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April 2007
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लघुकथाएँ - 41 - 53

बोझ

"तो मैं यह समझ लूँगी कि मेरा कोई बेटा था ही नहीं।"

"माँ!"

"क्यों ! आश्चर्य हो रहा है ना मेरे वाक्यों पर? ऐसा ही मुझे भी लगता था जब तुम कहते थे कि¸ दो चार साल हम नहीं भी मिले तो क्या हुआ? मैंने शादी अपनी मर्जी से भी कर ली तो क्या हुआ? इन्सान को सब कुछ सहन करने की आदत होनी चाहिये। अब कहो¸ क्या तुम इन्सान नहीं हो?"

"तुम ये सब इतनी सहजता से कैसे कह सकती हो माँ क्या तुम्हारे पास मेरे लिये कोई प्रेम नहीं बचा? मैंने तो सोचा था कि हमसे लाख गलतियाँ हो लेकिन तुम हमेशा ही हमारा साथ दोगी। लेकिन मैं ही गलत था।"

"तुम्हारी यही सोच कहाँ थी बेटा जब दो बार स्वदेश वापसी के दौरान तुम इसी शहर की अपनी संपन्न ससुराल में महीने भर तक आतिथ्य ग्रहण करते रहे। माँ - बाप के लिये बस एक औपचारिक दिन रखा¸ उसमें भी हमारी बहू तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर यहाँ नहीं आई।"

"वो समय और था माँ! उन्हें सहारे की जरूरत थी। और मैं प्रीती का स्वभाव तुम्हें नहीं समझा सकता। उसकी पहली डिलेवरी के लिये उसकी माँ आई थी हमारे यहाँ। इस बार कॉम्प्लीकेशन है इसलिये अपनों पर भरोसा करना चाह रहा था। तुम हो कि पराया किये दे रही हो।"

"संतान अपनी मनमानी को गलतियों का रूप देकर अपना स्वार्थ सिद्‌ध करती रहे और माँ - बाप को उनके कर्तव्य पालन और ममता की दुहाई दे देकर अपना काम आसान करती रहे। मैं अच्छे से जानती हूँ कि अब तुम्हारे ससुरजी का बिजनेस बैठ गया है और वहां भी तुम्हारे ही एक गलत निर्णय के कारण। वहाँ जाकर आँख मिलाकर बात करने की हिम्मत नहीं है¸ मदद मिलने की उम्मीद नहीं है इसलिये यहाँ चले आए हो।"

"माँ! इतनी कठोर तो न बनो! ये तो सोचो कि अपना काम करते हुए मैं और प्रीती दो दो बच्चों को कैसे सम्हालेंगे? कुछ ही महीनों की ही तो बात है। मैं तुम्हें वापिस छोड़ने भी आऊँगा।"

"तुम्हारी गृहस्थी और हमारी नई बहू को देखने आना चाहती थी मैं। तुम्हें मदद करना ही चाह रही थी। लेकिन तब तो तुम जिम्मेदार और स्वावलंबी थे। तुमने ही कहा था कि हमने तुम्हें जन्म देकर¸ पाल पोसकर बड़ा किया¸ तुहारी पढ़ाई पर खर्च किया और अब हमारी जिम्मेदारी खत्म हो चुकी है।"

"माँ!"

"हाँ! और अब तुम्हारे बच्चों की जिम्मेदारी भी तुम्हारी अपनी है। इसके लिये अब तुम्हें मेरी जरूरत क्यों पड़ रही है? अपना किया हमने देखा। खुद का किया तुम देखो।"

शेखर चला गया था। रात प्रीती का फोन आया था।

"माँ प्लीज आ जाईये। मुझसे ये सब नहीं होगा। यहाँ नौकर बड़े महँगे है माँ। हम दोनों सब कुछ मैंनेज नहीं कर पाएँगे। वहाँ आने जाने में चौगुना खर्च हो जाएगा। आपके आ जाने से बड़ी सहूलियत हो जाएगी। हम दोनों वैसे भी साथ रहे नहीं है कभी। इसी बहाने अण्डर्स्टेंड़िंग हो जाएगी।"

माँ सुनती रही। प्रीती से उन्होंने वहाँ डिलेवरी करवाने और दो नौकर रखने की स्थिती में हो सकने वाले खर्चे की रकम मालूम की। दूसरे दिन उन्होंने स्वयं शेखर को बुलवाया। उसके हाथ में संभाव्य खर्चे से चौगुनी रकम का धनादेश रखा। शेखर हतप्रभ था।

"शेखर! यदि संतान ये समझती है कि माँ - बाप को बार - बार उनके रिश्ते की दुहाई देकर¸ कर्तव्यों की याद दिलाकर¸ जो बी चाहिये वह हासिल कर सकती है तब वह यह भूल जाती है कि यही वे माँ - बाप है जिन्होंने उन्हें जन्म दिया है।"

"......"

"हमेशा की तरह तुम्हारा इस बार का भी स्वार्थ पूरा किये दे र ही हूँ। लेकिन म्कौ ये अच्छी तरज्ह से जानती हूँ कि तुम मेरा भावनात्मक शोषण करते हुए ये रकम ले जा रहे हो। तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस लगती हो तब भी तुम इसे मुझे लौताकर मुँह नहीं फेर सकते। याद रखो शेखर! कुछ ऐसी ही चोट तुम बरसों पहले मुझे दे चुके हो।"

शेखर काँप उठा। यही पैसा उसे देश से दूर ले गया। अब यही पैसा माँ बाप से अलग किये दे रहा है। उसके कदम बोझिल हो उठे थे। वह तय नहीं कर पा रहा था कि उसकी गलतियों का बोझ ज्यादा था या माँ - बाप के एहसानों का...

ममता

"ऊँ... आँ"

नवजात शिशु के रूदन से कमरा गूँज उठा। प्राची ने उनींदी¸ थकी आँखों से देखा¸ शाम के पाँच बज रहे थे। घण्टा भर पहले ही तो इसे दूध पिलाकर सुलाया था। कल रात भर भी रो रोकर जागता रहा था। प्राची को खीज हो आई। प्न्द्राह बीस दिन के उस नन्हे से जीव को गुड़िया जैसे उठाकर उसने गोदी में लिया। माँ का स्पर्श पाते ही वह गुलगोथना शिशु संतुष्ट हो गया। अपनी बँधी मुठ्ठियों की नन्ही¸ मूँगफली के दूध भरे दानों के जैसी ऊँगलियों को ही मुँह में लेकर चूसने लगा। प्राची को अब समझ में आया कि उसे क्या करना है।

तभी प्राची की माँ वहाँ आई।

"उठ गया क्या हमारा राजकुमार? चलो अब घूँटी पीने का समय हो गया है।"

"क्या माँ ! मैं तो परेशान हो गई हूँ इससे।" प्राची तुनक पड़ी।

"क्या हुआ?"

क्या क्या हुआ? सोने भी नहीं देता ढ़ंग से। एक तो रात रात भर जागता रहता है। हर घण्टे दो घण्टे में दूध चाहिये। कभी नैपी गंदा करता है तो कभी गोदी में रहना होता है। ऐसा ही रहेगा क्या ये?" प्राची रूआँसी होने लगी थी।

प्रसव के लिये मायके आई बेटी की इस परेशानी को समझते हुए माँ उसके पलँग पर ही पालखी लगाकर बैठ गई । नन्हे शिशु को गोदी में लिया और प्राची का सिर भी अपनी गोदी में रखकर उसे थपथपाने लगी। उनकी आँखों से आँसू बह चले। एक बिंदु प्राची के गल पर गिरा। उसने हड़बड़ाकर माँ को देखा। वे बड़बड़ा रही थी।

"जब तक इसे माँ चाहिये तब तक ये सुख भोग ले बेटी। आजकल पराए परदेसों का कोई भरोसा नहीं है। वो धरती निगल जाती है हमारे लाड़लों को।"

माँ प्राची के बड़े भैया की सामने ही रखी तस्वीर को देखे जा रही थी जो पिछले दस वर्षों से विदेश से वापिस ही नहीं आए थे।

नन्हे शिशु ने प्राची की ऊँगली अपने मैंदे से हाथ में थाम ली थी। प्राची ने अब उसे नहीं छुड़ाया।

टेस्ट

"देखो तो मौसी! वो है मेरी सहेली रीना।" श्वेता ने नेकलेस ठीक करते हुए कहा। मौसी ने गौर से देखा। एक चंचल आँखों वाली लेकिन परिपक्व व्यक्तित्व की स्वामिनी सुदर्शना युवती¸ आत्मविश्वास के साथ उनकी पार्टी में आ रही थी। हल्के नीले परिधान पर नाममात्र की साज सज्जा और चेहरे पर मोहक मुस्कान। साथ था उसका उतना ही शालीन मंगेतर¸ आनंद।

श्वेता ने उसे देखते ही मुँह बनाया । अपने दर्जन भर चूड़ियों वाले हाथ नचाते हुए कहने लगी¸ "देखो मौसी! मैं ना कहती थी? बड़ी स्टूड़ियस बनती है। सिंपल ब्यूटी के नाम से कॉलेज में जानी जाती थी। एन्गेजमेंट के बाद तो अच्छे से सज सँवर कर आना चाहिये ना पार्टी में?" श्वेता ने अपने ब्यूटीपार्लरित बाल लहराए और लिपे पुते चेहरे की अदाओं से बिजलियाँ गिरानी चाही।

मौसी मंद मंद मुस्कुराती रही। श्वेता फिर कह चली¸ "मुझे तो लगता है इसे ज्वेलरी या फैशन एसेसरीज का टेस्ट ही नहीं है। नहीं तो इस तरह से अपनी उम्र से बड़ा कौन दिखना चाहेगा भला?"वह एक बार फिर अपनी हाई हील पर डांवाडोल होते होते बची।

तभी रीना और आनंद एक साथ मुस्कुराते हुए आगे बढ़े। दोनों का जोड़ा जैसे एक दूसरे के लिये ही बना था।

"मुझे लगता है श्वेता!" मौसी ने कहा।

"रीना का टेस्ट¸ जिंदगी की सबसे जरूरी ज्वेलरी के हिसाब से तो काफी उम्दा है।"

श्वेता दाँत पीसती हुई लिपस्टिक टच करती रही...

ज्यादा जानकारी

कथा बड़े मार्मिक प्रसंग पर जाकर टिकी हुई थी। श्रीकृष्ण के विरह में सुध बुध खोती¸ उनके दर्शनों के लिये व्याकुल गोपियों की मन:स्थिती का बड़ा ही मार्मिक व सजीव चित्रण स्वामीजी कर रहे थे। भावुक भक्तों की आँखों से अविरल अश्रुधारा बही जा रही थी। तभी कथा पहुँची श्रीकृष्ण दर्शन के शुभ प्रसंग पर। श्रीकृष्ण का भव्य स्वरूप¸ गले में वैजयन्ती माला¸ मुरली की मोहक तान¸ गोपियों का आल्हाद¸ जीवन की पूर्णता का बोध। श्रीकृष्ण लीलास्थली जैसे उस कथास्थल पर जीवंत रूप में स्वामीजी की मधुर¸ सहज और भावपूर्ण वाणी में प्रस्तुत थी। भक्त तो भक्त¸ स्वामीजी का कण्ठ भी अश्रुआर्द्र हो उठता था।

कथा समाप्ति के बाद घर लौटते हुए शास्त्रीजी अपनी श्रीमतिजी से बोल ही पड़े¸ "क्या आनंद आता है इन स्वामीजी की कथा में तुम्हें? बड़ी भावावेश में आँसू बहाए जा रही थी! उनके ना तो भाषागत उच्चारण सही थे और कई स्थानों पर गलत व्याकरण का प्रयोग भी कर रहे थे।"

शास्त्रीजी का चढ़ा हुआ मुँह श्रीमति शास्त्री को जरा भी नहीं सुहाया।

"ये आप नहीं¸ आपके अंदर के हिन्दी भाषा के प्राध्यापक बोल रहे है। माना कि उच्चारण गलत थे। व्याकरण गलत था लेकिन ये सब कुछ एक भाव पर केन्द्रित था और वह है भक्ति।"

वे आगे बोली¸ "मुझे एक बात बताईये। सही¸ शुद्ध और शास्त्रोक्त भाषा में जब आप अपने छात्रों को तुलसी सूर के भक्ति पद भी पढ़ाते है तब क्या कोई भावावेश में आकर एक भी आँसू बहाता है? सही जानकारी भर बाँटते बाँटते उसका उद्‌गम स्थान शायद याद नहीं रहता आपको।"

अपनी भाषागत जानकारी के प्रति अति जागरूकता के चलते अब शास्त्रीजी की पलके भीगने को आतुर थी।

भेदभाव

लेखक संघ के प्रांगण में नये पुराने शब्द साधकों की गहमा गहमी थी। अवसर था¸ "भेदभाव" शीर्षक से आयोजित की गई कहानी प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा का।

आखिर द्ददय थामे बैठे प्रतियोगियों के बीच प्रथम पुरस्कार की घोषणा की गई । उम्रदाराज सोनीजी का नाम आते ही तालियाँ तो बजी ही साथ ही जिज्ञासाएँ भी बढ़ी।

तीसरे स्थान पर रहने वाली मिसेस जोशी बहू और बेटी के बीच भेदभाव करती सास की कहानी पर थी तो द्वितीय स्थान पर रहने वाले मिश्राजी ने अपने माँ बाप और सास ससुर के बीच भेदभाव करते बेटे का चित्रण अपनी कहानी में किया था।

"आपकी कहानी की थीम क्या थी सोनीजी?"

"मेरी कहानी का नायक है एक ऐसा बेटा¸ जो अपनी मिट्टी का नमक खाकर परदेस की जेबें भरने चला जाता है।"

ज्यादा कुछ न कहते हुए सोनीजी ने आयोजन से चलने की तैयारी की। इकलौता बेटा आठ वर्ष पूर्व परदेस जाकर बस गया था। बीमार मिसेस सोनी की देखभाल करने के लिये उन्हें जल्दी घर पहुँचना था।

वंशावली

दादाजी हर सप्ताह की भाँति आज भी अपनी पुरानी लोहे की पेटी खोलकर बैठे थे। पायल और पिनाक उन्हें इस मुद्रा में देखकर पहले ही दूर भाग जाया करते। वे अपनी कुल वंशावली निकालकर पीढ़ियों पुराने किस्से सुनाते। पुराने समय की असँख्य यादें आज भी उनके चित्त में अपना स्थान बनाए हुए थी।

दरअसल वही सब कुछ बार बार सुनकर बच्चों को बोरियत होने लगी थी। बच्चों के ये सब कुछ सुनने से मना करने पर वे बड़े प्रेम से समझाया करते थे।

"देखो बेटा! हमारे कुल¸ वंश और पीढ़ियों की जानकारी तुम्हें होनी ही चाहिये। यही तो हमारी असली संपत्ति है. कोई भी व्यक्ति अपने कुल नाम¸ वंश¸ गोत्र और जाति से ही तो जाना जाता है।"

"दादाजी!" नन्ही पायल बोल पड़ी।

"हाँ बिटिया!"

"मैं इन दिनों यदि किसी शख्सियत से सबसे ज्यादा प्रभावित हूँ तो वे है स्वामी विवेकानंद।"

"बड़ी अच्छी बात है बिटिया।"

"क्या आप बता सकते है उनके पिता¸ दादा¸ परदादा आदी का नाम और उनका गोत्र?"

"......"

"दादाजी! आज यदि उनके जीवन के इतने वर्षों के बाद भी उनके विचार¸ कार्य इतने सामयिक और सार्थक है तब उनका वंश¸ कुल¸ गोत्र मालूम न होने के कारण क्या हम उन्हें आदर्श नहीं मान सकते? सूतपुत्र होने के बावजूद कर्ण के कार्यों की सराहना तो की जाती है ना?"

दादाजी की त्यौरियाँ चढ़ने लगी थी। पायल ने सहज होकर कहा ¸ "दादाजी! मेरा मानना तो सिर्फ ये है कि जन्म लेना और जीना अलग है और जीकर कुछ कर दिखाना एकदम अलग। मुझे तो कुछ ऐसा कर दिखाना है जिससे सिर्फ मेरा नाम नहीं बल्कि मेरा काम आदर्श बने।"

"पायल दीदी!"

"आई विनू! बैठो तुम सब।"

पायल चल पड़ी। आज बस्ती के बच्चों की कक्षा में उसने विज्ञान के प्रयोग जो सिखाने थे।

रफ्तार

तूफानी गति से कार भाग रही थी। सुनसान हाईवे पर इस आधुनिक¸ सर्वसुविधायुक्त कार में बैठा था विवेक और पल्लवी का जोड़ा। शादी के बाद पहली बार लाँग ड्राईव¸ जून महीने की अलमस्त हवाएँ और चिकना सपाट रास्ता। विवेक तो जैसे बाँधे नहीं बँध रहा था। इस तरह की सुहानी शामें कितनी कम मिल पाती है जिंदगी में। यही तो एन्जॉय करने के दिन है। कार में कुछ इसी तरह की बातें हो रही थी।

तभी गप्पों के दौर के बीच जाने कहाँ से एक नन्हा सा बालक रास्ते पर आ निकला। उसकी मजदूरनी माँ पीछे पीछे दौड़ती हुई आ रही थी। विवेक ने देखा लेकिन गति नियंत्रित करनी बड़ी मुश्किल थी। बच्चे की माँ ने जोर से उसका हाथ खींचा। विवेक ने भी स्टेयरिंग दूसरी ओर मोड़ा।

बालक के पैर में गंभीर चोट आई। लेकिन विवेक¸ गति नियंत्रित करने के स्थान पर उस बालक की माँ की लापरवाही को लेकर लंबी चौड़ी बातें करता रहा। उन्होंने रूककर बालक को देखा भी नहीं।

बातें धीरे धीरे उनके वैवाहिक जीवन के भविष्य और सपनों पर जाकर टिकी। उन्हें अब बचत करने की आवश्यकता थी। दोनों को मिलाकर गृहस्थी चलानी थी। तभी तेज गति से चलती कार के रेडियो पर "तेल बचाओ सप्ताह" के तहत कुछ विज्ञापन प्रसारित होने लगे।

"क्या आप जानते है? अपने चार पहिया वाहन की गति को नियंत्रित कर आप ईंधन की एक चौथाई तक बचत कर सकते है!"

और कार की गति नियंत्रित हो गई।

पल्लवी को लगा जैसे एक मानव के जीवन पर एक चौथाई ईंधन के बराबर रूपयों की कीमत भारी पड़ी हो ...

जीनियस बालक

"मिठू! देखो कल मैंने डिस्कवरी चैनल के "विंग्स" प्रोग्राम से तुम्हारे लिये कुछ नोट्‌स निकालकर रखे है। उन्हें पढ़ जरूर लेना। और हाँ स्कूल की साईंस एक्जीबिशन का क्या हुआ?"

"वो तो सेवन ईयर्स एण्ड़ अप के लिये है ना मम्मी! मैंने मिस से पूछा भी था। वे बोली नेक्स्ट टाईम।"

"ठीक है। लेकिन इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में तुमसे आगे कोई भी नहीं जाना चाहिये समझे? हमें उसकी पूरी तैयारी करनी है ओ के?"

"डन मम्मी!"

और मम्मी ने अपने मिठू को प्यार से देखा। छ: साल का उनका लाड़ला पूरी तरह से उनहीं अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा था। और हो भी क्यों नहीं¸ वे खुद भी तो कितनी मेहनत कर रही थी उसके पीछे। उसे क्लास में चल रहे कोर्स से हमेशा एक लैसन आगे रखना¸ ट्‌यूशन्स के अलावा भी खुद पढ़ने लेकर बैठना¸ उसके जनरल नॉलेज के लिये ढ़ेरो पुस्तकें सी-डी आदी लाना। क्या कुछ नहीं किया था अपने मिठू के लिये उन्होंने।

मिठू भी पढ़ाई में होशियार था। क्लास में हमेशा पहले पाँच में रैंक होता था उसका। बाकी एक्टीविटीज में भी उसके उत्साह की सभी तारीफें किया करते थे।

उसकी मम्मी को इन दिनों चिंता थी उसके स्कूल में होने वाली इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन की। इस राउण्ड के बाद यदि मिठू जीत जाता है तो इण्टर स्कूल इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में वह अपने स्कूल को रिप्रेजेन्ट करेगा। फिर सिटी लेवल¸ स्टेट लेवल¸ नॅशनल लेवल और इन्टरनॅशनल लेवल।

"मेरा मिठू तो सबसे आगे रहेगा।" ऐसा सोचते हुए उन्होंने काफी बड़े सपने बुनने शुरू कर दिये थे।

मिठू की इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन क्या हुई¸ पूरे घर में जैसे भूचाल आ गया हो। दादाजी की दवाईयों के रैपर से लगाकर किराना सामान के खोके¸ टी वी कमर्शियल्स से लगाकर अखबारों की कटिंग्स तक सब कुछ मिठू के पढ़ने के लिये तैयार रखा जाता। उसकी मम्मी का बस चलता तो उसे पुरा शब्दकोष ही रटवा देती लेकिन उन्होंने सुन रखा था कि इस इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन में ज्यादातर वे ही शब्द पूछे जाते है जिनके बारे में हम सभी की यही धारणा होती है कि हम इन्हें जानते है लेकिन वास्तव में वे बड़े मुश्किल होते है। उसकी काँपिटिशन न हुई मम्मी का ब्लड़ प्रेशर हो गया जो दिन पर दिन बढ़ता ही जाता था।

दुकानों के बोर्ड्‌स¸ न्यूज चैनल के स्क्रोलर्स¸ शेयर मार्केट की शब्दावलियों से लगाकर बॉटनिकल नेम्स तक सभी की जानकारी छोटे से मिठू के पीछे पड़ी थी कि कब वह अपने नन्हे से मस्तिष्क में उन्हें छोटी सी जगह दे।

यहाँ तक कि आजकल वह कुछ भी बोलने से पहले भी डरने लगा था। मम्मी उसके कहे हुए शब्द शब्द का हिसाब रखते हुए उसे बेहाल किये रहती। उसे प्रत्येक कहे हुए शब्द का स्पेलिंग मालूम होना जरूरी था।

मिठू कभी कभी सोचता कि यदि उसे यह पुरस्कार नहीं मिला तो मम्मी तो शायद बिस्तर ही पकड़ लेगी। हो सकता है स्युसाईड भी कर ले। और वह टेंशन में आ जाता कि उसे स्युसाईड की स्पेलिंग याद है या नहीं।

इस दबाव से घिरा हुआ मिठू आज बड़ा कमजोर¸ थका हुआ और सुस्त दिखाई दे रहा था। दो दिन के बाद इंग्लिश स्पेलिंग काँपिटिशन थी इसलिये मम्मी को लगा कि वह नर्वस हो रहा है। उन्होंने उसी हालत में¸ उसकी कमजोरी की कोई परवाह किये बिना इंस्टंट स्पेलिंग सॉफ्टवेयर पर टेस्ट आजमाया। अच्छे से ध्यान न दे पाने के कारण मिठू नब्बे प्रतिशत ही ला पाया। कल तक वह निन्यानवे तक पहुँच गया था और मम्मी के हिसाब से इन दो दिनों के अभ्यास से वह पूर्ण भी हो जाता था।

उन्होंने मिठू को फटकार लगाई। कॉन्सेन्ट्रेशन की कमी का ताना मारकर वे चली गई।

इधर मिठू परेशान हो रहा था। आँखें जवाफूल सी लाल¸ बदन गर्म सलाख सा तपता हुआ। टूटन और कँपकँपी से वह थक गया था। सर्दी खाँसी और तेजी से चलती साँस के बीच भी वह मेडिकल सॉफ्टवेयर के सिमटम्स वाले पेज पर गया। उसने अपने सिमटम्स डाले लेकिन तभी एक चक्कर खाकर गिरने को हुआ ।

मिठू दिन भर अपने कमरे में पड़ा रहा। न खाना खाया न किसी से बातचीत की। मम्मी के ड़र से घर में किसी ने भी नहीं पूछा कि उसे क्या हो रहा है।

मम्मी दिन भर¸ "नर्वस हो रहा है" "आज पॉईंट कम स्कोर किये है इसलिये पढ़ रहा होगा" जैसी बातें बताती रही।

मिठू के पापा रात दस बजे घर लौटे। हमेशा की तरह मिठू के कमरे में गये। उन्होंने देखा¸ उनका प्यारा बेटा बुखार में भी कुछ बड़बड़ा रहा था।

"ई...एन...एफ...।" वे झल्ला उठे। पूरे घर को सिर पर उठा लिया।

"किसी को कोई खबर नहीं है मेरा बेटा यहाँ बुखार में तड़प रहा है।"

मिठू से पूछने पर कि उसे क्या हो रहा है¸ वह घबरा जाता। उसने किसी से कुछ नहीं कहा। बस यही कहता रहा¸ "अभी नहीं¸ थोड़ी देर से बताऊँगा।"

जल्दी से डॉक्टर को बुलाया गया। सभी चिंतित थे और सभी की उपस्थिति में मिठू ज्यादा घबरा रहा था। डॉक्टर ने सभी को कमरे से बाहर जाने को कहा।

"बोलो मिठू बेटे। क्या हुआ है तुम्हें? मुझे नहीं बताओगे तुम्हें क्या हो रहा है?"

