नीचे टैक्स्ट बॉक्स से रचनाएँ खोज कर पढ़ें -
 नाका संपर्क : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी यहाँ [लिंक] देखें.

लाल्टू की कहानी : निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की

साझा करें:

कहानी निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की - लाल्टू अजंता, तपती दुपहरी, लू के तमाचे और शाम का एकाकीपन, इन सबसे अलग अब...

कहानी

निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की

nikhil-chaganlal2

- लाल्टू

image

अजंता,

तपती दुपहरी, लू के तमाचे और शाम का एकाकीपन, इन सबसे अलग अब और कुछ नहीं रहा। तुमने पाँच वर्षों के अनुभव पर कविता लिखने को कहा था न...! मैंने लिखा है–‘बस फटे पन्ने-सी उड़ती ज़िंदगी, इस पुलिये को भी छोड़ चली...।’ बस! इसके बाद और कुछ लिख न पाया! सुना है, बड़े शायरों ने पुरानी जगहों को छोड़ते वक़्त समृतियों को गीतों व ग़ज़लों में संजोया है; पर मैं तो, तुम जानती ही हो कभी दो-एक कविताएं लिख लेता हूँ। अब अचानक किसी फूल के खिलने-सा आलोड़न अनुभव करता हूँ हृदय में, या जब मेरे किसी मित्र की बातों में कहीं कुछ चुभता हुआ सा प्रतीत होता है। अचानक दिशाओं में वीणा के तार झंकृत हो उठते हैं और मैं डायरी के पन्नों में कुछ लिखने लगता हूँ। पर इन पाँच वर्षों में मैं सूखता गया हूँ, पल्लवहीन तरु जैसा। कभी लगता है, किसी ने तीखे चाकू की नोक मेरे हृदय में चुभो दी है। अब कोशिश करने पर भी आवेग नहीं उत्पन्न होता, और फिर यह तो, स्कूल टीचर गिरिधर पांडे कहा करते थे न–कला जो है, सीखी नहीं जा सकती, चक्रवात-सी अचानक उबल पड़ती है। अपने चारों ओर निर्लज्ज नंगे मनुष्यों को महसूस करती मेरी आँखें उन्हीं की तरह ठंडी हो गई हैं। अब कहीं कुछ उबलता नहीं...!


पाँच साल...! अच्छा, अजंता! तुम्हें ऐसे किसी द्वीप में भेज दिया जाए जहाँ सभी नपुंसक हों और तुम... एक मिनट के लिए तुम्हें पुरुष मान लेता हूँ ... (हंसना नहीं, मैं सीरियसली सोच रहा हूँ) अपना पुरुषत्व लिए नपुंसकों के बीच घूमती रहो, एक क्षीण आशा लिए कहीं कोई और स्वस्थ मनुष्य मिले! दो-एक पुरुष तुम्हें मिलें भी तो वे नपुंसकों की भीड़ में सम्मोहित दीख पड़ें, तो तुम्हें कैसा लगेगा?... और अचानक एक दिन तुम्हें पता चले कि वे सब नपुंसक नहीं थे, कतिपय राक्षस और उनके भय से पुरुषों की विशाल श्रेणी कुत्तों की तरह दुम हिलाती घूम रहीं!... मुझे पहली दफ़ा जब इस रहस्य का पता चला ... मैं रो पड़ा था... (मैं डर गया था कि मुझे मार डाला जाएगा, पर जब तक मेरी मौत करीब आई, मुझमें ज़िंदा रहने की लेशमात्र भी इच्छा न ती)। जब रोते-रोते मैं थक गया, मैंने कविताएं लिखीं। मेरे आंसुओं से भीगी वे कविताएं...जिनमें मेरे कमरे के बगल से बहती खून की नदी बहती थी, उन्हीं फटे पन्नों में बिखर गईं...जिनमें मिलकर मेरी ज़िंदगी क्रमशः उड़ती जा रही है।


मैंने फूलों को मुरझाते ही देखा। तुम पूछोगी, ‘तुम्हारे मित्रों को हंसते भी तो देखा है?’ बेशक! हंसी, जिसमें मैं नहीं शामिल हो पाया। अजंता! तुमनें किसी फूल को मुरझाते हुए देखा है?... अगर कभी ग़ौर से देखा हो तो मुरझाने से पहले खिलने के लिए जब फूल हाथ-पैर पटकता है... उस क्षण तुम्हें बेहोशी की अनुभूति अवश्य हुई होगी। मैं इसी बदहवासी में दिन गुज़ारता रहा हूँ। पहले दिन जब मैं रोया था, दर्जी गंगाचरण के बेटे को दाख़िला न दिला पाने की वजह से, और गंगाचरण के यह कहने पर कि, ‘डिफेंस में हैं साहब! हमारे बच्चे को सेंट्रल स्कूल में नहीं लिया और प्रोफेसरों के लड़कों को ले लेते हैं...।’ उसी दिन श्यामा के घर निमंत्रण था, अठारह मोमबत्तियां बुझा कर उसने केक काटा था... मेरे मन में सवाल था कि गंगाचरण के बेटे और श्यामा के भाई को क्या एक तराज़ू को दो पलड़ों पर बैठाया जा सकता है।


मेरा हृदय बहुत पहले से ही चूर्ण-विचूर्ण हो चुका है। अब अगर गुड्डी की चिट्ठियों में बापू का शराबी पागलपन या आर्थिक दुर्वस्था का वर्णन हो, तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, जबकि पहले में कितना चिंतित हो जाया करता था और ‘शीघ्र ही कुछ करना होगा’ सोचते-सोचते तड़पता रहता था। शायद गुड्डी में भी टूटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए आजकल उसकी चिट्ठियां कम ही आती हैं, और जो आती भी हैं, उनमें न तो खेतों की हरीतिमा होती है और न ही बरसाती दिनों का मटमैला आकाश गंभीर हो खड़ा होता है। बस ग्रीष्म की ऐसी रातें, जब कहीं हवा न बहती हो और पसीने में भीगा शरीर बिस्तर पर लुड़कता रहता हो।


अरे! आज तो 20 मई है न? ठीक एक साल पहले, याद है तुम्हें ...? मुझे लग रहा है कुछ ही दिन हुए हैं, तुमने अपनी शादी का निमंत्रण-पत्र भेजा था मुझे ...। अपनी शादी की सालगिरह मनाओगी न? तुम्हें बधाई दे दूं!...मैं तो भूल ही गया, तुम्हारी शादी किस दिन हुई थी ... पर मुझे वह दिन न भूलेगा ... ठीक एक साल पहले मैं तुम्हारे भेजे हुए उस रंगीन कार्ड को लेकर खड़ा रह गया...। जानती हो! उस दिन मैं बहुत रोना चाहता था, पर मैं रो न पाया। उस दिन पहली बार मुझे लगा... मेरी आंखों के नीचे तालाब सूख गया है और मेरा हृदय टूटता जा रहा है। मैंने मन ही मन प्रतिज्ञा की थी कि अब तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं रखूंगा, पर कुछ ही दिनों बाद जब तुम्हारा ख़त आया और उसमें तुमने लिखा था–शादी पर मेरे न आने से तुम्हें बुरा लगा ... तुम्हें बीसों साड़ियां मिलीं और क्या-क्या... अंत में लिखा था–तुम्हारे ‘वे’ चीफ़ अकांउटेंट हैं, किसी एक विदेशी कंपनी की शाखा के... उस दिन मैं हंस पड़ा था... अपनी मूर्खता पर हंसने के सिवा और कर भी क्या सकता था!... और भीतर कोई रोने लगता था... उसे भूलने के लिए मैं अपने उन मित्रों की भीड़ में जा बैठा था जो मेरी संकीर्णता पर भावुक हो मुझे विशाल होने का उपदेश देते। इसके कुछ ही दिनों बाद जब गौरी सिंह ने मुझे बताया था, कि उसकी भाभी का शादी से पहले किसी से इश्क था, इसलिए उसका भाई भाभी को पीटता है, मैंने तुम्हें एक ख़त लिखा था जिसे पड़कर ... तुम्हें पता चला कि मैं बदल गया हूँ, जैसे हर कोई बदल जाता है।


अभी कुछ दिनों पहले मेरे कुछ मित्र विदेश यात्रा से पूर्व ‘क्वॉलिटी’ में पार्टी पर बुला ले गये। उस आलीशान रेस्तरां में निशाहार करते मैंने मन ही मन तुमसे कहा, ‘अजंता, देखो मैं कितने बड़े रेस्तरां में डिनर खाता हूँ।’ तुमने हंसकर उत्तर दिया, ‘वाह! आज दोस्तों ने पार्टी दी तो चले आये, रोज़ थोड़े ही आते हो।’ मैंने कहना चाहा था, ‘तुम्हारे दांत दूध से भी ज़्यादा सफ़ेद हैं’, पर मैंने कहा, ‘हां! आज पार्टी है। अब मैं अपने इन मित्रों को असंख्य शुभकामनाएं उपहार दूंगा। ये विज्ञान और तकनीकी के हित धन कमाते हुए ही अपना जीवन कुर्बान कर दें।’ अचानक उठकर चली गईं तुम और लौटी नहीं। मेरे मित्र काफ़ी परेशान थे कि उस दिन मैं बिल्कुल चुप क्यों था...। उस वक़्त मेरी आंखों के सामने एक मोटी तोंद जिस पर ‘चीफ़ अकाउंटेंट’ का लेबल चिपका था और उससे सटी हुई एक कोमल देह तैर रही थी...।


अच्छा अजंता! हमारे स्कूल के गेट पर एक लंगड़ा भिखारी बैठा करता था। निताई नाम था उसका। ज़रा देखना, वह आजकल वहां बैठता है कि नहीं? यहां कॉलेज के गेट पर वैसा ही एक भिखमंगा बैठा करता है। एक बार बचपन में पिताजी आये थे स्कूल में, शायद हेडमास्टर ने बुलाया था। निताई को देखकर काफ़ी बिगड़े और उन्होंने हेडमास्टर से शिकायत की थी। इसके बाद करीब महीने भर वह नहीं आया था। फिर अचानक एक दिन मैंने उसे देखा था, उसी जगह बैठे हुए, एल्यूमीनियम की एक टूटी थाली पसारे...। मैंने उसे निताई कहकर पुकारा तो उसने बतलाया कि वह निताई नहीं, गोपाल है। मुझे आश्चर्य हुआ था, पर मैं हमेशा उसे निताई ही कहता था। उस दिन ‘क्वॉलिटी’ से लौटते हुए कॉलेज के गेट पर बैठे भिखारी को मेरे एक मित्र ने पाँच पैसे दिये। मुझे अचानक हंसी आ गयी। मेरा वह मित्र काफ़ी देर तक मुझे घूरता रहा और धीरे से दूसरे एक मित्र के कानों में फुसफुसाया था, “सनकी है साला!”


उस दिन मैंने एक कविता लिखी थी – ‘त्रिभुज के तीन कोणों का योग दो समकोण होता है।’ तीन कोण – भूख, नग्नता और गरीबी। समकोण – फटा पन्ना और ज़िंदगी।


एक बार यहां कि एक प्रादेशिक समिति के साथ वनभोज पर गया था। ‘बिठूर’ नामक एक स्थान पर (यहां से करीब 14 कि.मी. दूर है)। खेतों के बीच पिकनिक की। करीब ही गंगा बहती थी। वहीं रमजसवा नामक एक स्थानीय वृद्ध ने कुएं से पानी भरा। उसकी बीवी और बच्चे भी काम करते रहे। करीब तीन बजे तक सबका खाना ख़त्म हुआ तो रमजसवा को बचा हुआ खाना दिया गया। वह इतना कम था कि वृद्ध ने बीवी को बच्चों में बांट देने को कहा। बच्चों की भूख न मिटी तो वे रोने लगे। आयोजकों में से एक से मैंने रमजसवा को कुछ पैसे देने को कहा। उसका जवाब था – ‘वह तो ख़ुद आया था, हमने तो उन्हें नहीं बुलाया।’ मैंने रमजसवा को बुलाकर कुछ पैसे दिये। उस दिन भी कविता लिखना चाहता था मैं, पर लिख न पाया। गंगा के किनारे बैठा सोच रहा था, मेरे चारों ओर बहती गंगा का जल खून-सा लाल है!


पाँच वर्ष...! मैं जानता हूँ, इससे पहले के सोलह वर्ष की दुनिया भी ऐसी ही थी। पर उन दिनों तुम थीं। उससे भी पहले सब थे – मेरा अपना दिन, अपनी रात, अपना पहाड़, अपना आकाश, अपनी नदी ... क्या नहीं था! धीरे-धीरे सब कहीं विलीन होता गया, बचपन में संजोयी आकांक्षाएं धीरे-धीरे मरती रहीं। मेरे वे सब सुन्दर क्षण ... एक-एक कर सब उड़ गये और तभी मुझे लगा था, मैं एक फटे पन्ने-सा काल के साथ उड़ता जा रहा हूँ। उड़ता-गिरता, धूलि में स्नान करता मैं किसी ओर जा रहा हूँ, मुझे पता नहीं। मेरे दिन गये। मेरी रातें गयीं। मेरे पहाड़, नदी और आकाश गये, और अजंता! मेरी तुम चली गयीं। मेरी कविताएं भी चली गयीं...!


तुम्हारे ‘वो’ तो काफ़ी पैसा कमाते होंगे! पिछली बार घर गया था तो मित्रों ने बतलाया था कि वे अच्छे खिलाड़ी भी हैं। मुझे ये बेशक काफ़ी पहले से पता था, क्योंकि मैंने उन क्षणों को सहा था, जब वे खेल में वे मुझसे काफ़ी आगे बढ़ गये थे। अगर मैं कहूँ, और वास्तव में यह सच है कि मैंने तुम्हारे ‘उनको’ कई बार निर्मित किया है और उनकी हत्या की है...। उन्माद के उन दिनों में मैंने इन पाँच वर्षों के सबसे बुरे (या अच्छे!) क्षण बिताये हैं...। अजंता! तुम्हें यह सब जानकर हंसी आ रही होगी...(पर कभी किसी क्षण मेरी याद आये तो दो आंसू मेरे लिए बहाना, गंगा के जल से अधिक निर्मल ... तुम्हारे गालों पर टपकते आंसू बड़े अच्छे लगेंगे...)। अब तक शायद तुम्हें मुझ पर गुस्सा आ रहा हो, कि कहां तो पाँच वर्षों के अनुभव पर कविता मंगवायी थी, और कहां यह पागलपन! पर जैसे मई महीने में जहां हर ओर सूखे, पीलिया से आक्रांत-से पेड़ दिखलाई पड़ते हैं, मैदानों में हर दोपहर, केवल चिताएं जलती हैं... इन पाँच वर्षों के बाद मैं भी उन्हीं में कहीं न कहीं हूँ। मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ न, मुझे हर अन्याय को समझना पड़ा है, मनन करके ... यही मेरी मौत का कारण था। मेरे प्रगतिशील, सक्रिय मित्रों ने उन गहराइयों में डुबकियां लगानी पसंद न की थीं, जिनमें चारों ओर फेनिल पंक था, गंदगी से भरा, टूटते हृदयों की व्यथा से बोझिल ... और वे ज़िंदा रहे।


अजंता तुमने कभी डूबते सूर्य से निकलती सतरंगी किरणों में श्रद्धा, स्नेह आदि भावों को हताशा और रुदन में बदलते देखा है? ... मेरे ये भाव एक दिन ऐसे ही बदल गये थे, जब मुझे पता चला था, किताबों और दो टांगों पर खड़ी ज़िंदगी में कितना फ़र्क है! आदिम नग्नता कि इस वीभत्सता के बारे में मैंने सोचा तक न था! और जिस दिन मैंने जाना, काले अक्षरों पर तैरती आँखों के नीचे भी नग्नता की चाह है, और प्रेम और घृणा वहां सहवास करते हैं ... मुझे याद है, मैंने दिनभर खाना तक न खाया था। शायद हर आदमी एक दिन इस परिस्थिति से गुज़रता है जब एक मिमियाती भेड़-सा वह कुछ कहना चाहता है। पर कह नहीं पाता। अगर हिम्मत कर कुछ कह भी दिया (कि देखो चारों ओर अंधेरा है! ... स्तब्ध और गाढ़ा ...) लोग संदेह की नज़रों से ताकते हैं ... पागल! और इन सबके साथ क्रमशः चलता रहता है ख़ुद को बेईमान समझने की बार-बार होने वाली मौत का सिलसिला!...


और यह मौत ही मेरी कविता है। इसे मैंने गत पाँच वर्षों में लिखा है इसके पहले कि मैं यहां से सचमुच चला जाऊं (जो अब असंभव-सा प्रतीत होता है) मैं यहां के हर पेड़, जो कि सूखे हुए हैं, हर बगीचे को, थकी रातों को जलती दुपहरियों को इसी तरह कुछ न कुछ कहना चाहता हूँ, जैसे तुमसे कह रहा हूँ ... या भिखमंगे निताई को कहना चाहता रहा ... पर कह नहीं पाया ...


इति –

पुनश्चः ... कितनी ख़ौफ़नाक मौत है यह! अपने सब आदर्शों की मौत! और काटती ज़रूरतों को ढोता मेरा पैशाचिक अस्तित्व! ... हाय अजंता! मैं न चाहता हुआ भी यह लिखने को मजबूर हो रहा हूँ ... वैसे मेरे ज़िंदा रहने की परवाह भी किसने की है। ... मेरी कविताओं का गला घोंट दिया गया। मैंने कभी कुछ चाहा था। एक प्राणमय जीवन, सृजन और संस्कृति से समृद्ध एक सामाजिक परिवेश ...। और कितना कुछ...। पर अब मेरी मौत हो चुकी है। अब मुझे कोई शर्म नहीं ... अजंता! भाई साहब की चिट्ठी आयी थी कि उन्होंने तुम्हारे ‘उन’ की कंपनी के चौरंगी स्थित ऐडमिनिस्ट्रेटिव ऑफ़िस में क्लर्की के लिए दरख़्वास्त की है। चूंकि मैं तुम्हें कभी अच्छी तरह जानता था (भाई साहब ने ऐसा ही लिखा है) मैं तुमसे अनुरोध कर सकता हूँ कि तुम भाई साहब की नौकरी के मामले में ज़रा उनसे कहो। भाई साहब ने पता लगाया था कि उनके कहने से नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जायेगी ...


(सारिका में 1981 में पूर्वप्रकाशित)

(आशीष अलेक्जेंडर ashiah002 AT gmail DOT com का टंकण सहयोग हेतु हार्दिक धन्यवाद )

रचनाकार परिचय के लिए लाल्टू का चिट्ठास्थल आइए हाथ उठाएं हम भी देखें

-----------

कलाकृति - निखिल-छगनलाल की कलाकृति, साभार निखिल-छगनलाल

टिप्पणियाँ

ब्लॉगर

---प्रायोजक---

---***---

|नई रचनाएँ_$type=list$au=0$label=1$count=5$page=1$com=0$va=0$rm=1$height=75

---प्रायोजक---

---***---

|कथा-कहानी_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|हास्य-व्यंग्य_$type=complex$rm=1$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

---प्रायोजक---

---***---

|काव्य-जगत_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|संस्मरण_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

---प्रायोजक---

---***---

|लघुकथा_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|उपन्यास_$type=complex$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

|लोककथा_$type=three$au=0$label=1$count=7$page=1$com=0$va=0$rm=1$src=random$height=85

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

~ विधा/विषय पर क्लिक/टच कर पढ़ें : ~

|* कहानी * |

| * उपन्यास *|

| * हास्य-व्यंग्य * |

| * कविता  *|

| * आलेख * |

| * लोककथा * |

| * लघुकथा * |

| * ग़ज़ल  *|

| * संस्मरण * |

| * साहित्य समाचार * |

| * कला जगत  *|

| * पाक कला * |

| * हास-परिहास * |

| * नाटक * |

| * बाल कथा * |

| * विज्ञान कथा * |

* समीक्षा * |

---***---



---प्रायोजक---

---***---

|आपको ये रचनाएँ भी पसंद आएंगी-_$type=complex$count=6$src=random$page=1$va=0$au=0$height=85

प्रायोजक

----****----

नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3979,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आवश्यक सूचना!,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,338,ईबुक,193,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,262,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,110,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2951,कहानी,2217,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,521,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,130,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,31,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,94,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,23,पाठकीय,62,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,367,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,339,बाल कलम,25,बाल दिवस,3,बालकथा,62,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,10,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,26,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,240,लघुकथा,1197,लघुकथा लेखन पुरस्कार आयोजन,241,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,326,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,68,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1992,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,697,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,774,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,15,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,75,साहित्यम्,6,साहित्यिक गतिविधियाँ,196,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,59,हास्य-व्यंग्य,75,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: लाल्टू की कहानी : निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की
लाल्टू की कहानी : निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की
http://lh5.google.com/raviratlami/RvdA1P1ZBcI/AAAAAAAABag/LbWPvUkC49Q/nikhil-chaganlal2_thumb%5B1%5D.jpg
http://lh5.google.com/raviratlami/RvdA1P1ZBcI/AAAAAAAABag/LbWPvUkC49Q/s72-c/nikhil-chaganlal2_thumb%5B1%5D.jpg
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2007/09/blog-post_24.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2007/09/blog-post_24.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय SEARCH सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