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May 2006
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-हितेश व्यास

हे महाकवियों !
महाकाव्यों की रचना के बाद
ऐसा क्या अपच रह गया था
जिसके लिए तुम्हें गोष्ठियों में पुनःपुः जन्म लेना पड़ता है

हे यशकमियों!
यश-रस का पान गोष्ठियों के सिवाय कहाँ हो सकता है
अहोरूपम अहोध्वनि का गगनोच्चार यहीं संभव है
हे कण्ठ कला विशारदो!
तुम जब तरन्नुम की बयार चलाते हो
तो गुरुत्व आकर्षण को ठेंगा दिखाते हुए
हम सब हवा में तैरने लग जाते हैं

तुम जब गायन पर लगाम लगाते हो गायकों!
हम सब धड़ाम से अतुकान्त के गर्त में गिर पड़ते हैं
हे अतीत में महान रचना कर चुके महान कवियों!
तुम कविता लाते हो या भूतकाल के बक्से से
गोटेदार जरी वाली साड़ी जो विवाहकालीन
झिलमिलाहट को तहाए हुए सोयी रहती है
अकसर तुम कविता के अंश भूल जाते हो
जैसे विस्मृति के चूहों ने कुतर डाला हो
जरी का वेश
हे जगत गति से रहित सुकवियों! तुम धन्य हो
कविता चाहे छायावाद प्रगतिवाद नई कविता और
साठोत्तरी कविता को लांघते हे सदी के अंतिम मुहाने पर
दस्तक दे रही हो

तुम द्विवेदीयुगीन कवियों के साथ
कदमताल करते नजर आते हो
हे तथाकथित विद्वानो!
क्या ये गोष्ठियाँ तुम्हारे लिए कूड़ाघर हैं
जहाँ तुम नियमित रूप से अपनी विद्वता झाड़ते हो
तुम्हारी विद्वता का डंका गोष्ठियों के
साउण्डप्रूफ कक्षों तक ही गूंजता है

हे चलायमान विद्वानों!
तुम्हें नमस्कार है
हे शाश्वत अध्यक्षों!
तुम अध्यक्षता ओढ़ते हो
अध्यक्षता बिछाते हो
अध्यक्षता लाते हो
अध्यक्षता ले जाते हो
अध्यक्षता का बाना धारण करते-करते तुम भूल गए
उस पोटली को जिसमें तुम्हारी सामान्य हैसियत बन्द है

हे छुटपुट कवियो!
इतिहास और बनियो की बही में
फुटकल खातों की कोई वकत नहीं होती
चाय की पर्चियों की तरह वे रोज नष्ट कर दे जाते हैं
डेली वेजेज पर आने वाले वर्कचार्ज!
तुम तो कहार हो
तुम्हारी वाह-वाह के कंधों पर
सवार होकर उठती है बड़े कवियों की पालकियाँ
हे बहुसंख्यकों!
तुम कालीन की तरह बिछते हो
तुम पर विराजते हैं बड़े कवि या छा जाते हैं तम्बू की तरह
तुम यज्ञ की समिधाएँ हो
जिसका लाभ उठाते हैं पुरोहित
गोष्ठी के हवन में स्वाहा हो जाने वाली
होलिकाओ!
तुम्हें समर्पित है यह कविता!

**-**

रचनाकार – हितेश व्यास राजस्थान उच्च शिक्षा विभाग में प्राध्यापक हैं. इनकी कुछ अन्य रचनाएँ आप रचनाकार में यहाँ पर पढ़ सकते हैं –

http://rachanakar.blogspot.com/2006/02/blog-post.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_22.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_113422217462821692.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_09.html
http://rachanakar.blogspot.com/2005/12/blog-post_08.html

संपर्क – के. आर. 82, सिविल लाइन्स, कोटा – 324001 , राजस्थान (भारत)




हिन्दी साहित्य की यूँ तो सैकड़ों पत्रिकाएँ निकलती हैं मगर उनमें हंस जैसा इम्पेक्ट पता नहीं क्यों किसी में भी दिखाई नहीं देता. और यही वजह है कि हिन्दी का रचनाकार हंस में प्रकाशित होकर अपने को धन्य समझता है.

परंतु परिकथा के दो अंक देखकर यह महसूस किया जा सकता है कि यह हंस की प्रतिमूर्ति बनने को तत्पर है – राजेंद्र यादव के संपादकीय को अगर हंस से निकाल दें तो जो पत्रिका आपके हाथों में होगी उसे आप परिकथा कह सकते हैं.

प्रख्यात रचनाकारों - असगर वजाहत, अनामिका, शैवाल तथा अभय के संपादन मंडल के अधीन परिकथा की प्रस्तुति में जहाँ आपको पढ़ने के लिए ढेरों पठनीय कहानियाँ मिलती हैं तो वहीं डायरी, संस्मरण, विचार-विमर्श, कविताएँ, कृतियों की समीक्षा इत्यादि सब कुछ भी संतुलित अंदाज में पढ़ने को मिलता है.

परिकथा की एक ख़ासियत और है. हंस जैसे स्थापित पत्रिकाओं की संपादकीय नीति के विपरीत, परिकथा का कहना है कि यह नए तथा अचर्चित लेखकों के प्रति संवेदनशीलता तो अपनाएगी ही, यदि आप अपनी रचना के साथ पता लिखा लिफ़ाफ़ा रखकर भेजेंगे तो प्रकाशन की अस्वीकृति की दशा में आपको उस रचना में सुधार करने के लिए आपको परिकथा संपादन मंडल द्वारा सलाहें भी दी जाएंगी ताकि रचना प्रकाशन योग्य हो सके.

परिकथा का यह अंदाज निःसंदेह उसे अन्य पत्रिकाओं की भीड़ में अलग करता है.

उम्मीद है, परिकथा – हिन्दी साहित्य में नए, प्रतिबद्ध और प्रयोगधर्मी रचनाकारों की एक नई खेप तैयार करने का वृहत् काम करेगी.

2 अंकों के संयुक्तांक का मूल्य मात्र 20 रुपए, तथा बारह अंकों की सदस्यता 225 रुपए रखी गई है जो कि परिकथा की सामग्री, उसके कलेवर को देखते हुए अत्यंत वाजिब प्रतीत होती है.

परिकथा को रचनाकार की ढेरों शुभकामनाएँ.

परिकथा का संपादकीय / सर्कुलेशन कार्यालय – परिकथा, 25 बेसमेंट, फेज V, इरोज गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-110044


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(शरद जोशी के कमलमुख की आलोचना-आलेख को पाठकों ने खूब सराहा और अनुरोध किया कि कुछ ऐसी ही रचनाएँ प्रकाशित करें. प्रस्तुत कुछ पत्र उसी व्यंग्य उपन्यास से उद्भृत)

पत्र 1
प्रिय भाई,
सुना है दिसंबर में कवि सम्मेलन आयोजित करवा रहे हो अपने नगर में. तब तो मिलना हो सकेगा. बुलवाओगे ना? यों तुम से क्या छुपा है? मार्ग व्यय और ऊपर से कुछ मिल जाए काफी है. आज्ञा सिर आँखों पर रख दौड़ा आऊंगा. हालांकि अभी तुम्हारा पत्र इस संबंध में आया नहीं है पर मैं व्यर्थ की औपचारिकताओं पर विश्वास नहीं करता. मेरी स्वीकृति समझो. पत्र डालना. भाभी को प्रणाम-बेबी को प्यार. विवाह तो हो ही गया होगा ना!

तुम्हारा अपना
कमलमुख
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पत्र 2
प्रिय भाई,
इस अभिनव पत्रिका के प्रकाशन के लिए मेरी लाख-लाख बधाइयाँ लो. सच कहूं – कैसी लगी? हिन्दी में पत्रिका का जो आदर्श रूप मेरी आंखों में है वह पूरा हो गया. कितनी सुंदर सज्जा, कैसा वस्तु चयन, क्या ही अच्छे विचार. भई वाह!

तुम्हारा ही सदा
कमलमुख
पुनश्च- रचना भेज रहा हूँ. जरा ध्यान रखना.
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पत्र 3
प्रिय भाई,
‘धर्मशाला’ में तुम्हारी कहानी पढ़ी. क्या कहने हैं. बरसों बाद अच्छी कहानी पढ़ पाया. हिन्दी में जिसे नई कहानी कहते हैं उसका सर्वश्रेष्ठ रूप तुम्हारी रचना में है. ‘साहित्य-धर्म’ के अगले अंक में मेरा गीत आ रहा है. कैसा लगा बताना. बाकी सब कुशल! आशा है स्वस्थ होंगे.

तुम्हारा सदैव,
कमु

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पत्र 4
प्रिय महोदय,
जब से आप आकाशवाणी के प्रोड्यूसर बनकर आए हैं, देख रहा हूं कार्यक्रम का स्तर निरंतर उठ रहा है. बधाई लीजिए. बड़ा श्रम करते हैं. स्वास्थ्य का ध्यान रखिए. एक शिकायत भी है- रेडियो मुझे भूल सा गया है. दो माह से कोई कांट्रैक्ट नहीं आया. उधर आना चाहता हूँ. मित्रों से मिलने की बड़ी इच्छा है. जल्दी जवाब दो. देखता हूँ कि डाकिया कब कांट्रैक्ट लाता है. और सब ठीक. पुस्तक कब आ रही है छपकर- पहली प्रति मैं पढ़ूंगा. बढ़िया सी आलोचना लिखने को बेताब हूं. भाभी को प्रणाम, बेबी को प्यार!

आपका,
कमलमुख
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पत्र 5
जनाब,
आपके प्रकाशन को पांडुलिपि भेजे दस माह हो गए. अभी तक स्वीकृति नहीं मिली. खेद है. कब प्रकाशित कर रहे हैं, शीघ्र लिखिए. इस संबंध में मेरा यह पांचवां पत्र है.

भवदीय,
कमलमुख






मैं चक्रधरपुर जा रहा था. बेटिकट! साथ में चाचा जी थे. टिकट लेना शायद चाचा जी को अपमानजनक लगा था. मेरे यह कहने पर कि 'टिकट ले लें', उन्होंने कहा था, 'धुर, बुड़बक! तीन ही स्टेशन तो जाना है, टिकट क्या करेंगे?' यानी चाचा जी भी आम बिहारियों की तरह 'लोकल' यात्रा में टिकट लेना जरूरी नहीं समझते? चाचा जी भी? रिटायर्ड प्रोफ़ेसर रामेश्वर प्रसाद चौधरी! बेटिकट! मेरे हैदराबादी संस्कार को धक्का लगा. साउथ में तो...

गाड़ी फ्लाई ओवर के पास धीमी होने लगी थी. डिब्बे में फुसफुसाहट हुई, 'चेकिंग तो नहीं?' चाचा जी सीटी बजाने लगे थे, तनाव मुक्त दिखें इस गरज से! मैं तो तनाव में आ गया था, 'न जाने कितनी बेइज्जती होगी?' लेकिन नहीं, गाड़ी स्पीड में आ गई थी. चाचा जी की सीटी बंद!

मैं एनबी कॉलेज_नारायण भगत कॉलेज जा रहा था_एज ए लेक्चरर! साथ में चाचा जी इसलिए कि ये भी इसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. इस अत्यंत अपरिचित जगह में सब से परिचय करवा देने का जिम्मा उन्होंने उठाया था. मैं उन्हें मन ही मन कोस रहा था. इन्हीं महाशय की कृपा से मुझे लेक्चरर होना पड़ गया था_भरी जवानी में लेक्चरर!! जबकि मेरे पढ़ने की, खेलने की, मस्ती करने की उम्र है, जबकि मुझे हैदराबाद यूनिवर्सिटी कैंपस में अपने मित्रों के साथ होना चाहिए था_गप्पें हाँकते हुए, कॉफी पीते हुए, सांबर-बड़ा खाते हुए, मैं चाचा जी के साथ था_मूँगफली टूँगते हुए! ''अरे! खाओ, टाइम पास होगा!'' मैं लाचार! जो-जो चाचा जी कह रहे हैं, करने को अभिशप्त!...चाचा जी ने फार्म भिजवा दिया था. ''पंद्रह साल बाद बिहार में वैकेंसी आ रही है, काफ़ी सीट है, अनिकेत को फॉर्म भरने बोलो, मैं भेज रहा हूं.'' पापा को फ़ोन पर कहा था. अभी-अभी तो एम एससी पूरी हुई है, रिसर्च करना है...वैज्ञानिक का जीवन जीने का सपना...! ''अरे! भाई, एप्लाय करने में क्या जाता है? बाद में तुम्हारी मर्जी! फिर बिहार में तुम्हारा होना भी असंभव ही है. वहां तो सोर्स चाहिए, घूस चाहिए.'' पापा ने कहा था और मैं राजी हो गया था. इंटरव्यू हुआ, अच्छा हुआ! दुर्भाग्य! मैं चुन लिया गया. जहां बिहार में एप्वाइंटमेंट में धांधली की ख़बरें हैदराबाद तक के अख़बारों में आ रही थीं वहां मुझे बिना धांधली के क्यों चुन लिया गया था, पता नहीं? शायद मेरा जीवन धूल में मिलाने के लिए! शायद मेरी किस्मत में आग...! ''अरे! किस्मत की बात करते हो? यहां देखो, बीस-बीस साल से लोग पी-एच डी किए बैठे हैं. कोई टयूशन से गुजारा कर रहा है कोई किसी वित्त रहित कॉलेज में प्रोफ़ेसर होने का गुमान पाले हुए हैं. तुम्हें एम एससी करते ही नौकरी मिल गई तो किस्मत खराब हो गई?''...चाचा जी मेरा रिजल्ट लेकर हैदराबाद पहुंच गए थे, मुझे ज्वाइन करने को फुसला रहे थे! पिताजी की भी सहमति थी, माताजी की भी, छोटे भाई की भी. विभाग के प्रोफ़ेसरों की भी. मित्रों की भी. ''जाकर देख लो, ठीक नहीं लगे तो वापस आ जाना!''

मैं चक्रधरपुर स्टेशन पर था. साथ में चाचा जी. एक किलोमीटर का पैदल सफर. सड़क कच्ची. ''बरसात के दिनों में तो यहां काफ़ी दिक्कत होती होगी चाचा जी?'' मैं पूछता हूं. ''हां, होती तो है, मगर कौन तुम्हें यहां रोज आना है? यहां पूरी आजादी है. जब चाहो आओ, न चाहो मत आओ!'' चाचा जी आश्चर्य प्रकट करने का मौका दिए बगैर मेरे ज्ञान में वृद्धि कर रहे थे!

मैं नारायण भगत कॉलेज के मैदान में खड़ा था. सामने कॉलेज_दो-तीन टूटे-फूटे कमरे_खपरैल के_जैसे गाँवों में किसी गरीब-गुरबे के भी नहीं होते. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैदान कॉलेज का है या इस मैदान में ही कॉलेज है?...आह! हैदराबाद यूनिवर्सिटी!!
''देखो, उधर भी बिल्डिंग है!'' चाचा जी ने मेरी मनःस्थिति को भांपकर दिखलाया था. ''अच्छा, पक्की बिल्डिंग भी है?''... तीन-चार कमरों का मकान, जिसमें ऑफिस, लाइब्रेरी, लेबोरैट्री आदि 'जरूरी' चीज़ें हैं और जिसमें बरसों से 'व्हाईट वाशिंग' नहीं हुई है_बरसात के पानी का गहरा दाग, दीवारों पर दरार!

गुनगुनी धूप थी, दिसंबर का महीना. कॉलेज बिल्डिंग के सामने मैदान में कुछ कुर्सियां लगी थीं, कुछ लगाई जा रही थीं. चाचा जी को देखकर चपरासी रामदेव ने दोनों हाथ उठा दिए, कहा, ''परनाम सर!'' खुश रहने का आशीर्वाद देकर चाचा जी ने मेरा परिचय करवाया, ''मेरा भतीजा है! यहां फिजिक्स का प्रोफ़ेसर बहाल हुआहै.''...''बहूत बढ़ियां सर! बहूत बढ़ियां. आइए, बैठिए न?'' रामदेव ने आग्रह किया था.

''प्रणाम सर!''...''प्रणाम सर!'' जो-जो लोग कॉलेज आते, चाचा जी को प्रणाम करते और चाचा जी उनसे मेरा परिचय करवाते, ''मेरा भतीजा है, फिजिक्स...!'' यानी मैं चाचा जी का भतीजा था, तभी फिजिक्स का लेक्चरर! अनिकेत तो था ही नहीं! हैदराबाद में किसी ने नहीं कहा था_मि. चौधरी का बेटा. स्कूल से लेकर यूनिवर्सिटी तक मुझे लोग मेरे नाम से जानते थे. यहां चाचा जी के नाम से. मेरा अपना नाम मिट गया था. कहीं इसी तरह मेरा अस्तित्व भी तो...!

मैदान की उन कुर्सियों पर काफ़ी प्रोफ़ेसर आकर विराज चुके थे. कुछ नए भी, यानी मेरे साथ ही बहाल हुए किन्तु मुझ से बहुत पहले ज्वाइन कर लेने वाले.

हम लोग खुले आकाश के नीचे बैठे थे. खुला मैदान था. मैदान के एक कोने में बच्चे कबड्डी खेल रहे थे. हार से आहत होकर एक दूसरे को 'तोरी माय के...', 'तोरी बहिनिया के...' करने से भी नहीं चूक रहे थे. कुछ लोग साइकिल चलाने का अभ्यास भी मैदान में कर रहे थे. और गाय-भैंसे अपनी मर्जी से आवाजाही कर रही थीं. मुझे पूरा वातावरण 'शांति निकेतन' जैसा लग रहा था. बल्कि प्रकृति यहां उससे भी अधिक थी_यहां तो प्रकृति भी अपनी प्राकृतिक अवस्था में थी!

'काश! मैं दबाव में नहीं आया होता? काश! मैं अपने मन के ख़िलाफ़ नहीं गया होता!' मैं सोच रहा था.

''एम एससी कहां से किए हैं?'' चाचा जी के पास बैठे प्रोफ़ेसर ने सवाल किया था.
''जी! हैदराबाद से.''

''बी एससी?''
''वहीं से.''

''अरे! भाई, यह पहली से एम एससी तक हैदराबाद में ही पढ़ा है.'' बगल में बैठे चाचा जी ने इकट्ठे बता देना जरूरी समझा.

''औ! तब तो यहां बिहार में आपको मन नहीं लगता होगा?''
''नहीं! ई तो ज्वाइन भी करना नहीं चाहता था. इसको तो पकड़ कर हम लाए हैं!'' चाचा जी ने गर्व का भाव चेहरे पर लाते हुए कहा था.

''अरे! नौकरी कोई छोड़ता है भला? इस जमाने में नौकरी मिलने में इतनी दिक्कत है. अच्छा किया इन्हें पकड़ कर ले आए.'' उन्हीं सज्जन ने कहा था.

''सर! कितना देना पड़ा?'' 'सज्जन' चाचा जी के कान में फुसफुसा रहे थे. चाचा जी हंस पड़े, ''अरे! भाय, इसका वश चलता तो यह नौकरी करने आता ही नहीं! और आप कह रहे हैं घूस-घास?''...

प्रिंसिपल साहब नहीं आए थे_बारह बजने के बावजूद! ज्वाइनिंग कैसे होगी? चाचा जी चिंतित थे. एक वरिष्ठ प्राध्यापक ने उन्हें आश्वस्त किया, ''अच्छा! नहीं आएंगे तो क्या? ज्वाइनिंग आज के डेट में हो जाएगा.'' उन्होंने रामदेव को 'बड़ा बाबू' को बुला लाने कहा. जब हेड क्लर्क आए तो उन्होंने निर्देश दिया, ''इनसे 'ज्वाइनिंग' लेकर रख लीजिए, कल प्रिंसिपल साहब आएंगे तो दस्तखत करवा दीजिएगा.'' हेड क्लर्क ने वैसा ही किया. ऑफ़िस से वापस आकर मैं फिर कुर्सी पर बैठ गया. मैंने भीड़ में ही एक सवाल उछाला, ''लड़के नजर नहीं आ रहे हैं?'' सब लोग गुम हो गए. नए आए एक लेक्चरर ने कहा, ''इस कॉलेज में लड़के नहीं हैं.''...''मतलब?'' मैं चौंक गया. ''मतलब यह कि एक तो यहां कम लड़के एडमीशन लेते हैं, उनमें से अधिकांश अपने-अपने धंधों में लगे रहते हैं. एक ही बार परीक्षा देने आते हैं.''...मैं इस अति आधुनिक व्यवस्था की जानकारी पा कर सन्न रह गया था. तब तक एक सीनियर प्रोफ़ेसर ने रामदेव को बुलाया था और कहा था, ''सच्चो बाबू का लड़कवा यहीं है न? उसको जाकर कह देना, 'आकर क्लास करेगा. फिजिक्स के प्रोफ़ेसर आ गए हैं'.'' और वे मेरी ओर देखकर बोले थे, ''क्या कीजिएगा? यहां बरसों से पोस्ट खाली है. बहाली होती नहीं. लड़के आकर क्या करेंगे?''