"डॉक्टर अंकल! आप मम्मी को तो नहीं बताएँगे ना?"

"अच्छा नहीं कहूँगा। बोलो भी अब।"

"मुझे इन्फ्लुएंजा हुआ है। मैंने मेडिकल सॉफ्टवेयर में सिमटम्स डालकर मालूम कर लिया था। लेकिन मम्मी से कहता तो वे उसकी स्पेलिंग पूछती। मैं क्या करूँ¸ मुझे याद ही नहीं हो रही।"

और मिठू फिर बड़बड़ाने लगा "ई...एन...एफ"...

गहरी जड़ों के नाम पर

"सारी जिंदगी घर को सजाने सँवारने में ही लग जाएगी। जाने इसमें चैन से रहेंगे कब!" खिड़कियों के शीशे पोंछते हुए शिखा बड़बड़ा रही थी। परसों ही तो साबुन से धोकर साफ किया था ये सब कुछ। फिर गलीचा धूप में डालते - डालते वह पसीना पसीना हो आई।

"इस घर के मर्द भी बस नाम को जिंदा है। बस खाने को और हुक्म चलाने को। हुँह।" उसने खुद ही बड़बड़ाते हुए फोन के आस पास का बिखरा सामान साफ किया। सुबह ऑफिस जाते हुए सभी अपने कपड़े¸ तौलिये¸ गंदे रूमाल यहाँ - वहाँ बिखेर गये थे। रोज घर का यही हाल होता था।

शादी के कुछ दिनों बाद तक रितेश थोड़ी बहुत शिखा की सुना सुनी अपना काम करने लगे थे। लेकिन बाबूजी की तीखी आँखें जब भी उन्हें घर का कोई भी काम करते हुए पकड़ती¸ दूसरे ही क्षण वे ऐसी राजनीति खेलते कि शिखा जल भुनकर राख हो जाती।

एक बार रविवार के दिन घर भर के परदे धोकर थकी माँदी शिखा ने रितेश को बस परदों भरी बाल्टी छत पर रख आने को कहा था। बाबूजी ने मौका ताड़ झट समधीजी को फोन लगाया। बातचीत में लगा बुझाकर कह ही दिया¸ "आपके जँवाई तो गुलाम बने आपकी बिटिया के साथ कपड़े धो रहे है। अब आखिर एक ही तो दिन मिलता है छुट्‌टी का तब भी चैन नहीं। ये औरतें तो घर में ही बैठी रहती है रोजाना।"

ऐसा एक नहीं कई बार हुआ। बाबूजी वैसे उसकी बड़ी इज्जत करते। चार लोगों के बीच तारीफ करते न थकते। माँजी के बाद घर की सारी जिम्मेदारी उसी पर सौंप रखी थी। शिखा की शादी के ड़ेढ़ साल बाद ही मँझला देवर राकेश एक विजातीय लड़की को चुपचाप ब्याह लाया था। पहले से ही घर के कामों में हड्डियाँ गला चुकी सास और उसी रास्ते पर चलती जेठानी के साथ वह नई लड़की कोई तारतम्य नहीं बैठा पाई।

पुरूष यदि कोई गलत तथ्य कह रहा हो तो उसे स्त्री ने सुधारना जबान चलाना क्यों कहा जाता है? घर में जब रहते सभी है तब थोड़ा थोड़ा काम सभी को करने में क्या हर्ज है?बाबूजी पानी तक अपने हाथ से क्यों नहीं लेते? ऐसे और न जाने कितने और सवाल मन में लिये वह दो महीने तक संघर्ष करती रही। सोचती रही कि या तो मन को समझ में आने वाले इन सवालों के जवाब ढूँढ़कर यहीं रम जाए या फिर अपनी जीवन शैली इन सभी को सिखाए जिसमें प्रत्येक को अपने अधिकार और अपना व्यक्तित्व था।

खैर! सुचित्रा एक उन्मुक्त आकाश में पली बढ़ी सुशिक्षित लड़की थी। उसे इन बंधनों में बाँधना ही बेवकूफी थी। शादी के तीसरे ही महीने शहर के मधय एक बहुमंजिला भवन में फ्लॅट लेकर उन्होंने अपना अलग जहान बसाया। सुचित्रा ने छोटी सी नौकरी करनी शुरू की। वे बिना किसी से बैर मोल लिये सुखी थे।

लेकिन बाबूजी के हिसाब से¸ उनके घर से जाने के बाद से ही माँ बीमार रहने लगी थी और छ: महीने के भीतर ही चल बसी। मेडिकल रिपोर्ट्‌स से यह मालूम होने के बाद भी कि उन्हें पुरानी दिल की बीमारी थी¸ बाबूजी ने राकेश और सुचित्रा का मुँह देखना तक बंद कर दिया। उनके विचार से सुचित्रा का यूँ घर छोड़ना ही माँ की मृत्यु का कारण था।

"अब ये सब कुछ क्या लेकर बैठ गई हूँ मैं!" महरी की आवाज से शिखा की तंद्रा टूटी। अलबम अवेरते हुए उसने थोड़े बहुत फोटो क्या पलट लिये थे¸ यूँ ही दिमाग में फितूर उठने लगे थे। साढ़े दस बज रहे है और सारा रसोईघर वैसा ही पड़ा है।

तभी बाबू जी किसी के साथ बैठक में दाखिल हुए।

"ऐसा है मिश्राजी! हमारे परिवार के रीति रिवाज¸ हमारे संस्कार इतने गहरे है ना! इसी के ऊपर तो हम लोग टिके हुए है साहब।"

ये संभाषण सुनकर शिखा के होश फाख्ता हो गये। बाबूजी फिर उन्हीं गहरी जड़ों वाले संस्कारों¸ मर्यादाओं और पीढ़ीजात परंपराओं का पुलिंदा लेकर बैठे है। इसका मतलब मिश्राजी आज यहीं खाना खाएँगे। अब तक शिखा को चाय तक पीने का वक्त नहीं मिला था।

वो सुबह तो कैसे कसरत करते हए निपटी थी शिखा ने उसका भगवान ही जानता है। थक हार कर खाना खाने ही बैठी थी कि फोन घनघनाया।

रमन की आवाज थी। उसका सबसे छोटा देवर।

"वो भाभी! मैंने कहा था ना¸ साक्षी को वो स्पेशल कचौड़ियाँ बनानी सीखनी है आपसे। तो वो अभी आधे घण्टे में ही पहुँच रही है घर पर। अपनी होने वाली देवरानी को अच्छे से ट्रेण्ड़ कर देना प्लीज!"

उधर से रमन की शरारत भरी हँसी के साथ फोन बंद हुआ। शिखा कसककर रह गई। उसे बाबूजी के सारे शब्द हथौड़े के जैसे कानों पर बजते हुए से महसूस हुए।

"हमारी गहरी जड़ैं है ये संस्कारों की। मर्यादाएँ¸ परंपराएँ बड़ों की इज्जत¸ सबको साथ लेकर चलना¸ ये सब हमारे घराने की विशेषताएँ है।"

क्या खाक विशेषताएँ है! इनमें से एक भी तो विशेषण आपके अपने कर्मों का फल नहीं है। मर्यादाएँ स्त्रियों के लिये है कि वे काम करती रहे¸ ऊफ न करें। परंपराएँ घर में निभती है और घर में रहती है औरतें तो निभाएगा कौन? बड़ों की इज्जत बहुओं को ही करनी होती है। रही सबको साथ में लेकर चलने की बात तो चौतरफा हमलों को लेकर पुरूष हमेशा से ही तो स्त्री की छाती पर सवार होता है जैसे कि वह कोई अष्टभुजा देवी हो और नाच नाच कर पुरूष की सारी जरूरतों को पूरा करते हुए उसके पुरूषत्व के खोखले अहं की पुष्टि करती रहे। जरा सी भूल चूक में उसके मायके का उद्धार और खुद की ऊँचाई का बखान। नींव के पत्थर जैसी जमींदोस्त होती इस घर में औरतें ही तो पुरूषों को अपने ऊपर खड़ा होने का मौका देती है।

"कहने को मालकिन होकर भी मैं क्या दो कौर भी शांति से खा नहीं सकती हूँ क्या?" शिखा झल्ला उठी।

साक्षी है रमन की मंगेतर। तीन महीने बाद शादी होने वाली है और रमन चाहता है कि सुचित्रा भाभी जैसी भूल साक्षी से न हो। इसलिये घर के तौर तरीके¸ काम करने का सलीका आदी सीखने के लिये किसी न किसी बहाने से उसे शिखा भाभी के पास भेजता रहता है।

कुछ ही देर के बाद साक्षी घर पर थी। शिखा का उतरा हुआ चेहरा¸ थकी माँदी देह¸ आधी छूटी थाली और ओढ़ी हुई मुस्कान काफी कुछ कह रही थी। साक्षी को समझते देर न लगी। उसे शिखा भाभी के वर्तमान में स्वयं के भविष्य की झलक पाई और मन ही मन दृढ़ निश्चय कर बैठी कि ऐसा जीवन तो कतई नहीं।

वो कुछ कह पाती इससे पहले ही बाबूजी बैठक में पधारे। "अच्छा तो छोटी बहू आई है।"

"जी बाबूजी।"

शिखा बाबूजी को साक्षी से बाते करते देख अपना बाकी काम निपटाने लगी। कुकर में कचौड़ी के लिये आलू उबलने रखे। मैदा नापकर थाली में ड़ाला। तभी फिर वही संभाषण कानों पर पड़ा जो सुबह मिश्राजी सुनकर गये थे।

"हमारा परिवार इतने गहरे संस्कारों की जड़ों से बना है कि..." शिखा को लगा कि उसके कान बज रहे है।

तभी साक्षी ने मुस्कुराकर उनकी बात काटते हुए कहा¸ "माफ कीजियेगा बाबूजी! इस परिवार के रीति रिवाज और परंपराओं के विषय में आप मुझे पहले भी चार पाँच बार समझा चुके है। और हाँ! मैं ये भी जानती हूँ कि सुचित्रा भाभी और राकेश भैया का आप मुँह भी देखना पसंद नहीं करते। क्योंकि वे इस परिवार की रीति के अनुसार नहीं चले। और इस वजह से माँजी चल पड़ी। लेकिन बाबूजी एक बात कहूँ?"

"हूँ..."

"डॉक्टर श्रीवास्तव जिन्होंने माँजी का इलाज किया था वे मेरे दूर के अंकल लगते है उन्होंने ही मुझे बताया कि उन्हें पुरानी दिल की बीमारी थी। खैर ! ये सब बातें ..."

"साक्षी ऽऽ"

बात बिगड़ती देख शिखा ने अंदर से आवाज दी। कोई प्रति-उत्तर नहीं मिला। साक्षी कहती चली।

"देखिये बाबूजी जिन गहरी जड़ों से जुड़े रहने की आप बातें करते है उन जड़ों को भी तो स्वाभिमान¸ सम्मान और अधिकार के पानी की आवश्यकता होती है। ये तो अन्याय ही होगा कि सारी प्रशंसा फूल पत्ते ही बटोर ले जाएँ और जड़ें गहरी और गहरी दबती जाएँ! इतनी कि अपना अस्तित्व ही खो दे...!"

शाम को रमन ने खाना लगाने में शिखा भाभी की मदद की। अपने कपड़े व्यवस्थित रखे।

"क्यों रे रमन! साक्षी यहाँ से सीधी तेरे पास आई थी क्या?" शिखा ने आश्चर्य से पूछा।

रमन बस मुस्कुराकर रह गया...

बेटी

"ये तो बात तुम्हारी गलत है दद्‌दा।"

दिनेश चबूतरे पर से उठ खड़ा हुआ था।

"जरूरत तुम्हारी आन पड़ी है सो हमारी जिज्जी की दुहाई देते पहुँच गये हो। इतने ही रिश्ते निभते तुमसे तो हमारे विकास को ये दिन ना देखना पड़ते। आए हो जँवाई बनने। अब वो लखनपुर की ससुराल याद नहीं आई?"

"बाबू!" पिताजी की हुक्के वाली सधी आवाज गूँजी।

वे खँखारकर गला साफ करते हुए कमरे से बाहर जाने के लिये उठे। उमा ने सहारा देना चाहा लेकिन उनकी
वक्र दृष्टि ही ना के लिये काफी थी। बाहर आकर देखा¸ सर झुकाए सदानंद बाबू बैठे थे। दिनेश वहीं पर¸ आधे घण्टे पहले झाड़ी बुहारी हुई जगह पर जबर्दस्ती झाड़ू फेरकर गुस्से को दबा रहा था।

"प्रणाम पिताजी!" सदानंदजी अनमने भाव से झुके।

इधर एक हूक सी उठी। इस व्यक्ति को देखकर न चाहते हुए भी वो सब याद आ जाता है।

कैसा हँसता गाता घर था। कैसी झिलमिल बारात उतरी थी। गाँव उलट पड़ा था दूल्हे की एक झलक पाने को। बिदाई के वक्त दुल्हन बनी रमा बिटिया और ये ही दूल्हा जब आशीष लेने को झुके थे तब पिताजी की एक आँख बेटी की बिदाई को रोई थी और दूसरी¸ अच्छा घर वर मिलने पर बेटी के भाग जगने की खुशी में बरसी थी।

रमा¸ उनकी पहली संतान। उन्हें पिता के गौरवपूर्ण पद पर आसीन करने वाली उनकी लाड़ली। जाति समाज की भी फिक्र किये बिना उन्होंने रमा को कॉलेज भेजा। बी कॉम करवाया। पढ़ी लिखी¸ काम काज में गुणी और सुंदर बिटिया को घर भी ऐसा मिला था कि एक पल को तो उधर से हाँ आने पर पिताजी को खुद के कानों पर भरोसा नहीं हुआ था।

वही रमा शादी के दूसरे ही साल प्यारे से बेटे के दोनों कुलों को निहाल कर बैठी थी। कितने चाव से सारे नेग शगुन दिये और रीती रिवाज निभाए थे पिताजी ने। दिनेश और उमा तो दिन भर जीजी¸ जीजाजी और छुटके की ही बातें किया करते। उसके भाग्य पर इतराते फिरते।

उसी रमा ने फिर मामूली बुखार में जो बिस्तर पकड़ा था। डॉक्टरों के इलाज के लिये शहर ले जाने की बात पर आगे पीछे होते हुए ये सदानंदजी ही अपनी माँ के कहने पर नीम हकीमों के चक्कर में पड़े थे। और सही इलाज के अभाव में रमा दीदी¸ चार साल के विकास को छोड़कर चल बसी।

पिताजी अंदर से टूट गये थे। वो तो दिनेश ने खेती बाड़ी सम्हाली और काम काज अपने हाथ में लिया तब जाकर धीरे धीरे सब कुछ ठीक होने लगा था।

तभी खबर मिली थी सदानंदजी के दूसरे ब्याह की।

"कोई जादू टोना ही किया है कँवरजी पे उन लखनपुर वालों नें । कहाँ तो सोने सी सुंदर बिटिया मेरी और कहाँ उस साहूकार की मँझली बेटी ला रहे है। जाने क्या गुल खिलाएगी अब।"

बाबूजी हर आए गये को यही सुनाते। माँ पर तो जैसे दु:खों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। चूल्हे में जलती आग के जैसे उनका जी भी जला करता था। दिनेश और उमा भरसक स्वयं को सामान्य बनाए रखने का प्रयास किया करते। सबका जी जुड़ता था कहीं तो बस छुटके का ख्याल करके। नन्हीं सी जान! स्कूल जाने लगा था। मम्मी को याद करके रोना भूला भी नहीं था अभी कि ये सौतेली माँ आ बैठी है। जाने क्या सीख पढ़कर आई होगी।

खैर! विमला ने इन लोगों से अपने संबंध बखूबी निभाए। उसकी सास को पसंद तो नहीं आता था लेकिन विकास को लेकर रमा दीदी के मायके वे साल में एक बार जरूर आती थी। सदानंदजी को खैर अपनी नई ससुराल खूब फली। हर छठे चौमासे आठ पन्द्रह दिन रह आते। शिकार¸ दावत हर तरक का आनंद रहता। लखनपुर का राजाराम यदा कदा दिनेश को छेड़ा करता था। "तुम्हारे कँवर साहब तो लखनपुर में बिराजे है हफ्ता भर से। खूब मौज मजा चलता है।" दिनेश तड़पकर रह जाता था। लेकिन चुपचाप सुन लेने के अलावा कोई चारा भी तो नहीं था।

वे ही सदानंदजी इतने सें के बाद घर पधारे थे। विकास शहर से पढ़ लिखकर लौटा था। अच्छी फर्म में नौकरी भी पा गया था। लेकिन वहाँ किसी मराठी लड़की को पसंद कर बैठा। अब जिद पर अड़ा है कि शादी करेगा तो उसी से। लड़की के ताऊ इसी गाँ के है। उनके लड़के के साथ दिनेश का उठना बैठना है।

सदानंदजी बिरादरी बाहर की बहू नहीं चाहते थे। दिनेश से कहने आए थे कि लड़की के भाई को समझाकर लड़की को पीछे खींच ले। और इसी बात पर दिनेश फट पड़ा था।

असल में बात कुछ और ही थी। पिछले महीने विकास अचानक एक दिन के लिये दिनेश के पास आया था। सीधे खेत पर ही मिला था सो कोई जान नहीं पाया। लड़की का नाम¸ फोटो दिखाकर आशीर्वाद ले गया था। दिनेश तो इसी में गद्‌गद्‌ हुआ जा रहा था कि भांजा अभी भी मामा से इतना जुड़ा हुआ है कि मन की बात उसे सबसे पहले बताई। इसी बात पर रोजाना उठने बैठने वाले लड़की के ताऊ के लड़के यानी अपने दोस्त के साथ मिलकर उसने बधाई भी ली दी थी। लेकिन बात अपने तक ही रखी।

और आज सदानंदजी इसी खुशी में खलनायक बन पुराने रिश्तों की दुहाई देने आए थे। माँ उनके यथेष्ट स्वागत सत्कार में लगी थी । उमा यहाँ - वहाँ दौड़ भाग कर रही थी।

सदानंदजी ने बात मालूम पड़ते ही पहले तो विकास को खूब खरी खोटी सुनाई। अपने घर के संस्कारों की दुहाई दी। लेकिन जब वह टस से मस नहीं हुआ तब खुद को मामले से अलग करके तटस्थ बने रहे। विकास भी दूसरे ही रोज शहर चला गया था। बात हाथ से निकलती देख उन्होंने लड़की के सभी संबंधियों की पड़ताल की और यहाँ तक पहुँचे थे।

दिनेश अपने दोस्त राजीव से ये बात हर्गिज करने को तैयार नहीं था कि वह अपनी बहन को समझाए। विकास को अपनी माँ तो ठीक से मिली नहीं। पिताजी हमेशा खुद में ही मस्त रहे। रही सही नई माँ¸ तो उसका हृदय किसने टटोला है आज तक? और यही सदानंदजी आज रमा दीदी की याद में दो चार आँसू भी ढ़ाल चुके थे। उन्हीं पुराने रिश्तों को उखाड़ रहे थे जिन्हें उन्होंने खुद ही अपना मतलब पूरा होते से ही भुला दिया था।

उनकी और दिनेश की कहा सुनी पर पिताजी ने ठंडा पानी डाला था।

"विकास बेटा समझदार है। उसे थोड़ा वक्त देने की जरूरत है। अभी हम भी बात नहीं उठा सकते और आप भी धीरज रखकर बैठिये। जो भी होगा¸ प्रभु की मर्जी से ठीक ही होगा।"

सदानंदजी के लौटने के बाद कुछ दिनों तक शांति रही थी घर में।

फिर उस दिन विमलाजी स्वयं आई थी। अकेली¸ विकास के सिवाए वे पहली बार थी यहाँ पर।

"ये आए थे न यहाँ!" सीधी बात कही थी उन्होंने।

"हाँ बेटी! आए तो थे कँवरजी।" माँ ने अपनी कमजोर आवाज में कहा।

"इन्हे जरा भी नहीं सुहाया है विकास और अदिती का जोड़ा। लेकिन..." उन्होंने आगे कहा।

"मुजे कोई आपत्ति नहीं है। मैं तो मिल भी आई हूँ अदिती से। बड़ी समझदार और गहरी लड़की है। आप क्या कहती है माँजी?"

तब तक दिनेश भी आ चुका था।

"हम क्या कहेंगे जिज्जी! हमारी रमा जिज्जी के जाते से विकास क्या¸ वो घर क्या¸ हमारे हक से¸ रिश्ते से तो गया है। उस दिन जीजा साहब आए थे पुराने रिश्ते सिलने और आज आप आई है यहाँ। हमसे निबाता तो है नहीं कोई¸ गरज पड़ते आ जाते है सभी।"

दिनेश बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये हाथ मुँह धोने आँगन में चला गया।

"ऐसा क्यों कहते है भैया? मैंने क्या विकास को कोई गलत परवरिश दी है जो आपकी दीदी नहीं देती। क्या कसर छोड़ी है उसकी माँ बनने में मैंने? विमलाजी की आँखें भर आई। घर का वातावरण बोझिल हो उठा। और कोई चारा न पाकर पिताजी¸ माँ¸ उमा¸ दिनेश सभी उनके इर्द गिर्द चौके में ही जमा हो गये।

"देखो भैया! देखिये पिताजी! मैं जानती हूँ रमाजीजी जैसी सुलक्षणा स्त्री ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगी। लेकिन मैंने भी तो अपनी पूरी कोशिश की ना खुद को उनकी जगह रखने की?" विमलाजी मुखर हो उठी।

"अपने सास - ससुर के तानें सुनकर भी छोटे विकास को लेकर आपके पास आती रही। क्या रमा जीजी जिंदा होती तो क्या वे भी नहीं आती ऐसे ही? विकास के सारे तीज त्यौहार इस गर से आए कपड़ों में ही करवाती रही जिससे उसे मामा घर का नेह लगे। उसे सारी कहानियाँ आप लोगों की ही सुनाती रही जिससे वह आप लोगों की ओर ही खिंचा रहे। और माँ ..." अपनी सारी शक्ति बटोरकर उन्होंने आगे कहा...

"लायक होते हुए भी बाँझ होने के ताने सुने जिंदगी भर। क्या इतना भी काफी नहीं?"

