30 दिसम्बर 2006

हास्य-व्यंग्य : किस्से अदालतों के...


किस्से अदालतों के...


- रवीन्द्र नाथ त्यागी


सुप्रीम कोर्ट ने उड़ीसा हाईकोर्ट के फ़ैसले को रद्द करते हुए उन चार लोगों को दोषी ठहराया जिन्होंने एक पत्रकार युवती के साथ कभी सामूहिक बलात्कार किया था और जिसके फलस्वरूप उस निरीह युवती की मृत्यु हो गई थी. हाईकोर्ट ने उस युवती के पति को कायर बताया था पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस तर्क को भी गलत करार दिया क्योंकि अकेला पति इतने लोगों के सामने कुछ भी नहीं कर सकता था. उस युवती के मात्र दो कसूर थे. पहला कसूर तो यह था कि वह रूपवती थी और दूसरा कसूर यह था कि उसने एक राजनीतिक पार्टी के खिलाफ एक अख़बार में अपनी रिपोर्ट छापी थी. दुःख की बात यह है कि इस फैसले तक पहुँचने में विभिन्न अदालतों को मात्र बाईस वर्ष लगे. ज्यादा जानकारी के लिए आप 25.4.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें.

न्यायपालिका प्राय: भ्रष्टाचार से मुक्त होती है पर कहीं-कहीं इस प्रथा के अपवाद भी पाए जाते हैं. सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस ने जब यह कहा कि इस देश में बीस प्रतिशत जज भ्रष्ट हैं तो एक जागरूक नागरिक ने राजस्थान हाईकोर्ट में उपरोक्त चीफ़-जस्टिस के खिलाफ न्याय-पालिका की मानहानि का दावा दायर कर दिया. हाईकोर्ट ने दावा खारिज कर दिया. इस संदर्भ में आप यदि 13.3.2002 का ‘हिन्दुस्तान टाइम्स' पढ़ें तो एकदम ठीक रहेगा.

अदालतों में बड़ी-बड़ी मजाक भी चलती हैं. मेरे काफ़ी मित्र और रिश्तेदार जज हैं और वे इतने लतीफ़े सुनाते हैं कि हँसते-हँसते पेट दुखने लगता है. एक बार मैं इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज (मिस्टर जस्टिस जे डी शर्मा) के यहाँ खाने पर गया. खाना खाने के बाद जब हम लोग कॉफ़ी पीने ड्राइंग रूप में बैठे तो मैंने जज साहिब से कहा कि वे अपनी जिंदगी का कोई बेहतरीन मुकदमा हम लोगों को सुनाएँ. उन्होंने बताया कि जब वे डिस्ट्रिक्ट जज थे तब उनके सामने एक ऐसा मामला आया था कि वे पशोपेश में पड़ गए थे.

हुआ यह था कि किसी सेठ का काफ़ी बड़ा क्लेम रेल-विभाग के ख़िलाफ़ पडा था और सब कुछ करने के बावजूद, रेलवे उनका पैसा नहीं दे रही थी. मुंसिफ़ साहिब ने, तैश में आकर, कालका-मेल के इंजन को ही ‘अटैच' कर दिया. गाड़ी आई और अदालत के हरकारे ने ‘अटैचमेंट आर्डर' को इंजन के बॉयलर पर चिपका दिया और ऑर्डर की एक कॉपी स्टेशन-मास्टर को दे दी. अब हालत यह हो गई की गाड़ी उसी स्टेशन पर घंटों तक खड़ी रही. घंटों बाद स्टेशन-मास्टर ‘ईस्ट इंडियन रेलवे' के हैड क्वार्टर (जो कलकत्ता में था) से बात कर सके. हैडक्वार्टर के बैरिस्टर ने बताया कि अदालत से कहिए वह अटैच्ड इंजन को अपने मालखाने में ले जाएँ ताकि गाड़ी में दूसरा इंजन लगाया जाए और वह आगे चले. अब मुंसिफ़ साहिब घबराए और सलाह मांगने डिस्ट्रिक्ट जज के यहाँ पहुँचे. जज साहिब को गुस्सा भी आया और हँसी भी आई. इंजन पर चिपका ‘अटैचमेंट आर्डर' वहाँ से हटाया गया और ‘बुकिंग विंडो' पर लगाया गया. घंटों की प्रतीक्षा के बाद कालका-मेल आगे बढ़ी.

