो गया था। वह किसी को कुछ न समझता था। एक दिन उसे एक दरवेश मिला। दरवेश ने उससे पूछा, 'तू इतना घमंड क्यों करता है?' योद्धा ने कहा, 'संसार में मुझ जैसा वीर कोई नहीं है।' दरवेश ने कहा, 'ऐसा तो नहीं है।'

योद्धा को क्रोध आ गया, 'तो बताओ पूरे संसार में ऐसा कौन है, जिसे मैं हरा न सकता हूं।'
दरवेश ने कहा, 'चींटी है।'


यह सुनकर योद्धा क्रोध से पागल हो गया। वह चींटी की तलाश में निकलने ही वाला था कि उसे घोड़ी की गर्दन पर चींटी दिखाई दी। योद्धा ने चींटी पर तलवार का वार किया। घोड़े की गर्दन उड़ गई। चींटों को कुछ न हुआ। योद्धा को और क्रोध आया। उसने चींटी को ज़मीन पर चलते देखा। योद्धा ने चींटी पर फिर तलवार का वार किया। खूब धूल उड़ी। चींटी योद्धा के बाएं हाथ पर आ गई। योद्धा ने अपने बाएं हाथ पर तलवार का वार किया, उसका बायां हाथ उड़ गया। अब चींटी उसे सीने पर रेंगती दिखाई दी। वह वार करने ही वाला था कि अचानक दरवेश वहां आ गया। उसने योद्धा का हाथ पकड़ लिया।

योद्धा ने हांफते हुए कहा, 'अब मैं मान गया। बड़े से, छोटा ज्यादा बड़ा होता है।'
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6 बंदर
एक दिन एक बंदर ने एक आदमी से कहा, 'भाई, करोड़ों साल पहले तुम भी बंदर थे। क्यों न आज एक दिन के लिए तुम फिर बंदर बनकर देखो।'
यह सुनकर पहले तो आदमी चकराया, फिर बोला, 'चलो ठीक है। एक दिन के लिए मैं बंदर बन जाता हूं।'

बंदर बोला, 'तो तुम अपनी खाल मुझे दे दो। मैं एक दिन के लिए आदमी बन जाता हूं।'
इस पर आदमी तैयार हो गया।
आदमी पेड़ पर चढ़ गया और बंदर ऑफिस चला गया। शाम को बंदर आया और बोला, 'भाई, मेरी खाल मुझे लौटा दो। मैं भर पाया।'

आदमी ने कहा, 'हज़ारों लाखों साल मैं आदमी रहा। कुछ सौ साल तो तुम भी रहकर देखो।'
बंदर रोने लगा, 'भाई, इतना अत्याचार न करो।' पर आदमी तैयार नहीं हुआ। वह पेड़ की एक डाल से दूसरी, फिर दूसरी से तीसरी, फिर चौथी पर जा पहुंचा और नज़रों से ओझल हो गया।

विवश होकर बंदर लौट आया।
और तब से हक़ीक़त में आदमी बंदर है और बंदर आदमी।
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7 चंद्रमा के देश में


हम दिल्ली के रहने वाले जब छोटे शहरों या कस्बों में पहुंचते हैं तो हमारे साथ कुछ इस तरह का बर्ताव किया जाता है जैसे पहले ज़माने में तीर्थयात्रा या हज से लौटकर आए लोगों के साथ होता था। हमसे उम्मीद की जाती है कि हम हिंदुस्तान के दिल दिल्ली की रग-रग जानते हैं। प्रधानमंत्री से न सही तो मंत्रियों से तो मिलते होंगे। मंत्रियों से न सही तो उनके चमचों से तो टकराते ही होंगे। हमसे उम्मीद की जाती है हम अखबारों में छपी खबरों के पीछे छिपी असली खबरों को जानते होंगे। नई आने वाली विपदाओं और परिवर्तनों की जानकारी हमें होगी। हमसे लोग वह सब सुनना चाहते हैं जिसकी जानकारी हमें नहीं होगी। लेकिन मुफ़्त में मिले सम्मान से कौन मुंह मोड़ लेगा? और वह भी अगर दो-चार उल्टी-सीधी बातें बनाकर मिल सकता हो, तो फिर मैं विश्वसनीय गप्पें पूरे कस्बे में फैल जाती हैं। रात तक दूसरे शहर और अगले दिन तक राज्य में इस तरह फैलती हैं, जैसे वहीं की जमीन से निकली हों।

छुट्टियों के समय बर्बाद करने के लिए वहां कई जगहें हैं। उनमें से एक 'खादी आश्रम` भी है। चूंकि वहां के कर्मचारी फुर्सत में होते हैं। आसपास में लड़-लड़कर थक चुके होते हैं इसलिए ग्राहकों से दो-चार बातें कर लेने का मोह उन्हें बहुत शालीन बना देता है। अच्छी बात है कि गांधीजी ने खादी की तरह समय के सदुपयोग के बारे में जोर देकर कोई ऐसी बात नहीं कही है, जिससे उनके अनुयायियों को समय बर्बाद करने में असुविधा महसूस हो। लेकिन समय के बारे में ऐसी कोई बात न कहकर गांधीजी ने संस्थाएं बनाने वालों के साथ जरूर अन्याय किया है, नहीं तो अब तक 'समय आश्रम` जैस कई संस्थाएं बन चुकी होतीं।


सफेद कुर्ता-पाजामाधरी युवक पान खाए था। मुझे अंदर आता देखकर उसने खादी प्रचारक से अपना वाकयुद्ध कर दिया और इत्मीनान से खादी के थान पर थान दिखाने लगा। मैं इस तरह जैसे गांधीजी के बाद दूसरा आदमी होऊँ जिसने खादी के महत्व का समझा हो, खादी देखता रहा। बीच-बीच में बातचीत होती रही। खादी आश्रम का विक्रेता कुछ देर बाद थोड़ा आत्मीय होकर बोला, 'श्रीमान, आप जैसी खादी-प्रेमी यहां कम आते हैं?'

मैं बात करने का मौका क्यों छोड़ देता। पूछा, 'कैसे?'
बोला, 'यहां तो टिंपरेरी खादी-प्रेमी आते हैं?'
'ये क्या होता है?'

'अरे मतलब यही श्रीमान कि लखनऊ वाली बस पकड़ने से पहले धड़धड़ाते हुए आए। पैंट, कमीज उतारी। सफेद कर्ता-पाजामा खरीदा। पहना। टोपी लगाई। सड़क पर आए। लखनऊ जाने वाली बस रुकवाई। चढ़ने से पहले बोले, 'शाम को पैंट-कमीज ले जाएंगे।` और सीधे लखनऊ।'
इस पर याद आया कि मरे भाई जो वकील हैं, एक बार बता रहे थे कि एक पेशेवर डाकू जो उनका मुवक्किल था, बहुत दिनों से कह रहा था कि वकील साहब हमें 'सहारा` दिला दो। खैर, तो एक दिन वह शुभ दिन आया। हमारे भाई साहब, उनके दो दोस्त और पेशेवर डाकू भाड़े की टैक्सी पर लखनऊ की तरफ रवाना हुए। जैसे ही टैक्सी लखनऊ में दाखिल होने लगी, डाकू ने टैक्सी वाले को रुकने का आदेश दिया। टैक्सी रुकी। वे लोग समझे, साले को टुट्टी-टट्टी लगी होगी। वह अपना थैला लेकर झाड़ियों के पीछे चला गया। कुछ मिनट बाद झाड़ियों के पीछ से मंत्री निकला। सिर खादी की टोपी में, पैर खादी के पाजामे में, बदन खादी के कुर्ते में। पैर गांधी चप्पल में।

इनमें से एम ने पूछा, 'ये क्या?'
'जरूरी हे। उकील साब, जरूरी है,' वह बोला।
'अमां तुम तो हमसे होशियार निकले।'
'सो तो हइये है उकील साब!'

अपना खादी-प्रेम प्रदर्शित करके और दो कुर्तों का कपड़ा बगल में इस तरह दबाए जैसे वही गांधीजी द्वारा देश के लिए छोड़ी संपूर्ण संपत्ति हो, मैं आगे बढ़ा। अब मेरा निशाना एक गृहस्थ आश्रम था।

अब छोटे शहरों में किसी भी चीज की कमी हो, वकीलों की कमी नहीं है। हर गांव, हर मोहल्ले, हर जाति, हर धर्म के वकील हैं। यही कारण है कि हर गांव, हर मोहल्ले, हर जाति, हर धर्म के लोगों के मुकदमेबाजियां हैं। कहने का मतलब यह कि वकीलों की कमी नहीं है।

इसका श्रेय किसे दिया जाना चाहिए? आप चाहें तो मोतीलाल नेहरू या जवाहरलाल नेहरू को दे सकते हैं, लेकिन मैं तो ऐसा नहीं करूंगा, क्योंकि ये हमारे वकीलों के पुरखे नहीं हो सकते। कहां तो उनके विलायत से धुलकर कपड़े आते थे और कहां ये विलायत से मंगवाकर कपड़े धोते हैं। इतने अंतर के कारण इन्हें किसी और का ही जांनशीन कहा जाना चाहिए। ये फैसला आप करें, क्योंकि वकीलों के लिए किसी पर मानहानि का मुकदमा दाग देना उतना ही आसान है, जितना हमारे आपके लिए एक सिगरेट सुलगा लेना।


वकील साहब का घर यानी 'गृहस्थ आश्रम` नजदीक था। छके हुए वकील हैं। छके हुए शब्दों के दो अर्थ हैं। पतला मतलब खूब खाए-पिए, मोटे-ताजे, तंदुरुस्त। दूसरा मतलब परेशान, सताए गए, थके हुए। कहते हैं कि यार यह काम करते-करते मैं छक गया। तो वकील साहब दूसरी तरह के छके हुए आदमी हैं। उर्दू के इम्तहानात यानी 'अदीब` वगैरा पास करके बी.ए. किया था। फिर अलीगढ़ से एल.एल.बी। उसके बाद की पढ़ाई यानी जो असली पढ़ाई थी, यानी मजिस्ट्रेटों और जजों को कैसे काबू किया जाए। ये न पढ़ सके थे। इसीलिए जीवन के इम्तहान में फेल हो गए थे।

मैं उनके घर पहुंचा तो खुश हो गए। मुझमें उम्र में आठ-दल साल बड़े हैं इसका हम दोनों को एहसास है। और इसका ख्याल करते हैं। फिर वकील साब को अनुभव भी मुझसे ज्यादा है। अपनी जिंदगी में अब तक ये काम कर चुके हैं: खेती करवा चुके हैं, भट्टे लगवा चुके हैं, अनाज की मंडी लगवा चुके हैं, मोजे बुनवाने का काम किया है, पावरलूम लगवा चुके हैं, डेरी खोल चुके हैं और आपकी दुआ से इन सब कामों में इन्हें घाटा हो चुका है। सब काम बंद हो चुके हैं। कुछ कर्ज अब तक चुका रहे हैं। कुछ का चुक चुका है। अब आपको जिज्ञासा होगी कि ऐसे हालात में वकील साहब की गाड़ी कैसी चल रही है। वकील साहब के पिताश्री ने उनको किराए की तीन दुकानें और एक मकान एक तरह छोड़े हैं कि वकील साहब को ये लगता ही नहीं कि वालिद मरहूम हकीकत में मरहूम हो चुके हैं। इसके अलावा वकील साहब कचहरी रोज जाते हैं तो दस-बीस रुपया बन ही जाता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि खाली हाथ आए। अरे दो दरख्वास्तें ही लिख दीं तो दस रुपये हो गए।

'आओ. . .कब आए?'
'परसों। जी वो. . .'
'खैर छोड़ो. . .सुनाओ दिल्ली के क्या हाल हैं।'

फिर वही दिल्ली। अरे आप लोग दिल्ली को छोड़ क्यों नहीं देते। ये क्यों नहीं कहते कि दिल्ली जाए चूल्हे भाड़ में, यहां के हाल सुनो!
'कोई खास बात नहीं।'
'बिजली तो आती होगी?'
'हां, बिजली हो आती है।'

'यहां तो साली दिन-दिन-भर नहीं आती। सुनते हैं इधर की बिजली काटकर दिल्ली सप्लाई कर देते हैं।'
'हां जरूर होता होगा।'

'होगा नहीं, है। इधर के पढ़े-लिखे लोग नौकरी करने दिल्ली चले जाते हैं। इधर के मजदूर मजदूरी करने दिल्ली चले जाते हैं। इधर का माल बिकने दिल्ली जाता है।'
'दिल्ली से अधर कुछ नहीं आता?' मैंने हंसकर पूछा।

'हां आता है. . .आदेश. . .हुक्म. . .और तुम कह रहे हो दिल्ली में कोई खास बात नहीं है। अरे मैं तुम्हें गारंटी देता हूं कि दिल्ली में वक्त हर कहीं कोई-न-कोई खास बात होती रहती है।'

'और आप आजकल क्या कर रहे हैं?'
'मियां, सोचते है। एक इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल खोल दें। बताओ कैसा आइडिया है? दिल्ली में तो बड़े-बड़े इंग्लिश मीडियम स्कूल हैं।'
'लेकिन. . .'

उन्होंने मेरी बात काटी, 'लेकिन क्या,' वे शेर की तरह बमके। मैं समझ गया कि वे मन-ही-मन इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलने की बात ठान चुके हैं।
'क्या कुछ इस्कोप है?'

