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चुटकुले क्रमांक 464 - 502

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खाली पीली (http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=89 ) चुटकुलों की गूंज कुछ यूँ रही-चुटकुला # 0464लालु और सुवर का बच्चा
लालुजी अपने ड्रायवर के साथ एक बार कार से जा रहे थे। एक गांव से पहले उनकी कार के निचे एक सुवर का बच्चा कुचल कर मर गया। लालुजी दुखी हुये। ड्रायवर को कुछ पैसे दिये और कहा कि "गांव मे जाओ और सुवर के मालिक को मुआवजा दे आओ"
डायवर पैसे लेकर गांव चला गया। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गये ड्रायवर वापिस नही आया। लालुजी बैचेनी से टहलते रहे। तिसरे घंटे के आखिर मे ड्रायवर एक बोरा सिर पर लादे आते दिखा। पास आने पर लालुजी ने पूछा "का रे ड्रायबर , अतना देर काहे लगा दिये ? अउर इस बोरा मे का लाये हो"
ड्राववर "इस बोरा मै पैसा है मालिक"
लालु " क्यो गांव मे का हुवा, तुम्हे अतना पईसा किसने और काहे दे दिया ?"
ड्रायवर "हमको कुछ नाही पता, हम तो गांव मे जाके इतना ही बोला कि हम लालु का ड्रायवर हूं और हमने उ सुवर का बच्चा मार दिया हूं"
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चुटकुला # 0465दवा
कुत्ता और पत्नी दोनों के बीमार होने पर एक व्यक्त…

प्रवीण पंकज की लघुकथा

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- लघुकथाउपहार -प्रवीण पंकज सुमा ने अस्पताल से फ़ोन लगाया, 'मुबारक हो जी, तुम पापा बन गए.'
'तुम भी तो मां बन गई.' रमण ने हँसते हुए कहा.
'पर सुनो जी अपने दिल के टुकड़े को खाली हाथ न देखने दूंगी तुम्हें. कोई प्यारा-सा उपहार लाओ, फिर दर्शन पाओ.'
सुमा की बातें सुनकर रमण हँस पड़ा, 'अच्छा तो ये बात है. आज्ञा हुजूर, सेवक हाजिर है. सच आज जो मांगोगी, दूंगा.'
'सच्ची कह रहे हो न?'
'बिल्कुल. आख़िर आपने हमारे घर को चिराग दिया है.'
'अच्छा तो अपनी फूल-सी गुड़िया रानी के लिए एक अच्छा-सा फ्रॉक...!'
'गुड़िया रानी? फ्रॉक?' रमण चौंक पड़ा.
'हां भाई, अपनी बेटी को फ्रॉक ही पहनाओगे न.'
पास खड़ी रमण की मां ने 'गुड़िया रानी' और 'फ्रॉक' शब्द सुना. उम्र के तर्जुबे ने सबकुछ समझा दिया, 'जाने पोते का मुंह देख भी पाऊंगी या नहीं. मैं तो कहती हूं, तू दूसरी शादी कर ले बेटा. बहू के लक्षण मुझे तो कुछ ठीक नहीं लगते. मुझे पोते का मुंह दिखा दे.'
रमण् अब और भी उत्तोजित हो गया, 'अरे फ्रॉक की छोड़ो. मैं तो तुम्हारे लिए वो उपहार ला रहा हूं कि तुम ज़िं…

