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January 2007
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-राजकुमारी श्रीवास्तव

कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जिनकी न तो संभावना होती है और न जिनके घटने की कोई आशा ही कर सकता है. एक दिन केरल के कोट्टायम जिले के ओलासा नामक स्थान में एक ऐसी ही अनोखी घटना घट गई. जब तुम उस अनोखी घटना को सुनोगे तो स्वयं कहोगे कि हाँ, सचमुच यह एक अनोखी घटना थी.

क्या तुमने यह कभी सुना है कि किसी लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझ गए हों और भैंस उसे खींच कर लिए जा रही हो? पर उस दिन ओलासा में सचमुच एक लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझ गए थे. भैंस तो भैंस ही थी. वह चुपचाप आगे बढ़ती जा रही थी. लड़की भी रोती-चीखती हुई, घसीटती-घसीटती सी उसके साथ-साथ चली जा रही थी.

लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में किस तरह उलझे - इसके बारे में कोई क्या कह सकता है? पर यह बात तो ठीक ही है कि लड़की के बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझे हुए थे, और भैंस उसे अपने साथ खींच कर लिए जा रही थी. यही गनीमत थी कि भैंस धीमी-धीमी चाल से चल रही थी. यदि कहीं वह भागती होती, तब तो लड़की के प्राणों पर आ बनती. पर कोई कह नहीं सकता था कि वह भागेगी नहीं. वह तो भैंस थी. जरा सी बात में उसके भड़क उठने की आशंका थी.

उस समय ओलासा के सीएसएस हाई स्कूल में दोपहर के खाने की छुट्टी हो चुकी थी. कुछ बच्चे स्कूल में ही खाने पीने में व्यस्त थे और कुछ खाना खाने के लिए अपने-अपने घर जा रहे थे. राजन भी खाना खाने के लिए अपने घर जा रहा था.

राजन का पूरा नाम सी.सी. राजन था. अचानक लड़की के चीखने-चिल्लाने की आवाज उसके कानों में पड़ी. वह भैंस के सींगों के द्वारा खिंचती हुई, उधर रोती-चीखती हुई चली जा रही थी. राजन उस ओर दौड़ पडा जिधर से रोने-चीखने की आवाज आ रही थी. उसने कुछ दूर जाने पर, जो दृश्य देखा, उससे उसके प्राण कांप उठे. लड़की के बड़े-बड़े बाल और उसके कपड़े भैंस के सींगों में उलझे हुए थे. भैंस आगे-आगे चली जा रही थी, उसके साथ-साथ रोती चीखती हुई लड़की भी खिंचती हुई चली जा रही थी. राजन ने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था. देखने को कौन कहे, उसने तो कभी अपने मन में ऐसे दृश्य की कल्पना तक भी न की होगी.

राजन विचारों में डूब गया. वह सोचने लगा - लड़की को किस तरह भैंस के सींगों से छुड़ाया जाए. यदि भैंस भड़क गई और जोर से भागने लगी, तो लड़की को चोट तो लगेगी ही, उसके प्राणों पर भी आ बनेगी.

राजन कुछ देर तक खड़ा-खड़ा सोचता रहा. फिर वह भैंस की ओर दौड़ पडा. उसने दौड़कर, बड़ी मजबूती से भैंस के सींगों को जा पकड़ा. उसने इस बात की बिलकुल चिन्ता नहीं की कि भैंस अपने सींगों से उसे झटक देगी, और उसे चोट लगेगी. उसे अपना नहीं, उस लड़की का ध्यान था. वह भैंस के सींगों को पकड़कर लड़की के उलझे हुए कपड़ों को छुड़ाने लगा.

कपड़े तो किसी तरह छूट गए, पर लड़की के बड़े-बड़े बालों को जो सींगों में बुरी तरह उलझ गए थे, छुड़ाना बहुत ही कठिन हो रहा था. भैंस रह-रह कर भागने की कोशिश कर रही थी. राजन मजबूती के साथ उसके सींगों को पकड़े हुए था. इसी समय उधर से एक आदमी निकला. राजन ने उससे शीघ्र एक चाकू लाने के लिए कहा.

वह आदमी दौड़कर चाकू ले आया. राजन ने चाकू से लड़की के उलझे हुए बालों को काट दिया. लड़की सींगों से छूट गई. राजन ने भैंस को छोड़ दिया. भैंस भाग गई. लड़की की जान में जान आई. राजन ने उसे मृत्यु के मुख में जाने से बचा लिया था.

राजन के इस साहस के लिए उसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया. उसका आदर किया गया.

****

साभार - पुरस्कृत बच्चों की साहसिक कहानियाँ, लेखिका - राजकुमारी श्रीवास्तव, संजीव प्रकाशन नई दिल्ली -2.

चित्र : नीलेश उपाध्याय की कलाकृति

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-नीरजा माधव

चन्तारा के दोनों हाथ तेज़ी से बेलन के साथ-साथ गोल-गोल घूम रहे थे. चौके पर पड़ी आटे की लोई पूड़ी का आकार ले रही थी.

''तुम कब से इहां काम कर रही हो?'' पास ही बैठी शांति ने अपनी पूड़ी को ज़मीन पर बिछे सफेद कपड़े पर फेंकते हुए पूछा. उसके हाथ में आटे की दूसरी लोई नन्हे गेंद की तरह थमी थी.
''हो गया होगा आठ-दस साल.'' चन्तारा ने एक दृष्टि शांति पर डाली थी और अपने चौके से पूड़ी उठाकर सफेद कपड़े पर फेंक दिया.
''मजूरी बढ़ाए कि नहीं चौहान बाबू?''
''काहे नहीं बहिन. उनकी किरपा तो बनी ही है. पहिले दिन भर की मजूरी पचास थी. अब बढ़ते-बढ़ते सौ रुपया कर दिया है.'' चन्तारा ने दूसरी लोई बेलन के नीचे दबा दिया था.
''हमको तो अभी अस्सी पर तय किए
हैं.'' शांति के चेहरे पर एक असंतोष का भाव था.

''बढ़ जाएगा धीरे-धीरे. अब जितने का ठीका होता है उतने में ही न सब कारीगरों को भी बांटना है.''
चन्तारा ने ढज्ञ।री को उंगली से चौड़ा किया और एक ओर झुककर देखने लगी थी.
''क्या है बहिन?''
''फुग्गी है उधर.'' झिरी में आंखें गड़ाए चन्तारा ने उत्तार दिया.
''कौन है?''
''मेरा लड़का.''
''वह भी आया है?''
''हां.''
''काम करता है यहीं?''

''हां. टैचू बनता है बड़े लोगों के यहां कार-परोजन में.''
शांति भी उत्सुकता रोक न सकी. बेलन को ज़मीन पर रख चन्तारा के कंधे पर झुक आई और झिरी से उस पार देखने लगी थी. सामने एक चौदह-पंद्रह वर्ष का लड़का नंगे बदन खड़ा था. दो व्यक्ति उसके हाथ, पेट और चेहरे पर हल्के नीले रंग की कोई चीज़ पोत रहे थे. सिर पर जटा की तरह बालों का नकली विग लगा था. कमर से बाघम्बर जैसा छोटा-सा वस्त्रा लटक रहा था. शेष खुले पैरों पर भी वही नीला पुता हुआ था.
''कहां है फुग्गी?'' शांति ने फुसफुसाकर पूछा था.

''वही जो सज रहा है.'' चन्तारा के स्वर में कोई उल्लास न था.
''वह जिसको सब नीला रंग पोत रहे हैं?''
''हां. रंग नहीं, सफेदा है. उसी में नीला पाउडर मिलाकर दो बूंद सरसों का तेल भी मिलाते हैं.''
''हाय, हाय, बेचारा लड़का, नंगे बदन कैसा कांप रहा है. इतनी ठंडक में ये क्यों बना रहे हैं? कुछ दूसरा...''
''अब ग्राहक जो चाहेगा, वही न बनाएगा ठीकेदार.''
चन्तारा का स्वर निराशा में डूब गया था.
'अरे इतना जाड़ा-पाला में कपड़ा वाला टैचू बना दिया होता तो ठिठुरता नहीं
लड़का.'' शांति ने पुरानी-सी शाल को अपने सिर के ऊपर से ओढ़ते हुए कहा.

''हां, मेम, जोकर चाहे नूरजहां ही बना देता. उसमें कपड़ा रहता है तन पर. पिंजरे वाली चनकानता में भी रहता कपड़ा. पर महात्मा और संकर में तो बस एक छोटा-सा ही कपड़ा पहनाते हैं. महात्मा बनेगा तो कमर से मर्दानी धोती या फिर बाघम्बर.'' उसने कनात का पकड़ा हुआ टोक छोड़ दिया था और अपना दूसरा कंधा पकड़कर झूलती अपनी तीन वर्षीया बेटी को पकड़ लिया.
''बेचारा.'' शांति भी अपनी जगह बैठ गई.
''अरे अभी क्या देख रही हो बहन. इतनी ठंड में चार-छह घंटे खड़ा रहेगा, या जब तक बाराती-घराती खा-पीकर एक किनारे न हो जाएं. उसके बाद आधी रात में सरसों के तेल से रगड़-रगड़कर छुड़ाना पड़ेगा सारा रंग. दुर्गत हो जाती है उसकी.''
चन्तारा ने बेटी को ज़बरदस्ती अपनी बगल में बैठा लिया और चौके पर दूसरी लोई रख लिया.
''क्यों, रंग पानी से नहीं छूटता?'' शांति ने पूछा.

''सफेदा है न? रंग होता तो छूट जाता आराम से.''
''अरे राम राम. तब तो लड़का बेचारा और ठिठुर जाता होगा जाड़े में. गर्मी में तो भले ही तकलीफ़ न हो, पर जाड़े में तो मरगन हो जाती होगी.''
''अरे बहिन, ई पेट जो न करवाए. पहिले केवल गर्मी के दिनों में ही शादी-बियाह का लगन होता था. अब तो जाड़ा बरसात, खरमास, कौनो मौसम नहीं छूटता शादी से. न जाने कौन से पतरा से पंडित लोग लगन सोधते हैं.''
''मुसलमान और दूसरी बिरादरियों का भी तो बियाह होता होगा. उसमें कौन लगन पताई देखता है.'' शांति ने पूड़ी बेलकर कपड़े की ओर उछाला था.
''हां, ठीक है. कितने ग़रीब-गुरबा की रोटी भी तो चलती है इसी बियाह से.'' चन्तारा ने एक बार फिर झुककर कनात की झिरी में आंखें टिका दी थीं.

''हे चन्तरवा, शन्तिया, तुम लोग बक-बक ही करती रहोगी कि काम भी करोगी? कड़ाही खाली जा रही है. घी जल रहा है और तुम लोग बतकही कर रही हो. चलाओ हाथ जल्दी-
जल्दी.'' पूड़ी छान रहे सरूप साव डपटकर बोल पड़े. उनके हाथ में पकड़े बड़े से पौना में कई फूली पूड़ियों से रिस-रिसकर घी कड़ाई में चू रहा था.
''माई, पूड़ी लूंगी.'' चन्तारा की बेटी मचली थी पूड़ियों को देख.
''चुप्प. अभी नहीं.'' चन्तारा ने उसे अपनी कुहनी से एक टिहोका दिया.
''नहीं, भूख लगी है माई. पूड़ीऽऽ...'' वह रिरियाते हुए पूड़ियों की ओर ललचाई दृष्टि से देख रही थी.
''नहीं, अभी भगवान जी को भोग लगेगा, तब सबको मिलेगा.'' चन्तारा के हाथ तेज़ चलने लगे थे.
''नहीं, अभी. हम अभी लेंगे.'' वह फिर मचली.