'इस्कोप-ही-स्कोप है। आज शहर में आठ इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूल हैं। सब खचाखच भरे रहते हैं। सौ रुपया महीने से कम कहीं फीस नहीं लगती। सौ बच्चे भी आ गए तो फीस-ही-फीस के दस हज़ार महीना हो गए। टीचरें रख लो आठ-दस। उनको थोड़ा बहुत दिया जाता है।. . .मकान-वकान का किराया निकालकर सात-आठ हज़ार रुपया महीना भी मुनाफा रख लो तो इतनी आमदनी और किस धंधे से होगी? और फिर दो टीचर तो हम घर ही के लोग हैं।'

'घर के, कौन-कौन?'
'अरे मैं और सईद।'

उनको चूंकि अपना बड़ा मानता हूं और चूंकि वे मेरा हमेशा खयाल करते हैं, इसलिए दिल खोलकर हंसने की ख्वाहिश दिल ही में रह गई। वकील साहब को अगर छोड़ भी दें तो उनके सुपुत्र सईद मियां बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हुए मुझे कल्पना में ऐसे लगे जैसे भैंस उड़ रही हो। पेड़ की जड़ें उपर हों और डालियां जमीन के अंदर। मतलब ऐसा लगता है, जैसे उसे दुनिया का आठवां अजूबा मान लिया जाएगा।

उत्तर प्रदेश, बिहार ही नहीं, पूरे-के-पूरे बेल्ट में अंग्रेजी की जो हालत है, किसी से छिपी नहीं है। यह अच्छा है या बुरा, यह अपने-आप में डिबेटेबुल प्वाइंट हो सकता है। लेकिन 'एम` को 'यम`, 'एन` को 'यन` और 'वी` को 'भी` बोलने वालों और अंग्रेजी का रिश्ता असफल प्रेमी और अति सुंदर प्रेमिका का रिश्ता है। पर क्या करें कि यह प्रेमिका दिन-प्रतिदिन सुंदर से अति सुंदर होती जा रही है और प्रेमी असफलता की सीढ़ियों पर लुढ़क रहा है। प्रेमी जब प्रेमिका को पा नहीं पाता तो कभी-कभी उससे घृणा करने लगता हे। इस केस में आमतौर पर यही होता है। अगर आप अच्छी-खासी हिंदी जानते और बोलते हों, लेकिन किसी प्रदेश के छोटे शहर या कस्बे में अंग्रेजी बोलने लगें तो सुनने वाले की इच्छा पहले आपसे प्रभावित होकर फिर आपको पीट देने की होगी।

यह तो हुई सबकी हालत। इसकी तुलना में सईद मियां की हालत सोने पर सुहागे जैसी है। जब पढ़ाते थे तब अंग्रेजी का नाम सुनते ही किसी नए नाथे गए बछड़े की तरह बिदकते थे और 'ग्रामर` का नाम सुनते ही उनकी सिट्टी-पिट्टी गुम नहीं नहीं हो जाया करती थी, खून खुश्क हो जाया करता था। कुछ शब्द तो उन पर गोली से ज्यादा असर करते थे, जैसे 'पंक्चुएशन`, 'डायरेक्ट इनडायरेक्ट टेंस`, 'फिल इन द ब्लैंक्स`। अंग्रेजी के अध्यापक को वे कसाई और आपको बकरा समझते थे।

सईद मियां को इंटर में अंग्रेजी के पर्चे में तीन सवाल नकल करते ही लगा था, जैसे एवरेस्ट फतह कर ली हो। उसके बाद कहां अंग्रेजी और कहां सईद मियां वे हथेली पर सरसों जमाना न जानते थे। होगी दुनिया में धूम-अपने ठेंगे पर।

वकील साहब ने फिर प्वाइंट क्लीयर किया, 'भई हमें इन इंग्लिस स्कूल वालों का सिस्टम अच्छा लगा। रटा दो लौंडों को। दे दो सालों को होम वर्क। मां-बाप कराएं, नहीं तो टीचर रखें। हमारे ठेंगे से। होम वर्क पूरा न करता हो तो मां-बाप को खींच बुलवाओ और समझाओ कि मियां बच्चे को अंग्रेजी मिडीयम में पढ़वा रहे हो, हंसी-मजाक नहीं है। फिर कसकर फीस लो। आज इस नाम से, तो कल उस नाम से। बिल्डिंग फंड, फर्नीचर फंड, पुअर फंड, टीचर फंड और स्कूल फंड. . .' वे हंसने लगे।

'हां, ये बात तो है।'
'अरे भइ भूल ही गया. . .चाय. . .लेकिन चाय तो तुम पीते ही रहते होंगे. . .बेल का शरबत पियोगे?'
जी में आया कि कहं, हुजूर, अब तो बियर पिलाइए। कहां इंग्लिश मीडियम, कहां बेल का शरबत।

बेल का शरबत आने से पहले आए सईद मिया। उन्हें देखते ही वकील साहब खुश हो गए, बोले, ' आओ आओ, बैठो। स्कूल के बारे में ही बात कर रहे हैं।'
मैंने सईद मियां के चेहरे पर वह सब कुछ देख लिया जो उनके बारे में लिखा जा चुका है।

'जी!' उन्होंने छोटा-सा जवाब दिया और बैठ गए। वकील साहब इस बात पर यकीन करने वाले आदमी हैं कि बच्चों को खिलाओ सोने का निवाला, पर देखो शेर की निगाह से। तो उन्होंने सईद मियां को हमेशा शेर की निगाह से देखा है और सईद मियां ने 'अकबर` इलाहाबादी के अनुसार 'अब काबिले जब्ती किताबें` पढ़ ली हैं और 'बाप को खब्ती` समझते हैं।

लेकिन सईद मिया खब्ती बाप से बेतहाशा डरते हैं। वकील साब इसे कहते हैं, लड़का सआदतमंद है। लेकिन इधर कुछ साल से इस सआदतमंदी में कुछ कमी आ रही है। दरअसल चक्कर यह है कि वकील साहब ने बेटों को चकरघिन्नी की तरह नचाया है। एक तो बेटे का पूरा कैरियर ही 'शानदार` था, दूसरे वकील साहब की रोज-रोज बनती-बिगड़ती योजनाओं ने सईद मियां को बुरी तरह कन्फ़्यूज़ कर रखा है। वकील साहब ने कभी उन्हें कम्प्यूटर साइंटिस्ट, कभी चार्टर्ड एकाउंटेंट, कभी एक्सपोर्टर वगैरा बनाने की ऐसी कोशिश की कि सईद मियां कुछ न बन सके।

'अब तुम कोई अच्छा-सा नाम बताओ स्कूल के लिए। यहां तो यही सिटी मांटेसरी, इंग्लिस मिडियम पब्लिक नाम चलते हैं। लेकिन नाम अंग्रेजी में होना चाहिए. . .वो मुझे पसंद नहीं कि स्कूल तो इंग्लिश मिडियम है लेकिन नाम पक्का हिंदी का है।' वे मेरी तरफ देखने लगे, 'अरे दिल्ली में तो बहुत इंग्लिस मीडियम स्कूल होंगे. . .उनमें से दो-चार के नाम बताओ।'

फिर आ गई दिल्ली। मैंने मन में दिल्ली को मोटी-सी गाली दी और दिल्ली के पब्लिक स्कूलों के नाम सोचने लगा।
'ज़रा माडर्न फैशन के नाम होना चाहिए,' वे बोले।
मैंने सोचकर कहा, 'टाइनी टॉट।'

'टाइनी टॉट? ये क्या नाम हुआ? नहीं नहीं, ये तो बिलकुल नहीं चलेगा. . .अरे मियां, कोई समझेगा ही नहीं। अब तो कमस खुदा की, मैं भी नहीं समझा टाइनी क्या बला है। क्यों सईद मियां, क्या ख्य़ाल है?'

सईद मियां गर्दन इनकार में हिलाने लगे और और बोले, 'चचा, यहां तो सिटी मांटेसरी और इंग्लिस मिडियम पब्लिक स्कूल ही समझते हैं और वो. . .' उनकी बात काटकर वकील साहब बोले, 'वो भी हिंदी में लिखा होना चाहिए।'

'टोडलर्स डेन,' फिर मैंने मजाक में कहा, 'रख लीजिए।'
इस पर तो वकील साहब लोटने लगे। हंसते-हंसते उनके पेट में बल पड़ गए। बोले, 'वा भई वाह. . .क्या नाम है. . .जैसे मुर्गी का दड़बा।'
अब सईद मियां की तरफ मुड़े, 'तुम अंग्रेजी की प्रैक्टिस कर रहे हो?'
'जी हां।'

'क्या कर रहे हो?'
'प्रेजेंट, पास्ट और 'फ़्यूचर टेंस याद कर रहा हूं।'
'पिछले हफ़्ते भी तुमने यही कहा था। अच्छी तरह समझ लो कि मैं स्कूल में एक लफ़्ज़ भी हिंदी या उर्दू का नहीं बर्दाश्त करूंगा।'
'जी हां,' सईद मियां बोले।
'बच्चों से तो अंग्रेजी में बता कर सकते हो?'

'क्यों नहीं कर सकता. . .जैसे ये सिटी व इंग्लिस मिडियम पब्लिक स्कूल, जो शहर का टॉप इंग्लिस स्कूल है, की टीचरें बच्चों से अंग्रेजी में बात करती हैं, वैसे तो कर सकता हूं।'
'ये कैसे?' मैंने पूछा।
'अरे चचा, कापी में लिख लेती हैं। पहले सवाल लिखती हैं जो बच्चों को रटा देती हैं। जैसे बच्चों से कहती हैं अगर तुमको बाथरूम जाना है तो कहा, 'मैम में आई गो टु बाथरूम।` जब बच्चे उनसे पूछते हैं तो वे कापी में देखकर जवाब दे देती हैं।'

'लेकिन इस सवाल का जवाब देने के लिए तो कापी में देखने की जरूरत नहीं है।'
'चचा, यह तो एग्जांपल दी है। करती ऐसा ही हैं।'
'अच्छा जनाब, एडमीशन के लिए जो लोग आएंगे, उनसे भी आपको अंग्रेजी ही में बातचीत करनी पड़ेगी।' मुझे लगा वकील साहब और सईद मियां के बीच रस्साकशी हो रही है। इस सवाल पर सईद मियां थोड़ा कसमसाए, फिर बोले, 'हां अगर वो लोग अंग्रेजी में बोले तो मैं भी अंग्रेजी में बोलूंगा।' वकील साहब जवाब सुनकर सकते में आ गए। सब जानते हैं कि इस शहर में जो लोग अपने बच्चों को इंग्लिश मिडियम स्कूल में दाखिल कराने आएंगे, वे अंग्रेजी नहीं बोल सकते।

'यही तो तुम्हारी गलती है. . .तुम अपना सब काम दूसरों के हिसाब से करते हो. . .अरे तुम्हें क्या. . .वे चाहे बोले, चाहे न बोलो. . .तुम अपना अंग्रेजी पेलते रहो. . .साले समझें तो कहां आ गए हैं।'
'यानी चाहे समझ में आए न आए?'
'बिलकुल।'

'तो ठीक है, यही सही,' सईद मियां का चेहरा खिंच गया।
कुछ देर बाद वकील नरम होकर बोले, 'अब ऐसा भी कर देना कि साले भाग ही जाएं।'
'नहीं-नहीं, भाग क्यों जाएंगे।'

वकील साहब ने बताया कि उनके जमाने में हिंदी-इंग्लिश ट्रांसलेशन में इस तरह के जुमले दिए जाते थे, जैसे आज बाजार में जूता चल गया, या वह चप्पल लेकर नौ-दो ग्यारह हो गया। फिर वकील साहब ने कहा, 'मैं यह भी सोचता हूं कि सईद मियां को टीचिंग में न डालूं. . .इन्हें वाइस प्रिंसिपल बना दूं।'
'क्यों?' मैंने पूछा।

'अरे भाई स्कूल में पांच-छ: लड़कियां पढ़ाएंगी. . .ये उनके बीच कहां घुसेंगे।' मैं पूरी बात समझ गया। सईद मियां भी समझ गए और झेंप गए।
शर्बत आने के बाद वकील साहब बातचीत को स्कूल के नाम की तरफ घसीट लाए। वे चाहते थे, ये मसला मेरे सामने ही तय हो जाए। सेंट पॉल, सेंट जांस, सेंट कोलंबस जैसे नाम उन्हें पसंद तो आए, पर डर यही था कि यहां उन नामों को कोई समझेगा नहीं। स्थानीय लोगों के अज्ञान पर रोते हुए वकील साहब बोले, 'अमां मिया धुर गंवार. . .साले गौखे . . .ये लोग क्या जानें सेंट क्या होता है. . .घुर गंवार. . .मैली-चिक्कट धोती और गंदा सलूका, पांव में चमरौधा जूता- मुंह उठाये चलते जाते हैं। हिंदी तक बोलनी नहीं आती, लेकिन कहते हैं, 'बबुआ का इंगरेजी इस्कूल में पढ़ावा चहत हन। टेंट में दो-तीन हज़ार के नोट दाबे रहता है. . .अब तुम ही बताओ, मुनाफे का धंधा हुआ कि न हुआ?'

'बिलकुल हुआ।'

रात उपर आसमान में तारे-ही-तारे थे। चांदनी फैली हुई थी। रात की रानी की महक बेरोक-टोक थी। अच्छी-खासी तेज़ हवा न चल रही होती तो मच्छर इस सुहावनी रात में फिल्मी खलनायकों जैसा आचरण करने लगते। बराबर में सबकी चारपाइयां बिछी थीं। सब सो रहे थे। रात का आखिरी पहर था। मैं वकील साहब से जिरह कर रहा था, 'आप ये क्यों नहीं समझते कि पूरी दुनिया में बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाता है।'

'मुझे क्या मतलब लोगों से, क्या मतलब मातृभाषा से. . .ये तो धंधा है. . .धंधा। हर आदमी अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़वाना चाहता है।'
'लेकिन क्यों?'
'अंग्रेजी तो पानी है. . .जैसे बिन पानी सब सून है. . .वैसे ही बिन अंग्रेजी सब कुछ सूना है।'

'लेकिन ऐसा है क्यों?'
'अंग्रेज़ी हम लोगों के हुक्मरानों की जबान है।'
'क्या अब भी कोई हमारे उपर शासन करता है?'
वकील साहब जोर से हंसे, 'तुम यही नहीं जानते?'
मैंने दिल में कहा, 'जानता हूं पर मानता नहीं।`

वे धीरे-धीरे पूरे आत्मविश्वास के साथ इस तरह बोलने लगे जैसे उनका एक-एक वाक्य पत्थर पर खिंची लकीर जैसा सच हो- 'अंग्रेजी से आदमी की इज्जत होती है. . .'रुतबा. . .पोजीशन. . .पावर. . .जो इज्जत तुम्हें अंग्रेजी बोलकर मिलेगी वह हिंदी या उर्दू या दीगर हिंदुस्तानी जुबानें बोलकर मिलेगी?' उन्होंने सवाल किया।
'हां मिलेगी. . .आज न सही तो कल मिलेगी।'
हवा के झोंकों ने मच्छरों को फिर तितर-बितर कर दिया। रात की रानी की महक दूर तक फैल गयी। पूरब में मीलों दूर 'सूर्य के देश में` सुबह हो चुकी होगी।
*******-*******

8 हरिराम और गुरु-संवाद
(1)
गुरु : तुम्हारा जीवन बर्बाद हो गया हरिराम!
हरिराम : कैसे गुरुदेव?
गुरु : तुम जीभी चलाना न सीख सके!
हरिराम : पर मुझे तलवार चलाना आता है गुरुदेव!
गुरु : तलवार से गरदन कटती है, पर जीभ से पूरा मनुष्य कट जाता है।
(2)
गुरु : हरिराम, भीड़ में घुसकर तमाशा देखा करो।
हरिराम : क्यों गुरुदेव?
गुरु : इसलिए की भीड़ में घुसकर तमाशा न देख सके तो खुद तमाशा बन जाओगे!