''लेकिन यहां तो फिजिक्स में पहले से ही एक शिक्षक थे? अभी ही कोई बता रहे थे?'' मैं पूछता हूं. मुस्कराते हुए वे जवाब देते हैं, ''बस यही समझ लीजिए कि नहीं थे!...उनको तो कॉलेज आने की तभी जरूरत होती है जब वेतन लेना हो!''...''वैसे ऊ पढ़ाएंगे भी क्या? कुछ आता-जाता थोड़े है?'' उन्होंने अपना स्वर थोड़ा दबाकर कहा था.

बगल से किसी ने कहा था, ''उनसे खेती-पथारी का गप चाहे जितना कर लीजिए, फिजिक्स-उजिक्स उनसे नहीं सपरता है!''...मैं अवाक् हो गया था.

अगले दिन मैं फिर चक्रधरपुर जा रहा था, टिकट लेकर. सिर्फ चार ही रुपए का सवाल था!
कॉलेज में 'सच्चो बाबू का लड़कवा' मेरी प्रतीक्षा में उपस्थित था. 'चलो, इसे पढ़ाते हैं.' मेरे मन में आया. मैंने रामदेव से पूछा, ''किस रूम में क्लास लें?'' रामदेव बोल पड़ा, ''सर! परयोगशाला में भी ले सकते हैं, लेकिन ऊ गंदा होगा. यहीं फील्डे में बैठ जाइए न? धूप भी है!''

रामदेव ने 'स्टाफ रूम' से थोड़ी दूर पर एक कुर्सी लगा दी. मैं कुर्सी पर बैठ गया, नीचे वह लड़का, रूपेश कुमार, वल्द सच्चो बाबू!...''हां, इंटर में तुम्हारा डिवीजन क्या था?'' मैं पूछता हूं. वह कहता है, ''फर्स्ट डिवीजन सर!''...''अच्छा!'' मैं प्रभावित हो जाता हूं.

''कोर्स में क्या-क्या है?'' मैं पूछता हूं. वह चुप! बहुत कुरेदने पर वह कहता है, ''नहीं जानते हैं सर! अभी दू महीना पहले एडमीशने हुआ है!''

''माई गॉड! दो महीने हो गए, इसे अभी तक कोर्स भी नहीं पता?'' मेरे मन में एक झल्लाहट सी होती है लेकिन मैं कहता हूं, ''अच्छा! आज ऐसे ही बातें करते हैं. बताओ इंटर में क्या-क्या पढ़ा था?'' वह अटक-अटक कर बताता है, गति, प्रकाश, चुंबक...!

''अच्छा यह बताओ कि आकाश में तारे टिमटिम करते क्यों प्रतीत होते हैं?'' मैं पूछता हूं तो उसका मुख सिग्नल की तरह नीचे झुक जाता है.

''अरे! नहीं जानते हो? यह तो तुम्हें आना चाहिए? जेनरल नाउलेज का सवाल है यह तो!''...अच्छा यह बताओ 'चुंबकीय क्षेत्र' किसे कहते हैं?''

उसका नत मस्तक और डाउन हो गया. मुझे लगा इसे इससे भी आसान सवाल पूछना चाहिए ताकि इसका खोया हुआ आत्मविश्वास वापस लौटे. मैंने पूछा, ''अच्छा, न्यूटन के गति के नियम क्या-क्या हैं?'' उसके अधोगामी दिमाग ने बहुत-बहुत याद करने की कोशिश की लेकिन बेकार! लगा कि इस बार भी वह नहीं उठ पाएगा. मेरे चेहरे पर पसीना आ गया था. जेब से रूमाल निकाल कर पसीना मैंने पोंछा और उससे कहा, ''ठीक है, आज जाओ! कल न्यूटन का गति-नियम पढ़कर आना.''

मैं मैदान में लगाए गए उसी स्टाफ रूम में आ गया. मैंने रामदेव से पानी मांगा और बगल में बैठे मंडल जी से कहा, ''देखिए, क्या स्टैंडर्ड है? बीएससी में पढ़ता है और गति का नियम तक नहीं जानता है.'' हिंदी के श्रीवास्तव जी कह पड़े, ''अरे! भाई, यह तो बहुत बड़ा सवाल कर दिया आपने. मेरी सुनिए! मेरे ऊपर कृपा करके जब कभी कोई ऑनर्स का लड़का आता है और मैं उससे पानी और हवा का लिंग-निर्णय करने कहता हूं तो वह नहीं कर सकता!..यहां अच्छे लड़के एडमीशन ही कहां लेते हैं? जो समर्थ हैं, बाहर चले जाते हैं.''

''लेकिन किसी का बेस इतना कमजोर कैसे हो सकता है? और बावजूद इसके वो फर्स्ट क्लास कैसे ला सकता है?''

''अनिकेतजी! आप धीरे-धीरे सब जान जाएंगे! यहां बेटे से ज्यादा बाप की परीक्षा होती है. बाप जितना मिहनती होता है, बेटे को उतने ही नंबर आते हैं...परीक्षा में नक़ल, फिर नंबर बढ़वाने का रिवाज. विद्यार्थी पढ़कर ही क्या करेंगे?'' श्रीवास्तव जी ने स्पष्ट किया था...''फिर स्कूल लेबल पर तो पढ़ाई का स्तर बहुत गिरा हुआ है न?'' उन्होंने आगे जोड़ा था.

रामदेव पानी लेकर हाजिर था. मैंने देखा_स्टील का मोटा-सा गिलास_जो पता नहीं कब से सफाई का मोहताज था? हाथ में लेकर देखा_गिलास के भीतर भी कालिमा थी. और काई जैसे कुछ कण उसमें तैर रहे थे. मैंने रामदेव से पूछा, ''यह क्या तैर रहा है इसमें?'' रामदेव ने सहज भाव में जवाब दिया, ''चापाकल का वासर सड़ गया है, वही थोड़ा-थोड़ा आ जाता है.'' मैंने कहा_फेंक दीजिए इसको, नहीं पी सकूंगा.'' प्यासा रहना मुझे ज्यादा उचित लगा था. मुझे पेशाब करने की भी इच्छा हो रही थी. मैंने रामदेव से ट्वायलेट का पता पूछा. उसने विहंसते हुए जवाब दिया, ''यहां बाथरूम कहां है सर? उधर दिवाल के पीछे चले जाइए न?''...मैं चला गया. दीवार से सटा एक गड्ढा सा था.

उधर 'प्रणाम सर! प्रणाम सर!' होने लगा था. प्रिंसिपल साहब पधार चुके थे. थुल-थुल से. मुड़ी-तुड़ी कमीज पहने. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें. 'ओह! डॉ रामाराव, आप मुझे क्यों याद आ रहे हैं? आपकी पर्सनालिटी से मैं इनकी तुलना क्यों करने लगा हूं?''

कल जो सज्जन चाचा जी की बगल में बैठे थे_शायद महादेव बाबू_प्रिंसिपल से मेरा परिचय करवा रहे थे, ''रामेश्वर बाबू का भतीजा है सर! अपने कॉलेज में फिजिक्स...!''

''अच्छा! अच्छा! बहुत अच्छा!...कल क्या हुआ क्या कहें?''
''क्या हुआ सर?'' प्रिंसिपल का दुख सुनने को सभी कान व्यग्र हो उठे. प्रिंसिपल ने सुनाया, ''कल भोरे से 'बेटीचोदना' दांत में दरद हो रहा था. इसीलिए नहीं आ सके.''

''दांत हिलता है क्या सर?''
''गरम पानी से कुल्ला नहीं किए थे?''
''मधु और फिटकिरी मिलाकर लगा देते?''
''नीम का दातुन किया कीजिए सर!''...

चारों ओर से जिज्ञासा और सलाहों की बौछारें पड़ने लगी थीं. कोई इनमें पीछे रहने को तैयार नहीं था. बात आखिर प्रिंसिपल साहब के दांत की थी! एक मैं ही मौन था और प्रिंसिपल साहब के वक्तव्यों में से एक शब्द पकड़ कर उस पर विचार कर रहा था, 'बेटी...!'

दंत-पुराण से निकल कर प्रिंसिपल साहब ने मेरे ज्वाइनिंग एप्लीकेशन पर दस्तख़त कर दिया था.
मेरी गाड़ी का समय हो गया था, मैं सबको प्रणाम कर निकल गया.

अगले दिन फिर से वह लड़का आ गया था लेकिन बिना कुछ पढ़े. ''घर में काम रहता है सर! नहीं पढ़ पाते हैं!'' उसने कहा. मैं द्रवित हो गया. कहा, ''ठीक है, तुम रोज यहां आया करो. मैं तुम्हें शुरू से पढ़ाऊंगा.'' मैंने सोचा आज ज़रा लेबोरेटरी का मुआयना कर लिया जाए? रूपेश कुमार को साथ लेकर मैं चल पड़ा. उस पक्की बिल्डिंग में एक छोटा कमरा लेबोरेटरी के नाम था, उसमें फिजिक्स, कैमिस्ट्री, बायो सबके प्रयोग एक साथ किए जाते थे. कमरे के चारों कोनों में चार टेबल थे जिन पर कुछ-कुछ उपकरण 'मौजूद' थे. एक 'विम बैलेंस', जिसके बाहर के शीशे टूटे हुए. बैलेंस का एक पलड़ा ग़ायब. दूसरा धूल के भार से नीचे बैठा हुआ. कुछ टूटी-फूटी परखनलियां. कुछ बोतलों में फंफूद लगे केमिकल्स. कुछ बोतलों में सूखे हुए पौधे... वगैरह-वगैरह!

अब मैंने लाइब्रेरी देखने की इच्छा जताई. कल भी जताई थी लेकिन कल लाइब्रेरियन नहीं आए थे. रूपेश कुमार मुझे बाहर वाले कमरे में ले गया. लकड़ी की कुछ पुरानी अलमारियां_कुछ टेढ़ी, कुछ बंद होने से इनकार करतीं. किताबों के गट्ठर अलमारियों पर अलग से बोझ डाले हुए!...यानी, ये थे मेरे वैज्ञानिक बनने के उपकरण! सपना_सपना_सपना! भुगतो परिणाम_ हैदराबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन न लेने का. पढ़ो अनिकेत कुमार फिजिक्स पढ़ो_खूब पढ़ो! इंजीनियरिंग में गए होते तो किसी अच्छी कंपनी में, अच्छे शहर में काम कर रहे होते! रिसर्च करना है फिजिक्स में! रिसर्च करना जरूरी है कि नौकरी? चाचा जी के अनुसार तो नौकरी! पिताजी के अनुसार भी. तभी न यहां भेजने में उन्हें ज्यादा सोचना नहीं पड़ा? अब नौकरी छोड़ने की बात करता हूं तो सब हँसते हैं_इतनी अच्छी नौकरी! काम कम, पैसे ज्यादा. इतनी मुश्किल से मिलती है नौकरी, भला छोड़ोगे?

हैदराबाद जैसे शहर में बचपन से रहने के बाद गांव में रहना! रोज दो किमी पैदल चलकर स्टेशन पहुंचना, गाड़ी से यात्रा! वापसी बड़ी कठिन थी, सचमुच!...चाचा जी ने आश्वासन दिया था_''कुछ दिन कष्ट सहो न? तुम्हारा ट्रांसफर शहर के कॉलेज में करवा दूंगा. कुछ दिन धैर्य रखो!'' लेकिन मुझमें धैर्य नहीं था. कॉलेज तो कॉलेज था और गांव, गांव! बचपन के तीन-चार साल यहीं गुज़ारे हैं मैंने. फिर पिताजी के साथ हैदराबाद. साल-डेढ़ साल में एक बार गांव आना! अच्छा लगता था, लेकिन सब दिन यहां रहने की बात कभी नहीं सोची थी. सोच में कभी आई ही नहीं थी. चाचा जी लाख कहते रहें, ''नौकरी के लिए तो कहीं भी जाना पड़ता है. तुम्हारे पिताजी इतनी दूर हैदराबाद गए कि नहीं?''..''हैदराबाद जाना चाहे जितना कठिन रहा हो चाचा जी! वहां से लौटना तो और भी कठिन है!'' मैं तर्क करता हूं...''क्या आप नहीं समझते कि मेरे लिए वैसी ज़िंदगी जीने के बाद ऐसी ज़िंदगी जीना कितना कठिन हो सकता है?''

''हां, सब समझता हूं बेटा! कुछ दिन रुको न? मैं तुम्हारा ट्रांसफर करवा दूंगा न?'' चाचा जी विश्वास दिलाना चाहते हैं. झख मारकर मैं रहता हूं. दोस्तों को ख़त लिखकर मन का बोझ कम करने की कोशिश करता हूं. दोस्तों को यहां की बातें अविश्वसनीय लगती हैं. पूरे कॉलेज में कुल तीन-चार छात्रों की उपस्थिति तो घोर अविश्वसनीय!

आखिर छह महीने के उस 'सश्रम कारावास' से मुक्ति पाने का दिन भी आता है_चाचा जी का परिश्रम रंग लाता है, मेरा तबादला विक्रमगंज के 'प्रतिष्ठित' कॉलेज में हो जाता है. क़िस्सा मशहूर है कि यह बीएन_बिमला नारायण कॉलेज बिहार के चार-पांच श्रेष्ठ कॉलेजों में से एक है. मेरे चाचा जी और पिताजी तक को इस कॉलेज में पढ़ने का सौभाग्य मिल चुका है. अब जब मुझे उस कॉलेज में तबादले का सौभाग्य मिला, तब इस कॉलेज_एनबी-नारायण भगत कॉलेज के प्रिंसिपल मुझे रिलीव करने के पक्ष में नहीं थे. 'इतने दिनों बाद फिजिक्स के कोई अच्छे प्रोफ़ेसर आए हैं, वे भी चले जाएंगे तो लड़कों की पढ़ाई का क्या होगा?'...और उन्होंने कब्र खोद-खोद कर 'लड़कों' को जिंदा कर लिया था. जिस रूपेश कुमार को छोड़कर मैंने किसी का नाम तक छह महीने में नहीं सुना था, उनके नाम से मेरे स्थानांतरण के विरोध में आवेदन आ चुके थे. कुछ अभिभावकों के भी पत्र प्रिंसिपल ने जुगाड़ लिए थे और अपनी 'अच्छी' अंग्रेज़ी में वीसी से मेरा स्थानांतरण रोकने की अपील कर चुके थे. यानी जो प्रिंसिपल मेरे चाचा जी के अंतरंग मित्र होने का दावा करते थकते नहीं थे, भतीजे के विरूद्ध लंगोट कसकर उतर चुके थे. उन्हें इस महाविद्यालय के कुल जमा एक विद्यार्थी का भविष्य अंधकारमय दिखने लगा था. जो शिक्षक पूरे साल कॉलेज नहीं आते, उनको कुछ कहने की हिम्मत इन्हें नहीं है, लेकिन मेरे नहीं रहने से इनका कॉलेज बंद हो जाएगा! मेरे मन में गुस्सा ही गुस्सा था. प्रिंसिपल के सामने कुर्सी पर गुस्सा दिखाकर मैं शांत हो गया था. मैं सोच रहा था, इनके विरूद्ध चांसलर को लिखूंगा. मैं तो इस कॉलेज के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगाते हुए ही पत्र लिखूंगा. जिस कॉलेज पर लाखों रुपए प्रतिमाह सरकार ख़र्च करती है, उसकी उपलब्धि क्या है? आखिर सरकारी धन का ऐसा दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है? क्यों नहीं इस कॉलेज को बंद कर यहां के लोगों को वहां भेज दिया जाता है_जहां 'मैन पावर' की वाक़ई जरूरत है?...मैं इन मुद्दों को प्रेस में देने की भी सोचने लगा था.

मैं स्टेशन की तरफ़ जा रहा था. साथ में थे हसन साहब और श्रीवास्तव जी. हमें आता देख आगे चल रहा कॉलेज का चपरासी पाठक जी रुक गया. हमारे साथ ही चलने लगा. ''बड़ा दोगला है प्रिंसिपल सर!'' उसने मेरे दुख में शामिल होते हुए कहा. ''देखे थे ऊ दिन जब मंटा यादव इनको लाठी कर रहा था, तब कैसा मुंह हो गया था?...भला का जमाने नहीं है!'' उसने आगे जोड़ा था.

सचमुच! उस दिन मंटा यादव इनका बुरा हाल कर देता. गाली तो खुले आम दे रहा था. एक चपरासी प्रिंसिपल को अपने गुप्तांग का बाल कह रहा था! कोई कुछ नहीं बोल रहा था. मैं ही बीच-बचाव करने क्यों पहुंच गया था? बीच-बचाव करना यहां का रिवाज ही नहीं है. आज ही जब प्रिंसिपल मेरी बात तक सुनने को तैयार नहीं थे, कोई टीचर कुछ क्यों नहीं बोल रहे थे? यहां अपना महाभारत आप ही लड़ना होता है शायद!

उस तनाव ग्रस्त वातावरण को रंजकता प्रदान करने के उद्देश्य से श्रीवास्तव जी ने पाठक जी को टहोका, ''अच्छा, पाठक जी? प्रिंसिपल साहब का दो हज़ार वाला क़िस्सा क्या है?''...पाठक जी हँसने लगे, ''बताए थे न सर?''...''हां, हां, बताए तो थे! अनिकेत जी नहीं जानते हैं न? सुनाइए ज़रा!''

''हुआ क्या था सर?'' पाठक जी मेरे मुखातिब थे, ''कि एक बार प्रिंसिपल साहब से एक जनानी दू हजार रुपया उधार ले गई थी. घर में प्रिंसिपल साहब किसी को नहीं बताए थे. मगर किसी तरह उनके बेटवा को पता चल गया. अब बेटवा ऊ जनानी के यहां पहुंच गया, पैसा मांगने. जनानी बड़ा जब्बर थी. बेटवा को बोली, ''पैसा कोन चीज़ का मांगते हो? दू बार 'घचपिलेंटिस' जो किया तुम्हारा बाप! दू हज़ार असूल हुआ कि नहीं?''...

हँसते-हँसते हम लोट-पोट हो गए. मेरा तनाव थोड़ा कम हो गया. स्टेशन आ गया था. पता चला, गाड़ी एक घंटा लेट है. 'चलिए चाय पीते हैं,' हसन साहब ने सुझाव दिया. हमने माना. वैसे मौसम बहुत गर्म था, फिर भी टाइम पास! हम लोग पीपल के एक घने पेड़ के नीचे बैठ गए. पाठक चाय के लिए दुकानदार को बोल आया और हम लोगों के साथ नीचे ज़मीन पर उकड़ूं बैठ गया. उसके हाव-भाव से लग रहा था कि वह कुछ और बात करना चाह रहा है. तब तक हसन साहब ने उसे उकसाया, ''अरे! विमलेश बाबू वाली कहानी क्या है?'' मुझे लग गया कि हसन साहब उस कहानी से परिचित थे, लेकिन मुझे ही सुनवाना चाहते थे. पाठक शुरू हो गया, ''अरे! सर, क्या बतावें? पहले हमारा कॉलेज यहां नहीं था, उधर गंगाजी के किनारे था. हौस्टल भी था उसमें. अब न गंगा में कट गया? स्टाफ क्वाटर भी था. बिमलेस बाबू उसी में रहते थे. इनकी जनानी गांव में रहती थी. एगो मेहतरनी साफ़-सूफ़ करने इनके घर आती थी. दसहरा का टैम था. बिमलेस बाबू हटिया से एक ठो साड़ी ख़रीद कर लाए, मेहतरनी को दिए. बगल में रहते थे सिंह जी. सिंह जी मज़ाक़ किए, 'का हो बिमलेस बाबू, मंगनिये दे दिए साड़ी?'...तऽ बिलमेस बाबू बोले, 'एतना बुड़बक समझते हैं हमको?...अरे पूरा छुट्टी ऊ हमरा 'काम' करती रही थी!''

हम फिर ठहाके लगा रहे थे. चाय की चुस्कियों के साथ पाठक एक से एक कहानी सुना रहा था. कुछ क़िस्से समान लिंगों के भी थे. एक रिटायर्ड प्रोफेसर तो चपरासी, किरानी सबके लिए 'प्रस्तुत' हो जाया करते थे!!

