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2007
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  कविताएं

- दिव्या माथुर

सुनामी सच

 

तुम्हारे एक झूठ पर

टिकी थी

मेरी गृहस्थी

मेरे सपने

मेरी ख़ुशियाँ

तुम्हारा एक सुनामी सच

बहा ले गया

मेरा सब कुछ।

 

कहानी

ऐत तहानी औल मम्मा

बहुत रात हो गई मुन्ना

बेटा अब तो तू सो जा

`बछ ऐत तहानी औल मम्मा

छुना बी दो ना'

अब मुन्ना बड़ा हो गया है

कहता है

मैं बहुत बोलती हूँ

मुन्ना ज़रा जल्दी चल

स्कूल को देर हो जायेगी

`मम्मा मेले छोते छोते पाँव

मैं दल्दी दल्दी तैछे तलूँ'

अब मुन्ना बड़ा हो गया है

कहता है कि

मैं बहुत `स्लो' हो गई हूँ

`मम्मा, मुदे दल लदता है

तुमाले छात छोऊँदा तुमाली दोदी में'

अब मुन्ना बड़ा हो गया है

और उसके मुन्ने को

 मेरा कमरा चाहिये

उस बड़े से बूढ़ाघर में

मम्मा के नन्हे से प्राण अटके हैं

 अपने मुन्ने की राह में।

 

 

झूठ 

मेरी ख़ामोशी

एक गर्भाशय है

जिसमें पनप रहा है

तुम्हारा झूठ

एक दिन जनेगी ये

तुम्हारी अपराध भावना को

मैं जानती हूँ कि

तुम साफ़ नकार जाओगे

 इससे अपना रिश्ता

यदि मुकर न भी पाये तो

उसे किसी के भी

गले मढ़ दोगे तुम

कोई कमज़ोर तुम्हें

फिर बरी कर देगा

पर तुम

भूल के भी न इतराना

क्यूंकि मेरी खामोशी

एक गर्भाशय है

जिसमें पनप रहा है

तुम्हारा झूठ।

 

झूठ  

झूठ

सिर पर चढ़ के

बोलता है

यही सोच के

खामोश हूँ मैं

इसका क़तई

ये अर्थ न लो

कि मेरे मुँह में

ज़ुबान नहीं।

 

 


माँ

उसकी सस्ती धोती में लिपट

मैंने न जाने

कितने हसीन सपने देखे हैं

उसके खुरदरे हाथ

मेरी शिकनें सँवार देते हैं

 मेरे पड़ाव हैं

उसकी दमे से फूली साँसें

ठाँव हैं

 कमज़ोर दो उसकी बाँहें

उसकी झुर्रियों में छिपी हैं

मेरी खुशियाँ

और बिवाइयों में

मेरा भविष्य।

 

 

माँ

मेरा सुख दुख

अपनी कमज़ोर आँखों से पढ़ लेती है

 अपने जोड़ों का दर्द भूल

 मुझे अपने से सटा वह लेती है

सफ़ेद बाल हैं प्रकाशस्तंभ

मेरी कश्ती कभी नहीं डोली

है ध्रुव तारे सी साथ सदा

मैं रास्ता कभी नहीं भूली

पाँव पोंछता रहता है

अब भी उसका उजला आँचल

आज भी मेरे सिर पर है

उसकी दुआओं का गगनान्चल।

 

 

सबूत

तुम झूठे हो

मैं सच्ची

तुम सच्चे हो

मैं झूठी

क्या जीवन बीतेगा

यूं ही

सबूत इकट्ठा करते

अग्निपरीक्षा देते

संबंधो को स्थगित करते

 

 

समझौता

एक अदृष्ट

समझौता है

परिवार के बीच

यदि मैंने ज़ुबान खोली

तो वे समवेत स्वर में

मुझे झुठला देंगे

झूठ की

ओढ़नी में लिपटी

मैं खुद से भी

रहती हूँ छिपी।

 

 

बंजर

अंजाम जानते हो फिर भी

क्यूँ बोते हो बीज नया

मेरे शक के कीटाणु ले

ये पनप कभी पायेगा क्या

छलनी छलनी मैं हूँ अब

कुछ भी तो ठहर नहीं पाता

पत्थर से सिर फोड़ोगे

जो तुमने बंजर सींचा!

 

पहला प्यार

`मिट्टी पड़े

तुम्हारे पहले प्यार पर'

कहा था अम्मां ने

इक बार दुखी होकर

और ब्याह दिया था

मुझे विदेश

पर न तो समय

न ही दूरी

कर पाये धूमिल

रंग रूप गँध

सभी तो ताज़ा हैं

मिट्टी पड़े

मेरे पहले प्यार पर।

 

 

 

चंदन पानी

हम चंदन पानी न हो पाये

चंदन पानी न हो पाये

कोल्हू के बैल से घूमें गए

गले में रस्सी लटकाये

 

दिन रात पसीना बहा कर भी

इक बूँद तेल की न पाये

तैरा किए सतहों पर ही

चंदन पानी न हो पाये

 

पहल करे कब कैसे कौन

तोड़ न पाए कभी मौन                                                                       

कभी साथ बैठे न सपने सजाए   

नियति के भरोसे पछताए    

                                                       

दिन और रात रहे उम्र भर                                                                     

चंदन पानी न हो पाये

चुरा ली नज़र झट कभी जो मिली

उँगलियाँ हमारी न उलझीं कभी

गलबहियों की तो खूब कही

मुँह बाएँ गए रस्में निभाये

 

दिल की थाह बिना पाए

चंदन पानी न हो पाये

सरकारी चक्की में पिसे

अफ़सर बनने की चाह लिऐ

बच्चों का अपने पेट काट

घूस में लाखों स्र्पये दिए

 

आँखों से अपनी अलग गिरे

चंदन पानी न हो पाये

बढ़ा पिता का रक्तचाप

माँ के गठिए का दर्द बढ़ा

मनमानी बच्चों की बढ़ी

फ़ासला हमारे बीच बढ़ा

बस रहे दूरियाँ तय करते

चंदन पानी न हो पाए

 

समय क़तर कैंची से हम

अब जीवन फिर से शुरू करें

थाम लो पतवार तुम्हीं

अपने रंग में रंग डालो मुझे

पानी और तेल नहीं रहें

हम चंदन पानी हो जाएँ।

 

पिंजरा

चारों प्रहर

पहरे पर रहता है

तुम्हारा शक

मेरी दृष्टि की भी

तय कर दी है

तुमने सरहद

प्रणय तुम्हारा

लेके रहेगा मेरे प्राण

क्या मुझे मिलेगा त्राण

आज़ाद है मन मेरा लेकिन

तन का छुटकारा सपना है

क़ैद तुम्हारी हो बेशक

पिंजरा तो मेरा अपना है।

 

 

बिछावन

 

ओस की बूँदों से

अब फिसल चुके हैं बच्चे

उनके बसंत पर

क्यूं मैं पतझड़ सी झड़ूं

उस स्पर्श का अहसास

बिछा लूँ

ओढ़ उसे ही कुछ सो लूँ

 

 

 

संबंध

 

संबंध ठहरे पानी से

अब सड़ने लगे हैं

आओ हम इक दूजे के

कंधों से उतर जाएं

और अब अपनी

राह बढ़ें

 

 

 

दायरे

 

 

ना इच्छा की

कहीं भागने की

ना जीवन को ही

कोसा कभी

हल को कंधे पर लादे सदा

बस आँख झुकाए जुगाली की

 

रस्सी तुड़ाते

लात मारते

और किसी भी

दिशा भागते

सिर पर जब थे सींग लदे

क्यूँ खाये तुमने डंडे

 

क्यूँ आँख पे पट्टी बँधवाए

रहे घिसटते जीवन भर

एक ही दायरे के भीतर

क्यूँ सदा लगाते रहे चक्कर

बेतुकी बात का पैर ना सिर

एक ज़रा से तेल की ख़ातिर?

 

बैल ने मुझे दो टूक जवाब दिया,

 ये तुम कह रही हो?

 

क्लोन्ज़

 

अब शायद

नवजात बच्चियों की

हत्या न हो

न स्त्री भ्रूण को

गर्भ में ही

समाप्त करने की आवश्यकता पड़े

 

काँसे के थालों को

अब कोलकी में बंद कर दो

क्यूँकि पैदा होने वाला हर बच्चा

बेटा ही होगा

 

बधाइयों की अनवरत ध्वनि

से गूँज उठेगा संसार

बधाई हो

बधाई हो

बेटा हुआ है

बधाई हो

 

जल्दी ही

पुरुष क्लोन्ज़ की

बस्तियाँ बस जाएँगी

प्रतिलिपियों पर आधारित

एक ऐसी पीढ़ी होगी

जिसके न माँ का पता चलेगा

न ही बाप का

 

संग्रहालय में प्रदर्शित

बची खुची महिलाएँ

तब भी मनोरंजन का

साधन ही रहेंगी

 

हाथापाई, युद्ध, लड़ाई, संग्राम में जुटी

पुरुष प्रधान पृथ्वी

कब तक टिकेगी

पर फ़िलहाल

बधाई हो!

 

 

 

बँटवारा

 

 

कल का जब

बंटवारा होगा

आधे की

तुम माँग करोगे

भोगा था

न भोग्य बनोगे

कल संपूर्ण

तुम्हारा था

संपूर्ण क्या तुम कल

मुझको दोगे?

 

 

मुक्ति एक्सप्रैस

 

माँ ने लगाया न सीने से

पहचानी पिता ने बेटी नहीं

भैया पुकारती राखी रही

पर कोई कलाई न आगे बढ़ी

 

चाची ने तरेर के आँख कहा

क्या रस्ते में न थी कोई नदी

नगर को लौटी नगरवधु

मुक्ति एक्सप्रैस में जो थी क़ैदी

 

डब डब करती उन आँखों को

स्वागत नज़र न आया कहीं

थीं मानवता से कहीं अधिक

मज़बूत सलाख़ें लोहे की

 

अब स्वागत होगा साँझ ढले

शान से इन अबलाओं का

ज़ख़्मों पर नमक छिड़कने को

चकलों में जुटेगा फिर मजमा

 

बेधड़क कलाई बेगाने

थामेंगे बताए बिना रिश्ता

नित गाली, मार और यौन रोग

क्या यही हश्र होगा इनका?

 

मुक्ति एक्सप्रैस नाम की रेलगाड़ी में भारतीय सरकार ने कुछ वेश्याओं को घर भिजवाने का असफल प्रयत्न किया था.

 

 

दोष

 

बेवजह राम ने छोड़ा जब

कोई मित्र गया था आग लगा                                                                  

 

चाहा था कि धरती फट जाए

बस और वह उसमें जाए समा

 

कृष्ण की बेवफ़ाई पर

वह ज़ार ज़ार यूँ रोई थी

अच्छा होता इससे तो वह

मर जाती पैदा होते ही

 

यौवन भी न उसका रोक सका

जब बुद्ध ने भी प्रस्थान किया

धन दौलत से भरा था घर

पर दिल उसका था टीस रहा

 

फिर टॉम, डिक और हैरी की

अनियमिता में भी वह तैरी

कुछ ठिठके, कुछ केवल ठहरे

कुछ बने जान के बैरी भी

 

अब बनता है संबंध कोई

कब टूटेगा वह सोचती है

कुछ नया पालने की उसको

टूटे तो खुजली होती है

 

इक स्थाई मित्रता की यूँ तो

वह आज भी इच्छा रखती है

आदर्श पुरुष की ख़ातिर वह

अपना सब कुछ तज सकती है

 

पर ये दुनिया न जाने सदा

क्यूं दोष उसे ही देती है

राम, कृष्ण और विष्णु को

आड़े हाथों नहीं लेती है

 

नज़रअंदाज करती है सदा

पुरुषों की सरासर ज़्यादती को

उसके विरुद्ध शह देती है

क्यूं टॉम डिक या हैरी को?

 

 

व्यवसाय

 

मज़हब जिनका भारी जेबें

ताज़ा कलियाँ उपलब्ध उन्हें

हर रात नई सोने की लौंग

एक बिस्तर नहीं नसीब जिन्हें

 

खिड़की से झाँक बुलाती हैं

चौखट पर खड़ी रिझाती हैं

पिछली रात की चोट छिपा

वे होंठ काट मुसकाती हैं

 

नाएलोन की साड़ी पर

पड़ गए पुराने धब्बे सूख

चुक जाते हैं बदन कई

पर मिटती नहीं सेठों की भूख

 

दलाल इधर दबोचते हैं

तो ग्राहक उधर खरोंचते हैं

हो गर्भपात या कि रक्त स्त्राव

कभी तन्हा इन्हें न छोड़ते हैं

 

बख़्शीश लोग दे जाते हैं

गहना रुपया और यौन रोग

उपयुक्त थीं केवल यौवन में

मृत्यु पर इनकी किसे शोक

 

नगरवधु दासी गणिका

क्यूँ आज हुइं रंडी वेश्या

क्यूँ आक़ा इनका ख़ून चूस

इन्हें लूट के हो जाते हैं हवा

 

समुचित आदर है आज जहाँ

बाक़ी के सब व्यवसायों का

लिहाज़ क्यूँ नहीं जग करता

इन अनाम अबलाओं का.

 

 

पूछताछ

 

एक बेसिर और बेनाम पुरुष

हर रात मेरा पीछा करता है

अपने सिर के बारे में

वह पूछताछ किया करता है

 

यदि ढूँढ के दे दूँ उसका सिर

बेवज़ह मुझे वह न हड़काए

खून में लिपटा उसका धड़

मेरे पीछे से हट जाए

 

क्यूं याद नहीं आता कुछ भी

मन मुझसे ही क्यों छिपाएगा

अधिक दिमाग पर ज़ोर दिया

तो वह अवश्य ही फट जाएगा

 

इसी बीच मिलती है मुझे

एक मासूम सी वह लड़की

गर्दन तक रेत में दबी हुई

लिए चेहरे पर मासूम हँसी

 

आँखों में उसकी खोजती हूँ

होती है मुझे बेहद दहशत

भर मुट्ठी रेत मैं झोंकती हूँ

और वह नहीं झपकती पलक

 

रेत न उसे दबा पाई

भर-भर बर्तन मैं डाल थकी

शीशे सा साफ़ लिए चेहरा

मासूम बनी मुस्काती रही

 

पीठ के पीछे हलचल सुन

मैं पलटी तो दिल दहल उठा

पूछ रहे थे लाखों धड़

सिरों का अपने अता-पता

 

क्या कभी पाऊंगी मैं अपने

बेसिर पुरूषों से प्राण छुटा

शायद ही एक छिपाया हो

क्यूं शहर था मेरे पीछे पड़ा!

 

 

पुनर्जन्म

 

आँखें थीं हिरणी की सी

चोटी ज्यूँ पूँछ गिलहरी की

उम्र से अपनी लंबी कहीं

पहने थी वो  इक छींट छपी

 

लंबे लंबे घूँघट थे

जहाज़नुमा साफ़ों के तले

ढकेलने पर वह बढ़ती थी

काली लंबी मूँछों में घिरे

 

कुछ रेलमपेल में गाते थे

 रघुपति राघव राजा राम

कुछ कोसते थे हत्यारे को

लेकर अजीब सा एक नाम

 

तर थे घूँघट, तर थीं मूंछें

था माजरा क्या किससे पूछें

उचक उचक देखा उसने

इक अर्थी को फूलों से लदे

 

फिर घेरा तंग होने लगा

पूंछ फंसी और  फटी

उधड़ी सीवन को पकड़ हुए

नन्ही लड़की रस्ता भटकी

 

घुप्प अँधेरा सन्नाटा

न चोट कोई न दर्द कहीं

सुनिश्चित सी निश्चिंत जगह

जहाँ थी कोई भीड़ नहीं

 

न घूँघट थे, न ही थे साफ़े

न मूंछें थीं न ही अपना कोई

अजीब बात थी बड़ी की वह

घबराई नहीं न ही रोई ही

 

यादें हैं अवचेतन में

जिनसे मेरा मस्तिष्क भरा

मुझे कोई तो बतलाए

इन सपनों का आधार है क्या?

 

 

 

 

दर्द का रिश्ता

 

इक तरफ़ा था

कब तक निभता

पूरी तरह से

टूटा न था

केवल चटका

कैसे निभता

 

जब तक मुझसे

निभा निभाया

दर्द का रिश्ता

टूटे हाथ सा

सदा साथ

रहता है लटका

दर्द दर्द

और दर्द है करता.

नये वर्ष की शुभकामनाएं

-वीरेन्द्र जैन

नये वर्ष में कम मच्छर हों कम खटमल हों....