(3)
हरिराम : क्रांति क्या है गुरुदेव?
गुरु : क्रांति एक चिड़िया है हरिराम!
हरिराम : वह कहां रहती है गुरुदेव!
गुरु : चतुर लोगों की ज़ुबान पर और सरल लोगों के दिलों में।
हरिराम : चतुर लोग उसका क्या करते हैं?
गुरु : चतुर लोग उसकी प्रशंसा करते हैं, उसके गीत गाते हैं और समय आने पर उसे चबा जाते हैं।
हरिराम : और सरल लोग उसका क्या करते हैं?
गुरु : वह उनके हाथ कभी नहीं आती।

(4)
हरिराम : गुरुदेव, अगर एक हड्डी के लिए दो भूखे कुत्ते लड़ रहे हों तो उन्हें देखकर एक सरल आदमी क्या करेगा?
गुरु : बीच-बचाव कराएगा।
हरिराम : और चतुर आदमी क्या करेगा?
गुरु : हड्डी लेकर भाग जाएगा।
हरिराम : और राजनीतिज्ञ क्या करेगा?
गुरु : दो भूखे कुत्ते वहां और छोड़ देगा।

(5)
हरिराम : आदमी क्या है गुरुदेव?
गुरु : यह एक प्रकार का जानवर है हरिराम!
हरिराम : यह जानवर क्या करता है गुरुदेव?
गुरु : यह विचारों का निर्माण करता है।
हरिराम : फिर क्या करता है?
गुरु : फिर विचारों के महल बनाता है।
हरिराम : फिर क्या करता है?
गुरु : फिर उनमें विचरता है।
हरिराम : फिर क्या करता है?
गुरु : फिर विचारों को खा जाता है।
हरिराम : फिर क्या करता है?
गुरु : फिर नए विचारों का निर्माण करता है।

(6)
हरिराम : संसार क्या है गुरुदेव?
गुरु : एक चारागाह है हरिराम!
हरिराम : उसमें कौन चरता है?
गुरु : वही चरता है जिसके आंखें होती हैं।
हरिराम : आंखें किसके होती हैं गुरुदेव?
गुरु : जिसके जीभ होती है।
हरिराम : जीभ किसके होती है गुरुदेव?
गुरु : जिसके पास बुद्धि होती है।
हरिराम : बुद्धि किसके पास होती है गुरुदेव?
गुरु : जिसके पास दुम होती है।
हरिराम : दुम किसके पास होती है गुरुदेव?
गुरु : जिसे दुम की इच्छा होती है।


(7)
गुरु : हरिराम, बताओ सफलता का क्या रहस्य है?
हरिराम : कड़ी मेहनत गुरुदेव!
गुरु : नहीं।
हरिराम : बुद्धिमानी?
गुरु : नहीं।
हरिराम : ईमानदारी?
गुरु : नहीं।
हरिराम : प्रेम?
गुरु : नहीं।
हरिराम : फिर सफलता का क्या रहस्य है गुरुदेव?
गुरु : असफलता।

(8)
हरिराम : गुरुदेव, अगर एक सुंदर स्त्री के पीछे दो प्रेमी लड़ रहे हों तो स्त्री को क्या करना चाहिए।
गुरु : तीसरे प्रेमी की तलाश।
हरिराम : क्यों गुरुदेव?
गुरु : इसलिए कि स्त्री के पीछे लड़ने वाले प्रेमी नहीं हो सकते।

(9)
हरिराम : सबसे बड़ा दर्शन क्या है गुरुदेव?
गुरु : हरिराम, सबसे बड़ा दर्शन चाटुकारिता है।
हरिराम : कैसे गुरुदेव?
गुरु : इस तरह कि चाटुकार बड़े-से-बड़े दर्शन को चाट जाता है।

(10)
हरिराम : ईमानदारी क्या है गुरुदेव?
गुरु : यह एक भयानक जानलेवा बीमारी का नाम है।
हरिराम : क्या ये बीमारी हमारे देश में भी होती है?
गुरु : हरिराम, बहुत पहले प्लेग, टी.बी. और हैजे की तरह इसका भी कोई इलाज न था। तब ये हमारे देश में फैलती थी और लाखों लोगों को चट कर जाती थी।
हरिराम : और अब गुरुदेव?
गुरु : अब उस दवा का पता चल गया है, जिसके कारण यह बीमारी रोकी जा सकती है।
हरिराम : उस दवा का क्या नाम है गुरुदेव?
गुरु : आज बच्चे-बच्चे की जुबान पर उस दवा का नाम है लालच।

***-***

9 स्विमिंग पूल

मुझे लग रहा था कि जिसका मुझे डर था, वही होने जा रहा है। और अफसोस यह कि मैं कोशिश भी करूं तो उसे रोक नहीं सकता। मैंने कई प्रयत्न किए कि पत्नी मेरी तरफ देख लें ताकि इशारे-ही-इशारे में उन्हें खामोश रहने का इशारा कर दूं, लेकिन वे लगातार वी.आई.पी. से बातें किए जा रही थीं! मेरे सामने कुछ दूसरे अतिथि खड़े थे, जिन्हें छोड़कर मैं एकदम से पत्नी और वी.आई.पी. की तरफ नहीं जा सकता था। प्रयास करता हुआ जब तक मैं वहां पहुंचा तो पत्नी वी.आई.पी. से 'उसी` के बारे में बात कर रही थीं। धाराप्रवाह बोल रही थीं। मैं शर्मिंदा हुआ जा रहा था। जब मुझसे खामोश न रहा गया तो बोला, 'अरे छोड़ो, ठीक हो जाएगा।'

पत्नी गुस्से में बोली, 'आपको क्या है, सुबह घर से निकल जाते हैं तो रात ही में वापस आते हैं। जो दिन-भर घर में रहता हो उससे पूछिए कि क्या गुज़रती है।'

यह कहकर पत्नी फिर 'उसके` बारे में शुरू हो गईं। मैं दिल-ही-दिल में सोचने लगा कि पत्नी पागल नहीं हो, हद दर्जे की बेवकूफ जरूर है जो इतने बड़े, महत्वपूर्ण और प्रभावशाली वी.आई.पी. से शिकायत भी कर रही है तो ये कि देखिए हमारे घर के सामने नाला बहता है, उसमें से बदबू आती है, उसमें सुअर लौटते हैं, उसमें आसपास वाले भी निगाह बचाकर गंदगी फेंक जाते है।, नाले को कोई साफ नहीं करता। सैंकड़ों बार शिकायतें दर्ज कराई जा चुकी हैं। एक बार तो किसी ने मरा हुआ इतना बड़ा चूहा फेंक दिया था। वह पानी में फूलकर आदमी के बच्चे जैसा लगने लगा था।

यह सच है कि हमने घर के सामने वाले नाले की शिकायतें सैकड़ों बार दर्ज कराई हैं। लेकिन नाला साफ कभी नहीं हुआ। उसमें से बदबू आना कम नहीं हुई। जब हम लोग शिकायतें करते-करते थक गए तो ऐसे परिचितों से मिले जो इस बारे में मदद कर सकते थे, यानी कुछ सरकारी कर्मचारी या नगरपालिका के सदस्य या और दूसरे किस्म के प्रभावशाली लोग। लेकिन नाला साफ नहीं हुआ। हमारे यहां जो मित्र लगातार आते हैं, वे नाला-सफाई कराने संबंधी पूरी कार्यवाही से परिचित हो गए हैं। सब जानते हैं कि इस बारे में उपराज्यपाल को दो रजिस्टर्ड पत्र जा चुके हैं। इसके बारे में एक स्थानीय अखबार में फोटो सहित विवरण छप चुका है। इसके बारे में महानगरपालिका के दफ़्तर में जो पत्र भेजे गए हैं उनकी फ़ाइल इतनी मोटी हो गई है कि आदमी के उठाए नहीं उठती, आदि-आदि।

वी.आई.पी. को घर बुलाने से पहले भी मुझे डर था कि पत्नी कहीं उनसे नाले का रोना न लेकर बैठ जाएं। क्योंकि मैं उनकी मानसिक हालत समझता था, इसलिए मैंने उन्हें समझाया था कि देखो नाला-वाला छोटी चीज़ें हैं, वह वी.आई.पी. के बाएं हाथ का भी नहीं, आंख के इशारे का काम है। ये काम तो उनके यहां आने की खबर फैलते ही, अपने-आप हो जाएगा। लेकिन इस वक्त पत्नी सब कुछ भूल चुकी थीं। मजबूरन मुझे भी वी.आई.पी. के सामने 'हां` 'हूं` करनी पड़ रही थी। आखिरकार वी.आई.पी. ने कहा कि यह चिंता करने की कोई बात नहीं है।

वी.आई.पी. के आश्वासन के बाद ही पत्नी कई साल के बाद ठीक से सो पाईं। उन्हें दोस्तों और मोहल्ले वालों ने बधाई दी कि आखिर काम हो ही गया।

वी.आई.पी. के आश्वासन से हम लोग इतने आश्वस्त थे कि एक-दो महीने तो हमने नाले के बारे में सोचा ही नहीं, उधर देखा ही नहीं। नाला हम सबको कैंसर के उस रोगी जैसा लगता था जो आज न मरा तो कल मर जाएगा।. . .कल न सही तो परसों. . .पर मरना निश्चित है। धीरे-धीरे नाला हमारी बातचीत से बाहर हो गया।

जब कुछ महीने गुज़र गए तो पत्नी ने महानगर पालिका को फोन किया। वहां से उत्तर मिला कि नाला साफ किया जाएगा। फिर कुछ महीने गुज़रे, नाला वैसे का वैसा ही रहा। पत्नी ने वी.आई.पी. के ऑफिस फोन किए। वे इतने व्यस्त थे, दौरों पर थे, विदेशों में थे कि संपर्क हो ही नहीं सका।

महीनों बाद जब वी.आई.पी. से संपर्क हुआ तो उन्हें बहुत आत्मविश्वास से कहा कि काम हो जाएगा। चिंता मत कीजिए। लेकिन यह उत्तर मिले छ: महीने बीत गए तो पत्नी के धैर्य का बांध टूटने लगा। वे मंत्रालय से लेकर दीगर दफ़्तरों के चक्कर काटने लगीं। इस मेज से उस मेज तक। उस कमरे से इस कमरे तक। सिर्फ 'हां` 'हां` 'हां` 'हां` जैसे आश्वासन मिलते रहे, लेकिन हुआ कुछ नहीं।

एक दिन जब मैं ऑफिस से लौटकर आया तो पत्नी ने बताया कि उन्होंने नाले में बहुत-से फल बहते देखे हैं। मैंने कहा, 'किसी ने फेंके होंगे।'
इस घटना के दो-चार दिन बाद पत्नी ने बताया कि उन्होंने नाले में किताबें बहती देखी हैं। यह सुनकर मैं डर गया। लगा शायद पत्नी का दिमाग हिल गया है, लेकिन पत्नी नार्मल थीं।

फिर तो पत्नी ही नहीं, मोहल्ले के और लोग भी नाले में तरह-तरह की चीजें बहती देखने लगे। किसी दिन जड़ से उखड़े पेड़, किस दिन चिड़ियों के घोंसले, किसी दिन टूटी हुई शहनाई।
एक दिन देर से रात गए घर आया तो पत्नी बहुत घबराई हुई लग रही थीं। बोली, 'आज मैंने वी.आई.पी. को नालें में तैरते देखा था। वे बहुत खुश लग रहे थे। नाले में डुबकियां लगा रहे थे। हंस रहे थे। किलकारियां मार रहे थे। उछल-कूद रहे थे, जैसा लोग स्विमिंग पूल में करते हैं!'
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10 ज़ख्म़

बदलते हुए मौसमों की तरह राजधानी में साम्प्रदायिक दंगों का भी मौसम आता है। फर्क इतना है कि दूसरे मौसमों के आने-जाने के बारे में जैसे स्पष्ट अनुमान लगाये जा सकते हैं वैसे अनुमान साम्प्रदायिक दंगों के मामले में नहीं लगते। फिर भी पूरा शहर यह मानने लगा है कि साम्प्रदायिक दंगा भी मौसमों की तरह निश्चित रूप से आता है। बात इतनी सहज-साधारण बना दी गयी है कि साम्प्रदायिक दंगों की खबरें लोग इसी तरह सुनते हैं जैसे 'गर्मी बहुत बढ़ गयी है` या 'अबकी पानी बहुत बरसा` जैसी खबरें सुनी जाती हैं। दंगों की खबर सुनकर बस इतना ही होता है कि शहर का एक हिस्सा 'कर्फ़्यूग्रस्त` हो जाता है। लोग रास्ते बदल लेते हैं। इस थोड़ी-सी असुविधा पर मन-ही-मन कभी-कभी खीज जाते हैं, उसी तरह जैसे बेतरह गर्मी पर या लगातार पानी बरसने पर कोफ़्त होती है। शहर के सारे काम यानी उद्योग, व्यापार, शिक्षण, सरकारी काम-काज सब सामान्य ढंग से चलता रहता है। मंत्रिमंडल की बैठकें होती हैं। संसद के अधिवेशन होते हैं। विरोधी दलों के धरने होते हैं। प्रधानमंत्री विदेश यात्राओं पर आते हैं, मंत्री उद्घाटन करते हैं, प्रेमी प्रेम करते हैं, चोर चोरी करते हैं। अखबार वाले भी दंगे की खबरों में कोई नया या चटपटापन नहीं पाते और प्राय: हाशिए पर ही छाप देते हैं। हां, मरने वालों की संख्या अगर बढ़ जाती है तो मोटे टाइप में खबर छपती है, नहीं तो सामान्य।

यह भी एक स्वस्थ परंपरा-सी बन गयी है कि साम्प्रदायिक दंगा हो जाने पर शहर में 'साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन` होता है। सम्मेलन के आयोजकों तथा समर्थकों के बीच अक्सर इस बात पर बहस हो जाती है कि दंगा होने के तुरंत बात न करके सम्मेलन इतनी देर में क्यों किया गया। इस इलज़ाम का जवाब आयोजकों के पास होता है। वे कहते हैं कि प्रजातांत्रिक तरीके से काम करने में समय लगता है क्योंकि किसी वामपंथी पार्टी का प्रान्तीय कमेटी सम्मेलन करने का सुझाव राष्ट्रीय कमेटी को देती है। राष्ट्रीय कमेटी एक तदर्थ समिति बना देती है ताकि सम्मेलन की रूपरेखा तैयार की जा सके। तदर्थ समिति अपने सुझाव देने में कुछ समय लगाती है। उसके बाद उसकी सिफारिशें राष्ट्रीय कमेटी में जाती हैं। राष्ट्रीय कमेटी में उन पर चर्चा होती है और एक नया कमेटी बनायी जाती है जिसका काम सम्मेलन के स्वरूप के अनुसार कार्य करना होता है। अगर राय यह बनती है कि साम्प्रदायिकता जैसे गंभीर मसले पर होने वाले सम्मेलन में सभी वामपंथी लोकतांत्रिक शक्तियों को एक मंच पर लाया जाये, तो दूसरे दलों से बातचीत होती है। दूसरे दल भी जनतांत्रिक तरीके से अपने शामिल होने के बारे में निर्णय लेते हैं। उसके बाद यह कोशिश की जाती है कि 'साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन` में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने के लिए नामी हिंदी, मुसलमान, सिख नागरिकों का होना भी जरूरी है। उनके नाम सभी दल जनतांत्रिक तरीके से तय करते हैं। अच्छी बात है कि शहर में ऐसे नामी हिंदी, मुस्लिम, सिख नागरिक हैं जो इस काम के लिए तैयार हो जाते हैं। उन नागरिकों की एक सूची है, उदाहरण के लिए भारतीय वायुसेना से अवकाशप्राप्त एक लेफ़्टीनेंट जनरल हैं, जो सिख हैं, राजधानी के एक अल्पसंख्यकनुमा विश्वविद्यालय के उप-कुलपति मुसलमान हैं तथा विदेश सेवा से अवकाश-प्राप्त एक राजदूत हिंदू हैं, इसी तरह के कुछ और नाम भी हैं। ये सब भले लोग हैं, समाज और प्रेस में उनका बड़ा सम्मान है। पढ़े-लिखे और बड़े-बड़े पदों पर आसीन या अवकाशप्राप्त। उनके सेकुलर होने में किसी को कोई शक नहीं हो सकता। और वे हमेशा इस तरह के साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलनों में आने पर तैयार हो जाते हैं।