विमलाजी अब फफक फफक कर रोने लगी थी। माँ का आँचल और उमा का दुपट्टा भी भीगा। दिनेश और पिताजी आश्चर्यमिश्रित भय से इस रमा दीदी की सौत को देख रहे थे। इस बात पर तो गौर ही नहीं किया उन्होंने कभी। उल्टे जीजी का घर हड़पने के कारण ही उन्हें संतान सुख से वंचित रहना पड़ा है यही सोचकर खैर मनाते रहे थे।

जिस औरत ने हमारी बहन के बेटे की खातिर अपनी जिंदगी दाँव पर लगा दी। सारे हक हमें दिये और हम उसे कुछ अपने से शब्द भी न दे पाए। शायद इसीलिये विकास¸ दिनेश को ही आकर सबसे पहले अपने मन की बात बता गया था।

दिनेश अब और नहीं सह पाया। अपने मन की उथल पुथल दबाकर वह कुछ कहने ही जा रहा था कि नियंत्रित स्वर में विमलाजी बोल पड़ी।

"खैर! अब इन बातों में कुछ नहीं रखा। घर में तो कोई विकास की इस शादी के पक्ष में नहीं है। लेकिन मैंने ही उसे हिम्मत दी है। माँ के प्यार को तरसा हुआ बेटा अब अपने जिंदगी के प्रेम को तो न तरसे। अगले महीने शहर जाकर शादी कर आऊँगी दोनों की। मामा घर से आप लोग रहेंगे ना?"

"बेटी!" भर्राए स्वर में पिताजी बोल पड़े।

"विकास बेटा तरसा तो है। लेकिन अपनी माँ के प्यार को नहीं? पिता की छाया को। तुम्हारी जगह यदि हमारी रमा होती तो वो भी अपने बेटे के लिये शायद ही इतनी हिम्मत करती।"

फिर वे भावविभोर सी बैठी रमा की माँ से कहने लगे¸ "सुन रही हो ना रमा की माँ? रमा बेटी कहीं नहीं गई। विकास के पास है वो। हमारे घर में है।" माँ को तो समझ नहीं आ रहा था कि इस क्षण को वे कहाँ छुपाकर रख दे।

पिताजी विमलाजी को भरे गले से कहने लगे¸ "ये तो तुम्हारा मायका है बेटी। पूछो नहीं हक से कहो। हमारा नाती है। उसकी शादी पूरे जोर शोर से होगी। हम सब चलेंगे शहर।"

सबके हृदय से कितना बड़ा बोझ उतर गया था। सबकी आँखों से खुशी बह रही थी। कुछ देर बाद पिताजी कहने लगे¸ "अरे रमा की माँ! भूल गई क्या सबकुछ? शादी तय हुई है नाती की। बेटी को शगुन की साड़ी तो ओढ़ाओ...!"

जिंदगी भर का साथ

टेढ़ी मेढ़ी लकीरें खींचते आधा घण्टा बीत गया। घड़ी की ओर देखा। अभी तीन घण्टे बाकी थे आकाश को लौटने के लिये। घर का काम खत्म कर पिछले एक घण्टे से मैं टी वी के सामने बैठी थी। और कोई होता तो टी वी ऑन भी किया होता। मुझे इन फालतू सीरियल्स में कोई रस नहीं आता। पहली बात तो इतना ज्यादा रिश्तों का उलझाव देखकर ही उबकाई आने लगती है। फिर वक्त काटने के लिये और कोई जरिया भी तो नहीं है सिवाय खाली बैठे रहने के सिवाय।

अचिंत्य¸ मेरा बेटा। होस्टल में हे। घर में और कोई नहीं है। सारी सोसाईटी मेरे भाग्य पर ईर्ष्या करती है। कोई "झंझट" जो नहीं है मेरे पीछे। जब जी चाहे घर को ताला लगाकर कहीं भी घूम आ सकती हूँ¸ शॉपिंग पर जा सकती हूँ। अच्छी खासी स्मॉल कार भी है मेरे लिये।

कितना गुस्सा हुए थे आकाश उस दिन मैंने कहा था। "अचिंत्य अब एट्‌थ में आ गया है। काफी मैच्योर हो गया है। क्यों ना एक और इश्यू।"

"ये खाली बैठे बैठे कुछ भी फितूर पाल लेती हो तुम दिमाग में। आसान बात है क्या एक और बेबी मैनेज करना? जानती हो तुम कि कोई और है नहीं हमारा। फिर तुम्हारे चेक अप¸ तबियत¸ हॉस्पिटल वगैरह के लिये मुझे मेरे साल भर से तय प्रोग्राम्स डिस्टर्ब करने पड़ेंगे।"

कहने को कितना कुछ था मेरे पास। शारीरिक¸ मानसिक यंत्रनाओं से गुजरने को तैयार थी मैं। अपनी सोच की ¸ अपनी अभिव्यक्ति की एक सृजनात्मक प्रतिकृति चाहती थी मैं। काश कि बच्चे पैदा करने के लिये मुझे किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता!

सारे कष्ट तो मुझे होने थे जिनका कुछ भी सोचे बगैर आकाश फैसला ले चुके थे।

मैं जब अपने आप में लौटी तो पाया कि खाली थाली के सामने बैठी हूँ। आकाश खाना खाकर टी वी के सामने बैठे थे। टी वी चालू था...

ऐसा तो हमेशा से है। मेरे सामने टीवी भी काली होता है और थाली भी। आकाश कहते तो है। फ्रेन्ड्‌स बनाया करे। किटी जॉईन करो। पार्टीज में जाओ। लेकिन तुममें वो चीज है ही नहीं। आखिर पत्थरों से बातें करने की आदत ड़ालनी है तो ये भी तो याद रखना होगा कि थोड़ी देर बाद ये बातें वापिस भी तो लौटेंगी टकराकर! वो सब सुन सुनकर अब कोफ्त होने लगी है।

घूम फिरकर बस एक ही सवाल मन में गूँजता है। अब आगे क्या? कई बार तो दिमाग पर जोर डालने पर भी आकाश की छवि ही याद नहीं आती। फिर मैं घबराकर फोटोफ्रेम पर नजर डालती हूँ।

उस दिन डॉक्टर आनंद का फोन आया था आकाश के लिये। इन्हें साईकेट्रिस्ट के कन्सल्टंट की क्या जरूरत पड़ गई? कुछ बातें छुपकर सुन ली थी मैंने।

"एकदम कूल है डॉक्टर ! कोई लाईफ ही नहीं बची। फुल्ली अनप्रिड़िक्टेबल। यू नो! कोई रिलेटिव भी नहीं है मेरा जो कंपनी दे सके।"

फिर कुछ दिनों के बाद अचानक अचिंत्य घर आ गया। आकाश को छुट्टियाँ मिली। हम हिल स्टेशन गए। वही रूटीन। सुबह उठकर ब्रश करने जैसा या फिर डाईविंग के जैसा लगता था। ऊपरी तौर पर कई चेन्जेस दिखाए मैंने लेकिन अंदर न जाने क्या ऐसा चिपक गया था जो लाख निकालो¸ निकलता ही नहीं था।

आकाश भी जैसे अपना सब कुछ कहीं बाँट आए थे। दो खोखली जिंदगियाँ एक साथ आखिर क्या कर सकती थी?

"तुम ना आकाश! मुझे कभी नहीं समझ सकते।"

आखिरी दिन था छुट्टियों का। शाम की फ्लाईट थी। सुबह नाश्ता करते वक्त जब मेरे हिस्से खालीपन आया तब यही तो निकल पड़ा था मुँह से। आकाश देखते रहे थे मुझे।

"आर यू ओके सिमी?"

"मेरा नाम सिमी है ना! वो अरसे बाद आपके मुँह से सुना इसलिये..."

"लेटो-लेटो¸ आराम करो तुम।"

"डॉक्टर वो बहुत कोशिश कर रही है बट कहीं कोई गड़बड़ है। ठीक है¸ दिन में दो ना? मैं डोज़ डबल कर दूँगा। आई विल लेट यू नो। बाय"

डॉक्टर आनंद ही तो थे। आकाश मेरे लिये डॉक्टर आनंद से कन्सल्ट कर रहे है। कौन सी दवाई चल रही है मुझे जिसका डोज़ डबल होने वाला है?

खैर छोड़ो! ऐसे जाने कितने ही किस्से हो चुके है मेरे साथ। कहीं जाने के बहाने आकाश दस दस दिन सिटी में ही होते और मुझे अखबार पढ़कर मालूम होता। ऑर्ग्यूमेंट करूँ तब तक उनके हिसाब से इतना वक्त गुजर चुका होता था¸ इतनी हैप्पनिंग्स हो चुकी होती थी कि मुझे हर वक्त पुराने इश्यूज को न घिसते रहने की हिदायत मिला करती थी।

फिर आई निर्मला। फिर साल भर का फॉरेन टूर। मुझे सिर्फ दो दिन पहले मालूम पड़ा था कि अब साल भर अकेली रहना है। ऑफिस से सैलरी चैक आ जाया करेगा।

आज हमें वेकेशन से लौटे दो महीने हो गये है। आकाश फिर तीन महीने के टूर पर बाहर गये है। मैं माता रूक्मिणीदेवी मानसिक रूग्णालय में भर्ती हूँ।

दिमाग पर बहुत जोर डालो तो याद आता है। आकाश डॉक्टर आनंद से मिलकर आए थे। और फिर अजीब सी शक्ल सूरत वाली दो बाईयाँ आकर मुझे ले गई थी। मैंने कोई प्रतिरोध नहीं किया। उन्होंने साँस छोड़ते हुए कहा था¸ "थैंक गॉड ये वॉयलेंट केस नहीं है।"

लेकिन मुझे समझ नहीं आया। इस हिसाब से तो पिछले पाँच सालों से मैं पागल ही कहलाऊँगी। पहले पाँच साल तक मैं भी हर चीज से प्रभावित होती थी। खुशी¸ दर्द¸ आँसू मुझे भी तो महसूस होते थे। लेकिन मेरी किसी भी पुकार का असर आकाश पर नहीं होता था। वो जैसा चाहते¸ मैं वैसा करती जाती। प्रतिरोध करना छोड़ दिया।

जब कोई सुनने वाला ही न हो तब दीवारों से बड़बड़ाने वाला भी पागल कहलाता है और चुपचाप खुद से बातें करने वाला भी। यही तो चाहते थे ना आकाश? मैंने सिर्फ उन्हीं का सुना। खुद को दफना दिया। फिर भी जाने क्या¸ कहाँ गलत हो ही गया। मुझे अपने दोस्त प्रशांत से बार बार मिलवाकर हमें घण्टे दो घण्टे अकेले छोड़ देने वाले आकाश शायद जानते नहीं थे कि मैं ये अच्छी तरह से जानती हूँ कि मैं किसी प्रशांत से नहीं डॉक्टर आनंद से बातें कर रही हूँ।

उस दिन भी सीढ़ियों से उतरते वक्त सिस्टर मेरा हाथ इतने जोर से पकड़े हुए थी! मैंने जरा छुड़ाने की कोशिश की तो वे चिल्ला पड़ी। "शी इज गैटिंग वॉयलेंट! होल्ड हर प्रॉपरली।" और फिर मुझे और जोर से

पकड़कर ले जाने लगे थे।

परसों आकाश आए थे। सूजा हुआ सा मुँह लेकर अचिंत्य भी आया था। और मेरी स्काय ब्ल्यू साड़ी में थी निर्मला। अचिंत्य छिटककर दूर जा खड़ा था। मुझे देखकर मुस्कुराया। सालों बाद उन जोड़ी भर आँखों में अपना सा कुछ तैरता दिखाई दिया।

अचिंत्य ने भी निर्मला का कोई विरोध नहीं किया था। मेरा बेटा। बिल्कुल मेरे जैसा। मुझे अब कोई दर्द नहीं। मैं न सही मेरा अक्स है आकाश के पास। उसे जिंदगी भर का साथ निभाने को...

चुप होती आवाजें

"बहुत सी वीरानियों के साये पड़े है इस भरी पूरी जिंदगी पर। ये सिर्फ मैं नहीं¸ हजारों लाखों के दिलों की बातें होंगी जो लफ्जों से कभी मिल ही नहीं पाई। कभी ना कभी का वो औरत होने का दर्द जब नासूर बन जाता है¸ हम उसे समझौते और दूसरी पीढ़ी की भलाई के नाम पर भगवान की नेमतों का पलस्तर चढ़ा बस आगे बढ़ने और वक्त काटने का जरिया बस बन जाते हैं।

बदलावों की फेहरिस्त जो कभी खत्म नहीं होती। मैं अपने मन की बात आम औरतों की तरह नहीं समझा सकती पूरी तरह। बहुत सी जगह पढ़ा है जो लिखा जाता है पुरूषों के लिये कि वे समझे एक नारी की अपेक्षाएँ लेकिन संसार की हर एक नारी ये जानती है कि ये सब झूठ है। अपने आप से की जाने वाली अपेक्षाओं को कर्ज की तरह उतारना¸ बातों को दिल से लगाकर रखना और फिर भी दोयम दर्जे पर ही पड़े रहना ये सोचकर कि चलो ये तो नसीब हुआ।

मेरे ख्याल से अपनी भावनाओं का प्रदर्शन कर हम खुद ही मुसीबत मोल लेते है। अति संवेदनशीलता ही हमारी कमजोरी है। पुरूष जानते है कि कमजोर परिस्थितियों में औरत ही सबसे पहले पिघलती है।"

लिखते लिखते माथा गर्म हो उठा मधु का। ये बस सम्मेलन में पढ़ने के लिये की जा रही तैयारी है या दबाहुआ सा कुछ निकलने लगा था वक्त की खुरचन खाकर?

बरसों पहले की वो रूमानी बातें¸ इंतजार की रातें¸ दिल पर पत्थर रखकर मानी गई तोहमतें¸ खुलती सच्चाईयाँ¸ सतही रिश्तें¸ सूखता प्यार और आज की वीरानी । कलम रोककर एक ग्लास ठंड़ा पानी पिया¸ अपने फैसलों को टटोला और आत्मविश्वास से बरी कुछ साँसों के पैबंद लगा फिलहाल तो उमड़ते सैलाब को रोक दिया।

अब डर लगता है खुद से ही। खुद की ही बनाई हुई जिंदगी। जब खुद के ही हाथों से निकलने लगी थी तब उसने खुद को ही निकाल लिया था उस भँवर से।

तंद्रा टूटी¸ मधु आज में लौटा लाई खुद को। ऊँचे सपने देखने वाली हर युवती की तरह मधु के भी ख्वाब जिंदगी में बुलंदियों को छूने के थे। आज वो बुलंदी पर है। लेकिन ख्वाब पूरा होने के साथ उसे ये भी चाहिये कि कोई सुने कि वह कितनी मेहनत से इस मुकाम पर पहुँची है। मधु सक्सेना या फिर वर्मा। फिर वही उलझन। छोड़ो भी¸ जरा सी विचारों को हवा लगती है तो दूर तक आग जाती है।

ऊँचाई वाकई में खुबसूरत तो होती है लेकिन वहाँ जगह बहुत कम होती है। मुझे समझने वाला शायद कोई भी नहीं बना। शायद सबको यह समझाते हुए जीना ही मेरी जिंदगी है।

धप्प... "पोस्टमॅन"

शाम के साढ़े चार बजे है। डाक आई है। लेकिन वो फुर्ती नहीं है जानने की कि क्या आया होगा। कोई कौतूहल नहीं। नयापन नहीं। कुछ बचा है तो बस खीज और ओढ़ी हुई उम्र। डाक में मधु के लिये होता भी क्या है। कहीं सम्मेलन में अध्यक्षता का प्रस्ताव तो कहीं उद्‌घाटन का आमंत्रण¸ वृक्षारोपण या अनाथालय के बच्चों से मुलाकात।

शुरूआती दौर में अच्छा लगता था ये सब। परिवार में अपने अस्तित्व को लगता जंग जब घुन की तरह खाने लगा था तब मधू ने अपनी अभिव्यक्तियों के लिये समाज सेवा का रास्ता चुना था। शुरू में दो चार बच्चों को मुफ्त में पढ़ाना¸ कामवाली औरतों की समस्याएँ सुलझाना¸ अनाथालय में जाकर बच्चों की जरूरत की वस्तुएँ बँटवाना¸ वृद्धाश्रम में जाकर वक्त बिताना ये सब कुछ उसकी दिनचर्या के अंग बन चले थे।

फिर जिन्हें अपने काम के लिये उसकी जरूरत और आदत पड़ चुकी थी वे परिवार के सदस्य धीरे धीरे कुलबुलाने लगे।

आखिर में स्थितियाँ कुछ इतनी उलझ गई कि उन्हें सुलझ पाने की स्थिती में न पा उसने स्वयं ही इस सब से अलग हो जाना ठीक समझा।

दस वर्ष! कोई कम वक्त नहीं दिया था परिवार को। वो भी इतना वक्त इसलिये खींच पाई क्योंकि प्रतीक साथ थे। सचमुच¸ घर की जिम्मेदारियों को निभाती और अपेक्षाओं को पूरा करती हुई बुरी तरह से ऊबी हुई पत्नी को कोई भी काम के बोझ से दबा हुआ पति कभी भी समझ नहीं सकता।

नौ साल तक मधु¸ प्रतीक को समझती रही और दसवें साल में उसने अपेक्षा की कि प्रतीक कुछ समझा करे। लेकिन साल भर से कम में ही सारी समझदारी¸ शक शबूहों¸ अबोले और ऊँची आवाज में संभाषण करते हुए अपने अहं की अभिव्यक्ति में बदल गई।

बातें घर से बाहर जाएँ इससे पहले ही मधु ने अपने आप को सम्हाला । काम करना शुरू किया और आत्मनिर्भर होते ही आत्मसम्मत निर्णय लेकर अलग हो गई। कितना समझाया था सभी ने। पिताजी दस दिन तक आकर रह गये थे।

सबको पिछले दो सालों से बिना शर्त लौटाती रही है वो। सबकी बड़ी बड़ी बातें¸ "चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम"। फिर "अपना घर तोड़कर दूसरों को जोड़ने की कोशिशें बेकार है।"

मधु को एकाएक विस्मय सा होता। उसने तो घर छोड़ा है। उसके वहाँ से हटते ही वो एकाएक टूट कैसे गया? सच ही तो है! जब रंग बिरंगी¸ इतराने वाली दीवारों का साथ नींव छोड़ देगी तो घर तो टूटेगा ही।

सब कुछ सोचना छोड़ उसने चश्मा उतारा। किचन में जाकर चाय बनाई। चाय पीते पीते शाम की डाक देखने की आदत थी उसकी। इस आदत पर अब कोई टोकने वाला या उसे अपनी मातहत समझकर डींगें हाँकने वाला कोई नहीं था यहाँ।

स्वतंत्र हवा में साँस लेने का सुख कुछ अलग ही स्वाद देता है। कितना तरसी थी वह इन सूकून भरे पलों के लिये अपनी पिछली जिंदगी में। अब रोकने टोकने या अपेक्षाओं बरा चेहरा लेकर सामने बैठने वाला कोई भी नहीं है। सचमुच! कोई भी तो नहीं है। कुछ भी करने के लिये...

ऐसा क्यों लगता है? अपने ही लिये हुए निर्णय पर फिर से सोचने का मन होता है। सिवाए प्रतीक और गुड़िया के¸ कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो आँखें नम कर सके।

उस दिन साम की डाक में गुड़िया का कार्ड आया था। याद आया¸ दो दिन बाद जन्मदिन है मधु का। चुपके से डाला होगा। वो भी अब ऐसी उम्र में नहीं है कि उसे कुछ भी कहकर मन बहलाया जा सके। पूरे नौ बरस की हो गई है अब।

"माँ! पापा खुद पर जरा भी ध्यान नहीं देते। घर में दादा - दादी से झगड़ा चलता रहता है उनका। मैं अच्छे से पढ़ाई करती हूँ लेकिन आजकल स्कूल जल्दी से आवर भी हो जाए तब बी घर लौटने का मन नहीं करता। एनी वे ! हैप्पी बर्थ ड़े।

गुड़िया"

कितने बुरे मोड़ से गुजर रही है गुड़िया! प्रतीक ने ही तो जिम्मेदारी ली थी उसकी। एक दूसरे को समझदार और नये जमाने के वयस्कों की तरह मानते हुए मधु और प्रतीक ने एक दूसरे से अलग होने को "वक्त की माँग" के जैसा सतही नाम दिया था। सच भी था¸ इतनी गहरी चोट¸ ज्यादा ध्यान देते रहने से नासूर बन सकती थी। एक दूसरे से अपना मन छुपाकर¸ मन ही मन अलग होने चले थे।

आगे की जिंदगी! मधु¸ प्रतीक¸ गुड़िया...

"क्या करूँ! कितना कचोटता है ये सवाल?"

नहीं! अपनी ही आवाज को दबा दिया था उसने।

जिंदगी अजीब से मोड़ लेती रही थी। मधु और ज्यादा व्यस्त¸ और ज्यादा "कामयाब" होती रही। गुड़िया के कार्ड¸ पत्र आते रहे। मधु सार्वजनिक जीवन में एकाकीपन उठाए ऊपर चढ़ती गई। पिछले सारे रंग फीके पड़ते गए। उनपर जिंदगी का एक दूसरा ही रंग असर दिखाता गया।

वक्त जैसी दमदार चीज के सामने नाजुक संवेदनाएँ अब हार मानने लगी थी। ठहरे हुए पानी में अपने विचारों की लहरों के सहारे बहने का मजा ढूँढ़ लिया था मधु ने।

इसी ठह्‌रे हुए से पानी में एक बड़ा सा भँवर उत्पन्न हुआ था उस दिन।

दरवाजे के उस पार¸ घण्टी बजाने वाला शख्स और कोई नहीं¸ प्रतीक ही था। शायद इस पल को कल्पनाओं में कई बार जी चुकी थी मधु¸ इसलिये प्रतीक की उपस्थिति को सहजता से ले पाई। मन में कितना कुछ ऊपर नीचे हो चला था। जाने क्या क्या बोलता रहा वो। जाने क्या क्या सुनती रही मधु।

उन शब्दों में कोई अर्थ नहीं रखा था उसके लिये। उसे तो प्रतीक का सामने होना ही सब कुछ लगता रहा। प्रतीक भी शायद काफी पूर्वाभ्यास से आया था सो इतना धाराप्रवाह बोल सका। सब कुछ सुनकर भी यूँ लगा जेसे ये बीते कल की चंद प्रतिध्वनियाँ है। वे तनाव जिन्हें शब्दों के जरिये आपसी झगड़े बनने से पूर्व ही मधु ने खुद ही ढीला कर दिया था वे अब पुन: तंबू के जैसे तनकर उसे अपनी छाँव में लेने की कोशिश में थे।

प्रतीक की बातों से स्पष्ट था। वह अंदर से बुरी तरह से टूट गया था। माँ - बाबू जी से बातचीत बंद थी। गुड़िया से रिश्ता सुख चला था। इस घिर आए अकेलेपन को काटने का मधु के जैसा कोई भी तो तरीका नहीं था उसके पास।

प्रतीक लौटना चाहता था। वो मधु को लेने नहीं¸ उसके पास आने की इजाजत माँगने आया था।

मधु के लिये इस ताजपोशी का नशा अलग ही था। फूल से हल्के होते पल कितने अपने से लगने लगे थे। लेकिन मधु जानती थी कि ये खुशियाँ उसके लिये नहीं बनी है। घर बचाने के लिये उसका घर छोड़ना जब सबको घर तोड़ना लग सकता है तब पति का उसके पास लौट आना यानी बुढ़ापे में माँ - बाप को अकेला छोड़ना नहीं होगा?