नये वर्ष में घिरे न तूफ़ानों की आंधी
नये वर्ष में सूली चढ़े न ईसा गांधी

नये वर्ष में फिर संस्कृति को दाग ना लगे
नये वर्ष में गिरजाघर में आग ना लगे

धार्मिकों को भी थोड़ी सी षर्म सतावे
कुष्ट सेवियों को कोई जिन्दा न जलावे

नये वर्ष में दफ्तर के जैसा दफ्तर हो
सरस्वती की पूजा होवे, पर घर पर हो

सूरज के आगे आगे अंधियारे ना हों
इतिहासों के निर्माता हत्यारे ना हों

नये वर्ष में बिन रिश्वत के काम हो सके
पद मद अंधों का आराम हराम हो सके

नये वर्ष में जाति धर्म के सब दल टूटें
सच्चाई बह निकले जब भी फोड़े फूटें

पैट्रोल डीजल की दर भी और ना चढे
नये वर्ष में अनियोजित परिवार ना बढे

नये वर्ष में कम मच्छर हों कम खटमल हों
नये वर्ष में रोज आपके नल में जल हो

नये वर्ष में रोज नियम से बिजली आये
घी में पाचों उंगली हों घी असली आये

नये वर्ष में अधिक पेट पर वेट न आये
नये वर्ष में ट्रेन आपकी लेट न आये

षेयरवालों के षेयर के रेट ना गिरें
बातचीत में मोबाइल का नेट ना गिरे

बीमारी में अस्पताल पर ताला न हो
और डाक्टर मंत्र चिकित्सा वाला न हो

नये वर्ष में जमे जगत में धाक आपकी
नये वर्ष में रहे सलामत साख आपकी

नये वर्ष में संवादों की धार न टूटे
नये वर्ष में मिले नियम से डाक आपकी
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संपर्क:
वीरेन्द्र जैन
2/1 शालीमार स्टर्लिंग, रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज के पास, भोपाल म.प्र.
फोन 9425674629


गीत

नव वर्ष

-अरूण मित्तल

शुभ हो नव वर्ष शुभ हो नव वर्ष
चंचल चित्त नाचे झूमकर
आये मतवाली घटा घूमकर
हो नवीन सृष्टि का उत्कर्ष
शुभ हो नव वर्ष शुभ हो नव वर्ष

मिट जाये हर क्लेश धरा से
एक चिर नूतन वैभव बरसे
सबके ही मन में हो हर्ष
शुभ हो नव वर्ष शुभ हो नव वर्ष

मानव के हित में चिंतन हो
श्रेष्ठ कर्म से श्रेष्ठ सृजन हो
यूँ प्रयास कर छू लें अर्श
शुभ हो नव वर्ष शुभ हो नव वर्ष

कहानी

गहना

-डॉ. भावना कुँअर

आज़ भी जब मुझे रूपा की बीती जिंदगी याद आती है तो मेरा रोम-रोम सिहर उठता है कलेज़ा पीड़ा के कारण टूटने लगता है, नफ़रत होने लगती है इस संसार से…

रूपा जो मेरी सबसे करीबी सहेली थी। हम दोनों एक ही कॉलेज ही पढ़ते थे। रूपा मध्यम वर्गीय परिवार में पली बढ़ी थी, अभी उसकी पढ़ाई भी पूरी नहीं हुई थी कि एक बड़े घराने से उसके लिये रिश्ता आया और आनफ-फानफ में रूपा की शादी रोहित के साथ हो गयी , जो एक बहुत बड़े बिज़नेस मैन परिवार से था।

उसकी शादी को आज़ तीसरा ही दिन था, घर में बड़ी पूज़ा रखी गयी थी। रूपा की सास ने रूपा को पूज़ा का जोड़ा निकाल कर दिया और जल्दी से नहा धोकर तैयार होने को कहा, स्नान के समय रूपा ने सारे गहने उतारकर बाथरूम में रख दिये और स्नान करने के बाद वह उनको लेना भूल गयी, जब वह बाहर आयी तो देखा सभी लोग जोर-शोर से पूज़ा की तैयारी में जुटे थे। रूपा को ज़रा भी याद नहीं था कि उसने गहने बाथरूम में ही छोड़ दिये हैं। जब उसकी सास ने उसको बिना गहनों के देखा तो बोली-" रूपा तुमने गहने क्यों नहीं पहने?" अब रूपा के तो होशो-हवास ही उड़ गये क्योंकि उसको याद आ गया था कि वो गहने बाथरूम में ही छोड़ आयी है और घर में ना जाने कितने नौकर-चाकर हैं कहीं किसी ने चुरा लिये तो उसका क्या होगा कहीं उसी पर इल्ज़ाम न लग जाये क्योंकि मध्यम वर्गीय परिवार की होने के कारण कहीं ये अमीर लोग उसको ही चोर न समझ बैठे। तभी उसकी सास ने उसको सोच में डूबा देखकर सवाल किया-"रूपा बेटे तुमने गहने क्यों नहीं पहने? क्या तुम्हें वो गहने पंसंद नहीं हैं? अगर नहीं तो कोई बात नहीं मैं तुम्हें दूसरे दे देती हूँ उनको पहन लेना…"

तभी रूपा जैसे नींद से जागी हो वो बोली-"नहीं मम्मी जी ऐसी कोई बात नहीं है मैं बाथरूम में रखकर भूल गयी हूं अभी लाती हूँ…” बस रूपा की सास का इतना सुनना था कि वो करीब-करीब बिफर ही पडी -'अरे ये क्या किया तुमने ? तुम इतनी लापरवाह हो तुम्हें पता भी है ना घर में कितने नौकर-चाकर हैं अब गहने तो नहीं मिलने वाले।"

कहते-कहते वो बाथरूम की ओर दौड़ी और वहाँ गहने ना पाकर उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया घर के सारे लोग एकत्रित हो गये, रूपा का रो-रोकर बुरा हाल था, वो बेहाल सी होकर अपने कमरे की तरफ दौड़ी और वहाँ जाकर फूट-फूटकर कर रोने लगी उसके आँसू थे कि थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे , तभी उसकी निगाह ड्रेसिंग टेबल पर पड़ी तो मारे खुशी के वो उछल पड़ी गहने सामने ही टेबल पर पड़े थे, उसने अपनी सास को आवाज़ लगाई सभी लोग वहाँ आ गये और वहाँ रखे गहने देखकर सभी चौंक पड़े सबकी जान में जान आ गयी नौकरों से अभी किसी ने ना ही कुछ पूछा था ना ही बताया था…

शान्ति नाम की उनकी नौकरानी रूपा के कमरे की ओर ही आ रही थी वह बोली-" बीबीजी हम बाथरूम साफ कर रहे थे तो हमने देखा आपके गहने वहाँ पड़े हैं तो हमने उनको आपके कमरे में लाकर रख दियें हैं आप देख लीजिये… रूपा डबडबाई अँखों से बस उसको थैंक्स ही कह पायी आज़ विद्या ने उसे लज्ज़ित होने से बचा लिया था। वह दिल ही दिल में उसे दुआएँ दे रही थी।

धीरे-धीरे समय बीतता गया रोहित के साथ, जो बहुत ही अज़ीब किस्म के व्यक्तित्व का व्यक्ति था, पैसे का गुरूर, शराब पीना, मौज़ मस्ती ही उसका शौंक था न ही उसे रूपा की परवाह थी, न ही घर की, बस उसकी दुनिया तो उसके दोस्त और उसके शौंक, अब ऐसे में रूपा एक बोझिल ज़िंदगी बिताने लगी दिनभर काम करने के बाद राहुल का इन्तज़ार करना और राहुल का शराब पीकर देर रात में आना और खाना खाकर सो जाना यही अज़ीब सी ज़िंदगी जीने लगी थी रूपा। वहाँ न तो उसको कोई समझने वाला ही था और न ही सुनने वाला था , पर हाँ, सुनाने वाले सब थे।

हाँ इसी बीच शान्ति जरूर उसकी सहेली की तरह हो गयी थी अपना दुख-सुख वह उसको ही बताया करती थी शान्ति बस इतना ही कह पाती -"बीबी जी ये बड़े लोग हैं इनकी बातें क्या बतायें हम…”

एक दिन सभी लोग किसी शादी में गये हुये थे, रूपा तबियत खराब होने के कारण घर पर ही थी, सभी नौकर-चाकर भी अपने-अपने घर जा चुके थे, रूपा की आँखों में नींद का नामोनिशान न था, रात के बारह बज़ चुके थे, टी०वी देखते -देखते आँखों में भी दर्द होने लगा था, उसने एक नींद की गोली खाई और आँख बन्द करके बिस्तर पर लेट गयी, ना जाने कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया, तभी उसने किसी का स्पर्श महसूस किया, उसने करवट ली, सोचा राहुल आ गया होगा, मगर ये क्या? ये राहुल नहीं राहुल के पिता थे, मारे डर और गुस्से से उसके चेहरा तमतमा रहा था, उसने अपने आपको छुड़ाने की हर तरह से कोशिश की, पर नाकामयाब रही, उसने मज़बूर होकर अपने ससुर के सामने हाथ जोड़े, भगवान का वास्ता दिया, पर उस शैतान के सर पर तो वासना का भूत सवार था, रूपा रोती रही, चिल्लाती रही, पर उसकी चीखें तब तक दीवारों से टकराकर वापस आती रहीं जब तक की वें सिसकियों में ना बदल गयीं। कुछ समय बाद सभी लोग वापस आ गये किसी ने भी उसकी सिसकियों की ओर ध्यान नहीं दिया, सब अपने-अपने कमरों में चले गये, राहुल भी मुँह फेरकर सो गया , जब राहुल सुबह उठा तो उसने राहुल को सारा वृतान्त सुनाया, राहुल ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं की, हाँ अपनी माँ को जरूर बता दिया और माँ ने सभी घरवालों को बताया। सभी रूपा को समझाने लगे – “देखो रूपा तुम ये बात किसी को मत बताना देखो घर की ही तो बात है वो कोई गैर तो नहीं है तुम्हारे ससुर जी ही हैं ना क्या फर्क पड़ता है, ऐसा तो हाई सोसाईटीज़ में चलता ही है रूपा यह सब सुनकार स्तब्ध रह गयी और सोचने लगी कि यह वही परिवार है जिसने उसके विवाह के तीन दिन बाद ही सोने के आभूषणों के लिये उसको कितनी जली कटी सुनायी और आज़ जब उसकी अस्मत के गहने को तार-तार किया गया तो इन ऊँची बिल्डिगों वालों ने उफ ! तक नहीं की।

ये लोग क्या समझें कि इज्जत का गहना अनमोल होता है ये तो तो चाँदी, सोने, हीरे जवाहरात की ही कीमत जानते हैं, रूपा ने शान्ति को बुलाया और रो-रोकर उसको सारी बात बताई, शान्ति भी बुरी तरह बिलखने लगी बोली-"बीबी जी आप दिल छोटा मत करो भगवान इनके किये की सज़ा इनको जरूर देगा, बीबी जी छोटे मुँह और बड़ी बात पर राहुल बाबा भी तो रोज़ -रोज़ नयी-नयी जगह जाते हैं, तभी तो रात को देर से घर आते हैं, ये बात तो सभी जानते हैं सिवाय आपके।

अब रूपा के पास कोई चारा नहीं था सिवाय खुदकुशी के क्योंकि इन रईसज़ादों के साथ लड़ने की ना तो उसमें ही ताकत थी, ना ही उसके घरवालों में ।

रूपा बस शान्ति का चेहरा देखती रही और उसकी आँखें शून्य में कहीं अटक गयी और वो हमेशा- हमेशा के लिये मुक्त हो गयी उस उच्चवर्गीय परिवार से।

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(लेखिका परिचय व संपर्क सूत्र के लिए देखें लेखिका का ब्लॉग दिल के दरमियां)

संस्कृति व सभ्यता का महा विश्वविद्यालय शिक्षायतन



प्रस्तुति : देवी नागरानी
शिक्षायतन के प्रारंग में बाल दिवस

तारीख २, दिसम्बर २००७ शिक्षायतन की ओर से आयोजित किया गया 19 वां सांस्कृतिक संगीतमय बालदिवस Hindu Temple Society of North America, Flushing, NY में सम्पन्न हुआ। पूर्णिमा देसाई शिक्षायतन की निर्माता, निर्देशिका अध्यक्ष एवं संचालिका है, जिन्होंने बड़ी समर्थता के साथ संचालन की बागडोर संभाली. ज्ञानदीप को उज्वलित करने की विधा को सरस्वती वंदना की सुंदर स्तुति से किया जिसमें सृष्टि के आधार ब्रम्हा, विष्णु, महेश बालस्वरूप उपस्थित रहे. मुख्य मेहमान World Business Forum ke Chairman
श्री किरन मेहता व सभी श्रोताओं एवं कविगण का स्वागत स्वरमय संगीत से किया गया. सिलसिले को आगे बढाते हुए अपने गुरुकुल में शिक्षा ले रहे सभी बच्चों को पेश किया एक रंगमय मंच पर जो गीत ग़ज़ल ओर शास्त्रीय संगीत से शुरू होकर वादन पर समाप्त हुआ. एक खास बात ध्यान देने योग्य यह थी जहाँ बालक बालिकाओं ने " दीदी तेरा देवर दीवाना" कि धुन पर एक अद्भुत रचना गाई
" अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ, ये है पहले स्वर हिंदी के
ए-ऐ-ओ-औ-और-अं-अः, ये है बाकी स्वर हिंदी के"
अंग्रेज़ी वातावरण में हिन्दी भाषा सीखने का ये एक अनुपम निराला ढंग है जिसमें स्वर और व्यंजन सुर ताल पर सीखने की प्रथा- जो पूर्णिमा जी ने शुरू की है, काबिले तारीफ है जिसके लिये वो बधाई की पात्र हैं. शिक्षा प्रदान का यह सिलसिला पिछले १८ साल से लगातार चल रहा है ओर यह तब तक चलता रहेगा जब तक शिक्षायतन के अपने प्रारंग में ये फूल नहीं महकते. यही पूर्णिमा जी की आशा है और उनका सपना भी.
शिक्षायतन के प्रारंग में आना एक अनुभूति रही और साथ में एक अनुभव भी. आज पहली बार इस समारोह में भाग लेते हुए यूँ लगा की जो बीज पूर्णिमा जी ने कल बोये थे वे इतने फले फूले है बस यूं कहिये एक महकता हुआ गुलिस्ताँ बन गए हैं. इस संगठन का विकास अनेक त्रिवेणियों के रूप में हो रहा है - हिन्दी भाषा का विकास, संगीत, नाट्य, वायलिन वादन,शास्त्रीय संगीत, और तबले पर युगलबंदी. यूँ लगता है अमरीका में यह एक अद्भुत महा विश्वविद्यालय है जहाँ पर वतन का दिल धड़क रहा है. एक मंच पर इस प्रतिभाशाली नव युग की पीढ़ी को विकसित होता देखकर यह महसूस हुआ कि हर युग में रविंद्रनाथ टैगोर का एक शंतिकेतन स्थापित हो रहा है. विश्वास सा बंधता चला जा रहा है की देश हमसे दूर नहीं है. जहाँ जहाँ इस तरह की संस्कृति पनपती रहेगी वहीं वहीं हिंदुस्तान की खुशबू फैलती रहेगी. पूर्णिमा देसाई व उनके कार्य कर्ता टीम का कार्य उलेखनीय है, जिनमें जी जान से से लगे हुए है श्री कमलाप्रसाद जी और पूर्णिमा जी की बेटी कविता देसाई। वे जिस दिशा में काम कर रहे हैं वह आम नहीं, यकीनन एक खास दिशा है जो आने वाली पीढ़ी के लिए एक नया रास्ता तय कर रही है. आज के सुकुमार मन विकसित होकर अपने देश की सौंधी मिटटी की महक यहाँ प्रवासी देश में फैलाने में कामयाब हो रहे हैं, और उसीकी गूँज भारत के हर कोने में भी पहुँच रही है. ये राष्ट्र प्रेम में भीने से लम्हें पुरानी यादें ताज़ा करते रहे जिसके सन्दर्भ में पूर्णिमा जी का कहना है " जितना हर्ष भारत की आज़ादी के वक्त हुआ, अब प्रवासी देश में वहीं राष्ट्र भावना के बीज डालने वाले ये हमारे भविष्य के नेता है, जो हमारी पूँजी भी है और आने वाले कल की धरोहर भी." अगर ऐसी सजीव आशाएं मन में संचार कर रही हों तो कौन कह सकता है कि हमारी मातृभाषा व राष्ट्रभाषा हिन्दी का भविष्य उज्वल नहीं है? उसीका भार हमें नव पीढ़ी के कांधों पर रखना होगा, चाहे वो साहित्य का हो या संस्कृति की दिशा में हो. कला की दृष्टि से निपुणता दिखाने में सबकी माहिरता सुनने व देखने योग्य थी पर खास उलेख मैं यहाँ क्रिस्टीन का करना चाहूंगी जो विदेशी होते हुए भी बढ़ी निपुणता एवं सुगमता के साथ राग बागेश्वरी को अलाप,व छोटी तान के साथ प्रस्तुत कर पायी, और जसबीर जिसने बड़ी ही सुंदर सलीकेदार ग़ज़ल सुनाई. बाकी सभी जो सारथी बन कर इस शिक्षायतन रथ को आगे बढ़ा रहे हैं वे हैं: राहुल, कविता, सुदीप्ता, शिवांगी, कुनल, यश, अन्विका, केवल, आकाश विरेन, युदित, कविता महावीर और सुदीप. वायलिन पर मुग्ध करने वाली धुन में श्री कमल जी ने तो कमाल ही कर दिया जिनके साथ तबले पर सांगत कि साजिब मोदक. पूर्णिमा जी ने भक्ति भाव से बड़े मन मोहक भजन गाये, तबले पर उनकी संगत कर रहे थे कुनाल नसीर और साजिब मोदक.

कार्यक्रम के अन्तिम चरण में आयोजित कवि गोष्टी में भाग लेने वाले थे श्री अशोक व्यास, देवी नागरानी, सरिता मेहता, बिन्देश्वरी अगरवाल, राम बाबू गौतन, नीना वही और आनंद आहूजा. मुख्य मेहमान श्री किरण मेहता के हाथों श्री पूर्णिमा देसाई की हाजरी में कवियों को "काव्य मणि" पुरुस्कार से सन्मानित किया गया। सुजलाम सुफलाम् माताराम वंदे मातरम !!!
प्रस्तुतकर्ता
देवी नागरानी

चराग़े दिल में पूर्वप्रकाशित

पुस्तक विचार

ग़ज़ल कहता हूँ

Pran. Bk (WinCE)

(समीक्षा)

शाइरः प्राण शर्मा

pran S (WinCE)

प्रकाशक : अनिभव प्रकाशन, ई-२८, लाजपतनगर, साहिबाबाद. उ.प्र.

