रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

February 2007
 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari


- ऋषि शर्मा


कल्लो शीर्षक पढ़कर पाठक शायद एक बार को चौंकें। मगर यह निश्चित है कि कहानी का केन्द्रीय पात्र कल्लो ही है। तीनों लोक से न्यारी कान्हा की नगरी मथुरा, जहॉ कृष्ण को भी कनुआ, कलुआ आदि शब्दों से पुकारा जाता है तथा जहां के गांवों मे धूपों, बूची, दम्मो, गेंदा, सत्तों जैसे नाम प्राय: सुनने को मिलते है। कल्लो का नामकरण भी उसकी दादी ने ही किया था , क्योंकि परिवार में शायद सबसे अधिक श्यामवर्ण उसका ही था । अब पंडित तो नामकरण बाद में करता, मगर दादी ने तो उसे पहली नजर में देखते ही कल्लो नाम से नवाजा।

नववर्ष अपनी दस्तक दे चुका था । आज शर्मा जी के घर में कुछ विशेष ही चहल -पहल थी, कल्लों भी हमेशा की तरह आज भी सूर्य- नमस्कार करने छत पर पहुँची, तभी मेरी नजर उस पर पड़ी। उसकी छोटी बहन ने पीछे से आकर उसे अपने आगोश में ले लिया और बोली -' दीदी, सूर्यदेव ने तुम्हारा शायद सुन ली है और आज यह मीठी खबर मैं बिना मुँह मीठा किए नहीं बताने वाली।' छुटकी को अचानक अपने पीछे देख कल्लो जिसका वास्तविक नाम रजनी है कुछ सकपका गई और इसी हड़बड़ाहट में वह नीचे की ओर भागी। तभी मुझे कुछ गिरने की आवाज सुनाई दी और पंडिताइन का स्वर भी सुनाई पड़ा, कहॉ भागी जा रही है, बड़ी मुश्किल से तो एक बाल्टी भर पाई थी वह भी लुढ़का दी । न जाने कब अक्ल आएगी इस कल्लो को ।

बाल्टी की आवाज सुन छुटकी भी नीचे आ गई थी, बाल्टी से बिखरा पानी देख वह भी सकपका गई थी और फिर उसके मन में एक आशंका जाग उठी कि कहीं इस वर्ष भी तो मेरी दीदी के सपने इस पानी की तरह कही बिखर तो न जाएंगे ।

अपने माता-पिता की ज्येष्ठ पुत्री होने के कारण रजनी को कुछ अधिक ही स्नेह प्राप्त हुआ था, खासकर अपने पापा की दुलारी थी । जब कभी अपनी दादी के कल्लो संबोधन से वह खीज जाती थी तो उसके पापा ही उसे यह कहकर सांत्वना देते थे कि दादी की बात का बुरा नहीं मानते अगर वह तुझे कल्लो कहती है तो मुझे भी तो कलुआ कहती है । रजनी बचपन से ही प्रतिभाशाली थी, पहली कक्षा से लेकर एम.काम. तक सभी परीक्षाएं उसने प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की । यद्यपि रजनी श्यामवर्ण की थी, मगर उसका मन दूध की तरह निर्मल था ।

एक दिन तो हद ही हो गई थी । कॉलेज के मनचले छात्रों ने उसके रंग को लेकर रजनी का भरपूर मजाक उड़ाया । वह कर भी क्या कर सकती थी, खिसियाकर कॉलेज से घर लौट आई। उसके पिता ने जब रजनी की ऐसी हालत देखी तो उन्होंने उसकी उदासी का कारण जानना चाहा। आखिर रजनी के धैर्य का बांध टूट ही गया । '' पापा मुझे अब अच्छी तरह मालूम हो गया है कि दुनिया में केवल गोरे रंग का ही मूल्य है, श्यामवर्ण तो लगता है अब मेरे लिए अभिशाप बन गया है। मैं ठीक कह रही हूं न -पापा। ''बेटा लगता है निराशा ने तेरे अंदर घर बना लिया है ।''

'' अब तू मेरी बातें ध्यान से सुन और इन्हें गांठ में अच्छी तरह बांध ले । क्या तू नहीं जानती कृष्ण भी तो श्यामवर्ण के थे और उनका तो नाम भी श्यामसुंदर है, क्या तू नहीं जानती कि उनके रूप पर कितनी गोपियां मोहित थी और यह भी तो सच है कि शंकर भी विष पीकर ही नीलकंठ बने। मेरा कहने का अर्थ महज इतना ही है कि कृष्ण अपने गुणों से श्यामसुंदर बने और नीलकंठ मंगलकारी । इसी प्रकार मनुष्य को अपने रुप से नहीं गुणों से श्रेष्ठ बनना चाहिए, क्या तू नहीं जानती मनुष्य अपनी सूरत से नहीं सीरत से पहचाना जाता है।

अपने पिता के शब्दों को सुन रजनी उनके गले से लिपट गई और बोली:-'' पापा आपने मेरी आंखें खोल दी है, हृदय के सौंदर्य को सर्वश्रेष्ठ माने वाले अपने पापा पर मुझे गर्व है ।

बी0काम0 के पश्चात् रजनी अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, मगर उसकी मां की इच्छा थी कि अब उसके हाथ पीले कर दिए जाए , मगर हमेशा की तरह इस बार भी उसके पापा ने उसका साथ दिया और फिर देखते ही देखते रजनी ने एम.काम. भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर लिया। अपने पापा से जिद करके वह शोध कार्य में जुट गई ।

बेटी को सयानी होती देख शर्मा जी को भी बेटी के विवाह की चिंता सताने लगी,योग्य वर के लिए उन्होंने इसकी चर्चा रिश्तेदारी एवं मित्रों से भी की, मगर हर जगह से निराशा ही हाथ लगी ।

आखिर उन्होंने रजनी के विवाह के लिए अखबार में विज्ञापन दे ही दिया।

विज्ञापन के परिणामस्वरूप कुछ प्रस्ताव भी प्राप्त हुए, मगर कहीं लड़के की षिक्षा कम होती तो कहीं दहेज की फरमाइश । रुढ़िवादी तथा ग्रामीण परिवेष में पले-बढ़े शर्मा जी अपनी बेटी का विवाह जाति में ही तथा सुसंस्कृत परिवार में करना चाहते थे । उनकी स्पष्ट धारणा थी कि बेमेल के विवाह कभी सफल नहीं हो सकते तथा बेटी की इच्छा के विपरीत विवाह करने पर वह जीवन भर उन्हें माफ नहीं करेगी।

आखिर दौड़-धूप रंग लाई, कानपुर से एक विवाह का प्रस्ताव शर्मा जी को प्राप्त हुआ, शर्मा जी ने भी उचित जांच-परख के बाद प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और आखिर वह दिन भी आ ही गया जब रजनी को देखने के लिए वर एवं उसके माता-पिता आ रहे थे। रजनी की मां को तो आज खुशी के मारे पैर भी जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। अतिथियों के स्वागत के लिए उन्होंने न जाने कितने तरह के पकवान तैयार किए।

बार-बार उनकी निगाह द्वार पर चली जाती और फिर रजनी पर निगाह पड़ते ही वह चौंकी - '' तू अभी तक तैयार नहीं हुई, अब मुझे क्या देख रही है - जा तैयार हो और हां - आज तू वही बनारसी साड़ी पहनना गोटे-वाली और पलंग पर जो जेवर रखे है, उन्हें भी पहन लेना ।

'' मां तू चिंता मत कर - छुटकी ने कहा ।

'' आज - दीदी को मै ऐसा सजाऊंगी कि चांद भी शरमा जाए ''

आखिर रजनी के सब्र का बांध टूट ही गया मां कब तक इस तरह तुम मेरी नुमाइष लगाओगी, ''मै जैसी हूं वैसी ही उनके सामने जाऊंगी । वे सजी-सजाई गुड़िया खरीदने आ रहे है या लड़की देखने ? मॉ-बेटी का द्वन्द्व सुन शर्मा जी आखिर बोल ही पड़े -

- '' लगता है मां-बेटी का महाभारत फिर शुरू हो गया है । ''

- '' अब तुम्हीं संभालो अपनी लाड़ली को, बहुत सिर चढ़ा रखा है ?''

द्वार पर कार की आवाज सुन घर के सभी मेहमानों के स्वागत के लिए दौड़ पड़े । घर के मुखिया शर्मा जी ने सभी अतिथियों का स्वागत गर्मजोशी के साथ किया। कुशलक्षेम तथा परिचय प्राप्ति के पश्चात बेटी रजनी को भी बुलाया गया। रजनी मेहमानों के लिए नाश्ता लेकर अपनी छोटी बहिन के साथ पहुंची। रजनी पर नजर पड़ते ही विजन ने अपने पिता के कान में कुछ कहा और उसके पिता ने शर्मा जी से कहा कि वे पत्र द्वारा अपने निर्णय से अवगत करा देगें ।

समय बीता तथा लगभग एक माह के पश्चात् एक पत्र आया जिसमें लिखा था कि लड़की के श्यामवर्ण के कारण वे रिश्ता करने में असमर्थ है, अगर छोटी लड़की के साथ विवाह का प्रस्ताव हो तो विचार किया जा सकता है।

पत्र क्या आया, शर्मा जी की आंखों के सामने अंधेरा छा गया । बेटी के स्वप्नों के महल धराशायी होते देख उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया । अपने पिता की हालत देख रजनी बोली '' पापा आप निराश न हों, यह तो होना ही था, मैं तो पहले ही जानती थी कि एक सांवले लड़के का विवाह तो गोरी लड़की से हो सकता है, मगर एक सांवली लड़की का विवाह गोरे लड़के के साथ शायद संभव नहीं '' आप हिम्मत न हारे पापा, आपके स्वप्न साकार होंगे, यह मेरा आपसे वायदा है ।

शर्मा जी ने तो ऐसा बिस्तर पकड़ा कि फिर कभी न उठ सके ।

पिता के आशीर्वाद तथा उसकी प्रतिभा ने रजनी को उसके मुकाम पर पहुंचा ही दिया। अब इसे विधि की विडम्बना कहे या कुछ और कि रजनी को नौकरी भी उसी विभाग में मिली जहां विजय कार्यरत था ।

समय का चक्र तेजी से चल रहा था, एक दिन संध्या पहर लिफ्ट में रजनी ने विजय को देखा । आत्मग्लानि से भरा विजय रजनी से बात करने का साहस नहीं जुटा पा रहा था, मगर रजनी ने फिर भी उसका हालचाल पूछ अपने कार्यालय की ओर बढ़ गई । आखिर अपनी उपेक्षा से विजय तिलमिला उठा, किसी तरह हिम्मत जुटाकर वह रजनी के केबिन में जा पहुंचा ।

रजनी ने शालीनता का परिचय देते हुए उसे बैठने को कहा । '' रजनी मैं आपका गुनहगार हू, ईश्वर ने मुझे अपने किए कि सजा दे दी है, मैं जान चुका हूं कि आंतरिक सौंदर्य के आगे वाह्य सौंदर्य कुछ भी नहीं , जिसे मैंने हीरा समझा था वह तो कांच का एक टुकड़ा निकला जो एक छोटी सी ठोकर से टूटकर बिखर गया । घमंडी बाप की लाड़ली जिसे अपने रुप पर घमंड था, आखिर मुझे छोड़ अपने बाप के पास चली गई और भिजवा दिए तलाक के काग़ज़ात।

मुझे जिंदगी भर इसका मलाल रहेगा कि मैं असली हीरे को न पहचान सका, अगर इजाजत हो तो मैं अब भी तुमसे........................................................

विजय की व्यथा सुन रजनी की आंखों में आंसू आ गए उसे लगा कि उसके पापा उसके सामने आ पूछ रहे है - '' बेटा रजनी कौन सा रंग मूल्यवान है ? ''

तभी विजय के सम्बोधन से रजनी की तन्द्रा भंग हुई । आपने क्या निर्णय लिया मैडम?

'' विजय तुम्हारे साथ जो कुछ हुआ वह निश्चय ही खेदजनक है मगर तुम अब मेरी बात ध्यान से सुनो- '' धनुष से निकला हुआ तीर, मुख से निकले वचन तथा बीता हुआ समय कभी वापिस नहीं आते । मेरी शादी तय हो चुकी है और हां उसका निमंत्रण भी तुम्हें मिल जाएगा ।

0----------0

संदर्भवश, कल्लो शब्द का ग्रीक में अर्थ - ‘सुंदरी' होता है. - सं.

चित्र - जितेन्द्र सक्सेना की कलाकृति

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


ग़ज़ल

- योगेश समदर्शी

आपकी यह हौसला अफजाई बहुत काम आएगी


सच कहता हूं यदि आपने यूं ही दिया साथ तो
वर्षों से रुकी कलम में फिर से जान आएगी

मैं यह तो नहीं कहता कि मैं कोई फोडूंगा भाड
पर मेरी चटक नाइंसाफी की आंख फोड जाएगी

दर्द जो द्स्तूर सा बनता रहा तो एक दिन
बदलाव की आंधी भी पूरे वेग से ही आएगी

आज आंसू बह रहे है देख जिनकी आंख में
वक्त की तहजीब है उनको हंसी भी आएगी

वार समझौतों पे गर होते रहे यूंही तो सुन
प्यार की फसलें बली के खून से लहलाएंगी


**-**

रचनाकार - योगेश समदर्शी की अन्य रचनाएँ उनके चिट्ठा-स्थल पर यहाँ पढ़ें-

http://ysamdarshi.blogspot.com/index.html

**-**

चित्र - श्रीमती शशि सिंह की कलाकृति.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



- कान्ति प्रकाश त्यागी

एक आफ़िस में कर्मचारी प्रायः नदारद रहते थे ,

नदारद रहने के कोई ना कॊई बहाने देते थे ।


जिसको देखो या तो रेस्ट रूम गया है ,

अथवा किसी कारण से बाहर गया है ।


कम्पनी डायरेक्टर को बहुत गुस्सा आया ,

पर्सनल मैनेजर को फ़ोरन बुलवाया ।


आप देखिए ! यह सब क्या हो रहा है ,

कोई भी सीट पर नहीं मिल रहा है ।


अनुशासन के लिए बनाऒ कुछ निर्देश ,

सभी को , अभी पहुंचाओ मेरा आदेश ।


महिलाएं केवल दिसम्बर माह

में ही प्रसव अवकाश लें ,


ऎसा न करने पर

उनको नॊकरी से निकाल दें ।


टायलेट के लिए कर्मचारी नामावली सूची बनाएं ,

सूची के अनुसार ही , कर्मचारी टायलेट जाएं ।


यदि कोई कर्मचारी कारण वश , नियत समय पर न जा पाए ,

तो अगले दिन का इंतज़ार करे , तब ही प्रसाधन के लिए जाए ।


सभी कर्मचारी घर से शॊचादि से निवृत हो कर आएं

एक शॊचालय को छॊड़ कर , अन्य बंद किए जाएं


डाक्टर का किसी प्रकार का सार्टीफिकेट नहीं चलेगा ,

जो कर्मचारी अनुपस्थित होगा , उसका वेतन कटेगा ।


जब वह डाक्टर के पास जा सकता है ,

तो कार्य के लिए आफ़िस आ सकता है ।

मुंडन विवाह , दाह संस्कार आदि में न जाएं ,

ऎसी स्थिती में , कार्मिक प्रमुख के पास आएं ।


दाह संस्कार में शामिल होने के बहाने मत कीजिए ,

मृतक के लिए क्या कर सकोगे , यह समझ लीजिए ।


अगर किसी का विवाह या मुंडन होना ,

तो तुमको इससे क्या लेना देना ।


उसकी इच्छा है , मुंडन करवाए या बाल रखाए ,

इच्छा करे शादी करे , ना करे , ना करवाए ।


न तो आप पंडित हैं , ऒर न नाई ,

फिर छुट्टी की एप्लीकेशन क्यूं आई ।


सभी संस्कारों में शामिल होने के लिए

विशेष कर्मचारियों को ट्रेनिंग दी जाएगी ,


किन अवसरों पर क्या करना है

सभी बातें समझा दी जाएगीं ।


कर्मचारी अपने किसी अंग का आपरेशन न कराएं ,

आपरेशन करा कर कम्पनी को नुकसान न पहुंचाए ।


स्वयं की मृत्यु का नोटिस भी , १५ दिन पहले देना होगा ,

अन्य कर्मचारी को अपने काम से अवगत कराना होगा ।


ऎसा न करने पर भविष्य निधि फण्ड नहीं दिया जाएगा ,

जो कर्मचारी वह काम करेगा , फण्ड से उसे वेतन दिया जाएगा ।

**-**

चित्र - अनु की कलाकृति - कागज पर पेंसिल रेखांकन

**-**

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

- सुधा अवस्थी

तुर्रम (बाल उपन्यास) : लेखक - कमलेश भट्‌ट कमल'

प्रकाशक : आत्मा राम एण्ड संस नई दिल्ली

प्रथम संस्करण:2006 , मूल्य: 80 रुपए (सजिल्द) पृष्ठ संख्या:47

प्रस्तुत लघु उपन्यास तुर्रम में श्री कमलेश भट्‌ट ‘कमल' ने बाल सुलभ मन के चित्र बहुत सहजता से उकेरे हैं। पढ़ते समय ऐसा लगा कि मेरा बचपन पुन: लौट आया है।बच्चे वास्तव में मन के सच्चे होते हैं। वे जिसे प्यार करते हैं पूरे मन से प्यार करते हैं। इस उपन्यास का मुख्य पात्र विनीत , तुर्रम नाम के मेंढक से बेहद प्यार करने लगता है। लेखक ने इसका सजीव चित्रण किया है कि बच्चा किस तरह धीरे धीरे तुर्रम से अपने को जोड़ता है। वह जब तक उसके क्रिया कलाप देख नहीं लेता तब तक उसे सुकून नहीं आता। लेखक ने बच्चे के लगाव एवं तुर्रम की हर गतिविधि का सूक्ष्म चित्रण किया है।

हर जीव को पालने के पीछे कुछ फायदे भी होते हैं। जैसे मेंढक मच्छर, कीड़े ,मकौडों को खा जाता है। इस प्रकार मच्छर वातावरण को कीड़े- मकौड़ों से रहित बनाता है। लेखक ने बहुत बारीकी से मेंढ़क की गतिविधियों का अवलोकन किया होगा तभी चित्रण में इतनी सहजता आ सकी है। इस उपन्यास को पढ़कर सबसे पहला विचार यही उभरता है कि हमें जीव -जन्तुओं से प्यार करना चाहिए। जीव -जन्तु किस प्रकार अपने आप को सुरक्षित रखकर स्वतंत्र जीवन जीते हैं। जीव- जन्तु किसी प्रतिबन्ध में रहना पसन्द नहीं करते। घर आने वाले प्रत्येक मेहमान को भी तुर्रम से परिचित कराया जाता है।

