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बाल कथा - लोहे के पंजों वाला बच्चा...

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बाल कथालोहे के पंजों वाला बच्चा- ब्रजेश कानूनगोचुन्नू दौड़ता हुआ अपने घर में घुसा. उसके एक पैर के पंजे से खून बह रहा था. उसको पता ही नहीं था कि उसके पैर में चोट लगी है और खून बह कर फ़र्श को भी लाल कर रहा है. चुन्नू की मम्मी ने जैसे ही फ़र्श की और देखा, वे चौंक पड़ीं.‘इसका मतलब चुन्नू को आज भी चोट लगी है.' वे बड़बड़ाती हुई चुन्नू के कमरे में पहुँचीं. चुन्नू जल्दी-जल्दी आलमारी से गेंद और बल्ला निकाल रहा था.‘चुन्नू, तुम्हारे पैर में चोट लगी है और तुम्हें पता ही नहीं है?' चुन्नू की मम्मी ने घबरा कर चुन्नू से कहा.‘अरे!'. आश्चर्य से चुन्नू अपना पंजा देखने लगा. लाल-लाल खून देखकर उसे रोना आ गया.चुन्नू की मम्मी ने चुन्नू के पाँव को देखा. तलवे में कांच चुभने का स्पष्ट निशान था और खून बह रहा था. चुन्नू की मम्मी ने तुरंत उसका घाव दवा से धोया और मरहम-पट्टी कर दी. और चुन्नू को बाहर जाकर खेलने से मना कर दिया.चुन्नू को जब तब पैरों में लगती ही रहती थी. उसकी मम्मी उसे समझा-समझा कर परेशान हो चुकी थी कि खेलते-घूमते कैनवस के जूते पहना करे या स्लीपर पैरों में डालकर घूमे फिरे. मगर चुन्नू पर कोई…

चुटकुले 601 से 650

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चुटकुला # 0601
पति (पत्नी से)- प्रिय, कान में कुछ ऐसी मीठी बात कह दो, जिससे कि
मेरे पांव जमीन पर ही न पड़े।
पत्नी (कान के पास जाकर झुंझलाते हुए)- जाओ फांसी लगा लो।

चुटकुला # 0602पत्नी (पति से)- शादी पर जो तुमने सोने की अंगूठी दी थी, वह आज कही
गिर गई।
पति (पत्नी से)- आज ही मेरे कोट की जेब से सौ रुपए चोरी हुए, खैर कोई
बात नहीं।
पत्नी(पति से) - क्यों?
पति (पत्नी से)- तुम्हारी अंगूठी मिल गई।
पत्नी (खुश होकर)- सच कहां मिली?
पति (पत्नी से)- उसी जेब में से, जिसमें से सौ रुपए गायब हुए है।

चुटकुला # 0603पत्नी (पति से)- इस बस के कंडक्टर ने मेरी बेइज्जती की है।
पति (पत्नी से)- भला वह कैसे?
पत्नी (पति से)- जब मैं बस से उतरी तो कंडक्टर ने कहा तीन सवारियां
इस सीट पर आ जाए।

चुटकुला # 0604 मुकेश ने अपने दोस्त सुरेश से पूछा- पत्नी को पति के जीवन की
आधारशिला क्यों माना जाता है?
‘इसलिए कि वह शिला पति से टकराती रहती है।‘ सुरेश ने मुस्कराते हुए
जवाब दिया।

चुटकुला # 0605पत्नी (पति से)- इतनी देर हो गई, आखिर क्या ढूंढ रहे हो?
पति (पत्नी से)- कुछ नहीं।
पत्नी (पति से)- कुछ तो खोया है! चार घंटे से मैंरिज सर्टिफिकेट को
उलट-पलट …

कब लगा सर पे आसमान भी था?

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तरही शेर...लफ़्ज के जून-अगस्त 06 अंक में ग़ज़ल लिखने के लिए तरह -"तब लगा सर पे आसमान भी था"
समस्या-पूर्ति के रुप में दिया गया था.इस दफ़ा पत्रिका ने उन तरही ग़ज़लों को प्रकाशित किया है. ग़ज़लें तो ख़ैर यहाँ प्रकाशित करना संभव नहीं है, हाँ, उन ग़ज़लों के खास ‘शेर' रचनाकार में प्रकाशित किए जा रहे हैं जिनमें इस ‘तरह' जैसे का तैसा इस्तेमाल किया गया है. आप देखेंगे कि इस ‘तरह' को शायरों ने किस बखूबी से, मनोरंजक तरीके से इस्तेमाल किया है.**-**
बिजलियाँ आ के जब गिरीं छत पर
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-अभय कुमार अभयबाप का साया उठ गया सर से
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-पूरन अहसानउठ गया जब ‘अनीस' का साया
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-अनीस अहमद खाँ ‘अनीस'बेज़मीं कर दिए गए जब हम
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-डॉ. असलम इलाहाबादीयाद जब आया इम्तिहान भी था
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-सैयद मुहम्मद असलमटूट कर जब गिरा अचानक वो
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-इब्राहीम अश्कन रही जब जमीन पैरों में
"तब लगा सर पे आसमान भी था"-अज़ीज़ अ…