सरकारी काम के सिलसिले में मैं सेशन जज की अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, सभी अदालतों का चक्कर काट चुका हूँ और सभी की कार्यप्रणाली से काफ़ी परिचित हूँ. कुछ वारदातों का जिक्र मैंने अपने सरकारी संस्मरणों में किया भी है. मगर व्यक्तिगत रूप से मेरा अनुभव एक ही है जो काफ़ी दुखद है. बरसों पहिले मैं शिलांग गया था वहाँ सरकारी डाक बंगले में ठहरा था. मेरी पत्नी मेरे साथ थी और जब हम दोनों शाकाहारी भोजन की तलाश में मारवाड़ी होटल गए हुए थे, तभी एक चोर ने डाक बंगले में चोरी कर ली. चोर भी सनकी था और इसी कारण वह सब कुछ छोड़कर, मात्र सौ रुपए, एक सस्ता कैमरा और एक बिलक्रीम की शीशी ही ले गया. रिपोर्ट लिखाई गई और चोर पकड़ा गया. चोरी किया गया सामान भी मिल गया. यहाँ जब मामला अदालत क पहुँचा तो देखा गया कि कैमरा जो था वह अदालत के मालखाने से ही गायब हो चुका था. इस देश का यारों क्या कहना... यह देश है धरती का गहना...

अंग्रेजी में कानून को लेकर श्रेष्ठतम हास्य लिखने वाले लेखक का नाम है हेनरी सिसील जिनकी कृतियों को वुडहाउस तक पढ़ा करते थे. मैं सलाह दूंगा कि आप भी जस्टिस खोसला की लिखी ‘मर्डर ऑफ़ महात्मा एंड अदर केसेज़' व डॉ. कैलाशनाथ काटजू द्वारा लिखित ‘केसेज़ टु रिमेम्बर' जरूर जरूर पढ़ें. फिलहाल मैं ‘शहबाज़' की एक नज़्म लिखता हूँ और सारे मुकद्दमे को यहीं खत्म करता हूँ.

नज़्म

देखा जो मुझको कोर्ट में, कहने लगे क्लर्क

यारों शिकार आया है, इसको खसोट लो,


जमशेद जी बोले कि मोटा है यह किसान

रिश्वत में इससे बढ़िया सी बैलों की जोट लो,


फ़रमाया जैकसन ने कि झंझट में मत पड़ो

सीधी सी बात यह है कि सौ-सौ के नोट लो,


बोले ये शेरसिंह कि बुजदिल हैं आप लोग

मेरी तो राय यह है कि कफ़न भी खसोट लो,


जुम्मन ने कांप कर कहा, यारों करो न शोर

जो कुछ भी तुमको लेना है, पर्दे की ओट लो,


नत्थू कड़क के बोले कि डर की है बात क्या

अपना ही तो अब राज है, डंके की चोट लो.

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साभार : व्यंग्य यात्रा : सार्थक व्यंग्य की रचनात्मक त्रैमासिकी - अंक: अक्तूबर मार्च 2006.

चित्र: कागज पर स्याही से बनी रेखा की कलाकृति.

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24 दिसम्बर 2006

हास्य कथा - जैसे को तैसा

जैसे को तैसा

- मोहिनी राव

एक जमींदार के लिए उसके कुछ किसान एक भुना हुआ मुर्गा और एक बोतल फल का रस ले आए. जमींदार ने अपने नौकर को बुलाकर चीजें उनके घर ले जाने को कहा. नौकर एक चालाक, शरीर लड़का था. यह जानते हुए जमींदार ने उससे कहा, "देखो, उस कपड़े में जिंदा चिड़िया है और बोतल में जहर है. खबरदार, जो रास्ते में उस कपड़े को हटाया, क्योंकि अगर उसने ऐसा किया तो चिड़िया उड़ जाएगी. और बोतल सूंघ भी ली तो तुम मर जाओगे. समझे?"

नौकर भी अपने मालिक को खूब पहचानता था. उसने एक आरामदेह कोना ढूंढा और बैठकर भुना मुर्गा खा गया. उसने बोतल में जो रस था वह भी सारा पी डाला. एक बूंद भी नहीं छोड़ा.

