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May, 2006 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कवियों को संबोधित करती एक कविता: गोष्ठियाए हुए कवि

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-हितेश व्यास

हे महाकवियों !
महाकाव्यों की रचना के बाद
ऐसा क्या अपच रह गया था
जिसके लिए तुम्हें गोष्ठियों में पुनःपुः जन्म लेना पड़ता है

हे यशकमियों!
यश-रस का पान गोष्ठियों के सिवाय कहाँ हो सकता है
अहोरूपम अहोध्वनि का गगनोच्चार यहीं संभव है
हे कण्ठ कला विशारदो!
तुम जब तरन्नुम की बयार चलाते हो
तो गुरुत्व आकर्षण को ठेंगा दिखाते हुए
हम सब हवा में तैरने लग जाते हैं

तुम जब गायन पर लगाम लगाते हो गायकों!
हम सब धड़ाम से अतुकान्त के गर्त में गिर पड़ते हैं
हे अतीत में महान रचना कर चुके महान कवियों!
तुम कविता लाते हो या भूतकाल के बक्से से
गोटेदार जरी वाली साड़ी जो विवाहकालीन
झिलमिलाहट को तहाए हुए सोयी रहती है
अकसर तुम कविता के अंश भूल जाते हो
जैसे विस्मृति के चूहों ने कुतर डाला हो
जरी का वेश
हे जगत गति से रहित सुकवियों! तुम धन्य हो
कविता चाहे छायावाद प्रगतिवाद नई कविता और
साठोत्तरी कविता को लांघते हे सदी के अंतिम मुहाने पर
दस्तक दे रही हो

तुम द्विवेदीयुगीन कवियों के साथ
कदमताल करते नजर आते हो
हे तथाकथित विद्वानो!
क्या ये गोष्ठियाँ तुम्हारे लिए कूड़ाघर हैं
जहाँ तुम नियमित रूप से अपनी विद्वता झाड़ते हो
तुम्हारी विद्वता का डंका …

एक नई साहित्यिक पत्रिका – परिकथा

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हिन्दी साहित्य की यूँ तो सैकड़ों पत्रिकाएँ निकलती हैं मगर उनमें हंस जैसा इम्पेक्ट पता नहीं क्यों किसी में भी दिखाई नहीं देता. और यही वजह है कि हिन्दी का रचनाकार हंस में प्रकाशित होकर अपने को धन्य समझता है.

परंतु परिकथा के दो अंक देखकर यह महसूस किया जा सकता है कि यह हंस की प्रतिमूर्ति बनने को तत्पर है – राजेंद्र यादव के संपादकीय को अगर हंस से निकाल दें तो जो पत्रिका आपके हाथों में होगी उसे आप परिकथा कह सकते हैं.

प्रख्यात रचनाकारों - असगर वजाहत, अनामिका, शैवाल तथा अभय के संपादन मंडल के अधीन परिकथा की प्रस्तुति में जहाँ आपको पढ़ने के लिए ढेरों पठनीय कहानियाँ मिलती हैं तो वहीं डायरी, संस्मरण, विचार-विमर्श, कविताएँ, कृतियों की समीक्षा इत्यादि सब कुछ भी संतुलित अंदाज में पढ़ने को मिलता है.

परिकथा की एक ख़ासियत और है. हंस जैसे स्थापित पत्रिकाओं की संपादकीय नीति के विपरीत, परिकथा का कहना है कि यह नए तथा अचर्चित लेखकों के प्रति संवेदनशीलता तो अपनाएगी ही, यदि आप अपनी रचना के साथ पता लिखा लिफ़ाफ़ा रखकर भेजेंगे तो प्रकाशन की अस्वीकृति की दशा में आपको उस रचना में सुधार करने के लिए आपको परिकथा संपादन …

हास्य व्यंग्य: शरद जोशी के कमलमुख के कुछ पठनीय पत्र

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(शरद जोशी के कमलमुख की आलोचना-आलेख को पाठकों ने खूब सराहा और अनुरोध किया कि कुछ ऐसी ही रचनाएँ प्रकाशित करें. प्रस्तुत कुछ पत्र उसी व्यंग्य उपन्यास से उद्भृत)