मूल्यः १५०, पन्नेः ११२

-देवी नागरानी

devi nagrani श्री प्राण शर्मा ग़ज़ल विधा के संसार में एक जाने माने उस्ताद हैं जिन्होंने अपनी शैली और सोच को शिल्पकार की तरह अपने ढंग से ढाला है. आए दिनों ग़ज़ल के बारे में उनके लेख पढ़ने को मिलते है जो नये लिखने वालों के लिये मार्गदर्शक बनते चले जा रहे हैं. आपके द्वारा लिखा गया “हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल” धारावाहिक रूप में हमारे सामने आता रहा और पथ दर्शक बन कर वह कई ग़ज़ल विधा की बारीकियों पर रोशनी डालते हुए बड़ा ही कारगर सिद्ध हुआ. उसी के एक अंश में आइये देखें वो ग़ज़ल के बारे में क्या कहते हैं –

“अच्छी ग़ज़ल की कुछ विशेषताएं होती हैं. इन पर समय के साथ के चलते हुए विशेषज्ञता हासिल की जाये तो उम्दा ग़ज़ल कही जा सकती है. साथ ही इनका अभाव हो तो ग़ज़ल अपना प्रभाव खो देती है या ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाती. सरल, सुगम एवं कर्णप्रिय शब्दों में यदि हिंदी ग़ज़ल लिखी जायेगी तो प्रश्न ही पैदा नहीं होता कि वह जन मानस को न मथ सकें. यदि ग़ज़ल में सर्वसाधारण के समझ में आने वाली कर्ण प्रिय मधुर शब्द आएंगे तो वह न केवल अपनी भीनी- भीनी सुगंध से जनमानस को महकाएगी बल्कि अपनी अलग पहचान बनायेगी. हिंदी ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने के लिये उसको बोलचाल या देशज शब्दावली को चुनना होगा, जटिल ग़ज़ल की वकालत को छोड़ना होगा.”

जब किसी रचनाकार की साहित्य रुचि किसी एक खास विधा में हो और वह उसके लिये जुस्तजू बन जाये तो वहाँ लेखन कला साधना स्वरूप सी हो जाती है. ऐसी ही एक स्थिती में प्राण शर्मा ने अपने इस ग़ज़ल संग्रह के आरंभ में लिखा है जिसे पढ़ कर सोच भी यही सोचती है कि किस जमीन की बुनियाद पर इस सोच की शिला टिकी होगी, किस विचार के उत्पन्न होने से, उसके न होने तक का फासला तय हुआ होगा. विचार की पुख़्तगी को देखिये, सुनिये और महसूस कीजिये.

ग़ज़ल कहता हूँ तेरा ध्यान करके

यही ए प्राण अपनी आरती है.”

अद्भुत, सुंदरता की चरम सीमा को छूता हुआ एक सच. यही भावार्थ लेकर एक शेर मेरी गज़ल का इसी बात की सहमति दे रहा है

दिल की दुनियाँ में जब मैं डूबी रही

कहकशाँ में नज़र आ गया कहकशाँ.”

-स्वरचित

एक आसमान जिस्म के अंदर भी है

तुम बीच से हटो तो नज़ारा दिखाई दे.”

- गणेश बिहारी तर्ज़

नज़रिया एक पर हर लफ़्ज अपने-अपने भाव से शेर में पिरोये हुए तालमेल का अंतर अपनी-अपनी द्रष्टि से अलग-अलग ज़ाहिर कर रहा है, जैसे कोई अपने वजूद की गहराइयों में डूबकर, बहुत कुछ टटोलकर प्रस्तुत करता है जिसमें कथ्य और शिल्प दोनों साकार हो जाते हैं. निशब्द सोच, शब्दों का सहारा लेकर बोलने लगती है, चलने लगती है. यही आकार एक अर्थपूर्ण स्वरूप धारण करके सामने आ जाता है एक कलाकार की कलात्मक अर्चना की तरह. सीप में मोती स्वास स्वास में राम बसा हो जैसे. स्वरचित हाइकू यूँ मानिये कि अपनी अपनी सोच के परों पर सवार होकर प्राण जी का मन शब्दों के जाल बुनता है, उधेड़ता है और फिर बुनता है कुछ यूँ कि वो छंद के दायरे में जहाँ कभी तो आसानियाँ साथ देती है, कहीं तो बस कशमकश के घेराव में छटपटाहट ही होने लगती है, जब तक सोच का एक मिसरा दूसरे मिसरे के साथ नियमानुसार ताल मेल नहीं खाता. ग़ज़ल लिखने के कुछ अपने कायदे हैं, कुछ रस्में है, उनका अपना एक लहज़ा होता है. उन्हीं के साथ इन्साफ करते हुए अपनी तबीयत की फिक्र को किस तरह ज़ाहिर कर रहे हैं, गौर फरमायें, सुनते है उनके ही शब्दों में-

ढूँढ लेता मैं कहीं उसका ठिकाना पाँव में पड़ते न छाले सोचता हूँ.

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में उम्र भर डेरा न डाले सोचता हूँ.”

किसी ने खूब कहा है ;कवि और शब्द का अटूट बंधन होता है. कवि के बिना शब्द तो हो सकते हैं, परंतु शब्द बिना कवि नहीं होता. एक हद तक यह सही है, पर दूसरी ओर “कविता” केवल भाषा या शब्द का समूह नहीं. उन शब्दों का सहारा लेकर अपने-अपने भावों को भाषा में व्यक्त करने की कला गीत-गज़ल है. ये तजुरबात की गलियों से होकर गुज़रने का सफर उम्र की मौसमें को काटने के बाद कुछ और ही गहरा होने लगता है, हकी़कतों से वाकिफ कराता हुआ. सोच का निराला अंदाज़ है, शब्दों का खेल भी निराला, कम शब्दों की पेशकश, जिससे साफ़ ज़ाहिर होता है वह ग़ज़ल की लेखन कला की माहिरता और उनकी सोच की परवाज़ सरहदों की हदें छूने के लिये बेताब है. बस शब्द बीज बोकर अपनी सोच को आकार देते हैं, कभी तो सुहाने सपने साकार कर लेते हैं, तो कहीं अपनी कड़वाहटों का ज़हर उगल देते हैं. सुनते हैं जब गमों के मौसम आते हैं तो बेहतरीन शेर बन जाते हैं.

अब देखिये प्राण शर्मा के एक गज़ल का मतला, जहाँ उनके अहसास सांस लेने लगते है, जैसे इनमें प्राण का संचार हुआ हो. बस शब्द बीज के अंकुर जब निकलते हैं तो सोच भी सैर को निकलती है, हर दिशा की रंगत साथ ले आती है.

सोच का परिंदा पर लगाकर ऊंचाइयों को छू जाता है, तो कभी ह्रदय की गहराइयों में डूब जाता है. वहाँ पर जिस सच के साथ उसका साक्षात्कार होता है उसी सत्य को कलम की जुबानी कागज़ पर भावपूर्ण अर्थ के साथ पेश कर देता है. अब देखिये इनके एक गज़ल का मक्ता इसी ओर इशारा कर रहा है:

धूप में तपते हूए, प्राण मौसम में सूख जाता है समन्दर, कौन कहता है”.

हिंदी ग़ज़ल बनाम उर्दू ग़ज़ल; धारावाहिक में उनका संकेत ग़ज़ल की अर्थपूर्ण संभावनाओं को प्रस्तुत करते समय क्या होता है और क्यों होता है कहते हुए प्राण शर्मा जी की जुबानी सुनें क्या फरमाते हैं- “अच्छे शेर सहज भाव, स्पष्ट भाषा और उपयुक्त छंद में सम्मिलन का नाम है. एक ही कमी से वह रसहीन और बेमानी हो जाता है. भवन के अंदर की भव्यता बाहर से दिख जाती है. जिस तरह करीने से ईंट पर ईंट लगाना निपुण राजगीर के कौशल का परिचायक होता है, उसी तरह शेर में विचार को शब्द सौंदर्य तथा कथ्य का माधुर्य प्रदान करना अच्छे कवि की उपलब्धि को दर्शाता है”.

जैसे मैंने पहले यह लिखा है कि यह उपलब्धि मिलती है गुरू की आशीष तथा परिश्रम अभ्यास से. जो यह समझता है कि ग़ज़ल लिखना उसके बाएं हाथ का खेल है तो वह भूल-भुलैया में विचरता है तथा भटकता है. सच तो यह है कि अच्छा शेर रचने के लिये शायर को रातभर बिस्तर पर करवटें बदलनी पड़ती है. मैंने भी लिखा है; - सोच की भट्टी में सौ सौ बार दहता है तब कहीं जाके कोई इक शेर बनता है. किसी हद तक यह ठीक भी है. शिल्पकारी में भी कम मेहनत नहीं करनी पड़ती है. मेरा एक शेर

न दीवार पुख़्ती वहाँ पर खड़ी है जहाँ ईंट से ईंट जिस दिन लड़ी है;

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसी का कभी शर्म से किसी की गरदन झुकी है”

- देवी

बकौल शाइर डा॰ कुँअर बेचैन ने इस ग़ज़ल संग्रह की प्रस्तावना को एक नये व अनोखे अंदाज से पेश किया है, हाँ खूब इन्साफ भी किया है. उनकी शैली उनकी दार्शनिकता के विस्तार के साथ खूब इन्साफ किया है. उनका प्राण शर्मा के ग़ज़लों के साथ साक्षात्कार होना, और फिर उसके साथ गुफ्तगू का सिलसिला इतना रोचक और जानदार लगा कि शुरू करने के बाद समाप्ति की ओर बढ़ती चली गई और फिर तो सोच का नतीजा आपके सामने है. सोच की उड़ान आसमाँ को छेदने की शिद्दत रखती है. छोटे बहर में बड़ी से बड़ी बात कहना इतना आसान नहीं. यह तो एक शिल्पकला है. ग़ज़ल लिखना एक क्रिया है, एक अनुभूति है जो ह्रदय में पनपते हुए हर भाव के आधार पर टिकी होती है. एक सत्य यह भी है कि यह हर इन्सान की पूंजी है, शायद इसलिये कि हर बशर में एक कलाकार, एक चित्रकार, शिल्पकार एवं एक कवि छुपा हुआ होता है.

किसी न किसी माध्यम द्वारा सभी अपनी भावनाएं प्रकट करते हैं, पर स्वरूप सब का अलग अलग होता है. एक शिल्पकार पत्थरों को तराश कर एक स्वरूप बनाता है जो उसकी कल्पना को साकार करता है, चित्रकार तूलिका पर रंगों के माध्यम से अपने सपने साकार करता है और एक कवि की अपनी निशब्द सोच, शब्दों का आधार लेकर बोलने लगती है तो कविता बन जाती है, चाहे वह गीत स्वरूप हो या रुबाई या गज़ल. देखिये प्राण शर्मा की इस कला के शिल्प का एक नमूना-

प्राण दुख आए भले ही जिंदगी में उम्र भर न डाले डेरा सोचता हूँ”.

काव्यानुभव में ढलने के लिये रचनाकार को जीवन पथ पर उम्र के मौसमों से गुज़रना होता है और जो अनुभव हासिल होते है उनकी प्राण जी के पास कोई कमी नहीं है. जिंदगी की हर राह पर जो देखा, जाना, पहचाना, महसूस किया और फिर परख कर उनको शब्दों के जाल में बुन कर प्रस्तुत किया, उस का अंदाज़ देखिये इस शेर में-

झोंपड़ी की बात मन करिये अभी भूखे के मुंह में निवाला चाहिये”.

हम भी थे अनजान माना आदमियत से मगर आदमी हमको बनाया आदमी के प्यार ने. उनकी शैली उनके चिंतन मनन के विस्तार से परिचित कराते हुए प्राण शर्मा के शेर हमें इस कदर अपने विश्वास में लेते हैं कि हमें यकीन करना पड़ता है कि उनकी शाइरी का रंग आने वाली नवोदित कवियों की राहों में अपनी सोच के उजाले भर देगा. लहज़े में सादगी, ख्याल में संजीदगी और सच्चाइयों के सामने आइना बन कर खड़ा है. हर राज का पर्दाफाश करते हुए प्राण जी के शेर के सिलसिले अब काफिले बन रहे है जो अपने साथ एक पैग़ाम लिये,बिन आहट के खामोशियों के साथ सफर करते हुए अपने मन के गुलशन में उमड़ते हुए भारतीयता के सभी रंग, वहाँ की सभ्यता, संस्कृति, तीज त्यौहार, परिवेश, परंपराओं की जलतरंग से हमारी पहचान कराते चले जा रहे हैं. उनका ये ग़ज़ल संग्रह ; मैं ग़ज़ल कहता हूँ; . बोलचाल की भाषा में अपने मन के भाव प्रकट करने के इस सलीके से मैं खुद बहुत मुतासिर हुई हूँ और आशा ही नहीं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि उनका यह सँग्रह लोगों की दिलों में अपना स्थान बनाता रहेगा.

मेरी राह रौशन करें आज देवी यही वो दिये है, यही वो दिये हैं.”

-स्वरचित

जाते जाते एक अनुपम शेर उनकी जुबानी-

रोशनी आए तो कैसे घर में दिन में भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे”.

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देवी नागरानी

न्यू जर्सी, यू.एस.ए

dnangrani@gmail.com

URL://charagedil.wordpress.com

व्यंग्य

संचालक

-आर.के.भंवर

r k bhanwar1 (WinCE) एंकर, संचालक, कम्प्येरर, उद्घोषक, एनाउंसर ये सारे शब्द एक उस बहु प्रयोजनीय व्यक्ति के निमित्त गढ़े गये हैं जो किसी संगोष्ठी, कार्यशाला, व्याख्यानमाला या सभा में 'मास्टर आफ सेरेमनी' होता है। किसी आयोजन के हिट और फ्लाप दोनों में ही उसकी भूमिका प्रबल होती है। रद्दी से रद्दी कार्यक्रम को वह बोलने की अपनी चमत्कारिक शैली में सुपरहिट करा सकता है। इसके विपरीत सुपरहिट आयोजन को अपनी नीरसता से बोगस भी। वह मंच पर ही एक दो किलोमीटर चल लेता है। वह सभापति की तरह एक आसन धर न होकर उठक बैठक लगाता ही रहता है। चुनाँचे एक स्थान पर बैठना उसके नसीब में नहीं। उसकी भूमिका उस टिकट चिपके लिफ़ाफ़ा की तरह है जिसे फाड़कर उसमें रखे पत्र को पढ़ना होता है और आप बेहतर ही जानते है कि फटे लिफाफे को कोई कलेजे नहीं लगाता है। इस प्रकार संचालक अपना काम करके डस्टबिन में चला जाता है। वह पूरे आयोजन का सूत्रधार होता है। वह मोतियों की माला का धागा होता है। माला, जिसमें मोतियां तो दिखती हैं पर धागा नहीं। और धागा यदि अपने को दिखाने की चाह रख ले तो मोतियों पर क्या गुजरेगी ?

वह किसी भी आयोजन का लास्ट मैन स्टैंडिंग होता है। आयोजन की समाप्ति तक अथवा सभी को स्वल्पाहार की मेज तक भेजने की घोषणा तक वह मंच पर रहता है। उसके हाथ का कागज परम गोपनीय होता है। बोलने के लिए किस किस महानुभाव को अवसर दिया गया है अथवा किसको नहीं दिया गया है, यह काम कम खतरे का नहीं होता है। जिसको बोलने का अवसर नहीं दिया गया और वह पूरी तैयारी के साथ आया है तो क्या समझते है वह महाशय अपनी बांह नहीं चढ़ायेंगे। घूर घूर कर यह तो बता ही देते है कि उतरो नीचे बच्चू , देखते है तुम्हारी औकात। ऐसे अवसर पर वह बहुत निरीह प्राणी होता है। उसके बचाव के लिए कोई नहीं आता है। मुख्य अतिथि अथवा माननीय अध्यक्ष जी को माला पहनवाने में कहीं चूक कर दी तो भी उसकी खैर नहीं .. । उसने जिस किसी से माला नहीं पहनवाई वह उसके दुश्मन, नीचे उतरे तो देख लेंगे की धमकी सो अलग। डर डर कर वह कैसे अपना काम चलाता है यह किसी धुरंधर संचालक के जेहन से पूछिये।

संचालक आयोजन की बुनियाद की ईंट होता है, जबकि कलश किसी और का चमकता है। उसका नाम भी नहीं छपता है। यदाकदा छप भी गया तो मात्र इतना गोष्ठी का संचालन फलां ने किया। उसमें यह भी नहीं बताया जाता है कि संचालन कला, किस कोटि की थी।

वर्तमान दौर में लोगबाग इस कला में अपना कैरियर खोजने लगे है। बेरोजगारी तो है ही। क्या करें, यह क्षेत्र कठिन तो है पर बहुत कठिन नहीं है। थोड़े बहुत शब्द और विशेषण पास में हो तो काम चल जाता है। पर मास्टर होने के लिए मंचीय तिकड़म को सीखना भी जरूरी है। जैसे आयोजक चाहता है कि फलां श्रीमान को कम महत्व मिले अथवा फलां जी को कुछ ज्यादा। वह तदनुसार काम कर लेता है। आयोजन का सफल होने का मतलब यह कि जितना कुछ लगाया है उससे तिगुना आयोजन से प्राप्ति नहीं हुई तो आयोजन की सफलता में कुछ कमी अखरेगी। सफल आयोजन हेतु समझदार आयोजक आयोजन से पहले संचालक से आधा दर्जन बैठक अवश्य करते हैं। इन बैठकों का मात्र उद्देश्य इतना ही रहता है कि कोई लय न टूटने पाये या जो फलसफा तय हो वह वैसे ही कार्यान्वित भी हो।

एक कुशल संचालक मंचस्थ वर्ण्य सद्जनों का इतिहास साथ में रखता है। उनके पैदा होने से लेकर उनके सुकृत्य (मंच पर श्रीमानों का कुकृत्य ब्यौरा निषेध होता है) तक का ब्यौरा। वह आयोजन का सूत्रधार तो जरूर होता है पर उसका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता है। उसे वही करना है जो आयोजक चाहेगा। इसे ऐसे कह ले कि रिमोट आयोजक के पास ही रहता है। वह दायें बायें जा ही नहीं सकता। उसकी नजरे आयोजक के संकेत की ओर लगी रहती है। मजाल क्या कि वह इधर उधर की कुछ जोड़ दे या छोड़ दे। यदि किया भी तो मानदेय में कटौती हुई। इस प्रकार वह अपने पेट पर जानबूझकर लात कभी नहीं मारता। यह अलग बात है कि मंच पर उससे छेड़छाड़ होता ही रहता है।

उसकी स्थिति उस समय अत्यंत दयनीय हो जाती है जब किसी वक्ता को बोलने के लिए पांच मिनट निर्धारित हो और वह बिना विराम के तीस मिनट बोल जाये। ऐसे में क्या करें, वह ? कितनी ही बार वह मन ही मन उसे गाली देता है, पर बाहर वह मुस्कराहट बिखेरने के अलावा कुछ नहीं कर पाता। बुध्दिधर लोगों का मानना है कि संचालन कर्म उन्हीं को साजता है जो अपनी विचार यात्रा का सफर मीलों तक नहीं ले जा सकते हैं। यह सोच ऐसे बुद्धिजीवियों की हो सकती है जो संचालन कर्म से जलन रखते हो। दरअसल एक कुशल संचालक एक कुषल रिर्पोटर भी होता है क्योंकि वह मंच की क्ष त्र ज्ञ से भिज्ञ होता है। मंच पर जब तक रहता है वह अतिविशिष्ट श्रेणी में रहता है। मंच से उतरते ही .... ?

संचालक आयोजन में सिर्फ संचालक ही होता है, उसका कोई नाम नहीं होता है। आयोजन सफल रहा हो तो आयोजक की जय जय। और संचालक, पर्दे के पीछे। सार यह है कि वह निष्काम कर्म की प्रतिमूर्ति होता है। कर्म में ही अधिकार रखने वाले संचालक को जो भी पत्र पुष्प सहज भाव से प्राप्त हो भी जाते है तो वह क्या उसकी गंभीर योग्यता के समतुल्य होते हैं ? उसके कार्य का आंकलन धन नहीं है और धन हो भी नहीं सकता है। वह आयोजन की नब्ज पर हाथ रखता है। क्या मजाल कि आयोजन के मिनट-टू-मिनट से वह भटक जाये, न ... न ... हो ही नहीं सकता।

संचालक का अपने कर्म के प्रति निष्ठा का भाव सभी क्षेत्रों में ग्राह्य होना चाहिये। हम जब कोई काम करते हैं तो उसकी पूर्णता पर प्राप्ति का भाव रखते हैं, प्राप्ति मतलब धन या यश, में कोई या दोनों ही, पर संचालक इन दोनों से दूर रहता है। धन मान ले मिल भी जाता है तो वह उसकी प्रतिभा कर्म का स्पष्ट मूल्यांकन कदापि नहीं है। इस विघा में लोग कैरियर की खोज करते हैं, उन्हें इससे काफी राहत मिलेगी।

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व्यंग्य

धनतंत्र + गनतंत्र = गणतंत्र

-आर.के.भंवर

जब बात आती है गणतंत्र की, तो मुझे अभी भी लगता है कि इस देश में धनतंत्र और गन(बंदूक) तंत्र के सामने जनतंत्र लाचार है। धनतंत्र और गनतंत्र दोनों मिलजुलकर काम कर रहे है। समन्वित विकास यात्रा में दोनों का जबरदस्त महत्व है। यह दोनों जब-जब साथ रहे है तो समाज, राज्य और देश का बेड़ागर्क किये है और कर रहे है, आगे भी करते रहेंगे। भारतीय राजनीति में इनका महत्व सर्वोपरि है। ये दोनों सत्ता की चूलें है। देश में गणतंत्र की वर्षगांठ मना ली गई है। सत्तावनवां गणतंत्र आया और आखिरकार मन ही गया। सबने खुशियां मनायी, झांकियां सजकर निकली, नेताओं ने भाषण दिये और हमारा गणतंत्र मजबूत हुआ। हो भी क्यों न ...... उम्र के सत्तावनवें दौर से गुजर रहे गणतंत्र का परिपक्व होना स्वाभाविक ही है। हमारे वैज्ञानिक व पूर्व राष्ट्रपति जी का भी यही कहना था कि संसदीय कार्य प्रणाली में परिपक्वता आ चुकी है। बहरहाल हमारा गणतंत्र उम्रदराज हो, ऐसी सभी की कामना होती है। अपने गणतंत्र के प्रतिवर्ष बढ़ते रहने से और इस बार उम्र के सत्तावन वर्ष की डयौढ़ी पर पहुंच जाने पर एक अनायास शंका मन में अलार्म बजाती है। क्षमा करिये शंकाएं कहीं तनाव में न बदलने पाये, इसलिए शंकाओं को शब्द देना परम आवश्यक है।

शंका यह, कि क्यों , क्या अपना गणतंत्र रिटायर नहीं होगा। और होगा, तो कब होगा। अट्ठावन में या साठ में या बहसठ में । फिर ढीले-ढाले, खर्चीलें गणतंत्र को क्यों न वी.आर.एस. दे दिया जाए कि भाई यह लो अपना पैसा या तो फुरसत से अपनी रिटायर्ड जिंदगी बिताओ या कोई प्राईवेट धंधा करो। हमें अब तुम्हारी जरूरत नहीं है। हमने एक कम्प्यूटर खरीद लिया है और नया साफ्टवेयर डलवा लिया है जो गणतंत्र की जगह काम कर सकता है। संविधान भी उसी कम्प्यूटर में फीड कर दिया है, वख्त जरूरत पर उसका इस्तेमाल करते रहेंगें। गणतंत्र मंहगा पड़ता है, उसे वी.आर.एस. देने पर देष का खर्च बचेगा। देश की विकास दर बढ़ जायेगी। जरूरत हुई तो किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी को ठेका दे देंगे। क्या जाता है एक टेंडर नोटिस सरकारी खर्चे पर निकालने में। चट्ट टेण्डर छपा और पट्ट आवेदनों के ढेर गिरे। बना डालेगे कम्परेटिव स्टेटमेंट। फर्स्ट लोएस्ट को दे देंगे, काम। बस। एक महीने पहले से तैयारी करने वाले, लंबी दूरी पर कदमताल करने, मंगनहीं का कपड़ा ले काम चलाने वाले स्कूली बच्चे को तो यही मालूम कि सज-धज कर परेड में जाना ही छब्बीस जनवरी कहलाती है। बहुत ज्यादा तो इतना कि इसी दिन संविधान जनता जनार्दन के हवाले कर दिया गया था कि लो रखो, पढ़ों और अपने पर लागू मानों। तो क्या जोखू और फुलमत्तो के पास भारतीय संविधान की किताब है या कोई ऐसा तंत्र है जहां से यह किताब बिना किसी आर्थिक दबाव के मिल जाए। इसीलिए वी.आर.एस. या रिटायर की बात आ रही है, कि क्यों, ऐसा हो सकेगा। इतनी मोटी, छोटे-छोटे अक्षरों वाली संविधान की किताब को कौन पढ़ेगा या जब मिलेगी तो तभी न पढ़ी जायेगी। इस देष का संविधान तो एक लाइन का लिखित होना चाहिए वह यह कि जिसकी लाठी उसकी भैंस, हालांकि यह अलिखित संविधान सभी जगह पूरे उत्साह से लागू है। जब लाठी में झंडा लग जाता तो भैंस कुछ समय के लिए आराम फरमा लेती है, क्योंकि भैंस को मालूम है कि वह बिना लाठी के आगे नहीं बढ़ सकती है। कभी कभी मुझे लगता है कि यह भारत का ही नहीं अपितु विश्व के सभी दादा देशों का संविधान है। ये अलग बात है कि वहां लाठी और भैंस किसी अन्य रूप में है।

देखा जाये तो इस देश में गणतंत्र की जरूरत सचमुच कम होती जा रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने कर्मचारी की जरूरत आधुनिक कम्पनी में न हो। उसके पास एम.बी.ए. की डिग्री नहीं है और न वह आई.एस.ओ. है, साथ ही वह सिक्स सिग्मा भी नहीं है। नए भारत उद्योग निगम में जो नये प्रोजेक्ट चल रहे हैं, उनमें गणतंत्र बहुत काम नहीं आता। एक प्रोजेक्ट हिन्दुत्व का है, एक जातिवाद का है, एक देश के कारपोरेटाईजेशन का है, ये आधुनिक जमाने के आधुनिक धंधे है जिनमें विकास की संभावनाएं हैं, इनमें आधुनिक तेज तर्रार मैनेजरों की जरूरत है। देश बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है। 21 वीं सदी में जाने से पहले राजीव गांधी जी के साथ सैम पित्रोदा जी आये थे, पर अब उनकी भी जरूरत नहीं है। देश में मरे हुए महान पुरूषों की मूर्तियों की जरूरत है और जरूरत है उनकी जाति के आधार पर संगठन की। जिंदा कौमें इंतजार नहीं करती है, वे आज के जमाने की है, इसलिए मरे हुए महान पुरूषों को अपने झंडे, डंडें, पोस्टर, बैनर के वास्ते जिंदा रखती है। वे पार्टियों या खेमों के सुप्रीमो बन जाते है। पार्टियों में बंटे महापुरूषों के लिए पार्टी का संविधान या पार्टी का एजेंडा। वह भी देश के संविधान से बहुत ऊपर। देश के संविधान कानूनविदों के लिए है या सेमिनार के लिए है। संविधान गण के लिए और तंत्र गण के लिए नहीं, वह मीडिया के लिए है।

ऐसे में हमारा पुराना ढीलाढाला गणतंत्र क्या करेगा। गणतंत्र बनाने वालों की ब्रान्डिंग हमने जो कर दी है। महात्मा गांधी सिर्फ अन्तर्राष्ट्रीय मंचों के लिए ठीक है। उनकी भी अब इस देश में विशेष जरूरत नहीं है। रिचर्ड एटनबेरो के लिए गांधी ठीक है, वह भी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में, ताकि आस्कर में पहुंच सके। यहां तो शेखर कपूर ही पर्याप्त है, बैंडैट क्वीन या एलिजाबेथ पर काम करने के लिए। इस देश में गांधी की उपयोगिता राजघाट तक सीमित है या शपथ समारोहों या दो अक्तूबर या सौ से हजार रूपयों पर मुद्रण तक। ऐसे में बुढ़ाता गणतंत्र काल सेंटर में नौकरी तो नहीं कर सकता है। हमारे गणतंत्र का पेंटेंट हो जाए तो कुछ महत्ता भले ही बढ़ जाए, पर इसके लिए जरूरी है कि सारे महापुरूषों को ब्राण्ड में परिवर्तित कर दिया जाए। सभी का एक नम्बर आवंटित कर दिया जाए जिससे जिसका काम चले, सो चलाए।

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28 दिसंबर को पुण्यतिथि के अवसर पर विशेष

छत्तीसगढ़ी काव्य के भारतेन्दु पंडित सुन्दरलाल शर्मा

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

ashwini kesharwani 2 (WinCE) महानदी के तटवर्ती ग्राम्यांचलों में केवल राजा, जमींदार या किसान ही नहीं बल्कि समाज सुधारक, पथ प्रदर्शक, अंग्रेजी दासता से मुक्ति दिलाने में अग्रणी नेता और साहित्यकार भी थे। छत्तीसगढ़ अपने इन सपूतों का ऋणी है जिनके बलिदान से हमारा देश आजाद हुआ। उन्हीं में से एक थे पंडित सुन्दरलाल शर्मा। उनके कार्यो के कारण उन्हें ''छत्तीसगढ़ केसरी'' और ''छत्तीसगढ़ का गांधी'' कहा जाता है। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार भी थे। अपनी साहित्यिक प्रतिभा से जहां जन जन के प्रिय बने वहीं भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और अछूतोध्दार में प्रमुख भूमिका निभाकर छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का सद्प्रयास किया है। छत्तीसगढ़ के वनांचलों में पंडित सुंदरलाल शर्मा ने ही महात्मा गांधी को पहुंचाने का सद्कार्य किया था। उनके कार्यो को देखकर गांधी जी अत्यंत प्रसन्न हुए और एक आम सभा में कहने लगे :-''मैंने सुना था कि छत्तीसगढ़ एक पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। लेकिन यहां आने पर पता चला कि यह गलत है। यहां तो मुझसे भी अधिक विचारवान और दूरदर्शी लोग रहते हैं। उदाहरण के लिए पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ही लीजिए जो मरे साथ बैठे हुए हैं, उन्होंने मुझसे बहुत पहले ही हरिजन उध्दार का सद्कार्य शुरू कर दिया है इस नाते वे मेरे ''गुरू'' हैं। ब्राह्यण कुलोत्पन्न, समाज सेवक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और साहित्यकार पंडित सुन्दरलाल शर्मा ''छत्तीसगढ़ी काव्य के भारतेन्दु'' थे। उनके बारे में पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ गौरव में लिखते हैं :-

 

बुधवर रामदयालु, स्वभाषा गौरव केतन।

ठाकुर छेदीलाल विपुल विद्यादि निकेतन।

द्विजवर सुन्दरलाल मातृभाषा तम पूषण।

बाबु प्यारेलाल देश छत्तीसगढ़ भूषण।

लक्ष्मण, गोविंद, रघुनाथ युग महाराष्ट्र नर कुल तिलक।

नृप चतुर चक्रधर लख जिन्हें हिन्दी उठती है किलक॥ (163)

जगन्नाथ है भानु, चन्द्र बल्देव यशोधर।

प्रतिभाशाली मुकुट काव्य के मुकुट मनोहर।

पदुमलाल स्वर्गीय सुधा सुरसरी प्रवाहक।

परमकृती शिवदास आशु कवि बुधवर शासक।

ज्वालाप्रसाद सत्काव्यमणी तम मोचन लोचन सुघर।

श्री सुन्दरलाल महाकृति कविता कान्ता कान्त वर॥ (165)

 

छत्तीसगढ़ी दानलीला के अंत में वे अपने बारे में लिखते हैं :-

छत्तिसगढ़ के मझोत एक राजिम सहर,

जहां जतरा महिना माघ भरते।

देश देश गांव गांव के जो रोजगार भारी,

माल असबाब बेंचे खातिर उतरथे।

राजा अऊ जमींदार मंडल किसान

धनवान जहां जुरके जमात ले निकरथे।

सुन्दरलाल द्विजराज नाम हवै एक,

भाई ! सुनौ तहां कविताई बैठि करथे।

ऐसे महापुरूष का जन्म छत्तीसगढ़ के तीर्थ राजिम के निकट चमसुर गांव में परासर गोत्रीय यजंर्वेदीय ब्राह्मण पंडित जयलाल तिवारी के घर पौष अमावस्या संवत् 1881 को हुआ था। उनका परिवार सुसंस्कृत, समृद्ध और प्रगतिशील था। वे कांकेर रियासत के कानूनी सलाहकार थे। माता देवमती सती साध्वी और स्नेह की प्रतिमूर्ति थी। कांकेर के राजा पंडित जयलाल तिवारी के कार्यों से प्रसन्न होकर उन्हें 18 गांव की मालगृजारी दिये थे। उनके तीन पुश्तैनी गांव चमसुर, घोंट और चचोद राजिम के निकट स्थित हैं।

पंडित सुन्दरलाल शर्मा की शिक्षा दीक्षा गांव के ही स्कूल में ही हुई। मिडिल स्कूल तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वे घर में ही उच्च शिक्षा ग्रहण किये। उन्होंने अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, मराठी, बंगला, उड़िया और संस्कृत भाषा का गहन अध्ययन किया। उनके घर लोकमान्य तिलक द्वारा संपादित '' मराठा केसरी '' पत्रिका आती थी। वे उनका नियमित पठन करते थे। 18 वर्ष की आयु में वे काव्य लेखन में परांगत हो गये। सन् 1898 में उनकी कविताएँ ''रसिक मित्र'' में प्रकाशित होने लगी थी। महानदी का पवित्र वातावरण उनके व्यक्तित्व में निखार ले आया। एक जगह वे लिखते हैं :-''राजिम में कहीं संगीत, कहीं सितार वादन होते ही रहता है...शंभू साव की साधु भक्ति, पंडित मुरलीप्रसाद की विद्वतापूर्ण वेदान्त प्रवचन, कामताभगत की निश्छल भरी भक्ति बड़ी प्रेरणास्प्रद होती थी..।'' इस प्रकार किशोरवय और भूषण कवि पंडित विश्वनाथ दुबे का साथ उन्हें काव्य में उन्हें प्रवीण बना दिया। यहां दुबे जी ने एक कवि समाज की स्थापना की थी जिनके संस्थापक महामंत्री और सक्रिय सदस्य पंडित सुन्दरलाल शर्मा थे। यही संस्था आगे चलकर जन जागरण करके बहुत लोकप्रिय हुआ।

पंडित जी ने साहित्य की सभी विधाओं में लेखन किया है। फलस्वरूप उनके खंडकाव्य, उपन्यास, नाटक आदि की रचना हुई। उनकी कृतियों में छत्तीसगढ़ी दानलीला, राजिम प्रेमपियुष, काव्यामृवाषिणी, करूणा पचीसी, एडवर्ड राज्याभिषेक, विक्टोरिया वियोग (सभी काव्य), कंस वध (खंडकाव्य), सीता परिणय, पार्वती परिणय, प्रहलाद चरित्र, ध्रुव आख्यान, विक्रम शशिकला (सभी नाटक), श्रीकृष्ण जन्म आख्यान, सच्चा सरदार (उपन्यास), श्रीराजिमस्त्रोत्रम महात्म्य, स्फुट पद्य संग्रह, स्वीकृति भजन संग्रह, रघुराज भजन संग्रह, प्रलाप पदावली, ब्राह्यण गीतावली और छत्तीसगढ़ी रामायण (अप्रकाशित) आदि प्रमुख है।

श्री सुन्दरलाल शर्मा छत्तीसगढ़ी काव्य के प्रवर्तक थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ी काव्य में रचना करके ग्रामीण बोली की भाषा के रूप में प्रचलित किया। घमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल ने छत्तीसगढ़ी व्याकरण लिखकर इसे पुष्ट किया। पंडित जी की छत्तीसगढ़ी दानलीला बहुत चर्चित हुई। रायबहादुर हीरालाल लिखते हैं :-''जौने हर बनाईस हे, तौने हर नाम कमाईस हे।'' माधवराव सप्रे उसकी प्रशंसा करते हुए लिखते हैं :-''मुझे विश्वास है कि भगवान श्रीकृष्ण की लीला के द्वारा मेरे छत्तीसगढ़िया भाईयों का कुछ सुधार होगा ? मेरी आशा और भी दृढ़ हो जाती है जब मैं देखता हूं कि छत्तीसगढ़िया भाईयों में आपकी इस पुस्तक का कैसा लोकोत्तर आदर है..।'' श्री भुवनलाल मिश्र ने तो पंडित सुन्दरलाल शर्मा को ''छत्तीसगढ़ी भाषा का जयदेव'' निरूपित किया है। छत्तीसगढ़ी दानलीला में छत्तीसगढ़ के जन जीवन की झांकी देखने को मिलती है :-

कोनो है झालर धरे, कोनो है घड़ियाल।

उत्ताधुर्रा ठोंकैं, रन झांझर के चाल॥

पहिरे पटुका ला हैं कोनो। कोनो जांघिया चोलना दोनो॥

कोनो नौगोटा झमकाये। पूछेली ला है ओरमाये॥

कोनो टूरा पहिरे साजू। सुन्दर आईबंद है बाजू॥

जतर खतर फुंदना ओरमाये। लकठा लकठा म लटकाये॥

ठांव ठांव म गूंथै कौड़ी। धरे हाथ म ठेंगा लौड़ी॥

पीछू मा खुमरी ला बांधे। पर देखाय ढाल अस खांदे॥

ओढ़े कमरा पंडरा करिहा। झारा टूरा एक जवहरिया॥

हो हो करके छेक लेइन तब। ग्वालिन संख डराइ गइन सब॥

हत्तुम्हार जौहर हो जातिस। देवी दाई तुम्हला खातिस॥

ठौका चमके हम सब्बो झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन॥

झझकत देखिन सबो सखा झन। डेरूवा दइन हवै भड़ुवा मन॥

चिटिक डेरावौ झन भौजी मन। कोनो चोर पेंडरा नोहन॥

हरि के साझ जगात मड़ावौ। सिट सिट कर घर तनी जावौ॥

शर्मा जी ने ''दुलरवा'' नामक एक छत्तीसगढ़ी पत्रिका का संपादन किया था। उनकी ''छत्तीसगढ़ी रामायण'' अप्रकाशित रही। उनके साहित्यिक मित्रों में पं. माखनलाल चतुर्वेदी, जगन्नाथ प्रसाद भानु, माधवराव सप्रे, लक्ष्मीधर बाजपेयी, नवनीत पत्रिका के संपादक ग. न. गद्रे स्वामी, सत्यदेव परिब्राधक आदि प्रमुख थे। उनके नाटक राजिम के अलावा छत्तीसगढ़ के अनेक स्थानों में मंचित किये गये थे। सन् 1911 और 1916 के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में वे सम्मिलित हुए। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार के साथ साथ चित्रकार, मूर्तिकार और रंगमंच के कलाकार थे।

उनके जीवन का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आजादी के महासमर में सक्रिय भागीदारी थी। श्री भुवनलाल मिश्र ने इसका अच्छा चित्रण अपने लेख में किया है-''कौन जानता था, कौन सोच सकता था कि छत्तीसगढ़ी दानलीला का रसिक और सुकुमार कवि हृदय में क्रांति की चिंगारी भी सुलग रही थी। कौन सोच सकता था कि ''विक्टोरिया वियोग'' का कवि उसके उत्तराधिकारियों के खिलाफ दिल में बगावत की आग समेटकर बैठा हुआ है। जब छत्तीसगढ़ का सम्पन्न वर्ग अंग्रेजी हुकूमत की वंदना करने में लीन था, जब देशी रियासतें अंग्रेजी हुकुमत की कृपाकांक्षी थी, जब आम आदमी अंग्रेजों के खिलाफ बात करने का साहस नहीं कर पाता था तब पंडित सुंदरलाल शर्मा ने पूरे छत्तीसगढ़ का दौरा करके जन जीवन में राजनीतिक चेतना जागृत की और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आजादी का शंखनाद किया..।''

सन् 1905 में जब बंग भंग के कारण देश व्यापी आंदोलन हुआ तब पंडित जी राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा की। उन्होंने छत्तीसगढ़ में जनसभाओं और भाषणों के द्वारा राजनीतिक जागरण किया। वे कांग्रेस के सूरत, कलकत्ता, बम्बई, जयपुर और काकीनाड़ा अधिवेशन में भाग लिये थे। इस महासमर में उनके प्रारंभिक सहयोगियों में श्री नारायणराव मेघावाले, श्री नत्थूलाल जगताप, श्री भवानीप्रसाद मिश्र, माधवराव सप्रे, श्री अब्दुल रऊफ, श्री हामिद अली, श्री वामनराव लाखे, यति यतनलाल जी, श्री खूबचंद बघेल, श्री अंजोरदास, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव जैसे कर्मठ लोगों का साथ मिला। उन्होंने सन् 1906 में ''सन्मित्र मंडल'' की स्थापना की थी। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के प्रचार में सक्रिय भूमिका अदा की और जगह जगह स्वदेशी वस्तुओं की दुकानें खोलीं। उन्होंने यहां अनेक सत्याग्रह किये और जेल यात्रा के दौरान अनेक यातनाएं झेली। उनके सत्याग्रहों में कंडेल सत्याग्रह अंग्रेजों की नींद हराम कर दी थी। यह सत्याग्रह पूरे देश में असहयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि बनी। इस बीच वे महात्मा गांधी को छत्तीसगढ़ आमंत्रित किये थे। उन्होंने यहां की आमसभा में उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की और हरिजनोध्दार के लिए उन्हें अपना ''गुरू'' स्वीकार किया था।

पंडित जी वास्तव में बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे छत्तीसगढ़ के एक सच्चे सपूत थे। समाज सुधार, स्वतंत्रता संग्राम और साहित्य के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने सन् 1935 में अपने सहयोगियों के प्रयास से धमतरी में एक ''अनाथालय'' और रायपुर में ''सतनामी आश्रम'' की स्थापना की थी। राजिम में वे ''बह्यचर्य आश्रम'' पहले ही स्थापित कर चुके थे। ऐसे युगदृष्टा ने अपने अंतिम क्षणों में राजिम में महानदी के पावन तट पर एक पर्ण कुटीर में निवास करते हुए 28 दिसंबर सन् 1940 को स्वर्गारोहण किया और समूचे छत्तीसगढ़ वासियों को विलखता छोड़ गये। डॉ. खूबचंद बघेल अपने एक लेख में लिखा है-''छत्तीसगढ़ के तीन लाल-घासी, सुंदर और प्यारेलाल'' वे तीनों को सत्यं, शिवं और सुन्दरं की प्रतिमूर्ति मानते थे। ऐसे युगदृष्टा के स्वर्गारोहण से सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ को अपूरणीय क्षति हुई जिसकी भरपायी संभव नहीं है। उन्हें हमारी विनम्र श्रध्दांजलि अर्पित है।

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रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,

चांपा-495671 (छ.ग.)

प्रतिभाशाली मुकुट काव्य के मुकुट मनोहर

MukutDhar Pandey (WinCE)

- प्रो. अश्विनी केशरवानी

ashwini kesharwani 2 (WinCE) महानदी के तट पर रायगढ़-सारंगढ़ मार्ग के चंद्रपुर से 7 कि.मी. की दूरी पर बालपुर ग्राम स्थित है। यह ग्राम पूर्व चंद्रपुर जमींदारी के अंतर्गत पंडित शालिगराम, पंडित चिंतामणि और पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय की मालगुजारी में खूब पनपा। पांडेय कुल का घर महानदी के तट पर धार्मिक और साहित्यिक ग्रंथों से युक्त था। यहां का एक मात्र निजी पाठशाला पांडेय कुल की देन थी। इस पाठशाला में पांडेय कुल के बच्चों के अतिरिक्त साहित्यकार पंडित अनंतराम पांडेय ने भी शिक्षा ग्रहण की। धार्मिक ग्रंथों के पठन पाठन और महानदी के प्रकृतिजन्य तट पर इनके साहित्यिक मन को केवल जगाया ही नहीं बल्कि साहित्याकाश की ऊँचाईयों तक पहुंचाया...और आठ भाइयों और चार बहनों का भरापूरा परिवार साहित्य को समर्पित हो गया। पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद, पंडित लोचनप्रसाद, बंशीधर, मुरलीधर और मुकुटधर सभी उच्च कोटि के साहित्यकार हुए। साहित्य की सभी विधाओं में इन्होंने रचना की। पंडित लोचनप्रसाद जहां इतिहास, पुरातत्व और साहित्य के ज्ञाता थे वहां पंडित मुकुटधर जी पांडेय साहित्य जगत के मुकुट थे। छायावाद के वे प्रवर्तक माने गये हैं। वे छत्तीसगढ़ के ऐसे एक मात्र साहित्यकार हैं जिन्हें भारत सरकार द्वारा ''पद्मश्री'' अलंकरण प्रदान किया गया है। वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ प्रांत के गौरव हैं। धीरे धीरे पांडेय कुल का घर महानदी में समाता गया और उनका परिवार रायगढ़ में बसता गया। इस प्रकार रायगढ़ नगर साहित्य कुल से जगमगाने लगा।

सन् 1982 में जब मेरी नियुक्ति रायगढ़ के किरोड़ीमल शासकीय कला और विज्ञान महाविद्यालय में हुई थी तब रायगढ़ जाने की इच्छा नहीं हुई थी। लेकिन ''नौकरी करनी है तो कहीं भी जाना है'' की उक्ति को चरितार्थ करते हुए मैंने रायगढ़ ज्वाइन कर लिया। कुछ दिन तो भागमभाग में गुजर गये। जब मन स्थिर हुआ और सपरिवार रायगढ़ में रहने लगा तब मेरा साहित्यिक मन जागृत हुआ। दैनिक समाचार पत्रों में मेरी रचनाएं नियमित रूप से छपने लगी। नये नये विषयों पर लिखने की मेरी लालसा ने मुझे रायगढ़ की साहित्यिक और संगीत परंपरा की पृष्ठभूमि को जानने समझने के लिए प्रेरित किया। यहां के राजा चक्रधरसिंह संगीत और साहित्य को समर्पित थे। उनके दरबार में साहित्यिक पुरूषों का आगमन होते रहता था। पंडित अनंतराम पांडेय और पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय उनके दरबार के जगमगाते नक्षत्र थे। डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र जैसे साहित्यकार उनके दीवान और पंडित मुकुटधर पांडेय जैसे साहित्यकार दंडाधिकारी थे। ऐसे साहित्यिक पृष्ठभूमि में मेरी लेखनी फली फूली। हमारे स्टॉफ के प्रो. अम्बिका वर्मा, डॉ. जी. सी. अग्रवाल, डॉ. बिहारी लाल साहू, प्रो. मेदिनीप्रसाद नायक, कु. शिखा नंदे, प्रो. दिनेशकुमार पांडेय से मेरा न केवल सामान्य परिचय हुआ बल्कि मैं उनके स्नेह का भागीदार बना। प्रो. दिनेशकुमार पांडेय साहित्यिक पितृ पुरुष पं. मुकुटधर पांडेय के चिरंजीव हैं। उन्होंने मुझे हमेशा प्रोत्साहित किया....और मेरी लेखनी सतत् चलने लगी।

मेरे लिए एक सुखद संयोग बना और एक दिन मुझे श्रद्धेय मुकुटधर जी के चरण वंदन करने का सौभाग्य मिला। मेरे मन में इस साहित्यिक पितृ पुरूष से इस तरह से कभी भेंट होगी, इसकी मैंने कल्पना नहीं की थी। उन्हें जानकर आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई कि मैं शिवरीनारायण का रहने वाला हूं। थोड़े समय के लिए वे कहीं खो गये। फिर कहने लगे-'शिवरीनारायण तो एक साहित्यिक तीर्थ है, मैं वहां की भूमि को सादर प्रणाम करता हूं जहां पंडित मालिकराम भोगहा और पंडित शुकलाल पांडेय जैसे प्रभृति साहित्यिक पुरूषों ने जन्म लिया और जो ठाकुर जगमोहनसिंह, पंडित हीराराम त्रिपाठी, नरसिंहदास वैष्णव और बटुकसिंह चौहान जैसे साहित्यिक महापुरूषों की कार्य स्थली है। मेरे पुज्याग्रज पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद और पंडित लोचनप्रसाद नाव से अक्सर शिवरीनारायण जाया करते थे। उस समय भारतेन्दु हरिश्चंद्र के सहपाठी ठाकुर जगमोहनसिंह वहां के तहसीलदार थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सुषमा से प्रेरित होकर अनेक ग्रंथों की रचना ही नहीं की बल्कि यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर लेखन की नई दिशा प्रदान की। उन्होंने काशी के ''भारतेन्दु मंडल'' की तर्ज पर शिवरीनारायण में ''जगमोहन मंडल'' बनाया था। उस काल के साहित्यकारों में पंडित अनंतराम पांडेय, पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय, वेदनाथ शर्मा, पं. हीराराम त्रिपाठी, पं. मालिकराम भोगहा, बटुकसिंह चौहान, आदि प्रमुख थे। मेरे अग्रज पंडित लोचनप्रसाद भी शिवरीनारायण जाने लगे थे और उन्होंने मालिकराम भोगहा जी की अलंकारिक शैली को अपनाया भी था। मैं भी उनके साथ शिवरीनारानायण गया तो भगवान जगन्नाथ के नारायणी रूप का दर्शन कर कृतार्थ हो गया। वहां के साहित्यिक परिवेश ने मुझे भी प्रेरित किया..।'

बालपुर और शिवरीनारायण सहोदर की भांति महानदी के तट पर साहित्यिक तीर्थ कहलाने का गौरव हासिल किया है। यह जानकर मुझे अत्यंत प्रसन्नता हुई। शिवरीनारायण की पवित्र भूमि में जन्म लेकर मेरा जीवन कृतार्थ हो गया। महानदी का संस्कार मुझे भी मिला। जब मैं लेखन की ओर उद्यत हुआ तब मुझे महानदी का कलकल निनाद प्रफुल्लित कर देता था। महानदी का सुन्दर वर्णन पांडेय जी के शब्दों में :-

कितना सुंदर और मनोहर, महानदी यह तेरा रूप।

कल कलमय निर्मल जलधारा, लहरों की है छटा अनूप॥

इसके बाद श्रध्देय पांडेय जी से मैं जितने बार भी मिला, मेरा मन उनके प्रति श्रध्दा से भर उठा। उन्होंने भी मुझे बड़ी आत्मीयता से सामीप्य प्रदान किया। संभव है मुझमें उन्हें शिवरीनारयण के साहित्यिक पुरूषों की झलक दिखाई दी हो ? रायगढ़ में ऐसे कई अवसर आये जब मुझे उनका स्नेह भरा सान्निध्य मिला। 01 और 02 मार्च 1986 को पंडित मुकुटधर जी पांडेय के सम्मान में रायगढ़ में गुरु घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर द्वारा छायावाद पुनर्मूल्यांकन गोष्ठी में डॉ. विनयमोहन शर्मा, डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन, श्री शरदचंद्र बेहार आदि अन्यान्य साहित्यकारों का मुझे सान्निध्य लाभ मिला। इस अवसर पर विश्वविद्यालय द्वारा श्रद्धेय पांडेय जी को डी.लिट् की मानद उपाधि प्रदान किया गया। यह मेरे लिए एक प्रकार से साहित्यिक उत्सव था।

पांडेय जी के सुपुत्र प्रो. दिनेशप्रसाद पांडेय के परिवार का मैं एक सदस्य हो गया। उनके घर अनेक लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यकारों के पत्र पं. मुकुटधर पांडेय के नाम देखने को मिला जिसमें साहित्य के अनेक बिंदुओं पर चर्चा की गई थी। डॉ. बल्देवसाव, डॉ. बिहारीलाल, ठाकुर जीवनसिंह, प्रो. जी.सी. अग्रवाल आदि के पास श्रध्देय पांडेय जी की रचनाओं को पढ़ने का सुअवसर मिला। पांडेय जी की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह ''विश्वबोध'' और ''छायावाद एवं श्रेष्ठ निबंध'' का संपादन डॉ. बल्देव साव ने किया है और श्री शारदा साहित्य सदन रायगढ़ ने इसे प्रकाशित किया है। इसी प्रकार उनकी कालिदास कृत मेघदूत का छत्तीसगढ़ी अनुवाद छत्तीसगढ़ लेखक संघ रायगढ़ द्वारा प्रकाशित की गई है। पांडेय जी की ''छायावाद एवं अन्य निबंध'' शीर्षक से म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन भोपाल द्वारा श्री सतीश चतुर्वेदी के संपादन में प्रकाशित कर स्तुत्य कार्य किया है। इसी कड़ी में गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर द्वारा श्रद्धेय पांडेय जी के जन्म शताब्दी वर्ष 1995 के अवसर पर प्रभृति साहित्यकारों की रचनाओं का संग्रह प्रकाशित कर एक अच्छी परम्परा की शुरूवात की है।

मुझे हाई स्कूल में मधुसंचय में पं. मुकुटधर पांडेय जी की कविता ''विश्वबोध'' पढ़ने को मिली थी। इस कविता में ईश्वर का दर्शन और शास्त्रों के अध्ययन का बहुत अच्छा चित्रण मिलता है :-

खोज में हुआ वृथा हैरान।

यहां भी था तू हे भगवान॥

गीता ने गुरू ज्ञान बखाना।

वेद पुराण जनम भर छाना॥

दर्शन पढ़े, हुआ दीवाना।

मिटा न पर अज्ञान ॥

जोगी बन सिर जटा बढ़ाया।

द्वार द्वार जा अलख जगाया॥

जंगल में बहु काल बिताया।

हुआ न तो भी ज्ञान ॥

ईश्वर को कहां नहीं ढूंढ़ा, मिला तो वे कृषकों और श्रमिकों के श्रम में, दीन दुखियों के श्रम में, परोपकारियों के सात्विक जीवन में और सच्चे हृदय की आराधना में..। कवि की एक बानगी पेश है :-

दीन-हीन के अश्रु नीर में।

पतितो की परिताप पीर में॥

संध्या की चंचल समीर में।

करता था तू गान॥

सरल स्वभाव कृषक के हल में।

पतिव्रता रमणी के बल में॥

श्रम सीकर से सिंचित धन में।

विषय मुक्त हरिजन के मन में॥

कवि के सत्य पवित्र वचन में।

तेरा मिला प्रणाम ॥

ईश्वर दर्शन पाकर कवि का मन प्रफुल्लित हो उठता है। तब उनके मुख से अनायास निकल पड़ता है:-

देखा मैंने यही मुक्ति थी।

यही भोग था, यही भुक्ति थी॥

घर में ही सब योग युक्ति थी।

घर ही था निर्वाण ॥

शिवरीनारायण की पावन धरा पर जन्म लेकर मेरा जीवन धन्य हो गया। मेरा यह भी सौभाग्य है कि मैं स्व. गोविंदसाव जैसे साहित्यकार का छोटा पौध हूं। महानदी का स्नेह संस्कार, महेश्वर महादेव की कुलछाया और भगवान नारायण की प्रेरणा से ही मेरी लेखनी आज तक प्रवाहित है। मुझे ठाकुर जगमोहनसिंह, पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी और पं. शुकलाल पांडेय का साहित्य अगर पढ़ने को नहीं मिला होता तो शायद मैं लेखन की ओर प्रवृत्त नहीं हो पाता। मित्र श्री वीरेन्द्र तिवारी का मैं अत्यंत आभारी हूं जिनके सहयोग से मैं उनके सत्साहित्य को पढ़ने का सौभाग्य पा सका। पंडित शुकलाल पांडेय ने ''छत्तीसगढ़ गौरव'' में मेरे पितृ पुरूष गोविंदसाव का उल्लेख किया है :-

नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।

बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन ।

हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति भोरा रघुवर।

विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद ब्रज गिरधर।

विश्वनाथ, बिसाहू, उमर, नृप लक्ष्मण छत्तीस कोट छवि।

हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि॥

इसी प्रकार उन्होंने पंडित मुकुटधर पांडेय जी के बारे में भी छत्तीसगढ़ गौरव में उल्लेख किया है -

जगन्नाथ है भानु चंद्र बल्देव यशोधर।

प्रतिभाशाली मुकुट काव्य के मुकुट मनोहर।

पदुमलाल स्वर्गीय सुधा सुरसरी प्रवाहक।

परमकृति शिवदास आशुकवि बुध उर शासक।

ज्वालाप्रसाद सत्काव्यमणी तम मोचन लोचन सुघर।

श्री सुन्दरलाल महाकृति कविता कान्ता वर॥

आज जब मैं पंडित मुकुटधर जी पांडेय के बारे में लिखने बैठा हूं तो अनेक विचार-संस्मरण मेरे मन मस्तिष्क में उभर रहे हैं।...फिर वह दिन भी आया जब जीवन के शाश्वत सत्य के सामने सबको हार माननी पड़ती है। 06 नवंबर 1989 को प्रात: 6.20 बजे 95 वर्ष की आयु में उन्होंने महाप्रयाण किया। यह मानते हुये भी कि जीवन नश्वर है, मन अतीव वेदना से भर उठा। विगत अनेक वर्षों से रूग्णता और वृद्धावस्था ने उनकी अविराम लेखनी को यद्यपि विराम दे दिया था। फिर भी उनकी सकाय उपस्थिति से साहित्य जगत अपनी सार्थकता देखता था। एक काया के नहीं रहने से कोई फर्क नहीं पड़ता, परन्तु साहित्य मनीषी पंडित मुकुटधर पांडेय किसी भी मायने में एक सामान्य व्यक्ति नहीं थे। पुराना दरख्त किसी को कुछ नहीं देता परन्तु उनकी उपस्थिति मात्र का एहसास मन को सांत्वना का बोध अवश्य करा देता है। साहित्य जगत में श्रद्धेय पांडेय जी की मौजूदगी प्रेरणा का अलख जगाने जैसी नि:शब्द सेवा का विधान किया था। कोई भी यहां अमरत्व का वरदान लेकर नहीं आया है लेकिन केवल देह त्याग ही अमरत्व का अवसान नहीं होता। श्रद्धेय पांडेय जी के महाप्रयाण के संदर्भ में तो बिल्कुल नहीं होता। शोकातुर करती है तो यह बात कि हिन्दी काव्य में इस मायने में समस्त भारतीय भाषाओं के काव्य में छायावाद की ओजस्वी धारा को सर्जक जनक के नाते पांडेय जी के चिर मौन होने के साथ ही हमारे बीच से छायावाद का अंतिम प्रकाश सदैव के लिए बुझ गया। उन्हीं के शब्दों में :-

जीवन की संध्या में अब तो है केवल इतना मन काम

अपनी ममतामयी गोद में, दे मुझको अंतिम विश्राम

चित्रोत्पले बता तू मुझको वह दिन सचमुच कितना दूर

प्राण प्रतीक्षारत् लूटेंगे, मृत्यु पर्व को सुख भरपूर।

मैं सोचने लगा -

जिसे हो गया आत्म तत्व का ज्ञान

जीवन मरण उसे है एक समान।

पांडेय जी ने तो एक एक को जीया है, भोगा है। देखिये उनकी कुछ मुक्तक :-

जीवन के पल पल का रखे ख्याल,

कोई पल कर सकता हमें निहाल।

चलने वाली सांसें है अनमोल,

काश समझ सकते हम इनके बोल।

माना नश्वर है सारा संसार,

पर अविनश्वर का ही यह विस्तार।

इसी प्रकार उनसे पूर्व छायावाद की अप्रतिम कवयित्री महादेवी वर्मा हमसे छिन जाने वाली इस कड़ी की अंतिम से पहले की कड़ी थी। पहले होने का गौरव तो केवल पांडेय जी का ही था। लेकिन वही अंतिम कड़ी होंगे किसने सोचा और जाना था ? निश्चय ही पांडेय जी ने भी कभी इसकी कल्पना तक नहीं की होगी। छत्तीसगढ़ की माटी से उन्हें अगाध प्रेम था। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य नदी-पहाड़, पशु-पक्षी सबसे लगाव था। देखिये छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी महानदी की एक बानगी :-

कितना सुंदर और मनोहर महानदी यह तेरा रूप

कलकल मय निर्मल जलधारा, लहरों की है छटा अनूप

तुझे देखकर शैशव की है स्मृतियां उर में उठती जाग

लेता है कैशोर काल का, अंगड़ाई अल्हड़ अनुराग

सिकता मय आंचल में तेरे बाल सखाओं सहित समोद

मुक्तहास परिहास युक्त कलक्रीडा कौतुक विविध विनोद।

इसीलिए अपना ऋण उन्होंने काव्य साधना की दिव्य विधा का संस्थापक बनकर उतारा था। इस धरती ने उन्हें जो कुछ भी दिया उसे उन्होंने साहित्य जगत को लौटाया है। प्रणय की यही संवेदना उनकी कविता का सम्पुट वरदान बनी थी, जिसने भी उसे पढ़ा-सुना उसने दिल से सराहा और स्वीकार किया।

''कविर्मनीषी परिभू: स्वयंभू:'' कवि का स्थान बहुत ऊँचा है, ऐसा स्वीकारने वाले इस साहित्य वाचस्पति का कहना है-'' कविता तो हृदय का सहज उद्गार है। वाद तो बदलते रहते हैं पर कविता में एक हृदयवाद होता है जो कभी नहीं बदलता।'' मानव मन में जो भावानुभूति होती है, वही सार्वजनीन है, सर्वकालिक है। ऐसे मानने वाले इस साहित्यानुरागी का जन्म नवगठित जांजगीर-चांपा जिले के अंतिम छोर चंद्रपुर से मात्र 07 कि.मी. दूर बालपुर में 30 सितंबर 1895 ईसवीं को पंडित चिंतामणी पांडेय के आठवें पुत्र के रूप में हुआ। अन्य भाईयों में क्रमश: पुरूषोत्तम प्रसाद, पद्मलोेचन, चंद्रशेखर, लोचनप्रसाद, विद्याधर, वंशीधर, मुरलीधर और मुकुटधर तथा बहनों में चंदनकुमारी, यज्ञकुमारी, सूर्यकुमारी और आनंद कुमारी थी। सुसंस्कृत, धार्मिक और परम्परावादी घर में वे सबसे छोटे थे। अत: माता-पिता के अलावा सभी भाई-बहनों का स्नेहानुराग उन्हें स्वाभाविक रूप से मिला। पिता चिंतामणी और पितामह सालिगराम पांडेय जहां साहित्यिक अभिरूचि वाले थे वहीं माता देवहुति देवी धर्म और ममता की प्रतिमूर्ति थी। धार्मिक अनुष्ठान उनके जीवन का एक अंग था। अपने अग्रजों के स्नेह सानिघ्य में 12 वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने लिखना शुरू किया। तब कौन जानता था कि यही मुकुट छायावाद का ताज बनेगा...?

पांडेय जी की पहनी कविता ''प्रार्थना पंचक'' 14 वर्ष की आयु में स्वदेश बांधव नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। फिर ढेर सारी कविताओं का सृजन हुआ। यहीं से उनकी काव्य यात्रा निर्बाध गति से चलने लगी और उनकी कविताएं हितकारणी, इंदु, स्वदेश बांधव, आर्य महिला, विशाल भारत और सरस्वती जैसे श्रेष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित हुई। सन् 1909 से 1915 तक की उनकी कविताएं ''मुरली-मुकुटधर पांडेय'' के नाम से प्रकाशित होती थी। उनकी पहली कविता संग्रह ''पूजाफूल'' सन् 1916 में इटावा के ब्रह्यप्रेस से प्रकाशित हुई। तत्कालीन साहित्य मनीषियों-आचार्य महाबीर प्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, हजारी प्रसाद द्विवेदी और माखनलाल चतुर्वेदी की प्रशंसा से उन्हें संबल मिला और उनकी काव्यधारा बहने लगी। इसी वर्ष पांडेय जी प्रयाग विश्वविद्यालय की प्रवेशिका में उत्तीर्ण होकर इलाहाबाद चले गये। कवि का किशोर मन बाल्यकाल के छूट जाने से अधीर हो उठता है :-

बाल्यकाल तू मुझसे ऐसी आज विदा क्यों लेता है,

मेरे इस सुखमय जीवन को दुखमय से भर देता है।

तीन माह के अल्प प्रवास के बाद पांडेय जी अस्वस्थ होकर बालपुर लौट आते हैं और यहीं स्वाध्याय से अंग्रेजी, बंगला और उड़िया भाषा पढ़ना और लिखना सीखा। गांव में रहकर उन्होंने सादगी भरा जीवन अपनाया

छोड़ जन संकुल नगर निवास किया क्यों विजन ग्राम गेह,

नहीं प्रसादों की कुछ चाह, कुटीरों से क्यों इतना नेह।

उनकी कविताओं में प्रकृति प्रेम सहज रूप में दर्शनीय है। ''किंशुक कुसुम'' में प्रकृति से उनके अंतरंग लगाव की पद्यबद्दता ने कविता में एक अनोखे भावलोक की सर्जना की है। किंशुक कुसुम से उनकी बातचीत ने प्रकृति का जैसे मानवीकरण ही कर दिया। पांडेय जी महानदी से सीधे बात करते लगते हैं :-

शीतल स्वच्छ नीर ले सुंदर बता कहां से आती है,

इस जल में महानदी तू कहां घूमने जाती है।

''कुररी के प्रति'' में एक विदेशी पक्षी से अपनत्व भाव जगाने उनसे वार्तालाप करने लगते हैं। देखिये उनकी एक कविता :-

अंतरिक्ष में करता है तू क्यों अनवरत विलाप

ऐसी दारूण व्यथा तुझे क्या है किसका परिताप

शून्य गगन में कौन सुनेगा तेरा विपुल विलाप

बता तुझे कौन सी व्यथा तुझे है, है किसका परिताप।

सामाजिक मूल्यों के उत्थान पतन को भी उन्होंने निकट से देखा और जाना है। ग्रामीण जीवन की झांकी उनकी कविताओं में दृष्टव्य है। उनके मुक्तकों में दार्शनिकता का बोध होता है। त्योहारों को सामान्य लोगों के बीच आकर्षक बनाने का भी उन्होंने प्रयास किया है :-

कपट द्वेष का घट फोड़ेंगे, होली के संग आज

बड़े प्रेम से नित्य रहेंगे हिन्द हिन्द समाज

फूट को लूट भगावेंगे, ऐता का सुख पावेंगे..।

इस प्रकार मुकुटधर जी का समूचा लेखन जनभावना और काव्य धारा से जुड़ा है। छायावादी कवि होने के साथ साथ उन्होंने छायावादी काव्यधारा से जुड़कर अपनी लेखनी में नयापन लाने की साधना जारी रखी और सतत् लेखन के लिए संकल्पित रहे। यही कारण है कि मृत्युपर्यन्त वे चुके नहीं। उन्होंने सात दशक से भी अधिक समय तक मां सरस्वती की साधना की है। इस अंतराल में पांडेय जी ने जीवन की गति को काफी नजदीक से देखा और भोगा है। उनकी रचनाओं में पूजाफूल (1916), शैलबाला (1916), लच्छमा (अनुदित उपन्यास, 1917), परिश्रम (निबंध, 1917), हृदयदान (1918), मामा (1918), छायावाद और अन्य निबंध (1983), स्मृतिपुंज (1983), विश्वबोध (1984), छायावाद और श्रेष्ठ निबंध (1984), मेघदूत (छत्तीसगढ़ी अनुवाद, 1984) आदि प्रमुख है।

अनेक दृष्टांत हैं जो मुकुटधर जी को बेहतर साहित्यकार और कवि के साथ साथ मनुष्य के रूप में स्थापित करते हैं। उनका समग्र जीवन उपलब्धियों की बहुमूल्य धरोहर है जिससे नवागंतुक पीढ़ी नवोन्मेष प्राप्त करती रही है। उनकी प्रदीर्घ साधना ने उन्हें ''पद्म श्री'' से ''भवभूति अलंकरण'' तक अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया है। सन् 1956-57 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा ''साहित्य वाचस्पति'' से विभूषित किया गया। सन् 1974 में पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर और सन् 1987 में गुरू घासीदास विश्वविद्यालय बिलासपुर द्वारा डी. लिट् की मानद उपाधि प्रदान किया गया है। 26 जनवरी सन् 1976 को भारत सरकार द्वारा ''पद्म श्री'' का अलंकरण प्रदान किया गया। सन् 1986 में मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा ''भवभूति अलंकरण'' प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त अंचल के अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया है। वास्तव में ये पुरस्कार और सम्मान उनके साहित्य के प्रति अवदान को है, छत्तीसगढ़ की माटी को है जिन्होंने हमें मुकुटधर जी जैसे माटी पुत्र को जन्म दिया है। उन्हें हमारा शत् शत् नमन....

काव्य सृजन कर कोई हो कवि मन्य,

जीवन जिसका एक काव्य, वह धन्य।

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प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव डागा कालोनी,

चाम्पा-495671 ( छत्तीसगढ़ )

आलेख

 

स्वागत नववर्ष के स्वर्णिम सूरज...

-भारती परिमल

नवप्रभात के स्वर्णिम सूरज तुम्हारा स्वागत है। साथ ही तुम्हारी रश्मियों से छनकर आते नववर्ष के प्रकाश पुंज का भी हार्दिक... हार्दिक स्वागत है। तुम्हारे और नववर्ष के स्वागत में हम पलक बिछाए हुए हैं। आज स्वागत की इस बेला में हमारे विचारों का उफनता ज्वार तुमसे कुछ कहने को उतावला हो रहा है। आओ घड़ी भर इसके पास आकर इसे ध्यान से सुनो...

नववर्ष के स्वागत में जहाँ चारों ओर हर्शोल्लास है, भड़कीला शोर और गुनगुनाता संगीत है...वहीं किसी कोने में एक अजन्मे मासूम की सिसकारी से लिपटी जिंदगी में मौत की खामोशी भी है। ये खामोशी तुमसे कुछ कहना चाहती है। इस दुनिया में लाखों धड़कनें ऐसी हैं, जिन्हें समय से पहले ही षांत कर दिया गया। माँ की विवषता और परिवार के सदस्यों की निर्दयता के कारण अनेक अजन्मे शिशुओं ने कोख से डस्टबिन तक का सफर तय किया। उनकी मासूम चीखों को सुननेवाला आसपास कोई न था। फूलों की पंखुड़ियों से भी कोमल अंगों पर तेज हथियारों से जोर आजमाइश का तांडव खेला जाता रहा और वे मासूम कुछ भी न कह सके। धारदार और नोकदार अस्त्रों का चक्रव्यूह तोड़ने के लिए अभिमन्यु बनना तो दूर वे तो एक पूर्ण आकार भी न पा सके और मौत के समंदर में फेंक दिए गए। आज उन्हीं मासूमों का आर्त्तनाद तुमसे आनेवाले नववर्ष में ऐसा न हो, इसकी प्रार्थना करता है। भावी माताओं को इतना सक्षम बनने का आशीर्वाद दो कि वे अपनी संतान को इस धरती पर आने का अवसर दे। मासूम की मुस्कान से उनका ऑंचल ही नहीं पूरा वातावरण सुरभित हो उठे, ये आशीर्वाद केवल और केवल तुम ही दे सकते हो।

एक मासूम जब मुस्कराता है, तो वह ईश्वर का सबसे प्यारा वरदान होता है। ईश्वर का यह उपहार हमें इतना प्यारा है कि हमने तो पूरा एक दिन ही इनके नाम कर दिया है। बाल दिवस के रूप में हम बच्चों को और अधिक करीब से जानने का प्रयास करते हैं। किंतु इसी बाल दिवस पर मीडिया के माध्यम से बाल मजदूरों की बढ़ती संख्या का ऑंकड़ा भी हमारे दिमाग में फिट हो जाता है। इन ऑंकड़ों के साथ माथे पर कुछ क्षणों के लिए सलवटें जरूर बनती हैं, पर शाम की धुँधली स्याही में ये फिर घुल जाती हैं। दिनचर्या फिर वैसी की वैसी हो जाती है। जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरी करते इन मासूमों को भी हक है कि वे भी स्कूल जाएँ, पढ़े-लिखें और अपने सपनों को सच करने का प्रयास करें। उनके सपनों में रंग भरने के लिए तुम्हें ही अपने आशीर्वाद की तूलिका उठानी होगी। आज इन्हें इसी की जरूरत है।

किशोरों और युवाओं के काँधे पर टिका ये देश आज मीडिया के जाल में उलझा हुआ है। यही कारण है कि आज युवा-मस्तिष्क सारे संस्कारों और सद्व्यवहार को हाशिए पर ले जाकर दिशाहीन मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। इंटरनेट का उपयोग वह केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिए ही कर रहा है। नतीजा यह कि ज्ञान का अथाह सागर सामने होने के बावजूद इनकी गागर सद्विचारों से खाली है। आज का युवा ध्येय के अभाव में यहाँ-वहाँ भटक रहा है। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में वे सभी कुछ जल्द से जल्द पा लेना चाहते हैं। इसके लिए वे कोई भी शार्टकट अपनाने को तैयार है। भटकते हुए इन युवाओं को नववर्ष में एक नई वैचारिक शक्ति और सद्विचारों का पुंज प्रदान करो।

आज अपनी सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए, समाज में स्टेटस मेन्टेन करने की पुरजोर कोशिश में व्यक्ति अपना सब कुछ दाँव पर लगा देता है। ऑफिस, पार्टी, घर-गृहस्थी, पत्नी-बच्चे इन सभी के लिए थोड़ा-थोड़ा वक्त निकालने के बाद उसके पास स्वयं के लिए ही समय नहीं होता। यह एक भागते-दौड़ते मशीनी मानव की सच्चाई है, किंतु इससे भी बड़ी सच्चाई तो यह है कि उसके पास सभी के लिए समय होने के बाद भी अपने माता-पिता के लिए समय नहीं होता। शहरों में झूलाघर की तरह वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस बात की पुष्टि करती है। आज के समाज का कटु सत्य यह है कि जिन माता-पिता को अपनी पाँच संतानों का लालन-पालन करना भारी नहीं लगा था, आज उन्हीं संतानों को अपने पाँच फ्लेट में उन्हीं माता-पिता को रखना भारी लग रहा है। एक माँ नौ माह तक संतान का भार हँसते हुए अपने कोख में उठा लेती है, किंतु यही बेटा बड़ा होकर माँ-बाप की जिम्मेदारियों को उठा नहीं सकता। उसका 2-4 वर्ष का लाडला तो उससे प्यार की अपेक्षा कर सकता है, किंतु बूढ़े माँ-बाप प्यार की चाहत नहीं रख सकते! समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति होने का दंभ उसे अपने ही माता-पिता से दूर ले जाता है। बचपन में वह माँ का बिस्तर गीला करता था और बड़ा हुआ तो माँ की ऑंखें गीली करने लगा। इस प्रकार उसे तो सदैव माता-पिता को गीलेपन में रखने की आदत हो गई है! ओ... सूरज इस वक्त ऐसे कलुषित विचारों से घिरे हुए मनुष्य को तुम्हारी शुभकामनाओं की विशेष आवश्यकता है। तुम आशीर्वाद दो कि उसके विचारों का यह अन्यायपूर्ण साम्राज्य जल्द से जल्द नश्ट हो जाए और वह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए माता-पिता से भी स्नेहपूर्ण व्यवहार करे।

अपनी संतान से दूर होने का अहसास क्या होता है, ये देखना हो, तो वृद्धाश्रमों की लम्बी सूची हमारे देश के कई शहरों में मिल जाएगी। इसकी ड्योढी पर पाँव रखते ही वहाँ अनुभवों की झुर्रियों से लिपटे लाचारगी भरे चेहरे मिलेंगे। ये चेहरे हमसे कुछ कहना चाहते हैं, पर हमने ही इन्हें घर की चहारदीवारी से दूर कर दिया है। वे हमसे बतियाना चाहते हैं, पर हमने ही उन्हें खामोश रहने के लिए उन्हें वृद्धाश्रमों में भेज दिया है। वे हमें कुछ देना चाहते हैं, उनके अनुभव हमें उपदेश लगते हैं, इसलिए हमने उपदेश के लिए तो महात्माओं की शरण ले ली, पर उनके अनुभव सुनने के लिए हमारे पास समय नहीं है। पेड़ से एक डाल यदि टूट जाती है, तो सूख जाती है, पर ये ऐसी डालें हैं, जो टूटी तो हैं, पर मुरझाई नहीं हैं, हमें इन डालों को अपने ऑंगन में रोपना है, ताकि हमें उनके अनुभव के मीठे फल मिले। लेकिन हम ऐसा कुछ भी नहीं चाहते, पर यह अवश्य चाहते हैं कि हमारी संतान हमारी पूरी देखभाल करे। पर क्या ऐसा संभव हो पाएगा?

सूरज दादा, क्या आप ऐसा होता देखेंगे, नहीं ना तो फिर कुछ ऐसा करो कि सभी की समझ में आ जाए कि नए वर्ष पर हम सब कुछ न कुछ देना सीख जाएँ। फिर वही मुन्ना अपने बूढ़े माता-पिता को अपना संरक्षण देगा, तब उनके झुर्रीदार चेहरे पर जो भाव आएँगे, वह किसी आशीर्वाद से कम नहीं होंगे। युवकों को यह समझा दो कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता, और नन्हे-मुन्नों को क्या समझाएँगे आप, वह तो गीली माटी की तरह हैं, उन्हें जो आकार दोगे, वे वैसा ही बन जाएँगे, इसलिए उन पालकरूपी कुम्हारों के हाथों में वह शक्ति दो कि ये गीली माटी जब भी चाक पर चढ़े, तो ऐसे रूप में सामने आए कि लोग देखते रह जाएँ। बस यही काम कर दो सूरज दादा, हमारी तुमसे यही विनती है कि धरती का एक-एक प्राणी तुम्हारे आशीर्वाद की वर्षा में भीग जाए।

ओ नववर्ष के ओजस्वी सूरज... हम सभी तुम से क्षण-क्षण की सफलता प्राप्ति के लिए सामर्थ्यवान होने का आशीर्वाद मांगते हैं। तुम्हारी स्नेह रश्मियों से भीगकर स्वयं को प्रकाशमय बनाने का प्रयास हम केवल और केवल तुम्हारी षुभवांछनाओं के साथ ही पूर्ण कर सकते हैं। इसलिए नववर्ष के नवक्षण को नवरूप देने के लिए हर घर के ऑंगन पर उतरती तुम्हारी सप्तरंगी किरणों का हार्दिक...हार्दिक स्वागत है।

भारती परिमल

403, भवानी परिसर इंद्रपुरी भोपाल 462022

सफेद पर्दे पर : एक अभिजात्य शून्यता

(डॉ. रमेश चन्द्र शाह के उपन्यास पर केन्द्रित)

- आनंदकृष्ण

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''मैंने एक कमरे के घर में चार सदस्यों के परिवार को पाला पोसा, बच्चों को लिखाया पढाया और आज इसी शहर में मेरे बेटे के चार मकान है जिनमें उसके बूढे बाप के लिए एक कोना भी नसीब नहीं है ।''

फिल्म ''लगे रहो मुन्ना भाई'' में वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर हुए नि:शक्त और बेबस बुजुर्ग का उक्त आशय का कथन समाज के उस विद्रूपित और घृण्य चेहरे का अक्स हमारे सामने रखता है जो विगत वर्षों मे तेजी से घनीभूत होता हुआ मानव के बहिर्मुखी और अंतर्मुखी व्यक्तित्वों में से मूल्यों के तिरोहित होने और उस समग्र प्रदूषण को मानव के डीएनए में शामिल होने तक के खतरे की गंभीरता उकेरता है । यह प्रवृत्ति मानवीय सभ्यता की कृतज्ञता-ज्ञापन की विशेषता को विस्मृत करने का प्रयास है और इसीलिए समाज का एक नया चेहरा, नया रूप और नई अनुभूतियों के साथ सामने आता है जहां वर्जनाएं दम तोड़ती नजर आती है और नित नए प्रतिमान आविर्भूत होते जाते हैं ।

अपनी बुजुर्ग पीढ़ी का सम्मान, उनके दाय को विनम्रता और श्रद्धा के साथ स्वीकार करने व उनके प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन करने की समझ के विकास की अनिवार्यता ने सर्जना के समस्त माध्यमों को अनुप्राणित किया है और इसके लिए रचनाकार गंभीरता से मनन-चिंतन व सृजन में रत है ।

किंतु डॉ रमेशचन्द्र शाह का उपन्यास ''सफेद पर्दे पर'' अपने कथ्य, प्रस्तुति और चिंतन की दृष्टि से भिन्न है ।

''सफेद पर्दे पर'' कुल जमा 118 पृष्ठ का उपन्यास है । इसमें कथानायक मनोविज्ञान के प्राध्यापक पद से सेवा निवृत्त हो चुका है और 65 वर्ष की उम्र में उसे अचानक वानप्रस्थ आश्रम में जाने की बात सूझती है । उसके परिवार में बेटा-बहू व पोता है और एक बेटी है जो विवाहित है । पत्नी का निधन हो चुका है । कथानायक अपने बेटा-बहू और पोते के साथ सुखी और निश्चिंत जीवन यापन कर रहा है, तभी वह वानप्रस्थ में जाने का निर्णय लेता है । उसी शहर में उसका एक और फ्लैट है जिसमें जाकर वह रहने लगता है । उस फ्लैट में सुख सुविधा के सारे साजो सामान मौजूद है । एक रामरती बाई है जो उसके लिए खाना बनाने और फ्लैट की साफ सफाई का काम करती है । एक पारिवारिक मित्र सप्रे साहब हैं जो रिटायर्ड आई.ए.एस हैं । सप्रे साहब अभी अभी ऑस्ट्रेलिया से आए हैं । वहां से वे एक एनजीओ का प्रोजेक्ट लाए हैं, जिसमें वैकल्पिक शिक्षा, जल संग्रह के पारंपरिक तौर तरीक़ों का पुनरुद्धार, जीवनोपयोगी कार्यों के रूप में भारतीय दर्शन, योग, विपश्यना आदि के शिविर लगाने का कार्य किया जाना है । कथानायक इसमें कोई दिलचस्पी नहीं लेता । कथानायक का एक बालसखा है-विनय मोहन; जिसे कथानायक सोसो कहकर पुकारता है । सोसो कथानायक के पास आता है । उसी दौरान सप्रे साहब अपने प्रोजेक्ट के बारे में बताते हैं । सोसो उनके प्रोजेक्ट में सहयोग की स्वीकृति देता है ।

कथानायक के वानप्रस्थ के आश्रम (उसके फ्लैट) के पड़ोसी फ्लैट में प्रोफेसर दत्ता रहते है । प्रोफेसर दत्ता और उनकी पत्नी से कथानायक की दोस्ती हो जाती है । उनके साथ भी कथानायक का वैचारिक आदान-प्रदान व चर्चाएं होती रहती हैं । ये चर्चाएं समकालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक मूल्यों पर बुद्धिजीवियों के चिंतन-मनन को सफलता के साथ उकेरती हैं ।

कथानायक की बेटी अपने पिता को लिखे गए पत्र के साथ उपन्यास में प्रकट होती है । यह पत्र भाषा, प्रवाह, अभिव्यक्ति और समग्रत: शिल्प में बेजोड़ है और लेखक की रचनात्मक सामर्थ्य का जीवंत दस्तावेज है । अपने पत्र में कथानायक की बेटी पिता के वानप्रस्थ के निर्णय की तर्कपूर्ण धज्जियां उड़ाते हुए उन्हें वापस परिवार में आने के लिए लिखती है और उन्हें अपने पास शिमला बुलाती है । कथानायक अपने सलाहकार दत्ता साहब से सलाह लेकर अपनी बेटी के पास जाने का निर्णय लेता है । इस संबंध में सोसो को सूचना देने के लिए कथानायक के द्वारा लिखे गए पत्र के साथ उपन्यास का प्रवाह विराम लेता है ।

इस उपन्यास की पहली विशेषता तो यही है कि यह वृद्धों की सामान्य समस्याओं, उनके सरोकारों और आकांक्षाओं के बारे मे चिन्तन न करते हुए अभिजात्य और उच्च बुद्धिजीवी वर्ग के ऐसे वृद्धों के जीवन की परतें खोलता है जिन्हें पारंपरिक तरीके की पारिवारिक, आर्थिक और यहां तक कि स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का भी सामना नहीं करना पड़ता है । ये वे लोग हैं, जिन्होंने जीवन भर उच्च पद पर रहते हुए जीवन के समस्त सुख-उपभोगों का आनंद लिया, उनके बच्चे भी भली भांति पढ़-लिख कर सुस्थापित हो चुके, उनके पास भरपूर चल-अचल संपत्ति है और शारीरिक व मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ, तृप्त व संतुष्ट रहते हुए वे अपने कर्मक्षेत्र के आभामण्डल को अपने जीवन का अंग बना चुके हैं । कथा नायक मनोविज्ञान का प्राध्यापक रहा था इसलिए उसका मित्र विनय मोहन उसे 'साइको' कह कर पुकारता है और विनय मोहन समाजशास्त्री (सोष्योलॉजिस्ट) है इसलिए उनका मित्रनाम 'सोसो' है । पूरा उपन्यास कथानायक के एकालाप व आत्मालाप के रूप में है जिसमें अन्य पात्रों की उपस्थिति होने पर ही संवाद मिलते है । पूरे उपन्यास में कथानायक का स्वयं से संघर्ष है । कथानायक का चरित्र उसके इसी आत्मालाप में स्पष्ट उभरकर सामने आता है । कथानायक की वैचारिक सामर्थ्य का चित्रण करने में विशेष सावधानी बरती गई है फिर भी पाठक यह देखकर भौंचक्का रह जाता है कि इतना बड़ा मनोविज्ञानी, इतना महान विद्वान भी मूल रूप से एक अत्यंत साधारण व्यक्ति की ही भांति सोचता है । उसके अंतर्मन में भी वैसी ही दुनिया है जैसी एक अत्यंत साधारण व्यक्ति की दुनिया होती है- एक ऐसी दुनिया; जिसमें व्यक्ति अपनी छोटी छोटी चीजों के इधर उधर हो जाने पर झुँझलाता है, अपनी स्वर्गवासी पत्नी के साथ हुए लड़ाई झगड़ों को पूरी भावुकता के साथ याद करता है और बेटे और खास तौर पर बहू के प्रति अपना पारंपरिक असंतोष व्यक्त करता है ।

कथानायक के द्वारा वानप्रस्थ आश्रम में जाने के निर्णय का विरोध भी पारंपरिक तर्को और मान्यताओं के आधार पर किया जाता है जिसमें यह आशंका प्रमुखता से व्यक्त की जाती है कि लोग कहेंगे कि बेटे-बहू ने कुछ गलत व्यवहार किया होगा इसलिए ये नाराज होकर अकेले रहने चले गए । लोगों के सोचने का यह डर बुजुर्गों को अत्यधिक सहनशील बना देता है, और आम पाठक यह सोच कर विस्मित रह जाता है कि निम्न वर्ग के चिंतन की यह प्रवृत्ति अभिजात उच्च-वर्ग में भी होती है ।

अभिजात उच्च-वर्गीय वृद्ध कथानायक अपने रिटायरमेण्ट के बाद अपनी तमाम बौद्धिकता और पैंसठ वर्षीय उम्र के साथ अपने अभिमान की पराजय स्वीकारते हुए तथा अपनी और ध्यान आकृष्ट करने के लिए वानप्रस्थ ग्रहण करता है । उसका वानप्रस्थ भी सोफिस्टिकेटेड और अभिजात्य शैली का फैशन नुमा वानप्रस्थ है । पाठक उपन्यास के लगभग शुरू में ही समझ सकता है कि उपन्यास के अंत में ये महाशय अपना वानप्रस्थ त्यागेंगे ।

उपन्यास में कथानायक का चरित्र स्वयं भी एक साइको-केस के रूप में अध्ययन के योग्य है । कथा नायक में बहुत गहरे कहीं गहन हीन भावना है जिसके कारण वह बहुत जल्दी दूसरों से प्रभावित हो जाता है और प्रभावित भी ऐसा कि अपने आत्मालाप में उसकी स्तुति ही करने लगता है । चाहे वे दत्तात्रेय दंपत्ति हो, चाहे रामरती बाई वह किसी से भी असीमित प्रभावित हो जाता है और उसमें उसे अपने सारे प्रश्न, सरोकार और विश्वास समाहित लगते है । उसकी इसी हीन भावना के कारण ही वह ऐसे कार्य करता है जिससे लोगों का ध्यान उसकी और आकर्षित हो सके ।

यह उपन्यास बुद्धिजीवी वर्ग के उथले और खोखले यथार्थ को स्पष्ट प्रकाशित करता है । लंबे बौद्धिक वाग्वितंडावाद ने कई जगह उपन्यास का प्रवाह अवरूद्ध किया है । कई जगह ऐसा स्पष्ट परिलक्षित होता है कि कथाक्रम का कलेवर बढ़ाने का प्रयास किया गया है । यदि उसमें कसावट का ध्यान रखा जाता तो यह एक शिथिल उपन्यास न होकर एक श्रेष्ठ लंबी कहानी होता । पूरी कृति में सभी पात्र चूंकि उच्च शिक्षित, एकेडेमिक लोग हैं; अत: भाषा के मामले में विशेष सतर्कता बरती गई है ।

लेखक की एक चूक असहनीय है । प्रारंभिक पृष्ठ पर कथानायक के एक सम्माननीय परिचित 'आशीष दा' उसे ''देवेश'' कर कर संबोधित करते है तो पृष्ठ 49 पर बताया गया है कि कथा नायक का नाम ''ध्यानचंद'' है जिस उसका मित्र 'सोसो' बचपन में 'ध्यानू' कह कर पुकारता था । नाम की यह विसंगति खटकती है । इसी तरह पूरे उपन्यास में कथानायक वाचक के रूप में रहता है, किंतु पृष्ठ 100 से 107 तक चैप्टर 17 में उसे अचानक 'कथानायक' व 'चरितनायक' कहते हुए लेखक स्वयं प्रकट हो जाता है । इस परिवर्तन का कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता ।

