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असग़र वजाहत का यात्रा संस्मरण : चलते तो अच्छा था

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चलते तो अच्छा था
ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण-असग़र वजाहतअनुक्रम1. मिट्टी का प्याला2. शबे शीराज़3. जाना-पहचाना अजनबी4. सड़क पर तेहरान5. समझदार को इशारा6. भारतीय होने का अर्थ7. तेहरान में पहला जुमा 8. दोस्त अकेला दुश्मन ज़माना 9. खुरचन 10. बुद्धिजीवियों की सड़क 11. सीमा की सीमाएं 12. मुसद्दिक़ की दुकान13. हवा के शहर में 14. हवा का रुख़ 15. परियों की तलाश में 16. तेल के खेल 17. अग्नि मंदिर 18. फिर वही रास्ता19. स्वर्ग के द्वार की ओर 20. धर्म के गढ़ में 21. आधी दुनिया22. रेत पर शहर 23. फिर धर्म और कविता की ओर 24. कवि का कर्ज़ा 25. हुक्मे नादिरशाही 26. ख़ाफ़ में तोते 27. ईरान के गिरफ़्तारपहली किश्त - ‘मिट्टी का प्याला' पढ़ें रचनाकार के अगले अंक मेंसभी चित्र - @ असग़र वजाहत . ऊपर का चित्र - गांजा, आज़रबाईजान
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अमृता प्रीतम: क्या दिया तुमने?

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-विजय शर्माहम लोगों की आदत है, किसी ने कहा कौआ कान ले गया और बस हम दौड़ पड़ते हैं कौए के पीछे. थोड़ी देर बाद यह भी भूल जाते हैं कि क्यों दौड़ रहें हैं. बस आँख मूँद कर दौड़ते जाते हैं कान की याद भी नहीं रहती है. कुछ ऐसा ही हुआ जब 31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम नहीं रहीं. उनकी मृत्यु पर खुशवंत सिंह ने टिप्पणी की और अधिकाँश अखबार ले उड़े उनकी टिप्पणी को. खुशवंत सिंह ने कहा, 'अमृता वॉज ए टेकर, नॉट ए गिवर. अमृता लेना-ही-लेना जानती थी उसने किसी को कभी कुछ दिया नहीं'. आगे उनकी टिप्पणी थी वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पढ़ती भी नहीं थी यहाँ तक कि अखबार भी नहीं. खुशवत सिंह ने गिन-गिन कर अमृता की कमियाँ लिख मारी, मसलन उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं थी, उनका साहित्य ऊँचे दर्जे का नहीं था, वे बड़ी सामान्य लेखिका थी आदि, आदि. भला खुशवंत सिंह कहें और किसकी मजाल है जो उनकी बात काटे, उनकी बात न माने. और बात एक लेखिका के विषय में थी लेखिका वैसे भी दोयम दर्जे की मानी जाती है. मेरे एक मित्र हैं बहुत बड़े विद्वान, खूब पढ़ने वाले, गजब की याददाश्त वाले. जो पढ़ते हैं उसको ज्यों-का-त्यों दशकों बाद …

व्यंग्य : मुझे भी एक अड्डा चाहिए

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- मनोज सिंह'चित भी मेरा, पट भी मेरा, अड्डा मेरे बाप का` चोरी और सीनाजोरी की इससे बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। देशों में अमेरिका पर यह कहावत पूर्णत: चरितार्थ होती है। अपने मोहल्ले में तो हम भारतीय भी इसमें पीछे नहीं हैं। उपरोक्त कहावत हिंदी में है तो हिंदी प्रदेशों में इसे स्वाभाविक रूप से अधिक प्रासंगिक होना चाहिए। और है भी। उत्तर प्रदेश, बिहार में तो यह आम बात है। राजनीतिज्ञों का तो इसके भावार्थ पर एकाधिकार शुरू से ही रहा है। चोर जब पुलिस से मिल जाता है तो ताल ठोंककर यह मुहावरा बोलने लगता है। फिल्मों की नायिका निर्माता-निर्देशक से मिलकर नायक को यह झटका दे सकती हैं। आजकल की औरतों के भी मजे हैं मायके में तो धाक पहले से ही थी ससुराल में भी पति के कान खींचकर कब्जा किया जाने लगा है। और अगर कभी पति के लिए प्रेम गीत गाती भी हैं तो बोल यही होते हैं। आदमी भी पीछे कहां रहने वाला, इन चंद शब्दों को बोलने के लिए शराब के दो पैग अंदर और फिर वो शेर की भांति दहाड़ने लगता है। मगर फिर भी, घर पर तो बोल नहीं सकता, उधर चित-पट चाहे जितना मर्जी कर लें अड्डा बीयर बार के मालिक का ही होता है और रही-सही कस…

