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November, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान

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पुण्यतिथि : 30 नवंबर  पर विशेष पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान प्रो. अश्विनी केशरवानी
छत्तीसगढ़ प्रदेश अनेक अर्थों में अपनी विशेषता रखता है। यहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेषों का बाहुल्य है जो अपनी प्राचीनता और वैभव सम्पन्नता की गाथाओं को मौन रहकर बताता है लेकिन इसके प्रेरणाास्रोत और विद्वतजन गुमनामी के अंधेरे में खो गये। उन दिनों आत्मकथा लिखने की पिपासा नहीं होने से कुछ लिख छोड़ने की परम्परा नहीं रही। दूसरी ओर उनकी कृतियां और पांडुलिपियां पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में चूहे और दीमक का भोजन या तो बन गये हैं या बनते जा रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस ओर देशोद्धार के सम्पोषकों ने ध्यान नहीं दिया। उनकी उपेक्षा नीति के कारण अंचल के अनेक मेघावी कवि, लेखक और कला मर्मज्ञ गुमनामी के अंधेरे में खो गये। इसी अज्ञात परम्परा के महान कवि-लेखकों में पंडित मालिकराम भोगहा भी थे जिन्हें प्रदेश के प्रथम नाटककार होने का गौरव प्राप्त होना चाहिए था, मगर आज उन्हें जानने वाले गिने चुने लोग ही हैं। छत्तीसगढ़ ऐसे अनेक स्वनामधन्य कवि-लेखकों से सुसम्पन्न था। देखिये पंडित शुकलाल पांडेय की एक बानगी :-…

कविता संग्रह : तारों के गीत

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डॉ. महेंद्र भटनागर उत्कृष्ट काव्य-संवेदना समन्वित द्वि-भाषिक कवि : हिन्दी और अंग्रेज़ी। सन् 1941 से काव्य-रचना आरम्भ। 'विशाल भारत' कोलकाता (मार्च 1944) में प्रथम कविता का प्रकाशन।
लगभग छह-वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्रता-पूर्व भारत; शेष स्वातंत्रयोत्तर। सामाजिक-राजनीतिक-राष्ट्रीय चेतना-सम्पन्न रचनाकार।
लब्ध-प्रतिष्ठ नवप्रगतिवादी कवि। अन्य प्रमुख काव्य-विषय प्रेम, प्रकृति, जीवन-दर्शन ।
दर्द की गहन अनुभूतियों के समान्तर जीवन और जगत के प्रति आस्थावान कवि। अदम्य जिजीविषा एवं आशा-विश्वास के अद्भुत-अकम्प स्वरों के सर्जक। जन्म : 26 जून 1926 / झाँसी (उत्तर-प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए. (1948), पी-एच.डी. (1957) नागपुर विश्वविद्यालय से।
कार्य : कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय / जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।
सम्प्रति : शोध-निर्देशक  :  हिन्दी भाषा एवं साहित्य।
कार्यक्षेत्र : चम्बल-अंचल, मालवांचल, बुंदेलखंड। प्रकाशन % 'डा. महेंद्रभटनागर-समग्र' छह खंडों में उपलब्ध।
प्रकाशित काव्य-कृतियाँ अठारह। अनुवाद : कविताएँ अंग्रेज़ी, फ्रेंच, चे…

सुशील कुमार की कविताएँ

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यह चुप्पियों का शहर है-   सुशील कुमारयह चुप्पियों का शहर है

निजाम बदल गयी
तंजी में बदल गयीं
पर इस शहर की तसवीर नहीं बदली
यह,
हादसों का एक शहर है
यहां धूल है, धुंआ है
राख की ढीहें हैं
और ढेर-सी चुप्पियां हैं। इन चुप्पियों के बीच
इक्की-दुक्की जो आहटें हैं
अधजले शवों पर श्मशान में
कौवों, चीलों की
छीना-झपटी जैसे हैं
जो टूटता है जब-तब
उंघती सरकार की
नींद उचाटती नारों की फेहरिस्त से
गलियों में सड़कों पर/इमारतों में
जिनकी बोलियां पहले ही लग चुकी होती है। 'मंगलदायक-भाग्यविधाताओं'
की छतरियों के नीचे
मर-मर कर जीने
और अभिषप्त रहने की तमीज
स्वशासन के इतने सालों में
लोगों ने शायद सीख लिया है,
तभी तो शहर में इतनी वहशत के बाद भी
न इनकी आंखें खुलती हैं
न जुबान हिलती है
पेट के संगत पर सिर्फ
इनके हाथ और
इनकी जांघें चलती हैं। इनकी 'बोलती बंद'के पीछे
तरह-तरह की भूख की तफसीलें हैं
जो इंसानियत की सभी हदें फांदकर
इस शहर के जनतंत्र में
इन्हें पालतू
बनाये रखती हैं
जहां अपनी आंखों के सामने
खून होता देखते हैं ये
चीखें सुनते हैं
मगर बोल नहीं पाते।
न कटघरे में
खड़े होकर अपने हलफनामे दे सकते।
इन पर बिफरना,
गुस्से से लाल होना
हमा…

छत्तीसगढ़ और पंडित शुकलाल पांडेय

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प्रो. अश्विनी केशरवानी भव्य ललाट, त्रिपुंड चंदन, सघन काली मूँछें और गांधी टोपी लगाये साँवले, ठिगने व्यक्तित्व के धनी पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ के द्विवेदी युगीन साहित्यकारों में से एक थे.. और पंडित प्रहलाद दुबे, पंडित अनंतराम पांडेय, पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय, पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय, वेदनाथ शर्मा, बटुकसिंह चौहान, पंडित लोचनप्रसाद पांडेय, काव्योपाध्याय हीरालाल, पंडित सुंदरलाल शर्मा, राजा चक्रधरसिंह, डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र और पंडित मुकुटधर पांडेय की श्रृंखला में एक पूर्ण साहित्यिक व्यक्ति थे। वे केवल एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि एक संस्था थे। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत सी रचनाएं लिखीं हैं। उनकी कुछ रचनाएं जैसे छत्तीसगढ़ गौरव, मैथिली मंगल, छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया ही प्रकाशित हो सकी हैं और उनकी अधिकांश रचनाएं अप्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ियापन की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ गौरव में ''हमर देस'' की एक बानगी देखिये :- ये हमर देस छत्तिसगढ़ आगू रहिस जगत सिरमौ…

बाल-साहित्य : हँस-हँस गाने गाएँ हम !

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बाल-साहित्य


हँस-हँस गाने गाएँ हम !  कवि - डॉ. महेंद्रभटनागर



       वर्षा



   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !



     आगे-आगे

     गरमी भागे



  हँस-हँस गाने  गाएँ हम !

   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम



     मेंढ़क बोलें

     पंछी डोलें



   बादल  गरजें; जैसे बम !

   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !



     नाव चलाएँ

     खू़ब नहाएँ

  आओ कूदें धम्मक - धम !

   सर-सर करती  चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !




        खेलें खेल



    छुक-छुक करती आयी रेल

    आओ, हिल-मिल खेलें खेल !



    आँख-मिचौनी, खो-खो और

    दौड़ा-भागी सब-सब ठौर !



    टिन्नू  मिन्नू  पिन्नू  साथ

    हँस-हँस और मिला कर हाथ !



    कूदें - फादें  घर दीवार

    चाहें  जीतें,  चाहें हार !



    कसरत करना हमको रोज़

    ताक़तवर हो अपनी फ़ौज !



    सब कुछ करने को तैयार;

    नहीं कभी भी हों बीमार !



    आपस में हम रक्खें मेल !



    छुक-छुक करती आयी रेल

    आओ, हिल-मिल खेलें खेल !







           अच्छे लड़के



  हम बालक हैं, हम बन्दर हैं,

  हम भोले-भाले सुन्दर हैं !



  हर रोज़ सुबह उठ जाते हैं,

  मुँह धोकर बिस्कुट खाते हैं !



  दो कप चाय गरम जब मिलती

  तब यह सूरत जाकर खिलती…

जब भी यह दिल उदास होता है, जाने कौन आस पास होता है...

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गुलज़ार के चंद नगमे (1)
जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
--------
(2)

हाल-चाल ठीक-ठाक है
सब कुछ ठीक-ठाक है
बी.ए. किया है, एम.ए. किया
लगता है वह भी ऐंवे किया
काम नहीं है वरना यहाँ
आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है आबो-हवा देश की बहुत साफ़ है
क़ायदा है, क़ानून है, इंसाफ़ है
अल्लाह-मियाँ जाने कोई जिए या मरे
आदमी को खून-वून सब माफ़ है और क्या कहूं?
छोटी-मोटी चोरी, रिश्वतखोरी
देती है अपा गुजारा यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है गोल-मोल रोटी का पहिया चला
पीछे-पीछे चाँदी का रुपैया चला
रोटी को बेचारी को चील ले गई
चाँदी ले के मुँह काला कौवा चला और क्या कहूं?
मौत का तमाशा, चला है बेतहाशा
जीने की फुरसत नहीं है यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है
हाल-चाल ठीक-ठाक है
-----…

अतुल चतुर्वेदी की कविता : स्थगन

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कविता-अतुल चतुर्वेदी
स्थगित हो जायेंगे
सब सोचे हुए काम एक दिन
वयस्त्तायें पट जायेंगी 
रात के कुहासे सी
बिखरी होगीं साजिशें चारों तरफ़
ऐसे में होंसले स्थगित हो जायेंगे
पूछता होगा पता जब कोई घर का
दरवाजों पर लटकी होगी उदासी
आंखों में कैद होंगे स्वप्न
मुट्ठियाँ छ्टपटाती होंगी
किसी ऐसी घड़ी में ही
संबोधन सब स्थगित हो जायेंगे
बंद होगा रास्ता आम लोगों को
खुली होंगी गलियां सुविधाओं के लिए
डूबती होगी जब आधी दुनिया कहीं
आवरण सारे स्थगित हो जायेंगे कौन भला टटोलेगा नब्ज रिश्तों की
धूल भरे पग कौन धोएगा
सुनकर आर्तनाद दौड़ पड़े
प्रयोजन पुनीत सब स्थगित हो जायेंगे
गहरा दौर है यह स्थगन का
आज शब्द कल द्श्य स्थगित हो जायेंगे
कहना असंभव है यात्राओं के विषय में
क्या पता कब गंतव्य स्थगित हो जायेंगे ?

युवक- युवती सम्मेलन

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कविता-डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागीकुछ लड़के और लड़कियों केमम्मी और पाप आपस में मिलेएक ने दूसरे को,दूसरे ने तीसरे कोउचित वर तथा वधु के चर्चे करेउनमें से किसी चतुर ने, एक बात बताईप्रापर्टी डीलर से मिलने की सलाह सुझाईएक भाई भड़क पड़ेक्यों भैया!, लड़के , लडकियांक्या प्रापर्टी हैं?. जोप्रापर्टी डीलर से मिलेंकई बार ठोंक ठोंक करमोल तोल किया जाता हैब्रोकर यानी बिचोलिए काअपना ही रोल होता हैअधिक बोली लगने परमुंह मांगा मूल्य न मिलने परफौरन पुराने ग्राहक सेरिश्ता तोड़ दिया जाता हैनया ग्राहक ढूंढा जाता हैयह प्रापर्टी से कैसे कम हैअब तो लगा बात में दम हैवे प्रापर्टी डीलर के तो नहीं,मैरेज़ डीलर के पास गएडीलर ने रजिस्ट्रेशन के नामकाफ़ी अच्छे पैसे धरवाएलड़के लडकी को,१५ दिन का रेपिडइंटरव्यू फ़ेस करने के नुस्ख़े समझाएपर्सन्लटी डेवलप्मेन्ट के नाम परसेंडविच कोर्स में काफी पैसे धरवाएभारी भरकम फ़ीस देने के बाद भीजब शादी की बात नहीं बन पाईतब अपना ही धंधा चलाने कीएक नई योज़ना बनाईरविवार के सभी प्रमुखअख़बारों में दे दियाधांसू बड़ा विज्ञापनआपके शहर में पहली बारविवाह योग्य युवक-युवतियोंका विराट परिचय सम्मेलनयुवक युवतियों काठहरने क…

वीडियोकास्ट : सत्यप्रसन्न के दोहे

सत्यप्रसन्न के चंद दोहे रचनाकार पर आपने यहाँ पढ़े.इनका सस्वर पाठ नीचे दिए गए वीडियो में आप देख-सुन सकते हैं.आप स्वयं अपनी रचनाओं को सस्वर पाठ में रचनाकार पर प्रकाशित-प्रसारित कर सकते हैं. बस अपना वीडियो रेकॉर्ड करवाइए (स्थानीय स्तर पर वीडियोग्राफ़ी करने वालों से या अपने स्वयं के या मित्रों के वीडियो रेकार्डर युक्त डिजिटल कैमरे से) और उसकी सीडी रचनाकार को भेज दीजिए. बस. ध्यान दें कि रचनाएँ 10 मिनट से अधिक बड़ी न हों. आप अपने आसपास के कविसम्मेलनों, साहित्य-चर्चा इत्यादि के वीडियो भी भेज सकते हैं. सीडी भेजने का पता बाजू पट्टी में दिया गया है.

दोस्तों का कर्ज

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बाल कहानीदोस्तों का कर्ज-ज़ाकिर अली `रजनीश´ शाम का समय था। असलम उस समय कमरे में अकेला था। वह अभी-अभी खेल के मैदान से लौटा था। उसने कनखियों से देखा- माँ किचन में खाना बनाने में व्यस्त थीं। बहन भी किचन में ही मॉं का हाथ बंटा रही थी। पिताजी अभी-अभी बाथरूम के अंदर गये थे। उसने सोचा कि यही सबसे अच्छा मौका है। किसी ने उसे देखा भी नहीं था। चुपचाप अपना काम करे और फिर से खेलने चला जाए। किसी को पता ही नहीं चलेगा कि वह कब आया और कब चला गया। शिकारी बिल्ली की तरह इधर-उधर देखते हुए असलम दरवाजे के पास लगी खूटियों के पास पहुंचा। वहॉं पर तमाम कपड़े टंगे हुए थे। उसने पिताजी की पैंट की जेब में हाथ डाला। उसका दिल जोर-जोर से धड़-धड़ कर रहा था। अगले ही पल पिताजी का मोटा सा पर्स असलम के हाथ में आ गया। उसका दिल बेहद घबराया। लगा पिताजी पीछे खड़े उसे देख रहे हैं। उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उसने पीछे देखा। वहॉं तो कोई नहीं था। वह उसका वहम था। वह सोच रहा था कि अगर यह काम अभी नहीं हो पाया, तो फिर वह कभी नहीं कर पाएगा। असलम ने झटके से पर्स खोला। पर्स के अंदर तमाम नोट रखे हुए थे। असलम ने जल्दी से एक नोट पकड़ कर बाह…

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तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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