रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

September 2006
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari

.
बाल कथा

लोहे के पंजों वाला बच्चा

- ब्रजेश कानूनगो

चुन्नू दौड़ता हुआ अपने घर में घुसा. उसके एक पैर के पंजे से खून बह रहा था. उसको पता ही नहीं था कि उसके पैर में चोट लगी है और खून बह कर फ़र्श को भी लाल कर रहा है. चुन्नू की मम्मी ने जैसे ही फ़र्श की और देखा, वे चौंक पड़ीं.

‘इसका मतलब चुन्नू को आज भी चोट लगी है.' वे बड़बड़ाती हुई चुन्नू के कमरे में पहुँचीं. चुन्नू जल्दी-जल्दी आलमारी से गेंद और बल्ला निकाल रहा था.

‘चुन्नू, तुम्हारे पैर में चोट लगी है और तुम्हें पता ही नहीं है?' चुन्नू की मम्मी ने घबरा कर चुन्नू से कहा.

‘अरे!'. आश्चर्य से चुन्नू अपना पंजा देखने लगा. लाल-लाल खून देखकर उसे रोना आ गया.

चुन्नू की मम्मी ने चुन्नू के पाँव को देखा. तलवे में कांच चुभने का स्पष्ट निशान था और खून बह रहा था. चुन्नू की मम्मी ने तुरंत उसका घाव दवा से धोया और मरहम-पट्टी कर दी. और चुन्नू को बाहर जाकर खेलने से मना कर दिया.

चुन्नू को जब तब पैरों में लगती ही रहती थी. उसकी मम्मी उसे समझा-समझा कर परेशान हो चुकी थी कि खेलते-घूमते कैनवस के जूते पहना करे या स्लीपर पैरों में डालकर घूमे फिरे. मगर चुन्नू पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था. वह खेलने की जल्दी में मम्मी की बात पर ध्यान नहीं देता और नंगे पैर मैदान की ओर दौड़ जाता. नतीजा यह होता कि कभी कांच के टुकड़े, तो कभी कील या लोहे की कतरन उसके पैरों को जख्मी बना देते.

शाम को चुन्नू की मौसी लखनऊ से आई. चुन्नू को अपनी मौसी से विशेष लगाव था. मौसी बहुत बातूनी थी और रात को चुन्नू को अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाया करती थी. चुन्नू के पैर में पट्टी बंधी देख उन्होंने चुन्नू की मम्मी से चोट का कारण पूछा. चुन्नू की मम्मी ने सारी बात मौसी को बताई और कहा कि हर तरह से वे चुन्नू को समझाने में असफल रही हैं कि वह नंगे पैर बाहर नहीं घूमा करे.

उस रात चुन्नू जब मौसी के पास कहानी सुनने आया तो उसकी मौसी ने कहा कि आज वे एक ऐसे लड़के की कहानी सुनाएंगी जिसके पैर अपनी गलतियों के कारण लोहे के बन गये थे. चुन्नू आश्चर्य से अपनी मौसी को देखने लगा.

.

.

मौसी ने कहानी शुरू की, ‘एक लड़का बड़ा शैतान था. अपनी मां की बातों पर अमल नहीं करता था. उसकी मां समझती कि सड़कों पर वह नंगे पैर न घूमे, मगर वह मां की हिदायत टाल देता. उसके पैरों में नंगे पैर घूमने की वजह से कभी कांच के टुकड़े तो कभी पत्थर या लोहे की छीलन-कीलें चुभ जाया करती. मगर वह उनकी परवाह नहीं करता. कुछ दिनों बात उसके पैरों में कठोरता आने लगी. धीरे-धीरे कठोरता बढ़ती ही गयी और एक दिन उसने महसूस किया कि उसके पैर के पंजे लोहे के बन गए हैं.'

चुन्नू बड़े ध्यान से कहानी सुन रहा था. कहानी उसको अपनी लग रही थी, इसलिए उसकी उत्सुकता भी बहुत बढ़ गई थी. वह सोच रहा था, काश उसके पैर भी लोहे के हो जाएँ, तो उसे किसी बात की परवाह न रहे. न जूते-चप्पल पहनने की किल्लत, न कांच-पत्थर-कीलें चुभने का डर.

चुन्नू की मौसी ने कहानी आगे बढ़ाई, ‘लोहे के पंजे पाकर पहले तो वह लड़का बहुत खुश हुआ. मगर धीरे-धीरे वे उसके लिए परेशानी बन गयी. भारी भरकम पंजे उठाते-उठाते उसकी टांगें दुखने लगती. उसके दोस्त उसे लोहे की टांगों वाला दानव बच्चा कहकर चिढ़ाने लगे.'

‘एक दिन उस लड़के के पंजे, एक ऐसे चुंबक के संपर्क में आ गए कि उसके पंजों में भी चुंबकत्व आ गया. अब उसके पंजों के संपर्क में जो भी लोहे की चीज आती, चिपक जाती. जहाँ-जहाँ वह जाता, लोहे की कतरनें, कीलें, ब्लेड वगैरह उसके पीछे-पीछे पंजों से चिपक कर घिसटने लगते.'

चुन्नू की मौसी की कहानी अभी इतनी ही हुई थी कि चुन्नू की घबराहट बढ़ने लगी और इसी घबराहट में उसको नींद आ गई.

सपने में भी उसे उसी लड़के की कहानी दिखती रही, उसे लगा जैसे कहानीवाला लड़का और कोई नहीं, स्वयं वही हो. अगर सचमुच ऐसा ही गया तो? उसके पैरों में अगर सारे मोहल्ले का कचरा चिपकता रहा तो? धीरे-धीरे वह इतना भारी हो जाएगा कि उसका एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल होगा. अचानक सपने में ही वह चिल्ला पडा, ‘नहीं! नहीं!'

उसकी नींद खुल गई थी. सुबह हो चुकी थी. रसोईघर में मम्मी चाय बना रही थी. वह दौड़ता हुआ मम्मी के पास पहुँचा और बोला, ‘मम्मी, मैं अब कभी नंगे पाँव बाहर नहीं घूमूंगा.'

चुन्नू की मौसी दूर खड़ी मुस्करा रही थी. उन्होंने बहुत ही बुद्धिमानी से चुन्नू को सबक सिखा दिया था.

फिर चुन्नू को कभी नंगे पाँव घूमते-खेलते नहीं देखा गया.

--*--

रचनाकार - ब्रजेश कानूनगो के देश की तमाम प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में सन् 1976 से बाल-कथाएँ, व्यंग्य रचनाएँ तथा कविताएँ लगातार प्रकाशित. वर्ष 1995 में व्यंग्य संग्रह ‘पुनः पधारें' तथा वर्ष 1999 में ‘वसुधा' की अनुषंग पुस्तिका के रूप में ‘धूल और धुएँ के परदे में' कविता पुस्तिका प्रकाशित. प्रस्तुत रचना -- स्टेट बैंक ऑफ इन्दौर , समाज सेवा प्रकोष्ठ द्वारा प्रकाशित अव्यावसायिक बाल कथा पुस्तिका - ‘फूल शुभकामनाओं के' से साभार.

.
चुटकुला # 0601

पति (पत्नी से)- प्रिय, कान में कुछ ऐसी मीठी बात कह दो, जिससे कि
मेरे पांव जमीन पर ही न पड़े।
पत्नी (कान के पास जाकर झुंझलाते हुए)- जाओ फांसी लगा लो।

चुटकुला # 0602

पत्नी (पति से)- शादी पर जो तुमने सोने की अंगूठी दी थी, वह आज कही
गिर गई।
पति (पत्नी से)- आज ही मेरे कोट की जेब से सौ रुपए चोरी हुए, खैर कोई
बात नहीं।
पत्नी(पति से) - क्यों?
पति (पत्नी से)- तुम्हारी अंगूठी मिल गई।
पत्नी (खुश होकर)- सच कहां मिली?
पति (पत्नी से)- उसी जेब में से, जिसमें से सौ रुपए गायब हुए है।

चुटकुला # 0603

पत्नी (पति से)- इस बस के कंडक्टर ने मेरी बेइज्जती की है।
पति (पत्नी से)- भला वह कैसे?
पत्नी (पति से)- जब मैं बस से उतरी तो कंडक्टर ने कहा तीन सवारियां
इस सीट पर आ जाए।

चुटकुला # 0604

मुकेश ने अपने दोस्त सुरेश से पूछा- पत्नी को पति के जीवन की
आधारशिला क्यों माना जाता है?
‘इसलिए कि वह शिला पति से टकराती रहती है।‘ सुरेश ने मुस्कराते हुए
जवाब दिया।

चुटकुला # 0605

पत्नी (पति से)- इतनी देर हो गई, आखिर क्या ढूंढ रहे हो?
पति (पत्नी से)- कुछ नहीं।
पत्नी (पति से)- कुछ तो खोया है! चार घंटे से मैंरिज सर्टिफिकेट को
उलट-पलट रहे हो।
पति (पत्नी से)- देख रहा हूं कि इसकी एक्सपायरी डेट कहां है?

चुटकुला # 0606

मुकेश ने अपने दोस्त सुरेश से पूछा- पत्नी को पति के जीवन की
आधारशिला क्यों माना जाता है?
‘इसलिए कि वह शिला पति से टकराती रहती है।‘ सुरेश ने मुस्कराते हुए
जवाब दिया।

चुटकुला # 0607

चिंटू (मां से)- आपने कहा था कि परियो के पंख होते है और वह उड़
सकती है?
मां (चिंटू से)- हां, वह उड़ सकती है।
चिंटू (मां से)- कल रात डैडी नौकरानी से कह रहे थे कि तुम परी हो, वह
कब उड़ेगी?
मां (गुस्से से)- बेटा वह कल सुबह होते ही उड़ जाएगी।

चुटकुला # 0608

बीमा कंपनी के एक एजेट से एक साहब ने आकर पूछा- यदि मैं अपनी
पत्नी का बीमा कराऊं और कल वह मर जाये तो मुझे क्या मिलेगा?
बीमा एजेट ने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया- जेल या फांसी।

चुटकुला # 0609

नाई ने एक ग्राहक से पूछा, ‘बाल कितने छोटे कर दूं, साहब?‘
‘इतने छोटे कर दो कि मेरी श्रीमति जी की पकड़ में न आएं। ग्राहक ने
बालों पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया।

घर में कलह होने के बाद पति ने गुस्से में पंखे से रस्सी का फंदा
लटकाया और स्टूल पर चढ़कर गले में डालने को तैयार हो गया, पत्नी
बोली- जो कुछ करना है जल्दी तय कर लो।
पति (पत्नी से)- मुझे तुम शांति से मरने भी न दोगी?
पत्नी (पति से)- मुझे स्टूल की जरूरत है।

चुटकुला # 0610

रेखा (मीना से)- ‘मैंने सुना है कि तुम्हारे पति को नींद में चलने की
बीमारी है।‘
मीना (रेखा से)- ‘हां...... है तो, मगर घबराने की बात नहीं है।‘
रेखा (मीना से)- ‘क्यों?‘
मीना (रेखा से)-‘क्योंकि वे इतने आलसी है कि दो-चार कदम चलकर फिर
लेट जाते है।‘

चुटकुला # 0611

मीता (सीमा से)- तुम्हारी हैदराबाद यात्रा कैसी रही?
सीमा (मीता से)- अरे क्या बताऊं। रास्ते में मेरे पति पानी लेने उतरे
और गाड़ी चल दी। वह स्टेशन पर ही रह गये।
मीता (सीमा से) मैं समझ रही हूं तुम्हारी पीड़ा। इतने लंबे सफर में तुम्हें
प्यासा ही रहना पड़ा।


चुटकुला # 0612
एक शराबी की पत्नी मर गई, तो उसके रिश्तेदारों ने पूछा- क्यों भाई, दवा
दारू नहीं की थी क्या?
शराबी (रिश्तेदारो से) - दारू पीकर ही तो दवा दी थी!

चुटकुला # 0613

बीमा कंपनी के एक एजेंट से एक साहब ने आकर पूछा- यदि मैं अपनी
पत्नी का बीमा कराऊं और कल वह मर जाये तो मुझे क्या मिलेगा?
बीमा एजेंट ने बड़े इत्मीनान से उत्तर दिया- जेल या फांसी।

चुटकुला # 0614

पत्नी (पति से)- ‘शादी पर जो तुमने सोने की अंगूठी दी थी, वह आज
कही गिर गई।‘
पति (पत्नी से)- ‘आज ही मेरे कोट की जेब से सौ रूपए चोरी हुए, खैर
कोई बात नहीं।‘
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- तुम्हारी अंगूठी मिल गई।
पत्नी (खुश होकर)- सच कहां मिली?
पति (पत्नी से)- उसी जेब में से, जिसमें से सौ रूपए गायब हुए थे।

चुटकुला # 0615

पति ने पत्नी से एक कप चाय बनाने के लिए कहा।
पत्नी (पति से) - तुम खुद बना लो।
पति (पत्नी से)- मेरे सिर में दर्द है।
पत्नी (पति से)- मेरे गले में दर्द है।
पति (पत्नी से)- ठीक है तो तुम मेरा सिर दबा दो, मैं तुम्हारा गला दबा
देता हूं।

चुटकुला # 0616

मीता (अपनी सहेली सीमा से) - तुम्हारी हैदराबाद यात्रा कैसी रही?
सीमा (मीता से)- अरे क्या बताऊं। रास्ते में मेरे पति पानी लेने उतरे
और गाड़ी चल दी। वह स्टेशन पर ही रह गये।
मीता (सीमा से)- मैं समझ रही हूं तुम्हारी पीड़ा। इतने लंबे सफर में तुम्हें
प्यासा ही रहना पड़ा।


चुटकुला # 0617
पत्नी (पति से) - अजी, क्या यह सच है कि रुपये-पैसे बोलते है?
पति (पत्नी से)- हां, कहते तो ऐसा ही है।
इस पर पत्नी बोली- तो फिर तुम मुझे कुछ पैसे दे जाना। मैं घर में
अकेली बैठी बोर होती रहती हूं।

चुटकुला # 0618

पत्नी ने उलाहने भरे स्वर में कहा, ‘अगर तुम अक्ल से काम लेते तो हर
महीने इतनी बचत कर लेते कि मेरे लिए कम से कम दो साड़ियां अवश्य
खरीद लेते।‘
‘अगर मैं अक्ल से काम लेता तो मुझे साड़ियो को खरीदने की कभी नौबत
ही नहीं आती।‘ पति ने मुस्कुरा के जवाब दिया।

चुटकुला # 0619

पत्नी (पति से)- जब भी तुम स्कूटर मोड़ते हो, तो मुझे बहुत डर लगता
है।
पति (पत्नी से)- तो इसका मतलब यह है कि तुम भी मेरी तरह डरपोक
हो। मैं तो मोड़ पर आंखे बंद कर लेता हूं। आगे से तुम भी ऐसा ही किया
करो।

चुटकुला # 0620

एक साहब ने कैमिस्ट से दवाइयां खरीदते समय उससे कहा, ‘दवाइयों को
अलग-अलग लिफाफे में रखकर उस पर लिख दीजिए कि कौन सी मेरी
बीवी की है और कौन सी मेरे कुत्ते की।
मैं नहीं चाहता कि दवाएं बदल जाएं और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाये।‘

चुटकुला # 0621

पति-पत्नी फिल्म देखने गये, तो पति ने एक पान पत्नी के लिए खरीदा।
पत्नी (पति से)- ‘एक अपने लिए भी तो ले लो।‘
पति (पत्नी से)- ‘मैं बिना पान खाये भी खामोश रह सकता हूं।‘

चुटकुला # 0622

नाई ने एक ग्राहक से पूछा, ‘बाल कितने छोटे कर दूं, साहब?‘
‘इतने छोटे कर दो कि मेरी श्रीमती जी की पकड़ में न आएं। ग्राहक ने
बालों पर हाथ फेरते हुए जवाब दिया।‘


चुटकुला # 0623
बस में बैठे एक साहब को बार-बार छीक आ रही थी लेकिन हर बार वे
उसे जबरदस्ती रोक लेते थे। उनकी हालत देखकर बगल में बैठे एक
सज्जन ने उनसे कहा, ‘आप एक बार कायदे से छींक क्यों नहीं लेते?‘
‘कैसे छीकूं.... मेरी बीवी ने मुझसे कहा था कि जब आपको छींक आए तो
समझना कि मैं तुम्हें याद कर रही हूं और जल्द ही तुम्हें अपने पास
बुलाने वाली हूं।‘ साहब बोले। ‘तो इसमें दिक्कत क्या है?‘
बगल वाले सज्जन ने फिर पूछा।
‘अब क्या बताऊं, असल में मेरी बीवी को मरे दो साल हो गए है और
फिलहाल मैं मरकर उसके पास नहीं जाना चाहता।‘

चुटकुला # 0624

पत्नी (पति से)- तुमने कभी सोचा है कि मेरी शादी किसी और से हो
जाती तो क्या होता?
पति (पत्नी से)- मैं कभी दूसरों का बुरा नहीं सोचता।

.


.

चुटकुला # 0625

शीला ( रमा से)- तुम्हारे हसबैंड पाइप से चढ़कर ऊपर अपने घर में क्यों
जा रहे है?
रमा (शीला से)- जब तक इनकी टांग का प्लास्टर खुल न जाए, डॉक्टर ने
इन्हें सीढ़ियां चढ़ने उतरने से मना किया है।


चुटकुला # 0626
जज (महिला से)- तुमने अपने पति के सिर पर कुर्सी दे मारी और वह टूट
गयी?
महिला (जज से)- जी हां, मगर यह मेरा इरादा नहीं था।
जज (महिला से)- यानी तुम्हारी नीयत पति पर हमला करने की नहीं थी।
महिला (जज से)- जी नहीं, मेरी नीयत कुर्सी तोड़ने की नहीं थी।

चुटकुला # 0627

वृद्ध पति की पत्नी अपनी सहेली से बोली- ‘मैंने अपने पति की दांतों से
नाखून काटने की आदत छुड़ा दी है।‘
सहेली ने पूछा - ‘कैसे?‘
‘मैंने उनके दांत छिपाकर रख दिये है।
चुटकुला # 0628
पत्नी (पति से)- जब मैं मर जाऊंगी, तो तुम क्या करोगे?
पति (पत्नी से)- मैं भी मर जाऊंगा।
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- क्योंकि कई बार ज्यादा खुशी से भी आदमी मर जाता है।

चुटकुला # 0629

पत्नी (पति से) - क्या बात है, जब भी तुम अपने ससुराल जाते हो, बहुत
सहमे से रहते हो? जब शादी करने गए थे, उस दिन तो बहुत अकड़ रहे
थे।
पति (पत्नी से)- उस दिन मैं अकेला नहीं था, पूरी बारात के साथ था।

चुटकुला # 0630

पति (पत्नी से)- यह शीशा तुम्हारे कारण टूटा है।
पत्नी (पति से)- बिल्कुल नहीं, तुम्हारे कारण टूटा है। मैंने तुम्हें फूलदान
फेककर मारा था, यदि तुम अपनी जगह से नहीं हटते तो शीशा कभी नहीं
टूटता।

चुटकुला # 0631

पत्नी (पति से)- तुम बहुत फिजूलखर्ची करते हो।
पति (पत्नी से)- तुम यह कैसे कह सकती हो?
पत्नी (पति से)- तुम जो आग बुझाने वाला यंत्र खरीदकर लाये हो, वह
अभी तक एक बार भी काम नहीं आया।

चुटकुला # 0632

लंबे आपरेशन के बाद बेहोशी टूटने पर एक मरीज ने आंखे खोलकर
कमजोर लहजे में कहा- मैं कहां हूं, क्या स्वर्ग में पहुंच गया हूं?
पत्नी (पति से)- नहीं प्यारे, अभी फिलहाल तुम नरक में हो।
पति (पत्नी से)- सबूत?
पत्नी (पति से) - क्या मैं सबूत के तौर पर कम हूं?