उधर जमींदार भोजन के समय घर पहुँचा और पत्नी से भोजन परोसने को कहा. उसकी पत्नी ने कहा, "जरा देर ठहरो. खाना अभी तैयार नहीं है." जमींदार ने कहा, "मैंने जो मुर्गा और रस की बोतल नौकर के हाथ वही दे दो. वही काफी है."

उसके गुस्से की सीमा न रही जब उसकी पत्नी ने बताया कि नौकर तो सुबह का गया अभी तक लौटा ही नहीं.

बिना कुछ बोले गुस्से से भरा जमींदार अपने काम की जगह वापस गया तो देखा नौकर तान कर सो रहा है. उसने उसे लात मारकर जगाया और किसान द्वारा लाई गई भेंट के बारे में पूछा.

लड़के ने कहा, "मालिक, मैं घर जा रहा था तो इतने जोर की हवा चली कि मुर्गे के ऊपर ढका कपड़ा उड़ गया और जैसा आपने कहा था, वह भी उड़ गया. मुझको बहुत डर लगा कि आप सज़ा देंगें और मैंने बचने के लिए बोतल में जो जहर था वह पी लिया. और अब यहाँ लेटा-लेटा मौत के आने का इंतजार कर रहा था."

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साभार: आओ हँसें एक साथ, अनुवाद - मोहिनी राव, नेशनल बुक ट्रस्ट, ए-5, ग्रीन पार्क, नई दिल्ली, इंडिया- 110016. आईएसबीएन नं. ISBN 81-237-2012-2

मूल्य - रुपए 20.00 मात्र (संस्करण 1988)

(18 देशों की, 53 हास्य कथाओं, 54 पहेलियों और 23 कहावतों के संकलन वाली यह एक अत्यंत पठनीय, संग्रहणीय व वाजिब कीमत की पुस्तक है. - सं.)

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20 दिसम्बर 2006

हास्य - व्यंग्य : पति का मुरब्बा

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हास्य - व्यंग्य

पति का मुरब्बा

-गीता शॉ पुष्प

यदि आपके पास पति है, तो कोई बात नहीं. न हो तो अच्छे, उत्तम कोटि के, तेज-तर्रार पति का चुनाव करें. क्योंकि जितना बढ़िया पति होगा, मुरब्बा भी उतना ही बढ़िया बनेगा. दागी पति कभी भी प्रयोग में न लाएँ. आवश्यकता से अधिक पके का चुनाव करने से भी मुरब्बा जल्दी खराब हो सकता है. नए ताजे पति का मुरब्बा डाल देने ठीक होता है. नहीं तो मौसम बदलते ही, अन्य सुन्दरियों के सम्पर्क में आने से उसके खराब होने की सम्भावना है.

अभी से मुरब्बा डालकर रखेंगी, तो जीवन भर उंगलियाँ चाटकर, चटखारे लेकर उसका आनन्द उठा सकेंगी. आपके घर की शोभा बढ़ेगी. भविष्य में आर्थिक दृष्टि से लाभ होगा. मुरब्बा डला पति मर्तबान के दायरे में ही रहता है. ट्रान्सपोर्टेशन में भी आसानी होती है. किसी भी मौसम में उसका उपयोग कर सकती हैं. पड़ोसियों और सहेलियों को जला सकती हैं.

आवश्यक सामग्री : प्रेम की चीनी, पति के बराबर तोल के मुस्कान की दालचीनी, हँसी की इलायची, जीवन के रंग, आवश्यकतानुसार नैनों की छुरी, एक मर्तबान.

विधि : पति को धो-पोंछकर साफ करें. मन के ऊपर लगी धूल अच्छी तरह रगड़कर दिल के कपड़े से पोंछ दें. पति चमकने लगेंगे. फिर प्रेम की तीन-तार चाशनी बनाएँ. इसमें पति को पूरा-का-पूरा डुबो दें. कम से कम हफ़्ते भर तक डुबोकर रखें. गरम सांसों की हल्की आंच पर पकने दें. सास-ननदों को पास न आने दें. पड़ोसिनों (विशेष कर जवान) के इनफ़ेक्शन से बचाकर रखें. इनके संपर्क में आने से खराब होने का भय रहता है. पति पूरी तरह प्रेम की चाशनी में सराबोर हो गए हैं, इसकी गारंटी कर लें. मुस्कान की दालचीनी, हँसी की इलायची, जीवन के रंग मिलाकर अच्छी तरह हिला लें.