लेखक ने अन्त में भी बड़ा सुन्दर चित्रण किया है कि जीव -जन्तु भी अपने साथियों के साथ रहना पसन्द करते हैं न कि किसी प्रतिबन्ध में रहना।साज- सज्जा की दृष्टि से यह बाल उपन्यास उत्तम है। मूल्य अधिक है कुछ कम होता तो अच्छा होता।

दिवा स्वप्न : गिजू भाई बधेका ( हिन्दी में प्रथम संस्करण, मूल गुजराती में 1932 )

हिन्दी अनुवाद : काशिनाथ त्रिवेदी

प्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया

मूल्य: 25 रुपए, पृष्ठ संख्या: 86

यह पुस्तक चार खण्डों में विभाजित है:-1 .प्रयोग का प्रारम्भ 2 .प्रयोग की प्रगति 3 .छह महीने के अन्त में 4 .अन्तिम सम्मेलन। लेखक ने लगभग 75 साल पहले जिस शिक्षण- कला के बारे में अपना चिन्तन एक शिक्षक की संघर्ष कथा के रूप में प्रस्तुत किया था. वह आज के शिक्षण की अनिवार्यता हो गई है। अध्यापक की उदासीन मानसिकता को बच्चे किस प्रकार सहन किया करते थे उसे लेखक ने महसूस किया है एवं उसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है। लेखक परम्परागत शिक्षण के ढाँचे के पक्ष में नहीं है। वह उसमें आमूल -चूल परिवर्तन का हामी है। वह अनेक प्रयोग करता है। किस प्रकार खेल- खेल में शिक्षा दी जाए, कैसे कहानी के माध्यम से बच्चों के लेखन, श्रवण, वाचन आदि क्रिया- कलाप का विकास हो तथा बच्चों को पाठ्‌यक्रम के अलावा अन्य शिक्षण में निपुण किया जाए, कैसे उनकी उत्सुकता का निराकरण किया जाए।

अध्यापक लक्ष्मीशंकर ने बहुत ही साहस का कार्य किया;जबकि उस समय उनके साथी उनकी शिक्षण- कला का मज़ाक उड़ाया करते थे कि बच्चों को खेल खिलाकर कहानी सुनाकर बरबाद कर रहे हैं।इस सोच के पीछे उस समय ऐसी ही धारणा थी क्योंकि उस समय परम्परागत शिक्षण से हटकर नवीन विधि को लागू करने का जोखिम मोल लेने में असफल हो जाने का डर भी था। बच्चों को केवल डण्डे के बल पर पढ़ाया जा सकता है, यह गलत धारणा बनी हुई थी। ऐसे में लक्ष्मीशंकर का स्थान-स्थान पर अध्यापक साथियों ने खूब मज़ाक उड़ाया, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। परिणाम उसी समय दिखाई देने लगे थे । डायरेक्टर साहब ने लक्ष्मीशंकर जी को खूब सहयोग दिया।

शिक्षक ने प्रत्येक विषय को क्रियाकलाप के माध्यम से पढ़ाया। मनोवैज्ञानिक ढंग से अध्ययन एवं विश्लेषण करके पता लगाया कि किस विद्यार्थी की किस कार्य में रुचि है। छात्र को केन्द्र में रखकर परीक्षा में आमूल चूल परिवर्तन किये। लेखक का मानना है कि कुछ बच्चों को पुरस्कृत करके कुण्ठा एवं अभिमान की भावना का ही प्रसार होता है। गिजू भाई की सुझाई गई नई प्रणाली आशाओं से भरे मधुर सपनों को साकार करती है। यह पुस्तक शिक्षक वर्ग के लिए एक उत्प्रेरक का काम करती है और नई से नई पद्वति के अपनाने पर बल देती है।

**-**

समीक्षक - सुधा अवस्थी केंद्रीय विद्यालय संस्थान में कार्यरत हैं तथा वर्तमान में हजरतपुर फिरोजाबाद में पदस्थ हैं.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


- नरेन्द्र कोहली

रामलुभाया ने एक स्वप्न देखा कि वह भारत का प्रधानमंत्री या कोई साधारण मंत्री बन गया है. बात स्वप्न की है, इसीले उस पर रहस्यात्मकता का पर्दा पडा रहे तो भी कोई कठिनाई नहीं है. रामलुभाया सामान समेत अपने नए बंगले में रहने को जा पहुँचा. वहाँ जाकर देखा तो उसके बंगले में पहले से एक व्यक्ति सपरिवार रह रहा था. परिवार था तो सामान भी था ही. रामलुभाया के रहने के लिए वहाँ तनिक भी स्थान नहीं था.

"तुम यहाँ क्या कर रहे हो?" रामलुभाया ने क्रुद्ध होकर पूछा.

"मैं यहाँ रहता हूँ सरकार." उस व्यक्ति ने कहा.

"तुमने यह बँगला खरीदा है क्या?" रामलुभाया ने क्रुद्ध स्वर में पूछा.

"तुमने खरीद लिया है क्या?" उस व्यक्ति ने पूछा.

"मैं तो चुनकर आया हूं." रामलुभाया ने उसे बताया और अपनी जेबें टटोलने लगा कि उसके पास उसका मंत्री होने का प्रमाण-पत्र है अथवा नहीं.

"मैं भी चुनकर ही आया हूँ." उस व्यक्ति ने सहज भाव से कहा.

"आप कहाँ से चुनकर आए हैं?" रामलुभाया ने ससम्मान पूछा.

"मैंने घूमकर सारे बंगले देखे. उनमें से मुझे यही सबसे अच्छा लगा. इसीलिए मैंने इसे चुन लिया."

रामलुभाया बोला, "मैं पूछ रहा हूं कि आप किस क्षेत्र में से चुनाव जीतकर आए हैं?"

"वह भी कोई जीतने की चीज है." वह व्यक्ति हँसा, "जीतनी ही हो तो आदमी कोई लड़ाई जीते. चुनाव जीता नहीं जाता भले आदमी. चुनाव तो किया जाता है. जैसे मैंने पहले अपनी पत्नी का चुनाव किया और फिर इस मकान का चुनाव किया." उसने घूरकर रामलुभाया को देखा, "तुमने अपनी पत्नी भी चुनी थी अथवा उसे भी कहीं से जीत कर लाए थे?"

रामलुभाया को लगा कि वह किसी भी क्षण इस आदमी का मुँह नोच लेगा.

रामलुभाया चिल्लाया - "सेक्योरिटी. ओ सेक्योरिटी-कहाँ हो?"

वह व्यक्ति बोला, "सुरक्षाकर्मी लोग तो आजकल केवल डाकुओं और हत्यारों की सेवा में लगा दिए गए हैं. वे बेचारे भी परेशान हैं कि जिन्हें पकड़कर कारागार में डाल देना उनका धर्म था, वे उन्हीं की सुरक्षा के लिए तैनात हैं और जिनको जूते मारने चाहिए थे, उनको सलाम करने को बाध्य हैं. अब कोई मां यह स्वप्न नहीं देखती कि उसका बेटा बड़ा होकर पुलिस में जाएगा और अपराधियों को पकड़ेगा."

"होगा वह सब." रामलुभाया बोला, "मैं तो एक ही बात जानता हूँ कि तुम यहाँ आज तक अनधिकृत रूप से रह रहे थे. अब और ऐसा संभव नहीं है."

"तो क्या अब तुम यहाँ अनधिकृत रूप से रहोगे."

"नहीं, मुझे तो यह बँगला आबंटित हुआ है."

"पर चुनाव तो तुमने अनधिकृत रूप से ही जीता है न." वह व्यक्ति मुस्कुराया, "बूथ लूटकर. उस पर कब्जा करके. जाली वोट डलवाकर. लोगों को लोभ देकर. कंबल बांट और शराब पिलाकर. उन्हें डराकर." वह क्षण-भर रुककर बोला, "तुमने देश की संसद पर अनधिकृत रूप से कब्जा कर लिया है. तुम संसद कब खाली करोगे?"

इस बार रामलुभाया क्रुद्ध नहीं हो सका. वह डर गया. बोला, "अच्छा रहते चलो, पर मुझे किराया देते रहना. मैं किसी और बंगले पर कब्ज़ा कर लूंगा. हमारे लिए क्या कठिनाई है."

"तुमने पाकिस्तान से आज तक कितना किराया लिया? वह भी तो अनधिकृत रूप से कश्मीर के कितने बड़े भाग पर कब्जा किए बैठा है. चीन से कितना किराया लिया? वह भी तो हमारी कितनी भूमि घेरे बैठा है..."

"पाकिस्तान से हम किराया कैसे ले सकते हैं. किराया लो तो रसीद देनी पड़ती है. और मुझे तो प्रत्येक राशि ब्लैक में लेने की ही आदत है." रामलुभाया बोला.

"जब-जब हमारे सैनिक पाकिस्तान से पूरा कश्मीर मुक्त करवाने आगे बढ़े, तब-तब ही तुमने पाकिस्तान से संधि कर ली. जब-जब हमारे सैनकों ने इच्छोगिल नहर पार कर लाहौर में प्रवेश किया, तब-तब तुम्हें उसके सामने कश्मीर खाली कराने की मांग रखने के स्थान पर अपनी सेनाएँ पीछे हटाने की जल्दी पड़ गई." वह व्यक्ति बोला, "और अपनी दिल्ली में तो तुम बंगलादेशियों से यमुनातट खाली कराते नहीं, मुझसे मेरा यह घर खाली कराने कैसे आ गए?"

रामलुभाया बुरी तरह घिर गया था. उसके सम्मुख अब एक ही रास्ता था. उसने अपनी जेब से पिस्तौल निकालकर उस व्यक्ति की छाती पर लगाकर छह गोलियाँ दाग दीं. ...उस व्यक्ति को जीने का क्या अधिकार था जो सत्य बोलना छोड़ नहीं सकता था?

**-**

साभार - गणतंत्र का गणित, व्यंग्य संकलन, वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज, नई दिल्ली 110002

**-**

चित्र - डॉ. नाथूलाल वर्मा की कलाकृति

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


-आशुतोष

ज़बरदस्त बारिश और घर की बालकनी पर बैठा मैं. बारिश की बूंदों को गिनते-गिनते नहा पड़ी पार्क के पास एक कुतिया. वह अपने दांतों में नन्हे पिल्ले को पकड़े तेजी से अपार्टमेंट की ओर भाग रही थी. बाक़ी पिल्ले भीगते हुए कूं-कूं कर रहे थे. कुतिया एक पिल्ले को रखकर दोबारा आती और दूसरे को फिर ले जाती.


मुझे अपनी मां की याद हो आई. घर से सैकड़ों मील दूर वह मां जो उम्र के इस पड़ाव पर सिर्फ़ मेरी आवाज़ सुनकर खिल उठती है. बस यही पूछती है_''कैसे हो. खाना खा लिया. तबियत ठीक है. बारिश में भीगना मत.'' जैसे मैं अभी भी बच्चा हूं पिल्ले की माफ़िक और वह अपने दांतों में पकड़ किसी सुरक्षित जगह पर ले जाना चाहती हो. उसके दांतों में अजीब तरह की नमी. कुछ गोंद जैसी तो कुछ मोम जैसी. चुभन में जैसे चाशनी घुली हो. मेरा हाथ अनायास ही गर्दन पर चला गया. लगा मैं अभी भी मां के दांतों के बीच फंसा हूं. तभी सेल फ़ोन की घंटी ने सोच के ताने-बाने को झिलमिल कर दिया. शमसी का फ़ोन था. कह रहा था आज फिर एंजला ने एंकरिंग करने से मना कर दिया. कुछ तबियत खराब थी. जल्दी ही घर चली गई. ऐसा पिछले कई महीने से चल रहा था. वह आती, थोड़ा काम करती और फिर अचानक उठती, अपना बैग उठाती और तबियत का 'बहाना' बनाकर चली जाती. कोई उसे ऊपर से कुछ नहीं कहता. सब जानते थे वह ''बॉस'' की प्यारी है. लेकिन अंदर-ही-अंदर सब कुढ़ते थे. वह स्वभाव से बुरी नहीं थी. सबसे घुलती-मिलती थी, उसकी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. थोड़ी मूडी, थोड़ी नकचढ़ी, थोड़ी खूबसूरत और थोड़ी प्रोफ़ेशनल. न ज्यादा सुंदर न ज्यादा बदसूरत. लेकिन बॉस को न जाने क्या भाया कि वह उसी पर अपना स्वामित्व जताने लगे थे. न शब्दों से न वाणी से सिर्फ़ अपने बॉडी लैंग्वेज़ से. कभी अकारण सेट पर आ जाना. कभी अकारण अपने कमरे में बुला लेना. कभी बिना खता किसी को डांट देना कि फलां ने उसकी तरफ़ देखने की जुर्रत क्यों की. एंजला को भी उस खेल में मजा आता. वह उनके पास जाती और उनसे दूर भी रहती. वह क़रीब आते, वह भाग जाती. वह दूर रहते तो सट जाती. वह खूबसूरत नहीं थी लेकिन अंदाज़ कातिल. आंखें पतली लेकिन सम्मोहन जो पूरे इंसान को लील जाए. कपड़ों में कभी लतीबी तो कभी बेतरकीब. लेकिन यह सब जानबूझकर. चाहने वाले सिर्फ़ वह ही नहीं थे. पूरी फौज थी. नज़र तो मैंने भी डाली थी. लाइन भी मिली, मुझे मुगालता भी हुआ था लेकिन कायर मन कंधों पर हाथ फेरने से ज्यादा कुछ नहीं कर पाया. कभी लगता दे देगी, तो कभी लगता नहीं देगी. कभी लगता आज की रात क़त्ल कर ही दूं. तो कभी लगता अगर छुरी उल्टी पड़ गई तो सिर पर बचे हुए बाल भी नहीं रहेंगे. मैंने शमसी को कहा, यार किसी और को बिठा दो. फिर थोड़ा अकड़ते हुए बोला, यार उसका इलाज कराना पड़ेगा. मैं एक बार बात कर ही लूंगा. लेकिन किससे बात करूंगा. उससे जो खुद उसका मारा हुआ है. शमसी की भी वह दोस्त थी. कम-से-कम शमसी यह मानता था. वह बोला, ''चलो मैं ही उससे बात कर लूंगा.'' मुझे कुछ जलन सी हुई. साला मेरा जूनियर क्यों उससे बात करेगा. मैं ही एंजला से बात करता हूं. मैंने शमसी से कहा_''नहीं, छोड़ो, मैं देखता हूं.'' मैं फिर बरसात की बूंदों में खो गया. बारिश थोड़ी और तेज़ हो चली थी. सड़क पर पानी जम गया था. रोशनी धुंधली पड़ गई थी. दिखना भी कम हो गया. कुतिया अपने चौथे पिल्ले को सुरक्षित जगह पर रख पांचवें को खोज रही थी.


पांचवां कहीं गायब हो गया था. वह कभी इधर जाती तो कभी उधर. तभी फिर सेल फ़ोन बजा. नंबर एंजला का था. लपक कर फ़ोन उठाया. आवाज़ में कड़ाई लाते हुए बोला, ''तुमने आज फिर छुट्टी ले ली!'' ''हां तो, मन नहीं था एंकरिंग का.'' मैंने कहा, ''तो?'', वह बोली, ''चलो कहीं घूमने चलते हैं.'' मैंने कहा, ''तुम्हारा दिमाग खराब है. ऑफ़िस जाना है. अगले इलेक्शन का पूरा शेडयूल बनाना है. बॉस से मीटिंग है. कल ही तो यजुवेंद्र से नाराज़ होकर उन्होंने इलेक्शन का चार्ज मुझे दिया है. न बाबा न. यू गो यार. सम अदर टाइम.'' ''सी, यू विल नॉट गो विद मी?'' मैंने कहा, ''नहीं.'' उसने फ़ोन पटक दिया. कुतिया को अभी भी पिल्ला नहीं मिला था. वह इधर-उधर छटपटा रही थी. तभी कुतिया के शरीर को चीरता हुआ मेरा मन न जाने कैसे पार्क, पार्क को चीरता हुआ अपार्टमेंट, अपार्टमेंट के पेट से निकलता हुआ सड़क और फिर हाइवे के रास्ते यजुवेंद्र के घर जा पहुंचा. कमरे के अंदर झांका तो जानी-पहचानी खिलखिलाहट कानों में जा पड़ी. यह आवाज़ एंजला की थी. उसके बिस्तर में लेटी हुई. बिजली गुम, कमरा अंधेरा और कमरे के एक कोने पर अधनंग पड़ा यजुवेंद्र. वह यजुवेंद्र जो उम्र में मुझसे एकाध साल छोटा था लेकिन कामयाबी के घोड़े पर ऐसा चढ़ा कि जल्द ही मेरा बॉस बन बैठा. सही जगह पर सही टांका फिट करना उसकी फ़ितरत थी. एंजला को पसंद तो मैं भी करता था लेकिन यजुवेंद्र में न जाने क्या जादू था. उसने भी उसे खूब प्रमोट किया. एक मामूली लड़की एक साल में स्टार बन गई. अच्छे-अच्छे सीनियर उससे डरने लगे. अफ़वाहों ने भी राजधानी एक्सप्रेस पकड़ ली. वह रफ्तार से भागती एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन, दूसरे से तीसरे_तीसरे से चौथे_तभी मेरी सोच में फिर ख़लल पड़ी. फिर सेलफ़ोन की घंटी बजी. एंजला की लगभग रोनी-सी आवाज़ मेरे कानों में जाने को बेताब थी ''तुम ऐसा नहीं कर सकते. यू कांट डू दिस टू मी. यू कांट इग्नोर मी लाइक दिस. आई एम कमिंग टू योर प्लेस.'' मैं हां या ना कहता उससे पहले ही उसने फ़ोन पटक दिया. अगले ही क्षण एक एसएमएस ने दस्तक दी_''आई मिस यू''. एसएमएस भेजने वाले का नाम था एंजला. एंजला, छोटे शहर की एंजला. थोड़ी पढ़ी-लिखी, थोड़ी समझदार. थोड़ी नकचढ़ी, थोड़ी संवेदनशील. मां-बाप न अमीर, न गरीब. दिल्ली पहुंची तो ठीक थी. नए दोस्त मिले तो सपनों ने आंखों में घरौंदे बनाने शुरू कर दिए. जैसे-जैसे मौक़ा मिला घरौंदे बड़े होने लगे. महत्तवाकांक्षाओं ने जैसे हवा से बातें करनी शुरू कीं तो एंजला के अंदर का छोटा शहर कभी छोटा तो कभी बड़ा होने लगा. कुछ प्रतिभाशाली थी और कुछ मेहनती तो शुरुआत में हिम्मत नहीं हुई. थोड़ा ज़िस्म भी ठीक था तो भंवरे भी इर्द-गिर्द नाचने लगे. किसी ने सिगरेट ऑफ़र की तो किसी ने गाड़ी में लिफ्ट, कोई उससे वॉयसओवर करवाता तो कोई अपनी ज़िंदगी की स्क्रिप्ट उससे लिखवाने को बेताब होता. वह कभी समझती तो कभी नहीं समझती. जब ब्राइटेस्ट स्टार यजुवेंद्र ने उसे लाइन देनी शुरू की तो इस खेल में उसे मजा आने लगा. शुरुआत हुई तो बात घर तक भी जाने लगी. कभी शरीर पर कपड़े होते तो कभी कभी घर छोड़ने की पेशकश तो कभी बीमारी में घर आकर देखने का बहाना. एंजला सब समझती थी. वह उसका फ़ायदा भी उठाना चाहती थी और नहीं भी. वह लाइन भी देती और उसे काट भी देती थी.