चुटकुला # 0633

सैनिको की पत्नियां अपने पतियों की बहादुरी का बखान कर रही थी।
एक बोली, ‘मेरे पति ने हाल ही के युद्ध में बहुत बहादुरी का परिचय दिया
था। उन्होने तो एक दुश्मन की टांग ही काट डाली थी।‘
दूसरी महिला ने पूछा, ‘पर टांग क्यों?‘ सिर क्यों नहीं?
इस पर पहली बोली, ‘क्योंकि उसका सिर तो पहले से ही कटा हुआ था।‘

चुटकुला # 0634

मीना (राकेश से)- उसने आत्महत्या कर ली और उसे आत्महत्या करनी
पड़ी। इन दोनो में अंतर बताओ।
राकेश (मीना से)- पहले वाक्य से व्यक्ति के अविवाहित होने और दूसरे
वाक्य से उसके विवाहित होने का पता चलता है।

चुटकुला # 0635

पत्नी (पति से)- मेरे पिताजी जब गाते थे तो उड़ते हुए पंछी गिर जाया
करते थे।‘
पति (पत्नी से)- ‘क्या तुम्हारे पिताजी मुंह में कारतूस भर कर गाते थे।‘

चुटकुला # 0636

पति (पत्नी से)- ‘अभी मीना की शादी की क्या जल्दी है? बहुत समय पड़ा
है। जब तक कोई अच्छा लड़का न मिले तब तक हमें बाट देखनी चाहिए।‘
पत्नी (पति से)- ‘बाट भी कब तक देखी जा सकती है? जब मैं शीला की
उम्र की थी तो मेरे घरवालों ने ही अच्छा लड़का मिलने का इंतजार कहां
किया था?‘

चुटकुला # 0637

राकेश (मीना से)- उसने आत्महत्या कर ली और उसे आत्महत्या करनी
पड़ी। इन दोनो में अंतर बताओ।
मीना (राकेश से)- पहले वाक्य से व्यक्ति के अविवाहित होने और दूसरे
वाक्य से उसके विवाहित होने का पता चलता है।

पत्नी (पति से)- मैंने दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला को देखा, उस पर
वो कपड़े खूब फब रहे थे।
पति (पत्नी से) अच्छा, फिर?
पत्नी (पति से)- फिर क्या? मैं आइने के सामने से हट गई।

चुटकुला # 0638

पति (पत्नी से)- आज ऑफिस में सारा दिन तनाव रहा।
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- पहले मिला काम का ढेर, फिर बॉस की डांट और फिर
टिफिन में कद्दू की सब्जी।

चुटकुला # 0639

पति (पत्नी से)- मैं बेवकूफ था, जो मैंने तुमसे शादी की।
पत्नी (पति से)- बिल्कुल। दरअसल, मैं प्यार में इस कदर डूबी थी, कि
मैंने नोटिस ही नहीं किया।

चुटकुला # 0640

पति (पत्नी) - सामने खिड़की में जो तोता-मैना बैठे है, दोनों रोज यहां
आते है। संग-संग बैठते है, चहचहाते है और एक हम है, हमेशा लड़ते ही
रहते है।
पत्नी - तुमने एक चीज पर ध्यान नहीं दिया। यहां बैठने वाले जोड़े में से
तोता तो रोज वही होता है पर मैना हमेशा नई होती है।

चुटकुला # 0641

पी (पति से) - अगर कोई बदमाश मुझे भगाकर ले जाएगा तो तुम क्या
करोगे?
पति (पी से) - मैं उससे कहूंगा कि भगाने की क्या जरूरत है ऐसे ही ले
जाओ।

चुटकुला # 0642

पति (पत्नी से)- पिछले एक घंटे से चाय का इंतजार कर रहा हूं। इतनी देर
तक तुम बालकनी में क्या कर रही थी?
पत्नी (पति से)- पड़ोस वाली मिसेज शर्मा से बातें कर रही थी।
पति (पत्नी से)- इतनी देर तक जब बात करनी थी तो उन्हें घर ही क्यों
नहीं बुला लिया?
पत्नी (पति से)- मैंने उनसे कहा था, पर वह बोली मेरे पास समय नहीं है।

चुटकुला # 0643

पत्नी (पति से)- कितनी बार कहा है कि अपने बालों में खिजाब लगाओ,
बुड्‌ढे नजर आते हो।
पति (पत्नी से)- अरे भाग्यवान! अगर मैंने बालों में खिजाब लगा लिया तो
लड़कियों से बेधड़क बात नहीं कर पाऊंगा।

चुटकुला # 0644

पति - ‘ऐसे जीवन से तो अच्छा है कि मैं मर जाऊं प्रभु, तू मुझे उठा
ले।'
पत्नी - ‘भगवान इनसे पहले मुझे उठा ले।'
पति - ‘प्रभु, तू इसकी सुन, मैं अपनी अर्जी वापस लेता हूं।'

चुटकुला # 0645

पति (पत्नी से)- ‘कल तुम मायके गई थी कि रात घर में चोर घुस आए।
उन्होने मुझे खूब मारा-पीटा, यहां तक कि मुझे मुर्गा भी बना दिया।‘
पत्नी - ‘क्या आपने शोर नहीं मचाया?‘
पति - ‘मैं कोई डरपोक था जो शोर मचाता।‘

चुटकुला # 0646

पत्नी (पति से)- आज तो नयी कंघी खरीदनी ही पड़ेगी। पुरानी कंघी का
एक दांत टूट गया है।
पति (गुस्से मे) एक दांत टूट गया तो क्या तुम नयी कंघी खरीदोगी?
पत्नी (पति से)- चीखो मत। खरीदनी तो पड़ेगी ही। वह कंघी का आखिरी
दांत जो था।

चुटकुला # 0647
घर में कलह होने के बाद पति ने गुस्से में पंखे से रस्सी का फंदा
लटकाया और स्टूल पर चढ़कर गले में डालने को तैयार हो गया।
पत्नी (पति से)- जो कुछ करना है जल्दी तय कर लो।
पति (पत्नी से)- मुझे तुम शांति से मरने भी न दोगी?
पत्नी (पति से)- मुझे स्टूल की जरूरत है।

चुटकुला # 0648

मरते हुए पुरूष ने अपनी पत्नी को अपने पास बुलाया और धीमें से बोला-
रमा, मेरे मरने पर दुकान मोहन के सुपुर्द कर देना।
पत्नी (पति से)- मोहन! उससे अच्छी तो मुकेश दुकान चलायेगा।
पति ने बात मान ली। ‘अच्छा, अच्छा। राम को मेरी कार दे देना।‘
पत्नी ने फिर सलाह दी- पर मेरे ख्याल में कार संजीव के पिता को चाहिए
उन्हें रोजाना सात मील दूर काम पर जाना पड़ता है।
पति - चलो, कार संजीव के पिताजी को ही दे देना, लेकिन मेरा यह
मकान महेश को दे देना।
इस पर पत्नी बोली- महेश को तो यह शहर पसंद ही नहीं है, मेरे विचार
में..........
पति से अब नहीं रहा गया। वह कराहा- रमा! एक बात बताओ, मर कौन
रहा है- मैं या तुम?

चुटकुला # 0649

पति (पत्नी से)- आज किसी ने मेरी जेब काट ली।
पत्नी (पति से)- तो पुलिस में रिपोर्ट की?
पति (पत्नी से)- नहीं, मैंने गलती कर दी।
पत्नी (पति से) - वह क्या?
पति (पत्नी से)- जेब कटने के तुरंत बाद मैंने उसे दर्जी से सिलवा लिया।

चुटकुला # 0650

पार्टी चल रही थी, मीना ने अपने पति को उंगली से अपनी ओर आने का
इशारा किया। पति आ गया और पूछने लगा, ‘क्या कोई काम था?‘
मीना (पति से)- काम तो कुछ नहीं था। बस मैं देखना चाहती थी कि
मेरी इस उंगली में कितनी ताकत है।‘


.
तरही शेर...

लफ़्ज के जून-अगस्त 06 अंक में ग़ज़ल लिखने के लिए तरह -

"तब लगा सर पे आसमान भी था"


समस्या-पूर्ति के रुप में दिया गया था.

इस दफ़ा पत्रिका ने उन तरही ग़ज़लों को प्रकाशित किया है. ग़ज़लें तो ख़ैर यहाँ प्रकाशित करना संभव नहीं है, हाँ, उन ग़ज़लों के खास ‘शेर' रचनाकार में प्रकाशित किए जा रहे हैं जिनमें इस ‘तरह' जैसे का तैसा इस्तेमाल किया गया है. आप देखेंगे कि इस ‘तरह' को शायरों ने किस बखूबी से, मनोरंजक तरीके से इस्तेमाल किया है.

**-**

बिजलियाँ आ के जब गिरीं छत पर
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अभय कुमार अभय

बाप का साया उठ गया सर से
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-पूरन अहसान

उठ गया जब ‘अनीस' का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अनीस अहमद खाँ ‘अनीस'

बेज़मीं कर दिए गए जब हम
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-डॉ. असलम इलाहाबादी

याद जब आया इम्तिहान भी था
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-सैयद मुहम्मद असलम

टूट कर जब गिरा अचानक वो
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-इब्राहीम अश्क

न रही जब जमीन पैरों में
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अज़ीज़ अय्यूब जयपुरी

.

.

मेरे हिस्से की उड़ गई जब छत
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-सतीश ‘बे-दाग़'

जब मेरे पाँव से जमीन खिसकी
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-मदन मोहन ‘दानिश'

जब उठा सर से बाप का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-देवेन्द्र अत्रि

उठ गया वालदैन का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अब्दुस्सलाम ‘कौसर'

जब हुए तलघरों के क़ैदी हम
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-केशव शरण

जबकि पैरों तले जमीं न रही
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-फसीउल्लाह ‘नक़ीब'

जब भी पैरों तले जमीं निकली
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-अब्दुल अहद साज

सायबां जब गुबार बन के उड़ा
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-खुर्शीद तलब

जब मिरा बाप हो गया रुख़सत
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

-गयास रहीम शकेब

और, पुरानी, मूल ग़ज़ल का शेर जिसमें से यह तरह उठाया गया था यह है-

सर पे जब आसमान टूट पडा
"तब लगा सर पे आसमान भी था"

- जावेद अकरम

*-**-*


अनूप भार्गव की कुछ कविताएँ

कविता 1
एक ज्यामितीय कविता
मैं और तुम
एक ही दिशा में
न जाने कब से चलती हुई
दो समान्तर रेखाएं हैं ।

आओ क्यों न इन
रेखाओं पर
प्यार का एक लम्ब डाल दें ?

मैं इसी लम्ब के
घुटनें पकड़ पकड़
शायद तुम तक
पहुँच सकूँ !

***-***
कविता 2

अगले खम्भे तक का सफ़र

याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था,
तुम आंखें बन्द कर के,
उँगलियों पर
कुछ गिननें का बहाना कर के
कहती थीं ,
बस उस अगले खम्भे तक और ।

आज बरसों के बाद
मैं अकेला ही
उस सड़क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब निगाह से देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता पूछ रहे हैं ,
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है

सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा इन्तजार कर रही होगी !


**-**

.


.


कविता 3

आशंका

मैं हर रोज़
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।

सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये मैं
एक बार फ़िर से लग जाता हूँ
नये मूल्यों और विश्वासों
को जन्म देनें में
ये जानते हुए भी
कि इन्हें कल फ़िर टूटना है ।

ये सब तब तक तो ठीक है
जब तक मेरा स्वयं
अपनें आप में विश्वास कायम है,
लेकिन डरता हूँ
उस दिन की कल्पना मात्र से
जब टूटते मूल्यों और विश्वासों
की श्रंखला में
एक दिन
मैं अपनें आप में
विश्वास खो बैठूँगा ।
***.***

ग़ज़ल 1
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ...

ख्वाबों को ऐसे सजाया है मैंने
हथेली पे सूरज उगाया है मैंने ।

आओ न तुम , तो मर्जी तुम्हारी
बड़े प्यार से पर बुलाया है मैंनें ।

लिखा ओस से जो तेरा नाम ले के
वही गीत तुम को सुनाया है मैंने ।

जीवन की सरगम तुम्ही से बनी है
तुझे नींद में गुनगुनाया है मैंने ।

मेरे आँसुओं का सबब पूछते हो
कतरा था यूँ ही बहाया है मेंने ।

**-**
रचनाकार - अनूप भार्गव को हाल ही में उत्तरप्रदेश के प्रतिष्ठित हिन्दी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है.
**-**
कलाकृति - रेखा की स्याही से बनी कलाकृति - निर्मल-प्रेम


रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ ताज़ी ग़ज़लें

ग़ज़ल 1

शब्दों की गूंज फिर मुझे दीवाना कर गई
सन्नाटा चीरती हुई दिल में उतर गई

दीवार पर लगी हुई तस्वीर बोल उठी
कमरे में एक अजीब सी खुशबू बिखर गई

बैरंग मौसमों का जमाना है आज कल
महके थे जिसमें जख़्म वह रूत भी गुजर गई

दो दिन की जिन्दगी में न बेदाग़ रह सके
ये जिन्दगी भी जीने का इल्जाम धर गई

मायूसियों ने घेर लिया फिर से रचश्री
उम्मीद की किरन भी न जाने किधर गई

**-**
ग़ज़ल 2

लालच की जिन्दगी तो कोई जिन्दगी नहीं
दरियाओं से भी प्यास ये बुझती कभी नहीं

हैं अपनी ख्वाहिशों के गुलाम अहले मयकदा
पीने की आरजू है मगर तिश्नगी नहीं

तुमको नहीं है होश मगर हमको होश है
जी भर के तुमने पी है मगर हमने पी नहीं

दौलत है जिनके पास वही बेसकून हैं
सब कुछ उन्हें मिला है पर आसूदगी नहीं

पतवार अपने हाथ में रखते जो रचश्री
कश्ती भँवर में फंस के कभी डूबती नहीं

**-**

ग़ज़ल 3

भूल जाना तो एक बहाना है
इस बहाने भी याद आना है

और तो कुछ नहीं है अपने पास
चंद यादों का एक खजाना है

जिन्दगी खूब है और कुछ भी नहीं
सिर्फ एक सांस का फसाना है

कौन रहता है इस सराय में
सब मुसाफिर हैं, सबको जाना है

आदमी आदमी का है दुश्मन
"रचश्री" यह अजब जमाना है

****

.


.

ग़ज़ल 4

मुझे आंखों में कोई और बसाया न गया
चैन खोकर भी तुझे दिल से भुलाया न गया

वादा यूँ टूटा कि विश्वास भी बिखरा मेरा
टूटे वादे से नया वादा बनाया न गया

अबके दीवाली की रात आई मगर तेरे बगैर
मुझसे आँगन में कोई दीप जलाया न गया

तेरा अहसान उठाया तो उठाया ऐसा
फिर किसी और का अहसान उठाया न गया

क्या ख़बर किसने चुराया है मेरा सब्रो करार
एक तेरे सिवा दिल में कोई आया न गया

"रचश्री" देख ही घर था मेरी महबूबा का
जिसकी दीवार का सिर से मेरे साया न गया

****


ग़ज़ल 5

दूर मंजिल नहीं, हौसला चाहिए
अब रुकावट है क्या देखना चाहिए

हम हवा की तरह हैं, ठहरते नहीं
पर्वतों में भी एक रास्ता चाहिए

देश ही में जिएँ देश पर ही मिटें
जिन्दगी में हमें और क्या चाहिए

अग्निबाणों का प्रयोग करना है अब
अब हमें शत्रु का सामना चाहिए

"रचश्री" यहाँ हो कोई भी जंग
वीरों की हमें वीरता चाहिए

****

ग़ज़ल 6

क्या खबर थी ऐसी आँधी आएगी
धूल मन दर्पन के ऊपर छाएगी

आएंगे घर में हवाओं के कदम
प्रेम के दीपक की लौ थर्राएगी

जिन्दगी में कर्म तुम करते रहो
यह न सोचो कर्म की ऋतु आएगी

बात है सिद्धांत की लेकिन उसे
अपनी दुनिया कब अमल में लाएगी

दिल दुखाकर चैन मिल सकता नहीं
दुःख की बदली सिर्फ दुःख बरसाएगी

कर्म अच्छे हैं तो अच्छा अंत भी
खूंट-कांटा है सदा तड़पाएगी

हम तो कांटों पर भी सो जाएँगे यार
और शोलों पर भी नींद आ जाएगी

अपने वायदे से मुकर जाएंगे दोस्त
क्या वह दिन भी दोस्ती दिखलाएगी

"रचश्री" सांसों के धागों में हमें
जाने कब तक जिन्दगी उलझाएगी

**-**

रचनाकार - रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें

रचना 1 रचना 2

**-**

चित्र - रेखा की कलाकृति - स्याही से बनी - गांव




बलि

- स्वयं प्रकाश

घनी हरियाली थी, जहां उसके बचपन का गांव था. साल, शीशम, आम, कटहल और महुए के पेड़. ये बड़े-बड़े पेड़. पेड़ के नीचे खड़े होकर एकदम ऊपर देखो तो सूरज न दिखाई दे. चारों तरफ़ धान के खेत, छोटे-बड़े पोखर और कुछ दूर इच्छा नदी. लकड़ी-मिट्टी-घास-गोबर के मकान और केले के पेड़, लौकी-कद्दू की बेलें और बैगन-टमाटर की बाड़ी. हाथ-हाथ भर के काले बिच्छू और चार-चार गज के ज़हरीले सांप. पोखर में कूदती-फांदती मछलियां और चूल्हे पर चढ़ी काली हांड़ी में खदबदाता भात.

अगर सुख का मतलब पेट-भर भात और आंख-भर नींद ही होता है तो वह एक सुखी बचपन ही रहा होगा. था ही. पेट-भर भात और आंख-भर नींद से ज्यादा भी कुछ चाहिए होता है क्या?

परिंदे सुखी होते हैं, लेकिन वे भी लड़ते हैं पेड़ की एक शाखा विशेष के लिए...मादा विशेष के लिए...वहां भी लड़ाइयां थीं. कई साल पहले लिए कुछ रुपयों की ख़ातिर मर्द लड़ते...बच्चों को लेकर, घर के सामने कचरा फेंकने से लेकर बेटा-बहू पर टोना करने तक के अबूझ आविष्कृत कारणों पर औरतें, और मरद पर काबू रखने या उससे पिटने के लिए पत्नियां अपने पतियों से लड़तीं. लेकिन लड़ाइयां ठंडी, कसैली, एकरस, हूहू रातों में आत्मा को, जीवन को जगाए रखने के लिए ज्यादा होती थीं. लड़कर भी कोई पराया नहीं होता था. कितनी ही लड़ाई के बावजूद किसी पर किसी का अधिकार ख़त्म नहीं होता था.
छोटे-छोटे खेल थे. खेल के साधन थे पत्थर, मिट्टी, घास, पत्तों, चिड़ियाओं के पंख, फलों के बीज...लकड़ी के अटपटे खिलौने...क्या ख़ज़ाना था जिसे छाती से लगाकर रखा जाता था. खेल माने शर्त बदकर नदी पार करना... किसी का बछड़ा खोल देना...किसी का कटहल चुरा लेना...किसी को कीचड़ में धक्का दे देना...खिल-खिल...खिल-खिल...