एक दिन सो कर उठा और हस्बे-दस्तूर आंखें मलता हुआ अखबार उठाने बालकनी पर आया तो हैडिंग थी 'पुरानी दिल्ली में दंगा हो गया। तीन मारे गये। बीस घायल। दस की हालत गंभीर। पचास लाख की सम्पत्ति नष्ट हो गयी।` पूरी खबर पढ़ी तो पता चला कि दंगा कस्माबपुरे में भी हुआ है। कस्माबपुरे का ख्याल आते ही मुख्तार का ख्याल आ गया। वह वहीं रहता था। अपने ही शहर का था। सिलाई का काम करता था कनाट प्लेस की एक दुकान में। अब सवाल ये था कि मुख्तार से कैसे 'कान्टैक्ट` हो। कोई रास्ता नहीं था, न फोन, न कर्फ़्यूपास और न कुछ और।


मुख्तार और मैं, जैसा कि मैं लिख चुका हूं, एक ही शहर के हैं। मुख्तार दर्जा आठ तक इस्लामिया स्कूल में पढ़ा था और फिर अपने पुश्तैनी सिलाई के धंधे में लग गया था। मैं उससे बहुत बाद में मिला था। उस वक्त जब मैं हिंदी में एम.ए. करने के बाद बेकारी और नौकरी की तलाश से तंग आकर अपने शहर में रहने लगा था। वहां मेरे एक रिश्तेदार, जिन्हें हम सब हैदर हथियार कहा करते थे, आवारगी करते थे। आवारगी का मतलब कोई गलत न लीजिएगा, मतलब ये कि बेकार थे। इंटर में कई बार फेल हो चुके थे और उनका शहर में जनसम्पर्क अच्छा था। तो उन्होंने मेरी मुलाकात मुख्तार से कराई थी। पहली, दूसरी और तीसरी मुलाकात में वह कुछ नहीं बोला था। शहर का मुख्य सड़क पर सिलाई की एक दुकान में वह काम करता था और शाम को हम लोग उसकी दुकान पर बैठा करते थे। दुकान का मालिक बफाती भाई मालदार और बाल-बच्चेदार आदमी था। वह शाम के सात बजते ही दुकान की चाबी मुख्तार को सौंपकर और भैंसे का गोश्त लेकर घर चला जाता था। उसके बाद वह दुकान मुख्तार की होती थी। एक दिन अचानक हैदर हथियार ने यह राज खोला कि मुख्तार भी 'बिरादर` है। 'बिरादर` का मतलब भाई होता है, लेकिन हमारी जुबान में 'बिरादर` का मतलब था जो आदमी शराब पीता हो।

शुरू-शुरू में मुख्तार का मुझसे जो डर था वह दो-चार बार साथ पीने से खत्म हो गया था। और मुझे ये जानकर बड़ी हैरत हुई थी कि वह अपने समाज और उसकी समस्याओं में रुचि रखता है। वह उर्दू का अखबार बराबर पढ़ता था। खबरें ही नहीं, खबरों का विश्लेषण भी करता था और उसका मुख्य विषय हिन्दू मुस्लिम साम्प्रदायिकता थी। जब मैं उससे मिला तब, अगर बहुत सीधी जुबान से कहें तो वह पक्का मुस्लिम साम्प्रदायिक था। शराब पीकर जब वह खुलता था तो शेर की तरह दहाड़ने लगता था। उसका चेहरा लाल हो जाता था। वह हाथ हिला-हिलाकर इतनी कड़वी बातें करता था कि मेरा जैसा धैर्यवान न होता तो कब की लड़ाई हो गयी होती। लेकिन मैं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में रहने और और वहां 'स्टूडेंट्स फेडरेशन` की राजनीति करने के कारण थोड़ा पक चुका था। मुझे मालूम था कि भावुकता और आक्रोश का जवाब केवल प्रेम और तर्क से दिया जा सकता है। वह मुहम्मद अली जिन्ना का भक्त था। श्रद्धावश उनका नाम नहीं लेता था। बल्कि उन्हें 'कायदे आजम` कहता था। उसे मुस्लिम लीग से बेपनाह हमदर्दी थी और वह पाकिस्तान के बनने और द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को बिलकुल सही मानता था। पाकिस्तान के इस्लामी मुल्क होने पर वह गर्व करता था और पाकिस्तान को श्रेष्ठ मानता था।

मुझे याद है कि एक दिन उसकी दुकान में मैं, हैदर हथियार और उमाशंकर बैठे थे। शाम हो चुकी थी। दुकान के मालिक बफाती भाई जा चुके थे। कड़कड़ाते जाड़ों के दिन थे। बिजली चली गयी थी। दुकान में एक लैंप जल रहा था, उसकी रोशनी में मुख्तार मशीन की तेजी से एक पैंट सी रहा था। अर्जेन्ट काम था। लैम्प की रोशनी की वजह से सामने वाली दीवार पर उसके सिर की परछाईं एक बड़े आकार में हिल रही थी। मशीन चलने की आवाज से पूरी दुकान थर्रा रही थी। हम तीनों मुख्तार के काम खत्म होने का इंतजार कर रहे थे। प्रोग्राम यह था कि उसके बाद 'चुस्की` लगाई जायेगी। आधे घंटे बाद काम खत्म हो गया और चार 'चार की प्यालियां` लेकर हम बैठ गये। बातचीत घूम-फिर कर पाकिस्तान पर आ गई। हस्बे दस्तूर मुख्तार पाकिस्तान की तारीफ करने लगा। 'कायदे आजम` की बुद्धिमानी के गीत गाने लगा। उमाशंकर से उसका कोई पर्दा न था, क्योंकि दोनों एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते थे। कुछ देर बाद मौका देखकर मैंने कहा, 'ये बताओ मुख्तार, जिन्ना ने पाकिस्तान क्यों बनवाया?'

'इसलिए कि मुसलमान वहां रहेंगे,' वह बोला।
'मुसलमान तो यहां भी रहते हैं।'
'लेकिन वो इस्लामी मुल्क है।'
'तुम पाकिस्तान तो गये हो?'
'हां, गया हूं।'

'वहां और यहां क्या फर्क है?'
'बहुत बड़ा फर्क है।'
'क्या फर्क है?'
'वो इस्लामी मुल्क है।'

'ठीक है, लेकिन ये बताओ कि वहां गरीबों-अमीरों में वैसा ही फर्क नहीं है जैसा यहां है? क्या वहां रिश्वत नहीं चलती? क्या वहां भाई-भतीजावाद नहीं है? क्या वहां पंजाबी-सिंधी और मोहाजिर 'लीजिंग` नहीं है? क्या पुलिस लोगों को फंसाकर पैसा नहीं वसूलती?' मुख्तार चुप हो गया। उमांशकर बोले, 'हां, बताओ. . .अब चुप काहे हो गये?' मुख्तार ने कहा, 'हां, ये सब तो वहां भी है लेकिन है तो इस्लामी मुल्क।'

'यार, वहां डिक्टेटरशिप है, इस्लाम तो बादशाहत तक के खिलाफ है, तो वो कैसा इस्लामी मुल्क हुआ?'
'अमें छोड़ो. . .क्या औरतें वहां पर्दा करती हैं? बैंक तो वहां भी ब्याज लेते-देते होंगे. . .फिर काहे की इस्लामी मुल्क।' उमाशंकर ने कहा।

'भइया, इस्लाम 'मसावात` सिखाता है. . .मतलब बराबरी, तुमने पाकिस्तान में बराबरी देखी?'
मुख्तार थोड़ी देर के लिए चुप हो गया। फिर अचानक फट पड़ा, 'और वहां क्या है मुसलमानों के लिए? इलाहाबाद, अलीगढ़, मेरठ, मुरादाबाद, दिल्ली, भिवण्डी- कितने नाम गिनाऊँ. . .मुसलमानों की जान इस तरह ली जाती है जैसे कीड़े-मकोड़े हों।'

'हां, तुम ठीक कहते हो।'
'मैं कहता हूं ये फसाद क्यों होते हैं?'
'भाई मेरे, फसाद होते नहीं, कराये जाते हैं।'
'कराये जाते हैं?'
'हां भाई, अब तो बात जग जाहिर है।'

'कौन कराते हैं?'
'जिन्हें उससे फायदा होता है।'
'किन्हें उससे फायदा होता है?'
'वो लोग जो मजहब के नाम पर वोट मांगते हैं। वो लोग जो मजहब के नाम पर नेतागिरी करते हैं।

'कैसे?'
'देखो, जरा सिर्फ तसव्वुर करो कि हिंदुस्तान में हिंदुओं, मुसलमानों के बीच कोई झगड़ा नहीं है। कोई बाबरी मस्जिद नहीं है। कोई राम-जन्मभूमि नहीं है। सब प्यार से रहते हैं, तो भाई, ऐसा हालत में मुस्लिम लीग या आर.एस.एस. के नेताओं के पास कौन जायेगा? उनका तो वजूद ही खत्म हो जायेगा। इस तरह समझ लो कि किसी शहर में कोई डॉक्टर है जो सिर्फ कान का इलाज करता है और पूरे शहर में सब लोगों के कान ठीक हो जाते हैं। किसी को कान की कोई तकलीफ नहीं है, तो डॉक्टर को अपना पेशा छोड़ना पड़ेगा या शहर छोड़ना पड़ेगा।'

वह चुप हो गया। शायद वह अपना जवाब सोच रहा था। मैंने फिर कहा, 'और फिरकापरस्ती से उन लोगों को भी फायदा होता है जो इस देश की सरकार चला रहे हैं।'
'कैसे?'

'अगर तुम्हारे दो पड़ोसी आपस में लड़ रहे हैं, एक-दूसरे के पक्के दुश्मन हैं, तो तुम्हें उन दोनों से कोई खतरा नहीं हो सकता. . .उसी तरह हिंदू और मुसलमान आपस में ही लड़ते रहे तो सरकार से क्या लड़ेंगे? क्या कहेंगे कि हमारा ये हक है, हमारा वो हक है तो तीसरा फायदा उन लोगों को पहुंचता है जिनका कारोबार उसकी वजह से तरक्की करता है। अलीगढ़ में फसाद, भिवण्डी में फसाद इसकी मिसालें हैं।'

ये तो शुरुआत थी। धीरे-धीरे ऐसा होने लगा कि हम लोग जब भी मिलते थे, बातचीत इन्हीं बातों पर होती। चाय का होटल हो या शहर के बाहर सड़क के किनारे कोई वीरान-सी पुलिया- बहस शुरू हो जाया करती थी। बहस भी अजब चीज है। अगर सामने वाले को बीच बहस में लग गया कि आप उसे जाहिल समझते हैं, उसका मजाक उड़ा रहे हैं, उसे कम पढ़ा-लिखा मान रहे हैं, तो बहस कका कभी कोई अंत नहीं होता।

उस जमाने में मुख्तार उर्दू के अखबारों और रिसालों का बड़ा भयंकर पाठक था। शहर में आने वाला शायद ही ऐसा कोई उर्दू अखबार, रिसाला, डाइजेस्ट हो जो वह न पढ़ता हो। इतना ज्यादा पढ़ने की वजह से उसे घटनायें, तिथियां और बयान इस कदर याद हो जाते थे कि बहस में उन्हें बड़े आत्मविश्वास के साथ 'कोट` करता रहता था। एक दिन उसने मुझे उर्दू के कुछ रिसालों और अखबारों का एक पुलिंदा दिया और कहा कि इन्हें पढ़कर आओ तो बहस हो। उर्दू में सामान्यत: जो राजनीतिक पर्चे छपते हैं, उनके बारे में मुझे हल्का-सा इल्म था। लेकिन मुख्तार के दिये रिसाले जब ध्यान से पढ़े तो भौंचक्का रह गया। इन परचों में मुसलमानों के साथ होने वाली ज्यादतियों को इतने भयावह और करुण ढंग से पेश किया गया था कि साधारण पाठक पर उनका क्या असर होगा, यह सोचकर डर गया। मिसाल के तौर पर इस तरह के शीर्षक थे 'मुसलमानों के खून से होली खेली गयी` या 'भारत में मुसलमान होना गुनाह है` या 'क्या भारत के सभी मुसलमानों को हिंदू बनाया जायेगा` या 'तीन हजार मस्जिदें, मन्दिरबना ली गयी हैं।` उत्तेजित करने वाले शीर्षकों के नीचे खबरें लिखने का जो ढंग था वह भी बड़ा भावुक और लोगों को मरने-मारने या सिर फोड़ लेने पर मजबूर करने वाला था।

वह दो-चार दिन बाद मिला तो बड़ा उतावला हो रहा था। बातचीत करने के लिए बोला, 'तुमने पढ़ लिये सब अखबार?'
'हां, पढ़ लिये।'

'क्या राय है. . .अब तो पता चला कि भारत में मुसलमानों के साथ क्या होता है। हमारी जान-माल, इज्जत-आबरू कुछ भी महफूज़ नहीं है।'
'हां, वो तो तुम ठीक कहते हो. . .लेकिन एक बात ये बताओ कि तुमने जो रिसाले दिये हैं वो फिरकापरस्ती को दूर करने, उसे खत्म करने के बारे में कभी कुछ नहीं लिखते?'

'क्या मतलब?' वह चौंक गया।
'देखो, मैं मानता हूं मुसलमानों के साथ ज्यादती होती है, दंगों में सबसे ज्यादा वही मारे जाते हैं। पी.ए.सी. भी उन्हें मारती है और हिंदू भी मारते हैं। मुसलमान भी मारते हैं हिंदुओं को। ऐसा नहीं है कि वे चुप बैठे रहते हों. . .।'

'हां, तो कब तक बैठे रहे? क्यों न मारें?' वह तड़पकर बोला।
'ठीक है तो वो तुम्हें मारें तुम उनको मारो. . .फिर ये रोना-धोना कैसा?'
'क्या मतलब है तुम्हारा?'
'मेरा मतलब है इसी तरह मारकाट होती रही तो क्या फिरकापरस्ती खत्म हो जायेगी?'
'नहीं, नहीं खत्म होगी।'

'और तुम चाहते हो, फिरकापरस्ती खत्म हो जाये?'
'हां।'
'तो ये अखबार, जो तुमने दिये, क्यों नहीं लिखते कि फिरकापरस्ती कैसे खत्म की जा सकती है?'