लीजिए, आपके पति का मुरब्बा तैयार है. जब जी में आए इसके मधुर स्वाद का आनन्द लीजिए.

सावधानियाँ : बीच-बीच में नाराजगी की धूप गर्मी दिखाना जरूरी है, नहीं तो फफूंदी लग सकती है. पड़ोसिनों और सहेलियों की नज़रों से दूर रखें. यदा-कदा चल कर देखती रहें. अधिक चीनी हो गयी हो तो झिड़कियों के पानी का छिड़काव करें. कभी-कभी ज्यादा मिठास से भी मुरब्बा खराब हो जाता है. चीटिंयाँ लग सकती हैं.

विशेष सावधानियां :-

खाई-खेली औरतों से बचाकर रखें.

मर्तबान तभी खोलें जब मुरब्बा खाना हो

इसी तेवर की कुछ और हास्य व्यंग्य रचनाएँ पढ़ें - स्त्री स्तोत्र

तथा त्रासदियाँ प्रेम की

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साभार - पति का मुरब्बा, गीता शॉ पुष्प, सन्मार्ग प्रकाशन, जवाहर नगर दिल्ली - 110007

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चित्र : काग़ज पर स्याही से बनाई गई रेखा की कलाकृति

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15 दिसम्बर 2006

कुछ पाकिस्तानी ग़ज़लें



मुनव्वर हुसैन बलोच की दो ग़ज़लें

इस धरती पर कितना दुःख है

इस धरती पर कितना दुःख है प्यारे, देख

ऊँचे महलों के वासी दुखियारे , देख

भूक और बेचैनी का हर-सू राज यहाँ

ये मजदूरों की बस्ती है प्यारे, देख

सुर्खी, पाउडर और परफ़्यूमों के इनसान

बिलख रहे हैं बच्चे भूक के मारे, देख

आस न तोड़ मिलन की, मन को आशा दे

चाँद की राहें देखें कब से तारे, देख

बादल, सब्जा, फूल और पानी, सब यकजा

कुदरत की फनकारी के शहपारे देख

लफ़्जों में तस्वीर उतर सकती है कब

होंट कली से बढ़कर नैन नियारे देख

यार बलोच ये वक्त भी कितना जालिम है

हमसे बिछड़े कैसे यार हमारे देख

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फीका-फीका सा है शहर का रंग

मैं मजबूर, तेरी चाहत और शहर का रंग

कब तक देखूं इक जलती दोपहर का रंग

लोगों बोझल आँखों के सब ख्वाब हवा

नींदें अपनी और न अपना दहर का रंग

कौन समय की आँखों में डूबा-उभरा

किसने देखा उस उठती हुई लहर का रंग

जख़्मों की गहराई नापने से हासिल?

क्या मतलब खंजर से, कैसा जहर का रंग

मर मिटना ही जब ठहरा अंजाम तो फिर

क्या घबराना जुल्म से, कैसा कहर का रंग

यार मुनव्वर इक मैं ही अफ़सुर्दा नहीं

फीका-फीका सा है सारे शहर का रंग

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रिजाज़ साग़र की दो ग़ज़लें

मैं बिखर रहा हूँ

मैं जर्रा-जर्रा बिखर रहा हूँ

मैं लम्हा-लम्हा गुज़र रहा हूँ

अजीब मौसम है मुझपे हावी

न जी रहा हूँ न मर रहा हूँ

चराग़ रक्खे हथेलियों पर

दयारे-शब से गुजर रहा हूँ

जवाब देगा तो कैसा देगा

सवाल कर के मैं डर रहा हूँ

अजीब हैं बेचराग रातें

हवेली अपनी से डर रहा हूँ

मैं पैरहन हूं गयी रुतों का

शजर के तन से उतर रहा हूँ

नहीं मुकद्दर में मौत सागर

जनम-जनम से अमर रहा हूँ

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कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