कहानियां थीं. उनमें भूत-प्रेत-चुड़ैल-डाकन, पंखों वाले सांप, परियां और राजा-रानी बहुत पास थे...बीस किलोमीटर दूर आबाद ज़िला मुख्यालय सुंदरगढ़ बहुत दूर था. उसका मानो अस्तित्व ही नहीं था. अस्तित्व को मानो उसकी आवश्यकता ही नहीं थी.

फिर देखते-ही-देखते सब कुछ बदल गया. टोप पहने कुछ लोग जीप और ट्रक में बैठकर आए और जगह-जगह तंबू लगाकर रहने लगे. वे मशीन से ज़मीन में घर्रर्र छेद करते और पत्थर की पूरी लाठी निकालकर डिब्बे में रखकर कहीं भेज देते. फिर कुछ दिन बाद कुछ ज्यादा लोग आए. उन्होंने गांव के मरदों से बात की. उन्हें भात चाहिए, मुर्ग़ा चाहिए, दारू चाहिए, रास्ता दिखाने वाला चाहिए. उन्होंने बताया, ज़मीन के नीचे ख़ज़ाना है. ख़ज़ाना माने कुदाल से खोदने से नहीं चलेगा. सिक्के नहीं हैं. मोहरें-अशर्फियां नहीं हैं. धातु का पत्थर है. पत्थर क़ीमती है. उसे निकाला जाएगा और उससे सीसा बनाया जाएगा. वही...जिससे बंदूक़ की गोली बनती है.

देखते-ही-देखते वहां एक कारख़ाना बन गया. पेड़ कटे. उनकी जगह पक्के मकान खड़े हो गए. भूमि समतल कर दी गई. बड़ी-बड़ी मशीनें. मकान...और मकान के बीच भी डामर की सड़क. सारी ज़िंदगी बदल गई. अब ख़ूब मुर्ग़े चाहिए. भात चाहिए. काम करने वाले आदमी चाहिए. पहली बार बड़े-बड़े नोट देखने को मिले. घर-घर मारामारी. और अंडे...और मुर्ग़े...और मछली और भात.

पतलून पहने आदमी...जूते पहने बच्चे... गोरे-गोरे...और सिनेमा के परदे से मानो निकलकर आई हों ऐसी औरतें.

लेकिन जब ग्रामलक्ष्मी ने एक बार जाना शुरू किया तो दूसरे रास्ते से दबे पांव दरिद्रता भीतर घुस आई. अब जो कुछ अच्छा था...सब बेचे जाने के लिए था. अपने उपभोग के लिए नहीं. न दूध न माछ. न सब्जी न भात. अब रुपए थे और भस्मासुरी इच्छाएं. मरद दिन-भर साहब लोगों के पीछे-पीछे कुत्तो की तरह घूमते थे और हर रात दारू में धुत्ता नज़र आते थे. खेत पड़े रहते थे उपेक्षित. महिलाएं जो जितना कर पातीं उसी से घर चलता था. कइयों की ज़मीनें चली गईं. बदले में कुछ नोट और नौकरी का आश्वासन. ख़जाना है भी क्या? क्या हम उसे छू सकते हैं? देख सकते हैं? हां-हां, क्यों नहीं! चाहें तो ले भी जाइए. पर यह तो पत्थर है. कुछ चमकता है बस! क्या इसे चूल्हे में डालने से...नहीं-नहीं...वह सब बड़ा प्रोसेस है. वह सब यहां नहीं होगा. दूसरे कारख़ाने में भेजा जाएगा.
अब झगड़े होते रोज़. और कड़वे. गाली- गलौच. अबोलाबोली. लंबे मुनमुटाव. गांव के लड़के साहब लोगों की नक़ल करते. सुंदरगढ़ से पतलून सिलवाकर लाते. सिगरेट पीते. साइकिल की ज़िद करते. नौकरी का ख़वाब देखते. सड़क पर तरह-तरह के बाहर के लोग आने-जाने लगे. दूकाने खुलने लगीं. कोई कद्दू बेच रहा है, कोई चाय-भजिया. एक कद्दू का एक रुपया! माई रे! इन साहब लोगों के पास फेंकने के लिए कितना पैसा है! यह आरंभ था समाज के बाज़ार बनने की प्रक्रिया का. बच्चे भूखे रहते थे. चोरी करने के लिए हालात द्वारा उकसाए जाते थे और हमेशा के लिए गांव से मुक्त हो जाने का सपना देखते थे. जर्जर और कृशकाय औरतें सभ्य समाज का चालचलन जिन नज़रों से देखती थीं, उनमें कुतूहल कम होता था, भय ज्यादा. अब तालाब पर कभी भी नहाने नहीं जाया जा सकता था...न दिशा-फरागत के लिए और यदि नदी में मछली थी, पेड़ पर फल, आसमान में परिंदा और धरती में जड़...तो ज़रूर उनकी भी कोई क़ीमत होगी. सोचना ज़रूरी था कि क्या?

यहीं और इसी समय में थी_लड़की.

उत्सुकता के मारे वे कुछ बच्चे साहब लोगों की कॉलोनी में चले गए थे. एक मकान में रेडियो बज रहा था. कोई गाना. वहीं खड़े हो गए. कैसी सुगंध आती है इन लोगों के घरों से. कैसी भीनी-भीनी. उसे खा जाने की इच्छा हो, ऐसी. कैसे गोल-गोल हाथ होते हैं इनके. कैसे रेशमी बाल. कितने सुंदर कपड़े_एकदम सिनेमा जैसे. मालकिन निकली थीं. इन्हें देखा था. आशंका से. चोरी तो नहीं करेंगी? फिर मुस्कराई थीं. जवाब में बच्चे भी बरबस मुस्करा दिए थे. मालकिन भीतर जाते-जाते पलटकर आई थीं. हाथ के इशारे से पास बुलाया था. काम करोगी? खाना देंगे. भात. पैसे भी देंगे.

सब बच्चे खिलखिलाकर भाग आए थे बगटुट.


कुछ दिन बाद सुना, मंगली एक मामी के घर काम करने लगी है._मामी क्यों? क्या वह तुम्हारे मामा की घरवाली है? नहीं, पर उसके बच्चे उसे मामी ही कहते हैं. तो मैं भी. अच्छा बताओ, क्या किया वहां? और क्या दिया उन्होंने तुम्हें खाने को?
मंगली का बाप नहीं था. मां बहुत बूढ़ी हो गई थी. उससे कुछ काम नहीं होता था. चार-चार दिन मांगे हुए नमक-मांड से गुज़ारा करना पड़ता था. कभी-कभी कोई मछली मिल जाती. या इस-उस घर की जूठन. बस, यही आसरा था. तन पर पूरे कपड़े नहीं थे. कहीं से होंगे, इसकी भी आशा नहीं थी. चेहरा लाश जैसा लगता था. बदन कटे पेड़ की सड़ी लकड़ी-सा. बातों में, सपनों में हर वक्त भूख-भूख. कौन उसके साथ खेलता! पर आने वाले महीने-भर के लिए वह गांव की लड़कियों के लिए हीरोइन बन गई. साहब लोग क्या खाते हैं, कैसे बोलते हैं, कैसे हँसते हैं, क्या करते हैं...क्या अपनी घरवाली को एकदम नहीं मारते? एक बार भी तुमने उन्हें मारते नहीं देखा?...क्या-क्या चीज़ है वहां? क्या तुमने ख़ुद देखा? छूकर देखा?...आदि-आदि.

फिर जब उसे उसकी मामी ने अपनी बेटी का एक पुराना फ्रॉक पहनने को दे दिया और साबुन का एक छोटा-सा टुकड़ा, कि नहाकर आना कल...तो मंगली अभागिन उत्सुकता की नहीं,र् ईष्या की चीज़ हो गई. साबुन खुश्बूदार था. सबने बारी-बारी सूंघकर देखा. फ्रॉक? अहा! कैसा नीला रंग था उस फ्रॉक का कि जिसे देखते ही पीने की इच्छा हो जाएगी. उस पर कुछ-कुछ लाल-सफेद फूल थे, जो बस हिलते भर नहीं थे...और एक खरगोश था... मुन्ना-सा...सफेद झक्क...गुलाबी गोल आंखों से बिटर-बिटर ताकता...जैसे अब फुदका कि तब. और कपड़ा कैसा मुलायम और रेशमी...जैसे किसी बछड़े का गलकंबल! बदन पर फ्रॉक हो तो बदन को कैसा महसूस होता होगा? उसे भी कई और लड़कियों की तरह लगा कि या तो मामी ने भूल से यह फ्रॉक मंगली को दे दिया है या यह चुराकर लाई है. या तो कल वह वापस मांग लेगी या यह फ्रॉक मंगली पहनकर जाएगी ही नहीं. देख लेना.
लेकिन दूसरे दिन मंगली वही फ्रॉक पहनकर काम पर गई और मामी ने उससे फ्रॉक वापस भी नहीं मांगा.

बस, उसी दिन लड़की ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया था कि चाहे जो हो जाए, वह भी काम करेगी और ऐसा ही फ्रॉक पाएगी. उसकी इच्छा के सामने अनेक बाधाएं थीं. पहली तो यह कि वह अभी छोटी थी, अपने घर का काम भी ठीक से नहीं कर पाती थी, झाडू की मूठ तक कसकर नहीं पकड़ पाती थी...और दूसरे यह कि वह मंगली की तरह बेआसरा या विपन्न नहीं थी. काश! कि वह बेआसरा और विपन्न होती! तब उसने ऐसा ही सोचा.

उसे चार साल लग गए इसमें. तब तक गांव की लगभग पच्चीस-तीस स्त्रियां-लड़कियां साहब लोगों के घर काम करने लगी थीं. तब तक साहब लोगों का भय पूरी तरह समाप्त हो गया था, लेकिन काफ़ी कुछ कुतूहल भी. तब तक कामवालियां भात और कपड़े के अलावा पैसे भी पाने लगी थीं और काम करने के अलावा चिरौंजी-काजू-चावल-माछ साहब लोगों को बिकवाने की दलाली भी. साहब परंपरागत ग्रामीण संस्कृति पर हमला करने वाला दुश्मन नहीं था अब, बल्कि एक मोटा मुर्गा था जिसका किसी भी तरह फ़ायदा उठाना था. तब तक लड़की का घर भी इतना विपन्न हो चुका था कि वह उठते-बैठते कारण-अकारण मां-बाप की डांट-मार खाने लगी थी.

सबसे पहले पंद्रह रुपए महीने पर बच्चा सम्हालने का काम किया लड़की ने. पंद्रह रुपया मामी ने अपने मन से कहा. लड़की पांच भी पाती तो प्रसन्न ही होती. दोपहर को भात-नमक दिया. बैंगन की सब्ज़ी भी. भात लड़की की ज़रूरत के हिसाब से कम था, लेकिन वह कुछ नहीं बोली. दरअसल उस पूरे दिन वह कुछ भी नहीं बोली. हां-ना का जवाब भी गरदन हिलाकर दिया. खूब सारी नई और कौतुकमय चीज़ों के बावजूद सच पूछो तो उसका मन नहीं लगा. पूरे समय एक तीन साल के बच्चे के पास बैठे रहो बस. इससे तो तालाब में नहाना, पेड़ों पर चढ़ना, भैंस की पूंछ मरोड़ना, पत्थर से इमली गिराना, खुली हवा में नीम के पेड़ की छांव में पसरकर सोना और गला फाड़कर हँसना-गाना यक़ीनन ज्यादा सुखद रहा होता.

घर में एक नौकरानी थी. जानकी मौसी. सारा काम वही करती थी. लड़की की देखा जाए तो वहां कुछ ख़ास ज़रूरत नहीं थी. लेकिन मामी एक जानकी मौसी के ही भरोसे नहीं रहना चाहती थी. मान लो, कल को जानकी भाग गई तो लड़की झाड़ू-पोंछा तो कर ही लेगी. कम-से-कम बच्चे को तो सम्हाल लेगी. फिर कुछ दिन में डांट पड़ने लगी_परे हट के बैठ, कालीन गंदा हो जाएगा. नहाकर आई? सिर क्यों खुजा रही है?...ठीक से पकड़ बेबी को. मुंह दूर रखाकर उसके मुंह से...सुबह लेटरीन जाकर साबुन से हाथ धोती है या नहीं?...शक्ल-सूरत नहीं दी भगवान ने तो कोई बात नहीं, कम-से-कम कपड़े तो
लड़की ऊपर से कुछ नहीं कहती, पर मन-ही-मन उसमें एक शत्रुभाव घनीभूत होता जाता, खाने को तो पूरा देती नहीं और रोब कैसा झाड़ती है! महीना पूरा होगा तब पंद्रह रुपया देगी. सो मेरे काम आएगा? मां ले लेगी वह तो. मैं तो उसमें से एक टिकुली भी नहीं ख़रीद पाऊंगी. कैसी-कैसी चीज़ें कचरे में फेंक देती है! उस दिन कचरे में से एक टिकुली निकालने लगी तो तुरंत टोक दिया_नहीं, उनमें से नहीं लो! चाहिए तो मांग लो...मांग लें. दो घंटे रगड़कर नहाएगी...फिर पॉउडर-क्रीम-लाली थोपेगी...खून जैसे होंठ और खून जैसे नाखून बनाएगी...फिर भी किसी से पूछ लो...मैं ही ज्यादा सुंदर दिखूंगी...ज़रा-सा खाएगी...और दिन-भर ढ ढ डकार लेगी. पता नहीं बच्चा कैसे जन दिया! एक दिन घर में झाड़ू लगानी पड़े तो हांफ जाए! कैसे साफ़-साफ़ कपड़े धोने के लिए डाल देती है. हमारे यहां किसी को ऐसी लुगाई मिल जाए तो दूसरे दिन झोंटा पकड़कर बाहर निकाल दे. हमारी ज़मीन से रुपा-सोना निकालकर मज़े मारते हैं और हमीं पर रुआब गांठते हैं!


लड़की के क्रोध को व्यक्त होने का कोई उपाय नहीं था. न मामी के घर, न अपने गांव में. काम से लौटकर आती तो प्रसन्नता का ही आवरण रखना पड़ता, वरना काम भी छूट जाता. क्या एक-से-एक खिलौने हैं. वह खुद भी चाभी भरकर चलाना सीख गई है_ऐसा ही बताती. कभी बच्चों को कमर पर टांगकर बाहर घूमने जाती तब अकेले में बड़बड़ाती. मन करता, बच्चे को ही नोच ले ज़ोर से.

एक बार नोच भी लिया. पर फिर वह जो रोया तो लड़की को लगा, गई उसकी नौकरी! भागी उस रोते बच्चे को कमर में टांगे दूर, ताकि उसके रोने की आवाज़ मामी के कानों तक नहीं पहुंच पाए. दो घंटे लग गए बच्चे को चुप कराने में. गाई, नाची, लाड़ लड़ाया, तरह-तरह के फूल दिए, फल दिए...और रोना बंद किया तो कैसे? एक कुत्तों के पिल्ले की कूं-कूं सुनकर...डरते-डरते उसकी पूंछ पकड़कर... घबराते-घबराते उसकी पीठ पर हाथ फेरकर.

मामी लड़की को ऐसी चीज़ों के लिए भी कोसती, जिन पर लड़की का कोई बस नहीं था. मसलन कहेगी, कैसी भाषा बोलते हो तुम लोग! जैसे लोटे में कंकड़ डालकर हिला रहे हो! या क्या वाहियात इलाक़ा है! पानी बरस रहा है तो बस पागलों की तरह बरसता ही जा रहा है! मार सीलन-ही-सीलन, कीचड़-ही-कीचड़! या जैसे 'यहां के अनाज में वह स्वाद ही नहीं है!' या जैसे 'ज़माना कहां-से-कहां पहुंच गया, ये वैसे-के-वैसे ही रहे! जंगली के जंगली!'

इन आक्षेपों का लड़की कोई प्रतिवाद नहीं कर सकती थी. लड़की को टूटकर बरसते पानी में तर-बतर भीगते हुए एक गांव से दूसरे गांव चले जाने में अपार आनंद की अनुभूति होती थी. वेग से हवा चलती तो शूं-शूं...झूं-झूं की आवाज़ आती. लगता, धरती पर नहीं किसी दिव्य लोक के रहस्य-रोमांच के बीच है. बिजली चमकती और बादल गरजते तो किसी से भी कसकर लिपटने को जी करता. पेड़ों के पत्तो और तने इधर-उधर झूमते-झुकते तो लगता, धरती को चंवर डुला रहे हैं. नदी-नाले पूरते तो लगता, अमृत की गागरें औंधी हुई हैं...ऐसे में कोई भी औरत प्याज़-बैंगन के गरम-गरम भजिए छानने या तर मालपुए उतारने के अलावा कुछ नहीं सोचेगी. घर के पिछवाड़े अरबी के पत्तो हों तब तो कहना ही क्या! और इसे देखो! यह वर्षा को ही कोस रही है!

लेकिन वर्षा ही क्यों, इसे तो यहां कुछ भी पसंद नहीं. इसे तो ग्वार-फली जानवरों के खाने की चीज़ लगती है. और पके कटहल में से उबकाई लेने वाली बदबू आती है. हमारी गायों का दूध इसे पानी जैसा लगता है और हमारे खेतों का अनाज बेस्वाद. हमारे उत्सव पिछड़ापन और हमारे परिधान जंगली!

लेकिन लड़की कुछ नहीं कर या कह पाती. कभी सोचती, कल नहीं आऊंगी. दूसरे दिन पाती कि आ ही गई है और तब कल का यह निश्चय याद आया है. बच्चा भी उससे हिल गया था. अब मां के पास भी नहीं रहता. मां कुछ देर लाड़ करती है, कुछ देर ठीक से बात करती है, फिर कुछ देर उपेक्षा करती है. और फिर जाने को कहती है, न जाए तो थप्पड़ मार देती है. बच्चा उसे चिपकू लगता है, रोतला लगता है. व्यवधान लगता है, इल्लत लगता है, आफत लगता है.

लड़की को नहीं लगता. लगता भी, तो वह क्या कर सकती थी? बच्चे को चिपकाए अथवा उठाए रखने और बच्चे से मां को आज़ाद रखने की ही वह उज़रत पाती थी. लड़का उस पर लदा रहता. दो क़दम पैदल नहीं चलता. कभी उसकी नाक पड़ता, कभी कान खींचता, कभी गाल खरोंचता, कभी बालों को मुट्ठी में भर लेता. लड़की हर बार प्रसन्न रहने को बाध्य थी. क्रीत थी.