एडिट मीटिंग के बीच से सुपर बॉस उसे एसएमएस करना नहीं भूलते थे. लेकिन न जाने क्यों एंजला कहीं फंस गई थी. उसके छोटे शहर का मन कहीं अटक गया था. बड़े बॉस की बड़ी कार उसे अच्छी तो लगती थी लेकिन उसे अपना घर ज्यादा खूबसूरत मालूम पड़ता था. बारिश की बूंदें थोड़ी कमज़ोर होने लगी थीं.
कुतिया काफ़ी परेशान थी. अब रोने लगी थी. उसकी आंखों के आंसू और बारिश का पानी घुलने लगे थे. एंजला की कार भी बारिश का सीना चीरकर मेरे घर की तरफ़ बढ़ी चली आ रही थी. ऐसा लग रहा था मानो वह रात को सोई नहीं थी. कपड़े उल्टे-पुल्टे थे. आंखें सूजी हुईं. काजल पानी में बह निकला था. मैं उठा दरवाज़ा खोलने. उसने झट से मुझे पकड़ लिया. इतनी ज़ोर से मेरा हाथ पकड़ा कि लगा टूट जाएगा. मैंने पूछा, ''क्या हुआ.'' ''कुछ नहीं'', छोटा-सा जवाब. ''झूठ मत बोलो. मैं तुम्हें अच्छी तरह जानता हूं. क्या किसी ने कुछ कहा है, किसी से झगड़ा हुआ, किसी ने डांटा,'' एक साथ कई सवाल. मुझे उन सवालों के जवाब पता थे. कुछ नहीं कहना बस मेरा मुंह देखते जाना. ''तुमने फिर यजुवेंद्र से झगड़ा किया?'' मैंने वही पुराना सवाल दोहरा दिया. मुझे उसके जवाब भी पता थे. वह जवाब जो उसने कभी नहीं दिए, बस मुझे पता चल जाते थे. कैसे यजुवेंद्र आजकल एक नई ट्रेनी पर मेहरबान है. कैसे एक नए रिपोर्टर की कार यजुवेंद्र के घर के आस-पास देखी जाने लगी है. कैसे रविंदर को देखते हए यजुवेंद्र का पूरा बदन आजकल खिलने लगता है. कैसे कल यजुवेंद्र पैलेस सिनेमाहॉल में नई 'सेक्सी' के साथ बांहों में बांहें डाले देखा गया. एंजला ने यह सब कभी नहीं बताया. न जाने क्यों वह यह सब सुनकर उदास...थोड़ी असुरक्षित हो जाया करती. यजुवेंद्र अभी भी उससे प्यार से बातें करता, अभी भी उसे प्राइम टाइम पर सबसे ज्यादा मौक़ा देता. मैंने आज तय कर लिया था कि उससे पूछकर ही रहूंगा. मैंने तेज़ आवाज़ में कहा, ''तुम बताती क्यों नहीं, क्या बात है?'' उसके सब्र का बांध अब टूटा कि तब टूटा. फिर अचानक वह उठी और मेरे सीने से लगकर रोने लगी. मैंने उसे रोते हुए कभी नहीं देखा था. लगा कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है. लेकिन पूछने का कोई फ़ायदा नहीं. वह कभी नहीं बताएगी, मैं जानता था. मुझे वह मामूली-सी लड़की याद आने लगी थी. वह जो कुछ दिन पहले ही दिल्ली आई थी. लंबे बाल, मामूली से कपड़े. एक अदद कैरियर की तलाश में एक न्यूज़ चैनल के दफ्तर जा पहुंची. पहली नज़र में उसे नौकरी नहीं मिलनी थी. लेकिन न जाने कैसे वह ट्रेनी बन गई. मैंने यह सवाल कभी नहीं पूछा. उसने भी बताना मुनासिब नहीं समझा. उसने ही मुझे खोज निकाला था. मुझे याद है कि जब पहली बार वह मेरे पास आई. उसे एंकरिंग करनी थी. आज सरकार से समर्थन वापसी की ख़बर चल रही थी. एक-दो पार्टियों के नेताओं को स्टूडियो आना था. कुछ सवाल उसे भी पूछने थे. मैंने कुछ सवाल लिखकर दे दिए. साथ ही अपने मोबाइल का नंबर भी. शो ख़त्म हो गया. अचानक देर रात एक एसएमएस आया_''थैंक यू.'' फिर सिलसिला चल निकला. वह अक्सर गाहे-बगाहे आ जाती. मैं भी सारा काम छोड़कर उसके सवाल लिख देता. देर रात एसएमएस ''थैंक यू.'' फिर ''थैंक यू'' आना बंद हो गया. एसएमएस थोड़े लंबे होने लगे. मैं भी जवाब देने लगा. जवाब देने में मज़ा आने लगा और इंतज़ार अखरने लगा. एक दिन हिम्मत करके उसे डिनर पर ले जाने की इच्छा व्यक्त की. वह फ़ौरन तैयार हो गई. मैंने सोचा गोटी फिट हो गई. फिर वह घर भी आने लगी. पंद्रह-बीस दिनों में एक बार हम गप्पें मारते और वह चली जाती. एक दिन वह काफ़ी उदास थी. मैंने पूछा. काफ़ी कुरेदा पर उसने कोई जवाब नहीं दिया. फिर उसकी उदासी बढ़ने लगी. मेरा पूछना लंबा होता गया. उसके जवाब छोटे होते गए.


एक दिन किसी ने बताया कि वह यजुवेंद्र के साथ देखी गई. मुझे खराब लगा. सोचा पूछूंगा. काफ़ी हिम्मत जुटाई. न पूछ पाया. फिर अफ़वाहों के पर लगने लगे. क़िस्से रोचक होने लगे. और उसका प्राइम-टाइम पर आना भी बढ़ने लगा. लेकिन उसका मुझसे मिलना कम नहीं हुआ. हां, बीच में वह गायब कुछ ज्यादा ही होने लगी थी. सेलफ़ोन भी नहीं उठाती. एसएमएस का जवाब भी नहीं देती. मन भटकता हुआ न्यूज़ रूम की दीवार को पार करता यजुवेंद्र के घर की ओर जाने को मचलता और उसके बिस्तर पर एक पहचानी-सी सूरत भी दिखाई पड़ती. सोचता, अब कभी उसके एसएमएस का जवाब नहीं दूंगा. लेकिन फिर सिलसिला चल पड़ता. इस बीच एक दिन शमसी ने ब्रेकिंग न्यूज़ दी. एंजला उसे क़वर करने लॉस एंजेल्स जा रही है. एक बगावत की फ़िल्म विदेशी फ़िल्मों की कैटेगरी में पुरस्कार के लिए नॉमिनेट हो गई है. कई सीनियर के सीने पर सांप लोट गया. उनकी तमन्नाओं ने दम तोड़ दिया. सुपर बॉस का फ़रमान था, हमें इस इवेंट को नए तरीके से कवर करना चाहिए. किसी जूनियर को भेजेंगे तो नया ''पर्सपेक्टिव'' मिलेगा. उन दिनों चैनल के लिए कंप्टीशन बढ़ गया था. नए आइडियाज़ की सख्त ज़रूरत थी. यजुवेंद्र भी थोड़ा परेशान था. उसने मुझसे पूछा ''ये बॉस को क्या हो गया? एंजला का फ़िल्मों से क्या लेना-देना?'' जवाब मुझे भी पता था और उसे भी. न वह बोला और न मैं. एंजला काफ़ी खुश थी. उसने एसएमएस कर मुझे न्यूज़ ब्रेक की. मैंने भी बधाई दी. हम देर रात पब भी गए. सेलिब्रेट करने. अंदर कुछ टूटता-सा महसूस हुआ. यजुवेंद्र भी थोड़ा चिड़चिड़ा हो गया था. लेकिन एंजला अपनी ही दुनिया में मस्त. फ़िल्म को ऑस्कर न मिलना था न मिला. लेकिन एंजला की ज़िंदगी की स्क्रिप्ट में एक नया मोड़ आ गया था. अब बॉस कुछ ज्यादा ही लिबर्टी लेने लग गए थे. कभी बालों पर हाथ फेर देते तो कभी गालों को सहला देते. एंजला बुरा नहीं मानती. उसका प्रमोशन हो गया. यजुवेंद्र सब देखता और अनदेखा कर देता.


एंजला के आंसुओं ने मेरी शर्ट भिगो दी. उसकी सिसकियां तेज़ होने लगीं. अतीत से निकलकर मेरी आंखों ने उसकी आंखों पर जूम-इन किया. फिर धीरे से टिल्ट-डाउन और उसके होंठों पर कैमरा फ़िक्स हो गया. होंठ थरथरा रहे थे. वह कुछ कहना चाहते थे. कुछ बोल भी रहे थे. लेकिन मैं सुन नहीं पा रहा था. फिर फुसफुसाहट थोड़ी तेज़ हुई_''क्या मैं गंदी लड़की हूं, एम आई ए बैड गर्ल?'' मैं चौंका. कुछ कहता कि
वह फिर बोली, ''मैं दोहरी ज़िंदगी नहीं जी सकती.'' मैंने पूछा, ''आख़िर हुआ क्या है?'' वह फिर कुछ नहीं बोली बस रोती रही. मैं पूछता रहा. लेकिन उसने मुंह नहीं खोला. बाहर बारिश तेज हो गई थी. कुतिया के रोने की भी आवाज़ आ रही थी.

**-**

रचनाकार - आशुतोष का सर्जनात्मक सफर 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'दैनिक हिंदुस्तान', 'बीआईटीवी', 'आज तक' से चलता हुआ ‘आईबीएन-7' के प्रबंध-संपादन पर जा पहुँचा है. हंस के टीवी-मीडिया विशेषांक के लिए खासतौर पर लिखी गई उनकी यह पहली कहानी.

**-**

चित्र - पीवी राजगोपाल की कलाकृति.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this



-डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

एक भाई हंसते हुए आये , सुना है अपना देश ,

एक बार फ़िर सोने की चिड़िया बन गया है.

हमने हैरत से पूछ ही लिया , क्यों भाई !,

अचानक यह सब कैसे हो गया है .


आप !, यह क्या कह रहे हैं ?,

अपने ऊपर तो ख़रबों का कर्ज़ है .

उस कर्ज़ को सिर से उतराना ,

आज़ नहीं , तो कल हमारा फ़र्ज़ है .


हम जिनके कर्ज़ दार हैं , वे ही ,

हमें सोने की चिड़िया बता रहे हैं .

ऒर अमीर देशों की सूची में ,

हमारा स्थान बारहवां बता रहे हैं .


क्या यह ख़ुशी मनाने की बात है ,

ज़रा सोच समझ कर , भाई तू ही बता दे .

यह तो ऎसा हुआ , कर्ज़ दाता आसामी को ,

ब्याज़ सहित रुपया देकर , साहूकार बता दे .


वह बोला अरे !, आप यह क्या कर्ज़ कर्ज़ चिल्ला रहे हैं ,

फ़ालतू में , हमें दुनियां के सामने नीचा दिखा रहे हैं .

आज़ तो ज़माना ही कर्ज़ दारों का है ,

कर्ज़ न देने वालों सलाह्कारों का है .


दुनियां में सभी कर्ज़ ले कर खा रहे हैं ,

बे झिझक रात दिन मस्ती मना रहे हैं .

देने की किसी को चिन्ता नहीं है ,

आप लोग इसको समझता नहीं है .


मकान , दूकान , कार व बीबी सभी किराये पर मिलते हैं ,

काहे की झिझक , काहे का लफ़ड़ा , दिल भर कर हंसते हैं .

कितने लोगों ने गाय भैंस , मकान आदि के लिये कर्ज़ लिये थे ,

सभी को मृतक अथवा आपदा बता कर , यूं ही हज़म किये थे .


पता नहीं कब कौन सी सरकार करने लगे इन्साफ़ ,

वोट के चक्कर में , करोड़ों का कर्ज़ा करने लगे माफ़ .

पहले तो घर में आते ही प्यारी सी नन्ही सी गुड़िया ,

बचत के लिये प्यार से समझाती थी , नानी बुढिया .


अब समझा क्यों कहते हैं , हमको सोने की चिड़िया ,

ले कर पूरा डकार जाओ , छोटी से चूरन की पुड़िया .


Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


- अजीत अंजुम

आज बॉस का मूड फिर उखड़ा-उखड़ा दिख रहा था. चेहरे पर बारह बज रहे थे. कोई पहली बार देख ले तो यही लगेगा कि अभी-अभी निगमबोध घाट से किसी को कंधा देकर आ रहा होगा. न्यूज़ रूम के लोग हर दूसरे-तीसरे शुक्रवार को बॉस का यह चेहरा देखने के अभ्यस्त हो चुके हैं. जिस शुक्रवार को चैनल की टीआरपी खराब आती है, उस दिन बॉस इसी तरह सड़ा हुआ मुंह लेकर न्यूज़ रूम में आता है...


लिफाफा देखकर कुछ लोग जैसे मज़मून भांप देते हैं, वैसे ही न्यूज़ रूम के लोग शुक्रवार को बॉस का चेहरा देखकर टीआरपी नाप लेते हैं. सबने बॉस के चेहरे की एक परिभाषा गढ़ ली है.
बॉस का खिला हुआ चेहरा...मतलब_ चैनल की टीआरपी बम-बम है.
बॉस का गंभीर चेहरा...मतलब_टीआरपी का मीटर डाउन है.
बॉस का सूजा हुआ चेहरा...मतलब_ चैनल की टीआरपी की मां...चु...गई है.


आज बॉस का चेहरा बेहद तपा हुआ था. जमाने भर का संताप और खुंदक इकट्ठा होकर जैसे चेहरे पर जमा हो गए थे. मतलब साफ़ था. आज टीवी टेन की टीआरपी चार-पांच प्वाइंट नीचे चली गई है. बॉस के पीछे-पीछे न्यूज़ रूम में दाख़िल होने वाले दोनों एक्जीक्यूटिव एडिटर विनोद पांडे और प्रीतेश भटनागर की भी यही हालत थी.
सबको समझ में आ गया कि ये लोग चैनल के सीईओ के साथ टीआरपी की रिव्यू मीटिंग से आ रहे हैं. आज कईयों के कपड़े फटने वाले हैं. आज कोई कितना भी अच्छा काम कर ले, किसी को शाबासी नहीं मिलने वाली. हां, जो भी बॉस के रडार में आएगा, उसकी बैंड ज़रूर बजेगी. आज की गलती पर न सही, कल परसों की किसी गलती पर. बॉस की नज़र से बचने के लिए न्यूज़ रूम में मौजूद प्रोडयूसर और रिपोर्टर व्यस्त दिखने की कोशिश करने लगे. तभी बॉस की तेज आवाज़ न्यूज़ रूम में गूंजी...


''तुम...तुमने आज फिर दोपहर एक बजे का बुलेटिन क्रिकेट या क्राइम की ख़बर से खोलने की बजाय पोलिटिकल ख़बर से खोल दिया. क्या तमाशा है...कह-कह के थक गया...व्हाई डोन्ट यू अंडरस्टेंड यार...कहां दिमाग रहता है तुम्हारा...'' बास रनडाउन प्रोडयूसर अजय ठाकुर के सामने खड़ा था. अजय की सिट्टी-पिट्टी गुम थी. कभी वह अपने कंप्यूटर को देख रहा था, कभी दुर्वासा की तरह तमतमाए बॉस को. उसके कंप्यूटर पर लाल-पीली-हरी पट्टियां लगातार ऊपर-नीचे हो रही थीं. यह
पट्टियां उन ख़बरों की थी, जो टीवी टेन न्यूज़ चैनल पर चल रही थीं या फिर चलने वाली थीं.


अजय ठाकुर कांपती उंगलियों से माउस को भी इधर-उधर कर रहा था, ताकि चैनल पर कुछ गलत न चला जाए...'क्या बोलूं या न बोलूं...' अजय कुछ जवाब सोच पाता, उससे पहले बॉस की तेज आवाज़ उसके भीतर तक धंस गई.
''...अजय...आई एम आस्किंग यू...गिव मी एन आनसर...व्हाई डोन्ट यू अंडरस्टैंड... अगर बात समझ नहीं आती है तो कल से रनडाउन पर बैठना छोड़ दो...''


अजय को पता था कि उसका हर जवाब अभी आग में घी का काम करेगा. बॉस जब आग उगल रहा हो तो कोई फायर ब्रिगेड भी उसे कंट्रोल नहीं कर सकता. जो उसे बुझाने की कोशिश करेगा वह खुद जल जाएगा...वह सवाल पूछता ही इसलिए है कि रिरियाते हुए सरेंडर करो...न कि जवाब दो...जवाब देना तो ज़बानदराज़ी है.
फिर भी अजय ठाकुर ने जवाब देने की हिम्मत की ''...सर...क्रिकेट या क्राइम में कुछ ख़ास नहीं था, जबकि उत्तार प्रदेश विधान सभा में आज काफ़ी हंगामा हुआ...बिजली की क़िल्लत के सवाल पर...''


अजय का जवाब उसके हलक़ से पूरी तरह बाहर भी नहीं निकल पाया था कि बॉस की ज़ोरदार आवाज़ गूंजी ''भाड़ में जाए यूपी. यूपी में पानी बिजली की क़िल्लत दूर करने का ठेका ले रखा है हमने? ये सामने देख रहे हो चैनल नाइन...क्या चल रहा है...?'' बॉस का इशारा सामने की दीवार पर लगे टीवी की तरफ़ था.