मैं विक्रमगंज जा रहा था. साथ में चाचा जी. विचार हुआ कि 'छोड़ो साले प्रिंसपलवा को, सीधे वीसी के पास चलते हैं. जिस वीसी ने ट्रांसफर किया है, वही ज्वाइन करवाएंगे'...

वीसी ने बिमला नारायण कॉलेज के प्रिंसिपल को फ़ोन कर दिया, ज्वाइनिंग हो गई.

यह बी एन कॉलेज सचमुच भव्य था. ऊंची-ऊंची बिल्डिंग, स्टेडियम, प्रिंसिपल का सजा हुआ चैंबर, पेड़-पौधे. सौ एकड़ ज़मीन पर कॉलेज है. नारायण सिंह इस इलाक़े के बहुत बड़े जमींदार थे, उन्होंने ही ज़मीन दी, पैसे दिए. इसीलिए उन पति-पत्नी के नाम पर यह कॉलेज है.'' चाचा जी ने जानकारी दी थी.

ज्वाइन करने के बाद विभागाध्यक्ष को रिपोर्ट करना भी जरूरी था. आज ही से गर्मी की छुट्टियां हो गई थीं, विभागाध्यक्ष कॉलेज नहीं आएंगे. हेडक्लर्क ने बताया, 'स्टेडियम के पीछे उनका क्वार्टर है,

डॉ मिश्र वहीं मिल जाएंगे, चले जाइए!' हम लोग गए. डॉ मिश्र चाचा जी से परिचित थे. उन्होंने मेरा परिचय पूछा और एक बार फिर चाचा जी, ''मेरा भतीजा है...!''

''वाह! यह तो बहुत अच्छा रहा. 'अपने' हैं.'' विभागाध्यक्ष कह रहे थे, ''एक नए व्यक्ति ट्रांसफर होकर आ रहे हैं, यह तो पता था लेकिन यह नहीं पता था कि 'अपने'...! मुझे बताया गया था इनका नाम. लेकिन 'चौधरी' टाइटिल से कन्फ्यूजन हो गया था. पता नहीं चल पा रहा था कि 'भू धातु' (भूमिहार) हैं कि सामाजिक न्याय के हैं कि हमारी ही तरह?...अब मैं निश्चिंत हो गया हूं.''

विभागाध्यक्ष डॉ मिश्र तो मुझे अपनी जाति का पाकर निश्चिंत हो गए थे लेकिन मैं उद्विग्न हो गया था. जातिवाद यहां इतने गहरे तक है इसका अनुमान नहीं था. सामान्य लोग जातिवादी हों, ठीक! नेता लोग जात का उत्पात मचाकर वोट लें, यह भी ठीक. लेकिन पढ़े-लिखे लोग, 'प्रोफ़ेसर्स!' वो भी फिजिक्स के?..शर्म है भाई शर्म! इस प्रोफ़ेसर मिश्र और उस पियन पाठक में आखिर अंतर क्या है? उसने एकांत पाकर एक दिन, ''आहा! सर, एक तो आए हैं अपन जात के, बाक़ी सब तो...!'' कह ही दिया था तो क्या बुरा किया था?

छुट्टियां हो ही गई थीं, मैंने हैदराबाद जाने की इच्छा व्यक्त की. चाचा जी पहले तो कहते रहे कि 'कामेश्वर भी तो गांव आने वाला था, क्या करोगे जाकर?' लेकिन मेरी जिद पर झुक गए. पिताजी यहां आते तो चाचा जी मेरी शादी की बात पक्की करने की कोशिश करते. जब से नौकरी लगी है, कोई न कोई रिश्ता लेकर चाचा जी के पास पहुंच ही रहा है. मेरा रुकना संभव न देखकर चाचा जी ने एक लंबा पत्र सभी रिश्तों की डिटेल देते हुए पिताजी को लिखा. कुछ 'अच्छी' लड़कियों की तस्वीरें भी लिफ़ाफ़े में दे दीं. लिफ़ाफ़ा जान-बूझकर खुला रखा ताकि मैं देख सकूं. मैंने देखीं भी_ट्रेन पर टाइम पास करने के ख़याल से. उन्हें देखकर मुझे गुस्सा ही आता रहा. लड़कियां क्या थीं, कार्टून थीं. किसी ने कुत्ता पकड़कर फ़ोटो खिंचवाया था. किसी ने घर के सभी साजो-सामान, फ्रिज़, टीवी, टेपरिकार्डर इकट्ठे कर लिए थे और बीच में खुद खड़ी हो गई थी. कोई खुले बालों में आकाश ताक रही थी. मन किया था कि एक थप्पड़ ऊपर से देकर इसका सर सीधा कर दूं!

हैदराबाद पहुंचकर मैं सबसे पहले अपने मित्रों से मिला. अपनी नौकरी के अनुभव सुनाए. मेरे लिए सुपरवाइजर प्रोफ़ेसर रेड्डी से मिलना बहुत जरूरी था. मैं बाहर रहने लगा हूं इसलिए मेरा रजिस्ट्रेशन कैंसिल भी किया जा सकता है. प्रोफ़ेसर रेड्डी ने आश्वस्त किया, ''तुम्हें स्पेशल परमीशन दिलवा दूंगा...वैसे तुम छुट्टियां लेकर आ जाओ. एक-डेढ़ साल में काम पूरा कर लो!'' मैंने उन्हें बताया कि अभी छुट्टियां नहीं मिलेंगी, प्रोबेशन पीरियड है! प्रोफ़ेसर रेड्डी ने तब सलाह दी कि, ''छुट्टियों में यहां आओ और बाक़ी समय वहीं पढ़ाई करो. बीच में एक-दो महीना मेडिकल तो ले ही सकते हो? बीमारी को कौन रोक लेगा?''

प्रो रेड्डी ने पूछा था, ''पेमेंट मिलना शुरू हुआ या नहीं? तुमने तो लिखा था कि तीन महीने हो गए, एक पैसा नहीं मिला है?''

''हां, सर, इन कुल छह महीनों में से डेढ़ महीने का वेतन मिला है. वो भी तीन दिन वीसी के आगे धरने पर बैठने के

बाद.'' प्रो रेड्डी 'क्वाइट सरप्राइजिंग' कहते हुए मुस्करा रहे थे. मैंने आगे कहा था, ''वेतन का यह हाल है सर! कि पूरा कभी नहीं मिलता. डीए वहां स्टेट गवर्नमेंट के एम्प्लाई की तुलना में आधा ही मिलता है. पीएफ कट जाता है लेकिन शिक्षकों के खाते में जमा नहीं होता. पीएफ से कोई लोन लेना चाहे तो उसमें कठिनाई! फिर लोन रिकवरी के लिए सैलरी से जो डिडक्शन किया जाता है, वह भी खाते में जमा नहीं होता. और तो और, एलआईसी के एवज में काटी गई राशि भी एलआईसी को नहीं भिजवाई जाती. यूनिवर्सिटी खा-पका जाती है.''
''हॉरिबुल!'' प्रो रेड्डी बोल पड़े थे.

''हां, सर, उसी 'हॉरिबुल कंडीशन' में मैं रह रहा हूं. और जानते हैं सर..'' मैं आगे बताना चाहता हूं, ''रिटायर्ड होने के बाद शिक्षक कॉलेज और यूनिवर्सिटी के चक्कर लगाते-लगाते चक्कर की बीमारी पाल लेते हैं, लेकिन पीएफ के पैसे वापस नहीं मिलते, ग्रेचुइटी नहीं मिलती, पेंशन फिक्स नहीं हो पाता!...''

प्रो रेड्डी ज़ोर से हँसने लगे थे. मैंने कहा, ''मैंने देखा है सर कि बूढ़े लोग यूनिवर्सिटी जाते हैं, क्लर्कों के पास गिड़गिड़ाते हैं. ऐसी अपमानजनक स्थिति है कि क्या कहें?...क्लर्क लोग पान चबाते हुए कुर्सियों पर बैठे रहते हैं, रिटायर्ड प्रोफ़ेसर्स खड़े रहते हैं या ज्यादा से ज्यादा स्टूल पर बैठा दिए जाते हैं.''

''पूरा सिस्टम ही गड़बड़ है बिहार का. ऐसे में तुम्हें परेशानी तो होती ही होगी!'' प्रो रेड्डी मुझसे सहानुभूति दिखाने लगे थे. मैंने विनम्र भाव से निवेदन किया था, ''मैं नौकरी छोड़ देना चाहता हूं सर!''

''नहीं, अभी नहीं. समय आने दो. जब यहां कुछ हो पाएगा, तब छोड़ना...तुम तो यूनिवर्सिटी पॉलिटिक्स में भी नहीं हो, तुम्हें नुकसान उठाना पड़ सकता है!'' प्रो रेड्डी ने रैशनल होने की सलाह दे डाली थी.

घर में माताजी, पिताजी भी नौकरी छोड़ने की मेरी बात से सहमत नहीं हो रहे थे. ''अब तो अच्छे कॉलेज में आ गए हो न बेटा? शहर भी ठीक ही है विक्रमगंज. मन लगाने की कोशिश करो. शुरू में थोड़ी कठिनाई होगी, फिर एडजस्ट कर जाओगे.''

''हम तो तुम्हारी भलाई के लिए ही कह रहे हैं न बेटा?''

मां, पिताजी और छोटा भाई मेरी शादी के लिए लड़कियों की तस्वीरें देखते, किसी को पसंद करते, किसी को छांटते. उनके उत्साह को ठंडा करने के लिए मैंने साफ़ कह दिया, ''मैं अभी शादी नहीं करने जा रहा हूं.''

वापस विक्रमगंज लौटने से पहले मैं अपनी प्रिय जगह, 'साइंस म्यूजियम' गया था. कई बार देखे, परखे यंत्रों को मैं फिर-फिर देखता रहा, उनसे बतियाता रहा. वहां से मैं बिड़ला मंदिर भी गया था. बिड़ला मंदिर की उस ऊंचाई से नीचे की झील में छलांग लगा देने की इच्छा मुझे हुई थी!...जीवन की निरर्थकता का यह बोध घर लौटते वक्त चारमीनार के ऊपर उड़ने वाले परिंदों को देखकर और बढ़ गया था.

विक्रमगंज में चाचा जी ने एक छोटा-सा फ्लैट मेरे लिए किराए पर ले रखा था. मात्रा बारह सौ रुपए में वह बहुत बढ़िया फ्लैट था. हैदराबाद में इतना सस्ता फ्लैट तो नहीं ही मिलता है. कुछ दिन होटल में खाकर काम चलाने और कुछ ही दिन में एक नौकर की व्यवस्था कर देने का आश्वासन देकर चाचा जी गांव लौट गए थे. 'मिथिला होटल का खाना फर्स्ट क्लास होता है' चाचा जी की इस उक्ति को होटल में खाते हुए चावल में प्राप्त कंकड़ के साथ-साथ महसूस किया जाता था. चावल के मोटे-मोटे दाने भी किसी कंकड़ से कम नहीं लगते थे. डोसा खाने को मन ललकता तो मित्रों के बताए शहर के सबसे अच्छे रेस्तरां में चला जाता और पाता कि उसका डोसा हैदराबाद के फुटपाथी डोसे से भी खराब है!

कॉलेज खुल चुका था. पहले दिन कॉलेज पहुंचा, हेड से मिला. उन्होंने मेरा परिचय अन्य विभागीय सदस्यों से करवाया. हेड अपने कमरे में चले गए, मैं विभागीय सदस्यों के साथ स्टॉफ रूम में बैठ गया. प्यास लगी थी. चपरासी मेरे बगल वाले सज्जन को पानी पिला रहा था. सज्जन बोल पड़े, ''अरे! कृष्ण जी, गर्मी में गर्म पानी? घड़ा क्या हुआ?''

''घड़ा फूट गया है सर!''
''तो दूसरा नहीं मंगवाया?''

''प्रिंसिपल साहब को कितना बार कहे सर! बड़ा बाबू को भी कहे, मगर ध्यान ही नहीं देते. आज कह रहे थे, 'अपने पैसा से ले आओ, बिल दे दो!' अब आप तो जानबे करते हैं ई कौलेज? अपना पैसा हम गरीब आदमी फंसा दें और बिल पास करवाने के लिए नाक रगड़ते रहें? ई कैसे होगा सर?'' कृष्ण जी धारा प्रवाह बोल गए थे. मुझे अपनी यूनिवर्सिटी के हर कोने में मौजूद वाटर कूलर की याद आ गई. क्यों याद आती है, मुझे हैदराबाद की बातें? मैं भूल क्यों नहीं जाता?...मैंने कृष्ण जी से पानी देने का आग्रह किया. कृष्ण जी ने अभी-अभी पिए गए गिलास में दो-चार बूंद पानी देकर उसे साफ़ किया, पानी भरकर मुझे पकड़ाया. मैंने देखा, गिलास पर जहां अभी-अभी एक वरीय सदस्य ने अपने निचले ओठ रखे थे, वहां पान की पीक के कुछ अंश मौजूद थे. मेरा मन उबकाई से भर आया. मैं बाहर निकल गया. गिलास का पानी फेंक दिया, गिलास वापस कृष्ण जी को देकर प्यासा बैठ गया.

''आज क्लास नहीं होगा सर?'' मैंने पास बैठे एक सज्जन से पूछ लिया. ''होगा! लेकिन आज कम लड़के आएंगे. आज कॉलेज खुला ही है न? दो-चार दिन में लड़के आने लगेंगे. आज आपको किसी क्लास में परिचय करवा देंगे, फिर रूटीन में आपके नाम बंटवारा भी कर देंगे.'' उन्होंने कहा था और उधर हो रही बातचीत में शामिल हो गए थे, ''क्या? क्या कहा? फिर से कहिए न?''

''अरे! भाई, कैमिस्ट्री डिपार्टमेंट वाली बात बता रहा था. पांडे जी नहीं बोले थे?''
''क्या? क्या बोले थे?''

''अरे! नई महिला नहीं आई हैं उनके डिपार्टमेंट में? आते ही मैटरनिटी लीव पर चली गईं. हेड साहब परेशान! तो पांडे जी बोले कि 'सर! अच्छा है ऊ अभी मैटरनिटी लीव पर चली गईं. कुछ दिन रह जातीं तो बदनाम आप ही होते न?''

सभी 'विद्वान' प्राध्यापकगण 'ठी-ठी' करके हंस पड़े थे. यानी यहां भी वही सब? यानी एन बी कॉलेज और बीएन कॉलेज में केवल क्रम का ही अंतर था? एनबी_बीएन! दोनों में और कोई अंतर नहीं है? धीरे-धीरे मुझे पता चल गया कि यह अंतर केवल क्रम का था_एनबी_बीएन! और दोनों में एक चीज़ तो कॉमन ही थी_'नारायण!'... ओह! यहां भी नारायण! नर नदारत!! बिल्डिंग ज़रूर ऊंची और बड़ी थी लेकिन कोई बता नहीं सकता कि कब से 'व्हाईट वाशिंग' नहीं हुई है? दरकी हुई दीवारों में पीपल के पेड़ उगे हुए भी देखे जा सकते थे. वर्षा होने पर कमरे के अंदर पानी का प्रवाह भी देखा जा सकता था और हां, पढ़ाते हुए कभी आप उन बंदरों को देखने का लुत्फ भी उठा सकते थे जो कमरे के दोनों ओर की खिड़कियों को जीटी रोड की तरह इस्तेमाल करने में ज़रा भी भयभीत नहीं होते थे. खुले-खुले वेन्टीलेटर पर कबूतर की गुटर-गूं और नीचे डेस्क पर उनके गू...! लेबोरेटरी यहां इंटर के लायक ठीक थी. बीएससी के विद्यार्थियों को दिक्कत होती ही थी. सालों से कोई ख़रीद नहीं हुई है. पैसे जो ग्रांट के आते हैं, अथॉरिटी खा जाती है!

एक दिन अपनी यूनिवर्सिटी की चमकती दीवारों को याद कर मेरे मुंह से निकल गया, ''यहां सब बेईमान ही हैं क्या?''
''क्यों? हैदराबाद में सभी ईमानदार ही हैं?'' पास बैठे गिरधारी बाबू बोल पड़े थे.

''नहीं, सर! बेईमान वहां भी हैं. लेकिन वहां काम भी होता है, यहां सिर्फ चोरी...वहां भी कॉलेज फंड से पैसे उड़ाए जाते हैं लेकिन इतना काम हो जाता है कि लोगों को कहने का मौका नहीं मिलता. यहां देखिए, व्हाईट वाशिंग कब से नहीं हुई है? घड़े की ख़रीद में वक्त क्यों लगता है? उपकरण क्यों नहीं ख़रीदे जाते?...अब यहां की सड़कों को देखिए और साउथ की सड़कों को देखिए? ऐसा नहीं कि वहां स्वयं धर्मावतार सड़क बनवाते हैं! वहां भी सड़क बनवाने के पैसे खाए जाते हैं लेकिन सड़क पर भी पैसे लगाए जाते हैं. यहां...!'' मैं चुप हो गया था. गिरधारी बाबू जवाब नहीं दे पाए थे, 'सो तो है ही' कहकर रह गए थे.

लड़के यहां अपेक्षाकृत अच्छे थे. संख्या भी पूरी थी. पहले-पहल सौ-सवा सौ लड़कों को एक साथ देखकर मैं घबड़ा गया था. कहां एनबी कॉलेज का वह इकलौता भक्ति भाव से नीचे बैठा शिष्य, कहां सौ शिष्य. आपस में बातचीत करते हुए. हाजिर लेने में पसीना निकलने लगा. पंद्रह मिनट लग गए. एक सेक्शन में डेढ़ सौ से ज्यादा लड़के रखे गए हैं, यह भी एक बड़ा मज़ाक़ है!

क्लास पर अधिकार जमाने के उद्देश्य से मैंने विद्यार्थियों की ओर देखना शुरू किया. आगे के बच्चे शांत होने लगे थे. पीछे घुसुर-पुसुर जारी थी. वैसे ही एक विद्यार्थी को खड़ा कर मैंने पूछा, ''बताओ जी! प्रकाश की गति क्या है?'' वह चुप. कमरे में चुप्पी. 'न जाने किसको खड़ा कर देंगे?'' इस भय से. आगे के एक-दो लड़कों ने हाथ ऊपर किया और जवाब भी सही दिया. मैं विषय पर आ गया. जब भी किसी नए क्लास में जाता, यही फार्मूला अपनाता. क्लास विनीत बन जाता. दो-तीन क्लास लेने के बाद तो प्रत्येक कक्षा के कुछ-कुछ लड़के झुंड बनाकर मेरे पीछे पड़ जाते. मेरा नाम पूछते, रहने का स्थान पूछते. टयूशन पढ़ने की इच्छा ज़ाहिर करते. मैं उन्हें अपना नाम और रहने का स्थान तो बता देता, टयूशन पढ़ाने से साफ़ मना कर देता. 'कभी कोई दिक्कत हो, क्लास में समझ नहीं पाओ तो बाहर भी पूछ सकते हो,' ऐसा आश्वासन देता. कुछ लड़के तो मुग्ध भाव से यह भी कह उठते, ''अपना शिष्य बना लीजिए सर!'' मैं कहता, ''अरे! यार, अभी शिष्य बनाने की मेरी उम्र नहीं हुई है! हां, बड़ा भाई समझकर पास आओ तो खुशी होगी.''

कुछ लड़कियां भी समय निकाल कर मुझसे मिलने आतीं. एक तो ऐसी थी जिसने मुझे भी डिस्टर्ब कर दिया था. बीएससी पार्ट थर्ड की वह लड़की...! उस पर नजर पड़ते ही मैं क्लास में हकलाने लगता. उसकी हँसती हुई नाक पीछा करती. हँसती हुई नाक मैंने जीवन में पहली बार देखी थी.

इंटर की उस कन्या पर मुझे दया ही आई थी! मैंने अपना 'गुरुत्व' सम्हाल लिया था और प्रैक्टिकल की कॉपी जांचते हुए उसकी जांघों के दबाव से अपने पैर को मुक्त करवा लिया था! लेकिन यह हँसती हुई नाक...! क्या इससे गुरु-शिष्य संबंध के अतिरिक्त भी कोई संबंध स्थापित किया जा सकता है? यहां तो इस तरह की परंपरा भी रही है! किसी ने एक कहानी सुनाई थी. कोई सज्जन इसी विभाग में थे. पचास साल तक अपना कौमार्य बचाए रहे. फिर पता नहीं कैसे बाईस वर्षीय कन्या पर मुग्ध हो गए और पिता की जगह पति बन गए?...यहां से ट्रांसफर करवाकर अन्यत्र चले गए. क्या वह कहानी फिर से दोहराई नहीं जा सकती? यहां तो उम्र का अंतर भी कम ही होगा, वर 26 का वधू 20 की! इतना तो चलता ही है?...क्या मैं ऐसा सोचकर भ्रष्ट हो गया? क्या मैंने गुरु की गरिमा घटाई?...इस उम्र में ही गुरु बनने का अभिशाप उठाए मैं आखिर कर भी क्या सकता था?

