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बांग्लादेश पर जीत : झेंप मिटाने की कवायद

मनमोहन हर्ष विश्व कप क्रिकेट में करोड़ों चहेतों की उम्मीदों व देश की प्रतिष्ठा को एवरेस्ट की ऊँचाई से गर्त में धकेलने के बाद बांग्लादेश के विरुद्ध टेस्ट व एक रोजा सिरीज में भारत की जीत एक बार पुन: सर्वत्र सुर्खियों में छाई है । माहौल में ऐतिहासिक जीत, दिव्य रिकॉर्डस व ढाका पर चढाई जैसे विशेषण यह आभास पैदा करते हुए कि गोया यह जीत विश्व कप विजय से भी बड़ी जीत है, असलियत पर पर्दा गिराने की साजिश रच रही है। वैसे भारतीय क्रिकेट में झेंप मिटाने का यह शगल पुराना है । वास्तविकता को पार्श्व में धकेलना, छोटी - मोटी जीत को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करना व इसके सहारे फजीहत के दाग को छिपाकर क्रिकेट प्रेमियों को कृत्रिम गर्व में भटकाए रखने की परम्परा सी पनप गई है । इस परम्परा का निर्वहन करना बोर्ड, मीडिया व क्रिकेट के व्यावसायिक पक्ष में अपना हित देखने वाले हर पक्ष की मजबूरी बन गया है। कहना न होगा कि मजबूरी के द्वारा रचे गये इस खेल ने देश के क्रिकेट प्रेमियों की संवेदनाओं को भी मृतप्राय: कर दिया है । अब आम क्रिकेट प्रेमी ऐसे माहौल का शिकार हो गया है, जहां क्रिकेट को अपने आर्थिक हितों के लिए भुनाने…

सभ्य लोग, बहादुर आदमी

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योगेंद्र दत्त की दो व्यंग्य रचनाएँ -
सभ्य लोग- योगेंद्र दत्त अब वे इस समारोह में मिले थे। सालों बाद। जब मैं पहुंचा तो वे कह रहे थे ''हमारा समाज अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।`` मुझे आश्वस्ति का सा भाव प्राप्त हुआ। सामाजिक सरोकार वालों के बीच ही हूं, यह सोचकर सहज सा लगा। मुझे ऐसे लोग अच्छे लगते हैं। वे ऐसी बातें करने में दक्ष होते हैं कि चाहे तो सुनने वाला अंगारों पर दौड़ जाए और चाहे तो देश को आग में जलते देख कर भी चैन की बंसी बजाए। फौरी और स्थूल दायित्व का बोध प्राय: अनिवार्य नहीं होता। कुछ को यह बोध होता है, उनके मैं बहुत निकट नहीं जाता। हीनता का बोध दे जाते हैं ऐसे लोग। मेरे पहुंचने पर सहज ही मिलने-चिलने की औपचारिकता सी हुई और विषय बदल गया। अब बात व्यक्तिगत, स्थूल विषयों पर होने लगी थी। महाकाव्यों का स्थान खंडकाव्यों ने ले लिया था। नारी कल्याण, शिक्षा व्यवस्था, दलितोद्घार के प्रसंग स्थगित हो गए थे। समारोह विराट महानगर की अपेक्षाओं के अनुरूप एक लघुतर भवन में था। जगह कम थी। शायद इसीलिए वे कुछ उद्विग्न से दिखायी दिए। ऐसे स्थान पर न तो कोई सत्ता की बात कर सकता है न कानाफूसी।…

वीरेन्द्र जैन की छः व्यंग्य रचनाएं

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छः व्यंग्य रचनाएं

- वीरेन्द्र जैन
1 क्या फेंकूं क्या जोड़ रखूं ? हरिवंशराय बच्चन, जिनकी कीर्ति पताका अब उनके काब्य संसार से अधिक एक स्टार कलाकार के पिता होने के कारण फड़फड़ा रही है, ने अपनी आत्म कथा का शीर्षक दिया है - क्या भूलूं क्या याद करूं। उनकी इस मन:स्थिति की कल्पना हम प्रतिवर्ष दीवाली पूर्व किये जाने वाले सफाई अभियान के दौरान करते हैं। नई आर्थिक नीति का सांप हमारे घर में ऐसा घुस गया है कि हम जीवन मरण के झूले में लगातार झूल रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों के अनुसार हमने न केवल अपने दरवाजे खोले अपितु खिडकियों रोशनदानों सहित चौखटें भी निकाल कर फैंक दीं जिससे दुनिया का बाजार दनादन घुसा चला आया और हमें आदमी से ग्राहक बना डाला । अब हमारा केवल एक काम रह गया है कि कमाना और खरीदना । बाजार से गुजरने पर इतनी लुभावनी वस्तुएं नजर आती हैं कि मैं उन्हें खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। उपयोग हो या ना हो पर खरीदने का आनन्द भी तो अपना महत्व रखता है- सोचो तो ऊंचा सोचो। इन नयी नयी सामग्रियों की पैकिंग का तो क्या कहना। बहुरंगी ग्लेजी गत्ते का मजबूत डिब्बा उसके अन्दर थर्मोकाल के सांचे …

स्वर्ग के द्वार की ओर - यात्रा संस्मरण

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चलते तो अच्छा थाईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण- असग़र वजाहत
अनुक्रम यहाँ देखें19 स्वर्ग के द्वार की ओरआस्त्रा में पता चला कि शाम चार बजे तबरेज़ के लिए बस मिलेगी। सुबह कमरे से निकला और सोचा आस्त्रा के वे हलके देखे जायें जो अब नहीं देख पाया हूं। फिर ख्याल आया कि क्यों न दाढ़ी बनवा ली जाये। नाई की दुकान पहुंच गया। परिचय देने पर नाई महोदय खुश हो गये। कस्बे के अनुसार दुकान काफ़ी साफ़ आधुनिक और सजी हुई थी। पैसे भी उन्होंने ठीक ही लिए। पचास रुपये यानी दस हज़ार रियाल। फिर सोचा क्यों ने ईरान का एक अच्छा-सा नक्शा ले लिया जाये। एक बुक सेलर की दुकान पर आया। परिचय कराया। उन्होंने एक नक्शा दिखाया। फ़ारसी में था पर ज़ाहिर है शहरों के नाम पढ़ सकता था। ले लिया। दाम पूछे तो दुकानदार महोदय ने शरमाते हुए कहा कि नहीं आपसे पैसे नहीं लूंगा। मेरे तरफ़ से उपहार है। ऐसे मौकों पर मेरी फ़ारसी में अनूदित कहानियों की पुस्तिका काम आती है, मैंने फौरन उसकी एक प्रति निकाल कर उन्हें भेंट कर दी, उनका कार्ड मांगा, अपना दिया और बाहर निकल आया।आस्त्रा का एक चक्कर लगाया। स्कूलों की नयी और अच्छी इमारतें दिखाई दीं। अस्पताल नज़र प…

हवा के शहर में - ईरान यात्रा संस्मरण

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चलते तो अच्छा थाईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण- असग़र वजाहत
अनुक्रम यहाँ देखें13हवा के शहर मेंसुबह जल्दी उठ गया। होटल से बाहर आया तो पास ही चाय वाली दुकान में चहल पहल थी। सोचा चाय पी लूं। चाय वाले बूढ़े काला सूट पहने थे और फ़्लैट हैट लगा रखी थी। इस हुलिये में उनका चाय बनाना और लोगों को चाय देना मुझे कुछ अजीब लगा। चाय के साथ लोग, वही गज़ भर लंबी, रोटी के टुकड़े और सूखा पनीर खा रहे थे। मैं भी एक चाय लेकर बैठ गया। एक दो लोग बात करने की कोशिश करने लगे। कुछ बातें हुई भी लेकिन कुछ निकला नहीं। यह देखकर कुछ अजीब सा लगा कि चाय वाले सज्जन ग्राहकों के खाने से बचे रोटी और पनीर सहेजते जा रहे हैं। निश्चित ही यह वह दूसरों को देते होंगे। शायद इनके समाज में 'झूठा' आदि की परिकल्पना नहीं है।चाय पीकर मुसद्दिक की दुकान गया तो वह बंद थी। सोचा घूम लूं घूमते हुए ख्याल आया कि नाई की दुकान में जाकर दाढ़ी कतरवा ली जाये। नाई की दुकान बहुत साफ़ सुथरी और आधुनिक थी। दस हज़ार रियाल यानी पचास रुपये में दाढ़ी बाल तरशवा कर बाहर आया। मुसद्दिक की दुकान अब भी बंद थी ओर मैं बिना ई-मेल चेक किए बाकू जाना नहीं चाहता था क…

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