किस्से अदालतों के...
- रवीन्द्र नाथ त्यागी
सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फ़ैसले को रद्द करते हुए उन चार लोगों को दोषी ठहराया जिन्होंने एक पत्रकार युवती के साथ कभी सामूहिक बलात्कार किया था और जिसके फलस्वरूप उस निरीह युवती की मृत्यु हो गई थी. हाईकोर्ट ने उस युवती के पति को कायर बताया था पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को भी गलत करार दिया क्योंकि अकेला पति इतने लोगों के सामने कुछ भी नहीं कर सकता था. उस युवती के मात्र दो कसूर थे. पहला कसूर तो यह था कि वह रूपवती थी और दूसरा कसूर यह था कि उसने एक राजनीतिक पार्टी के खिलाफ एक अख़बार में अपनी रिपोर्ट छापी थी. दुःख की बात यह है कि इस फैसले तक पहुँचने में विभिन्न अदालतों को मात्र बाईस वर्ष लगे. ज्यादा जानकारी के लिए आप 25.4.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें.
न्यायपालिका प्राय: भ्रष्टाचार से मुक्त होती है पर कहीं-कहीं इस प्रथा के अपवाद भी पाए जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने जब यह कहा कि इस देश में बीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं तो एक जागरूक नागरिक ने राजस्थान हाईकोर्ट में उपरोक्त चीफ़-जस्टिस के खिलाफ न्याय-पालिका की मानहानि का दावा दायर कर दिया. हाईकोर्ट ने दावा खारिज कर दिया. इस संदर्भ में आप यदि 13.3.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें तो एकदम ठीक रहेगा.
अदालतों में बड़ी-बड़ी मजाक भी चलती हैं. मेरे काफ़ी मित्र और रिश्तेदार जज हैं और वे इतने लतीफ़े सुनाते हैं कि हँसते-हँसते पेट दुखने लगता है. एक बार मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज (मिस्टर जस्टिस जे डी शर्मा) के यहाँ खाने पर गया. खाना खाने के बाद जब हम लोग कॉफ़ी पीने ड्राइंग रूप में बैठे तो मैंने जज साहिब से कहा कि वे अपनी जिंदगी का कोई बेहतरीन मुकदमा हम लोगों को सुनाएँ. उन्होंने बताया कि जब वे डिस्ट्रिक्ट जज थे तब उनके सामने एक ऐसा मामला आया था कि वे पशोपेश में पड़ गए थे.
हुआ यह था कि किसी सेठ का काफ़ी बड़ा क्लेम रेल-विभाग के ख़िलाफ़ पडा था और सब कुछ करने के बावजूद, रेलवे उनका पैसा नहीं दे रही थी. मुंसिफ़ साहिब ने, तैश में आकर, कालका-मेल के इंजन को ही ‘अटैच' कर दिया. गाड़ी आई और अदालत के हरकारे ने ‘अटैचमेंट आर्डर' को इंजन के बॉयलर पर चिपका दिया और ऑर्डर की एक कॉपी स्टेशन-मास्टर को दे दी. अब हालत यह हो गई की गाड़ी उसी स्टेशन पर घंटों तक खड़ी रही. घंटों बाद स्टेशन-मास्टर ‘ईस्ट इंडियन रेलवे' के हैड क्वार्टर (जो कलकत्ता में था) से बात कर सके. हैडक्वार्टर के बैरिस्टर ने बताया कि अदालत से कहिए वह अटैच्ड इंजन को अपने मालखाने में ले जाएँ ताकि गाड़ी में दूसरा इंजन लगाया जाए और वह आगे चले. अब मुंसिफ़ साहिब घबराए और सलाह मांगने डिस्ट्रिक्ट जज के यहाँ पहुँचे. जज साहिब को गुस्सा भी आया और हँसी भी आई. इंजन पर चिपका ‘अटैचमेंट आर्डर' वहाँ से हटाया गया और ‘बुकिंग विंडो' पर लगाया गया. घंटों की प्रतीक्षा के बाद कालका-मेल आगे बढ़ी.
सरकारी काम के सिलसिले में मैं सेशन जज की अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, सभी अदालतों का चक्कर काट चुका हूँ और सभी की कार्यप्रणाली से काफ़ी परिचित हूँ. कुछ वारदातों का जिक्र मैंने अपने सरकारी संस्मरणों में किया भी है. मगर व्यक्तिगत रूप से मेरा अनुभव एक ही है जो काफ़ी दुखद है. बरसों पहिले मैं शिलांग गया था वहाँ सरकारी डाक बंगले में ठहरा था. मेरी पत्नी मेरे साथ थी और जब हम दोनों शाकाहारी भोजन की तलाश में मारवाड़ी होटल गए हुए थे, तभी एक चोर ने डाक बंगले में चोरी कर ली. चोर भी सनकी था और इसी कारण वह सब कुछ छोड़कर, मात्र सौ रुपए, एक सस्ता कैमरा और एक बिलक्रीम की शीशी ही ले गया. रिपोर्ट लिखाई गई और चोर पकड़ा गया. चोरी किया गया सामान भी मिल गया. यहाँ जब मामला अदालत क पहुँचा तो देखा गया कि कैमरा जो था वह अदालत के मालखाने से ही गायब हो चुका था. इस देश का यारों क्या कहना... यह देश है धरती का गहना...
अंग्रेजी में कानून को लेकर श्रेष्ठतम हास्य लिखने वाले लेखक का नाम है हेनरी सिसील जिनकी कृतियों को वुडहाउस तक पढ़ा करते थे. मैं सलाह दूंगा कि आप भी जस्टिस खोसला की लिखी ‘मर्डर ऑफ़ महात्मा एंड अदर केसेज़' व डॉ. कैलाशनाथ काटजू द्वारा लिखित ‘केसेज़ टु रिमेम्बर' जरूर जरूर पढ़ें. फिलहाल मैं ‘शहबाज़' की एक नज़्म लिखता हूँ और सारे मुकद्दमे को यहीं खत्म करता हूँ.
नज़्म
देखा जो मुझको कोर्ट में, कहने लगे क्लर्क
यारों शिकार आया है, इसको खसोट लो,
जमशेद जी बोले कि मोटा है यह किसान
रिश्वत में इससे बढ़िया सी बैलों की जोट लो,
फ़रमाया जैकसन ने कि झंझट में मत पड़ो
सीधी सी बात यह है कि सौ-सौ के नोट लो,
बोले ये शेरसिंह कि बुजदिल हैं आप लोग
मेरी तो राय यह है कि कफ़न भी खसोट लो,
जुम्मन ने कांप कर कहा, यारों करो न शोर
जो कुछ भी तुमको लेना है, पर्दे की ओट लो,
नत्थू कड़क के बोले कि डर की है बात क्या
अपना ही तो अब राज है, डंके की चोट लो.
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साभार : व्यंग्य यात्रा : सार्थक व्यंग्य की रचनात्मक त्रैमासिकी - अंक: अक्तूबर मार्च 2006.
चित्र: कागज पर स्याही से बनी रेखा की कलाकृति.
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