महीना बीतते-बीतते मेरा परिचय बहुत लोगों से हो गया था. ज्यादातर नए लेक्चरर्स के साथ ही उठना-बैठना होता. क्लास में पढ़ाना भी अच्छा ही लगता, लेकिन अपनी पढ़ाई के छूटने का दुख बराबर बना रहा. एक दिन सोचा, अब पढ़ाई शुरू करनी चाहिए. चलें यहां के पुस्तकालय का 'अवलोकन' करें? बांग्ला विभाग के चटर्जी साहब के साथ मैं पुस्तकालय पहुंच गया. पुस्तकालयाध्यक्ष से परिचय हुआ. अपने विषय से संबंधित पुस्तकों का रजिस्टर देखा. रजिस्टर इसलिए कि यहां 'कैटलॉग' की सुविधा नहीं थी. कुछ किताबें काम की थीं, मैंने उन्हें निकलवा देने का आग्रह किया. लग रहा था, मैं पागल हो जाऊंगा सुनकर! चटर्जी साहब बता रहे थे, ''रिटायर्ड करने पर भी ये किताब नहीं लौटाते! इनके बेटे-बेटी, नाती-पोती सहित कई पीढ़ी के लोग उससे पढ़ते हैं. रिटायर्ड करते समय किताब का दो गुना क़ीमत जमा कर फ्री हो जाते हैं...अब देखिए, तीस साल पहले जिस किताब का दाम पंद्रह रुपया था, उसके बदले तीस रुपया जमा करना क्या मुश्किल है? जबकि आज के हिसाब से उसका दाम तीन सौ रुपया होता है!''

''भ्रष्ट हैं सब, भ्रष्ट!'' मैं बोल पड़ा था. ''इनको यह चिंता नहीं कि विद्यार्थियों को कितनी दिक्क़तें होती हैं?...तभी तो मैं जब लड़कों को लाइब्रेरी जाने को कहता हूं तो वे किताबें न मिलने का रोना रोते हैं?''

हमें चाय पीने की इच्छा होती है लेकिन कॉलेज में कैंटीन नाम की कोई चीज़ नहीं है. 'कल्चर ही नहीं है कैंटीन का!' मैं कहता हूं. 'चलिए न बाहर चलकर पी लेंगे.' चटर्जी साहब कहते हैं. हम चल पड़ते हैं. कॉलेज गेट से बाहर निकल कर जब चौक पर जाते हैं तो पाते हैं कि वहां लड़कों की भीड़ है. एक लड़का रह-रहकर घंटी बजा रहा है. एक बंदर मरा पड़ा है. एक लड़का उसकी पूंछ पकड़कर उसे उठाए हुए है. बगल में एक लाल रंग का कपड़ा बिछा है, जिस पर कुछ सिक्के कुछ नोट पड़े हैं. कुछ लड़के हर आने-जाने वाले वाहनों को रोककर पैसे देने का 'आग्रह' कर रहे हैं. उत्सुकतावश हमने एक लड़के से माजरा समझना चाहा तो उसने बताया, ''एक हनुमान जी मर गए हैं सर! लड़के चंदा जमा कर रहे हैं, यहां मंदिर बनेगा''... ''चलिए चटर्जी साहब! इन पागलों की भीड़ में हम कुछ नहीं कर पाएंगे. हमारा पढ़ाना बेकार जा रहा है. अब तक ये हनुमान और हनुमानजी का अंतर नहीं समझ सके हैं!!''
चाय की दुकान पर हम बैठे ही थे कि श्रीकांत जी गुज़रते मिल गए. हमने उनसे भी चाय पीने का आग्रह किया. आग्रह स्वीकार कर उन्होंने एक गरमागरम ख़बर हमें देना जरूरी समझा. ''जानते हैं? एक कांड हो गया है!''

''क्या?'' हमें उत्सुकता हुई.

''अरे! हॉस्टल नंबर तीन के वार्डन नहीं हैं, उपाध्याय जी? उनकी मिसेज अपने क्वार्टर के आंगन में नहा रही थी. एक लड़का छत पर था, देख रहा था, देखता रहा. थोड़ी देर में मिसेज की नजर जब ऊपर गई तो वह भागी भीतर! और बताया उपाध्याय जी को. उपाध्याय जी फायर! तुरत नोटिस निकाल दिया उसको हॉस्टल खाली करने के लिए.''

''अरे! ये क्या हो गया?'' मैं कहता हूं तो श्रीकांत जी कहते हैं, ''अभी क़िस्सा बाक़ी है! लड़के को प्रोक्टर के पास भेजा गया. लड़के ने क्या जवाब दिया, जानते हैं?...बोला, 'सर! हम इतना देर तक देखते रहे तऽ ऊ दिखाती काहे रही?''

हमारे दुखी होने की बारी थी. श्रीकांतजी लेकिन खुश थे. उपाध्याय जी से उनकी नहीं बनती है इसलिए. 'कैसे लड़के हैं यहां भाई?' मन घृणा से भर गया. 'ऐसे लड़कों को तो सचमुच निकाल देना चाहिए. अनुशासनहीनता की अच्छी मिसाल है यह!'...मुझे एक घटना याद आई और मैंने उन लोगों को सुनाया भी, ''एक दिन मैं क्लास के लिए जा रहा था. लेट हो रहा था इसलिए तेजी से चल रहा था. मैंने कहीं से आवाज़ सुनी, ''भौजी!''...आवाज़ बड़ी तेज़ थी. पीछे मुड़कर मैंने देखा तो कुछ लड़कियां मेरे पीछे-पीछे आ रही थीं. लड़कों ने उन्हें ही 'भौजी' कहा था. मैंने आवाज़ की दिशा में देखा तो ऊपर के कमरों में खिड़कियों पर लड़के खड़े थे, हंस रहे थे. मेरे उधर देखने पर सब पीछे हट गए थे.

इसी तरह खेल के मैदान की बात है. कई साल बाद एथलेटिक्स का आयोजन कॉलेज में हुआ था. लड़कियां भी हिस्सा ले रही थीं. 'डिस्कस थ्रो' हो रहा था. एक शादी-शुदा स्थूल सी लड़की डिस्कस फेंक रही थी. वह साड़ी में थी. जब वह डिस्कस फेंकती, भीड़ से आवाज़ आती, 'चाची!'...मैं गुस्से से लाल हो गया था. वे लड़के भीड़ में कहीं छुप गए थे, नहीं तो...! अरे! भाई, हम लोग भी यूनिवर्सिटी में लड़कियां देखा करते थे, उनके बारे में बातें किया करते थे, लेकिन किसी के सामने ऐसा कमेंट नहीं किया करते थे!''

''इतनी छोटी जगह में 'को-एड' होना ही नहीं चाहिए. जहां बचपन से ही लड़के- लड़कियों का अंतर मन में बैठाया जाता हो, वहां एकाएक बंधन तोड़ देना घातक होता है.'' श्रीकांत जी ने मेरी बात को बढ़ाते हुए कहा था, फिर उन्होंने एक घटना का जिक्र किया कि एक बार एक लड़का, एक लड़की एक कमरे में रोमांटिक मूड में बातें कर रहे थे. घूमते-घामते प्रिंसिपल वहां पहुंच गए. दोनों के गार्जियंस को बुलवा लिया गया. दोनों प्रेमियों ने कहा कि 'हम पढ़ाई की बात कर रहे थे!'...

''देखिए, 'को-एड' होने पर लड़के- लड़कियां आपस में बातचीत तो करेंगे ही? कुछ प्रेम-प्रसंग भी होंगे, इनको रोका नहीं जा सकता. हां, बदतमीजी न हो, इस बात का ख़याल ज़रूर रखा जाना चाहिए.'' मैंने कहा था.

मेरे जीवन से डेढ़ साल निकल चुके थे. इस बीच दो बार हैदराबाद भी हो आया था. रिसर्च का काम थोड़ा हो गया था. इस कॉलेज में शुरू-शुरू में पढ़ाने का जो उत्साह बना था वह भी धीमा होता जा रहा था. पढ़ाना अब बोरिंग लगने लगा था. क्लास कम से कम हो यही इच्छा बनी रहती थी. इसमें दो लंबी छुट्टियों के अतिरिक्त कभी शिक्षकों की हड़ताल, कभी शिक्षकेतर कर्मचारियों की, कभी छात्रों की तोड़-फोड़ मदद पहुंचाती थी. बची-खुची कसर परीक्षाएं निकाल लेती थीं. बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय का अपना कोई कैलेंडर नहीं है इसलिए यहां साल भर परीक्षाएं होती रहती हैं, कभी पार्ट वन, कभी पार्ट टू, कभी पार्ट थ्री तो कभी इंटर. बचे समय में कॉलेज की वार्षिक परीक्षाएं, टेस्ट परीक्षाएं! और इनमें डयूटी करने की अनिवार्यता. इस नौकरी का सबसे घटिया पक्ष. तीन घंटे की भयानक परेड. कॉपी बांटना, पर्चे बांटना, सबकी एटैंडेंस लेना फिर चौकीदारी_ इधर-उधर तो नहीं कर रहा? इस कॉलेज की परंपरा रही है नक़ल नहीं करने देने की. लेकिन फिर भी नक़ल हो ही जाती है. चिट निकाला, पकड़े जाने पर धमकी, ''मैं फलां का आदमी हूं.''...मैंने तो कह दिया था, ''तुम किसी के भी आदमी हो, अभी तुम्हें एक्सपेल्ड करूंगा.'' बीच में सहयोगी शिक्षक बचाव करने लगे थे, शायद डर गए थे, ''दे दीजिए कॉपी!''...''ऐ! लड़का तुम आगे बैठकर लिखो!'' वही सहयोगी मुझे थोड़ा-बहुत आंख मूंद लेने की सीख दे रहे थे, ''अरे! भाई, नौकरी करनी है न? क्यों टेंशन मोल लें? और आप यहां रोककर भी क्या कीजिएगा? जहां कॉपी जाएगी, वहां पहुंच जाएंगे, नंबर बढ़वा लेंगे! वहां भी नहीं तो सीधे यूनिवर्सिटी से मनचाहा नंबर पा लेंगे!''

''लेकिन कैसे छोड़ दें इस तरह सर?'' मैं उनसे पूछता हूं.

''अरे! भाई, आप नहीं छोड़िएगा तो प्रिंसिपल छोड़ देंगे! एक बार मेरे साथ यही हुआ था.''
''हे भगवान! मैं कहां फंस गया हूं?...मैं क्या-क्या छोड़ूं? टयूशन पढ़ाना, नोट्स बेचना मुझे अपने पेशे के प्रति बेवफाई लगी, छोड़ दिया. कॉपी जांचना भी इसीलिए रिफ्यूज कर चुका हूं कि बेईमानी करने से बच जाऊं. एक बार गलती से कापियां आ गईं. उनसे पहले आ गए थे सिफारिशी लोग. चपरासी से लेकर वीसी तक के लोग. कुछ लोकल अधिकारीगण. कुछ पुराने कॉलेज के सहयोगी. कुछ चाचा जी का खत लेकर! तंग आकर मैंने कापियां यूनिवर्सिटी को वापस कर दीं. अब यह जो अनिवार्य डयूटी मिली है, निगरानी की, उसे भी ठीक से नहीं निभाऊं?

''ऐ! लड़का! बात क्यों कर रहे हो?'' दो लड़कों को मैंने देख लिया था. दोनों की कापियां मैंने ले लीं. एक लड़का अकड़ने लगा, ''हम बात नहीं कर रहे थे सर!''

''तुम बात कर रहे थे, मैंने तुम्हें देखा है.''
''अब नहीं होगा सर!'' दूसरा समर्पण कर चुका था. दूसरे को मैंने कॉपी दे दी. पहला स्वीकार ही नहीं कर रहा था अपनी गलती. मैंने कहा, ''देखो, अगर गलती नहीं मानोगे तो परीक्षा से बाहर कर दूंगा.'' वह भी समर्पण कर बैठा. मैंने उसे भी कॉपी दे दी. लेकिन पीछे एक लड़का चिट से लिख रहा था. उसे 'एक्सपेल्ड' करने के अलावा चारा नहीं था. मैं उसे परीक्षा-नियंत्रक के हवाले कर आया.

अगले दिन डयूटी में तैनात सिपाही मुझसे कह रहे थे, ''सर! आप ही किए थे एक्सपेल्ड? लड़का लोग पूछ रहा था. लुच्चा-लफंगा होता है सर! बेकार...''

''अरे! भाई, आप लोग भी ऐसी बात करते हैं?'' मैंने कहा था, ''पुर्जा लेकर कोई नकल कर रहा हो तो उसे छोड़ देंगे?...वैसे लड़के करेंगे क्या? जान ही से न मार देंगे? मार दें, लेकिन नकल करते देखा नहीं जाएगा मुझसे.''

पता नहीं क्यों? इस बार का 'एक्सपल्शन' कॉलेज में गूंज रहा था. जो मिलता, वही पूछता, ''आप ही किए थे एक्सपेल्ड?''...इससे पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ था? कई लोग कर चुके थे एक्सपेल्ड?

दो-तीन दिन बाद की बात है. मैं अपने आवास से निकल कर बाज़ार जा रहा था. रिक्शा नहीं मिला था, पैदल ही. बीच में सुनसान-सा स्थान पड़ता था. वहां कुछ लड़के खड़े थे, मेरा रास्ता रोके. एक दादा क़िस्म का लड़का मुझसे सवाल कर रहा था, ''कॉपी छीनते हो?''

''हां! कोई नकल करेगा तो छीनेंगे ही!' मैं बोल गया था.
''भेजा गोली से उड़ा देंगे.''
''ठीक!''

''माधर...!'' उसने आधी गाली भी दी. मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था. वह हाथ उठाने लगा था शायद! तब तक बाक़ी लड़के बीच-बचाव करने लगे थे, उस 'दादा' को पकड़कर ले जाने लगे थे. मैं मर चुका था. ज़िंदगी में अपमान का एक लफ्ज़ भी सुनने को नहीं मिला था, आज...!

मैं घर लौट आया. रोने लगा. रोता रहा. खाना भी नहीं खाया गया. रात किसी तरह बीती. सुबह वर्मा जी को फ़ोन करके बुलवाया. वे समझाने लगे, ''यहां कुछ भी संभव है. मैं तो यहां स्टूडेंट लाईफ से ही रह रहा हूं. ऐसे ही एक केस में किसी ने घुसा दिया था, पीछे से डंडा...! नृशंस! नृंशस हैं लोग भाई! बच के रहने में ही फ़ायदा है.''

''अभी कुछ दिन पहले अख़बार में नहीं पढ़ा था?'' वर्मा जी बोल रहे थे, ''मननपुर के कॉलेज का हाल?...कॉलेज में घुसकर एक शिक्षक से गाली-गलौज की, एक को पीटा! अरे! यहां तो कॉलेज में घुसकर आपको कोई गोली मारने आए, तो भी कोई बचाने वाला नहीं है. इसलिए...''

''मैं यह नौकरी छोड़ रहा हूं वर्मा जी! मैं एलान कर देता हूं, 'मेरा अपमान हुआ है'.''

''देखिए! नौकरी छोड़नी हो तो छोड़ दीजिए? वैसे भी आपको यहां मन नहीं ही लग रहा है. आप छोड़ सकते हैं, जा सकते हैं हैदराबाद! लेकिन यहां कितने लोग नौकरी छोड़ने की स्थिति में हैं?...हां, जहां तक अपमान की बात है, तो अपमान आपका नहीं हुआ है. आप चोरी, बेईमानी नहीं कर रहे थे. आप तो अच्छे काम की वजह से प्रताड़ित हुए हैं. आपकी बेइज्ज़ती का सवाल ही कहां है?' मित्र होने के नाते वर्मा जी ने मरहम लगाना चाहा था. लेकिन उस हादसे को मैं भूलने की स्थिति में नहीं था. मुझे याद आ रही थी हाल ही में प्रधानमंत्री जी के मुख से सुनी गीता की उक्ति, 'न दैन्यं न पलायनं!' यह प्रधानमंत्री जी का मोटो है, आदर्श वाक्य! ऐसी उक्तियां प्रधानमंत्रियों पर ही चरितार्थ हो सकती हैं, या फिर कृष्ण पर, अर्जुन पर! हमारे जैसे साधारण मनुष्यों के हिस्से तो दैन्य ही आता है, पलायन ही आता है.

मैं पलायन कर रहा हूं. अगर दुनिया में रहने लायक कोई जगह नहीं बची हो तो मैं अपेक्षाकृत कम खराब जगह का चुनाव करूंगा. वहां जाकर अपना रिसर्च पूरा करूंगा. फिर आगे के रिसर्च के लिए बाहर चला जाऊंगा. मैं वैज्ञानिक का जीवन जीना चाहता हूं, लेक्चरर का नहीं! इस पेशे से मुझे नफरत हो गई है. जिन विद्यार्थियों को मैं जी-जान से चाहता था, उनके नाम से नफ़रत हो गई है.

मैं धरती के इस सबसे बड़े नरक से मुक्ति चाहता हूं.
मैं स्टेशन जा रहा था. अकेला. वाया कलकत्ता हैदराबाद का टिकट बुक करवाने.
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रचनाकार - संजीव ठाकुर के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ, समीक्षाएँ, भेंटवार्ताएँ, बाल-कहानियाँ तथा एक कहानी-संग्रह, 'नौटंकी जा रही है.' प्रकाशित हैं. कुछ पुस्तकों के सहयोगी लेखक, तथा कुछ पुस्तकों का संपादन भी आपने किया है.


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चित्र – रेखा श्रीवास्तव की कलाकृति, कैनवस पर तैलरंग – 36x48 इंच



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“लेखक विद्वान हो न हो, आलोचक सदैव विद्वान होता है. विद्वान प्रायः भौंडी बेतुकी बात कह बैठता है. ऐसी बातों से साहित्य में स्थापनाएँ होती हैं. उस स्थापना की सड़ाँध से वातावरण बनता है जिसमें कविताएँ पनपती हैं. सो, कुछ भी कहो, आलोचक आदमी काम का है.” आज से आठ वर्ष पूर्व आलोचना पर अपने मित्रों के समूह में बोलते हुए यह विचार मैंने प्रकट किए थे. वे पत्थर की लकीर हैं. लेखक का साहित्य के विकास में महत्व है या नहीं है यह विवादास्पद विषय हो सकता है पर किसी साहित्यिक के विकास में किसी आलोचक का महत्व सर्वस्वीकृत है. साहित्य की वैतरणी तरना हो तो किसी आलोचक गैया की पूंछ पकड़ो, फिर सींग चलाने का काम उसका और यश बटोरने का काम कमलमुख का.

आलोचना के प्रति अपनी प्राइवेट राय जाहिर करने के पूर्व मैं आपको यह बताऊं कि आलोचना है क्या? यह प्रश्न मुझसे अकसर पूछा जाता है. साहित्यरत्न की छात्राएँ चूंकि आलोचना समझने को सबसे ज्यादा उत्सुक दिखाई देती हैं इसलिए यह मानना गलत न होगा कि आलोचना साहित्य की सबसे टेढ़ी खीर है. टेढ़ी खीर इसलिए कि मैं कभी इसका ठीक उत्तर नहीं दे पाता. मैं मुस्कराकर उन लड़कियों को कनखियों से देखकर कह देता हूँ, “यह किसी आलोचक से पूछिए, मैं तो कलाकार हूँ.”

खैर, विषय पर आ जाऊँ. आलोचना शब्द लुच् धातु से बना है जिसका अर्थ है देखना. लुच् धातु से ही बना है लुच्चा. आलोचक के स्थान पर आलुच्चा या सिर्फ लुच्चा शब्द हिन्दी में खप सकता है. मैंने एक बार खपाने की कोशिश भी की थी, एक सुप्रसिद्ध आलोचक महोदय को सभा में परिचित कराते समय पिछली जनवरी में वातावरण बहुत बिगड़ा. मुझे इस शब्द के पक्ष में भयंकर संघर्ष करना पड़ा. आलोचक महोदय ने कहा कि आप शब्द वापस लीजिए. जनता ने भी मुझे चारों ओर से घेर लिया. मुझे पहली बार यह अनुभव हुआ कि हिंदी भाषा में नया शब्द देना कितना खतरा मोल लेना है. मैंने कहा, मैं शब्द वापस लेता हूँ. पर आप यह भूलिए नहीं कि आलोचना शब्द ‘लुच’ धातु से बना है.