अनूप भार्गव की कुछ कविताएँ

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अनूप भार्गव की कुछ कविताएँकविता 1
एक ज्यामितीय कविता
मैं और तुम
एक ही दिशा में
न जाने कब से चलती हुई
दो समान्तर रेखाएं हैं ।आओ क्यों न इन
रेखाओं पर
प्यार का एक लम्ब डाल दें ?मैं इसी लम्ब के
घुटनें पकड़ पकड़
शायद तुम तक
पहुँच सकूँ !***-***
कविता 2अगले खम्भे तक का सफ़र याद है,
तुम और मैं
पहाड़ी वाले शहर की
लम्बी, घुमावदार,सड़क पर
बिना कुछ बोले
हाथ में हाथ डाले
बेमतलब, बेपरवाह
मीलों चला करते थे,
खम्भों को गिना करते थे,
और मैं जब चलते चलते
थक जाता था,
तुम आंखें बन्द कर के,
उँगलियों पर
कुछ गिननें का बहाना कर के
कहती थीं ,
बस उस अगले खम्भे तक और ।आज बरसों के बाद
मैं अकेला ही
उस सड़क पर निकल आया हूँ ,
खम्भे मुझे अजीब निगाह से देख रहे हैं
मुझ से तुम्हारा पता पूछ रहे हैं ,
मैं थक के चूर चूर हो गया हूँ
लेकिन वापस नहीं लौटना है
हिम्मत कर के ,
अगले खम्भे तक पहुँचना है सोचता हूँ
तुम्हें तेज चलने की आदत थी,
शायद अगले खम्भे तक पुहुँच कर
तुम मेरा इन्तजार कर रही होगी !
**-**.
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कविता 3आशंकामैं हर रोज़
बचपन से पले विश्वासों को
क्षण भर में
काँच के गिलास की तरह
टूट कर बिखरते देखता हूँ ।सुना है जीने के लिये
कुछ मूल्यों और विश्वासों
का होना ज़रूरी है,
इसलिये म…

रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ ताज़ी ग़ज़लें

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रमेशचन्द्र श्रीवास्तव की कुछ ताज़ी ग़ज़लेंग़ज़ल 1शब्दों की गूंज फिर मुझे दीवाना कर गई
सन्नाटा चीरती हुई दिल में उतर गईदीवार पर लगी हुई तस्वीर बोल उठी
कमरे में एक अजीब सी खुशबू बिखर गईबैरंग मौसमों का जमाना है आज कल
महके थे जिसमें जख़्म वह रूत भी गुजर गईदो दिन की जिन्दगी में न बेदाग़ रह सके
ये जिन्दगी भी जीने का इल्जाम धर गईमायूसियों ने घेर लिया फिर से रचश्री
उम्मीद की किरन भी न जाने किधर गई**-**
ग़ज़ल 2लालच की जिन्दगी तो कोई जिन्दगी नहीं
दरियाओं से भी प्यास ये बुझती कभी नहींहैं अपनी ख्वाहिशों के गुलाम अहले मयकदा
पीने की आरजू है मगर तिश्नगी नहींतुमको नहीं है होश मगर हमको होश है
जी भर के तुमने पी है मगर हमने पी नहींदौलत है जिनके पास वही बेसकून हैं
सब कुछ उन्हें मिला है पर आसूदगी नहींपतवार अपने हाथ में रखते जो रचश्री
कश्ती भँवर में फंस के कभी डूबती नहीं**-**ग़ज़ल 3भूल जाना तो एक बहाना है
इस बहाने भी याद आना हैऔर तो कुछ नहीं है अपने पास
चंद यादों का एक खजाना हैजिन्दगी खूब है और कुछ भी नहीं
सिर्फ एक सांस का फसाना हैकौन रहता है इस सराय में
सब मुसाफिर हैं, सबको जाना हैआदमी आदमी का है दुश्मन
"रचश्री"…

स्वयं प्रकाश की हृदयस्पर्शी कहानी : बलि

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बलि- स्वयं प्रकाशघनी हरियाली थी, जहां उसके बचपन का गांव था. साल, शीशम, आम, कटहल और महुए के पेड़. ये बड़े-बड़े पेड़. पेड़ के नीचे खड़े होकर एकदम ऊपर देखो तो सूरज न दिखाई दे. चारों तरफ़ धान के खेत, छोटे-बड़े पोखर और कुछ दूर इच्छा नदी. लकड़ी-मिट्टी-घास-गोबर के मकान और केले के पेड़, लौकी-कद्दू की बेलें और बैगन-टमाटर की बाड़ी. हाथ-हाथ भर के काले बिच्छू और चार-चार गज के ज़हरीले सांप. पोखर में कूदती-फांदती मछलियां और चूल्हे पर चढ़ी काली हांड़ी में खदबदाता भात.अगर सुख का मतलब पेट-भर भात और आंख-भर नींद ही होता है तो वह एक सुखी बचपन ही रहा होगा. था ही. पेट-भर भात और आंख-भर नींद से ज्यादा भी कुछ चाहिए होता है क्या?परिंदे सुखी होते हैं, लेकिन वे भी लड़ते हैं पेड़ की एक शाखा विशेष के लिए...मादा विशेष के लिए...वहां भी लड़ाइयां थीं. कई साल पहले लिए कुछ रुपयों की ख़ातिर मर्द लड़ते...बच्चों को लेकर, घर के सामने कचरा फेंकने से लेकर बेटा-बहू पर टोना करने तक के अबूझ आविष्कृत कारणों पर औरतें, और मरद पर काबू रखने या उससे पिटने के लिए पत्नियां अपने पतियों से लड़तीं. लेकिन लड़ाइयां ठंडी, कसैली, एकरस, हूहू रातों में आत्मा को, जीव…