कोई इलजाम धरना चाहता हूँ

तेरे हाथों संवरना चाहता हूँ

शगूफ़े, फूल, फल, पत्ते, हवाएँ

मैं मौसम हूँ, बिखरना चाहता हूँ

लबों पर रख के खामोशी का पत्थर

मैं तुझसे बात करना चाहता हूँ

नहा कर शबनमे-रंजो-अलम में

बरंगे-गुल निखरना चाहता हूँ

अजब हैं तश्नगी की ख्वाहिशें भी

कि दरियाओं में मरना चाहता हूँ

मुक़द्दर गर्दिशें हैं फिर भी सागर

कहीं इक पल ठहरना चाहता हूँ

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6 दिसम्बर 2006

बाल पहेली कोश से कुछ बाल पहेलियाँ...

चंद बाल पहेलियाँ

1 चार पाँव पर चल न पाए

चलते को भी वह बैठाए


2 मारे से वह जी उठे

बिन मारे मर जाए


3 चल पड़ती तो चल जाती

बिना सहारे ठहर न पाती


4 छोटे से मियाँ जी

दाढ़ी सौ गज की


5 एक घर में राजा सोएँ

दूसरे में पाँव पसारें


6 दिन में मुर्दा

रात में जिंदा


7 मुंह पर पानी छिड़का क्यों

सुनार खाली बैठा क्यों


8 मेरा भाई बड़ा शैतान

बैठे नाक पर पकड़े कान


9 साथ-साथ मैं जाती हूँ

हाथ नहीं मैं आती हूँ


10 हरा आटा लाल पराँठा

सखियों ने मिलकर बांटा


11 दिन में लटकी

रात में अटकी


12 सिर पर पत्थर

पेट में अंगुलि


13 सदा करूं चौकीदारी

मेरे दम पे दुनियादारी


14 एक लड़का जनम का हीना

जिन देखा तिन थू-थू कीना


15 गोल मोल और छोटा मोटा

हर दम वह जमीन पर लोटा

खुसरो कहे यह नहीं झूठा

जो न बूझे अक्ल का खोटा


16 आगे-आगे बहना आई

पीछे-पीछे भइया

दाँत निकाले बाबा आए

बुरका ओढ़े मइया


17 अचरज बँगला एक बनाया

ऊपर नींव तरे घर छाया

बांस न बल्ला बंधन घने

कह खुसरो घर कैसे बने

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उत्तर - मेहँदी, परछाईं, कुर्सी, ताला, ढोलक, भुट्टा, सांकल, साइकिल, अंगूठी, बया का घोंसला, सुई-धागा, दीपक की रौशनी, लोटा पीकदान, दीपक, सोना न था, चश्मा (उत्तर अनुक्रम में नहीं हैं)

(साभार : बाल पहेली कोश, संकलन - चित्रा गर्ग, बाल सभा प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली 110030)

चित्र - रेखा की डिजिटल कलाकृति.

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1 दिसम्बर 2006

पूरन सरमा का व्यंग्य - सूट कथा


व्यंग्य : सूट कथा




- पूरन सरमा

सूट सर्दी का पहनावा है. हर आदमी की इच्छा होती है कि वह सूट पहने. कुछ लोगों को शादी के मौके पर सूट नसीब हो जाता है और वे पूरे जीवन उसे सीने से लगाए फिरते हैं. कुछ लोग सूट बनवा भी लेते हैं, लेकिन पहन नहीं पाते. वे सूट को लेकर पेशोपेश में रहते हैं. इस तरह सूट पूरी सर्दी परेशान करता है. मेरी परेशानी फिलहाल यह है कि मेरे पास सूट नहीं है. हिसाब से तो मेरे पास सूट नहीं होना चाहिए, क्योंकि इसके पहनने का कोई कारण मेरे पास नहीं है, लेकिन बावजूद इसके मेरे पास इसकी एक महत्वाकांक्षी योजना है कि मेरे पास काश! एक सूट हो तो मेरे बराबर वाली सीट पर सूट पहन कर बैठे आदमी को मैं किसी क्षेत्र में परास्त कर देता. यह बराबर वाली सीट मेरे दफ़्तर में ही नहीं, बस में, रेल में, सिनेमा में, सांस्कृतिक संध्या में या फिर किसी आशीर्वाद समारोह में, कहीं भी हो सकती है.