'ये अखबार क्यों नहीं चाहते होंगे कि फिरकापरस्ती खत्म हो?'
'ये तो वही अखबार वाले बता सकते हैं। जहां तक मैं समझता हूं ये अखबार बिकते ही इसलिए हैं कि इनमें दंगों की भयानक दर्दनाक और बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गयी तस्वीरें होती हैं। अगर दंगे न होंगे तो ये अखबार कितने बिकेंगे।'

मेरी इस बात पर वह बिगड़ गया। उसका कहना था कि ये कैसे हो सकता है कि मुसलमानों के इतने हमदर्द अखबार ये नहीं चाहते कि दंगे रुकें, मुसलमान चैन से रहें, हिंदू-मुस्लिम इत्तिहाद बने।

कुछ महीनों की लगातार बातचीत के बाद हम लोगों के बीच कुछ बुनियादी बातें साफ हो चुकी थीं। उसे सबसे बड़ी दिलचस्पी इस बात में पैदा हो गयी थी कि दंगे कैसे रोके जा सकते हैं। हम दोनों ये जानते थे कि दंगे पुलिस, पी.ए.सी. प्रशासन नहीं रोक सकता। दंगे साम्प्रदायिक पार्टियां भी नहीं रोक सकतीं, क्योंकि वे तो दंगों पर ही जीवित हैं। दंगों को अगर रोक सकते हैं तो सिर्फ लोग रोक सकते हैं।

'लेकिन लोग तो दंगे के जमाने में घरों में छिपकर बैठ जाते हैं।' उसने कहा।
'हां, लोग इसलिए छिपकर बैठ जाते हैं क्योंकि दंगा करने वालों के मुकाबले वो मुत्तहिद नहीं हैं. . .अकेला महसूस करते हैं अपने को. . .और अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। जबकि दंगा करने वो 'आरगेनाइज` होते हैं. . .लेकिन जरूरी ये है कि दंगों के खिलाफ जिन लोगों को संगठित किया जाये उनमें हिंदू-मुसलमान दोनों हों. . .और उनके ख्यालात इस बारे में साफ हों।'

'लेकिन ये काम करेगा कौन?'
'हम ही लोग, और कौन?'
'लेकिन कैसे?'

'अरे भाई, लोगों से बातचीत करके. . .मीटिंगें करके. . .उनको बता-समझाकर . . .मैं कहता हूं शहर में हिंदू-मुसलमानों का अगर दो सौ ऐसे लोगों का ग्रुप बन जाये जो जान पर खेलकर भी दंगा रोकने की हिम्मत रखते हों तो दंगा करने वालों की हिम्मत परस्त हो जायेगी। तुम्हें मालूम होगा कि दंगा करने वाले बुजदिल होते हैं। वो किसी 'ताकत` से नहीं लड़ सकते। अकेले-दुकेले को मार सकते हैं, आग लगा सकते हैं, औरतों के साथ बलात्कार कर सकते हैं, लेकिन अगर उन्हें पता चल जाये कि सामने ऐसे लोग है। जो बराबर की ताकत रखते हैं, उनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी, तो दंगाई सिर पर पैर रखकर भाग जायेंगे।'

वह मेरी बात से सहमत था और हम अगले कदम पर गौर करने की स्थिति में आ गये थे। मुख्तार इस सिलसिले में कुछ नौजवानों से मिला भी था।

कुछ साल के बाद हम दिल्ली में फिर साथ हो गये। मैं दिल्ली में धंधा कर रहा था और वह कनाट प्लेस की एक दुकान में काम करने लगा था और जब दिल्ली में दंगा हुआ और ये पता चला कि कस्साबपुरा भी बुरी तरह प्रभाव में है तो मुझे मुख्तार की फिक्र हो गयी। दूसरी तरफ मुख्तार के साथ जो कुछ घटा वह कुछ इस तरह था।. . .शाम का छ: बजा था। वह मशीन पर झुका काम कर रहा था। दुकान मालिक सरदारजी ने उसे खबर दी कि दंगा हो गया है और उसे जल्दी-से-जल्दी घर पहुंच जाना चाहिए।

पहाड़गंज में बस रोक दी गयी थी। क्योंकि आगे दंगा हो रहा था। पुलिस किसी को आगे जाने भी नहीं दे रही थी। मुख्तार ने मुख्य सड़क छोड़ दी और गलियों और पिछले रास्तों से आगे बढ़ने लगा। गलियां तक सुनसान थीं। पानी के नलों पर जहां इस वक्त चांव-चांव हुआ करती थी, सिर्फ पानी गिरने की आवाज आ रही थी। जब गलियों में लोग नहीं होते तो कुत्ते ही दिखाई देते हैं। कुत्ते ही थे। वह बचता-बचाता इस तरह आगे बढ़ता रहा कि अपने मोहल्ले तक पहुंच जाये। कभी-कभार और कोई घबराया परेशान-सा आदमी लंबे-लंबे कदम उठाता इधर से उधर जाता दिखाई पड़ जाता। एक अजीब भयानक तनाव था जैसे ये इमारतें बारूद की बनी हुई हों और ये सब अचानक एक साथ फट जायेंगे। दूर से पुलिस गाड़ियों से सायरन की आवाजें भी आ रही थीं। कस्साबपुरे की तरफ से हल्का-हल्का धुआं आसमान में फैल रहा था। न जाने कौन जल रहा होगा, न जाने कितने लोगों के लिए संसार खत्म हो गया होगा। न जाने जलने वालों में कितने बच्चे, कितनी औरतें होंगी। उनकी क्या गलती होगी? उसने सोचा अचानक एक बंद दरवाजे के पीछे से किसी औरत की पंजाबी में कांपती हुई आवाज गली तक आ गयी। वह पंजाबी बोल नहीं पाता था लेकिन समझ लेता था। और कह रही थी, बबलू अभी तक नहीं लौटा। मुख्तार ने सोचा, उसके बच्चे भी घर के दरवाजे पर खड़े झिर्रियों से बाहर झांक रहे होंगे। शाहिदा उसकी सलामती के लिए नमाज पढ़ रही होगी। भइया छत पर खड़े गली में दूर तक देखने की कोशिश कर रहे होंगे। छत पर खड़े एक-दो और लोगों से पूछ लेते होंगे कि मुख्तार तो नहीं दिखाई दे रहा है। उसके दिमाग में जितनी तेजी से ये ख्याल आ रहे थे उतनी तेज उसकी रफ़्तार होती जाती थी। सामने पीपल के पेड़ से कस्साबपुरा शुरू होता है और पीपल का पेड़ सामने ही है। अचानक भागता हुआ कोई आदमी हाथ में कनस्तर लिये गली में आया और मुख्तार को देखकर एक पतली गली में घुस गया। अब मुख्तार को हल्का-हल्का शोर भी सुनाई पड़ रहा था। पीपल के पेड़ के बाद खतरा न होगा, क्योंकि यहां से मुसलमानों की आबादी शुरू होती थी। ये सोचकर मुख्तार ने दौड़ना शुरू कर दिया। पीपल के पेड़ के पास पहुंचकर मुड़ा और उसी वक्त हवा में उड़ती कोई चीज उसके सिर से टकराई और उसे लगा कि सिर आग हो गया है। दहकता हुआ अंगारा। उसने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया और भागता रहा। उसे ये समझने में देर नहीं लगी कि एसिड का बल्ब उसके सिर पर मारा गया है। सर की आग लगातार बढ़ती जा रही थी और वह भागता जा रहा था। उसे लगा कि वह जल्दी ही घर न पहुंच गया तो गली में गिरकर बेहोश हो जायेगा और वहां गिरने का नतीजा उसकी लाश पुलिस ही उठाएगी। दोनों बच्चों के चेहरे उसकी नजरों में घूम गये।

दंगा खत्म होने के बाद मैं मुख्तार को देखने गया। उसके बाल भूरे जैसे हो गये थे और लगातार गिरते थे। सिर की खाल बुरी तरह जल गयी थी और ज़ख्म़ हो गये थे। एसिड का बल्ब लगने के बराबर ही भयानक दुर्घटना ये हुई थी कि जब वह घर पहुंचा था तो उसे पानी से सिर नहीं धोने दिया गया था। सबने कहा था कि पानी मत डालो। पानी डालने से बहुत गड़बड़ हो जायेगी। और वह खुद ऐसी हालत में नहीं था कि कोई फैसला कर सकता। आठ दिन कर्फ्यू चला था और जब वह डॉक्टर के पास गया था तो डॉक्टर ने उसे बताया था कि अगर वह फौरन सिर धी लेता तो इतने गहरे ज़ख्म़ न होते।

दंगे के बाद साम्प्रदायिक सद्भावना स्थापित करने के लिए सम्मेलन किये जाने की कड़ी में इन दंगों में तीन महीने बाद सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में मैंने सोचा मुख्तार को ले चलना चाहिए। उसे एक दिन की छुट्टी करनी पड़ी और हम दोनों राजधानी की वास्तविक राजधानी- यानी राजधानी का वह हिस्सा जहां चौड़ी साफ सड़कें, सायादार पेड़, चमचमाते हुए फुटपाथ, उंचे-उंचे बिजली के खम्बे और चिकनी-चिकनी इमारते हैं और वैसे ही चिकने-चिकने लोग हैं। मुख्तार भव्य इमारत में घुसने से पहले कुछ हिचकिचाया, लेकिन मेरे बहादुरी से आगे बढ़ते रहने की वजह से उसमें कुछ हिम्मत आ गयी और हम अंदर आ गये। अंदर काफी चहल-पहल थी। विश्वविद्यालयों के छात्र, अध्यापक, संस्थानों के विद्वान, बड़े सरकारी अधिकारी, दफ़्तरों में काम करने वाले लोग, सभी थे। उनमें से अधिकतर चेहरे देखे हुए थे। वे सब वामपंथी राजनीति या उसके जन-संगठनों में काम करने वाले लोग थे। कहां कलाकार, लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार, रंगकर्मी और संगीतज्ञ भी थे। पूरी भीड़ में मुख्तार जैसे शायद ही चन्द रहे हों या न रहे हों, कहा नहीं जा सकता।

अंदर मंच पर बड़ा-सा बैनर लगा हुआ था। इस पर अंग्रेजी, हिंदी और उर्दू में 'साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन` लिखा था। मुझे याद आया कि वही बैनर है जो चार साल पहले हुए भयानक दंगों के बाद किये गये सम्मेलन में लगाया गया था। बैनर पर तारीखों की जगह पर सफेद कागज चिपकाकर नयी तारीखें लिख दी गयी थीं। मंच पर जो लोग बैठे थे वे भी वही थे जो पिछले और उससे पहले हुए साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलनों में मंच पर बैठे हुए थे। सम्मेलन होने की जगह भी वही थी। आयोजक भी वही थे। मुझे याद आया। पिछले सम्मेलन के एक आयोजक से सम्मेलन के बाद मेरी कुछ बातचीत हुई थी और मैंने कहा था कि दिल्ली के सर्वथा भद्र इलाके में सम्मेलन करने तथा ऐसे लोगों को ही सम्मेलन में बुलाने का क्या फायदा है जो शत-प्रतिशत हमारे विचारों से सहमत हैं। इस पर आयोजक ने कहा था कि सम्मेलन मजदूर बस्तियों, घनी आबादियों तथा उपनगरीय बस्तियों में भी होंगे। लेकिन मुझे याद नहीं कि उसके बाद ऐसा हुआ हो।

हाल में सीट पर बैठकर मुख्तार ने मुझसे यही बात कही। वह बोला 'इनमें तो हिंदु भी हैं और मुसलमान भी।'
मैंने कहा, 'हां!'

वह बोला, 'अगर ये सम्मेलन कस्साबपुरा में करते तो अच्छा था। वहां के मुसलमान ये मानते ही नहीं कि कोई हिंदू उनसे हमदर्दी रख सकता है।'

'वहां भी करेंगे. . .लेकिन अभी नहीं।' तभी कार्यवाही शुरू हो चुकी थी। संयोजक ने बात शुरू करते हुए साम्प्रदायिक शक्तियों की बढ़ती हुई ताकत तथा उसके खतरों की ओर संकेत किया। यह भी कहा कि जब तक साम्प्रदायिकता को समाप्त नहीं किया जायेगा तब तक जनवारी शक्तियां मजबूत नहीं हो सकतीं। उन्होंने यह आश्वासन भी दिया कि अब सब संगठित होकर साम्प्रदायिक रूपी दैत्य से लडेंगे। इस पर लोगों ने जोर की तालियां बजायीं और सबसे पहले अल्पसंख्यकों के विश्वविद्यालय के उप-कुलपति को बोलने के लिए आमंत्रित किया। उप-कुलपति आई.ए.एस. सर्विसेज में थे। भारत सरकार के उंचे ओहदों पर रहे थे। लंबा प्रशासनिक अनुभव था। उनकी पत्नी हिंदू थी। उनकी एक लड़की ने हिंदू लड़के से विवाह किया था। लड़के की पत्नी अमरीकन थी। उप-कुलपति के प्रगतिशील और धर्म निरपेक्ष होने में कोई संदेह न था। वे एक ईमानदार और प्रगतिशील व्यक्ति के रूप में सम्मानित थे। उन्होंने अपने भाषण में बहुत विद्वत्तापूर्ण ढंग से साम्प्रदायिकता की समस्या का विश्लेषण किया। उसके खतरनाक परिणामों की ओर संकेत किये और लोगों को इस चुनौती से निपटने को कहा। कोई बीस मिनट तक बोलकर वे बैठ गये। तालियां बजीं।

मुख्तार ने मुझसे कहा, 'प्रोफेसर साहब की समझ तो बहुत सही है।'
'हां, समझ तो उन सब लोगों की बिलकुल सही है जो यहां मौजूद हैं।'
'तो फिर?'

तब तक दूसरे वक्ता बोलने लगे थे। ये एक सरदार जी थे। उनकी उम्र अच्छी-खासी थी। स्वतंत्रता सेनानी थे और दसियों साल पहले पंजाब सरकार में मंत्री रह चुके थे। उन्होंने अपने बचपन, अपने गांव और अपने हिंदू, मुस्लिम, सिक्ख दोस्तों के संस्मरण सुनाये। उनके भाषण के दौरान लगभग लगातार तालियां बजती रहीं। फिर उन्होंने दिल्ली के हालिया दंगों पर बोलना शुरू किया।

मुख्तार ने मेरे कान में कहा, 'सरदार जी दंगा कराने वालों के नाम क्यों नहीं ले रहे हैं? बच्चा-बच्चा जानता है दंगा किसने कराया था।'
मैंने कहा, 'बचपने वाली बातें न करो। दंगा कराने वालों के नाम ले दिये तो वे लोग इन पर मुकदमा ठोक देंगे।'

'तो मुकदमे के डर से सच बात न कही जाये?'
'तुम आदर्शवादी हो। आइडियलिस्ट. . .।'
'ये क्या होता है?' मुख्तार बोला।
'अरे यार, इसका मकसद दंगा कराने वालों के नाम गिनाना तो है नहीं।'
'फिर क्या मकसद है इनका?'
'बताना कि फिरकापरस्ती कितनी खराब चीज है और उसके कितने बुरे नतीजे होते हैं।'
'ये बात तो यहां बैठे सभी लोग मानते हैं। जब ही तो तालियां बजा रहे हैं।'
'तो तुम क्या चाहते हो?'