चुटकुले 430 - 463

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मेरा पन्ना (http://www.jitu.info/merapanna/?p=559 ) की दुकान के कुछ भयंकर मीठे चुटकुले -
चुटकुला क्र............................................... # 0430पंजाब के एक रेलवे स्टेशन पर एक सरदारजी दौड़ते हुए स्टेशन मास्टर के पास आए, और बोले " साहब! वहाँ प्लेटफ़ार्म नम्बर १ की पटरी पर लगभग १०० सरदार ट्रेन के नीचे आ गए है। चलिए" स्टेशन मास्टर का माथा ठनक गया। तो दौड़े दौड़े प्लेटफ़ार्म पर पहुँचे तो देखा लगभग १०० सरदार ट्रेन से कटकर मर चुके थे। स्टेशन मास्टर ने दौडकर आने वाले सरदार से मामला पूछा:
स्टेशन मास्टर :क्या हुआ था?
सरदार : साहब! एक मिनिस्टर आने थे, ट्रेन से। सारे सरदार उस मिनिस्टर के स्वागत के लिये प्लेटफ़ार्म पर खड़े थे। अचानक एनाउन्समेन्ट हुई, कि ट्रेन प्लेटफ़ार्म नम्बर एक पर आ रही है। बस फिर क्या था,सारे सरदार पटरी पर उतर पड़े, अपने नेता के स्वागत के लिये और कट कर मर गए।
स्टेशन मास्टर : अच्छा तो ये बात है, लेकिन तुम कैसे बच गए तुम भी तो सरदार हो।
सरदार : साहब मैं तो स्टेशन पर आत्महत्या करने आया था, इत्ते सारो के ऊपर कैसे कूदता?
चुटकुला क्र..........................................…

कैफ़ी आज़मी की चंद ग़ज़लें

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मैं खड़ा था के पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई ।
- कैफ़ी आज़मी
ग़ज़ल 1पत्थर के खुदा वहाँ भी पाए
हम चाँद से आज लौट आएदीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गए मेहरबान साएजंगल की हवायें आ रही हैं
कागज का यह शहर उड़ न जाएलैला ने नया जनम लिया है
है कैस कोई तो दिल लगाएहै आज जमीं का गुस्ल-ए-सेहत
जिस दिल में हो जितना खून लाएसहरा सहरा लहू के खेमे
फिर प्यासे लब-ए-फुरात आए****
गुस्ल-ए-सेहत = स्वस्थ स्नान, सहरा = मरूस्थल**-**ग़ज़ल 2मैं ढूंढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीं नया आसमां नहीं मिलतानई ज़मीं नया आसमां भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलतावोह तेग मिल गई जिस से हुआ है कत्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलतावोह मेरा गांव है, वोह मेरे गांव के चूल्हे
के जिनमें शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलताजो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों
मुझे खुद अपने कदम का निशाँ नहीं मिलताखड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता****.****
बशर=व्यक्ति, तेग=तलवार..

ग़ज़ल 3क्या जाने किसी की प्यास बुझाने किधर गयीं
उस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गयींदीवाना पूछता है यह लहरों…

अब तुम पाकिस्तान जा सकते हो

तेरी मेरी कहानी
-सलीम खान
आधी रात को हिंदुस्तान आजाद हुआ था परंतु स्वतंत्र देश की पहली सुबह में विभाजन के खून की लाली शामिल थी और बदहवासी के उस आलम में खुशी के साथ आंसू शामिल थे। आबादी की अफरा-तफरी के दौर में कई लोगों के लिए किसी नतीजे पर पहुंचना बहुत मुश्किल था। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करके ख्वाबों की जन्नत में जाएं या न जाएं ये सवाल अनेक आत्माओं को मथ रहा था। कैसा अजीब-सा दौर था कि दरख्त जमीन से इल्तिजा कर रहा है कि मेरे पैर छोड़ दो। सब भाग रहे थे परंतु कोई कहीं पहुंच नहीं रहा था।हम लोग पलासिया में अपने पुश्तैनी मकान में रहते थे। मेरे पिता अब्दुल रशीद खान होलकर पुलिस में डीआईजी थे और उनके महकमे में भी तब्दीलियां हो रही थीं। इंदौर हमेशा से एक थमा हुआ शहर रहा है, कमोबेश मानसरोवर झील की तरह। वक्त की बर्फ यहां आहिस्ता-आहिस्ता पिघलती है परंतु उस दौर में पहली बार मालवा की जमीन का मोह छोड़कर कुछ लोग जाना चाहते थे। मालवा की जमीन में एक नशा है जिससे छूटना आसान नहीं। इस शहर में बसे अधिकांश लोग यहां किसी नौकरी के तहत आए थे। तबादला होने पर खुद बाहर चले गए परंतु अपने परिवार को मालवा की शरण में ही र…