पत्र 1
प्रिय भाई,
सुना है दिसंबर में कवि सम्मेलन आयोजित करवा रहे हो अपने नगर में. तब तो मिलना हो सकेगा. बुलवाओगे ना? यों तुम से क्या छुपा है? मार्ग व्यय और ऊपर से कुछ मिल जाए काफी है. आज्ञा सिर आँखों पर रख दौड़ा आऊंगा. हालांकि अभी तुम्हारा पत्र इस संबंध में आया नहीं है पर मैं व्यर्थ की औपचारिकताओं पर विश्वास नहीं करता. मेरी स्वीकृति समझो. पत्र डालना. भाभी को प्रणाम-बेबी को प्यार. विवाह तो हो ही गया होगा ना!

तुम्हारा अपना
कमलमुख
*************-************
पत्र 2
प्रिय भाई,
इस अभिनव पत्रिका के प्रकाशन के लिए मेरी लाख-लाख बधाइयाँ लो. सच कहूं – कैसी लगी? हिन्दी में पत्रिका का जो आदर्श रूप मेरी आंखों में है वह पूरा हो गया. कितनी सुंदर सज्जा, कैसा वस्तु चयन, क्या ही अच्छे विचार. भई वाह!

तुम्हारा ही सदा
कमलमुख
पुनश्च- रचना भेज रहा हूँ. जरा ध्यान रखना.
*************-************

पत्र 3
प्रिय भाई,
‘धर्मशाला’ में तुम्हारी कहानी पढ़ी. क्या कहने हैं. बरसों …

संजीव ठाकुर की कहानी: नारायण! नारायण!!

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मैं चक्रधरपुर जा रहा था. बेटिकट! साथ में चाचा जी थे. टिकट लेना शायद चाचा जी को अपमानजनक लगा था. मेरे यह कहने पर कि 'टिकट ले लें', उन्होंने कहा था, 'धुर, बुड़बक! तीन ही स्टेशन तो जाना है, टिकट क्या करेंगे?' यानी चाचा जी भी आम बिहारियों की तरह 'लोकल' यात्रा में टिकट लेना जरूरी नहीं समझते? चाचा जी भी? रिटायर्ड प्रोफ़ेसर रामेश्वर प्रसाद चौधरी! बेटिकट! मेरे हैदराबादी संस्कार को धक्का लगा. साउथ में तो...

गाड़ी फ्लाई ओवर के पास धीमी होने लगी थी. डिब्बे में फुसफुसाहट हुई, 'चेकिंग तो नहीं?' चाचा जी सीटी बजाने लगे थे, तनाव मुक्त दिखें इस गरज से! मैं तो तनाव में आ गया था, 'न जाने कितनी बेइज्जती होगी?' लेकिन नहीं, गाड़ी स्पीड में आ गई थी. चाचा जी की सीटी बंद!

मैं एनबी कॉलेज_नारायण भगत कॉलेज जा रहा था_एज ए लेक्चरर! साथ में चाचा जी इसलिए कि ये भी इसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर हुआ करते थे. इस अत्यंत अपरिचित जगह में सब से परिचय करवा देने का जिम्मा उन्होंने उठाया था. मैं उन्हें मन ही मन कोस रहा था. इन्हीं महाशय की कृपा से मुझे लेक्चरर होना पड़ गया था_भरी जवानी में लेक्चरर!! ज…

व्यंग्य: शरद जोशी के कमलमुख से ‘आलोचना’

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“लेखक विद्वान हो न हो, आलोचक सदैव विद्वान होता है. विद्वान प्रायः भौंडी बेतुकी बात कह बैठता है. ऐसी बातों से साहित्य में स्थापनाएँ होती हैं. उस स्थापना की सड़ाँध से वातावरण बनता है जिसमें कविताएँ पनपती हैं. सो, कुछ भी कहो, आलोचक आदमी काम का है.” आज से आठ वर्ष पूर्व आलोचना पर अपने मित्रों के समूह में बोलते हुए यह विचार मैंने प्रकट किए थे. वे पत्थर की लकीर हैं. लेखक का साहित्य के विकास में महत्व है या नहीं है यह विवादास्पद विषय हो सकता है पर किसी साहित्यिक के विकास में किसी आलोचक का महत्व सर्वस्वीकृत है. साहित्य की वैतरणी तरना हो तो किसी आलोचक गैया की पूंछ पकड़ो, फिर सींग चलाने का काम उसका और यश बटोरने का काम कमलमुख का.

आलोचना के प्रति अपनी प्राइवेट राय जाहिर करने के पूर्व मैं आपको यह बताऊं कि आलोचना है क्या? यह प्रश्न मुझसे अकसर पूछा जाता है. साहित्यरत्न की छात्राएँ चूंकि आलोचना समझने को सबसे ज्यादा उत्सुक दिखाई देती हैं इसलिए यह मानना गलत न होगा कि आलोचना साहित्य की सबसे टेढ़ी खीर है. टेढ़ी खीर इसलिए कि मैं कभी इसका ठीक उत्तर नहीं दे पाता. मैं मुस्कराकर उन लड़कियों को कनखियों से द…

ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी : जाल

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आकाश सक्सेना सुबह जब दफ़्तर पहुँचा, तब कम ही लोग आए थे. जो आए थे वे ई.टी. पढ़ रहे थे या फिर आपस में फैशन, फूड या फ़िल्म में से किसी एक विषय पर गपशप कर रहे थे.

आकाश को ऐसी मंडलियों में बैठना अच्छा नहीं लगता. ...कलीग इस तरह बातें करते हैं जैसे बहुत बड़े दार्शनिक हों. जबकि उनके पास सतही सूचनाएं होती हैं और वे उसे ज्ञान समझने की खुशफहमी पाले रहते हैं.

आकाश सक्सेना ने चाय मंगवाई. अभी उसने कुछ घूँट ही भरे थे कि इंटरकॉम की बेल बजी. डीएम आकाश सक्सेना को अपने केबिन में बुला रहा था.

आकाश मन ही मन मुस्कराया. चाय ख़त्म की. मन ही मन बुदबुदाया – बिस्मिल्लाह ही ख़राब हो गया.

आकाश सक्सेना डी.एम. केबिन में था. बड़ी सी टेबल. रिवाल्विंग चेयर. टेबल पर शीशा. शीशे के नीचे सर्कुलर... पेपर... देवी देवताओं की तस्वीरें. कमरे में गणेश जी की मूर्ति. अगरबत्ती. खुशबू... फर्श पर महरून कलर का कालीन. सनमाइका की चमचमाती दीवारें... ए.सी... वातानुकूलित वातावरण... बाहर का मौसम गर्म... शरीर को झुलसाता... लेकिन केबिन में वातावरण सुखद... केबिन में प्रविष्ट होते ही सुख का अहसास होता था. सुख की उपस्थिति हर कहीं थी- डी.एम. के चेहर…

लक्ष्मीनारायण गुप्त की इच्छा कविता

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इच्छा

इच्छा है मन में कि अपनी एक कुटिया हो
कुटिया में एक खटिया हो
पास में एक खुँटिया हो
खुँटिये पे लटकी एक तुलसी की माला हो
मन भक्ति से मतवाला हो
इनडोर प्लम्बिंग हो
फ़र्श पर कालीन हो
इन्टरनेट की सुविधा हो
पास में एक वैष्णव भोजनालय हो
बिना मिर्च का भोजन हो
गंगा की धारा हो
मन्दिर इक न्यारा हो
आधुनिक भक्त की सुविधा के
सारे साधन हों
पास में जंगल हो
जंगल में मंगल हो
प्राकृतिक सौन्दर्य हो
प्रभु की भक्ति हो
शरीर में शक्ति हो
पत्नी भी कभी कभी
विज़िट के लिये आती हो
मठरी अचार लाती हो
कभी कभी रात में रुक जाती हो
अभी तो इतना ही सोचा है
बाकी तो प्रभु की इच्छा है
देखो क्या होता है


**-**
रचनाकार - लक्ष्मीनारायण गुप्त की ऐसी ही अन्य मजाहिया इच्छाएँ आप उनके जालस्थल
http://kavyakala.blogspot.com/2006/05/blog-post_16.html

पर पढ़ सकते हैं.

अनवर सलीम की चंद ग़ज़लें

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**-**

ग़ज़ल 1

हाथ जलने लगे पाँव फिर शल हुए
यूँ निगाहों में कितने ही मक़्तल हुए ।

आसमां में जो तहलील बादल हुए
जानते बूझते लोग पागल हुए ।

तिलमिलाती हवाएँ झपटने को थीं
हम मचल के सरे दस्त बादल हुए ।

शीशा शीशा पिघल कर उतरता रहा
देखते देखते जिस्म ओझल हुए ।

पानी पानी हुए हमसे मिलते ही वो
हाथ फैला के हम उनकी छागल हुए ।

धूप पहना के हम को वो लज्जित हुई
हम ने समझाया, हम इससे शीतल हुए ।

सनसनाती पवन की थीं सरगोशियाँ
यूं लगा हम को, हम उसकी पायल हुए ।

इस मुसाफ़िर हूँ सूरज को सर पे लिए
मेरी ख़ातिर वो बरगद न पीपल हुए ।

पास थे आईने जिनके वो बच गए
पास थे जिनके पत्थर वो घायल हुए ।

रुप है चीज़ ऐसी कि जिसके लिए
आज तक कतने खूं रेज़ दंगल हुए ।

क़ीमतें अपनी पहचान पाए न हम
कैसा सोना थे हम, आज पीतल हुए ।

काले धब्बे ही धब्बे थे दिल पर ‘सलीम’
तेरी बख़्शीश से हम आज निर्मल हुए ।

**-**

ग़ज़ल 2

मुझे अपना लिबास तू अपना बना के देख भी ले
लहू की आग में खुद को जला के देख भी ले ।

परों को नोचना इक खेल तो नहीं लेकिन
शिकारियों को ज़रा आज़मा के देख भी ले ।

अलग अलग ही सही रास्ते तेरे मेरे
लकीर हाथ की अपने मिटा के देख भी ले ।

शुआएं जिस्म से फूटें निखार आ जाए
बदन …

सुदामा प्रसाद पाण्डेय 'धूमिल' की लंबी कविता

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पूरे तीस पृष्ठों की इस पूरी कविता का टंकण अनूप शुक्ल ने किया है तथा उनके चिट्ठा स्थल फ़ुरसतिया पर यह पूर्व प्रकाशित है. इसे साभार यहाँ पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है. कविता लंबी है। आराम से आनन्द उठायें, बिना हड़बड़ाये हुये। देखें तमाम जगह आप महसूस
करेंगे कि बात आपको ही संबोधित करके कही गयी है।
पटकथा
जब मैं बाहर आया

मेरे हाथों में

एक कविता थी और दिमाग में

आँतों का एक्स-रे।

वह काला धब्बा

कल तक एक शब्द था;

खून के अँधेर में

दवा का ट्रेडमार्क

बन गया था।

औरतों के लिये ग़ैर-ज़रूरी होने के बाद

अपनी ऊब का

दूसरा समाधान ढूँढना ज़रूरी है।

मैंने सोचा !

क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच/अपनी भूख को ज़िन्दा रखना/जीभ और जाँघ के

स्थानिक भूगोल की/वाजिब मजबूरी है।
क्योंकि शब्द और स्वाद के बीच

अपनी भूख को ज़िन्दा रखना

जीभ और जाँघ के स्थानिक भूगोल की

वाजिब मजबूरी है।

मैंने सोचा और संस्कार के

वर्जित इलाकों में

अपनी आदतों का शिकार

होने के पहले ही बाहर चला आया।

बाहर हवा थी

धूप थी

घास थी

मैंने कहा आजादी…

मुझे अच्छी तरह याद है-

मैंने यही कहा था

मेरी नस-नस में बिजली

दौड़ रही थी

उत्साह में

खुद मेरा स्वर

मुझे अजनबी लग रहा था

मैंने कहा-आ-जा-दी

और दौड़ता हु…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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