अस्तु, बात आई गई हो गई. मैंने इस विषय में सोचना और चर्चा करना बंद सा कर दिया. पर यह गुत्थी मन में हमेशा बनी रही कि आलोचक का दायित्व क्या है? वास्तव में साहित्य के विशाल गोदाम में घुसकर बेकार माल की छंटाई करना और अच्छे माल को शो-केस में रखवाना आलोचक का काम माना गया है, जिसे वह करता नहीं. वह इस चक्कर में रहता है कि अपने परिचितों और पंथ वालों का माल रहने दें, बाकी सबका फिंकवा दें. यह शुभ प्रवृत्ति है और आज नहीं तो कल इसके लाभ नजर आते हैं. कोशिश करते रहना समीक्षक का धर्म है. जैसे हिन्दी में अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि मैथिलीशरण गुप्त, निराला और कविवर कमलमुख में कौन सर्वश्रेष्ठ है. एक राष्ट्रकवि है. एक बहुप्रशंसित है और तीसरे से बड़ी-बड़ी आशाएँ हैं.

समीक्षकों के इस उत्तरदायित्वहीन मूड के बावजूद पिछला दशक हिन्दी आलोचना का स्वर्णयुग था. जितनी पुस्तकें प्रकाशित नहीं हुईं उनसे अधिक आलोचकों को सादर भेंट प्राप्त हुई हैं. कुछ पुस्तकों को संपूर्ण संस्करण ही आलोचकों को सादर भेंट करने में समाप्त हो गया. समीक्षा की नई भाषा, नई शैली का विकास पिछले दशक में हुआ है. (दशक की ही चर्चा कर रहा हूँ क्योंकि मेरे आलोचक व्यक्तित्व का कंटीला विकास भी इसी दशक में हुआ है). हिन्दी का मैदान उस समय तक सूना था जब तक आलोचना की इस खंजर शब्दावली का जन्म नहीं हुआ था. इस शब्दावली के विशेषज्ञों का प्रकाशक की दूकान पर बड़ा स्वागत होते देखा है. प्रकाशक आलोचक पालते हैं और यदि इस क्षेत्र में मेरा जरा भी नाम हुआ तो विश्वास रखिए, किसी प्रकाशक से मेरा लाभ का सिलसिला जम जाएगा.

मैंने अपने आलोचक जीवन के शैशव काल में कतिपय प्रचलित शब्दावली, मुहावरावली और वाक्यावली का अनूठा संकलन किया था जिसे आज भी जब-तब उपयोग करता रहता हूँ. किसी पुस्तक के समर्थन तथा विरोध में किस प्रकार के वाक्य लिखे जाने चाहिए, उसके कतिपय थर्ड क्लास नमूने उदाहरणार्थ यहां दे रहा हूँ. अच्छे उदाहरण इस कारण नहीं दे रहा हूँ कि हमारे अनेक समीक्षक उसका उपयोग शुरू कर देंगे.


समर्थन की बातें

इस दृष्टि से रचना बेजोड़ है (दृष्टि कोई भी हो). रचना में छुपा हुआ निष्कलुष वात्सल्य, निश्छल अभिव्यक्ति मन को छूती है.
छपाई, सफाई विशेष आकर्षक है.
रूप और भावों के साथ जो विचारों के प्रतीक उभरते हैं, उससे कवि की शक्ति व संभावनाओं के प्रति आस्था बनती है.
कमलमुख की कलम चूम लेने को जी चाहता है. (दत्तू पानवाला की, यह मेरे विषय में व्यक्त राय देते हुए संकोच उत्पन्न हो रहा है परंतु उनके विशेष आग्रह को टाल भी तो नहीं सकता).
मनोगुम्फ़ों की तहों में इतना गहरा घुसने वाला कलाकार हिन्दी उपन्यास ने दूसरा पैदा नहीं किया.
आपने प्रेमचंद की परंपरा को बढ़ाया है. मैं यदि यह कहूं कि आप दूसरे प्रेमचंद हैं तो गलती नहीं करता.
कहानी में संगीतात्मकता के कारण उसी आनंद की मधुर सृष्टि होती है जो गीतों में पत्रकारिता से हो सकती है.

विरोध की बातें

कविता न कहकर इसे असमर्थ गद्य कहना ठीक होगा. भावांकन में शून्यता है और भाषा बिखर गई है.
छपाई, सफाई तथा प्रूफ संबंधी इतनी भूलें खटकने वाली हैं.
लेख कोर्स के लिए लिखा लगता है.
रचना इस यशसिद्ध लेखक के प्रति हमें निराश करती है. ऐसी पुस्तक का अभाव जितना खटकता था, प्रकाशन उससे अधिक अखरता है.
संतुलन और संगठन के अभाव ने अच्छी भाषा के बावजूद रचना को घटिया बना दिया है.
लेखक त्रिशंकु-सा लगता है – आक्रोशजन्य विवेकशून्यता में हाथ पैर मारता हुआ.
इन निष्प्राण रचनाओं में कवि का निरा फ्रस्ट्रेशन उभरकर आ गया है.
पूर्वग्रह ग्रसित दृष्टिकोण, पस्तहिम्मत, प्रतिक्रियाग्रस्त की तड़पन व घृणा, शब्द चमत्कार से कागज काला करने की छिछली शक्ति का थोथा प्रदर्शन ही होता है इन कविताओं में.
स्वयं लेखक की दमित, कुंठित वासना की भोंडी अभिव्यक्ति यत्र तत्र ही नहीं, सर्वत्र है.
सामाजिकता से यह अनास्था लेखक को कहाँ ले जाएगी. जबकि मूल्य अधिक है पुस्तक का.

ये वे सरल लटके-खटके हैं जिनसे किसी पुस्तक को उछाला जा सकता है, गिराया जा सकता है.

आलोचना से महत्वपूर्ण प्रश्न है आलोचक व्यक्तित्व का. पुस्तक और उसका लेखक तो बहाना या माध्यम मात्र है जिसके सहारे आलोचक यश अर्जित करता है. प्रसिद्धि का पथ साफ खुला है. स्वयं पुस्तक लिखकर नाम कमाइए अथवा दूसरे की पुस्तक पर विचार व्यक्त कर नाम कमाइए. बल्कि कड़ी आलोचना करने से मौलिक लेखक से अधिक यश प्राप्त होता है.

इस संदर्भ में मुझे एक वार्तालाप याद आता है जो साहित्यरत्न की छात्रा और मेरे बीच हुआ था-

रात के दस बजे/गहरी ठंड/पार्क की बेंच/वह और मैं/तारों जड़ा आकाश/ घुप्प एकांत लुभावना.

वह- “आलोचना मेरी समझ में नहीं आती सर.”
मैं- “हाय सुलोचना, इसका अर्थ है तुझमें असीम प्रतिभा है. सृजन की प्रचुर शक्ति है. महान लेखकों को आलोचना कभी समझ में नहीं आती.”

वह- “आप आलोचना क्यों करते हैं?”
मैं- “और नहीं तो क्या करूं. दूसरे की आलोचना का पात्र बनने से बेहतर है मैं स्वयं आलोचक बन जाऊँ”

वह- “किसी की आलोचना करने से आपको क्या मिलता है?”
मैं- “उसकी पुस्तक”

कुछ देर चुप्पी रही.

वह- “सच कहें सर, आपको मेरे गले की कसम, झूठ बोलें तो मेरा मरा मुंह देखें. आलोचना का मापदंड क्या है? समीक्षक का उत्तरदायित्व आप कैसे निभाते हैं?”

उस रात सुलोचना के कोमल हाथ अपने हाथों में ले पाए बिना भी मैंने सच-सच कह दिया- “सुलोचना! आलोचना का मापदंड परिस्थितियों के साथ बदलता है. समूचा हिन्दी जगत तीन भागों में बंटा है. मेरे मित्र, मेरे शत्रु और तीसरा वह भाग जो मेरे से अपरिचित है. सबसे बड़ा यही, तीसरा भाग है. यदि मित्र की पुस्तक हो तो उसके गुण गाने होते हैं. सुरक्षा करता हूँ. शत्रु की पुस्तक के लिए छीछालेदर की शब्दावली लेकर गिरा देता हूँ. और तीसरे वर्ग की पुस्तक बिना पढ़े ही, बिना आलोचना के निबटा देता हूँ या कभी-कभी कुछ सफे पढ़ लेता हूँ. अपने प्रकाशक ने यदि किसी लेखक की पुस्तक छापी हो तो उसकी प्रशंसा करनी होती है ताकि कुछ बिक विक जाए. जिस पत्रिका में आलोचना देनी हो उसके गुट का खयाल करना पड़ता है. रेडियो के प्रोड्यूसर, पत्रों के संपादक तथा हिन्दी विभाग के अध्यक्ष आलोचना के पात्र नहीं होते. सुलोचना, सच कहता हूँ, प्रयोगवादी धारा का अदना-सा उम्मीदवार हूँ. अतः हर प्रगतिशील बनने वाले लेखक के खिलाफ लिखना धर्म समझता हूँ. फिर भी मैं कुछ नहीं हूँ. मुश्किल से एक-दो पुस्तक साल में समीक्षार्थ मेरे पास आती है बस... बस इतना ही.”

(सुलोचना ने बाद में बताया उस रात मेरी आँखों में आंसू छलछला आए थे)

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रचनाकार – शरद जोशी (21 मई 1931 – 5 सितम्बर 1991) को हिन्दी साहित्य के सर्वकालिक तीन महान् व्यंग्यकारों में से एक माना जाता है. प्रस्तुत अंश उनके व्यंग्य उपन्यास – मैं, मैं और केवल मैं (वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली 110002, प्रकाशन वर्ष 1993) से साभार उद्भृत.

चित्र – लोकेश की कलाकृति. कैनवस पर तैलरंग, 36x48 इंच



आकाश सक्सेना सुबह जब दफ़्तर पहुँचा, तब कम ही लोग आए थे. जो आए थे वे ई.टी. पढ़ रहे थे या फिर आपस में फैशन, फूड या फ़िल्म में से किसी एक विषय पर गपशप कर रहे थे.

आकाश को ऐसी मंडलियों में बैठना अच्छा नहीं लगता. ...कलीग इस तरह बातें करते हैं जैसे बहुत बड़े दार्शनिक हों. जबकि उनके पास सतही सूचनाएं होती हैं और वे उसे ज्ञान समझने की खुशफहमी पाले रहते हैं.

आकाश सक्सेना ने चाय मंगवाई. अभी उसने कुछ घूँट ही भरे थे कि इंटरकॉम की बेल बजी. डीएम आकाश सक्सेना को अपने केबिन में बुला रहा था.

आकाश मन ही मन मुस्कराया. चाय ख़त्म की. मन ही मन बुदबुदाया – बिस्मिल्लाह ही ख़राब हो गया.

आकाश सक्सेना डी.एम. केबिन में था. बड़ी सी टेबल. रिवाल्विंग चेयर. टेबल पर शीशा. शीशे के नीचे सर्कुलर... पेपर... देवी देवताओं की तस्वीरें. कमरे में गणेश जी की मूर्ति. अगरबत्ती. खुशबू... फर्श पर महरून कलर का कालीन. सनमाइका की चमचमाती दीवारें... ए.सी... वातानुकूलित वातावरण... बाहर का मौसम गर्म... शरीर को झुलसाता... लेकिन केबिन में वातावरण सुखद... केबिन में प्रविष्ट होते ही सुख का अहसास होता था. सुख की उपस्थिति हर कहीं थी- डी.एम. के चेहरे पर... मेज़ पर... कालीन पर... ऐसा लगता था बाहरी जगत की हाय तौबा, दुःख, उदासी, ऊब और बदहाली से यह केबिन निस्संग था. निस्संगता किसी पात्र की तरह थी जो यहाँ मौजूद थी. ...डी.एम. के चेहरे पर तृप्ति का भाव था और आँखों में किसी शिकार कथा का रोमांच! टेबल पर कुछ फ़ाइलें थीं जिन पर डी.एम. ने अपने रिमार्क्स लिख दिए. कुछेक पर साइन कर दिए थे. बड़ी सी टेबल के साथ केबिनेट था. उस पर दो फोन रखे थे. दो फोन टेबल पर रखे थे. डी.एम. के बिलकुल पास गोल्डन पेन और नोकिया का मोबाइल रखा था.

जब डी.एम. के कमरे में आकाश सक्सेना पहुँचा, डी.एम. किसी क्लाएंट से फोन पर बात कर रहा था. आकाश सक्सेना ने आखिरी वाक्य सुना- ‘शाम को यार्क में मिलते हैं.’

जब तक डी.एम. फोन रखता, आकाश सक्सेना कुर्सी खींचकर बैठ चुका था. डी.एम. को आकाश सक्सेना की ऐसी बातें नागवार लगती हैं. बाकी एम्प्लाई खड़े रहते हैं. इंतज़ार में रहते हैं. डी.एम. कुछ पल बाद कहता है – ‘प्लीज़, टेक दि चेयर.’ वे तब बैठते हैं. डी.एम. से एक तरह की इज़ाजत ली जाती है. डी.एम. का यह सुखवाद है. एम्प्लाई जानते हैं. समझदार हैं. डी.एम. खुश तो बहुत सारे रास्ते साफ!

आकाश सक्सेना सोच रहा था शाम को यह डी.एम. यार्क में किसी क्लाएंट के साथ डिनर लेगा. आर.सी. के दो-तीन पैग के दौरान क्लाएंट और डी.एम. में ‘अंडरस्टैंडिंग’ बनेगी. अगले दिन उस क्लाएंट की फ़ाइल फिर से ‘मूव’ होगी. सर्वेयर को दोबारा सर्वे रिपोर्ट भेजने के लिए कहा जाएगा. दूसरी सर्वे रिपोर्ट साफ सुथरी होगी. सारे ऑब्जेक्शन हटा दिए जाएंगे. क्लेम अप्रूव हो जाएगा – सर्वे रिपोर्ट के अनुसार! और यह डी.एम. मिस्टर साहनी चिकना-चुपड़ा चेहरा लेकर हॉल में एम्प्लाइज़ को संबोधित करेगा – फ्रेंड्ज़, आर. ओ. (रीजनल ऑफ़िस) से सरकुलर आया है. डिसिप्लिन ज़रूरी है. लाइफ़ को एंजॉय कीजिए – लेकिन डिसिप्लिन के साथ! वन थिंग मोर! ‘क्लेम रेशो’ इंक्रीज हुआ है. हमारा डिविजनल ऑफ़िस प्रॉफ़िट में नहीं जा रहा. वी ऑल शुड बी वरीड अबाउट दिस!

डिविजनल मैनेजर प्रत्येक मींटिंग में इसी तरह की बातें किया करता था. और प्रत्येक मीटिंग में आकाश सक्सेना डी.एम. को भद्दी सी गाली देता था. गालियाँ और लोग भी देते थे. पवित्र-सी भाषा बोलने वाला डी.एम., मक्कारी के जाल बुनना जानता था. संवेदना पार्थिव हो चुकी हो तो हाथ ऐसे चाकू हो जाते हैं जो अपने-पराए का लिहाज़ नहीं करते. प्रायः सभी डी.एम. इसी प्रवृत्ति के थे. सब डी.एम. ऐसी कठपुतलियाँ थे जिनकी डोर एजीएम के हाथ में थी और एजीएम की डोर अपने किसी आका के हाथ में. कंपनी के बड़े अधिकारी तुच्छता के कीचड़ में धंसे थे. लेकिन जब वे सुबह-सवेरे दफ़्तर पहुँचते तो लगता कि मनुष्य नहीं कोई ‘देवता’ चला आ रहा है.

दफ़्तर के इन ‘देवताओं’ के हाथ लम्बे लेकिन दिल छोटे थे. स्वार्थ किसी स्थाई भाव की तरह मौजूद था. दिमाग हमेशा कुछ खुराफ़ातें बुनता हुआ. चेहरा सख़्त. जैसे हँसने के लिए ‘परहेज़’ बताया हो किसी डाक्टर ने. सख़्त चेहरे का अपना फायदा था. एम्प्लाई या फिर अपने से नीचे छोटे ऑफ़ीसर थोड़ा डिस्टेंस बनाकर रखते थे. सत्ता का सुख भोगने के लिए यह परम आवश्यक था कि सबार्डिनेट्स की शख़्शियत को औक़ात में बदल दो. उनकी कमज़ोरियों को समझो और वक़्त आने पर उन कमज़ोरियों पर वार करो.

डी.एम. इस कला में निपुण था.

सामने बैठे आकाश सक्सेना को उसने बैठा रहने दिया. डी.एम. की यह ‘अदा’ थी या कोई खामोश-सा अटैक ! सामने बैठा ‘बंदा’ बेचैन होने लगता. डी.एम. दूसर को बेचैन करने की हद तक ले जाकर बात शुरू करता.

‘ओह, आई एम सॉरी मिस्टर सक्सेना... फोन पीछा नहीं छोड़ते.’ डी.एम. ने बनावटी किस्म का खेद प्रकट किया.

‘सर, आपका सर्कल बहुत बड़ा है.’ आकाश सक्सेना ने डी.एम. की किसी ख़ास लहज़े के साथ प्रशंसा की. डी.एम. समझ नहीं पाया.

कुछ क्षण बाद डी.एम. ने किंग साइज़ सिगरेट निकाला. लाइटर से सिगरेट को जलाते हुए, लाइटर को बंद करते हुए बोला, ‘क्या करें, फ्रेंड्ज़ बहुत हैं.’

‘सर, फ्रेंड्ज़ या क्लाएंट्ज़ ?’ यह सवाल तीखा था. मार करता. डी.एम. ने सिगरेट का कश लेकर आकाश सक्सेना को बड़े ठण्डेपन से देखा.

‘क्या क्लाएंट्ज़ फ्रेंड नहीं हो सकते ?’ डी.एम. की आवाज़ शुष्क थी. बल्कि हिकारत का भाव भी था.

‘हो सकते हैं सर, क्यों नहीं हो सकते. लेकिन ऑब्जेक्ट दूसरा होता है.’ आकाश सक्सेना ने तीर छोड़ा.

‘मैं तुम्हारी बात के मीनिंग समझ रहा हूँ सक्सेना ! फ़ील्ड के एक्सपीरिएंस तुम्हारे बहुत कम हैं. फ्रेंडशिप के पीछे हमेशा कोई न कोई परपज़ छुपा होता है... यू नो ?... बिजनेसमैन पार्टियाँ अरेंज करते हैं किसलिए ? रिलेशन बढ़ाने के लिए और ‘डील’ के लिए.’

‘सर, फ्रेंडशिप ‘डील’ का दूसरा नाम है.’

‘इस तरह एनालाएज़ करेंगे तो परेशान हो जाएंगे. ऐनी हाऊ, यस्टरडे यू वर नाट इन दि ऑफ़िस.’

‘आइ वाज़ आन लीव सर !’

‘ओह आई सी !’ डी.एम. ने सिगरेट का धुआं छोड़ा. रिवाल्विंग चेयर को थोड़ा घुमाया. कई सारी आवाज़ें निकलीं. फिर बोला, ‘आई वांट डिसिप्लिन इन दि ऑफ़िस.’

‘वाई नॉट सर ! ... डिसिप्लिन भी कैरेक्टर का एक हिस्सा होता है’

‘आई एप्रिशिएट युअर फ़ीलिंग.’

‘थैंक्यू सर.’

‘मिस्टर सक्सेना आप चाय लेंगे ?’ डी.एम. ने अफसरीय अदा को थोड़ी देर के लिए स्थगित रखते हुए दोस्ती का जाल फेंका. सियासी नज़रिया रखनेवाला हर बड़ा अधिकारी इस तरह के जाल फेंकना जानता है.

‘सर, आपके साथ चाय पीना मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी.’ आकाश सक्सेना ने जाल फेंके जाने के लिए जगह बनाई.

‘मेरे लिए भी. आकाश सक्सेना जैसा जीनियस, फुटबाल का प्लेयर, लिटरेरी टेस्ट रखने वाला एम्प्लाई मेरे साथ चाय पिए... मुझे भी अच्छा लगेगा.’

