बुधवार, 31 अक्तूबर 2007

मनुष्य स्वयं है अपने सुख-दुख का कर्ता और नियंता

-सीताराम गुप्ता ख़लील जिब्रान कहते है, ‘‘हम अपने सुखों और दुखों का अनुभव करने से बहुत पहले ही उनका चुनाव कर लेते हैं।'' कर्मफल के स...

सोमवार, 29 अक्तूबर 2007

नईम की कविताएँ : लिखने जैसा लिख न सका मैं

दो कविताएँ -नईम   लिखने जैसा लिखने जैसा लिख न सका मैं सिकता रहा भाड़ में लेकिन, ठीक तरह से सिक न सका मैं. गत दुर्गत जो भी होना थी,...

रविवार, 28 अक्तूबर 2007

शैलेन्द्र चौहान की चंद चुनिंदा कविताएँ

कविताएँ -शैलेन्द्र चौहान   कामना  कितनी गहरी रही ये खाई   मन काँपता डर से अतल गहराइयाँ मन की झाँकने का साहस कहाँ दूर विजन एकांत में सरित...

शनिवार, 27 अक्तूबर 2007

आक्रोश युवा पीढ़ी का

-प्रो. अश्विनी केशरवानी युवा कौन है...युवा किसे कहें...युवा कहलाने की कसौटी और पहचान क्या है ? सिर्फ उम्र, नवीनतम फैशन, होश रहित जोश, अप...

व्यंग्य : ख़ुराक

- सीताराम गुप्ता संतलाल से मेरा थोड़ा परिचय जरूर था पर मित्रता नहीं। परिचय का कारण था एक ही डिपार्टमेंट में काम करना और संतलाल का और मेरा ...

शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2007

मोना डार्लिंग और जार्ज बुश

-शशिभूषण द्विवेदी घड़ी की सुई रात के 11 बजा रही थी। दिल्ली जाने वाली अंतिम बस अब तक नहीं आई थी। स्टेशन पर मातमी सन्नाटा था। अधिकतर सवारिया...

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2007

सफलता का मूलमंत्र-जो चाहा वो पाया

रेडीमेड कपड़ों का जमाना है। फास्ट फूड खाना पसंद किया जाता है। हर एक को हर चीज में जल्दी है। यहां तक कोशिश की जाती है कि सर्दी-जुकाम भी हो त...

अंग्रेज भी उरांवों को दास नहीं बना सके

-मनोज कुमार उरांव जनजाति को अंग्रेजी शासन कभी अपना गुलाम नहीं बना पायी और न ही स्थानीय राजाआें की हुकूमत उन पर चली। उरांव स्वतंत्रता के साथ...

बुधवार, 24 अक्तूबर 2007

विश्वजीत सपन की कहानी : वह पागल

कहानी वह पागल -विश्वजीत सपन 'ऐ इधर आओ।` 'क्या बात है ?` 'कुछ नहीं।` 'फिर बुलाया क्यों ?` 'मेरी मर्जी।` 'म...

सोमवार, 22 अक्तूबर 2007

मृत्यु स्मृति स्तम्भ

-डॉ. रेखा श्रीवास्तव मानव मन की सहज अभिव्यक्ति ही कला कहलाती है। जो मानव जीवन की समृद्धि के साथ साथ विकसित होती चली गई है। जिस प्रकार आदि ...

शनिवार, 20 अक्तूबर 2007

छायावाद की एक प्रमुख रचनाः आँसू

- डॉ.उत्तम पटेल श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के भावुक कवि और कुशल कलाकार हैं। इसे कोई यदि उनकी एक ही रचना में देखना चाहें तो उसे आँसू की ओर ...

मैं और मेरा अष्टावक्र

- हरीश भादानी मैं ---. मेरे भेजे में न तेरा ई-उ पार आवे और ना ही यह जौल-टौल तू तो वो बता कहा था न तूने.... मन का बीमार- वह कैसा होता है...

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2007

श्रीमती तारा सिंह की कुछ ग़ज़लें

ग़ज़ल (1) आँख उनसे मिली तो सजल हो गई प्यार बढने लगा तो गजल हो गई   रोज कहते हैं आऊँगा आते नहीं उनके आने की सुनके विकल हो गई   ख्वाब में ...

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