यह पूरी कृति अपने समेकित रूप में पलायनवादी दृष्टिकोण का विरोध करती है । अपनी रचनात्मक क्षमता और योग्यता के अधिकाधिक प्रयोग करने की वकालत करते हुए लेखक ने कथा नायक और उसके मित्रों के माध्यम से उच्चशिक्षित बुद्धिजीवी वर्ग के अंतर्मन की उस गहराई तक झांकने की सफल कोशिश की है, जिस गहराई को बुद्धिजीवी वर्ग सदैव आवरण डालकर रखता है और जहां प्रवेश की अनुमति किसी को नहीं मिलती । इस बुद्धिजीवी व्यक्तिवाद के अपने विशिष्ट सामाजिक संदर्भ हैं जिनकी विशद व्याख्या समग्र सामाजिक अध्ययन के लिए जरूरी है । यह कृति उन बुद्धिजीवी व्यक्तिवादियों के लिए अपने आवरण से निकल कर एक सहज और सामाजिक जीवन जीने के लिए एक गेट पास है । उनके मनोविज्ञान को रूपायित करने में लेखक को सफलता मिली है ।

आधुनिक युग के समग्र परिदृश्य में, जब हम मानव मन की गहन-गोपन गुफा में प्रवेश कर वहां से नए नए निष्कर्ष निकाल रहे हैं, वहीं, समाज की बहिर्मुखी चेतना से अपना तादात्म्य स्थापित करने की कोशिशों के साथ, भीतर और बाहर चल रहे झंझावातों के बीच में से उभर कर सामने आ रहे समाज के नए स्वरूप में मूल्यों और रचनात्मक संभावनाओं के लिए गुंजाईश बनाए जाने की जरूरत है । ''सफेद पर्दे पर'' उपन्यास इस जरूरत को समाज के एक विशिष्ट वर्ग को संप्रेषित करने में सक्षम है ।

चूंकि यह कृति विशिष्ट वर्ग के लिए उसके अनुरूप वातावरण को रेखांकित करती है, अत: यह कृति स्पष्टतः साधारण व्यक्ति के लिए अनुकरणीय नहीं है । साधारण व्यक्ति जानता है कि रिटायर होने के बाद उसे बेटी की शादी करना है, बेटे-बहू, नाती-पोतों की देखभाल करना है, ब्लडप्रैशर और डाइबिटीज की दवाइयां लेना है और सारे संघर्षों के साथ उसे परिवार में ही रहना है । वानप्रस्थ आदि उसके लिए विलासमय सोच होती है । वह रिटायरमेण्ट के बाद जीवन भर सांसारिक प्रपंचों को त्यागने की योजनाएं बनाता रहता है और वे योजनाएं कभी पूरी नहीं होतीं । उपन्यास में वर्णित वानप्रस्थ की तो वह कल्पना भी नहीं कर पाता ।

बहुत विषालकाय पाठकवर्ग के लिए यह उपन्यास सिनेमा के उस सफेद पर्दे जैसा ही है जिस पर उत्कंठित करने वाली, स्वप्न दिखाने वाली और दर्षक की यथार्थपूर्ण परिस्थितियों के सापेक्ष कल्पना की उंची उड़ानें भरने वाली फिल्म चलती रही हो और फिल्म समाप्त हो जाने के बाद ''सफेद परदें पर'' एक अभिजात्य शून्यता और खामोशी फैल गई हो ।

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डा. रमेचंद्र शाके उपन्यास ''सफेद परदे पर'' पर समीक्षा)

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संपर्क:

 

आनंद कृष्ण

3/29, टी.टी.सी.कालोनी

गेट नं.-6, रिज रोड

जबलपुर (म.प्र.)

फोन : 09425 800 818

आलेख

शादी के लिए कुंडली की नहीं रक्त की जांच कराइये

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

Ashwini kesharwani (WinCE) मेरे एक मित्र हैं-अनंत, जैसा नाम वैसा गुण, धीरज और सभ्यता जैसे उन्हें विरासम में मिला था। घर में अकेले और बड़े होने से उसकी शादी बड़े धूमधाम से एक सुधड़ कन्या से हुआ। लड़की सुशील, सभ्य और गृह कार्य में दक्ष थी। दोनों की जोड़ी को तब सभी ने सराहा था। बड़ी खुशी खुशी दिन गुजरने लगे मगर एक दिन उसका रक्त स्त्राव होने लगा। थोड़े बहुत इलाज से सब ठीक हो गया और बात आई गई हो गई। दिन गुजरने लगा और कभी कभी उसका रक्त स्त्राव हो जाता था, गर्भ ठहरता नहीं था। बार-बार रक्त स्त्राव से गर्भाशय कमजोर पड़ गया। एक बार गर्भ ठहर गया तब सभी कितने खुश हुये थे। सभी उस सुखद क्षण की कल्पना करके खुश हो जाते थे मगर जब वह वक्त आया तो बच्चा एबनार्मल हुआ। थोड़ी देर जीवित रहने के बाद शांत। बड़ी मुश्किल से मां को बचाया जा सकता है। दादा-दादी बनने की इच्छा ने इलाज से टोने टोटके तक ले आया और इस अंध विश्वास ने बेचारी को एक दिन मौत के गले लगा दिया। उस दिन की घटना ने मुझे विवाह सम्बंधी तथ्यों पर गंभीरता पूर्वक विचार करने की बाध्य कर दिया।

वास्तव में विवाह दो अनजाने व्यक्तियों का मधुर मिलन होता है-दो परिवारों के बीच एक नया सम्बंध। अत: इस संबंध की प्रगाढ़ता के लिये कुछ तथ्यों पर गंभीरता पूर्वक विचार किये जाने की परम्परा होती है। इसके अंतर्गत विवाह पूर्व लड़के और लड़की की कुंडली मिलाया जाता है, कुल गोत्र और पारिवारिक चरित्रावली का अवलोकन किया जाता है। इसके पीछे वंशानुक्रम को जीवित रखने के साथ साथ सुखी और स्वस्थ परिवार की कल्पना होती है। आज इस प्रकार की कितनी शादियां सफल हो पाती हैं वह अलग बात है, मगर इस विधि को कोई छोड़ना नहीं चाहता। यह एक विचारणीय प्रश्न है। बहरहाल कुंडली और राशि की बात महज और थोथी लगती है क्योंकि कुंडली बच्चे के जन्म समय और तिथि के आधार पर बनायी जाती है। मशीनी युग में आपको घड़ी सही समय बतायेगी इस पर संदेह है। वैसे भी आज अधिकांश बच्चे अस्पतालों में पैदा होते है और बच्चे के जन्म के समय डॉक्टर-नर्स सभी डिलीवरी कराने में व्यस्त रहते है। इस समय थोड़ी सी असावधानी जच्चा और बच्चा के जीवन के लिये खतरा बन सकता है, ऐसे वक्त किसका ध्यान समय नोट करने की ओर जायेगा...हां, रजिस्ट्रर में खाना पूर्ति के लिये अवश्य लिखा होता है मगर अंदाज से लिखे इस समय के आधार पर बना कुंडली और राशि कितना सही हो सकता है, इसका अंदाज आप स्वंय लगा सकते हैं।

भारत के अलावा किसी दूसरे देश में कुंडली जैसी कोई चीज नहीं होती। पश्चिम के देशों में विवाह लड़के लड़की के रक्त समूह की जांच करके की जाती है। यहां जाति बंधन नहीं होता। इनसे जन्मे बच्चे स्वस्थ, सुन्दर और उच्च बौद्धिक स्तर के होते हैं। आज ऐसे विवाहों की आवश्यकता हैं जिसमें सादगी और उसका रक्त स्वस्थ हो, तो आइये पहले अपने रक्त के बारे में जान लें।

वास्तव में हमारे शरीर में पाये जाने वाले रक्त की रचना हल्के पीले रंग के द्रव तथा इसमें उतराने वाली कोशिकाओं से होता है। इस द्रव को ''प्लाज्मा'' तथा कोशिकाओं को ''रक्त कणिकाएं'' कहते हैं। ये रक्त कणिकाएं लाल और सफेद कणिकाओं से मिलकर बना होता है। रक्त की 54 से 60 प्रतिशत मात्रा प्लाज्मा तथा चालीस से छियालिस प्रतिशत मात्रा रक्त कणिकाओं की होती है। यह मात्रा परिस्थिति और स्वास्थ्य के अनुसार परिवर्तित होते रहता है।

प्लाज्मा अम्बर के रंग का द्रव भाग है जो निर्जीव होता है। इसमें जल की मात्रा 90 प्रतिशत होती है। अनेक प्रकार की वस्तुएं इसमें घुलकर इसकी रचना को जटिल बना देती है। इसमें से लगभग सात प्रतिशत प्रोटीन्स कोलायडी दशा में 0.9 प्रतिशत लवण और 0.1 प्रतिशत ग्लूकोज होता है। शरीर के एक भाग की प्लाज्मा की रचना दूसरे भाग के प्लाज्मा की रचना से एक ही समय में भिन्न हो सकती है, क्योंकि प्लाज्मा से कुछ पदार्थ निकलकर अंगों में और अंगों से प्लाज्मा में आते जाते रहते है। प्लाज्मा में तीन प्रकार के प्रोटीन्स-फाइब्रिनोजन, सीरम एल्बूमिन तथा सीरम ग्लोबूलिन होती है। इनका संलेषण यकृत में होता है। फाइब्रिनोजन रक्त के जमने में प्रयुक्त होती है। इन्हीं के कारण रक्त में परासरण दाब भी होता है जिससे अपने से कम सांद्रता वाले द्रवों को खींच लेने के क्षमता होती है। इसमें सोडियम, परासरण दाब भी होता है जिससे अपने से कम सांद्रता वाले द्रवों को खींच लेने के क्षमता होती है। इसमें सोडियम, पोटेशियम, कैलिसयम, लोहा और मैंग्निशियम के क्लोराइड, फास्फेट, बाई कार्बोनेंट और सलफेट लवण होते हैं। इसमें से सोडियम क्लोराइड और सोडियम बाई कार्बोनेट बहुत ही आवश्यक लवण है। इसके अलावा आक्सीजन, कार्बन डाईआक्साइड और नाइट्रोजन धुलित अवस्था में होती है। पचे हुए भोजन के अलावा उत्सर्जी पदार्थ, विटामिन तथा अंत: स्त्रावी ग्रंथियों में बने हारमोन्स इसमें घुले रहते हैं। जब कभी रक्त में किसी प्रकार के जीवाणु पहुंच जाते हैं तो इसमें विशेष प्रकार की प्रतिरोधी प्रोटीन बनती है जिसे एंटीबाडी कहते हैं। यह उस जीवाणु को प्रभावहीन कर देती है। ऐसे पदार्थ जो रक्त में एन्टीबाडीज का निर्माण करते है ''एन्टीजेन्स'' कहलाते हैं। ये लाल रक्त कणिकाएं में होती है।

इसी प्रकार रक्त कणिकाएं तीन प्रकार की होती है जिनमें लाल रक्त कणिकाएं, सफेद रक्त कणिकाएं और रक्त प्लेटलेटस। लाल रक्त कणिकाएं वास्तव में हल्के पीले रंग की कणिकाओं का पुंज है और जब ये इकटठी होती हैं तो ये लाल रंग के दिखते हैं। ये लाल रंग इसमें उपस्थित प्रोटीन्स ''हीमोग्लोबिन'' के कारण होती है। यह दो भाग-ग्लोबिन प्रोटीन और प्रोटीन रहित हीम से मिलकर बने होते हैं। इसमें लोहा होता हैं। पुरूषों में हीमोग्लोबिन की मात्रा 11 से 19 ग्राम और स्त्रियों में 14 से 18 ग्राम प्रति मिली लीटर की दर से होती है। इसी प्रकार स्वस्थ पुरुषों में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या 5 से 5.5 मिलियन प्रति घन मिली लीटर तथा स्वस्थ स्त्रियों में 4 से 5 मिलियन प्रति घन मिली लीटर होता है। लाल रक्त कणिकाओं की संख्या स्वस्थ मनुष्यों की संख्या से अधिक होने पर ''पालिसाइथिमिया'' तथा कम होने के कारण कणिकाओं का सारा हीमोग्लोबिन उसकी सतह पर फैला रहता है जिससे लाला रक्त कणिकाओं की आक्सीजन वाहन क्षमता दूसरों की तुलना में अधिक होती है। हीमोग्लोबिन आक्सीजन को शरीर के अंगों में पहुँचाती है। एक लाल रक्त कणिका में लाखों हीमोग्लोबिन के अणु होते हैं और चूंकि हीमोग्लोबिन के एक अणु में चार लौह परमाणु होते है अत: एक अणु में चार आक्सीजन परमाणु को ग्रहण करने की क्षमता होती है। हमारे शरीर में प्रतिदिन 6.25 ग्राम हीमोग्लोबिन बनता है।

सफेद रक्त कणिकाएं जिसे ल्यूकोसाइट्स भी कहते हैं। इनकी संख्या लाल रक्त कणिकाओं की संख्या से कम होती है, स्वस्थ मनुष्यों में से लगभग 5000 से 10000 प्रति धन मिली लीटर होता है। इन कणिकाओं का सामान्य से अधिक होना ''ल्यूकोपिेनिया'' नामक बीमारी हो जाती है। इसमें हीमोग्लाबिन नहीं होता। इनका आकार अमीबा जैसे तथा केन्द्रक युक्त होता है। सफेद रक्त कणिकाओं में इओसिनोफिल्स कोशिकाएं होती है। इनकी संख्या सारी सफेद कणिकाओं की संख्या का 3 प्रतिशत होती है। मनुष्यों में इनकी संख्या के बढ़ जाने से ''इओसिनोफिलिया'' नामक बीमारी होती है। सफेद रक्त कणिकाओं का कार्य शरीर में आये हानिकारक जीवाणुओं का भक्षण करना है। इनकी इस प्रवृत्ति के कारण इसे ''भक्षाणु'' (फैगोसाइट्स) कहते हैं।

सबसे आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि शरीर के किसी भाग में जख्म लगने से रक्त बहने लगता है मगर थोड़ी देर बाद रक्त जम जाता है। यही रक्त शरीर के अंदर नहीं जमता, क्यों ? यह तीसरे प्रकार की कणिका रक्त प्लेटलेड्स की उपस्थिति के कारण होता है। एक स्वस्थ मनुष्य में रक्त जमने में 2 से 5 मिनट लगता है और कभी कभी रक्त जमता ही नहीं और चोट लगे भाग से रक्त स्त्रावित होते रहता है, यह एक बीमारी है और इसे ''हीमोफिलिया'' कहते हैं। शरीर के अंदर ''हिपेरिन'' नामक पदार्थ की उपस्थिति के कारण रक्त नहीं जमता।

यह तो हुई रक्त की बात रक्त में उपस्थित एंटीबाडीज और एंटीजन्स की उपस्थिति से रक्त चार प्रकार के होते हैं जिन्हें A] B] AB और O रक्त समूह से प्रदर्शित किया जाता है। वह व्यक्ति जिसके रक्त में एन्टीजन्स A और एन्टीबाडी B होता है उसे रक्त समूह A में रखा जाता है। इसी प्रकार जिस रक्त में एन्टीजन्स B और एन्टीबाडी A होता है उसे रक्त समूह B में रखा जाता है और जिसमें एन्टीजन्स A और B होता है परन्तु एन्टीबाडी नहीं होता उसे रक्त समूह AB में रखा जाता है। इसी प्रकार जिसमें कोई एन्टीजन्स नहीं होता लेकिन एन्टीबाडी A और B दोनों होता है तब उसे रक्त समूह O में रखा जाता है। जब शरीर में रक्त की कमी होती है तब रक्त देते समय रक्त समूह की जांच आवश्यक होता है। A रक्त समूह के लोग A और O रक्त समूह से रक्त ग्रहण कर सकता है और A तथा AB समूह को रक्त दे सकता है। इसी प्रकार B रक्त समूह B और O के रक्त को ग्रहण कर सकता है B तथा AB समूह को रक्त दे सकता है। मगर AB रक्त समूह वाले लोग A, B, AB और O रक्त समूह का रक्त ग्रहण कर सकता है लेकिन केवल AB रक्त समूह को ही रक्त दे सकता है। इसके इस प्रवृत्ति के कारण इसे ''यूनिवर्सल रिसेप्टर'' कहते है। इसी प्रकार O रक्त समूह सभी रक्त समूह वाले व्यक्ति को रक्त दे सकता है लेकिन केवल O समूह का यही रक्त को ग्रहण कर सकता है। इसके इस प्रवृत्ति के कारण इसे ''यूनिवर्सल डोनेटर'' कहा जाता है। रक्त देते अथवा लेते समय ऐसा नहीं करने से रक्त जम जाता है और व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। रक्त में Rh फेक्टर भी होता है। यह दो प्रकार का होता है- Rh+ और Rh-। विवाह पूर्व रक्त की जांच करते समय रक्त समूह के साथ साथ Rh Factor को भी देखा जाता है। यहां एक बात ध्यान देने योग्य है कि Rh- रक्त वाला लड़का Rh- तथा Rh+ दोनों प्रकार के रक्त वाले रक्त वाले लड़की से शादी कर सकता है मगर Rh+ रक्त वाला लड़का को Rh+ रक्त वाले लड़की से ही शादी करना चाहिये, Rh- वाली लड़की से नहीं अन्यथा लड़की के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसी प्रकार लड़कियों के रक्त में अगर Rh- फैक्टर है तो उसका विवाह Rh- फैक्टर वाले लड़के से सफल हो सकता है अन्यथा बच्चा एबनार्मल होता है और डिलीवरी के समय जच्चा, बच्चा दोनों के जीवन को खतरा होता है। इससे होने वाली बीमारी को ''इरिथ्रोब्लास्टोसिस फीटेलिस'' कहते हैं। इससे स्वस्थ बच्चा जनने की आशा नहीं होती। स्वस्थ विवाह के लिये निम्न लिखित चार्ट दिया जा रहा है।

rakt ki jaanch

उपर्युक्त रक्त समूह वाले चार्ट से आपको स्वस्थ और सुखी परिवार के लिये लड़का और लड़की ढूंढने में सहयोग मिल सकेगा।

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रचना, लेखन एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी, चांपा-495671 (छ.ग.)

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