''चटाक्...'' एक हल्का-सा झापड़ उसके गाल पर जमाकर चन्तारा ने अपना ब्लाउज़ ऊपर उठाया था और बच्ची को दबोचकर अपना स्तन उसके मुंह में दे दिया.
गुस्से में बच्ची ने अपने दांतों को उसके स्तन में गड़ा दिया था. एक सीत्कार के साथ चन्तारा ने एक भारी घूंसा बच्ची की पीठ पर जड़ते हुए झटके में स्वयं से अलग किया था. निरावृत देह से कुछ क्षण के लिए उसका ध्यान हटकर अपनी पीड़ा पर चला गया था. सरूप साव बड़ी लालसा से यह दृश्य देख रहे थे. हाथ में एक पूड़ी उठाए वे जल्दी से चन्तारा के पास आ गए थे.
''क्यों पीट रही हो बच्ची को? लो, यह दे दो. मेरे होते हुए क्यों परेशान होती हो? बच्चे तो भगवान की मूरत होते हैं.'' वे पूड़ी चन्तारा के हाथ में पकड़ा रहे थे और दृष्टि कहीं और भटक रही थी. पूड़ी थामते हुए चन्तारा ने उनकी दृष्टि की पहुंच पर आंचल

में.'' वह बहुत आशा भरी दृष्टि से सरूप साव की ओर देख रही थी.
''बस अपने फुग्गिया की चिंता है. कभी हम लोगों की भी चिंता होती है तुझको?'' सरूप साव गहरी दृष्टि से उसे देखते हुए हँसे थे. बदले में चन्तारा भी हँस पड़ी थी.
''बहुत चालाक हो तुम सब. बात घुमाना तो कोई तुम लोगों से पूछे. ब्रह्मा के भी कान काट लो.''
सरूप साव चूल्हे की ओर जाने लगे थे.
''साव जी, दो ठो पूड़ी...'' चन्तारा गिड़गिड़ाई.

''अभी बचिया को दिया न? दो मिनट ठहरकर दूंगा, नहीं तो मालिक कहेंगे कि पहले चन्तारा को ही भोग लगा दिए साव जी?'' हो-होकर हँसे थे सरूप साव और जाने के लिए मुड़े थे.
बगल में बैठी चन्तारा की बेटी दोनों हाथों में पूड़ी को थामे जल्दी-जल्दी काटकर खा रही थी. चन्तारा ने उसे अपने पीछे आड़ में बिठा दिया ताकि अन्य कारीगरों और आने-जाने वालों की दृष्टि न पड़े उस पर. एक बार पुन: कनात की झिरी से उसने झांककर जायजा लिया था.

फुग्गी लगभग तैयार हो चुका था. एक मिट्टी के बड़े से कसोरे में धूप और लोहबान सुलगाई जा रही थी. उसे जटा के ऊपर रखकर एक ऊंचे स्थान पर बैठाया जाता था फुग्गी को. सफेद चादर से टके से खड़ी हो गई थी वह.
चमकीली शेरवानी, तंग पायजामा, कमर में खुंसी तलवार, हाथ में भाला और सिर पर बड़ा-सा साफा. मूंछें भी अपनी नहीं थी फुग्गी के बाऊ की. बड़ी-बड़ी झोप्पादार मूंछों के पीछे उसका असली चेहरा तो छिप ही गया था.
''क्या कर रही हो?'' उसने अपनी आवाज़ को भारी बनाते हुए पूछा था.

''पूड़ी बेल रही...अरे तुम...?'' एकाएक अपने पति को पहचान वह झेंप गई थी. अकारण ही वह डरकर बोल रही थी. अगले ही पल वह हँसते-हँसते दुहरी हो गई थी. आंखों से छलक आए पानी को आंचल से सुखाते हुए वह बोल पड़ी, ''ये कौन भेस बनाए हो फुग्गिया के बाऊ?''
''अरे चीन्ह गई तुम?'' मैं तो सोचा कि डराऊंगा कुछ देर.''
''हां हां, बहुरुपिया तो हो ही तुम.'' वह हँसी थी.

''चलो इसी बहाने दरबान बनने का शौक पूरा हो गया, नहीं तो कौन राजा हमको पूछता? दउरी सूप बीनते-बीनते जिनगी
तमाम.'' वह उल्लास से भरा हुआ था.
''क्या करना होगा तुमको?'' चन्तारा ने पूछा था.
''कुछ नहीं. बस, वह जो गेट बना हुआ है न फूलों वाला, उसी के सामने खड़ा रहना है हम दोनों को.''
''दोनों को?''
''हां, गेट पर एक ही दरबान नहीं रहता न? हमारे साथ वाला जूठन भी दरबान बना है. दोनों ओर भाले को एक-दूसरे से सटा हम खड़े रहेंगे और जब कोई बराती, घराती या दूल्हा आएगा तो हम अपना भाला सीधा कर
लेंगे.'' उसने उसे समझाया था.

''इससे क्या होगा?'' चन्तारा का बेवकूफ़ी भरा सवाल उसे हँसा गया था.
''अरे पागल, हमेशा कुछ होगा ही? शादी-ब्याह में ये सब फैशन है आजकल. पुराने ज़माने की रईसी की झलक है इसमें. एक दिन के लिए दूल्हा और उसके संग-साथ के लोग राजा का सुख उठाते हैं.''
''हूं, एक दिन का राजा बनने से क्या फ़ायदा? बेकार में पैसा...'' चन्तारा ने मुंह सिकोड़ा.
''ये सब न हो तो हम ग़रीबों की रोज़ी-रोटी कैसे चले? तुमको समझ नहीं आएगी. पचास लोगों को पूड़ी बेलने और सब्जी काटने के लिए तो ठेकेदार नहीं न लगा लेगा. ई सब होने से सबका काम-धन्धा ही बढ़ा है. वह भी खुश, हम भी खुश. जी भी आन-मान हो जाता है हम लोगों का ये सब देखकर.''

''हां, तुम्हारा होता होगा आन-मान राजा बाबू बनकर. हमको तो घर-बाहर वही चौका-बेलन.'' चन्तारा ने मुंह बिचकाया था.
''अगली किसी लगन में तुझे अमेरिकन मेम या नूरजहां बनवा दूंगा. बड़ी जमेगी तू.''
''अरे जाओ, छह घंटा टैचू बनकर मैं तो बैठ चुकी. अपना तो भाला हटाने-बढ़ाने के बहाने हिल-डुल लोगे पर जिसको एक तरह से बैठे रहना पड़ता होगा उसकी सजाय पूछो जाकर. कुल्ला पेशाब लग जाए तो क्या हो?'' चन्तारा ने चुटकी ली थी. दोनों हँस पड़े थे.
''अरे चन्तारा, झरोखा ही झांकोगी कि हाथ भी चलेगा?'' सरूप साव चूल्हे के पास से उसे टोक रहे थे.
''अभी हम लोग दो मिनट के लिए हाथ रोक दें तो सावजी एकदम पिनपिना जाएंगे.'' उधर से सब्जी के लिए धनिया की पत्ताी काटते रजिन्दर की आवाज़ आई थी.
''धोती खोल के खड़े हो जाएंगे गुस्से में.'' धीरे से फुसफुसाकर एक महिला ने कहा तो आसपास की आलू छीलती महिलाएं हँस पड़ी थीं खिलखिलाकर.

चन्तारा ने कनात का टोक छोड़ दिया और सिर झुकाए पूड़ी बेलने लगी थी. गले में लिपटी पुरानी मटमैली शाल को उठाकर एक किनारे रख दिया था. फुग्गी इतनी ठंड में नंगे बदन वहां खड़ा रहे और वह चूल्हे के पास बैठी शाल ओढ़कर पूड़ी बेले? इसके लिए उसकी आत्मा धिक्कार रही थी. यहां तो भला तम्बू की छांह है. थोड़ी दूर ही सही, बड़ा-सा चूल्हा चल रहा है. कुछ तो गर्मी लग रही है, पर फुग्गिया बेचारा...खुले आसमान के नीचे ओस और ठंडक में नंगे बदन बैठा रहेगा कब तक?
चन्तारा को लगा उसका कलेजा कोई मसल रहा है. वह उठी थी. शाल को पुन: उठाकर कंधे पर डाला था और परात में पंद्रह-बीस पूड़ियों को रखकर साव को चूल्हे के पास देने के बहाने पहुंची थी. साव ने मुस्कराते हुए उसकी ओर देखा.
''साव जी, दो पूड़ी दे दीजिए तो फुग्गिया को दे आऊं?'' वह धीमे-से गिड़गिड़ा उठी.

''कैसे ले जाएगी? सब देख रहे हैं.'' साव ने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई. सभी अपने-अपने काम में तल्लीन थे.
''जल्दी से अंचरा फैलाओ. झट से छिपा लेना नहीं तो मालिक हमको जीने नहीं देगा.'' सरूप साव ने फुसफुसाते हुए दो ठंडी पूड़ियां दउरा से निकालकर उसके फैले आंचल में फेंक दी थीं.
चन्तारा जल्दी-जल्दी डग भरते कनात की दूसरी ओर चली गई थी.
''क्यों साव जी, अब नहीं कहोगे कि देरी हो रही है? दो आंख कर रहे हैं?'' रजिन्दर ने चंतारा को दूसरी ओर जाते देखा तो साव की चुटकी ली.
''अरे भाई, किसी का कुल्ला पेशाब हम नहीं न रोक देंगे. तुमको भी लगी हो तो जाओ निपट आओ.'' सरूप साव ने बारीकी से बात टाली थी. सब हँस पड़े. चन्तारा फुग्गी के पास पहुंची तो दो-तीन लोग उसके हाथ में रुद्राक्ष की माला लपेट रहे थे.
''हे भइया, जरा दो कौर कुछ मुंह में डाल लेने दो. सुबह से कुछ नहीं खाया है ये.'' वह याचक की तरह बोल पड़ी थी. फुग्गी उसकी ओर दैन्य भाव से देख रहा था. उसके दांत ठंड के कारण रह-रहकर किटकिटा उठते थे. उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में भूख की पीड़ा कसमसा रही थी. माथे पर त्रिपुंड और पतले ओठों पर हल्की लाली के पीछे सफेद दांत चमक उठे थे मां के आते ही.

''नहीं, अब नहीं. पूरा मेक-अप हो चुका है. छह बज गए हैं. कुछ ही देर में बरात लगेगी. घराती तो आने भी लगे हैं.'' रुद्राक्ष पहना रहा व्यक्ति रुखाई से बोल पड़ा.
''हे भइया, बस ज़रा-सा. हम अपने हाथ से ही तोड़कर मुंह में डाल दें.'' वह गिड़गिड़ाई थी. फुग्गी का भीतर धंसा पेट उसे पीड़ा पहुंचा रहा था.
''वाह भाई वाह, हम लोग मूर्ख हैं क्या, जो एक का मेकअप करे, फिर भोजन कराएं, फिर मेक-अप करें...फिर...'' वह गुर्राया.
''क्यों परेशान कर रही हो? अभी इसको तैयार कर लेने के बाद स्टैचू लड़की को भी तैयार करना है हमें. इसे हम खिलाने लगेंगे तो मेक-अप पोंछा जाएगा और हमें फिर मेहनत करनी होगी.'' दूसरे ने अपेक्षाकृत कुछ विनम्रता से समझाया.
चन्तारा की आंखों में आंसू मचल उठे थे. उसने अंतिम प्रयास किया, ''हे भइया, माई हूं न इसकी. जानवर भी अपना बच्चा भूखा नहीं देख पाता. देख लो इसका पेट. कितना धंसा है भूख से? तुम्हारी अम्मा भी होती तो न सह पातीं.''
''अच्छा खिला दो.'' दूसरे वाले ने हारकर सहमति दे दी.