एजाज़ अख़्तर की चूड़ियाँ खनकाती ग़ज़ल...

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ग़ज़ल
एजाज़ अख़्तरकुछ सदा सुबह तक तो आएगी
चूड़ियों की खनक तो आएगी सूखी ऑंखों के सूने जंगल में
ऑंसुओं की महक तो आएगी लाख रस्ते बदल के घर जाओ
राह में वह सड़क तो आएगी एक पल ही को वह लगा था गले
अपने तन से महक तो आएगी चाहे वह कुछ न पहने पैरों में
पायलों की छनक तो आएगी***-***
रचनाकार - एजाज़ अख़्तर के कुछ अन्य रचनाएँ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें ..

आलेख - हमारे किशोर किस ओर...

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हमारे किशोर किस ओर
- मृणाल पाण्डेशेख सादी के ‘गुलिस्तां' में एक लड़के की कहानी आती है जिसे बादशाह-सलामत का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए शाही हकीम के बताए नुस्खे के तहत हलाक (बलि) किया जाना था पर यह लड़का जब बादशाह सलामत के सामने ले जाया गया तो मुस्कुरा पड़ा. बादशाह ने अचरज से पूछा कि अपनी मौत की इस घड़ी में तू हँसने लायक ऐसा क्या देख रहा है? लड़के ने जवाब दिया, "बच्चे को पहला सहारा मां-बाप का होता है जो उसे पालते-पोसते हैं और बच्चे पर जुल्म हो तो फरियाद लेकर तुरत काजी के पास जाते हैं ताकि बादशाह सलामत न्याय करें. यहाँ हालत यह है कि मेरे मां-बाप ने पैसे के लालच में मुझे बेच दिया है और काजी साहब ने बादशाह को खुश करने को तुरत फतवा दे दिया है कि इस लड़के का मारा जाना ही ठीक है. जब काजी और मां-बाप ही नहीं, खुद बादशाह सलामत भी मेरी मौत में ही अपना भला देख रहे हों तो मैं जुल्म का इनसाफ उनसे करने को क्या कह सकता हूँ? कहते हैं, बादशाह ने शर्मिंदा होकर लड़के को गले से लगाया और उसे बहुत सारा धन देकर यह कहते हुए विदा कर दिया कि एक बेगुनाह के खून से अपनी जान बचाने से तो मेरा मरना ही बेहतर होग…

चुटकुले 553 - 600

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इंटरनेट से विविध फ़ॉन्टों की साइटों से उतारे गए तथा यूनिकोडित किए गए कुछ चुटकुलेचुटकुला # 0553
पत्नी (पति से)- जब मैं मर जाऊंगी, तो तुम क्या करोगे?
पति (पत्नी से)- मैं भी मर जाऊंगा।
पत्नी (पति से)- क्यों?
पति (पत्नी से)- क्योंकि ज्यादा खुशी से आदमी मर जाता है।


चुटकुला # 0554
एक वृद्ध महिला अपनी सहेली से बोली - मैंने अपने पति की दांतों से
नाखून काटने की आदत छुड़ा दी है।
सहेली ने पूछा- कैसे?
वृद्धा ने जवाब दिया-मैंने उनके दांत छुपाकर रख दिए है।

एक बेवकूफ पति ने अपनी पत्नी से पूछा- बताओ, शादी में दूल्हा घोड़ी की
जगह गधे पर चढ़कर क्यों नहीं आता?
पत्नी ने जवाब दिया- ताकि दुल्हन एक साथ दो गधो को देखकर बेहोश न
हो जाए।

चुटकुला # 0555पत्नी अपने पति के खर्चीले स्वभाव से बहुत परेशान थी।
पति ने अपनी पत्नी से पैसे मांगे तो पत्नी ने खीजकर कहा- तुमको मैंने
कितनी बार कहा है कि बजट से आगे जाकर खर्च मत किया करो। हर
महीने भीख मांगने की नौबत आ जाती है।
पति- वैसे भी तो हर महीने मैं तुमसे भीख ही मांगता हूं।

चुटकुला # 0556पत्नी (पति से)- तुम बहुत फिजूलखर्ची करते हो।
पति(पत्नी से)- तुम यह कैसे कह सकती हो?
पत्नी(पति से)- तुम ज…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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