'ये दंगा करने वालों के नाम बतायें।' मुख्तार की आवाज तेज हो गई। वह अपना सिर खुजलाने लगा।
'नाम बताने से क्या फायदा होगा?'
'न बताने से क्या फायदा होगा?'

स्वतंत्रता सेनानी का भाषण जारी था। वे कुछ किये जाने पर बोल रहे थे। इस पर जोर दे रहे थे कि इस लड़ाई को गलियों और खेतों में लड़ने की जरूरत है। स्वतंत्रता सेनानी के बाद एक लेखक को बोलने के लिए बुलाया गया। लेखक ने साम्प्रदायिकता के विरोध में लेखकों को एकजुट होकर संघर्ष करने की बात उठाई।
'तुम मुझ एक बात बताओ,' मुख्तार ने पूछा।
'क्या?'

'जब दंगा होता है तो ये सब लोग क्या करते हैं?'
मैं जलकर बोला, 'अखबार पढ़ते हैं, घर में रहते हैं और क्या करेंगे?'
'तब तो इस जुबानी जमा-खर्च का फायदा क्या है?'
'बहुत फायदा है, बताओ?'
'भाई, एक माहौल बनता है, फिरकापरस्ती के खिलाफ।'

'किन लोगों में? इन्हीं में जो पहले से ही फिरकापरस्ती के खिलाफ हैं? तुम्हें मालूम है दंगों के बाद सबसे पहले हमारे मोहल्ले में कौन आये थे?'
'कौन?'

'तबलीगी जमात और जमाते-इस्लामी के लोग. . .उन्होंने लोगों को आटा-दाल, चावल बांटा था, उन्होंने दवाएं भी दी थीं। उन्होंने कर्फ्यू पास भी बनवाये थे।'
'तो उनके इस काम से तुम समझते हो कि वे फिरकापरस्ती के खिलाफ हैं।'
'हों या न हों, दिल कौन जीतेगा. . .वही जो मुसीबत के वक्त हमारे काम आये या जो. . .'
मैं उसकी बात काटकर बोला, 'खैर बाद में बात करेंगे, अभी सुनने दो।'
कुछ देर बाद मैंने उससे कहा, 'बात ये है यार कि इन लोगों के पास इतनी ताकत नहीं है कि दंगों के वक्त बस्तियों में जायें।'

'इनके पास उतनी ताकत नहीं है और जमाते इस्लामी के पास है?'
मैं उस वक्त उसके इस सवाल का जवाब न दे पाया। मैंने अपनी पहली ही बात जारी रखी, 'जब इनके पास ज्यादा ताकत आ जायेगी तब ये दंगाग्रस्त इलाकों में जा सकेंगे, काम कर सकेंगे।'
'उतनी ताकत कैसे आयेगी?'

'जब ये वहां काम करेंगे।'
'पर अभी तुमने कहा कि इनके पास उतनी ताकत ही नहीं है कि वहां जा सकें. . .फिर काम कैसे करेंगे?'
'तुम कहना क्या चाहते हो?'
'मतलब यह है कि इनके पास इतनी ताकत नहीं है कि ये दंगे क बाद या दंगे के वक्त उन बस्तियों में जा सकें जहां दंगा होता है, और ताकत इनके पास उसी वक्त आयेगी जब ये वहां जाकर काम करेंगे. . .और जा सकते नहीं।'

'यार, हर वक्त दंगा थोड़ी होता रहता है, जब दंगा नहीं होता तब जायेंगे।'
'अच्छा ये बताओ, जमाते इस्लामी के मुकाबले इन लोगों को कमजोर कैसे मान रहे हो. . .इनके तो एम.पी. हैं, दो तीन सूबों में इनकी सरकारें हैं, जबकि जमाते इस्लामी का तो एक एम.पी. भी नहीं।'
मैं बिगड़कर बोला, 'तो तुम ये साबित करना चाहते हो कि ये झूठे, पाखंडी, कामचोर और बेईमान लोग हैं?'

'नहीं, नहीं, ये तो मैंने बिलकुल नहीं कहा!' वह बोला।
'तुम्हारी बात से मतलब तो यही निकलता है।'
'नही, मेरा ये मानना नहीं है।'
मैं धीरे-धीरे उसे समझाने लगा, 'यार, बात दरअसल ये है कि हम लोग खुद मानते हैं कि काम जितनी तेजी से होना चाहिए, नहीं हो रहा है। धीरे-धीरे हो रहा है, लेकिन पक्के तरीके से हो रहा है। उसमें टाइम तो लगता ही है।'
'तुम ये मानते होगे कि फिरकापरस्ती बढ़ रही है।'
'हां।'

'तो ये धीरे-धीरे जो काम हो रहा है उनका कोई असर नहीं दिखाई पड़ रहा है, हां फिरकापरस्ती जरूरी दिन दूनी रात चौगुनी स्पीड से बढ़ रही है।'
'अभी बाहर निकलकर बात करते हैं।' मैंने उसे चुप करा दिया।

इस बीच चाय सर्व की गयी। आखिरी वक्ता ने समय बहुत जो जाने और सारी बातें कह दी गयी हैं, आदि-आदि कहकर अपना भाषण समाप्त कर दिया। हम दोनों थोड़ा पहले ही बाहर निकल आये। सड़क पर साथ-साथ चलते हुए वह बोला, 'कोई ऐलान तो किसी को करना चाहिए था।'
'कैसा ऐलान?'

'मतलब ये है कि अब ये किया जायेगा, ये होगा।'
'अरे भाई, कहा तो गया कि जनता के पास जायेंगे, उसे संगठित और शिक्षित किया जायेगा।'
'कोई और ऐलान भी कर सकते थे।'
'क्या ऐलान?'

'प्रोफेसर साहब कह सकते थे कि अगर फिर दिल्ली में दंगा हुआ तो वे भूख हड़ताल पर बैठ जायेंगे। राइटर जो थे वो कहते कि फिर दंगा हुआ तो वे अपनी पद्मश्री लौटा देंगे। स्वतंत्रता सेनानी अपना ताम्रपत्र लौटाने की धमकी देते।' उसकी बात में मेरा मन खिन्न हो गया और मैं चलते-चलते रुक गया। मैंने उससे पूछा, 'ये बताओ, तुम्हें इतनी जल्दी, इतनी हड़बड़ी क्यों है?'
वह मेरे आगे झुका। कुछ बोला नहीं। उसने अपने सिर के बाल हटाये। मेरे सामने लाल-लाल जख्म थे जिसे ताजा खून रिस रहा था।

***-***

11 मुश्किल काम

जब दंगे खत्म हो गये, चुनाव हो गये, जिन्हें जीतना था जीत गये, जिनकी सरकार बननी थी बन गयी, जिनके घर और जिनके जख्म भरने थे भर गये, तब दंगा करने वाली दो टीमों की एक इत्तफाकी मीटिंग हुई। मीटिंग की जगह आदर्श थी यानी शराब का ठेका- जिसे सिर्फ चंद साल पहले से ही 'मदिरालय` कहा जाने लगा था, वहां दोनों गिरोह जमा थे, पीने-पिलाने के दौरान किसी भी विषय पर बात हो सकती है, तो बातचीत ये होने लगी कि पिछले दंगों में किसने कितनी बहादुरी दिखाई, किसने कितना माल लूटा, कितने घरों में आग लगाई, कितने लोगों को मारा, कितने बम फोड़े, कितनी औरतों को कत्ल किया, कितने बच्चों की टाँगें चीरीं, कितने अजन्मे बच्चों का काम तमाम कर दिया, आदि-आदि।

मदिरालय में कभी कोई झूठ नहीं बोलता यानी वहां कही गयी बात अदालत में गीता या कुरान पर हाथ रखकर खायी गयी कसम के बराबर होती है, इसलिए यहां जो कुछ लिखा जा रहा है, सच है और सच के सिवा कुछ नहीं है। खैरियत खैरसल्ला पूछने के बाद बातचीत इस तरह शुरू हुई। पहले गिरोह के नेता ने कहा 'तुम लोग तो जन्खे हो, जन्खे. . .हमने सौ दुकानें फूंकी हैं।' दूसरे ने कहा, 'उसमें तुम्हारा कोई कमाल नहीं है। जिस दिन तुमने आग लगाई, उस दिन तेज हवा चल रही थी. . .आग तो हमने लगाई थी जिसमें तेरह आदमी जल मेरे थे।'

बात चूंकि आग में आदमियों पर आयी थी, इसलिए पहले ने कहा, 'तुम तेरह की बात करते हो? हमने छब्बीस आदमी मारे हैं।' दूसरा बोला, 'छब्बीस मत कहो।'
'क्यों?'

'तुमने जिन छब्बीस को मारा है. . .उनमें बारह तो औरतें थीं।'
यह सुनकर पहला हंसा। उसने एक पव्वा हलक में उंडेल लिया और बोला, 'गधे, तुम समझते हो औरतों को मारना आसान है?'
'हां।'

'नहीं, ये गलत है।' पहला गरजा।
'कैसे?'

'औरतों की हत्या करने के पहले उनके साथ बलात्कार करना पड़ता है, फिर उनके गुप्तांगों को फाड़ना-काटना पड़ता है. . .तब कहीं जाकर उनकी हत्या की जाती है।'
'लेकिन वे होती कमजोर हैं।'

'तुम नहीं जानते औरतें कितनी जोर से चीखती हैं. . .और किस तरह हाथ-पैर चलाती हैं. . .उस वक्त उनके शरीर में पता नहीं कहां से ताकत आ जाती है. . .'
'खैर छोड़ो, हमने कुल बाइस मारे हैं. . .आग में जलाये इसके अलावा हैं।' दूसरा बोला।
पहले ने पूछा, 'बाईस में बूढे कितने थे?'

'झूठ नहीं बोलता. . .सिर्फ आठ थे।'
'बूढ़ों को मारना तो बहुत ही आसान है. . .उन्हें क्यों गिनते हो?'
'तो क्या तुम दो बूढ़ों को एक जवान के बराबर भी न गिनोगे?'

'चलो, चार बूढ़ों को एक जवान के बराबर गिन लूंगा।'
'ये तो अंधेर कर रहे हो।'
'अबे अंधेर तू कर रहा है. . .हमने छब्बीस आदमी मारे हैं. . .और तू हमारी बराबरी कर रहा है।'

दूसरा चिढ़ गया, बोला, 'तो अब तू जबान ही खुलवाना चाहता है क्या?'
'हां-हां, बोल बे. . .तुझे किसने रोका है।'
'तो कह दूं सबके सामने साफ-साफ?'
'हां. . .हां, कह दो।'

'तुमने जिन छब्बीस आदमियों को मारा है. . .उनमें ग्यारह तो रिक्शे वाले, झल्ली वाले और मजदूर थे, उनको मारना कौन-सी बहादुरी है?'
'तूने कभी रिक्शेवालों, मजदूरों को मारा है?'
'नहीं. . .मैंने कभी नहीं मारा।' वह झूठ बोला।
'अबे, तूने रिक्शे वालों, झल्ली वालों और मजदूरों को मारा होता तो ऐसा कभी न कहता।'

'क्यों?'

'पहले वे हाथ-पैर जोड़ते हैं. . .कहते हैं, बाबूजी, हमें क्यों मारते हो. . हम तो हिंदू हैं न मुसलमान. . .न हम वोट देंगे. . .न चुनाव में खड़े होंगे. . .न हम गद्दी पर बैठेंगे. . .न हम राज करेंगे. . .लेकिन बाद में जब उन्हें लग जाता है कि वो बच नहीं पायेंगे तो एक-आध को ज़ख्म़ी करके ही मरते हैं।'

दूसरे ने कहा, 'अरे, ये सब छोड़ो. . .हमने जो बाईस आदमी मारे हैं. . .उनमें दस जवान थे. . कड़ियल जवान. . . '

'जवानों को मारना सबसे आसान है।'
'कैसे? ये तुम कमाल की बात कर रहे हो!'
'सुनो. . .जवान जोश में आकर बाहर निकल आते हैं उनके सामने एक-दो नहीं पचासों आदमी होते हैं. . .हथियारों से लैस. . .एक आदमी पचास से कैसे लड़ सकता है?. . .आसानी से मारा जाता है।'

इसके बाद 'मदिरालय` में सन्नाटा छा गया, दोनों चुप हो गये। उन्होंने कुछ और पी, कुछ और खाया, कुछ बहके, फिर उन्हें धयान आया कि उनका तो आपस में कम्पटीशन चल रहा था।

पहले ने कहा, 'तुम चाहो जो कहो. . .हमने छब्बीस आदमी मारे हैं. . .और तुमने बाईस. . .'
'नहीं, यह गलत है. . .तुमने हमसे ज्यादा नहीं मारे।' दूसरा बोला।
'क्या उल्टी-सीधी बातें कर रहे हो. . .हम चार नंबरों से तुमसे आगे हैं।'

दूसरे ने ट्रम्प का पत्ता चला, 'तुम्हारे छब्बीस में बच्चे कितने थे?'
'आठ थे।'
'बस, हो गयी बात बराबर।'
'कैसे?'

'अरे, बच्चों को मारना तो बहुत आसान है, जैसे मच्छरों को मारना।'
'नहीं बेटा, नहीं. . .ये बात नहीं है. . . तुम अनाड़ी हो।'
दूसरा ठहाका लगाकर बोला, 'अच्छा तो बच्चों को मारना बहुत कठिन है?'
'हां।'

'कैसे?'
'बस, है।'
'बताओ न . . '

'बताया तो. . .'
'क्या बताया?'

'यही कि बच्चों को मारना बहुत मुश्किल है. . .उनको मारना जवानों को मारने से भी मुश्किल है. . .औरतों को मारने से क्या, मजदूरों को मारने से भी मुश्किल।'

'लेकिन क्यों?'
'इसलिए कि बच्चों को मारते वक्त. . .'