''क्या करते हो यार? फिर मेकअप करोगे?'' पहले वाला गुर्राया.
''जाने दो, मैं कर दूंगा. बस लिपस्टिक ही ख़राब होगी न? दोबारा मार दूंगा. इतनी ठंड में खाली पेट बैठेगा और कहीं मार दी ठंडक तो बस...'' वह हँसा.
''हे शीतला माई, रक्षा करना मेरे बाल बच्चे की.'' बुदबुदाती हुई चन्तारा ने अपने आंचल से पूड़ी निकालकर हाथ में ले लिया और एक टुकड़ा तोड़कर फुग्गी के मुंह में डाल दिया. वह जल्दी-जल्दी मुंुह चलाने लगा था. उसकी आंखों में एक चमक जाग उठी.

''तब तक मैं अपनी यह शाल ओढ़ा दूं भइया, फुग्गी को?'' दूसरा कौर उसके मुंह में डालते हुए चन्तारा ने डरते-डरते पूछा.
''शाल ही क्यों, रजाई ले आकर ओढ़ा दो. ऊंगली पकड़ते-पकड़ते पहुंचा थामने लगी.'' दूसरा वाला लड़का बिगड़ पड़ा.
फुग्गी ने हाथ के इशारे से मां को मना किया और धीरे से पानी मांगा.
''हे लौण्डे, पानी पिएगा तो पेशाब लगेगी. लग रहा है जैसे लड़ाई के मैदान में जा रहा है जो सारा खाना-पानी दुरुस्त कर लेना चाह रहा है. अरे, दो-चार घंटे बाद खाना अढ़ाई सेर और पी कंडाल भर पानी. कौन रोकेगा?'' दूसरा वाला लड़का ही फिर बोला था.

''बहुत दया कर रहा था न? अब तू ही झेल.'' पहले वाले ने दूसरे को कोसा और स्टैचू लड़की को सजाने में व्यस्त हो गया.
''क्यों जी, अभी घराती-बराती किसी के मुंह में अन्न नहीं गया और तुम भोग लगाने लगी. तुम्हीं बड़की पंडिताइन हो क्या?'' एक कसैला-स्वर कानों में पड़ा चन्तारा के और दूसरी पूड़ी का कौर तोड़ते-तोड़ते वह सहमकर रुक गई थी. फुग्गी ने भी डरकर मुंह चलाना रोक दिया. सामने कन्या पक्ष के मालिक खड़े-खड़े आग्नेय नेत्रों से उन दोनों को घूर रहे थे.
''क्यों, हमने खाना बनाने का ठेका दिया है कि लंगर खोला है?'' वे जल-भुनकर पूछ रहे थे.
''मलिकार, बहुत भूखा था बच्चा, इसीलिए...मांगकर लाई हूं, चुराकर नहीं. पूछ लीजिए साव जी से मलिकार.'' उसके चेहरे पर दैन्य पसर गया था. दोनों जुड़े हाथों के बीच पूड़ी थमी थी.

'पूछूंगा तो है ही. ये तमाशा हो रहा है? किसी की इज्ज़त ले लेंगे ये लोग? अब किसी में ईमान नहीं बचा. जहां निगाह न डालो तो लूट ले जाएं लोग. इसीलिए ठेके पर दिया जाता है कि लोग इज्ज़त उतार लें मौके पर?''
''मलिकार बस दो ही पूड़ी ले आई थी. एक खिला दिया है, एक ये है. आपकी इज्ज़त हमारी इज्ज़त है सरकार. नराज मत होइए मालिकार. अब ऐसी ग़लती नहीं होगी.'' वह गिड़गिड़ा उठी. उसका हृदय धुक-धुक करने लगा था. साव जी ने चोरी से उसे पूड़ी निकालकर दिया था. कहीं मालिक पूछने लगे तो वे मुकर न जाएं इस बात से? तब क्या होगा?
''आप बड़े हैं मालिक, बेटी का ब्याह कर रहे हैं. हम गरीबों का भी पुन्न आशीर्वाद लग जाए बिटिया को.'' चन्तारा ने पूड़ी को ज़मीन पर रखा था और मालिक के चरण छू लिए थे.

''नहीं, मैं गरीबों को खिलाने का विरोध नहीं करता. मैं तो ख़ुद ही चाहता हूं कि अधिक से अधिक लोग खाएं-पीएं हमारे यहां. अंतिम बेटी है. रज्ज-गज्ज से विदा करना चाहता हूं. बस हमारी भी इज्ज़त-मान का ध्यान तुम लोग रखो.'' मालिक की आवाज़ नरम हो गई थी. चन्तारा आश्वस्त हुई थी. मालिक दूसरी ओर जाने के लिए मुड़ गए तो वह पुन: अपने स्थान पर आई थी और ज़मीन पर पड़ी पूड़ी को उठा लिया.

''हां, हां अब नहीं खिलाओ. हमने फिर से लिपस्टिक वगैरह लगाकर ठीक कर दिया
है.'' मेकअप करने वाले दूसरे आदमी ने मना किया था चन्तारा को. फुग्गी भी सहम गया था कुछ क्षण पहले का दृश्य देखकर. उसकी खाने की इच्छा मर गई थी. उसने हाथ के इशारे से मां को मना किया. चन्तारा चली गई.
द्वार पूजा के बाद जयमाला के लिए वर-वधू मंच पर आ गए थे. इत्र से सुगंधित क़ीमती जेवरों और साड़ियों से लकदक महिलाएं, गर्म सूट में सजे-संवरे पुरुष पूरे पंडाल में इधर-उधर विचरण कर रहे थे. कुछ कुर्सियों पर बैठे थे तो कुछ दूल्हे और दुल्हन के साथ मंच पर चुहलबाजी में व्यस्त थे. ठंड से बचने के लिए गर्म-गर्म कॉफी की घूंट भरती महिलाएं और लड़कियां निरर्थक बातों पर भी ठहाके लगाने का प्रयास कर रही थीं, ताकि लोगों की दृष्टि उनकी ओर खिंचे. कोई अपने कटे बालों को बड़ी अदा के साथ झटक रहा था तो कोई पारंपरिक परिधान में था.
बड़ी-बड़ी मूंछों और सिर के साफा ने तो फुग्गी के बाऊ को और भड़कीला बना दिया था. चन्तारा को आज अपना पति बहुत अच्छा लगा था. उसने लजाकर मुंह दूसरी ओर फेर लिया. सलाद और प्लेट सजी मेज़ के पास काली पैंट और नारंगी छोटी-सी शर्ट पहने सिर पर हैट, आंखों पर काला चश्मा लगाए मेम बनी एक लड़की कमर पर एक ओर बल दिए खड़ी थी. हाथ प्लेट की ओर इशारा करते एक स्थिर मुद्रा में थे. एक बारगी देखकर आश्चर्य हो रहा था कि क्या वह मोम की गुड़िया है या सचमुच का इन्सान?

क्या-क्या फैशन चल निकला है? कल को कुछ और होगा. पहले तो सबके यहां शादी में काठ का सुग्गा आता था मड़वे में. बढ़ई उस सुग्गे वाले झोंपे को लेकर खड़ा होता था. मालकिन मूसल, लोढ़े और सूप से तथा फिर अपने आंचल से उसका परिछन करती थी. गोतिन दयादिन गारी गाती थी...'गोड़ मोरा बथेला, परिछ लेई जाऊ रे...' सोचते हुए चन्तारा के ओठों पर एक मुस्कान रेंग गई थी. मंच पर दुल्हन दूल्हे के गले में वरमाला डाल रही थी. लोग तालियां बजा रहे थे. फूल फेंक रहे थे एक दूसरे पर. लड़कियां लजा रही थीं बेताब. चन्तारा ने फुग्गी की खोज की. बड़े गेट के भीतर दाहिनी ओर खुले आकाश के नीचे फुग्गी अपने रुई जैसे कपड़े के पहाड़ पर बैठा था. दूर से देखने पर रुई बर्फ़ जैसी दिखाई दे रही थी. उसके ऊपर बैठे फुग्गी के सिर के ऊपर से धीरे-धीरे धुआं उठ रहा था.

चलो, धूप और लोहबान की कुछ तो गरमी लग ही रही होगी मेरे बेटे को. चन्तारा ने अपने मन को दिलासा दिया. फुग्गी के बगल में त्रिशूल और उस पर लटका डमरू दिखाई दे रहा था. आंखें आधी बंद आधी खुलीं, मानो ध्यानावस्थित. पूरा बदन नंगा. बस कमर पर बाघम्बर लटक रहा था. चन्तारा को सिहरन-सी हुई थी. उसने कंधे पर सो रही बेटी को अपनी शाल से
''बेचारा, ठंडा रहा होगा.'' बगल में खड़ी शांति ने चन्तारा को टिहोका दिया.

''हूं. नेता या मुनीम बना दिए होते तो ठीक रहता.'' चन्तारा बेबसी में बोल रही होती.
''इस बार जाड़ा भी तो गजबै पड़ रहा है. सांझ से ही कोहिरा, हाथ-पैर तो जैसे सुन्न हो जा रहा है.''
''हूं.'' चन्तारा र्खोई-सी बोल रही थी. तीन चार मनचले लड़के फुग्गी के आसपास खड़े होकर उसे देख रहे थे.
न चाहते हुए भी चन्तारा के पांव उधर ही बढ़ने लगे. मंच पर आशीर्वाद देने और वीडियोग्राफी का कार्यक्रम चल रहा था. थोड़ी देर के लिए आरकेस्ट्रा वाले भी चाय-पानी करने चले गए थे.

''क्यों यार, क्या ये सचमुच की मूर्ति है?'' एक लड़का फुग्गी की आंखों में आंखें डालकर पूछ रहा था.
''तुमको हँसी नहीं आ रही है मूर्ति जी?'' दूसरे ने पूछा.
''चन्दू के चाचा ने, चांदनी रात में चाची को चांदी के चम्मच से चटनी चटाया.'' चाऊमिन खाते हुए एक लड़के ने स्टैचू बने फुग्गी को हँसाने का प्रयास किया. फुग्गी मूर्तिवत् रहा.

''सचमुच चटा यार. देख बोलता है कि नहीं.'' एक ने सलाह दी तो दूसरे ने झट प्लास्टिक के चम्मच से चिली सॉस उसके ओठों पर लगा दिया. पास खड़ी चन्तारा को क्रोध आया था.
''ये क्या बाबू. वह भी किसी का लड़का है. ऐसे क्यों करते हो?''
चन्तारा को रजिन्दर चुप कराने लगा था.