चुटकुले 401 - 423

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चुटकुला # 0401
शिक्षक : "तुम्हे आने में देर क्यों हुई?"
विद्यार्थी : "जी, रास्ते में बोर्ड लगा हुआ था, ‘आगे स्कुल हैं-कृपया धीरे चलें'"***
चुटकुला # 0402
शिक्षक : "राम तुम्हे आने में देरी क्यों हुई?"
राम : "जी, मेरे दो रूपैये रास्ते में गिर गये थे, मैं उन्हे ढ़ुंढ़ रहा था"
शिक्षक : "और श्याम तुम्हे देरी क्यों हुई? क्या तुम्हारे भी रूपैये खो गये थे?"
श्याम : " जी नहीं, मैं तो राम के रूपैये को पावँ के नीचे दबा कर खड़ा था."***
चुटकुला # 0403
शिक्षक : "ऐसा कोई उदाहरण बताओ जो साबित करे कि गरमी से चीज़े फैलती हैं तथा ठंड में सिकुड़ती हैं."
विद्यार्थी : "गर्मीयों में दिन बड़े होते हैं तथा सर्दीयों में छोटे."***
चुटकुला # 0404
"उठो बेटा, स्कूल जाने में देरी हो जायेगी"
"नहीं माँ, मैं स्कूल नहीं जाऊंगा."
"क्यों नहीं जाना चाहते, जरा दो कारण भी बता दो."
"एक सारे विद्यार्थी मुझसे नफरत करते हैं, दो सारे टीचर भी मुझसे नफरत करते हैं'
"यह तो कोई कारण नहीं हुआ'
"तो फिर तुम भी कोई दो कारण ब…

कहानी : युद्ध

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युद्ध







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-बलजीत सिंह रैना

रातोंरात सुरेंद्रनाथ कौल अपने घर का थोड़ा सा ज़रूरी सामान सरदार हकूमतसिंह के ट्रक पर लादकर परिवार सहित जम्मू आ पहुंचा था.
सरदार हकूमतसिंह से उसकी जान- पहचान बहुत पुरानी नहीं थी लेकिन गहरी और सघन थी. तब वह बारामूला सरकारी अस्पताल में मेडिकल असिस्टेंट था. हकूमतसिंह का बड़ा ख़तरनाक ट्रक एक्सीडेंट हुआ था. बाईं टांग की हड्डी टूट गई थी. ग्यारह दिन अस्पताल में रहा और इन ग्यारह दिनों में सुरेंद्रनाथ ने बड़े अपनेपन से उसकी मरहम पट्टी की थी. बाद में बीस-बाइस दिन मरहम पट्टी के लिए वह उसके घर भी जाता रहा. यह एक महीने की सेवा उन दोनों को इतना निकट ले आई कि वह सगे भाईयों जैसे दोस्त हो गए.
ट्रक पर सामान रखवाते हुए सुरेंद्रनाथ की आंखें भर आईं तो हकूमत सिंह ने गर्म हाथों से उसका कंधा दबाते हुए कहा था, ''हौंसला रख सुरेंद्रनाथ! कभी हम भी इसी तरह मुजफराबाद से उजड़े थे. पैदल चलते ऊड़ी, करना होते हुए बारामूला पहुंचे थे. हिम्मत रख...तेरे परिवार को जम्मू पहुंचाने के लिए रब सबबी (ईश्वर की इच्छा से) मैं आज अपने ट्रक के साथ तेरे पास हूं पर जब हम उजड़े थे तब हमें छोड़ने वाला कोई नहीं था. कबाई…

चुटकुले 376-400

चुटकुला क्रमांक -------------------------------------0376
प्यार स्वर्ग से? वेलेन्टाइन डे के अवसर पर एक सर्वे में लोगों से पूछा कि आप स्वर्ग से प्यार करते हैं या नर्क से? केवल एक व्यक्ति को छोड़कर सभी का उत्तर स्वर्ग था। प्रश्नकर्ता ने कहा कि ताज्जुब है कि आप अकेले व्यक्ति हैं जिन्होंने स्वर्ग के बजाय नर्क को चुना है। क्या आप बताएंगे कि ऐसा क्यों?
मासूमियत से उन्होंने जवाब दिया कि यह धरती नर्क से भी बदतर है और मैं यहीं बहुत खुश हूं। बाकी सब लोगों को आप स्वर्ग जाने दीजिए। चुटकुला क्रमांक -------------------------------------0377
प्रेम विवाह ! प्रेमिका - मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकती। प्रेमी - विवाह को मारो गोली! प्रेम तो कर सकती हो? प्रेमिका - अवश्य कर सकती हूं।प्रेमी - मगर कब? प्रेमिका - विवाह के बाद। चुटकुला क्रमांक -------------------------------------0378
हसीन सपना ! लड़का - कल रात मैंने सपने में देखा कि मैं संसार की सबसे सुंदर लड़की से बातें कर रहा हूं।
लड़की - अच्छा क्या सचमुच?
लड़का - हां, मैं सच कह रहा हूं।
लड़की - अच्छा तो यह बताओ, कि मैं तुमसे क्या कह रही थी?चुटकुला क्रमांक ----------…

मुफ़्त !!

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जमाना मुफ़्त खोरी का








- हिना जैनजमाना मुफ़्तखोरी का है
डिब्बे पर डिब्बा मुफ़्त
टीवी पर टीवी मुफ़्त
दो किलो किराने के सामान पर
एक किलो मुफ़्त
साबुन पर साबुन मुफ़्त
और मुफ़्त का ये अंतहीन सिलसिला
चलता ही रहता है
सोमवार की हर सुबह
मन कहता है, हे भगवान!
क्यों नहीं है आखिर
रविवार पर एक रविवार मुफ़्त?--*--सोच रहा हूँ- डॉ. रवीन्द्र पहलवानबेटे ने कहा-
पापा, अब यह टेबल
पुराना हो गया है,
इसे घर के
पिछवाड़े डाल दो,
और मैंने
डाल दिया.
अब,
मैं सोच रहा हूं
मैं भी तो
हो चला हूँ, पुराना, बूढ़ा.*-***-*
अब समझ आयाकल शाम
मेरा चश्मा
गिर कर टूट गया.
अब समझ आया
जो आँखों पर चढ़ता है
वह टूटता है
और
जो आँखों में उतरता है
वह जोड़ता है.**-**..
कम अवे विद मी
- नोरा जोन्स (अनुवाद - कमला पाटनी)रात के समय
दूर चले आना मेरे साथदूर चले आना मेरे साथ
और
मैं तुम्हें दूंगी लिखकर एक गीतदूर चले आना मेरे साथ
एक बस में
जहाँ कोई पीछा न कर सके
अपनी झूठी बातों के साथदूर चले आना मेरे साथ
जब
बादल हों आसमान में
और
घुटनों तक हो
पीली घास खेतों में
क्या मेरे साथ
चलना पसन्द नहीं करोगे?दूर चले आना मेरे साथ
हम प्यार करेंगे
पहाड़ों की ऊँची शिखा पर
अन्तहीन प्यार!और
बरसात की फुहार के साथ
जा…

व्यंग्य : चुंबन लो, पैसे दो

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व्यंग्यचुंबन लो, पैसे दो - यज्ञ शर्मा
दिल्ली में एक नियम लागू होने वाला है- जो भी सार्वजनिक स्थान में चुंबन लेगा, उसे 500 रुपये दंड भरना पड़ेगा। यह कानून लागू हो गया तो दिल्ली में क्या हुआ करेगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।दृश्य 1:लोदी गार्डन में नौजवान जोड़ा बैठा है। जोड़ा समझता है कि झाड़ी की ओट में किसी को कुछ नहीं दिखता। बड़ी भारी गलतफहमी में है। हमारी पुलिस की एक खासियत है। खुलेआम होता कारनामा उसे भले ही न दिखे, ओट में होने वाला हर काम उसे साफ दिखता है। इधर नौजवान जोड़ा नजदीक आया, उधर पुलिसवाला हाजिर हो गया, 'के हो रया है?' 'बैठे हैं, सिपाही जी।' 'बैठ्ठा है कि चुम्मा ले रया है? चल 500 रुपैया निकाल।' 'पर, हमने तो कुछ नहीं किया।' 'नहीं करया तो झाड़ी के पिच्छे के करणे बैठा है? खुल्ले में बेंच पे के नहीं बैठ्ठा? 500 रुपैया निकालता है के ले चलूं थाणे?' 'मेरे पास 500 नहीं है।' 'कित्ते हैं?' '100।' 'चल दे दे।'दृश्य 2:लोदी गार्डन। खुली जगह में लगी बेंच पर नौजवान जोड़ा बैठा है। एक पुलिसवाला उनके पास आया, 'ये के हो…