'हां. . .हां, बोलो रुक क्यों गये?'
'बच्चों को मारते समय. . .अपने बच्चे याद आ जाते हैं।'
***-***

12 होज वाज पापा

अस्पताल की यह उंची छत, सफेद दीवारों और लंबी खिड़कियों वाला कमरा कभी-कभी 'किचन` बन जाता है। 'आधे मरीज` यानी पीटर 'चीफ कुक` बन जाते हैं और विस्तार से यह दिखाया और बताया जाता है कि प्रसिद्ध हंगेरियन खाना 'पलचिंता` कैसे पकाया जाता है। पीटर अंग्रेजी के चंद शब्द जानते हैं। मैं हंगेरियन के चंद शब्द जानता हूं। लेकिन हम दोनों के हाथ, पैर, आंखें, नाक, कान हैं जिनसे इशारों की तरह भाषा 'ईजाद` होती है और संवाद स्थापित ही नहीं होता दौड़ने लगता है। पीटर मुझे यह बताते हैं कि अण्डे लिये, तोड़े, फेंटे, उसमें शकर मिलाई, मैदा मिलाया, एक घोल तैयार किया। 'फ्राईपैन` लिया, आग पर रखा, उसमें तेल डाला। तेल के गर्म हो जाने के बाद उसमें एक चमचे से घोल डाला। उसे फैलाया और पराठे जैसा कुछ तैयार किया। फिर उसे बिना चमचे की सहायता से 'फ्राइपैन` पर उछाला, पलटा, दूसरी तरफ से तला और निकाल लिया। पीटर ने मजाक में यह भी बताया था कि उनकी पत्नी जब 'पलचिंता` बनाने के लिए मैदे का 'पराठा` 'फ्राइपैन` को उछालकर पलटती हैं तो 'पराठा` अक्सर छत में जाकर चिपक जाता है। लेकिन पीटर 'एक्सपर्ट` हैं, उनसे ऐसी गलती नहीं होती।


पीटर का पूरा नाम पीटर मतोक है। उनकी उम्र करीब छियालीस-सैंतालीस साल है। लेकिन देखने में कम ही लगते हैं। वे बुदापैश्त में नहीं रहते। हंगेरी में एक अन्य शहर पॉपा में रहते हैं और वहां के डॉक्टरों ने इन्हें पेट की किसी बीमारी के कारण राजधानी के अस्पताल में भेजा है। यहां के डॉक्टर यह तय नहीं कर पाये हैं कि पीटर का वास्तव में ऑपरेशन किया जाना चाहिए या वे दवाओं से ही ठीक हो सकते हैं। यानी पीटर के टेस्ट चल रहे हैं। कभी-कभी डॉक्टर उनके चेहरे और शरीर पर तोरों का ऐसा जंगल उगा देते हैं कि पीटर बीमार लगने लगते हैं। लेकिन कभी-कभी तार हटा दिये जाते हैं तो पीटर मरीज ही नहीं लगते। यही वजह है कि मैं उन्हें आधे मरीज के नाम से याद रखता हूं। पीटर 'सर्वे` करने वाले किसी विभाग में काम करते हैं। उनकी एक लड़की है जिसकी शादी होने वाली है। एक लड़का है जो बारहवीं क्लास पास करने वाला है। पीटर की पत्नी एक दफ़तर में काम करती हैं। पीटर कुछ साल पहले किसी अरब देश में काम करते थे। ये सब जानकारियां पीटर ने मुझे खुद ही दी थीं। यानी अस्पताल में दाखिल होते ही उनकी मुझसे दोस्ती हो गयी थी। पीटर मुझे सीधे-सादे, दिलचस्प, बातूनी और 'प्रेमी` किस्म के जीव लगे थे। पीटर का नर्सों से अच्छा संवाद था। मेरे ख्याल से कमउम्र नर्सों को वे अच्छी तरह प्रभावित कर दिया करते थे। उन्हें मालूम था कि नर्सों के पास कब थोड़ा-बहुत समय होता है जैसे ग्यारह बजे के बाद और खाने से पहले या दो बजे के बाद और फिर शाम सात बजे के बाद वे किसी-न-किसी बहाने से किसी सुंदर नर्स को कमरे में बुला लेते थे और गप्पशप्प होने लगती थी। जाहिर है वे हंगेरियन में बातचीत करते थे। मैं इस बातचीत में अजीब विचित्र ढंग से भाग लेता था। यानी बात को समझे बिना पीटर और नर्सों की भाव-भंगिमाएं देखकर मुझे यह तय करना पड़ता था कि अब मैं हंसूं या मुस्कराऊँ या अफसोस जाहिर करूंगा 'हद हो गयी साहब` जैसा भाव चेहरे पर लाऊँ या 'ये तो कमाल हो गया` वाली शक्ल बनाऊँ? इस कोशिश में कभी-कभी नहीं अक्सर मुझसे गलती हो जाया करती थी और मैं खिसिया जाया करता था। लेकिन ऑपरेशन, तकलीफ, उदासी और एकांत के उस माहौल में नर्सों से बातचीत अच्छी लगती थी या उसकी मौजूदगी ही मजा देती थी। पीटर ने मरे पास भारतीय संगीत के कैसेट देख लिये थे। अब वे कभी-कभी शाम सात-आठ बजे के बाद किसी नर्स को सितार, शहनाई या सरोद सुनाने बुला लाते थे। बाहर हल्की-हल्की बर्फ गिरती होती थी। कमरे के अंदर संगीत गूंजता था और कुछ समय के लिए पूरी दुनिया सुंदर हो जाया करती थी।


पीटर के अलावा कमरे में एक मरीज और थे। जो स्वयं डॉक्टर थे और 'एपेण्डिसाइटिस` का ऑपरेशन कराने आये थे। पीटर को जितना बोलने का शौक था इन्हें उतना ही खामोश रहने का शौक था। वे यानी इमैर अंग्रेजी अधिक जानते थे। मेरे और पीटर के बीच जब कभी संवाद फंस या अड़ जाता था तो वे खींचकर गाड़ी बाहर निकालते थे। लेकिन आमतौर पर वे खामोश रहना पसंद करते थे।


मैं कोई दस दिन पहले अस्पताल में भर्ती हुआ था। मेरा ऑपरेशन होना था। लेकिन एक जगह एक, एक ही किस्म का ऑपरेशन अगर बार-बार किया जाये तो ऑपरेशन पर से विश्वास उठ जाता है। मेरी यही स्थिति थी। मैं सोचता था, दुनिया में सभी डॉक्टर 'ऑपरेशन` प्रेमी होते हैं और खासतौर पर मुझे देखते ही उनके हाथ 'मचलने` लगता है। लेकिन बहुत से काम 'आस्थाहीनता` की स्थिति में भी किए जाते हैं। कोई दूसरा रास्ता नहीं बचता। तो मैं भर्ती हुआ था। तीसरे दिन ऑपरेशन हुआ था। पर सच बताऊँ आपरेशन में उम्मीद के खिलाफ काफी मजा आया था। ये डॉक्टरों, 'टेक्नोलॉजी` का कमाल था या इसका कारण पिछले अनुभव थे, कुछ कह नहीं सकता। लेकिन पूरा ऑपरेशन ख्वाब और हकीकत का एक दिलचस्प टकराव जैसा लगा था। पूरे ऑपरेशन के दौरान मैं होश में था। लेकिन वह होश कभी-कभी बेहोशी या गहरी नींद में बदल जाता था। उपर लगी रोशनियां कभी-कभी तारों जैसी लगने लगती थीं। डॉक्टर परछाइयों जैसे लगते थे। आवाजें बहुत दूर से आती सरगोशियों जैसी लगती थीं। औजारों की आवाजें कभी 'खट` के साथ कानों से टकराती थीं। और कभी संगीत की लय जैसी तैरती हुई आती थीं। कभी लगता था कि यह आपरेशन बहुत लंबे समय से हो रहा है और फिर लगता कि नहीं, अभी शुरू ही नहीं हुआ। कुछ सेकेण्ड के लिए पूरी चेतना एक गोता लगा लेती थी और फिर आवाजें और चेहरे धुंधले होकर सामने आते थे। जैसी पानी पर तेज हवा ने लहरें पैदा कर दी हों। एक बहुत सुंदर महिला डॉक्टर मेरे सिरहाने खड़ी थीं। उसका चेहरा कभी-कभी लगता था पूरे दृश्य में 'डिज़ाल्व` हो रहा है और सिर्फ उसका चेहरा-ही-चेहरा है चारों तरफ बाकी कुछ नहीं है। इसी तरह उसकी आंखें भी विराट रूप धरण कर लेती थीं। कभी यह भी लगता था कि यहां जो कुछ हो रहा है उसका मैं दर्शक मात्र हूं।


जिस तरह तूफान गुजर जाने के बाद ही पता चलता है कि कितने मकान ढहे, कितने पेड़ गिरे, उसी तरह ऑपरेशन के बाद मैंने अपने शरीर को 'टटोला` तो पाया कि इतना दर्द है कि बस दर्द-ही-दर्द हे। यह हालत धीरे-धीरे कम होती गयी लेकिन ऑपरेशन के बाद मैंने 'रोटी सुगंध` का जो मजा लिया वह जीवन में पहले कभी न लिया था। चार दिन तक मेरा खाना बंद था। गैलरी में जब खाना लाया जाता था तो 'जिम्ले` ;एक तरह की पाव रोटी की खुशबू मेरी नाक में इस तरह बस जाती थी कि निकाले न निकलती थी। चार दिन के बाद वही रोटी जब खाने को मिली तब कहीं जाकर उस सुगंध से पीछा छूटा।


जैसा कि मैं पहले कह चुका हूं, एक ही जगह पर एक ऑपरेशन बार-बार किये जाने के क्रम में यह दूसरा ऑपरेशन था। डॉक्टरों ने कहा था कि इसकी प्रगति देखकर वे अगला ऑपरेशन करेंगे। फिर अगला और फिर अगला और फिर . . .तंग आकर मैंने उसके बारे में सोचना तक छोड़ दिया था।


पीटर मेरे ऑपरेशन के बाद दाखिल हुए थे या कहना चाहिए जब मैं दूसरे ऑपरेशन की प्रतीक्षा कर रहा था तब पीटर आये थे और उनके टेस्ट वगैरा हो रहे थे। आखिरकार उनसे कह दिया गया कि वे दवाओं से ठीक हो सकते हैं। पीटर बहुत खुश हो गये थे। उन्होंने जल्दी-जल्दी सामान बांध था और बाकायदा मुझसे गले-वले मिल गये थे। इमरे तो उससे पहले ही जा चुके थे। इन दोनों के चले जाने के बाद मैं कमरे में अकेला हो गया था, लेकिन अकेले होने का सुख बड़े भयंकर ढंग से टूटा। यानी मुझे सरकारी अस्पताल के कमरे में दो दिन तक अकेले रहने की सजा मिली। यानी तीसरे दिन मेरे कमरे में एक बूढ़ा मरीज आ गया था। देखने में करीब सत्तर के आसपास का लगता था। लेकिन हो सकता है ज्यादा उम्र रही हों। वह दोहरे बदन का था। उसके बाल बर्फ जैसे सफेद थे। चेहरे का रंग कुछ सुर्ख था। आंखें धुंधली और अंदर को धंसी हुई थीं। जाहिर है कि वह अंग्रेजी नहीं जानता था। वह देखने में खाता-पीता या सम्पन्न भी नहीं लग रहा था। लेकिन सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि उसके आते ही एक अजीब अजीब किस्त की तेज बदबू ने कमरे में मुस्तकिल डेरा जैसा जैसा जमा लिया था। मैं बूढ़े के आने से परेशान हो गया था। लगा कि शायद मैं नापसंद करता हूं, यह नहीं चाहता कि वह इस कमरे में रहे। लेकिन जाहिर है कि मैं इस बारे में कुछ न कर सकता था। सिर्फ उसे नापसंद कर सकता था और दिल-ही-दिल में उससे नफरत कर सकता था। उसकी अपेक्षा कर सकता था या उसके वहां रहने से लगातार बोर होता रह सकता था। फिर यह भी तय था कि अभी मुझे अस्पताल कम-से-कम बीस दिन और रहना है। यह बूढ़ा भी ऑपरेशन के लिए आया होगा और उसे भी लंबे समय तक रहना होगा। मतलब उसके साथ मुझे बीस दिन गुजारने थे। अगर मैं उससे घृणा करने लगता तो बीस दिन तक घृणित व्यक्ति के साथ रहना बहुत मुश्किल हो जाता। इसलिए मैंने सोचा कम-से-कम उससे घृणा तो नहीं करनी चाहिए। आदमी है बूढ़ा है, बीमार है, गरीब है, उसे ऐसी बीमारी है कि उसके पास से बदबू आती है तो उसमें उस बेचारे की क्या गलती? तो बहुत सोच-समझकर मैंने तय किया कि बूढ़े के बारे में मेरे विचार खराब नहीं होने चाहिए। जहां तक बदबू का सवाल है उसकी आदत पड़ जायेगी या खिड़की खोली जा सकती है, हालांकि बाहर का तापमान शून्य से चार-पांच डिग्री नीचे ही रहता था।


उसी दिन शाम को मुझसे मिलने डॉ. मारिया आयीं। वे भी बूढ़े को देख कर बहुत खुश नहीं हुईं। लेकिन जाहिर है वे भी कुछ नहीं कर सकती थीं। उन्होंने इतना जरूर किया कि एक खिड़की थोड़ी-सी खोल दी।


'ये कब आये?' उन्होंने पूछा।
'आज ही।' मैंने बताया।
'क्या तकलीफ है इन्हें?' उन्होंने कहा।
'मैं नहीं जानता। आप पूछिए। मेरे ख्याल से ये अंग्रेज़ी नहीं जानते हैं।'


डॉ. मारिया ने बूढ़े सज्जन से हंगेरियन में बातचीत शुरू कर दी। मारिया बुदापैश्त में हिंदी पढ़ाती हैं और हम दोनों 'क्लीग` हैं। एक ही विभाग में पढ़ाते हैं।
कुछ देर बूढ़े से बातचीत करने के बाद उन्होंने मुझे बताया कि बूढ़े को टट्टी करने की जगह पर कैंसर है और ऑपरेशन के लिए आया है। काफी बड़ा ऑपरेशन होगा। बूढ़ा काफी डरा हुआ है क्योंकि वह चौरासी साल का है और इस उम्र में इतना बड़ा आपरेशन खतरनाक हो सकता है। यह सुनकर मुझे बूढ़े से हमदर्दी पैदा हो गयी। बेचारा! पता नहीं क्या होगा!


अचानक कमरे में एक पचास साल की औरत आयी। वह कुछ अजीब घबराई और डरी-डरी-सी लग रही थी। उसके कपड़े और रखरखाव वगैरा देखकर यह अनुमान लगाना कठिन नहीं था कि वह बहुत साधरण परिवार की है। वह दरअसल इस बूढ़े की बेटी थी। उससे भी मारिया ने बातचीत की। वह अपने पिता के बारे में बहुत चिंतित लग रही थी। बूढ़े की लड़की से बातचीत करने के बाद मारिया ने मुझे फिर सब कुछ विस्तार से बताया। हम बातें कर ही रहे थे कि कमरे में हॉयनिका आ गयी। यहां कि नर्सों में वह एक खुशमिजाज नर्स है। खूबसूरत तो नहीं बस अच्छी है और युवा है। उसके हाथों में दवाओं की ट्रे थी। आते ही उसने हंगेरियन में एक हांक लगायी। मैं दस-बारह दिन अस्पताल में रहने के कारण यह समझ गया हूं कि यह हांक क्या होती है। सात बजे के करीब रात की ड्यूटी वाली नर्स हम कमरे में जाती है और मरीजों से पूछती है कि क्या उन्हें 'स्लीपिंग पिल` या 'पेन किलर` चाहिए? आज उसने जब यह हांक लगायी तो मैं समझ गया। लेकिन मारिया ने उसका अनुवाद करना जरूरी समझा और कहा, 'पूछ रही हैं पेन किलर या सोने के लिए नींद की गोली चाहिए तो बताइए।' मैंने कहा, 'हां दो, 'पेन किलर` और एक 'स्लीपिंग पिल`।'


मारिया अच्छी बेतकल्लुफ दोस्त हैं। वे मजाक करने का कोई मौका नहीं चूकतीं। पता नहीं उनके मन में क्या आयी कि मुस्कुराकर बोलीं, 'क्या मैं नर्स से यह भी कहूं कि इन दवाओं के अलावा, रात में ठीक से सोने के लिए आपको एक 'पप्पी` भी दे?'