उसके मन से हजारों आवाजें आती रही।

प्रतीक को उसने अपने एक एक आँसू का हिसाब दिया। मन की उमंगों से दोस्ती करवाई अरमानों की फेहरिस्त सुनाई। ओढ़ी हुई तटस्थता के अंदर की टूटी हुई अकेली मधु उस एकाकी क्षण में मुखर हो उठी। प्रतीक भी ज्यादा अलग नहीं था।

मधु का वापिस जाना संभव नहीं था। प्रतीक का यहाँ आ जाना सही नहीं था। दोनों ने एक दूसरे की आवाजें सुनी¸ पहचानी। लेकिन उनका जवाब उन दोनों में से किसी के पास भी नहीं था।

फिर वक्त आगे जाता गया। गुड़िया के खत आते गए।

"पापा मेरी पढ़ाई में इन्ट्रेस्ट लेते है माँ। खूब मेहनत करते है। दादा दादी से ज्यादा बोलते तो नहीं लेकिन झगड़ते भी नहीं। दो दिनों के बाद स्कूल में छुट्टियाँ है। पापा मुझे एक्टीविटी कैम्प भेजेंगे। बाकी सब ठीक है।

गुड़िया।"

मधु ने हमेशा की तरह शून्य में ही देखा लेकिन एक तसल्ली थी। अपने ऊँचे होते अरमानों की आवाज को चुप करने के बाद¸ इस मौन की आवज ज्यादा सुरीली थी।

जात

"मैथिली! जल्दी करो आशीष पहुँचता ही होगा।"

"बस हो गया भाभी!" मैथिली की आवाज धीरे धीरे पास आती गई।

"बस थोड़ा सा ये क्लिप तकलीफ दे रहा था। बाकी तो मैं ये तैयार हूँ।" अब मैथिली एकदम सामने थी शुभा के।

"अब देखती ही रहोगी या कहोगी भी कि कैसी लग रही हूँ।"

शुभा की आँखों मे एक साथ कई स्वप्न तैर गए। स्वयं को संयत करती हुई वह बोली¸ "नजर न लगे। मैं ना कहती थी! पीच कलर कितना सूट करता है तुझे!"

सचमुच! हकोबा का बारीक काम किया हुआ बिन बाँहों का कुरता¸ तंग चूड़ीदार और नेट की चुन्नी में मैथिली का रूप फटा पड़ रहा था। तिसपर क्रिस्टल की ढ़ेर चूड़ियाँ एक हाथ में और दूसरे में भैया की बर्थ डे पर गिफ्ट की हुई गोल्डन रिस्ट वॉच। सलीके से सँवारा गया चेहरा¸ बाल और मैंच करता पर्स। और क्या चाहिये शॉपिंग के बहाने किसी "योग्य" लड़के के साथ घूमने के लिये।

मैथिली शुभा की ननद और आशीष "शुभा" का योग्य छोटा भाई। अत्यंत उच्च कुल के दोनों परिवार। पानी की तरह बहता पैसा। क्लब¸ पूल¸ बार वगैरह के मापदण्ड़।

शुभा की आँखों में आशीष मैथिली का जोड़ा बहुत पहले से भा गया था। फिर जब आशीष ने सही तरीके से अपना बिजनेस भी सम्हालना शुरू कर दिया तब शुभा ने शादी लायक हुई मैथिली से अपने दिल की बात कह दी थी। जान बूझकर अनजान बनती लेकिन गुलाबी गालों में मुस्कुराती मैथिली की मर्जी तो शुबा उसी दिन जान गई थी। वह सिर्फ इतना चाहती थी कि दोनों का मेलजोल पहले आकर्षण में बदल जाए। फिर गर्म तवे पर जरा पानी डालते ही वह भाप देने लगेगा।

आशीष के बिजनेस पार्टनर की बहन की शादी थी और उसकी मम्मी को क्वालिटी पर्चेसिंग करवाने का जिम्मा आशीष पर था। ऐसे अवसरों पर उसकी एप्रोच सीधी शुभा दीदी ही होती थी। परसों ही तो आया था वो।

"दीदी! आप तो जानती है कि शर्मा अंकल की नरगिस की शादी है। मम्मी तो बस उसकी मम्मी बनने पर तुली हुई है जैसे।"

जिस हिकारत से ये सब आशीष बिना किसी हिचक के बोल गया था¸ शुभा भीतर तक हिल गई थी।

शर्मा अंकल पापा के अच्छे दोस्त है। पापा के बिजी बिजनेस शेड्‌यूल के कारण सारे व्यवहार¸ नाते रिश्ते मम्मी के ही जिम्मे थे। फिर शर्मा आंटी की अचानक मौत के बाद मम्मी का उनके घर आना जाना काफी बढ़ गया

था।

शुभा तो अपनी शादी के वक्त शर्मा अंकल का एहसान ही मानती रह गई थी। पापा बिदाई के समय भी नहीं पहुँचे थे और शर्मा अंकल रो रोकर मुँह सुजाए दे रहे थे।

"लेकिन मम्मी ऐसा कुछ..."

"छोड़ो दीदी!" आशीष लगभग चीखा।

"यदि पापा अपना ध्यान कहीं और लगाएँगे तो मम्मी को भी अपना फ्रस्ट्रेशन निकालने के लिये कुछ तो चाहिये ना। शुक्र करो कि एक ही है।"

कुछ पलों तक श्मशान शांतता रही थी दोनों के बीच। फिर विषय बदलने की गरज से आशीष शॉपिंग वाली बात कह गया था। बिना किसी लाग लपेट के शुभा दीदी ने अपनी किटी का बहाना बनाकर आज का आशीष और मैथिली का प्रोग्राम बना दिया था। आगे का सारा काम हाई सोसाईटी में पली बढ़ी मैथिली खुद कर लेगी।

सज धजकर तैयार खड़ी मैथिली को उतना ही शोभित आशीष ले गया। फिर दोनों पूरे तीन घण्टे बाद मैथिली के लिये एक ब्रेसलेट का उपहार लिये थके से घर लौटे।

"ओह भाभी! आशीष इज हेविंग अ नाईस सेंस ऑफ ह्‌यूमर। इतना हँसाया बाबा रे! और वो रेड साड़ी वाली आँटी जिनकी हील टूट गई थी¸ हाऊ इम्बरेसिंग शी वॉज!" और दोनों तालियाँ पीटकर हँसते रहे थे।

शुभा भी उनमें शामिल हो जाती शायद यदि उसे अरण्या का ख्याल न आ जाता।

मैथिली भी पागल। अरण्या को आशीष के सामने ले आने की क्या जरूरत थी? अच्छी भली उसके कमरे में छुपाए थी वह उसकी गरीब सहेली को। जाने क्या नोट्‌स वोट्‌स देने आई है। ले देकर बिदा करती।

अरण्या के सात्विक सौंदर्य का तेज आशीष से सहते न बना। गेहुएँ रंग पर स्वच्छ शुभ्र वस्त्र¸ नाममात्र के आभूषण¸ हल्के भूरे लंबे केश और नियंत्रित हाव भाव। मैथिली जहाँ डच रोज सी गमक रही थी वहीं अरण्या शुभ्र कमल से पवित्र भीनी महक दे रही थी। कहीं कोई मादकता नहीं।

हालाँकि उस दिन आशीष और अरण्या में कोई बातचीत नहीं हुई लेकिन उस लड़की में गुण ही इतने थे कि मैथिली आशीष का साहचर्य पाने के लिये अरण्या की बातों का सहारा लेने लगी। वह सोचती कि आशीष शायद इन बातों में इसलिये रस ले रहा है क्योंकि वे मैथिली के मुँह से कही जा रही है। लेकिन असल में तो वह इन बातों से मिलते संकेतों को जोड़कर अपने भविष्य की मूर्ति गढ़ता जाता था।

खैर! आशीष और मैथिली देर रात डिस्को से थके हुए¸ हॉटेल की प्लेटों में आधे से ज्यादा खाना छोड़ घर लौटते तो शुभा दीदी का जी गज भर का हो जाता।

अब वक्त आ ही गया है कि इनसे आशीष और मैथिली की बात की जाए। लेकिन मैथिली के भैया तीन महीने की अफ्रीकी देशों की यात्रा पर थे। शुभा दीदी आशीष और माँ की ओर से तो सहमत थी लेकिन पति की मंजूरी की अहमियत तो थी ही।

फिर मैथिली के जन्मदिन पर उसे स्वरोस्की क्रिस्टल भेंट करते हुए आशीष का ध्यान एक खुबसूरत लिखावट पर गया। कुछ पहचानी सी वह¸ अरण्या की ही थी। हाथ में उठाकर पढ़ा तो पढ़ता ही चला गया। मैथिली से अपनी दोस्ती¸ उसके रूप गणों का कितनी खूबसूरती से एक छोटी सी कविता में वर्णन कर दिया था अरण्या ने। आशीष कायल हो गया।

मेहमानों की धुत भीड़ में¸ गहने कपड़ों की लकदक के बीच वह अलग थलग सी पड़ी अरण्या तक आखिर पहुँच ही गया। पुन: शुभ्र वस्त्र। इस बार शीशे का काम था उनपर और सफेद ही एम्ब्रायडरी। सिर्फ उसके हल्के भूरे बाल ही उस शुभ्र विन्यास में कुछ रंगत भर रहे थे।

आशीष के लिये उससे बात करना बेहद जटिल था। हर बात में "वो मैथिली कह रही थी..." से शुरू होती और फिर अरण्या चुप होकर रह जाती। लेकिन आशीष ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थी। उसकी लिखावट की¸ उसकी कविता की¸ मैथिली से उसकी दोस्ती की और उसके सफेद रंग की पसंद की बातों का सहारा लेकर उसने अरण्या का सारा इतिहास जान लिया था। उसके कॉलेज आने जाने का वक्त और रास्ता भी।

अरण्या के पिता किसी अच्छी कंपनी में एकाउंटेंट थे। माँ कुछ साल पहले चल बसी थी। बड़ी बहन अणिमा विवाह विच्छेद के बाद यहीं रहती थी। पिताजी का छोटा मोटा टेलरिंग का काम था। अणिमा वही देखा करती थी।

आशीष कौतूहल से भर उठा। इस लड़की की जिंदगी मेम् तो जरा ऊपर उठाकर देखने की भी गुंजाइश नहीं है। फिर कैसे यह अपने संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर स्वयं की स्पष्ट छाप छोड़ जाती है! आशीष जान चुका था¸ छोटी जात की¸ निम्न मध्यमवर्गीय जीवन जीते हुए भी संस्कारों में¸ नैतिकता में और सबसे बढ़कर दिमागी खूबसूरती में मैथिली इस लड़की के सामने बाल बराबर भी नहीं है। बातें भी करती है तो आँखें कहीं और रखकर। एक सुरक्षित दूरी बनाकर और अनाधिकार प्रवेश की चाह रखने वाले किसी भी व्यक्ति के विचारों को दूर से ही झटक देती है।

यूँ तो आशीष को उसके ऑफिस में एक से बढ़कर एक लड़कियाँ प्राप्य थी। लेकिन उन सबसे ऊब चुके आशीष को अरण्या में एक निर्मल निर्झर सा मिला था। उसकी ओर खिंचते जाते हुए आशीष ने यह परवाह भी नहीं की कि शुभा दीदी और मैथिली उससे क्या आस लगाए इस रिश्ते को बढ़ाने की छूट दे रहे है।

खुले तौर पर सभी आशीष मैथिली की जोड़ी को जानते थे। लेकिन अरण्या का नाम आते ही जैसे सभी पर घड़ों पानी गिर गया।

"देखो बेटा! वो लड़की आज तक क्लब की एक सीढ़ी भी नहीं चढ़ी। कभी कॉकटेल पार्टीज में पैर नहीं रखा। हमारा रहन सहन¸ हमारी लाईफस्टाईल इन सभी से कभी भी एडजैस्ट नहीं हो पाएगी वो। और ये सब छोड़ भी दे तो एक बात याद रखना आशीष।"

माँ एकदम तटस्थ होकर बैठी थी। कुछ हिकारत से आगे बोली¸ "इन्सान कभी भी अपनी जात नहीं छोड़ता।"

"मुझे तुमसे कोई बात नहीं करनी आशीष।" शुभा दीदी मुँह फुलाए बैठी थी।

जबसे उन्हें यह मालूम हुआ था कि आशीष उसकी सब्जपरी सी खूबसूरत और सलीकेदार ननद को छोड़ उसकी ही किसी नीची जात की सहेली पर मर मिटा है तो वे आपे से बाहर हो गई थी।

"मैथिली ने दिन भर से खाना नहीं खाया है। अरण्या महारानी आई थी अपना अपसगुनी चेहरा लेकर!"

आशीष की आँखों में अरण्या का नाम सुनते ही जो चमक आई थी उसे देखकर ही शुभा दीदी इस रिश्ते की गहराई को समझ गई थी।

अपनी हिकारत दिखाते हुए बोली¸ "हरि के हाथ ही कहलवा दिया था कि अब फिर कभी लौटकर न आए।"

सुर्ख जोड़े में सर से पाँव तक सजी धजी अरण्या पारंपरिक दुल्हन लग रही थी। सजीले कोसा के परिधान पर बाँधनी के छींट के दुपट्टे में था उसका दूल्हा आशीष।

कुछ दिनों के बाद आशीष के घर किचन में सुबह सुबह कुछ देर को चूड़ियों की खनखनाहट सुनाई देती। फिर माँ का वज्र घोष। अरण्या को सलीके सिखाते ताने धीरे धीरे उसके पिता के इस घर में घुसपैठ के इरादे तक जा पहुँचते। असहृय होने पर अरण्या पहले आँसू टपकाती¸ आशीष के समक्ष जा खड़ी होती। आश्रयस्तंभ एक ही तो था उसका।

घर में आने जाने वाले यहाँ तक कि नौकर भी उसे अजीब सी नजरों से घूरते। चारों ओर से बस एक ही शोर सुनाई देता था। "नीची जात...नीची जात... नीची जात"

अरण्या के दिन शूलों पर और रातें फूलों पर बीतती थी। आजकल काभी कबी शराब की बदबू को छुपाने के लिये इस्तेमाल किया जाने वाला दमदार स्प्रे भी उसे धोखा नहीं दे पाता था। कभी कभी वह अपने लिये हुए निर्णय पर सशंकित हो उठती थी लेकिन आशीष का उदात्त प्रेम उसकी हर शंका का समाधान बन जाया करता था।

माँ का शर्माजी के यहाँ आना जाना ज्यादा बढ़ गया था।

वक्त बीतते बीतते अरण्या एक स्वस्थ बेटे की माँ बनी। "औदार्य" सभी के आकर्षण का केन्द्र बना। फिर भी इस हँसते खिलखिलाते घर में अरण्या स्वच्छ पानी में स्याही की बूँद जैसी सभी को खटकती।

उस दिन अरण्या को आशीष के कोट में वह परफ्यूम लगा रूमाल मिला। उस सुगंध ने जाने कितना कुछ याद दिला दिया था उसे। मैथिली¸ उसकी मैंत्री¸ आशीष का आगमन और अब तक का सफर एक पल में तय कर अरण्या पुन: उसी प्रश्न के समक्ष जाकर खड़ी रह गई।

"मैथिली का रूमाल आशीष की जेब में क्या कर रहा है?"

अरण्या को खुलने में दो दिन लगे। बिजनेस डील के दिल्ली गया आशीष दोपहर तीन बजे लौटा। इस वक्त न तो कोई फ्लाईट थी न ट्रेन और उसकी गाड़ी भी यहीं थी।

"देखो अरण्या! ये रोक टोक मुझे पसंद नहीं है। मैं शहर में ही था। किसी के यहाँ रूका था बस।"

अरण्या सन्न रह गई। कुछ भी समझ में नहीं आया कि ये सब हो क्या रहा है।

जब उन भोली प्रश्नवाचक आँखों ने आशीष का पीछा नहीं छोड़ा तो हारकर उसे बताना ही पड़ा।

"देखो अरण्या! तीन साल हो गए है हमारी शादी को। अब तुम भी पहले जैसी नहीं रही हो। डोन्ट यू थिंक सो अ मॅन नीड्‌स चेन्ज? मैं दो दिन मैथिली के साथ था । शी वॉज रनिंग थ्रू डिप्रेशन फेज। दैट्‌स ऑल।"

अरण्या को साँस लेने में मुश्किल होने लगी। तीन सालों तक तो घर में बिंधते बाण इसलिये सह जाती थी कि आशीष मरहम का काम करेगा। आज उसे पीछे से ही कटार भोंक दी थी उस मरहम ने। टूटकर गिर जाने का मन हुआ। वे सारे प्रश्न¸ वे सारे मूल्य¸ वे सारी नैतिकताएँ बेशर्मी से उसके सामने आकर मुँह चिढ़ाने लगी।

क्यों इतने प्रेम और आकर्षण का दिखावा किया आशीष ने? जब फिर से मैथिली के पास ही जाना था तब ये प्रेम का नाटक क्यों? ऐसे हालात में उसे अणिमा के ¸ अपनी दीदी के चरणों पर ही चलना होगा क्या?

रात के ढाई बजे थे। उन कुछ शब्दों को सुनने के बाद से अरण्या को हवा भी काटने को दौड़ रही थी। और उन्हें कहने वाला आशीष¸ निश्चिंत सोया था। तो आज तक उसका अपना कहलाने वाला आशीष¸ आज उसका अपना नहीं था।

मैथिली¸ उसका जिस्म¸ उसकी अदाएँ¸ उसकी खुशबू सभी कुछ सामने घूमने सा लगा। इस व्यक्ति के चेहरे पर शिकन तक नहीं? मैथिली भी डिप्रेशन से गुजर रही है मतलब? साल भर पहले ही तो उसकी शादी बड़े भव्य तरीके से की गई थी। ऊँचे घर में ब्याही गई मैथिली के पति भी ऊँचे इरादों के थे। आशीष के पापा की तरह वे भी घर में कम ही टिकते।

तो क्या इसीलिये मैथिली! लेकिन आशीष! उसे क्या कमी है? कह तो रहा था तीन साल हो गये है। चेन्ज चाहिये। मैं भी वैसी नहीं रही । तो क्या बस यूँ ही? तो ऐसी अब तक कितनी... और माँजी और शर्मा अंकल!... वही चेन्ज... आशीष ...माँजी......

"छी..."

अरण्या के पूरे शरीर में डंक मारने वाले असंख्य बिच्छू रेंगने लगे। घृणा हो आई इस माहौल से उसे। मैथिली और आशीष पहले भी तो एक साथ थे। वो तो अरण्या की ओर स्वयं ही हाथ बढ़ाया था आशीष ने। लेकिन अब ये सब कुछ क्या है? वो प्यार वो पागलपन सब झूठ था? घण्टों वह पैर सिकोड़े गुड़ी मुड़ी सी पड़ी रही।

जिंदगी के मायने बदल रहे थे¸ सोच बदल रही थी¸ अरण्या बदल रही थी। कभी प्रेमवश आशीष ने उससे कहा था¸ "तुम अपने नाम के ही जैसी किसी अरण्य में विहार करती कुमुदिनी के जैसी हो अरण्या!" और आज उसी आशीष की करतूतें उसे जंगल के हिंस्र पशुओं के जैसी लग रही थी।

मैथिली¸ आशीष¸ माँजी और पिछला वक्त चीख चीखकए अरण्या के कानों में गर्म सीसा ऊँड़ेल रहा था¸ जात¸ नीची जात।

तो क्या आशीष भी इसी लिये ...

"ऊफ! मैं क्या करूँ? रूआँसी हो चुकी अरण्या के हाथ स्वभावगत ऊपर देखकर जुड़ा गए।

वही ईश्वर जो जन्म देता है¸ उसी के इन्सानों ने बनाई जात को ढोकर जनम भर से चली आ रही अरण्या उसी से न्याय की भीख माँगने चली थी।

जाने कब नींद लगी उसे। अजीब से सपनों और दृष्टांतों के बाद सुबह उठी हुई आत की टसुए बहाती स्त्री नहीं रह गई थी। आज उसके सामने एक लक्ष्य था। अपनी "जात" दिखाने का। बीते कल की मीठी यादें और आनेवाले कल के मधुर स्वप्न अपनी आँखों से उतारकर रख दिये है उसने।

किसी को भी कानोंकान खबर नहीं हुई। अरण्या अणिमा से मिलने जाती रही। रोज। पहले तो उसे देखकर उसकी बातें और भविष्य की योजनाएँ सुनकर अणिमा असंभव...असंभव से भाव लाती रही थी चेहरे पर। फिर दृढ़ निश्चयी अरण्या के आगे उसने घुटने टेक दिये।

छ: महीने के बीतर ही आशीष के सारे ऑफिशियल कॉन्टॅक्टस गुपचुप अरण्या का फेवर करने लगे। घर के सभी आने जाने वाले लोगों का रूख अरण्या की ओर नरम होता गया।

घर की चौखट में कैद रहने वाली नीची जात की बेचारी सी लड़की अचानक मुखर¸ सहृदय और जेन्टलवूमन पर्सनालिटी की कहलाने लगी। घर से बेखबर आशीष इसे अरण्या का "चेन्ज ऑफ बिहेवियर ड्‌यू टू अनअवॉइडेबल सरकम्स्टांसेस" मानता रहा।

तब तक¸ जब तक रजिस्टर्ड डाक से उसके पास एक पत्र नहीं आ गया।

"प्रिय आशीष !

मुझसे पत्र पाकर हैरानी तो जरूर होगी। काफी कोशिश की कि आप मिले तो बात करूँ लेकिन स्थिती इतनी जटिल है कि मेरा आपसे समय लेकर मिलना भी संभव नहीं है।

इन दिनों में पता नहीं आपने नोटिस किया भी या नहीं लेकिन मैंने काफी कुछ बदल दिया है। न सिर्फ खुद को वरन्‌ अपने आस पास के सभी को। अब मैं आपकी डिपेन्डेन्ट वाईफ नहीं बल्कि "औदार्य इन्डस्ट्रीज प्राईवेट लिमिटेड के एम डी की हैसियत से ये पत्र आपको लिख रही हूँ। आपके लीगल एडवाईजर मिस्टर प्रधान और चार्टर्ड एकाउंटेंट मिस्टर वर्मा अब मेरे मुलाजिम है।

और आज का दिन आपके घर में मेरा आखरी दिन था। क्योंकि उस दिन क्लब मेंबरशिप पेपर्स पर साईन करते समय आप म्युच्युअल डिवोर्स पेपर्स पर भी साईन कर चुके है। बेटा भी अब मेरा है। "लीगली।"

अब सभी को घर में यही चर्चा करने में आनंद आएगा कि इतना वैभव और इतनी ऊँची लाईफस्टाईल मैं सहन नहीं कर पाई और अंत में मैंने अपनी जात दिखा ही दी।

मुझे सिर्फ इतना ही कहना है कि तुम तथाकथित उच्चवर्ग के मनुष्य तो अपनी ओछी और गिरी हुई हरकतों से जानवरों को भी पीछे छोड़ देते हो। तुम्हारा धर्म स्वार्थ है और जात पैसा। फिर आज ये वाली हो या कल वो।

तुमसे तो मेरी जात अच्छी है। कम से कम इन्सानों में तो हूँ। आज मेरा इस जेल में जानवरों के बीच का जीवन समाप्त हुआ। अपने सारे बंधन तोड़कर मैं सहर्ष अपनी जात में शामिल हो रही हूँ।

अरण्या"

बस थोड़ी देर तक हतप्रभ रहने के बाद आशीष ने दाँई ओर मुड़कर आवाज दी¸ "बाहर आ जाओ रीटा ऽऽ! कोई नहीं¸ बस पोस्टमॅन था...।"

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प्रकाशक : अरूण पब्लिशिंग हाऊस प्राईवेट लिमिटेड़

एस सी ओ 49 – 51¸ सेक्टर 17 सी

चण्ड़ीगढ़ – 160017

आईएसबीएन : 81–8048–031–3

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ग़ज़ल 1
अंधेरों में उजालों की कसम तुमको मुबारक हो
समय की बेवफाई का भरम तुमको मुबारक हो

हमारी चीख की कोई कहानी बन नहीं पाई
तुम्हारे प्यार के किस्से का ग़म तुमको मुबारक हो

अभी मासूम ख़्वाहिश को वफ़ाएँ तोड़ देती हैं
मुहब्बत में ज़माने का सितम तुमको मुबारक हो

हमारे जख़्म पे मरहम लगाकर उंगलियाँ रखना
सियासत में नुमाइश का धरम तुमको मुबारक हो

कहाँ हँसते हुए देखा कभी बेजान पत्थर को
फरिश्ता है वही तो ये वहम तुमको मुबारक हो

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ग़ज़ल 2
मेरे जज़्बात मेरे नाम बिके
उनके ईमान सरेआम बिके

ऐसी मंडी है सियासत जिसमें
तेरे अल्लाह मेरे राम बिके

पी के बहका न करो यूँ साहब
अब तो मयख़ाने के हर जाम बिके

उनकी बातों का भरोसा कैसा
जिनके मजमून सुबह-शाम बिके

कैसे इजहार करूं उल्फत के
मेरे अरमान बिना दाम बिके

*--*--*

ग़ज़ल 3
ग़म यहीं है हवा किधर जाए
सिर से चादर न फिर उतर जाए

खेल ही खेल में किधर जाए
जो इधर आग है उधर जाए

सूखे पेड़ों से आग बरसेगी
धूप में आईना ठहर जाए

एक जंजीर है जो टूटेगी
इस कलाई का जख़्म भर जाए

हम जरूरत नहीं मुहब्बत हैं
उस हुक़ूमत को ये ख़बर जाए

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ग़ज़ल 4
ग़म हमारा मलाल उनका है
ये भी कहिए कमाल उनका है

ये सफ़र का अजीब हिस्सा है
याद उनकी खयाल उनका है

हम परंदे नहीं जो उड़ जाएँ
जाने कैसा सवाल उनका है

एक शीशे-सा टूट जाना है
ऐसे रिश्ते का हाल उनका है

फ़िक्र है तो यक़ीन भी होगा
ये गुज़स्ता-सा साल उनका है

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चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

- असग़र वजाहत

अनुक्रम यहाँ देखें

अध्याय 5


समझदार को इशारा

तेहरान विश्वविद्यालय की तरफ़ मुंह करके खड़े हो जायें तो दाहिनी तरफ़ इन्क्लाबे-इस्लामी सड़क पर ही कुछ आगे चल कर एक कई मंज़िला गोल-सी इमारत है जिसे 'थियेटर सेंटर' The centre for dramatic Arts कहते हैं। यहां आने से पहले ही यह पता था कि ईरान, खासकर तेहरान में थियेटर का बड़ा ज़ोर है और वहां नाटक वालों से ज़रूर मिलना चाहिए। मोनी ने नाहीद के ज़िम्मे यह भारी काम डाला था कि मुझे 'थियेटर सेंटर' दिखाये। नाहीद अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी है और फिलहाल एक अखबार में किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है।

थियेटर सेंटर की काफ़ी बड़ी और प्रभावशाली इमारत है। बताया गया कि यह इस्लामी क्रांति आने से कुछ साल पहले ही बनी थी। ईरान में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। 'कॉमिक इंअरटेनमेण्ट' पर केन्द्रित नाट्य विधाएं ईरान में इस्लाम आने से पहले प्रचलित थीं जिन्हें 'बक्फालबाज़ी', 'तख्त हाउज़ी', 'सियाहबाज़ी', 'ख्यालबाज़ी', 'ख़ेमाशबाज़ी' के नाम दिए गए थे। इन सबकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। इसके अतिरिक्त 'कठपुतली' का तमाशा भी ईरान की लोकनाट्य शैलियों में है। इन लोक नाट्य शैलियों की कथावस्तु घरेलू झगड़े, प्रेमियों का संघर्ष, धनवान और गरीब की लड़ाई आदि हुआ करते थे। प्राय: नाटक लिखे हुए नहीं होते थे और इनका प्रमुख उद्देश्य समाज व्यवस्था की आलोचना करना और मखौल उड़ाना ही होता था। इस्लाम आने के बाद कर्बला की घटना पर आधारित नाटक 'ताज़िया' का दौर शुरू हुआ और धीरे-धीरे उसका महत्व बढ़ता चला गया। आज मोहर्रम के दस दिन ईरान के हर शहर, कस्बे और गांव में 'ताज़िया' खेला जाता है जिसमें स्थानीय लोग कलाकारों के रूप में भाग लेते हैं और इमाम हुसैन के साथ कर्बला के मैदान में घटी घटनाओं को मंच पर प्रस्तुत किया जाता है।

आधुनिक ईरानी नाटक कुछ उसी दौर में है जिस दौर में हमारा नाटक है। 'थियेटर सेंटर' थियेटर संबंधी कई सेवाएं देता है। यहां प्रदर्शन होते हैं, रिहर्सल होते हैं, वर्कशाप होती हैं, कोर्स चलते हैं। थियेटर पर सेमीनार होते हैं। थियेटर का अभिलेखागार है और कुल मिलाकर ईरान में थियेटर की सबसे बड़ी और शायद अकेली संस्था है।

इमारत की चक्करदार सीढ़ियों और गैलरियों में पिछले शताब्दी के थियेटर के पोस्टर, अभिनेताओं के चित्र, अखबार की कतरनें नुमाइश के लिए लगी है। इन्हें देखना रोचक इसलिए है कि इस्लामी क्रांति का प्रभाव इन पर भी दिखाई पड़ता है। हम लोग इन चित्रों को देखते चक्करदार सीढ़ियां चढ़ते उतरते वहां पहुंचे जहां नाहीद का जानने वाला ग्रुप अभ्यास ‘रिहर्सल' कर रहा था। निर्देशक को देखकर हबीब तनवीर की याद आ गयी। वैसा ही चेहरा, वैसे ही बाल और उसी तरह का समर्पण। लड़के लड़कियां मंच पर रिहर्सल कर रहे थे। लड़कियां यहां भी अपने सिर ढंके हुए थीं। बताया गया कि नाटक की विषय वस्तु इस्लाम-पूर्व समय की कोई ईरानी गाथा है। पात्रों की वेशभूषा देखने और नाटक के स्वरूप से भी लग रहा था इसका संबंध किसी प्राचीन गाथा से ही हो सकता है। निर्देशक महोदय स्वयं भी भूमिका कर रहे थे। वे विशेष रूप से 'एक्रोबेटिक' किस्म का काम करने में बड़े दक्ष लग रहे थे। उनका शरीर दुबला पतला और बहुत फुर्तीला लग रहा था। लड़कियां पता क्यों, लगा कि लड़कों से अच्छा अभिनय कर रही थीं। मुख्य भूमिकाएं भी लड़कियों की थी। इस्लामपूर्व की ईरानी कथा पर आधारित नाटक में लड़कियां वर्तमान इस्लामी युग के ईरानी कानून के अनुसार सिर ढंके हुए थीं बहरहाल राजनैतिक इच्छा या राजहट सबसे बड़ा हट होता है, यह सब जानते हैं।

रिहर्सल क्या पूरा नाटक देखकर हम बाहर निकले। मैं चाहता था कि नाहीद इतना समय दे कि मैं उनको चाय पिलाने के बहाने खुद चाय पी सकूं पर युवा पीढ़ी की नाहीद यह चाहती थी कि मैं जितना ज्यादा देख सकूं उतना अच्छा है। हम एक दूसरे नाटक का रिहर्सल देखने गये। यह नाटक अत्याधुनिक 'निरर्थक थिएटर' जैसा था। बीच मंच पर एक लंबी सी मेज़ रखी थी। उसके ऊपर एक साइकिल लटक रही थी। मेज़ के दूसरे सिरे पर कुछ बड़े-बड़े फुटबाल लटक रहे थे। कुछ अभिनेता ओर अभिनेत्रियां संगीत (पाश्चात्य) के साथ अपने शरीर को अलग-अलग दिशाओं में, अलग-अलग ढंग से तोड़-मरोड़ ओर मटका, लचका, घुमा, फिरा, गिरा, उठा, लिटा, सिटा रहे थे। कुछ अभिनेता मेज़ के नीचे थे। यही कर रहे थे। एक लड़की साइकिल का एक पहिया नचा रही थी और उस पर कभी-कभी अपने पूरे शरीर को घुमा रही थी। तेज़ संगीत के साथ प्रकाश भी कई-कई रंगों में और कई-कई तरह से आ जा रहा था। सभी पसीने-पसीने थे। इस कड़े अभ्यास में उनका शरीर मेज़, कुर्सी, साइकिल, पहिये, गेंदों से रगड़ता था और निश्चय ही लंबे समय तक यह करते रहने में बहुत मेहनत लग रही होगी। पर हम लगातार बीस मिनट तक बिना रुके ये सब देखते हैं। अचानक मेरे दिमाग में यह ख्याल आया कि यह निरर्थकता कहीं 'सार्थकता' के ऊपर व्यंग्य और विरोध तो नहीं है। अब मैं नाटक को दूसरे ढंग से देखने लगा और मेरे ऊपर उसके अर्थ खुलने लगे। कहीं ये 'थेरेपी' तो नहीं है? नाटक तो वैसे ही 'थेरेपी' कहलाता है। बहरहाल सवाल अनेक हैं और समझने वालों को इशारा काफ़ी है।

सीढ़ियों से नहीं लिफ्ट से हम ऊपर आये कैंटीन में गये चाय पीने लगे। ईरानी चाय के साथ दूध नहीं पीते, चाय में शक्कर नहीं डालते बल्कि शक्कर का एक डला (क्यूब) मुंह में रख कर चाय घूंट लेते हैं। यही तरीक़ा जारी रहता है। इसका अभ्यास करना पड़ता है। आज मेरा चौथा दिन है इसलिए कुछ संकट है। वैसे भी बिना दूध की चाय, बिना नींबू डाले कुछ ख़ास ही लगती है।

मुख्य हाल में नाटक चल रहा है। हमारे पास टिकट नहीं है। नाहीद कहती है कि मैं अगर कुछ झलकियां देखना चाहूं तो वह कोशिश कर सकती है-

हां हां क्यों नहीं।

कुछ देर बाद हम चोरों की तरह मुख्यहाल में घुसते हैं। मुझे डर नहीं अगर बिना टिकट पकड़ लिए गये तो क्या होगा। यह लड़की सुलटेगी। बैठ गये। सामने मंच के दाहिनी बायीं तरफ़ धार्मिक नेताओं के चित्र लगे थे।

मंच बहुत बड़ा था। उसको खानों (हिस्सों) में बांट दिया गया था। ऐसा लगता था जैसी बहुत बड़ी-बड़ी कबूतरों की काबुकें हैं। हर ख़ाने में दो पात्र थे। घर या जहां भी वे हैं, उसका सेट था। कभी प्रकाश एक ख़ाने पर पड़ता था तो वहां बैठे पात्र संवाद बोलने लगते थे। बाकी ख़ानों के पात्र खामोशी से अंधेरे में बैठ रहते थे, पर दिखाई देते रहते थे। नाहीद ने बताया कि ये सब पात्र एक ही परिवार के हैं और कहानी उन सबके बीच घूमती रहती है। बात कुछ-कुछ समझ में आने लगी। अभिनय का स्तर अच्छा था। कहना चाहिए बहुत अच्छा था। प्रकाश व्यवस्था, मंच सज्जा तकनीकी दृष्टि से मैं कोई कमी न निकाल सका।

थियेटर के चायखाने के बाहर किताबों की दुकान थी। वहां नाहीद मुझे किताबें दिखाने लगी। ईरान के एक प्रसिद्ध नाटककार निर्देशक बहज़ाद के नाटक दिखाये और बताया बहज़ाद इस्लामपूर्व ईरान की कथाओं को अपने नाटकों का आधार बनाते हैं। दिमाग़ में फिर घंटी बजने लगी। यह नाटक ख़त्म होने की घंटी नहीं थी। यह जानने की घंटी थी कि अभी जो रिहर्सल देखे उनमें से एक इस्लामपूर्व कथा पर आधारित था। दूसरा भी निश्चय रूप से इस्लामी मूल्यों पर आधारित नाटक नहीं था। तीसरे बहज़ाद साहब से परिचय हुआ जो इस्लामी पूर्व कथानक चुनते हैं।

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कहानी- कमजोर कड़ी

-राजनारायण बोहरे

तनु चकित सी खड़ी थी ।

ग्यारह बजे थे । भीतर प्रवेश करते ही उसे अपना कार्यालय पूरी तरह सुनसान दिखा तो उसे अजीब लगा। उसने हॉल में रूककर अपने बॉस के कमरे की तरफ एक क्षण को ताका, फिर तेज गति से उधर ही बढ़ गई । वह कमरा भी बाकी दफ्तर की तरह सूना था । रात को यहां रहने वाला चौकीदार बॉस के कमरे की हर चीज को साफ पोंछ के चमका गया था। उनकी सूनी कुर्सी, खाली टेबुल को ललक के साथ ताकते हुए जब उसकी नजर एक तरफ रखे कम्प्यूटर पर पहुंची तो उसकी आंखें चमक उठी । खाली कम्प्यूटर देख कर ऐसा प्राय' होता है ।

जबसे कम्प्यूटर चलन में आये हैं, हमारी सोसायटी में तमाम नये एटीकेट पैदा हो ग़ये हैं, तनु यह बात भली भांति जानती थी। फिर भी अपने बॉस के खाली कमरे में रखा नया पी-फोर श्रेणी का कम्प्यूटर उसे अपनी ओर इस ताकत से खींच रहा था कि वह अपना लोभ संवरण नहीं कर सकी , और बेहिचक कम्प्यूटर के सामने जम गई।

कम्प्यूटर ऑन करके उसने अपने हैड-ऑफिस की वेव साईट खोल ली ।

ई-मेल बॉक्स में कोई अर्जेन्ट और खास संदेश मौजूद होने का संकेत दिखाई पड़ रहा था ।

सहज रूप से तनु ने अपनी ई-मेल चैक करी । लेकिन उसका अपना डाकथैला खाली था, यानी कि कम्प्यूटर में उसके लिए नहीं बल्कि इस ऑफिस के इंचार्ज के लिए कोई जरूरी संदेश था ।

तनु भूल गई कि किसी का पासवर्ड जानना गलत होता है, और उसे प्रयोग में लाना तो सरासर गलती कहलाती है । इस बारे में बस मिनट भर सोचा तनु ने, फिर अपने बॉस का पासवर्ड एप्लाइ किया और उनकी डाक खोल ली ।

मॉनीटर के स्क्रीन पर एक ख़ास ख़त झिलमिला रहा था, जिसके बांये कोने पर तुरन्त और जरूरी जैसे कार्यालयीन शब्द बोल्ड अक्षरों में चमक रहे थे ।

तनु ने ध्यान से वो ख़त पढ़ना शुरू किया , और खत पूरा होते-होते उसके माथे के बल गहरे होते चले गये ।

हैडऑफिस ने निगम में से कर्मचारियों की छंटनी की नई योजना बनाई थी, और हैडऑफिस यह स्कीम यहां भी लागू कर रहा था । छंटनी के लिए तैंतीस प्रतिशत लक्ष्य था-यानी कि यहां के स्टाफ के कुल बारह में से चार कर्मचारियों की छुटटी !

उसके मन और मस्तिष्क में एक साथ प्रश्न उठा- कौन होंगे ये चार कर्मचारी ?

एकाएक उसे लगा कि बाहर कहीं कुछ आहट हुई है , तनु ने जल्दी से कम्प्यूटर शट-डाउन किया और हड़बड़ी में वहां से उठकर बाहर चली आई । बाहर कोई नहीं था, शायद दरवाजे के बाहर सड़क पर कहीं कोई आवाज हुई होगी । यह जान कर उसे राहत मिली और अपनी सीट पर आकर बैठ गई ।

उसके मन में एक ही प्रश्न था-चार लोग कौन होंगे !

उसे जाने क्यों रह-रह कर ऐसा लग रहा था कि चार में से एक शायद वह खुद जरूर होगी ।

खुद की छंटनी की आशंका के लिए तमाम वजहें थीं उसके पास । जिन पर वह फुरसत में बैठ कर विचार करना चाहती थी । सहसा उसे लगा कि आज जैसी फुरसत कब होगी! उसने विचार करना शुरू किया-पहली वजह है ज्यादा लीव पर रहना ! ऑफिस में रिकॉर्ड भी है इसका । इसके लिए उसे पूरे एक दर्जन मैमो दिये गये है। हां, पिछले एक बरस में उसने स्टाफ में सबसे ज्यादा छुट्टियां ली हैं । हालांकि ये छुट्टियां उसने बिला वजह नहीं लीं, अपनी माँ को अस्पताल में ले जाकर उनका इलाज कराने और बाद में घर पर उनकी खिदमत करने के लिए उसने अपनी नौकरी के अब तक के कार्यकाल में पहली बार इतनी ज्यादा छुटिटयां ली हैं । माँ की देखभाल के लिए उसके अलावा कोई दूसरा नहीं है, सो मजबूरी है ।

एकाएक उसे लगा कि इस बार सचमुच कोई आहट हुई और कोई उसके सामने खड़ा है। वाकई एक अधेड़ आदमी उसकी टेबिल के सामने खड़ा उससे कुछ जानना चाहता था । तनु ने भौंह चढ़ाई-'' फरमाइये , मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूं ।''

'' वो, वो आपके ऑफीसर कब मिल सकेंगे ?''

'' देखिये मैं कई दिन बाद आयी हूं , सो 'आइ कान्ट से' मतलब मैं नहीं बता सकती कि वे कब मिल सकेंगे ।''

'' लगता है, आपके सिवा आज पूरा स्टाफ किसी खास मिशन में उलझ गया है।'' अधेड़ उससे सहमत था या उसे उलाहना दे रहा था, तनु समझ नहीं पाई ।

वह आदमी बिना कुछ पूछताछ किये वापस चला गया तो तनु फिर से अपने भाव संसार में डूब गयी । छंटनी सूची में अपना नाम होने की आशंका का दूसरा कारण था तनु का निर्मम और रिज़र्व नेचर का होना। उसने आज तक किसी भी सहकर्मी को हद से ज्यादा नहीं बढ़ने दिया है , जहां उसे लगा कि सामने वाला द्विअर्थी संवाद बोल रहा है-वहीं वह अकड़ गई , और सारे लिहाज़ और अदब उठाकर ताक में रख दिये उसने । सो निश्चित ही इस बार सीनियर्स को मौका मिला है तो अपने मन की लगी जाने कब-कब की लगी बुझा लेंगे लोग !

तीसरा कारण था तनु की अंग्रेजी की अज्ञानता । हालांकि उस जैसे कई लोग अंग्रेजी में ढपोरशंख थे, पर उसे तो इस बाबत कई दफा लिखित में चेताया जा चुका है, इस कारण उसका नाम आना स्वाभाविक था ,बाकी किसी को लिखित में ऐसा मेमो नहीं मिला कभी।

चौथा कारण था तनु का कोई सोर्स न होना , सचमुच हैड ऑफिस में तनु का कोई भी मददगार न था इस वक्त , सो आसमानी गाज से खुद को बचाने में वह अपने को कतई असमर्थ पा रही थी ।

अपने नाम की निश्चितता जानके मायूस हो उठी वह

दूसरा, तीसरा और चौथा कर्मचारी कौन सा होगा ? वह अब तक अंन्दाज नहीं लगा पा रही थी ।

उसका वो पूरा दिन अकेले ही बीता । सांझ पांच बजे चौकीदार आया तो पता लगा कि आज शहर में राजधानी से उनके निगम के एमडी आये थे सो पूरा स्टाफ उनके सामने अपनी हाजिरी लगवाने गया था । उसे झटका लगा- यानी कि उसकी गैर हाजिरी एमडी के सामने लग गयी , मतलब कि उसकी जबरिया छंटनी पक्की । यह सोचते ही उसके माथे में दर्द की एक तीखी तरंग सी दौड़ी । आंखों के आगे अंधेरा सा घिरने लगा । मायूस होती वह बाहर निकली और अपनी स्कूटी संभालने लगी।

अगले दिन सुबह कार्यालय के इंचार्ज यानीकि तनु के बॉस पदमन साहब और ऑफिस-सुप्रिण्टेडेट शुक्ला सिर से सिर भिढ़ाये बैठे मिले तो तनु का मन कंप गया- छंटनी वाले कर्मचारियों के नाम पर ही चर्चा चल रही है शायद !

स्टाफ के बीच यही चर्चा थी-'हैड ऑफिस आखिर कैसे कर देगा यहां से कर्मचारियों की कोई छंटनी ! पिछले साल हैड ऑफिस ने ही तो यहां के स्टाफ को '' ऑल वर्कर टैलेंण्टेड'' का पुरस्कार दिया है । इस एक बरस में कैसे मिलेंगे ढीले और नाकारा कर्मचारी ! हम तो अपनी यूनियन की तरफ से कोर्ट में जायेंगे ।' तनु को मन ही मन कुछ राहत मिली ।

अगले कई दिन दफ्तर का हर आदमी तनाव में रहा । हरेक को आशंका थी कि कहीं उसी का नाम छंटनी वालों में शामिल न हो जाये ।

उस दिन रविवार था, जब फोन पर शाम को तनु को पता लगा कि ऑफिस का हर आदमी किसी न किसी बहाने पदमन साहब या शुक्ला के घर हो आया है । उन दोनों की बड़ी पूछ-परख हो रही है इन दिनों । जो देखो उनकी खुशामद में लगा है । तनु पूरे स्टाफ में एक अकेली महिला है, वो आखिर किस के साथ जायेगी, बड़े बाबू और पदमन साहब के घर । फिर किसी महिला कर्मचारी का किसी पुरूष अफसर के घर जाना लोग कहां से पचा पायेंगे ! शायद झूठमूठ की गप्पें उड़ने लगें । बवण्डर मच जाये बेकार का ।

आखिर संकोच और हिचक से भी तो बात नहीं बनेगी न, तनु ने फिर सोचा । इस तरह संकोच में फंसी बैठी रही तो शायद नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा । फिर क्या होगा उसका ? उसका और मां का भी । बैंक में जमा पूंजी भला कितने दिन चल पायेगी । नई नौकरी तलाश करना इतना आसान है क्या ? हर जगह छंटनी चल रही है । फिर सरकारी निगम से छंटनी किये गये कर्मचारियों को कौन झेल सकेगा ? भले ही पुरस्कृत स्टाफ हो , लेकिन प्राइवेट कंपनियों की तुलना में तो आलसी और नाकारा ही कहे जायेंगे वे सब के सब ।

संकोच और हिचक तो उसमें कभी नहीं रही । दो की चार पकड़ाने की सदैव से आदत है उसकी । इसी आदत और दम के बल पर ही तो वह अपनी अस्मत बचा पाई है, निगम की ज़लालत भरी नौकरी में । इसके अध्यक्ष और एमडी तो अपनी जागीर समझते हैं, इन संस्थाओं और उसके स्टाफ को । मनमानी करते हैं, सबके साथ-नियम-कायदों के साथ, स्टाफ के साथ, निगम की सम्पत्ति के साथ भी । इसी वजह से तो तमाम महिला कर्मचारी जरा में ही खेत रह जाती हैं । या फिर नौकरी छोड़ना पड़ती हैं बेचारियों को ।

कई हादसे याद आते हैं तनु को । तब वह नई-नई आई थी नौकरी में , पापा सेक्रेटेरियेट में उच्च श्रेणी लिपिक थे । राजधानी की मेन ब्रांच में काम करती थी वह ।

ब्रांच के इंचार्ज थे-चाटुर्ज्या साहब । पैंतालीस वर्षीय , स्थूल काय लेकिन स्मार्ट और मृदुभाषी चटर्जी साहब उसका खास ख्याल रखते थे - तनु को चाय दो भाई ! तनु का इन्क्र्रीमेंट लगाओ भाई ! तनु को टेबुल कुर्सी का नया सेट दो यार ! तनु की टेबुल पर इंटरकॉम लगाओ सबसे पहले !