‘थैंक्यू सर ! आप मेरी कुछ ज्यादा ही प्रशंसा कर रहे हैं’

‘यू डिज़र्व इट मिस्टर आकाश सक्सेना.’ डी.एम. ने कहा.

यह खेल शह और मात का था जो दोनों खेल रहे थे.

चाय पीते हुए आकाश सक्सेना बोला, ‘ऐसे अच्छे कप में चाय पीना, चाय को एंज्वाय करन जैसा होता है.’

‘रियली मिस्टर सक्सेना... आई फ़ील इट सो.’ डी.एम. थोड़ा हँसा. उसे लगने लगा था कि माहौल सहज हो रहा है. आकाश सक्सेना जैसा कड़ियल और अड़ियल एम्प्लाई रास्ते पर आ रहा है.

डी.एम. चाय का घूँट भरते हुए बोला, ‘मिस्टर सक्सेना कभी-कभी तुम परेशान नज़र आने लगते हो... यह डिविजनल ऑफ़िस एक फैमिली जैसा है. कोई परेशानी हो तो मुझे बताओ यार ! ’

आकाश सक्सेना सतर्क हो गया. सहानुभूति के दास्ताने डालकर अभी यह बंदा उसका गला पकड़ लेगा.

‘बिलकुल सर, परेशानी होगी तो आपको ही बताऊँगा.’ आकाश सक्सेना ने डी.एम. की चाल को चलने दिया. यहाँ नासमझी जरूरी थी. इसी नामसमझी के जरिए डी.एम. को शिकस्त दी जा सकती थी. इस बीच डिविजन मैनेजर ने फोन अटैंड किया. वो पंजाबी में बात कर रहा था, ‘राजन, की हाल ने यार !...बड़े दिनां बाद फोन कीता. ...कम्म ? ...केड़ा कम्म ? ...टोटल लास क्लेम ? ... वैसे उस क्लेम का हम रिपेयर खर्च दे रहे थे... नब्बे हजार...सानूं की पता सी गड्डी तेरे रिलेटिव दी है...ऐनी हाऊ... डोंट वरी ! मैं देखता हूँ... हो जाएगा. फ़ाइल रिजनल ऑफ़िस चली जाती तो सब गड़बड़ हो जाता... मैं अब्बी स्क्रूटिनी बनवाता हूँ. ये तो अच्छा हुआ सर्वेयर से मैंने दोनों तरह की रिपोर्ट मंगवा ली थीं. ... रिपेयर की और टोटल लॉस की.’

डिविजन मैनेजर ने फोन रखा. आकाश सक्सेना की तरफ देखते हुए मुस्कराया - ‘माई ओल्ड फ्रेंड !... बहुत पुराना दोस्त है...हमने एक साथ बहुत ख़ुराफ़ातें की हैं.’

एक ख़ुराफ़ात अब भी करने जा रहा है बेटे... आकाश बुदबुदाया.

‘कुछ कहा तुमने ?’ डी.एम. ने कहा

‘सर, मैं कह रहा था कि आप ग्रेट हैं अपनी पुरानी दोस्ती को अभी तक निभा रहे हैं.’

डी.एम. ने आकाश सक्सेना की तरफ देखा. मुस्कराते हुए बोला, ‘अब तो नहीं निभ पा रही दोस्ती.’

‘सर, कैसे नहीं निभ पा रही ? ... रिपेयर के असेसमेंट को आप टोटल लॉस में बदल रहे हैं.’

‘मिस्टर सक्सेना, करना पड़ता है.’ डी.एम. ने मेज़ के शीशे के नीचे रखी विष्णु भगवान की तस्वीर पर हाथ रखते हुए कहा, ‘मैं तो रब्ब से डरता हूँ सक्सेना. किसी का बुरा नहीं करता... बोत बुरा वक्त देखा है. गरीबी देखी है... मेहनत से ऊँचाई पर पहुँचा हूँ.’

डी.एम. – आकाश मन ही मन बोला- जिसे ऊँचाई कह रहा है तू, वह सब नकली रंगों का खेल है. वरना खड़ा तू अब भी तलघर में है डी.एम. तुच्छता के तलघर में.

‘कुछ कहा तुमने सक्सेना ?’ डी.एम. को लगा जैसे सक्सेना ने कुछ कहा है.

‘सर मैंने कहा है कि आप शिखर पर खड़े हैं.’

‘नहीं सक्सेना... आई एम नाट सेटिस्फाइड... मैं यहीं नहीं रुके रहना चाहता. मैं ग्रो करना चाहता हूँ... ईश्वर ने चाहा तो मैं जल्दी...’

‘जी.एम. तो आप बन ही जाएंगे.’ आकाश सक्सेना डी.एम. के मन की बात समझते हुए बोला.

‘लेट्स सी.’ डी.एम. ने कहा. मुस्कराया.

डी.एम. को महसूस हुआ आकाश सक्सेना अब लाइन पर आ गया है. डी.एम. मेज़ पर झुकते हुए और आकाश सक्सेना को राजदार बनाते हुए बोला, ‘सक्सेना, एक बार तुम मुझे सेटिसफाई कर दो... फिर देखो...’

‘क्या देखो सर ?’ सक्सेना, डी.एम. के नाटक का पात्र बनते हुए बोला.

‘फिर तुम्हारी सारी टेंशनें ख़त्म !’ डी.एम. के चेहरे पर कुटिलता थी.

‘थैंक्यू सर !’ आकाश उस कुटिलता को गेंद बनाकर खेलने लगा.

‘सक्सेना... तुम्हें एक बात बताऊँ ?... मोरेलिटी जैसा रद्दी शब्द और कोई नहीं.’ डी.एम. अनौपचारिक हो गया था.

‘दिस इज़ युअर ग्रेट एक्सपीरिएंस सर !’

‘मनी मेक्स ए मीयर गो.’

‘ठीक कहा सर आपने.’

‘पवित्रता का डायमीटर पता है कितना है... आरती की थाली जितना. थाली के बाहर दूसरी दुनिया है.. आई मीन...’ डी.एम. वाक्य अधूरा छोड़कर एक आँख को थोड़ा दबाकर मुस्कराया.

आकाश सक्सेना भी मुस्कराया.

आकाश सक्सेना उठने लगा तो डी.एम. बोला,

‘डी.एल. थी सी बत्तीस पचपन फ़ाइल...’

‘सर, टोटल लॉस क्लेम ?’

‘वेरी शॉर्प यू आर मिस्टर सक्सेना.’

‘थैंक्यू सर !’

सक्सेना उठ खड़ा हुआ

आकाश सक्सेना कुर्सी को खींचकर, बाहर निकलने की जगह बनाने लगा.

डी.एम. को लगा ‘एनेस्थेसिया’ का डोज़ अभी पूरा नहीं दिया गया. उसका अनुभव पुराना था. उसने अच्छे-अच्छे महारथियों को अपने कब्ज़े में ले लिया था. सिक्कों की खनक और उनकी चमक के आगे सबकी आँखें चुंधिया गई थीं. वे ‘पालतू’ बनते चले गए थे. उन्होंने अपनी रीढ़ की हड्डियाँ डी.एम. के सामने रख दी थीं. वे रीढ़ विहीन केंचुए हो गए थे.

डी.एम. मिस्टर साहनी जिस दफ़्तर में गया उसने यही खेल खेला. कइयों को फालतू बना दिया, कइयों को पालतू ! ... सिस्टम के लिए यह खेल खेलना जरूरी होता है. पालतू बनाकर, एम्प्लाइज़ को अपने कब्जे में रखो. फिर मन चाही सामंती व्यवस्था चलाओ. क्या मजाल कोई बोल जाए. सब के सब कारिन्दे... सबके सब याचक! जी हजूरी की प्रार्थनाएँ गाते. चापलूसी का चूरण चाटते!

डी.एम. मिस्टर साहनी एक-एक एम्प्लाई को अपने केबिन में बुलाता. गहराई नापता. उसी अनुपात का जाल फेंकता. जाल इतना महीन होता कि एम्पलाई को पता न चलता कि वह फांस लिया गया है.

डी.एम. मिस्टर साहनी के ही नहीं, अन्य डिविजनल मैनेजरों ... ब्रांच मैनेजरों के ‘विश्वासपात्र’ थे. इन्हीं विश्वासपात्रों के जरिए दफ़्तर चलता था. ‘सिस्टम’ बना रहता था. रुकी हुई क्लेम फ़ाइलें ‘मूव’ होती थीं. बोगस क्लेम ‘पास’ हो जाते. औकात के मुताबिक अंश मिल जाता.

डी.एम. जब अपने बहुत करीबी दोस्तों के साथ यार्क, होस्ट, गेलार्ड, परिक्रमा में दो तीन ड्रिंक्स ले लेता, दिमाग ऊँची उड़ान उड़ने लगता. शराब खून में मिलती और खून में सोया अहंकार का तत्व जाग उठता. डी.एम. साहनी घूँट भरता, झूमता और दाएँ हाथ को उठाकर, सामने बैठे करीबी दोस्त से कहता, ‘स्किल... स्किल होनी चाहिए कालरा... वो स्किर मुझमें हैं.... तुम नहीं जानते... मैं जानता हूँ सिस्टम किसे कहते हैं... वो दांव चलने और जीतने का नाम है... वो अपना ‘अम्पायर’ खड़ा करने का नाम है.... मैंने यही किया है. मैं हर डी.ओ. में अपनी सल्तनत खड़ी करता हूँ... फिर हुकूमत करता हूँ....सब बिकाऊ माल हैं यार ! सस्ते में बिक जाते हैं. मैं खरीद लेता हूँ.’ डी.एम. घूँट भरता. गिलास को मेज़ पर रखता. फिर हाथ ऊपर उठता, ‘सिस्टम पता है क्या सिखाता है ?... टुकड़े फेंको, छोटे बड़े टुकड़े फैंको. यू नो ? लोग छोटे-छोटे टुकड़े बटोरने में लगे रहेंगे... सिस्टम यही सिखाता है... उन्हें मश्गूल रहने दो टुकड़ों के खेल में... आप सत्ता का सुख भोगो. ’

डी.एम. साहनी और अन्य अधिकारी सचमुच सत्ता का सुख भोगते थे. उन सबने यही किया कि एम्प्लाइज़ की आवाज़ तो नहीं छीनी... अलबत्ता, मुंह पर ताला लगा दिया... चाबी अपने पास रख ली.

बहुत सारे खुराफाती थे. जिन्होंने टुकड़े नहीं चुने थे. जो अधिकारियों के खेल में शामिल नहीं हुए जिनके पास अपनी आवाज़ मौजूद थी. उनके मुँह पर व्यवस्था अपनी संवेदन शून्यता का ताला भी नहीं लगा पाई थी.... ऐसे खुराफातियों से डी.एम., ए. डी.एम., ब्रांच मैनेजर ही नहीं, जी.एम. तक डरते थे... क्या पता किस फ़ाइल की जीरोक्स कराकर अपने पास रख ली हो... हर तीसरी फ़ाइल में कोई न कोई ‘लू-पोल’ होता था. अधिकारी ऐसी फ़ाइलों को ‘संभाल’ कर रखते. खुराफाती लोग उनकी ताक में रहते. ऐसी फ़ाइलों की फोटोकॉपी करवा कर रख लेते. यही विचलन का कारण बनता.

खुराफ़ातियों में आकाश सक्सेना नाम का एम्प्लाई भी था. दबंग. मस्त. कूल ! सबसे बड़ी बात घर फूंक तमाशा देखने वाला.

डी.एम. साहनी, सक्सेना से डरता था. इस डर को साहनी ने अपने अंदर छुपाकर रखा हुआ था. कभी ‘शो’ नहीं होने दिया था. लेकिन डर तो डर था. और आकाश सक्सेना... उसने तो सर पर कफ़न और हथेली पर सर रखा हुआ था.

दोनों क्लेम फ़ाइलें जानबूझकर मिस्टर साहनी ने आकाश सक्सेना को दी थीं. वरना स्क्रूटिनी तो वह किसी से भी बनवा सकता था.

इस बात को आकाश सक्सेना भी जानता ता कि क्लेम फ़ाइलें एक तरह का लिटमस टेस्ट हैं कि वह मिस्टर साहनी का ‘वफादार’ बनता है कि नहीं ?... कि वह केंचुए की भूमिका निभा सकता है कि नहीं ?

दोनों फ़ाइलें आकाश सक्सेना की टेबल पर रखी हैं. मेरीन क्लेम में कंसाइनमेंट सही हालत में इंश्योर्ड के गोदाम में पहुँची. गोदाम में वही कंसाइनमेंट डैमेज हुई. क्लेम इंश्योरेंस कंपनी से मांग रहा है. और डिविजनल मैनेजर मिस्टर साहनी चाहते हैं कि एक लाख सत्तर हजार का क्लेम पास कर दिया जाए.

दूसरी फ़ाइल मोटर क्लेम की है. एक क्लेम फ़ाइल में दो तरह की सर्वे रिपोर्ट ने आकाश सक्सेना का दिमाग चकरा दिया है. क्लेम फ़ाइल ऊपरी सतह पर कम्प्लीट नज़र आती है. लेकिन है नहीं. बहुत देर तक फ़ाइल स्टडी करने के बाद आकाश सक्सेना ने छिद्र ढूंढ लिया है. ड्राइविंग लाइसेंस ‘फेक’ है. चालक के पास एक्सीडेंट के दौरान ड्राइविंग लाइसेंस था ही नहीं. बाद में किसी दूसरे का ड्राइविंग लाइसेंस लगा दिया गया. चालक का नाम के. लाल है और ड्राइविंग लाइसेंस किसी कृष्ण लाल का है. एफ़.आई.आर. तक सादे कागज पर है.

क्लेम टोटल लॉस का है. यानी दो लाख चालीस हजार का. ... आकाश सक्सेना गहरी सोच में डूबा है क्या करे ?... प्रत्येक डिविजनल ऑफ़िस में इसी तरह के क्लेम आते हैं और उनका ‘पेमेंट’ हो जाता है... लेकिन वह क्या करे ? अपनी आत्मा को मार दे ? अपने मिज़ाज के ख़िलाफ़ चला जाए ?... विकृति का वह हमेशा प्रतिवाद करता आया है. आज भी उसे विरोध करना चाहिए. लेकिन आज वह दुविधा में है. अपने भीतर के अंतर्विरोध से उसकी ठनी है. वह जानता है कि अकेले आदमी की लड़ाई हमेशा पराजय में बदल जाती है.

तत्काल मन में दूसरा स्वर उभरता है- तो क्या वह अव्यवस्था और विकृति का विरोध करना छोड़ दे... पालतू बन जाए... यह लड़ाई लड़कर हारने से पहले की पराजय होगी... ज़मीर की पराजय ! अपने भीतर के व्यक्ति की पराजय !

आकाश सक्सेना अच्छी तरह जानता है कि उसके द्वारा बनाई गई ‘नो-क्लेम’ की स्क्रूटिनी का डी.एम. पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा. यह खेल तो जानबूझकर खेला गया है उसके साथ. .. उसे डी.एम. ने अपनी प्रयोगशाला का गिनीपिग बनाया है. वह फ़ाइलें देखकर मुस्कराएगा. अपने भीतर के आक्रोश को दबा लेगा वह अच्छी तरह जानता है. कुछ पल सोचता रहेगा. इसके बाद वह अपने ‘विश्वासपात्रों’ में से किसी एक को बुलाएगा... क्लेम की फिर से स्क्रूटिनी बनेगी- पास फार पेमेंट की. आकाश सक्सेना तिलमिलाकर रह जाएगा.

डी.एम. विरोधी के हथियारों को कुंद करने की तरकीबें जानता है.

आकाश सक्सेना बहुत देर तक सिस्टम की जड़ता पर विचार करता रहा. फिर उसने अपने आपको समझाया- आकाश, एक क्षीण-सा स्वर सही... इस दफ़्तर में है तो सही! यह स्वर भी समाप्त हो गया तो तन्त्र पूरी तरह निरंकुश हो जाएगा....

आकाश सक्सेना ने गहरी सांस ली. थोड़ा मुस्कराया. पेन उठाया. दोनों फ़ाइलों पर नो-क्लेम संबंधी डिटेल देने के बाद लिखा- क्लेम फ़ाइल सबमिटेड फार रेपुडिएशन !

आकाश सक्सेना ने फ़ाइलें डी.एम. के पास भिजवा दीं. कैंटीन से चाय मंगवाई. पीने लगा. उसने अपने आप को देखा. उसे लगा जैसे उसके कद में थोड़ा सा इज़ाफ़ा हो गया है.

मन ही मन वह अपने आप को तैयार करने लगा- अब तेरी ट्रांसफर निश्चित है सक्सेना. ...तू सस्पैंड भी हो सकता है. एक्शन का रिएक्शन तो होना ही है.

वह मन ही मन मुस्कराया. बुदबुदाया – सब ठाठ पड़ा रह जाएगा... जब लाद चलेगा बंजारा...

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रचनाकार – ज्ञानप्रकाश विवेक के सात कहानी संग्रह, एक कविता संग्रह तथा दो उपन्यास प्रकाशित हैं.

चित्र: ऋतु चौधरी की कलाकृति


इच्छा

इच्छा है मन में कि अपनी एक कुटिया हो
कुटिया में एक खटिया हो
पास में एक खुँटिया हो
खुँटिये पे लटकी एक तुलसी की माला हो
मन भक्ति से मतवाला हो
इनडोर प्लम्बिंग हो
फ़र्श पर कालीन हो
इन्टरनेट की सुविधा हो
पास में एक वैष्णव भोजनालय हो
बिना मिर्च का भोजन हो
गंगा की धारा हो
मन्दिर इक न्यारा हो
आधुनिक भक्त की सुविधा के
सारे साधन हों
पास में जंगल हो
जंगल में मंगल हो
प्राकृतिक सौन्दर्य हो
प्रभु की भक्ति हो
शरीर में शक्ति हो
पत्नी भी कभी कभी
विज़िट के लिये आती हो
मठरी अचार लाती हो
कभी कभी रात में रुक जाती हो
अभी तो इतना ही सोचा है
बाकी तो प्रभु की इच्छा है
देखो क्या होता है


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रचनाकार - लक्ष्मीनारायण गुप्त की ऐसी ही अन्य मजाहिया इच्छाएँ आप उनके जालस्थल
http://kavyakala.blogspot.com/2006/05/blog-post_16.html

पर पढ़ सकते हैं.


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ग़ज़ल 1

हाथ जलने लगे पाँव फिर शल हुए
यूँ निगाहों में कितने ही मक़्तल हुए ।

आसमां में जो तहलील बादल हुए
जानते बूझते लोग पागल हुए ।

तिलमिलाती हवाएँ झपटने को थीं
हम मचल के सरे दस्त बादल हुए ।

शीशा शीशा पिघल कर उतरता रहा
देखते देखते जिस्म ओझल हुए ।

पानी पानी हुए हमसे मिलते ही वो
हाथ फैला के हम उनकी छागल हुए ।

धूप पहना के हम को वो लज्जित हुई
हम ने समझाया, हम इससे शीतल हुए ।

सनसनाती पवन की थीं सरगोशियाँ
यूं लगा हम को, हम उसकी पायल हुए ।

इस मुसाफ़िर हूँ सूरज को सर पे लिए
मेरी ख़ातिर वो बरगद न पीपल हुए ।

पास थे आईने जिनके वो बच गए
पास थे जिनके पत्थर वो घायल हुए ।

रुप है चीज़ ऐसी कि जिसके लिए
आज तक कतने खूं रेज़ दंगल हुए ।

क़ीमतें अपनी पहचान पाए न हम
कैसा सोना थे हम, आज पीतल हुए ।

काले धब्बे ही धब्बे थे दिल पर ‘सलीम’
तेरी बख़्शीश से हम आज निर्मल हुए ।

**-**

ग़ज़ल 2

मुझे अपना लिबास तू अपना बना के देख भी ले
लहू की आग में खुद को जला के देख भी ले ।

परों को नोचना इक खेल तो नहीं लेकिन
शिकारियों को ज़रा आज़मा के देख भी ले ।

अलग अलग ही सही रास्ते तेरे मेरे
लकीर हाथ की अपने मिटा के देख भी ले ।

शुआएं जिस्म से फूटें निखार आ जाए
बदन की धूप में मेरे नहा के देख भी ले ।

हरीफ़ कोई नहीं है तो आईना ही बना
शिकस्ता राज़ की फिर मुस्कुरा के देख भी ले ।

फ़ना के बाद की मन्ज़िल की आगही के लिए
तू अपनी जान की बाज़ी लगा के देख भी ले ।

शबीह तेरी नहीं ऐसी जिस पे इतराए
‘सलीम’ आज तू पर्दा उठा के देख भी ले ।


//*//

ग़ज़ल 3

राख क्या बताये आंच आग की
बात कर कभी न अपने त्याग की ।

दूध आजकल पिला रहा हूँ मैं
जानता हूँ ख़सलतें भी नाग की ।

साथ साथ तेरे मेरा है वजूद
बात ये नहीं है कोई लाग की ।

रोटियाँ न डाल मेरे सामने
ये न मेरे काम की न भाग की ।

बस में कर सके मुझे ‘सलीम’ जो
है उम्मीद ख़ाम ऐसी बाग़ की ।

बाग़ = लगाम
***/***

नअतियह दोहे:-

धूप की चिन्ता कौन करे क्या सूरज उसे जलाए
छांव घनेरी पेड़ की तेरे जिस को भी मिल जाए ।

चारों ओर अन्धेरा धुप जुगनू भी नज़र न आए
ऐसे रात के राही को तू पल में भोर दिखाए ।

कल क्या होगा मेरा पापी मन जब जब घबराए
तब तब आस का पंछी उड़कर तेरी नगरिया जाए ।

रब के प्यारे दया का सागर देने पर जब आए
इतना देवे तू प्यारे लेते लेते थक जाए ।

गुम्बद है इक हरा हरा जो सबके मन के भाये
उस की छांव मिले अगर तो सारा जग मिल जाए ।

काली कली कमली अपने सर पर जब लहराए
डर काहे का रब का फिर जब चाहे बुलावा आए ।

दूर नगरिया तेरी सोच के मन ही मन घबराऊँ
दे शक्ति दिन रात मैं तेरा नाम ही जपता जाऊँ ।

**-**

रचनाकार – अनवर अली शेख़ शायर और ग़जलकार हैं. आपकी कविताएँ विभिन्न हिन्दी – उर्दू पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं. एक उर्दू कविता संग्रह – पर हवा के भी प्रकाशित है. आपको आन्ध्र प्रदेश तथा राजस्थान उर्दू अकादमियों के अदबी सम्मान से भी नवाज़ा जा चुका है.