मैं बहुत खुश हो गया 'क्या ये कहा जा सकता है? बुरा तो नहीं मानेगी? अपने महान देश में यह कहने का प्रयास वही करेगा जो लात-जूते से अपना इलाज कराना चाहता हो।'
'नहीं, यहां कहा जा सकता है।' वे हंसकर बोलीं।
'तो कहिए।'


उन्होंने नर्स से कहा। वह हंसी, कुछ बोली और इठलाती हुई चली गयी।
'कह रही है मैं पत्नियों केसामने पति को 'पप्पी` नहीं देती। जब मैंने उससे बताया कि मैं पत्नी नहीं हूं तो बोली कि ठीक है, वह लौटकर आयेगी।'
मैंने मारिया से कहा, 'उर्दू के एक प्रसिद्ध हास्य-व्यंग्य कवि अकबर इलाहाबादी का शेर है
'तहज़ीबे गऱिबी में बोसे तलक है माफ
आगे अगर बढ़े तो शरारत की बात है।'

शेर सुनकर वे दिल खोलकर हंसी और बोलीं, 'हां, ये सच है कि भारत और यूरोप की नैतिकता में बड़ा फर्क है। लेकिन उसी के साथ-साथ यह भी तय है कि भारतीय इस संबंध मैं प्राय: बहुत कम जानते हैं। जैसे अकबर इलाहाबादी शायद यह न जानते होंगे कि यूरोप में कुछ 'बोसे` बिलकुल औपचारिक होते हैं। जिन्हें हम हाथ मिलाने जैसा मानते हैं।

अब मेरी बारी थी। मैंने कहा, 'लेकिन हमारे यहां तो औरत से हाथ मिलाना तक एक 'छोटा-मोटा` 'बोसा` समझा जाता है।' इस पर वे खूब हंसीं।

कमरे के दूसरी तरफ बूढ़े के पास उसकी लड़की बैठी थी। दोनों बातें कर रहे थे। हल्की-हल्की आवाजें हम लोगों तक आ रही थीं। मैंने मारिया से पूछा, 'वे उधर क्या बातें कर रहे हैं?'


'वह अपनी लड़की से कह रहा है कि मेरी प्यारी बेटी, तुम सिगरेट पीना छोड़ दो। पिछली बीमारी के बाद तुम्हें डॉक्टर ने मना किया था कि सिगरेट न पिया करो. . .लड़की कह रही है कि उसने कम कर दी है. . .अब कुत्ते के बारे में बात हो रही है। बूढ़ा कह रहा है कि उसके अस्पताल में रहते कुत्ते का पूरा ख्याल रखना। अगर कुत्ते का ध्यान नहीं रखा गया तो वह नाराज हो जायेगा. . .अब वह कह रहा है कि दोपहर के खाने में और सुबह के नाश्ते में भी गोश्त था। कम था, लेकिन था. . .अब बाजार में गोश्त की बढ़ती कीमतों पर बात हो रही है. . .बूढ़ा बहुत नाराज है. . .अब कुछ सुनाई नहीं दे रहा. . .' मारिया कुर्सी की पीट से टिक गयीं।


'बेचारे गरीब लोग मालूम होते हैं।'
'गरीब?'
'हां, हमारे यहां की गरीबी रेखा के नीचे के लोग।'


कुछ देर बाद 'विजिटर्स` के जाने का वक्त हो गया। बूढ़े की लड़की चली गयी। मारिया भी उठ गयीं। गर्म कपड़ों और लोमड़ी के बालों वाली टोपी से अपने को लादकर बोलीं
'आपकी नर्स तो नहीं आयी?'
'अच्छा ही है जो नहीं आयी।'
'क्यों?'

'इसलिए कि औपचारिक बोसे से काम नहीं चलेगा और अनौपचारिक बोसे के बाद नींद नहीं आयेगी।'
उन्होंने कहा, 'कोई-न-कोई समस्या तो रहनी ही चाहिए।'


अस्पताल की रातें बड़ी उबाऊ, नीरस, उकताहट-भरी और बेचैन करने वाली होती हैं। नींद क्यों आये जब जनाब दिन-भर बिस्तर पर पड़े रहे हों। नींद की गोली खा लें तो उसकी आदत-सी पड़ने लगती है। पढ़ने लगें तो कहां तक पढ़ें? सोचने लगें तो कहां तक सोचें? लगता है अगर अनंत समय हो तो कोई काम ही नहीं हो सकता। रात में सो पाने, सोचने, पढ़ने आदि-आदि की कोशिश करने के बाद मैं अपने कमरे में आये नये बूढ़े मरीज की तरफ देखने लगा। वह अखबार पढ़ते-पढ़ते सो गया था। जागते हुए भी उसका चेहरा काफी भोला और मासूम लगता है कि लेकिन सोते में तो बिलकुल बच्चा लग रहा था। उसके बड़े-बड़े कान हाथी के कान जैसे लग रहे थे। धंसे हुए गालों के उपर हड्डियां उभर आयी थीं। शायद उसने नकली दांतों का चौखटा निकाल दिया था। उसकी ओर देखकर मेरे मन में तरह-तरह के विचार आने लगे। सबसे प्रबल था कैंसर का बढ़ा हुआ मर्ज, चौरासी साल की उम्र में जिंद़गी का एक ऐसा मोड़ जो अंधेरी गली में जाकर गायब हो जाता है। लगता था बचेगा नहीं. . .जो कुछ मुझे बताया गया था उससे यही लगता था कि ऑपरेशन के बाद बूढ़ा सीधा 'इन्टेन्सिव केयर यूनिट` में ही जायेगा। और फिर कहां? मुझे लगने लगा कि उसकी मृत्यु बिलकुल तय है। उसी तरह जैसे सूरज निकलना तय है। लगा कहीं ऑपरेशन टेबुल पर ही न चल बसे बेचारा . . .पता नहीं क्यों अचानक वह मुझे हंगरी के अतीत-सा लगा।


रात ही थी या पता नहीं दिन हो गया था। अचानक कमरे की सभी बत्तियां जल गयीं और हॉयनिका के अंदर आने की आवाज से मैं उठ गया। उसने मुस्कराकर 'थरमामीटर` हाथ में दे दिया। इसका मतलब है सुबह का छ: बजा है। उसकी मुस्कराहट बड़ी कातिल थी। शायद कल वाली बात उसे याद होगी। मैंने दिल-ही-दिल में कहा, इस तरह मुस्कराने से क्या होगा, वायदा निभाओ तो जानें। उसने बूढ़े आदमी को 'पापा` कहकर जगाया और उन्हें भी 'थरमामीटर` पकड़ा दिया।

संसार के सभी अस्पतालों की तरह इस अस्पताल में भी आप समय का अंदाजा नर्सों की विजिट, डॉक्टरों के आने, नाश्ता दिये जाने, गैलरी की बत्तियां बंद किये जाने वगैरा से लगा सकते हैं।


सुबह के काम धीरे-धीरे होने लगे। 'पापा` उठे। उन्होंने अपनी छड़ी उठायी। छड़ी बहुत पुरानी लगती है। उतनी तो नहीं जितने पापा हैं लेकिन फिर भी पुरानी है। छड़ी के हत्थे पर प्लास्टिक की डोरी का एक छल्ला-सा बंध हुआ था। उन्होंने छल्ले में हाथ डालकर छड़ी पकड़ ली और बाहर निकल गये। शायद बाथरूम गये होंगे। छड़ी के हत्थे से प्लास्टिक की डोरी बांधने वाला आइडिया मुझे अच्छा लगा। इसका मतलब यह है कि पापा के हाथ में छड़ी कभी गिरी होगी। बस में कभी चढ़ते हुए या ट्राम से उतरते हुए या मैट्रो से निकलते हुए। छड़ी गिरी होगी तो पापा भी गिरे होंगे। पापा गिरे होंगे तो उनके पास जो सामान रहा होगा वह भी गिरा होगा। लोगों ने फौरन उनकी मदद की होगी। सामान समेटकर उन्हें दिया होगा। उनकी छड़ी उन्हें पकड़ाई होगी। इस तरह के बूढ़ों को मैंने अक्सर बसों, ट्रामों से उतरते-चढ़ते समय गिरते देखा है। पूरा दृश्य आंखों के सामने कौंध गया। इसी तरह की घटना के बाद पापा ने प्लास्टिक की डोरी का छल्ला छड़ी के मुट्ठे से बांध लिया होगा।


इस शहर में मैंने अक्सर इतने बूढ़े लोगों को आते-जाते देखा है जो ठीक से चल भी नहीं पाते। फिर भी वे थैले लिये हुए बाजारों, बसों में नजर आ जाते हैं। शुरू-शुरू में मैं यह समझ नहीं पाता था कि यदि ये लोग इतने बूढ़े हैं कि चल नहीं सकते तो घरों से बाहर ही क्यों निकलते हैं। बाद में मेरी इस जिज्ञासा का सामाधान हो गया था। मुझे बताया गया था कि प्राय: बूढ़े अकेले रहते हैं। पेट की आग उन्हें कम-से-कम हफ़्ते में एक बार घर से निकलने पर मजबूर कर देती हैं।

यह आदमी, बूढ़ा आदमी, जिससे मैं कल नफरत करते-करते बचा, दरअसल बहुत अच्छा है। जैसे-जैसे दिन गुजर रहे हैं, मुझे उनके बारे में अधकि बातें पता चल रही हैं। भाषा के सभी बंधनों के होते हमारे जो रिश्ते बन रहे हैं उनके आधार पर उसे पसंद करने लगा हूं। हालांकि हम दोनों आमतौर पर चुप रहने के सिवाय इसके कि हर सुबह एक-दूसरे को 'यो रैग्गैल्स` मतलब 'गुड मार्निंग` कहते हैं। दिन में 'यो नपोत किवानोक` यानी 'विश यू गुड डे` कहते हैं। छोटी-मोटी मदद के बाद 'कोसोनोम`, धन्यवाद कहते हैं। या धन्यवाद कहे जाने का जवाब 'सीवैशैन` कहकर देते हैं।


मुझे याद है दो दिन पहले जब मैं अपने दूसरे ऑपरेशन के बाद कमरे में जाया गया था और दर्द-निवारक दवाओं का असर खत्म हो गया था तो दर्द इतना हो रहा था कि बकौल फैज अहमद 'फैज` हर रगे जां से उलझ रहा था। डॉक्टर कह रहे थे जितनी स्ट्रांग दर्द-निवारक दवाएं वे दे चुके हैं उससे अधकि और कुछ नहीं दे सकते। अब तो बस झेलना ही है। मैं झेल रहा था। बिस्तर पर तड़प रहा था। कराह रहा था। आंखें कभी बंद करता था, कभी खोलता था। उसी वक्त एक बार आंखें खुलीं तो मैंने देखा कि पापा हाथ में छड़ी लिये मेरे बेड के पास खड़े हैं। मुझे यह उम्मीद न थी। वे कह कुछ न रहे थे। क्योंकि भाषा की रुकावट थी। लेकिन जाहिर था कि क्यों खड़े हैं। दर्द की वजह से उनका चेहरा धुंधला लग रहा था। उनकी धंसी हुई आंखें बिलकुल ओझल थीं। लंबे-लंबे कान लटके हुए थे। गर्दन झुकी हुई थी। सिर पर सफेद बाल बेतरतीबी से फैले थे। वे चुपचाप खड़े थे पर मुझे लगा जैसे कह रहे हों, देखो दर्द भी क्या चीज है कोई बांट नहीं सकता। उसे सब अकेला ही झेलते हैं। पापा को देखते ही मैं अपने दर्द से उनके दर्द की तुलना करने लगा। लगा इस विचार ने दर्द-निवारक गोली का काम कर दिया। मैंने सोचा, पापा, तुम्हारे ऑपरेशन के बाद मैं शायद तुम्हें देख भी न पाउंगा जिस तरह तुम मुझे देख रहे हो क्योंकि तुम शायद आई.सी.यू में होगे या किसी ऐसी जगह जहां मैं पहुंच न सकूंगा। तुम्हारे इस तरह मुझे देखने का एहसान मेरे उपर हमेशा के लिए बाकी रह जायेगा।

ऑपरेशन के बाद मैं ठीक होने लगा। दूसरे दिन टहलने लगा। इस दौरान पापा के टेस्ट वगैरा चल रहे थे। हंगेरियन अस्पतालों में कोई हबड़-तबड़ नहीं होती क्योंकि नफा-नुकसान, लेन-देन आदि का कोई चक्कर नहीं है। इसलिए पापा के 'टेस्ट` काफी विस्तार से हो रहे थे। मैं दिन में घबराकर कमरे के चक्कर लगता था और उकताहट दूर करने के लिए या पता नहीं किसलिए दिन में दसियों बार पापा से पूछता था, होज वाज पापा? यानी कैसे हो पापा? पापा मेरे सवाल का हर बार एक ही जवाब देते थे, 'कोसोनोम योल` धन्यवाद, ठीक हूं।` मैं समझता था कि शायद मेरे बार-बार एक सवाल पूछने से वे चिढ़ जायेंगे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ। शायद वे जानते थे कि मैं पता नहीं उनसे क्या-क्या कहना चाहता हूं लेकिन नहीं कह पाता।


पापा लगभग पूरे दिन बड़े ध्यान से अखबार पढ़ा करते थे। वे हंगेरी का वह अखबार पढ़ते थे जो पहले कम्युनिस्टों का था और अब समाजवादियों का अखबार है। पापा की अखबार में गहरी रुचि मुझे चमत्कृत कर देती थी। ऐसी उम्र में, इतनी खतरनाक बीमारी से जूझते हुए दुनिया में कितने लोगों की रुचि बचती है। या तो लोग चुप हो जाते हैं या रोते रहते हैं। लेकिन पापा के साथ ऐसा न था। एक रात अखबार पढ़ने के बाद वे हाथ बचाकर मेज पर चश्मा रखने लगे तो चश्मा फर्श पर गिर पड़ा था। तब मैंने पापा के मुंह से ऐसी आवाज सुनी जो दु:ख व्यक्त करने वाली आवाज थी। मैं तत्काल उठा और पापा का चश्मा उठाया। मैंने देखा, न केवल चश्मा बेहद गंदा था बल्कि उसे धागों से इस तरह बांध गया था कि कई जगहों से टूटा लगता था। जैसा भी रहा हो, उसका पापा के लिए बहुत ज्यादा महत्व था। मैंने चश्मा उनकी तरफ बढ़ाया। उनकी आंखों में कृतज्ञता का स्पष्ट भाव था। चश्मा टूटा नहीं था। अगर टूट जाता तो? बहुत बुरा होता, बहुत ही बुरा।


दो-चार दिन बाद मेरी हालत ये हो गयी थी, अपने बेड पर लेटा-लेटा मैं यह इंतजार किया करता था कि पापा की मदद करने का अवसर मिले। वे रात में सोने से पहले लैम्प बंद कर