खुद को इतनी तरज़ीह दी जाती देख कर मन ही मन गदगद होती थी वह ।

लेकिन उन्ही दिनों वो एक घटना ऐसी घटी कि वह सनाका खा गई थी ।

उस दिन विधानसभा प्रश्न का उत्तर तैयार करने के लिए सारा स्टाफ उपस्थित था, तनु भी थी और चाटुर्ज्या साहब भी। रात ग्यारह बजे काम निबटा, तो चाटुर्ज्या साहब ने तनु को अपनी कार में लिफ्ट देने की पेशकश की । उस वक्त दूसरा कोई साधन मिल भी नहीं सकता था, सो तनु खुशी-खुशी उनकी कार तें बैठ गयी । कार तनिक आगे चली तो चाटुर्ज्या साहब शुरू होगये-''तनु, यू आर वेरी स्मार्ट ! कहां छोटी सी नौकरी में पड़ी हो ! तुम्हें अपनी कीमत ही पता नहीं है । तुम तो बहुत आगे जाओगी । हम जैसे अफसर तुम्हारी खुशामद करेगे । करेंगे क्या, हम तो अभी भी तुम्हारी ख़िदमत में हाजिर हैं । बस एक बार सहमति दे दो ।''

तैश में भरी तनु ने तुरंत कार रूकवाई थी और चाटुर्ज्या साहब को खूब खरीखोटी सुना डाली थीं फिर बेधड़क दरवाजा खोल के बाहर निकल आई थी ।

उस रात बड़ी परेशानी हुई उसे अपने घर पहुंचने में । पापा ने पूछा-'' क्या हुआ बेटी ? तुम्हारा चेहरा इतने तनाव में क्यों है ?''

वह कुछ न बोली । लड़कियों को बचपन से यही तो सिखाया जाता है न , कि ऐसी बातें कहने से अपनी ही बदनामी होती है , सो घर-बाहर का कोई भी आदमी ऐसी-वैसी हरकत करे , कभी किसी से मत कहो ।

बचपन से अब तक कौन कौन की शिकायत करे वह पापा से ! मामा का लड़का रानू, बुआ का लड़का दीपू , दीपू की बड़ी बहन का देवर चंदू , हरेक के साथ कुछ न कुछ जुड़ा है तनु के स्मृति कोश में । जिसने जब भी मौका देखा उसके बदन को सहलाया , दबाया या चूम ही लिया है । हर बार उसने प्रतिकार तो ऐसा किया कि तूफान मचा देगी , लेकिन बात पराई नहीं होने दी उसने , हर बार मन ही मन दबा गई है वह अपने रिश्तेदारों की ऐसी तमाम जुर्रतें ।

होने को तो ओ एस शुक्ला भी कम उचक्का नहीं है , उस दिन वे भी द्विअर्थी बात कहने लगे थे-'' देखो तनु ,तुम्हारे केबिन में अकेली कब तक बैठोगी ? किसी न किसी को तो अपना साथी बना के बिठाना ही पड़ेगा । दूसरा कोई पसंद न हो तो मैं सही । बोलो क्या कहती हो ? ऑफिस की जो सीट चाहोगी वो मिल जायेगी ।''

तनु चिढ़ उठी थी-'' शुक्ला जी , आप किस भाषा में बात कर रहे है? क्या होता है साथी बनाना ? आप बैठना चाहते हैं इधर ! मेरे केबिन में बैठने के लिए आपको महिला आयोग से परमीशन लेना पड़ेगी । आपको शायद पता नहीं कि किसी महिला कर्मचारी के अलग केबिन में कोई पुरूष उस महिला की अनुमति के बिना नहीं बैठ सकता ।''

''तभी तो अनुमति मांग रहा हूं '' उजड्ड बड़ा बाबू बेझिझक अपनी बात पर अड़ा था ।

वो बात भी तनु ने अपने घर नहीं बताई थी। आखिर वह क्या-क्या बताती ? यूं तो अब तक हर बाबू किसी न किसी बहाने उससे निकटता की याचना कर चुका है ! जिसे जब मौका मिलता उसे छूने , वेवजह धकियाने या पारदर्शी दुपट्टे के पार दिख रहे कुर्ते के गले से भीतर झाकने से नहीं चूकता है कोई । लेकिन तब से वह इन छोटी-मोटी चीजों पर ध्यान नहीं देती , जबसे इस देश के एक आईएएस अफसर के खिलाफ उसकी सहकर्मी महिला अफसर ने इन्हीं सब हरकतों के कारण अदालत में मुकद्दमा दायर किया है , और यह बार सरे-आम चाय की गुमटियों से लेकर हजामत की दुकानों तक में चर्चा का विषय बन चुकी है ।

तनु ने अंदाजा लगाया- छंटनी में आने वाला उसके अलावा दूसरा कर्मचारी निगम होगा ! वो इसलिये कि निगम दांये हाथ से विकलांग है , और उसकी कार्यक्षमता एक सामान्य आदमी से कम है, इस कारण उस बेचारे पर भी छंटनी की गाज गिर सकती है । निगम का भी हैड-ऑफिस में कोई मददगार नहीं है सो उसी के रिटायर होने की ज्यादा संभावना है । लेकिन तीसरा और चौथा कौन होगा ! उसका मस्तिष्क यह पहेली हल नहीं कर पा रहा है ।

अगले दिन से ऑफिस में एक नयी हवा उड़ने लगी है, कि छोटे बाबुओं की छंटनी का आधार बड़े बाबुओं की गोपनीय रपट बनाई जायेगी । यानीकि हर छोटा बाबू अब अपने बड़े बाबू का मोहताज है । तनु खुद बड़े बाबू के पद पर है , उसे भी अपने अधीनस्थ तीन बाबुओं की रपट बनाना पड़ेगी । लेकिन रिटायर तो शायद बड़े बाबुओं में से भी एक कोई होगा ! उनकी रपट शायद ओ एस शुक्ला बनायेगा , और जहां तक वश चलेगा, वह तो जरूर ही तनु को रिटायर करवा के दम लेगा !

सोमवार को डिवीजनल हैड क्वार्टर से एक अफसर आये थे , उनके साथ सभी बड़े बाबुओं की मीटिंग हुई । पदमन साहब ने उन सबको एक-एक फॉर्म थमाया -'' इसमें आप को अपने अधीन काम कर रहे उस कर्मचारी का नाम लिखना है जिसे आप रिटायर कराना चाहते है। नाम के आगे वाले कालम में वे कारण है जिनके कारण आप उसे हटाना चाहते हैं जैसे लेट लतीफी , काम में ढीला होना , काम न आना , ऑफिस में काम में आने वाली भाषा की जानकारी न होना वगैरह ।''

'' इसके अलावा भी आप कोई कारण चुन सकते है ।'' ये ओएस शुक्ला के वचन थे ।

'' इसके अलावा क्या कारण हो सकते है ?'' तनु हैरान थी ।

'' अरे कोई भी कारण !'' शुक्ला बाबू हंस रहे थे -'' जैसे किसी का गलत ढंग से कपड़े पहनना , या जरूरत से ज्यादा लम्बी मूंछे रखना , बिना मोजे के गंदे जूते पहनना या बात करते में तुतलाना , गलत-सलत अंग्रेजी बोलना वगैरह -वगैरह कुछ भी ।''

''सर ,ये बचकाना बातें इस मीटिंग में न की जायें तो बेहतर होगा । आप ही बताइये ,क्या ये भी कोई कारण हो सकता है कि कोई कैसे कपड़े पहनता है,कैसे जूते रखता है, कैसे बोलता है, इसको आधार बनाकर हम उसे रिटायर कर दें । सर ,हर आदमी की इंडीजुयलटी भी तो होती है, उसमें दखल देने वाले हम कौन होते है ? ये तो मानवता नहीं हुई कि हम किसी की ज़रा सी कमजोरी की वजह से उसे अपने यहां से बाहर निकाल दें ।'' बोलते-बोलते तनु भूल गयी कि वह ऑफिस में हैं ।

'' मिस तनु , क्या होती है मानवता ! हमें अपना ऑफिस चलाना है, दफ्तर का काम करना है,मानव कल्याण की कोई संस्था नहीं चलानी । आपको पता होना चाहिये कि दुनिया में उसे ही जीने का हक़ होता है जो ताकतवर होता है ! आज विश्व बाजार का जमाना है ग्लोवनाइजेसन का युग है, इन दिनों हर चीज आधुनिक हो रही है। आप किस जमाने की बातें कर रही है ? वो जमाने गये जब मानवता वगैरह की दुहाई दी जाती थी । आज तो वही आदमी आगे बढ़ेगा, जो समर्थ होगा ,योग्य होगा ।'' यह पदमनसाहब थे जो अभी-अभी एक महीने का कोर्स करके विदेश से लौटे थे ।

'' इस का मतलब यह है सर, कि अगर कोई आदमी हमको व्यक्तिगत रूप से अच्छा नहीं लगता है तो हम उसकी नौकरी छीन सकते हैं ।'' तनु के बिस्मय का पारावार न था ।

'' हां !'' डिवीजन से आये अफसर ने बेझिझक उत्तर दिया था ।

बैठक के अंत में तनु ने प्रश्न किया -'' सर मुझे यानी कि बड़े बाबू को किस आधार पर छंटनी में शामिल किया जायेगा ?''

''इसके लिये मैं और ओ एस शुक्ला नीति तय करेंगे ।'' पदमन साहब का जवाब हमेशा छोटा होता था । कारपोरेट जगत में बॉस लोगों के बोलने का यही कायदा था ।

तनु सहसा चौंकी -छंटनी की ये नीति भी तो इसी कारपोरेट संस्कृति का ही एक हिस्सा है । इस छंटनी का तरीका भी -यानी कि अपने बीच के ही किसी आदमी को हर हालत में घर बिठा देना , इसके लिए चाहे कोई मनचाही नीति काहे न बनाना पड़े ,इसी आयातित कारपोरेट कल्चर की देन है।

'' तो साथियों आपको खोजना है वो दरार जिससे आपकी नीतियां लीक हो रही है , अपनी इमारत का वो कमजोर पाया जिससे बिल्डिंग धराशायी होने जा रही है , वो सड़ा-गला पुर्जा जिसके कारण पूरा यंत्र कमजोर हो रहा है । ढूंढ़िये कि कौन है हमारी जंजीर की कमजोर कड़ी । ताकि उसे निकाल कर बाहर फेंका जा सके ।'' पदमन साहब मीटिंग की समाप्ति पर अपने अधीनस्थों को निर्देश दे रहे थे । उनका एक-एक शब्द तनु को कानों के रास्ते हृदय में जा रहा पिघला हुआ सीसा लग रहा था , इच्छा हो रही थी कि कुछ सुना दे उन्हें । लेकिन यहां उसकी मरजी नहीं चलना थी , उसकी खुद की नौकरी ख़तरे में थी ।

उसे तो अब उन चार नामों पर अपनी सहमति जताना थी जो पदमन साहब और शुक्ला जी चुनें, बस प्रयास इतना करना है कि उस सूची में खुद का नाम न हो । अब तो किसी को भी कमजोर कड़ी साबित करना है ।

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रचनाकार - परिचय

राजनारायण बोहरे

जन्म

बीस सितम्बर उनसठ को अशोकनगर मध्यप्रदेश में

शिक्षा

हिन्दी साहित्य में एम0 ए0 ओर विधि तथा प्त्रकारिता

में स्नातक

प्रकाशन

' इज्ज़त-आबरू ' एवं ' गोस्टा तथा अन्य कहानियां'

दो कहानी संग्रह और किशोरों के लिए

दो उपन्यास

पुरस्कार

अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता 96 में पच्चीस हजार रूप्ये

के हिन्दी में एक कहानी पर अब तक के

सबसे बड़े पुरस्कार से

पुरस्कृत

सम्पर्क

एल आय जी 19 , हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया-475661

चित्र - डिजिटल आर्ट : रेखा

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- प्रभात कुमार झा तथा रविकांत

लाज़िम है, कि 'सड़कछाप' शायरी की बात एक सड़कछाप गाने की नक़ल से की जाए। विद्वान जगत शायद विद्योत्माना अंदाज़ में पूछे कि 'अस्ति कश्चिद वाग्विशेष:' -- ऐसी क्या ख़ास बात है ? बचाव पक्ष पैसे तो दलील देने की ज़रूरत नहीं समझता फिर भी इशारतन गुज़रे ज़माने के चंद महारथियों को फुटनोटित करना शायद होशियारी होगी। उर्दू के आलातरीन, अफ़सानानिगार स'आदत हसन मंटो ने अपने पचासेक साल पहले लिखे एक निहायत चुटीले लेख 'दीवारों पर लिखना' में लगभग सिद्ध कर दिया कि महत्तर सत्य बड़ी इमारतों के बदबूदार मूत्रालयों में खुदे होते है। इसका एक और धारदार प्रमाण उन्हीं की एक और कहानी - और क्या, 'मूतरी' - में मिलता है, जहाँ कथानायक हिन्दू-मुसलमानों के बीच वाग्युद्ध अर्थात माँ-बहन का उपसंहार एक तटस्थ क़िस्म के जुमले में हुआ देख कर उस दुर्गंधित माहौल में खुशबू के अहसास से तर होकर बाहर निकलता है। अगर आपने मंटो को पढ़ा है तो आपने देखा होगा कि उनकी कहानियाँ अख़बारी कतरनों को ले कल्पना और मर्म के अबूझ ठिकानों का सफ़र ऐसे तय करती हैं जैसे कि सच और झूठ की मिलावट का पता ही न चले।

मंटो के हवाले से ही पता चलता है कि जनाब पतरस बुख़ारी ने भी उर्दू हाई अदब के उड़नछू घोड़े से नीचे उतरकर इस क़िस्म के भित्तिलेखन को अपनी नज़रेसानी के लायक़ समझा। उसी तरह फ़्रांस ने नामी-गिरामी सिद्धांतकार रोलाँ बार्थ ने इमारतों पर प्रेमी-प्रेमिकाओं द्वारा 'एक-दूजे के लिए' उकेरी गई सार्वजनिक इबारतों कों उनके इश्क़ की अद्वितीयता और अमरता से जोड़ा है। हाल ही में प्रदर्शित एक और फ़िल्म के नायक बंटी और बबली जब छोटे शहरों की कम-कम बारिश और नदिया की मद्धम रफ़्तार से तंग आकर महानरीय समंदर में छलाँग लगाने के सपने देखते हैं, तो उनकी एक हसरत यह भी होती है कि कोयले के खड़िये से फ़लक पर अपना बड़ा-बड़ा नाम लिख दें। अगर और शास्त्रीय ढाढ़स चाहिए तो वॉल्टर बेन्यामिन और मिशेल दि सर्त्यू को भी पलटा जा सकता है। क़िस्सा कोताह ये कि सड़कछाप, गली-मोहल्ला छाप, पान-दुकान छाप, चौक-नुक्कड़ छाप या लोक-संस्कृति छाप रचनाशीलता के हम पहले क़द्रदान नहीं हैं। कहते हैं न किसी ज़माने में नज़ीर भी गुज़रे थे और चिरकी तो अंडरवर्ल्ड शायरी के जानकार के लिए मंगलाचरण जैसा ही ठहरे!

बहरहाल, मंटो का अपना नतीजा यह है कि दीवारों पर लिखना इंसानी फ़ितरत, में शामिल है। दीवार पर लिखना ऐसा ही है जैसे 'सरे-बाज़ार कोई ब-आवाज़े बुलंद करके कोई ऐलान कर दिया जाए......दीवारों पर क़िस्मत भी आज़माई जाती है...... हिसाब के सवाल भी हल किए जाते हैं, सियासत की गुत्थियाँ भी सुलझाई जाती हैं और अपने दिल की भड़ास भी निकाली जाती है...'

तो इन्हीं पुरखों से प्रेरणा-प्रसाद पाकर हमने क़रीब साल-डेढ़-साल पहले दिल्ली की सड़कों पर कभी आड़े-तिरछे, कभी थके-हारे तो कभी रॉकेटीय सैनिक संरचना में अनुशासित चींटियों की तरह तैरते स्कूटर-तिपहिया-ऑटो के पिछवाड़ों को ताड़ना शुरू किया। ताड़ना और पाड़ना भी, यानी उन इबारतों को क़लमबद्ध करना भी शुरू किया। जैसे ही किसी ऑटो के पीछे कुछ लिखा हुआ दिखा नहीं कि हमारी आँखें बकोध्यानम मुद्रा में आ जाती थीं। हाथ, क़लम और काग़ज़ टटोलने लगते थे, और कुछ नहीं मिला तो हम सामने की इबारत को मोबाइल में ही जज़्ब कर लेते थे। अगर दिल्ली पुलिस मुस्तैद होती तो हमारे कई चालान कट चुके होते क्योंकि बाज़ मौक़ों पर तो हमने बाक़ायदा गाड़ी हाँकते हुए इनकी नक़ल करने की कोशिश की है। लेकिन दोस्तों ने भी क्या मदद की! स्कूटर पर हैं तो स्कूटर पर, कार में हैं, तब तो क्या बात है - कई एक साथ हैं --- सब की कोशिश यही होती थी कि इस अमृतवाणी को नोट ही कर लिया जाए। फ़ील तो ख़ैर तत्काल ही कर लेते थे। ज़ाहिर है कि हमारे प्रयास हमेशा सफल नहीं होते थे। कई बार तो टटोल-टटोल कर थक जाते थे, हाथ सिर्फ़ चिल्लड़ आता था। याददाश्त हमसे वादा करती कि याद रख लेंगे लेकिन लेखनी तक पहुँचते-पहुँचते वह भी बेवफ़ाई कर जाती। इस तरह हमने कम से कम सौ-डेढ़-सौ रत्नों को तो खोया ही होगा। शायद उनमें से कुछ को किसी और मोड़ पर पा भी लिया होगा, कौन जानता है? अपने लंबे जुगाड़-काल में हम तो बेशरम थे ही, हमने यह भी पाया कि इस टाइमपास को लेकर जनता में आम उत्साह है और कई लोग तो शौक़िया ऐसा ही काम करते रहे हैं। किसी पार्टी में बात छेड़ दी तो दस में एक मेहरबान के पास तो कुछ न कुछ निकल आता था। हमारी एक दोस्त को जब पता चला तब से उन्होंने हमे नियमित तौर पर नारे भेजने शुरू कर दिये। तो साहिबान यह एक सामूहिक बौद्धिक कार्य है, और कभी न खत्म होनेवाला भी।

यह भी तजुर्बें की बात है कि इबारतें दिल्ली की ऑटो की ख़ासियत हैं। हमने तो इतनी काव्यमय, ऐसी शायराना सवारीगाड़ी हिन्दुस्तान में कहीं नहीं देखी --- आसेतु हिमालय और पूरब से पश्चिम तक। बेशक लोग तरह-तरह से अपने रोज़गार, अपने विश्वकर्मा, अपनी लक्ष्मी को सजाते और अराधते हैं, लेकिन जितनी रंगीनी और विविधता यहाँ हैं, उतनी कहीं नहीं। शायरी का शौक़ दिल्ली ले ख़ून में है --- मीर, ग़ालिब और अशोक चक्रधर यहीं के तो ठहरे! हमारी राह पर पहले चले महाजन बताते हैं कि थाइलैंड में इसकी बहन को 'टुकटुक' कहते है, कि हिन्दुस्तान में ही इसके कोई आकार-प्रकार है, इनके थोड़े दूर के सगे-संबंधियों को कहीं 'सूअर' तो कहीं 'गणेश' कहते हैं -- जाकी रही भावना जैसी। यह भी कि पाकिस्तान में भी ऑटो की दीवारों पर काफ़ी शायरी आज़माई जाती है, जिनमें से कुछ तो वर्च्युअल या आभासी दुनिया के रास्ते हम तक भी पहुँची है। कुछ छन-छनाकर आप तक भी पहुँचाए देते हैं: वहाँ के ऑटो खुद को एक ओर तो काली 'ज़हरीली नागन' या 'ज़ख़्मी परिंदा' तो दूसरी ओर 'बुलबुल का बच्चा'या 'ख़तरनाक़ रैम्बो' कहते पाए गए है। 'डालर की तलाश' में हर कोई 'आफ़रीदी तैयारा' बैठा है। दिल्ली या हैदराबाद की तरह सिनेमा वहाँ भी छाया हुआ है -- 'सिर्फ़ तुम', 'ज़िद्दी' या 'मोहब्बतें', जैसी कितनी फ़िल्मे आकर चली गई हैं, दीवारों से उनके पोस्टर फट चुके होंगे, लेकिन उनके नाम अभी भी लाहौर या कराची की गलियों में लरज़ रहे हैं। दिल्ली की तरह ही पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में पंजाबी बोली की खुशबू आबाद है:

आवांगी हवा बन के।

जावांगी तंग करके ।।


ना छेड़ मलंगा नूँ।

पै जाएगा पंगा नूँ।।


हिन्दुस्तान में तुलसीदास की अवधी चौपाइयाँ मिल जाती हैं:

प्रवेसि नगर कीजै सब काजा।

हृदय राखि कोसल पुर राजा।।


तो जैसी कि उम्मीद भी की जाती है, कुछ पाकिस्तानी सड़कछाप शायरी तो वाक़ई अदबी है:


ना डर बाद-ए-मुख़ालिफ़ से ऐ अक़ाब।

ये तो चलती है, तुझे ऊँचा उड़ाने के लिए।।


जो शायद उच्च-भ्रू नक़्क़ादों को भी भा जाएँ। इस शे'र को तो लाल बुझक्कड़ दानिशमंद साहिबान इक़बाल के नाम से जोड़ ले जायेंगे, लेकिन सामान्य तौर पर ये इबारतें खुली इबारतें हैं, इनके लेखक, सर्जक पता नहीं कौन हैं। पता नहीं कहाँ-कहाँ से टुकड़ा जोड़कर, कहीं का रदीफ़ और कहीं का क़ाफ़िया जोड़कर शे'र बना लिया जाता है, पद गढ़ लिए जाते हैं, नारे चिपका दिए जाते हैं। लेकिन इतना तय है कि इनका अस्तित्व प्रवाहमयी है, रवानगी इनकी नियति है, ये चलायमान हैं, शाश्वत गतिमय... सिर्फ़ इस अर्थ में नहीं कि ये चलती हुई गाड़ी से चिपके हैं, बल्कि इस अर्थ में भी कि इन चल-इबारतों का मूल खोजना बड़ा कठिन है। कहा जा सकता है कि ये अफ़वाहों की तरह हैं... जितने मुँह उतनी बातें। उतनी ही तरह की बातें!


अब चूँकि हमने इनके मूल को शक के घेरे में डाल कर इन इबारतों के रचयिता को मौलिक होने की महानता की गुंजाइश से महरूम कर दिया है, तो थोड़ी सफ़ाई देने की ज़रूरत महसूस हो रही है। पूछ जा सकता है कि क्या नक़ल में रचना नहीं हैं? या नक़ल क्या महज़ नक़्क़ाली है, क्या चीज़ों को वक़्त और स्थान के साथ निरंतर नए परिवेशों में ले जाने और उनमें नए अर्थ भर देने में कोई सलाहियत, क़ाबिलियत नहीं है? कोई हुनर नहीं ? क्या अफ़वाहों में ही कोई कल्पना, कोई तसव्वुर नहीं होता। इतिहासकार मान चुके हैं कि कमल के फूल, या चपातियों, या उड़ी-उड़ाई मौखिक उड़नघइयों से 1857की क्रांति हुई, पातियों से 19वीं सदी में दंगे हुए, गाँधी 'महात्मा' बन गये, दिल्ली-भर में गणेश जी ने दूध पी लिया, या हाल में ही नरवानर का तांडव संभव हुआ! तो, रचना तो है। यह भी मानते चलें कि बातों के मुँह और जगह बदलने से उनका रूप ही नहीं, पैकेजिंग ही नहीं, बातें खुद भी बदल जाती हैं। उनका असर तो बदलता है। प्रस्तुत है कुछ प्रमाण इस सड़कछाप रचनाधर्मिता के नाम:


तेरी झील सी आँखों में डूब जाने को दिल चाहता है - छपाक !