फिर एक दिन लड़की नहीं गई. उसने कहा कि उसकी तबीयत ठीक नहीं है. मां ने ज्यादा पूछा-पाछी नहीं की. कभी-कभी मांएं ज्यादा पूछा-पाछी नहीं भी करतीं. होता ही है. उस दिन लड़की ने सोचा था कि खूब मौज-मस्ती करेगी. सहेलियों के साथ दिन-भर धमाचौकड़ी मचाएगी. आसमान को सिर पर उठा लेगी. इतने दिनों की सारी कसर पूरी कर लेगी. लेकिन वैसा कुछ भी नहीं हो पाया. साथ की लड़कियां मिल ही नहीं पाईं. कई तो काम पर गई थीं. जो नहीं भी जाती थीं वे उछल-कूद मचाने की बजाय एक पेड़ की घनी छांव में छिपी बैठी गप्पें मार रही थीं. वे शरमा रही थीं. किसी मामी ने किसी लड़की को अपनी पुरानी ब्रेसरी पहनने के लिए दे दी थी. अब इस वक्त और इस स्थान पर उसे पहनकर देखने की समस्या सुलझानी थी. फिर उन्होंने मामियों के बारे में सुने-सुनाए क़िस्से शुरू कर दिए_कि मामियां माहवारी में भी रसोई में चली जाती हैं! कि एक शीशी में से एक सफ़ेद मलाई निकालकर लगाती हैं. बाल उड़ाने के लिए आदि-आदि. लड़की से भी उसकी मामी के बारे में पूछा जाने लगा. वह उठ आई.

उस दिन लड़की उन सब स्थानों पर गई जिन स्थानों की स्मृति ने उसे मामी के घर सुबह से शाम तक काम करने के दौरान विह्वल किया था. लेकिन कहीं मज़ा नहीं आया. न पेड़ पर चढ़ने में, न पत्थर मारकर इमली तोड़ने में, न भैंस की पूंछ मरोड़ने में, न तालाब में नहाने और तैरने में. सारा कुछ एकदम सूना और भांय-भांय लग रहा था, जैसे हर तरफ़ धूल उड़ रही हो. हवा जैसे बहुत थकी हुई हो. आसमान जैसे बहुत बूढ़ा हो गया हो. तालाब जैसे बहुत गंदला हो गया हो. धरती जैसे बहुत खुश्क हो गई हो.


देर दोपहर घर लौटी तो ठंडा भात-मांड़ रसोई में शाम तक सोचने लगी, इससे तो चली ही जाती तो ठीक रहता.

दूसरे दिन गई तो बच्चा दौड़कर आया और लिपट गया. मामी लाड़ नहीं लड़ाने लगी, पर उसने डांटा भी नहीं. वह निरंतर सशंक थी और चुप. उस दिन लड़की को उसने भात के साथ-साथ अपने जैसा खाना भी दिया. थोड़ी-थोड़ी मात्रा में. मसाले वाली तर सब्जियां, हींग-घी से बाघारी हुई दाल और कटोरी भर खीर. शाम को आते समय मामी ने एक पांच का नोट पकड़ा दिया_रख ले. काम आएंगे. तनखा में से काट लूंगी.

यह लड़की की अपनी कमाई का पहला नोट था. नोट बहुत मैला और मुड़ा-तुड़ा था. उसे जल्दी-से-जल्दी चला देने की इच्छा होती. लड़की का मन कांप रहा था. उसने सोचा था, जब जिंदगी में पहली बार उसे पगार मिलेगी तो वह खूब खुश होगी. रोमांचित भी हो सकती है. लेकिन अभी ऐसा कुछ भी नहीं लग रहा था. वह चाहती थी कि वैसा कुछ लगे. उसने कोशिश भी की, पर उससे बना नहीं. वह बहुत उदास, बहुत तनहा, बहुत व्यथित थी. काली घिरी हुई बेबरसी घटाओं में प्यासी और उमस से छटपटाती. क्यों उसे खुशी नहीं हुई? क्यों दिन-भर ही उसके-मामी के बीच तनाव बना रहा?

फिर उसे गुस्सा आने लगा. यह औरत डरपोक भी है. सोचती होगी, मैं चली जाऊंगी तो बच्चा उसे खुद सम्हालना पड़ेगा. बच्चा उसकी साड़ी की इस्त्रीी ख़राब करेगा. वह रिश्वत दे रही है. वह सुस्वाद भोजन भी रिश्वत था और यह पांच का मैला-मुसा नोट भी. नहीं, यह उसकी मेहनत की, हक़ की कमाई नहीं है जो सुख-संतोष लाती है. यह रिश्वत है जो उसने चुपचाप सिर झुकाकर स्वीकार कर ली है. यह उच्छिष्ट है...जो उसे दिया गया है और जिसे निर्विरोध गटक लेने के लिए मानो वह अभिशप्त है.

उस सारी रात सो नहीं पाई लड़की. सोचती रही कि अब क्या करना है उसे? कल काम पर जाना है या नहीं जाना है? क्या कोई और घर देख लें? लेकिन वे पूछेंगे कि वहां पिछले घर में क्यों काम छोड़ा तो? और सब घरों में तो बच्चे भी नहीं होंगे. और उस घर में भी ऐसा ही व्यवहार मिला तो, कहां तब भागेगी?

मामी पर क्रोध आता. क्रोध में आंसू आ जाते, पर फिर मामी पर दया भी आती. क्या वह जान-बूझकर अपमान करना चाहती है? उसे बोध ही नहीं होता कि उसके व्यवहार से किसको क्या कष्ट हुआ? बच्चा याद आता. वह रोएगा, पिटेगा, मार खाएगा. फिर कुछ रोज़ में कोई और लड़की आ जाएगी, बच्चा उससे हिल जाएगा, और कहीं राह-बाट में यह लड़की सामने पड़ गई, तो इसे पहचान भी नहीं पाएगा. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि बच्चा उससे उसकी भाषा सीख ले और यहां के लोगों से, फूलों से, फ़सलों से, मौसमों से प्यार करने लगे?

गांव में और घर पर सब लोग कितना बदल गए थे इन्हीं कुछ दिनों में. पांच का नोट मां को दिया तो मां ने उसके सिर पर हाथ फेरा और नोट को फैलाकर, देखकर, आंखों से लगाकर भगवान के सामने रख दिया. लड़की मानो रो पड़ी, 'काश! मां थोड़ा बिगड़ती. पूछती, कहां से लाई? चुराकर तो नहीं लाई? मांगा तो नहीं? दिया भी तो मना क्यों नहीं किया? क्या तुम्हारी पगार के बिना हम लोग भूखे मर रहे हैं? क्या सोचती होगी तुम्हारी मामी भी? बेशऊर लड़की! ताड़ बराबर हुई, ज़रा-सी अकल नहीं. उन्होंने दिया और ये तुरंत ले आई. सारा ध्यान तो पैसे में है. अब तुम्हीं चाटो इसे.' काश! ऐसा ही कुछ कहा होता मां ने.

लेकिन नौकरी के पहले दिन से ही मां डांटना छोड़ चुकी है. वह काम न करे तो भी, बात न सुने तो भी मां डांटती नहीं. किसी दिन वह कपड़े न धोए तो मां न केवल अपने बल्कि उसके भी कपड़े धो डालती है. कहती कुछ नहीं, केवल, जा रही है? आ गई? बस, यहीं तक सिमटकर रह गई है.

लड़की अपने ही घर में घुटने तोड़े बैठी विपन्नता से अपरिचित थी. ज़मीन कारख़ाने में चली गई थी. नौकरी का आश्वासन अभी तक पूरा नहीं हुआ था. मुआवज़े की राशि के लिए भूमि में स्वामित्व का अकाटय प्रमाण प्रस्तुत करने थे, पिता को कभी भी जिनकी ज़रूरत नहीं पड़ी थी. वहां इतना कहने से नहीं होता था कि मेरा बाप भी इस ज़मीन पर खेती करता था. अब पिता पटवारघर-तहसील-कचहरी- वकील-दलाल-पंच-प्रधान आदि-आदि के चक्कर काट रहे थे. और उन्हें जो भी अपने पास था, एक-एक कर भेंट चढ़ा रहे थे. उन्हें हर दिन नए सिरे से पता चलता था कि उनसे बड़ा मूर्ख दुनिया में दूसरा नहीं और हर दिन बताया जा रहा था कि जो आदमी होकर भी काइयां नहीं हुआ, उसका तो जन्म ही अकारथ है, जीवन ही एक तरह से अवैध है.

लेकिन यह सब लड़की कैसे समझती?


उस रात लड़की ने एक कठिन निर्णय लिया. वह इसी मामी के यहां काम करेगी. लेकिन दिखा देगी कि जो-जो और जैसे-जैसे मामी खुद करती है और दूसरी मामियां करती हैं...वह भी कर सकती है. बल्कि उनसे भी अच्छा. घर में जितने भी काम होते हैं_खाना, पकाना, सीना-पिरोना, काढ़ना-बुनना, बोलना-चालना, लिखना-पढ़ना...वह सब सीखेगी...इन्हीं से सीखेगी और एक दिन इन्हीं से अच्छा करके दिखा देगी. हरदम हँसती रहेगी. कभी किसी बात की ख़ुद से भी शिकायत नहीं करेगी. हँसी और सेवाभाव_यही उसके हथियार होंगे. और जिस दिन मामी मान जाएगी कि ये जंगली लोग भी उनसे किसी बात में कम नहीं, बस मौक़ा मिलने की बात है...और जिस दिन मनुष्य की तरह व्यवहार करने लगेगी, जंगली लोगों से बराबरी का बरताव_वह उसे उसके हाल पर छोड़कर अपनी दुनिया में वापस आ जाएगी_एक उन्मुक्तता और उत्फुल्ल प्राकृतिक दुनिया_जिसका रूप, रस, गंध और स्पर्श मामी जैसों के नसीब में ही नहीं है.

अगले दो साल लड़की के संपूर्ण कायांतरण के साल थे. पहले अनुनय से, फिर आग्रह से और फिर अधिकार से उसने धीरे-धीरे घर का एक-एक काम सीखना, करना और अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया. सीधा-सादा गुरुमंत्र था_उसने इस दुनिया की अपनी दुनिया से, इस जीवन की अपने जीवन से और इन मूल्यों की अपने परंपरागत-प्रचलित मूल्यों से तुलना करना एकदम बंद कर दिया. ठीक है. हैं, जैसे हैं. इन्हें अपने जैसा तो बनाना नहीं है. जब तक हैं, रहेंगे, फिर लौट जाएंगे. लेकर क्या जाएंगे? कुछ देकर ही जाएंगे. एक बार मन पक्का करके मान लो कि ये लोग पराए हैं, बस, हो गया.

अब कठिनाई की जगह रोमांच ने ले ली. हां, वह बिजली की झाड़ू चला सकती है, मशीन से कपड़े धो सकती है, बटन दबाकर टीवी रेडियो या ठंडे पानी का पंखा चला सकती है. उसे मालूम है, मेज़पोश मेज़ पर बिछाया जाए तो कौन-सा कोना सामने रखना चाहिए, किसी को पानी पिलाया जाए तो गिलास कहां तक भरे रहना चाहिए, टेलीफ़ोन का घंटी बजे और उसे उठानेवाला कमरे में कोई न हो तो टेलीफ़ोन उठाकर क्या-किस स्वर में कहना-पूछना चाहिए, कोई आए तो उसकी अगवानी किस तरह की जानी चाहिए...किसे बाहर खड़े रहने को कहना चाहिए, किसे बरामदे में बैठाना चाहिए, और किसे भीतर ड्राइंग रूम में ले आना चाहिए, रास्ते में बच्चे के साथ उसे देखकर कोई मुस्कराए तो क्या करना चाहिए और कोई कुछ दे तो उसे कैसे स्वीकार अथवा अस्वीकार करना चाहिए.

अब देखा जाए तो इसमें भी हज़ारों उलझाने वाले प्रश्न थे. इस समाज की छुटाई-बड़ाई, दूरी-नज़दीकी, आव-आदर की तदनुसार बदलती भंगिमाएं, शिष्टाचार के नाम पर प्रचलित नफ़ीस अभिनय और लगभग अबूझ कुंठाएं...लेकिन इन तथा ऐसे प्रश्नों को लड़की ने स्थगित करना सीख लिया था. समझ में आना होगा तो एक दिन अपने-आप समझ में आ जाएगा. नहीं आना हो, न आए, उसकी बला से!

एक साल बाद ऐसी बात चली कि साहब का ट्रांसफर हो रहा है. साहब खुश हुए. सारा घर. साहब बहुत दिनों से कोशिश कर रहे थे. बात चली कि जाएंगे तो क्या ले जाएंगे, क्या छोड़ जाएंगे, नई जगह कैसे क्या किया जाएगा, बच्चे की पढ़ाई का क्या करेंगे...वगैरह. रस लेकर ये बातें की जा रही थीं. बातों-ही-बातों में मामी ने कहा कि कुछ भी कहो, नई जगह जाकर उसे लड़की की बहुत याद आएगी, क्योंकि इतने कम पैसों में इतना काम करने वाली, इतनी ईमानदार और मेहनती लड़की उन्हें कहां मिलेगी?


यह बात सुनकर लड़की को एक गर्हित-सी खुशी हुई. कद्र की आख़िर. मेहनत की, ईमानदारी की. पर अभी पूरी तरह उस पर निर्भर नहीं हुई है. ऐसा नहीं कहा कि लड़की के बग़ैर कैसे काम चलेगा? चलो, इसे भी ले चलें. जाती तो वह क्या, पर सुनकर अच्छा लगता. शायद उसे जल्दी करनी चाहिए. ख़ैर, देखते हैं.

लड़की ने उन्हीं दिनों रसोई में प्रवेश किया था और मालिकों की पसंद के व्यंजन बनाना तेज़ी से सीख रही थी. उसने ज़िद करके एक घंटा रोज़ मामी से पढ़ना भी शुरू कर दिया, लेकिन इस क्षेत्र में उसकी प्रगति आश्चर्यजनक रूप से मंद थी. लगभग नहीं के बराबर. हिंदी का व्याकरण और देवनागरी के संयुक्ताक्षर उसकी खोपड़ी में एकदम नहीं घुसते. वह एकदम नहीं समझ पाती कि कार स्त्रीलिंग है तो स्कूटर पुल्लिंग कैसे है? दोनों ही क्लीव लिंग क्यों नहीं हैं? 'सीता आ रही है' तो 'राम-सीता आ रहे हैं' कैसे हो गया? आमदनी को ये लोग आम दनी क्यों बोलते हैं? एक दफ़ा हम गए. ठीक है तो हम दफ़ा-दफ़ा जाएंगे में हँसने की क्या बात है? हम भूल करते हैं तो ये लोग हँसते क्यों हैं? ये हमारी भाषा सीखेंगे तो भूल नहीं करेंगे क्या?

इस दिन मामी ने लड़की को एक नई शैंपू की शीशी उपहार में दी. शैंपू खुशबूदार और महंगा था. लेकिन लड़की जानती थी कि साहब द्वारा कहीं से लाया गया वह शैंपू मामी को पसंद नहीं आया था और वह साहब के सामने इसकी आलोचना भी कर चुकी थी कि इसे लगाने से तो उनके सिर में दर्द हो गया. पर लड़की ने आश्चर्य, उत्फुल्लता और अविश्वास का अभिनय किया. क्या सचमुच आप मुझे दे रही हैं? इतना महंगा? लेकिन मैं कैसे ले सकती हूं? क्या अच्छा लगेगा हम लोगों को इतनी महंगी चीज़ इस्तेमाल करना? आप सचमुच कितनी दयावान हैं आदि. परिस्थितियों ने उसे सच छिपाकर सामने वाले को खुश करने वाली बातें करना सिखा दिया था. अपनी इस बकवास का वांछित प्रभाव देखकर उसे खूब मज़ा आता था. तुम लोग इसी लायक़ हो. यही पाकर प्रसन्न रहो. यह ग़लत था, लेकिन इस दुनिया में समझदार और स्वीकार्य बनने की यही शर्त थी.


लेकिन साहब का ट्रांसफर टल गया. नहीं हुआ. और लड़की कस्टर्ड, जैम, जेली, पुडिंग, नानखताई, आइसक्रीम, शरबत, स्क्वैश, ये वो जो-जो वे ख़ूब पसंद करते थे, ख़ूब अच्छा बनाना सीखती गई.

प्रिय पाठक! मैं अगर भगवतीचरण वर्मा टाइप लेखक होता तो कितनी आसानी से अभी कह देता कि इस तरह धीरे-धीरे लड़की को बच्चे से सचमुच प्यार हो गया और वह हृदय की कल्पना से छिप-छिपकर रोने भी लगी और एक दिन उसने अपनी जान पर खेलकर... वगैरह-वग़ैरह. पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. बच्चे की उद्दंडता में कोई कमी नहीं आई, बल्कि धीरे-धीरे लड़की की ज़रूरत उसके लिए कम-से-कम होने लगी. फिर जब वह स्कूल जाने लगा तो उसके अपने से बोलना चाहिए...पर यह आदेश या अनुदेश नहीं...एक नैतिक या धार्मिक क़िस्म की राय ही होती, जिसकी परवाह करना ज़रूरी नहीं होता.
मामी एकाधिक बार साथवालियों-सहेलियों- पड़ोसिनों को यह बताकर चमत्कृत कर चुकी थीं कि सुबह आपने जो दही-बड़े खाए या कल आपको जो पुडिंग भिजवाया था...वह लड़की ने बनाया था. उनमें से अनेक मामी के सामने लड़की की प्रशंसा करती थीं, पीठ पीछे मामी से जलती थीं और एकाध तो लड़की को फुसला भी चुकी थीं कि हमारे यहां आ जाओ, वह जितनी तनखा देती है उससे पांच रुपए ज्यादा ले लेना.

.

.


इसलिए बग़ैर भेजे लड़की यदि किसी के भी घर जाती तो मामी सशंक हो जातीं. क्योंकि मामला अब सिर्फ़ आराम और सहूलियत का नहीं, सामाजिक प्रतिष्ठा का भी हो गया था, इसलिए एक दिन साहब से बात करके मामी ने लड़की की तनखा दुगुनी कर दी और वहीं एक कोठरी में उसके रहने की व्यवस्था कर दी. इतवार के इतवार दो-चार घंटे के लिए अपने घर चली जाया करेगी.

लड़की के मन में सवाल तो उठा कि जैसे पालतू जानवर होते हैं, क्या वह पालतू आदमी बनाई जा रही है? चुभा भी, पर उसने स्वीकार कर लिया. मां को भी राज़ी कर लिया. मां को अजीब तो लगा, जब सुबह जाकर शाम को आ जाती है, यह रात में भी क्यों रहेगी? आशंका भी हुई...लड़की जवान हो रही है...कोई उलटा-सीधा चक्कर तो नहीं है? कुछ पूछताछ भी की...कोई आदमी तो नौकर नहीं है? या चपरासी या रिश्तेदार जो वहां रुकता हो? साहब कैसा आदमी है? हँसकर तो बात नहीं करता?...सिर या पांव की मालिश तो नहीं करवाता?...पानी का गिलास पकड़ाते समय बहाने से उंगली तो नहीं दबाता?...मामी की अनुपस्थिति में बार-बार कमरे में तो नहीं बुलाता?...लुंगी-कपड़े ठीक से पहनता है तो?...सब तरह से आश्वस्त होकर दुगुनी पगार की बात सोचकर हां कर दी. इस पर भी दूसरे दिन साहब और मामी खुद कार में बैठकर लड़की के घर आ गए और मां-बाप को आश्वस्त कर गए...कि जैसे हमारे बच्चे वैसे ही यह लड़की. किसी तरह की चिंता न करें.


यह कितना बड़ा छल था, इसे उन लोगों ने कई साल बाद समझा. पर तब तक काफ़ी से ज्यादा देर हो चुकी थी. इस समय तो पूरी बस्ती में कोलाहल ही मच गया. क्या साहब ख़ुद आया था? अच्छा? मामी भी थी? फिर तुम लोगों ने उन्हें कहां बिठाया? उन्हें क्या खिलाया-पिलाया? कार का रंग कैसा था? ठेठ घर तक कार आई? वग़ैरह.