लोगों का मानना है कि सूट पहनने के लिए अच्छी आय या पद का होना अपेक्षित नहीं है. क्योंकि अच्छे पद वाले सूट नहीं पहन पाते और उधर उनके अधीनस्थ लिपिकीयकर्मी रोज सूट बदलते हैं. इस तरह सूट यहाँ फिर धर्मसंकट बन जाता है मेरे लिए. मैंने सूट ज्यादातर उन लोगों के पास देखे हैं जिनकी या तो शादी हो गई है अथवा वे जो भ्रष्टाचार करते हैं. अब वे लोग जिनके पास इन दोनों कारणों को छोड़ कर भी सूट है, उन्हें नाराज इसलिए नहीं होना चाहिए, क्योंकि वे अभी तक अपने गरेबान में नहीं झांक सके हैं. वैभवशाली लोगों के लिए तो खैर सूट पहनावा हो सकता है. लेकिन वे लोग अवश्य इस बारे में सोचें जो बिना वैभव के सूट को शरीर पर टांगकर घूम रहे हैं.

कुछ लोगों का यह भी मानना है कि चाहे उनके कृतित्व कैसे भी हों, लेकिन सूट व्यक्तित्व को निखारता है. व्यक्तित्व का निखार शादी के अवसर तक तो मुनासिब है लेकिन शादी के बाद या तो आदमी व्यक्तित्व निखारने की पोजीशन में नहीं रहता अथवा शादी के बाद भी व्यक्तित्व निखार रहा है तो अवश्य दाल में काला है. आजकल दाल में काला का प्रतिशत और औसत आंकड़ा बढ़ रहा है यह चिंताजनक है. शायद बढ़ते तलाकों में सूट भी कोई भूमिका निर्वाह कर रहा हो, यह प्रश्न सूट पहनने वाले खुद तोलें, हो सकता है उनका सच्चाई से मुकाबला हो जाए. इसलिए व्यक्तित्व निखारने की होड़ अथवा आफत उठाने से पहले तीन बार सोच लें, क्योंकि निखरा हुआ व्यक्तित्व सदा घातक सिद्ध हुआ है. मेरा सूट नहीं पहनने का एक मुख्य कारण यह भी रहा है. मैंने कई बार देखा है कि जब भी मेरा व्यक्तित्व निखरा और मित्र और सहकर्मी ‘न्यू पिंच' कहकर मोटी दावत की मांग उठाते हैं. कुछ मित्र यह भी कह डालते हैं - ‘अरे भाई शर्मा क्या चक्कर है, नंबर दो की कमाई में अंगुलियाँ तर हैं.' कुछ मित्र यह भी कहते हैं - ‘अरे भाई यह सजना संवरना कैसे, क्या भाभी जी पीहर गयी हैं या फिर कोई सुदर्शना पड़ोसिन को रिझाने में लगे हो.' मेरे कहने का आशय यह है कि सूट कई संकटों की जड़ है. बताइये मैं कैसे धारण करूं. जो लोग ये बातें करते हैं वे सोचते हैं जैसे कोई चक्कर बिना सूट के चल ही नहीं सकता. अब उन्हें यह कौन बताए कि हम बिना सूट के भी सभी प्रकार के चक्कर चला देते हैं.