अजय ठाकुर की नज़र टीवी पैनल पर रखे कई टीवी सेटों में से उस टीवी सेट पर जा टिकी, जिस पर 'सती हुई नागिन' स्लग के साथ कोई स्टोरी चल रही थी. स्क्रीन पर थ्री विंडो नज़र आ रहा था. एक में रिपोर्टर कुछ बोले जा रहा था, दूसरे में चैनल नाइन का तेज-तर्रार एंकर अतुल भार्गव दिख रहा था और बीच के विंडो में आग में जलता एक सांप दिख रहा था.
अजय से रहा नहीं गया ''...सर बहुत बकवास स्टोरी है...ये स्टोरी हमारे रिपोर्टर ने भी भेजी थी, लेकिन हमने ड्राप कर दिया...ये कुछ सपेरों की बदमाशी थी...गांव के अंधविश्वासी लोगों पर अपना जादू चलाने के लिए कुछ सपेरों ने...''


अजय की बात अधूरी रह गई. बॉस फिर चीखा, ''...शटअप यार, जब मैं तुम्हें समझाने की कोशिश करता हूं तो तुम मुझे ख़बर समझाने लगते हो...हमें टीआरपी चाहिए, समझे...और टीआरपी बिजली-पानी से नहीं मिलने वाली है..."
अजय के पास अब कोई जवाब नहीं था. सिर झुकाए सिर्फ़ इतना कहा उसने, ''...सर मैं इस नागिन वाली ख़बर को हेडलाइन बनाकर अगले बुलेटिन में ले लेता हूं...''
''न सिर्फ़ हेडलाइन लो बल्कि अपने रिपोर्टर से चैट भी कर लो...और हां... कोशिश करो इस ख़बर को कम-से-कम एक घंटे तक ताने रहो...दर्शकों से लाइव सवाल-जवाब होने दो...पूरा तान दो... समझे...''


''सर...''
''...और आइंदा ऐसी ख़बरों पर नज़र रखा करो...'' बॉस बेहद भन्नाया हुआ था. अजय ठाकुर अगर कुछ देर और उससे ज़िरह करता तो शायद वह उसे उसी वक्त नौकरी छोड़कर जाने का फ़रमान सुना देता. लोग कहते हैं...अगर बॉस के सामने सरेंडर कर दो तो वह जान बख्श देगा...ज़िरह करोगे तो ले...लेगा...हर हफ्ते वह किसी-न-किसी की ले...लेता है...अजय कतई नहीं चाहता था कि उसकी ली जाए...वह भी सरेआम... ज़ंग में हारे हुए सिपाही की तरह अजय ने सिर झुकाया और बॉस के आदेश को अध्यादेश मानकर अपनी सीट पर बैठ गया...बॉस ने कुछ सेकेंड तक उसे घूरकर देखा और दूसरी ओर चला गया...अजय अपने कंप्यूटर पर रनडाउन बनाने में जुट गया. दो बजे का बुलेटिन शुरू होना था. ख़बरों को सिलसिलेवार
अजय अभी अगले बुलेटिन की तैयारी में उलझा ही था कि न्यूज़ रूम के चिल्ल पों के बीच फिर बॉस की आवाज़ आई...सिर उठाकर देखा तो न्यूज़ रूम में बाईं तरफ़ बने एसाइनमेंट डेस्क के पास वह अब नीलेश गुप्ता की क्लास ले रहा था.


नीलेश गुप्ता यानी अजय ठाकुर का इमीडिएट बॉस और आफ्टरनून बुलेटिन का इंचार्ज ख़ुद को महाज्ञानी मानने वाले नीलेश गुप्ता का संक्षिप्त परिचय यह है कि दुनिया का कोई ऐसा विषय नहीं, जिस पर नीलेश चोंच लड़ाने को तैयार न हो...न सिर्फ़ वह चोंच लड़ाने को तैयार रहता है बल्कि अगर किसी ने उसके चोंच से अपनी चोंच भिड़ाई तो वह चोंच मारने को तैयार हो जाता है...


वह हमेशा लोगों को अपने बौध्दिक ज्ञान के अखाड़े में लाकर मारता है...पॉलिटिकल रिपोर्टर से जेपी आंदोलन और संविद सरकारों के जमाने की बात करेगा...खुद को अच्छा कॉपी राइटर मानने वाले शख्स से तब तक साहित्य विमर्श करेगा जब तक वह मान न ले...'प्रभु आप महान हैं मैं तो आपके सामने कुछ भी नहीं'...किसी क्राइम रिपोर्टर को मारियो पूजो और माफ़िया का इतिहास न जानने पर लताड़ लगा देगा...फ़िल्म रिपोर्टर पर धौंस जमाने के लिए मूक फ़िल्मों के ज़माने से शुरू होकर भुवन सोम और पाथेर पंचाली पर लेक्चर दे डालेगा...


मतलब यह कि अपने को महाज्ञानी साबित करने के लिए नीलेश हमेशा मौक़े की ताक में रहता है...
लोग कहते हैं कि टीवी में आने से पहले नीलेश ने आठ-दस साल तक किसी डमडमडिगा टाइप के अख़बार में नौकरी की. काम-धाम ज्यादा था नहीं, कई किलो वजन की किताबें दीमक की तरह चाट गया. किताबी ज्ञान का यहां कोई इस्तेमाल होता नहीं है इसलिए बुध्दि विलास करता रहता है...बौध्दिक आतंकवाद फैलाता रहता है...उसके अंग-अंग से हमेशा बौध्दिकता टपकती रहती है...चूती रहती है...सब उसे बहुत बड़ा कठकरेजी मानते हैं और उससे चोंच लड़ाने से बचते हैं...हां अगर किसी की स्टोरी में कोई पेंच फंस जाए तो नीलेश ज़रूर काम आ जाता है.


वह काम कम चकल्लस ज्यादा करता है. उसका मानना है नीचे वालों का काम है_काम करना, ऊपर वालों का काम है_काम करने वालों पर नज़र रखना...और नीलेश वरिष्ठता के मामले में बहुतों से ऊपर आ चुका था. अब वह 'मूतो कम हिलाओ ज्यादा' की परंपरा का ध्वजवाहक हो गया था.


कैंटीन से कुछ खा-पीकर फुदकते हुए आ रहे नीलेश को कतई अंदाज़ा नहीं था कि बॉस ने न्यूज़ रूम में कोहराम मचा रखा है, वरना वह कुछ देर तक तो न्यूज़ रूम में आता ही नहीं. नीलेश हमेशा यही करता है. अगर उसे पता चल जाए कि बॉस का मूड खराब है और वह न्यूज़ रूम में लोगों के कपड़े फाड़ रहा है, तो वह किसी सुरक्षित जगह पर कुछ देर बिताकर ही इस डेंजर जोन में आता है...फिर सबसे पता करता है बॉस ने आज किस-किस की बैंड बजाई. उसके बाद मजे ले-लेकर लोगों को क़िस्से सुनाता है...गुरु, आज बॉस ने तो फलां के कपड़े फाड़ दिए...गुरु, आज बॉस ने तो फलां की बत्ताी बना दी...गुरु, आज बॉस ने तो फलां की पेंट उतार ली...लेकिन आज पहली बार सरेआम नीलेश की पेंट उतरने लगी.


बॉस दबोचने वाले अंदाज़ में कह रहा था, ''...यार, तुम लोग तो बिल्कुल अक्ल से पैदल हो...जिस ख़बर को ताना जा सकता है, उसी को दो-मिनट में निपटा देते हो...आज नागिन वाली स्टोरी को तुम लोगों ने प्ले अप ही नहीं किया...कल भी जालंधर के गांव में भूत लीला वाली स्टोरी को खेल नहीं पाए...''
''...सर, वो तो हमने चलाया था क़रीब बीस मिनट तक...''
''...'नेशन न्यूज़' चैनल ने कितनी देर तक चलाया था...?''
....................
''...फिर...? अरे यारे...उस ख़बर में टीआरपी थी...तुम यहां बिजली-पानी चलाते रहो और चैनल को नीचे से पहले नंबर पर पहुंचा दो.''
''...सर, लेकिन उसमें कुछ था भी नहीं...''


''फिर बक़वास...ये चुतियापे वाली फिलासफ़ी को कहीं कूड़ेदान में डाल आओ...यार, ऐसी ख़बरों को तानने के लिए क्या चाहिए...किसी मनोचिकित्सक को बुला लो...रिपोर्टर को चैट के लिए खड़ा करो...दर्शकों के दस-बीस फ़ोनो ले लो...जाहिर है ऊल-जलूल कुछ सवाल पूछे जाएंगे. बस...एंकर और मनोचिकित्सक से जवाब दिलवाते रहो...हो गया एक घंटा...''
''जी सर...'' नीलेश बुरी तरह मिमिया रहा था. कोई और होता तो नीलेश निपट भी लेता, मगर बॉस के सामने उसकी जुबान दगा दे रही थी. पहली बार न्यूज़ रूम में उसका सार्वजनिक अभिनंदन हो रहा था. ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था. बॉस नीलेश की ले...रहा था...और न्यूज़ रूम में इधर-उधर काम कर रहे कई लोग बॉस के खौफ़ से आक्रांत होकर भी भीतर-भीतर मजे ले रहे थे.

अपने सीनियर एडिटर नीलेश के कपड़े फटते देखकर अजय ठाकुर की तकलीफ़ थोड़ी कम हो गई थी...हर बार बॉस के ओखल में अपने जूनियर का सिर डालकर बच निकलने वाले नीलेश गुप्ता की आज लग गई थी. छह महीने पहले जब अजय ठाकुर ने टीवी टेन ज्वाइन किया था, तब इसी नीलेश गुप्ता ने एक दिन उसे बताया था, ''यहां हर शुक्रवार को इस मीडिया हाउस के तीसरे माले पर टीआरपी मीटिंग होती है. इस मीटिंग में चैनल के सीईओ समेत सभी कर्ता-धर्ता शामिल होते हैं. जिस हफ्ते टीआरपी ठीक होती है, उस हफ्ते तो ये मीटिंग चाय-पकौड़े के साथ खुशनुमा माहौल में ख़त्म होती है. जिस हफ्ते टीआरपी तीन-चार प्वाइंट गिर जाती है, उस हफ्ते बॉस की बैंड सीईओ बजाता है और बॉस नीचे आकर बाकियों की बैंड बजाता है. तुम रनडाउन प्रोडयूसर हो, इसलिए तुम हमेशा बजने के लिए तैयार रहना.


''लेकिन नीलेश जी...शिफ्ट इंचार्ज तो आप हैं, जवाबदेही तो आपकी भी होगी...'' अजय ठाकुर ने पूछा था.
''...गुरु ऐसा है...मेरे पास और भी दस काम होते हैं...आने वाले कई प्रोग्राम की प्लानिंग करनी होती है...रनडाउन का जिम्मा तुम्हारा है...जब कोई कन्फ्यूज़न हो तो मुझसे पूछ लिया करना...'' नीलेश ने एक संपादक की तरह अजय को समझाया था. इतने दिनों में अजय ने जब भी अच्छा काम किया, सारा क्रेडिट कूद-कूद कर नीलेश ने लिया और जब गलतियां हुईं तो टोपी उसे पहना दी. बॉस ने आकर उसकी ले ली. हर बार नीलेश पल्ला झाड़कर खड़ा हो गया, ''...सॉरी बॉस, मैं तो वीकेंड की प्लानिंग कर रहा था...मैं ध्यान नहीं दे पाया, वरना ये गलती नहीं होती...''


अजय ठाकुर की सीट से कुछ दूर खड़ा बॉस अब भी नीलेश को टीआरपी बटोरने वाली ख़बरों की बारीकियां समझा रहा था, ''...तुमने देखा था_अलवर के एक सिरफ़िरे शख्स ने यमराज से मुलाक़ात की बात कहकर कैसे सबको उल्लू बना बनाया... 'इंडिया न्यूज़ चैनल' ने तीन घंटे तक इसे चलाकर टीआरपी बटोर ली न...'' बॉस का पारा कुछ नीचे लुढ़का था. वह समझाने वाले अंदाज़ में आ गया था.


''पिछले हफ्ते तो उन लोगों ने भूतहा कार वाली स्टोरी दिखाकर चार घंटे तक ड्रामा किया. उस स्टोरी में क्या था यार? लेकिन ड्रामा ने चैनल की तो नैया पार लगा दी न. उनका एक शुक्रवार तो निकल गया, हमारे लिए काला शुक्रवार हो गया...ब्लैक फ्राइडे...डू यू अंडरस्टैंड...ब्लैक फ्राइडे?'


''जी सर...लेकिन कई बार लगता है कि हम टीआरपी के चक्कर में...'' नीलेश के भीतर के पत्रकार ने न चाहते हुए भी प्रतिकार करने की कोशिश की, लेकिन उसके वाक्य ने आधे रास्ते में ही दम तोड़ दिया.
''फिर तुम वही बात कर रहे हो...अब जनता चुतियापे वाली स्टोरी ही देखती है तो चुतियापे करते रहो...राखी सावंत को मीका ने एक बार चूमा लेकिन उसने तीन दिन में तीन सौ बार चूमते हुए दिखाया...और जनता ने देखा...तो हम क्या करें...हमने राखी सावंत को कम दिखाया तो पिट गए ना?'' बॉस की भृकुटी फिर तनी थी.


बॉस और नीलेश के संवाद को दूर बैठा अजय ठाकुर चुपचाप सुन रहा था. दिनभर ख़बरों के गिरते स्तर पर भाषणबाजी करने वाले नीलेश की सिट्टी-पिट्टी गुम थी, क्योंकि यहां बात ख़बर की नहीं टीआरपी की हो रही थी.
टीआरपी बरसों पहले रेडियो सिलॉन पर चलने वाले संगीत कार्यक्रम बिनाका गीतमाला की तरह है, जो यह तय करता है कि कौन चैनल किस पायदान पर है. कौन इस हफ्ते ऊपर चढ़ा, कौन नीचे लुढ़का. एक फ़र्क़ है_बिनाका गीतमाला के पायदान पर ऊपर-नीचे होने से किसी म्यूजिक कंपनी में कोहराम नहीं मचता था. यहां हर शुक्रवार को कई चैनलों में टीआरपी के ऊपर-नीचे होते ही कोहराम मच जाता है. एक दिन बॉस जब अच्छे मूड में था, तो संपादकीय मीटिंग में उसने कहा भी था, ''...कितना अच्छा होता अगर ज़िंदगी में कभी शुक्रवार नहीं होता.''


अजय ठाकुर और फिर नीलेश गुप्ता को निपटाकर बॉस पलटा तो सामने इनवेस्टिगेटिव ब्यूरो के चीफ़ समरजीत सिंह पर उसकी नज़र पड़ गई. जब-जब चैनल की ग्रह दशा खराब होती है, समरजीत में बॉस को संकटमोचक नज़र आता है.
''यार कल शाम को चैनल नाइन एक खुलासा करने जा रहा है. सुना है कोई बहुत बड़ा स्कूप है.''
''...हां सर...कोई स्टिंग ऑपरेशन है...सुना है कुछ बड़े-बड़े लोग फंसे हैं...''
''...तो क्या लगता है टीआरपी मिल जाएगी इस प्रोग्राम को...?''


''...अब सर ये पता नहीं, लेकिन जिससे पता चला है कि बाक़ी चैनल भी उस समय के लिए जवाबी तैयारी कर रहे हैं.''
''...तुम्हारे पास क्या तैयारी है...?'' बॉस की पेशानी पर परेशानी की रेखाएं और गहरी हो गईं.
''...सर उसी के चक्कर में लगा हूं...रात तक एक एक्सक्लूसिव प्लान बनाकर आपको देता हूं...'' समरजीत का अंदाज़ बॉस को खुश करने वाला था. हमेशा वह यही करता है. पता नहीं, बॉस को वह क्या घुट्टी पिलाकर रखता है कि टीआरपी गिरने पर सबकी बैंड बज जाती है, लेकिन वह अक्सर बच जाता है. लोग कहते हैं वह बॉस का मुंहलगा है और जासूस भी. न्यूज़ रूम की हर ख़बर बॉस तक पहुंचाना उसका ख़ास काम है. एक ख़ास बात और है उसमें. राई को पहाड़ बनाना और सुई को तलवार बनाना जितना उसे आता है, किसी और को नहीं. दो मिनट की स्टोरी का रायता फैलाकर दो घंटे तक पेल देने में उसे महारत हासिल है...उसे पता है कि कब और कैसे किस स्टोरी को बेचा जा सकता है. तानने-खेलने और पेलने में समरजीत का कोई सानी है.


रिपोट्र्स मानते हैं_स्टोरी बेचना तो कोई समरजीत सिंह से सीखे...हफ्ते दो हफ्ते में जैसे ही 'टीवी टेन' के काले स्क्रीन पर लिखा हुआ आता है_टेलीविजन इतिहास में पहली बार...एक सनसनीखेज खुलासा...आज रात नौ बजे...सारे चैनलों के सूरमाओं को अंदाज़ा हो जाता है कि यह पटाखा समरजीत सिंह का ही होगा...उसका पटाखा भले ही आवाज़ कम करे, धुआं बहुत छोड़ता है, मतलब यह कि उसके फुस्स होने पर भी सनसनी फैल जाती है. नमालूम कितनी बार उसने ऐसे पटाखे चलाए हैं. कुछ धमाके के साथ फूटे, कुछ बेआवाज़ रहे. कहते हैं जब इस देश में किसी भी न्यूज़ चैनल के किसी रिपोर्टर को कोई सनसनीखेज़ स्टोरी नहीं मिलेगी, तब भी समरजीत कहीं-न-कहीं से कुछ ज़रूर खोज कर लाएगा...सनसनीखेज़ स्टोरी खोजने के मामले में वह वास्कोडिगामा है. बॉस ने अपने वास्कोडिगामा को चैनल नाइन के खुलासा का मुक़ाबला करने की रणनीति तैयार करने का जिम्मा दे दिया...


''...रात तक नहीं, इतना टाइम नहीं है. शाम पांच बजे मीटिंग है मेरे केबिन में. तब तक प्लान तैयार कर लो.'' बॉस तेज कदमों से अपने केबिन की तरफ़ चला गया. समरजीत को एक टास्क मिल गया. उसने तत्काल अपनी खोजी टीम के सदस्यों को इकट्ठा किया और आपात बैठक करने के लिए कांफ्रेंस रूम की तरफ़ चल पड़ा.
इधर पूरे न्यूज़ रूम में हलचल शुरू हो गई. नेशनल ब्यूरो प्रमुख धीरज महाजन तीन-चार संवाददाताओं को साथ लेकर कोने में जम गए. महाजन साहब को इस बात का मलाल था कि बॉस ने इस बार भी चैनल नाइन को काउंटर करने का प्लान उनसे नहीं, बल्कि समरजीत सिंह से मांगा था. उन्हें अपने फ़ालतू होने का अहसास हो रहा था. गम गलत करने के लिए महाजन साहब परनिंदा और गॉसिप में जुट गए। संध्या सदानंद भी उनकी चौकड़ी में शामिल हो गई थी. महाजन साहब जब भी गमगीन होते हैं, संध्या की मौजूदगी भर से उनका गम कुछ हल्का हो जाता है.