अब लड़की वही खा रही थी जो वे खा रहे थे. उसी बाथरूम में नहा रही थी क्योंकि बाथरूम एक ही था. उसी संडास का इस्तेमाल कर रही थी और उसी साबुन से हाथ धो रही थी. धीरे-धीरे वह परिवार की सदस्य जैसी हो गई. किसी को रात बारह बजे भी प्यास लगती तो अब रजाई से निकलने की ज़रूरत नहीं थी. लड़की को आवाज़ दी जा सकती थी. साहब का परिवार तीन रोज़ को भी बाहर जाता तो लड़की के भरोसे घर छोड़ जाता. चोरी का भी अंदेशा नहीं रहता और लौटने पर घर भी झड़ा-पूंछा मिलता. सौदा-सुल्फ तो वह करती ही थी, अब हिसाब भी रखने लगी. अब पहनने-ओढ़ने-खाने-पकाने में उसकी राय भी ली जाने लगी और साहब अब जब भी बाहर से आते, जैसे सबके लिए वैसे उसके लिए भी कुछ-न-कुछ ज़रूर लाते. वह खुद भी इस-उस मामले में राय देती या टोकती और सलीके तथा मितव्ययिता से घर चलाकर दिखाने की धुन में रहती.

मामी लड़की से बहुत अपनापन महसूस करती और जब भी लड़की को ध्यान से देखती उन्हें लगता, उन्हें इसके लिए कुछ करना चाहिए. यह उन पर क़र्ज़ चढ़ा रही है जिसे कभी किसी तरह उतारने की जुगत सोचनी चाहिए. सोचतीं और सोच में पड़ जाती, देखो! कहां के हम और कहां की यह! और कैसे घुलमिल गई है! जैसे दूध में बताशा. ज़रूर पिछले जन्म का कोई रिश्ता है.

मामी पति से भी कभी-कभी यही बात कहतीं. वे भी भीग-से जाते. कितना घबराते हुए आए थे इस जगह! पता नहीं कैसे रहेंगे बच्चों के साथ! कैसे दो-चार साल कटेंगे. कठिनाइयां भी हैं. लेकिन कठिनाइयां कहां नहीं होंगी. इस लड़की ने कठिनाइयों में जीवन आसान कर दिया है. पिछली जगहों के नौकरों के बारे में सोचते...सब-के-सब साले चोर, मक्कार, भुक्खड़...तुलना करते तो लगता कि नहीं, लड़की को सिर्फ़ नौकर नहीं माना जा सकता. अब तबादला न भी हो तो कोई बात नहीं. कुछ पढ़ी-लिखी होती तो अपनी कंपनी में ही कहीं लगवा देते.

लड़की जो अब हर चीज़ छू-बरत सकती थी, सब चीज़ों पर अपना ज़रा-ज़रा मालिकाना समझने लगी थी. 'हमारा साहब' और 'हमारी मामी' अब 'हमारा घर' और 'हमारी कार' तक पहुंच गए थे. एक दिन लड़की ने कमरे में जाकर खुद को खोला और टटोला तो हैरान होकर पाया कि जो शत्रुभाव उसने इस घर में रहने की मूल प्रतिज्ञा और अभिप्राय के रूप में धारण किया था, वह पता नहीं कब, कैसे बहुत पतला और फीका पड़ गया है. बल्कि वह इसे बीच-बीच में तो एकदम भूल जाती है. बल्कि उसे खुद को याद दिलाना पड़ता है कि वह इन लोगों में से एक न है, न हो सकती है. उसकी दुनिया कोई और है और वह वहां किसी और मतलब से आई है.

जब उसकी हैरानी, ग्लानि और आत्मक्रोध थोड़ा ठंडा पड़ा तो एक नई समस्या उठ खड़ी हुई. उसने पाया कि अब उसमें घृणा और शत्रुता धारण करने की शक्ति ही शेष नहीं रह गई है. वैसा आत्मविश्वास ही कहीं नज़र नहीं आ रहा है जैसा विजय की आकांक्षा के लिए लाजमी होता है. और जो था, किसने उसे ठग लिया? किसने छीनी यह दौलत उससे? बल्कि हद है, शर्म जैसी बात है कि वह अपनी प्रतिज्ञा, अपने अभिप्राय के औचित्य पर ही प्रश्नचिद्द लगा रही है! अब मन-ही-मन, ख़ुद से भी चोरी-चोरी पूछ रही है कि क्या यह बेहतर अभिप्राय नहीं होगा कि खाओ, पीओ, मज़ा करो, जब तक साहब यहां हैं, फिर भूल जाओ इसे और कोई दूसरा घर पकड़ लो. क्या उसके भासित रूप से सक्षम होते जाने ने उसे भीतर से एकदम अक्षम ही बना दिया है.

लड़की को बहुत असहायता का अनुभव हुआ. उसे लगा, जैसे अब वह तैर नहीं रही है, सिर्फ़ बह रही है. बहना आसान है, तैरना कठिन...लेकिन तैरने वाले को पता होता है कि उसे कहां जाना है अथवा कहां नहीं जाना है. बहने वाले के हाथ में कुछ नहीं होता. लड़की उदास और अनमनी-सी रहने लगी और तरह-तरह के अटपटे और असंभव दिवास्वप्न देखने लगी...ख़रीदारी में से पैसे बचाकर उसने दो रुपए वाला लॉटरी का टिकट ख़रीद लिया है...और उसका एक लाख रुपए का इनाम खुल गया है...कोई यूनिट इन जंगलों में अपनी फ़िल्म की शूटिंग करने आई है और इन्हें एक लड़की की तलाश है जो पेड़ों पर चढ़ सकती हो और थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी भी समझती हो...और उन्होंने लड़की को चुन लिया है और अपनी अगली फ़िल्म में उसे नायिका का रोल दे दिया है...किसी साहब का ख़ूबसूरत लड़का उस पर मोहित हो गया है और दोनों ने मंदिर में जाकर गुपचुप विवाह कर लिया है...जानती थी. जानती थी कि ऐसा कुछ भी कभी भी नहीं होगा. फिर और दुखी, और अनमनी, और अकेली, और उदास हो जाती थी. वह अपने भीतर की बात किसको बता सकती थी?

अंतत: एक दिन साहब का तबादला हो गया.


जब सचमुच हो गया तो खुशी मनाने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की गई. खुशी का स्थान व्यस्तता ने ले लिया. कब जाना है? कैसे जाना है? क्या-क्या ले जाना है? क्या-क्या छोड़ जाना है? देखो, पता नहीं चलता और सामान कितना बढ़ जाता है. अब पैकिंग. अब कारपेंटर. अब पेंट. अब रस्सी-सुतली-कील-लकड़ी- टाट-जूट. अब ट्रक. अब रिजर्वेशन. अब चिट्ठियां. अब विदाई पार्टियां. अब बच्चे का टीसी. अब बैंक खाता. अब अलमारी-पलंग- सोफा-टीवी-कूलर-फ्रिज-कोठी-क़ालीन-कील-कांटा. सबकी गिनती हो चुकी तब जाकर अंत में लड़की का ध्यान आया. लड़की का क्या करेंगे? क्या इसे यहीं छोड़ जाना होगा?

और लड़की को तो बस रोना-ही-रोना आ रहा था. पता नहीं क्यों? क्या वह नहीं जानती थी कि ये लोग एक दिन जाएंगे? क्या वह अपने मिशन के अधूरा छूट जाने पर दुखी थी? लेकिन देखा जाए तो वह मिशन तो कभी का पूरा हो चुका था. क्या वह यह सोच रही थी कि अब जीवन में कभी भी दोबारा इन लागों को नहीं देख पाएगी? क्या यह कि अब दूसरी किसी मामी के यहां काम करना पड़ेगा और फिर से एक ओछा और गला हुआ फ्रॉक पहनकर एक नीम अंधेरी कोठरी में उकड़ूं बैठकर नमक-भात खाना पड़ेगा?


लड़की जो भी सोच रही हो, यह सोचने की फुर्सत किसी को नहीं थी कि वह क्या सोच रही है. घर में अब न झाड़ू की ज़रूरत थी न पोंछे की. न सजावट-सलीके की न व्यंजनों- पकवानों की. न सौदा-सुल्फ की न सैर-सपाटे की. न मेहमाननवाज़ी की न हिसाब-किताब की. अब घर में लकड़ी-टाट-बोरे-रस्सी-सुतली- कील-कनस्तर बिखरे हुए थे. दीवारों पर से सजावटें उतार ली गई थीं. दीवारें नंगी और भुतहा लग रही थीं. अब सिर्फ़ सामान जल्दी-जल्दी पैक करने की ज़रूरत थी...जिसका लड़की को कोई अभ्यास या अनुभव नहीं था. दो-चार चीज़ें उसने तोड़ भी दीं. वह फिर डांट खाने लगी. मामी उसे हर ग़लती, हर नुकसान के लिए ज़ोर से डांटतीं और जब वह रोने लगती तो मामी भी रोने लगती. जैसे-जैसे जाने का दिन नजदीक आता गया मामी की घबराहट, उच्च रक्तचाप और हाथ-पांव फूलना बढ़ता गया. जब सबसे ज्यादा फुर्ती की ज़रूरत थी, मामी एकदम निढाल हो गयी.


यह अभी निबटा भी नहीं था कि दावतों का सिलसिला शुरू हो गया. सुबह इनके यहां जाना है तो शाम को उनके यहां. सुबह गोयल्स के यहां लंच है तो शाम को परीडाज के साथ डिनर. दो-चार जगह वे लड़की को छोड़कर गए तो सबने लड़की के बारे में पूछा कि उसे भी साथ क्यों नहीं ले आए? वह क्या अकेली के लिए चूल्हा जलाएगी? फिर उसे साथ ले जाने लगे तो और ज्यादा परेशान हो गए. लड़की की थाली अलग से लगाकर दे दी जाती कि उधर कोने में बैठकर खा ले और फिर अपेक्षा की जाती कि घर-भर के बरतन साफ़ कर जाएगी.

लड़की को भी अजीब लगता इस सजे-धजे परिवार के साथ मेहमान की तरह और घरों में खाने जाना. आख़िर वह तो यहीं है. कहीं जा नहीं रही. फिर विदाई-भोज में उसका क्या काम?

लड़की के पास प्रस्ताव आने लगे, हमारे यहां काम करना, हमने पहले ही कह दिया है. कहो तो तुम्हारी मामी से भी कह दें. किसी और को हां मत कहना. लड़की को ऐसे प्रस्तावों पर विचार करना भी बेवफ़ाई जैसा लगता. वह कान ही नहीं देती.
फिर वे नई जगह की बातें करने लगे. वहां कैसा घर होगा, कौन-कौन पुराने लोग मिलेंगे, वहां से कौन-कौन शहर पास पड़ेंगे और कहां-कहां घूमने जाया जा सकेगा आदि-आदि.


इन अनुमानों-अंदाज़ों-कल्पनाओं में भी लड़की कहीं नहीं थीं. लड़की को लगा, जैसे पिंजरे में फंसे चूहे को दूर छोड़ आया जाता है, घर में नहीं रखा जाता, और फिर याद भी नहीं किया जाता, उसी तरह उसे भी छोड़ जाया जाएगा और फिर कभी याद नहीं किया जाएगा. धीरे-धीरे उसने फिर अपने मन की कमर कसी और सोचने लगी कि इन लोगों के बग़ैर भी उसका जीवन क्यों नहीं संभव हो सकता? ऐसा होने का एक कारण यह भी था कि मामी हर दिन कोई-न-कोई फालतू चीज़ उसे पकड़ा रही थीं, तू ले ले, तू रख ले करके और इन चीज़ों से उसकी संदूकची भर गई थी और हर चीज़ इतनी लुभावनी थी कि फिर वह चीज़ों के बारे में ही सोचने लगी कि देखें ये और ये और वो मामी साथ ले जाती हैं या उसे दे जाती है.

जैसे-जैसे जाने का दिन पास आता गया, मामी का व्यवहार ऐसा होता गया जैसे वह लड़की को पहचानती ही न हो. मानो लड़की से उन्हें कोई मतलब ही न हो. मानो वह कोई और औरत थी जो लड़की से पिछले जन्म का कोई रिश्ता मान रही थी. अब लड़की को फिर मामी के दोष दिखाई देना शुरू हो गए और वह थककर सोचने लगी कि जाएं बाबा ये लोग जल्दी ताकि उसे मुक्ति मिले और वह चैन से बैठकर कुछ सोच सके कि आगे उसे क्या करना है?

लेकिन रवानगी से एक दिन पहले साहब और मामी फिर लड़की के घर थे. बहुत सारे उपहारों के साथ. बहुत सारी दिल जीत लेनेवाली बातों के साथ. बहुत सारे सभ्य चमत्कारों के साथ. छह महीने की अग्रिम तनखा के साथ. और इस अनुरोध के साथ कि लड़की को वो सिर्फ़ दो महीने के लिए उनके साथ भेज दें. वहां सब घर-गृहस्थी जमाकर वापस आ जाएगी. साहब खुद छोड़ जाएंगे. और किसी बात की चिंता न करें, क्योंकि जैसे आपकी बेटी वैसे हमारी बेटी. क्योंकि अब इनसे तो कुछ होता नहीं और नई जगह जाएंगे तो सब नए सिरे से शुरू करना पड़ेगा. फिर बच्चा भी इससे इतना हिल गया है कि...मैं तो कहती हूं मांजी की ज़रूर अपना पिछले जन्म का कोई संबंध है...वरना कौन किसी के लिए...और अगले दिन लड़की ट्रेन में बैठी थी. ज़िंदगी में पहली बार. उसकी आंखों के आगे उसके अपने प्यारे देश के नदी-पहाड़-तालाब-झरने-पेड़-गाछ- खेत-मैदान-गांव-जवार-आम-महुआ-केले- कटहल-कोयल-मैना...भाग-भागकर पीछे छूटता जा रहा था और वह मन-ही-मन बार-बार ख़ुद से कह रही थी, मैं जानती थी, यही होगा. मैं जानती थी. मैं जानती थी.

नई जगह, नया शहर, नए लोग, नया मकान, नया माहौल. पुराना था तो बस मामी का उच्च रक्तचाप और लड़की के सिर पर गृहस्थी का सारा बोझ. लेकिन लड़की बोझ को ज़रा भी बोझ नहीं समझ रही थी, बल्कि सबकुछ इस तरह कर रही थी कि जैसे वह नहीं करेगी तो और कौन करेगा?

यह एक बड़ी जगह थी. यहां इस बड़ी जगह में मकान छोटे थे. और साहब भी इतना बड़ा साहब नहीं था जितना उस छोटी जगह में था. नौकरों के लिए मकान में अलग से कोई कोठरी नहीं थी. लड़की के लिए एक खाट बच्चे के ही कमरे में डाल दी गई. अभी लोग मिलने-जुलने आ रहे थे. पूछ रहे थे कि कोई काम हो तो बताएं. पूछ रहे थे कि क्या लड़की उनकी कोई रिश्तेदार है? उन्हें अंग्रेज़ी में बताया जा रहा था कि रिश्तेदार नहीं, नौकरानी है, कुछ दिनों के लिए साथ आ गई है, फिर चली जाएगी.

यहां आजू-बाजू के मकानों में काम कर रही सहेलियां-मौसियां-नानियां-ताइयां नहीं थीं. यहां लड़के थे जो साइकिल पर घंटी बजाते हुए आते थे और घंटे-दो-घंटे में काम निबटाकर साइकिल पर चढ़कर घंटी बजाते हुए चले जाते थे. उसकी तरफ़ देखते भी नहीं थे.

लड़की के मन में आया कि वह भी साइकिल चलाती! बच्चे के आगे एक दिन उसके मुंह से यह बात निकल गई. बच्चे ने मां से कह दी. मां ने साहब से. साहब को लगा कि यह तो अच्छी बात है. इसमें तो कोई हर्ज़ नहीं है. सीखना ही चाहिए. बड़े बाज़ार से सब्ज़ी ले आया करेगी. राशन वगैरह ख़रीदने के लिए, गेहूं पिसवाने के लिए हर बार कार लेकर नहीं जाना पड़ेगा. लेकिन इसे साइकिल सिखाएगा कौन?

लड़की ने एक दोपहर एक नौकर से बात की_तू मुझे साइकिल सिखा देगा? उसने कहा_मेरे पास फालतू की बातों के लिए टैम नहीं है. चल फूट. लड़की ने आजिज़ी से कहा_सिखा दे न! ऐसा क्या करना है? कोई घिस जाएगा क्या? ज़िंदगी-भर तेरे गुण गाऊंगी. लड़के ने पूछा_साइकिल कहां है? लड़की ने झिझकते हुए बताया, साहब लाने वाले हैं. पर तब तक तेरी साइकल से ही सीख लूंगी. लड़का हँसकर बोला_ये तो जेंट्स है. डंडे वाली. लड़की बोली_तो क्या हुआ? रात के टैम सड़क ख़ाली होती है. एक बार कूदकर कैसे भी बैठ जाऊंगी, तू पीछे से पकड़े रहना, बस. लड़का लड़की का हाथ पकड़कर आंख मारकर बोला_बदले में क्या देगी? लड़की 'धत्' कहकर हाथ छुड़ाकर भीतर भाग गई.

एक दिन साइकिल आ गई. नई-नकोर. उस दिन लड़की की खुशी का ठिकाना नहीं था. उस रात साहब मामी से कह रहे थे_चलो! तुम्हारे लिए छह महीने का तो आराम हो गया. चिट्ठी लिख दो कि अभी साइकिल सीख रही है, इसलिए अभी नहीं आ पाएगी. कुछ रुककर आएगी. फिर देखेंगे.

लड़की लेकिन साइकिल सीख नहीं पाई. तीसरे ही महीने उसका बाप आया और उसे ले गया. बाप को भी वहीं ठहरना पड़ा. बच्चे के कमरे में. वहीं वह खांसा. वहीं उसने बीड़ी पी. शायद थूका भी. उसे जल्दी भेजना ज़रूरी था. मामी अब लड़की को रोकने का कोई बहाना नहीं कर सकी. घर जमा हुआ था. गृहस्थी चल रही थी.

मामी ने बाज़ार जाकर तरह-तरह के बहुत सारे कपड़े लड़की के लिए ख़रीदे. हैंडलूम की साड़ियां, सलवार-कमीज़ के कटपीस, गाउन और नाइटी भी. पेंटी भी. ब्रा भी. रोते-रोते टिकुली भी. चुटीला भी. चूड़ियां भी. मामी को लग रहा था जैसे घर से बेटी को विदा कर रही हो. लेकिन आख़िर तो एक दिन उसे जाना था. कब तक रहती? कितना मुश्किल हो जाएगी! झाड़ू-पोंछा...कपड़े-बरतन...लड़के क्या-कितना कर लेंगे? नौकरानी यहां मिलती नहीं. सबसे कहकर देख लिया. क्या करें? खुद ही करना पड़ेगा. मरी ने काम करने की आदत ही छुड़वा दी. सुखी रहे जहां रहे. हमारा आशीर्वाद तो साथ रहेगा. क्या इसके बाप से पूछें कि कोई और औरत अगर आने को तैयार हो...आने-जाने का किराया दे देंगे...क्या पूछना ठीक रहेगा?