जय शिव शंकर, भीड़ ज़रा कम कर


कही अनकही बातों की अदा है दोस्ती,

हर रंजन-ग़म की दवा है दोस्ती।


इस ज़माने में कमी है पूजा करनेवालों की,

वरना इस ज़माने में ख़ुदा है दोस्ती।।


उफ़क़ पर सितारों को नींद आ रही है।

उल्लू की पट्ठी तू अब आ रही है।।


कभी साइड से आती हो, कभी पीछे से आती हो।

मेरी जाँ हार्न दे देकर, मुझे तुम क्यों सताती हो।।


या, सरहद पार से ही एक और योगदान:


क़ायदे आज़म ने फ़रमाया। तू चल, मैं आया।।


एक शे'र बिहारी दिल्लीवाले की तरफ़ से भी :


हम भी कभी रहीश थे, जो दुनिया लुटा बैठे।

क्शिमत ऐसी फूटी, ऑटो चला बैठे।।


लेकिन हम जिस शे'र से सबसे मुतास्सिर हुए, उसे पेश किए बिना बात बनेगी नहीं:

आपके नेचर ने हम पर इतना इफेक्ट किया।

सबको रिजेक्ट कर हमने आपको सेलेक्ट किया।।


इन्हें आप चाहे जैसे पढ़ सकते हैं, लेकिन इतना ज़रूर है कि ये इबारतें मध्यवर्गीय रूढ़ धारणाओं को चुनौती देती हैं। दिल्ली के एक आम मध्यवर्गीय रोडार्थी की आए दिन की विपदा सुनें तो लगेगा कि ऑटो वालों से ज़्यादा मक्कार तो शायद ही शहर में कोई हो। कुछ तथ्य: स्टेशन पर उतरते ही दिल्ली में नए आए मेहमानों की जैसी खिचिखच भरी ख़ातिरदारी ये उतारते हैं, वैसी कम से कम मुम्बई या हैदराबाद वाले तो नहीं करते। मीटर, चाहे इलेक्ट्रॉनिक ही क्यों न हो, सत्तर फ़ीसदी ख़राब पाए जाते हैं; वापसी में सवारी नहीं मिलती, किसी ज़माने में पिस्टन की बदलाई के चलते चढ़ाई असंभव हो जया करती थी और ये सारे बहाने चालीस का सत्तर बनाने की फ़िराक़ में गढ़े जाते थे। अगर आप बहस छेड़ें तो उनके पास टका-सा जवाब भी होता है कि साहब, कौन भ्रष्ट नहीं है, जिसका प्रति-जवाब अक्सर मुश्किल हो जाता है। हाँ, कभी-कभी कहने का मन होता है -- ऑटो क्यों चलाते हो? बैंक क्यों नहीं लूटते? कभी-कभार हम आपसी गप-शप में ऑटोवालों की ईमानदारी की किंवदंतियां सुनते-सुनाते पाये जाते हैं, या साल में एकाध ख़बर अख़बार में भी उग जाती है कि फ़लाँ-फ़लाँ ऑटोवाले ने अमुक महिला का पर्स, जिसमें पैसे थे, क्रेडिट-कार्ड थे, जस-का-तस लौटा दिया और हम इसपर यक़ीन भी करते हैं, दाँतों तले उँगली दबाकर। कहने का मतलब यह है कि दिल्ली के तिपहिया चालकों की जनछवि राजनेताओं से बेहतर नहीं है। रही-सही कसर पिछले दिनों सीएनजी संकट के दौरान हुई उनकी हड़तालों ने दूर करदी। पर ऑटोवालों से निजात भी है क्या ? ऑटो अध-बने मेट्रो के इस शहर-ए-दिल्ली की धड़कन है -- हमसाया भी, मजबूरी भी, आसरा भी। वे आपसे लाख लड़ेंगे, झगड़ेंगे, हुज्जत करेंगे, लेकिन अगले दिन आप ही के इंतज़ार में बिछे मिलेंगे, आँखों में निमंत्रण, दिलों में सेवाभाव लिए:


क्यों बैठे हो सोच में।

आ जाओ मेरे कोच में।।


चलती गाड़ी उड़ती है धूल।

मिलती है सवारी खिलते हैं फूल।।


अपने दरबार में ऐ मालिक मेरी भी ज़मानत रखना।

मुझे जो भी हो लेकिन मेरी सवारी को सलामत रखना।।


उम्मीद है कि यह सब पढ़के हमारी ही तरह आपके दिल पर भी पड़ी पूर्वग्रह की चट्टानी परतों में एक छोटी-सी दरार पड़ गई होगी और आप ऑटोवालों की कलात्मक प्रतिभा को सराहने के मूड में आ चुके होंगे। वैसे भी, अगर इन इबारतों को इनके लिखने वालों के आत्मकथ्य की मिसाल मानी जाए तो हमें कोई यकसाँ चरित्र नहीं दिखेगा। शहर की तरह ही इनमें वैविध्य है -- इलाके का, भाषा का, धर्म का, मिज़ाज का, ख़याल का, तबीयत, का राजनीतिक प्रतिबद्धताओं का, तुकातुक का, रचना व प्रेरणा का... और न जाने किन-किन चीज़ों का जिन्हें किसी सरल समाजशास्त्रीय या सौंदर्यशास्त्रीय घटकों में घटाया नहीं जा सकता। वैसे तो नैतिक निर्णय हमारे समाज में बहुत सहज और सस्ते उपलब्ध है, और हम चाहें तो फ़ौरन उनके आचरण और चरित्र के बारे मे मूल्य-विषयक फ़ैसले कर सकते हैं, लेकिन बेहतर यही होगा कि देखें कि ये इबारतें हमसे क्या सब लेकर और किन रूपों में मुख़ातिब हैं।


पहली बड़ी आमफ़हम बात तो यह कि ऑटो की दुनिया पूरी तरह फ़िल्मी दुनिया है: सिर्फ़ इस सामान्य अर्थ में नहीं कि हमारी आपकी और जनसाधारण की दुनिया फ़िल्मी है। हम अपने सरताज महबूब सितारों की तस्वीरें टाँगते हैं, उनकी फ़िल्में 'फ़र्स्ट डे, फ़र्स्ट शो' देखने में गर्व महसूस करते हैं, और बड़े फ़ख़्र से उनके मशहूर जुमले, दृश्य, स्टाइल दुहराते या कॉपी करते हैं। शायद कहा जा सकता है कि हमारी संस्कृति के लिए फ़िल्में एक अहम संदर्भ-बिंदु हैं, जहाँ लोग फ़िल्मों से वैसे ही उद्धरण व सूक्तियाँ लेते हैं, जैसे हमारे पूर्वज-पूर्वजाएँ गोसाई जी के रामचरितमानस से लेते थे। ऑटो की भीतरी दीवारों पर भी अमूमन हीरो-हीरोइनों की शोख़ या मासूम तस्वीरें होती हैं। ख़ास बात ये हैं कि बाहरी दीवारों पर ऑटोवालों के नाम फ़िल्मों के नाम पर धर दिए जाते हैं। आपने राह चलते कई 'दिलजले', 'फ़क़ीरा', 'हिना', 'बेवफ़ा सनम', 'मुक़द्दर का सिकंदर', 'मैं तुलसी तेरे आँगन की', 'राजा हिन्दुस्तानी', 'आशिक़ी', 'दिल आशिक़ाना है', देखे होंगे। एक अहम बात यह भी कि ये फ़िल्मी शीर्षक जैसे गाड़ी पर छपकर दीगर चिन्हों की तरह उसके ड्राइवर के मिज़ाज की लक्षणाएँ या व्यंजनाएँ बन जाते हैं। लेकिन बात सिर्फ़ फ़िल्मों से अविकल नक़ल उतारने की नहीं है, बात उस अंदाज़ की भी है, जिसे हम फ़िल्मी कहा करते हैं। अंदाज़ की इस गाड़ी में तरह-तरह के तेवर हैं -- रूमानियत, गुस्सा, अकड़, आवारगी, दार्शनिकता. फ़ाक़ा-मस्ती, बेचारगी, विडंबना, दीनो-ईमान, बदला, शहादत, वग़ैरह। ऐसा लगता है कि ये सब भावनाएँ अपनी अभिव्यक्ति के लिए जब लोक-सांस्कृतिक विधाएँ तलाशती हैं, तो उन्हें फ़िल्मी मुहावरों के तैयारशुदा विश्वकोश की शरण लेनी पड़ती है, या यूँ कहें मुहावरे जब कुछ यूँ बनते दिखते है, तो हम उन्हें फ़िल्मी कहकर पुकारते हैं:



रूप की रानी चोरों का राजा।

मिलना है तो सोनिया विहार आ जा।।


सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के वसूलों से।

कि खुशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से।।


दिल के अरमां आँसुओं में बह गये।

वो उतरकर चल दिए, हम गियर बदलते रह गये।।


दुल्हन वही जो पिया मन भाए।

गाड़ी वही जो मंज़िल तक पहुँचाए।।


जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया।


कभी हँसना है, कभी रोना है, कभी खोना है, कभी पाना है।

क़िस्मत का तो यही फ़साना है।।


लब्बोलुबाव ये है कि भावनाओं की इस इन्द्रधनुषी दुनिया में हमें भोगे हुए दर्शन मिलते हैं, तो जी-हुई नसीहतें भी। गति का उत्सव मिलता है तो बेकल ज़िंदगी की लानतें भी। कुल मिलाकर शहर और सड़क की अनिश्चित ज़िंदगी की सूक्तियाँ हैं ये नारे जिसमें 'स्ट्रीट-स्मार्ट विज़्डम' अर्थात गली-सुलभ बुद्धि है साक्षात निदर्शन होते हैं। दो-चार मिसालें लें:

अपनों से सावधान


दोस्ती पक्की, ख़र्चा अपना-अपना


माँगना है तो ख़ुदा से माँग बंदे से नहीं।

दोस्ती करनी है तो मुझसे कर, धंधे से नहीं।।


देते हैं रब, सड़ते हैं सब।

पता नहीं क्यों।।


'दुनिया मतलब की' जैसे नारे अगर ज़माने से ठोकर खाई आत्मा की चीत्कार हैं, तो 'अपनों से बचकर रहेंगे, ग़ैरों को देख लेंगे' में एक साथ अपने अस्तित्व का निचोड़ है, तो धमकी भी। लेकिन ऐसा लगता है कि ऑटो वाले अनिश्चितता के इतने आदी है कि अपेक्षित ही उनकी परेशानी का सबब हो जाता है। अब देखिए कि भला करने वाले एक भले ऑटो वाले का क्या निष्कर्ष है:


मतलब की है दुनिया कौन किसी का होता है।

धोखा वही देते हैं जिन पर ऐतबार होता है।


नेकी कर जूते खा,

मैंने खाए तू भी खा।।


ऑटो वालों की ज़िन्दगी परेशान, जल्दबाज़ी में फँसे, फ़ौरन पहुँचाने की माँग/आदेश/गुहार लगाते पैसेंजरों से अनवरत मुठभेड़ का दूसरा नाम है। ऐसे यात्रियों को भी कभी हौले से 'थोड़ा इंतज़ार का मज़ा लीजिए' तो कभी दिल्ली का ठेठ जवाब मिलता है: 'ठंड रख ठंड।' लेकिन इसी तीर से पीछे आ रही धैर्यहीन गाड़ियों को सबक़ दी गई है।

ऐ आदमी हराम खाना छोड़ दे।

टायर महंगे हैं, रेस लगाना छोड़ दे।।


पीछा करना बेकार है


पार कर, नहीं तो बर्दाश्त कर


लोग नहीं मानें तो कोई कह बैठेगा:

मैं तो ऐसे ही चलूँगी


वह शरीफ़ज़ादा फिर भी शोर मचाये जा रहा हो तो:


भौंक मत कुत्ते की तरह!


अगर इससे भी बात नहीं बनी तो जीवन अंतिम सत्य ही पढ़ा दिया जाये,

शायद कुछ असर हो:


भगवान के घर पंद्रह साल पहले जाने से अच्छा है,

अपने घर पंद्रह मिनट देर से जाओ।


जो इतने लंबे वाक्य में नहीं समझ पाया, वह मुख़्तसर में क्या समझेगा, लेकिन सरसइया के

दोहरे की तरह शायद बात बन जाए:

जिनको जल्दी थी, वो चले गए!

या

जिनको जल्दी थी वो गुज़र गए!


बाज़-बच्चे ख़ासकर मोहल्लों में, जब ऑटो धीरे-धीरे, लगभग रेंग रहा होता है तो लटक लेने की कोशिश करते हैं। उन्हें वैसे ही डाँटा गया, है जैसे हमारे समाज में बच्चों को डाँटा जाता है:

चल हट पीछे!

-लटक मत टपक जाएगा!

-लटक मत पटक दूँगी!

इसका एक झारखंडी संस्करण भी अभी हमारे हाथ लगा है:

बेटा छूले त गेले

सटले त घटले!


अर्थात, अगर छुओगे तो जाओगे, और अगर सटे तो दुनिया से घटे। वहीं से एक आवारा मिज़ाज ऑटो वाले का भी पता मिलता है। मुलाहज़ा फ़रमाइए:


फिराया लाल चौक टू बुट्टी मोड़

वाया जन्ने-तन्ने


अर्थात, आग़ाज़ और अंजाम तो तय है पर बीच के स्टॉप या बरास्ते कहीं भी हो सकते हैं। आवारगी के ही मानकों को लेकर चलें तो ड्राइवरों और शराब का आपसी रिश्ता मिथकीय है और एक पद में तो इसकी बाक़ायदा आत्मस्वीकृति भी मिली:


दुल्हन वही जो पिया मन भाये।

ड्राइवर वही जो पीकर चलाए।।


एक और में तो पीने की वकालत निहायत देवदासाना रूमानियत के साथ की गई है:


शराब नाम ख़राब चीज़ है, जो कलेजे को जला देती है।

उसे बेवफ़ा से तो सही है, जो ग़म को भुला देती है।।


लेकिन हमारी इल्तिजा है कि ऑटो के जनपद में ऊपर दी गई नसीहतों को अपवाद माना जाए। आम तौर पर पीकर न चलाने की सख़्त हिदायत ही देखी गई है:


पीकर जो चलाएगा, परलोक को जाएगा

चलाएगा होश में तो ज़िंदगी भर साथ दूँगी।


चलाएगा पीकर तो ज़िंदगी जला देंगी।।


बड़ी ख़ूबसूरत हूँ नज़र मत लगाना।

ज़िंदगी भर साथ दूँगी पीकर मत चलाना।।


राम जन्म में दूध मिला, कृष्ण जन्म में घी।

कलयुग में दारू मिली, सोच समझ कर पी।।


अगर पी है तो भगा ले

वरना 1132 के पीछे लगा ले।


भाँग माँगें मीठा, चरस माँगे घी

दारू माँगे जूता चप्पल, जब-जब ज़्यादा पी।


यानी आपको भंग पीने पर मीठी चीज़ खाने की इच्छा होती है, चरस पीने वाले अगर घी जैसी पुष्टिवर्धक चीज़ खाएँ तो बेहतर है, पर हंगामेबाज़ दारूबाज़ों का तो कोई सरल प्राकृतिक उपचार है ही नहीं। पीने पर एक आख़िरी शे'र देखें:

ऐ दूर के मुसाफ़िर, नशे में चूर गाड़ी मत चलाना।

बच्चे इंतजार में है, पापा वापस ज़रूर आना।।

आपने ग़ौर कर लिया होगा कि ये नाते कई तरह संवाद परोस रहे हैं। कहीं ऑटो, जो अक्सर माशूक़ा की भूमिका में होती है, अपने माशूक़ के वावफ़ा रहने का इसरार करती है, कहीं पीछे चलते किसी भी ड्राइवर को ये चीज़ें संबोधित है, और कहीं तो इसे बस 'जनहित में जारी कर दिया गया है:
  

आबादी का बढ़ता बोझ, साधन घटते जाते रोज़।

पेड़ों से आती हरियाली, हर हाल में हो रखवाली।।


अगर पीछे अशोक के बहुभाषीय अभिलेखों तक जायें तो आदेशों व सूचनाओं को पब्लिक कंज़ंप्शन या जनहित में जारी करने की रिवायत पुरानी है, पर हमारी याददाश्त में आधुनिक वाहनों पर इतने इफ़रात में सरकारी नारों का इस्तेमाल आपातकाल के आसपास से हुआ। बीस-सूत्री कार्यक्रम के तमाम सूत्र तो पेले ही गये, और याद हो तो 'छोटा परिवार, सुखी परिवार', 'अनुशासन ही देश को महान बनाता है', 'हम दो, हमारे दो' आदि नारे उन्हीं दिनों की राज्याश्रयी प्रेरणा के नतीजे हैं। बहरहाल, परंपरा का निर्वाह न सिर्फ़ सहमत जैसी संस्थाओं ने सांप्रदायिक सौहार्द फैलाने के उद्देश्य से आयोजित ऑटो स्लोगन प्रतियोगिताओं के ज़रिये किया है, जिसका एकाध अवशेष मिटते-मिटाते हम तक भी पहुँचने में कामयाब हो गया:

मंदिर मस्जिद के झगड़ों में दोनों क़ौमें मिट जाएंगी।

मंदिर मस्जिद में पूजा करने क्या इनकी लाशें जाएंगी।।


धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं


बल्कि कुछ ऑटोवालों ने भी स्वायत्त ढंग से समाज-कल्याण के नारे दिए है, भले ही उनमें से कुछ संदेश वाक़ई घिसे-पिटे-से है, जैसे:


दुल्हन ही दहेज़ है

सुंदरता को श्रृंगार की ज़रूरत नहीं होती


तो चंद नारे वाक़ई आक्रामक हैं, इस तथ्य के गवाह कि हिंदू राष्ट्रवाद का घृणा अभियान एक हद तक सफल रहा है:

दूध माँगोगे खीर देंगे।

कश्मीर माँगोगे चीर देंगे।।


लेकिन ग़ौरतलब है ये कि कुछ नारे थोड़ा हटके, थोड़ी विडंबना और कहीं-कहीं आलोचना का पुट लिए हुए हैं:

रामराज्य तो आने से रहा,

भ्रष्टाचार जा नहीं सकता

? ऐसा लगता है ना!


सौ में से निन्यानबे बेईमान,

फिर भी मेरा भारत महान !


मेरी दिल्ली, तेरी शान।

टूटी सड़कें, ट्रैफ़िक जाम!!

संत कबीर रुहानी कशमकश की पेचीदगियों, उसके ताने-बाने को समझाने के लिए हमें अपनी बुनकर की ज़िंदगी से मुहावरे उठाकर देते हैं, दुष्यंत कुमार हमें वहीं सुनाते हैं, जो वे ओढ़ते-बिछाते हैं, उसी तर्ज़ पर ऑटोवाले भी बिलकुल अपनी कच्ची-पक्की ज़िंदगी हमारे जैसे खोल कर रख देते हैं। हम पाते हैं कि काफ़ी पीड़ा, काफ़ी दर्द, और अपनी यथास्थिति से काफ़ी असंतोष है यहाँ। उम्मीद है तो बस इसलिए कि जिजीविषा है, गुलज़ार के लफ़्ज़ों में, जिये जाना भी तो एक आदत है:


  

माँ की दुआ जन्नत की हवा।

माँ की बद्दुआ बेटा रिक्शा चला।।


सबर कर बुरे दिन भी टल ही जाएंगे।

मज़ाक उड़ाने वालों के चेहरे बदल जाएंगे।।


जी रहा हूँ ऐसे पीके अश्के ग़म।

जिओ ऐसे तो कलेजा निकल जाए।।


ऐ ऊपरवाले, बदनसीबी न दे।

मौत दे दे, पर, ग़रीबी न दे।।


गाड़ी चलाने से पहले हैंडल संभाल लेना।

अभी भूखी चल रही हूँ, खाना खिला देना।।


सो जाते हैं फ़ुटपाथ पर अख़बार बिछाके।

मज़दूर कभी नींद की गोली नहीं खाते।।


जब तक इंस्टालमेंट देते हो, गाड़ी अपना नहीं सपना है।


वैसे ही जैसे-तैसे कट रही थी, ऊपर से सीएनजी तो कोढ़ में खाज की तरह आया। सीएनजी ने दिल्लीवालों की ज़िंदगी आम तौर पर, और ऑटोवालों की ख़ास तौर पर, हराम कर दी। पहले केन्द्र और राज्य सरकार के बीच की रस्साकशी, अदालत का डंडा, ईंधन की क़िल्लत वो लंबी-लंबी लाइनें कि सारा वक़्त अक्षरश: ईंधन जुटाने में ही लग जाये आदमी कमाए कब, आराम कब करे -- नई स्कूटर ख़रीदने का दंद और लाइसेंस-काग़ज़ का चिरंतन पुलिसिया ख़ौफ़ तो बिलकुल नये जामे में दम-दाख़िल हो गया। सुनते है उनकी आपबीती, उन्हीं की ज़ुबानी:

उफ़ ये गैस !


अमीरों को मारा पेट की गैस ने।


ग़रीबों को मारा सीएनजी की गैस ने।।


गाड़ी चल नहीं सकती बिना सीएनजी के।

ड्राइवर गाड़ी नहीं चला सकता बिना सवारी के।।


गैस मिल गई क्या ?


बुरी नज़र वाले सीएनजी चला।

यह आख़िरी नारा तो फिर भी एक अनाम, निराकार दुश्मन को संबोधित है, लेकिन आगे तो साक्षात दिल्ली पुलिस से खुले आम पंगा ले लिया गया है। इसी ज़मीन का दूसरा शे'र ज़्यादा मार्मिक है:


हमको दिल्ली पुलिस ने लूटा और किसी में कहाँ दम था।

मेरी कश्ती वहीं डूबी जहाँ पानी कम था।।

मेरी गाड़ी वहीं रुकी जहाँ सीएनजी कम था।।

हमें तो अपनों ने मारा ग़ैरों में कहाँ दम था।।।


ख़ुदा ग़ारत करे सीएनजी बनानेवाले को।

घर से बेघर कर दिया सीएनजी चलानेवाले को।।


ओए बेटा नीले, सीएनजी न मिले, तो देसी पी ले।

अगर देसी न मिले, तो थैली पीले।।


दारू से सीएनजी का ग़म ग़लत नहीं होना था, नहीं हुआ। सीएनजी का कारवाँ तो चल पड़ा था, गर्दो-गुबार भी धीरे-धीरे थम ही गया। ऑटो को नये पर्यावरण के मुताबिक़ अपना रंग-रूप बदलना पड़ा, अपनी देह पर सीएनजी का अनिवार्य गुदना गुदाना पड़ा और साथ ही बदली उसकी वाणी:

सीएनजी की कदर करें


लेकिन इस मौक़े का सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन लोगों ने उठाया जिनका संघर्ष के दौर में अस्तित्व ही नहीं था। आरटीवी नाम की एक नई ग्रामीण वाहन गाड़ी शहर में चली, जिसके लिए आसमान साफ़ था, ज़मीन समतल थी, सो वे चटपट आबाद हो गई, खुद को 'हरी-भरी' कहा, लगभग आत्ममुग्ध, स्वनामधन्य अंदाज़ में। लेकिन उन्होंने पैसेंजरों का ऐसा ठुँसान ठूँसा कि उनकी स्वार्थपरता भी उसकी अपनी ही किसी सखी-सहेली ने उजागर कर दी:

हरी तुम्हारी, भरी हमारी


 जो हरी-भरी दिल्ली के सरकारी मंसूबों पर एक तल्ख़ टिप्पणी है, होगी हरी तुम्हारी, हमारी तो हमें बस भरी चाहिए।
एक लिप्सा-दर्प भी है।

बहरहाल, ये सब तो ऐतिहासिक हादसे हैं --यक़ीनन संजीदा, मगर आए-आए। आइए, वापस कुछ स्थायी क़िस्म की वेदनाओं की ओर लौटें। ऑटो वालों की तमाम ज़िंदगी टुकड़ा-टुकड़ा इंतज़ार की ज़िंदगी है। एक जगह से दूसरी जगह जाने का, भाड़ा सही मिलेगा कि नहीं, मीटर सही उठेगा कि नहीं, पैसेंजर मिलेगा कि नहीं। सड़क उभरता है, जब हम ऑटो वालों के विरह-विदग्ध सगे संबंधियों की दशा देखते हैं:

कीचड़ में पैर रखोगी तो धोना पड़ेगा।

ड्राइवर से शादी करोगी तो रोना पड़ेगा।।


पापा जल्दी आ जाना।

मम्मी इंतज़ार कर रही है।।


भोजन भरी थाली,

दूध भरा प्याला,

बालम तेरी याद में।


लेकिन इस सर्वदा चलायमान ज़िन्दगी में इंतज़ार भी स्थायी नहीं है:

मौत भी मुकम्मल, तेरा भी एतबार है

दोनो में जो भी आए, उसका इंतज़ार है


यह हम नहीं कह रहे है, '3952 आई थी कहकर चली गई':

सीख ले बेटा ड्राइवर, बड़ी बुरी है जात।

न रहने का ठौर ठिकाना, घरवाली देखे बाट।।


जल्दी घर लौट कर आना

लिखा परदेस क़िस्मत में, वतन की याद क्या करना।

जहाँ बेदर्द हाकिम हों, वहां फ़रियाद क्या करना।।


क़िस्मत ने मुझको राह का पत्थर बना दिया।

जो इधर से गुज़रा ठोकर लगा गया।।


दिल तो बहुत रोया, पर आँखों से न रो सके।

ज़िन्दगी रोड पर गुज़री, कभी गद्दे पर न सो सके।।


परदेसी तुम कब आओगे?

हम गगन गिल के एक उम्दा लेख के हवाले से जानते हैं कि रघुवीर सहाय की तरह ही बहुत सारे ऑटो वालों के लिए भी दिल्ली परदेस ही है, यहाँ सड़कों पर वह वक़्त-बेवक़्त, उनींदे इसलिए दौड़ते फिरते हैं कि गाँव के उनके घर में एक और नींव पड़ जाए, एक और दीवार उठ जाए, एक अदद छत डल जाए, चंद रुपये मनीऑर्डर के चले जाएँ। यानी बक़ौल राही मासूम रज़ा, ग़ुब्बारे भले यहाँ उड़ रहे हों, डोर तो कहीं और है। पर ये जीना भी कोई जीना है: शहर की, सड़क की, सवारी की अनिश्चितताएँ, पुलिस का खड़का, ट्रैफ़िक का हाँका! इसीलिए आपने भाग्य के साथ समझौता कर लेने के बाद एक आउटडेटेड सी नसीहत वे अब भी कलेजे से लगाए घूमते हैं:

संत को दिल्ली मत भेजना

चाँदनी चौक के फ़व्वारे न होते, इंडिया गेट के नज़ारे न होते।


गाड़ी अगर न चलती होती, ड्राइवर भूखे मरते होते।।


सवारी मिल भी जाए तो परेशानी ख़त्म हो जाती है क्या? एक से एक लोगों से पाला पड़ता है: कोई कहता है तेज़ चलो कोई धीरे चलने की ताक़ीद करता है, किसी को लंबा, फ़रागत रास्ता चाहिए तो कोई शॉर्टकट ढूँढता है... चाहे जो हो

गाड़ी चलानेवाला, किसी से कुछ नहीं कहता

सवारी शोर करती है, ड्राइवर कुछ नहीं कहता।।


क्योंकि वह जान चुका है, सवारी से झगड़ा करना नादानी है, ज्यादा अकड़ ठीक नहीं:

झुकते वही हैं जिनमें जान होती है।

अकड़ जाना मुर्दे की पहचान होती है।।


ऑटो वाले हर हालत में अपनी सवारी के शुक्रगुज़ार हैं सिवाय उधारियों के हमने तो शायद ही कभी किसी को उधार पर ऑटो लेते देखा है, लेकिन ये जनाब तो इस तरह की शिकायत से बचने की जुगत भिड़ाते दिखे:

नाज़ुक है ज़िन्दगी परेशां है ज़माना।

आपसे उधार करके हमें क्या है कमाना।।


पानी गिरता है पहाड़ से, दीवार से नहीं

दोस्ती है हमसे, हमारे रोज़गार से नहीं


धर्म, विश्वास, आस्था

रॉकेट छोड़ते समय नारियल फोड़ने वाले देश में वैसे तो यह समझने में कोई मसला नहीं होना चाहिए कि मशीनों पर काम करने वाले भी काफ़ी पूजा-पाठ, सगुन-अपसगुन मानते हैं। ऑटो की दुनिया भी काफ़ी हद तक अंधविश्वासों की दुनिया है, विश्वास और आस्था की तो है ही: कुछ लोग शायद दोनों में फ़र्क़ भी नहीं करते होंगे। हम उन्हें दोष नहीं देते, क्योंकि वैसे भी आधुनिकतावादी विवेकवाद के इतने लंबे शासनकाल के बाद क्या दोनों में कोई तार्किक भेद करना संभव है? बहरहाल, जिसे आम शब्दावली में आस्था कहा जाता है, धर्म कहा जाता है, उसी की बात करें। ख़तरों से खेलते इस भगवान-भीरू जीवन के बारे में पहली मार्के की बात तो यह है कि यह बहु-देववादी है... लोगों की अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक जड़े हैं? सरोकार हैं, मत-परंपराएँ हैं। आते होंगे लोग दिल्ली भौतिक संपदाओं की अपनी एक छोटी-सी गठरी लेकर, लेकिन मन की आध्यात्मिक गठरी में तो क्या कुछ नहीं समाया होता है, और यह गठरी जब सड़कों पर, इबारतों में बिछती है, तभी हम पर खुलती है:

मधुर मधुर नाम, हरि ओम हरि ओम।

पावन पावन नाम हरि ओम हरि ओम।।


माता रानी फल देगी।

आज नहीं तो कल देगी।।


जय बाबा भैरो नाथ की।

चिंता नहीं किसी बात की।।


चाँदनी रात थी नदी का किनारा था।

स्टीयरिंग था हाथ में माता का सहारा था।।


शिव समान दाता नहीं, बिपत निडारन हार।

लज्जा मोरी राखियो, नन्दी के स्वार।।


शिव हमारे गुरु हैं

शिव जन-जन के गुरु हो सकते हैं

सोने से पहले अपने गुनाहों को याद कर।

कहीं यह तेरी ज़िन्दगी की आख़िरी रात न हो।।


आपने लक्ष्य किया होगा कि मुख़्तलिफ़ ख़ित्ता-जवार से दिल्ली में आए ये पुरुषार्थी अपने मन की गाँठ में अपने इष्ट, आराध्य को भी बांध लाए हैं, और बतौर सुरक्षा-कवच उन्हें गाड़ी की दीवारों पर चिपका कर उसे किसी अनिष्ट की आशंका से बुलेट-प्रूफ़ कर लेते हैं। गाड़ी-छकड़े का क्या ठिकाना। कब बिदक-बिगड़ जाये, कब कोई और ही ग़लती कर बैठे, खुद से ही कोई भूल-चूक हो जाये -- यहाँ तो लोग थोड़ा-सा छू जाने पर भी आसमान सर पर उठा लेते हैं। तो समरसता के तमाम शोर-जाप के बावजूद विविधता और आस्था की निजता यथावत बनी है।

न हिन्दू बुरा न मुस्लिम बुरा।

जो बुराई पर उतर आए, है वो इंसान बुरा।।


अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का।

उसका काल क्या करे जो भक्त हो महाकाल का।।


हम चिंतन करें उनकी, जिन्हें चिंता हमारी है।

हमारे रथ की रक्षा जो करे, वो सुदर्शन चक्रधारी हैं।।


           पर हमारा सर्वप्रिय धार्मिक, ठेठ देहलवी नारा यही है:

मेरे बाबे दी फुल कृपा


कुछ ऑटो : सेंटिमेंट से लदी-फदी


धार्मिक नारों में भक्ति और समर्पण तो है ही, एक अनाम डर का भी तत्त्व है। दुर्घट या अनिष्ट को टालने का आनुष्ठानिक तत्त्व भी है, शैतानी के शमन की दैनिक मजबूरी है। पर अब ज़रा शुद्ध सड़कछाप इश्क़िया शायरी की बात करें। और एक बार फिर हमें यहाँ इश्क के तमाम पहलुओं, चरणों, ख़तरों नाकामियों-सफलताओं, संयोग की उछाह, वियोग का बिछोह, वफ़ा का ऐलान, बेवफ़ाई की सरेआम रुस्वाई, ताने-उपालंभ और लगन के दर्शन होते है, उसी चिर-परिचित फ़िल्मी अंदाज़ में:

किसी से प्यार न करो, हो जाए तो इनकार न करो।

निभा सको तो निभाओ, किसी की ज़िन्दगी बर्बाद न करो।।


घरवाले कहते हैं, घर छोड़ दो,

गर्लफ़्रेंड कहती है, मुझे प्यार करना छोड़ दो,

दोस्त कहता है, ज़िन्दगी छोड़ दो।


माना हम ग़ैर हैं, अपने बन सकते नहीं।

ऐसी क्या मजबूरी है कि कभी मिल सकते नहीं।।


दूर से देखा करो, सुंदर गुलाब होते हैं।

हाथ से छूना नहीं, काँटे हज़ार होते हैं।।


इस आख़िरी शे'र पर ना जाएं, यह चाहत महज़ किताबी नहीं है दैहिक भी है और प्रकृति का आलंब तो शास्त्र-सम्मत बहाना है

बुलबुल भी चहचहाने लगती है, सावन में जब छाती है घटा।

तुम्हें चूमने को दिल चाहता है, ज़रा गालों से ज़ुल्फ़ें तो हटा।।


खुशबू फूल से होती है, चमन का नाम होता है।

निगाहें क़त्ल हैं, हुस्न बदनाम होता है।।


लेकिन हर आशिक़ की तरह एक मासूम, अदम्य, नैसर्गिक विश्वास भी, कि हमारा मिलना तय है

पत्ते हिलते नहीं हवा हिला देती है।

सच्चे आशिक़ों को कुदरत मिला देती है।।


फिर गहरी प्रतिबद्धता का ऐलान:


फूलों से पूछो भँवरों के लिए श्रृंगार कितना।

मेरे दिल से पूछो तेरे लिए प्यार कितना।।


मंदिर में जाके यही फ़रियाद करता हूँ।

ख़ुदा उसको सलामत रख, जिसे मैं प्यार करता हूँ।।


प्यार मिले तो उसे अपना लो।

वफ़ादार कम मिलते हैं।।


पर अक्सर जैसा होता है, अंतत: उस विश्वास का टूटना:

याद आ जाती है तेरी हर शाम के बाद।

आँसू आ जाते है आँखों में तेरे नाम के बाद।।


फिर कोसना इस तरह कि डियर तुम्हारे इनकार में तुम्हारा ही घाटा है, भूल तो ख़ैर क्या पाओगी मुझे:


माना आपकी नज़रों में हम कुछ नहीं।

ज़रा उनसे पूछो, जिन्हें हम हासिल नहीं।।


रोओगी, तड़पोगी, फ़रियाद करोगी।

वो दिन भी आएगा, जब तुम हमको याद करोगी।।


आम लोग ऐसी स्थितियों में बोतल का सहारा लेते हैं, लेकिन कुछ लोग तो आँखों की लत लगा बैठे हैं:

जीनेवाले तो हर हाल में जी लेते हैं,

सीनेवाले तो हर ज़ख़्म सी लेते हैं।


नहीं पिलानी है तो मत पिला साक़ी

पीनेवालों तो इन आँखों से भी पी लेते हैं।।


जाम से जाम पीने से क्या फ़ायदा,

रात में ही सारी उतर जाएगी।


उनकी आँखों से पी ले,

सारी उम्र नशे में गुज़र जाएगी।


          जीवन में हँसने की बड़ी महिमा है, ख़ास तौर पर दिल टूटने को जो हँसके टाल जाय,
वह इंसान ख़ास तो है:

आपको मिस करना रोज़ की बात है,

आपको याद करना आदत की बात है।


आपसे दूर रहना क़िस्मत की बात है,

आपको झेलना हिम्मत की बात है।।


पेड़ से पत्ते गिरते हैं, उठाता है कोई-कोई।

प्यार सभी करते हैं, निभाता है कोई-कोई।।


तुम बोलो या न बोलो तुम्हारे बोलने का काम नहीं।

तुम्हारी हँसने की अदा भी बोलने से कम नहीं।।


घूँघट में तुझे देखा तो दीवाना हुआ,

संगीत का तराना हुआ,

शमा का परवाना हुआ,

मस्ती का मस्ताना हुआ।

जैसे ही घूँघट उठाई इस दुनिया से रवाना हुआ।।


एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा,

दूसरी लड़की को देखा तो वैसा लगा।

जब दोनों के जूते लगे तो एक जैसा लगा।।


कुछ शब्द बदल गये हैं, लेकिन भाव वहीं हैं:

वो लड़की कितनी प्यारी थी जिसको आँख मारी थी।

वो सैंडल कितनी भारी थी जो उसने मारी थी।।


इस तरह दिलफेंक और जुमलादाग़ आशिक़ों के मानस में महिलाओं की सैंडल का ख़ौफ़ तो है पर उन्हें यह भी लगता है कि वे कॉलेज न जाकर थोड़े वंचित से रहे हैं:


NO NOLEG

WITHOUT KOLEG


ज्ञान तक ऐक्सेस हर किसी के बस की बात नहीं और कॉलेजों में सिर्फ़ ज्ञान ही नहीं मिलता। अगर 'फ़िल्मी कॉलेजों' के दृष्टांतों पर भरोसा किया जाए तो वहाँ ऐसी फ़्री ललनाएँ भी मिलती हैं जो इस दुनिया में महज़ आमोद-प्रमोद और उपभोग की वस्तुएँ है:


पढ़ती थी कॉलेज में पहनती थी जूतियाँ

चलती थी सड़क पे धड़कती थी चूचियाँ।।


ऐसा लगता है कि 'डिज़ायर' और 'क्लास' में टेंशन है, क्लास और जेंडर के बीच मसले हैं, सेक्स और सभ्यता तो विपरीतार्थक शब्द युग्म हैं ही। देवियों और सज्जनो, हमें सच से इनकार नहीं कि हमारा भाड़ा गाड़ी का यह जाँबाज़ आशिक़ मर्दवादी फ़िल्मी लोक-संस्कृति का ही एक नमूना है। आप में से जिनके कान लाल हो रहे हों उनसे क्षमा याचना सहित उनकी नज़र करते हैं इस तरह के सेंटिमेंट को पंक्चर करता हुआ एक सुपरहिट शे'र :

मत सता लड़की को, ये पाप होगा।

तू भी किसी दिन, किसी लड़की का बाप होगा।।


बुरी नज़र

ऑटो जीविका है। धंधा है। लक्ष्मी है। जब ये घर आता है या कहना चाहिए कि आती है तो इसका श्रृंगार होता है लेकिन सजे-सँवरे रूप को नज़र लग जाने का लोकापवाद तो आम है। इसलिए झट से डिठौना लगा दिया जाता है। नज़र कौन लगाएगा, वही न जो जलेगा। नज़र की कई काटें हैं और कुछ ख़ास दिनों पर कुछ विशेष टोटके भी किए जाते हैं। जैसे जूते टाँगना, नींबू-मिर्ची लटकाना, शनिवार को रेडलाइट पर सरसों तेल में लोहे के शनि महाराज को दान देना, राह चलते अगर किसी मातबर दरगाह या हनुमान मंदिर के दर्शन हो जायें तो सर झुका देना। लेकिन एक बार फिर रोज़ाना अनिश्चितताओं की इस दुनिया में कुछ न कुछ स्थायी समाधान भी किए जाते हैं। और यह धर्म, पंथ, विश्वास से ऊपर की रूढ़ अंधविश्वासों का चलन है। मान्यता है कि

इन्सान इतना अपने दुखों से दुखी नहीं है।

जितना दूसरों के सुखों से दुखी है।।


लिहाज़ा लगभग सौ फ़ीसदी ऑटो वालों को बुरी नज़र का ख़ौफ़ सताता है : और उसको काटने में वे तरह-तरह की रचनात्मक जुगाड़ लगाते हैं। बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला तो ख़ैर सर्वव्यापी है और सबसे घिसा-पिटा नारा है, लेकिन इस भाव की अन्य भंगिमाएँ भी दिलचस्प हैं:

बुरी नज़र वालों की तीन दवाई

जूता, चप्पल और पिटाई।।


चलती है गाड़ी, उड़ती है धूल।

जलते हैं दुश्मन, खिलते हैं फूल


या पाठांतर में:

मिलती है सवारी खिलते हैं फूल

इसका एक और रूप चित्रमय है यानी कि जूता लिखा नहीं चित्रित है, बाक़ायदा काला और भयावह। इससे एक तीर में दो शिकार हो जाते हैं। आप डिठौना भी लगा गए, धमकी तो दे ही रहे हैं... जैसे यहाँ:


बुरी नज़र वाले तेरे लिए तोहफ़ा -- ( जूते की तस्वीर... आँख की भी...)

पर ऐसा लगता है कि बुरी नज़र वाले कुत्ते की दुम की तरह हैं:

बुरी नज़र वाले

तू फिर जूते खा ले।


ओफ़ कितनी हिंसा है हमारी सड़कें पर!

35 के फूल 36 की माला

बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला


बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला

तेरा आतंकवादियों से पड़े पाला।

दिल्ली और आतंकवाद का यह पुराना रिश्ता बसों में आपकी सीट के नीचे 'बम्ब' से होता हुआ ऑटो के पिछवाड़े पर बद के लिए बददुआ बन चिपक गया...।

बुरी नज़र वाले तेरे बच्चे जियें


और इसके पहले कि आप ऑटो वाले की मौलिक शराफ़त और सद-दुआ पर झूम उठें

बड़े होकर तेरा ख़ून पियें...


एक और पाठांतर

बड़े होकर देसी दारू पियें


कुछ तो सीधे-सीधे अपनी बात कहना पसंद करते हैं - बिना किसी लाग-लपेट, हर्रे फिटकिरी के, बिल्कुल कोसने की ठेठ देहाती परंपरा में...

बुरी नज़र वाले तू जल


बुरी नज़र वाले तू पी के 100 जा


बुरी नज़र वाले भगवान मुझे उठा ले


बुरी नज़र वाले, तू ज़हर खा ले

लेकिन कुछ लोग उनसे एक-दो गालियाँ देकर मुक्ति पाना नहीं चाहते बल्कि एक ऐसा स्थायी रिश्ता गढ़ लेते हैं, जो लोक-संस्कृति द्वारा विहित, पोषित और मान्य हो - चाहे जब जी चाहे एक गाली जड़ दो:

बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला।

मैं तेरा जीजा, तू मेरा साला।


एक भाई साहब को तो ऐसे तत्त्वों से इतनी कोफ़्त है कि वे एक नया भारत छोड़ो आंदोलन छेड़ देना चाहते हैं:

बुरी नज़र वाले लंदन जा...


वैसे और भी रास्ते हैं, नज़रों में अगर खोट है, साहब तो इलाज कराइए:

BNW आँखें बदल


या इलाज संभव न हो तो हे

बुरी नज़रवाले, नेत्रदान करा ले!


लेकिन सारे लोग आँख के बदले आँख, ख़ून के बदले ख़ून के प्यासे सड़कों पर नहीं घूम रहे हैं, चंद शरीफ़ समाजसुधारवादी क़िस्म के लोग भी हैं:

न किसी की बुरी नज़र, न किसी का मुँह काला


सबका भला चाहता है, 2072 वाला


बुरी नज़र वाले तेरा भी भला

एक तो गांधीवादी भी मिला, बिल्कुल किताबी:


बुरा मत देखो, बुरा मत कहो, बुरा मत सुनो


या इसी को बेहतरीन शायराना अंदाज़ में ऐसे कहा गया है:

बुत को बुत ख़ुदा को ख़ुदा कहते हैं।

हम भी देखें तो उसे देख के क्या कहते हैं।।


जो भले हैं वो बुरों को भी भला कहते हैं।

न बुरा सुनते हैं अच्छे न बुरा कहते हैं।।


तो साहब जलने से भरसक परहेज़ कीजिए और अगर जलना ही है तो:

जलो मगर दिये की तरह।

नेक नीयत, मंज़िल आसान


और इसी पर-उपदेश कुशल बहुतेरे के नोट पर हम भी अपनी ऑटो-यात्रा को विश्राम देना चाहेंगे। चुन्नू ते मुन्नू ते पिंकी ते 100नू की गड्डी को इजाज़त दीजिए, हम फिर मिलेंगे:


नदी किनारे बुलबुल बैठी ओढ़े लाल दुपट्टा।

अगले चक्कर फिर मिलूंगा दिल न करना खट्टा।।

क्योंकि वक़्त के साथ हमारा पहिया तो नहीं रुकनेवाला और न ही रुकेगी सड़कछाप शायरी, ये अलग बात है कि बाज़ार का कुछ असर हमारी दीवारों पर शायद दिखने लगे और मंटो ने जिस आशंका की बात उस लेख के आख़िर में की थी वह सच हो जाते यानी कि हमारी अपनी दीवारों की शायरी भी शायद प्रायोजित हो जाए, मेट्रो की दीवारों की तरह - सपाट, चकाचक और यांत्रिक। चटपटा स्वाद जाने का अफ़सोस तो हम सबको होगा पर दुनिया तो फ़ानी है, आनी-जानी है:

सुबह का बचपन हँसते देखा दोपहर मस्त जवानी।

शाम का बुढ़ापा ढलते देखा, रात को ख़त्म कहानी।।


बुलबुल की ज़िन्दगी चमन की बहार पर

ड्राइवर की ज़िन्दगी मोटर की रफ़्तार पर


आपके बैठने का धन्यवाद....

उफ़ बाजी, रिक्शा गई!


आधार

यह लेख सराय की आलोचनात्मक शहरी लोक-संस्कृतिप्रियता की साझा उपज है और ख़ास तौर पर शुद्धब्रत सेनगुप्ता को समर्पित है। जिन दोस्तों ने नारे जमा करने से हमारी मदद की उनमें सोहन पाल अग्रणी हैं, जिन्होंने कई मौक़ों पर बस से उतर कर ऑटो के पीछे भागने तक की ज़हमत उठायी। दीपू (अवधेन्द्र शरण) और सौम्या गुप्ता ने बारी-बारी से गणेश और कृष्ण यानी लिपिक व सारथी की भूमिकाएँ बख़ूबी अदा की। शाहिद अमीन, ऋतु मिश्रा, आदित्य निगम, अविनाश झा, विजय सिंह, सदन झा, संजय शर्मा, नरेश गोस्वामी और योगेन्द्र दत्त ने या तो कई बेजोड़ नारे दिए या कुछ अच्छे सुझाव। करूणाकर को तो यह रोग ऐसा लगा कि वह हमसफ़र हो लिया और यहाँ छपी तस्वीरें उसी के कैमरे के जादुई चमत्कार है, ज़्यादातर चलती गाड़ी से उतारे गए।

संदर्भ

स' आदत हसन मंटो, बलराज मेनरा, शरद दत्त (सं.) दस्तावेज़ मंटो, खंड 4, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 1993.

रोलाँ बार्थ, अ लवर्स डिस्कोर्स: फ़्रैग्मेंट्स. 1977

http://wikipedia.org/wiki/Auto-rickshaw

रचनाकार द्वय:

रविकांत – इतिहासकार, लेखक और अनुवादक. ट्रांसलेटिंग पार्टीशन के सहसंपादक. संप्रति: जनसंचार, लोक संस्कृति व देसी कंप्यूटरी के मसलों पर सराय में कार्यरत और दीवान-ए-सराय के श्रृंखला संपादक.

प्रभात कुमार झा : स्वयंसेवी संगठन अंकुर से संबद्ध और सायबरमोहल्ला प्रॉजेक्ट का समन्वय करते हैं. फिलहाल एनसीईआरटी समेत कई शैक्षिक परियोजनाओं में डूबे हैं और वैकल्पिक शिक्षा के नायाब फ़ॉर्मूले तराशने में लगे हैं.

चित्र - जी. करूणाकर. ऑटो के पीछे के कुछ और उम्दा चित्र आप यहाँ देख सकते हैं.

आलेख दीवान-ए-सराय 02 शहरनामा से साभार. मूल आलेख पीडीएफ़ फ़ाइल फ़ॉर्मेट में यहाँ से डाउनलोड कर पढ़ सकते हैं.

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