प्रभा दीक्षित की चंद ग़ज़लें

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ग़ज़लें-प्रभा दीक्षित




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ग़ज़ल 1सवालों के जंगल डराने लगे हैं
यहाँ आइने मुँह चुराने लगे हैं।अंधेरे में कुछ रोशनी के फरिश्ते
अदब की दुकानें सजाने लगे हैं।जहाँ भूख को रोटियाँ खा रही हैं
वहां फलसफे सर झुकाने लगे हैं।हमारे शहर के पुराने लुटेरे
नई बस्तियाँ भी बसाने लगे हैं।ज़मीनी जरूरत के बुनियादी मुद्दे
कलावादियों को पुराने लगे हैं।बदलते समय में सुबह के मुसाफिर
‘प्रभा' की ग़ज़ल गुनगुनाने लगे हैं।**-**
ग़ज़ल 2
तू कारवां के साथ में सबको मिला के चल
इक रोशनी का फूल दिलों में खिला के चलये रात तेरे सर पे भी मंडराएगी जरूर
जुगनू की तरह जलते हुए झिलमिला के चलकुछ मुश्किलें पहाड़ सी आएंगीं राह में
दरिया की तरह हँसते हुए खिलखिला के चलचलने के लिए शर्त है मंजिल की राह में
सारे जहाँ के बोझ को सर पे उठा के चलहर दर्द से गुजरा है मेरे इश्क का ज़मीर
फटते हुए दामन को जरा सिल सिला के चलशायद ग़ज़ल में तेरी ‘प्रभा' वो असर नहीं
बस्ती की बेहतरी में खुद का घर जला के चल**-**..
ग़ज़ल 3हम अपनी जिन्दगी को सही मायने तो दें
मंजिल को दिशा ठीक से पहचानने तो देंये जुस्तजू ये जिन्दगी कुछ बेवजह नहीं
पर्वत से अपने कद को जरा नापने तो दे…

चुलकुले 351 - 375

चुटकुला क्रमांक *********************************** # 0351
अंधा प्यार... पति- 'क्या खाना बनाया है तुमने, सब्जी कच्ची और रोटी जली हुई है।
पत्नी- 'तुम स्वयं कहते नहीं हो कि प्रेम...।
पति- '...अंधा होता है, पर इतना तो नहीं कि कच्चा-जला भी न दिखे। शहर प्रेमी तो पक्का है न कि हम आज रात 2 बजे शहर छोड़कर भाग जाएँगे। तुम लेट
मत होना।
प्रेमिका तुम फिक्र मत करो, मेरे पति मेरा सामान बाँध रहे हैं।डर... मोनू- 'पापा, आप हाथी से डरते हैं?
पिता- 'नहीं बेटा।
मोनू- 'आप शेर से डरते हैं?
पिता- 'नहीं बेटा।
मोनू- 'भूत से?
पिता- 'नहीं।
मोनू- 'यानी आप मम्मी के सिवा किसी से नहीं डरते।चुटकुला क्रमांक *********************************** # 0352
जिम्मेदारी... एक बच्चे ने अपने पापा से पूछा- 'पापा मुंबई कहाँ है?
पापा का जवाब था- 'बेटे अपनी माँ से पूछो, वे ही सारी चीजें संभालकर रखती हैं।चुटकुला क्रमांक *********************************** # 0353
खोया हलवाई ने कविता लिखी यो, तुम्हारे रूप की चाशनी में मन को डुबोया है
मक्खन-सी देह, मलाई-सा रंग है, मन 'खोया-खोया है।चुटकुला क्रमांक ***…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


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