लड़की ना-ना कहती जा रही थी और मामी जाने क्या-क्या उसकी संदूकची में ठूंसे जा रही थी. लड़की का रोना बंद ही नहीं हो रहा था. हिचकियां बंध गई थीं. मामी ने खुद अपने हाथ से रास्ते के लिए खाना बनाकर दिया. साहब ने लड़की के बाप को टिकट पकड़ाया और राहख़र्च के लिए दस-दस के पांच नोट. बाप ने पैसे माथे से लगाकर जेब में रख लिए और दोनों हाथ जोड़कर बीड़ी-पानी के लिए कुछ पैसे और मांगने लगा. फिर बोला, रास्ते में कहां पानी के लिए रेल से उतरेंगे...हम तो ठहरे अनपढ़ गंवार आदमी...ट्रेन ने सीटी मार दी तो दोड़कर चढ़ भी नहीं पाएंगे...आप कहें तो बबुआ के कमरे में जो पानी की बोतल टंगी है, वह मिल जाती तो...फिर पांव छुए उसने साहब के और मामी के, बच्चे के भी छूने लगा और फिर जाते-जाते बोला कि यह साइकिल तो अब आपके कोई काम आएगी नहीं, आपके तो पैसे बेकार हो गए. अगर हमें ही दे देते...आप चाहें तो हम ख़रीद लेंगे....और जेब से वही पचास रुपए निकालकर बढ़ा दिया जो अभी-अभी साहब ने उसे दिए थे. साहब को यक़ीनन बुरा लगा होगा, पर उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि ले कैसे जाओगे? इस पर अपूर्व आत्मविश्वास के साथ बूढ़ा बोला कि आपकी कार के पीछे बांधकर स्टेशन तक ले जाएंगे और एक बार रेलगाड़ी में चढ़ गई तब तो अपने गांव पहुंच ही गई समझिए.

लड़की अब धाड़ें मार-मारकर रोने लगी. वह मामी से एकदम चिपक गई. अपना बाप उसे बहुत टुच्चा, नीच और कसाई जैसा लगने लगा. उसने कसकर मामी के पांव पकड़ लिए और रोते-रोते गुहार करने लगी_मुझे मत निकालो! मुझे मत निकालो!

साहब और मामी को कुछ समझ में नहीं आया कि बात क्या है? घर जाने में यह लड़की इतना रो क्यों रही हो? निकाल कौन रहा है? बाप लेने आया है और यह छोड़कर जा रही है. चक्कर क्या है?

ऊंची आवाज़ में रोना-धोना सुनकर पास-पड़ोस के बच्चे और महिलाएं भी निकल आईं. ताका-झांकी करने लगीं. साहब का दिमाग़ भन्नाने लगा. यह हो क्या रहा है? कोई तरीका है. नई जगह है. लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे! खामखा बातें उड़ेंगी. उन्होंने एकदम साहबी अख्तियार कर ली. बाहर निकल लिए. नौकर से ज़ोर से कहा_साइकिल डिग्गी में घुसेड़ दे. मामी ने लड़की को समझाया_तेरी भी ज़िंदगी है कि नहीं कुछ? मां-बाप का भी तुझ पर हक़ है. जाकर शादी-ब्याह कर. अपना घर बसा. हमारे साथ सारी ज़िंदगी थोड़ी न रह सकेगी. जा. जी छोटा मत कर. वहां तुझे अच्छा लगेगा. जितनी साथ लिखी थी, निकल गई. हमें तो ख़ुद ही बहुत बुरा लग रहा है, पर क्या करें, पेट की जाई को भी विदा तो करना ही पड़ता है.

पच्चीस-तीस बार प्रणाम करके बूढ़ा आख़िर गाड़ी में बैठा और लड़की विदा हुई.


लड़की को ट्रेन में बिठाकर साहब लौटे तब तक मामी स्थिरचित्ता हो चुकी थीं. घर पर हालांकि उदासी पुती हुई थी. जैसे अभी-अभी तक कुछ चीज़ यहां थी जो अब नहीं है. एकदम ख़ाली-ख़ाली लग रहा था. साहब ने बूढ़े के काइयांपन की एक-दो बातें बताई. इन दोनों ने लड़की को कुछ देर बड़ी ममता के साथ याद किया. उसकी अच्छाइयों को याद किया, उसकी तारीफ़ की. मामी ने एकाध बार पल्लू से आंखें भी पोंछी. फिर कहा, चलो बाबा! राज़ी-राज़ी गई. जवान-जहान लड़की घर में थी. पराई औलाद. डर लगता था. ज़रा-सी कुछ ऊंच-नीच हो जाती तो किसी को मुंह दिखाने लायक़ नहीं रहते. उमर तो सब पर आती है, पर उस मरे रामेश्वर से साइकिल सीखने के बहाने हँसकर बातें करती थी तो मेरी तो तभी से नींद हराम हो गई. मैंने तो मानता कर ली थी कि हे भगवान! राजी-राज़ी जाए अपने घर तो परसाद चढ़ाऊं. चलो ठीक हुआ. गई.


यह बातचीत इस बिंदु पर समाप्त हुई कि अब दूसरी कोई नौकरानी ढूंढा जाए. उससे बिल्कुल नहीं होगा घर का काम.
अच्छा, देखते हैं. एक कप चाय पिलवाओ. साहब ने कहा.

मामी के मुंह पर लड़की का नाम आते-आते रह गया कि चाय बना ला. घुटनों पर ज़ोर देकर उठीं..रसोई में गई...और...जैसे पहली बार चाय बना रही हों...चाय बनाने लगीं.


वैसी ही ट्रेन थी और छूटते गांव-घर-नदी- नाले-पेड़-पुल-खेत-मैदान-ऊसर-जंगल-पर्वत- पठार...आंसू-से धुंधले. कहें कि लड़की सारे रास्ते रोती ही रही तो भी ग़लत नहीं होगा, क्योंकि जब आंखें नहीं रो रही थीं, तब भी दिल तो रो ही रहा था. एक दुनिया...एक पूरी दुनिया...सपनों और संभावनाओं का एक पूरा ब्रह्मांड उसके हाथ आकर छिटक गया था. हाथ से छूटकर चूर-चूर हो गया था. ज़रूर मामी ने ही चिट्ठी लिखकर बाप को बुलाया होगा. उस दिन जब वह और रामेश्वर रात ग्यारह बजे तक घर के बगीचे के दरवाज़े पर बातें करते रहे थे और जब मामी ने उसे देख लिया था और जब आंखें फाड़-फाड़कर देखा तो था, पर कहा कुछ नहीं था. हां, बिल्कुल यही बात है. और कुछ हो ही नहीं सकता. दूसरे दिन मामी ने लड़की से कुछ चिट्ठियां पोस्ट भी करवाई थीं. और देखो दुर्भाग्य! कि लड़की खुद अपने ही हाथों से वे चिट्ठियां डाक के डिब्बे में डाल आई थी. काश! उसे पता होता. काश! वह पढ़ना सीख गई होती.

रामेश्वर कहता था_नाइट क्लास चलती है. दो घंटे जाना पड़ता है. फीस नहीं लगती. वह जाता है. वह उसे भी ले जाया करेगा. छोड़ भी जाया करेगा. पोथी-पाटी वहीं से फ्री मिलती है. आख़िर में एक सर्टीफिकेट भी मिलता है. तू मेमसाब से परमीशन ले ले बस. काम ज़रा जल्दी निबटा देगी, सात बजे तक, तो मेमसाब मना थोड़ी करेंगी. पढ़ना तो अच्छी चीज़ है.

लेकिन मेमसाब ने परमीशन नहीं दी. वह समझ रही थीं कि पढ़ाई प्रेमालाप का बहाना है और कुछ नहीं. पढ़ना होता तो वहीं न पढ़ लेती? ज़रूर ये लोग रोमांस की बातें करते हैं. सेक्स की बातें करते हैं. गंदी-गंदी बातें करते हैं. ज़रूर रामेश्वर लड़की को भगाकर ले जाने की योजना बना रहा है. देखना, एक दिन आंख खुलेगी तो पता चलेगा, लड़की घर में नहीं है...और पुलिस...क्या घर में पुलिस आएगी? हो सकता है, वो लोग लड़की को रेप करके जंगल में मारकर पटक दें और...

...रामेश्वर कहता था, एम्प्लॉयमेंट में नाम लिखाने से वे लोग ख़ुद चिट्ठी भेजते हैं नौकरी के लिए. सात सौ-आठ सौ कमाना कोई मुश्किल बात नहीं है. मज़े से अलग घर लेकर रहो. कब तक दूसरों की जूठन साफ़ करना!


रामेश्वर जैसे लोग बदमाश थे. किसी आदिवासी कबीले के नरभक्षी जंगली थे. लड़की को उबलते तेल के कड़ाह में डालकर पकानेवाले और फिर किलकारियां भरते हुए उसकी बोटियां नोच-नोचकर खाने वाले. लड़की को रामेश्वर जैसे लोगों से बचाना ज़रूरी था. और मान लो, पढ़ने वाली बात ठीक भी थी तो भी इसे रोकना ज़रूरी था. सब पढ़ लिए तो घर का काम कौन करेगा? परमात्मा ने पांचों उंगलियां बराबर तो नहीं बनाईं.

लड़की सपने देखती है...हरी घाटी में लाल कवेलू की छतवाली एक झोंपड़ी है. छत पर कद्दू की बेल चढ़ी हुई है और उसमें पीले-पीले फूल खिले हुए हैं. आंगन में एक खटिया पर पड़ा रामेश्वर ट्रांजिस्टर सुन रहा है और वह भीतर अजवायन के पत्तोों के भजिए छान रही है...

...साइकिल पर बैठकर ऑफ़िस जा रही है और स्कूल की यूनिफॉर्म पहने एक छोटी-सी, गोरी गोल-मटोल बच्ची अपनी नन्हीं हथेली नचाते हुए उसे दरवाज़े पर खड़ी टा, टा कर रही है. पास ही रामेश्वर खड़ा हँस रहा है...


...रेलगाड़ी बोगदे से गुज़र रही थी. रेलगाड़ी बोगदे में रुक गई. चारों तरफ़ घुप्प अंधेरा है. मामी और साहब टॉर्च लेकर लड़की को ढूंढ रहे हैं।
...सब अंडबंड. सब गड्डमड्ड. सब ऊलजलूल. सब चीज़ों का अर्थ कहीं छूट गया है. सारे शब्द निरर्थक ध्वनियां बन गए हैं. सारे विचार स्वार्थ भरे शोर. सारी कल्पनाएं खंड-खंड भय. और सारे सपने सूखी रुई चबाने की तरह बेस्वाद और उकबाई-भरे.

रात होते-होते लेकिन नींद आ जाती है. नींद दोस्त है. रहम है. ईश्वरीय कृपा है. वह नहीं होती तो शायद हममें से बहुत-से पशु हो जाते.
बाप ने पूरे रास्ते बात नहीं की है. न खाने को पूछा है, न पानी को. मामी ने जो खाना साथ रखा था, सारा बैठे-बैठे अकेला भकोस चुका है. पानी उसने पहले पीया, फिर उसी पानी से मुंह-हाथ धोए, कुल्ला किया, पांव धोए और बोतल ख़ाली करके लटका दी. हम वहां भूखे मर रहे थे. और ये यहां तर माल उड़ा रही थी. अब रह भूखी. अभ्यास कर ले भूखे रहने का, ठीक रहेगा. उठेगी तो आप ही किसी स्टेशन से भर लाएगी. ज्यादा भूख-भूख करेगी तो मूड़ी ले दूंगा कहीं.

लड़की एक स्टेशन पर पानी भर लाई. पानी पीकर फिर लेट गई. ख़ाली पेट गुरड़-गुरड़ कर रहा था. उठकर बैठ गई और खिड़की से मुंह सटा लिया. और फिर रोने लगी.


कुछ ही देर में वही जाने-पहचाने दृश्य थे. वही कोयल-मैना, केले-कटहल, आम-महुआ, गांव-जवार, खेत-मैदान, पेड़-गाछ, तालाब-झरने, नदी-पहाड़...वही ठंडी हवा...वैसी ही मादक सुगंध...अचानक उसे लगा, वह अपने-आपको बहला रही है...सुगंध नहीं दुर्गंध है...कहीं कुछ सड़ रहा है...हवा में कुछ सड़ रहा है...जैसे कहीं किसी जानवर की लाश सड़ रही हो...उसे लगा, मक्खियां बहुत हैं. डिब्बे में भी. वे वाकई थीं. उसे लगा, उमस बहुत है. उसे लगा, उसके प्यारे देश ने उसके स्वागत में बांहें नहीं फैलाईं. उसकी मातृभूमि ने उसे उछाह में आकर अंग में नहीं भर लिया. अब वह एक अजनबी की तरह, एक भगोड़े की तरह, एक द्रोही की तरह अपने ही गांव-घर में प्रवेश करेगी.

और वैसा ही हुआ. मां उसे देखकर रोने नहीं लगी. मौसियां-ताइयां देखते ही सिर पर, गाल पर हाथ नहीं फेरने लगीं. चाचा-ताऊ आसीसने नहीं लगे...सखियां दौड़कर गले नहीं लग गईं...बच्चे लटूमने-लटकने नहीं लगे...लड़के दीदी-दीदी कहकर हँसी-मज़ाक़ नहीं करने लगे.

सब उसे दीदे फाड़-फाड़कर देख रहे थे. अब वह एक अजूबा थी. एक चमत्कार थी. एक अविश्वसनीयता थी. उसका बदन भर गया था. रंग साफ़ हो गया था. हथेलियां गुदगुदी थीं. पांवों में बिवाइयां नहीं थीं. बाल लंबे और साफ़ थे. बदन पर पूरे बल्कि अच्छे कपड़े थे. डिजाइनदार सैंडल पहने थी. छातियां औरों की तरह थुलथुल या लटकी हुई नहीं, चोंचदार थीं. आंखों में चमकदार तरलता थी...दंतपंक्ति बिजली जैसी चमकती थी. नहीं, यह वह लड़की नहीं है जो यहां से गई थी. जिसे हम जानते थे. जो हमारी थी.


गली में कीचड़ है. लड़की एक हाथ से साड़ी को ज़रा उठाए हुए चलती है. खाने से पहले हाथ धोती है. मक्खियां उड़ाती है...कमरे के भीतर जाकर, दरवाज़ा बंद करके कपड़े बदलती है...मुस्कराकर 'कैसे हैं आप' जैसी बातें पूछती हैं...तेल-मसाले में तरकारी भूनती है...गाय-भैंस से बचकर निकलती है...बार-बार चाय पीने की इच्छा करती है...साइकिल चलाना जानती है...नहीं, यह वह हमारी लड़की नहीं है.

लड़की फिर अकेली थी. वहां जैसे कपड़े पहनने के बाद भी और कीचड़ में फट-फट नंगे पांव चलने-फिरने के बाद भी. दरअसल उसके भीतर ही कुछ बदल गया था. उसे कुछ अच्छा ही नहीं लग रहा था. उससे कुछ किया ही नहीं जा रहा था. अब न तालाब पर नहाया जाता था, न बग़ैर साबुन फचीट-फचीटकर कपड़े धोए जाते थे, न नमक-भात खाया जाता था, न मुस्कराया जाता था, न खुले में फरागत के लिए जाया जाता था.

लेकिन इससे पहले कि वह कुछ सोचती, कुछ अनुकूल होने की कोशिश करती...कुछ दी हुई परिस्थितियों को अपना भाग्य मानकर स्वीकार करती...कुछ अपनी पुरानी दुनिया को भूल पाती...कुछ रातों को रामेश्वर के सपने देखना बंद कर पाती...और शायद वह ज़रूर ऐसा कर लेती, पर इससे पहले कि वह ऐसा कर पाती...उसकी शादी कर दी गई.


सब कुछ पहले से निश्चित था. तीसरे दिन सुबह उसे जल्दी उठाकर, नहलाकर हल्दी लगा दी गई और फिर नहलाकर तांत की एक कोरी साड़ी पहनाकर पवित्र नारियल हाथ में पकड़ाकर उसे पूजा में बैठा दिया गया. वह छटपटाई, तड़पी, रोई, गिड़गिड़ाई, चीख़ी, चिल्लाई, लेकिन उसकी किसी ने न सुनी. गांव-भर की औरतें उसे समझाती रहीं. गांव-भर के पुरुषों ने उसके आगे हाथ जोड़ लिए. तीसरे पहर बारात आ गई. बाप उसके आगे साष्टांग दंडवत की मुद्रा में लेट गया...हुलहुल ध्वनि और मंगलवाद्यों के शोर में उसकी आत्मा का हाहाकार अनसुना ही रह गया. और रात एक बैलगाड़ी पर सवार होकर वह दस कोस दूर अपनी ससुराल पहुंच गई.

रो-रोकर लड़की की आंखें सूज गई थीं. वह रो रही थी अपनी साइकिल के लिए...अपने कपड़ों-सैंडल के लिए...अपनी टिकुली-चुटीले के लिए...ब्रा-पेंटी के लिए...साड़ी-तौलिए के लिए...शैंपू-साबुन के लिए...साहब-मम्मी के लिए...अपनी खोई हुई आज़ादी के लिए... रामेश्वर के लिए...अपने अस्तित्व के लिए... अपनी असहायता-निरुपायता के लिए...अपने नारी-जन्म के लिए.

दो दिन पहले उसका मन रो-रोकर पूछ रहा था, क्यों मुझे स्वीकार नहीं करते हो भाई? मैं तुम्हारी ही हूं. आगे बढ़ जाना ऐसा कोई अपराध तो नहीं, और आज उसे लग रहा था कि जिनसे वह अपने लिए स्वीकार चाह रही थी, उन्होंने ही मिलकर उसे एक कुएं में धक्का दे दिया है और बाहर खड़े जय-जय बोल रहे हैं. बस...ख़त्म. ख़त्म. अब कुछ नहीं हो सकता.

लड़की का पति शराबी और निकम्मा था. वह शराबी और निकम्मा ही होता_लड़की निभा लेती. बहुत-से लोग शराबी और निकम्मे होते हैं. लेकिन यह मूर्ख भी था. घर में कोई भी औरत नहीं थी. अड़ोसनें-पड़ोसनें ही चाची-ताई थीं. वे सारा शुभकर्म और शकुन की रस्में यथासंभव कर-कराकर चली गईं.

मूर्ख पति ने उस रात लड़की के साथ जो किया उसे पशुता-बर्बरता-बलात्कार-पाशविकता क्या कहा जाए? क्या कहा जाए? मानो वह लड़की को मार ही डालने पर उद्यत था. लड़की कर्तव्य-भाव से भी भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती, लेकिन नहीं, उसे अपने पौरुष का लोहा मनवाना था. उसे मानो सारे आगामी जीवन के लिए एक अधिपति भाव धारण करना था. उस मल्ल को मानो लड़की की बुनियादी अस्मिता तक का मानमर्दन करना था. मानो लड़की कोई कटखना सांड़ हो, जिसे काबू में करके दिखाना हो. उसे विश्वास ही नहीं था बग़ैर बलप्रयोग और पशुता के भी यह सब संपन्न किया जा सकता है.