पूरे तीस पृष्ठों की इस पूरी कविता का टंकण अनूप शुक्ल ने किया है तथा उनके चिट्ठा स्थल फ़ुरसतिया पर यह पूर्व प्रकाशित है. इसे साभार यहाँ पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है. कविता लंबी है। आराम से आनन्द उठायें, बिना हड़बड़ाये हुये। देखें तमाम जगह आप महसूस
करेंगे कि बात आपको ही संबोधित करके कही गयी है।


पटकथा


जब मैं बाहर आया

मेरे हाथों में

एक कविता थी और दिमाग में

आँतों का एक्स-रे।

वह काला धब्बा

कल तक एक शब्द था;

खून के अँधेर में

दवा का ट्रेडमार्क

बन गया था।

औरतों के लिये ग़ैर-ज़रूरी होने के बाद

अपनी ऊब का

दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।

मैंने सोचा !



क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच/अपनी भूख को ज़िन्दा रखना/जीभ और जाँघ के

स्थानिक भूगोल की/वाजिब मजबूरी है।

क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच

अपनी भूख को ज़िन्दा रखना

जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की

वाजिब मजबूरी है।

मैंने सोचा और संस्कार के

वर्जित इलाकों में

अपनी आदतों का शिकार

होने के पहले ही बाहर चला आया।

बाहर हवा थी

धूप थी

घास थी

मैंने कहा आजादी…

मुझे अच्छी तरह याद है-

मैंने यही कहा था

मेरी नस-नस में बिजली

दौड़ रही थी

उत्साह में

खुद मेरा स्वर

मुझे अजनबी लग रहा था

मैंने कहा-आ-जा-दी

और दौड़ता हुआ खेतों की ओर

गया। वहाँ कतार के कतार

अनाज के अँकुए फूट रहे थे

मैंने कहा- जैसे कसरत करते हुये

बच्चे। तारों पर

चिड़ियाँ चहचहा रही थीं

मैंने कहा-काँसे की बजती हुई घण्टियाँ…

खेत की मेड़ पार करते हुये

मैंने एक बैल की पीठ थपथपायी

सड़क पर जाते हुये आदमी से

उसका नाम पूछा

और कहा- बधाई…


घर लौटकर

मैंने सारी बत्तियाँ जला दीं

पुरानी तस्वीरों को दीवार से

उतारकर

उन्हें साफ किया

और फिर उन्हें दीवार पर (उसी जगह)

पोंछकर टाँग दिया।

मैंने दरवाजे के बाहर

एक पौधा लगाया और कहा–

वन महोत्सव…

और देर तक

हवा में गरदन उचका-उचकाकर

लम्बी-लम्बी साँस खींचता रहा

देर तक महसूस करता रहा–

कि मेरे भीतर

वक्त का सामना करने के लिये

औसतन ,जवान खून है

मगर ,मुझे शान्ति चाहिये

इसलिये एक जोड़ा कबूतर लाकर डाल दिया

‘गूँ..गुटरगूँ…गूँ…गुटरगूँ…’

और चहकते हुये कहा

यही मेरी आस्था है

यही मेरा कानून है।


इस तरह जो था उसे मैंने

जी भरकर प्यार किया

और जो नहीं था

उसका इंतज़ार किया।

मैंने इंतज़ार किया–

अब कोई बच्चा

भूखा रहकर स्कूल नहीं जायेगा

अब कोई छत बारिश में

नहीं टपकेगी।

अब कोई आदमी कपड़ों की लाचारी में

अपना नंगा चेहरा नहीं पहनेगा

अब कोई दवा के अभाव में

घुट-घुटकर नहीं मरेगा

अब कोई किसी की रोटी नहीं छीनेगा

कोई किसी को नंगा नहीं करेगा

अब यह ज़मीन अपनी है

आसमान अपना है

जैसा पहले हुआ करता था…

सूर्य,हमारा सपना है

मैं इन्तज़ार करता रहा..

इन्तज़ार करता रहा…

इन्तज़ार करता रहा…

जनतन्त्र, त्याग, स्वतन्त्रता…

संस्कृति, शान्ति, मनुष्यता…

ये सारे शब्द थे

सुनहरे वादे थे

खुशफ़हम इरादे थे


सुन्दर थे

मौलिक थे

मुखर थे

मैं सुनता रहा…

सुनता रहा…

सुनता रहा…

मतदान होते रहे

मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे

उसी लोकनायक को

बार-बार चुनता रहा

जिसके पास हर शंका और

हर सवाल का

एक ही जवाब था

यानी कि कोट के बटन-होल में

महकता हुआ एक फूल

गुलाब का।

वह हमें विश्वशान्ति के और पंचशील के सूत्र

समझाता रहा। मैं खुद को

समझाता रहा-’जो मैं चाहता हूँ-

वही होगा। होगा-आज नहीं तो कल

मगर सब कुछ सही होगा।



मैं अपनी सम्मोहित बुद्धि के नीचे/उसी लोकनायक को/बार-बार चुनता रहा/जिसके पास

हर शंका और/हर सवाल का/एक ही जवाब था/यानी कि कोट के बटन-होल में /महकता

हुआ एक फूल/गुलाब का

भीड़ बढ़ती रही।

चौराहे चौड़े होते रहे।

लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज

खाकर-निरापद भाव से

बच्चे जनते रहे।

योजनायेँ चलती रहीं

बन्दूकों के कारखानों में

जूते बनते रहे।

और जब कभी मौसम उतार पर

होता था। हमारा संशय

हमें कोंचता था। हम उत्तेजित होकर

पूछते थे -यह क्या है?

ऐसा क्यों है?

फिर बहसें होतीं थीं

शब्दों के जंगल में

हम एक-दूसरे को काटते थे

भाषा की खाई को

जुबान से कम जूतों से

ज्यादा पाटते थे


फिर बहसें

होतीं थीं/

शब्दों के जंगल में/हम एक-दूसरे को काटते थे/भाषा की खाई को/जुबान से कम जूतों

से/ज्यादा पाटते थे

कभी वह हारता रहा…

कभी हम जीतते रहे…

इसी तरह नोक-झोंक चलती रही

दिन बीतते रहे…

मगर एक दिन मैं स्तब्ध रह गया।

मेरा सारा धीरज

युद्ध की आग से पिघलती हुयी बर्फ में

बह गया।

मैंने देखा कि मैदानों में

नदियों की जगह

मरे हुये साँपों की केंचुलें बिछी हैं

पेड़-टूटे हुये रडार की तरह खड़े हैं

दूर-दूर तक

कोई मौसम नहीं है

लोग-

घरों के भीतर नंगे हो गये हैं

और बाहर मुर्दे पड़े हैं

विधवायें तमगा लूट रहीं हैं

सधवायें मंगल गा रहीं हैं

वन-महोत्सव से लौटी हुई कार्यप्रणालियाँ

अकाल का लंगर चला रही हैं

जगह-जगह तख्तियाँ लटक रहीं हैं-

‘यह श्मशान है,यहाँ की तश्वीर लेना

सख्त मना है।’



क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच/अपनी भूख को ज़िन्दा रखना/जीभ और जाँघ के

स्थानिक भूगोल की/वाजिब मजबूरी है।

फिर भी उस उजाड़ में

कहीं-कहीं घास का हरा कोना

कितना डरावना है

मैंने अचरज से देखा कि दुनिया का

सबसे बड़ा बौद्ध- मठ

बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है

अखबार के मटमैले हासिये पर

लेटे हुये ,एक तटस्थ और कोढ़ी देवता का

शांतिवाद ,नाम है

यह मेरा देश है…

यह मेरा देश है…

हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक

फैला हुआ

जली हुई मिट्टी का ढेर है

जहाँ हर तीसरी जुबान का मतलब-

नफ़रत है।

साज़िश है।

अन्धेर है।

यह मेरा देश है

और यह मेरे देश की जनता है

जनता क्या है?

एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:

कुहरा,कीचड़ और कांच से

बना हुआ…

एक भेड़ है

जो दूसरों की ठण्ड के लिये

अपनी पीठ पर

ऊन की फसल ढो रही है।


जनता

क्या है?

एक शब्द…सिर्फ एक शब्द है:/कुहरा,कीचड़ और कांच से/ बना

हुआ…/एक भेड़ है/जो दूसरों की ठण्ड के लिये/अपनी पीठ पर/ऊन की फसल ढो

रही है

एक पेड़ है

जो ढलान पर

हर आती-जाती हवा की जुबान में

हाँऽऽ..हाँऽऽ करता है

क्योंकि अपनी हरियाली से

डरता है।

गाँवों में गन्दे पनालों से लेकर

शहर के शिवालों तक फैली हुई

‘कथाकलि’ की अंमूर्त मुद्रा है

यह जनता…

उसकी श्रद्धा अटूट है

उसको समझा दिया गया है कि यहाँ

ऐसा जनतन्त्र है जिसमें

घोड़े और घास को

एक-जैसी छूट है

कैसी विडम्बना है

कैसा झूठ है

दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र

एक ऐसा तमाशा है

जिसकी जान

मदारी की भाषा है।



दरअसल, अपने यहाँ जनतन्त्र/एक ऐसा तमाशा है/जिसकी जान/मदारी की भाषा है।

हर तरफ धुआँ है

हर तरफ कुहासा है

जो दाँतों और दलदलों का दलाल है

वही देशभक्त है

अन्धकार में सुरक्षित होने का नाम है-

तटस्थता। यहाँ

कायरता के चेहरे पर

सबसे ज्यादा रक्त है।

जिसके पास थाली है

हर भूखा आदमी

उसके लिये,सबसे भद्दी गाली है


हर तरफ कुआँ है

हर तरफ खाई है

यहाँ,सिर्फ ,वह आदमी,देश के करीब है

जो या तो मूर्ख है

या फिर गरीब है


यहाँ,सिर्फ

,वह आदमी,देश के करीब है/जो या तो मूर्ख है/या फिर गरीब है

मैं सोचता रहा

और घूमता रहा-

टूटे हुये पुलों के नीचे

वीरान सड़कों पर आँखों के

अंधे रेगिस्तानों में

फटे हुये पालों की

अधूरी जल-यात्राओं में

टूटी हुई चीज़ों के ढेर में

मैं खोयी हुई आजादी का अर्थ

ढूँढता रहा।

अपनी पसलियों के नीचे /अस्पतालों के

बिस्तरों में/ नुमाइशों में

बाजारों में /गाँवों में

जंगलों में /पहाडों पर

देश के इस छोर से उस छोर तक

उसी लोक-चेतना को

बार-बार टेरता रहा

जो मुझे दोबारा जी सके

जो मुझे शान्ति दे और

मेरे भीतर-बाहर का ज़हर

खुद पी सके।

–और तभी सुलग उठा पश्चिमी सीमान्त

…ध्वस्त…ध्वस्त…ध्वान्त…ध्वान्त…

मैं दोबार चौंककर खड़ा हो गया

जो चेहरा आत्महीनता की स्वीकृति में

कन्धों पर लुढ़क रहा था,

किसी झनझनाते चाकू की तरह

खुलकर,कड़ा हो गया…

अचानक अपने-आपमें जिन्दा होने की

यह घटना

इस देश की परम्परा की -

एक बेमिशाल कड़ी थी

लेकिन इसे साहस मत कहो

दरअस्ल,यह पुट्ठों तक चोट खायी हुई

गाय की घृणा थी

(जिंदा रहने की पुरज़ोर कोशिश)

जो उस आदमखोर की हवस से

बड़ी थी।


मगर उसके तुरन्त बाद

मुझे झेलनी पड़ी थी-सबसे बड़ी ट्रैजेडी

अपने इतिहास की

जब दुनिया के स्याह और सफेद चेहरों ने

विस्मय से देखा कि ताशकन्द में

समझौते की सफेद चादर के नीचे

एक शान्तियात्री की लाश थी

और अब यह किसी पौराणिक कथा के

उपसंहार की तरह है कि इसे देश में

रोशनी उन पहाड़ों से आई थी

जहाँ मेरे पड़ोसी ने

मात खायी थी।

मगर मैं फिर वहीं चला गया

अपने जुनून के अँधेरे में

फूहड़ इरादों के हाथों

छला गया।

वहाँ बंजर मैदान

कंकालों की नुमाइश कर रहे थे

गोदाम अनाजों से भरे थे और लोग

भूखों मर रहे थे

मैंने महसूस किया कि मैं वक्त के

एक शर्मनाक दौर से गुजर रहा हूँ

अब ऐसा वक्त आ गया है जब कोई

किसी का झुलसा हुआ चेहरा नहीं देखता है

अब न तो कोई किसी का खाली पेट

देखता है, न थरथराती हुई टाँगें

और न ढला हुआ ‘सूर्यहीन कन्धा’ देखता है

हर आदमी,सिर्फ, अपना धन्धा देखता है

सबने भाईचारा भुला दिया है

आत्मा की सरलता को भुलाकर

मतलब के अँधेरे में (एक राष्ट्रीय मुहावरे की बगल में)

सुला दिया है।

सहानुभूति और प्यार

अब ऐसा छलावा है जिसके ज़रिये

एक आदमी दूसरे को,अकेले –

अँधेरे में ले जाता है और

उसकी पीठ में छुरा भोंक देता है

ठीक उस मोची की तरह जो चौक से

गुजरते हुये देहाती को

प्यार से बुलाता है और मरम्मत के नाम पर

रबर के तल्ले में

लोहे के तीन दर्जन फुल्लियाँ

ठोंक देता है और उसके नहीं -नहीं के बावजूद

डपटकर पैसा वसूलता है

गरज़ यह है कि अपराध

अपने यहाँ एक ऐसा सदाबहार फूल है

जो आत्मीयता की खाद पर

लाल-भड़क फूलता है


अपराध/अपने यहाँ

एक ऐसा सदाबहार फूल है/जो आत्मीयता की खाद पर/लाल-भड़क फूलता है

मैंने देखा कि इस जनतांत्रिक जंगल में

हर तरफ हत्याओं के नीचे से निकलते है

हरे-हरे हाथ,और पेड़ों पर

पत्तों की जुबान बनकर लटक जाते हैं

वे ऐसी भाषा बोलते हैं जिसे सुनकर

नागरिकता की गोधूलि में

घर लौटते मुशाफिर अपना रास्ता भटक जाते हैं।


उन्होंने किसी चीज को

सही जगह नहीं रहने दिया

न संज्ञा

न विशेषण

न सर्वनाम

एक समूचा और सही वाक्य

टूटकर

‘बि ख र’ गया है

उनका व्याकरण इस देश की

शिराओं में छिपे हुये कारकों का

हत्यारा है

उनकी सख्त पकड़ के नीचे

भूख से मरा हुआ आदमी

इस मौसम का

सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय

सबसे सटीक नारा है

वे खेतों मेंभूख और शहरों में

अफवाहों के पुलिंदे फेंकते हैं


भूख से

मरा हुआ आदमी/

इस मौसम का /सबसे दिलचस्प विज्ञापन है और गाय/सबसे सटीक नारा है

देश और धर्म और नैतिकता की

दुहाई देकर

कुछ लोगों की सुविधा

दूसरों की ‘हाय’पर सेंकते हैं

वे जिसकी पीठ ठोंकते हैं

उसकी रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है

वे मुस्कराते हैं और

दूसरे की आँख में झपटती हुई प्रतिहिंसा

करवट बदलकर सो जाती है

मैं देखता रहा…

देखता रहा…

हर तरफ ऊब थी

संशय था

नफरत थी

मगर हर आदमी अपनी ज़रूरतों के आगे

असहाय था। उसमें

सारी चीज़ों को नये सिरे से बदलने की

बेचैनी थी ,रोष था

लेकिन उसका गुस्सा

एक तथ्यहीन मिश्रण था:

आग और आँसू और हाय का।

इस तरह एक दिन-

जब मैं घूमते-घूमते थक चुका था

मेरे खून में एक काली आँधी-

दौड़ लगा रही थी

मेरी असफलताओं में सोये हुये

वहसी इरादों को

झकझोरकर जगा रही थी

अचानक ,नींद की असंख्य पर्तों में

डूबते हुये मैंने देखा

मेरी उलझनों के अँधेरे में

एक हमशक्ल खड़ा है

मैंने उससे पूछा-’तुम कौन हो?

यहाँ क्यों आये हो?

तुम्हें क्या हुआ है?’

‘तुमने पहचाना नहीं-मैं हिंदुस्तान हूँ

हाँ -मैं हिंदुस्तान हूँ’,

वह हँसता है-ऐसी हँसी कि दिल

दहल जाता है

कलेजा मुँह को आता है

और मैं हैरान हूँ

‘यहाँ आओ

मेरे पास आओ

मुझे छुओ।

मुझे जियो। मेरे साथ चलो

मेरा यकीन करो। इस दलदल से

बाहर निकलो!

सुनो!

तुम चाहे जिसे चुनो

मगर इसे नहीं। इसे बदलो।

मुझे लगा-आवाज़

जैसे किसी जलते हुये कुएँ से

आ रही है।

एक अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट

जैसे कोई मादा भेड़िया

अपने छौने को दूध पिला रही है

साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है


एक

अजीब-सी प्यार भरी गुर्राहट /जैसे कोई मादा भेड़िया/अपने छौने को दूध पिला रही

है/साथ ही किसी छौने का सिर चबा रही है

मेरा सारा जिस्म थरथरा रहा था

उसकी आवाज में

असंख्य नरकों की घृणा भरी थी

वह एक-एक शब्द चबा-चबाकर

बोल रहा था। मगर उसकी आँख

गुस्से में भी हरी थी

वह कह रहा था-

‘तुम्हारी आँखों के चकनाचूर आईनों में

वक्त की बदरंग छायाएँ उलटी कर रही हैं

और तुम पेड़ों की छाल गिनकर

भविष्य का कार्यक्रम तैयार कर रहे हो

तुम एक ऐसी जिन्दगी से गुज़र रहे हो

जिसमें न कोई तुक है

न सुख है

तुम अपनी शापित परछाई से टकराकर

रास्ते में रुक गये हो

तुम जो हर चीज़

अपने दाँतों के नीचे

खाने के आदी हो

चाहे वह सपना अथवा आज़ादी हो

अचानक ,इस तरह,क्यों चुक गये हो

वह क्या है जिसने तुम्हें

बर्बरों के सामने अदब से

रहना सिखलाया है?

