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दुनिया गोल है - किश्त 5

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संस्मरण दुनिया गोल है 5   -सोमेश शेखर चन्द्र   टपरे के भीतर, जमीन पर उसका चीकट और मैला बिस्तर पड़ा हुआ था। रस्सी की एक अरगनी पर उसने अपने...

संस्मरण

दुनिया गोल है 5

 

-सोमेश शेखर चन्द्र

 

टपरे के भीतर, जमीन पर उसका चीकट और मैला बिस्तर पड़ा हुआ था। रस्सी की एक अरगनी पर उसने अपने वैसे ही मैले और चीकट चीथड़े टांग रखे थे। बाहर उसने ईंट जोड़कर चूल्हा बना रखा था जिस पर वह अपना खाना बनाती थी। चूल्हे में उसके अभी भी अधजली लकड़ियाँ पड़ी थी और उसकी अगल बगल टुटही स्टील की थाली कटोरी गिलास कलछी जैसे जूठे बर्तन छितराए पड़े थे। बगल में ही पानी भरा वैसा ही गंदा मिट्टी का एक घड़ा खुला पड़ा था। यही उसकी मुकम्मल गृहस्थी थी।

इसके पहले मैं लेफसर में मुंडा लोगों का घर देख चुका था। उनके घरों में खटिया नहीं होती। लोग जमीन पर ही धान का पुआल बिछा कर सोते हैं।

बुढ़िया को रिक्शे में बैठाकर जब मैं उसके टपरे के पास पहुँचा था तो उसने मुझे बताया था कि यही मेरा घर है। उसका वैसा घर देखकर मैं हैरान था। भला यह भी कोई घर है और इतने छोटे से घर में इसके बेटे पतोहू, पोते, पोतियाँ रहते कैसे है? उसका टपरा उस समय एकदम खाली था। और वहाँ पर उसका कोई भी मुझे नहीं दिखा था। मैंने उससे पूछा यहाँ तो कोई नहीं है कहाँ गए तुम्हारे पोते पोतियाँ? बुढ़िया मुझे कुछ बताती, इसके पहले ही उसके तथाकथित बेटे पतोहू तथा दूसरे सगे संबंधी, रिक्शे के पास पहुँच गये थे। वे उसे नुचा चिथा और खून से लथपथ देख जोर जोर से चिल्लाते मुझे घेर लिए थे। आहि गे मइया ऽ ऽ ऽ अहि गे बप्पा आ ऽ ऽ ऽ ई तोहैं की भैं गयल को ऽ ऽ ऽ। बुढ़िया की वह दशा देख, उन लोगों ने समझा कि उसका एक्सीडेंट हो गया है और ऐक्सीडेंट मेरी कार या स्कूटर से हुआ है इसीलिए मैं उसे रिक्शे में लाद फाँदकर यहाँ ले आया हूँ।

दरअसल वे लोग उसके बेटे पतोहू या सगे संबंधी थे ही नहीं। वे दूसरे लोग थे। वहाँ रहने के चलते बुढ़िया उन्हें पतोहू, बेटा, पोते, पोतियाँ मानती थी। ये लोग दुख बीमारी में बुढ़िया की मदद भी करते रहे होंगे।

भारत के लोगों के यह खून में ही है कि वे जहाँ भी रहते हैं वहाँ के वासिंदो से अपना खून का जैसा रिश्ता बना लेते हैं। दरअसल वहाँ न तो बुढ़िया का कोई अपना सगा था और न ही लकवाग्रस्त उस बूढ़े का ही कोई था। बूढ़ा और बूढ़ी भी आपस में भाई बहन नहीं थे। उन दोनों में आपस में किसी तरह का कोई रिश्ता भी नहीं था। उनकी अपनी परिस्थितियों और जरूरतों ने दोनों को एक साथ कर रखा था।

बुढ़िया ने मुझे बाद में बताया कि उसके बेटा, पतोहू, पोता, पोतियाँ सभी हैं लेकिन बेटा, उन सबको लेकर आसाम चला गया था और वही बस गया था। आसाम जाने के बाद वह अपनी माँ की खोज खबर लेने वापस नहीं लौटा। बुढ़िया का मर्द बहुत पहले मर चुका था। अपना जीवन यापन करने के लिए वह राँची चली आई थी और अपर बाजार में किसी सेठ के घर का काम करने के साथ, उसके बच्चों का खेलाना बोलाना करती थी। बच्चे जब बड़े हो गए, सेठ सेठानी मर गए तो बच्चे उसे अपने घर से निकाल दिए थे। तभी से वह इस जगह पर टपरे डालकर रहती है और भीख मांग कर अपना बसर करती है।

बुढ़िया का नाम सोमरी था। वह संथाल थी और बुढ्ढा मुंडा जाति से था।

सोमरी के तथाकथित बेटे और पतोहू का भी किस्सा कुछ इसी तरह का था। बेटे का असली घर कहीं दूसरी जगह था। वहाँ उसकी ब्याहता पत्नी और उससे पैदा बच्चे रहते थे। यहाँ इस घर में उसकी रखैल रहती थी। दफ्तर के पीछे ठेले पर वह चाय और खाना बनाकर बेचती थी। वहाँ से कुछ ही कदमों की दूरी पर टीना डालकर उसने अपना घर बना लिया था और उसी में वह रहती थी। उसके तीन चार बच्चे थे। उसका मरद हफ्ते के कुछ दिन अपनी रखैल के साथ और कुछ दिन अपनी व्याहता पत्नी बच्चों के साथ रहता था। वह करता कुछ नहीं था। दिनभर दारू पीता था और तीन चार लोगों को लेकर जुआं खेलता था।

सोमरी इन्हीं लोगों को अपना बेटा, पतोहू तथा उसके बच्चों को नाती, पोता कहती थी। सोमरी को लेकर जब मैं उसके टपरे के पास पहुँचा था तो उसका बेटा नशे में धुत्त जुआ खेल रहा था और उसकी पतोहू अपनी दुकान पर बैठी थी। सोमरी की दुर्दशा देख उसकी पतोहू जोर जोर से चिल्लाती मेरे पास पहुँची थी उसका चिल्लाना सुनकर उसका शराबी बेटा जुआं खेलना छोड़, तीन चार जनों के साथ मेरे पास पहुँच गया था। मेरा चेहरा मोहरा और पहनावा, ओढ़ावा देख वे समझे थे कि बाबू कोई मोटा आसामी हैं और उससे उसकी गलती के लिए मोटी रकम वसूली जा सकती है। क्या हो गया रे नानी ई ऽ ऽ ऽ तेरी ऐसी दशा इसी आदमी ने कर दिया क्या ऽ ऽ ऽ ? उसकी बहू क्रोध से उबलती, चिल्लाती खा जाने वाली नजरों से मुझे ऊपर से नीचे तक ताकती मेरे करीब आकर खड़ी हो गई थी। उसका चिल्लाना सुनकर और भी कई लोग दौड़कर वहाँ पहुँच गए थे लेकिन कुशल यही हुआ था कि सोमरी ने उन्हें बता दिया था कि बाबू ने मुझे कुछ नहीं किया कुत्तों ने मुझे काट खाया है। बाबू तो मुझे वहाँ से उठाकर यहाँ ले आया है। इसके बाद उसका बेटा और पतोहू शांत हो गए थे। मैंने उनसे कहा कि अपनी माँ को रिक्शे से उतारो और अस्पताल ले जाकर इसकी दवा, दारू करवाओ । इसकी हालत ठीक नहीं है। मेरे इतना कहने पर उसकी पतोहू बिना कुछ बोले वापस अपनी दुकान पर चली गई थी, और अपने ग्राहकों को संभालने लगी थी। उसका शराबी बेटा भी अपने जुआ खेलने की जगह पर वापस लौट गया था। सारे तमाशबीन भी एक एककर वहाँ से खिसक लिए थे।

क्या हुआ नानी तेरे बेटे पतोहू तुझे छोड़कर भाग क्यों गए? यहाँ पर किसी बुजुर्ग औरत को इज्जत देना हो तो लोग उसे नानी कहते हैं।

भागिगैलो बेटा आ ऽ ऽ ऽ कि करबौ औ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ हे ए ऽ ऽ ऽ राम कहकर वह अपना माथा पकड़ कर बैठ गई थी।

मैं बुढ़िया को वही रिक्शे पर छोड़ उसकी बहू के पास गया था। पूछा क्या हुआ, तुम लोग बूढ़ी को छोड़कर भाग क्यों आए?

क्या करेगें बाबू हम लोग, बुढ़िया हमारी कोई नहीं लगती।

लेकिन वह तो मुझे बताई कि मेरे बहू बेटे यही लोग है।

वह यहाँ रहती है, हम लोग भी यहीं रहते है इसलिए वह ऐसा बोल रही है नहीं तो वह संथालिन भिखमंगी है और हम लोग लोहरा, हमारी माँ कैसे हो गई वह? मैं थोड़ी देर तक अनिश्चय की स्थिति में वही खड़ा रहा था फिर सोचा कि इसे अस्पताल ले जाकर इसकी दवा, दारू करवा देता हूँ। अच्छा सुनो ओ ऽ ऽ मैंने उसकी पतोहू से कहा, ठीक है, वह तुम्हारी माँ नहीं है, मैं इसे अस्पताल ले चल रहा हूँ तुम इसके साथ अस्पताल तो चल सकती हो? इसको उठाने बैठाने पकड़ने, धकड़ने में एक और आदमी के मदद की जरूरत होगी। लेकिन उतना तक भी करने के लिए वह राजी नहीं हुई थी। मैं इस समय अपनी दुकान छोड़कर कहीं नहीं जा सकती। उसका मर्द शराब के नशे में धुत्त था। उसका साथ जाने का सवाल ही नहीं था। और जिस तरह वह लड़खड़ा रहा था उसे साथ ले जाना मैं ठीक भी नहीं समझा था।

मैं सोमरी को सदर अस्पताल लेकर गया। अपनी बारी आने पर डाक्टर को दिखाया और उसे बताया कि बुढ़िया भीख माँग कर अपना बसर करती है इसलिए आप इसकी जितनी मदद कर सकते हो कर दीजिए। डाक्टर, बुढ़िया की दुर्दशा देखकर और मेरी बात सुनकर पसीजा या नहीं यह तो मैं नहीं जानता लेकिन उसने मुझे बताया कि कुत्ते के काटे का घाव सिलना उचित नहीं है, लेकिन बिना सिले जैसी इसकी घावें हैं और माँस उघड़ा हुआ है वैसे में यह सड़ जाएगा और उसे गैंगरिन हो सकता है। उसने जरूरी दवा, सुई, मरहम पट्टी का निर्देश चुटके पर लिखकर मुझे पकड़ा दिया था। मैं उसे लेकर पट्टी घर में आया। उस समय तक दोपहर की छुट्टी हो चुकी थी और लोग पट्टी घर बंद कर रहे थे। वहाँ पर स्टाफ में कोई झाजीं और दूसरा एक आदमी था। मुझे बुढ़िया की मदद करते देख उनमें भी उसके प्रति हमदर्दी और कर्तव्य बोध जग गया था। उन दोनों ने दोबारा आलमारी खोलकर बुढ़िया के घाव की सफाई, मरहम पट्टी किया, सुई लगाया और खाने के लिए गोलियाँ देकर चले गए।

सोमरी को कुत्ते ने काट खाया था इसलिए उसे रेवीज का इंजेक्शन लगना जरूरी था। मरहम पट्टी करने वालों ने बताया कि अस्पताल में रैबीज का इंजेक्शन नहीं है लेकिन आप फलां डाक्टर से मिलकर बुढ़िया के बारे में बताइए शायद आपको इंजेक्शन मिल जाए। जिस डाक्टर से मिल लेने के लिए उसने मुझसे कहा था उससे मिलकर सारी बातें बताया तो उसने मुझे एक दूसरे डाक्टर के पास भेज दिया था। भीड़ में इस डाक्टर से उस डाक्टर के पास काफी दौड़ने के बाद मुझे लगा कि किसी भी हालत में यहाँ सुई नहीं मिलेगी। इंजेक्शन खरीदने के लिए अस्पताल के गेट के पास ही मेडिकल स्टोर की दूकान है, वहाँ गया तो पता चला एक इंजेक्शन का दाम करीब सात सौ रुपए है। मेरे पास उस समय उतने पैसे नहीं थे। इंजेक्शन लगवाना जरूरी था। मेरी जेब में उस समय करीब चार सौ रुपए थे। दुकान पर बैठे लड़के से निवेदन किया कि वह मुझे सुई दे दें, मैं उसे दो घंटे के भीतर बाकी का पैसा पहुँचा दूँगा। लड़का उस दुकान पर नौकरी करता था उसे किसी को उधार देने की इजाजत नहीं थी। मैंने अपनी टीसाट घड़ी निकालकर उसे दे दिया, कहा मैं आपको बाकी का पैसा दो घंटे में लाकर दे दूँगा, बड़ा हीला हवाली करने के बाद उसने घड़ी रख लिया था।

मैं उस बुढ़िया की मरहम पट्टी करवाने के लिए रोज अस्पताल ले जाता। उसके घाव भरने लगे थे। जैसी उसकी हालत थी वैसे में उसका ट्टटी पेशाब जाना भारी था तो वह भीख माँगने कहाँ जा सकती थी। बूढ़े को कभी तीन रुपए तो कभी चार, पाँच रुपए काली मंदिर के सामने बैठने पर मिलते ऐसे में उनका भोजन, पानी चलना मुश्किल था। इसलिए उनके खाने के लिए मैं उसे रोज पचीस-तीस रूपए दे देता था। पाँच रुपए में एक प्लेट चावल, उसके साथ दाल और आलू की भुजिया वहीं पर मिल जाया करता था।

दो तीन दिनों के बाद हमेशा की तरह एक दिन जब मैं बुढ़िया को अस्पताल ले जाने के लिए पहुँचा तो बुढ़िया का बेटा शराब के नशे में धुत्त लड़खड़ाता हुआ मेरे पास पहुँचा था, और मेरे हाथ में एक कागज पकड़ा कर बोला इसे पढ़ लीजिए। उसे पढ़ा तो उसमें हिंदी में हाथ से लिखा था कि वे लोग गरीबों की मदद के लिए चंदा इकट्ठा कर रहे हैं इसलिए उसके लिए मुझे दान देना चाहिए। मैं इस बात के लिए पहले से ही सतर्क था। मैं जान गया था कि ए लोग मुझे कोई धनाढ्य और पैसे वाला सेठ समझते हैं। इसलिए वे मुझसे किसी न किसी बहाने कुछ पैसा जरूर ऐंठने के फिराक में होंगे। मुझे तो इस बात का भी डर लगा रहता था कि कहीं ये लोग पैसे के लिए मेरा अपहरण न कर लें। या कि यह बात इतनी फैल न जाए कि दूसरे जरायम पेशा लोगों की नजरों में मैं चढ़ जाऊँ। मैं उनसे बहाने कर दिया था, कि मेरे पास पैसे कहाँ है? अरे मैं तो इस बुढ़िया की मदद के लिए शहर के सेठों के सामने जाकर गिड़गिड़ाता हूँ तब जाकर उसके दवा दारू का पैसा मिलता है। मेरे पास अगर पैसे होते हो इसकी दवा के लिए अपनी घड़ी थोड़ी गिरवी रखता। मैं ज्यादातर पैदल ही चलता था। मेरे पास एक साइकिल तक नहीं थी हाँ कपड़े जरूर मैं साफ पहनता था, इसलिए उन लोगों को मेरी बात पर विश्वास हो गया था। बाद में बुढ़िया को भी मैं यही बता दिया था कि उसके ऊपर जो भी खर्च कर रहा हूँ, सब, लोगों से माँग कर लाता हूँ। बुढ़िया ने मुझसे कहा था बाबू हिनकौ एकौ पैसा मत दिहे सब दारू पीकर और जुआं खेलकर उड़ाय देतौ।

कुछ दिनों तक लगातार दवा, दारू चलने के बाद सोमरी की हालत में सुधार होने लगा था। इस बीच मुझे घर से पत्नी का फोन मिला कि वह बीमार है। घर पर वह अकेली रहती थीं इसलिए उसकी दवा दारू और देखभाल करने वाला कोई नहीं था। ऐसे में मेरा घर जाना जरूरी हो गया था। सोमरी अब ठीक हो रही थी लेकिन चलने फिरने में वह अभी भी असमर्थ थी। उसके टपरे से थोड़ी ही दूर पर धुर्वा डोरंडा की तरफ से आने वाले विक्रम गुजरते थे। वह अपने टपरे से बैठकर घिसटती पिसटती किसी तरह विक्रम वालों के रास्ते के बगल बैठ जाया करती थी। विक्रम के ड्राइवर उसे रुपए आठ आने दे दिया करते थे। लेकिन जितना उसे मिलता था, उसमें उसकी दवा, दारू तथा दो जनों के खाने के लिए पूरा नहीं पड़ता था। इसलिए मैं उसकी रैबीज की बाकी की सुई और दो महीने की गोलियाँ खरीदकर उसकी पतोहू को समझाकर, उसे दे दिया था। उससे मैंने कहा था तुम इसकी दवा और खाने का ध्यान रखना समय पर उसे सुई लगवा देना। जरूरत पड़ने पर अपनी तरफ से खर्च कर देना जो खर्चा करोगी उसे जोड़कर रखना वापस लौटकर मैं तुम्हारा हिसाब कर दूँगा। बुढ़िया को मैंने दस रुपए की एक गड्डी तोड़कर एक हजार रुपए चुपके से दे दिया था और उससे कहा था कि इसे बहुत संभालकर रखना जरूरत पड़ने पर इसमें से निकालकर खर्च करना। मैं जिस समय उसके टपरे में घुसकर उसे रुपए दे रहा था तो बगल की लीटी चोखा की दूकान में एक सतरह, अठारह साल का लड़का काम करता था। वह सोमरी के लिए खाना और इसकी जरूरत की दूसरी चीजें ला दिया करता था। उसने मुझे पर्दे की ओट से सोमरी को रुपए देते देख लिया था। रात में लड़का उसके टपरे में घुसा था, और उसका गला दबाकर उससे सारी रुपया छीनकर भाग खड़ा हुआ था। दूसरे दिन उसके टपरे में पहुँचा तो सोमरी मुझे बताने लगी, बाबू धोन सब रूपैया वहि छोकरा हमर गटई दाब के छीन ले लौउ। मैंने सोचा कि तकदीर इसी को कहते हैं नहीं तो इस जैसी लाचार के घर में डाका कैसे पड़ता।

उसी दिन लकवाग्रस्त बूढ़े ने मुझे बताया कि उसकी पेशाब से खून आता है और वह मुझसे गिड़गिड़ाने लग गया कि बाबू मेरी भी दवा करवा दे। मैं बूढ़े को रिक्शे मैं बैठाकर डाक्टर अग्रवाल के क्लिनिक में ले जाकर उन्हें दिखाया। डाक्टर साहब को जब मैं पैसा देने लगा तो उन्होंने मुझसे पैसे नहीं लिए। आप इसके लिए इतना कर रहें है, मैंने इतना कर दिया तो उसका पैसा लूँगा? बूढा तीन चार दिन दवा खाने के बाद ही ठीक हो गया था।

पत्नी के स्वस्थ हो जाने के बाद जब मैं वापस राँची लौटा, तो मुझे पता चला कि सोमरी के साथ उसके टपरे में रहने वाला लकवाग्रस्त उसका भाई मर गया, और कुकुर काटे से सोमरी पूरी तरह ठीक हो गई थी लेकिन उसे लकवा मार गया है। वह माँगने के लिए अपने टपरे से घिसट घिसट कर विक्रम वालों के रास्ते की बगल जाकर बैठ जाती और वहाँ से उसे कुछ मिल जाता। मैं भी उसे दो तीन दिनों में एक दफा बीस-पचीस रुपए दे दिया करता। उसके कपड़े सब फट गए थे। उसके पास एक ब्लाउज और पेटीकोट था जिसे पहनकर वह अपना शरीर ढॅपती।

मैंने उसे दो कंबल दो सेट धोती, ब्लाउज और पेटीकोट खरीदकर दिया। उसके टपरे की पन्नी सड़कर फट गई थी, जिसके चलते पानी बरसने पर वह उसके नीचे बैठकर भीगती अपनी रातें गुजारती। टपरे पर डालने के लिए, मैं बाजार से दस मीटर की एक मजबूत पालीथीन की बरसाती उसे खरीदकर दिया, और उसकी पतोहू से बोला कि तू इससे इसका टपरा छवा दे। वह राजी हो गई। तीन चार दिनों के बाद मैं वापस सोमरी के पास गया तो देखा वह अभी भी उसी तरह ब्लाउज और पेटीकोट में बैठी थी, और उसके टपरे पर पन्नी भी नहीं डाली गई थी। क्या हुआ नानी तू पहले की तरह अभी भी उघार बैठी हुई है जो कपड़े दिया था। उसे पहनती क्यों नहीं? और टपरे पर पन्नी क्यों नहीं डलवायी। मेरे पूछने पर उसने कोई जवाब नहीं दिया था। उसकी पतोहू ने मुझे बताया कि आपने जितना भी कपड़ा लत्ता बुढ़िया को दिया था और वह पन्नी भी उसने सब बेच दिया है। ऍय.... मैं सुनकर अबाक रह गया था। हॉ बाबू आप नहीं जानते बुढ़िया को दारू और हंडिया पीने की आदत है।

वह झूठ नहीं बोल रही थी। सोमरी को एक दिन मैं खुद, जेल की चहार दीवारी के पास सड़क के किनारे हंडिया बेचने वाली औरतों के पास बैठी, हंड़िया पीते देख चुका था। बोला कुछ नहीं था। बोलने का कोई फायदा भी नहीं था। बोलने पर मेरे सामने वह कह देती, आगे से नहीं पियूँगी या सीधा कह देती मैं नहीं पीती। जिसकी हमेशा पीने की आदत होती है वह बिना पिए रह नहीं सकता। उसके लकवा की दवा करवाने के लिए मैं उसे डाक्टर अग्रवाल के पास ले गया। उन्होंने बताया इसकी दवा लंबी चलेगी, और इससे विशेष लाभ हो सकेगा, इसकी मुझे कम ही उम्मीद है। इसलिए मैं उसकी दवा करवाने का इरादा छोड़ दिया था। अब मैं उसकी हाल जानने के लिए हर दूसरे तीसरे दिन इसके पास जाता। उसे दस, बीस रुपए देकर सड़कों पर घूमने लगता। मैं अब फिर पहले की स्थिति में पहुँच गया था। सड़क पर घूमने के अलावे करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था।

एक दिन मैं रातू रोड पर आकाशवाणी अहाते की बगल के मन्दिर से लौट रहा था तो सड़क के दूसरे किनारे पर जहाँ ट्रांसफार्मर लगा है उसके नीचे तीस बत्तीस साल की एक औरत मुझे बैठी मिली थी। उसके एक पाँव घुटने के नीचे फूलकर काफी मोटा हो गया था। उसमें काफी दर्द हो रहा था। जिसके चलते वह कराह रही थी। मैं उसके पास जाकर उससे पूछा क्या हुआ? वह अपने पाँव पर एक बेहद गंदा कपड़ा लपेट रखी थी जिस पर ढेर सारी मक्खियाँ भिनभिना रही थी। मेरे पूछने पर, मुझे दिखाने के लिए उसने अपने पांव पर से कपड़ा हटाया तो उसमें से बड़ी सड़ी किस्म की बदबू उठकर मेरे नथुनों में भर गई थी, जिसके चलते मुझे जोर की उबकाई आ गई थी। उसके पाँव में एक बहुत बड़ा घाव था, और वह पूरी तरह सड़ चुका था। करीब वित्ते भर की जगह में उसके पाँव की माँस सड़कर निकल गई थी। उतनी जगह पीव और मवाद से भरा हुआ था। उसका पाँव देखकर मेरा मन भिन्ना गया था।

वह भीख माँगती थी। उसके पास एक छोटी गठरी थी जिसमें उसने कुछ कपड़े और पतली लकड़ियाँ बांध रखा था। मैं उसे रिक्शे में बैठाकर बड़ा तालाब के पास के मारवाड़ी अस्पताल ले गया। सोचा गरीब जानकर लोग इसका मुफ्त में उपचार कर देंगे। लेकिन वहाँ बड़ी भीड़ थी। वह चल फिर सकने में असमर्थ थी। इसलिए उसे लेकर, उसकी गठरी के साथ, उस भीड़ में यहाँ से वहाँ दौड़ सकना संभव नहीं था। वहाँ पर उपचार भी मुफ्त में नहीं होता था। इसलिए मैंने सोचा कि इसे ले चलकर किसी प्राइवेट डाक्टर से इसकी इलाज करवाता हूँ। लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि इस एरिया में डाक्टर तो कई हैं लेकिन इस बीमारी का इलाज करने वाला यहाँ कोई डाक्टर नहीं है।

वह औरत विक्षिप्त किस्म की थी। पूछने पर उसने अपना नाम राधा बताया था। उसकी बात से लगता था कि वह हरियाना से थी। यहाँ उसका कौन है, और वह कहाँ रहती है? पूछने पर वह बतायी, उसके बेटे-बेटी सभी हैं। मर्द उसका किसी देवी का दर्शन करवाने ले गया था। राँची में वह कहाँ रहती है? पूछने पर वह किसी का नाम बताती थी। लेकिन कहाँ रहती है यह नहीं बता पाती थी। मुझे लगा कि पागलपन के चलते उसका मर्द उससे छुटकारा पाने के लिए देवी दर्शन के बहाने घर से ले आया होगा और उसे गाड़ी में बैठाकर भाग गया होगा। इस तरह वह राँची पहुँच गई होगी। क्योंकि पूछने पर वह बस यही बताती थी कि उसके बच्चे हैं। उसका मर्द है और बार-बार वह मन्दिर जाने और देवी का दर्शन करने की बात करती। वह यहाँ के किसी आदमी या उसका पता नहीं बता पाती थी। हो सकता है वह यहाँ किसी के जाल में फंस गई थी। वह आदमी उसे भीख मंगवाने के लिए इसी हालत में उसे रोड़ पर छोड़ जाया करता था। या यह भी हो सकता था कि वह लावारिस थी और इधर उधर दिन भर कहीं बैठकर जो पाती थी, खा लिया करती थी, और कहीं भी पड़कर अपनी रात गुजार देती थी। उसके सिर के बाल कटवा दिये गए थे।

मारवाड़ी अस्पताल में ही मुझसे एक सज्जन टकरा गये थे। मेरे साथ उस औरत को देख वे चकरा से गये थे। यह कौन है आपकी। उन्होंने मुझसे पूछा था तो उन्हें मैंने सारा किस्सा सुना दिया था। उन्होंने मुझे सुझाव दिया कि इसे आप राजेन्द्र मेडिकल ले जाइए। वहाँ इसे लावारिस करके भरती करवा दीजिए, तो अस्पताल की तरफ से इसका मुफ्त इलाज भी होगा और खाना पीना भी इसे मुफ्त दिया जाएगा। यह बड़ी अच्छी बात थी। औरत की हालत काफी खराब थी। उसे सेप्टिक हो गया था। मैं उसका इलाज तो करवा सकता था लेकिन उसकी पूरी देखभाल नहीं कर सकता था।

एक आटो रिजर्व करके मैं उसे आर.एम.सी.एच. ले गया। वहाँ पर इमर्जेंसी में बैठे डाक्टर को सब कुछ बताया और उससे निवेदन किया कि यह भिखमंगिन है, सड़क पर मुझे पीड़ा से कराहती दिखी। मैं वहीं से इसे उठाकर यहाँ ले आया हूँ। इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है इसलिए आप इसे लावारिस मरीज की तरह अस्पताल में भर्ती कर लीजिए। मेरे ऐसा निवेदन करने पर उन्होंने कहा ऐसा कर सकना मेरे अधिकार क्षेत्र में नहीं है। किसके अधिकार क्षेत्र में है यह? मेरे पूछने पर मुझ पर झुँझलाते हुए उन्होंने इसकी जानकारी इनक्वेरी से करने को कहकर अपने काम में व्यस्त हो गए थे।

डाक्टर साहब ने इमर्जेंसी में उसकी मरहम पट्टी करवा दिया था, और एक चुटके पर दवा और इंजेक्शन लिखकर मुझे पकड़ा कर बोले थे, इसे आप बाजार से खरीद लीजिए।

इन्क्वेरी में पता किया तो वहाँ बैठा आदमी वहाँ के बड़े डाक्टर का नाम बताया जो मरीज को लावारिस भर्ती करने के लिए सक्षम था। पाँव से चलने में लाचार होने के चलते राधा बड़ा रेंघ, रेंघ कर चलती थी। उसकी गठरी तथा उसे पकड़कर किसी तरह लंबी दूरी चलकर और कई सीढ़ियाँ चढ़कर, तीन तल्ले पर उस डाक्टर के पास पहुँचा था। लंबे इन्तजार के बाद जब उनके पास पहुँचकर राधा की कैफियत बताया था और उसे अस्पताल में भर्ती कर लेने का उनसे निवेदन किया था तो वे मुझ पर बिगड़ गए थे। लावारिस मरीज अस्पताल में ऐसे भर्ती नहीं कर लिया जाता। उसके कुछ नियम हैं फिर यह तो भर्ती करने लायक है भी नहीं। आप इसे फलॉ डाक्टर के पास ले जाकर दिखवा लीजिए। वही इसके विशेषज्ञ है। मैं उसे वहाँ से साथ लेकर काफी दूर दूसरे लल्ले पर बैठे विशेषज्ञ डाक्टर के पास ले जाकर नंबर लगाया था। अपना नंबर आने पर जब मैं उसे लेकर उनके चैंबर में गया, तो उसे देखने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा यह कैसे हुआ? मैं जानता नहीं था, कैसे हुआ, उससे पूछा तो उसने बताया चोट लगी थी। डाक्टर को संदेह हुआ कहीं इसके पाँव में फ्रैक्चर तो नहीं है? उन्होंने उसका एक्सरे करने को लिखा। एक्सरे बड़ी दूर कहीं दूसरी जगह होता था, मैं उसे वहाँ ले गया तो वहाँ का स्टाफ कभी मुझे देखता और कभी राधा को। उसकी हैरानगी देख, मैंने उसे राधा की पूरी कहानी बता दिया था। उसने कहा, लेकिन एक्सरे के पैंसठ रुपए लगेंगे। और इस समय जमा करने वाला भी कोई नहीं है। मैं उसे पैंसठ रुपए पकड़ाकर कहा आप इसे रखिए और इसका एक्सरे कर दीजिए।

एक्सरे की कापी घंटे भर बाद मिलती, इसलिए मैं राधा को लेकर नीचे आ गया था। सुबह से ही वह मेरे साथ लगी थी इतने समय में इसने कुछ खाया पिया नहीं था। बेचारी भूखी प्यासी होगी। क्या पता इसके पहले इसे खाना कब नसीब हुआ होगा। यही सब सोचकर मैं उसे एक किनारे जहाँ पानी की एक टोंटी थी और उसकी बगल ही संडास था, वहाँ बैठाकर अस्पताल गेट के ठीक सामने कई ढाबे हैं वहाँ से उसके लिए खाना लाने चला गया।

मैं उसके लिए छ: सात रोटियाँ और एक पन्नी में सब्जी ले आया। उसे खाने को दिया तो खाने के पहले उसने उसमें से तीन चार रोटियाँ निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दी थी। ले तू भी खाले। उसके चेहरे पर और आवाज में उस समय जो आत्मीयता भरा आग्रह था उसे देख, सुन और महसूस करके मैं अभिभूत हो गया था। क्या होता है औरतों में, उनका वात्सल्य या उनकी सहजवृति कि दिनभर की भूखी प्यासी होने और विक्षिप्त की हालत में भी खाने के पहले, अपने खाने में से ज्यादा हिस्सा निकालकर उसने मेरे आगे बढ़ा दिया था। भूख उस समय मुझे भी लगी थी लेकिन मैं उसे कह दिया था कि मुझे भूख नहीं है तू खाले।

जिस समय मुझे, उसका एक्सरे मिला, डाक्टर अपने चैंबर से जा चुके थे। एक्सरे अभी गीला था। मैं एक्सरे लिया और राधा को आटो में बैठाकर डाक्टर अग्रवाल के पास लालपुर आ गया था। डाक्टर साहब के पास राधा को ले जाकर उन्हें उसका एक्सरे और पर्चा दिखाया। वह मुझे कहाँ मिली, तथा उसकी मानसिक स्थिति कैसी है और दिनभर उसे लेकर कहाँ कहाँ भटका जैसी तमाम बातें उन्हें मैंने बताया। इतना सब उन्हें बताने के पीछे मेरा उद्देश्य यह था कि वे शहर के प्रभावशाली व्यक्ति हैं। इसके पहले मैं लकवाग्रस्त बूढ़े और सोमरी को उन्हें दिखा चुका था। राधा को देखकर वे जरूर समझ जाएँगे कि मैं जिस काम में लगा हुआ हूँ वह काफी पुण्य का और बड़ा काम है, और इसे समझकर डाक्टर साहब मेरे काम में मदद करने के साथ स्थाई रूप से अपने काम में जम सकूँ, इसमें मेरा सहयोग करेंगे।

डाक्टर साहब मेरे काम से प्रभावित भी हुए थे। पर्ची और एक्सरे देखकर उन्होंने कहा था दवा ठीक लिखा है इसे यह खाएगी और इसका ठीक से मरहम पट्टी होगी तो यह ठीक हो जाएगी। डाक्टर अग्रवाल शायद हरियाना के ही थे, उन्होंने राधा से हरियानवी में उसका नाम, घर कहाँ है, पति क्या करते है, कितने बच्चे है, आदि बातें पूछे। राधा ने उन्हें भी अपने बच्चों, पति और मंदिर की बात वैसे ही बताया था जैसा वह मुझे बता चुकी थी। अब इसे आप कहाँ ले जाइएगा? उन्होंने मुझसे पूछा तो मैंने उन्हें बताया कि जहाँ से इसे उठाया था वही ले जाकर छोड़ दूँगा। अपने घर में मैं इसे रख नहीं सकता। इस पर उन्होंने कहा था कि आपका, अगर सिर छुपाने के लायक ही सही, एक सेड होता तो अच्छा होता। डाक्टर साहब की बात सुनकर, मुझे लगा कि वे मुझे कोई ठोस मदद करने की दिशा में कुछ सोच रहे है। दूसरे दिन ही मैं यह सोचकर उनके पास फिर गया कि वे मुझसे इस विषय में विचार विमर्श करेंगे और मुझे किस तरह मदद करना चाहते हैं, इस बात का खुलासा करेंगे लेकिन उन्होंने मदद जैसी बात का मुझसे कोई जिकर ही नहीं किया था। उनके पास पहुँचने का मेरा उद्देश्य वे जरूर समझ गए थे। उन्होंने समझा मैं उनके गले पड़ना चाहता हूँ, इसलिए मेरा भ्रम तोड़ने के लिए वे मुझे बताने लगे कि मेरे यहाँ जो भी गरीब और लाचार आते हैं मैं खुद उनकी मदद करता हूँ, इसलिए किसी और की मदद करने का बोझ मैं अपने सिर पर नहीं ले सकता। हालांकि दूसरी बात उन्होंने स्पष्ट नहीं कहा था लेकिन उनके कहने का मतलब यही था, यह शायद आदमी की सहजवृति में है कि दूसरे की खराब बातें सुनने और बतियाने में उसे बड़ा रस और आनंद मिलता है। लेकिन किसी की अच्छाई, उससे बर्दाश्त नहीं होती। किसी की अच्छाई देख, सुनकर उसको अपने कमतर होने का बोध होता है जिसके चलते वह ईष्यालु हो उठता है शायद यही कारण है कि अच्छे अच्छे लोग भी किसी की अच्छाई या अच्छी बात सुनकर नजरें चुराने और उबासियाँ लेने लगते हैं। या कि वे यह कहना शुरू कर देते हैं कि मैं भी इसी तरह करता हूँ, या कि मेरा अपना एक संबंधी भी इसी तरह की ऊँचाई पर पहुँचा हुआ है या यही करता है।

खैर डाक्टर साहब में क्या बात थी यह तो मैं ठीक ठीक नहीं कह सकता लेकिन उनसे मैं अपने काम में सहयोग पाने की जो एक बहुत बड़ी उम्मीद बाँध रखा था वह एकदम से टूट गई थी। इसके बाद डाक्टर साहब के पास मैं फिर नहीं गया था।

डाक्टर साहब के यहाँ से मैं राधा को रिक्शे में बैठाकर, रातू रोड बस स्टैंड के पास, जहाँ वह सुबह मुझे मिली थी, वहीं छोड़ देने के लिए ले आया था। उस समय रात के आठ बज रहे थे। सोचा उसे कुछ खिला दूँ, नहीं तो वह भूखी रह जाएगी। कोने के एक छोटे से होटल में उसे लेकर गया तो होटल वाला उसे अंदर नहीं घुसने दिया। कहा इसे देखकर मेरे दूसरे ग्राहक बिदक जाएँगे। उसने मुझसे कहा मैं इसे जो कहिएगा बाहर बैठाकर खिला दूँगा। मैं होटल वाले को राधा के खाने भर के लिए दाल, चावल, रोटी, सब्जी का पैसा दिया, और उससे दूसरे दिन, सुबह दस बजे वही होटल के सामने मौजूद रहने को कहकर तथा दवा की गोलियाँ कैसे और कब खाना है, सब कुछ समझाकर चला आया था, उसकी मुझे मरहम पट्टी जो करवाना था। लेकिन दूसरे दिन मैं उसका वहाँ बड़ी देर तक इंतजार किया, लेकिन वह नहीं पहुँची। उसे तलाशने के लिए मैं अपर बाजार, रातू रोड और पहाड़ी मंदिर तक घूमा लेकिन वह मुझे नहीं मिली। काफी दिनों के बाद, एक दिन वह मुझे, रियाडा के बगल सब्जी बाजार के सामने की सड़क पर दिखी। यह देखकर मुझे खुशी हुई थी कि उसके पाँव का घाव ठीक हो गया था। मैं उससे पूछा कैसी हो, मुझे पहचान रही हो? मैं वही आदमी हूँ, जो तुम्हारे पाँव की दवा करवाने के लिए तुम्हें बड़ा अस्पताल ले गया था। लेकिन मेरे काफी याद दिलाने के बाद भी वह मुझे पहचान नहीं सकी थी।

सोमरी को देखने मैं रोज जाता था, और उसे दस-पन्द्रह रूपये दे दिया करता था। एक दिन उससे मैंने कहा कि, अगर तू किसी भिखारी को या ऐसे ही किसी को जानती है जो बीमार है और अपनी, दवा नहीं करवा सकता, उसे बुलाओ मैं उसकी दवा करवा दूँगा। दो दिन बाद ही एक बूढ़ी औरत मुझे, सोमरी के पास बैठी दिखी। उसके बेटा पतोहू सभी थे और अपना घर भी था लेकिन इसके बेटे न तो उसको खाना देते थे और न ही उसकी देखभाल ही करते थे। सोमरी जब अपने देह, पाँव से दुरूस्त थी तो वह उससे घिघियाने लगी कि उसे भी भीख माँगना सिखा दे। बेटा, पतोहू के हाथ उसकी दुर्दशा की कहानी सोमरी पहले ही सुन चुकी थी। उसका घिघियाना देखकर उस पर उसे दया आ गई थी। भीख माँगने का हुनर सिखाने के लिए, सोमरी उसे अपने साथ लेकर, गृहस्थों के घर जाती और भीख माँगा कैसे जाता है उसकी कला उसे सिखा दी थी। जब उसने गृहस्थों का घर देख लिया और खुद भीख माँगना शुरू कर दिया तो वह सोमरी को भाव देना ही बंद कर दी थी। इस बात को लेकर सोमरी के मन में बड़ी कुफुत थी। उस दिन सोमरी के पास वह इसलिए आई थी कि दिनभर डह बजरकर वह जो कुछ माँग कर लाती है बेटा, पतोहू उसे छीन लेते हैं। इस बात को लेकर वह बड़ा दुखी और परेशान थी। सोमरी ने उसे बताया था कि कुत्ते ने जब उसे काट खाया था तो इसी बाबू ने मेरी दवा करवाया था। वह बुढ़िया सोमरी से अपनी दुर्दशा बताकर उससे घिघिया रही थी कि अपनी झोपड़ी के पास वह उसकी भी झोपड़ी डलवा दे।

बुढ़िया खांसी से बहुत परेशान थी। उसने मुझसे कहा बाबू मेरी साँस बहुत फूलती है। रातभर मैं खांसते ही गुजारती हूँ, इसके चलते मैं बहुत परेशान हूँ। तू मेरी भी दवा करवा दे। ठीक है चल मैं तेरी दवा करवा देता हूँ। मैं उससे कहता इसके पहले ही सोमरी उसे समझाने लग गई थी कि बाबू कोई बड़ा आदमी थोड़ो है अरे इसने मेरी दवा करवाने के लिए सेठों से गिड़गिड़ाकर और पाँव पकड़ कर पैसे माँगे थे तब कहीं मेरी दवा करवाया था ऐसे में वह तेरी दवा कहाँ से करवा देगा?

एक तो सोमरी उस औरत से, अपनी अवहेलना को लेकर चिढ़ी हुई थी, दूसरे उसे शायद इस बात का डर था कि अगर मैं इस औरत से जुड़ गया तो उसे जो रोज मुझसे दस-पाँच रुपए मिलते हैं वह मिलना बंद हो जाएगा। सोमरी जब उसे इस तरह समझाने लग गई थी तो मैं उस समय चुप लगा गया था। दूसरे दिन जब मैं सोमरी के टपरे पर पहुँचा था तो बुढ़िया ने उसके साथ जो कृतघ्नता की थी सब मुझे विस्तार से बताने लग गई थी। बाबू ऊ ऽ ऽ ऽ घोन वहि बुढ़िया कौ बोलै तक कै सऊर नाइ रहौ। ओकर बेटा, पुतोहूँ तीन तीन दिन तक होकरा के भुखै राखत रहलौऊ। हमरा से आइ के रोवे लगलौऊ, दीदी हमरौ के भीख मांगै सिखाय दें, दुखियारी है बेचारी यहै सोच के मैं ओकरा के गृहस्थन के घर ले जाइके भीख माँगै सिखैली। जब ऊ सब सीखि लेलौउ तो हे बप्पा, हमार से बोलनै बंद कर देलौउ। हमरा के देखि के आपन मुंह घुमाय लेतौउ। मैंने उससे कहा जाइ दे नानी तैं आपन फर्ज पूरा कै देली, होकर जौन सुभाव है वैसा कइलस, तोर थोड़ौ कुछ बिगाड़ लेलस। एकर फल ओकरा के भगवान दी हैं। देलस न बाबू, अब माँगिके जौन कुछ लानत हई सब होकर बेटा पतोहू छीन लैतौ काल्हि वहै सब हमरा से रोवत रह लै कि दीदी यहि ठॉव आपन झोपड़ी के बगल हमरौ एक झोपड़ी डलवाय दे। जाइ दे नानी तै आपन तरफ से निरछल हइसनै।

सोमरी उस पर इतनी खफा थी कि वह उसकी बात भी करना नहीं चाहती थी। उसने मुझसे कहा बेटा आपन कनिया के एक दिन लाइके हम्मै देखाइ दे। मैंने उसे बताया कनिया यहाँ नहीं रहती वह गाँव पर रहती है। बात वहीं पर खत्म हो गई थी। लेकिन जब मैं अगले दिन सोमरी के पास पहुँचा तो देखा उसके टपरे के भीतर एक सत्रह अठारह साल की लड़की बैठी हुई है। लड़की खूबसूरत तो नहीं थी लेकिन देह दशा से वह साफ थी और सलवार कुर्ते में ठीक ठाक दिख रही थी। यह लड़की कौन है नानी? मेरे पूछने पर उसने मुझे बताया कि तेरी कनिया यहाँ नहीं है, यह लड़की तेरे घर का सारा काम कर दिया करेगी। मैं सोमरी का अभिप्राय समझ गया था। मैं अकेला जरूर रहता था लेकिन अपने कपड़ों की सफाई, घर का झाड़ू पोंछा से लेकर खाना बनाने और बर्तन साफ करने तक का सारा काम खुद ही करता था। चाहता तो, यहाँ घर में काम करने वाली दाइयाँ आसानी से मिल जाती थी, उन्हें रख लेता। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया था, और न ही कभी किसी औरत के साथ हम बिस्तर होने जैसी बात ही मेरे दिमाग में आई थी। ऐसा करना न तो मेरी फितरत में था और न ही मैं जिंदगी में दूसरी औरत के साथ ऐसा कभी किया था। सोमरी की बात सुनकर मैं उसे कोई जवाब नहीं दिया था न ही उस पर कोई प्रतिक्रिया ही व्यक्त किया था। उसे दस रुपए पकड़ाया था और वहाँ से अपने डेरे पर आ गया था।

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क्रमशः अगले अंकों में जारी...

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रचनाकार संपर्क:

आर. ए. मिश्र,

2284/4 शास्त्री नगर,

सुलतानपुर, उप्र पिन - 228001

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रचनाकार: दुनिया गोल है - किश्त 5
दुनिया गोल है - किश्त 5
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