पुस्तक समीक्षा : हंसते-हंसते दर्शन शास्त्र

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वर्ल्ड ऑफ़ बुक्सहंसते-हंसते दर्शन शास्त्र

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवालउम्र के सत्तर बरस पूरे कर लेने के बाद थॉमसन ने सोचा कि अब उसे अपनी जीवन शैली को बदल डालना चाहिये ताकि कुछ बरस और जिया जा सके। बेहद संतुलित भोजन, जॉगिंग, तैराकी – इन सब का असर यह हुआ कि तीन माह में उसका हुलिया ही बदल गया। वज़न में तीस पाउण्ड और कमर के घेरे में 30 इंच की कमी हो गई। उत्साहित होकर उसने सोचा कि अब इस युवा लगती काया के अनुरूप हेयर स्टाइल भी हो जाए! गया एक हेयर कटिंग सेलून में, बाल कटवाये, और जैसे ही बाहर निकला, एक बस की चपेट में आ गया। गिरते-गिरते भी उसके मुंह से निकला , “ हे भगवान, तूने मेरे साथ ऐसा क्यूं किया?” जवाब में आकाशवाणी हुई, “थॉमसन सच तो यह है कि मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया।“ दर्शन शास्त्र की किताब में यह लतीफ़ा! कुछ अजीब नहीं लगता? थॉमस केथकार्ट और डेनियल क्लाइन की ताज़ा किताब प्लेटो एण्ड अ प्लेटिपस वॉक इण्टु अ बार : अण्डरस्टैंडिंग फ़िलोसॉफ़ी थ्रू जोक्समें यही बेमेल लगने वाला संयोजन चौंकाता भी है, आनन्दित भी करता है। टॉम (यानि थॉमस) और डेनियल हार्वर्ड विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र पढे हैं और बहुधन्ध…

शिव-पार्वती का संगमः उत्तर-दक्षिण का सांस्कृतिक मिलन

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(रुक्ष्मणि पटेल)
आलेख
- प्रा.रुक्ष्मणि पटेलसागर-सेवित, मेघ-मेखलित यात्रा-विवरण अज्ञेय की प्रसिद्ध पुस्तक अरे यायावर, रहेगा याद का एक अंश है जिसमें उन्होंने भारत-भ्रमण के विशिष्ट अनुभवों को अभिव्यक्त किया है। अज्ञेय जी यह बताते हैं कि कालिदास ने कुमारसंभव की रचना करने के पूर्व समुद्रों को हिमालय के साथ जोड़ दिया है। भारत का काव्य-चित्र प्रस्तुत करते हुए हम भी उत्तर में हिमाद्रि तुंग श्रृंग और दक्षिण में तट-प्रक्षालन करते हुए महासागर की बात करते हैं। किन्तु यह उत्तर-दक्षिण को जोड़ना नहीं है, अलग करना है। जबकि कालिदास का हिमालय महासागरों में अवगाहन करके निकला है। सागर भी महान है जो हिमालय के पाँव पखारने झुकता है और हिमालय भी महान है जो मानो उसे क्रीड़ा-सहचर बना कर अंक भेंट लेता है। इस प्रकार शिव और सती, पिनाकी और गिरिजा, पर्वतों का तपस्यारत योगी और अंतरीप की तपस्विनी कुमारिका के महा-मिलन का वर्णन किया है, जिससे कुमार का जन्म हुआ होगा। यह मिलन सिर्फ शिव-पार्वती का ही नहीं है, उत्तर और दक्षिण का भी है। दो परमशक्तियों के संगम में जन्म लेगा एक परम योद्धा (कार्तिकेय), जो दानवी सत्ता के आतंक स…