क्या यह विश्वास की कमी है

जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है

या कि शर्म

अब तुम्हारी सहूलियत बन गयी है

नहीं-सरलता की तरह इस तरह

मत दौड़ो

उसमें भूख और मन्दिर की रोशनी का

रिश्ता है। वह बनिये की पूँजी का

आधार है

मैं बार-बार कहता हूँ कि इस उलझी हुई

दुनिया में

आसानी से समझ में आने वाली चीज़

सिर्फ दीवार है।

और यह दीवार अब तुम्हारी आदत का

हिस्सा बन गयी है

इसे झटककर अलग करो

अपनी आदतों में

फूलों की जगह पत्थर भरो

मासूमियत के हर तकाज़े को

ठोकर मार दो

अब वक्त आ गया है तुम उठो

और अपनी ऊब को आकार दो।


क्या यह

विश्वास की कमी है/जो तुम्हारी भलमनसाहत बन गयी है/या कि शर्म /अब तुम्हारी

सहूलियत बन गयी है

‘सुनो !

आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ

जिसके आगे हर सचाई

छोटी है। इस दुनिया में

भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क

रोटी है।


मगर तुम्हारी भूख और भाषा में

यदि सही दूरी नहीं है

तो तुम अपने-आपको आदमी मत कहो

क्योंकि पशुता -

सिर्फ पूँछ होने की मज़बूरी नहीं है

वह आदमी को वहीं ले जाती है

जहाँ भूख

सबसे पहले भाषा को खाती है

वक्त सिर्फ उसका चेहरा बिगाड़ता है

जो अपने चेहरे की राख

दूसरों की रूमाल से झाड़ता है

जो अपना हाथ

मैला होने से डरता है

वह एक नहीं ग्यारह कायरों की

मौत मरता है


जो अपना

हाथ/मैला होने से डरता है/वह एक नहीं ग्यारह कायरों की /मौत मरता है

और सुनो! नफ़रत और रोशनी

सिर्फ़ उनके हिस्से की चीज़ हैं

जिसे जंगल के हाशिये पर

जीने की तमीज है

इसलिये उठो और अपने भीतर

सोये हुए जंगल को

आवाज़ दो

उसे जगाओ और देखो-

कि तुम अकेले नहीं हो

और न किसी के मुहताज हो

लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खड़े हैं

वहाँ चलो।उनका साथ दो

और इस तिलस्म का जादू उतारने में

उनकी मदद करो और साबित करो

कि वे सारी चीज़ें अन्धी हो गयीं हैं

जिनमें तुम शरीक नहीं हो…’


तुम अकेले

नहीं हो/और न किसी के मुहताज हो/लाखों हैं जो तुम्हारे इन्तज़ार में खड़े हैं/वहाँ

चलो।उनका साथ दो

मैं पूरी तत्परता से उसे सुन रहा था

एक के बाद दूसरा

दूसरे के बाद तीसरा

तीसरे के बाद चौथा

चौथे के बाद पाँचवाँ…

यानी कि एक के बाद दूसरा विकल्प

चुन रहा था

मगर मैं हिचक रहा था

क्योंकि मेरे पास

कुल जमा थोड़ी सुविधायें थीं

जो मेरी सीमाएँ थीं

यद्यपि यह सही है कि मैं

कोई ठण्डा आदमी नहीं है

मुझमें भी आग है-

मगर वह

भभककर बाहर नहीं आती

क्योंकि उसके चारों तरफ चक्कर काटता हुआ

एक ‘पूँजीवादी’दिमाग है

जो परिवर्तन तो चाहता है

मगर आहिस्ता-आहिस्ता

कुछ इस तरह कि चीज़ों की शालीनता

बनी रहे।

कुछ इस तरह कि काँख भी ढकी रहे

और विरोध में उठे हुये हाथ की

मुट्ठी भी तनी रहे…
और यही है कि बात

फैलने की हद तक

आते-आते रुक जाती है

क्योंकि हर बार

चन्द सुविधाओं के लालच के सामने

अभियोग की भाषा चुक जाती है।

मैं खुद को कुरेद रहा था


हर

बार/चन्द सुविधाओं के लालच के सामने/अभियोग की भाषा चुक जाती है।

अपने बहाने उन तमाम लोगों की असफलताओं को

सोच रहा था जो मेरे नजदीक थे।

इस तरह साबुत और सीधे विचारों पर

जमी हुई काई और उगी हुई घास को

खरोंच रहा था,नोंच रहा था

पूरे समाज की सीवन उधेड़ते हुये

मैंने आदमी के भीतर की मैल

देख ली थी। मेरा सिर

भिन्ना रहा था

मेरा हृदय भारी था

मेरा शरीर इस बुरी तरह थका था कि मैं

अपनी तरफ़ घूरते उस चेहरे से

थोड़ी देर के लिये

बचना चाह रहा था

जो अपनी पैनी आँखों से

मेरी बेबसी और मेरा उथलापन

थाह रहा था

प्रस्तावित भीड़ में

शरीक होने के लिये

अभी मैंने कोई निर्णय नहीं लिया था

अचानक ,उसने मेरा हाथ पकड़कर

खींच लिया और मैं

जेब में जूतों का टोकन और दिमाग में

ताज़े अखबार की कतरन लिये हुये

धड़ाम से-

चौथे आम चुनाव की सीढ़ियों से फिसलकर

मत-पेटियों के

गड़गच्च अँधेरे में गिर पड़ा

नींद के भीतर यह दूसरी नींद है

और मुझे कुछ नहीं सूझ रहा है

सिर्फ एक शोर है

जिसमें कानों के पर्दे फटे जा रहे हैं

शासन सुरक्षा रोज़गार शिक्षा …

राष्ट्रधर्म देशहित हिंसा अहिंसा…

सैन्यशक्ति देशभक्ति आज़ादी वीसा…

वाद बिरादरी भूख भीख भाषा…

शान्ति क्रान्ति शीतयुद्ध एटमबम सीमा…

एकता सीढ़ियाँ साहित्यिक पीढ़ियाँ निराशा…

झाँय-झाँय,खाँय-खाँय,हाय-हाय,साँय-साँय…

मैंने कानों में ठूँस ली हैं अँगुलियाँ

और अँधेरे में गाड़ दी है

आंखों की रोशनी।

सब-कुछ अब धीरे-धीरे खुलने लगा है

मत-वर्षा के इस दादुर-शोर में

मैंने देखा हर तरफ

रंग-बिरंगे झण्डे फहरा रहे हैं

गिरगिट की तरह रंग बदलते हुये

गुट से गुट टकरा रहे हैं

वे एक- दूसरे से दाँता-किलकिल कर रहे हैं

एक दूसरे को दुर-दुर,बिल-बिल कर रहे हैं

हर तरफ तरह -तरह के जन्तु हैं

श्रीमान्‌ किन्तु हैं

मिस्टर परन्तु हैं

कुछ रोगी हैं

कुछ भोगी हैं

कुछ हिंजड़े हैं

कुछ रोगी हैं

तिजोरियों के प्रशिक्षित दलाल हैं

आँखों के अन्धे हैं

घर के कंगाल हैं

गूँगे हैं

बहरे हैं

उथले हैं,गहरे हैं।

गिरते हुये लोग हैं

अकड़ते हुये लोग हैं

भागते हुये लोग हैं

पकड़ते हुये लोग हैं

गरज़ यह कि हर तरह के लोग हैं

एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे

इस बात पर सहमत हैं कि इस देश में

असंख्य रोग हैं

और उनका एकमात्र इलाज-

चुनाव है।


हर तरह

के लोग हैं/एक दूसरे से नफ़रत करते हुये वे/इस बात पर सहमत हैं कि इस देश

में/असंख्य रोग हैं/और उनका एकमात्र इलाज-/ चुनाव है।

लेकिन मुझे लगा कि एक विशाल दलदल के किनारे

बहुत बड़ा अधमरा पशु पड़ा हुआ है

उसकी नाभि में एक सड़ा हुआ घाव है

जिससे लगातार-भयानक बदबूदार मवाद

बह रहा है

उसमें जाति और धर्म और सम्प्रदाय और

पेशा और पूँजी के असंख्य कीड़े

किलबिला रहे हैं और अन्धकार में

डूबी हुई पृथ्वी

(पता नहीं किस अनहोनी की प्रतीक्षा में)

इस भीषण सड़ाँव को चुपचाप सह रही है

मगर आपस में नफरत करते हुये वे लोग

इस बात पर सहमत हैं कि

‘चुनाव’ ही सही इलाज है

क्योंकि बुरे और बुरे के बीच से

किसी हद तक ‘कम से कम बुरे को’ चुनते हुये

न उन्हें मलाल है,न भय है

न लाज है

दरअस्ल उन्हें एक मौका मिला है

और इसी बहाने

वे अपने पड़ोसी को पराजित कर रहे हैं

मैंने देखा कि हर तरफ

मूढ़ता की हरी-हरी घास लहरा रही है

जिसे कुछ जंगली पशु

खूँद रहे हैं

लीद रहे हैं

चर रहे है

मैंने ऊब और गुस्से को

गलत मुहरों के नीचे से गुज़रते हुये देखा

मैंने अहिंसा को

एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा

मैंने ईमानदारी को अपनी चोरजेबें

भरते हुये देखा

मैंने विवेक को

चापलूसों के तलवे चाटते हुये देखा…


मैंने

अहिंसा को/एक सत्तारूढ़ शब्द का गला काटते हुये देखा/मैंने ईमानदारी को अपनी

चोरजेबें/भरते हुये देखा/मैंने विवेक को/चापलूसों के तलवे चाटते हुये

देखा…

मैं यह सब देख ही रहा था कि एक नया रेला आया

उन्मत्त लोगों का बर्बर जुलूस। वे किसी आदमी को

हाथों पर गठरी की तरह उछाल रहे थे

उसे एक दूसरे से छीन रहे थे।उसे घसीट रहे थे।

चूम रहे थे।पीट रहे थे। गालियाँ दे रहे थे।

गले से लगा रहे थे। उसकी प्रशंसा के गीत

गा रहे थे। उस पर अनगिनत झण्डे फहरा रहे थे।

उसकी जीभ बाहर लटक रही थी। उसकी आँखें बन्द

थीं। उसका चेहरा खून और आँसू से तर था।’मूर्खों!

यह क्या कर रहे हो?’ मैं चिल्लाया। और तभी किसी ने

उसे मेरी ओर उछाल दिया। अरे यह कैसे हुआ?

मैं हतप्रभ सा खड़ा था

और मेरा हमशक्ल

मेरे पैरों के पास

मूर्च्छित- सा

पड़ा था-

दुख और भय से झुरझुरी लेकर

मैं उस पर झुक गया

किन्तु बीच में ही रुक गया

उसका हाथ ऊपर उठा था

खून और आँसू से तर चेहरा

मुस्कराया था। उसकी आँखों का हरापन

उसकी आवाज में उतर आया था-

‘दुखी मत हो। यह मेरी नियति है।

मैं हिन्दुस्तान हूँ। जब भी मैंने

उन्हें उजाले से जोड़ा है

उन्होंने मुझे इसी तरह अपमानित किया है

इसी तरह तोड़ा है

मगर समय गवाह है

कि मेरी बेचैनी के आगे भी राह है।’


‘दुखी मत

हो/ यह मेरी नियति है/मैं हिन्दुस्तान हूँ/ जब भी मैंने उन्हें उजाले से जोड़ा है/उन्होंने

मुझे इसी तरह अपमानित किया है/इसी तरह तोड़ा है/मगर समय गवाह है/कि मेरी

बेचैनी के आगे भी राह है।’

मैंने सुना। वह आहिस्ता-आहिस्ता कह रहा है

जैसे किसी जले हुये जंगल में

पानी का एक ठण्डा सोता बह रहा है

घास की की ताजगी- भरी

ऐसी आवाज़ है

जो न किसी से खुश है,न नाराज़ है।

‘भूख ने उन्हें जानवर कर दिया है

संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है

फिर भी वे अपने हैं…

अपने हैं…

अपने हैं…

जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं

नहीं-यह मेरे लिये दुखी होने का समय

नहीं है।अपने लोगों की घृणा के

इस महोत्सव में

मैं शापित निश्चय हूँ


‘भूख ने

उन्हें जानवर कर दिया है/संशय ने उन्हें आग्रहों से भर दिया है/फिर भी वे अपने

हैं…/जीवित भविष्य के सुन्दरतम सपने हैं’

मुझे किसी का भय नहीं है।

‘तुम मेरी चिंता न करो। उनके साथ

चलो। इससे पहले कि वे

गलत हाथों के हथियार हों

इससे पहले कि वे नारों और इस्तहारों से

काले बाज़ार हों

उनसे मिलो।उन्हें बदलो।

नहीं-भीड़ के खिलाफ रुकना

एक खूनी विचार है

क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी

इस हिंसक भीड़ का

अन्धा शिकार है।

तुम मेरी चिन्ता मत करो।

मैं हर वक्त सिर्फ एक चेहरा नहीं हूँ

जहाँ वर्तमान

अपने शिकारी कुत्ते उतारता है

अक्सर में मिट्टी की हरक़त करता हुआ

वह टुकड़ा हूँ

जो आदमी की शिराओं में

बहते हुये ख़ून को

उसके सही नाम से पुकारता हूँ

इसलिये मैं कहता हूँ,जाओ ,और

देखो कि लोग…


भीड़ के

खिलाफ रुकना/

एक खूनी विचार है/क्योंकि हर ठहरा हुआ आदमी/इस हिंसक भीड़ का /अन्धा शिकार

है।

मैं कुछ कहना चाहता था कि एक धक्के ने

मुझे दूर फेंक दिया। इससे पहले कि मैं गिरता

किन्हीं मजबूत हाथों ने मुझे टेक लिया।

अचानक भीड़ में से निकलकर एक प्रशिक्षित दलाल

मेरी देह में समा गया। दूसरा मेरे हाथों में

एक पर्ची थमा गया। तीसरे ने एक मुहर देकर

पर्दे के पीछे ढकेल दिया।

भय और अनिश्चय के दुहरे दबाव में

पता नहीं कब और कैसे और कहाँ–

कितने नामों से और चिन्हों और शब्दों को

काटते हुये मैं चीख पड़ा-

‘हत्यारा!हत्यारा!!हत्यारा!!!’

मुझे ठीक ठीक याद नहीं है।मैंने यह

किसको कहा था। शायद अपने-आपको

शायद उस हमशक्ल को(जिसने खुद को

हिन्दुस्तान कहा था) शायद उस दलाल को

मगर मुझे ठीक-ठीक याद नहीं है


मेरी नींद टूट चुकी थी

मेरा पूरा जिस्म पसीने में

सराबोर था। मेरे आसपास से

तरह-तरह के लोग गुजर रहे थे।

हर तरफ हलचल थी,शोर था।

और मैं चुपचाप सुनता हूँ

हाँ शायद -

मैंने भी अपने भीतर

(कहीं बहुत गहरे)

‘कुछ जलता हुआ सा ‘ छुआ है

लेकिन मैं जानता हूँ कि जो कुछ हुआ है

नींद में हुआ है

और तब से आजतक

नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये

मैंने कई रातें जागकर गुज़ार दीं हैं

हफ्तों पर हफ्ते तह किये हैं

अपनी परेशानी के

निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण

जिये हैं।

और हर बार मुझे लगा है कि कहीं

कोई खास फ़र्क़ नहीं है

ज़िन्दगी उसी पुराने ढर्रे पर चल रही है

जिसके पीछे कोई तर्क नहीं है


हाँ ,यह सही है कि इन दिनों

कुछ अर्जियाँ मँजूर हुई हैं

कुछ तबादले हुये हैं

कल तक जो थे नहले

आज

दहले हुये हैं


हाँ यह सही है कि

मन्त्री जब प्रजा के सामने आता है

तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है

नये-नये वादे करता है

और यह सिर्फ़ घास के

सामने होने की मजबूरी है

वर्ना उस भले मानुस को

यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन

और अपने निजी बिस्तर के बीच

कितने जूतों की दूरी है।


मन्त्री जब

प्रजा के सामने आता है/तो पहले से ज्यादा मुस्कराता है/नये-नये वादे करता है/और यह

सिर्फ़ घास के/सामने होने की मजबूरी है

वर्ना उस भले मानुस को /यह भी पता नहीं कि विधानसभा भवन/और अपने निजी

बिस्तर के बीच /कितने जूतों की दूरी है।

हाँ यह सही है कि इन दिनों -चीजों के

भाव कुछ चढ़ गये हैं।अखबारों के

शीर्षक दिलचस्प हैं,नये हैं।

मन्दी की मार से

पट पड़ी हुई चीज़ें ,बाज़ार में

सहसा उछल गयीं हैं

हाँ यह सही है कि कुर्सियाँ वही हैं

सिर्फ टोपियाँ बदल गयी हैं और-

सच्चे मतभेद के अभाव में

लोग उछल-उछलकर

अपनी जगहें बदल रहे हैं

चढ़ी हुई नदी में

भरी हुई नाव में

हर तरफ ,विरोधी विचारों का

दलदल है

सतहों पर हलचल है

नये-नये नारे हैं

भाषण में जोश है

पानी ही पानी है

पर

कीचड़ खामोश है


मैं रोज देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का

एक पुर्ज़ा गरम होकर

अलग छिटक गया है और

ठण्डा होते ही

फिर कुर्सी से चिपक गया है

उसमें न हया है

न दया है


मैं रोज

देखता हूँ कि व्यवस्था की मशीन का/एक पुर्ज़ा गरम होकर/अलग छिटक गया है

और/ठण्डा होते ही/फिर कुर्सी से चिपक गया है

नहीं-अपना कोई हमदर्द

यहाँ नहीं है। मैंने एक-एक को

परख लिया है।

मैंने हरेक को आवाज़ दी है

हरेक का दरवाजा खटखटाया है

मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ

उठायी है उसको मादा

पाया है।

वे सब के सब तिजोरियों के

दुभाषिये हैं।

वे वकील हैं। वैज्ञानिक हैं।

अध्यापक हैं। नेता हैं। दार्शनिक

हैं । लेखक हैं। कवि हैं। कलाकार हैं।

यानी कि-

कानून की भाषा बोलता हुआ

अपराधियों का एक संयुक्त परिवार है।


मैंने

एक-एक को परख लिया है/मैंने हरेक को आवाज़ दी है/हरेक का दरवाजा खटखटाया

है/मगर बेकार…मैंने जिसकी पूँछ उठायी है /उसको मादा

पाया है।

भूख और भूख की आड़ में

चबायी गयी चीजों का अक्स

उनके दाँतों पर ढूँढना

बेकार है। समाजवाद

उनकी जुबान पर अपनी सुरक्षा का

एक आधुनिक मुहावरा है।

मगर मैं जानता हूँ कि मेरे देश का समाजवाद

मालगोदाम में लटकती हुई

उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’ लिखा है

और उनमें बालू और पानी भरा है।


मेरे देश

का समाजवाद/

मालगोदाम में लटकती हुई /उन बाल्टियों की तरह है जिस पर ‘आग’

लिखा है/और उनमें बालू और पानी भरा है।

यहाँ जनता एक गाड़ी है


एक ही संविधान के नीचे

भूख से रिरियाती हुई फैली हथेली का नाम

‘दया’ है

और भूख में

तनी हुई मुट्ठी का नाम नक्सलबाड़ी है।


मुझसे कहा गया कि संसद

देश की धड़कन को

प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है

जनता को

जनता के विचारों का

नैतिक समर्पण है

लेकिन क्या यह सच है?

या यह सच है कि

अपने यहां संसद -

तेली की वह घानी है

जिसमें आधा तेल है

और आधा पानी है

और यदि यह सच नहीं है

तो यहाँ एक ईमानदार आदमी को

अपनी ईमानदारी का मलाल क्यों है?

जिसने सत्य कह दिया है

उसका बुरा हाल क्यों है?


अपने यहां

संसद -

तेली की वह घानी है/जिसमें आधा तेल है/और आधा पानी है/

मैं अक्सर अपने-आपसे सवाल

करता हूँ जिसका मेरे पास

कोई उत्तर नहीं है

और आज तक –

नींद और नींद के बीच का जंगल काटते हुये

मैंने कई रातें जागकर गुजार दी हैं

हफ्ते पर हफ्ते तह किये हैं। ऊब के

निर्मम अकेले और बेहद अनमने क्षण

जिये हैं।

मेरे सामने वही चिरपरिचित अन्धकार है

संशय की अनिश्चयग्रस्त ठण्डी मुद्रायें हैं

हर तरफ शब्दभेदी सन्नाटा है।

दरिद्र की व्यथा की तरह

उचाट और कूँथता हुआ। घृणा में

डूबा हुआ सारा का सारा देश

पहले की तरह आज भी

मेरा कारागार है।


-धूमिल



चित्र:- रितु चौधरी की कलाकृति

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