पालिटिकल एडिटर नीरज जैन माहौल भांप कर लिफ्ट की तरफ़ चल पड़े. टीआरपी गिरने की समीक्षा और उसे उठाने की रणनीति बनाने में जैन साहब को न पहले कभी मजा आता था न अब. मोटी तनख्वाह है. लंबी गाड़ी है. करने को कोई काम नहीं. फिर भी अगर किसी दिन टीआरपी में जाना पड़ता है, तो उनकी सुलग जाती है. झुन्न हो जाते हैं. जैन साहब का यह हाल तब से हुआ है, जब से चैनलों की दिशा बदली है...चैनल पर नेताओं की जगह भूतों ने ले ली है...ख़बरों की जगह ड्रामे ने ले ली है...पार्टियों के क़वरेज की जगह नाग-नागिन ने ले ली है...जैन साहब को लगता है रियलिटी शोज ने उन्हें हाशिए पर डाल दिया है. अब सिर्फ़ कहने को वह पालिटिकल एडिटर रह गए हैं, लेकिन एडिट करने को उनके पास कुछ रहा ही नहीं है. पहले रोज़ टीवी पर दिखते थे. देश के अलग-अलग शहरों से राजनीतिक रिपोर्टिंग करते थे. लाइव चैट और फ़ोनों करके छाए रहते थे...नेताओं की दो-चार बाइट लेकर हर रोज़ एक-दो स्टोरी पेल दिया करते थे. दनादन चैट या फ़ोनों करके अपनी स्टोरी को चमका देते थे.


और अब...हर रोज़ सुबह की मींटिंग में पालिटिकल स्टोरी का आयडिया देते ज़रूर हैं लेकिन बॉस उन्हें सिरे से खारिज़ कर देता है. जैन साहब को कई बार लगता है कि आयडिया को नहीं, उन्हें खारिज़ कर दिया गया है.
एक तो टीवी स्क्रीन से लुप्तप्राय होने का फ्रस्ट्रेशन, ऊपर से हर रोज़ आयडिया खारिज़ होने का फ्रस्ट्रेशन...जैन साहब का फ्रस्ट्रेशन लाइलाज होता जा रहा है. पहले रोज़ फिटफाट होकर दफ्तर पहुंचते थे. तीन-चार बार बाथरूम में जाकर बालों पर कंघी फेरकर टनाटन होकर न्यूज़ रूम के चक्कर लगाते रहते थे. पता नहीं अचानक कब-कहां चैट के लिए खड़ा होना पड़े.
अब देखिए...अक्सर इस हाल में ऑफ़िस पहुंचते हैं कि विक्स वेपोरब वाला मिल जाए तो पूछ बैठे_ये क्या हाल बना रखा है...कुछ लेते क्यों नहीं...


अब न तो वह पार्टी दफ्तरों में देखे जाते हैं, न ही नेताओं के घरों पर...कई बार तो चैनल में भर्ती हुए नए बच्चों को ज्ञान की खुराक़ देते नज़र आते हैं. पोलियो ड्राप...दो बूंद ज़िंदगी की...जैसी.
रिपोर्टर, एंकर या प्रोड्यूसर बनने का सपना लिए 'टीवी टेन' में भर्ती हुए नए बच्चे गौर से जैन साहब की बात सुनते हैं...जब वह चुनाव की रिपोर्टिंग किया करते थे तो कैसे दूसरे चैनलों को कोसों पीछे छोड़ देते थे...राजनीति में कोई पत्ता भी खड़कता था तो कैसे सबसे पहले उन तक उसकी आवाज़ पहुंचती थी और वह ब्रेकिंग न्यूज़ देकर छा जाते थे...कैसे संसद सत्र के दौरान मिलने पर दर्जनों सांसद उन्हें डिनर पर आने का न्यौता देते थे...कैसे टाइम नहीं होने की वजह से उन्हें क्षमा मांगनी पड़ती थी...प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री कैसे उन्हें अपने साथ लिए बग़ैर किसी विदेश दौरे पर नहीं जाते थे...वग़ैरह...वग़ैरह. यानी बीते दिनों की हर वह बात, जो जैन साहब को अपने गौरवशाली अतीत की तरह लगती है, नए बच्चों को सुनाते रहते हैं. और बच्चे...वह भी अब जैन साहब को देखकर भागने लगे हैं क्योंकि मौक़ा मिला नहीं कि वह चिपट जाते हैं और शुरू हो जाते हैं.


अपना फ्रस्ट्रेशन शेयर करने के लिए जैन साहब ने लाइट माइंडेड लोगों की एक तिकड़ी भी बना ली है. चैनल की दशा और दिशा पर चिंतन करना जैन साहब का सबसे अच्छा टाइम पास है. इस चिंतन में उनके साथ हमेशा हैं, उनके दो साथी, यानी तिकड़ी के सदस्य सीनियर एडिटर अभिनव त्यागी और एसोसिएट एक्जीक्यूटिव प्रोडयूसर कौशल किशोर. जैन साहब ने सोचा, कुछ देर बाद बॉस के कमरे में बदमज़गी होगी ही, क्यों न उससे पहले बाहर की फ्रेश हवा और शंकर की चाय का लुत्फ़ उठा लिया जाए.
इधर पूरे न्यूज़ रूम में ख़बर फैल गई कि सीनियर्स की मीटिंग बुलाई गई है. मीटिंग का एजेंडा है...कल रात चैनल नाइन पर चलने वाली ख़ास रिपोर्ट का जवाब कैसे दिया जाए.
शाम पांच बजे समय से पहले ही बॉस के केबिन में टीवी टेन के सारे दिग्गज़ जमा हो गए. बॉस के सामने वाली कुर्सी पर चैनल के दोनों एक्जीक्यूटिव एडिटर विनोद पांडे और प्रीतेश भटनागर ने आसन ग्रहण किया. उनके अगल-बगल नीलेश गुप्ता समेत इनपुट और आउटपुट के पांचों सीनियर एडिटर एक-एक कुर्सी थामकर बैठ गए. नेशनल ब्यूरो चीफ़ धीरज महाजन, पालिटिकल एडिटर नीरज जैन और इन्वेस्टिगेटिव ब्यूरो चीफ़ समरजीत सिंह भी पीछे की कुर्सियों पर जम गए. माहौल मेंं तनाव घुला हुआ है. टीआरपी लुढ़कने का तनाव! मीटिंग की शुरुआत बॉस ने की.


''कल चैनल नाइन पर चार घंटे तक सनसनीखेज़ खुलासा होने वाला है. हमें कुछ काउंटर करना होगा...अगर इस हफ्ते हम अपने आपको नहीं बचा पाए तो...?'' बॉस ने बात अधूरी छोड़ दी. सबको स्कैन करती हुई उसकी आंखें तेजी से घूमी और केबिन के एक कोने पर टिक गई. वहां रखे टीवी सेटों पर अलग-अलग चैनल चल रहे थे.
बॉस की नज़र चैनल नाइन पर थी. वही चैनल नाइन, जिसने पिछले तीने महीने में टीवी टेन को टीआरपी के जंग में कई बार पछाड़ दिया था. इस शुक्रवार की टीआरपी में भी चैनल नाइन ने बाजी मार ली थी. अगले हफ्ते भी यही हाल रहा तो...घ् शायद यही सोच रहा था बॉस. चैनल नाइन को वह यूं देख रहा था, जैसे दुश्मन सामने हो और उसे अखाड़े में चित्ता करने के लिए उसकी कमजोरियां तलाश रहा हो...


उसका चेहरा अचानक सख्त हो गया था...तनाव, खीझ और बेबसी...सब कुछ एक साथ चेहरे पर उमड़ पड़ा था...उसके निचले होंठों को दांतों ने आगे बढ़कर दबोच लिया था...टेबल के नीचे उसके पैर इतनी तेजी से हिल रहे थे कि कुर्सी में घुसी उसकी पतली काया उस कंपन को पचा नहीं पा रही थी...तभी चैनल नाइन के स्क्रीन पर एक लाल पट्टी आई...एक सनसनीखेज़ खुलासा...टेलीविजन इतिहास में पहली बार...शनिवार रात आठ बजे से लगातार... बीस सेकेंड का यह प्रोमो जैसे ही ख़त्म हुआ, बॉस के पैरों का हिलना बंद हो गया...दांतों ने होंठों को आजाद कर दिया...

''...इन सालों ने हद कर रखा है...हर हफ्ते कोई-न-कोई स्टिंग ऑपरेशन, खुलासा या चुतियापे की कोई स्टोरी कहीं से ले आते हैं और चार-पांच घंटे तक पेल देते हैं...हमारा काम लगा देते हैं...इस बार भी हमारी लग जाएगी...उधर सीईओ ने साफ़ कह दिया है कि हम तीसरे या चौथे नंबर पर होना एफ़ोर्ड नहीं कर सकते. आप लोग बताइए हम क्या करें...?'' अचानक बॉस ने सामने बैठे लोगों की तरफ़ सवाल उछाल दिया.


एसोसिएट एडिटर दिवाकर गुप्ता ने बॉस के सवाल को तुरंत लपका. तनाव से जूझ रहे बॉस को खुश करने के लिए दिवाकर ने दनाक से अपना जवाब चिपका दिया, ''सर, मुझे लगता है हमें घबराने की ज़रूरत नहीं है. यूपी के गैंगस्टर बबलू श्रीवास्तव की आत्मकथा के कुछ हिस्से आज अख़बारों में छपे हैं. बाक़ी हिस्सों में भी बहुत मसाला है. हम डॉन की दास्तान को स्पेशल रिपोर्ट बनाकर चला सकते हैं...''


गुप्ता जी ने तो सोचा था कि इससे पहले कि किसी और का आयडिया बॉस को क्लिक़ कर जाए क्यों न अपनी पेल दें, लेकिन बात जमी नहीं. बॉस ने एक पल में खारिज़ कर दिया. ''नहीं...स्टोरी अच्छी है. लेकिन ड्रामा नहीं है...किसी और दिन के लिए ठीक है, चैनल नाइन के काउंटर के लिए नहीं...'' गुप्ता जी का मुंह सूखे हुए छुहारे की तरह हो गया. सारा उत्साह एक सेकेंड में भीतर घुस गया.


अब बारी उनके ठीक बगल में बैठे एसाइनमेंट डेस्क के सीनियर एडिटर परवेज हयात की थी. परवेज को बार-बार नागपुर कॉरस्पोंडेंट शिखा पॉल की स्टोरी आयडिया का ख्याल आ रहा था.
आज सुबह-सुबह सबसे पहला फ़ोन शिखा का ही आया था. ''सर, विदर्भ में खुदकुशी करने वाले किसानों की तादाद आज एक हज़ार हो गई है. हम लोग इस पर एक घंटे का शो कर सकते हैं. मैं कई दिनों से कह रही हूं. कोई सुनता ही नहीं.'' शिखा ने बेरुख़ी से कहा था.


फिर उसने खीझते हुए सवाल पूछा था_''सर, क्या अब चैनलों के लिए किसानों के मरने का कोई मतलब नहीं रह गया है? क्योंकि इसमें कोई ड्रामा नहीं है? इस बार हमने तो इस स्टोरी में काफ़ी ड्रामा और रोना-धोना भी डाल दिया है. प्लीज सर..एक हज़ारवीं खुदकुशी पर तो एक स्पेशल शो बनाकर चला दीजिए...'' शिखा की दलील सुनने के बाद परवेज ने प्राइम टाइम में विदर्भ के हाल पर आधे घंटे का शो प्लान करने का फैसला भी कर लिया था. सोचा था बॉस को कन्विंस कर लेगा. इसी बीच यह टीआरपी आ गई और चैनल नाइन के खुलासे का ऐलान. अब किसान चाहे एक सौ मरें या एक हज़ार, यह ख़बर न तो टीआरपी दे सकती है, न ही किसी चैनल के खुलासे का मुक़ाबला कर सकती है. परवेज साहब ने स्पेशल शो के आयडिया को अपने भीतर ही दफ़न कर दिया. उन्हें पता था अगर अभी किसानों की खुदकुशी पर शो करने की बात भी की तो बॉस उनका मजाक़ उड़ा देगा. परवेज़ साहब अपने भीतर थे और बॉस की नज़र उन पर टिकी थी. कुछ सोच-विचार के बाद परवेज ने टीआरपी के मिजाज से मेल खाती हुई एक स्टोरी आगे बढ़ाई.


''गाजियाबाद में एक महीने के भीतर दस बच्चे गायब हुए हैं. कहते हैं कोई गिरोह है जो बच्चों को...''
परवेज़ साहब का वाक्य फुलस्टाप तक पहुंच पाता उससे पहले ही बॉस ने कौमा लगा दिया. ''मुझे पता है कुछ बच्चों के परिवार वाले स्टूडियो भी आने को तैयार हैं, लेकिन इसमें उतनी टीआरपी नहीं है...मुझे टीआरपी चाहिए यार...''
केबिन में कुछ सेकेंड के लिए फिर चुप्पी छा गई. शीशे के केबिन के बाहर गहमागहमी और भागदौड़ थी...भीतर सन्नाटा. अब बॉस के एक हाथ की उंगलियां टेबल पर पड़े लैपटॉप के माउस पर घूम रही थीं और दूसरे हाथ की उंगलियां उसकी पेशानी को सहला रही थीं.


सहलाते-सहलाते उसकी उंगलियों का दबाव उसकी पेशानी पर बढ़ गया था. पांचों उंगलियां कभी एकजुट होकर उसकी आंखों के ऊपर के हिस्से को दबा रही थीं तो कभी ललाट को. बॉस की उंगलियां चाहे-अनचाहे चेहरे पर उभर आए तनाव को कम करने का तरीका खोज रही थीं. लेकिन उसकी नज़र अब भी रह-रहकर चौदह इंच के मॉनिटर में कैद दुश्मन पर टिकती थी...यानी चैनल नाइन पर...


एक राष्ट्रीय अख़बार की नौकरी छोड़कर कुछ महीनों पहले ही टीवी टेन में इनपुट एडिटर बने साकेत वर्मा के भीतर उथल-पुथल मची थी. स्टोरी आयडिया तो कई आ रहे थे लेकिन डर लग रहा था, कहीं उल्टा न पड़ जाए. वैसे भी बॉस उन्हें कई बार कह चुका था...आप अख़बारी खोपड़ी लेकर चैनल में आ गए हैं. पहले अपनी खोपड़ी की सफाई करिए...विजुअल इम्पैक्ट को समझिए...फिर भी हर रोज़ कहीं-न-कहीं उनसे चूक हो जाती है. उन्हें लग रहा था कि आज अगर कोई आयडिया नहीं दिया तो बॉस समझ लेगा अख़बारी खोपड़ी में अभी तक टीवी नहीं घुस पाया है.


बहुत हिम्मत करके उसने आख़िरकार मुंह खोल ही दिया, ''...सर, मध्यप्रदेश में शिक्षकों की बहाली में धांधली पर हमारे दो रिपोट्र्स ने काफ़ी काम किया है...उस स्टोरी को अगर हम दो घंटे के शो के हिसाब से प्लान करें...मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेताओं को स्टूडियो में बुलाकर सवाल-जवाब करें तो शायद...'' साकेत को अपनी बात अधूरी छोड़नी पड़ी. बॉस का चेहरा देखकर समझ गया कि वह गलत डायरेक्शन में जा रहा है.


''...यार, आप सब लोग उन ख़बरों की बात कर रहे हैं जो साल-दो साल पहले टीवी पर चलती थीं.'' बॉस ने साकेत को तिरस्कार करने वाले अंदाज़ में देखा था. कुछ यूं कि...चूतिए...बात टीआरपी वाली ख़बरों की हो रही है और तुम क्या बक़वास आयडिया पेल रहे हो...मन लायक कोई स्टोरी आयडिया नहीं आते देख बॉस बौखला गया. बॉस का ब्लडप्रेशर बढ़ रहा था.
''...लेकिन बॉस हम लोग यूं ही टीआरपी के चक्कर में ऊलजलूल ख़बरें चला-चलाकर लोगों की नज़र में अपनी क्रेडिबलिटी ख़त्म करते जा रहे हैं...हमें लांग टर्म सोचना चाहिए...'' अब तक चुपचाप बैठे एक्जीक्यूटिव एडिटर प्रतीेश भटनागर से रहा नहीं गया. वह सैद्धांतिक सवाल खड़े करने के मूड में आ गए.


''यार प्रीतेश, क्रेडिबलिटी की चटनी बनाकर चाटेंगे क्या...? हम ज्यादा लांग टर्म सोचेंगे तो हम ही शाट टर्म हो जाएंगे...समझे? मार्केटिंग वालों ने कह दिया है कि टीआरपी यूं लढ़कती रही तो इस फाइनेंशियल इयर में तीस-चालीस करोड़ का नुकसान हो जाएगा...और अगर वाक़ई ऐसा हुआ तो क्रेडिबलिटी बत्ताी बनाने के काम भी नहीं आएगी...सीईओ कान पकड़कर न जाने कितनों को बाहर कर देगा...समझे?'' बॉस बुरी तरह बिदक गया. प्रीतेश की नसीहत सुनकर उसे बदहज़मी-सी हो गई.


प्रीतेश भटनागर सकपका गए. आमतौर पर बॉस उन्हें कभी नहीं झिड़कता था. वह इतना कहने की हिम्मत भी इसलिए कर पाए क्योंकि वर्षों तक वह बॉस के हम-प्याला, हम-निवाला रहे हैं. पांच साल पहले दोनों अख़बार की नौकरी छोड़कर एक साथ ख़बरिया चैनलों की दुनिया में आए...एक बॉस बना, दूसरा उसका नंबर टू...लेकिन रिश्ते में कभी गांठ नहीं पड़ी..इनकी दोस्ती तब से है, जब दोनों दिल्ली में फाक़ामस्ती किया करते थे...दिन भर चप्पल घिसते हुए अख़बारों में नौकरी खोजा करते थे...फिर दोनों को एक ही साथ बहादुर शाह जफर मार्ग पर एक अख़बार में पहली नौकरी मिली थी. दिन भर काम निपटाने के बाद दोनों तीन सौ बीस नंबर की बस पकड़कर लक्ष्मी नगर में अपने दड़बेनुमा कमरे पर आते थे.


थकान मिटाने के लिए कभी-कभी एरिस्ट्रोक्रेट या मेक्डावेल का अध्दा-पौवा खरीद लाते और अंकुरे हुए चने या मूंग के साथ गटक जाते थे. तब दोनों ने चैनल में नौकरी करने के सपने देखना तो दूर, सपने में कभी न्यूज़ चैनल भी नहीं देखा था. छुट्टी के दिन दोनों डीटीसी के सरकारी पास बनवाकर दिन भर मटरगश्ती किया करते थे...तब दोनों गरम मिजाज इतने थे कि नौकरी को हाथ पर लेकर घूमा करते थे...हमेशा हनुमान जी की पूंछ में आग लगाने को तैयार...अख़बार के मालिकनुमा संपादक ने कुछ कहा नहीं कि टेबल पर रखी अपनी स्पाइरल नोट बुक उठाई और कुर्सी छोड़कर खड़े हो गए...कुछ इस अंदाज़ में कि लो अपनी नौकरी...बत्ताी बनाकर डाल लो...