सुबह लेकिन उस मैली-टुटली सुखशैया पर लड़की के सिर के उखड़े बालों और ख़ून के कुछ धब्बों के अतिरिक्त इस हिंसा के कोई चिद्द नहीं थे. और इन्हें भी देखने वाला कोई नहीं था. लड़की वितृष्णा और उबकाई से भर गई. क्या शादी इसी को कहते हैं? क्या रामेश्वर भी उसके साथ ऐसा ही करता? उठकर लस्त-पस्त बाहर आई और एक पेड़ की छाया में उकड़ूं बैठ गई. सिर पकड़कर. क्या भाग जाऊं? लेकिन भागकर जाऊंगी कहां? इस अपने मुलुक में क्या कोई भी ऐसी जगह है जहां वह भागकर चली जाए और उसे दोबारा यहीं पकड़कर न मंगवाया जाए? एक बार जो स्टेशन तक पहुंच पाती. लेकिन दस कोस अपना गांव और वहां से पचपन किलोमीटर स्टेशन...पास में दमड़ी नहीं...और यहां तो प्राइवेट बस भी नहीं आती. क्या मामी...क्या रामेश्वर...कितनी दूर हैं वे सब! लेकिन एक दिन...एक दिन वह ज़रूर इस नरक में से निकल जाएगी, देख लेना.

सारी देह से मानो सड़ांध फूट रही थी. अभी सूरज नहीं निकला था. लोग सो रहे थे. आकाश पर तारे थे. घर के पीछे ही पोखर था. लड़की ने निश्चय किया कि सबसे पहले देह से 'उसका' स्पर्श छुड़ाएगी. गई और नहा आई.

लौटी तो आदमी अभी सो ही रहा था. नाक बज रही थी और खुले मुंह में मक्खियां घुस रही थीं. लड़की को भूख लगी. घर में कुछ नहीं था. बाहर आई कि एक पड़ोसन दिखाई दे गई. दोनों ने एक-दूसरे को देखा. पड़ोसन ने पास आते ही कहा कि सुबह-सुबह मिल जाए तो मिल जाए वरना फिर गोबर दिन-भर नहीं मिलता. गांव की औरतें इतनी ख़राब हैं कि गाय-भैंस की पूंछ में हाथ घुसेड़कर सारा गोबर निकाल ले जाती हैं. तुम सुनाओ, मरद के साथ रात कैसे कटी? लड़की ने ससंकोच भूख का जिक्र किया. पड़ोसन तुरंत गई और एक दोने में पके कटहल का एक टुकड़ा रखकर ले आई. सिर पर हाथ फेरकर बोली, ले, खा ले. ईश्वर तुझे जल्दी से बेटे का मुंह दिखाए.

अभी यह बात चल ही रही थी कि लड़की की पीठ पर ज़ोर से किसी ने लात मारी. इतनी ज़ोर से कि लड़की आगे की तरफ़ मुंह के बल गिरी और दांतों से ख़ून निकलने लगा. दोना कहीं गिरा. पड़ोसन डरकर भाग गई.

पिटाई ज़रूरी है. कारण का होना आवश्यक नहीं है. पत्नी की नियमित पिटाई ज़रूरी है. कल रात जो कुछ हुआ वह तो घर के भीतर हुआ. अब सार्वजनिक रूप से उस आधिपत्य की घोषणा भी तो आवश्यक है. जब तक सारा गांव जमा होकर लड़की के लिए दया की भीख न मांगने लगे, वह उसे मारता ही जाएगा. इसी तरह औरत काबू में रहती हैं.


लड़की को चाहिए था कि पहली चोट लगते ही दहाड़ें मारकर रोती या फिर पलटकर खुद भी मारती, जो हाथ में आए उसी से. इतने साल मामी के यहां नहीं रही होती तो शायद ऐसा ही करती. लेकिन लड़की भूल चुकी थी और परेशानी यह थी कि वह एक तरह से पूरे इलाके में कुख्यात हो चुकी थी. जैसे कोई पालतू कुत्ता जंगली कुत्तों के बीच आ गया हो. परेशानी यह थी कि वह सुंदर जैसी थी, यानी ज़रूर कुलटा भी होगी. परेशानी यह थी कि साहब लोगों के बीच रहकर दीन-दुनिया के बारे में बहुत सारी बातें जानने लगी थी_यानी ज़रूर मन-ही-मन पति को मूर्ख और हेठा समझती होगी_या समझेगी. परेशानी यह थी कि रेल में बैठकर दूसरे मुलुक घूम आई थी_यानी ज़रूर खूब माल कमाकर लाई होगी. और परेशानी यह थी कि इसके बाप ने वादा करके भी दहेज में कुछ नहीं दिया था और अपने क़र्ज़े और अपनी दरिद्रता का राग अलापने लगा था ऐन टाइम पर. जिसे साइकिल जैसी वस्तु उपहार में मिल जाती हो, उसका बाप यदि कुछ न दे तो उसे तो मारना ही चाहिए. बल्कि मार ही डालना चाहिए.

पूरे एक साल लड़की सहन करती रही. ख़ुद को हालात के अनुसार गड़ा ही नहीं किसी से...न गाली-गलौज...न पति से न और किसी से. इससे पति की देह में और आग लग जाती. सब उसकी तारीफ़ क्यों करते हैं? वह अच्छी है तो अच्छी क्यों है? लबार क्यों नहीं है? छिनाल क्यों नहीं है? कुलटा क्यों नहीं है? पति की आशंकाओं को ग़लत सिध्द करने का उसे क्या अधिकार है? ज़रूर वह पति को नीचा दिखाने और उसका मज़ाक़ उड़वाने के लिए ही अच्छी है.

पति-पत्नी के झगड़े में कोई बीच में नहीं पड़ता...लेकिन जब वह घर के बाहर लड़की को बेदर्दी से पीटता तो बहुत-से लोग बीच में पड़ते और उसे बचाने की कोशिश में पति को भला-बुरा कहते. इससे वह और चिढ़ता. साली ने सबको अपनी तरफ़ मिला रखा है. उसने लड़की के और साहब के, लड़की के और मामी के, लड़की के और शहरी लोगों के बीच कुछ बेहद गंदे संबंध कल्पित किए और उन्हें घर-घर जाकर सुनाने लगा, ताकि उसकी क्रूरता और वहशीपने को एक तार्किक आधार तो मिल ही जाए. अनेक लोगों ने इस बकवास पर विश्वास नहीं किया, लेकिन लड़की के कानों तक भी बात तो पहुंची ही...वह अर्ध्दविक्षिप्त-सी हो गई_पति सारे सभ्य समाज को अपनी कुंठाओं की विष्ठा में लपेटकर सारे सभ्य समाज से अपने असभ्य रह जाने का बदला ले रहा था...और माध्यम थी लड़की.


पूरे एक साल उसने धैर्य से सहन किया. फिर थक गई. हताश हो गई. स्मृति की परीधि से बाहर चले गए साहब...मामी...बच्चा... रामेश्वर...साइकिल...ब्रा...टिकुली...मां-बाप... सहेलियां...गांव का पोखर...निश्चिंत बचपन... टोपवाले आदमियों का आकर ज़मीन खोदना... ज़मीन के नीचे ख़ज़ाना है...बच्चों का यों ही घूमते-घूमते कॉलोनी चले जाना और एक मामी का पूछना_काम करोगे? भात देंगे. पैसे देंगे. और सबका खिलखिल बगटुट भाग आना...अब रेलगाड़ी एक घुप्प अंधेरे बोगदे में अनंतकाल के लिए खड़ी हो गई थी और कोई भी उसे टॉर्च लेकर नहीं ढूंढ रहा था.

साल-भर बाद एक रात लड़की ने यातना के इस अंतहीन सफ़र को एक झटके से ख़त्म कर दिया. गले में फंदे लगाकर छत से लटक गई. शायद मृत्यु के उस पार ही कहीं एक हरी-भरी घाटी हो...जिसमें एक लाल कबेलू की छतवाली झोंपड़ी हो...छत पर कद्दू की बेल चढ़ी हो...बेल में पीले-पीले फूल खिले हों...और स्कूल की यूनिफॉर्म पहने एक गोरी, गोल-मटोल बच्ची दरवाज़े पर खड़ी अपनी नन्हीं-नन्हीं हथेली नाचकर उसे टा टा करती हो.
ख़बर कुछ दिन बाद मामी तक भी पहुंची. वह धम्म से सिर पकड़कर बैठ गई.


आधा घंटा सहाब और मामी ख़ामोश बैठे रहे. फिर लंबी उसांस छोड़कर मामी उठीं और बोलीं, अच्छी थी बेचारी.

फिर उस घर में लड़की की बात कभी नहीं हुई.


ग़ज़ल
एजाज़ अख़्तर

कुछ सदा सुबह तक तो आएगी
चूड़ियों की खनक तो आएगी

सूखी ऑंखों के सूने जंगल में
ऑंसुओं की महक तो आएगी

लाख रस्ते बदल के घर जाओ
राह में वह सड़क तो आएगी

एक पल ही को वह लगा था गले
अपने तन से महक तो आएगी

चाहे वह कुछ न पहने पैरों में
पायलों की छनक तो आएगी

***-***
रचनाकार - एजाज़ अख़्तर के कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें

.

.


हमारे किशोर किस ओर
- मृणाल पाण्डे

शेख सादी के ‘गुलिस्तां' में एक लड़के की कहानी आती है जिसे बादशाह-सलामत का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए शाही हकीम के बताए नुस्खे के तहत हलाक (बलि) किया जाना था पर यह लड़का जब बादशाह सलामत के सामने ले जाया गया तो मुस्कुरा पड़ा. बादशाह ने अचरज से पूछा कि अपनी मौत की इस घड़ी में तू हँसने लायक ऐसा क्या देख रहा है? लड़के ने जवाब दिया, "बच्चे को पहला सहारा मां-बाप का होता है जो उसे पालते-पोसते हैं और बच्चे पर जुल्म हो तो फरियाद लेकर तुरत काजी के पास जाते हैं ताकि बादशाह सलामत न्याय करें. यहाँ हालत यह है कि मेरे मां-बाप ने पैसे के लालच में मुझे बेच दिया है और काजी साहब ने बादशाह को खुश करने को तुरत फतवा दे दिया है कि इस लड़के का मारा जाना ही ठीक है. जब काजी और मां-बाप ही नहीं, खुद बादशाह सलामत भी मेरी मौत में ही अपना भला देख रहे हों तो मैं जुल्म का इनसाफ उनसे करने को क्या कह सकता हूँ? कहते हैं, बादशाह ने शर्मिंदा होकर लड़के को गले से लगाया और उसे बहुत सारा धन देकर यह कहते हुए विदा कर दिया कि एक बेगुनाह के खून से अपनी जान बचाने से तो मेरा मरना ही बेहतर होगा.

देश के महानगरों में बदहवास होकर कालेजों में दाखिले के लिए भटकते या उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोध और समर्थन में लामबंद होते हुए लड़कों और लड़कियों को देखकर यह कहानी मन में कौंध गई. कहते हैं युवावस्था मनुष्य के जीवन की सबसे स्वर्णिम, सबसे आनंदकारक अवस्था होती है पर इन दिनों हमारे किशोरों को देखिए तो उनकी बेचारगी पर तरस आता है. जिन अभिभावकों से उनको शारीरिक-मानसिक श्रम की अति से बचाने की उम्मीद की जाती है वे स्कूली दिनों से ही ऊँची तनख्वाह की नौकरी दिलानेवाले उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लालच में बच्चों को बेपनाह ट्यूशनों और रतजगों के भँवर में ठेलते रहते हैं. इसका सीधा नतीजा परीक्षाकाल आने पर छात्रों में बढ़ते तनाव और आत्महत्या की प्रवृत्ति के रूप में हमें दिखाई देने लगा है. नतीजे निकल आए तो शुरू होती है, ‘कट-ऑफ़' और ‘कैट' की ‘मार्क्स' वादी कवायद. ऐसे में उच्च शिक्षण संस्थानों में अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान उनको अपने घावों पर नमक छिड़कने जैसा लग रहा है.

पिछड़ों के लिए आरक्षण तथा गैर पिछड़ों के लिहाज से सीटें बढ़वाने को लेकर भले ही राजनीति हो रही हो लेकिन इस क्षेत्र में आरक्षण को बढ़ाने से पहले उपलब्ध शिक्षण संस्थानों के संसाधनों, संकायों में नई सीटों को आत्मसात करने की क्षमता और सबसे ऊपर शिक्षकों की अतिरिक्त भर्तियों पर समय रहते पूरा विचार और तैयारी जरूरी बनती है. पिछले छप्पन सालों से अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों को हमारे संविधान ने आरक्षण दे रखा है फिर भी अधिकतर शिक्षण संस्थानों में आरक्षित कोटा पूरी तरह नहीं भर पाता. झारखंड, उत्तरांचल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे जनजातीय बाहुल्य वाले प्रांतों से केंद्रीय सिविल सेवा या इंजीनियरिंग सेवा परीक्षाओं में आज भी बमुश्किल एक दर्जन लोग चुने जाते होंगे और खुद जनजाति कल्याण मंत्रालय स्वीकार करता है कि इसकी मूल वजह प्राइमरी तथा सेकेंडरी स्तर पर कमजोर वर्गों के छात्रों को समुचित शिक्षा का न मिल पाना है लेकिन इन दोनों स्तरों की बेहतरी और वहाँ पर आरक्षण का प्रावधान करने की बजाए विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थों और कालेज स्तरीय पिछड़ों, खासकर छात्रों के वोट-बैंक हथियाने की होड़ के तहत बात प्रशिक्षण की गारंटी की बजाय भर्ती की गारंटी यानी आरक्षण कोटा बढ़ाने की ही हो रही है वह भी सिर्फ उच्च शिक्षा क्षेत्र में, जहाँ इन वर्गों के मुट्ठीभर ही छात्र पहुँच पाते हैं और जो पहुँचते भी हैं, वे प्रायः मलाईदार परतों से ही जुड़े होते हैं.

.

.

अब ये छात्र मार्गदर्शन और न्याय की उम्मीद किससे करें? उन मध्यवर्गीय अभिभावकों से जिन्हें ऊँची तनख्वाह की नौकरी (और परिप्रेक्ष्य में मिलने वाले ऊँचे दहेज) का इतना लालच है कि वे बच्चों को कोड़ामार साइसों की तरह दिन-रात दौड़ा रहे हैं? उन काजियों से जो चुनाव जितवाने के लिए सामाजिक न्याय के नाम पर लाखों छात्रों का खून बहाना अनिवार्य समझ रहे हैं? या उस बादशाह से, जिसकी जमीनी पकड़ लगातार कमजोर पड़ रही है और जो इस खून से अपनी सियासी सेहत सुधारने का इच्छुक है?

पिछले वर्षों में हमने देखा है कि कैसे हर न्यायपरक और लोकतांत्रिक सोच जब-जब वह हमारी राजनीति के अंतःस्थल से निकलकर इतिहास में अपनी राह बनाने लगती है, अपने मौलिक स्वरूप से स्खलित होकर मूल का विकृत कैरिकेचर बन जाती है. हर किसी जाति को तरक्की के इतने अवसर मिलें कि उसका सदस्य अपनी जातीय अस्मिता के बोध से भरे, उस पर गर्व करे, यह एक सुंदर सोच थी लेकिन जमीनी राजनीति के साथ जुड़ने पर उसने हर पार्टी के भीतर एक-से-एक अहंग्रस्त, आक्रामक और जातीय असहिष्णुता से भरपूर नेता पैदा कर डाले. मनुवादी व्यवस्था की आलोचना हम इसलिए करते हैं और ठीक ही करते हैं कि उसके वर्चस्व तले दलित तथा पिछड़ी जातियाँ और हर जाति-वर्ग की स्त्रियाँ अपनी मानवीय विशिष्टता गंवाकर एक गुलाम, ग्लानिबोध और हीनभावना से भरी भीड़ बनने को बाध्य होते रहे हैं पर क्या गैर मनुवादी जातीय अस्मिता में जीते हुए लोग सही अर्थों में अधिक लोकतांत्रिक, उदार और समदर्शी नागरिक बन पाए हैं? क्या उनमें भी हम स्त्रियों के लिए आरक्षण पर वैसा ही अड़चनवादी रूख और मलाईदार परत की छटनी कर अपनी जाति के पिछड़े लोगों को आगे लाने के प्रति ठंडी उदासीनता नहीं दीखती?

उच्च शिक्षा के क्षेत्र को सभी वर्गों-जातियों के बच्चों के लिए समान रूप से सुलभ बनाने की बहस अधूरी रहेगी अगर हमारे अभिभावक, काजी और बादशाह सीधे-सीधे उन प्रश्नों का सामना नहीं कर पाते जिन्हें ये किशोर उठा रहे हैं और वे प्रश्न सीधे हमारे नेतृत्व के स्वरूप, शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों की बहुलता और प्रतिभा के मानकों से जुड़े हुए हैं, इस बात से नहीं कि उत्तर प्रदेश के चुनावों में यादवों को हराने के लिए एक जातीय संघर्षवाहिनी कैंपसों में कैसे खड़ी की जाए? या कि मलाईदार परत की कानूनी व्याख्या को कैसे अनंत समय तक छेंक दिया जाए!

**-**
साभार - कादम्बिनी, जुलाई 2006.

.
इंटरनेट से विविध फ़ॉन्टों की साइटों से उतारे गए तथा यूनिकोडित किए गए कुछ चुटकुले

चुटकुला # 0553
पत्नी (पति से)- जब मैं मर जाऊंगी, तो तुम क्या करोगे?
पति (पत्नी से)- मैं भी मर जाऊंगा।
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- क्योंकि ज्यादा खुशी से आदमी मर जाता है।


चुटकुला # 0554
एक वृद्ध महिला अपनी सहेली से बोली - मैंने अपने पति की दांतों से
नाखून काटने की आदत छुड़ा दी है।
सहेली ने पूछा- कैसे?
वृद्धा ने जवाब दिया-मैंने उनके दांत छुपाकर रख दिए है।

एक बेवकूफ पति ने अपनी पत्नी से पूछा- बताओ, शादी में दूल्हा घोड़ी की
जगह गधे पर चढ़कर क्यों नहीं आता?
पत्नी ने जवाब दिया- ताकि दुल्हन एक साथ दो गधो को देखकर बेहोश न
हो जाए।

चुटकुला # 0555

पत्नी अपने पति के खर्चीले स्वभाव से बहुत परेशान थी।
पति ने अपनी पत्नी से पैसे मांगे तो पत्नी ने खीजकर कहा- तुमको मैंने
कितनी बार कहा है कि बजट से आगे जाकर खर्च मत किया करो। हर
महीने भीख मांगने की नौबत आ जाती है।
पति- वैसे भी तो हर महीने मैं तुमसे भीख ही मांगता हूं।

चुटकुला # 0556

पत्नी (पति से)- तुम बहुत फिजूलखर्ची करते हो।
पति(पत्नी से)- तुम यह कैसे कह सकती हो?
पत्नी(पति से)- तुम जो आग बुझाने वाला यंत्र खरीदकर लाए हो, वह अभी
तक एक बार भी काम नहीं आया।

चुटकुला # 0557

पति (पत्नी से)- कल रात मैंने बहुत ही अच्छा सपना देखा।
पत्नी (पति से)- ऐसा क्या देख लिया तुमने?
पति (पत्नी से)- कल रात मैंने देखा कि मुझे भारत की ओर से अंतरिक्ष में
भेजा गया।
पत्नी (पति से)- हां-हां, तुम्हें तो भेजना ही चाहिए था क्योंकि अंतरिक्ष में
परीक्षण के लिए जानवरों को ही भेजा जाता है।

चुटकुला # 0558

पत्नी ने पति से पूछा, ‘क्यों जी, इतनी देर तक आप कहां रहे?‘
‘देखो, समझदार पत्नी अपने पति से ऐसे प्रश्न नहीं पूछती।‘ पत्नी को
समझाते हुए पति ने कहा।
लेकिन पत्नी शांत नहीं हुई और बोली, ‘मगर, समझदार पुरुष भी तो अपनी
पत्नी से.....‘
‘बस रहने भी दो, समझदार पुरुष की पत्नी नहीं होती।‘ पत्नी की बात बीच
में ही काटकर पति ने कहा।

चुटकुला # 0559

व्यवसायी पति एक सप्ताह के लिए शहर से बाहर जाने वाला था। उसने
पत्नी को समझाया, ‘देखो कल से जो भी चिट्‌ठी आए, तो उस पर लिख
देना, कि वह कब आई।‘
पत्नी ने कहा, ‘आप चिंता न करे।‘
जब पति लौटकर वापस आया और डाक देखने लगा, तो हर चिट्‌ठी के
कोने में लिखा था, ‘आज आई।‘

चुटकुला # 0560

पति (पत्नी से)- समझ में नहीं आता, कि आखिर तुम कुत्ता ही क्यों
खरीदना चाहती हो?
पत्नी (पति से)- इसलिए कि आपके दफ्तर चले जाने के बाद मेरे
आगे-पीछे घूमने वाला कोई तो हो।

चुटकुला # 0561

पत्नी (पति से)- जानते हो संगीत में कितनी शक्ति होती है?
पति (पत्नी से)- कितनी?
पत्नी (पति से)- संगीत मे इतनी शक्ति है कि पानी गरम हो सकता है।
पति (पत्नी से)- अरे भई, जब तुम्हारा गाना सुन कर मेरा खून खौल
सकता है,तो पानी क्या चीज है।
चुटकुला # 0562
पति (पत्नी से)- आज किसी ने मेरी जेब काट ली।
पत्नी (पति से)- तो पुलिस में रिपोर्ट की?
पति (पत्नी से)- नहीं, मैंने गलती कर दी।
पत्नी (पति से)- वह क्या?
पति (पत्नी से)- जेब कटने के तुरंत बाद मैंने उसे दर्जी से सिलवा लिया।

.