जॉलीवुड का फ़िल्मी धरातल

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- सुशील अंकन झारखंड प्रकृति के आंचल में एक ऐसा प्रदेश है जहां की हवाओं, घटाओं, पर्वत, पानी और मिट्टी में समृद्धि की गाथा लिखी हुई है। यहां की संस्कृति यहां की परंपरा खुले आकाश के नीलवर्ण जैसा पारदर्शी है। ईश्वर ने मुक्त हाथों से इस राज्य को सौगात दिए हैं और ऐसी पृष्ठभूमि में यहां का सौंदर्य यहां के फूल यहां के झरने यहां के गीत अगर फ़िल्मों के माध्यम से बांटी जाय तो सारे लोग बरबस ही इस ओर आकर्षित होंगे ऐसा मैं मानता हूं। कुछ लोगों ने झारखंड प्रदेश में बहुत पहले से फ़िल्म निर्माण का कार्य करते रहे हैं किन्तु उनका कोई प्रमाणिक रिकार्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके कार्यों को रेखांकित करना शोध का विषय है। जिन लोगों ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में कदम रखा उनके कार्यों का लेखा जोखा सरेआम मौजूद है ज़रूरत है इन पर एक दृष्टि डालने की और पूरे आंकड़ों को ईमानदारी से लिपिबद्ध करने की । जॉलीवुड की फ़िल्मी धरातल पर अगर नज़र डालें तो 1988 में दृश्यांतर इंटरनेशनल के बैनर तले बनी एक हिन्दी फ़िल्म ''आक्रांत'' को पहले पड़ाव पर रख सकते हैं। झारखंड की मौलिक समस्याओं पर बनी इस फ़िल्म में सूदखो…

सुकेश साहनी की लघुकथाएँ.

महत्त्वपूर्ण कड़ीचाणक्य गुरूबालक , अभिभावक औरशिक्षक के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । शिक्षा की कोई भी विधि -प्रविधि ,पाठ्यक्रम-पाठ्यचर्या लागू करने से पहले बच्चे को समझना होगा । कोई भी तौर-तरीकाबच्चे से ऊपर नहीं है और न हो सकता है । कोई भी व्यक्ति या संस्था इसके ऊपर नहीं है ,वरन् इसके लिए है । यह बात सदैव ध्यान में रखनी होगी । श्री सुकेश साहनी नेशिक्षा-जगत पर कई महत्त्वपूर्ण लघुकथाएँ लिखी हैं ;जिनमें से कुछ यहाँ दी जा रहीहैं । ये लघुकथाएँ हमारी आँखें खोलने का काम करती हैं एवं शिक्षा के लिए हमारीअव्यावहारिक कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैँ ।
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प्रस्तुति : रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'1-मैं कैसे पढ़ूँ ?
पूरे घर मेंमुर्दनी छा गई थी। माँ के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाईमाँ---रो-रोकर थक चुकी माँ के पास चुपचाप बैठी गाँव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटेगुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखाथा----
शुचि!टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गईऔर वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।
तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रहीथी----बोलो?” वह घबरा गई। प…

उम्र पचपन, याद आता है बचपन

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आलेख -भारती परिमल'वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी' जगजीत-चित्रा सिंह द्वारा गाई गई ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ सुनते ही हम सब कई बरस पीछे अपने बचपन की यादों में समा जाते हैं. बचपन जहाँ केवल मस्ती ही मस्ती होती है. हम सबका बचपन तितली की तरह उड़ता, चिड़िया की तरह चहकता और गिलहरी की तरह फुदकता हुआ था. सुख और दु:ख की घनी छाँव क्या होती है, इसकी हमें खबर न थी. सावन की पहली फुहार का बेताबी से इंतजार रहता था हम सबको. बूँदें धरती पर गिरी नहीं कि हथेली उसे सहेजने के लिए अपने आप ही आगे बढ़ जाती थी. पलकों को छूती हुई वे बूँदें मन को भिगो जाती थी. बारिश में भीगने का ऐसा जुनून होता था कि भरी दोपहरी में जब घर के सारे लोग सो रहे हों, तब चुपके से माँ की ओट छोड़ कर दबे पाँव एक कमरे से दूसरा कमरा पार करते हुए, धीरे से किवाड़ खोल कर घर की देहरी लांघ जाते थे. देहरी लांघने में खतरा हो, तो दीवार फांदने में देर नहीं करते थे. फिर एक के बाद एक सबको आवाज देते, किसी को खिड़की से पुकारते, तो किसी को पक्षी या जानवर की आवाज के इशारे से पुकारते घर के बाहर ले आते थे. फिर लगता था मस्ती का मेला, खुद की मस्ती, खुद की दु…

शैतानी गणित में बिलबिलाती रूहें...

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(पिछले दिनों असग़र वजाहत की कहानी शाह आलम कैम्प की रूहें के परिप्रेक्ष्य में चिट्ठा जगत् में जमकर विवाद हुआ और उसकी परिणति नारद पर एक चिट्ठे पर प्रतिबंध के रूप में सामने आया. प्रस्तुत समीक्षा उसी कहानी-संग्रह – मैं हिन्दू हूँ की है. समीक्षक हैं अभिषेक श्रीवास्तव. यह समीक्षा तद्भव में  प्रकाशित हो चुकी है. प्रसंगवश, अभिषेक वही हैं जिनकी एक कहानी को (भाषा का सवाल उठाते हुए किसी चिट्ठे को पहली दफ़ा) नारद पर प्रतिबंधित किया गया था. – सं.) शैतानी गणित में बिलबिलाती रूहें...पुस्तक समीक्षा – कहानी संग्रह –मैं हिन्दू हूँलेखक – असग़र वजाहतसमीक्षक – अभिषेक श्रीवास्तवअसग़र वजाहत की कहानियों के केन्द्र में साम्प्रदायिकता है। लेकिन यह साम्प्रदायिकता उस पारम्परिक साम्प्रदायिकता से बिल्कुल भिन्न है जिनका साक्षात्कार हमें रोज ब रोज की घटनाओं में अपने समाज में देखने को मिलता है। ये घटनाएं , दंगे और फसाद इनकी कहानियों के एक महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन चिन्ता उस शैतान की है जिसकी गणित पूरे सामाजिक तानेबाने को छिन्न भिन्न किये दे रही है। मैं हिन्दू हूं एक ऐसा कहानी संग्रह है जहां मानवीय विद्रूपताएं अपने नग…

अंतरिक्ष : अनंत में अस्तित्वहीनता

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आलेखअनंत में अस्तित्वहीनता- मनोज सिंहअंतरिक्ष से हम बहुत हद तक अनजान हैं। जितना हम अब तक समझ पाये हैं, उस हिसाब से भी देखें तो कितना विशाल ब्रह्मांड है हमारा, जहां असंख्य बड़े-बड़े तारे और अनगिनत आकाशगंगायें हैं। इनके बीच उपस्थित हमारा सूर्य और उसका छोटा-सा सौरमंडल। जिसमें फिर दूसरे ग्रहों की अपेक्षा हमारी पृथ्वी थोड़ी छोटी ही है। इसी पृथ्वी के छोटे से हिस्से में एक देश, भारत मेरी मातृभूमि। सौ करोड़ की आबादी और जिनके लिए बसाये गये लाखों गांव, कस्बे, शहर व महानगर। इन्हीं सैकड़ों नगरों में एक नया शहर चंडीगढ़। अभी छोटा ही है। मगर कोठियों व बिल्डिंगों की संख्या हजारों में पहुंच रही है। इन्हीं में से एक इमारत की दूसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट के छोटे से अध्ययन कक्ष में बैठकर जब मैं अपने आपको देखता व सोचता हूं तो मुझे अस्तित्वहीनता का आभास होता है। छोटी उम्र से ही आकाश और तारे मुझे आकर्षित तो करते हैं मगर फिर जल्द ही बेचैन भी करने लगते हैं। रात के अंधेरे में, छत पर लेटे-लेटे, साफ आसमान को एकटक नजर से निरंतर देखने पर अचानक असंख्य तारों के बीच पाकर अजीब-सा डर लगने लगता है। यह दृश्य अत्यंत भयानक होता है…

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रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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