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कहानी : साहसी राजन

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-राजकुमारी श्रीवास्तवकभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिनकी न तो संभावना होती है और न जिनके घटने की कोई आशा ही कर सकता है. एक दिन केरल के कोट्टायम जिले के ओलासा नामक स्थान में एक ऐसी ही अनोखी घटना घट गई. जब तुम उस अनोखी घटना को सुनोगे तो स्वयं कहोगे कि हाँ, सचमुच यह एक अनोखी घटना थी.क्या तुमने यह कभी सुना है कि किसी लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझ गए हों और भैंस उसे खींच कर लिए जा रही हो? पर उस दिन ओलासा में सचमुच एक लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझ गए थे. भैंस तो भैंस ही थी. वह चुपचाप आगे बढ़ती जा रही थी. लड़की भी रोती-चीखती हुई, घसीटती-घसीटती सी उसके साथ-साथ चली जा रही थी.लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में किस तरह उलझे - इसके बारे में कोई क्या कह सकता है? पर यह बात तो ठीक ही है कि लड़की के बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझे हुए थे, और भैंस उसे अपने साथ खींच कर लिए जा रही थी. यही गनीमत थी कि भैंस धीमी-धीमी चाल से चल रही थी. यदि कहीं वह भागती होती, तब तो लड़की के प्राणों पर आ बनती. पर कोई कह नहीं सकता था …

कहानी - चुप चन्तारा रोना नहीं

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-नीरजा माधव

चन्तारा के दोनों हाथ तेज़ी से बेलन के साथ-साथ गोल-गोल घूम रहे थे. चौके पर पड़ी आटे की लोई पूड़ी का आकार ले रही थी.

''तुम कब से इहां काम कर रही हो?'' पास ही बैठी शांति ने अपनी पूड़ी को ज़मीन पर बिछे सफेद कपड़े पर फेंकते हुए पूछा. उसके हाथ में आटे की दूसरी लोई नन्हे गेंद की तरह थमी थी.
''हो गया होगा आठ-दस साल.'' चन्तारा ने एक दृष्टि शांति पर डाली थी और अपने चौके से पूड़ी उठाकर सफेद कपड़े पर फेंक दिया.
''मजूरी बढ़ाए कि नहीं चौहान बाबू?''
''काहे नहीं बहिन. उनकी किरपा तो बनी ही है. पहिले दिन भर की मजूरी पचास थी. अब बढ़ते-बढ़ते सौ रुपया कर दिया है.'' चन्तारा ने दूसरी लोई बेलन के नीचे दबा दिया था.
''हमको तो अभी अस्सी पर तय किए
हैं.'' शांति के चेहरे पर एक असंतोष का भाव था.

''बढ़ जाएगा धीरे-धीरे. अब जितने का ठीका होता है उतने में ही न सब कारीगरों को भी बांटना है.''
चन्तारा ने ढज्ञ।री को उंगली से चौड़ा किया और एक ओर झुककर देखने लगी थी.
''क्या है बहिन?''
''फुग्गी है उधर.'' झिरी म…

कहानी : कुत्ते

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-असगर वजाहत शहर में जब कुत्तों ने गड़बड़ शुरू की और वहाँ भौंकने लगे जहाँ उन्हें दुम हिलानी चाहिए थी तो पाया कि कुत्तों से मुक्ति पाने का यही तरीका है कि उनके खिलाफ भी उसी तरह का अभियान छेड़ दिया जाए जैसा इससे पहले मच्छरों के खिलाफ छेड़ा गया था. मच्छरमार दवा बनाने वाली कंपनी ने घोषणा की कि उसने कुत्तामार दवा भी बना ली है और उन लोगों ने जो प्रत्येक वर्ष कुत्तों की प्रदर्शनी लगाया करते थे, कुत्तों को पकड़ने का ठेका लेने की दरख्वास्त में लिखा है कि चूंकि वे इससे पहले भी कुत्ते पकड़ा करते थे, हालांकि लक्ष्य दूसरा होता था, पर लक्ष्य में परिवर्तन आ जाने के बावजूद कुत्ते फंसाने का उनको इतना अभ्यास है कि ठेका उन्हीं को मिलना चाहिए. बात सही भी है. कुत्ते पकड़ना एक कला है और कला कुछ दिनों का काम नहीं, निरंतर अभ्यास जो उसके लिए दरकार होता है, उनके पास था और उन्होंने उसका अच्छा इस्तेमाल किया.ऐसी बात नहीं कि कुत्तों को इसकी खबर नहीं थी. खबर थी, पर वे कुत्ते थे और सामान्य फैशन के अनुसार उन्हें सिर्फ भौंकना सिखाया गया था और लगातार न काटने से उनके दाँत झड़ गए थे, यहाँ तक कि नए पैदा हुए पिल्लों के तो …

संजय विद्रोही की कहानी : हैप्पी न्यू ईयर

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कहानी: हैप्पी न्यू ईयर'संजय विद्रोही उन दिनों ऑफिस में मदान साहब की तूती बोलती थी। मदान साहब ईस्ट इंडिया कम्पनी के फार्मूले ‘फूट डालो-राज करो' को प्रशासन का अचूक हथियार मानते थे। यह मंत्र उनके लिए बिजनेस का कायदा था और जीने का ढंग । किसको कितनी ढील देनी है और किसको कितना ‘भाव' ये वो अच्छी तरह जानते थे। रोब उनका ऐसा कि बस पूछो मत। ताड़ने और हॉंकने के मामले में पक्के ‘कांईये' और पूरे ‘फेंकू'। अनिच्छित व्यक्ति अगर काम से भी आ बैठे तो जानबूझ कर अपने आप को अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेना और बातों के जवाब में सिर्फ ‘हॉं-हुँ' करते रहना उनकी ‘टालने की कला' थी। बेचारा आने वाला तब हार कर कहता ‘अच्छा सर मैं चलता हूँ' तो तपाक से बोल पड़ते ‘ओके ओके'। आदमी बेचारा अपना सा मुँह लेकर लौट जाता। जबकि कई दफा ‘चमचा टोली' के लोग अनावश्यक ही उनके पास ठठ्ठ लगा कर बैठे रहते और चाय समोसों का दौर चलता रहता। मदान साहब तब चमचों की बातों पर हो-हो कर के दॉंत निपोरते नहीं अघाते।जब कभी वो राऊण्ड पर निकलते तो मानो कॉरिडोर में कर्फ्यू लग जाता। एरिया मैनेजरों को एक साथ खड…

तृतीय प्रकृति के द्वँद

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तृतीय प्रकृति के द्वँद
-आलेख : डॉ. सुनील दीपक

हाल ही में 800 मीटर की दौड़ में पदक जीत कर "स्त्री नहीं पुरुष" होने के आरोप में उसे खोने वाली सुश्री शाँती सौंदराजन के हादसे ने अंतरलैगिक जीवन से जुड़ी हुई बहुत सी मानव अधिकार समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है. जिस तरह से यह बात समाचार पत्रों तथा टेलीविजन पर प्रस्तुत की गयी, उनमें मानव अधिकारों की उपेक्षा भी थी और सहज सँवेदना की कमी भी. साथ ही यह भी स्पष्ट था कि अँतरलैंगिक (transgender) विषय पर आम जानकारी कितनी कम है.

जबकि समलैंगिक (homosexual) और द्वीलैंगिक (bisexual) विषयों पर पिछले कुछ वर्षों में कुछ बहस और विमर्श हुआ है, अँतरलैंगिक विषय पर बात अधिक आगे नहीं बढ़ी है. अँतरलैंगिक शब्द का प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में किया जाता है जैसे किः
जब व्यक्ति का शारीरिक लिंग उसके मानसिक लिंग से भिन्न हो, जैसे कि स्त्री शरीर हो कर भीतर से पुरुष महसूस करना या पुरुष शरीर में अंदर से स्वयं को स्त्री महसूस करना.जब यौन अंग ठीक से न बने हों जिससे यह कहना कठिन हो कि व्यक्ति पुरुष है या स्त्री
इनसे मिलती जुलती एक अन्य परिस्थिति है जिसमें व्यक्त…

शौकत थानवी का व्यंग्य: नेता

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व्यंग्यनेता- शौकत थानवीडॉक्टर अंसारी के व्याख्यान का सबसे अधिक प्रभाव भाई मकसूद पर हुआ कि हम लोग हाय-हाय करते रह गए और वह तीर की तरह मंच पर पहुँचकर टोपी, शेरवानी, कुर्ता आधि उतार-उतार कर फेंकने लगे और एक खद्दर की धोती बांधकर पाजामा फी तुरंत उतारकर फेंक दिया, क्योंकि वह भी विदेशी कपड़े का बना हुआ था. इसके पश्चात् उन्होंने एक विशेष भाव के कारण बड़ा प्रभावशाली लेक्चर दिया था जिसका केवल यह अंश हमको अब भी स्मरण है:‘मैं केवल कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श बना हूँ. वह मुझको देखकर शिक्षा ग्रहण करें और स्वदेशी की उन्नति में अपने कर्तव्यों पर विचार करें.'अब हर समय भाई मकसूद खद्दर प्रचार करते. विशेष रूप से हमसे नाराज थे कि उनके बार-बार कहने के पश्चात् भी हम खद्दर नहीं पहनते थे. कुछ भी हो किंतु वह अब एक राष्ट्रीय मनुष्य बन गए थे और हमारे अनुमति के अनुसार तो उन्हें कांग्रेस का सभापति होना चाहिए था और वास्तव में यह उनका बलिदान था कि वह अपने होते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉक्टर अंसारी और श्रीमती सरोजनी नायडू आदि को सभापति होता हुआ देखते थे और चुप थे.उनकी इस राष्ट्र…

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रवि रतलामी

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