मेरे एक अधिकारी मित्र हैं. हल्की सी गुलाबी सर्दी शुरू होते ही सूट पहन लेते हैं, केवल इसलिए कि उनके व्यक्तित्व को देखकर उनके अधीनस्थकर्मी कम से कम सर्दी सर्दी तो डरे रहेंगे. सूट से डराने की परम्परा हमारे यहाँ आदिकाल से चली आ रही है. सामान्य सा आदमी या गरीब आदमी सूट पहनने वाले को जो अदब पेश करता है, वह मात्र उनका डर ही है. कम पढ़ा लिखा या निरक्षर व्यक्ति भी एक बार सूट पहनकर चेहरे पर तेल लगाले (नहाले तो और भी बढ़िया) तो भाईजान क्या पूछते हो. अंधों का राजा वही बन जाता है. सफर में और पूरे जीवन में कभी इस बात को आजमा कर देख लें. लेकिन इसके लिए बनवाना पड़ेगा एक अदद सूट, जो आपके वश की बात है नहीं. इस डराने की दृष्टि से सूट बनवाना चाहता हूँ क्योंकि इस डराने से अनेक काम अपने आप निकल जाते हैं. किसी दफ़्तर में किसी काम से जाओ. बाबू सूट वाले से पहले बात करता है, सामान्य आदमी को तो पीछे धकिया देता है. इस पोशाक में वह व्यक्ति गंभीर तथा पढ़ा लिखा बौद्धिक दिखाई देता है, चाहे वह है नहीं. कई बार मुझे लगता है कि मैं बात-बात पर हंसने वाला आदमी यदि सूट पहन लूंगा तो यह सूट की तौहीन होगी, क्योंकि मैं ज्यादा लंबे समय तक गंभीरता को चेहरे पर मेंटेन नहीं कर पाऊंगा. इसलिए सोचता हूं कि सूट नहीं भी है तो चलेगा. लेकिन फिर कोई आदमी खामख्वाह नहीं डरे यह खेदजनक लगता है. मेरी भी अपनी इच्छा है कि कोई मुझसे डरे तो भाई इस सफेद स्वेटर के पहनने से तो कोई डरने वाला है नहीं, सूट में जो गंभीरता है वह भला स्वेटर में कहाँ, इसलिए सूट की यादें लिए तड़पता रहता हूँ.

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वैसे सूट की भारतीय पोशाक नहीं है. यह पश्चिम की नकल है. लेकिन नकल में हमारा कोई मुकाबला नहीं है और बिना अक्ल के नकल का कारवां बढ़ाते चलते हैं. सूट में भी यही हो रहा है. ऐसे-ऐसे विदूषक देखे हैं, जो सूट में जँचे या न जँचे, वे इसे धारण कर चार्ली चैपलिन की मूंछों में इतराते हैं. मैंने सुना है सूट खोलकर सोना चाहिए - लेकिन भारतवर्ष में लोग सूट पहनकर सो जाते हैं. इसका कारण यह भी हो सकता है कि उन्होंने जैसे तैसे करके सूट तो बनवा लिया और जब रज़ाई की बारी आई तो वे खाली हो चुके थे. इस तरह सूट उनको रात में रज़ाई का विकल्प बनकर रह गया. कुछ लोग सूट के साथ बूट के महत्व को न समझ कर हवाई चप्पलों में ही घूम रहे हैं उनसे पूछा कि भाई ढंग सा देसी जूता ही ले आओ तो वे तड़ से बोले - ‘कृपया आप सूट को देखें.' भारत में जो लोग सूट पहन रहे हैं, वे इसके धुलाई महात्म्य को भी नहीं समझ पाए हैं. चिकनाई से सूट एक अलग ही रंग की आभा से दमकने लगा है लेकिन वे बेफिक्री से मैल को ढो रहे हैं. क्योंकि उनके पास सूट है. अनेक लोगों को सूट के पेंट को डोरे से बांधे देखा है वे बेल्ट नहीं ला सके हैं. सूट को लेकर अनेक विसंगतियाँ हैं लेकिन उनके अपने अपने निजी कारण हैं और इस भारतीय आबोहवा में सूट परिहास का कारण बन गया है.

वैसे सूट की महत्ता को देखकर इसके कुछ मापदंड तय होने चाहिए. जैसे कि जिसकी मासिक कमाई अमुक राशि से कम नहीं हो, वह सूट नहीं पहन सकता. सूट कहाँ पहना जाए. शादी विवाह में सूट कौन पहने? दफ़्तरों में किस रेंक का आदमी सूट पहने या नहीं. सूट पहनने वालों पर हैलमेट न लगाने वालों की तरह पूछताछ हो तथा यदि वे मापदंडों से इधर उधर पाए जाएँ तो बाकायदा चालान हो. इससे सोसायटी में अफरातफरी नहीं होगी तथा सोसाइटी में लोगों का क्रेज और स्तर बना रहेगा. वरना अब तो सब्जी के ठेले वाला, चाय पान की धड़ी लगाने वाला या गजक बेचने वाला भी सूट पहन रहा है. वह सूट पहनना ही चाहे तो अपने घर में पहने, बाहर दूसरों का स्टेटस क्यों खराब करता है. पहले वह अपना स्टेटस बनाए फिर सूट पहने तब किसी को कोई तकलीफ़ नहीं होगी. अब यह दीगर बात है कि प्रायः बहुत से बड़े लोग, बड़े अफ़सर जिनके पास तथाकथित बड़ा स्टेटस होता है, बस स्टेटस में बड़े होते हैं - मानवता या दूसरे अर्थों में नहीं.

