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May 2007
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  • मनमोहन हर्ष

विश्व कप क्रिकेट में करोड़ों चहेतों की उम्मीदों व देश की प्रतिष्ठा को एवरेस्ट की ऊँचाई से गर्त में धकेलने के बाद बांग्लादेश के विरुद्ध टेस्ट व एक रोजा सिरीज में भारत की जीत एक बार पुन: सर्वत्र सुर्खियों में छाई है । माहौल में ऐतिहासिक जीत, दिव्य रिकॉर्डस व ढाका पर चढाई जैसे विशेषण यह आभास पैदा करते हुए कि गोया यह जीत विश्व कप विजय से भी बड़ी जीत है, असलियत पर पर्दा गिराने की साजिश रच रही है। वैसे भारतीय क्रिकेट में झेंप मिटाने का यह शगल पुराना है । वास्तविकता को पार्श्व में धकेलना, छोटी - मोटी जीत को बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करना व इसके सहारे फजीहत के दाग को छिपाकर क्रिकेट प्रेमियों को कृत्रिम गर्व में भटकाए रखने की परम्परा सी पनप गई है । इस परम्परा का निर्वहन करना बोर्ड, मीडिया व क्रिकेट के व्यावसायिक पक्ष में अपना हित देखने वाले हर पक्ष की मजबूरी बन गया है। कहना न होगा कि मजबूरी के द्वारा रचे गये इस खेल ने देश के क्रिकेट प्रेमियों की संवेदनाओं को भी मृतप्राय: कर दिया है । अब आम क्रिकेट प्रेमी ऐसे माहौल का शिकार हो गया है, जहां क्रिकेट को अपने आर्थिक हितों के लिए भुनाने वाले इन लोगों के इशारों पर उसकी भावनाएं उबाल लेती हैं, शांत होती है या इस कृत्रिम माहौल में पुन: शरीक होकर गुणगान का राग अलापने लगती है ।

क्रिकेट के व्यवसायवाद ने भारत में रोमांच, जुनून व खेल के प्रति चाह को कृत्रिमता के आचरण में कैद करके रख दिया है। अब तो हालात यहां तक आ पहुँचे है कि मीडिया जब रुलाता है तो क्रिकेट प्रेमियों के आंसू निकलते है तथा अगले ही पल जब मीडिया क्रिकेटरों पर पुन: सिर आंखों पर बैठाने लगता है तो लोग जख्मों को भूल कर जश्न में शरीक हो जाते हैं । जन भावनाओं व क्रिकेट के रोमांच के ठेकेदार बनते जा रहे पक्षों ने ही भारत में क्रिकेट का बेड़ा गर्क किया है । फजीहत व पराजय के हर मोड़ पर ये घड़ियाली आंसू बहाने के साथ - साथ उस पर पर्दा गिराने का अवसर ताकने लगते हैं ताकि क्रिकेट से जुड़े उनके हितों की मौत न हो । बिल्लियों के भाग का छींका इस बार बड़ी जल्दी टूट गया है । उपमहाद्वीपीय परिस्थितियों में घर के शेरों ने बांग्लादेश को छकाकर उनकी मुराद सी पूरी कर दी है । वैसे देखा जाए तो बांग्लादेश को ऐसे दस दौरे में अनवरत इसी तरह हराने के बाद भी विश्व कप की उस एक हार व उससे भारतीय क्रिकेट की प्रतिष्ठा को हुई क्षति के दंश को नहीं भुलाया जा सकेगा। इस हकीकत को आत्मसात कर भारतीय क्रिकेट का भविष्य सुधारने का जज्बा अब शेष कहां दिखाई देता है ।

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संदर्भ: ब्रायन चार्ल्स लारा का बेमिसाल कैरियर

कैरेबियन क्रिकेट के दर्द का महाकाव्य

  • मनमोहन हर्ष

विश्व कप क्रिकेट की चकाचौंध, सफलता का आरोहण करने वाले सितारों व टीमों की चर्चा के बीच आलमी क्रिकेट के एक ऐसे बेमिसाल खिलाड़ी की विदाई गुमनामी के अँधेरों में खोकर रह गई, जिसने अपने बेमिसाल कैरियर के दौरान खेल के मैदान पर समर्पण के साथ-साथ मुल्क व क्रिकेट के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का अद्वितीय मुजाहिरा किया है। जी हाँ, कैरेबियाई क्रिकेट के महानायक ब्रायन चार्ल्स लारा का रुतबा कुछ ऐसा ही रहा है, जिसके समक्ष विश्व कप विजेता व व्यक्तिगत स्तर पर लोकप्रियता की हदें छूने वाले नामी क्रिकेटरों की आभा भी कई मायनों में फीकी नजर आती है। घरेलू मैदानों पर वेस्टइंडीज को विश्व विजेता का ताज दिलवाने में नाकामी का दंश झेलकर विश्व क्रिकेट से रुखसत हुए दिव्य प्रतिभा के धनी लारा ने अपने 17 वर्षों से ज्यादा लम्बे कैरियर में अनेकानेक अवसरों पर बल्ले का ऐसा जलवा बिखेरा, जिसने क्रिकेट के मैदानों पर रोमांच व श्रेष्ठता के अध्याय रचे। आलमी क्रिकेट में लारा की समकालीन सितारों से तुलना करने पर हम देखते है कि जिस प्रकार की विषम विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए लारा ने अपने बल्ले से महासमर लड़ा, वैसी नाउम्मीदी से भरी घड़िया उनके कई समकालीन खिलाड़ियों को सौभाग्य नसीब नहीं हुई। ऐसे में लारा के खाते में विश्व कप विजेता बनने की उपलब्धि भले ही दर्ज नहीं हो पाई हो बावजूद इसके उनका कैरियर महानता व समर्पण की अनोखी व अमिट छाप क्रिकेट के असंख्य चाहने वालों के दिलोदिमाग पर छोड़ गया है, जिसका ओज क्रिकेट की आने वाली पीढ़ियों को रोशन करता रहेगा।

ब्रायन लारा के कैरियर पर निगाह डाले तो हमें अनहोनी को होनी में तबदील कर देने के सदृश कई महामानवीय प्रदर्शन देखने को मिलते है, जो कैरेबियन व विश्व क्रिकेट के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से अंकित है। सेंट जोंस एंटीगा के मुकाम पर 2004 में टेस्ट क्रिकेट में निर्विवाद विश्व श्रेष्ठता की परिचायक 400 रनों की नाबाद पारी खेलकर लारा ने ऐसा कारनामा कर दिखाया था, जिसे छू पाना किसी भी क्रिकेटर के लिए नाकों चने चबाने के बराबर होगा। ब्रायन लारा की यह पारी कैरेबियन क्रिकेट के डूबते सूरज के बीच, उसके लिए (कैरेबियन क्रिकेट) सदैव अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर कुछ नया कर गुजरने को प्रतिबद्ध एक सितारे द्वारा गहराते धुंधलकों के बीच उम्मीदों को चिराग रोशन कर देने वाला करतब था। वक्त के उस मोड़ पर लारा व बीते जमाने के क्रिकेट बादशाह वेस्टइंडीज नियति के थपेड़ों को झेलते-झेलते सातवें आसमान से रसातल में धंसने का दंश झेल रहे थे। कहना न होगा कि लारा के कैरियर में नियति ने कमोबेश प्रत्येक मोड़ पर ऐसी ही अग्नि परीक्षाओं के अवरोध खड़े किए, मगर अपनी हाई बैकलिफ्‌ट व बल्ले से निर्मम प्रहारों की बाजीगरी से चुनौतियों को फतह करने में आनंद की अनुभूति करने वाले लारा ने व्यक्तिगत स्तर पर बारम्बार चौंकाने वाला प्रदर्शन कर कैरेबियन क्रिकेट की प्रतिष्ठा का परचम अकेले दम पर लहराया।

लारा के बल्ले से चार सौ रनों की वह कालजयी पारी उस समय निकली जब लाजवाब बल्लेबाजों व तूफान को भी अपनी रफ्‌तार से धता बता देने वाले तेज गेंदबाज़ों से विश्व क्रिकेट में चहुंओर अपनी कीर्ति पताका लहराने वाला वेस्टइंडीज उन टीमों के हाथों लाचार व बेबस सा पिटता चला जा रहा था, जिनको सहज ही धूल चटाना कभी कैरेबियन दिग्गजों के लिए बाएं हाथ का खेल हुआ करता था। विध्वंसक तेवरों के बल पर प्रतिद्वंद्वियों को मैदान पर चारों खाने चित्त करने की कैरेबियन परम्परा को जैसे कोई सांप सूंघ गया था। बद से बदतर होते हालात के बीच सदैव चुनौतियों का बीड़ा उठाकर एक संकटमोचक की तरह रणक्षेत्र में प्रतिपक्षियों से लोहा लेकर कैरेबियन क्रिकेट की प्रतिष्ठा के क्षरण को थामने के लिए संघर्षरत रहे लारा ने अपनी उस विस्फोटक पारी से वेस्टइंडीज क्रिकेट में प्राणवायु का संचार करने का अद्वितीय प्रयास किया।

कैलिप्सो की धुन पर लाल सुरा की मस्ती के साथ दिल की गहराईयों तक क्रिकेट को चाहने वाले कैरेबियाई क्रिकेट प्रेमी विश्व क्रिकेट में दीवानगी की मिसाल माने जाते है। लेकिन असफलता के अनवरत दौर ने इन दीवानों का भी खेल से मोहभंग कर दिया। कभी रोहन कन्हाई, गैरी सोबर्स, क्लाईड वॉलकॉट, क्लाईव लॉयड, विवियन रिचर्डस, गॉर्डन ग्रीनिज, मैल्कम मार्शल व माईकल होल्डिंग सरीखे एक से एक महान खिलाड़ियों के पदचिह्नों का अनुसरण करने की तमन्ना के साथ वहां के समुद्र तटों पर जुट जाया करने वाली युवाओं की भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। और तो और युवा क्रिकेट को छोड़ कर बेसबॉल, बास्केटबाल व अन्य खेलों को तरजीह देने लगे। क्रिकेट को जुनून की तरह लेने व जीत के लिए जिद्दी इरादें रखने वाले लारा के लिए इससे अधिक सालने वाली बात और क्या हो सकती थी? ये सब परिस्थितियां उस समय उत्पन्न हुई जब वेस्टइंडीज की कमान व बागडोर ब्रायन लारा के हाथों में रही और न केवल कैरेबियन क्रिकेट बल्कि समूचे विश्व में उसके प्रशंसक लारा की ओर बड़ी उम्मीद के साथ देखते थे कि ये वामहस्त बल्लेबाज अपनी टीम का भाग्य पलटकर रख देगा! दिग्गजों की निवृति व तेज गेंदबाजों की कुंद होती धार के बीच लारा जैसे सितारे के कंधों पर कैरेबियन क्रिकेट का भाग्य आ टिका। कप्तान के रूप में टेस्ट व एक रोजा मैचों में लारा ने कई बार अपनी टीम को बुरे वक्त से गुजरते हुए देखा। इस विश्व कप सहित गत दो विश्व कप मुकाबलों में वे अपने नेतृत्व में कोई करिश्मा नहीं दिखला पाए। व्यक्तिगत स्तर पर श्रेष्ठता को बारम्बार साबित करने के बावजूद नवोदित पीढ़ी के गेल, गंगा, हिंडस, रिकार्डो पावेल, चंद्रपाल, सरवन, टीनो बेस्ट एडर्वड्‌स, सिलवेस्टर जोजेफ, डेवोन स्मिथ, सैमुअल्स व ब्रावो जैसे साथियों के प्रदर्शन में सततता व एकजुटता के अभाव में टीम के प्रदर्शन का पूरा दारोमदार लारा पर ही रहा। विरासत को सम्भालने व टीम के प्रदर्शन को पटरी पर लाने के चक्रव्यूह में लारा नैसर्गिक प्रतिभा के धनी होते हुए भी कई बार अपने बल्ले की धार खो बैठे। उन पर टीम को गर्त में धकेलने व अग्रिम मोर्चे से नेतृत्व न कर पाने के आरोप भी मढ़े जाते रहे। कैरेबियन क्रिकेट की मुफलिसी पर अपनी प्रतिभा का खजाना न्यौछावर करते रहने के बावजूद लारा के खाते में अपयश ही ज्यादा दर्ज किया जाता रहा। कई बार उनसे नेतृत्व छीनकर उन्हें बलि का बकरा बनाया गया, लेकिन हर बार कैरेबियन क्रिकेट की नैया को पार जगाने के लिए लारा से बेहतर खेवनहार की तलाश अधूरी ही रही और कप्तान के रूप में लारा की वापसी होती रही।

लारा की अपने कैरियर के दौरान ये खुसूसियत रही की उन्होंने कई अवसरों पर अकेले दम पर ऐसा विस्मयकारी खेल दिखाया जिसने न केवल उनको क्रिकेट इतिहास में अमर कर दिया बल्कि साथी खिलाड़ियों की बेरूखी व असफलता के बावजूद उन्होंने टीम की जीत की इबारत लिख डाली। चार सौ रनों की उस ऐतिहासिक पारी के अलावा लारा ने जब 1994 में सर्वप्रथम 1994 में सोबर्स के 365 रनों के 35 वर्ष पुराने कीर्तिमान को 375 रन बनाकर ध्वस्त किया तथा प्रथम श्रेणी क्रिकेट में भी 501 रनों की नाबाद पारी खेलकर विश्व रिकॉर्ड बनाए तब भी उनके जेहन में अपने प्रदर्शन से कैरेबियाई क्रिकेट को प्रतिष्ठा के उस मुकाम पर पुन: ले जाने की तमन्ना हिलोरे मार रही थी। लारा के कैरियर के कुछ और यादगार लम्हों का प्रत्यास्मरण करे तो 1998-99 में बहैसियत कप्तान उन्होंने धरेलू मैदानों पर दो लगातार टेस्ट मैचों में 213, 8, 153 नाबाद व 100 रनों की बेमिसाल पारियां खेलते हुए वाल्श व एम्ब्रोस जैसे पुछल्ले बल्लेबाजों में जीवट भर ऑस्ट्रेलिया से टेस्ट सिरीज बराबर करवाई थी। वर्ष 2001-2002 में भारतीय उपमहाद्वीप के दौरे पर उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ भी बल्ले का खूब जौहर दिखाया। न केवल एक टेस्ट में 221 व 130 रनों की पारियां उनके बल्ले से निकली बल्कि पूरी श्रृंखला में उन्होंने 688 रन बनाए जो वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों द्वारा पूरी श्रृंखला में बनाए गए रनों का 42 प्रतिशत थे। लारा ने नवम्बर 2005 में एडीलेड टेस्ट में एलन बोर्डर के 11 हजार 174 रनों के कीर्तिमान को पीछे छोड़कर टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में सर्वाधिक रनों का रिकॉर्ड अपने नाम किया। इतना सब कुछ अर्जित करने के बावजूद इस विश्व कप से उनकी खामोश विदाई व वेस्टइंडीज की उनके नेतृत्व में एक और असफलता को लारा के साथ नियति के अन्याय की संज्ञा दी जा सकती है। उन जैसे प्रतिभावान सितारे की झोली किस्मत और साथी खिलाड़ियों के साथ से और समृद्ध हो सकती थी।

ब्रायन लारा के कैरियर व उनकी चंद अद्वितीय पारियों को साहित्यिकता के रंग में रंगने की गुस्ताखी माफ हो तो मुझे उनका कैरियर कैरेबियन क्रिकेट के दर्द का एक महाकाव्य व लारा उसके महानायक नजर आते है । गोया लारा बच्चन (डॉ. हरिवंशराय) हो गए हों और अपने बल्ले से मधुशाला की कुछ अमर पंक्तियों को कुछ इस अंदाज में क्रिकेट जगत के समक्ष कह गए हों - लाल सुरा की धार लपट सी, कह न इसे देना ज्वाला, फेनिल मदिरा है, इसको मत कहना उर का छाला, दर्द नशा है इस मदिरा का (मेरा कैरियर व इस दौरान खेली गई विस्मय कारी पारियां कैरेबियन क्रिकेट के दर्द को भीतर तक महसूस करने की देन है । लारा के जेहन में यह दर्द इन पारियों के दौरान नशे की तरह मौजूद था), विगत स्मृतियां साकी हैं (विरासत को न संभाल पाने की पीड़ा व अतीत की अजेय यात्रा ने प्रेरित किया), पीड़ा में आनंद जिसे हो आए मेरी मधुशाला (जो विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानकर उसी में आनंद की बयार पैदाकर, उत्कर्ष की ओर बढ़ने की राह खोज सकता है, वह आए और मेरे द्वारा प्राप्त किए गए चिर आनंद को आत्मसात करे) ।

ब्रायन चार्ल्स लारा

जन्म - तिथि : 2 मई 1969, जन्म स्थान - कैन्टारो, सांताक्रूज (ट्रिनिडाड)

पहला टेस्ट :- विरूद्घ पाकिस्तान, लाहौर, 6 से 11 दिसम्बर 1990

अंतिम टेस्ट :- विरूद्घ पाकिस्तान, कराची, 27 नवम्बर से 1 दिसम्बर 2006

पहला वनडे :- विरूद्घ पाकिस्तान, कराची, 9 नवम्बर 2006

अंतिम वनडे :- विरूद्घ इंग्लैंड ब्रिजटाउन, 21 अप्रैल 2007

कैरियर पर एक नजर :-

मैच पारी रन औसत उच्च स्कोर शतक अर्द्घशतक

टेस्ट 131 232 11953 52.88 400 नाबाद 34 48

वन डे 299 289 10405 40.48 169 19 63

प्र श्रेणी 260 439 21933 51.38 501 नाबाद 64 87

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रचनाकार संपर्क :

  • मनमोहन हर्ष

(खेल समीक्षक)

जिला सूचना एवं जनसम्पर्क अधिकारी,

हनुमानगढ़।

कमरा नम्बर-208

मिनी सचिवालय, हनुमानगढ़ जंक्शन-335512


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सभ्य लोग

- योगेंद्र दत्त

अब वे इस समारोह में मिले थे। सालों बाद। जब मैं पहुंचा तो वे कह रहे थे ''हमारा समाज अभी बहुत पिछड़ा हुआ है।`` मुझे आश्वस्ति का सा भाव प्राप्त हुआ। सामाजिक सरोकार वालों के बीच ही हूं, यह सोचकर सहज सा लगा। मुझे ऐसे लोग अच्छे लगते हैं। वे ऐसी बातें करने में दक्ष होते हैं कि चाहे तो सुनने वाला अंगारों पर दौड़ जाए और चाहे तो देश को आग में जलते देख कर भी चैन की बंसी बजाए। फौरी और स्थूल दायित्व का बोध प्राय: अनिवार्य नहीं होता। कुछ को यह बोध होता है, उनके मैं बहुत निकट नहीं जाता। हीनता का बोध दे जाते हैं ऐसे लोग।

मेरे पहुंचने पर सहज ही मिलने-चिलने की औपचारिकता सी हुई और विषय बदल गया। अब बात व्यक्तिगत, स्थूल विषयों पर होने लगी थी। महाकाव्यों का स्थान खंडकाव्यों ने ले लिया था। नारी कल्याण, शिक्षा व्यवस्था, दलितोद्घार के प्रसंग स्थगित हो गए थे।

समारोह विराट महानगर की अपेक्षाओं के अनुरूप एक लघुतर भवन में था। जगह कम थी। शायद इसीलिए वे कुछ उद्विग्न से दिखायी दिए। ऐसे स्थान पर न तो कोई सत्ता की बात कर सकता है न कानाफूसी। सत्ता के विमर्श के लिए परिधि का विमर्श महत्वपूर्ण हो जाता है। कोने में सत्ता की बात करने में संकोच होता है। जगह की लघुता के अनुरूप पात्रों के मस्तिष्क भी छोटे हो जाते हैं। सत्ता के विस्तार का फलक पूरा पसर नहीं पाता। यही कानाफूसी के लिए भी सही है। उसके लिए निस्सीम शून्य की अपेक्षा होती है। कुल मिलाकर यह उनके लिए पहचान के संकट का भूगोल था।

उनका नाम हर्षवर्धन पांडेय था पर जातिसूचक नाम के स्थान पर `सुकुमार' लिखने लगे थे। कॉलेज में प्रवक्ता थे और खुद को प्रोफेसर मानते थे। उन्होंने लिखा कुछ न था पर लिखने और पढ़े जाने वालों से खुद को ज्यादा मेधावान मानते थे। संस्कृत पढ़ाते थे इसलिए साहित्य सम्मेलनों में जा चुके थे। चार-पांच कविताएं लिखी थीं जिन्हें अपने घर में रस-रंजन के अवसर पर मित्रों को सुना कर कवि के रूप में प्रतिष्ठा पा चुके थे। कविताओं को एक-दो पत्रिकाओं में भेजा तो सधन्यवाद लौट आयीं। इसे वे साहित्य की क्षति मानते थे। प्रगतिशीलता और क्रांतिकारिता के चलन को यान में रखते हुए युवावस्था में मजदूर वर्ग की मुक्ति, किसानों की उन्नति, स्त्री समानता और मानव मूल्यों की स्थापना के आंदोलनों में संलग्न रह चुके थे। बकौल उन्हीं के, उन्हें ''अपने लिए कभी कुछ करने का मौका ही नहीं मिला।`` सदा व्यस्त रहे।

समारोह स्थल पर मैं कन्या पक्ष के कुछ परिचितों के साथ औपचारिक रूप से दायित्वबद्घ दिखने की चेष्टा कर रहा था। कोई अपनी बात समाप्त करने के बाद मेरी ओर उड़ती सी नजर डालते हुए अतिरिक्त सहमति के लिए कह देता, ''क्यों, है कि नहीं?`` या ''क्या समझे!`` तो मैं फौरन गर्दन हिला कर सहमति दे देता और यह सोचकर खुश होता कि मेरा आना सार्थक हो गया। मुझे भीतर का आदमी जाना गया है। इसी स्वांग के दौरान पीछे से उनकी वही बात फिर सुनाई पड़ी ''हां, हमारे लोग अभी बहुत पिछड़े हुए हैं।``

मैंने उनको लक्ष्य करके कहा, '' क्यों भई, क्या हो गया?``

''यही कि हमारे लोग अभी इतने नहीं बढ़ पाए हैं। देखो कहां फंसे खड़े हैं।``

''इस बात से तो कोई आपत्ति नहीं परंतु दिल्ली में बड़े बारात घर आसानी से मिलते कहां हैं।``

''नहीं, मैं बारात घर की बात नहीं कर रहा हूं। देखिए न यहां इतनी देर से खड़े हैं। कोई पानी तक को नहीं पूछता।``

एक मित्र ने कहा, ''नहीं सुकुमार जी, स्टैंडिंग सिस्टम तो ऐसा ही होता यहां तो सब खुद ही पानी लेते हैं। हम सबने तो पी भी लिया।`` उसने इस भाव से कहा था मानो उसमें औरों की सहमति भी निहित हो। फिर भी उसने मानवश कहा, ''इसमें क्या है, मैं लाए देता हूं।``

सुकुमार जी थोडा व्यथित हुए। अभी खाली हुई एक कुर्सी की ओर लपकते हुए बोले,

''अरे नहीं, मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं। इनकी भी तो कोई सभ्यता होगी।`` उन्होंने वर पक्ष के लोगों की ओर संकेत करते हुए कहा।

अब समझ में आया कि मानव सभ्यता को विलाप के लिए बाय क्यों किया जा रहा था। उन्हें नोटिस जो नहीं किया गया था। किसी ने अभी तक उन्हें यह नहीं कहा था कि `अहोभाग्य, आप हमारे द्वार पधारे।'

आखिरकार उनके लिए एक बैरे को बुलाया गया और उन्होंने अपने कंठ को नम किया। एक घूंट। बस। मानो किसी सम्राट ने कलाकंद की थाल को छूकर दासों को संकेत कर दिया हो, `लो छू दिया। जाओ गरीबों में बांट दो।' जैसे सम्राट दासों से आंख मिलाने में अपनी हेठी मानते होंगे वैसे ही उन्होंने भी बैरे को दृष्टिपात के योग्य नहीं माना। बैरा चला गया। उनके कंठ को अनावश्यक और आहत अंतस को आवश्यक शीतलता मिल गयी।

बैरा समझदार था। देखते ही उनकी कमजोरी भांप गया था। थोड़ी देर में उनके लिए कॉफी ले आया। उन्होंने संतोष के भाव से पी। कुछ क्षण पश्चात हल्का नाश्ता भी वहीं हाजिर किया गया। ज्यादातर लोग खानपान का उद्यम खुद ही संभाल रहे थे परंतु वे वहीं जमे रहे। कुछ अन्य मित्र भी उनके साथ आ बैठे। उन्होंने भी सुकुमार जी के संक्रामक आलस्य को ओढ़ते हुए इसी मुद्रा को अपना स्थायी भाव बना लिया था। वे भी वहां से हिलने वाले नहीं थे। उनके लिए भी माल आने लगा।

सुकुमार जी सत्ता का केंद्र बन चुके थे। उन्होंने अपने ईद-गिर्द महत्व और प्रासंगिकता का आभामंडल रच लिया था। साथ बैठे लोगों को वे सत्ता के निकट होने का दंभ और अज्ञानता का अहसास बांट रहे थे।

तीसरा रसगुल्ला मुंह में रखा और अपनी बात जारी रखते हुए बोले,

''जब तक समाज के सभी वर्ग प्रगति नहीं करेंगे तब तक देश प्रगति नहीं कर सकता। इसके लिए आवश्यक है कि हमारे लोग शिष्ट हों, परिश्रम करें। हमारे लोग आगे ही नहीं बढ़ना चाहते।``

एक सज्जन ने उनकी बात बीच में ही काटते हुए कहा, ''जब अवसर ही न होंगे तो?``

''बात अवसरों की नहीं साहस की है। डॉ अम्बेडकर ने कहा था, हमारे लोगों में साहस नहीं है।``

माहिर बैठकबाज़ की तरह उन्होंने भी एक महापुरुष का नाम लेकर सबको निरुत्तर करने का दांव खेल डाला था। इस वक्तव्य अपेक्षित असर हुआ। वे जरा ठहर कर लोगों के चेहरे पर अपनी विजय के चिन्हों का अध्ययन करने लगे। वे मुंह खोलकर अपने एकाख्यान को आगे बढ़ाने ही वाले थे कि एक दुर्घटना हो गई। उनके श्रोताओं में एक मित्र कथित दलित जाति से भी था। बोला,

''अम्बेडकर ने यह बात दलितोद्घार के प्रसंग में कही थी।``

''वही तो मैं भी कह रहा हूं।`` यह उनका दूसरा दांव था। शत्रु को भी अपने पक्ष में दिखाने का दांव। असहमति को भी सहमति दर्शाने का दांव। ''दलितों में, स्त्रियों में, मजदूरों में, साहस नहीं है। डॉ अम्बेडकर ने कहा था जिस दिन दलित घृणित कार्य करना बंद कर देंगे, उसी दिन समाज को उनकी अनिवार्यता का बोध होगा और वे दलितों का सम्मान करने लगेंगे। उन्हें अपना लेंगे।``

अपने जन्म की जाति व धर्म को छोड़कर बौद्घ धर्म अपना चुके चंद्रप्रकाश नाम के उस मित्र ने कहा,

''लेकिन वे भला और क्या साहस करें। अवसर हैं नहीं और आप उनसे रोजी-रोटी का जरिया भी छोड़ने की बात कह रहे हैं। उनकी बेहतरी के लिए समग्र स्तर पर प्रयास करना होगा। सिर्फ काम छोड़ देने से बात नहीं बनेगी। उन्हें वैकल्पिक काम भी देना होगा। और वैसे भी, वे जो काम करते हैं उसे कोई और करके बताए तो मैं उसे साहसी मानूं। आप करेंगे इस काम को?``

चंद्रप्रकाश ने उनके आभामंडल को बो दिया था। लोग उनकी बातों को सुन तो अब भी रहे थे पर अब वैसा कौतूहल नहीं था। सब मुस्कुराते हुए सभा में जमे हुए थे और मौका मिलते ही कोई किसी के कान में फूंक सी भी मार देता था।

यह उनकी सत्ता को खुली चुनौती थी। सुकुमार जी ने बेचैनी को छिपाने का प्रयास किए बिना, संरक्षक भाव से कहा, ''माई डियर, मैं भी यही कह रहा हूं।`` उन्होंने चंद्रप्रकाश को एक बार फिर अपने पाले में खींचने का प्रयास करते हुए कहा। किंतु अब वे रक्षात्मक मुद्रा में थे। निराशा के भाव से उन्होंने तीसरा दांव चला। चंद्रप्रकाश को नादान बालक साबित करते हुए उन्होंने कहा ''तुम मेरी बात का मतलब नहीं समझे। मेरे पास आओ, मैं समझाता हूं।``

चंद्रप्रकाश ने समझने से इनकार कर दिया। टोक कर बोला,

''अच्छा छोड़िए। ये बताइए अगर दलित मौजूदा काम छोड़ दें तो करेंगे क्या? आप दिलाएंगे उन्हें कोई काम? सामाजिक प्रतिष्ठा की तो बात ही छोड़ दीजिए।``

''अरे! इसके लिए तो उन्हें आंदोलन करना होगा भाई। स्वाभिमान से आगे बढ़ना होगा।``

अब बहस इन्हीं दोनों के बीच सिमट चुकी थी। एक भुक्तभोगी था जो मुक्ति के लिए छटपटा रहा था और दूसरा मुक्ति के सिद्घांतों का भोग लगा रहा था। चंद्रप्रकाश बोला,

''तो आप क्या करेंगे?``

''हम भी योगदान देंगे। पीछे थोड़े हटेंगे। तुम्हें क्या लगता है, हम विरोध करेंगे! हर संभव सहायता और समर्थन देंगे।`इसमें किसी को संदेह नहीं था कि वे विरोध नहीं करेंगे। जब आरक्षण का आंदोलन जोरों पर था तो उन्होंने चुपचाप दूसरे विश्वविद्यालय में नाम लिखा लिया था। विरोध नहीं किया था, किसी का भी।

''पर अब तक तो आपने ऐसा नहीं किया।``

''करेगे न भई, करेंगे। समय आएगा तोकरेंगे।``

अब उनके भीतर का उपदेशक डूब मरना चाहता था। उन्होंने अपने चेहरे पर व्यस्तता का भाव पैदा करते हुए रसगुल्ले के डोंगे में हाथ डाला। रसगुल्ले खत्म हो चुके थे। तीन उंगलियां डूबी रह गईं। रसगुल्ला हाथ नहीं लगा। `छि! ये क्या किया।' वाले भाव के साथ उन्होंने हाथ बाहर खींच लिया। अब प्रासंगिक बने रहने का भाव ओढे़ रहना बेवकूफी थी। उन्होंने समर्पण करते हुए कहा,

''नहीं, तुम्हारे सवाल गंभीर हैं। कभी लंबी बात करेंगे इन पर।``

बैरा उन्हीं की ओर आ रहा था। उन्हें लगा हमला कर देगा। उन्होंने उसे हमले का मौका नहीं दिया। उसे अनदेखा करते हुए खुद ही उठे और शाही पनीर, दाल मखनी आदि व्यंजनों की मेजों की ओर लपक लिए। उन्हें गंवारों के बीच अपनी सभ्यता की रक्षा करनी थी। चाहे पलायन के ही मार्ग से।

मैंने चंद्रप्रकाश का हाथ पकड़कर चुटकी ली,

''क्या यार, आज तो तुमने उन्हें परेशान कर डाला। कहीं ग्लानि से मर न जाएं। हत्या का अभियोग तुम्हीं पर लगेगा।``

''कुछ नहीं होगा। ऐसे लोग ग्लानि जैसे आदिम विचारों से परेशान नहीं होते। ऐसा होता तो रोज हजार और मरते। ये सभ्य लोग हैं।``

(१२-२-७)

बहादुर आदमी

- योगेंद्र दत्त

''आप जैसा डरपोक आदमी मैंने नहीं देखा।``

राधेश्याम जी ने ऐसा तब कहा जब मैंने यह स्पष्ट कर दिया कि मैं उनकी बात से सहमत नहीं हूं।

बैठक साधारण विषयों पर हो रही थी। मसलन, कुंजड़ों को मोहल्ले के बाहर बैठने दिया जाए या नहीं। मछली वालों को कितनी दूर तक हटवाने की दरख्वास्त दी जाए (उनसे गंध बहुत आती है)। नगरपालिका कर्मियों को दायित्व का बोध कराया जाए आदि। राधेश्यामजी तत्काल निर्णय और सख्त कदमों की अनिवार्यता पर बल दे रहे थे। मैंने तनाव के आसार देखते हुए कहा कि इस बारे में कुछ दिन बाद दोबारा बात कर ली जाए तो बेहतर होगा। राधेश्याम जी को मेरी बात बुरी लगी।

यह जानने लायक बात नहीं है कि असहमत होना विरोधी पक्ष की नजर में कायरता होता है। प्रमाण देने वाला ताकतवर हो तो निश्चय ही।

मुझे उनका वक्तव्य सुनकर खुद से ही घृणा होने लगी। किसी झगड़े से बचने के लिए बीच का रास्ता ढूंढ लेना वीरता की बात तो नहीं ही है। फिर भी निंदा हरेक को बुरी लगती है सो मुझे भी चुभी।

बैठक के बाद गिले-शिकवे का औचित्य नहीं था। मैंने बात बदलने के लिए पूछा,

''और सुनाइए क्या चल रहा है आजकल?``

''बस आजकल तो एक ही काम है। बिटिया की शादी।`` उन्होंने जरा गंभीरता से कहा।

''क्या बात है, कुछ परेशान लग रहे हैं।`` मैंने कहा।

''क्या बताएं सज्जनता का कोई मोल ही नहीं है।``

उनकी बात सुनकर मैं भी उत्सुक हो उठा। भला ऐसी क्या बात थी कि जो दुनिया को वीरता के पदक बांटता फिरता है वही आज परेशान है। उसे सज्जनता की क्या परेशानी। समरथ को नहीं दोस गुसांई। संसार भर के दुर्जन सज्जन कहलाते हैं। सज्जन भले सज्जन न कहलाएं।

औपचारिकता निभाना अपने आप में एक फर्ज होता है। मैं सज्जन सही पर सामाजिक आदमी होने के नाते फर्ज तो निभाना ही था। मैंने उन्हें निपटाने की गरज से कहा, बल्कि मुंह से निकल गया,

'' क्यों क्या हुआ।``

''अरे क्या कहें!``

''हां ये भी है। हर बात कही नहीं जाती।``

''आप भी न।``

झिड़का पर इस बार उन्होंने मुझे कायर नहीं कहा। आत्मतोष का भाव तो उनके चेहरे पर अब भी दिख रहा था पर अबकी उन्होंने मुझे कायर नहीं कहा। यही मेरे लिए उपलब्धि की बात थी। लगा आज मैं भी वीरों की पांत में खड़ा हूं। उनके साथ। दिलासा प्राय: अपनी इच्छा का परिणाम होती है और चाहे कितनी भी क्षणभंगुर हो, अच्छी लगती है। उनकी प्यार भरी झिड़की भी अच्छी लगी।

''यू आर सो इनोसेंट!``

उन्होंने मुझसे अपनापन जताया।

''देखिए न, लड़के वालों को इक्यावन हजार दे दिए। अब कहते हैं कि बड़े बेटे की सगाई में सवा लाख आए थे।`''मतलब...`` मेरी बात पूरी नहीं होने दी उन्होंने।

''और क्या! सवा लाख मांग रहे हैं।``

''बुरी बात है।``

''सो तो है ही।``

वे सर्वानुमति के बाद भी बेचैन से थे। मुझे लगा उनकी बेचैनी गहरी है। कुछ तो करना ही होगा। मैंने उन्हें कॉफी का आमंत्रण दे डाला।

''हद है।``

''सो तो है ही।``

''हां।``

हम घर के दालान में पहुंच गए थे।

''सोचिए...``

उन्होंने एक ही शब्द बोला. स्वाभाविक है वे और भी कहना चाहते थे। शब्द नहीं मिल रहे थे।

''वही तो... स्वगत में उन्होंने कहा।

मैं अभी भी चुप रहा। पता था वे खुद ही बोलेंगे। सदा उपदेश देने वाला आदमी समाज की इस विकृत मानसिकता पर भला चुप क्यों रहेगा। उनके सारे मूल्यों का हनन हो रहा था। वे तो दहेज प्रथा, बालक-बालिका विवाह के घोर विरोधी थे। उनके भाषण अकसर मुझे हीनता का बोध कराते थे।

''आप तो कुछ बोल ही नहीं रहे हैं।`` उन्होंने मुझे कोंचते हुए कहा।

''क्या बोलूं। दुनिया ऐसी ही है।`` मैंने विह्वल होते हुए कहा।

''अरे नहीं सब ऐसे नहीं हैं। मैं उनमें नहीं हूं जो हाथ पर हाथ धरे हार मान लें।``

''सो तो है।``

''क्या आप भी! सो तो है, सो तो है की रट लगाए हुए हैं।``

''सो तो है। ओह, पता ही नहीं चला। ....मैं आपके बारे में ही सोच रहा था।``

''वही तो! मैं भी सोच से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं। कहां से लाऊं इतने पैसे।``

''देखिए आपके सिद्घांत बहुत ऊंचे हैं। मुझे पता है आप उनसे समझौता नहीं कर सकते। लेकिन कोई मार्ग तो निकालना ही होगा।`` मैंने दिखावे के लिए नहीं कहा था। मुझे सचमुच चिंता होने लगी थी। मेरी बेटी भी अब सयानी हो चली थी।

''सो तो है।`` इस बार उन्होंने कहा।

मैं चौंक पड़ा। उनके पास शब्द चुक रहे थे।

हम मोढ़े पर बैठ गए। अनचाहे ही इधर-उधर की कुछ बातें होने लगी। वे बेचैन थे।

घुमा-फिरा कर बात वहीं आ गई जिससे उनका जी भटकाने के लिए कॉफी का व्यापार जोड़ा जा रहा था।

''आप ही बताइए। क्या यह अच्छी बात है।``

''कौन सी बात।``

उनको बेचैन देखकर जो कुछ अनजानी सी खुशी हो रही थी उसके वश मैं भूल ही गया कि वे कुछ और भी कहना चाहते हैं।

अब मुझे समझ में आने लगा था। दुनिया के हर विषय पर जो वे कहते रहे हैं वह झूठ है या सच, छद्म है या वास्तविकता, उसमें वह हमेशा साफगो रहे थे। आज वे दुविधा में थे। आज वह अपने बारे में बात कर रहे थे। हर आदमी के जीवन के अंतर्विरोधी पक्ष होते हैं। पर अपनी हीनता के बोध ने मुझे उनके भीतर भी अंतर्विरोध हो सकते हैं इस आशंका से भी हीन कर दिया था। उन्हीं का चमत्कार था ये भी।

बहरहाल, जैसे ही मैंने कहा ''कौन सी बात``, उनकी गर्दन अनायास ही मेरी ओर घूम गयी। मेरा अपराध अक्षम्य था।

''आपको क्या गरज है। कोई चाहे मरे चाहे जिए। आप तो सदा घरघुस्सू रहे हैं। कभी दुनिया देखी है आपने। कितनी परेशानियां हैं। जैसे-तैसे आदमी पैसे जमा करता है। कहां-कहां से पैसे नहीं जमा किए मैंने। आपने जिंदगी में किया क्या है। यहां लोगों की कितनी मदद करता हूं। आपको क्या पता। आप तो बस मौन रमाइए। पारसाल लड़के की शादी की थी। जो पैसे मिले थे उन्हीं को जोड़ रहा था। स्नातक उद्यमी योजना में कॉलेज के लड़कों को लाइसेंस दिलाया था। कोई सेठ ले जाता तो आप मुझे गाली देते। उसके थोड़े से पैसे मिले थे। इन सबको मिलाकर लड़के के लिए मकान खरीदना था। ऊपर से घर के खर्चे हैं, दुनियादारी है। अब यह सारा पैसा मैं दहेज में दे दूं! मैं कायर नहीं हूं कि सिद्घांतों का यूं गला घोंट दूं।``

उन्होंने शाप देते हुए कहा ''जान लीजिए, मैं दहेज प्रथा और अपव्यय का घोर विरोधी हूं।``

इन तीखे वचनों को सुनकर मेरी किशोर बेटी बाहर आ गई। उसे लगा झगड़ा हो गया है।

''क्या हुआ पिताजी?``

''कुछ नहीं बेटा, यह सिद्घांतों की बात है। वीरों का जीवन ऐसा ही होता है।``

तब तक राधेश्यामजी तनतनाते हुए सैंडल की बद्दी खींचते दालान के पार जा चुके थे।

दस-बारह दिन बाद पान वाले ने समाचार दिया ''आदमी हो तो राधेश्यामजी जैसा। दमदार और खरलड़की की शादी में पूरे एक लाख एक हजार दिए हैं। वो भी मांगने पर। आदमी हो तो ऐसा हिम्मती और जबान का पक्का! है कि नहीं।``

''सो तो है।`` मैंने पान लिया, ढाई रुपए थमाए और घर की ओर चल दिया। मुझे घर जाकर बेटी को भारतीय संस्कृति का अध्याय पढ़ाना था। मेरे पास लाख रुपए नहीं थे।

(11-2-07)



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छः व्यंग्य रचनाएं

- वीरेन्द्र जैन


1 क्या फेंकूं क्या जोड़ रखूं ?

हरिवंशराय बच्चन, जिनकी कीर्ति पताका अब उनके काब्य संसार से अधिक एक स्टार कलाकार के पिता होने के कारण फड़फड़ा रही है, ने अपनी आत्म कथा का शीर्षक दिया है - क्या भूलूं क्या याद करूं। उनकी इस मन:स्थिति की कल्पना हम प्रतिवर्ष दीवाली पूर्व किये जाने वाले सफाई अभियान के दौरान करते हैं। नई आर्थिक नीति का सांप हमारे घर में ऐसा घुस गया है कि हम जीवन मरण के झूले में लगातार झूल रहे हैं। नई आर्थिक नीतियों के अनुसार हमने न केवल अपने दरवाजे खोले अपितु खिडकियों रोशनदानों सहित चौखटें भी निकाल कर फैंक दीं जिससे दुनिया का बाजार दनादन घुसा चला आया और हमें आदमी से ग्राहक बना डाला । अब हमारा केवल एक काम रह गया है कि कमाना और खरीदना । बाजार से गुजरने पर इतनी लुभावनी वस्तुएं नजर आती हैं कि मैं उन्हें खरीदने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। उपयोग हो या ना हो पर खरीदने का आनन्द भी तो अपना महत्व रखता है- सोचो तो ऊंचा सोचो।

इन नयी नयी सामग्रियों की पैकिंग का तो क्या कहना। बहुरंगी ग्लेजी गत्ते का मजबूत डिब्बा उसके अन्दर थर्मोकाल के सांचे में सुरक्षित रूप से फिट किया गया सामान इतना सम्हाल के रखा गया होता है जैसे कोई मां गर्भ में अपने बच्चे को रखती है भले ही जन्म के बाद वह कुपुत्र निकले पर माता कुमाता नहीं होती है। कई बार तो मन करता है कि सामान फैंक दिया जाये पर डिब्बा सम्भाल कर रख लिया जाये ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पर काम आवे। दीवाली का आगमन ऐसे सामान के प्रति बड़ी कड़ी प्रतीक्षा की घड़ी होती है। छोटे छोटे फ्लेट इन डिब्बों से पूरे भर जाते हैं। दीवाली पर इन्हें बाहर निकाला जाता है पोंछा जाता है और सोचा जाता है कि रखूं या फैकूं। क्या भूलूं क्या याद करूं की तरह असमंजस रहता है। वैसे आजकल यूज एण्ड थ्रो का जमाना है पर हम हिन्दुस्थानी मध्यम वर्गीय लोगों से फेंका कुछ नहीं जाता। हमारे यहाँ ऐसे डाटपैन सैकड़ों की संख्या में मिल जायेगे जिनकी रिफिल खत्म हो गयी है। और रिफिल बदलने वाली बनावट नहीं है, पर पड़े हैं तो पड़े हैं। न किसी काम के हैं और ना ही फेंके जाते है। ढेरों किताबें है जिनकों पढ़ने का कभी समय नहीं मिला पर रद्दी में बेचने की हिम्मत नहीं होती। अंग्रेजों के समय में लोग जेल जाया करते थे, जहां उन्हें लिखने और पढ़ने का समय मिल जाता था पर आजकल के जेलों में जगह ही खाली नहीं रहती कि पढ़ने लिखने वालों को अवसर दिया जा सके। इसलिए किताब बिना पढ़ी रह जाती हैं। पुराना ब्लैक एण्ड व्हाइट टीवी क़ो कोई पांच सौ रूपये में भी नहीं खरीदना चाहता है जबकि इतना पैसा तो उसे शोरूम से घर लाने और पड़ोसियों को मिठाई खिलाने में ही लग गया था। अगर कुछ वर्ष और रह गया तो उल्टे पांच सौ रूपया देकर ही उठवाना पड़ेगा। पुराने जूते, खराब हो गयी टार्च, कपड़े के फटने से बेकार हो गये छाते, बच्चे की साइकिल गुमी हुई चाबियों वाले ताले, सेमिनारों में मिलें फोल्डर और स्मारिकाएं, बरातों में मिले गिफ्ट आइटम, जो न केवल दाम में कम है अपितु जिनके काम में भी दम नहीं है। बिल्कुल वही हाल है कि -

चन्द तस्वीरे-बुतां, चन्द हसीनां के खतूत

बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला

रद्दीवाला तक कह देता है कि छोटे छोटे कागज अलग कर लीजिए इनका हमारे यहां कोई काम नहीं है। ये इकट्ठे होते रहते है तथा मरने के बाद ही बाहर निकलते हैं (वैसे सामान तो कुछ और भी निकला होगा पर एक शेर में आखिर कितना सामान आ सकता हैं। )

इन सामानों का क्या करूं ? प्लास्टिक के आधार पर पीतल जैसी धातु के चमकीले स्मृति चिन्ह दर्जनों रखे हैं। कई स्मृति चिन्हों की तो स्मृतियों ही खो गयी है कि ये कब किसके द्वारा क्यों मिला था। अगर इन्हें बेचने जायेगे तो खरीददार समझेगा कि बाबूजी ने शायद जुआ या सट्टा खेल लिया है जो अब स्मृति चिन्हों को बेचने की नौबत आ गयी है। ऐसी दशा में वह इतने कम दाम लगायेगा कि अपमान के कई और घूंट बिना चखने के पीने पड़ जायेगे। वे केवल इस उपयोग के रह गये है कि गाहे बगाहे इनकी धूल पोंछते रहो। कई बार अतिथियों को दिखाने की फूहड कोशिश की तो वे बोले कि हमारे घर तो आपके यहाँ से दुगने पड़े हैं और दुगनी धूल खा रहे है।

एक जमाना तो ऐसा था प्लास्टिक की पन्नियों को भी सम्हाल के रखा जाता था। जो दुकानदार इन पन्नियों मं सामान बेचता था उसकी बिक्री बढ़ जाती थी। अब यही पन्नियां, पत्नियों की तरह आफत की पुड़ियां बन गयी है। कई फोटो एलबम है जिनमें बचपन से लेकर पचपन तक के चित्र डार्विन के विकासवाद की पुस्तक - बन्दर से आदमी बनने की विकास यात्रा की तरह सजे हुऐ हैं। निधड़ नंग धड़ंग स्वरूप में नहलायें जाने से लेकर सिर के गंजे होने तक के चित्रों की गैलरी सजी है। कभी लगता था कि वह दिन भी आयेगा जब लोग अखबार के पन्नों पर इनकी झांकी सजायेंगे पर अब इस शेख चिल्लीपन पर खुद ही हंसी आती है। इन्हें फेंकने का जो काम भविष्य में कोई और करेगा वही काम खुद करने में हाथ कांपते है।

धूल उड़ाने के लिए खरीदा गया वैक्यूम क्लीनर खुद ही धूल खा रहा है। कई तरह के वाइपर जिन पर खुद ही पोंछा लगाने की जरूरत महसूस होती है। मकड़ी छुडाने वाले झाडू पर मकड़ी के जाले लग गये हैं। बाथरूम में फ्रैशनर की केवल डिब्बियॉ टंगी रह गयी हैं। फ्रैशनर की टिकिया खरीदते समय वह फालतू खर्च की तरह लगती है पर डिब्बी फैंकी नहीं जाती। मेलों, ठेलों से खरीदे गये कई तरह के अचार मुरब्बे चटनियों और चूरन इस प्रतीक्षा में है कि कब खराब होकर सड़ने लगें तब फैके जावें।

जिस तरह आत्मा शरीर को नहीं छोडना चाहती बिल्कुल उसी तरह बेकार हो गयी सामग्रियॉ छूटती नहीं हैं। कहना ही पड़ेगा- क्या फेकूं ? क्या जोड़ रखूं ?

2 बच्चे और गड्ढे

जैसे यह तय करना मुश्किल है कि मुर्गी पहले आयी या अण्डा उसी तरह यह तय करना भी कठिन है कि गड्ढों में गिराने के लिए बच्चे पैदा किए जाते हैं या पैदा हो गये बच्चे को गिराने के लिए गड्ढे खोदे जाते हैं । बहरहाल कुछ भी हो पर जो परिणाम मुर्गी और अण्डों का होता है वही आजकल बच्चों और गड्ढों का होने लगा है। महीने में कोई सप्ताह ऐसा नहीं होता जिसमें कोई बच्चा किसी गड्ढे में गिर गर राष्ट्रीय समाचार न बनता हों। राष्ट्रीय समाचार बनने को व्याकुल कई नेता और कवि तो गड्ढों के आस पास ही घूमते पाये गये है। ताकि किसी तरह राष्ट्रीय समाचारों का हिस्सा बन सकें। पर यह गड्ढों की संकीर्णता ही रही कि उन्होने इन मोटी अकल वालों को अपने अन्तर में नहीं समेटा। वे बेचारे हत्या में फंसे रिश्वत में फंसे, सवाल पूछने में फंसे, सांसद निधि के दान में फंसे, कबूतरबाजी में फंसे, डकैती, चोरी, अपहरण, मारपीट, साम्प्रदायिक बलवों में फंसे, पर गड्ढों में नहीं फंस पाये।

गड्ढों में बच्चे ही फंसे।

लोग बच्चे दर बच्चे पैदा करते रहे और योजनाएं बनाते रहे, इसे डाक्टर बनायेंगे, इसे इंजीनियर बनाएंगे, इसे वकील बनाएंगे और इस चौथे वाले को गड्ढे में फंसने के लिए छोड़ देंगे। अगर सचमुच फंस गया और कुछ चैनलों की टीआरपी बढ़वा दी तो हो सकता है यह डाक्टरों, इंजीनियरों व वकीलों से कई गुना कमाई बचपन में ही करके गड्ढे से बाहर निकले। सरकार ने भले ही बालश्रम के खिलाफ कानून बना कर मुक्ति पा ली हो और होटलों, ढ़ाबों, मोबाईल मैकेनिकों की दुकानों पर काम करने वालों को काम से छुड़ा कर भूखा मरने के लिए छोड़ दिया हो पर गड्ढे तो खुले छोड़ रखे हैं। अगर कोई काम नहीं है तो गड्ढों में ही गिर लो- चौबीस घंटे समाचार देने वाले चैनलों को कुछ काम ही मिलेगा। गड्ढे में कैमरा डाल कर वे इस छोटे सद्दाम की डैथ का लाइव टेलीकास्ट दिखाते रहेंगे।

ईसा मसीह ने कहा था कि स्वर्ग के दरवाजे उनके लिए खुलें है। जिनके ह्रदय बच्चों की तरह हैं पर यह मामला उन बड़े बूढों के लिए है जो अपनी लम्बी उम्र के बाद भी अपना ह्रदय बच्चों की तरह रख सकें। जो अभी बच्चे ही हैं उनके लिए स्वर्ग के दरवाजे खोलने के लिए हमें कुछ करना होता है सों हमने गड्ढे खोद रखे है। हमारे गॉव देहात, बिलियर्ड की टेबिल जैसे हो गये हैं जिसके चारों कोनों पर गड्ढे हैं जिनमें हम गोल गोल रंगीन गेंदों जैसे बच्चों को गिराने के लिए ठेलते रहते है।

जो बच्चे ऐसे गड्ढों में गिरने से बच जातें उनके लिए बड़ी बड़ी कोठियॉ बनवा ही जाती हैं जो निठारी गॉव जैसे बच्चों को बुला बुला कर गड्ढों में दबाते रहते हैं लगता है नालों पर सरकार इसीलिए अतिक्रमण कराती रहती है और नालों की सफाई नहीं करवाती। कुछ राज्य सरकारें पाठ्यक्रम बदलवा रही हैं और हो सकता है कि अगले पाठ्यक्रम में गणित के परचों में कुछ ऐसे सवाल हों-

' यदि एक नाले की सफाई से बीच बच्चों के कंकाल निकल सकते हैं तो पूरे नोएडा के नालों की सफाई कराने पर कितने बच्चों के कंकाल निकलेंगे? नोएडा में कुल कितने नाले हैं यह वहाँ के निगम वालों को भी पता नहीं है।

नगर निगम अपनी आय में वृद्वि करने के लिए मेडिकल कालेजों को नरकंकाल सप्लाई करने के ठेके ले सकती है। बस उसे नालों की नियमित सफाई करानी पड़ेगी। पर ऐसा कराने पर चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छर और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की दवाएं बिकवाने वाले झोलाछाप डाक्टर नाराज हो सकते हैं।

3 करारोपण की संभावनाएं

वित्त मंत्री चिदम्बरम ने अपने बहुआयामी बजट प्रस्तावों से भले ही सबको चारों खाने चित कर दिया हो पर कुछ ऐसे भी छूट गये हैं जिनको टेक्स के दायरे में लाना चाहिए था। देर आयद दुरस्त आमद के फार्मूले का प्रयोग करते हुए निकट भविष्य में वे अपनी भूल सुधार सकते हैं। मैं यहाँ सूची दे रहा हूँ ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत पर काम आवे।

डंक शल्यक्रिया कर अर्थात स्टिंग आपरेशन टेक्स:- यह कर प्रत्येक स्टिंग आपरेशन करने वाले पत्रकार पर ठोका जा सकता है। आजकल डंक विहीन पत्रकारों को कोई नहीं पूछता इसलिए सारे पत्रकार हिडन कैमरा लिए हुये डंक उठाये घूम रहें है। ऐसे प्रत्येक पत्रकार पर टेक्स लगाया जा सकता है तथा स्टिंग आपरेशन करने के बाद उस कार्यवाही को न दिखाये जाने पर दुहरा कर लगाया जा सकता है।

वाहन पर प्रेस लिखवाने का कर:- इन दिनों प्रेस लिखे वाहनों की संख्या 'पुलिस' लिख वाहनों से पचास गुनी अधिक हो गयी है इसलिए इन वाहनों के मालिकों पर प्रेस पर लगा कर प्रेसर बनाया जा सकता है। जिस ट्रक के पीछे कोई शेर न लिखा हो उसका चालान काट कर राजस्व में वृद्वि की जा सकती है।

संसद निधि जारी करने पर कर:-जो जनप्रतिनिधि अपनी सांसद निधि से सार्वजनिक कार्य के लिए स्वीकृति देते हैं उनके द्वारा स्वीकृत की गयी राशि पर कर लगाया जा सकता है। जो उचित समय तक अपनी राशि खर्च न कर पाते हों उन पर ' उपयोग न होने का कर ' लगाया जा सकता है।

सवाल पूछने का कर:- संसद में पूछे गये सवालों पर बाजार भाव से करारोपण लगाया जा सकता है। सार्वजनिक हित और व्यक्ति विशेष हित में पूछे गये प्रश्नों पर कर की दरें भिन्न भिन्न हो सकती हैं। सवाल लगाकर सदन में उपस्थित न होने वाले सदस्यों से दोहरी दर पर कर लगाया जा सकता है।

थाना विशेष पद स्थापना कर:- जिस तरह क्षेत्र विशेष में विशेष भत्ते दिये जाते है उसी तरह कर भी लगाये जा सकते हैं क्रीमी लेयर वाले मलाईदार थानों में पदस्थापना कराने वाले पुलिस कर्मियों पर वेतन से चार गुना कर लगाया जा सकता है तथा सूखे थानों को सूखा राहत दी जा सकती है।

आरटीओ पद स्थापना कर:- पुलिस कर्मियों की ट्रैफिक में डियूटी लगने पर विशेष कर लगाया जा सकता है जहाँ गाड़ियों धुऑ नहीं धन उगलती हैं। इसमें भी अगर नाकों पर डयूटी है तो कर्मचारी नाक वाला हो जाता है इसलिए उस पर विशेष उपकर लगाया जा सकता है।

गवाही से मुकरने पर कर:- जो गवाह पुलिस से डर कर गवाहों में नाम लिखा लेते है और आरोपी से कर अदालत में मुकर जाते हैं उन पर 'डर कर' लगाया जा सकता है। जो गवाह प्रकरण चलने के जितने दिन बाद मुकरता है उस पर उस कर का दण्डात्मक ब्याज वसूला जा सकता है।

सन्देह का लाभ मिलने पर कर:- जब हर तरह के लाभों पर कर लगाया जा सकता है तो सन्देह के लाभ पर कर क्यों नहीं लगाया जाना चाहिए जबकि इस तरह से लाभान्वित होने वालों की संख्या में होती है।

मुकदमें की तारीख बढ़ने पर कर:- यह कर मुकदमें के आरोपियों पर लगाया जा सकता है। इससे आरोपियों को जेल से बाहर रहने व अपना धंधा करते रहने के अवसर मिलते हैं इस लाभ को कर के दायरे में लाया जा सकता है।

एनकाउन्टर पर कर:- अपराधियों को अदालत से छूट जाने से बचाने के लिए उसे इस भव बन्धन से छुड़ा देने वाले एनकाउन्टर विशेषज्ञों को करके दायरे में लाया जा सकता है।

टेलीफोन टेप न होने पर कर- जो लोग टेलीफोन धारक हैं वे रसमयी बातें करके अपनी आरती उतरवा सकते हैं। इस अवसर पर यदि उनके टेलीफोन टेप न होने की सुविधा पर कर लगाया जा सकता है।

मेरे पिटारे में अभी बहुत सारे उपाय और शेष हैं पर डर यह है कि बिना मांगी सलाह देने पर यदि कर लग दिया गया तो मैं परेशानी में आ सकता हूँ इसलिए अभी इतना ही।

4 कम कपड़ों की क्रान्ति

लोगों के चेहरे मुस्कराते है पर राम भरोसे जब दूर की कौड़ी लाता है तो उसकी चाल तक मुस्काराने लगती है। आज जब वह इसी चाल से आता दिखा तो मुझे लगा कि उसके दिमाग की पाकिट में जरूर कोई खास माल भर चुका है। आते ही उसने पूछा कि राष्ट्रीय सम्मान कौन कौन से हैं। मैंने अपने ज्ञान की सीमा के अनुसार बता दिये। फिर उसने पूछा कि इनमें सर्वोच्च कौन सा है। मैंने वह भी बता दिया और पूछ लिया कि उसे कौन सा मिलने जा रहा है। इस पर वह आंखे तरेरता हुआ बोला कि वह उन अभिनेत्रियों को दिलाने की सिफारिश करने जा रहा है जो कम से कम वस्त्र पहिन कर देश का भला करने में जुटी है।

' तुम अपने भले को देश का भला बताने वाली नेताओं जैसी चालाकी क्यों कर

रहे हों ? मेरा सवाल था।

' मैं देश से कम वाले स्तर पर कभी सोचता ही नहीं हूँ ' उसने मुझे न लिखने

लायक गाली देते हुए कहा।

' कम वस्त्रों की अप-संस्कृति में देश का कौन सा भला है ? मैंने भी उसी तेवर

से पूछा।

' नये नेय विचार बुद्विजीवियों को ही आते है। उसने कहाँ फिर बोला - देखो पहला लाभ तो यह है कि कम कपड़ों से देश में कपड़ों की बचत होती है। जब सात मीटर कपड़ों की जगह सत्तर सेंटीमीटर से काम चल सकता हो तो ' सारी विच नारी है। कि नारी बिच सारी हैं ' वाली गुत्थी में क्यो उलझा जायें। कम कपड़ों से गहने पहनने की जरूरत नहीं पड़ती और नारी यथावत आकर्षक बनी रहती है। गहने नहीं पहिनने से चैन खींच ले जाने का खतरा नहीं रहता इसलिए अपराधों में कमी आती है जिससे सरकार की छवि सुधरती है। कम वस्त्र पहिनने वाली नारी को अधिक सौन्दर्य प्रसाधनों के उपयोग बौर ब्यूटी पार्लरों में जाने की बारम्बारता से छुटकारा मिल जाता है। क्योंकि लोग उसके चेहरे की ओर कम ही देखते हैं। शरीर में धूप हवा लगते रहने से उसका प्राकृतिक विकास होता है। रोग कूप स्वस्थ और स्वच्छ रखने के प्रति प्रेरणा मिलती है। हमारी पम्पराएं भी इतनी बहु आयामी है कि हम अपनी सुविधानुसार उन्हें चुन कर अपने को परम्परा से जुड़ा हुआ बतला सकते हैं। अपने पौराणिक नायकों का उदाहरण देते हुऐ कलैन्डरों में छपे उनके फोटो दिखा सकते हैं तथा अपनी संस्कृति रक्षा वाली आर्दश बातें कर सकते है।

कम कपड़ों वाले समाज में अश्लील फिल्में और पीत पत्रकारिता पिट जाती है क्योंकि छलिया बनाने वाले माध्यम साक्षात संजीव के आगे कैसे टिक सकते हैं। कम वस्त्रों से नारियों को मिलने वाले प्रेम प्रस्तावों से मुक्ति दिला सकती है। कम कपड़े अपरिग्रह की ओर अग्रसर करते दिखते हैं व इस तरह धार्मिक संदेश देते हैं।

अभिनेत्रियॉ अफसोस करती होंगी कि उनके परमपिता परमात्मा ने देह को इतनी छोटी क्यों बनाया कि उसके उधारडने की सीमाएं जल्दी ही समाप्त हो जाती हैं और तरह तरह से उखाडनें के बाद समझ में नहीं आता कि अब कैसे कहाँ से उधाड़ा जायें पिंडलियॉ, जॉघें, पेट, पीठ, नाभि गरदन, बाहुए, सीना आदि के बाद ऐसा क्षेत्र नहीं बचता जिसे दिखाया जा सके। शरीर का क्षेत्रफल विशाल होता तो बहुत मदद मिलती है।

व्यक्तित्व विकास में भी कम वस्त्रों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। बड़ी दाढ़ी रखने वाले टेनिस खिलाड़ी की स्कर्ट ही नापत रहते हैं और वह टेनिस की गेंद उनके मुंह पर मारती रहती है। स्कर्ट नापने के चक्कर में वे बेचारे खेल ही नहीं देख पाते। घूघंट और बुर्के में रहकर टेनिस नहीं खेली जा सकती।

कपड़ों की केचुली को उतार फेंकने वाले लोग ही सच्चे स्वंत्रत लोग हैं जो चादरें उतार कर ज्यों की त्यों रखते जा रहें हैं। उन्हें पुरूस्कृत और सम्मानित किया जाना जरूरी है।' कहते कहते राम भरोसे के चेहरे पर चमक आ गयी थी।

5 झूठ बोलती प्रार्थनाएं

भक्त आरती गा रहा है-

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा

अन्धन खो आंख देत, कोढिन को काया

बांझन खों पुत्र देत निर्धन को माया।

ऐसा लगता है जैसे गणेश जी ने आरती लिखने के लिए किसी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र लिखने वाले को अनुबंधित करा दिया हो और वह लिख रहा हो कि प्रतिवर्ष एक करोड़ लोगों को रोजगार दिया जायेगा तथा प्रत्येक गांव में पीने को पानी की सुचारू व्यवस्था की जावेगी, सारे गांवों को सड़कों से जोड़ने में करोडों रूपये लगाये जायेगें व उन पर प्रधानमंत्री के फोटो सहित होर्डिग लगाये जायेगे, विकलांगों को आरक्षित कोटे का बैकलाग भरा जायेगा आदि। यनि जिसके पास जो कमी है वह पूरी किये जाने का लालच जगा के वोट झटक लो।

मैं एक अंधे को पिछले इस वर्ष से गणेश उत्सव में यही आरती गाते देख रहा हूँ पर आंख की तो छोडिये उसकी घड़ी तक कोई चुरा कर ले गया पर उसने गाना नहीं छोड़ा कि अन्धन खो आंख देत । गणेश जी यदि कोढ़ियों को काया देना शुरू कर दें तो बहुत उत्तम होगा वैसे मुझे या मेरे आस पास के किसी व्यक्ति को ऐसी कोई शिकायत नहीं है पर मेरा एक दुश्मन ' एमड़ीटी ख़ाओं कुष्ठ मिटाओ करता हुआ कुष्ठ निवारण मिशन में नौकरी पर लग गया है और गणेश जी कोढिन को काया दे दे तो उसकी नौकरी से छुट्टी हो जायेगी। पर असल में ऐसा होता नहीं है कई बार तो आरती गाने वालों को कुष्ठ होते तो देखा है पर आरती गा कर काया पाता हुआ कोई कोढ़ी नहीं मिला।

यदि लढुअन कौ भोग लगाने के बाद संत सेवा करते रहें तो अंधन खों आंख देने की फुरसत किसे मिलेगी और क्या मिलनी चाहिए। पत्नी पैर दबाती रहे तो आदमी को भी शेष नाग पर लेट हुये नींद आ जाये, देवताओं की तो बात ही और है। हमारे देवता वैसे भी सोने के लिए मशहूर हैं और मूर्ख जानता समझती है कि वे समाधि में हैं जिसमें केवल मुद्रा का फर्क होता है। चिड़िया तो पेड़ पै बैठे बैठे सो लेती है और घोड़ा खड़े सो लेता है पर उसे तो हम नहीं कहते कि वह समाधि में हैं। श्रद्वा ऐसी ही चीज होती है जो भोजन को भोग में और सोने को समाधि का सम्मान प्रदान करती है। वर्षाऋतृ में देवता सोते हैं तो फिर वर्षा बाद ही उठते हैं और उनके उठने वाले दिन देवोत्थान एकादशी का त्यौहार मनाया जाता है। जिन्हें रोज सुबह सुबह उठ कर काम पर जाना पड़ता है उनके लिए तो रोज ही एकादशी होती है। लम्बे सोने की सुविधा देवताओं को ही प्राप्त है।

वैसे तो मेरे मुहल्ले में कई गोबर गणेश मिल जाते हैं। मैं उनकी बात नहीं करता पर मुझे लगता है कि देवताओं में भी एकाधिक गणेश हुऐ हैं। शायद यही करण है उनकी अलग पहचान बताने के लिए आरती गाने वालों ने आरती में ही उनकी बल्दियत बताना जरूरी समझा है। वह कहता है कि - माता जा की पारवती, पिता महादेवा - अर्थात आप किसी दूसरे गणेश की जय मत करने लग जाना।

प्रार्थनाओं में अपने आराध्य की अतिरंजित स्तुति ही काफी नहीं होती अपितु दूसरे देवताओं की छवि खराब करना भी जरूरी समझा जाता है। कांग्रेस और भाजपा में भले ही एक ही पार्टी के सदस्य रहते हों पर गुट और नेता तो अलग अलग होते हैं। हर गुट के सदस्य को अपने नेता की प्रशंसा और दूसरे गुट के नेता की निन्दा अनिवार्य होती है। तुलसीदास ने भी ज्ञान गुण सागर हनुमान जी की हनुमान चालीसा में स्तुति करते हुऐ दूसरे देवताओं की छवि भी अंकित करने की कोशिश की है। वे कहते है कि:-

और देवता चिन्त न घरई

हनुमत वीर सदा सुख करई

अर्थात नेताओं की तरह दूसरे देवता तो ध्यान नहीं देते पर हनुमत वीर सदा ही सुख करते हैं। रामचरित्र मानस को स्वान्त: सुखाय घोषित करने वाले तुलसीदास अपनी पुस्तक की विशेषताएं बताते हुए कहते है कि ' जो यह पढ़े हनुमान चालिसा होय सिद्व साकी गौरी सा अर्थात रेपिडैक्स खरीदिये और सौ दिन में अंगेजी सीखिये।

ऐलोपेथी के प्रचार में एक प्रार्थना ने बहुत सहायता की है। मेरे एक एमबीबीएस मित्र अपने क्लीनिक में जय जगदीश हरे की प्रार्थना का चार्ट भी अन्य चार्टो की तरह लटकाये हुऐ है जिनमें शरीर को चीर फाड़ कर भीतरी अंग दर्शाए गये है। जब मैंने उनसे कारण पूछा तो वे बोले यह हमारी प्रचार नीति का मुख्य गीत है जिसमें भक्त जनन के संकट पल में दूर करने वाले हरे जगदीश की स्तुति की गयी है। इस प्रार्थना के कारण भक्त लम्बे समय वाली आयुर्वेदिक या होम्योपैथिक चिकित्सा पद्वति के चक्कर में नहीं फंसता। वह संकट को पल में दूर करने वाली ऐलोपैथी के पास ही दौड़ा चला आता है। वो जमाने लद गये जब भक्त को भरोसा था तथा वह मानता था कि- कबहुं दीन दयाल के भनक परेगी कान। अब तो वो आके कहता है कि डाक्टर साब आप दीन दयाल के कानों में मशीन फिट कर दो ताकि वे जल्दी सुन लिया करें।

मैं अपने सफाई कर्मचारी देवीदयाल को कट्टर जैन मानता हूँ क्योंकि जब शाम को वह नगरपालिका इंसपेक्टर को गाली देता हुआ निकलता है उसी समय मेरी पत्नी एक जैन प्रार्थना का कैसिट लगा कर भजन सुनती है जिसमें कहा गया है कि - मन में हो सो वचन उचरियें, वचन होय सो तन सों करिये। इन्सपेक्टर साहब की मॉ स्वर्गवासी हो चुकी हैं तथा बहिन कोई है नहीं अन्यथा बहुत सम्भव था कि वह वचन को कर्म में परिवर्तित करने की कोशिश करता हुआ सच्चा जैन साबित होता। मैं शाम को बाजार जा रहा होता हूँ तभी जैन भजन का वह भाग बजता है जिसमें कहाँ गयाहै कि ' संसार में विषबेल नारी तज गये योगीश्वरा' तब मैं पत्नी की ओर नहीं देखता।

6 घर से ये सामां निकले

मैं अपना घर देख रहा हूँ- पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण ही क्या दसों दिशाओं से देखना चाह रहा हूँ , पर पाताल दिशा से देखे जाने की सुविधा नहीं है इसलिए नौ दिशाओं से ही देख पा रहा हूँ। यह मेरा घर है कोई बाबरी मस्जिद के ध्वंसावशेषों पर बना मंदिर तो है नहीं कि जापानी तकनीकी द्वारा जो नहीं है उसका भी दृश्य दिखायी दे जाये, जमीन के अन्दर से।

साहित्यकारों पर ही आरोप लगाया जाता रहा है कि वे ऐसे भाव जगत में खोये रहते है कि अपना घर नहीं देखते, पर मैं ऐसी टिप्पणी से सहमत नहीं हूँ। साहित्यकारों ने न केवल अपने घर देखे हैं अपितु प्रमाण स्वरूप घर देखने की घटना से जन्में भावों को अंकित करके टंकित भी करा लिया है। मिर्जा गालिब अगर अपना घर नहीं देखते होते तो कैसे लिखते -

दरो दीवार पर उग आया है सब्जा गालिब

हम बियांवां में हैं और घर में बहार आयी है

हिन्दी के मिर्जा गालिब दुष्यंत कुमार ने भी लिखा है कि '

आज वीरान अपना घर देखा

तो कई बार झांक कर देखा

यदि शायर घर नहीं देखते होते तो यह कैसे लिखते कि-

सारी दुनिया घूम कर आया मगर

मुझको अपना घर बहुत अच्छा लगा।

मुझे तो लगता है कि ' लौट के बुद्धू घर को आये वाली कहावत भी किसी कवि के सम्मान में ही लिखी गयी होगी। इस मान्यता पर तब और भी भरोसा हो गया जब तक भाषा विज्ञानी ने बताया कि बुद्धू शब्द बुद्ध के प्रति द्वेष प्रकट करने की दृष्टि से ही बिगाड़ा गया शब्द है और बुद्धिमान से जुड़ता है।

मैं अपने घर को घूर-घूर कर इसलिए देख रहा हूँ क्योंकि यह मेरा घर होकर भी मेरा घर नहीं है क्योंकि इसकी मिल्कियत के कागज अर्थात रजिस्ट्री मेरे पास नहीं हैं। वह हो भी नहीं सकती क्योंकि ये किराये का घर है और मकान मालिक इसे खाली कराना चाहता है। वह इसलिए खाली नहीं करा रहा है कि मैं उसका कई महीनों का किराया टांग लेता हूँ या लटका देता हूँ और न ही मैं बार-बार मकान को ठीक कराने की शिकायतें किराये के भुगतान के समय करता हूँ अपितु इसलिए खाली कराना चाहता है कि वह मुझसे डर गया है। वैसे मैं कोई गुण्डा, मवाली या निराला की तरह पहलवान नहीं हूँ कि वह मुझसे डरने लगे पर पिछले दिनों कुछ ऐसा घट गया कि वह मुझसे डरने लगा । दरअसल हुआ यह कि मेरे लेखों की पुस्तक एक प्रकाशन ने इसलिए छाप दी क्योंकि उसे अगले महीने होने वाले पुस्तक मेले में भाग लेना था, जिसके लिए बीस- पच्चीस नई पुस्तकें आवश्यक थीं। बड़े-बड़े लेखक गच्चा दे गये सो वो मजबूरी में मेरे चक्कर में फंस गया। आंकड़ा कुछ ऐसा फिट बैठा कि उस पुस्तक पर एक पुरस्कार भी घोषित हो गया। ( बाद में पता लगा कि आंकड़ा प्रकाशक ने फिट करवाया था। ताकि उसकी किताब तो बिक सके )। इस पुरस्कार की घोषणा के बाद दो चार लाल बत्ती की गाड़ी वाले मुझे बधाई देने आये। मकान मालिक पड़ोस में ही रहता था। उसने यह नजारा देखा तो वह डर गया। सोचा होगा कि कैसे आदमी को मकान दिया है यदि कल के दिन इसने खाली करने में आना कानी की तो पहलवान पत्थर सिंह की सेवाएं भी काम नहीं आयेंगी। इसलिए इसे धीरे से खिसकाओ!

एक दिन विनम्र भाव से मेरे पास आया और बोला कविराज एक जरूरी बात करनी है।

' फर्माइये ' मैंने पूछा।

' अब बात तो मेरे घर की है पर बता ही दूं- बात यह है कि मेरी पत्नी और बहू में

अनबन बहुत बढ़ गई है सो सोचता हूँ कि बहू बेटे को अलग ही कर दूॅ॥

' यह तो उचित है' मैंने बिना सोचे समझे निर्णय दिया।

' आप थोड़ी मदद कीजिए'

' आदेश करें ' दूसरे की महिलाओं से गुफ्तगू करने के लोलुप मन ने अपनी सेवाएं प्रस्तुत करने में देर नहीं की।

' आप दूसरा घर देख लें तो इस मकान में उनको शिफ्ट कर दूं'!' उसने असली मंतव्य प्रकट कर दिया। मैं अपनी सलाह पर पछताया - फिर सोचा कि बहाना कुछ भी हो पर बात तो वही आनी थी। सो कहा - ठीक है एक दो महीने का समय दीजिए।

गैर साहित्यिक मित्रों के सहयोग से दूसरा मकान मिल गया है और मुझे मीर का वो शेर याद आ रहा है-

चन्द तस्वीरे बुतां, चन्द हसीनों के खतूत

बाद मरने के मेरे घर से ये सामां निकला

और मैं सोच रहा हूँ कि मेरे इस किराये के घर से मेरा सामान कैसे निकालेगा। दस वर्षों में घर के अन्दर रहते रहते ही सामान इतना फैल गया कि बाहर निकलने में समस्या पैदा कर सकता है। मकान मालिक से दरवाजा तोड़ने के लिए कहूँगा तो वो गुस्सा होकर सामान तोड़ने की सलाह देगा आंगन से छत पर ले जाकर गली में उतारू तो बिजली, टेलीफोन और टी वी क़ेबिल के तार बाधा बनेंगे।

शायर का सामान मरने के बाद ही निकले तो ठीक रहता है। फिर डायनिंग टेबिल, डबलबैड, आलमारी वगैरह कोई 'तस्वीरे-बुतां' या 'चन्द हसीनों के खतूत' तो हैं नहीं कि इधर शायर मरा, और उधर उसका सामान निकला! अब तो मरने के पहले भी सामान निकलने के अवसर आते ही रहते हैं। उनके दीवान ही बिना बिके उनके घर में पड़े रहते है जिन्हें दीमकों से बचाने के लिए बक्सों में भर कर रखना पड़ता है। ऐसे भारी भारी सामान कैसे निकलेंगे।

जहाँ एक ओर शायर को यह खुशी भी रहती है कि इस बहाने से उसके संकलन धूप और उजाला तो देख सकेगे वहीं दूसरी और यथार्थ की चकाचौंध उसे खयालों की दुनिया से वास्तविक धरातल पर ला पटकती है और वह घर को चारों ओर से इस तरह देखने लगता है कि जिन्दा रहते हुऐ यह सामां कैसे निकले ?

मैं भी ऐसे ही देख रहा हूँ।

रचनाकार परिचय व संपर्क


- वीरेन्द्र जैन

पता 21 5 शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड अप्सरा टाकीज के पास भोपाल मप्र 462023

फोन 0755-2602432 मोबाइल 9425674629

शिक्षा विज्ञान स्नातक एवं अर्थशास्त्र में एमए

जन्मतिथि 12 जून 1949

कार्य लेखक, राज्यस्तरीय अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार एवं सामाजिक कार्य करने की दृष्टि से 29 वर्ष पंजाब नैशनल बैंक में अधिकारी पद पर कार्य करने के बाद सन 2000 में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति

मूल निवास पुरानी जेल के पीछे दतिया मप्र 475661

फोन 07522-233212

कार्यस्थल बैंक सेवा में मध्यप्रदेश में हरपालपुर,जबलपुर,दतिया इन्दरगढ घीरपुरा,भोपाल, उत्तरप्रदेश में बैनीगंज, हाथरस, गाजियाबाद, कानपुर, राजस्थान में भरतपुर, आन्ध्रप्रदेश में हैदराबाद, महाराष्ट्र में नागपुर में पदस्थ रहे व बैंक निराक्षक के रूप में उत्तर प्रदेश में मथुरा, लखनउ, बाराबंकी बुदांयु, बिल्सी तथा बिहार में भागलपुर व गया में अल्पकाल रहने व जानने का अवसर मिला। लेखक सम्मेलनों व सेमिनारों में देश भर के प्रमुख स्थलों में जाने का व देखने का मौका मिला।

लेखन सन 1969 से हिन्दी की राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं से लेखन प्रारम्भ किया और प्रमुख रूप से धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, माधुरी, ब्लिट्ज, नवभारत टाइम्स में प्रकाशित होने के कारण देश भर में पहचाने गये। सेवानिवृत्ति के बाद पूरे समय लेखन व पत्रकारिता में जुटने के बाद दैनिक भास्कर, जनसत्ता ,लोकमत समाचार, राष्ट्रीय सहारा, नवभारत, दैनिक जागरण, नईदुनिया,राज्य की नई दुनिया राज ऐक्सप्रैस, आचरण, स्वतंत्रवार्ता, अमर उजाला लोकजतन, लोकलहर, समेत हंस, सम्बोधन, नया ज्ञानोदय, उद्भावना, उत्तरगाथा, सरिता, समग्रदृष्टि, आकंठ, व्यंग्य यात्रा, लफ्ज दक्षिण समाचार,अट्टहास, आलेख संवाद, जनमतस्वर जैसी साहित्यक-वैचारिक पत्रिकाओं समेत हमसमवेत फीचर ऐजेन्सी के माध्यम से जो दो सौ समाचार पत्रों को आलेख भेजती है, द्वाराएक सौ से अधिक आलेख जारी किये गये। इस दौरान सात सौ से अधिक लेख प्रकाशित।

प्रकाशन

व्यंग्य की चार पुस्तकें प्रकाशित 1 एक लुहार की पराग प्रकाशन दिल्ली

2 देखन में छोटे लगें एकता प्रकाशन दतिया

3 हम्माम के बाहर भी आलेख प्रकाशन दिल्ली

4 अस्पताल का उद्घाटन आलेख प्रकाशन दिल्ली

सुप्रसिद्ध हास्यकवि काका हाथरसी के साथ संयुक्त रूप से एक पुस्तक स्टार पाकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित होने के साथ दस से अधिक मानक संकलनों के सहयोगी रचनाकार कई राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ ।

सामाजिक कार्य साक्षरता कार्यक्रमों,समेत भारत ज्ञानविज्ञान समिति,जनवादी लेखकसंघ समेत अनेक गैर सरकारी संगठनों के कार्यों में सहयोग। साम्प्रदायिकता का सक्रिय व मुखर विरोध हेतु अनेक प्रर्दशनों व सेमिनारों में सक्रिय भागीदारी। सम्प्रति जनवादी लेखक संघ भोपाल इकाई के अध्यक्ष पद की जिम्मेवारी।

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चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

- असग़र वजाहत


अनुक्रम यहाँ देखें

19

स्वर्ग के द्वार की ओर

आस्त्रा में पता चला कि शाम चार बजे तबरेज़ के लिए बस मिलेगी। सुबह कमरे से निकला और सोचा आस्त्रा के वे हलके देखे जायें जो अब नहीं देख पाया हूं। फिर ख्याल आया कि क्यों न दाढ़ी बनवा ली जाये। नाई की दुकान पहुंच गया। परिचय देने पर नाई महोदय खुश हो गये। कस्बे के अनुसार दुकान काफ़ी साफ़ आधुनिक और सजी हुई थी। पैसे भी उन्होंने ठीक ही लिए। पचास रुपये यानी दस हज़ार रियाल। फिर सोचा क्यों ने ईरान का एक अच्छा-सा नक्शा ले लिया जाये। एक बुक सेलर की दुकान पर आया। परिचय कराया। उन्होंने एक नक्शा दिखाया। फ़ारसी में था पर ज़ाहिर है शहरों के नाम पढ़ सकता था। ले लिया। दाम पूछे तो दुकानदार महोदय ने शरमाते हुए कहा कि नहीं आपसे पैसे नहीं लूंगा। मेरे तरफ़ से उपहार है। ऐसे मौकों पर मेरी फ़ारसी में अनूदित कहानियों की पुस्तिका काम आती है, मैंने फौरन उसकी एक प्रति निकाल कर उन्हें भेंट कर दी, उनका कार्ड मांगा, अपना दिया और बाहर निकल आया।

आस्त्रा का एक चक्कर लगाया। स्कूलों की नयी और अच्छी इमारतें दिखाई दीं। अस्पताल नज़र पड़े। सड़कें साफ़ और अच्छी हालत में देखी। सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि व्यवस्था है और विकास के कार्यों में पैसा लगाया जा रहा है। अपने देश जैसा हाल नहीं है।

दो बजे आस्त्रा के बस अड्डे पहुंच गया। टिकट लेने की कोशिश की तो पता लगा अभी नहीं मिलेगा। वेटिंग हाल में बैठ गया। पास की बेंचों पर एक मोटे से बूढ़े व्यक्ति से परिचय हुआ। इकराम नाम बताया। मैंने अपने बारे में बताया। कहानियों की पुस्तिका दी। पता चला बूढ़े पहले बस ड्राइवर थे। अब रिटायर हो चुके हैं और तबरेज़ में रहते हैं। मैंने इकराम से पूछा कि तबरेज़ में मैं किसी अच्छे और सस्ते मेहमानपिज़ीर ( मुसाफिरखाने) में ठहरना चाहता हूं। उन्होंने पक्का विश्वास दिलाया कि वे सब कर देंगे। कुछ देर बाद उनकी लड़की सबके लिए जूस खरीदकर लायी और मुझे भी दिया। अब अकरम से ही नहीं उनके परिवार से मेरी बातें होने लगीं। टूटी-फूटी फ़ारसी काम आने लगी। कहीं-कहीं गाड़ी अटक भी जाती थी। उनकी पत्नी ने हाथ की भंगिमा से नृत्य की मुद्रा बताई और कहा कि हिन्दी फिल्मों में नायिकाएँ 'हिजाब' नहीं करतीं और बहुत सुंदर लगती हैं। उन्होंने अपनी सिर पर ओढ़े गये हिजाब पर हाथ लगाकर कहा कि यह उन्हें अच्छा नहीं लगता, पर मजबूरी है। बातें फिल्मों पर होने लगी। उनकी एक लड़की ने पूछा कि भारतीय अभिनेत्रियों के बाल इतने लंबे और खूबसूरत कैसे होते हैं? मैं ज़ाहिर है इस क्षेत्र का जानकार नहीं हूं लेकिन कोई न कोई जवाब तो देना ही था। मैंने कहा यह पानी के प्रभाव के कारण होता है। लड़की पूरी तरह कन्विंस हो गयी। बोली- 'तासीरे आब'। मैंने कहा- 'बेशक' फिर शाहरुख खान वगैरा के बारे में बात होने लगी। सोचा भारत ने और कुछ किया हो या न किया हो लेकिन फिल्म उद्योग के जरिये तो नाम कमाया ही है। आस्त्रा के बाज़ार में भी मैंने हिन्दी फिल्मों की सी.डी. बिकते हुए देखी थीं।

तबरेज़ जाने वाली बस में मेरा चढ़ना या चढ़ाया जाना काफ़ी नाटकीय रहा जो मेरी समझ में नहीं आया। मैं बस जाने से दो घंटे पहले आ गया था और टिकट खरीदना चाहता था पर यह कह कर टिकट नहीं दिया गया कि अभी बहुत जल्दी है। लेकिन जब बस छूटने के दो मिनट पहले मुझे बस पर चढ़ने की अनुमति मिली और वह भी इस तरह जैसे मेरे ऊपर बड़ी मेहरबानी की जा रही हो।

बस पर साथ बैठे एक युवक से परिचय हुआ जो कम्प्यूटर इंजीनियर हैं। बहुत मामूली और थोड़ी-थोड़ी अंग्रेज़ी में दो चार बातें हुई। बस बिल्कुल नयी दिशा में जा रही थी। मुझे यह जानकारी न थी कि तबरेज के रास्ते में सहन्द पहाड़ों की श्रृंखला पड़ेगी। धीरे-धीरे बस पहाड़ों पर चढ़ना शुरू हो गयी। परिदृश्य बदलने लगा। शाम घिर आई थी। पहाड़ लगातार सुंदर होते चले गये। मैं यह देखने और समझने की कोशिश करने लगा कि ये पहाड़ हिमालय से कितना और किस तरह भिन्न हैं। पहली बात जो समझ में आयी वह थी कि इन पहाड़ों का एक लंबा सिलसिला है तथा पहाड़ ऊंचे होते हुए पूरे परिवेश को ढंक नहीं लेते बल्कि दूर-दूर तक साफ़ दिखाई देता है। हमारे यहां पहाड़ी रास्तों पर चलते हुए प्राय: पहाड़ या घाटियां दिखाई पड़ती है लेकिन इन पहाड़ों पर दूर-दूर तक फैले ऊंचे पहाड़ों पर हरी-घास के मैदान नज़र आते हैं। निश्चित रूप से पहाड़ बहुत सुंदर थे। बस तेज़ी से ऊंचाई तय कर रही थी। सड़क के इधर-उधर, जंगलों और घास के मैदानों में पिकनिक मनाने वाले बड़ी तादाद में मौजूद थे और इसी के साथ-साथ प्लास्टिक कचरा भी बिखरा पड़ा था। एक बात और समझ में नहीं आई कि पिकनिक करने वाले प्राय: सड़क के किनारे ही गाड़ियां खड़ी करके बैठ जाते हैं वे कुछ अंदर जंगल के अंदर पहाड़ों के ऊपर क्यों नहीं जाते?

अधिक ऊंचाई पर पहुंचे तो कोहरे के बादल हमारे बिल्कुल पास आ गये। ठण्ड बढ़ गयी और पूरा परिदृश्य फैलता हुआ सा महसूस होने लगा। अंधेरा होते-होते बस पहाड़ की ऊंची चोटियों से नीचे उतरने लगी। अब चारों ओर अंधेरा था निपट अंधेरा. . . यह अंधेरा तब तक रहा जब तक कि दूर तबरेज़ की रौशनियां नहीं दिखाई देने लगी। ऊंचाई से लगता था कि रौशनियों का एक समुद्र है जिसका न ओर है न छोर।

आस्त्रा से फ़ोन-वोन करने के बाद भी तबरेज़ में मेरा कोई ठहरने का इंतिज़ाम नहीं हो पाया था। यानी 'सस्पेंस' था कि कहां ठहरुंगा। सहयात्री ने कुछ आश्वासन दिया था। तबरेज़ के विशाल बस अड्डे पर जब बस रुकी तो मित्र भूतपूर्व बस ड्राइवर इकराम और उनका परिवार लापता हो चुका था। मैं सहयात्री के साथ खड़ा था हैरान और परेशान।

तबरेज़ बस अड्डे के टैक्सी स्टैण्ड पर आये तो वहां क़यामत का सा हिसाब-किताब था। कोई नियम नहीं, कोई कायदा नहीं। एक अनार सौ बीमार. . .काफ़ी देर के बाद मैं सहयात्री और तीन अन्य लोग एक टैक्सी में बैठ गये। सहयात्री ने बताया कि मैं इन लोगों के साथ जो यहां मजदूरी करने आये हैं, किसी मुसाफिरख़ाने में ठहर सकता हूं। एक कमरे में चार लोग रहेंगे तो मुझे कम पैसा देना पड़ेगा। मैं तैयार हो गया। लेकिन होटल वाले ने यह योजना फ़ेल कर दी और कहा कि चूंकि मैं विदेशी हूं इसलिए देशी लोगों के साथ नहीं रह सकता। फिर भी चालीस हज़ार दीनार में कमरा मिला। अब पेट का सवाल पैदा हुआ। साढ़े दस बज रहे थे। नीचे भागा और एक बंद होती दुकान से टिनबंद मछली और रोटी ले आया।

मिथकों और इतिहास का शहर तबरेज़ अपने बुनियादी चरित्र में ईरान के दूसरे शहरों से काफ़ी अलग लगता है। यह 'आज़री' यानी तुर्की और ईरानी सम्मिश्रण से जन्मी संस्कृति का सबसे बड़ा प्रतीक है। शहर ने अपनी सांस्कृतिक अस्मिता बचाए रखने के लिए कई संघर्ष किए हैं और एक अर्थ में यह आज भी जारी है। यही वजह है कि मेरे मित्र ने आस्त्रा से जब तबरेज़ के होटलों में फ़ोन किए थे तो वहां से उत्तर फ़ारसी में नहीं अज़री भाषा में मिले थे। यह शहर भाषाई और सांस्कृतिक संघर्ष के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई में भी आगे रहा है। 18वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में संवैधानिक क्रांति का जन्म भी तबरेज़ में ही हुआ था। इस शहर ने ईरानी शासकों के दमन के साथ-साथ रूस की ज़ारशाही के दमन-चक्र को भी झेला है। अपनी स्थापत्य कला और सौंदर्य शास्त्रीय मानदण्डों के अनुसार भी तबरेज का अपना अलग चरित्र है।

होटल से मैं सुबह तड़के ही निकल पड़ा। पुराने शहर को चारों तरफ़ से नये शहर ने घेर रखा है। आज तबरेज़ ईरानी के बड़े औद्योगिक शहरों में गिना जाता है लेकिन मैं तो शहर के उस हिस्से को ही देखना चाहता था जो प्राचीन है। सड़कों पर घूमते हुए चौराहों के करीब उन मज़दूरों की भारी भीड़ दिखाई पड़ी जो दिहाड़ी की तलाश में आये हुए थे। ऐसी भीड़ दूसरे शहरों में नहीं देखी थी। लगा कि आर्थिक रूप से प्रगति करने के बाद भी तबरेज़ में रोज़गार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

सुबह का वक्त होने की वजह से ज्यादातर दुकानें बंद थीं। मुझे कैमरे के फिल्म रोल चाहिए था। सोचा जब तक दुकानें नहीं खुलती तब तक कोई ऐतिहासिक इमारत देखी जाये। तबरेज़ की नीली मस्जिद ;1465 ई. बहुत प्रसिद्ध है। वहां पहुंचा तो देखा एक नयी तरह का खूबसूरत पार्क है जिसमें छोटे-बड़े गोल दर बनाये गये हैं और बीच में बारहवीं शताब्दी के अज़री कवि शिरवानी ख़ाक़ानी की बड़ी सी प्रतिमा लगी हुई है। उसके पीछे एक गोल गुम्बद दिखाई पड़ा जिस पर फिदा हो गया। जो लोग रेखाओं और आकारों के मर्म को समझते हैं वे अच्छी तरह पहचान लेते हैं कि आकार की सुंदरता क्या है। दरअसल आकार की सुंदरता केवल आकार पर ही नहीं बल्कि उसके संतुलन पर निर्भर होती है। आकार अपने 'प्रोपोशन' में कुछ सम्प्रेषित करता है। आकार में छोटा-सा परिवर्तन मतलब किसी विशेष दिशा या भाग पर दिया जाने वाला बल पूरी परिकल्पना को प्रभावित करता है। वह संवेदनाओं को जगाता है और बनाने वाले के सौंदर्यशास्त्रीय सिद्धांतों को उद्धाटित करता है। नीली मस्जिद का गोल गुम्बद बिल्कुल गोल भी नहीं है। यह गोलाई परिचित गोल आकारों से भिन्न है जैसे प्राय: दिखाई देते हैं। अपनी भिन्नता के कारण ही नहीं बल्कि अनुपातिक सुंदरता के कारण यह बहुत आकर्षक हो गया है। लगता है नीली मस्जिद में और कुछ न होता केवल यही गुम्बद होता तो वह अद्वितीय इमारत होती। रोचक यह हे कि नीली मस्जिद का गुम्बद नीला नहीं है, सफेद रंग का है और नया बना लगता है। यह राज़ बाद में खुला कि ईरानी इतिहास के सबसे भयंकर भूकम्प (1727 ई.) में यह गुम्बद सही सलामत बच गया था लेकिन 1773 ई के भूचाल में यह गिर गया था। 1951 में इसे बनाने का काम शुरू किया गया था और आज यह बनकर तैयार है लेकिन पहले जैसे 'शेप' में ही है। हां अभी इसके ऊपर टाइल्स और फ़ारसी कैलीग्राफ़ी का वह काम होना है जो मूल गुम्बद पर था।

गुम्बद देखता हुआ और उसके चित्र खींचता मैं मस्जिद के मुख्य द्वार पर आ गया। एक विशाल दरवाज़ा नज़र आया जिस पर नीले रंग के 'टाइल्स' से कुरान की आयतें और बेलबूटे द्वारा चप्पाकारी की गयी थी। मस्जिद के दरवाज़े पर चार बहुत युवा ईरानी सिपाही बैठे थे। उन्हें देखकर उनसे बात करने का मन बन गया और मैंने टूटी-फूटी फ़ारसी में उनसे परिचय कराया। कुछ बातचीत होने लगी। अपने ऊपर हंसी भी आई कि आये थे मस्जिद देखने और यहां बैठकर ईरानी सिपाहियों से गप्प मारने लगे। बहरहाल, एक सिपाही ने फ़रमाइश कर दी कि उसे हिन्दी फ़िल्मी गानों का कैसेट चाहिए। मैंने उसका पता नोट किया। इतनी देर में वहां करीब तीस-पैंतीस साल का एक आदमी आ गया और अंग्रेज़ी में बोला कि क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूं? पूरा परिचय देते हुए उसने अपना कार्ड दिखाया कि वह मान्यता प्राप्त गाइड हैं और मैं चाहूं तो उसकी सेवाएं. . . मैंने मना कर दिया। पर अन्य गाइडों की तरह यह गया नहीं और मेरे लिए दुभाषिये का काम करने लगा। कुछ देर बाद रीज़ा (गाइड का नाम) ने फिर कोशिश की कि मैं उसे गाइड ले लूं, पर मैं तैयार न हुआ। लेकिन अब उससे मेरी सीधी बात होने लगी। उसने कहा कि वह हमदान में किसी भारतीय कंपनी में काम कर चुका है और भारतीय लोगों को बहुत अच्छा मानता है इसलिए वह बिना पैसे लिए भी मेरी मदद करने के लिए तैयार है। मैंने धन्यवाद दिया और उससे पूछा कि 'ईरानी एयर लाइन्स' का ऑफिस यहां कहां है क्योंकि मुझे अपना वापसी की 'डेट' 'कन्फ़र्म' करानी है। वह बोला कि कोई दस मिनट बाद वह स्वयं वहां किसी काम से जा रहा है और मैं चाहूं तो उसके साथ चल सकता हूं। अजनी देश में सहारा। मैंने कहा, बिल्कुल ठीक है और टैक्सी का किराया मैं दूंगा।

रीज़ा जिन्हें मैं आपकी अपनी सहूलियत तथा हिन्दुस्तानी उच्चारण के अंतर्गत रज़ा लिखूंगा मेरे साथ एयर लाइन के ऑफिस गये। वहां मेरा पूरा काम कराया। फिर सवाल यह पैदा हुआ कि रात में मुझे तेहरान जाना है, बस का टिकट रिजर्व कराना है। रज़ा ने यह काम भी कराया। फिर होटल से सामान लेना था ताकि दो बजे दिन के बाद अगले दिन का किराया न लग जाये। इस काम में भी रज़ा ने मदद की। मैं यह समझने की कोशिश कर रहा था कि रज़ा मेरे ऊपर इतनी कृपा क्यों कर रहे हैं कि अपना काम धंधा छोड़कर मेरे साथ लगे हैं। यह रहस्य समझ में नहीं आ रहा था। इस बीच रज़ा से बहुत सी बातें भी हो रही थीं। उन्होंने बताया कि वे अंग्रेजी में बी.ए. आनर्स हैं और एम.ए. करना चाहते हैं। क्या दिल्ली से कर सकते हैं? मैंने उन्हें सलाह दी और जामिया में अपने एक सहयोगी का ई-मेल भी दिया कि रज़ा की मदद करें। आख़िर दोपहर होते-होते हम अच्छे दोस्त बन गये थे। रज़ा ने मेरी इतनी मदद की थी कि मैं उन्हें दोपहर का खाना खिलाने के बारे में सोचने लगा। मैंने उनसे कहा कि हम शहर के केन्द्र में चले, वहां कहीं कबाब खायें और थोड़ा और घूम लें। रज़ा ने कहा कि यहीं, यानी नये शहर के महंगे इलाके में भी बहुत मुनासिब रेस्त्रां है जहां हम खाना खा सकते हैं। वे मुझे लेकर एक रेस्त्रां में गये और ऑर्डर देने से पहले पूछा कि इतनी इतने-इतने पैसे का खाना होगा। जो रक़म उन्होंने बताई थी या मैंने सुनी थी, मुनासिब लगी। खाना आया, कबाब चावल और सूप। अच्छा खाना था। बिल देने हम काउण्टर पर गये तो बताया गया कि तीन लाख रियाल का पेमेंट करना है। मैं प्राय: पचास-हज़ार या उससे कम पैसे में कबाब वगैरा खाया करता था और सोच रहा था कि बिल अगर डेढ़ लाख रियाल भी होगा तो ठीक है। पर यहां तो तीन लाख देना था। मैंने कहा बिल कहां है तो बताया गया कि इस रेस्त्रां में बिल नहीं दिया जाता, रक़म बता दी जाती है।

मैं कुछ हिचकिचाया तो देखा कि रज़ा के तेवर भी बदले हुए हैं और उन्होंने कहा कि बिल तो देना पड़ेगा। मुझे समझते देर नहीं लगी कि रज़ा का दांव चल गया है। कोई रास्ता न था। मैंने पैसे गिनने शुरू किए तो तीन लाख गिन देने के बाद मेरे पास एक रियाल भी न बचा। जबकि मुझे विश्वास था कि मेरे पास जो पैसे हैं वे तेहरान में भी काम आयेंगे। मतलब रज़ा ने मूंड लिया। यह भी लगा कि होटल वाले को वे जानते हैं। शायद बाद में आकर अपना 'हिस्सा' ले जायेंगे या जाने क्या होगा? तीन लाख का बिल चुकाने के बाद मैं बाहर आया तो रज़ा ने कहा अब आपके पास ईरानी करंसी तो बची नहीं है चलिए आपके डालर चेंज करा दूं। यह सुनकर मुझ यक़ीन हो गया कि मैं जब भी जहां भी पेमेण्ट करता था रज़ा मेरे पैसों का हिसाब लगा लेते थे ओर नज़रों ही नज़रों में सब समझ लेते थे। रज़ा का यह कहना कि चलिए आपके डालर चेंज करा दूं मुझे खतरे की घण्टी ही नहीं लगा यह यक़ीन हो गया कि यह आदमी फ़्राड है, ठग है और अब मैं इसके साथ डालर चेंज कराने जाऊंगा तो पता नहीं क्या हो? हो सकता है जाली करंसी दिला दे। हो सकता है कोई डालर लेकर भाग जाये या हो सकता है गैरकानूनी तरीक़े से डालर 'चेंज' कराने के इल्ज़ाम में मुझे फ़र्ज़ी पुलिस का सिपाही पकड़ ले और मेरे सारे डालर मुझसे छीन लिए जायें, यानी कुछ भी हो सकता है। ये सब पर्यटकों के साथ कभी-कभी होता रहता है।

मैंने कुछ नाराज़ होकर रज़ा से कहा कि आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, मुझे जब डालर चेंज कराने होंगे तो मैं खुद ही करा लूंगा। कहने को तो मैंने यह कह दिया था लेकिन बैंक कहां है? वहां कैसे जाऊंगा? कौन सा बैंक होगा? ईरान में 'मनी चेंज' काफ़ी मुश्किल है और मेरे पास इतनी ईरानी करंसी भी नहीं है कि रास्ते में चाय-वाय पी सकूं। तो संकट गहराता लगा। पर यह भी लगा कि रज़ा के साथ डालर चेंज कराने का मतलब तो 'मौत' को दावत देना ही होगा।

मैंने रज़ा से कहा- आपने मेरे बहुत मदद की है। आपका आभारी हूं अब कृपया आप अपना काम करें और मुझे अपना काम करने दें, आप जाइये।'

मेरे ऊपर हैरत और घबराहट का पहाड़ टूट पड़ा जब रज़ा ने कहा कि वे मुझे 'अकेला' छोड़कर नहीं जा सकते। वे मेरे साथ ही रहेंगे।

अब जैसे काटो तो खून नहीं, मैं बेहद परेशान हो गया और फिर कहा कि प्लीज़ आप मेरे साथ न रहें, आप जाइये।

रज़ा ने कहा- नहीं मैं आपको यहां अकेला छोड़कर नहीं जा सकता।

सोचा यार बड़ा शातिर आदमी है, हो सकता है इसने यह सोचा हो कि शाम तक मेरे साथ रहेगा और मेरे जाने के पहले यह कहेगा कि मैं दिनभर के लिए उसे गाइड के रूप में 'हायर' किया था। उसने बताया था वह सौ डालर प्रतिदिन लेता है। वह मुझसे सौ डालर मांग सकता था कि उसकी फ़ीस है। अगर उसने यहां ऐसा कहा तो मेरा साथ कौन देगा? मैं भाषा नहीं जानता। वह स्थानीय आदमी है, पंजीकृत गाइड है। उसकी बात सब मान लेंगे और मुझे पता नहीं उसे कितना पैसा देना पड़ जायेगा। चलो जो दिल में है इससे कह दो। देखो क्या होता है।

मैंने कहा- आप दिन भर मेरे साथ इसलिए रहना चाहते हैं कि शाम को कह सकते हैं कि मैंने आपको दिनभर के लिए 'गाइड' के तौर पर 'हायर' किया था और आपकी फ़ीस सौ डालर होती है जो मैं अदा करूं।

यह सुनकर रज़ा हंसने लगा और बोला- नहीं, नहीं. . .मैंने ये नहीं कहूंगा. . .आप गुस्से में आ गये हैं।

_ हां मैं जरूर गुस्से में हूं। आप जानते हैं कि मैं हिन्दुस्तानी हूं। अमरीकन या योरोपियन टूरिस्ट नहीं हूं। आप ये भी जानते हैं कि मैं बस से सफ़र कर रहा हूं। सस्ते होटलों में ठहर रहा हूं. . .यह सब जानते हुए आपने ऐसे रेस्त्रां में खाना खिलवाया जहां तीन लाख का बिल आ गया।

वह बोला, हां मुझे अफ़सोस है कि बिल कुछ ज्यादा आ गया था लेकिन यहां के यही रेट हैं।

मैं कुछ नहीं बोला। उसे एक 'गुडबाई' कहा और एक दिशा को चल दिया लेकिन उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह मेरे साथ-साथ चलने लगा। मेरे कई बार कहने पर भी उसने चले जाने से इंकार किया। अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि रज़ा ऐसा क्यों कर रहा है?

मैं एक पार्क में आकर बेंच पर बैठ गया। वह भी मेरे पास बैठ गया। मैं उठकर चल दिया तो वह भी साथ-साथ चलने लगा। अब तो मेरी घबराहट और गुस्सा दोनों बढ़ने लगे। लेकिन लगा इससे काम नहीं चलेगा पता नहीं इसके क्या इरादे हैं।

रज़ा कहने लगा- 'गुस्सा थूकिए. . .मैं अपने पैसे से आपको घूमा देता हूं।'

_ नहीं शुक्रिया. . .आप जब जाइये।

_ मैं आपको छोड़कर नहीं जाऊंगा. . .आपकी बस ग्यारह बजे रात को जाती है, तब तक मैं आपके साथ रहूंगा।

अब क्या किया जाये। मैं बस अड्डे की तरफ़ पैदल चल निकला। वह भी साथ-साथ चलने लगा। बस अड्डे पर मैं एक सीट पर बैठ गया, वह भी बराबर वाली सीट पर बैठ गया। मेरे बहुत ज्यादा कहने पर कि उसे चले जाना चाहिए। रज़ा ने कहा- ठीक है मैं अभी जा रहा हूं लेकिन आपकी बस जाने से पहले आऊंगा। यह कह वह चला गया।

अब मेरी हालत यह कि जेब में एक पैसा नहीं। पूरी रात का सफ़र। तेहरान पहुंचकर टैक्सी करना पड़ेगी। उसके लिए पैसा नहीं है। रात में कुछ खाना-वाना भी पड़ेगा। डालर चेंज कराये बिना काम ही नहीं चलेगा। मैं उठा और सोचा आसपास कोई बैंक होगा। वहां चलकर डालर चेंज करा लिए जायें। दूर जा भी नहीं सकता था क्योंकि पहली बात यह कि टैक्सी का किराया नहीं था दूसरी बात यह कि पता नहीं कि बैंक कहां है और टैक्सी वाले आमतौर अंग्रेज़ी नहीं जानते। इसलिए पैदल घूमते हुए बैंक खोजना ही एकमात्र रास्ता था।

काफ़ी लंबा चक्कर लगाकर एक बैंक पहुंचा पर उन्होंने कहा कि वे विदेशी मुद्रा में 'डील' नहीं करते फिर किसी बैंक की तलाश में कई किलोमीटर का चक्कर लगाया और कोई बैंक नहीं मिला। अब जैसे-जैसे शाम घिर रही थी संकट भी गहराता दिखाई पड़ रहा था। चाय तक नहीं पी सकता था। पानी नहीं खरीद सकता था। खाने की कौन कहे।

अचानक ख्याल आया कि रज़ा ने कहा है कि वह बस जाने से पहले आयेगा। अगर वह आ गया तो. . .एक अद्भुत विचार आया और अपनी पीठ अपने आप ठोंकने लगा। अब रज़ा का मैं बेसब्री से इंतज़ार करने लगा। मुझे यकीन था कि वह आयेगा। करीब छ: बजे वह आया और उसे देखते ही मैं खुश हो गया। रज़ा ने भी मेरे स्वभाव में आये परिवर्तन को महसूस किया। मैंने उससे बहुत निदामत से कहा_ मुझे कुछ ज्यादा ही गुस्सा आ गया था मैं माफ़ी चाहता हूं।

वह खुश हो गया। हम दोनों एक दुकान में चाय पीने गये, चाय पीते हुए मैंने उससे कहा- तुम्हारे पास अभी इस वक्त ज़ेब में कितने पैसे हैं?

उसने निकाल कर गिने। दस डालर के करीब ईरानी करंसी उसके पास थी।

मैंने कहा_ ये ईरानी करंसी मुझे दे दो और मुझसे दस डालर ले ले लो।

उसने कहा_ दस हज़ार रियाल ;यानी पचास रुपये कम हैं।

मैंने कहा_ कोई बात नहीं. . .दस हज़ार तुम और रखो. . .घर जाने के लिए किराया. . .बाकी पैसे मुझे दे दो।

उससे करीब साठ हज़ार रियाल लेकर मैंने जेब में रखे। उसे दस डालर दिए वह खुश हो गया और मेरा तो पूछना ही क्या?

हम बड़ी प्यार भरी बातें करने लगे। जब बस चलने वाली थी तो उसने कहा कि वह ईरानी और तुर्की संस्कृति के अनुसार मेरा चुम्बन लेकर मुझे विदा करना चाहता है। मुझे लगा यार इसमें कहीं कोई चाल न हो। ख़ैर मैंने अपना पर्स, पासपोर्ट जिन जेबों में रखा था उन्हें अच्छी तरह दबाया और चुम्बन के लिए तैयार हो गया।

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धर्म के गढ़ में

धर्म और व्यक्ति, धर्म और समाज, धर्म और राजनीति ये तीनों समीकरण धर्म के जिस व्यावहारिक स्वरूप को स्थापित हैं वह एक दूसरे से नितांत भिन्न है, जबकि धर्म इन तीनों समीकरणों के केन्द्र में हैं। निश्चित रूप से व्यक्ति ओर धर्म का समीकरण सहज रूप से बहुत सीधा-साधा है और व्यक्ति के हित और उत्थान को ध्यान में रखता है। धर्म और समाज एक व्यवस्था की मांग करते हैं और धर्म विशेष के मानने वाले अपने को एक समुदाय के रूप में गठित करते हैं। धर्म जब राजनीति के साथ मिल जाता है तो राजनैतिक व्यवस्था को संचालित करता है। रोचक यह है कि धर्म जैसा आध्यात्मिक विषय राजनीति जैसी स्थूल और व्यवहारिक स्थापना से पूरा सामंजस्य स्थापित कर लेता है और धर्म राज्यों का आधार बनता है।

ईरान इस्लामी गणराज्य है। यानी एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था जो इस्लाम के सिद्धांतों पर आधारित है। यह समीकरण राजनीति के क्षेत्र में इस्लाम की स्थापनों से संचालित करता है, पर कठिनाई यह पैदा होती है कि धर्म ग्रंथों के मूलपाठ की व्याख्या करते हुए उन सूत्रों को तलाश करना पड़ता है जो वर्तमान सामाजिक, राजनैतिक स्थितियों के संदर्भ में दिशा दे सकें। इस्लाम 'मसावात' यानी बराबरी पर बहुत जोर देता है। इसके कारण मुझे विश्वास था कि ईरान में इस्लामी क्रांति आने के बाद निश्चित रूप से भूमि सुधार हुए होंगे और तथा ईरान में गरीबों और अमीरों के बीच बहुत बड़ा अंतर न होगा। लेकिन ईरान में मेरे यह दोनों भ्रम टूट गये। बताया गया कि इस्लामी क्रांति के बाद ज़मीन के बंटवारे के सवाल पर धार्मिक नेताओं की राय थी कि यह ग़ैर इस्लामी है। इस कारण ईरान में बहुत बड़े किसानों के पास बेहिसाब भूमि है तथा दूसरी ओर छोटे किसान उजड़ रहे हैं ईरान में ऐसे गांव अक्सर दिखाई पड़ जाते हैं। जो पूरी तरह उजड़ चुके हैं। शहरों में भुखमरी तो नहीं है।

कमजोर, बेसहारा, बेरोज़गार, शोषित और असहाय लोग नहीं या कम नज़र आते हैं पर गरीबी और अमीरी के बीच बहुत बड़ा अंतर ज़रूर दिखाई पड़ता है।

ईरान के धार्मिक शहरों कुम और मशहद, देखकर यह विश्वास पक्का हो गया कि धर्म और धन के बीच एक स्थायी समझौता हो चुका है। धर्म और धनाढ्यता, धर्म और ऐश्वर्य, धर्म और प्रदर्शन का जो रूप देखने को मिलता है वह ईरान ही में नहीं सारे संसार में एक जैसा है। निश्चित रूप से हर धर्म के प्रवर्तक और उनके सच्चे अनुयायी सादगी, सहजता, मानवीयता पर बल देते थे लेकिन आज उनके नाम पर धन का अश्लील प्रदर्शन किया जा रहा है।

ईरान का शहर कुम एक धार्मिक नगर है जो संसार के शिआ मुसलमानों के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि यहां आठवें इमाम हज़रत रज़ा ;जिनका मक़बरा मशहद में है, की बहन हज़रत मासूमा का मक़बरा है। यह संसार के शिआ मौलवियों की शिक्षा का केन्द्र है। यहीं अयातुल्ला खुमैनी भी रहा करते थे जिन्हें ईरान के रज़ाशाह पहलवी ने देश निकाला की सजा दे दी थी। कहा जाता है कुम में से ही ईरान की धार्मिक राजनीति तय होती है। इस्लामी क्रांति से पहले भी कुम से ही ईरान की राजशाही को चुनौती मिला करती थी।

तेहरान से कुम का रास्ता कोई डेढ़ दो घंटे का है। बस पर दो अफ़ग़ानी मज़दूर लिए गये थे जो अच्छी तरह हिन्दुस्तानी बोलते थे। ये लोग ईरान में ग़ैरकानूनी तौर पर रह रहे थे और मजदूरी करते थे। इनके पास कागज़ात नहीं थे और इन्हें डर लगा रहता था कि पुलिस कहीं इन्हें पकड़ न लें। इनमें से एक ने अपना नाम नादिर अली करीमी बताया था इन्होंने मुझे बस का किराया नहीं देने दिया था। रास्ते में नादिर से काफ़ी बातचीत होती रही। उसने बताया कि ईरान में बहुत तरक्की हो रही है। सरकार जनता पर काफ़ी पैसा खर्च करती है। स्कूल, अस्पताल, सड़कें और बिजली की व्यवस्था अच्छी है। फिर उसने कहा था लेकिन ईरानी हमेशा अपनी सरकार की शिकायत करते रहते हैं। ये एहसान फ़रामोश हैं। इन्हें इतमीनान ही नहीं होता जबकि इनके लिए सरकार बहुत करती है। अफ़गानिस्तान के बारे में उसने बताया कि वहां सब कुछ खत्म हो चुका है।

कुम में हम बस उतरे तो नादिर मुझे एक होटल में ले गया जहां एक कमरा पचास डालर में था। ज़ाहिर है कि यह मेरे लिए बहुत महंगा था। फिर वह मुझे मेरे स्टैण्डर्ड के एक मेहमान पिज़ीर (मुसाफिरख़ाने) में ले गया जहां किराया आठ डालर था। मैं वहां ठहर गया। उसने कहा कि वह शायद कल मुझसे मिल सकेगा।

कमरे में सामान पटक कर मैं बाहर आ गया। चौराहे के बीच में घण्टाघर था और बायीं तरफ़ दूर तक फैली मकबरे तथा मदरसे की इमारत थी। इसके सामने एक सूखी नदी थी जहां गाड़ियों की पार्किंग और टैंट लगाकर रहने की जगह बनाई गयी थी। मैं पहले मक़बरे की तरफ़ बढ़ा। रात हो चुकी थी। मक़बरा और चारों तरफ़ बनी मस्जिदें और इमारतें सफेद रौशनी में जगमगा रही थीं। मुख्य मक़बरे का गुम्बद सोने की तरह दमक रहा था। उसके ऊपर शीशे लगे थे जिनके नीचे से सुनहरा प्रकाश निकल रहा था। सब कुछ बहुत भव्य और शानदार था। पूरी इमारत खासतौर पर मेहराबदार ऊंचे दरवाज़ों और गुम्बदों पर रंगीन टायल्स से बहुत खूबसूरत पारम्परिक डिज़ाइनें तथा कैलीग्राफ़ी के नमूने बने हुए थे।

मुख्य मकबरे में दोनों तरफ़ विशाल मस्जिदें और वे इमारतें हैं जहां धर्म की शिक्षा दी जाती है। मैं एक मस्जिद के अंदर चला गया। जगमगाहट से आंखें चकाचौंध हो गयीं। हर तरफ़ जो था वह चमक रहा था। चप्पे-चप्पे पर भरपूर रौशनी थी। लोगों का आना जाना लगा हुआ था। कुम का रौज़ा महिलाओं के लिए विशेष महत्व रहता है इसलिए बड़ी संख्या में हिजाब किए औरतें जाती और आती दिखाई दे रही थीं। मैं बाहर निकल आया और सोचा कल सुबह कैमरा लेकर आऊंगा।

बाहर सड़कों पर बड़ी चहल-पहल दिखाई दी। मैंने पुल पार किया और अपने होटल के सामने वाले चौराहे से एक ऐसी सड़क पकड़ ली जिस पर दोनों तरफ़ दुकानें थीं। कुम चहल-पहल के बावजूद काफ़ी परम्परावादी ढंग का शहर लगा। वह आधुनिक प्रभाव जो दूसरे शहरों में दिखाई पड़ता है यहां नहीं है। तरह-तरह की दुकानों के पास से गुज़रता मैं रोटी की दुकान के सामने रुक गया। सोचा रात में कुछ खाना तो है ही है क्यों न रोटी खरीद ली जाये। रोटी की दुकान में तरह-तरह की रोटियां रखी थी। ईरानियों से रोटी बनाने का काम सीखना चाहिए। इतने तरह की और इतनी मज़ेदार रोटियां शायद ही और कहीं बनती हों। वजह शायद यह है कि लोग घरों में रोटी नहीं पकाते। रोटी हमेशा बाज़ार से ही खरीदी जाती है।

दो-तीन तरह की रोटियां खरीदने के बाद मैं फिर फुटपाथ पर आ गया। एक छोटी-सी दुकान में देखा कि बड़ी-सी परात में किसी जानवर पक्की खाली रखी है। दुकान के अंदर बैठ लोग खा रहे हैं, मैंने वहीं सुना तो था कि खाल भी पका कर खाई जाती है लेकिन खाने का मौक़ा कभी न मिला था। सोचा हाथ कंगन को आरसी क्या और पढे-लिखे को फ़ारसी क्या। चलो खाते हैं। फिर ख्याल आया कि रोटी तो ले ली है। दुकान में अंदर जगह कम है। देखा कि कुछ-लोग खाल की डिश पैक करा रहे हैं। मैंने भी एक डिब्बे में पैक करा ली। खाल के साथ कुछ पानी जैसी तरी भी थी। अब सवाल यह पैदा हुआ कि इसे होटल के कमरे में खाने के लिए चमचा चाहिए होगा और मेरे पास चमचा नहीं है।

एक चमचा खरीदा कुछ मुश्किल लगा क्योंकि दुकानदार चमचों के सेट बेच रहे थे। बहरहाल खोजने से भगवान तक मिल जाता है। चमचे की औक़ात क्या। एक छोटी-सी बाजार में चमचा मिला और होटल के कमरे में लौट आया। सोचा खा लूं और फिर बाहर टहला जाये। बताया गया था कि शहर में कोई डर नहीं है और रातभर लोग आते-जाते रहते हैं। रौज़ा चौबीस घण्टे खुला रहता है।

होटल के कमरे में खाल खाने लगा। मज़ा कुछ नया और अजीब लगा। सोचा और खाऊं तो शायद अच्छी लगी। और खाई तो खाल से अजीब लेकिन अरुचिकर गंध सी आई। सोचा यार लोग तो बड़ा मज़ा ले-लेकर खा रहे थे, कुछ और खाकर देखो हो सकता है अच्छी लगने लगे। और खाई पर यह जल्दी ही पता चल गया कि चलेगी नहीं। मतलब खा नहीं पाऊंगा। रोटी पनीर के साथ खाकर पानी पी लिया और सोचा खाल वाली डिश बाहर निकलकर कूड़े में डाल दूंगा। अच्छी बात है कि ईरानी न केवल अपने शहर को साफ़ रखते हैं बल्कि जगह-जगह कूड़ा फेंकने के डिब्बे लगाये जाते हैं।

अगले दिन मैं तड़के ही रौजे पर गया। केवल मस्जिद वाले हिस्से में फ़ोटोग्राफ़ी की अनुमति थी। मुख्य रौजे का फ़ोटो नहीं खींचा जा सकता था। रौजे क़ी ज़ियारत की। वहां-वहां भीड़ थी। बाहर आ गया और सड़कों, गलियों में घूमता रहा। इस शहर में इमाम अयातुल्ला ख़ुमैनी के घर को छोड़कर और कोई महत्वपूर्ण चीज़ नहीं है और वह घर पर्यटकों के लिए बंद है। इसलिए होटल से सामान उठाया और बस अड्डे जाने वाली सड़क पर 'सवारी' का इंतिज़ार करने लगा। चलो एक तीर्थ यात्रा पूरी हुई।

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आधी दुनिया

आज अगर कोई संसार कह देता है तो हम मात्रा इस शब्द से प्रभावित नहीं होते क्योंकि विज्ञान और तकनीक ने संसार को बहुत छोटा बना दिया है। पूरे संसार का चक्कर हज़ारों लोग लगा चुके हैं। आज क्या है संसार में जो लुका-छिपा रह गया है? लेकिन सोलहवीं शताब्दी में तो ऐसा नहीं था। संसार का पूरा नक्शा ही नहीं बन सका था। किसी को नहीं पता था कि संसार के ओर छोर क्या हैं? कितने लोग बसते हैं? कितनी तरह के लोग रहते हैं? कितने देश हैं? कितनी नदियां हैं? उस समय का संसार सीमित और अंजान था, कठिन था, चुनौती भरा और रहस्यमय था। उस ज़माने में इस्फ़हान के बारे में कहा जाता था यह शहर 'आधी दुनिया' है इस्फ़हान का सही या मूल उच्चारण निस्फ़ (आधा) और जहान (संसार) है। मतलब यह कि इस्फ़हान देखने का मतलब था कि आधी दुनिया देख ली और आधी दुनिया ही देख पाना असंभव जैसा था उस युग में।

तेहरान से 340 किलोमीटर दक्षिण में इस्फ़हान सैकड़ों वर्षों तक ईरान की राजधानी था। आज राजधानी न होते हुए उसकी हैसियत राजधानी से कम नहीं है। ईरानी संस्कृति तेहरान में नहीं बल्कि इस्फ़हान की रगों में धड़कती है। शहर में अतीत का गौरव ही नहीं बल्कि वर्तमान का सौंदर्य भी है। कला और संस्कृति के क्षेत्र, फिल्म और साहित्य के मैदान में, संगीत और स्थापत्य कला में आज इस्फ़हान आगे है। यहां बाज़ारों में घूमते हुए उस इतिहास को महसूस किया जा सकता है जिसके कारण इस्फ़हान को आध संसार कहा जाता था। सैकड़ों श्रेष्ठ ऐतिहासिक इमारतों, दसियों बाग़ों और प्राचीन बाज़ारों को अपने अंदर समेटे यह शहर क़दम-क़दम पर चौंका देता है। सड़क पर चलते हुए पेड़ों के झुरमुट के पीछे किसी पुरानी इमारत का ऐसा फ़ाटक दिखाई पड़ता है कि पैर अपने आप ठहर जाते हैं। लगता है कि कुछ भी ऐसा नहीं है जिसके पीछे गहरी कलात्मक दृष्टि न हो। दुकानों के बोर्ड और इश्तिहार तक कला कृतियों जैसे लगते हैं। यही वजह है कि यूनेस्को ने इस शहर को विश्व धरोहर की मान्यता दी है।

ढाई हज़ार साल पुराने शहर का एक इतिहास है जिसकी कड़ियां भारत से भी जुड़ती हैं। शेरशाह सूरी से हारने के बाद मुग़ल बादशाह हुमायूं यही आया था और उसे इसी शहर में ईरान के सम्राट शाह अब्बास सफ़वी ने शरण दी थी और पुन: हिन्दुस्तान हासिल करने के लिए फौजी सहायता भी दी थी। ईरान के पुराने यानी इख़ामंशी साम्राज्य ( ई. 700 वर्ष पूर्व ) की स्थापत्य कला से प्रेरित 'चेहेल स्तून' मतलब चालीस खंभों वाले महल में दीवारों पर बड़ी-बड़ी तस्वीरें पेंट की गयी हैं। इनमें से एक तस्वीर में मुगल सम्राट हुमायूं को शाह अब्बास सफ़वी द्वितीय के साथ एक भोज में चित्रित किया गया है।

इस शहर का इतिहास उतना ही पुराना है जितना ईरान का इतिहास है। ईसा से 700 वर्ष पूर्व इख़ामंशी सम्राटों के समय और उसके बाद सासानी साम्राज्य (ई. 200 वर्ष पू.) में इस्फ़हान बड़ा शहर था लेकिन इसका स्वर्ण युग शाह अब्बास सफ़वी के शासन काल से प्रारंभ होता है। शाह अब्बास सफ़वी ने तबरेज़ से अपनी राजधानी इस्फ़हान में स्थापित की थी। उस समय की कई शानदार इमारतें अब भी यहां हैं। उसके बाद सफ़वी सम्राटों की राजधानी इस्फ़हान अफ़ग़ानी हमलों का शिकार होने लगी और अंतत: राजधानी तेहरान चले जाने के कारण यह शहर सम्राट विहीन हो गया।

टैक्सी वाले ने मुझे अमीर कबीर होटल के सामने छोड़ा था। होटल में बताया गया कि एक कमरे का किराया बीस डालर है। मैं धन्यवाद कहकर वापस जाने लगा तो होटल के मालिक ने पूछा कि क्या मैं कमरा 'शेयर' कर सकता हूं। मेरे हां कहने पर बताया कि 'डॉरमेट्री' में मुझे एक 'बेड' कोई दो डालर में मिल सकता है। मैं तैयार हो गया। 'डारमेट्री' बहुत साफ़-सुथरी थी। छ: पलंग बिछे थे। बाक़ायदा बेड कवर वगैरा सब थे। मुझसे एक फ़ॉर्म भराया गया जिसमें लिखा था कि सामान की जिम्मेदारी मेरी ही है और इसी तरह की तमाम बातें थीं। मैंने अपने लिए कोने का एक बेड चुन लिया और सामान रखकर घूमने निकल पड़ा। टूरिस्ट गाइड किताबों से पता चला कि मुख्य और प्राचीन इमारतें करीब ही हैं और उन्हें टहल-घूमकर देखा जा सकता है। पहले तो मैं दिशाहीन होकर घूमने लगा। पुराने कच्ची मिट्टी और लकड़ी के मकान देखे। वैसे दरवाज़े और दर जो अपने यहां पुराने कस्बों और गांवों में होते हैं। कोई दो-तीन किलोमीटर का चक्कर लगा कर मैंने पूछना शुरू किया कि मशहूर इमाम मस्जिद किध्र है। अपने क्षेत्रफ़ल में, संसार के सबसे बड़े अहाते माउ त्सेतुंग स्वायर (बेइजिंग) से कुछ ही छोटा यह 'काम्प्लेक्स' इस्लामी संसार की सबसे बड़ी इमारत है। शाह अब्बास सफ़वी महान ने अपने जीवन की बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा के रूप में इसे बनवाया था।

जैसा कि मेरे साथ होता है मैं इस विशाल इमारत में उस द्वार से दाख़िल नहीं हो पाया जो इसका दरवाज़ा है। लेकिन जब मैं इसके अंदर गया तो आधी दुनिया देख लेने के बाद हैरत में पड़ गया। इतनी बड़ी, व्यापक, भव्य और सुंदर इमारत मैंने जीवन में कभी नहीं देखी थी। पहले तो यह समझने में समय लगा कि आख़िर ये है क्या? ये ठीक है कि इसके सिरे पर मस्जिद है। दूसरे सिरे पर कोई मक़बरा है। लेकिन चारों तरफ़ फैला विशाल भवन क्या है? अंदर गया तो पता चला कि इस काम्प्लेक्स की चारदीवारी दरअसल दो मंज़िला है। पहली मंज़िल पर आमने सामने दुकानें हैं और बीच में कोई पचास फुट चौड़ा जैसा रास्ता है। इन दुकानों की इमारतें के साथ-साथ बनी कुछ और इमारतें हैं कहीं-कहीं इमारत तीन मंजिल की है और उनके चौड़े पर कोटे हैं, खुले हुए बरामदेनुमा हाल हैं। ईरानी साज-सज्जा मतलब रंगीन टायल्स लगाकर बेलबूटे बनाना तथा कुरान की आयतों के आधार पर कैलीग्राफ़ी से यह पूरी इमारत सजी है। मैंने विशाल बाज़ार का चक्कर लगाया और मुख्य मस्जिद तक गया। जितना विशाल घेरा है उतनी बड़ी मस्जिद नहीं है और न उतनी प्रभावशाली है।

सफ़वी साम्राज्य की एक और पहचान चालीस खंभोवाली इमारत भी है। एक बाग़ के अंदर बनी इस इमारत को सम्राट ने विशेष आयोजनों के लिए बनवाया था। मुख्य द्वार से अंदर जायें, सामने इमारत नज़र आती है। यह चालीस लकड़ी के खंभों पर खड़ा एक विशाल बरामदा है जिसकी छत पर चित्रकारी की गयी है। विशाल बरामदे के पीछे बड़े-बड़े हाल और कमरे हैं। जिनकी दीवारों पर शाह अब्बास सफ़वी के युग के महत्वपूर्ण युद्धों तथा अन्य महत्वपूर्ण घटनाओं के चित्र उकेरे गये हैं। इन्हें देखना बहुत रोचक है क्योंकि यह जीता जागता इतिहास है, वास्तविक पात्र है, ऐतिहासिक घटनाएं हैं। सामतों के साथ गायक, नर्तकियां, वाद्य बजाने वाले और नौकर चाकर सभी का चित्रण किया गया है। यहीं मैंने एक चित्र मुग़ल सम्राट हुमायूं को भी देखा। चेहेल सुतून देखने के बाद दो संग्रहालय देखे और शाम होते-होते मैं अपनी प्रिय जगह यानी सड़क पर पहुंच गया।

पुराने इस्फ़हान की सड़कें सीधी हैं। जाने और आने के लिए सड़क का विभाज बीच में पार्क बनाकर किया गया है। दुकानों के सामने फुटपाथ हैं जहां हरे भरे पेड़ों और क्यारियों में फूल के पौधों का सिलसिला दुकानों के साथ-साथ जारी रहता है। चौराहों पर पार्क है। आमतौर पर खूबसूरत है। लोगों के बैठने के लिए अच्छा इंतिज़ाम है। मैं एक मुख्य सड़क पर टहलने लगा। रात घिर आई थी। सड़कों पर कारों की संख्या बढ़ गयी थी। चहल-पहल ज्यादा थी। एक दुकान से कुछ खाना खरीदा और पार्क में बैठकर खा लिया।

होटल के कमरे में आया तो देखा पांच खाली बेडों में से तीन पर दो जापानी और एक योरोपीय पर्यटक जमे हुए हैं। दो बेड अब भी खाली थे। मैं सोने की तैयारी कर ही रहा था कि एक जापानी लड़का और एक लड़की कमरे में आ गये। मुझे पक्का यक़ीन था कि पुरुषों की 'डारमेट्री' में लड़कियां नहीं रह सकती। सोचा यह लड़की किसी अलग, किसी लेडीज़ डारमेट्री में रहेगी और यहां अपने मित्र के साथ कुछ समय बिताने आ गयी होगी, चली जायेगी। पर जल्दी ही समझ में आ गया कि लड़की यहीं इसी कमरे में यानी पांच पुरुषों के साथ रहेगी। लड़की ने एक बेड पर अपना स्लीपिंग बैग फैला दिया। कपड़े ठीक करने लगी। छोटी-सी सफ़री घड़ी निकलकर अपनी मेज़ पर रख दी। यह सोचकर कुछ अजीब और नया-सा लगा कि ईरान जैसी कट्टर इस्लामी समाज में यह कैसे संभव है, पर पैसा जो न कराये वह कम है।

रात में एक मद्धिम सी बत्ती जल रही थी लेकिन उसकी रौशनी में जब आंख खुलती थी तो बिस्तर पर लेटी लड़की नज़र आ जाती थी। उसके बाल कभी फैले हुए नजर आते थे, कभी उसका सफेद हाथ बाहर निकला दिखाई देता था, कभी गुड़-मुड़ियाई सी दिखाई पड़ती थी और कभी अपने एक हाथ को तकिया बनाये नज़र आती थी। धीरे-धीरे थकान और रात के सन्नाटे ने अपना काम दिखाया और कमरे में सांसों की आवाज़ के अलावा सब कुछ शांत हो गया। यह सोचते हुए सो गया कि यह घटना अगर पच्चीस तीस साल पहले घटी होती तो जरूर परेशानी होती।

सुबह आंख जल्दी खुल गयी। तैयार होकर बाहर निकल आया। सोचा कहीं चाय पी जाये। दुकानें बंद थीं अचानक एक रेस्त्रांनुमा दुकान खुली नज़र आई। अंदर दो आदमी बैठे थे। शायद यह चाय की दुकान नहीं बल्कि रोटी की दुकान थी। पर सोचा चलो पूछ लेते हैं। चाय मिल जाये तो अच्छा ही है। दरवाज़े पर खड़े होकर पूछा तो एक आदमी ने मना कर दिया। मैं जाने ही वाला था कि दोनों ने इशारा करके मुझे अंदर बुला लिया। उन्हें शायद यह जानने में रुचि पैदा हो गयी थी कि मैं कौन हू, कहां से आया हूं? इन जिज्ञासों के समाधान के लिए मैंने अपनी पुस्तिका उन्हें पेश कर दी।

रोटी की दुकान में बैठे ये दोनों लोग बावर्ची किस्म के लग रहे थे। उनके सामने चाय चढ़ी हुई थी। एक ने चाय निकालकर मुझे दी और शकर के टुकड़ों की तरफ़ इशारा कर दिया। कुछ टूटी फूटी बातें होने लगी। मैंने अपनी पुस्तिका दी। पुस्तिका में मेरा परिचय पढ़कर दोनों खुश हुए और फिर कहानियां पढ़ने लगे। इस पुस्तिका की कहानियों में से एक की पंच लाइन है_ 'आज आदमी बंदर है और बंदर आदमी है।' यह कहानी पढ़ कर एक बावर्ची काफ़ी नाराज़ हो गया। उसने काफ़ी कड़ी आवाज़ में मुझसे पूछा कि क्या वह मुझे बंदर दिखाई पड़ता है? मैं सवाल समझ गया। डारविन का सिद्धांत और मनुष्य की उत्पत्ति के बारे में इस्लामी धारणा के कारण वह नाराज़ हो रहा था। मैंने उससे कहा कि मैं उसे बंदर नहीं, इंसान मानता हूं। इस पर भी वह संतुष्ट हुआ और बोला- 'मेरे दो आंखें, नाक, कान हैं, मेरा चेहरा आदमी जैसा है। क्या मैं तुम्हें बंदर लगता हूं।'

मैंने उससे माफ़ी मांगी और कहा कि वह ठीक कहता है। तब वह बोला कि फिर मैंने यह क्यों लिखा कि आदमी बंदर है और बंदर आदमी है। फ़ारसी भाषा में उसे यह समझाना मेरे लिए असंभव था। मैंने फिर माफ़ी मांगी और चाय के पैसे पूछे। उसने कहा कि पैसा नहीं लेगा। मैं जान बचाकर बाहर भागा और तय किया कि कहानियों की पुस्तिका देकर परिचय प्राप्त करने का काम मुसीबत में भी डाल सकता है।

नदियों पर सुंदर पुल बनाना मध्यकाल में एक चुनौती था। इस्फ़हान अपने सुंदर पुलों के लिए भी जाना जाता है। मैं पूछता पाछता मारान पुल तक पहुंच गया। यानदेह नदी पर सोलहवीं शताब्दी का पुल स्थापत्यकला का बेमिसाल नमूना है। छोटे-छोटे दर बनाकर इस पुल को जोड़ा गया। ट्रैफिक के लिए बंद इस पुल पर बस पैदल चला जा सकता है।

मारान पुल पार करके शहर के दूसरे हिस्से में आ गया जो एक प्रकार से आधुनिक शहर है। नदी के किनारे बने विशाल पार्क में घूमते हुए देखा कि एक पर्यटक अपने स्पीपिंग बैग में पेड़ के नीचे सो रहा है। यह देखकर मज़ा आया। इसलिए जब दो डालर में मैं रात बिता रहा था तो सोच रहा था कि यार बड़े सस्ते में रात काट दी। अब इससे कम क्या हो सकता है? लेकिन सुबह तड़के अमीर कबीर होटल के 'कोर्ट यार्ड' में देखा था कि साइकिल सवार पर्यटकों की साइकिलें कोर्टयार्ड (आँगन) में खड़ी थी और वे खुले आसमान के नीचे अपने स्लीपिंग बैगों में सो रहे थे। मैंने सोचा था कि इन लोगों ने मुझसे भी कम पैसे में रात बिताई होगी। यहां पार्क में एक पर्यटक को पेड़ के नीचे सोता देखा तो यह सोचकर हंसी आयी कि इस पट्ठे ने बिना पैसा खर्च किए ही रात बिता दी। याद आया किसी पर्यटक ने लिखा है कि घूमने के लिए पैसा नहीं बल्कि इच्छाशक्ति चाहिए।

इस्फ़हान की सड़कों पर ही मेरी मुलाकात हिन्दी सिनेमा जगत के सितारों से हुई थी। पोस्टर बेचने वाली एक दुकान पर शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, सनी देओल और पता नहीं जाने कितने हिन्दी फिल्मों के अभिनेताओं के पोस्टर बिक रहे थे। ये तय है कि हिन्दी फिल्मों ने ईरान के बाज़ार पर कब्जा किया हुआ है। नाइट सर्विस बसों में हिंदी फिल्में चलती हैं। हर शहर में हिंदी फिल्मों की सी.डी. मिल जाती है। हर फ़ारसी फ़िल्मी पत्रिका में बॉलीवुड की ख़बरें, तस्वीरें छपती हैं। लोग हिन्दी फिल्मों से न सिर्फ पूरी तरह परिचित हैं बल्कि पसंद करते हैं। इस्फ़हान की सड़क पर हिन्दी फिल्मों के अभिनेताओं की तस्वीर बेचने वाले से बातचीत की कोशिश करता रहा। उसकी तस्वीर खींची और उसका पता लिया। वापस होटल आया तो होटल के मालिक ने कहा कि उनकी पत्नी हिन्दी फ़िल्मी की रसिया है और क्या यह नहीं हो सकता कि वे भारत से हिन्दी फिल्मों की सी.डी. मंगा सकें।

हिन्दी फिल्मों की लोकप्रियता के कई कारण हैं। पहला तो यह कि भारतीय सामाजिक मूल्य और ईरानी सामाजिक मूल्यों में बड़ी समानता है। परिवार को जो महत्व हमारे समाज में है, बड़ों की इज्जत करने की परिपाटी जो यहां है, विवाह की जो जटिलताएं यहां है वे सब ईरानी समाज में भी हैं और इस वजह से हिंदी फिल्में उन्हें पसंद आती है। हॉलीवुड उन्हें दूर लगता है बॉलीवुड करीब लगता है। अपनी पूरी यात्रा के दौरान मुझे लगातार ऐसे लोग मिलते रहे जिन्होंने भारत का नाम आते ही हिन्दी फिल्मों के किसी ऐक्टर का नाम लिया या फिल्म का उल्लेख किया। इस्फ़हान की सड़क पर ही मुझे एक दिलचस्प फ़ारसी फ़िल्मी पत्रिका 'समीन' मिली जो पूरी 'बॉलीवुड' सिनेमा को समर्पित पत्रिका है। इस पत्रिका में हिन्दी फिल्मों के समाचारों के अलावा हिंदी फ़ारसी फ़िल्मी शब्दावली का छोटा शब्दकोश छापा गया था। ईरानियों को यह बताया गया था कि हिंदी फिल्में फ़ारसी में डब किए बिना भी देखी जा सकती हैं क्योंकि हिंदी समझना बहुत सरल है। पत्रिका देखकर आश्चर्य हुआ और सोचा कि हिंदी प्रचार के इस स्वरूप के बारे में हमारे यहां कितने लोग जानते हैं? और हम ईरानियों की इस रुचि के लिए क्या कर रहे हैं? 'समीन' में हिन्दी फिल्मों के गीतों का मूलपाठ और उसका अनुवाद छापा गया था ताकि ईरानी दर्शक गाने भी समझ सके। 'समीन' के अलावा फ़ारसी भाषा की कोई ऐसी फ़िल्मी पत्रिका या अखबार नहीं देखा जिसमें हिन्दी फिल्मों पर समाचार और अभिनेताओं के चित्र न हों। मुख पृष्ठ पर छ: कालम में शाहरुख़ खान के चित्र देखकर लगा कि वाह कम से कम हमारे फिल्म उद्योग ने तो कुछ किया है।

दु:ख की बात यह है कि ईरान में हिन्दी फिल्मों का पूरा व्यापार गैरकानूनी है और हिंदी सिनेमा जगत को उसे एक पैसे का लाभ नहीं होता। करोड़ों की सी.डी. दुबई की ब्लैक मार्केट से ईरान आ जाती हैं और घर-घर पहुंच जाती हैं। फिल्मों के निर्माता कुछ नहीं कर सकते क्योंकि यह भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र का मामला है। इस बारे में तेहरान के भारतीय राजदूतावास के एक अधिकारी से बात हुई तो उन्होंने बताया कि ईरान ने कापी राइट संबंधी किसी अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं इस कारण कापी राइट का मसला ही नहीं उठाया जा सकता। अब सोचने की बात यह है कि भारत और ईरान के राजनैतिक संबंध तो ठीक ही हैं। इस संबंध में क्या कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं हो सकता है? अगर यह हो जाता है तो ईरान की बाज़ार भारतीय फिल्म जगत के लिए खुल जायेंगी। इसके अलावा यह भी सोचने वाली बात है कि ईरानी जनता की हिन्दी फिल्मों में गहरी रुचि के मद्देनजर क्या हम कुछ ऐसी नीतियां और कार्यक्रम बना सकते हैं जिससे दोनों देशों को लाभ हो? उदाहरण के लिए तेहरान या ईरान के अन्य शहरों में हिन्दी फिल्म समारोह आयोजित किए जा सकते हैं। हिन्दी फिल्मों को फ़ारसी में डब करने का काम किया जा सकता है और भी इस तरह की तमाम योजनाएं संभव हैं।

(क्रमश: अगले अंकों में जारी)

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चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

- असग़र वजाहत


अनुक्रम यहाँ देखें

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हवा के शहर में

सुबह जल्दी उठ गया। होटल से बाहर आया तो पास ही चाय वाली दुकान में चहल पहल थी। सोचा चाय पी लूं। चाय वाले बूढ़े काला सूट पहने थे और फ़्लैट हैट लगा रखी थी। इस हुलिये में उनका चाय बनाना और लोगों को चाय देना मुझे कुछ अजीब लगा। चाय के साथ लोग, वही गज़ भर लंबी, रोटी के टुकड़े और सूखा पनीर खा रहे थे। मैं भी एक चाय लेकर बैठ गया। एक दो लोग बात करने की कोशिश करने लगे। कुछ बातें हुई भी लेकिन कुछ निकला नहीं। यह देखकर कुछ अजीब सा लगा कि चाय वाले सज्जन ग्राहकों के खाने से बचे रोटी और पनीर सहेजते जा रहे हैं। निश्चित ही यह वह दूसरों को देते होंगे। शायद इनके समाज में 'झूठा' आदि की परिकल्पना नहीं है।

चाय पीकर मुसद्दिक की दुकान गया तो वह बंद थी। सोचा घूम लूं घूमते हुए ख्याल आया कि नाई की दुकान में जाकर दाढ़ी कतरवा ली जाये। नाई की दुकान बहुत साफ़ सुथरी और आधुनिक थी। दस हज़ार रियाल यानी पचास रुपये में दाढ़ी बाल तरशवा कर बाहर आया। मुसद्दिक की दुकान अब भी बंद थी ओर मैं बिना ई-मेल चेक किए बाकू जाना नहीं चाहता था क्योंकि पता नहीं ललित जी वहां हैं या नहीं हैं। कस्बे की सड़कों पर इधर घूमता रहा। ताज़ा फ़लों और सूखे फ़लों की दुकानें, रोटी की दुकाने, बेकरी की दुकानें, दीगर समान ओर अच्छा मंहगा सामान भरा पड़ा था। तीस-पैंतीस हज़ार आबादी वाले इस कस्बे से मैं काफ़ी प्रभावित हुआ। साफ़ सुथरी सड़कें, चौराहों पर ट्रैफ़िक लाइटें, जेबरा लाइनें, नो पार्किंग के बोर्ड, टेलीफ़ोन बूथ, किताबों की कई दुकानें, इंटरनेट की सुविधा, टैक्सी स्टैण्ड, घंटाघर ओर सब से बड़ी बात यह कि स्वस्थ, तन्दुरुस्त और खुशहाल लगने वाले लोग।

ललित जी के दो ई-मेल आये थे। मैंने पहला खोला और पढ़ा। उन्होंने लिखा था कि वे बाकू में ही हैं, मैं आ जाऊं। दूसरा ई-मेल खोलकर पढ़ने की तकलीफ़ मैंने नहीं उठायी। जबकि महत्वपूर्ण जानकारियां दूसरे ई-मेल में थी जिनके न होने के कारण बाकू में मुझे खासा झेलना पड़ा।

होटल से सामान लेकर बार्डर चेक पोस्ट पर आये। यहां ईरानी-कस्टम और एमीग्रेशन के कार्यालय हैं। अधिकतर काम औरतें कर रही थीं। करबी तीन घण्टे बाद यहां से छुट्टी मिली। आगे बढ़े इमारत के बाद एक छोटी सी नदी के इस तरफ़ ईरानी पुलिस की चौकी थी और उस तरफ़ आज़रबाइजान की पुलिस पोस्ट थी। आजरबाइजान कस्टम एमीग्रेशन में गया। अधिकारियों ने देखा, पीठ पर बड़ा-सा बैकपैक उठाये, कंधे पर कैमरा टांगे एक अधेड़ उम्र अजनबी आदमी खड़ा है। मुझसे प्रतीक्षा करने को कहा गया। सब लोग निकल गये। मेरी बारी आयी। मैं केबिन में गया। सामने जो आज़री अधिकारी बैठा था उसके चेहरे पर लिखा था 'मैं घूसखोर हूं'। उसे मुझे दिखाकर अंगूठा बड़ी उंगली पर मसला और कहा- 'टेन डॉलर'।

मैं सब कुछ समझ गया मैं घूस देने पर तैयार नहीं था। वह तथा उसके अन्य साथी बिना घूस के मुझे आज़रबाइजान में दाख़िल करने पर तैयार नहीं थे। कुछ देर तक कहा सुनी होती रही। उसके बाद मैंने ट्रम्प कार्ड यानी बाकू स्थिति भारतीय दूतावास की चिट्ठी उन्हें दिखाई कहा कि मैं औपचारिक, सरकारी तौर पर जा रहा हूं। तब वे पसीजे, मेरे पासपोर्ट पर ठप्पे वग़ैरा लगाये गये और मैं बाहर निकला।

आज़रबाइजान में क़दम रहते ही होश उड़ गये। दरवाजे से निकलकर देखा एक पतला-सा रास्ता, दोनों तरफ़ टीन के शेड में बनी दुकानें, एक आद खाने का सस्ता-सा होटल। अजीब उजाड़ और डरावना माहौल। मैं यह सब देख ही रहा था कि अचानक आठ दस लोगों ने मुझे घेर लिया। इनमें से तीन-चार टैक्सी ड्राइवर थे, दो-तीन 'मनीचेंज' वाले थे, दो-एक होटल के ऐजेण्टनुमा लोग थे। इनमें से हर एक मुझे सामान समैत अपने साथ ले जाना चाहता था। दूर एक पुलिस का सिपाही खड़ा ये सब देख रहा था। मैंने उसकी तरह मदद करने के भाव से देखा, उसने उपेक्षा से मुंह फ़ेर लिया। अब स्थिति यह भी कि मैं न आगे जा सकता था, न पीछे लौट सकता था। सबसे ज़रूरी यह था कि मैं डालर देकर लोकल करन्सी यानी मनात ले लूं। दस हजार मनात को शीरवान कहते हैं जो करीब सत्तर रुपये के बराबर होता है। मैंने चालीस डालर की करन्सी ली और एक बूढे टैक्सी ड्राइवर के साथ यह सोच कर आगे बढ़ा कि अब जो कुछ होना है हो जाये, मैं क्या कर सकता हूं। इन ड्राइवर साहब से मैंने कहा कि मुझे बाकू की बस पकड़नी है, बस अड्डे ले चलो।

बुजुर्ग टैक्सी ड्राइवर बड़े घाघ निकले। कस्बे में एक जगह आकर उन्होंने टैक्सी रोकी और बोलो- नो बस, नो बस। तीसरी जगह भी यही किया तो मैं समझ गया कि बुर्ज़गवार खेल रहे हैं। सोचा देखो कहां तक खेलते हैं फिर उन्होंने एक सुनसान रास्ते पर टैक्सी रोकी, अपनी जेब से पचास हज़ार मानत का नोट निकाला और इशारा और टूटी-फ़ूटी अंग्र्रेजी में समझाया कि मैं उन्हें ऐसे दो नोट दूं तो वे मुझे बाकू की बस तक छोड़ सकते हैं, जो दूर मिलेगी। चूंकि उन्होंने सुनसान जगह टैक्सी रोककर यह बात कही थी इसलिए मैं टैक्सी से उतर जाता तो जाता कहां? मैं तैयार हो गया। उन्होंने कहा कि पैसे मैं उन्हें अभी दे दूं यानी बस अड्डा पहुंचने से पहले। इस पर मुझे गुस्सा आ गया और मैंने 'पुलिस पुलिस'. . .कहा तब ड्राइवर साहब आगे बढ़े।

कस्बे से गुज़रने लगे। जितना प्रभावित मैं ईरान के आस्त्रा से हुआ था। उतना ही निराश मैं आज़रबाइजान के आस्त्रा से हुआ। अजीब उजड़ा-उजड़ा, गरीब, निरीह, और रंगीनविहीन कस्बा लगा। सोवियत ज़माने के बने घर और ईमारतें दूर से पहचानी जाती हैं। वे भी बुरी हालत में थीं और लोग भी काफ़ी गरीब दिखाई दे रहे थे। टैक्सी क़स्बों से गुजरती रही। अचानक एक जगह सामने से आती बनी-सजी एक औरत आती दिखाई दी। बुजुर्ग टैक्सी ड्राइवर ने उसकी तरफ़ इशारा करके संकेतों द्वारा समझाया कि वह वेश्या है और अगर मैं चाहूं तो वे उसे बुला सकते हैं। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बूढ़े टैक्सी ड्राइवर के दिमाग़ में यह ख्याल इस वक्त क़ैसे आया? क्या मैं ऐसा लगता हूं कि इन हालात में भी मैं किसी वेश्या के पास जाना चाहूंगा। अपनी शकल फिर से देखने की बात सोचने लगा। मैंने उन्हें मना किया।

करीब आधे घंटे बाद टैक्सी एक मुख्य चौराहे पर पहुंची जो टैक्सियों और बसों का अड्डा था। यहां दुकानें भी थी। मैं सुबह का भूखा, प्यासा था और दिन के दो बज रहे थे। दुकान देखकर खुश हो गया। टैक्सी वाले को पचास-पचास हजार के दो नोट देकर मैं उतर आया। बाकू जाने वाली एक मैटाडोर खड़ी थी जिसमें मुझे धर दिया गया। टैक्सी वाले को एक लाख मनात देकर मेरे पास कम ही पैसा बचा था। अब टेंशन यह हुआ कि यहां से बाकू तक का किराया कितना होगा? अगर बस वाले ने भी एक लाख मांग लिये तो मुसीबत हो जायेगी। बहरहाल ऐसा नहीं हुआ। सिर्फ बीस हजार में टिकट दे दिया।

तेल के खेत मैंने पहले कहीं नहीं देखे थे। यहां तेल के खेत देखे। फ़ल और सब्ज़ी की तरह तेल और मोबिल ऑयल बिकते पाया। उसी तरह के पहाड़ जो तेहरान से निकलते हुए दिखाई पड़े थे, दूर तक फैले थे। यहां साथ बैठे लोगों से एक दो बातें करके मैं अच्छी तरह समझ गया कि अज़री में कुछ समझ लेना या फ़ारसी के शब्दों से कुछ काम चला लेना असंभव है। दूसरी तरफ़ सड़क के किनारे लगे बोर्ड भी अपरिचित लिपि में थे। पता नहीं रूसी लिपि थी या तुर्की लिपि थी। मैटाडोर में बैठा एक लड़का मुझसे कुछ बात करने की कोशिश कर रहा था। मैं भी कोशिश में था लेकिन ज्यादा नतीजा नहीं निकल रहा था।

शाम होते-होते बाकू पहुंचे। शहर में सबसे ख़ास बात पूर्व और पश्चिम का मिलन है। मैराडोर ने उतार दिया। साथ यात्रा करने वाले लड़के को मैंने ललितजी के आफ़िस का पता दिखाया। उसने कहा कि वह मैट्रो में मुझे आफ़िस के निकट तक पहुंचा देगा। वहां से टैक्सी ले सकता हूं। ललितजी के आफ़िस पहुंचा तो आफ़िस बंद था। चौकीदार अज़री के अलावा कोई भाषा नहीं जानता था। हां ललित कुमार नाम से यह ज़रूर समझता था कि वह उसकी कंपनी के मालिक का नाम है। बड़ी समस्या पैदा हो गयी। रात घिर आयी थी। आफ़िस भी कुछ सुनसान से इलाके में था। टैक्सियों का भी कोई अता-पता न था। चौकीदार के पास ललितजी के घर का फ़ोन नंबर भी नहीं था। ऐसे कठिन हालात में चौकीदार पड़ोसी को बुला लाया जो थोड़ी अंग्रेजी जानता था उसने ललितजी के आफ़िस में काम करने वाली एक लड़की को फ़ोन किया। लड़की ने ललित जी को बताया कि आपके अतिथि आफ़िस के बाहर खड़े हैं। थोड़ी ही देर में ललित जी अपनी शानदार बी एम डब्ल्यू में आ गये।

बाकू को हवाओं का शहर कहा जाता है। यहां हवाएं खूब तेज़ चलती हैं। जिस मौसम में गया वह अच्छा था, सर्दियों में यही हवाएं जान लेवा हो जाती हैं। लेकिन जान की परवाह कौन करता है? क्योंकि बाकू 'सिल्क रोड' पर बसा एक प्रमुख शहर है। कल्पना कीजिए हज़ारों साल पहले चीन से योरोप का रास्ता कितना कठिन रहा होगा? पश्चिम एशिया अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण संसार के बहुत अधिक कठिन और दुर्गम क्षेत्र माना जाता है। लेकिन रेशम के व्यापारी इन बाधओं को पार करते हज़ारों मील की यात्रा किया करते थे। वे तकलीमकान रेगिस्तान पार करते थे जो संसार का सबसे खतरनाक रेगिस्तान माना जाता है। यहां का मौसम भयानक है। गर्मियों में 40 डिग्री तापमान बढ़कर 50 डिग्री सैल्सियस हो जाता है। रेत की आंधियाँ आमतौर पर चलती रहती है। पानी और बस्तियों का दूर-दूर नामों निशान नहीं है। 'मौत के इस सहरा' को पार करने वाले 'रेशम के व्यापारी' क्या कहे जायेंगे।? साहसिक लोग? लालची लोग? कायर लोग? बहरहाल इन्हें चाहे जो कहिए बाकू इसका गवाह है कि इस तरह के लोग यहां आते थे। आसपास से ही नहीं बल्कि पंजाब और राजपूताना के व्यापारी भी बाकू की सराय में ठहरा करते थे। कभी-कभी मृदंग बजाते साधु, कभी हठयोगी हज़ारों मील की यात्रा करते बाकू पहुंच जाते थे। इस तरह भारतीय व्यापारियों और आध्यात्मिक पुरुषों की पहुंच से बाकू बाहर न था। मैं अपने को क्या मानूं? इसका फैसला पाठक ही करें।

यह मानते हैं कि जहां पैसा पहुंचता है वहां धर्म भी पहुंच जाता है, कला भी पहुंचती है, साहित्य भी पहुंचता है और क्या है जो नहीं पहुंचता। बाकू में धन आया तो सब आ गया।

बाकू मध्यकाल में उस समय महत्वपूर्ण हो गया जब भूचाल के कारण शिरवान से राजधानी बाकू आ गयी थी और लगभग सौ साल तक शहर का विकास होता रहा।

व्यावसायिक नगर के रूप में बाकू की ख्याति बहुत प्राचीन हैं। 1572 में एक ब्रिटिश कम्पनी ने बाकू का दौरा किया और पाया कि यहां तेल का अथाह ख़जाना है। इस तेल के ख़जाने की जानकारी स्थानीय या आसपास के लोगों को पहले से थी और मध्यकाल के विद्वान अब्दुर्रशीद-अल-बाकुवी ने लिखा था कि यहां तरह-तरह का तेल होता है। तेल के अलावा पीले रंग का एक पदार्थ भी मिलता है जो मोमबत्ती की तरह जनता है। अब्दुर्रशीद ने यहां की हवाओं का बड़ा भयावह चित्रण किया है। लिखा है कभी-कभी दुम्बे और घोड़े तक उड़कर समुद्र में पहुंच जाते हैं।

हमारे यहां एक कहावत है 'पढ़े फ़ारसी तेज बेचे तेल, ये देखो क़िस्मत के खेल?' लेकिन तेल बेचना मध्य एशिया या ईरान में अपमानजनक नहीं है। योरोप के देशों में आज़रबाइजान का तेल बेचने के लिए कड़ी प्रतिर्स्पधा थी। यही कारण है कि बाकू योरोप के कई देशों और एशिया के स्थापत्य कला का एक अनोखा संगम है। ब्रिटिश, फ्रेंच, जर्मन, इतालवी कम्पनियों की उपस्थिति शहर को लगातार निखारती रही है।

तेहरान से बाकू आना अपने आप में एक अजीब अनुभव है। लड़कियों को 'हिजाब' में देखने की आदी आंखों की रौशनी बढ़ जाती है। बाकू एक मुक्त शहर लगता है। रहने वाले सब मुसलमान हैं लेकिन इस्लाम या धर्म का कोई आतंक नहीं है। लगता है पूर्वी योरोप को कोई शहर है जिसे उठाकर मध्य एशिया में रख दिया गया है।

आज़रबाइजान जाने से पहले मैं यह मानता था कि मध्य एशिया के इन देशों पर सोवियत संघ ने जो अधिकार जमा लिया था वह बहुत ग़लत था, लेकिन अब यह विश्वास के साथ कह सकता हूं कि ऐसा नहीं है। आज आज़रबाइजान एक पढ़ा-लिखा देश है। अधिकतर आबादी मध्यम वर्ग है। शहरों कस्बों में स्कूल, अस्पताल है, सड़कें हैं, बिजली है। लोगों के दिमाग़ खुले हुए हैं। सफ़ाई-सुथराई है। पर्यावरण के प्रति लोग सचेत हैं। मानवीय संबंध और विशेष रूप से स्त्री पुरुष संबंध सहज और सामान्य है। यह सब कैसे हुआ? इतना तय है कि अगर सोवियत यूनियन के साथ ये देश न होते तो आज उनकी स्थिति लगभग अफ़गानिस्तान जैसी होती। हम यह तो नहीं कह सकते कि आज़ादी हर शर्त पर स्वागत योग्य है लेकिन यह कह सकते हैं कि मनुष्य और समाज का कल्याण ही आज़ादी की पहली शर्त है।

ललित कुमार बाकू में व्यापार करते हैं। आपने देखा होगा कि कुछ लोग किसी विशेष क्षेत्र में बहुत सफ़ल हो जाते हैं लेकिन उनका व्यक्तित्व उस क्षेत्र के अनुकूल नहीं होता। ललित भी ऐसे ही लोगों में हैं। व्यापार में और विशेष रूप से तेल के व्यापार में उन्हें अपार लाभ हुआ है। 'रियल स्टेट' बेज़नेस में उन्होंने करोड़ों डालर कमाया है। मध्य एशिया में ही नहीं योरोप में उनके रेस्त्रां की 'चेन' है लेकिन उन्हें देखकर लगता है कि यह आदमी इतना सफ़ल व्यापारी कैसे हो सकता है क्योंकि वह तो हर समय शेरो-शायरी, संगीत, साहित्य और कलाओं में डूबा रहता है। वह उठते बैठते ग़ज़लों के शेर पढ़ता है वह सपने में 'लूर्व' जाता है। कल्पना में मेंहदी हसन से बतियाता है। सफ़ल व्यापारी के लिए जितना व्यवहारिक होना ज़रूरी है ललित कुमार उतने ही अव्यवहारिक हैं।

14

हवा का रुख़

पच्चीस साल पहले ललित कुमार लुधियाना से व्यापार करने तेहरान आये थे। ये शाह का ज़माना था और तेल की खरीद करने वाली कम्पनियां टैंकरों में तेल लेकर बंदरगाह तक ले जाती थीं। ललित कुमार ने तेल ले जाने का एक छोटा-सा ठेका लिया और कारोबार शुरू हो गया। लेकिन ग़ज़ब यह हुआ कि ललित कुमार क्लासिकी फ़ारसी शायरी की गिरफ्त में आ गये। फिरदौसी और हाफ़िज़ का कलाम उनका तकिया कलाम बन गया। व्यापार चलता रहा है और ललित फ़ारसी शायरी और संगीत में रमते चले गये। उन्होंने बताया था_ दस साल पहले पहली बार जब बाकू आया था तो फ्लाइट रात में पहुंची थी। एयरपोर्ट पर अंधेरा था। सर्दियों के दिन थे। हीटिंग भी नहीं थी। रात के वक्त टैक्सियां भी नहीं थीं। हालांकि मेरी होटल में बुकिंग थी लेकिन वहां पहुंच ही नहीं सकता था। रात ओवर कोट में एक ठण्डी कुर्सी पर गुज़ारी। दस साल बाद आज जिस विशाल इमारत के सबसे ऊपरी फ्लोर पर ललित का सुपर डीलक्स फ़्लैट है, वह उन्हीं की है। फ़्लैट में लीविंग रूम, टी.वी. लॉज, बिल्यर्ड रूम, लायब्रेरी, स्वीमिंग पूल, 'सोना' बाथ और टेरिस गार्डेन है।

मुझे ललित जी ने जब वह कमरा दिखाया जहां मुझे रहना था तो लगा कि बस जिंदगी में न कभी ऐसा हुआ था न आगे होगा। इस विशाल डीलक्स फ़्लैट में ललित अकेले रहते हैं। नौकरों के लिए इसी बिल्डिंग में क्वार्टर्स हैं, ड्राईवर, गार्ड, सफ़ाई वाले नौकर, खाना पकाने वाली लड़की और उनका सेक्रेटरी इसी इमारत में हैं। ललित जी बाकू में भी तेल का कारोबार करते हैं। उनके टैंकर तेल लेकर टर्की के बंदरगाहों तक जाते हैं। 'रियल स्टेट' का काम भी कर रहे हैं। रेस्त्रां भी है और अब कई हजार एकड़ पर लाल मिर्च की खेती भी करा रहे हैं।

सुबह आंख खुली तो हल्के संगीत के साथ किसी के गाने की गंभीर आवाज़ सुनाई दी। यह आवाज़ भीमसेन जोशी की आवाज़ की तरह बिलकुल अंतर की गहराईयों से निकलने वाली आवाज़ थी। ध्यान से सुनने पर पता चला कि फ़ारसी में कुछ गाया जा रहा है। आवाज़ कहां से आ रही है, यह अंदाज़ा लगाना चाहता था पर लगा कि शायद कमरे में चारों तरफ़ से आ रही है। बाहर निकला तो लगा यह आवाज़ यहां भी है और लिविंग रूम में गया तो देखा ललित जी अख़बारों के गट्ठर में डूबे हैं मुझे देखकर मुस्कुराये।

_ नींद तो अच्छी आई होगी? उन्होंने कहा।

निश्चय ही पूरे दिन की शारीरिक और साथ-साथ मानसिक मेहनत ने नींद को गहरा किया था।

नाश्ते पर पता चला कि ललित जी पूरी तरह ईरानी आज़री रंग में रच-बस चुके हैं। उन्होंने बताया कि उनके यहां खाना, नाश्ता, चाय सब कुछ अज़री है। जैसा देश वैसा भेस। हमें नाश्ता एक लड़की करा रही थी जिससे मेरा परिचय कराया गया। ललित जी ने उसका नाम ज़ाले बताया। दुबली पहली तीखे नक्शो निगार वाली यह लड़की बड़ी फुर्ती और सम्मान के साथ नाश्ता करा रही थी। लड़की अंग्रेजी बोल रही थी। नाश्ते पर ललित जी ने बताया कि आज़रबाईजान की पुरानी इमारतें और प्राचीन शहर कई सौ साल पहले भूकम्प में नष्ट हो चुके हैं। अब भी कुछ इमारतें बची हैं उन्हें देखा जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि आज़रबाईजान देखना है तो मुझे छोटे कस्बों में जाना चाहिए जहां इस देश का इतिहास है।

नाश्ते के बाद मैंने उनसे पूछा कि ये तो बताइये ये संगीत और गायन कैसा था जो मैंने उठते ही सुना था।

ललित जी हंसने लगे। बोले, मैं हर रोज़ सुबह हाफ़िज़ की एक ग़ज़ल सुनता हूं। यहां पूरे फ़्लैट में एक साउण्ड सिस्टम है जो हर कोने में आवाज़ को इस तरह पहुंचाता है कि लगता है कि आवाज वहीं से आ रही है। आज सुबह आप हाफ़िज़ शीराज़ी की ग़ज़ल सुन रहे थे।

नाश्ते के बाद ललित जी आफ़िस चले गये। वे मेरा आज का प्रोग्राम बना गये थे। वह यह था कि ज़ाले, वही लड़की जो हमें नाश्ता करा रही थी, मुझे शहर घुमाने ले जायेगी।

अजनबी शहर में घूमने का एक मज़ा है और अजनबी लड़की के साथ अजनबी शहर घूमने का अपना अलग मज़ा है। ज़ाले ने ललित जी का हुक्म सुनाते हुए कहा था_ सर ने कहा है कि आपको पुराना शहर घुमाया जाये। मैंने टैक्सी बुला ली है। हम पुराने शहर जायेंगे। उसके बाद आपको किसी चायख़ाने में मुरब्बे के साथ चाय पिलाऊंगी। फिर हम लंच तक घर आ जायेंगे। साहब लंच घर पर ही करते हैं। आपके लिए आज घर में आज़री मछली पकाई जायेगी और उसके साथ न्यूडल्स होंगे और. . .।

टैक्सी ड्राइवर एक बहुत सजीला नौजवान था। मैंने सोचा ये कितना अच्छा मौक़ा है, मैं ज़ाले की मदद से टैक्सी ड्राइवर से बातचीत कर सकता हूं लेकिन पहले तो ज़ाले से ही परिचय प्राप्त किया जाये। ज़ाले ग्रेजुएट है। अंग्रेजी में बी.ए. किया है। उसके बाद किसी स्कूल में पढ़ाती थी। वहां काम बहुत था और नौकरी पक्की नहीं थी इसलिए अब ललित जी के यहां काम करती है, ललित जी के यहां काम करती है, ललित जी उसे बेटी की तरह मानते हैं। उसके जन्म दिन पर उसके घर जाते हैं। वहीं खाना खाते हैं। उसे चमत्कृत कर देने वाले उपहार देते हैं। ज़ाले की अभी शादी नहीं हुई है। एक लड़का है जिससे वह प्रेम करती है। पर किसी को उस लड़के के बारे में कुछ मालूम नहीं है। कहती है जब तक विवाह नहीं हो जाता वह लड़के के बारे में किसी को नहीं बतायेगी। ज़ाले धार्मिक है वह शिआ मुसलमान है। मुहर्रम में सोग मनाती ; शोक और मातम करती है। उसके पिता कम्युनिस्ट पार्टी के एक प्रमुख नेता थे। उन्होंने उसकी माता से प्रेम विवाह किया था। अब ज़ाले शादी करके घर बसाना चाहती है।

टैक्सी ड्राइवर का नाम तैयर है जो मेरी समझ में नहीं आया। शायद यह तैयब होगा जो बिगड़ते-बिगड़ते तैयर हो गया है। तैयर काफ़ी शर्मीले किस्म के नौजवान हैं। उसके पास भविष्य के लिए कोई योजना नहीं है। टैक्सी अपनी है। आमदनी ठीक-ठाक हो जाती है। शादी अभी नहीं की है न किसी से प्रेम करता है।

हमें शहर के केन्द्र पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। एक चौराहे पर किसी औरत की बड़ी कलात्मक और भव्य प्रतिमा खड़ी थी। ज़ाले ने बताया कि यह औरत अपीन 'चादर' फेंक रही है। उसने यह भी बताया कि सोवियत यूनियन के समय यहां नारी सुधार के बड़े आंदोलन चले थे। इसके परिणाम स्वरूप पर्दा व्यवस्था को ख़त्म हो गयी थी। नारी शिक्षा पर ज़ोर दिया गया था। यह प्रतिमा यहां नारी मुक्ति का प्रतीक मानी जाती है।

बाकू में एक 'ओपेन एयर म्यूज़ियम' है। प्राचीन नगरों की तरह यहां भी शहर के चारों तरफ़ एक दीवार हुआ करती थी। वैसी ही जैसी दिल्ली के चारों तरफ़ थी, और अब उसके टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। बाकू का पुराना शहर इस शहरपनाह के अंदर है जो आज एक संग्रहालय जैसा महत्वपूर्ण है।

हमारी टैक्सी समंदर के किनारे पुराने शहर के पास रुकी। सामने एक मीनार-सी दिखाई पड़ रही थी। यह मीनार निश्चय ही दूर से आने जाने वालों को देखने और पहचानने के लिए बनाई गयी होगी। इसे बारहवीं सदी में एक पुरानी मीनार के स्थान पर बनाया गया था। इसे 'गिज़ ग्लासी' कहते हैं। ज़ोला ने मुझसे पूछा कि क्या मैं इसके ऊपर चढ़ना चाहता हूं? कुतुब मीनार के बिल्कुल ऊपर तक चढ़ चुके आदमी से यह सवाल काफ़ी बचकाना था। मैंने मना कर दिया लेकिन कैमरा सीध करके मीनार की कुछ तस्वीरें ज़रूर खींच ली। शहर का यह हिस्सा दरअसल अपने अंदर कई साम्राज्यों की यादें समेटे हुए हैं। यहां अग्निपूजक ईरान के पहले बड़े साम्राज्य अख़ामनश, दूसरे बड़े साम्राज्य सासानी, अरबी शासन, ईरान के परवर्ती शासकों, शीरवानी सम्राटों, तुर्की साम्राज्य और बाद में सोवियत यूनियन दौर की प्रति छायाएं दिखाई पड़ती हैं।

मीनार के पास एक सराय के खण्डहर थे इसके साथ पुरानी बाज़ार के दर भी थे जहां दुकानें लगती होंगी। पीछे तुर्की स्टाइल का एक हम्माम नज़र आया। मीनार के पास कुछ लोग पुराना समान बेच रहे थे। मैंने प्राचीन बाज़ार की पृष्ठभूमि में तैयर का एक फ़ोटो खींचा।

आगे शीखानशाह का किला था जिसके अंदर अब व्यवसायिक दबाव के कारण रेस्त्रां चल रहे हैं। यह प्राचीन किला बिल्कुल एशियाई या कहना चाहिए अपने देश के किलो जैसा ही लगा पर इसके अंदर की इमारत सलामत नहीं है। किले के दूसरे दरवाजे से हम बाहर आये तो सामने पार्क में एक विशाल मूर्ति लगी थी। मैंने पूछा तो ज़ाले ने बताया यह अज़रबाइजान के राष्ट्रकवि निज़ामी की प्रतिमा है। कवियों का ऐसा सम्मान मैंने योरोप में ही देखा था। एशिया में यह देखकर खुशी हुई और इसके बारे में मैंने ज़ाले से कहा तो उसने आज़रवाईजान करंसी का एक पांच सौ मनात का नोट निकालकर दिखाया जिस पर निज़ामी का चित्र बना था। उसने कहा कि हम तो कवियों को इतना सम्मान देते हैं कि उनके चित्र नोटों पर छापते हैं। मेरा सिर शर्म से झुक गया। कालिदास, ग़ालिब और टैगोर जैसे कवियों में से किसी का चित्र नोट पर छोड़िए सड़क पर भी नहीं मिलता। याद आया कि हंगरी की राजधनी बुदापैश्त में प्रमुख चौराहों के नाम कवियों, लेखकों, चित्रकारों, संगीतकारों, विद्वानों के नाम पर हैं। कोई प्रसिद्ध व्यक्ति यदि किसी इमारत में रह चुका होता है तो इमारत के बाहर पत्थर पर यह लिख कर लगा दिया जाता है कि अमुक-अमुक वैज्ञानिक लेखक, चित्रकार यहां इस समय में इस समय तक रहता था। क्या दरिद्र देश ही अपनी प्रतिभाओं का सम्मान नहीं करते? क्या इसी कारण वे दरिद्र होते हैं कि अपनी प्रतिमाओं का सम्मान नहीं करते?

_ आप क्या सोचने लगे? ज़ाले ने पूछा। वह मेरा पूरा ध्यान रख रही थी कि 'सर' के मेहमान को कुछ बुरा न लग जाये। ये बूढ़ा कहीं गिर न पड़े इसलिए अक्सर मुझे ज़रूरत पड़ने पर सहारा भी दे देती थी।

_कुछ नहीं, कुछ नहीं, मैंने कहा।

निज़ामी की तस्वीरें खींची और हम आगे बढ़े। अब शहर का योरोपियन हिस्सा शुरू हुआ। लगा मध्य योरोप में आ गये हों। पर्यटकों की भीड़-भाड़ चहल-पहल जो ईरान में नहीं है, यहां देखी।

ज़रूरत कुछ डालर चेंज कराने की थी क्योंकि आस्त्रा में बुर्जुगवार टैक्सी ड्राइवर एक लाख मनात झटक चुके थे। यहां बज़ार में जगह-जगह 'चेंजमनी' की दुकानें थीं जो ईरान में नहीं दिखाई देती। चालीस डालर चेंज कराये। ज़ाले ने कहा कि मैं पैसे सुरक्षित ढंग से रखूं क्योंकि 'लोग' अच्छे नहीं हैं। मैं मुस्कुरा दिया।

शहर की कुछ योरोपीय किस्म की इमारतें देखने के बाद हम लोग लौट आये। दोपहर को पक्का अज़री खाया। खाने की मेज़ पर ललित जी ने मेरा शाम का प्रोग्राम बना दिया। उन्होंने कहा कि आप शाम को 'कैम्पियन सी' के किनारे चाय पियेंगे। आपको ज़ाले और मेरी सेक्रेटरी वहां ले जायेंगे।

मुझ यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पहली ही मुलाकात में ललित जी मेरे बारे में यह कैसे समझ गये कि मुझे क्या पसंद है क्या नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि वे शाम को किसी 'बिजनेस डिनर' में फंस गये हैं, नहीं तो वे भी साथ चलते।

बाकू में समुद्र के तट पर दूर-दूर तक पार्क और टहलने की जगहें बनायी गयी हैं। इन्हीं पार्कों के अंदर पेड़ों और लताओं के झुरमटों के पास चाय के रेस्त्रां हैं। यहां जाने के रास्ते बहुत कलात्मक हैं यानी ऐसा लगता है कि आप नदी पर बने किसी पुल को पार करने के लिए रेस्त्रां में जा रहे हैं। मैं शाम के घुंघलके में ज़ाले, ललित जी की सेक्रेटरी गुल और टैक्सी ड्राइवर तैयर के साथ समुद्र के तट पर टहल रहा था। यहां भीड़ तो नहीं थी, लोग थे। इन्हीं लोगों में कुछ महिला चेहरे देखकर मैं ठिठक गया। लगा यही हैं वे कोहेक़ाफ़ की परियां। लेकिन यह बात किसी से पूछी नहीं जा सकती थी। ये लड़कियां उन सब लड़कियों से बिलकुल अलग थीं जिन्हें मैंने उस वक्त तक जिन्दगी में देखा था। इनके बाल इतने काले थे कि काला रंग भी इनके सामने फ़ीका पड़ रहा था। इनके क़द लंबे थे। शरीर का गठन बहुत सटीक और कलात्मक और नाजुक ही नहीं बल्कि गरिमापूर्ण था। इनका रंग न तो सफेद गोरा था और न सांवला था। एक अजीब रहस्यमयी रंग था इनके चेहरों का। इनके माथे चौड़े थे। नक्शों निगार लगता था किसी चित्रकार ने बनाये थे। वे गरिमा, जीवन्तता और सुंदरता का अद्भुत मिश्रण लगी, लगा नारी का इससे श्रेष्ठ स्वरूप हो ही नहीं सकता। कहते हैं मुगल सम्राट अकबर की एक पत्नी कोहेक़ाफ़ की थी जिसका नाम मरियम था।

हमारी बायीं तरफ़ समंदर था, हम एक चौड़े रास्ते पर चल रहे थे, दाहिनी तरफ़ एक पानी की कृत्रिम नहर थी उसके ऊपर छोटे-छोटे पुल से बने थे। नहर के दोनों तरफ़ पेड और लतायें थी। हम लोग सीढ़ियों पर चढ़ने लगे और नहर के उस पार एक रेस्त्रां के अंदर गये। रात के अंधेरे में पेड़ों के नीचे मेजें लगी थीं। हम एक जगह बैठ गये। कुछ ही देर में चाय और मुरब्बे हमारी मेज़ पर आ गये। मैं चाहता था कि इन लड़कियों से अधिक जानकारी मिल सके। यहां के समाज के बारे में, लोगों और जीवन के बारे में। पर पता नहीं कैसे पूरी बातचीत धर्म पर केन्द्रित हो गयी और पता चला कि वे तीनों ईश्वर पर पक्का विश्वास करते हैं। धार्मिक हैं पर अपने को आधुनिक मुसलमान कहते हैं। टैक्सी ड्राइवर तैयर के बारे में पता चला कि वे सब कुछ खा-पी लेते हैं पर अपने को मुसलमान मानते हैं।

15

परियों की तलाश में

मैं बाकू में घूमा कम, आराम ज्यादा किया। सुबह-सुबह आलौकिक संगीत से उठता था। चाय पीता था। ललित जी से दुनियां जहान की बातें होती थी। तैयार होकर आज़री नाश्ता करता था। ललित जी आफ़िस चले जाते थे। ज़ाले आ जाती थी। उसके साथ चाय का दौर चलता था। वह कभी अपने माता-पिता के प्रेम प्रसंगों की चर्चा करती थी, कभी बताती थी कि उसके पिता उसका कितना ध्यान रखते हैं। कभी यह किस्सा छेड़ बैठती थी कि सोवियत ज़माने में उसकी माता आज़री कढ़ाई किए कपड़े बेचने मास्को तक जाती थी। कभी अपने पिताजी की कम्युनिस्ट गतिविधियों की चर्चा करती थी। इस बीच वह लंच की तैयारी भी करती रहती थी। ललित जी का ड्राइवर भी आ जाता था। वह निहायत व्यवहारिक आदमी था। चाय पी, दो बिस्कुट खाये और चला गया। लगता था उसे दुनिया जहान से कोई मतलब नहीं है।

ग्यारह बारह बजे मैं तैयार हो जाता था। दोपहर में ललित जी के साथ शानदार लंच होता था। वे घण्टा भर आराम करते थे। मैं दो घण्टे आराम करता था। शाम को वे चले जाते थे और मैं निकल पड़ता था अकेले शहर के भ्रमण पर। शराबखाने, चायखाने, समन्दर के किनारे बने रेस्त्रां, पश्चिमी ढंग की पुरानी इमारतें आदि आदि। रात के खाने के बाद ललित जी की लायब्रेरी में नियमित बैठक होती थी और कला, साहित्य, संस्कृति की चर्चाएं हुआ करती थी। लायब्रेरी से निकलते समय कोई किताब उठा लेता था और रात बारह एक तक पढ़ता रहता था। इसी बीच ललित जी ने मुझे बाकू में इतनी तरह के खाने खिलाये कि नाम भी याद नहीं।

_ 'अरे यार तुम घूमने आये हो, आराम करने नहीं आये।' एक दिन मैंने अपने आपको धिक्कारा।

रात के खाने के समय मैंने घोषणा कर दी कि मैं कल गूबा जा रहा हूं। बताया गया कि यह कोहेक़ाफ़ में एक अच्छा कस्बा है जहां बहुत सी रोचक चीजें हैं।

_ 'ज़रूर जाइये. . .कोहेक़ाफ़ की परियां देखना चाहते हैं?' ललित जी ने छेड़ा।

_ पर आप जायेंगे कैसे? आप भाषा तो जानते नहीं। ज़ाले ने घबराकर कहा।

_ 'अरे तो क्या हुआ? भटक जाऊंगा? खो जाऊंगा और क्या हो सकता है?'

_ 'नहीं नहीं. . .मेरी दोस्त का ब्वाय फ्रेंड गूबा में टैक्सी चलाता है। मैं उसको फ़ोन करती हूं।' ज़ाले ने कहा।

बहुत जल्दी सब कुछ तय हो गया। मैं आठ बजे की बस से गूबा जाऊंगा। ज़ाले की दोस्त का ब्याय फ्रेंड करीम मुझे बस स्टैण्ड पर मिलेगा और कस्बा घुमायेगा। वह मुझे आसानी से पहचान लेगा क्योंकि उसने आज तक कोई इण्डियन नहीं देखा है।

चल दिए जहां की साध लेकर आये थे। बाकू से बस चली- गूबा के लिए और रास्ते में पहाड़ ऊंचे होते गये। पेड़ हरे होते गये। झरनों का पानी साफ़ होता गया। बादलों का रंग सुरमई होता गया। एक बजे के करीब बस गूबा बस अड्डे पर रुकी। मैं उतरने भी न पाया था कि नीचे खड़े किसी आदमी ने हाथ हिला-हिलाकर मेरा स्वागत करना शुरू कर दिया- करीम. . .नीचे करीम खड़े थे। मैं उनसे मिला। हम एक शब्द- 'सलाम' के अलावा, एक दूसरे से और कुछ नहीं बोल सके। 'जबाने यार तुर्की है।'

आज़रबाईजान एक खानदेश था। गूबा भी एक खानदेश था। केन्द्रीय सत्ता के कमज़ोर पड़ते ही प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं ने अपने छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे जिन्हें अंग्रेजी में खानेट कहा जाता है। गूबा खानदेश की स्थापना 18वीं शताब्दी के मध्य में गूबा खान हुसैन अली ने की थी। उसने यहां अपना किला बनवा कर शहर के चारों तरफ़ दीवार भी खड़ी कराई थी। अन्य खानदेशो की तरह गूबा भी 1913 में रूस द्वारा जीत लिया गया था।

गूबा आने के दो आकर्षण थे। पहला 'कोहेक़ाफ़' की परियों को देखना और दूसरा गूबा के पास बनी मध्यकालीन यहूदी बस्ती का जायजा लेना। ज़ाहिर है कि 'कोहेक़ाफ़' की परियां किसी एक जगह नहीं मिलेंगी किसी इमारत की तरह कहीं जाकर उन्हें देखा नहीं जा सकेगा। यह मैं जानता था। इसलिए अपने अनुमान और दिए गए विवरण के अनुसार मैं स्थानीय महिलाओं में 'कोहेक़ाफ़' की परियों जैसी लड़कियों को देखने की कोशिश करने लगा। गूबा के पास एक प्राचीन अग्नि मंदिर भी है और उसे देखना भी ज़रूरी था। इसके अलावा शहर में तुर्की ढंग से पुरानी मस्जिद और हम्माम की इमारतें भी देखना चाहता था। मित्र टैक्सी चालक ने मुझे टैक्सी पर बिठाया और गुदियाल नदी के उस पार पहाड़ों पर स्थिति यहूदियों की बस्ती की तरफ़ रवाना हो गये। नदी बड़ी थी लेकिन पानी बहुत कम था। नदी का दूसरा किनारा काफ़ी ऊंचाई पर था और टैक्सी कई चक्करदार सड़कों पर से गुजरती उस बस्ती में पहुंच गयी। सीधी और अच्छी खासी चौड़ी गलियों के इधर-उधर घर बने थे लेकिन अजीब बात यह लगी कि बस्ती में लोग नजर नहीं आ रहे थे।

यह भी लग रहा था कि घर खाली है। बिना लोगों की बस्ती से टैक्सी गुजरती रही। कुछ घर तो अन्य पुराने अज़री घरों जैसे थे। लेकिन उनमें अहाता या कम्पाउण्ड नहीं था। कुछ दो मंजिले घरों में इतालवी ढंग की बाहर को निकली खिड़कियां बहुत रोचक लगी। मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर भी इसी तरह की बाहर को निकली बालकनी नुमा खिड़कियां काफ़ी घरों में देखी। दो-तीन गलियों में घूमने और इक्का दुक्के लोग देखने के बाद पता चल गया कि यहां की यहूदी आबादी इज़राइल बनने के बाद वहां चली गयी है क्योंकि बूढ़े लोगों के अलावा कोई और नहीं दिखाई पड़ रहा था। यहूदी के धर्म स्थल 'सेनेगॉग' के सामने भी सन्नाटा ही था। हो सकता है शाम के वक्त कुछ लोग रहते हों।

यहूदी बस्ती से निकलकर हम पुरानी अज़री बस्ती आ गये जहां प्राचीन मस्जिद है। ये बिल्कुल तुर्की ढंग की मस्जिद लगी। एक ऊंचा-सा मीनार और गोल नहीं बल्कि कुछ अण्डाकार बड़ा-सा गुम्बद मस्जिद के तुर्की स्टाइल को स्थापित करता था। आसपास की आबादी में कट्टर मुसलमान जैसे लगने वाले लोग नहीं थे। मस्जिद के बाद हम लोग एक दरगाह देखने गये। जिसकी फ़ोटो खींचने पर वहां मौजूद मौलवी किस्म के आदमी ने टैक्सी ड्राइवर से कुछ नाराजगी जाहिर की। मैं भाषा न जानने के कारण साफ़ बच गया।

शहर के पुराने हिस्से में एक जगह टैक्सी से उतर कर हम लोग चाय पीने जा रहे थे। यहां लड़कियों का एक गिरोह देखा जो निश्चित रूप से 'कोहेक़ाफ़' की परियों के विवरण से मिल रही थी।

नख शिख वर्णन करना कवियों का काम है। दुर्भाग्य से मेरे अंदर न तो उतनी क्षमता है और न शक्ति है। लेकिन फिर भी चूंकि 'कोहेक़ाफ़' की परियों के बारे में इतना लिख चुका हूं इसलिए बचा भी नहीं जा सकता। पहली बात इन लड़कियों के बारे में बहुत साफ़ लगी और वह यह कि ये अन्य लड़कियों से अलग लगीं। इनकी अलग पहचान भी साधारण नहीं है बहुत प्रमुख पहचान है। आमतौर पर इनका कद लंबा है लेकिन लंबाई इतनी नहीं है जो बुरी लगे। कद और काठी का संयोजन संभवत: क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति की वजह से बहुत सही और प्रभावशाली है। ऐसा नहीं है कि शरीर का एक हिस्सा अतिरिक्त रूप से दूसरे हिस्सों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता हो। शरीर की विशेष बनावट की वजह से उनके चलने फिरने, खड़े रहने में एक राजकीय ठसक भी आ गयी है जो बहुत गरिमामय लगती है। पैर बिल्कुल सीधे हैं, कमान की तरह तिरछे नहीं हैं। जहां तक चेहरे का सवाल है, मीर तकी 'मीर' के अनुसार_ जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आयी - वाला हाल है। लगता है इनका जन्म मां के पेट से नहीं हुआ है बल्कि किसी चित्रकार ने बड़े इतमीनान, लगन, उत्साह और समर्पण के साथ इनके नक्शो निगार बनाये हैं। चेहरे ही नहीं व्यक्तित्व का एक बड़ा हिस्सा इनके बाल लगे। काले इतने ज्यादा के काला रंग की शरमा जाये। पता नहीं इस काले रंग को क्या कहेंगे जिसमें चमक भी है और बेहिसाब काला रंग भी है। काले बाल पतले नहीं बल्कि खासे मोटे हैं। माथा चौड़ा है किताबी, खुले हुए चेहरे पर चौड़ा समतल और चारों ओर से आनुपातिक माथा चेहरे को एक विस्तार देता सा लगता है। माथे के नीचे भवें भी काली और घनी होती हैं लेकिन इनका रूप बहुत सधा हुआ लगता है। दोनों आंखों के ऊपर बीच से भवें 'अलिफ़' के अंदाज़ में शुरू होती हैं यानी एक काली मोटी लकीर जिसे शुरू करने से पहले क़लम को थोड़ा दाब दिया गया हो और कलम ने अपनी चौड़ाई से कुछ ज्यादा चौड़ी शुरुआत की हो। भवें इस तरह शुरू होकर बिल्कुल सीधी आगे बढ़ती है और फिर आकर्षक ढंग से नीचे को झुक जाती हैं। इस क्रम में उनकी मोटाई लगातार कम होती चली जाती है जो अंतिम बिंदु तक साफ़ नज़र आती है। पलकें इतनी घनी, काली और लंबी होती हैं कि आखों के चारों तरफ़ एक काला-सा हाला दिखाई पड़ता है। इस काले, गतिमान हाले के बीच सफेद आंखों की चमक बढ़ जाती है। आंखें मध्यम आकार की ही होती है। पलकों की वजह से आंखों तक पहुंचना कुछ आसान नहीं होता।

चेहरे पर जो कुछ भी है, तीखा है, नाक है तो सितुवां हैं, कहीं किसी छोटे से छोटे बिन्दु पर उंगली रख कर यह नहीं कहा जा सकता कि प्रकृति यहां चूक गयी है। इसी तरह तराशे हुए होंठ जिनका प्राकृतिक रंग ताज़गी और खुशी दर्शाता है।

16

तेल के खेल

कुछ दिन के बाद ललित जी कुछ 'फ्री' हुए तो उन्होंने कार्यक्रम बनाने शुरू कर दिए। बाकू के बाहर तेल के खेत दिखाने ले गये। मशीनों से लगातार तेल निकलता है। एक पाइप जमीन के अंदर से उसी तरह कच्चा तेल खींचता है जैसे हैण्डपम्प से पानी बाहर निकलता है। यह तेल पाइप के माध्यम से एक जगह पहुंचता रहता है और वहां से तेल शोधक कारखाने में चला जाता है या निर्यात हो जाता है। रेगिस्तानी पहाड़ियों पर ले जाकर उन्होनें एक मुरमुरी किस्म की जमीन दिखाई और बताया कि इसमें नीचे गैस है। तेल के कुएं अनगिनत थे। इसके अलावा आज़रबाइजान कैस्पियन समुद्र से भी तेल और गैस निकाल रहा है। मैंने ललित जी से कहा कि तब तो यह देश बड़ा धनवान होगा। उन्होंने कहा मुश्किल यह है कि तेल की सम्पन्नता आम आदमी तक बहुत कम पहुंचती हैं। ऊपर ही ऊपर बहुत से खेल हो जाते हैं। जिनसे बड़ी कम्पनियों बिचोलियों और राजनेताओं की जेबें भर देती है।

सोवियत संघ के टूटने के बाद से ही अमेरिका की नजर मध्य एशिया के तेल पर है। मध्य एशिया के अन्य देशों की तुलना में आज़रबाइजान का तेल पश्चिमी देशों तक ले जाना भौगोलिक दृष्टि से ज्यादा सरल है। आज़रबाइजान के राजनैतिक हालत विशेष रूप से स्वतंत्रता हासिल करने के बाद अरमीनिया के साथ युद्ध और परिणाम स्वरूप देश का बड़ा भू-भाग खो देने के कारण उपजी राजनैतिक अस्थिरता से पश्चिमी देशों को बहुत लाभ हुआ है। सोवियत संघ के विघटन के बाद रूस स्वयं अस्थिरता के दौर में था और आंतरिक समस्याओं से जूझ रहा था इस कारण वह मध्य एशिया में पश्चिमी देशों विशेष रूप से अमेरिका के बढ़ते प्रभाव को रोक नहीं सका।

आज़रबाइजान का तेल पहले सोवियत यूनियन के माध्यम से विश्व मण्डी में पंहुचता था लेकिन अब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश यह तेल सीधे लेते हैं। एक 'ईस्ट वेस्ट इनर्जी कारीडोर' बनाया जा रहा है जिसके माध्यम से आज़रबाइजान का तेल पाइप लाइन के माध्यम से सीध तुर्की के बंदरगाहों पर पहुंचेगा और वहां से बहुराष्ट्रीय तेल कम्पनियां तेल ले जायेंगी। लगभग तीन बिलियन डालर से तैयार होने वाली यह पाइप लाइन बाकू तिबलिसी और सिहान से गुजरने के कारण टी.बी.सी. कहलाती है। यह प्रतिदिन एक मिलियन बैरल तेल भेजने की क्षमता रखेगी। टी.बी.सी. आज़रबाइजान और मध्य एशिया में बनने वाले आर्थिक ही नहीं राजनैतिक समीकरणों पर भी प्रभाव डालेगी। क्षेत्र में पश्चिम का प्रभुत्व बढेग़ा और ईरान पर सरलता से नजर रखी जा सकेगी। दूसरे देश भी इसका लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं। ;क्षेत्र में रूस और चीन का प्रभाव कम हो सकता है। निश्चय ही ये दोनों देश इन हालत से खुश नहीं हैं और मध्य एशिया में अमेरिकी प्रभुत्व को रोकने के लिए शंघाई कार्पोरेशन का गठन किया गया है। इस गठबंधन में किरगिस्तान, ताजिकिस्तान, चीन, रूस, उज्बेकिस्तान और काजाकिस्तान शामिल हैं।

तेल के खेल ने बाकू का चेहरा अच्छी तरह बदला है। लगता है आर्थिक गतिविधियों का बोलबाला है। पिछले दस साल में शहर के अन्दर सैकड़ों की तादात में बड़ी-बड़ी विशाल इमारतें बन गयी है। छोटे मकानों और रिहायशी इलाकों के बीच बनी ये इमारतें कहीं कहीं बड़ी अटपटी लगती हैं। बाकू के बाजार विदेशी सामान और ग्राहकों से खलबलाते हैं तरह-तरह के नये रेस्त्रां बन गये हैं। ललित जी बाकू में बने रेस्त्रां का पूरा हिसाब रखते है। एक दिन ताजमहल में खाना खिलाने ले गये किसी पाकिस्तानी ने यह रेस्त्रां बनाया है। बातचीत के दौरान ललित जी ने बताया कि हालात कुछ ऐसे है कि भारतीय खाने के रेस्त्रां का नाम चाहे वह संसार के किसी कोने में हो 'ताजमहल' या 'महाराजा' ही हुआ करता है। हद ये है कि पाकिस्तानी भी इस नियम का पालन करते है। उप महाद्वीप का खाना भारतीय खाने के नाम पर बेचा जाना विवशता है। ललित जी ने तुर्की खाने का मजा चखाया फिर एक दिन ग्रीक खाना खाने गये। इतालवी और चीनी खाना तो खैर साधारण बात है।

17

अग्नि मंदिर

मनुष्य का कुछ बुनियादी उपलब्धियों में आग और पहिये के आविष्कार को विशेष महत्व दिया जाता है। आग पैदा करना तथा इस्तेमाल करना तो मानव ने बाद में सीखा होगा लेकिन इससे पहले यह ज्ञान हो गया होगा कि आग कितनी विनाशकारी हो सकती है और उसके सामने कुछ भी नहीं ठहरता। तेल और आग का पुराना रिश्ता है। आज़रबाईजान को आग का देश भी कहा जाता है। जमीन के अंदर इतनी गैस है कि कहीं-कहीं पत्थर और मिटटी की तहें तोड़-फ़ोड़कर बाहर निकल पड़ती है और वातावरण के तापमान के कारण जलने लगती हैं। गैस के अथाह भंडार के कारण यह गैस लगातार निकलती और जलती रहती है। आज़रबाईजान में यह दृश्य कई स्थानों पर देखा जा सकता है।

बाकू में एक अग्नि मंदिर है। जिसे अतिशकदा कहा जाता है। ललित जी ने अपनी निजी जिज्ञासा के अंतर्गत इस अग्नि मंदिर के संबंध में काफ़ी सामग्री जमा कर रखी है। मेरी इच्छा और उनके सहयोग से एक दिन मैं ज़ाले और अपने प्रिय टैक्सी ड्राइवर तैयारी के साथ अग्नि मंदिर यानी अतिशकदा की तरफ़ निकल पडे ज़ो बाकू से दस बारह किलोमीटर दूर सुराखानी इलाके में है।

सुराखानी में टैक्सी दाखिल हुई तो लगा काफ़ी पुरानी बस्ती है। कुछ नीचे और पुराने ढ़ंग के मकान, गलियां, पतले रास्ते, छोटी-छोटी दुकानें दिखाई पड़ने लगी। सुराखानी में तेल के अनगिनत कुएं भी नजर आये जो दूर-दूर तक फ़ैले हुए थे। हमारी टैक्सी आबादी को पीछे छोड़कर एक मैदान में पहुंची जो शायद अतिशकदा के लिए कार पार्किंग है। यहां दाहिनी तरफ़ को एक पुरानी हवेलियों या सरायों जैसा फ़ाटक दिखाई पड़ा और उंची चहार दीवारी भी नज़र आयी। दरवाजा और फ़ाटक राजस्थानी या उत्तर भारत की पुरानी शैली में बने हुए हैं। तैयर ने टैक्सी बिल्कुल फ़ाटक के सामने रोकी तो मैंने उनसे कहा टैक्सी कुछ दूर खड़ी करो ताकि फ़ाटक की तस्वीर में टैक्सी न आ जाये। फ़ाटक की तस्वीरें खींचने के बाद हम आगे बढे। फ़ाटक के दरवाजे के ऊपर काले रंग के पत्थर की एक तख्ती पर उँ गणेश नम: लिखा था 'ओम' का निशान भी बना था।

अंदर बिल्कुल सन्ताटा था। सामने एक मंदिर दिखाई पड़ा जिसकी छत बिल्कुल उसी तरह की है जैसी भारतीय मंदिरों की होती है। इस छत पर त्रिशूल भी लगा दिखाई पड़ा। मंदिर के अंदर पत्थर के एक चौकोर से कुण्ड के अंदर से आग निकल रही थी। अहाते में चारों तरफ़ कोठरिया बनी थी जिसके उपर देवनागरी में नामपट्ट लगे हुए थे। इससे पहले हम मुख्य मंदिर की तरफ़ आगे बढ़ते यह पता चला कि अंदर जाने के लिए टिकट लेना पडेग़ा क्योंकि यह एक संग्रहालय है जो सरकार के संरक्षण में है। मुख्य द्वार के अंदर इधर उधर बने बरामदेनुमा कमरों में एक टिकट घर था। तीन टिकट खरीदने के बाद आगे बढ़े।

मुख्य मंदिर के चारों गोल खुले दर हैं। मंदिर की मुख्य इमारत लगभग पन्द्रह फुट लम्बी और पन्द्रह फुट चौड़ी है ऊपर चढ़ने के लिए तीन सीढियां हैं। हम मंदिर के अंदर आ गये। पत्थर के चौकोर हौज से पत्थर के टुकड़ो के बीच से आग की ज्वाला निकल रही थी। इस आग का रंग सामान्य आग जैसा लाल नहीं था, न इसमें धुआं था, न ही इसकी लपटें रंग बदल रही थीं। ये लगातार निकल रही थीं। हवा के झोंकों से जरूर इसमें परिवर्तन आता था। कभी एक दिशा में कभी, दूसरी दिशा में मुड़ जाती थी। यह आग जमीन से निकलने वाली गैस के कारण जल रही थी। बताया गया कि पता नहीं कब से यह आग इसी तरह निकल रही है। मंदिर की शिवाले जैसी छत के ऊपर चार चिमनियों जैसे बूर्ज भी बने थे। रात में इसमें से निकलने वाली गैस को भी जला दिया जाता है। तब मंदिर के ऊपर चार दिशाओं से आग की लपटे निकलती हैं। और नीचे मुख्य मंदिर के अंदर को भी ज्वाला फूटती रहती है।

मुख्य मंदिर में बाहर आकर देखा तो चारों तरफ़ पत्थर की कोठरियां बनी दिखाई पड़ी। अहाता चौकोर नहीं था। हम तीनों एक कोठरी के दर पर पहुंचे। चौकोर दर के ऊपर देवनागरी में खुदा पत्थर लगा था। मैंने फ़ोटो खींची। पढ़ने की कोशिश की तो कुछ नाम पढ़ सका। संवत पढ़ने में आया। अगली कोठरी में गये तो वहां गणेश जी की एक प्रतिमा रखी थी। बताया गया कि यह हाल ही में यहां रखी गयी है। पहले नहीं थी। अगली कोठरी भी खाली थी। पत्थर की ठण्डी दीवारे और नीची छत किसी मध्यकालीन कैदखाने की याद ताजा करा रही थी।

एक तरफ़ कोठरियों में संग्राहलय बनाया गया था। यहां अतिशकदा के पुराने चित्र लगे थे। जो विवरण लिखा था वह रूसी कुछ चित्र पुराने भारतीय व्यापारियों और साधु-सन्यासियों के चित्र थे। अगली कोठरी में अतिशकदा के इतिहास को सजीव करने का प्रयास किया गया था। एक मंडल में आदमी जंजीरो से जकड़ा दिखाया गया था। यह नमूना था उस सज़ा का जो यहां चोरों को दी जाती थी। एक मॉडल में सेठ अपने मुनीम के साथ हिसाब-किताब कर रहा था। एक अन्य प्रस्तुति में कुछ मसाला या दवाएं कूटते लोग दिखाई गये थे।

संग्राहलय से बाहर निकलकर हम फिर अहाते में आ गये। अचानक मुख्य द्वार से दो आज़री औरतें आती दिखाई पड़ी। वे सीधे अतिशकदा में गयी और हाथ फ़ैला कर कुछ प्रार्थना जैसा करने लगी। ज़ाले ने बताया शायद इनकी कोई पुरानी मुराद पुरी हो गयी और वे आभार व्यक्त करने आयी हैं या कोई मन्नत मानने आयी होगीं। इसका मतलब है कि स्थानीय लोग इस मंदिर को पवित्र मानते हैं। इस पर उनकी आस्था है।

अतिशकदे की मैं विभिन्न कोणों से फ़ोटो लेने लगा। मुझे लगा कितने दुख की बात है कि भारत में लोग इसके बारे में कुछ नहीं या बहुत कम जानते हैं। महा पंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने मध्य एशिया के संस्मरणों में इस मंदिर का उल्लेख किया है। शाम को ललित जी ने दो दस्तावेज दिये। जिन्हें पढ़कर अतिशकदा के बारे में बहुत सी बातें स्पष्ट हो गयी। पहली बात तो यह है कि आज़रबाईजान की सरकार ने कुछ वर्ष पहले यूनिस्को लिखा था कि इस मंदिर को 'जोराशट्रियन मंदिर' के रूप में एक विश्व शोध स्मारक की मान्यता दी जाये। इस आवेदन पर एक जोराशट्रियन यानी पारसी शोध संस्थान ने खोजबीन करने के बाद यह निर्णय दिया कि अतिशकदा पारसी मंदिर नहीं है। इसका उल्लेख पिछले दो सौ वर्ष के किसी वृत्तांत नहीं हैं। यह वास्तव में भारतीय व्यापारियों द्वारा स्थापित अग्नि मंदिर है। यह पवित्र स्थान बहुत प्राचीन है। लेकिन 17वीं 18वीं शताब्दी में 'सिल्क रोड' पर व्यापार करने वाले भारतीय विशेष रूप से पंजाब के व्यापारियों ने इसे बनाया था। इसकी देखरेख का कार्य भी वही करते थे। यह मंदिर ही नहीं था बल्कि सराय और व्यापार केन्द्र के रूप में भी स्थापित था। इस मंदिर में साधु सन्यासी आते रहते थे जिनको अक्सर स्थानीय लोगों से असहमति भी हो जाती थी। कुछ पर्यटकों द्वारा दिये गये विवरणों के आधार पर यहां एक हठयोगी भी आया था, जो सात साल पहले अपना एक हाथ उठाये हुए था। अग्नि मंदिर के पुजारियों की व्यवस्था भी भारतीय व्यापारी किया करते थे। कोठरियों पर लिखे विवरण इस बात का प्रमाण है कि समय-समय पर भिन्न-भिन्न भारतीय व्यापारियों ने इन्हें बनवाया था। 'सिल्क रोड' का महत्व समाप्त हो जाने तथा राजनैतिक परिवर्तनों के कारण इस मंदिर से भारतवासियों का सम्पर्क टूट गया था लेकिन यह सराहनीय है कि आज़रबाइजान की सरकार ने संरक्षण दिया है। यह मंदिर इस्लाम धर्म के प्रभाव तथा कम्युनिष्ट शासन के बाद भी सुरक्षित है।

18

फिर वही रास्ता

देखे हुए रास्ते पर चलना कितना तकलीफ़ देह होता है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। लेकिन अफ़सोस यह है कि लोग नये रास्ते नहीं बनाते, बने बनाये रास्ते पर चलना ज्यादा पंसद करते है। जहां इरानियों का सवाल है, उन्होंने तो आजरबाईजान जाने के दसियों रास्ते बनाये थे लेकिन इतिहास उन रास्तों को बंद करता चला गया और अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा है जिससे मैं आया था। मतलब यह है कि वापस ईरान जाने के लिए आस्त्रा आना ही एक मात्रा रास्ता था। मैंने दसियों लोगों से पूछा कि क्या कोई दूसरा रास्ता, मतलब कोई और बॉर्डर भी है जहां से ईरान में दाखिल हो सकते हैं? लेकिन बताया गया नहीं।

बाकू से आस्त्रा तक का सफ़र देखे हुए रास्ते और उस रास्ते को देखना था जिस पर कुछ नहीं है। निर्जीव पहाडियां हैं। तेल के खेत और दूर-दूर फैली इक्का-दुक्का बस्तियां कुछ गावं कस्बे चौराहे और खस्ताहाल सड़क। दोपहर होते-होते सीमा तक पहुंच गया यह वही बॉर्डर है जहां आते समय 'कुछ' मांगा गया था और मैं बडी मुश्किल से जान बचा सका था।

बॉर्डर या कस्टम चौकी पर टैक्सी ने छोड़ा तो कुछ लोग पीछे लग गये, वे अजरी में जाने क्या क्या कह रहे थे। शायद होटल वालों के ऐजेण्ट थे या टैक्सी वाले थे। मैं सबसे पीछा छुड़ाता आगे बढ़ता रहा लेकिन एक जवान लडका बराबर साथ बना रहा। वह अंग्रेजी के कुछ शब्दों के माध्यमों से बातचीत कर रहा था अजनबी देश में देर तक बिना किसी कारण कोई आपके साथ चिपका रहे तो डर पैदा हो जाता है कि क्या चक्कर है। इस लड़के ने बताया कि यह लंच टाइम है। और दो बजे बॉर्डर खुलेगा, वह मुझे चाय पिलाने एक ढाबे किस्म के रेस्त्रा में ले गया। मैं अपना समान, पर्स, पासपोर्ट बगैरा पर बार-बार निगाह डालता था और डर रहा था कि यह लड़का और कुछ लेकर चम्पत हो गया तो मेरे ऊपर कयामत टूट पडेगी। जहां हम बैठे वहां चाय नहीं मिली। एक-दूसरे ढ़ाबे में लड़के ने कुछ छाज जैसी चीज पिलाना चाहा, छाज में कुछ मसाले डालकर स्वादिष्ट बनाया गया था। वहां मैंने कुछ खाया भी लड़का मुझसे मेरा पासपोर्ट दिखाने की फ़रमाइस करने लगा। मैंने अपने हाथ में लेकर पासपोर्ट दिखा दिया। लड़का कहने लगा कि वह पासपोर्ट अपने हाथ में लेकर देखना चाहता है। मैं डर गया और जल्दी से पासपोर्ट जेब में रख लिया। बहरहाल, उसने मेरा पता लिया और तरह-तरह के सवाल पूछे।

आजरी कस्टम वाले पिछली बार की तरह सब यात्रियों से कुछ ले रहे थे और मुझे एक कोने में प्रतीक्षा करने के लिए खड़ा कर दिया गया था। मैंने पर्स खोलकर देखा तो अच्छी खासी करेन्सी थी। मैंने सोचा चलो यार मैं भी पैसा देकर इस अदृश्य कैद से निजात पाऊं। वरना ये लोग पता नहीं कितने देर मुझे और खड़ा रखें।

घूस मिलते ही उनके चेहरे चमक गये और उन्होंने मेरी तरफ़ बड़े सम्मान से देखा। उन्हें याद था कि जाते समय मैंने पैसे नहीं दिये। उन्हें यह लगा कि आजरबाईजान में पन्द्रह-बीस दिन रहकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। वहां से बाहर निकला, अब एक छोटी-सी नदी को पार करना था और उस पार ईरान था। नदी के किनारे आज़रबाइजान पुलिस की एक चौकी बनी थी वहां बैठे सिपाई ने भी मुझसे घूस मांगी। मेरे पास अजरी करंसी खत्म हो चुकी थी। मैंने उसे पचास रुपये के बराबर वैल्यू का एक ईरान नोट थमा दिया तो उसने काफ़ी बुरा माना और फिर गिडगिडाने वाले अंदाज में कहने लगा कि कुछ और भी दो। उसका रिश्वत मांगने का यह तरीका मुझे अच्छा लगा और एक नोट और थमाकर मैं नदी पर बने पुल को पार कर गया। मैं ईरान में था मेरी जानकारी के अनुसार यहां रिश्वत का बाजार गर्म नहीं है जो आज़रबाइजान में लगातार बढ़ रहा है। आज़रबाइजान में ही ललित जी ने बताया था कि पुलिस में बड़ा भ्रष्टाचार था और है। क्योंकि सत्ता परिवर्तन के बाद उनके वेतन नहीं बढ़े थे, पर कीमतें बहुत बढ़ गयी थीं। पुलिस के भ्रष्टाचार से सभी परिचित थे और यह माना जाता था कि पुलिस वाले यदि घूस न लें तो इस नये समाज में उनका काम कैसे चलेगा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर सरकार ने पुलिस का वेतन कई गुना बढ़ा दिया था और यह घोषणा हुई थी कि अब कोई पुलिस वाला घूस लेते पकड़ा गया तो उसके साथ बड़ा बुरा व्यवहार किया जायेगा।

आज़रबाईजान जाते समय मै ईरानी कस्बे आस्त्रा के जिस मुसाफिरखाने में रुका था वह काफ़ी गंदा था। इसलिए पीठ पर थैला लादकर नये मुसाफिरखाने की तलाश में निकल पड़ा। कस्बा जाना पहचाना ही नहीं मेरी पसंद का था। यहां पिछली बार बनाये एक दो दोस्ती भी हैं। सोचा समान रखकर दोस्तों की तलाश करूंगा।

मुस्द्दिक अपनी कम्प्युटर की दुकान पर मिल गये। वे मुझे देखकर खुश हुए। पिछली बार उन्होंने मुझसे कहा था कि उनका एक दोस्त मुस्तफ़ा मेरी कहानियों का फ़ारसी में अनुवाद करना चाहता है। मैंने उसे अपनी अंग्रेजी में छपी कहानियों की किताब दे दी थी। कुछ देर बाद मैं मुस्तफ़ा की किताबों की दुकान पर पहुंच गया। दुकान उन्होंने हाल ही में खोली है और उसमें केवल साहित्यिक किताबें रखते हैं। लगा कि अभी दुकान चल नहीं पाई है। बहरहाल, मुस्तफ़ा अंग्रेजी कुछ ज्यादा जानते हैं इसलिए उनसे बातचीत होने लगी।

मुस्तफ़ा ने बताया कि आस्त्रा छोटा-सा कस्बा है लेकिन वहां कई लेखक और कवि रहते हैं। उन्होंने आस्त्रा के कहानीकारों का एक संग्रह भी दिखाया। फ़ारसी में छपी साहित्यिक पुस्तकों को देखकर अच्छा लगा कि किताबों की सज्जा और डिज़ाइन इत्यादि बहुत अच्छी है। कुछ पढ़ने की भी कोशिश की और लगा कि ज्यादा नहीं अगर तीन-चार महीने यहां रहूं तो फ़ारसी सीख सकता हूं।

बातचीत घूम-फिर कर ईरानी समाज पर आ गयी। मुस्तफ़ा ने बताया कि बहुत से लोग ईरान के इस्लामी गणराज्य को वास्तव में इस्लामी नहीं मानते। उनका कहना है कि इस इस्लामी गणराज्य के पीछे वह आधुनिक दृष्टि नहीं है जो आज के सवालों के जवाब खोजने के लिए इस्लाम की व्याख्या करने की मांग करती है। उन्होंने कहा कि डॉ. अली शरायती के विचार आज भी ईरान की युवा बुद्धिजीवी पीढ़ी में लोकप्रिय हैं। तेहरान में भी डॉ. अली शरायती के बारे में लोगों से काफ़ी बातचीत हुई थी। वे बहुत लोकप्रिय बुद्धिजीवी थे जिन्होंने इस्लाम और आधुनिक युग के सवालों को एक साथ समझने का प्रयास किया था। वे शाह के जमाने में थे और कहा जाता है कि शाह की खुफ़िया एजेन्सी 'सवाक' ने लंदन में उनकी हत्या कर दी थी।

मैं आस्त्रा से तबरेज़ जाना चाहता था। क्योंकि आया तेहरान होकर था इसलिए फिर से तेहरान वापस चले जाने में कोई फ़ायदा न था। दूसरा यह कि आज़रबाईजान ;ईरान वाले हिस्से की राजधनी तबरेज़ है जो आज़री कल्चर का गढ़ माना जाता है। तीसरा यह कि बाइबल के कुछ संकेतों के आधार पर तबरेज़ वह नगर है जो स्वर्ग के द्वार पर बना हुआ है। इतना तो तय है कि स्वर्ग न देख पाऊंगा तो द्वार पर बना नगर देखने से क्यों चूंक जाऊं? इसलिए तय किया था कि ईरान ही नहीं मध्य एशिया के प्राचीनतम नगर तबरेज़ को देखना ज़रूरी है। अब सवाल यह था कि तबरेज़ में कहां ठहरेंगे। यहां इस मुक़ाम पर मदद करने के लिए मित्र मुस्तफ़ा सामने आये। उन्होंने तबरेज़ के कई होटलों में फ़ोन किए तो सीधे अज़री में जवाब मिला, फ़ारसी में नहीं। यह सुनकर मैं चौंक गया। इतना तो अंदाजा था कि अज़री और फ़ारसी भाषा ही नहीं बल्कि आज़रबाइजान की संस्कृति और समाज तथा ईरानी समाज और संस्कृति के बीच एक अदृश्य दीवार-सी है पर इतना पक्की होगी इसका अंदाज़ा न था।

(क्रमश: अगले अंकों में जारी)

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