और अब...सीईओ की लताड़ को आशीर्वचन की तरह सुनने को तैयार रहते हैं लेकिन नौकरी छोड़ने को नहीं...क्योंकि तब नौकरी हज़ारों की थी...अब लाखों की है...तब बस में चलते थे...अब टोयटा कैमरी और होंडा एकार्ड जैसी महंगी गाड़ियों पर चलते हैं...


तब छुट्टियां मनाने के लिए पटना और गोरखपुर जाते थे...अब यूके और यूएस...तब यार-दोस्त, दीन-दुनिया, समाज और सरोकार से जुड़े थे...अब टीआरपी से जुड़े हैं...टीआरपी है तो नौकरी है...नौकरी है तो ये ऐशो आराम हैं...टीआरपी नहीं तो कुछ नहीं...
बॉस ने तो काफ़ी पहले ही मान लिया था...टीआरपी देवो भव...लेकिन प्रीतेश कभी-कभी प्रतिकार करके असहमत होने की खानापूर्ति करते थे...फिर अक्सर सहमत हो जाते थे.


आज भी प्रीतेश असहमत होते दिख रहे थे. लेकिन बॉस आज उनकी असहमति का थोड़ा भी सम्मान करने को कतई तैयार नहीं था. वह सबकी बजाने के मूड में था. बॉस की झिड़की सुनकर प्रीतेश गंभीर मुद्रा धारण कर चुके थे. बॉस ने प्रीतेश की आंखों में आंखें डाल दीं ''...ऐसा है प्रीतेश, मुझे भी पता है कि जो हम कर रहे हैं उसका क्या मतलब है. लेकिन न करने का क्या मतलब है, ये 'इन टीवी' की हालत देखकर समझ लो...उनके पास हो सकता है क्रेडिबलिटी हो, लेकिन टीआरपी नहीं है. एक साल में वो चैनल दूसरे से पांचवें-छठे नंबर पर पहुंच गया है...हम तो अब इससे नीचे नहीं जा सकते...समझे...''
प्रीतेश समझ गए कि इस बार मामला काफ़ी संगीन है. उन्हें याद आया. सुबह की मीटिंग में पकौड़े खाते हुए सीईओ का चेहरा...बेहद क्रूर...उसने अपने ख़ास लहजे में कह दिया था_हमें हर हाल में रेटिंग चाहिए.


बॉस ने जब उसकी बात काटने की कोशिश की थी तो उसने घूरकर देखा था. ऐसे जैसे पकौड़े के साथ बॉस का भी नाश्ता कर लेगा. अब बॉस के एक हाथ की उंगलियां माउस को छोड़कर अपने अधगंजे सिर पर घूमने लगी थी...उसकी बेचारगी साफ़ झलक रही थी...बॉस को यह अहसास हो गया कि किसी के पास कोई धांसू आइडिया नहीं है.
समरजीत उसकी आख़िरी उम्मीद है...और समरजीत...वह चुपचाप सबको सुन रहा था और अपनी जेब से अख़बारों की कतरनें निकाल-निकालकर देख रहा था.


''...तुम बताओ...?'' बॉस अब समरजीत से मुखातिब था.
''सर चैनल नाइन की स्टोरी को काउंटर करने के लिए हमारे पास पांच-छह आइटम हैं. एक-एक करके बताता हूं. जो स्टोरी सही लगती है, उस पर हम दो-तीन घंटे तक खेल सकते हैं. ये मैं प्लान करके आपको दे सकता हूं...'' समरजीत सिंह ने पांच-सात अख़बारी कतरन निकाली और एक-एक करके बॉस को स्टोरी सुनाने लगा.
पहली स्टोरी...मऊ दंगे का एक आरोपी हमारे संपर्क में है. पुलिस उसकी तलाश कर रही है लेकिन हम चाहे तो वो हमारे स्टूडियो में सरेंडर कर सकता है...ये मोस्ट वांटेड हिस्ट्रीशीटर भी है इसलिए इसका स्टूडियो में सरेंडर करना सनसनीखेज घटना होगी...बहुत खेलने लायक ख़बर है सर...


दूसरी स्टोरी...बड़ोदरा के एक गांव में दो दिन पहले एक लड़के ने खेत में एक नाग को मार दिया था...तब से कहते हैं एक नागिन उस लड़के के घर के पास बार-बार देखी जा रही है...लोगों को लगता है कि वो उसी नाग की नागिन है, जो अब बदला लेने के लिए उस लड़के की तलाश कर रही है...
बॉस की बुझी हुई आंखें पहली बार चमकीं. समरजीत को उसने बीच में ही रोका, ''...लेकिन नागिन वाली ख़बर तो आज ही सारे चैनलों पर चली है...''


''...हां सर, लेकिन ये दूसरी नागिन है. वह सहारनपुर की नागिन थी, जो अपने नाग की मौत के बाद सती हो गई. यह बड़ोदरा की नागिन है. ये स्टोरी एक्सीक्लूसिव है...सिर्फ़ हमारे पास है. लेकिन आप पहले बाक़ी स्टोरी के बारे में सुन लीजिए.''
तीसरी स्टोरी...जयपुर में एक तांत्रिक है, जो अपनी कुंडली देखकर अपने मरने की भविष्यवाणी कर रहा है. इस स्टोरी में टीआरपी की काफी गुंजाइश है. उस तांत्रिक से बात हो गई है. उसको हमने इस बात के लिए सेट कर लिया है कि वो सिर्फ़ हमारे कैमरे पर अन्तिम सांस लेने की कोशिश करे...


चौथी स्टोरी...सर, एक तो ये है कि ग्वालियर के पास एक गांव में सात साल की एक लड़की है, जिसका दावा है कि तीन जन्म पहले वह झांसी की रानी थी...वो 1857 की लड़ाई के किस्से भी सुना रही है. हम इस लड़की को स्टूडियो में बुलाकर काफी तान सकते हैं...बहुत बिकने वाली स्टोरी है...


पांचवीं स्टोरी...हरियाणा के एक गांव के लोगों के मुताबिक़ एक स्कूल में रात को भूत पढ़ाई करने आते हैं...यहां भी गांव के लोगों का मज़मा जुटाकर हम काफी रायता फैला सकते हैं. बच्चों की भीड़ के साथ शिक्षकों को भी हम..
''एक मिनट...एक मिनट...भूत वाली स्टोरी हम कई बार चला चुके हैं...ग्वालियर वाली स्टोरी में क्या-क्या मिल जाएगा...? बॉस ने चौथी स्टोरी में दिलचस्पी दिखाई.


''बॉस, वो लड़की मिल जाएगी...उसके घरवाले मिल जाएंगे...वो लड़की कहीं से पुरानी-सी तलवार भी ले आई है...लोगों को देखते ही वो तलवार चलाने लगती है...वो भी 1857 के किस्से सुनाती है...कैसे वह घोड़े पर चलती थी...कैसे तात्या टोपे से उसकी मुलाकात हुई थी...बहुत दिलचस्प मामला है सर..''
''बॉस सुन रहा था. चेहरे पर द्वंद्व भी था और क्या करें न करें की चिंता भी. कुछ महीने पहले उसने पुनर्जन्म की स्टोरी लाने वाले एक रिपोर्टर को बुरी तरह हड़काया था. उस रिपोर्टर की वकालत करने वाले इनपुट एडिटर अभय वर्मा को भी ऐसी बकवास स्टोरी को इंटरटेन न करने की हिदायत दी थी.
अभय ने तब बहुत ज़ोर देकर कहा था, ''...बॉस, इसे लोग बहुत देखेंगे.''


बॉस बुरी तरह बिदका था, ''...लोग ब्लू फ़िल्म भी देखते हैं...तो क्या चला दें...न्यूज़ बिज़नेस में हैं तो न्यूज़ को समझा कीजिए...'' बॉस काट खाने वाले अंदाज़ में अभय पर चिल्ला पड़ा था..
और आज...बॉस समरजीत से पुनर्जन्म की पहेली समझने की कोशिश कर रहा था.
''...बॉस, ये स्टोरी टीआरपी प्वाइंट ऑफ़ व्यू से अच्छी रहेगी...इसे हम काफी देर तक तान सकते हैं.''
सीनियर आउटपुट एडिटर आनंद शर्मा अचानक बहुत उत्साहित होकर बीच में कूद पड़ा. ख़बरों का तानना आनंद का पसंदीदा शगल है. न्यूज़ रूम में जैसे ही तानने लायक कोई ख़बर आती है, आउटपुट डेस्क की तरफ़ से आनंद की आवाज़ ज़रूर आती है. ''अबे इस ख़बर को तानो...इससे पहले की फलां चैनल इसे ताने, तुम तान दो...'' अपने प्रोडयूसरों को वह तान दो...तान दो...इस तरह से कहता है, जैसे उसके बाप-दादे रामलीला मैदान में तंबू तानते रहे हों और यही पुश्तैनी क़ारोबार वह इस चैनल में कर रहा है. मैदान में तंबू तानने की बजाय ख़बरों को तान रहा है. खुद को टीआरपी मामलों का विशेषज्ञ मानने वाले आनंद का एक ही उसूल है...टीआरपी है तो चैनल है...चैनल है तो हम हैं...लिहाज़ा टीआरपी के लिए कुछ भी करने में बुराई नहीं...


पहले समरजीत का स्टोरी आयडिया और फिर आनंद के समर्थन ने बॉस की आंखों की चमक बढ़ा दी. गिरी हुई टीआरपी का टेंशन और चैनल नाइन के खुलासे का जो डर कुछ मिनट पहले तक उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था, वह कुछ कम होता दिखा.
''...अब कल का हमारा एजेंडा यही होगा...आप लोग समरजीत के साथ बैठकर प्लानिंग कर लीजिए. चैनल नाइन शायद कल शाम सात बजे से अपना खुलासा दिखाने वाला है. हम लोग ठीक दो मिनट पहले ही 'मैं झांसी की रानी हूं' दिखाना शुरू कर देंगे...दर्शक अगर एक बार हमारे चैनल पर रुक गया तो समझिए हमने बाजी जीत ली.'' बॉस ने मीटिंग ख़त्म करने वाले अंदाज़ में कहा.


विनोद पांडे ने तुरंत सहमति में मुंडी हिलाई. जैसे बॉस ने कोई बहुत बड़ी बात कह दी हो और उन्हें सबसे पहले समझ में आ गया हो. समरजीत के चेहरे पर विजेता का भाव था. एक बार फिर उसकी स्टोरी बॉस को पसंद आ गई थी. एक बार फिर चैनल की नैया का खेवैया बनने का मौक़ा उसे मिलने वाला था. और बाक़ी लोग...सब चुप...
नेशनल ब्यूरो चीफ़ धीरज महाजन ने नज़र घुमाकर सबकी ओर देखा...इस उम्मीद में, कि कोई तो बोले कि बॉस हम यह क्या कर रहे हैं...लेकिन उड़ता तीर कोई लेने को तैयार नहीं था. असहमत होने का मतलब था टीआरपी बटोरने वाला कोई धांसू आयडिया देना, जो किसी के पास था नहीं. कोई मुंह खोलकर बॉस का कोपभाजन बनने के मूड में नहीं लग रहा था. धीरज को पता था कि वह अपना मुंह खोलेगा तो बॉस उसकी खोल देगा. उसने धीरज जैन की ओर देखा...उसकी आंखों में गुजारिश थी...जैन साहब आप तो कुछ बोलिए...लेकिन जैन साहब 'दुनिया जाए भाड़ में मुझे क्या पड़ी' वाली मुद्रा में बैठे रहे. आंखों ही आंखों में उन्होंने कहा...जो चलता है चलने दो. वैसे भी जब से इन्वेस्टीगेटिव ब्यूरो चीफ़ समरजीत सिंह इन्वेस्टीगेशन करने की बजाय चूतियापे वाली स्टोरी पेलने लगा है जैन साहब को उससे एलर्जी हो गई है.


प्रीतेश के चेहरे पर कुढ़न साफ़ दिख रही थी, लेकिन वह भी क्या कर सकते थे. जब-जब वह बॉस से असहमत होते तो प्रीतेश जी अंग्रेज़ी के उस कहावत को मान लेते थे_
रूल नंबर वन_द बॉस इज आलवेज़ राइट
रूल नंबर टू_इफ द बॉस इज रांग, सी रूल नंबर वन
बॉस ने सभा विसर्जित करने का संकेत दिया. सबने एक साथ कुर्सी छोड़ी और एक-एक करके केबिन से बाहर चले गए.
अगले दिन शाम के ठीक छह बजकर पचास मिनट पर न्यूज़ रूम में गहमागहमी का माहौल था. न्यूज़ रूम वार रूम में तब्दील हो गया था. आठ मिनट बाद 'टीवी टेन' पर 'मैं झांसी की रानी हूं' शुरू होना है. स्टूडियो में पुनर्जन्म मामलों के कुछ विशेषज्ञ बैठे हैं. ग्वालियर में झांसी की रानी के घर पर संवाददाता मौजूद है. ग्वालियर के चर्चित इतिहासकार को सेटेलाइट लिंक के जरिए कनेक्ट कर दिया गया है. बस इंतज़ार हो रहा है घड़ी की सूइयों के आगे खिसकने का. बॉस खुद भी न्यूज़ रूम में मौजूद है. सारे सीनियर्स भी उसके आसपास हैं. सामने दीवार पर एक लाइन से आठ टीवी सेट टंगे हैं. सब पर अलग-अलग न्यूज़ चैनल चल रहे हैं.


'चैनल इंडिया' पर कमिंग अप आ रहा है 'ख़ून पीने वाले लोगों का इलाक़ा...' थोड़ी देर में.
महानगर टीवी पर कमिंग अप है...'मुर्दों ने मचाया उत्पात...'
'सिटी न्यूज़' चैनल पर कमिंग अप है... 'सुरंग में कैद एक आत्मा की आत्मकथा.' टेलीविजन पर पहली बार...ठीक सात बजे.
'चैनल नाइन' पर बार-बार लाल पट्टी चल रही थी...'देश को हिला देने वाला एक खुलासा... ऑपरेशन नेता जी...बस थोड़ी देर में. बाक़ी चैनलों की ओर किसी का ध्यान नहीं था.
तभी बॉस ने चिल्लाकर रनडाउन प्रोड्यूसर अजय ठाकुर से कहा, ''...अजय...'मैं झांसी की रानी हूं' का कमिंगअप लगातार चलाते रहो. एक सेकेंड भी नहीं हटना चाहिए. कमर्शियल ब्रेक के बीच में भी नहीं.''


फिर पीछे खड़े एक्जीक्यूटिव एडिटर विनोद पांडे की तरफ़ देखकर बोला, ''...देख रहे हो न अगर आज हमने तैयारी नहीं की होती तो कितनी बुरी तरह से पिटने वाले थे...'' हमेशा की तरह विनोद पांडे ने अपना सिर हिलाया.
कुछ ही मिनटों बाद खेल शुरू हो गया. 'चैनल नाइन' पर एक स्टिंग ऑपरेशन दिखाया जा रहा था...'ऑपरेशन नेता जी'. केंद्र सरकार के कुछ नेता और सरकारी अफसर किसी प्रोजेक्ट को पास करने के नाम पर रिश्वत लेते हुए दिख रहे थे.
बॉस एक-एक कर सारे चैनलों को देख रहा था. उसके चेहरे पर बेचैनी कुछ कम हो गई थी.


कुछ देर तक बॉस कंट्रोल रूम यानी पीसीआर से ग्वालियर में मौजूद अपने रिपोर्टर को बताता रहा कि कैसे वह दर्शकों को पुनर्जन्म वाली यह स्टोरी बता-बताकर देर तक बांधे रखे. ''...देखो, जब तक चैनल नाइन पर खुलासे वाली स्टोरी चलेगी, तब तक हमारे चैनल पर ये ड्रामा चलना चाहिए. दर्शकों के लिए तीन-चार फ़ोन लाइनें खोल दो...वो जितने भी बेवकूफी वाले सवाल पूछ सकते हैं, पूछने दो...कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता...एंकर से उस लड़की से तमाम तरह के सवाल करवाओ...साथ में झांसी की रानी का इतिहास भी बताओ...''


बॉस बोलता जा रहा था. पैनल प्रोडयूसर सौरभ सिन्हा गौर से उसका चेहर देख रहा था. उसने बॉस को इतना एक्साइटेड पहली बार तब देखा था, जब इराक युध्द के समय पहले भारतीय पत्रकार के रूप में टीवी टेन का रिपोर्टर विवेक प्रकाश बगदाद पहुंचने में कामयाब हो गया था. बगदाद में अमरीकी टैंकों के पास खड़े विवेक प्रकाश से सेटेलाइट फ़ोन के जरिए वह बात कर रहा था...
कंट्रोल रूम में उछल-उछल कर बॉस इराक युध्द की ख़बर परोसने के तरीके समझा रहा था...और अब देखिए...क्या हो गया है इस आदमी को...बीस साल की पत्रकारिता के बाद यह आदमी अचानक कितना बदल गया है...
सौरभ सोच रहा था...रेस में जीतने के लिए जैसे खिलाड़ी ड्रग लेते हैं, उसी तरह चैनलों की इस प्रतियोगिता में अब ड्रग्स का इस्तेमाल होने लगा है...नाग-नागिन और पुनर्जन्म की ख़बरें ड्रग्स ही तो हैं...फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि अब तक इस खेल में डोप टेस्ट होना शुरू नहीं हुआ है...