.
चुटकुला # 0563

पत्नी (पति से)- मुझे आज तक एक बात समझ नहीं आई।
पति (पत्नी से)- कौन सी बात?
पत्नी (पति से)- यही कि जब भी तुम अपने ससुराल जाते हो, बहुत सहमे
से रहते हो? जब शादी करने गए थे, उस दिन तो बहुत अकड़ रहे थे।
पति (पत्नी से)- उस दिन मैं अकेला नहीं था, पूरी बारात के साथ था।

चुटकुला # 0564

एक महिला अपने पति से कार चलाना सीख रही थी।
पत्नी (पति से)- देखिए कार का शीशा ठीक से नहीं लगा हुआ है।
पति (पत्नी से)- क्यों, क्या गड़बड़ है?
पत्नी (पति से)- इसमे मैं पीछे से आ रहा ट्रैफिक तो देख पाती हूं पर
अपना चेहरा नहीं।

चुटकुला # 0565

पति (पत्नी से)- देखो, कभी-कभी गुस्सा भी लाभदायक होता है।
पत्नी (पति से)- अरे नहीं, ये कैसे हो सकता है?
पति (पत्नी से)- देखो कल तुम गुस्से में थी और तुमने सारा गुस्सा कपड़ो
पर उतार दिया। मेरे सारे कपड़े कितने साफ और उजले हो गए।

चुटकुला # 0566

पति (पत्नी से)- तुम इतनी अच्छी रोटियां नहीं बना सकतीं, जितनी अच्छी
मेरी मां बनाती थीं।
पत्नी (पति से)- और तुम भी उतना अच्छा आटा नहीं गूंथ सकते, जितना
अच्छा मेरे पिताजी गूंथते थे।

चुटकुला # 0567

पत्नी (पति से)- तुम बहुत फिजूलखर्ची करते हो।
पति (पत्नी से)- तुम यह कैसे कह सकती हो?
पत्नी (पति से)- तुम जो आग बुझाने वाला यंत्र खरीदकर लाए हो, वह
अभी तक एक बार भी काम नहीं आया।
चुटकुला # 0568

पत्नी (पति से)- क्या बात है, आप आधी रात को इस तरह पेरशान होकर
कमरे में क्यों टहल रहे हैं?
पति (पत्नी से)- अपने ससुरजी की बात याद कर रहा हूं।
पत्नी (पति से)- कौन सी बात?
पति (पत्नी से)- जब मैं तुम्हारे घर शादी का प्रस्ताव लेकर गया था, तब
उन्होंने मुझसे कहा था कि यदि मैंने तुमसे शादी करने की हिम्मत की तो
वह मुझे उम्रकैद करा देगे।
पत्नी (पति से)- हां, पर अब इस बात का क्या लेना देना?
पति (पत्नी से)- अरे अब जाकर ही तो समझ में आया कि उम्रकैद ज्यादा
बेहतर थी?

चुटकुला # 0569

एक दिन पत्नी ने पति से बड़े शिकायती लहजे में कहा - अब मुझे पक्का
यकीन हो रहा है कि आपको मुझसे पहले जैसी मोहब्बत नहीं रही।
पति (पत्नी से)- तुम्हें यह गलतफहमी कैसे हुई?
पत्नी (पति से)- गलतफहमी नहीं, असलियत है। पहले जब आप खाना
खाने बैठते थे, तो खुद कम खाते थे और मुझे ज्यादा खिलाते थे।
पति (पत्नी से)- अरे....अरे। बात दरअसल, यह है कि अब तुम पहले जैसा
बेस्वाद खाना नहीं बनाती।

चुटकुला # 0570

पति-पत्नी आपस में बात कर रहे थे, तभी पत्नी ने पति से पूछा- क्या तुम
मुझसे सच में प्यार करते हो।
पति (पत्नी से)- यह भी कोई पूछने की बात है।
पत्नी (पति से)- वायदा करो कि मेरी मौत के बाद तुम हर रोज मेरी कब्र
पर आया करोगे।
पति (पत्नी से)- हां-हां, निश्चिंत रहो। कब्रिस्तान मेरे दफ्तर के रास्ते में ही
पड़ता है।

चुटकुला # 0571

एक व्यक्ति घर में बैठकर गाना गा रहा था यह देखकर उसकी पत्नी ने
कहा-
पत्नी (पति से)- मेरे पिता जी जब गाते थे तो उड़ते हुए पंछी गिर जाया
करते थे।
पति (पत्नी से)- क्या तुम्हारे पिता जी मुंह में कारतूस भर कर गाते थे।

शराब के नशे में डूबे हुए पति से पत्नी ने कहा - क्या कहा, तुम मुझे
पहचान नहीं रहे हो, मैं तुम्हारी बीवी हूं।
इस पर पति ने लड़खड़ाती जुबान में कहा - जानम, शराब पीकर हम सभी
गम भूल जाते है।

चुटकुला # 0572

पत्नी (व्यापारी पति से)- हमारी बेटी अब शादी लायक हो गई है। उसके
लिए लड़का देखना शुरू कर दीजिए।
पति (पत्नी से)- कितने साल का लड़का देखूं?
पत्नी (पति से)- हमारी बेटी 18 साल की है, तो लड़का कम से कम 20
साल का तो होना ही चाहिए।
पति (पत्नी से)- अगर 20 साल का सही लड़का न मिले तो क्या दस-दस
साल के दो लड़के ले आऊं?

चुटकुला # 0573

पत्नी (पति से)- मैंने दुनिया की सबसे खूबसूरत महिला को देखा, उस पर
वो कपड़े खूब फब रहे थे।
पति (पत्नी से)- अच्छा, फिर?
पत्नी (पति से)- फिर क्या? मैं आईने के सामने से हट गई।

चुटकुला # 0574

पत्नी (पति से)- यह लीजिए, बालों को मजबूत करने वाले तेल की
शीशी...।
पति (पत्नी से)- पर मेरे बाल तो झड़ते ही नहीं।
पत्नी (पति से)- ये आपके लिए नहीं, आपकी सेक्रेट्री के लिए है।

चुटकुला # 0575

पत्नी (पति से)- आज आप बहुत देर से घर आए।
पति (पत्नी से)- और तुम इतनी रात तक जाग कर क्या कर रही हो।
पत्नी (पति से)- मैं पांच घंटे से आपके इंतजार में जाग रही थी।
पति (पत्नी से)- और मैं पांच घंटे से इसी इंतजार में बाहर खड़ा था कि
तुम सो जाओ तो मैं अंदर आऊं।

चुटकुला # 0576

पति (पत्नी से)- आज किसी ने मेरी जेब काट ली।
पत्नी (पति से)- तो पुलिस में रिपोर्ट की?
पति (पत्नी से)- नहीं, मैंने गलती कर दी।
पत्नी (पति से)- वह क्या?
पति (पत्नी से)- जेब कटने के तुरंत बाद मैंने उसे दर्जी से सिलवा लिया।
चुटकुला # 0577

पति (पत्नी से) - चलो आज किसी होटल में चलकर खाना खाते है।
पत्नी (पति से) - क्यों, क्या मेरे हाथ के बने खाने से बोर हो गए हो?
पति (पत्नी से)- नहीं। दरअसल, आज बर्तन साफ करने का मन नहीं कर
रहा।

चुटकुला # 0578

पति (पत्नी से)- क्यों जी आज तुमने मेरा कोट नहीं झाड़ा?
पत्नी (पति से)- झाड़ा तो था, क्यों क्या हुआ?
पति (पत्नी से)- बात कोई विशेष नहीं है। मेरे कोट की जेब में सौ का नोट
रखा हुआ था और वह अब भी है।

चुटकुला # 0579

पति (पत्नी से)- आज मैंने दस रुपए बचाए।
पत्नी (पति से)- वो कैसे?
पति (पत्नी से)- मैं दफ्तर से घर बस के पीछे-पीछे दौड़ते हुए आया हूं।
पत्नी (पति से)- तभी तो कहती हूं कि तुम मूर्ख हो, टैक्सी के पीछे दौड़ते
तो पच्चीस रुपए बचते।

चुटकुला # 0580

पति (पत्नी से)- जब भी मैं पिताजी की तलवार देखता हूं तो मेरा लड़ाई
पर जाने का दिल करता है।
पत्नी (पति से)- तो चले क्यों नहीं जाते?
पति (पत्नी से)- क्या करूं, इसके बाद तुरंत उनकी नकली टांग की याद
आ जाती है।

पति-पत्नी फिल्म देखने गए, तो पति ने एक पान पत्नी के लिए खरीदा।
पत्नी (पति से)- एक अपने लिए भी तो ले लो।
पति (पत्नी से)- मैं बिना पान खाए भी खामोश रह सकता हूं।

चुटकुला # 0581

नवविवाहिता पत्नी (पति से)- यदि ससुराल पहुंचने के बाद घरवालो ने मुझे
गाना गाने के लिए कहा तो मैं क्या करूंगी?
पति (पत्नी से) - तब तुम गाना सुना देना, ताकि फरमाइश करने वालो
को अपनी गलती का एहसास हो जाए।

चुटकुला # 0582

पत्नी (पति से)- आज तो इस वॉल क्लॉक ने मेरी मां को मार ही दिया
था। मेरी मां के उठने के कुछ सेकंड बाद यह गिर पड़ी।
पति (पत्नी से)- मैं तो पहले ही कह रहा था कि यह घड़ी आजकल धीरे
चल रही है।
चुटकुला # 0583

पति (पत्नी से)- स्कूल के जमाने में मैं जिधर से गुजरता था, लड़कियो की
नजरे मुझ पर ही टिकी रहती थी।
पत्नी (पति से)- मैं तो आज भी यही कहती हूं कि तुम्हें किसी अजायबघर
में होना चाहिए था।

चुटकुला # 0584

पत्नी(पति से)- अजी सुनते हो, बबलू तो आजकल झूठ पर झूठ बोलना
सीख रहा है। जैसे सच बोलना तो उसे आता ही नहीं है।
पति(पत्नी से)- मां के गुण तो बच्चा पहले सीखता है, पिता के गुण तो
उसमें धीरे-धीरे ही आएंगे।

चुटकुला # 0585

पत्नी (पति से)- यह लीजिए बालों को मजबूत करने वाले तेल की
शीशी....।
पति (पत्नी से)- पर मेरे बाल तो झड़ते ही नहीं।
पत्नी (पति से)- अजी, आपके तो नहीं, आपकी खूबसूरत सेक्रेट्री के तो
झड़ते हैं।

चुटकुला # 0586

पत्नी (पति से)- सुनो जी, आपकी वह नीली शर्ट मुझसे जल गई है।
पति (पत्नी से)- कोई बात नहीं डार्लिंग, मेरे पास वैसी एक और शर्ट है।
पत्नी (पति से)- पता है, तभी तो मैंने उस शर्ट में से कपड़ा काटकर जली
हुई शर्ट पर पैबंद लगा दिया है।

चुटकुला # 0587

पत्नी (पति से)- तुम जब दफ्तर चले जाते हो, तो मुझे बहुत घबराहट
होती है।
पति (पत्नी से)- तुम चिंता न करो। मैं इतनी जल्दी लौट आऊंगा कि तुम्हें
पता भी नहीं चल पाएगा।
पत्नी (पति से)- यही सोचकर तो और घबराहट होने लगती है।

चुटकुला # 0588

पति (अपनी खुशी व्यक्त करते हुए)- कल रात मुझे सपने में भारत की
ओर से अंतरिक्ष में भेजा गया।
पत्नी (पति से)- हां-हां, तुम्हें तो भेजना ही चाहिए था क्योंकि अंतरिक्ष में
परीक्षण के लिए जानवरो को ही भेजा जाता है।

चुटकुला # 0589

पत्नी (पति से)- जो आदमी चोरी करता है, वह अपनी जिंदगी में कभी न
कभी जरूर पछताता है।
पति (पत्नी से)- हां ठीक कहती हो, शादी से पहले मैंने तुम्हारा दिल
चुराया था। आज तक पछता रहा हूं।

चुटकुला # 0590
पति (पत्नी से)- आज संडे है, तो मैंने सोचा कुछ ऐश की जाए।
पत्नी (पति से)- वह कैसे?
पति (पत्नी से)- यह लो पिक्चर की तीन टिकट।
पत्नी (पति से)- तीन किसके लिए?
पति (पत्नी से)- एक तुम्हारे लिए और दो तुम्हारे मम्मी-पापा के लिए।

चुटकुला # 0591

पत्नी (पति से)- कल रात तुम नींद में मुझे गालियां क्यों दे रहे थे?
पति (पत्नी से)- तुमको गलतफहमी हुई है।
पत्नी (पति से)- कैसी गलतफहमी?
पति (पत्नी से)- यही कि मैं सोया हुआ था।

चुटकुला # 0592

पत्नी (पति से)- डियर, क्या कभी तुम्हारे दिल में यह ख्याल आया है कि
मेरी शादी किसी और से हो जाती तो अच्छा होता।
पति (पत्नी से)- बिल्कुल नहीं।
पत्नी (पति से)- सच।
पति (पत्नी से)- मैं किसी और का बुरा क्यों चाहूंगा ?

चुटकुला # 0593

लंबी बीमारी के बाद रमेश की जब आंख खुली तो उसने पास खड़ी अपनी
बीवी से पूछा - मैं कहां हूं? क्या स्वर्ग में।
पत्नी ने जवाब दिया- नहीं अभी तुम नरक में ही हो।
रमेश ने पूछा- इसका क्या सबूत है?
पत्नी ने कहा- क्या मैं सबूत के तौर पर काफी नहीं हूं।
चुटकुला # 0594

पति (पत्नी से)- मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं।
पत्नी (पति से)- क्या?
पति (पत्नी से)-शादी से पहले मेरे दस अफेयर थे।
पत्नी (पति से)- अब जब कुंडली मिली है तो गुण तो मिलेंगे ही।
चुटकुला # 0595

एक महाशय अपने पड़ोसी के बेटे को मिट्टी के खिलौने बनाना सिखा रहे
थे।
बच्चे ने उत्सुकता से पूछा - अंकल आप हाथ से इतना अच्छा गीली
मिट्टी का गोला कैसे बना लेते है?
अंकल (बच्चे से)- बेटा नियमित प्रैक्टिस से।
बच्चा (अंकल से)- वह कैसे अंकल?
अंकल (बच्चे से)-क्या बताऊं बेटा अगर गोल रोटी नहीं बना पाता तो
तुम्हारी आंटी नहीं खाती।

चुटकुला # 0596

संजीव (धावक मित्र हरीश से)- तुम हर बार दौड़ने की प्रतियोगिता में
प्रथम आते हो, इसका क्या राज है?
हरीश (संजीव से)- यार, मैं जब भी दौड़ना शुरू करता हूं तो यह मान
लेता हूं कि मेरी बीवी मेरे पीछे आ रही है।

चुटकुला # 0597

अजी सुनते हो, बबलू तो आजकल झूठ पर झूठ बोलना सीख रहा है। जैसे
सच बोलना तो उसे आता ही नहीं है। पत्नी ने पति से कहा।
‘मां के गुण तो बच्चा पहले सीखता है, पिता के गुण तो उसमें धीरे-धीरे
ही आएंगे।‘ पति ने मुस्कराते हुए जवाब दिया।

चुटकुला # 0598

नए मकान मालिक के पास एक शख्स गया और कहने लगा, ‘साहब,
आपकी इमारत की तीसरी मंजिल पर जो औरत रहती है, वह अपने शौहर
से लड़ती रहती है, जिसकी वजह से सारे पड़ोसियों को तकलीफ होती है।
आप मकान मालिक की हैसियत से उस औरत को समझाएं कि वह अपने
शौहर से लड़ाई-झगड़ा न किया करे।‘
मकान मालिक ने पूछा, ‘क्या आप उस औरत के पड़ोसी है?‘
जी नहीं मैं उसका शौहर हूं, उस शख्स ने जवाब दिया।

चुटकुला # 0599

मिस्टर एंड मिसेज शर्मा की कार को ट्रैफिक हवलदार ने रोक लिया और
कहा- जुर्माना निकालो, बगैर हैडलाइट के गाड़ी चलाते हो?
शर्मा जी बोले - दरअसल गाड़ी के ब्रेक कमजोर है इसलिए कल एक्सीडेंट
में हैडलाइट खराब हो गई थी।
कांस्टेबल बोला- यह तो दो जुर्म हुए। लाइसेंस दिखाओ।
‘वह तो अभी बनवाना है। ' शर्मा जी बोले।
कांस्टेबल बोला- तीन जुर्म किए हुए ऐसे ही घूम रहे हो? चलो सीधे पुलिस
स्टेशन।
तभी मिसेज शर्म्रा बीच में बोली - अरे साहब, इनकी बातों पर यकीन न
कीजिएगा। शराब पीकर ये ऐसी ही बहकी-बहकी बातें करते है।

चुटकुला # 0600

रेखा (मीना से)- मैंने सुना है कि तुम्हारे पति को नींद में चलने की
बीमारी है।
मीना (रेखा से)- हां...... है तो, मगर घबराने की बात नहीं है।
रेखा (मीना से)- क्यों?
मीना (रेखा से)- क्योंकि वे इतने आलसी है कि दो-चार कदम चलकर फिर
लेट जाते है।

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget