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''अग्रपूज्य गणेश की प्रतीकात्मकता तथा प्रासंगिकता''

 

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-सीताराम गुप्ता

 

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हिन्दी में एक मुहावरा है 'श्रीगणेश करना' जिसका अर्थ है किसी कार्य का शुभारंभ करना। इस मुहावरे से जनजीवन में गणेश की सर्वव्यापकता का ही पता चलता है। उर्दू वाले या कहें कि अहले-इस्लाम भी इसी के समकक्ष एक मुहावरे का प्रयोग करते हैं और वह है 'बिस्मिल्लाह करना'। इसका अर्थ भी ठीक वही है जो श्रीगणेश करने का है। ग़ौर करें तो हम पाते हैं कि इस्लाम में 'अल्लाह' एक ओर केवल एक सर्वोच्च शक्ति है। हिंदुओं में ईश्वर के अतिरिक्त अनेक देवी-देवता हैं तो फिर किसी भी कार्य की शुरूआत पर श्रीगणेश करना ही क्यों कहा जाता है? वस्तुत: किसी भी कार्य के प्रारंभ में सबसे पहले गणेशपूजा या गणेश को स्मरण करने का ही विधान है और वो इसलिए कि गणेश को गणाधिपति या गणाध्यक्ष माना जाता है। गणेश का एक नाम है गणपति जिसका अर्थ होता है समूह का नेता और गणेश में देवताओं का नेतृत्व करने के सभी गुण उपस्थित हैं। इन्हीं गुणों के कारण गणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब शिव ने ग़लती से अपने ही पुत्र गणेश का सिर काट दिया तो पार्वती बहुत दुखी हो गई और शोक में डूब गई। पार्वती का शोक दूर करने और अपनी भूल का सुधार करने के लिए शिव ने अपने गणों को दौड़ाया और कहा कि ऐसे प्राणी का सिर काटकर ले आओ जो उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोया हो। गण इस अवस्था में सोए हुए एक हाथी का सिर काट कर ले आए। शिव ने उसी हस्तिमुख को गणेश के धड़ पर लगा कर उन्हें पुनर्जीवित पर दिया और साथ ही उनको सेना का नायक भी बना दिया। तभी से गणेश गणपति कहलाए। गणपति के इस रूप की पूजा या स्मरण का मंत्र है : ओम् गणं गणपत्यै नम:। इसका एक दूसरा रूप ''ओम् गं गणपत्यै नम:'' भी मिलता है।

रिद्धि-सिद्धि प्रदायक गणेश केवल सुख-समृद्ध, वैभव एवं आनंद के ही अधिष्ठाता नहीं हैं अपितु हर प्रकार के विघ्न और कष्टों को हरने वाले तथा बुद्धि देने वाले भी हैं इसीलिए चाहे कोई सामान्य व्यक्ति हो अथवा विद्वान, विद्यार्थी हो अथवा कलाकार, व्यवसायी हो अथवा उद्योगपति, स्त्री हो या पुरुष, मांगलिक कार्य हो अथवा कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने की इच्छा, हर प्रकार की सफलता के लिए सबसे पहले गणेश का ही स्मरण अथवा पूजा की जाती है। पुस्तक का पहला पृष्ठ हो अथवा किसी मांगलिक अवसर का निमंत्रण पत्रा सबसे पहले लिखा जाता है: ''श्री गणेशाय नम:''। बच्चे को वर्णमाला के वर्णों का ज्ञान कराने से पहले उससे उच्चरित कराया जाता है ''श्री गणेशाय नम:''। इस प्रकार ''श्री गणेशाय नम:'' मांगलिक कार्य के प्रारंभ होने का ही प्रतीक है और कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न कराने वाले हैं श्री गणेश। कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो जाए इसके लिए गणेश की निम्न स्तुति ही सबसे पहले की जाती है:

 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा॥

 

एक विद्यार्थी भी बुद्धि-प्रदाता गणेश की स्तुति ही सर्वप्रथम करता है ताकि उसे बुद्धि की प्राप्ति हो और साथ ही इस प्राप्ति में कोई विघ्न भी पैदा न हो:

 

विद्यादाता गणाधीश सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा॥

 

विद्या की देवी हैं सरस्वती। पूजा या प्रार्थना या स्मरण पहले गणपति का तत्पश्चात सरस्वती का। सरस्वतीपूजा हो तो भी गणेश पहले और लक्ष्मीपूजा हो तो भी गणेश पहले। ''रामचरितमानस'' का प्रारंभ करते हुए बालकाण्ड के प्रथम सोपान में पहले श्लोक में तुलसीदास लिखते हैं:

 

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कत्तरारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

 

अर्थात अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों छंदों और मंगलों की करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। ''विनयपत्रिका'' में तुलसीदास अपनी विनय सीता के माध्यम से राम तक पहुँचाने की प्रार्थना करते हैं लेकिन 'विनयपत्रिका' में जो सबसे पहला पद है वह है 'श्रीगणेश-स्तुति' जो निम्न प्रकार से है:

 

गाइये गनपति जगबंदन। संकर-सुवन भवानी-नंदन॥

सिद्ध-सिदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर सब-लायक॥

मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्या-वारिध, बुद्धि-विधाता॥

माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥

 

तुलसीदास राम के अनन्य भक्त हैं इसलिए हृदय में राम और सीता को ही बसाए रखना चाहते हैं लेकिन इसकी प्राप्ति के लिए सबसे पहले गणपति से ही याचना करते हैं। गणेश की अनुकंपा के अभाव में किसी अन्य ईष्ट की कृपा भी संभव नहीं। कोई भी कार्य हो, अनुष्ठान हो अग्रपूज्य हैं गणेश।

तुलसीदास द्वारा रचित 'श्रीगणेश-स्तुति' में गणेश का न केवल परिचय मिलता है अपितु उनकी अनेक विशेषताओं की भी जानकारी प्राप्त होती है। 'स्तुति' में एक पंक्ति है 'संकर-सुवन, भवानी-नंदन'। 'संकर-सुवन' अर्थात् शंकर के पुत्र । इस प्रकार गणेश के पिता हैं भगवान शंकर ;शिव, तथा माता हैं पार्वती ;उमा,। गणेश शंकर और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र हैं तथा उनसे छोटे पुत्र हैं कार्तिकेय। इस प्रकार कार्तिकेय गणेश के अनुज हैं। गणेश की एक बहन भी है जिसका नाम मनसा है।

असंख्य नाम हैं गणेश के लेकिन कहा जाता है कि गणेश के निम्नलिखित बारह नाम प्रात: दोपहर और सांयकाल लेने मात्र से व्यक्ति के सब कष्ट दूर होकर सफलता मिलती है:

वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्रा, लंबोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन। इस सूची में कहीं-कहीं अंतर भी मिलता है लेकिन श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से कार्य में सफलता अवश्य मिलती है। कहीं पर गणेश के एक सौ आठ नामों की सूची भी मिलती है लेकिन गणेश के नामों की कोई सीमा नहीं। नामावली ही नहीं उनके स्वरूपों को भी सीमा में बाँधना मुश्किल है। गणेश नेतृत्व, शौर्य और साहस के प्रतीक है। कहीं उनके विनायक रूप में विकरालता, कहीं हेरंब रूप में युद्धप्रियता तथा कहीं विघ्नेश्वर रूप में लोकरंजक व परोपकारी स्वरूप के दर्शन होते हैं।

गणेश ऐसे देवता हैं जो सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य अनेक देशों में भी किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित हैं। पड़ोसी देश नेपाल में गणेश को सूर्य विनायक, सूर्यगणपति अथवा हेरंब के नाम से जाना जाता है। यहाँ हेरंब गणेश के पाँच सिर और दस हाथ मिलते हैं। यूनान के प्राचीन ग्रंथों में बुद्धि के देवता के रूप में 'जानस' का जिक्र मिलता है वह गणेश का ही एक रूप है जिसके सात सिर और एक सूंड है। अन्य पडोसी देशों और दूसरे महाद्वीपों में भी गणेश से मिलती-जुलती अनेक प्रतिमाएँ मिलती हैं जिन्हें गणेश की तरह ही पूजा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि वैदिक काल से लेकर आज तक संपूर्ण विश्व की संस्कृति में गणेश किसी न किसी रूप में अवश्य ही विद्यमान हैं।

यदि धर्म की बात करें तो गणेश मात्र हिंदुओं के ही नहीं बल्कि जैन और बौद्धों के भी आराध्य देव हैं। जैन संप्रदाय में ज्ञान का संकलन करने वाले गणाध्यक्ष हैं गणेश। महाभारत के लेखक के रूप तो गणेश जाने ही जाते हैं। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की लेकिन उनके सहायक हुए गणेश। वेदव्यास बोलते गए और गणेश अपने हाथों से लिखते गए। गणेश के हस्तिमुख पर स्थित दंतद्वय में से एक टूटा हुआ है। कहा जाता है कि इसी टूटे हुए दांत से गणेश ने महाभारत की कथा को लिपिबद्ध किया था। बौद्ध धर्म की अनेक शाखाओं में मान्यता है कि गणेश वंदना के बिना मंत्रसिद्धि असंभव है। नेपाल एवं तिब्बत के अनेक मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। गणेश किसी धर्म या मत विशेष के नहीं अपितु धर्म का जो मूल तत्व है उसके प्रतीक हैं।

गणेश की रूपाकृति की प्रतीकात्मकता:

गणेश की बाह्य रूपाकृति कुछ विचित्र सी ही प्रतीत होती है। धड़ मनुष्य का तथा सिर हाथी का। पैर मनुष्य की तरह दो लेकिन हाथ चार या कभी-कभी छ:, आठ या दस भी । शरीर के विभिन्न अंगों में भी संतुलन का अभाव तथा अत्यंत स्थूलकाय। स्वयं स्थूलकाय पर वाहन के रूप में मूषक महाशय। ऊपर से देखने पर तो यह विचित्र सा लगता है परन्तु यदि हम गणेश के शरीर के विभिन्न अंगों की प्रतीकात्मकता पर विचार करें तो प्रत्येक अंग एकाधिक आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है। संतुलन बाह्य नहीं आंतरिक होना भी अनिवार्य है। शरीर, मन और बुद्धि में उचित संतुलन और तालमेल होगा तभी व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में पदार्पण कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकेगा। सुकरात अथवा लिंकन की बाह्य कुरूपता उनके विकास और उन्नति में बाधक नहीं बनी। उनके विचार आज भी प्रेरणास्पद हैं। गणेश अपने संपूर्ण शरीर और परिवेश में प्रेरणादायक हैं।

सबसे पहले गणेश के हस्तिमुख पर विचार करते हैं। शिव द्वारा पहले तो गणेश का सिर काटना और फिर उस पर मानवमुख की बजाय हाथी का सिर आरोपित करना वास्तव मे प्रतीकात्मक ही है। मनुष्य सकारात्मक और नकारात्मक भावों अथवा वृत्तियों का समुच्चय ही तो है लेकिन यदि नकारात्मकता बढ़ जाती है तो उसका उन्मूलन अनिवार्य है। सिर या मस्तिष्क अहंकार का प्रतीक है। जब तक सिर रूपी अहंकार को उतार कर नहीं फेंका जाता तब तक आध्यात्मिक उन्नति संभव ही नहीं। आध्यात्मिक उन्नति के अभाव में भौतिक उन्नति भी असंभव है और यदि आध्यात्मिक उन्नति के बिना भौतिक उन्नति प्राप्त कर भी ली जाती है तो जीवन में संतुलन संभव नहीं। शरीर, मन और आत्मा का एक धरातल पर आना ही वास्तविक उन्नति है। जीवन में संतुलन के लिए अहंकार की समाप्ति अथवा शिरोच्छेदन अनिवार्य है। प्रेम भी जीवन का अनिवार्य तत्व है। अहंकार के साथ प्रेम भी असंभव है। तभी कबीर भी कहते है:

 

यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं।

सीस उतारे भुईं धरे तब पैठे घर माहिं॥

 

अहंकार के रहते आपको महत्व नहीं मिल सकता। अंहकार का समापन ही किसी को नायक, गणपति अथवा अग्रपूज्य बना सकता है। हाथी बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। हाथी का सिर पुनर्स्थापित होने का अर्थ है ज्ञान की प्राप्ति का प्रारंभ । अहंकार गया तो आत्मज्ञान होते देर नहीं लगती। आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर अहंकार का विसर्जन स्वाभाविक है। अहंकार के साथ अन्य नकारात्मक वृत्तियाँ भी चली जाती हैं। पुनर्जन्म की स्थिति है ये। एक सिर को काट कर दूसरा सिर लगाना या दूषित रक्त को निकालकर स्वस्थ रक्त चढ़ाना पुनर्जन्म नहीं तो और क्या है? पुनर्जन्म से तात्पर्य शारीरिक मृत्यु नहीं अपितु दूषित मनोभावों से मुक्ति है। जब व्यक्ति के दूषित मनोभाव तिरोहित हो जाते हैं तभी वह सही अर्थों में जीना प्रारंभ करता है। गणेश का हस्तिमुख आपको लगातार स्मरण कराता रहता है कि आपको हर हाल में अपनी जड़ता और दूषित मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त होना है।

हाथी शक्ति, साहस और धैर्य का प्रतीक है। हाथी में अनुशासन भी है और स्वामीभक्ति। हाथी के पैर मजबूत तथा सूंड लचीली होती है। जीवन में स्थायित्व भी हो अर्थात् इरादों में फौलाद-सी मजबूती तथा समय के साथ परिवर्तित होने का गुण भी। जिसके विचारों में जड़ता न हो वही सबको साथ लेकर चल सकता है। लोकतंत्र में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च माना गया है क्योंकि राष्ट्रपति किसी भी प्रकार की दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर, पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निरपेक्ष भाव से कार्य करता है। वह सबकी भावनों को समझकर सही निर्णय लेने में सक्षम है। निर्णय के समय उसमें लचीलापन है लेकिन निर्णय के कार्यान्वयन में दृढ़ता भी। जब तक किसी व्यक्ति में पूर्वाग्रह तथा अहंकार है, दृढ़ता तथा लोच का अभाव है वह सर्वोच्च पद के लायक नहीं है।

हाथी के कान होते हैं सूप के समान बडे-बड़े। सूप सार तत्व को रखकर बेकार की थोथी अथवा महत्वहीन वस्तु को उड़ा देता है। सिर्फ काम की बातें ग्रहण करो शेष छोड़ दो तभी मानव जीवन की सार्थकता है, तभी सफलता है। उपयोगी का चुनाव हमें आगे ले जाता है। सही जनप्रतिनिधियों का चुनाव राष्ट्र और समाज की उन्नति में सहायक है। गणेश के बड़े-बड़े हस्तिकर्ण सारग्राह्यता के ही प्रतीक हैं। हाथी का मुँह छोटा है पर कान बड़े-बड़े। यहाँ गणेश संदेश देते हैं कि कम बोलो और सुनो ज्यादा तथा ध्यानपूर्वक। जब जरूरत हो तभी बोलो। इसके लिए चिंतनशील होना अनिवार्य है। हाथी का शरीर विशाल होता है लेकिन ऑंखें छोटी-छोटी। गणेश की छोटी-छोटी ऑंखें सूक्ष्म दृष्टि तथा एकाग्रता का प्रतीक हैं जो उनकी चिंतनशीलता का ही प्रमाण है।

हाथी की सूंड दूर तक सूंघने में सक्षम होती है अत: यह दूरदर्शिता के महत्व को प्रतिपादित करती है। आज मनुष्य अपने थोड़े से लाभ के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर पर्यावरण में अंसतुलन पैदा कर रहा है। ओजोन परत का विनाश कर ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। उसे जीवन के हर क्षेत्र में दूरदर्शी होना चाहिये और हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहिए। गणेश के दो दाँत हैं जिनमें से एक पूरा है तथा दूसरा अपूर्ण। पूरा दाँत श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है तो अपूर्ण या भग्न दाँत बुद्धि और ज्ञान का। बुद्धि अथवा ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता लेकिन पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हम निरंतर ज्ञानार्जन और आत्मज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर सकते हैं। महत्व ज्ञान का उतना नहीं है जितना ज्ञान का जीवन में सही और सार्थक उपयोग करने में हैं। विश्वास भी मात्र ज्ञान प्राप्ति के लिए ही अनिवार्य नहीं है अपितु सामाजिक जीवन में संबंधों के विकास के लिए भी इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। श्रद्धा में पूर्ण समर्पण होता है और समर्पण में अहंकार और द्वैत का विसर्जन। इस प्रभार गणेश का हस्तिमुख एक वृहद आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतीकात्मक अर्थ प्रस्तुत करता है।

गणेश के मानवेतर अंग अर्थात् हस्तिमुख या गजशिर के अतिरिक्त उनके शरीर के मानव अंग भी कम प्रतीकात्मक नहीं हैं। छोटी-छोटी मगर मजबूत दो टाँगें और भारी भरकम उदर। भारी-भरकम उदर के कारण ही लंबोदर कहलाए लेकिन लंबोदर का गुण है सब कुछ उदरस्थ कर लेना। सब कुछ स्वीकार कर लेना। सह लेना। गणेश सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं, सह लेते हैं और पचा जाते हैं। बुराइयों को फैलने से रोक देते हैं। शिव ने विष को कंठ में धारण किया था, गणेश नकारात्मकता को उदर में धारण कर लेते हैं। गोपनीयता बनाए रखते हैं। समाज को विकृति से बचाए रखते हैं। ये इस बात का प्रतीक है कि नकारात्मक भावों को मन-मस्तिष्क से निकाल कर उदरस्थ कर लो। मल का स्थान मन नहीं ऑंतें हैं।

गणेश के पैर छोटे-छोटे हैं इसलिए वे तेज नहीं दौड़ सकते। मजबूत पैरों से धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं। उनमें उतावलापन नहीं है। आगे बढ़ो लेकिन सहजता से यही संदेश देते हैं गणेश के नन्हें-नन्हें पैर।

गणेश के चारों हाथों में से एक में अकुंश है, दूसरे में पाश, तीसरे में मोदक तथा चौथा आशीर्वाद की मुद्रा में। अंकुश प्रतीक है विषय-वासनाओं पर नियंत्रण का तथा पाश प्रतीक है मन तथा इंद्रियों पर नियंत्रण का। इंद्रियों को वश में रख कर मन को नियंत्रित करो उसमें विषय-वासनाओं और विकारों के उत्पन्न होने पर रोक लगाओ। इच्छाओं पर नियंत्रण कर संयमित जीवन जीओ। मनुष्य के जीवन में रूपांतरण तभी संभव है जब भावनाओं को परिष्कृत किया जा सके। तभी नये मनुष्य का जन्म संभव है। मोदक प्रतीक है आनंद का, सात्विक आहार का। मोदक तत्वज्ञान का भी प्रतीक है। निष्काम कर्म द्वारा व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त होकर आनंद की प्राप्ति करने में सक्षम है। अभय मुद्रा जीवन में निडरता के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है। जब तक किसी भी प्रकार का भय है हम आगे नहीं बढ़ सकते। मृत्यु का भय ठीक से जीने नहीं देता, रोग का भय स्वस्थ नहीं रहने देता, निर्धनता का भय समृद्धि से दूर ले जाता है। निर्भय होकर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति संभव है।

गणेश का वाहन है नन्हा चूहा जो एक अत्यंत क्षुद्र जीव है। गणेश समता के प्रतीक हैं। उनका सिर पृथ्वी पर सबसे बड़े प्राणी हाथी का तथा वाहन अत्यंत छोटा प्राणी चूहा। समाज के विकास के लिए न केवल सभी वर्गों के लोगों का मिल-जुलकर रहना और कार्य करना अनिवार्य है अपितु धरती पर भी सभी जीवों का अस्तित्व महत्वपूर्ण है। इस शृंखला में यदि एक प्राणी की भी उपेक्षा हुई अथवा उसका लोप हो गया तो मानव जीवन संकट में पड़ जाएगा। सामाजिक विकास के साथ-साथ जीव-जंतुओं और प्रकृति के संरक्षण की भी अत्यंत आवश्यकता है।

गणेश की प्रतीकात्मकता की प्रासंगिकता मात्र धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं अपितु व्यक्ति के स्वयं के विकास, सामाजिक जीवन तथा राष्ट्र की उन्नति के संबंध में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गणेश की प्रतीकात्मकता अत्यंत व्यापक है और इसी व्यापकता के कारण गणेशोत्सव मनाने की परंपरा का शुभारंभ और विकास हुआ।

गणेश चतुर्थी अर्थात् गणेश जन्मोत्सव भारत के प्रसिद्ध पर्वों में से एक है। महाराष्ट्र और देश के दूसरे भागों में जहाँ महाराष्ट्र के मूल निवासी रहते हैं वहाँ यह पर्व ग्यारह दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन बड़ी धूम-धम से गणेश की सुंदर-सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं और ग्यारह दिन तक पूजा-पाठ करने के उपरान्त अनन्त चतुर्दशी के दिन मूर्तियों को जुलूस के रूप में नाचते-गाते हुए ले जाकर नदी, तालाब या समुद्र के किनारे जल में विसर्जित कर दिया जाता है। गणेश प्रतिमाओं की स्थापना, पूजा-पाठ और विसर्जन घरों में व्यक्तिगत रूप से, गणेश मंडलों अथवा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से दोनों तरह किया जाता है। महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की परंपरा की शुरूआत उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में लोकमान्य तिलक ने पुणे से की। वैसे सामूहिक गणेशोत्सव की स्थापना का प्रारंभ 1885 में शोलापुर के आजोबा गणपति मंदिर में हो चुका था। जब तिलक यहाँ आए तो उन्होंने इस सार्वजनिक गणेशोत्सव से प्रेरणा लेकर 1893 में पूरे महाराष्ट्र में सामूहिक गणेशोत्सव मनाने की परंपरा शुरू की जो आज भी विद्यमान है और जिसमें लगातार नये आयाम जुड़ते जा रहे हैं। लोकमान्य तिलक ने धर्म के माध्यम से राजनीतिक व सामाजिक चेतना के विकास के लिए सामूहिक गणेशोत्सव को एक आन्दोलन के रूप में स्थापित किया। उस समय देश को स्वतंत्र कराना एक अहम मुद्दा था। सामूहिक गणेशोत्सव आयोजन के माध्यम से इसकी चेतना का विकास खूब किया गया। आज भी गणेश की पूजा-अर्चना के साथ-साथ समसामयिक समस्याओं को इन आयोजनों के माध्यम से बख़ूबी प्रस्तुत किया जा रहा है। कई सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठन भी इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं और इसके जरिये अपना संदेश प्रसारित करते हैं। गणेशोत्सव सादगी से मनाने और इसके द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए लोगों में जागृति उत्पन्न करने के लिए भी इसी मंच का सहारा लिया जा रहा है। इससे गणेश और गणेशोत्सव दोनों ही आधुनिक संदर्भ में अधिकाधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

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संपर्क:

 

सीताराम गुप्ता,

ए.डी. 106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110088

फोन नं. 011-27313954

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  1. गणेशजी पर बढ़िया लेख है। हालाँकि इस बारे में मेरी राय कुछ अलग है। गणपति का सबसे पहले उल्लेख वेदों में पाया जाता है, साथ ही उन्हें विघ्नेश कहा गया है। यानी कि विघ्नों का स्वामी। वैदिक गणेश कार्यों में विघ्न पैदा करते थे। ख़ास तौर पर वे यज्ञों में आने वाली तरह-तरह की बाधाओं के कारण थे। यही कारण है कि वैदिक काल में उनकी स्तुति इसलिए की जाती थी कि वे कोई बाधा खड़ी न करें। पौराणिक काल आते-आते गणेशजी का स्वरूप बदल गया और वे विघ्नेश से विघ्नहर्ता बन गए। हालाँकि "विघ्नेश पादपंकजं" आदि श्लोकांशों से अभी भी उनके वैदिक अर्थ का भान होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. धन्यवाद ..! .विनायक चतुर्थी की बहुत बहुत बधाई ,, अनायास ही इतना भव्या और पूर्ण वर्णन देख दिल हर्षित हो उठा, साधुवाद..!

    उत्तर देंहटाएं

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