महिलाएँ सूट नहीं पहनती हैं लेकिन वे जो भी पहनती हैं उन पर भी मापदंड प्रभावी हो ताकि सूट वाले अपने स्तर की महिला को पहचान सकें. वैसे ही महिलाओं के वस्त्र कीमती होते हैं लेकिन इसमें भी सीमा रेखा तय हो जाए तो भेदभाव घटेगा तथा समाज में सद्भाव बनेगा. हाँ, जो महिलाएँ सलवार सूट पहनती हैं उन्हें भी पाबंद किया जाना चाहिए - क्योंकि सूट पुरूषों का पहनावा है इसलिए सूटधारी सज्जनों के हित में उन्हें अपनी पोशाक भी उन्हें ही समर्पित कर देनी चाहिए, तब देखना भारतीय संस्कृति के किस तरह से चार चाँद लग जाएंगे. महिलाओं को इसके लिए आगे आना चाहिए तथा पुरुषों के हित में सूट का त्याग करना चाहिए. वैसे महिलाओं को सूट के मामले में स्वतंत्र रखना भी ठीक है ताकि वे जो लोग सूट पहन रहे हैं उनके बारे में सही राय दे सकें.

सूटधारी सज्जनों सर्दी बहुत बढ़ रही है और आपने यदि सूट अभी तक बक्सों में से नहीं निकाला हो तो इस अंग्रेजी पहनावे को अविलम्ब निकालें और धारण कर लें, हो सकता है यह आपके व्यक्तित्व को निखारने में अथवा लोगों को व्यर्थ डराने में कोई न कोई महती भूमिका निभावे. सूट जैसा भी है सूट है. चाहे वह बीस बरस तीस बरस पहले का होने से छोटा हो गया है लेकिन है तो सूट. सूट कई मानसिक व्याधियों का हरता है तथा बराबरी का दर्जा दिलाता है. इसलिए इस मनभावन बेला में पहन लें अपना सूट. सूट में आप अभिनेताओं जैसे लगते हैं. विश्वास नहीं हो तो सूट पहनकर दस बीस मिनट फुल साइज के आइने के सामने खड़े होकर अपने आपको निहारें तथा हमशक्ल हीरो से तुलना करें. थोड़ी देर में आप पाएँगे कि आप वह हो गए हैं. हीरो बनने की ऋतु आ गई है. सूट नहीं हो तो बनवा लें. चाहे आईसीआईसीआई बैंक से ऋण ही क्यों न लेना पड़े. सूट ऐसा बनवाओ कि बराबर वाले की आँख खुली की खुली रह जावे. सूट की इतनी ही कथा नहीं है, वह तो भगवान की कथा की तरह अनंत है. अतः बाकी कथा फिर कभी.

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(साभार: मधुमती, दिसम्बर 1996)

चित्र - रेखा की डिजिटल कलाकृति

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रचनाकार में प्रकाशनार्थ हर विधा की रचनाओं का स्वागत है. अपनी या अपने रचनाकार मित्रों की रचनाएँ हिन्दी के किसी भी फ़ॉन्ट यथा - कृतिदेव, डेवलिस, श्रीलिपि, शुषा, वेबदुनिया, जिस्ट-आईएसएम, लीप या किसी भी अन्य फ़ॉन्ट में पेजमेकर या एमएस वर्ड फ़ाइल के रूप में अपनी रचना ई-मेल के जरिए rachanakar@gmail.com .के पते पर भेजें. विस्तृत जानकारी बाजू पट्टी में देखें. आप अपनी रचनाओं के सस्वर ऑडियो/वीडियो पाठ की सीडी भी प्रकाशनार्थ भेज सकते हैं जिन्हें कुछ इस तरह [ देखने के लिए इस कड़ी/लिंक पर क्लिक करें] प्रकाशित किया जा सकेगा. ......................