''क्या बोलती हो? इसीलिए तो सजाकर खड़ा किया जाता है कि लोग खुश हों देखकर. तुम क्या बक रही हो? मुफत में नहीं कर रहा है न तुम्हारा बेटा.''
चन्तारा को अपनी त्रुटि का एहसास हुआ था और वह सिर झुकाए अपने झुंड की ओर चली गई थी. पूड़ी बेलने की गुहार हुई तो वे सब कनात के पीछे चूल्हे की ओर भागी थीं. बराती खाने पर एक साथ टूट पड़े थे. बेयरे थालियों और भगौनों में भर-भरकर पोलाव, सब्जी और पूड़ी कतारबध्द बर्तनों में भरने लगे थे.
''बस एक घंटे की भीड़ और है. फिर सब लोग निबट जाएंगे. मड़वे में ब्याह बैठ जाएगा तो हम लोगों की छुट्टी हो जाएगी.'' सरूप साव ने पौना हाथ में ले लिया था. औरतों के हाथ जल्दी-जल्दी पूड़ी बेलने लगे थे. पुरुष लोई काट-काटकर उनकी ओर फेंक रहे थे.

''इरे इतनी जल्दी नहीं होगा साव.'' शांति ने भीड़ की ओर देखा. ''चार-पांच सौ लोग हैं खानेवाले. हम लोगों से साढ़े तीन सौ लोगों के लिए कहा गया था.'' रजिन्दर चन्तारा के बगल में बैठा आटे की लोई काट रहा था. पास की बिछी चादर पर चन्तारा की बच्ची शॉल में लिपटी सोई थी.
एक कोलाहल-सा मचा था एक ओर. कुछ लोग किसी को उठाए लिए जा रहे थे. मालिक बदहवास से उन लोगों की तरफ़ बढ़े जा रहे थे.
''क्या हुआ साहब?'' रजिन्दर उठ खड़ा हुआ था.
''वह कहां है?''

''कौन?''
''अरे भाई जिसका लड़का स्टैचू बना था.'' उनकी दृष्टि बेचैन सी चन्तारा को ढूंढ रही थी।
''उधर बैठी है चन्तारा.'' रजिन्दर ने उसकी ओर इशारा किया.
''क्या हुआ मलिकार?'' किसी अनहोनी की आशंका में उसका हृदय धड़क उठा था.
''देखो, चन्तारा, तुम्हारा लड़का शायद बेहोश होकर गिर पड़ा है. लोग पास वाले डॉक्टर के पास लेकर गए हैं.''
''हाय राम! क्या हुआ मेरे फुग्गी को?'' वह चीख़ पड़ी थी.

''चुप चन्तारा, रोना नहीं. ब्याह बैठ चुका है. कोई अपशकुन न हो चन्तारा. लड़की के भविष्य का मामला है. सारा ख़र्च मैं उठाऊंगा तेरा. रोना नहीं, अन्यथा मेरी लड़की को अपशकुनी मान बैठेंगे ससुराल वाले लोग.'' मालिक के दोनों हाथ जुड़े थे चन्तारा के सामने और वे दैन्य भाव से चन्तारा की बढ़ रही हिचकियों को रोक लेने का अनुरोध कर रहे थे.
चन्तारा ने सोती हुई बच्ची को कंधे पर लादा था और मुंह में आंचल ठूंसे उस ओर भागी थी जिधर लोग फुग्गी को लेकर गए थे.
विवाह मंडप में मंत्रोच्चार हो रहा था.
(अन्यथा, नवंबर)
रचनाकार - नीरजा माधव अंग्रेज़ी साहित्य में एमए. पी-एच डी हैं. 'चिटके आकाश का सूरज', 'अभी ठहरो अंधी सदी', 'आदिमगंध तथा अन्य कहानियां', 'पथदंश' (कहानी-संग्रह) 'तेभ्य: स्वधा', 'गेशे जम्पा', 'यमदीप' (उपन्यास) प्रकाशित. एक कहानी-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाश्य. संप्रति आकाशवाणी, वाराणसी में सेवारत.


-असगर वजाहत

शहर में जब कुत्तों ने गड़बड़ शुरू की और वहाँ भौंकने लगे जहाँ उन्हें दुम हिलानी चाहिए थी तो पाया कि कुत्तों से मुक्ति पाने का यही तरीका है कि उनके खिलाफ भी उसी तरह का अभियान छेड़ दिया जाए जैसा इससे पहले मच्छरों के खिलाफ छेड़ा गया था. मच्छरमार दवा बनाने वाली कंपनी ने घोषणा की कि उसने कुत्तामार दवा भी बना ली है और उन लोगों ने जो प्रत्येक वर्ष कुत्तों की प्रदर्शनी लगाया करते थे, कुत्तों को पकड़ने का ठेका लेने की दरख्वास्त में लिखा है कि चूंकि वे इससे पहले भी कुत्ते पकड़ा करते थे, हालांकि लक्ष्य दूसरा होता था, पर लक्ष्य में परिवर्तन आ जाने के बावजूद कुत्ते फंसाने का उनको इतना अभ्यास है कि ठेका उन्हीं को मिलना चाहिए. बात सही भी है. कुत्ते पकड़ना एक कला है और कला कुछ दिनों का काम नहीं, निरंतर अभ्यास जो उसके लिए दरकार होता है, उनके पास था और उन्होंने उसका अच्छा इस्तेमाल किया.

ऐसी बात नहीं कि कुत्तों को इसकी खबर नहीं थी. खबर थी, पर वे कुत्ते थे और सामान्य फैशन के अनुसार उन्हें सिर्फ भौंकना सिखाया गया था और लगातार न काटने से उनके दाँत झड़ गए थे, यहाँ तक कि नए पैदा हुए पिल्लों के तो दाँत ही न थे, यह बात दूसरी है कि वे, जहाँ जी चाहता, टाँग उठाकर मूत देते.

एक कुत्ता, जिसे कई बार खाज हुई थी और बिना किसी दवा-इलाज के ठीक हुई थी, वह फटी-फटी आंखों, खरखराती हुई पीठ और चार गज लम्बी जबान वाला यतीम था. ‘कुत्तों से शहर को बचाओ' अभियान वाले जब उसके पास पहुँचे तो उसे पकड़ने में बड़ी परेशानी हुई. हुआ यह कि वह कहने लगा कि वह कुत्ता ही नहीं है.

जब पूछा गया कि वह क्या है तो उसने कहा कि वह आदमी है. कुत्ते के अपने आपको आदमी कहने पर कुत्ता पकड़ने वालों में यह बहस छिड़ते-छिड़ते बची कि कुत्ते का अपने आपको आदमी कहना कुत्तों के लिए अपमानजनक है या आदमियों के लिए. अगर यह बात छिड़ जाती तो इसका कोई अन्त नहीं होता. आखिरकार किसी बुद्धिमान ने सुझाया कि कुत्ते और आदमी के फरक को समझने के लिए डाक्टरी परीक्षा ही एकमात्र रास्ता है.

उसे अस्पताल ले जाने से पहले यह बहस भी हुई कि उसे जानवरों के अस्पताल ले जाएँ या आदमियों के. फिर सर्वसम्मत से तय पाया कि कोई फरक नहीं पड़ता और वे उसे अस्पताल ले गए.

डॉक्टर ने गम्भीरता से परीक्षा करने के बाद निर्णय किया कि वह न आदमी है और न कुत्ता. डाक्टर के इस निर्णय के कारण शहर को कुत्तों से बचाओ अभियान वालों ने डाक्टर के पीछे यह शक किया कि डाक्टर भी आदमी नहीं है और वे छिपकर डाक्टर की निगरानी करने लगे. आखिर एक दिन पता नहीं अपने हेलुसिनेशन के कारण या वास्तव में, उन्होंने एकांत में डाक्टर को भौंकते हुए पाया और समझ गए कि डाक्टर भी कुत्ता है. अगले दिन कुत्ते और उस कुत्ते को, जो कुछ दिन पहले डाक्टर था, ‘शहर को कुत्तों से बचाओ' अभियान वाले पकड़कर ले गए. लेकिन डाक्टर के कुत्ता साबित होने से शहर में सनसनी फैल गई. ‘शहर को कुत्तों से बचाओ' अभियान वाले सोचने लगे कि कुत्ते की पहचान, कुत्ता ही होना नहीं है.

**-**

साभार : दिल्ली पहुँचना है - कहानी संग्रह, असगर वजाहत, प्रकाशन संस्थान क्यू 22, नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110032.

चित्र - सी. सुधाकर की तैलरंग से बनी कलाकृति

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कहानी: हैप्पी न्यू ईयर'

  • संजय विद्रोही

उन दिनों ऑफिस में मदान साहब की तूती बोलती थी। मदान साहब ईस्ट इंडिया कम्पनी के फार्मूले ‘फूट डालो-राज करो' को प्रशासन का अचूक हथियार मानते थे। यह मंत्र उनके लिए बिजनेस का कायदा था और जीने का ढंग । किसको कितनी ढील देनी है और किसको कितना ‘भाव' ये वो अच्छी तरह जानते थे। रोब उनका ऐसा कि बस पूछो मत। ताड़ने और हॉंकने के मामले में पक्के ‘कांईये' और पूरे ‘फेंकू'। अनिच्छित व्यक्ति अगर काम से भी आ बैठे तो जानबूझ कर अपने आप को अन्य कार्यों में व्यस्त कर लेना और बातों के जवाब में सिर्फ ‘हॉं-हुँ' करते रहना उनकी ‘टालने की कला' थी। बेचारा आने वाला तब हार कर कहता ‘अच्छा सर मैं चलता हूँ' तो तपाक से बोल पड़ते ‘ओके ओके'। आदमी बेचारा अपना सा मुँह लेकर लौट जाता। जबकि कई दफा ‘चमचा टोली' के लोग अनावश्यक ही उनके पास ठठ्ठ लगा कर बैठे रहते और चाय समोसों का दौर चलता रहता। मदान साहब तब चमचों की बातों पर हो-हो कर के दॉंत निपोरते नहीं अघाते।

जब कभी वो राऊण्ड पर निकलते तो मानो कॉरिडोर में कर्फ्यू लग जाता। एरिया मैनेजरों को एक साथ खडे हो कर गपियाते देख लेते तो उनकी नजर चश्मे के भीतर भी टेढी हो जाती। तब वो लोग बेचारे कई दिनों तक एक साथ नहीं दिखाई पड़ते थे। और भूले से अगर दिख भी जाते तो तुरन्त अपने काम धंधे में लग जाते। मदान साहब ऑफिस के हर आदमी के बारे में ‘खुफिया जानकारियॉं' लेते रहते थे और इस काम में उनकी चमचा टोली खूब बढ चढ कर अपनी ‘डयूटी' पूरा करती थी। कई दफा तो बात में नमक मिर्च लगा कर अच्छी जायकेदार बना कर मदान साहब के सामने सुनाई जाती और अन्य ‘सहगोत्री' चमचे हॉं में हॉं मिलाकर बात पर सच्चाई की मोहर लगा देते। कई सीधे-सादे लोग इस तरह आये दिन चमचा टोली के ‘अधिकारिक वक्तव्यों' की बली चढ जाते। मदान साहब सारे तमाशे को खूब एन्जॉय करते । उनकी इस विशिष्ट कार्यशैली के परिणाम भी आफिस में नजर आने लगे। किसी को आधा टारगेट अचीव करने पर ही भारी इन्क्रीमेण्ट मिलने लगा और किसी को टारगेट से ज्यादा अचीव करने पर भी कोरा ‘वेरी गुड'। नतीजतन ऑफिस में ‘खबरचियों' की नई खेंप तैयार होने लगी। जो जितना बडा ‘खबरची' वो बॉस का उतना बडा हितैसी और उतना ज्यादा प्रिय।कहने की आवश्यकता नहीं कि उसका उतना ही भारी इन्क्रीमेण्ट। लगाई -बुझाई से दूर रहने वाले भी अब इस ‘एकस्ट्रा कैरिकुलर एक्टिविटि' में गहरी दिलचस्पी लेते दिखाई देने लगे। ऑफिस का माहौल बडा बेढब हो चला था। कौन,कब,क्या कर बैठे ?कोई नहीं जानता था। आये दिन लोग पाळा बदलते दिखने लगे।

दिसम्बर का आखिरी पखवाडा चल रहा था। सब लोग साल की आखिरी रात को अपने अपने अंदाज से सेलिब्रैट करने वाले थे। आजकल सब लोग बस इसी प्लानिंग में लगे रहते थे। जरा फुरसत पाई नहीं कि लगे हवा में किले खडे करने। कोई पत्नी के साथ तो कोई गर्लफ्रैण्ड के साथ । कोई घर में तो कोई शराबघर में ।नये साल के स्वागत को हर कोई तत्पर जान पडता था। आज भी लंच के बाद लगे मजमे में इसी टॉपिक पर डिस्कशन चल रहा था। तभी चपरासी हाथ में एक टाईप किया हुआ कागज लेकर हॉल में अवतरित हुआ। उसकी निगाहें किसी को ढूंढ रही थी। प्रजापत को देखते ही वो मुस्कुरा दिया और आगे बढकर उसके हाथ में ‘वो कागज' देकर चलता बना। सब एकसाथ प्रजापत के पास जा पहुँचे ये देखने कि आखिर चपरासी क्या देकर गया है। किन्तु ये जानकर कि मदान साहब ने दिनेश प्रजापत का ‘एक्सप्लेनेशन' कॉल किया है तुरन्त ही सब तितर बितर हो गये। ‘न्यू ईयर सेलिब्रैसन' की चर्चाऍं एकाएक फुर्र हो गई। सब अपनी अपनी टेबिल पर जाकर काम में मुँह देकर बैठ गये।

दिनेश जैसे दब्बू किन्तु काम के प्रति सीरियस रहने वाला कैसे मदान की चपेट में आ गया ?जानकर मुझे बडी हैरानी हुई। उस पर अपनी कम्पनी का ‘डाटा' दूसरी प्रतिस्पर्धी कम्पनी के साथ शेयर करने का आरोप लगाया गया था। प्रजापत ने रो-रो कर बुरा हाल कर लिया था। जिससे और कुछ नहीं मगर ये जरूर जाहिर हो रहा था कि बन्दा बेकसूर है और किसी की कच्ची ‘खबर' पर उसको बलि का बकरा बनाया जा रहा है। मैंने उसको ढाढस बॅंधाया और " चिन्ता मत कर,कोई रास्ता निकाल लेंगे।" कहकर उसको सॉंत्वना दी। उस दिन शाम को दफ्तर से हम साथ ही निकले। मैं उन दिनों कुँवारा था और जवाहरनगर में एक मकान के गैराज पोर्शन में रहता था। मालिक मकान दुबई गया हुआ था कमाने और मालकिन अपने बच्चों के साथ अकेली यहॉं रहती थी,प्रवासी भारतीय की अप्रवासी पत्नी बेचारी। मेनगेट की एक अतिरिक्त चाबी मैंने बनवा रखी थी। सो खा-पीकर रात देर से लौटने में कोई असुविधा नहीं होती थी। तिस पर मकान मालकिन से भी थोडा ‘तारतम्य' था । सो किसी किस्म की तकलीफ नहीं थी मुझको वहॉं।उ स दिन प्रजापत को मैं अपने साथ ही ले गया। वो भी इस शहर में अकेला ही था। अकेला रहेगा तो ज्यादा सोच विचार करेगा,इसी विचार से मैंने उसको अपने साथ ले लिया था।

करीब घण्टे भर की समझाईश के बाद जाकर कहीं वो नॉर्मल हो पाया था। नौ बजे के लगभग हम डिनर करने के लिए निकले। मैं अक्सर राजापार्क में ही खाना खाता हूँ। नजदीक पडता है। सो पैदल ही निकल पडे। अभी ढाबे से काफी दूर थे कि अचानक प्रजापत बोल पडा " सक्सेना आज मूड ठीक नहीं है। एक-एक पैग हो जाए तो कैसा रहे?" अँधे को क्या चाहिए? दो ऑंखें। मैं झट तैयार "नेकी और पूछ पूछ।"

अब हम खाने की बजाय पीने की जुगाड में लग गए। एक रिक्शा किया गया और शाही अंदाज में उसको निर्देश दिया गया " रोशन बार चलो।"

एक-एक पैग से चल कर दौर तीन-तीन पैग तक जा पहुंचा। प्रजापत की ऑंखें चमकने लगी और वो आत्मसम्मान से लबरेज हो उठा " वो साला समझता क्या है अपने आप को? सक्सेना तुम अगर जरा सा सहारा लगा दो तो मैं साले की एसी-तैसी कर के रख दूँ।" मैं भी कुछ कम विद्रोही नहीं हुआ जा रहा था। फौरन बोला " उठो आज उसके घर चलते हैं। वहीं साले की मॉं-बहन एक करेंगे। अपना हुलिया नहीं पहचान पाएगा साला आईने में।"

" मगर सक्सेना अगर उसने हमसे बात करने से मना कर दिया तो ?" प्रजापत ने संदेह जताया।

" कैसे मना कर देगा?कोई मजाक है? डरता क्यूँ है साले? मैं हूँ ना साथ में।"

" वो और नाराज हो गया तो?" प्रजापत अब डरने लगा था। पल भर पहले शेर की तरह दहाडने वाला प्रजापत मेमने की तरह मिमियाने लगा था।

" तू साले हिजडा है क्या? तुझ जैसे कस्सी लोगों ने ही तो उसको खुला सांड बना दिया है। वरना क्या मजाल वो चूं भी कर जाए?जानता नहीं क्या कि हमारी खून-पसीने की कमाई पर ही वो एयरकंडिशनर की हवा खा रहा है। उसको साले को क्या पता कि फिल्ड में काम कैसे होता है?" मैं पूरी तरह तरंग में था और ‘करो या मरो' का बिगुल फूंकने की ठान चुका था।

"लेकिन उसने कुछ कह दिया तो?" वो अब भी सहम रहा था।

" तू डर मत यार। मेरे साथ चल बिंदास।"

" चल ठीक है। फिर जो कुछ बोलना है तू ही बोलना। मैं तो हॉं में हॉं भर दूँगा बस।" उसने तपाक से कहा और मैंने "हो" कहते हुए हामी भर दी।मदान का घर राजापार्क से ज्यादा दूर नहीं था। बार से बाहर आ कर हमने एक रिक्शा पकडा और थोडी ही देर बाद हम बापूनगर स्थित मदान साहब के घर के सामने थे। घर के बाहर एक कॉल बेल लगी थी। किन्तु बजाए उसको बजाने के, हम लगे दरवाजे को जोरों से पीटने और पीटते ही गए जब तक कि ‘भडाक' से दरवाजा खुल नहीं गया।दरवाजे पर मिसेज मदान थी ‘बोलिए।'

"मदान साहब से मिलना था।" मैं किंचित मुँह पर हाथ रख कर बोला। कहीं शराब की बदबू ना आ जाए।

" वो तो सो गए।" मिसेज मदान ने बडा सपाट-सा उत्तर दिया।

"ठीक है" मैं भी आग्याकारी बालक की तरह वापस पलट गया। मिसेज मदान दरवाजा बंद करने लगी । ना जाने मुझे क्या हुआ मैं वापस मुडा और किंचित ऊँची आवाज में बोला " जगा दिजिए। कहिए सक्सेना आया है।" मानो सक्सेना ना हुआ, कोई पीएम हो गया। मैं झौंक में था। पीछे मुड कर देखा प्रजापत दुबका जा रहा था सहमे हुए मेमने-सा। ऑंखों से उसको घुडकाया तो वो थोडा खिसक कर आगे हो गया। पर बोला कुछ नहीं। मिसेज मदान दरवाजा खुला छोड कर अन्दर बढ गई थी और मैं घुस कर हॉल में पडे सोफे पर जा कर पसर गया। ईशारे से प्रजापत को भी बुला लिया। वो भी पॉंव समेट कर पास ही एक कुर्सी पर बैठ गया। थोडी ही देर बाद मदान साहब प्रकट हुए। मंहगा नाईट सूट पहने वो बिल्कुल फ्रैश लग रहे थे और साफ लग रहा था कि वो चाहे जो भी कर रहे हों सो तो नहीं रहे थे। हॉं आने जाने वालों के लिए टालने का बहाना अच्छा है कि ‘साहब सो रहे हैं।'

‘कहो' उन्होंने बैठते हुए पूछा। साथ में बैठे प्रजापत को देखकर वो सारी रामकथा समझ गए। घूर कर उन्होंने प्रजापत को देखा भर, वो सहम गया। उसकी टॉंगें कांप रही थी और सारा नशा हिरण हो चुका था।

‘क्या काम था इतनी रात गए?' उन्होंने फिर पूछा।

‘कुछ खास नहीं। बस यूँ ही थोडा डिस्कशन करना था। सो चले आए और क्या?' मुझे कुछ और नहीं सूझा।

‘बोलो क्या डिस्कशन करना है?'

‘यही कि ऑफिस का माहौल ठीक नहीं है' मैंने बात शुरू की।

‘क्यों ?क्या हुआ ऑफिस के माहौल को?' मदान साहब बिल्कुल नॉर्मल थे।

‘होना क्या है? आप आजकल किसी की सही बात सुनने को तैयार ही नहीं हैं। कुछ ‘स्वार्थी‘ लोगों ने आफिस को खेमेबाजी का अडडा बना रखा है। चुगलखोरों की बातों में आकर एसे निर्णय लिए जा रहे हैं, जिनसे शरीफ लोगों का जीना मुहाल हो गया है। इस प्रजापत का क्या कसूर था? जरा बताईये। मुझ में अचानक जाने कहॉं से शक्ति फूट पडी।

‘तुम नाहक ही इसकी तरफदारी कर रहे हो सक्सेना। मुझे ऑथेंटिक रिपोर्ट मिली है कि यह आदमी हमारे ‘डाटा-बेस' को दूसरी कम्पनी से शेयर कर रहा है।'

‘कौन है आपका ऑथेंटिक रिपोर्टर? वो गुप्ता जो एक एक चाय के लिए लोगों के गले पडता रहता है या वो अरोडा जो आपके पीछे से आपकी पत्नी के बारे में चटखाारे ले लेकर भददी-भददी बातें करता है। या वो सिंघल जिसकी लडकी आपके छोटू को पढाती है। किस ऑथेंटिक रिपोर्टर की बात कर रहे हैं आप?' मुझ पर ‘सुरा' पूरी तरह से हावी थी। मानो आरपार की लडाई के मूड में था।

‘मैं तुम्हें कोई एक्सप्लेनेशन देने की जरूरत नहीं समझता। किंतु मैं किसी भी केस को ऊपर रिकमण्ड करने से पहले खुद तसल्ली कर लेता हूँ ,तभी कोई एक्शन लेता हूँ। समझे?'

‘आप जानते हैं ,लोग आपकी कम्पनी में काम करना नहीं चाहते।'

‘कौन कहता है?'

‘कौन नहीं कहता ये पूछिए?' सुनकर मदान साहब सकपका गए।

‘आप जितनी तनख्वाह देते हैं ना ,उतने का तो अलाऊन्स उठा लेते हैं अन्य कम्पनियों वाले। चुगलखोरी के माहौल में कोई कैसे रह पाएगा तब?एसे में आपके यहॉं नौकरी करना घटी दरों पर बेगार करना नहीं तो और क्या हुआ? बताईये।' मैं घोडे पर सवार था फुल और आज ‘सम्पूर्ण स्वराज' की घोषणा करने पर आमादा था। प्रजापत जस का तस बुत बना बैठा था। मानो काठ मर गया हो।

‘तुम चाहते क्या हो? स्पष्ट बताओ।' मदान बोला। मदान साहब का ‘साहब' भी दारू की भेंट चढ़ गया।

‘प्रजापत के खिलाफ जो आरोप पत्र आपने निकाला है, उसको आप वापस लें बस।'

‘नहीं तो?'

‘नहीं तो मैं, नहीं हम दोनों नौकरी छोड देंगे। कल अपनी मेज पर हमारा रेजिगनेशन देख लेना। लात मारते हैं एसी नौकरी को जहॉं आत्मसम्मान चमचागिरी का मुखापेक्षी हो।' कहते हुए मैंने जेब से रजनीगंधा का जिपर-पाऊच निकाला और दो तीन चम्मच एक साथ फॉंक गया। मेरी बात सुनकर मदान लाल पीला नहीं हुआ जैसा वो अक्सर हो जाता है। वो शांत बना रहा और मेरी तरफ मुस्कुराकर देखते हुए बोला ‘तुम एक काबिल प्रोफेशनल हो सक्सेना। किसी बात की तह में जाए बगैर सिर्फ भावनाओं में बह कर फटे में पॉंव घुसा देना तुमको शोभा नहीं देता। तुम्हें असल बात मालूम नहीं है अभी।'

‘मालूम नहीं है तो आप बता दीजिए ना।' मैं पूरे जोश में था और आज प्रजापत को न्याय दिलाकर उठने की ठान कर आया था।

‘जोशी को तो तुम जानते ही हो। उसकी आजकल कम्पनी की पब्लिक रिलेशन ऑफिसर दीपाली बरूआ के साथ कुछ ज्यादा ही देखादेखी चल रही है। दोनों घण्टों ऑफिस में बतियाते हैं। प्रेमालाप में लीन रहते हैं।'

‘तो इसमें इस गरीब का क्या लेनादेना?' मैं बीच ही में बोल पडा।

‘सुनो तो।दफ्तर में उनका जी नहीं भरता तो वे लोग शहर में मिलते हैं। और शहर में मोज-मस्ती करने के लिए ये आपके मित्र महानुभाव उन्हें अपना आवास उपलब्ध कराते हैं। बदले में जोशी इनकी मिटिंग दूसरी कम्पनी के मैनेजर से कराता है। क्या है ये सब? बताओ।' मदान एकाएक ऊँची आवाज में बोलने लगा। सुनकर प्रजापत तो पत्ते की तरह कॉंपने लगा।लेकिन मैंने तुरन्त प्रतिवाद किया ‘किसी के घर आना-जाना कोई जुर्म तो नहीं है। आप भी अपने कलिग्स के घर आते-जाते होंगे। लोग भी आप के घर आते-जाते होंगे। इस मामले में आपकी दखलंदाजी बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त होगी। तब किस तरह प्रजापत दोषी हुआ। बताऍं।रही बात उनके बीच चल रही देखादेखी की। सो उसमें ना आप कुछ कर सकते हैं ना मैं। जोशी और दीपाली बच्चे तो हैं नहीं कि उनको कुछ कहा जाए। वैसे भी प्यार करना कोई जुर्म तो है नहीं हमारे मुल्क में। उन्हें अपना निजी जीवन अपनी मरजी से जीने का पूरा हक है। हॉं,दूसरी कम्पनी वाली बात अवश्य ही विचारणीय है। किन्तु वो आपके लिए भी विचारणीय है। आप क्यों नहीं आत्म निरीक्षण करते कि क्या वजह है कि जो प्रजापत जैसा दब्बू आदमी भी ‘स्विच ओवर' करने कि सोच रहा है और दूसरी कम्पनी के मैनेजर से मीटिंग कर रहा है?' मैं आज पूरा प्रवचन झाडने के मूड में था।

‘अच्छा चलो तुम्हारी बात मान लेता हूँ। तो क्या तुम दोनों मेरी एक बात मानोगे।'मदान ने मुस्कुराते हुए पल्टी मारी।

‘क्या?' हम दोनों के मुँह से एक साथ बेसाख्ता निकला। इतनी देर में पहली बार प्रजापत के मुँह से बोल फूटा था।

‘मैनेजमेण्ट जोशी के काम से कुछ खास खुश नहीं है ,तुम तो जानते ही हो।काम में उसकी दिलचस्पी जरा भी नहीं है। इश्कमिजाजी जरा ज्यादा है। अगर तुम दोनों उसके खिलाफ एक बढिया सी कम्पलेण्ट लिख कर मुझे दे दो तो मैं तुम्हारा साथ दूँगा। बदले में प्रजापत का एकसप्लेनेशन वापस हो जाएगा और तुम्हारा इंक्रिमेण्ट। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट।' मदान ने आखिर अपने पत्ते मेरे सामने खोल ही दिए।

‘हम एसा गिरा हुआ काम नहीं कर सकते। क्यों करें ?जाति तौर पर हमको उनसे क्या तकलीफ है?कम से कम मुझको तो नहीं. और इस प्रजापत को भी क्या हो सकती है? क्यों बे?' मैं तैश खा गया। प्रजापत काठ के उल्लू की तरह जस का तस खडा था।

‘तब फिर यहॉं क्यों खडे हो?' मदान ने साफ शब्दों में हम पर अपनी मंशा जता दी थी। मतलब साफ था कि या तो उसका साथ दो नहीं तो भुगतो। सुनकर प्रजापत के तो माथे पर पसीना चमकने लगा। मैं एक झटके के साथ खडा हो गया और ‘मदान साहब नमस्ते। जिन्दा रहे तो मिलेंगे' कहकर चल पडा। प्रजापत मेरे पीछे पीछे।

दूसरे दिन, मैं अपने केबिन में बैठा अभी गई रात की घटना के बारे में ही सोच रहा था कि तभी पिऊन आया और ‘मदान साहब बुला रहे हैं।' कहकर चलता बना। सुनकर अपन तो कल की घटना को याद करके मारे आशंका के एक बार तो घबरा गए। लेकिन फिर सोचा देखा जाएगा । चलो।

मदान साहब ने मेरे आते ही चपरासी को बुला कर चाय का आर्डर दे दिया और साथ में कुछ बिस्कुट नमकीन ले आने की भी ताकीद की। चपरासी भी आज आश्चर्यचकित था। मदान के चेहरे की मुस्कुराहट को देखकर मुझे नहीं लगता था कि वो कल रात की बात को ‘डिस्कस' करना चाहता है। फिर मुझे क्यों बुलाया है सुबहा सुबह बग्रै किसी कारण के? मैं अजीब पशोपेश में था। आखिर मैंने ही पूछ डाला ‘जी सरा। कहिए।'

‘कहना क्या है भई? हमसे तो अकेले अब ये आफिस सम्हलता नहीं है। क्या क्या देखें हम? हम चाहते हैं कि तुम कुछ हमारी मदद करो। आफिस की कुछ रिस्पांसिबिलिटी तुम से शेयर करना चाहते हैं। आफ्टर ऑल यू आर ए डिजर्विंग कैण्डडेट एण्ड सीनियर पर्सन।' वो कुटिलता से मुस्कुरा रहा था।

‘आदेश करें सर।' मैं अतिरिक्त विनम्र था । ना जाने क्यों?

‘आदेश नहीं सक्सेना। तुम इतने सीनियर हो तुमसे तो मैं रिक्वेस्ट ही कर सकता हूँ।ऊपर वालों ने कुछ कम्पीटेण्ट आफिसर्स के नाम मॉंगे हैं मुझसे । जिन्हें असिस्टेण्ट मैनेजर के प्रमोशन के लिए कन्सिडर किया जा सके। सिनियेरिटी के हिसाब से तो दो तीन लोग हैं आफिस में। किन्तु मेरे जेहन में सिर्फ तुम्हारा ही नाम है। क्योंकि तुम ‘डिजर्विंग' तो हो ही ‘कम्पीटेण्ट' भी हो। लोग तुम्हारी बात मानते हैं और स्टाफ तुम्हारी ईज्ज्त करता है। तुम्हारे एक ईशारे पर काम होता है ,ये मैं जानता हूँ। आफिस भर में तुमसा कोई ओर नजर नहीं आता मुझको।' उसने बडी कुटिलता से मुस्कुराते हुए बुलाने का म्तांव्य साफ किया। चाय बिस्कुट आ चुके थे।

‘जी मुझे क्या करना होगा?'मैंने चाय की घूँट भरते हुए पूछा।

‘करना कुछ नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में एक अडचन आ रही है, बस।'

‘क्या?'

‘जोशी। वो भी इस प्रमोशन का दावेदार है। उसका अनुभव तुमसे दो साल ज्यादा है।जिस कारण टॉप मैनेजमेण्ट जोशी के लिए ज्यादा ‘कीन' है। पर मैं जानता हूँ कि वो कितना निकम्मा है। सिर्फ सर्विस पीरियड बढ जाने से कोई ज्यादा काबिल थोडे ही हो जाता है। तिस पर मैं ये भी जानता हूँ कि प्रमोशन की तुमको ज्यादा जरूरत है। तुम्हें अपनी बहन की शादी करनी है तुम्हारा छोटा भाई मथुरा में इंजिनियरिंग की पढाई कर रहा है गॉंव में तुम्हारे बूढ़े मॉं बाप भी हैं। और फिर तुमको अपने बारे में भी तो सोचना है ,शादी ब्याह करना है कि नहीं ? या जिन्दगी भर ‘अप्रवासी मकान मालकिन' का किरायेदार बने रहना है? बोलो। इसलिए मैं पर्सनली तुम्हें प्रमोट कराना चाहता हूँ। यू नो मेरी रिकमण्डेशन पर ही सब डिपेण्ड करेगा।' मदान अपने असली चोले में आता जा रहा था। उसकी मुस्कुराहट से कमीनगी साफ झलक रही थी।

‘लेकिन¼' मैं रात की बात को अभी भूला नहीं था।

‘लेकिन वेकिन क्या? मुझे पता है तुम दिल के बहुत साफ हो। कल रात भी तुमने जो कुछ किया वो प्रजापत की मदद करने के लिहाज से ही किया था। इसलिए मैंने उस सब का कुछ बुरा नहीं माना। वरना किसी की क्या मजाल कि मदान के सामने इतने ऊँचे सुर में बोल जाए? नौकरी से हाथ धोना पड़ जाए सो अलग। चक्की और पिसवा दूँ,दो मिनट में।' मुस्कुराते हुए उसने मेरे सम्मुख अपनी सामर्थ्य का और मेरी विवशता का एक ही झटके में खुलासा कर दिया था। वाकई वो बडा घाघ था, आज मैं साफ देख रहा था। मैं चुप ही रहा। कुछ बोला नहीं।

‘जी मुझे क्या करना होगा?' मैंने कुछ देर बाद पुन: दोहराया।

‘कुछ नहीं। बस जोशी के खिलाफ एक बढिया-सी कम्पलेण्ट तैयार कर के उस पर दस-बीस लोगों के साईन करवा दो। बाकी सब मैं देख लूँगा। क्या है कि सब लोगों पर तुम्हारा बडा दबदबा है। लोग तुम्हें मना नहीं करेंगे। मैं उसी कागज पर अपना कमेण्ट लिखकर हैड ऑफिस भेज दूँगा। उसके बाद तुम्हारे प्रमोशन में कोई रोडा नहीं रहेगा।' उसने मेरी तरफ ऑंख मिचकाते हुए कुटिलता से फुसफुसाया।

‘सर,एक तरफ आप मुझे ‘डिजर्विंग' और ‘कम्पीटेण्ट' कहते हैं और दूसरी तरफ मुझसे ऐसा कार्य करने को कहते हैं। मैंने कल रात ही आपको मना कर दिया था कि मुझसे ऐसा नहीं हो सकेगा। जोशी जी ने मेरा क्या बिगाडा है? बल्कि जब मैं इस शहर में नया नया आया था तब उन्होंने मेरी मदद ही की थी। उस मदद का बदला मैं इस तरह दूँगा। ऐसा आपको क्यों लगता है? मैं ऐसा कतई नहीं कर पाऊँगा।'मैंने किंचित रोष के साथ कहा।

‘देखो मदद-वदद तो कोई भी कर सकता है,प्रमोशन कोई भी थोडे ही दिला सकता है। और फिर तुम ये क्यों भूलते हो कि हम खुद तुमको इस काम के लिए कह रहे है। मदान खुद। सोचो जरा।' उसने कुटिलता से फिर ऑंख दबा दी।

‘सॉरी सर। आपने गलत आदमी को चुना है, बस। मैं इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकता। चलता हूँ।' मैं कहता हुआ उठने लगा।

‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।' वो बुरी तरह तिलमिला उठा। क्रोध के मारे उसका चेहरा तमतमा गया। मैं बगैर कुछ बोले केबिन से बाहर निकल गया।

आ के सीट पर बैठा ही था कि प्रजापत पास आ बैठा ‘क्या कह रहा था ?'

‘कुछ नहीं । वही ,जोशी का रोना रो रहा था।' मैंने छोटा-सा जवाब दिया। इतने में ही पिऊन फिर से मेरी टेबिल के सामने आ खडा हुआ। ‘क्या है?' मैंने जोर से पूछा।

‘परजापत जी, साब बुला रहे हैं।' उसने जरा हिकारत से बिना मेरी ओर देखे प्रजापत से कहा। प्रजापत सिर पर पैर रख कर भागा। मूड ऑफ था। सो मैं उस दिन हॉफ-डे लेकर घर चला आया।

प्रजापत आजकल खुश रहने लगा था। उसने मदान से माफी मॉंग ली थी और भविष्य में अनुशासन में रहने का भरोसा भी दिलाया था। उसका ‘एक्सप्लेनेशन' भी कैंसिल हो गया था। मदान की मण्डली में भी वो अक्सर बैठा दिखाई देने लगा था। प्रजापत को खुश देखकर मैं भी मन ही मन खुश था कि चलो एक शरीफ आदमी ‘झमेले' में पडने से बच गया।

फिर एक दिन आफिस में घुसते ही प्रजापत ने मिठाई का डब्बा सामने कर दिया। मैंने प्रश्निल भाव से पूछा ‘किस खुशी में? '

वो तपाक से बोला ‘हैप्पी न्यू ईयर।'

‘सेम टू यू।' अचानक मुझे याद आया कि आज तो नया साल है।

‘एक पीस और ले सक्सेना।' प्रजापत ने पुन: डब्बा मेरी और बढाते हुए कहा।

‘बस यार।'

‘ले तो सही।' इस बार उसकी आवाज में मनुहार थी।

‘आखिर बात क्या है? बडा खुश दिखाई दे रहा है आज।' मैंने दूसरा पीस उठाते हुए पूछा।

‘प्रमोशन हो गया अपना' वो तपाक से बोला और मुस्कुराता हुआ आगे बढ गया।

अचानक मदान के कहे अन्तिम वाक्य कान में गूंज उठे ‘सक्सेना ! ये काम तुम नहीं करोगे तो कोई और करेगा। मदान एक बार जो ठान लेता है वो कर के मानता है।'


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तृतीय प्रकृति के द्वँद


-आलेख : डॉ. सुनील दीपक

हाल ही में 800 मीटर की दौड़ में पदक जीत कर "स्त्री नहीं पुरुष" होने के आरोप में उसे खोने वाली सुश्री शाँती सौंदराजन के हादसे ने अंतरलैगिक जीवन से जुड़ी हुई बहुत सी मानव अधिकार समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है. जिस तरह से यह बात समाचार पत्रों तथा टेलीविजन पर प्रस्तुत की गयी, उनमें मानव अधिकारों की उपेक्षा भी थी और सहज सँवेदना की कमी भी. साथ ही यह भी स्पष्ट था कि अँतरलैंगिक (transgender) विषय पर आम जानकारी कितनी कम है.

जबकि समलैंगिक (homosexual) और द्वीलैंगिक (bisexual) विषयों पर पिछले कुछ वर्षों में कुछ बहस और विमर्श हुआ है, अँतरलैंगिक विषय पर बात अधिक आगे नहीं बढ़ी है. अँतरलैंगिक शब्द का प्रयोग विभिन्न परिस्थितियों में किया जाता है जैसे किः
  • जब व्यक्ति का शारीरिक लिंग उसके मानसिक लिंग से भिन्न हो, जैसे कि स्त्री शरीर हो कर भीतर से पुरुष महसूस करना या पुरुष शरीर में अंदर से स्वयं को स्त्री महसूस करना.
  • जब यौन अंग ठीक से न बने हों जिससे यह कहना कठिन हो कि व्यक्ति पुरुष है या स्त्री

इनसे मिलती जुलती एक अन्य परिस्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने से विभिन्न लिंग के वस्त्र धारण करना चाहते हैं लेकिन वह अपने लिंग को नहीं बदलना चाहते (transvestites or cross-dressers).

अपने अंतर में अपने आप को स्त्री या पुरुष महसूस करना (sexual identity) और अपने यौन जीवन के लिए स्त्री या पुरुष का साथ चाहना (sexual orientation), यह दो अलग अलग बातें हैं जिनके बारे में अक्सर लोग ठीक से नहीं समझते हैं और इन सब लोगों को समलैंगिक समझते हैं, जोकि सही नहीं है. अगर आप के शारीरिक और मानसिक लिंग भिन्न हों तो आज विकसित देशों में, शल्य चिकित्सा के द्वारा लिंग बदलना सँभव है. इसकी वजह से लिँग और यौन सम्बंधों के बहुत से विभिन्न गुट बन सकते हैं, जिनकी अपनी विभिन्न कठिनाईयाँ होती हैं.

बोलोनिया में मेरी जान पहचान के एक व्यक्ति शादीशुदा हैं, अपनी पत्नी से बहुत प्यार करते हैं पर साथ ही मन ही मन में वह अपने आप को स्त्री देखते हैं. कुछ समय से वह होरमोन से इलाज करवा रहे हैं ताकि उनके शरीर में पुरुष भाव कम हों और स्त्री भाव तीव्र हों. वह अपने मित्रों के बीच स्त्री पौशाक पहनते हैं और मन में साहस जुटा रहे हैं कि घर से बाहर भी स्त्री रुप में रह सकें. उनकी आशा है कि एक दिन भविष्य में वह शल्य चिकित्सा से शारीरिक रुप में भी स्त्री बन जायेंगे. जहाँ काम करते हें वहाँ अभी यह बात उन्होंने नहीं बताई है पर कभी न कभी, उन्हें वहाँ भी अपना भेद खोलने की हिम्मत करनी पड़ेगी. दुनिया के लिए वह साधारण विषमलैंगिक व्यक्ति हैं पर अपने मन में समलैंगिक, लैसबियन. यह सब कितनी कठिनाईयों से जुड़ा है उसका अंदाज लगाना कठिन है और वह मनोयोग चिकित्सक से इलाज भी करवा रहे हैं ताकि अपने स्त्री होने या पुरुष होने के मानसिक द्वंद को समझ सकें. उनकी बेटी उनसे बात नहीं करती पर उनकी खुशकिस्मती हैं कि इस कठिनाई में उनकी पत्नी और उनकी वृद्ध माँ, उनके साथ हैं.

मानव अधिकारों की दृष्टि से देखें तो हर व्यक्ति को अपने बारे में यह निर्धारित करना का हक है कि वह क्या चाहता है, स्त्री होना या पुरुष होना. इतालवी कानून इस बात की अनुमति देता है कि लिंग बदलाव के बाद, वह कानूनी तौर से स्त्री बन सकते हें और अपना नाम आदि बदल सकते हैं.

जब यौन अँग ठीक से न बने हों तब भी, यह व्यक्तिगत निर्णय पर निर्भर करता है कि उस व्यक्ति को पुरुष माना जाये या स्त्री. पर क्योंकि यह निर्णय अक्सर बचपन में बच्चे के माँ बाप द्वारा लिया जाता है, जैसा कि शाँती सौदराजन के साथ हुआ, तब बड़े हो कर उन व्यक्तियों को यह छूट मिलनी चाहिये कि वह स्वेछा से अपना सामाजिक लिंग निर्धारित कर सकें. इससे सभी कठिनाईयाँ तो नहीं मिटती पर कुछ आसानी होती है.

भारत में इन सब व्यकितयों को जिनका लिंग स्पष्ट न हो "हिँजड़ा" श्रेणी में रखा जाता है पर असलियत में विभिन्न शौध कार्यों नें दिखाया है कि "हिँजड़ा" कहे जाने वाले बहुत से लोग समलैंगिक पुरुष होते हैं. वात्सयायन के "काम शास्त्र" में "तृतीय प्रकृति" की बात की गयी है जिसका अर्थ अधिकतर समलैंगिक पुरुषों से जुड़ा है पर वैचारिक दृष्टि से यह शब्द अंतरलैंगिक की तरह हैं जिसकी अधिक खुली परीभाषा हो सकती है जिसमें विभिन्न परिस्थितियों वाले लोग अपनी पहचान खोज सकते हैं.

हिंदू धार्मिक ग्रँथों में इन सब विषयों पर विभिन्न देवी देवताओं के माध्यम से सामाजिक स्वीकृति दी गयी थी, जिसे आज बहुत से लोग भूल चुके हैं. कैल्ब, नपुसँक और सँधा जैसे शब्द इन विषयों को भिन्न तरीकों से छूते हैं. शिव के रूद्र रुप और अर्धनारीश्वर रुपों में अंतरलैंगिक जीवन की स्वीकृति है तो पुराणों और महाभारत में अर्जुन अंतरलैंगिकता को व्यक्त करते हैं. महाभारत के योद्धा अर्जुन, पद्म पुराण में झील में स्नान के बाद अर्जुनी बन जाते हैं और कृष्ण से संसर्ग करते हैं. महाभारत में इंद्र के श्राप से विराट नगर में अर्जुन का एक वर्ष के लिए स्त्री वस्त्र धारण करने वाला पुरुष बुहनाला बन कर रहना इसकी एक और परिस्थिति पर्स्तुत करता है. दक्षिण भारत में भगवान अयप्पा, जिन्हें मणीकँठ भी कहते हैं और जिनकी पूजा सबरीमाला में होती है, की कहानी भी अंतरलैंगकिता दर्शाती है. ब्रह्माँड पुराण के अनुसार विष्णु के मोहिनी के रुप में, शिव के वीर्य से अयप्पा का जन्म होता है और यौद्धा अयप्पा प्रतिज्ञा करते हें कि जब तक पुरुष भक्त उनके मंदिर में पूजा करने आते रहेंगे वह शादी नहीं करेंगे.

आज विकसित पश्चिमी देशों को अंतरलैंगिक व्यक्तियों के मानव अधकारों के बारे में जागरूक समझा जाता है और विकासशील देशों को इस दिशा में पिछड़ा हुआ कहते हैं. पर मेरे विचार में भारतीय धर्म ग्रँथों में इस विषय पर गहरी समझ भी थी और सामाजिक स्वीकृति भी जिसे विकटोरियन मानसिकता ने भुला दिया है और जिसकी खोज की आवश्यकता है.

साभार : जो कह न सके

रचनाकार - डॉ. सुनील दीपक मेडिकल प्रेक्टिशनर हैं तथा डब्यूएचओ / यूएनओ जैसी संस्थाओं से सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं.

व्यंग्य

नेता

- शौकत थानवी

डॉक्टर अंसारी के व्याख्यान का सबसे अधिक प्रभाव भाई मकसूद पर हुआ कि हम लोग हाय-हाय करते रह गए और वह तीर की तरह मंच पर पहुँचकर टोपी, शेरवानी, कुर्ता आधि उतार-उतार कर फेंकने लगे और एक खद्दर की धोती बांधकर पाजामा फी तुरंत उतारकर फेंक दिया, क्योंकि वह भी विदेशी कपड़े का बना हुआ था. इसके पश्चात् उन्होंने एक विशेष भाव के कारण बड़ा प्रभावशाली लेक्चर दिया था जिसका केवल यह अंश हमको अब भी स्मरण है:

‘मैं केवल कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए एक आदर्श बना हूँ. वह मुझको देखकर शिक्षा ग्रहण करें और स्वदेशी की उन्नति में अपने कर्तव्यों पर विचार करें.'

अब हर समय भाई मकसूद खद्दर प्रचार करते. विशेष रूप से हमसे नाराज थे कि उनके बार-बार कहने के पश्चात् भी हम खद्दर नहीं पहनते थे. कुछ भी हो किंतु वह अब एक राष्ट्रीय मनुष्य बन गए थे और हमारे अनुमति के अनुसार तो उन्हें कांग्रेस का सभापति होना चाहिए था और वास्तव में यह उनका बलिदान था कि वह अपने होते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉक्टर अंसारी और श्रीमती सरोजनी नायडू आदि को सभापति होता हुआ देखते थे और चुप थे.

उनकी इस राष्ट्रीय-निमग्नता की यह दशा थी कि सवेरे आँख खुलते ही इन्कलाब जिंदाबाद का नारा लगाते थे और आवश्यकताओं से निपटने के पश्चात् तुरंत ही चर्खा लेकर बैठ जाते थे और इस स्वदेशी तपस्या में दोपहर कर देते थे. फिर कॉलेज जाते थे और वहाँ पढ़ने के स्थान पर स्वदेशी प्रचार करते थे.

एक दिन जब हम पुस्तक लेकर बैठे तो उन्होंने चर्खा चलाते हुए कहा, ‘क्या पढ़ रहे हो?'

हमने कहा, ‘हाँ, फिर'

विषैली हँसी के साथ कहा, ‘कुछ नहीं, किंतु मैं यह पूछता हूँ कि इस व्यर्थ शिक्षा का क्या फल हुआ?'

मैं इस सागर की भांति विशाल विवाद के विषय को गागर में भरकर कहा, ‘परीक्षा का समय निकट है.'

कहने लगे, ‘मान लिया कि आप परीक्षा में सफल भी हो गए तो क्या कीजिएगा.'

मैंने कहा, ‘डिप्टी कलेक्टरी और इसके पश्चात् अपने न्यायालय में तुमको फौजदारी के अपराध में छः मास की कड़ी सज़ा और सौ रुपया दंड अथवा सौ रुपए न देने के रूप में तीन महीने की और अधिक जेल करूंगा.'

कहने लगे, ‘तुमको अपने इन शब्दों पर लज्जा से डूब मरना चाहिए तथा मुझको गर्व करना चाहिए कि मैं अपनी जननी की सेवा में जेल जाऊंगा तथा देश एवं राष्ट्र के लिए दुःख सहूंगा.'

मैंने कहा, ‘तो मेरी समझ में नहीं आता कि आप कॉलेज में क्यों समय नष्ट कर रहे हैं. गांधी जी के आश्रम जाकर चर्खा चलाइए अन्यथा ताड़ी की दुकान पर धरना देकर जेल जाइए ठाठ के साथ.'

कहने लगे, ‘सच कहते हो पर मैं अपने माता-पिता को अभी तक नहीं मना सका हूँ और विश्वास रखो कि जिस दिन उनको समझाने में सफल हो गया उसी दिन मैदान में आकर तुमको दिखा दूंगा कि स्वतंत्रता के प्रेमी दुःखों को खेल समझते हैं.'

मैंने विनती करते हुए कहा, ‘तो कम-से-कम उस समय तक तो मुझको भी स्वतंत्रता से पढ़ लेने दो. मेरे माता पिता तो मुझको घर से निकाल देंगे.'

कहने लगे, ‘नहीं तो तुमको पढ़ने से नहीं रोकता.'

यह कहकर वह चरखा चलाने में लगे और मैंने पढ़ना प्रारंभ किया. अभी एक पृष्ठ भी न पढ़ा होगा कि आपने गाना प्रारंभ कर दिया-

चर्खा कातो तो बेड़ा पार

हां गोइयाँ ... चर्खा'

मैंने पुस्तक तो उठाकर एक ओर फेंक दी और यह सोचकर कि अभी दूसरे कमरे में रहने का प्रबंध करूंगा स्वयं बाहर निकल आया. सारे विद्यार्थी पुस्तकें चाटने में लगे हुए थे और मैं था कि शरण ढूंढता हुआ इधर-उधर मारा-मारा फिर रहा था. ऐसा बहुमूल्य समय और मैं... जी करता था कि इसको गोली मारकर फांसी पर चढ़ जाउँ. हमें कौन अपने कमरे में जगह देता और कौन भाई मकसूद के संग रहने पर राज़ी होता.

सारांश यह कि हमें जगह न मिली किंतु शाहिद ने केवल इतना ही कहा कि वह भाई मकसूद को समझाएंगे पर समझाने गए तो स्वयं विपत्ति में घिर गए. उन्होंने कहा-

‘यह क्या बेहूदगी है.'

उत्तर में भाई मकसूद ने अपनी प्रारंभ कर दी, ‘यह तो सब कुछ बेहूदगी है किंतु आपको लज्जा आनी चाहिए. आप विलायती कपड़ा पहन कर अपने देश को दासता की शृंखला में जकड़ रहे हैं.'

शाहिद ने कहा, ‘भाई मैं तो विलायती नहीं, देशी कपड़ा पहने हूँ'

कहने लगे, ‘यह कुछ नहीं, हाथ का कता और हाथ का बुना हुआ कपड़ा होना चाहिए.' शाहिद के मुँह से निकल गया, ‘यह तुम्हारा कट्टरपन है.'

इसके उत्तर में भाई मकसूद ने वह धुँआधार लेक्चर दिया कि आस-पास के कमरों से सारे लड़के निकलकर हमारे कमरे में इकट्ठे हो गए और उनको देखकर भाई मकसूद ने और भी भावपूर्ण लेक्चर दिया. सबको यह तय करना पडा कि आज ही दोपहर के पश्चात् छात्रावास में एक सभा की जाए जिसमें भाई मकसूद स्वदेशी के प्रचार पर व्याख्यान दें. कुछ हिचर-मिचर करने के पश्चात् भाई मकसूद भी इस पर तैयार हो गए.

निश्चित समय पर जब सारे लड़के जमा हो गए तो भाई मकसूद को बुलाया गया जो अपने मोटे से खद्दर के कपड़ों में चप्पलें पहने हुए श्रीमान् या नेता बल्कि महात्मा बने हुए पहुँचे और सबने खड़े होकर ‘मौलाना मकसूद जिंदाबाद', ‘महात्मा मकसूद की जय', ‘वंदेमातरम्', ‘इंकलाब जिंदाबाद', ‘टूडी बच्चा हाय हाय' के गगनभेदी नारों से आपका स्वागत किया और सबको प्रणाम करते हुए मंच पर पहुँच गए. मुझे सभापति बनाया गया भाई मकसूद को तथा मुझे मकसूद ने एक हार पहनाया और फिर नारे लगाए गए. जब लोग कुछ शांत हुए तो आपने गला साफ करके कहा:

श्रीमान् सभापति एवं प्रिय मित्रो!

इससे पहले कि मैं स्वदेशी के विषय पर कहूँ, मुझको आपको धन्यवाद देना चाहिए कि आपने मुझ जैसे अयोग्य मनुष्य का यह आदर किया. मुझे आशा है कि आपके भीतर वह स्पिरिट जल्दी ही उत्पन्न हो जाएगी जो आपको राष्ट्र तथा देख के लिए उपयोगी बना सके और आप देश की सेवा के लिए मैदान में आएंगे. रह गया मैं, तो मेरा तो लक्ष्य यही है:

शोल-ए-आह से एक आग लगाना है मुझे

खुद भी जलता हूँ कफस को भी जलाना है मुझे.

किंतु मैं आप लोगों से भी यही कहता हूँ कि:

खेतों को दे लो पानी अब बह रही है गंगा

कुछ कर लो नौजवानो, उठती जवानियां हैं.

आप नवयुवक हैं. देश का भविष्य आपके हाथ में है. आप ही देश को दासता की शृंखला से छुड़ाएंगे. मैं जानता हूँ कि आप विद्यार्थी हैं अतः मैं यह नहीं चाहता कि आप नमक बनाएँ, जेल चले जाएँ. मैं चाहता हूँ कि आप विदेशी वस्तुओं को त्याग दें. और उनके स्थान पर स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करें और इस प्रकार अपने देशी उद्योग धंधों को उन्नति दें.

दर्शक दीर्घा में से एक चिल्लाया - ‘किंतु क्या आप जानते हैं कि यदि आप विलायती कपड़ा न पहने तो आपको ज्ञान है क्या हो, विलायती कारखाने टूट जाए, विलायती मजदूर जो हमारे विश्व कुटुम्ब के भाई हैं, मर जाएँ, इंगलैंड में प्रलय मच जाए, सरकार भूखों मर जाए, पार्लियामेंट के मेंबर कौड़ी-कौड़ी मांगते फिरें और न जाने क्या-क्या हो जाए...'

इसी बीच में होस्टल के वार्डन साहब ने आकर सारा मजा किरकिरा कर दिया. न जाने क्या होता वह तो वार्डन साहब कुछ समझ ही न सके.

हमारे विचारानुसार अब इसके बताने की आवश्यकता ही नहीं कि भाई मकसूद परीक्षा में बैठकर फेल हुए और हमको अपने ऊपर अचंभा है कि क्योंकर प्रमोशन कर सके. भाई मकसूद ने अपनी शिक्षा चर्खे की भेंट चढ़ा दी और निष्ठुर आकाश ने उनको हमसे छीन कर छुड़ा दिया:

खाक ऐसी जिंदगी पर हम कहीं और तुम कहीं'

(कुछ अरसे बाद की खबर : भाई मकसूद कबीना मंत्री हो गए हैं और हम उनके प्रोटोकॉल अफसर यानी कि उनके आने जाने का हिसाब रखने वाले सरकारी सेवक डिपुटी कलेक्टर हैं.)

साभार: श्रीमती जी, व्यंग्य संकलन, लेखक शौकत थानवी, जनवाणी प्रकाशन, 30/22 ए, गली नं 9, विश्वास नगर शाहदरा दिल्ली 110032.

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