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April, 2007 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं
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अन्तरा करवड़े की 53 लघुकथाएँ - अंतिम किश्त

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लघुकथाएँ - 41 - 53
बोझ"तो मैं यह समझ लूँगी कि मेरा कोई बेटा था ही नहीं।""माँ!""क्यों ! आश्चर्य हो रहा है ना मेरे वाक्यों पर? ऐसा ही मुझे भी लगता था जब तुम कहते थे कि¸ दो चार साल हम नहीं भी मिले तो क्या हुआ? मैंने शादी अपनी मर्जी से भी कर ली तो क्या हुआ? इन्सान को सब कुछ सहन करने की आदत होनी चाहिये। अब कहो¸ क्या तुम इन्सान नहीं हो?""तुम ये सब इतनी सहजता से कैसे कह सकती हो माँ क्या तुम्हारे पास मेरे लिये कोई प्रेम नहीं बचा? मैंने तो सोचा था कि हमसे लाख गलतियाँ हो लेकिन तुम हमेशा ही हमारा साथ दोगी। लेकिन मैं ही गलत था।""तुम्हारी यही सोच कहाँ थी बेटा जब दो बार स्वदेश वापसी के दौरान तुम इसी शहर की अपनी संपन्न ससुराल में महीने भर तक आतिथ्य ग्रहण करते रहे। माँ - बाप के लिये बस एक औपचारिक दिन रखा¸ उसमें भी हमारी बहू तबीयत खराब होने का बहाना बनाकर यहाँ नहीं आई।""वो समय और था माँ! उन्हें सहारे की जरूरत थी। और मैं प्रीती का स्वभाव तुम्हें नहीं …

अनिरूद्ध सिन्हा की ग़ज़लें

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ग़ज़ल 1
अंधेरों में उजालों की कसम तुमको मुबारक हो
समय की बेवफाई का भरम तुमको मुबारक हो

हमारी चीख की कोई कहानी बन नहीं पाई
तुम्हारे प्यार के किस्से का ग़म तुमको मुबारक हो

अभी मासूम ख़्वाहिश को वफ़ाएँ तोड़ देती हैं
मुहब्बत में ज़माने का सितम तुमको मुबारक हो

हमारे जख़्म पे मरहम लगाकर उंगलियाँ रखना
सियासत में नुमाइश का धरम तुमको मुबारक हो

कहाँ हँसते हुए देखा कभी बेजान पत्थर को
फरिश्ता है वही तो ये वहम तुमको मुबारक हो

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ग़ज़ल 2
मेरे जज़्बात मेरे नाम बिके
उनके ईमान सरेआम बिके

ऐसी मंडी है सियासत जिसमें
तेरे अल्लाह मेरे राम बिके

पी के बहका न करो यूँ साहब
अब तो मयख़ाने के हर जाम बिके

उनकी बातों का भरोसा कैसा
जिनके मजमून सुबह-शाम बिके

कैसे इजहार करूं उल्फत के
मेरे अरमान बिना दाम बिके

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ग़ज़ल 3
ग़म यहीं है हवा किधर जाए
सिर से चादर न फिर उतर जाए

खेल ही खेल में किधर जाए
जो इधर आग है उधर जाए

सूखे पेड़ों से आग बरसेगी
धूप में आईना ठहर जाए

एक जंजीर है जो टूटेगी
इस कलाई का जख़्म भर जाए

हम जरूरत नहीं मुहब्बत हैं
उस हुक़ूमत को ये ख़बर जाए

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ग़ज़ल 4
ग़म हमारा मलाल उनका है
ये भी कहिए कमाल उनका है

ये सफ़र का अजीब हिस्सा है
याद …

समझदार को इशारा - असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण

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चलते तो अच्छा थाईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण- असग़र वजाहतअनुक्रम यहाँ देखेंअध्याय 5

समझदार को इशारातेहरान विश्वविद्यालय की तरफ़ मुंह करके खड़े हो जायें तो दाहिनी तरफ़ इन्क्लाबे-इस्लामी सड़क पर ही कुछ आगे चल कर एक कई मंज़िला गोल-सी इमारत है जिसे 'थियेटर सेंटर' The centre for dramatic Arts कहते हैं। यहां आने से पहले ही यह पता था कि ईरान, खासकर तेहरान में थियेटर का बड़ा ज़ोर है और वहां नाटक वालों से ज़रूर मिलना चाहिए। मोनी ने नाहीद के ज़िम्मे यह भारी काम डाला था कि मुझे 'थियेटर सेंटर' दिखाये। नाहीद अपनी पढ़ाई पूरी कर चुकी है और फिलहाल एक अखबार में किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है।थियेटर सेंटर की काफ़ी बड़ी और प्रभावशाली इमारत है। बताया गया कि यह इस्लामी क्रांति आने से कुछ साल पहले ही बनी थी। ईरान में रंगमंच का इतिहास बहुत पुराना है। 'कॉमिक इंअरटेनमेण्ट' पर केन्द्रित नाट्य विधाएं ईरान में इस्लाम आने से पहले प्रचलित थीं जिन्हें 'बक्फालबाज़ी', 'तख्त हाउज़ी', 'सियाहबाज़ी', 'ख्यालबाज़ी', 'ख़ेमाशबाज़ी' के नाम दिए गए थे। इन सबकी अपनी-अपनी विश…

कमजोर कड़ी

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कहानी- कमजोर कड़ी-राजनारायण बोहरेतनु चकित सी खड़ी थी । ग्यारह बजे थे । भीतर प्रवेश करते ही उसे अपना कार्यालय पूरी तरह सुनसान दिखा तो उसे अजीब लगा। उसने हॉल में रूककर अपने बॉस के कमरे की तरफ एक क्षण को ताका, फिर तेज गति से उधर ही बढ़ गई । वह कमरा भी बाकी दफ्तर की तरह सूना था । रात को यहां रहने वाला चौकीदार बॉस के कमरे की हर चीज को साफ पोंछ के चमका गया था। उनकी सूनी कुर्सी, खाली टेबुल को ललक के साथ ताकते हुए जब उसकी नजर एक तरफ रखे कम्प्यूटर पर पहुंची तो उसकी आंखें चमक उठी । खाली कम्प्यूटर देख कर ऐसा प्राय' होता है । जबसे कम्प्यूटर चलन में आये हैं, हमारी सोसायटी में तमाम नये एटीकेट पैदा हो ग़ये हैं, तनु यह बात भली भांति जानती थी। फिर भी अपने बॉस के खाली कमरे में रखा नया पी-फोर श्रेणी का कम्प्यूटर उसे अपनी ओर इस ताकत से खींच रहा था कि वह अपना लोभ संवरण नहीं कर सकी , और बेहिचक कम्प्यूटर के सामने जम गई। कम्प्यूटर ऑन करके उसने अपने हैड-ऑफिस की वेव साईट खोल ली । ई-मेल बॉक्स में कोई अर्जेन्ट और खास संदेश मौजूद होने का संकेत दिखाई पड़…

ऑटो के पीछे क्या है?

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- प्रभात कुमार झा तथा रविकांतलाज़िम है, कि 'सड़कछाप' शायरी की बात एक सड़कछाप गाने की नक़ल से की जाए। विद्वान जगत शायद विद्योत्माना अंदाज़ में पूछे कि 'अस्ति कश्चिद वाग्विशेष:' -- ऐसी क्या ख़ास बात है ? बचाव पक्ष पैसे तो दलील देने की ज़रूरत नहीं समझता फिर भी इशारतन गुज़रे ज़माने के चंद महारथियों को फुटनोटित करना शायद होशियारी होगी। उर्दू के आलातरीन, अफ़सानानिगार स'आदत हसन मंटो ने अपने पचासेक साल पहले लिखे एक निहायत चुटीले लेख 'दीवारों पर लिखना' में लगभग सिद्ध कर दिया कि महत्तर सत्य बड़ी इमारतों के बदबूदार मूत्रालयों में खुदे होते है। इसका एक और धारदार प्रमाण उन्हीं की एक और कहानी - और क्या, 'मूतरी' - में मिलता है, जहाँ कथानायक हिन्दू-मुसलमानों के बीच वाग्युद्ध अर्थात माँ-बहन का उपसंहार एक तटस्थ क़िस्म के जुमले में हुआ देख कर उस दुर्गंधित माहौल में खुशबू के अहसास से तर होकर बाहर निकलता है। अगर आपने मंटो को पढ़ा है तो आपने देखा होगा कि उनकी कहानियाँ अख़बारी कतरनों को ले कल्पना और मर्म के अबूझ ठिकानों का सफ़र ऐसे तय करती हैं जैसे कि सच और झूठ की मिला…

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