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September, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एक आम हिन्दुस्तानी की आवाज : दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें

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(30 सितम्बर, दुष्यन्त कुमार की जयंती पर विशेष)(दुष्यन्त कुमार. चित्र साभार अनुभूति-हिन्दी.ऑर्ग)-अरुण मित्तल अद्भुतदुष्यन्त कुमार हिन्दी कवियों में एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी ग़ज़ल का प्रवर्तक माना जाता है। दुष्यन्त कुमार के विषय में अगर कहा जाए कि उन्होने हिन्दी रचनाकारों के लिए हिन्दी में ग़ज़ल का एक रास्ता खोला तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे हिन्दी ग़ज़ल की एक सामान्य परिभाषा देना कठिन कार्य है। क्योंकि यदि छंद के दृष्टिकोण से देखें तो हिन्दी ग़ज़ल में हिन्दी छंद का प्रयोग एवं हिन्दी छंद शास्त्र के नियमों का पालन होना चाहिए, अर्थात् मात्राओं की गणना ध्वनि के आधार पर नहीं अपितु प्रयोग किए गए शब्द के वास्तविक वजन के आधार पर होनी चाहिए। और यदि भाषा एवं शब्द चयन कि दृष्टि से देखें तो हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का गहन अध्ययन किया जाए तो उन्होने उपर्युक्त दोनों नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। उन्होंने अपनी ग़ज़लें उर्दू बहरों में लिखी और हिन्दी शब्दों के साथ उर्दू शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया। परंतु इस सब के बाद दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों क…

5 गीत

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- सुजान पंडित1- सदभावना गीत --बेला, गुलाब, जुही, चम्पा, चमेली। नाम अलग पर हम है सहेली॥ भारतीय - हम है भारतीय -- मंदिर में सजते हम मस्जिद में सजते गिरजा-गुरुद्वारा के बेदी में चढ़ते। अपना न जात-पात, धर्म न मजहब। माला बन सारे देवों पे सजते॥ भारतीय - हम है भारतीय -- ईद, दिवाली हम मिलकर मनाते। प्यार-मोहब्बत का पाठ पढ़ाते॥ लड़ना-झगड़ना न सीखा कभी हम। धागे में मिलकर हम जीना सिखाते॥ भारतीय - हम है भारतीय -- 2- मेरी चिट्ठी तेरे नाम---चलो चलें हम बाटें, चिट्ठी एकता की। मिलकर बाटें चिट्ठी हम सब एकता की। मेरी चिट्ठी तेरे नाम, हिन्द के लोगों तुम्हें प्रणाम-- मेरा न कोई मंदिर मस्जिद, न गिरजा गरुद्वारा। हम हैं एक खुदा के बंदे, एक है अपना नारा॥ चलो चलें हम बाटें-- पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चारों दिशाएं अपनी है। हिन्द का कोना कोना अपना, सब भाषाएं अपनी है॥ चलो चलें हम बाटें-- इस चिट्ठी में लिखी हुई है, विश्व शांति का संदेशा। सारे विश्व के घर आंगन में, जोत जले भाई चारे का॥ चलो चलें हम बाटें-- 3- सरगम गीत--म, से मंदिर, म, से मस्जिद, ग, से गिरजा, गुरुद्वारा। सात स्वरों में छुपा हुआ है, आपस का भाईचारा॥ सा,…

दो लघुकथाएँ

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-संजय पुरोहितनासमझ''पापा, ये कविता तो मुझे बिल्कुल ही समझ नहीं आई'' ''बेटा, इसमें हैरानी की क्या बात, जो समझ में आ जाए वो कविता ही क्या ?'' ''लेकिन पापा, मुझे छठी क्लास की 'झांसी की रानी'', ''पाथल और पीथल'' तो पूरी समझ में भी आई, और मैंने याद भी की थी। इतने सालों बाद भी मुझे वो पूरी याद है। वो भी तो कविता ही थी ना!'' ''बेटा, वो जमाना गया जब सीधी भाषा में जन भावना पर कविता की रचना होती थी, कविता में भी अब तो कई प्रयोग हो रहे हैं'' ''प्रयोग!, ये आप क्या कह रहे हैं। कविता कोई मेंढक, चूहा या बन्दर है जिस पर प्रयोग हो रहे हैं'' ''तुम समझे नहीं, अब कविता भी पहले जैसी नहीं रही। कोई 'नयी कविता' लिख रहा है तो कोई 'हाईकू', ये कुछ-कुछ मॉर्डन आर्ट की तरह है, जो कम ही लोगों के समझ में आता है, कवि नये-नये प्रयोग कर साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।'' ''पापा, सच-सच बताओ, क्या आपके समझ में ये नयी कविताएं आती है ?'' ''बेटा, मैं एक आम भारतीय जित…

नेता जी की षष्ठ्यब्दि पर हिंदी व्यंग्यकारों की बधाइयाँ

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-शंकर पुणतांबेकरएक नेताजी के हाल ही में साठ वर्ष पूर्ण हुए. काफी ऊँची किस्म के राष्ट्रीय नेता थे वे. अतः जब साठ साल जी लेने के उपलक्ष्य में समारोह मनाया गया, तो उसमें देश के और लोगों की तरह व्यंग्यकारों को भी निमंत्रित किया गया. हमारे हिन्दी के व्यंग्यकारों ने हरिशंकर परसाईं से लेकर बृजेश परसाईं तक बधाइयों के जो तार भेजे थे नीचे दिए जा रहे हैं - आप बिना संसद के प्रधानमंत्री बनें. – हरिशंकर परसाईं आपके दल-बदल नित्य सफल रहें. –शरद जोशी आपके बेटे खोटे काम करें फिर भी उनका बाल बांका न हो. - रवीन्द्रनाथ त्यागी सुसंग से बचें और जीवन में नित्य सफल रहें. - श्रीलाल शुक्ल वर्तमान स्थिति के विपरीत चेहरे से कम उम्र के और मस्तिष्क से अधिक उम्र के लगें. – नरेन्द्र कोहली सिर सलामत बना रहे पगड़ियाँ हजार हैं . – केशवचन्द्र वर्मा, श्रीनारायण चतुर्वेदी आपके कानों के परदे नित्य मोटे बने रहें. – बरसानेलाल चतुर्वेदी बांधने के लिए भविष्य में मुट्ठी हमेशा खुली रहे. – आत्मानंद मिश्र, संसारचन्द्र बहती सत्ता में हाथ धोते रहें. – प्रभाकर माचवे, अमृतलाल नागर जेलों में जाने से बचे रहकर जेलों के उद्घाटन करते रहें. …

हिन्दी पद्य साहित्य में नारी : वर्तमान परिप्रेक्ष्य

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-अरुण मित्तल अद्भुतयत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवतायत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफला: क्रिया।नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में,पीयूष स्रोत सी बहा करो,जीवन के सुंदर समतल मेंउपरोक्त हिन्दी एवं संस्कृत की अति प्रसिद्ध काव्योक्तियां न केवल नारी की पवित्रता एवं सम्मान को दर्शाती हैं, अपितु यह संकेत भी करती हैं कि जीवन के सुंदर समतल में अमृतसम बहने वाली नारी एक विश्वास के बंधन के साथ साथ कितनी कर्तव्यपरायण भी हैं। पुरातन साहित्य की इन पंक्तियों अनुवादित करते हुए मुख्य विषय यह है कि आज रचा जाने वाला पद्य साहित्य जिस पर निराला की साहित्यिक निष्ठा से लेकर उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण तक का प्रभाव है, ने नारी की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता, उच्छृंखलता एवं कर्मक्षेत्र में योद्धा की भांति लड़ने वाली प्रवृत्ति को किस रूप में दिखाया है। आधुनिक हिन्दी पद्य साहित्य में नारी के लिए पर्याप्त स्थान है। परंतु जैसे-जैसे समाज में नारी ने अपना रूप बदला है। वैसे-वैसे साहित्यकारों ने उसका पीछा किया है। और साहित्य ने कम से कम इस विषय में तो, अर्थात् नारी को प्रस्तुत करते हु…

अथ रिश्वतमेव जयते

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· आर.के.भंवर हमारे स्वनामधन्य एवं गुणज्ञ महापुरूषों ने देश की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए बड़े-बड़े काम किये है और नारे दिये है। नारे वही लोग देते है जो मनसा वाचा कर्मणा उन पर अमल कर चुके होते। तभी तो इन नारों का प्रभाव लोगों पर पड़ता है। किसी संत ने पहले गुड़ खाना छोड़ दिया तभी बुढ़िया के बेटे से कहा था कि उसे गुड़ नही खाना चाहिए । ऐसी बाते अंदर तक घंटी बजाती है। इन्हीं महापुरूषों में से एक ने देश को नारा दिया था '' सत्यमेव जयते '' । '' सत्य '' पहले से था किन्तु रजिस्टर्ड नही था । दरअसल नारा देना और देश की उस नारे के प्रति स्वतंत्र स्वीकारोक्ति ही नारें का रजिस्टर्ड होना कहलाता है। अब सब जान गये कि सत्य की जीत होती है। स्कूलों, थानों, कार्यालयों, न्यायालयों, संसद, विधान सभाओं अर्थात् सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर '' सत्यमेव जयते '' लिखा हुआ पाया जाने लगा। थाने में दरोगा जी की कुर्सी के ठीक ऊपर ' सत्यमेव जयते ' पढ़ने को मिलेगा। चुनांचे जहां-जहां सत्य जा कर स्वयं को कृतार्थ कर सकता था, वहां-वहां वह पहुंचा। किताबों, सेमिनारों, सामूहिक-चर्च…

लोक हास्य धारा

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- सीताराम गुप्ताबच्चीएक व्यक्ति रेलगाड़ी में सफर कर रहा था। दोपहर को जब उसे भूख लगी तो उसने अपना खाने का डिब्बा बाहर निकाला और खाना खाने लगा। खाने के साथ प्याज भी रखा था। प्याज काटने के लिए उस व्यक्ति के पास चाकू वग़ैरा तो था नहीं इसलिए प्याज को सीट पर रखकर मुक्का मारकर उसे तोड़ने लगा। प्याज पर मुक्का लगना था कि प्याज के बीच का हिस्सा जिसे बच्ची कहते हैं छिटककर रेलगाड़ी के डिब्बे की खिड़की से बाहर जा गिरा। इस व्यक्ति ने शोर मचा दिया कि उसकी बच्ची गाड़ी से बाहर गिर गई। लोगों ने सुना तो उन्होंने जंजीर खींच दी और रेलगाड़ी रुक गई। वह व्यक्ति फुर्ती से रेलगाड़ी से नीचे उतरा और ढूँढ़कर बच्ची को उठा लाया। गाड़ी रुकने पर दूसरे डिब्बों के यात्राी भी आ गए और पूछने लगे कि क्या हुआ? लोगों ने बताया कि किसी की बच्ची गिर गई थी। ''किस की बच्ची गिर गई थी? क्या बच्ची मिल गई?'' ये पूछने पर उस आदमी ने जो रोटी खा रहा था कहा, ''हाँ, बच्ची मिल गई।'' जब लोगों ने ये पूछा कि बच्ची को चोट तो नहीं लगी तो उस आदमी ने जवाब दिया, ''चोट तो नहीं लगी पर मिट्टी में गिरने से जरा किरकिरी हो ग…

“धर्म का मूल्यांकन करता है धर्मावलंबियों का आचरण”

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तथा
''गुरु के मूल्यांकन की कसौटी है उसके शिष्यों का आचरण''-सीताराम गुप्ता साधु-संत त्याग, तपस्या और सहनशीलता तथा क्षमा की प्रतिमूर्ति होते हैं इसमें संदेह नहीं। इसी से संत की जीवन अनुकरणीय तथ प्रेरणास्पद होता है। एक शिष्य अथवा अनुयायी की चरितार्थता इसी में है कि वह अपने गुरु के आचरण को जीवन में उतारे। यही बात धर्म के संबंध में भी कही जा सकती है। धर्म वह है जो हमें व्यवस्थित करे, हममें सकारात्मक गुणों का विकास करे। हमें राग-द्वेष, हिंसा, क्रोध, अहंकार, अविद्या, असत्य, असहिष्णुता आदि नकारात्मक भावों से बचाए। एक धार्मिक व्यक्ति की चरितार्थता भी इसी में है कि वह अपने धर्म पर की गई किसी भी टिप्पणी पर उत्तेजित न हो और अपने धर्म के विरोध में बोलने वाले को भी क्षमा कर धैर्य का परिचय दे। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है अपितु धर्म का अनिवार्य तत्व है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता है तो वह धार्मिक होने का ढोंग तो कर रहा है लेकिन सही अर्थों में धार्मिक नहीं है क्योंकि किसी भी धर्म में धर्म की रक्षा के लिए उत्तेजना, अधैर्य, असहिष्णुता अथवा हिंसा का कोई स्थान नहीं है अपितु इनकी निंदा…

दो लघुकथाएँ

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-सीताराम गुप्ता'आवभगत'कई बार कालबेल का बटन दबाने के उपरांत अंदर से एक युवती निकल कर बाहर आई और बरामदे में से ही ऊँची आवाज में पूछा, ''यस? क्या बात है? किससे मिलना है?'' वर्मा जी ने बतलाया कि मैं रामनारायण जी के ऑफिस में ही काम करता हूँ और उन्हें कुछ जरूरी कागजात देने आया हूँ। ये सुनकर युवती ने कहा कि मैं अभी पापा को बुलाती हूँ और बिना गेट खोले ही जीने से ऊपर चली गई। लगभग पन्द्रह मिनट बाद रामनारायण जी जीने से नीचे उतरते दिखलाई पड़े। साथ ही उनकी बेटी भी एक हाथ में एक ट्रे में पानी से भरा एक गिलास रखे उनके पीछे-पीछे नीचे उतर रही थी। बाहर तेज धूप थी। रामनारायण जी ने लोहे का भारी गेट खोलते हुए पूछा कि भई वर्मा जी इतनी तेज गर्मी में दोपहर के वक्त कैसे आना हुआ? अंदर बरामदे में आने पर वर्माजी ने काग़जों का एक पुलिंदा उनकी ओर बढ़ा दिया। रामनारायण जी वहीं बरामदे में खडे होकर काग़जों को देखने लगे। काग़जों को देखने के बाद रामनारायण जी के चेहरे पर रौनक आ गई और कहने लगे कि वर्मा तुमने बहुत अच्छा किया जो ये पेपर्स मुझे फौरन देने के लिए आ गये। इतना कहकर उन्होंने बेटी के हाथ से ट्रे…

''घोर व्यावसायिक दृष्टिकोण में परिवर्तन ही सही शिक्षा है''

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- सीताराम गुप्ता पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना से ही हलचल शुरू हो गई। पेट्रोल पंपों पर रौनक बढ़ गई। आख़िरकार आधी रात के बाद दाम बढ़ने की घोषणा भी एक दिन कर ही दी गई। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। जिसे देखो भागा जा रहा है पेट्रोल भरवाने। गाड़ी में दस-पंद्रह लीटर पेट्रोल होगा पर आज तो टंकी फुल करवानी है। वैसे तो दो-दो लीटर पेट्रोल डलवाते फिरेंगे। बाप गाड़ी ले जा रहा है तो 50 रुपये का पेट्रोल डलवा रहा है और बेटा 25 रुपये में ही काम चला रहा है। न जाने पेट्रोल समाप्त हो जाने पर कितनी बार गाड़ी सड़क के बीच में ही लटक कर रह गई पर आज टंकी फुल करवानी है। पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं। घंटों में पेट्रोल डलवाने का नंबर आ रहा है पर आज ये मैदान मारना ही है जैसे आज ये जीत हासिल कर ली तो फिर जीवन भर कोई ख़तरा नहीं। पेट्रोल भरवाकर विजयी की मुद्रा में घर लौट रहे हैं। मैंने ऐसे ही एक साहब से पूछा कि भाई साहब चार किलोमीटर जाकर पेट्रोल भरवा कर लाए हो इतना पेट्रोल तो जाने-आने में ही लग गया होगा जितना फायदा नहीं हुआ होगा। कहने लगे, ''फायदा कैसे नहीं हुआ?'' मैंने पूछा कैसे? कह…

भावों को दें उचित आकार साँचे में मन के

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- सीताराम गुप्ता चीन और जापान में भाषा, संस्कृति, कला तथा जीवन के कई अन्य क्षेत्रों में इतनी अधिक समानता पायी जाती है जिसके कारण इन दोनों देशों का नाम प्राय: साथ-साथ लिया जाता है। इन दोनों देशों की एक विशेषता ये भी है कि इन दोनों देशों में उपहार के तौर पर तरबूज भेंट करने की भी प्रथा है और वो भी चौकोर तरबूज। चौकोर तरबूजों की यहाँ ख़ूब माँग रहती है अत: चीन और जापान के किसान चौकोर तरबूज उगाने पर विशेष ध्यान देते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या खेतों में चौकोर तरबूज उगाए जा सकते हैं? वास्तव में प्राकृतिक रूप से तरबूज चौकोर नहीं होते। तरबूज तो सामान्यत: गोल, अण्डाकार या इन दोनों आकारों से मिलते-जुलते आकार के ही हो सकते हैं लेकिन यहाँ के किसान तरबूजों को चौकोर बनाने के लिए एक पात्र विशेष का सहारा लेते हैं। यह पात्र चौकोर या घनाकार होता है जिसे छोटे फल पर लगा देते हैं। फल जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है वह अपने ऊपर लगे पात्र या खोल का आकार ग्रहण करता जाता है। फल के परिपक्व होने पर पात्र को खोल कर अलग कर दिया जाता है। और इस प्रकार मनचाहे आकार का फल तैयार कर लेते हैं। ईंटें बनाने के लिए भी साँचों का…

''अकाल में कलाओं का विकास''

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- सीताराम गुप्ता होरेस ने कहा है कि ''प्रतिकूल या विषम परिस्थितियाँ प्रतिभा को प्रकट करती हैं तथा समृद्धि इसका लोप''। सामान्य व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकता और इसीलिए वह सामान्य रह जाता है आगे नहीं बढ़ पाता। सफल व्यक्ति वह है जो विषमताओं में भी अवसर खोज लेता है। वस्तुत: जीवन की हर समस्या किसी बड़े लाभ के लिए अवसर का आधार प्रस्तुत करती है। यह बात केवल व्यक्ति के संदर्भ में ही नहीं अपितु समाज, राष्ट्र तथा विश्व के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक लगती है। यह तो हुआ आर्थिक या व्यावसायिक पहलू लेकिन विषम या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्तम साहित्य, संस्कृति और विभिन्न कलाओं के विकास के लिए भी कम उपयोगी आधार प्रस्तुत नहीं करतीं। समस्याएँ या कठिनाइयाँ जीवन का स्वाभाविक क्रम है। ये समस्याएँ प्राकृतिक भी हो सकती हैं और मनुष्य निर्मित भी। अकाल, बाढ़, भूकंप, महामारी, जंगलों की आग, ज्वालामुखी विस्फोट, तूफान और अब अंत में प्रचंड सूनामी लहरों का ताण्डव आदि न जाने कितनी प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य अपने आरंभिक काल से ही दो-चार होता रहा है। आज वैज्ञानिक प्रगति के युग में असावधनीवश भी अनेक आ…

रिहाई

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-सीताराम गुप्ता ये जितने पेड़-पौधे हैं तुम्हारी कैद में जिन्हें तुम रोज नवजात शिशुओं की तरह अपने चम्मचों में डालकर पानी पिलाते हो खिलाते हो परवरिश करते हो इतने प्यार से तेज सर्दी और गर्मी से हिफाजत करते हो जिनकी ऑंधियों से और हवाओं से बचाते हो जिन्हें बड़े एहतियात से कभी अंदर कभी बाहर सजाते हो उन्हें आजाद कर दो कि पाव भर मिट्टी में छिछले गमले की नग्न हैं जड़ें जिनकी उन्हें दे दो ढाँपने को नग्नता अपनी खुला आकाश ऑंगन का फैलने दो धरती में जड़ें उनकी पाताल तलक भीगने दो बारिश में काँपने दो सर्द मौसम की बर्फ़ीली हवाओं में और तपने दो तेज गर्मी में उन्हें उनकी पत्तियों को झूमने दो ऑंधियों में तेज उनको नृत्य करने दो फिर देखना इक दिन तुम्हें ही ये दुआ देंगे बिठाएँगे सर-ऑंखों पर तुम्हें अपनी फूल, फल और छाँव देंगे तेज हवाओं से ऑंधियों से भिड़ जाएँगे तुम्हें बचाने को बारिश लाएँगे और तेज बारिश में धरती को कटने से यही बचाएँगे ये बूढ़े बोनसाई पौधे दुआएँ देंगे कैद से गमलों की आजाद इन्हें कर दो और दुआएँ जीने की इनसे लो। -------- संपर्क: सीताराम गुप्ताए.डी.-106-सी, पीतमपुरा, दिल्ली-110034 फोन नं. 27313954

हमें बोलने की स्वतंत्रता है?

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-मनोज सिंह कितना अच्छा लगता है यह सोचना, सुनना और महसूस करना कि हम स्वतंत्र हैं। कितना गर्व होता है यह कहकर कि हम एक आजाद देश के नागरिक हैं। गुलामी की बातों को याद कर अत्यंत दु:ख और फिर आक्रोश आता है। इस बात की हम हर जगह, हर वक्त दुहाई देते रहते हैं कि हमें अपने देश में घूमने-फिरने, लिखने-बोलने की आजादी है। जो कि गुलाम देशों में सामान्यत: नहीं होती। मगर क्या यह पूर्णत: सत्य है? वास्तविकता में अगर देखें तो हकीकत कुछ और है। शासन, व्यवस्था, सुरक्षा, धर्म और समाज के नाम पर ही कई सारे प्रतिबंधों को देखा जा सकता है। यही नहीं बच्चे जो मन के सच्चे होते हैं, उन्हें भी बचपन से ही मां-बाप द्वारा जगह-जगह पर रोका, समझाया और कभी-कभी तो डांटा भी जाता है कि क्या बोलना है और क्या नहीं, क्या करना है और क्या नहीं। बड़े होने पर कॉलेज-स्कूल में अनुशासन के नाम पर, अध्यापक के खिलाफ आप कुछ नहीं बोल सकते। चाहे वो पढ़ाने में बिल्कुल भी ध्यान न दे रहे हों। नौकरी में अधिकारी का डंडा। यहां अंग्रेजी की कहावत का उदाहरण दिया जा सकता है, बॉस इज ऑलवेज राइट। कहीं-कहीं तो अधीनस्थ कर्मचारी से डरना पड़ता है तो कभी-कभी यून…

धर्म, अध्यात्म और योग:

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योग द्वारा ही संभव है धर्म का पालन- सीताराम गुप्ता प्राय: योग, धर्म और अध्यात्म को अलग-अलग माना जाता है। योग का संबंध भौतिक शरीर को पुष्ट करने अथवा शारीरिक व्याधियों के उपचार तक सीमित माना जाता है। धर्म को प्राय: किसी विशेष पद्धति से पूजा-पाठ अथवा कर्मकाण्ड मान लिया गया है तथा अध्यात्म को दूसरे लोक की रहस्यात्मक वस्तु मान लिया जाता है। वास्तव में धर्म, अध्यात्म तथा योग अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब इन तीनों को अलग-अलग देखने और इनके अंतर्संबंधों को जानने का प्रयास करते हैं। धर्म क्या है?धर्म की अनेक परिभाषाएँ और व्याख्याएँ मिलती हैं। मनुस्मृति में लिखा है: धृति: क्षमा दमोद्धस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधे दशकं धर्म लक्षणम्॥ धैर्य, क्षमा, दम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध - ये धर्म के दस लक्षण हैं। जिस व्यक्ति के स्वभाव में इन दस लक्षणों का समावेश होगा, वह व्यक्ति धर्म से युक्त होना ही चाहिए, चाहे वह हिंदू हो अथवा अन्य कोई। यदि संकुचित दृष्टि से ऊपर उठकर देखें तो पाते हैं कि उपरोक…

लाल्टू की कहानी : निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की

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कहानीनिताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की- लाल्टूअजंता, तपती दुपहरी, लू के तमाचे और शाम का एकाकीपन, इन सबसे अलग अब और कुछ नहीं रहा। तुमने पाँच वर्षों के अनुभव पर कविता लिखने को कहा था न...! मैंने लिखा है–‘बस फटे पन्ने-सी उड़ती ज़िंदगी, इस पुलिये को भी छोड़ चली...।’ बस! इसके बाद और कुछ लिख न पाया! सुना है, बड़े शायरों ने पुरानी जगहों को छोड़ते वक़्त समृतियों को गीतों व ग़ज़लों में संजोया है; पर मैं तो, तुम जानती ही हो कभी दो-एक कविताएं लिख लेता हूँ। अब अचानक किसी फूल के खिलने-सा आलोड़न अनुभव करता हूँ हृदय में, या जब मेरे किसी मित्र की बातों में कहीं कुछ चुभता हुआ सा प्रतीत होता है। अचानक दिशाओं में वीणा के तार झंकृत हो उठते हैं और मैं डायरी के पन्नों में कुछ लिखने लगता हूँ। पर इन पाँच वर्षों में मैं सूखता गया हूँ, पल्लवहीन तरु जैसा। कभी लगता है, किसी ने तीखे चाकू की नोक मेरे हृदय में चुभो दी है। अब कोशिश करने पर भी आवेग नहीं उत्पन्न होता, और फिर यह तो, स्कूल टीचर गिरिधर पांडे कहा करते थे न–कला जो है, सीखी नहीं जा सकती, चक्रवात-सी अचानक उबल पड़ती है। अपने चारों ओर निर्लज्ज नंगे मन…

''अग्रपूज्य गणेश की प्रतीकात्मकता तथा प्रासंगिकता''

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-सीताराम गुप्ताहिन्दी में एक मुहावरा है 'श्रीगणेश करना' जिसका अर्थ है किसी कार्य का शुभारंभ करना। इस मुहावरे से जनजीवन में गणेश की सर्वव्यापकता का ही पता चलता है। उर्दू वाले या कहें कि अहले-इस्लाम भी इसी के समकक्ष एक मुहावरे का प्रयोग करते हैं और वह है 'बिस्मिल्लाह करना'। इसका अर्थ भी ठीक वही है जो श्रीगणेश करने का है। ग़ौर करें तो हम पाते हैं कि इस्लाम में 'अल्लाह' एक ओर केवल एक सर्वोच्च शक्ति है। हिंदुओं में ईश्वर के अतिरिक्त अनेक देवी-देवता हैं तो फिर किसी भी कार्य की शुरूआत पर श्रीगणेश करना ही क्यों कहा जाता है? वस्तुत: किसी भी कार्य के प्रारंभ में सबसे पहले गणेशपूजा या गणेश को स्मरण करने का ही विधान है और वो इसलिए कि गणेश को गणाधिपति या गणाध्यक्ष माना जाता है। गणेश का एक नाम है गणपति जिसका अर्थ होता है समूह का नेता और गणेश में देवताओं का नेतृत्व करने के सभी गुण उपस्थित हैं। इन्हीं गुणों के कारण गणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं। पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब शिव ने ग़लती से अपने ही पुत्र गणेश का सिर काट दिया तो पार्वती बहुत दुखी हो गई और शोक में डूब गई। पार्व…

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रवि रतलामी

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