अगला शुक्रवार
आज फिर शुक्रवार है. अजय ठाकुर सुबह से रनडाउन पर काम कर रहा है. उसकी नज़र उस ख़बर पर है जो वाकई ख़बर नहीं है. उसे इस बात का इंतज़ार है कि आज टीआरपी का ऊंट किस करवट बैठेगा. तभी शीशे के दरवाज़े से न्यूज़ रूम में बॉस की एंट्री होती है. चेहरा बिल्कुल खिला- खिला सा लग रहा था. जैसे अभी-अभी किसी नर्सिंग होम से बेटे के बाप बनने की ख़बर सुनकर सीधा दफ्तर आ गया हो. सबको 'हेलो हाय' करता हुआ बॉस अपने केबिन की तरफ़ चला गया. न तो वह रनडाउन पैनल की तरफ़ आया, न ही इनपुट और आउटपुट डेस्क की तरफ़. बॉस का मूड भांपने में एक्सपर्ट माने जाने वाले प्रोडयूसर और रिपोर्टर ये ख़बर फैलाने में जुट गए कि बॉस के मूड से लगता है टीआरपी ठीक हो गई है...अजय को समझ में नहीं आ रहा था कि चैनल नाइन के 'ऑपरेशन नेताजी' का मुक़ाबला यह फर्जी झांसी की रानी कैसे कर सकती है...? कुछ ही मिनट बाद सीनियर एडिटर आनंद ने आकर ख़बर दी, ''...हमारे चैनल ने बाजी मार ली है. 'ऑपरेशन नेताजी' को हमारी झांसी की रानी ने निपटा दिया. चैनल नाइन के सारे दिग्गज बेहोश पड़े हैं...अब वे लोग भी कुछ ऐसा ही तलाशने में जुटे हैं...बॉस ने सबको कांग्रेचुलेट करते हुए मेल भेजा है...'' अजय ने तुरंत अपना मेल बाक्स चेक किया.
इनबाक्स में बॉस का मेल आ चुका था...


...डियर आल,
फाइनली वी हेव डन इट. आवर चैनल हैज वन्स एगेन रीगेन्ड इट्स पोजीशन. आई वुड लाइक टू पर्सनली कांग्रेचुलेट आल आफ यू फॉर एचीविंग दिस फीट. आई एम स्योर दिस विल गो अ लांग वे इन एचीविंग मेनी सच माइल स्टोन्स इन फ्यूचर.
कीप इट अप...चियर्स...


पूरे न्यूज़ रूम में उत्साह का माहौल था. चैनल नाइन को पछाड़ने का उत्साह. बॉस खुश तो सब खुश. अपनी शिफ्ट डयूटी ख़त्म होने के बाद हर रोज़ की तरह अजय ठाकुर लाइब्रेरी की तरफ़ चल पड़ा. कुछ अख़बार चाटे बग़ैर उसे घर जाने की आदत नहीं थी.
लाइब्रेरी पहुंचा तो देखा एक कोने में नेशनल ब्यूरो के चार दिग्गज रिपोर्टर अख़बारों का बंडल लेकर कुछ खंगालने में जुटे हैं. अजय ठाकुर को समझ में नहीं आया_अक्सर फ़ील्ड में व्यस्त रहने वाले ये रिपोट्र्स आज लाइब्रेरी में बैठकर क्यों मगजमारी कर रहे हैं.
अजय ठाकुर से रहा नहीं गया. पालिटिकल कॉरसपांडेंट अशोक कौशिक से पूछा, ''...कोई ख़ास ख़बर खोज रहे हैं क्या आप लोग?''
''...यार ख़बर घंटा खोजेंगे...हम तो भूत-प्रेत, जिन्न, नाग-नागिन या फिर पुनर्जन्म की कोई स्टोरी खोज रहे हैं...अगर टीआरपी अब इसी से मिलती है तो हम क्या करें...'' अशोक कौशिक ने ऐसे जवाब दिया जैसे पहले से तपा बैठा हो.
...यही अशोक कौशिक कुछ दिन पहले न्यूज़ रूम में घूम-घूमकर लोगों से कह रहा था, ''...यार, टीआपी के चक्कर में सारे चैनलों ने ख़बरों की मां चो...के रख दी है... गंद हो गया है यार अब टीवी जर्नलिज्म...''
विदेश मंत्रालय और वामपंथी दल कवर करने वाला रविंद्र भदौरिया मातम मनाने की मुद्रा में बैठा था. लस्त-पस्त और निढ़ाल. उजड़े हुए चमन की तरह. दिन भर साउथ ब्लाक, नॉर्थ ब्लाक से लेकर अजय भवन तक भटकने वाला भदौरिया आज पहली बार दिन में लाइब्रेरी में नज़र आया था.


''...यार चैनलों पर तो चुतियापे हो रहे हैं, वो बंद भी होगा या नौकरी छोड़कर कोई और धंधा करूं...बहुत हो गया यार...आज तो बॉस ने साफ़ कह दिया, हमारे पास पालिटिकल ख़बरों के लिए बहुत जगह नहीं है...पार्टी की कोई कांफ्रेंस या स्टोरी कवर करके आता हूं तो चलती ही नहीं है...अब तो नेता लोग बाइट देने में भी टालमटोल करने लगे हैं...टीआरपी के चक्कर में हम लोग अब गांडूपने पर उतर आए हैं...मैं तो नहीं कर सकता ये सब...हालत ये हो गई है कि कल को लोग कहेंगे_इनसे मिलिए...ये हैं_नाग मामलों के विशेषज्ञ...इनसे मिलिए...ये हैं_प्रेत मामलों के विशेषज्ञ...ये हैं_पुनर्जन्म
मामलों के विशेषज्ञ...बहनचो... यही सब करने के लिए हम लोग पत्रकारिता में आए थे क्या...घ्'' भदौरिया का चेहरा तमतमाया हुआ था.


तभी अपनी स्पेशल रिपोर्ट्स के लिए चर्चित स्पेशल कारेसपांडेंट अशरफ जैदी ने सबका ध्यान खींचा.
उसका इशारा मेरठ से छपने वाले अख़बार की एक ख़बर की तरफ़ था, ''...यार, मुझे तो आज के लिए एक स्टोरी मिल गई...गाजियाबाद में एक छात्रा ने अध्यापक की पिटाई के तुरंत बाद खुद को नागिन का अवतार घोषित कर दिया है...वह नागिन का हाव-भाव बनाकर लोगों का ध्यान खींच रही है...कह रही है वह पिछले जन्म में नागिन थी...किसी सपेरे ने उसके नाग को मार दिया था...उसी सपेरे से बदला लेने के लिए नागिन ने इंसान की योनि में जन्म लिया है...नाग को मारने वाला सपेरा उसी गांव का था जहां नागिन का लड़की के रूप में पुनर्जन्म हुआ है...'' अशरफ अख़बार की ख़बर को पढ़कर सुनाता जा रहा था...सब सोच रहे थे_


क्या आज का दिन अशरफ के नाम होने वाला है?

**-**

रचनाकार - अजीत अंजुम का सर्जनात्मक सफर 'चौथी दुनिया', 'अमर उजाला' तथा 'आज तक' के रास्ते चलकर फिलहाल 'बीएजी फिल्म्स' में जारी है. यह उनकी पहली कहानी.

**-**

चित्र - डॉ. आलोक भावसार की कलाकृति

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


1-कविता क्या है?

भोर में पाखी का कलरव गान
फिर नील गगन में
पंख खोलकर तैरना
लेना ऊँची उड़ान ।
किसलय की नोक पर फिसलती ओस की बूँद
पहाड़ की तलहटी में
झरने का मधुर गान ।
गरम लोहे पर
पसीने से तरबतर
हथौड़ा चलाते मज़दूर की थकान
लहलाती फ़सल के
पकने के इन्तज़ार में
हुक्का गड़गुड़ाता किसान ।
शिशु को चूमती हुई
दुनिया से बेखबर
माँ की हल्की मुस्कान ।
कल लड़ने के बाद
आज फ़िर से मिल-जुलकर
खेलते बच्चे ।
किवाड़ के पल्ले पर कुहुनी टिकाए
पति - प्रतीक्षारत
देहरी पर खड़ी पत्नी ।
खेतों में धमाचौकड़ी मचाता बछड़ा
गली के नुक्क्ड़ पर बिल्ली के साथ
अठखेलियाँ करता पिल्ला
यही तो कविता है ।





°°°°°°°



2- सच की ज़ुबान

सच की नहीं होती ज़ुबान
वह काट ली जाती है
बहुत पहले-
अहसास होते ही
कि व्यक्ति
किसी न कुसी दिन
सच बोलेगा
किसी बड़े आदमी का राज़ खोलेगा ।
शुभ कर्म का
नहीं होता कोई पथ
जो इस पथ को पहचानते हैं
वे इस पर चलने वाले
हर कदम को रोक देना
शुभ मानते हैं
क्योंकि
जो शुभ पथ पर चलेगा
वह अशुभ की पगडण्डियाँ
बन्द करेगा
केवल भगवान से डरेगा।
बच नहीं सकते वे हाथ
जो इमारत बनाते हैं
किसी के भविष्य की ,
जो गढ़ते हैं ऐसा आकार-
जिसकी छवि
आँखों को बाँध ले
जो बोते हैं धरती पर
ऐसे बीज ,
जिनसे पीढ़ियाँ फूलें -फलें ।
जो देते हैं दुलार,
जो बाँटते हैं प्यार,
जो उठते हैं केवल
आशीर्वाद के लिए
जो बढ़ते हैं किसी की रक्षा में
वे काट लिए जाते हैं ;
क्योंकि ऐसा न करने पर
कुकर्म के अनगिन भवन
ढह जाएँगे ,
टूट जाएँगी कई तिलिस्मी मूर्तियाँ ।
तृप्त पीढ़ी रिरियाएगी नहीं
दुलार ,प्यार और आशीर्वाद
की छाया में पले लोग
उनकी खरीद भीड़ नहीं बन सकेंगे ।
---------------------
3- एक शेर


उजाले की खातिर मैं द्वार आया।
शुक्रिया तुमने घर मेरा जलाया



----------------------
4 -कुछ दुख झेलो

कुछ दु:ख झेलो
कुछ दु:ख ठेलो
कुछ राम भरोसे छोड़ दो।
दुख क्या बन्धु
बहती नदिया
नहीं एक तट रह पाती है।
जिधर चाहती
मुड जाती है
सुख-दुख बहा ले जाती है।
या धारा के संग तुम
या धारा का मुख मोड दो।

------------------------


Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this


-अविनाश

गुरुदेव ने पहले ही दिन कहा था, 'बेटा बतकही के चक्कर में जिस दिन पड़े_ख़बर का मर्म भूल जाओगे.' उन्हें लगता था कि लड़का नया-नया है और जल्दी ही न्यूज़ रूम के लोग इसे हड़प लेंगे.

गुरुदेव अच्छे आदमी हैं. वे अच्छे इसलिए हैं, क्योंकि वे खुद मानते हैं कि पत्रकारिता में अब उनके जैसे लोग नहीं बचे. अपनी भाषा, अपनी समझ पर खुद उन्हें ही बहुत फख्र है. उन्हें इस बात का भी फख्र है कि न्यूज़ रूम के लोग भी ऐसा समझते हैं. हर मुश्किल वक्त में उनको सेनापति बनाया जाता है.
लेकिन न्यूज़ रूम के लोग कहते हैं कि यह मुश्किल वक्त पिछले कई सालों से नहीं आया है. जब से यह ख़बरिया चैनल 24 घंटे का हुआ है, तब से तो एकदम नहीं.

लेकिन अतीत की भव्यता से ही वह इतने खुश रहते हैं कि लगता है कि सब कुछ जैसे बस कल शाम का ही क़िस्सा है. हालांकि यह क़िस्सा दूसरों के लिए रहस्य ही है. पत्रकारिता में नए पौधे उग आए हैं. जिन्हें वह किस्सा याद है और जो गुरुदेव के दोस्त-मित्र रहे हैं, वे ऊंचे ओहदों पर हैं_उन्हें गुरुदेव के अतीत की चर्चा करने की फुर्सत नहीं.
लेकिन जैसा कि सूत्र बताते हैं, वे बड़े लोग जब कभी खाली होते हैं और उनका मन उन ख़बरों की ख़बर लेने का होता है, तब वे गुरुदेव की चर्चा ज़रूर करते हैं. वे सब मानते हैं कि गुरुदेव की चर्चा में बड़ा आनंद है. फ़िल्मी दुनिया के किसी गॉशिप से भी ज्यादा.

लेकिन यह सब गुरुदेव का परिचय नहीं है. उनका परिचय है उनका नाम. किसी अच्छी कहानी और बुरे-से-बुरे जीवन की शुरुआत भी नाम और गोत्र से होती है.
गुरुदेव का नाम है 'के'. उनका नाम कभी सिर्फ़ 'क' हुआ करता था. इसी 'क' नाम से उन्होंने अपना पूरा बचपन काटा. मधुबनी में कमला बलान के किनारे सुनसान रेत पर बैठकर घंटों यह सोचते रहे कि वे इस पूरे ज़िले के कलक्टर हैं.
फिर जब पटना के महेंद्रू में वे कुछ दोस्तों के साथ एक कमरा शेयर करके रहते थे, उस वक्त भी उनका नाम 'क' ही था. उन्हीं दिनों पटना से निकलने वाले आर्यावर्त में संपादक के नाम चिट्ठी लिखा करते थे. उन दिनों को याद करते हुए वे मानते हैं कि वे महज चिट्ठियां नहीं, उस समय की राजनीति, संस्कृति और समाज के संक्षिप्त दस्तावेज़ हैं.
बाद में गुरुदेव 'क' नाम के साथ ही दिल्ली आ गए और डीयू में उन्होंने एडमिशन ले लिया. यहीं बढ़ती उम्र के साथ उन्हें यक़ीन हो गया कि ज़िले का कलक्टर बनना उनके बस में नहीं.

गुरुदेव कहते हैं, 'दिल्ली में भाषा उनके साथ आई.'
ऐसी भाषा, जिसमें मिट्टी की खुशबू भरी हुई थी. आर्यावर्त के लिए चिटि्ठयों के जरिए जिस क़िस्म की भाषा का रियाज़ हुआ, वह तो था ही. इसी खुमारी में एक दिन गुरुदेव 'दरबारे दिल्ली' नाम से निकलने वाले अख़बार के दफ्तर पहुंच गए.
उस समय अख़बारों में जो लोग काम करते थे, उनमें आज की तरह का दर्प नहीं था. वे कम ही प्रतीक्षा करवाते थे और आगंतुकों से आदमी की तरह मिलते थे. फिर वह आगंतुक नौकरी के सिलसिले में ही क्यों न आया हो. और गुरुदेव आज की तरह नौकरी की तलाश में भटकने वाले लौंडे-लपाड़े तो थे नहीं, जो ज़िंदगी की तमाम दूसरी जंग हारकर मीडिया में भाग्य आजमाने चले आते हैं. उनके पास इतनी प्रतिभा तो थी ही कि वे एक पूरा वाक्य लिख पाएं. हालांकि उनका यह अफसोस कभी-कभी अब भी छलक जाता है कि पूरा एक वाक्य लिखने की प्रतिभा के सहारे वे किसी ज़िला के कलक्टर नहीं बन सके.
गुरुदेव को 'दरबारे दिल्ली' में नौकरी मिल गई. उप-संपादकी करते हुए उन्होंने संपादक के चेंबर में लगातार हाज़री लगाई...और एक दिन उनसे अपने लिए अपराध बीट ले ही लिया.

अपराध बीट. इस बीट में दूसरे क़िस्म का रुतबा था. पुलिस से जान-पहचान और अपराधियों के बीच क्रेज भी. वे अपराधी जो बाद में राजनीति की राह पकड़ने वाले थे, गुरुदेव से सांठगांठ बनाए रखते. कभी दफ्तर के बाहर आकर उन्हें बुलाते...और पांव छू कर उनकी कृपा मांगते, तो गुरुदेव गदगद हो जाते. वे कहते हैं कि तब उनकी आंखों से आंसू बहने लगते थे. वे नहीं जानते थे कि लोग उनसे इस क़दर प्यार करते हैं और उनका इतना सम्मान करते हैं.
उस वक्त एक दूरदर्शन हुआ करता था, जिस पर दिन में इक्का-दुक्का समाचार के बुलेटिन थे और उसमें नौकरी सरकारी हुआ करती थी. लेकिन अब चूंकि अख़बार में काम करते हुए दस लोगों के बीच गुरुदेव सरकार को गाली भी दे लेते थे, और सोच भी नहीं पाते कि दूरदर्शन के लिए समाचार ला, कह और दिखा पाएंगे.

संयोग से उन दिनों हिंदी की एक संघसमर्पित समाचार पत्रिका ने एक बड़े जनवादी पत्रकार के साथ अनुबंध किया...और दूरदर्शन पर आधे घंटे के एक न्यूज़ बुलेटिन का स्लॉट ख़रीद लिया. गुरुदेव लपक के पहुंचे और चूंकि वहां पत्रकारों की ज़रूरत थी और गुरुदेव अब तक ज़रूरत भर पत्रकार हो गए थे, उन्हें रख लिया गया.
जिस दिन उनको काम करने की चिट्ठी थमाई गई, उस रात वे सो नहीं सके. सपने में उन्हें मधुबनी की वह गली याद आई, जिसमें वे गुनाहों के देवता बने घूमते और किसी सुधा को अपनी सूरत दिखाने और उसकी सूरत देखने के लिए ताक-झांक किया करते थे. सालों से उनके स्वप्न में एक कर्फ्यू-सा जो लगा था, वह हट गया था.
सपने में उन्होंने देखा कि शहर में चहल-पहल है और इस चहल-पहल के बीच बहुत सारे लोग उनकी तरफ़ हसरत से देख रहे हैं. जैसे कह रहे हों_'क' ज़िंदाबाद!!!

अचानक उन्हें याद आया कि अरे...अब उनका 'क' कहां?
'दरबारे दिल्ली' में काम करते हुए उन्हें एक बार चंद्रास्वामी से मिलने का मौक़ा मिला. वे पांव पर ऐसे गिर गए, जैसे लंबी तपस्या के बाद कोई बड़े देवता सामने प्रकट हो गए हों. चंद्रास्वामी ने उनकी ललाट पर हाथ फेरा और अपने बाएं हाथ से एक हीरे की अंगूठी निकालकर गुरुदेव के दाहिने हाथ में रख दी.
गुरुदेव ने कहा, ''बस्स...अब आप ही हमारे भाग्य विधाता हैं.''
चंद्रास्वामी ने कहा, ''नाम बदल लो, करोड़ों की दौलत तुम्हारे दरवाज़े पर होगी.''
गुरुदेव ने कहा, ''आप ही कोई नाम दे दें स्वामी.''
चंद्रास्वामी ने कहा, ''आज से तुम्हारा नाम 'क' नहीं 'के' होगा.''

तब से आज तक गुरुदेव को लोग 'के' नाम से जानते हैं. कइयों को अटपटा लगता है कि ये नाम तो हिंदुस्तान में पाया नहीं जाता. वे पूछते हैं तो गुरुदेव हत्थे से उखड़ जाते हैं. कहते हैं, ''औकात में रहकर बात करो. तुम जानते ही कितना हो हिंदुस्तान को?'' लेकिन जब उनका कोई समकालीन पूछता है, तब वे अपने नाम से जुड़ी कोई कहानी गढ़ने की कोशिश करते हैं और हकलाते हुए नामकरण की काल्पनिक कहानी कहने की कोशिश करते हैं.
जब अख़बार छोड़कर गुरुदेव ने टीवी की नौकरी पकड़ी, तो वेतन मिला बीस हज़ार रुपए. इतना वेतन उनके ज़िले के कलक्टर को भी नहीं मिलता था. उन्हें लगा कि अब वे अपने गांव में एक तालाब खुदवा सकते हैं और उसके महार पर एक शिलालेख लिखवा सकते हैं_'क'...नहीं-नहीं...'के' की कृपा से यह तालाब हमारी मातृभूमि को सप्रेम भेंट.

लेकिन अब गुरुदेव उस चैनल की नौकरी करते हैं, जहां मैं थोड़े ही दिनों पहले आया हूं. 24 घंटे के इस चैनल में चार घंटे काम करने के एवज में गुरुदेव को दो लाख रुपए मिलते हैं. हालांकि शिफ्ट आठ घंटे की होती है, लेकिन चूंकि गुरुदेव मालिक से मिल मिलाकर रहते हैं_इसलिए और सिर्फ़ इसलिए चार घंटे उन्हें शहर में घूमने, स्मोकिंग ज़ोन में बतकही लड़ाने और किसी नेता और अतीत के अपराधी के साथ महंगे रेस्तरां में खाने-पीने की छूट मिली रहती है.
...और दरअसल गुरुदेव की कहानी यहीं से शुरू होती है. इसी चैनल से. इससे पहले तो उन्हें इस लायक भी नहीं समझा जाता था कि उनकी कहानी किसी से कही सुनाई जाए.

गुरुदेव कहते हैं कि उन्हें इस चैनल में लाया गया था आउटपुट हेड बनाकर. आउटपुट का काम टीवी में सबसे रुतबे का होता है. वे किसी ख़बर के साथ छेड़छाड़ कर सकते हैं. किसी रिपोर्टर की ख़बर पांच बार ऑन एयर कर सकते हैं और चाहें तो एक बार चलाकर हमेशा के लिए गिरा सकते हैं. यह तय कर सकते हैं कि हेडलाइन क्या-क्या होगी.
लेकिन अब गुरुदेव को अक्सर यह कहते हुए सुना जाता है कि वे राजनीति के शिकार हुए. रिपोर्टरों से लेकर ख़बर जमा करने वाले और आउटपुट को उन ख़बरों की थैली थमाने वाले इनपुट डेस्क के एक आदमी ने उनके साथ राजनीति की.
और जैसा कि गुरुदेव बताते हैं यह वही आदमी है, जिसे उन्हीं के कहने पर रखा गया.

लेकिन बाद के दिनों में हुआ यह कि मालिक के आगे-पीछे करने में वह गुरुदेव का उस्ताद निकल गया और एक दिन आउटपुट की उस्तादी गुरुदेव से छीनकर उसे दे दी गई. गुरुदेव सामान्य रिपोर्टर बना दिए गए. हालांकि वे ऐसा नहीं मानते. मानते हैं कि वे इस चैनल के ज़रूरी संवाददाता हैं और उनके बिना इस चैनल का काम नहीं चल सकता.
इन दिनों गुरुदेव महीने में कुछ ख़बरें यह कहकर आउटपुट को देते हैं कि एक्सक्लूसिव है, किसी के पास नहीं है_और जब उनकी बात को हँसी में उड़ा दिया जाता है, तो वे स्मोकिंग ज़ोन में यह कहते हुए नज़र आते हैं कि चैनल डूब रहा है.
ऐसा नहीं है कि गुरुदेव बस यूं ही गुरुदेव हैं. उनकी किस्मत भी कई बार साथ दे देती है. साथ का मतलब यह कि उन्हें कोई आइडिया कहीं से मिलता है, तो वे तुरंत मालिक के पास पहुंच जाते हैं.
ऐसे ही एक दिन वे मालिक के पास पहुंचे. आइडिया दिया, सदी का पहला गीत ढॅ।
उसके बाद यह गीत पूरे न्यूज़ रूम की ज़बान पर चढ़ा और टीवी की भाषा में कहें, तो हमने कई दिनों तक इस गाने को खूब खेला.

पहली बार जब हमने पर्दे पर ठुमकते दृश्यों के बीच उस गीत के बोल सुने_हम उतने तन्मय नहीं हुए_जितने गुरुदेव की इस करामात के बाद. लगा कि पूरा देश वही गीत गा रहा है.
चैनल से लौटते हुए जब पान की दुकान पर खड़े हुए, तो रेडियो एफएम के साथ ज़बान लड़ाते पनवाड़ी को देखकर मज़ा आ गया. वही गीत था_मगर पान की लाली में भीगा हुआ.
'कजरारे कजरारे तेरे कारे कारे नैना.'
पहली बार गुरुदेव के प्रति श्रध्दा हुई.
खुसरो के उस गीत की लरजती हुई लय याद आ गई.
'न नींद नैना न अंग चैना न आप ही आवें न भेजें पतिया.'
आज शायद ही विरह का वह मसला हमारे ज़ेहन में हो. पास में मोबाइल है और सारी दूरियां सिमटकर बांहों के घेरे में आ गई हैं.

बदलती हुई दुनिया में गुरुदेव की यह खोज क्लिक कर गई और पूरा न्यूज़ रूम उनकी वंदना करने लगा.
हमने भी कॉलर टोन रिसीव किया. हमारे मोबाइल में गूंज उठा_'कजरारे कजरारे तोरे कारे कारे नैना.'
नई सदी के पहले गीत की खोज का खुमार इस कदर चढ़ा कि गुरुदेव और आक्रामक हो गए. वे अब किसी मुगलिया सल्तनत के सुल्तान की तरह न्यूज़ रूम में घुसने लगे. पहले भी वे कुछ इसी अंदाज़ में जीते रहे हैं लेकिन अब उनके आने में एक लचक है, जो लोगों को अपनी तरफ़ खींचती है.
देश में लोकतंत्र पर ज़रा-सा कोहरा छाता है और उस वक्त अगर गुरुदेव ओबी स्पॉट पर होते हैं, तो लगभग चीखने लगते हैं.
कहते हैं, ''यह चीख जनता की चीख है और तब तक गूंजती रहेगी, जब तक लोकतंत्र के दुश्मन पस्त नहीं हो जाते.''
लेकिन इन दिनों वे राज दरबारों के क़िस्से सुनाने लगे हैं. एक बार हिमाचल के राजकुंवर के साथ उन्हें नाश्ते का मौक़ा मिला_उसका वृतांत.

''मुश्किल से राजकुंवर ने दो-तीन शब्द कहे और इतनी नफ़ासत से पेश आए कि क्या कहना.''
गुरुदेव इस बात पर मुग्ध थे कि नाश्ता करते हुए राजकुंवर ने उन्हें चार बार भर आंखों से देखा. और दुखी इस बात से कि पुरानी राजशाही की तासीर, चलने का सलीका और बड़ों के मान का वह संस्कार नए ज़माने में बिल्कुल ही नहीं बचा. वे खुश थे कि उन्होंने राजकुंवर के साथ नाश्ते के दौरान इसका निर्वाह किया. जब भी राजकुंवर कुछ पूछते, गुरुदेव तपाक से कहते, 'हुजूर!'
एक बार दरभंगा महाराज के वंशज ने उन्हें खाने पर बुलाया. एक तलवार भेंट की. वे चाहते हैं कि इस चैनल के न्यूज़ रूम में इस तलवार को कहीं टांग दें.

फ़िलहाल तलवार उनके शयनकक्ष की शोभा है. अब बीवी इसी बात से खफ़ा रहती है. ऐसा भी कहीं आदमी हुआ है. एक तो देर रात घर आते हैं_पी-पिला कर. बिस्तर पर बिखर जाते हैं...और एकटक तलवार को देखते रहते हैं.
सुबह की चाय का भाप कानों में जाता है तो नींद खुलती है_लेकिन आंखों को बस तलवार की धार चाहिए. बीवी की सूरत पर समय की झुर्री पड़ रही है.
गुरुदेव लेकिन महफिल के शौकीन हैं, और जब भी घर से निकलते हैं...दाढ़ी में खिज़ाब चाहिए.
बीवी तब से कुछ नहीं कहती, जब से गुरुदेव ने उन्हें कमरे में बंद कर भर दम पीटा.
बात बस इतनी थी कि गुरुदेव के मोबाइल पर एक लड़की का अश्लील एसएमएस पढ़कर उसके बारे में सवाल-जवाब कर दिया था.

बीवी पूरे छह महीने तक अस्पताल में पड़ी रही. गुरुदेव ने पूरे छह महीने दिन-रात बीवी की सेवा की, लेकिन उस हादसे के बाद बीवी की खामोशी अब तक नहीं टूटी है.
गुरुदेव इस बात से परेशान रहते हैं, या सुखी_घर में किसी को नहीं पता. न उनके नौकर को, न बच्चों को. क्योंकि घर में अब भी तलवार ही निहारा करते हैं.
अब लेकिन गुरुदेव की सांस उखड़ने लगी है. दमा उन्हें बेदम किए रहता है. वे देखते हैं कि इतना ऐश्वर्य और इतने पैसे के बाद भी लोग उनसे बच रहे हैं. गांव का कोई आदमी उनके पास नहीं आता. एक बार आया था उनका चचेरा भाई, उन्होंने घर के राशन की लिस्ट थमा कर मंगल बाज़ार भेज दिया था. गांव से एक नौकर मंगवाया, और दो साल बाद जब वह वापस गया तो लकवा लेकर गया.

अब वे अकेले हैं. घर में भी, अपनी कार में भी और न्यूज़ रूम में भी.
आते हैं. मशीन से चाय निकालते हैं. टी बैग डुबोते-डुबोते कंप्यूटर ऑन करते हैं. देखते हैं हज़ारों हज़ार इनहाउस मेल अपने क़त्ल के इंतज़ार में उनके इनबॉक्स में पड़े हैं. वे ग़ौर करते हैं कि इस बीच किसी ने उनसे दुआ-सलाम नहीं की. वे तड़प कर रह जाते हैं और प्रतिशोध की एक हल्की-सी चिंगारी दिल के किसी कोने में भड़क उठती है. उन्हें लगता है इस न्यूज़ रूम को आग लगा देनी चाहिए. वे कंट्रोल ए से सारे मेल सलेक्ट करते हैं और कंट्रोल शिफ्ट डी से सारे मेल उड़ा देते हैं.
अचानक उनकी नज़र कैलाश पर पड़ती है. कैलाश सिर नवाए उनके सामने खड़ा है.
वे पूछते हैं, ''और कैली, क्या सब चल रहा है?''

टीवी में सबका नाम छोटा करके पुकारने का चलन बन गया है. जैसे प्रियदर्शन नाम है, तो पीडी पुकारेंगे. चंद्रप्रकाश नाम है, तो सीपी पुकारेंगे और संदीप नाम है तो सैंडी पुकारेंगे. इसी तरह कैलाश को न्यूज़ रूम में लोग कैली कहकर पुकारते हैं.
मैं जब शुरू-शुरू में इस चैनल में आया था, तो बहुत दिनों तक यही समझता रहा कि इसका नाम कैली ही है. लेकिन वक्त क़े साथ असल का पता तो चल ही जाता है.
कैली ने मुस्कराकर कहा, 'सब ठीक है'
''और चैनल में क्या चल रहा है?''
कैली कहता है, ''चलेगा क्या, सब बकवास. कोने में चलिए, कुछ और बताता हूं!''
फिर वह गुरुदेव से कहता है, 'यहां किसी को ख़बर से खेलना नहीं आता. या तो क्रिकेट के पीछे लगे रहते हैं या सिनेमा के पीछे. किसी को देश की फिक्र नहीं.''

फिर कैली उन्हें बताता है कि आजकल बॉस किसके साथ सांठगांठ में हैं, किस पर मेहरबान हैं और किसको डंडा किया जा रहा है.
गुरुदेव इसी बात से कैली से खुश रहते हैं. उन्हें लगता है कि पूरे न्यूज़ रूम में कैली ही उनका खैरख्वाह है.
वे कैली को अपनी कार में बिठाकर चैनल से बहुत दूर ले जाते हैं. सड़क के किनारे खड़े होकर कुल्फी खिलाते हैं और कहते हैं, 'देखो, मैं अब भी सड़क से कितनी मोहब्बत करता हूं. सड़क के किनारे के ठेले मुझे अपनी ओर खींचते हैं. पुराने दिनों की याद दिलाते हैं.'
और जब वे नोएडा की सड़कों पर कैली को टहलाते हैं, तो दीवार पर गुप्त रोगों का शर्तिया इलाज बताने वाले नीम-हकीमों के पोस्टर दिखाते हुए कहते हैं कि मुल्क की नब्ज़ इन्हीं नीम-हकीमों के हाथों में है.
उन्हें लगता है कि उन्होंने कोई ऐसी बात कह दी है, जो सिर्फ़ वही कह सकते हैं.
उनका मूड बन रहा है. वे कैली से कहते हैं, ''आज की रात तुम्हारे नाम.''
कैली कहता है, ''सर ये कुछ ज्यादा नहीं हो जाएगा.''

गुरुदेव कहते हैं, ''छोड़ो भी. हम सब ज़लावतन में हैं. रात-दिन की फिक्र मत किया करो. हमारी सोहबत किसी-किसी को नसीब होती है.''
कैली की जैसे सांस अटक रही है, लेकिन वह अपना दु:ख बयान करने की हालत में नहीं है. मालिक अब भी गुरुदेव की कोई-कोई बात मान लेते हैं.
रात के दो बजे हैं. नोएडा की एक सड़क के किनारे गुरुदेव नीम बेहोशी में चित्ता लेटे हैं. उल्टी चारों ओर फैली हुई है. उम्दा शराब की बेकाबू गंध हवा में उड़ रही है.
कैली गुरुदेव की कार के अंदर बैठकर फूट-फूटकर रो रहा है.

वह एक औसत प्रतिभा का लड़का गांव से शहर आया था. यहां उसने सब कुछ करने की कोशिश की. सेल्समैनशिप से लेकर दलाली तक. लेकिन कहीं ठौर नहीं मिल पाया. एक दिन क़िस्मत के सांढ़ की तरह इस नंबर वन चैनल में आ गया. और यहां कभी इनके तो कभी उनके चरण छूकर अब तक अपनी नौकरी बचा रहा है.
लेकिन आज उसे अपनी ज़िंदगी गलीज़ लग रही है. हालांकि हादसे इससे भी बड़े-बड़े जब-तब हुए. और यह तो कोई हादसा भी नहीं. हफ्ता दस दिन पर दारू पीकर सड़क के किनारे गुरुदेव के लुढ़कने का वह सबसे अधिक साक्षी रहा है.
...पर आज पता नहीं क्यों उसे गांव की याद आ रही है. उस बूढ़ी मां की याद, जिसे उसने हर महीने कुछ पैसे भेजने का भरोसा दिया था और शहर आकर पूरी कमीनगी से भूल गया था.
दूसरे दिन वह सुबह छह बजे घर पहुंचे और पूरे दिन बिस्तर पर मुर्दा की तरह पड़े रहे. दोपहर तीन बजे आंख खुली, तो मालिक के नंबर से पचास मिस्ड कॉल देखकर उन्हें होश आ गया. उन्हें याद आया कि दोपहर दो बजे से संसद भवन पर उसकी ओबी रखी गई है.

सालों बाद एक सपना उनके आगे सच की झोली फैलाए खड़ा था. हालांकि इससे पहले भी ऐसे छोटे--मोटे मौक़े उनके जीवन में आए थे, लेकिन हर बार वे अपनी बेवकूफी, अपने शाही अंदाज़ और अपनी कछुआ चाल की वजह से वह मौक़ा खोते रहे.
एक बार फिर वही हादसा दरपेश था. वे फौरन सौ सवा सौ की रफ्तार से चैनल पहुंचे, मालिक ने सीधे कमरे में बुलाया. थोड़ी देर बाद अंदर से एकतरफ़ा चीख ने न्यूज़ रूम को दहला दिया.
हालांकि न्यूज़ रूम में यह रोज़ का किस्सा है और रोज़ ही न्यूज़ रूम दहलता रहता है_लेकिन यह चीख इसलिए सबसे अलग थी क्योंकि यह गुरुदेव के ख़िलाफ थी. लोग खुश थे कि यह दर्प की इमारत के
सब यह देखना चाहते हैं कि मालिक के चैंबर से गुरुदेव कौन-सा मुंह लेकर निकलते हैं. अब तक तो उन्होंने खिज़ाब में छिपे हुए पुरसुकून चेहरे को ही देखा था_लेकिन आज उसी चेहरे से झड़ते हुए खिज़ाब को देखने का इंतज़ार है.
थोड़ी देर में गुरुदेव निकले तो उनके चेहरे पर स्याह परतों का नामोनिशान नहीं था, जिसकी उम्मीद में न्यूज़ रूम लगातार सनसना रहा था.

चार कदम बढ़ते ही वे हँसे. लगभग अट्टहास की तरह. कैली को पास बुलाया. लगा जैसे कल कुछ हुआ ही नहीं था.
कैली लपक कर उनके पास पहुंचा.
लोगों ने कैली के पास खड़े गुरुदेव को यह फुसफुसाते हुए सुना कि उनकी मां डुमरांव स्टेट के खजांची की बेटी थी और पिता बड़े ज़मींदार. वे ज़िला कलक्टर नहीं हुए तो क्या_मीडिया में उनका सानी ही क्या है?
कैली कल की तरह ही मुस्करा रहा था. न्यूज़ रूम में सब इस वार्तालाप से हैरान होना चाह रहे थे, लेकिन तभी एक ब्रेकिंग न्यूज़ ने सबकी तंद्रा भंग कर दी.
**-**
रचनाकार - अविनाश पत्रकारिता के साथ कविता करते रहे हैं, यह उनकी पहली कहानी है जिसे उन्होंने हंस के टीवी मीडिया विशेषांक ले लिए खास तौर पर लिखा है. अविनाश हिन्दी के उभरते चिट्ठाकारों में से एक हैं. इनका चिट्ठा है - मोहल्ला . संप्रति एनडीटीवी में आउटपुट एडिटर.

**-**
चित्र - केनवस पर तैलरंग से बनाई गई रेखा की कलाकृति.

Tag ,,,

Add to your del.icio.usdel.icio.us Digg this storyDigg this

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

रचनाकार में ढूंढें...

आपकी रूचि की और रचनाएँ -

randompost

कहानियाँ

[कहानी][column1]

हास्य-व्यंग्य

[व्यंग्य][column1]

लघुकथाएँ

[लघुकथा][column1]

कविताएँ

[कविता][column1]

बाल कथाएँ

[बाल कथा][column1]

लोककथाएँ

[लोककथा][column1]

उपन्यास

[उपन्यास][column1]

तकनीकी

[तकनीकी][column1][http://raviratlami.blogspot.com]

वर्ग पहेलियाँ

[आसान][column1][http://vargapaheli.blogspot.com]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget