रचनाकार

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June 2007
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चलते तो अच्छा था

ईरान और आज़रबाईजान के यात्रा संस्मरण

-असग़र वजाहत

अनुक्रम

1. मिट्टी का प्याला

2. शबे शीराज़

3. जाना-पहचाना अजनबी

4. सड़क पर तेहरान

5. समझदार को इशारा

6. भारतीय होने का अर्थ

7. तेहरान में पहला जुमा

8. दोस्त अकेला दुश्मन ज़माना

9. खुरचन

10. बुद्धिजीवियों की सड़क

11. सीमा की सीमाएं

12. मुसद्दिक़ की दुकान

13. हवा के शहर में

14. हवा का रुख़

15. परियों की तलाश में

16. तेल के खेल

17. अग्नि मंदिर

18. फिर वही रास्ता

19. स्वर्ग के द्वार की ओर

20. धर्म के गढ़ में

21. आधी दुनिया

22. रेत पर शहर

23. फिर धर्म और कविता की ओर

24. कवि का कर्ज़ा

25. हुक्मे नादिरशाही

26. ख़ाफ़ में तोते

27. ईरान के गिरफ़्तार

पहली किश्त - ‘मिट्टी का प्याला' पढ़ें रचनाकार के अगले अंक में

सभी चित्र - @ असग़र वजाहत . ऊपर का चित्र - गांजा, आज़रबाईजान

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-विजय शर्मा

हम लोगों की आदत है, किसी ने कहा कौआ कान ले गया और बस हम दौड़ पड़ते हैं कौए के पीछे. थोड़ी देर बाद यह भी भूल जाते हैं कि क्यों दौड़ रहें हैं. बस आँख मूँद कर दौड़ते जाते हैं कान की याद भी नहीं रहती है. कुछ ऐसा ही हुआ जब 31 अक्टूबर 2005 को अमृता प्रीतम नहीं रहीं. उनकी मृत्यु पर खुशवंत सिंह ने टिप्पणी की और अधिकाँश अखबार ले उड़े उनकी टिप्पणी को. खुशवंत सिंह ने कहा, 'अमृता वॉज ए टेकर, नॉट ए गिवर. अमृता लेना-ही-लेना जानती थी उसने किसी को कभी कुछ दिया नहीं'. आगे उनकी टिप्पणी थी वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं थी, पढ़ती भी नहीं थी यहाँ तक कि अखबार भी नहीं. खुशवत सिंह ने गिन-गिन कर अमृता की कमियाँ लिख मारी, मसलन उनकी कोई राजनैतिक विचारधारा नहीं थी, उनका साहित्य ऊँचे दर्जे का नहीं था, वे बड़ी सामान्य लेखिका थी आदि, आदि. भला खुशवंत सिंह कहें और किसकी मजाल है जो उनकी बात काटे, उनकी बात न माने.

और बात एक लेखिका के विषय में थी लेखिका वैसे भी दोयम दर्जे की मानी जाती है. मेरे एक मित्र हैं बहुत बड़े विद्वान, खूब पढ़ने वाले, गजब की याददाश्त वाले. जो पढ़ते हैं उसको ज्यों-का-त्यों दशकों बाद भी कोट कर सकते हैं. सारा विश्व साहित्य चाट रखा है पर किसी लेखिका को नहीं पढ़ते हैं. एक व्याट को छोड़ कर उन्होंने कभी कोई लेखिका नहीं पढ़ी और न ही भविष्य में पढ़ने का इरादा रखते हैं. उनका पक्का विश्वास है लेखिकाएँ भला क्या लिख सकती हैं. पता नहीं मेरे इन मित्र को लेखिकाओं से क्या अदावत है. पता नहीं खुशवंत सिंह को अमृता प्रीतम से क्या अदावत है. वैसे उन्होंने एक बड़ा लचर सा कारण दिया है जाहिर है यह मुख्य कारण नहीं है. उन्होंने कहा है कि मैंने उसके उपन्यास 'पिंजर' का इंग्लिश अनुवाद किया पर इसका वह कहीं जिक्र नहीं करती है. उसने साहिर से अपने प्रेम का बखान किया है पर इमरोज से प्रेम की बात नहीं कही. एक साथ इतने सारे आरोप और वह भी शोक सन्देश के नाम पर.

अमृता जब अमृतसर टेलीविजन के लिए काम करती थीं उन्होंने वहाँ के एक साहित्यकार मोहन सिंह का इंटरव्यू लिया पर उस आदमी ने जिस तरह से एवार्ड और सम्मानपत्र मिलने की बात की उससे लगा कि एवार्ड्स और सम्मान पत्रों के एवज में इंसान बहुत छोटा हो गया है. अमृता को सदैव यह एहसास था कि मोहन सिंह एक सरल साधारण-सा आदमी है, सिर्फ कमजोर, पर उस दिन उन्हें लगा कि वह बहुत छोटा है. और एक शायर के इस ओछेपन से उन्हें बेहद तकलीफ हुई उन्होंने अपनी डायरी में लिखा, 'यह साहित्यिक दुनिया का एक और उदास दिन था'. इसी इंटरव्यू का जिक्र करते हुए अपनी पत्रिका 'नागमणि' के अपने संपादकीय में उन्होंने कुछ सफे लिखे जिसकी खूब चर्चा हुई और लोग खुल कर मोहन सिंह की गैर जिम्मेदारियों की बात करने लगे. वे इसे लिख कर खुश नहीं थीं उन्होंने इसे उदासी और निराशा के साथ लिखा था. यह शायर जाती बैठकों में बराबर बड़े निम्न स्तर की बातें करता था, पर अब उसने लेखों में भी अपना निम्न रूप दिखाना शुरु कर दिया था. अमृता ने उसके खिलाफ एक बड़ा सख्त मैटर लिखा. मैटर कम्पोज हो गया था पर इसी बीच मोहन सिंह की मौत की खबर आ गई. अमृता ने अपना संपादकीय रोक लिया. उन्हें लगा अब उसकी मौत के बाद उससे मुखातिब हो कर यह बात कहने का वक्त नहीं. पर वह आसपास के लोगों को देख कर हैरान थी. कोई मोहन सिंह की कविता के विषय में लेख तैयार कर रहा था, कोई भाषण, कोई अपनी पत्रिका में उस पर विशेषांक निकाल रहा था. वैसे सब उसकी बुराई कर रहे थे. कोई मोहन सिंह की मौत पर रोया नहीं. यह शख्स 'मोहब्बत के पाक चश्मों की बात जो लोग गन्दी नालियों की तरह करते हैं उनमें से एक था'. पर उसके मरने पर अमृता ने अपना लिखा कटु आलेख छपने से रोक लिया. और एक खुशवंत सिह हैं ओबीचरी में लिखने के लिए उन्हें ऐसी बातें ही मिलीं. शराब और शबाब पर लिखना महान लेखन हो सकता है पर प्रेम और बँटवारे के दर्द पर लिखना कुछ नहीं यह बात गले नहीं उतरती है.

अगर डिग्री बटोरना ही पढ़ने-लिखने, ज्ञान की निशानी है तब हम नानक, दादू, कबीर को कहाँ रखें? हाँ अमृता किसी पब्लिक स्कूल में नहीं पढ़ीं थीं पर वे अनपढ़ थीं यह कहना अक्ल का दिवालियापन है. हो सकता है वे अखबार न पढ़ती हों. क्या छपता है अखबारों में वही लूटमार, कत्ल, बलात्कार, घूसखोरी. अभी किसी ने पूछा भी है भला हम मीडिया को चौथा स्तम्भ क्यों माने? पर वे बेखबर नहीं थीं, रेडियो सुनतीं थीं, टेलीविजन बराबर देखतीं थीं, यह उनकी डायरी में दर्ज है. रही पढ़ने की बात तो उसका हवाला भी उन्हीं की डायरी के माध्यम से. अमृता की 1977 से 1984 तक की डायरी इमरोज ने प्रकाशित करवाई है और यह राजपाल से छपी है. वे न केवल किताबें पढ़तीं थीं बल्कि उस पर चिंतन-मनन भी करतीं थीं और जब-तब इमरोज से उन किताबों में पढ़े हुए पर चर्चा भी करतीं थीं. एक बार जब वे एंथनी क्विन की आत्मकथा 'द ओरिजिनल सिन' पढ़ रहीं थीं, इमरोज और उनमें मूल गुनाह और गुनाह पर काफी बातें हुईं वे अपने विषय में कहती हैं कि उन्होंने एक गुनाह किया था 'सिन ऑफ इग्नोरेंस' का. इस एक गुनाह, अज्ञान के गुनाह की उन्होंने खूब सजा भुगती और खूब दर्द भुगते. और जब उन्होंने कॉलिन विल्सन की एक किताब पढ़ी तो उसमें भी लिखा था, 'द चर्च मीन्स बाई ओरिजनल सिन: वी यू एंड आई आर इंफिनिटली स्ट्रॉगर दैन वी एवर रियलाइज'.

हनाह अरैंदत ने बर्तोल ब्रेख्त के बारे में लिखा कि एक शायर के साथ सबसे बड़ा दु:खांत यह होता है कि वह जीते जी शायर न रहे यही ब्रेख्त के साथ हुआ. वह अपने आखिरी बरसों में कुछ अच्छा न लिख सका. अमृता कहतीं हैं शायरों के बहुत गुनाह माफ होते हैं पर सब नहीं. और ब्रेख्त का गुनाह था कि उसने स्तालिन की स्तुति गीत गाए थे, और व्यक्ति पूजा को कला की रूह कभी माफ नहीं करती है. अमृता के अनुसार मोहन सिंह भी कभी चढती सबेर का शायर था पर जब उसने इनामों के लिए शायरी करनी शुरु कर दी तो शायरी उससे दूर छिटक गई. अमृता अंत तक बेहतर शायरी करतीं रहीं.

अमृता प्रीतम को सपने खूब आते थे करीब-करीब रोज और उन्होंने शायरों तथा लेखकों के सपनों को इकट्ठा करके एक किताब भी तैयार की. वे सपनों के विश्लेषण करने में रूचि लेती थीं इसीलिए फ्रायड और युंग को भी उन्होंने काफी पढ़ा था. फ्रायड और युंग के सिद्धांतों के बुनियादी फर्क उन्हें पता थे. उन्हें पता था फ्रायड सपनों को एक निश्चित थ्योरी में बाँधता है पर युंग नहीं. युंग कहता है जो ख्याल उसके चेतन मन के साथ धीरे धीरे सपनों के आसपास जुड जाते हैं उनमें से ही वह सपनों के अर्थ पहचानता है. यह अमृता ने युंग की किताबें 'मैमॉयर्ज' तथा 'ड्रीम्ज एंड रिफलेक्शन' पढ़कर जाना था.

एक समय ऐसा था जब ऐन रेन्ड के उपन्यासों की धूम थी. पाठक पागल थे उसके पीछे. वह नौजवानों की मसीहा बनी हुई थी, लोग उससे प्रेरणा पाते थे. आर्किटेक्ट और मैनेजमेंट के छात्र आज भी उसे पूजते हैं. यही ऐन रैंड अमृता की पसन्दीदा लेखिका हैं. पढ़ने-लिखने वाले लोगों को जिन्हें पुस्तकों से प्यार होता है, उन्हें लगता है, वे चाहते हैं कि जब वे कोई अच्छी चीजें पढ़ते हैं यह औरों को भी पढ़ना चाहिए. इसका आनन्द उनके परिचितों को भी मिलना चाहिए. ऐन रैंड के 'एटलस श्रग्ड' और 'फाउन्टेन हेड' को अमृता इतना पसन्द करती थीं उनसे इतनी प्रभावित थीं कि बहुत बार इन्हें खरीदा और दोस्तों को बाँटा. जिन्दगी की कई मुश्किल घड़ियों में उन्हें ऐन रेन्ड से ताकत मिली. इंसान-इंसान में जो फर्क होता है, जो फर्क हो सकता है वह उन्होंने इस लेखिका से ही सीखा. वे तहे दिल से उसका शुक्रिया अदा करना चाहतीं हैं पर जिसे कभी देखा न हो, जिससे आप कभी मिले न हों, उसे भला आप कैसे शुक्रिया अदा करेंगे? लेकिन बिना मिले, बिना देखे भी यदि आप के मन आभार है तो आप कोई न कोई तरीका अख्तियार कर लेते हैं यही वे करतीं हैं और वे ऐन रेन्ड के एक किरदार को दूसरे किरदार के कहे हुए शब्दों को मन-ही-मन दोहरातीं हैं, 'आई थैंक यू फॉर ह्वाट यू आर' और अपने ढंग से अपनी प्रिय लेखिका को धन्यवाद देतीं हैं.

बहुत से भारतीय पाठकों की तरह सबसे पहले उनके हृदय में शरत चंद्र ने जगह बनाई. अमृता ने दुनिया भर के लेखक पढ़े. जब वे अन्य लोगों की कृतियाँ पढ़ती तो लगता वे लेखक और उनकी रचनाएँ अमृता से बात कर रहीं हों. रोम्या रोलाँ, इवंग स्टोन, खलील जिब्रान, चेखव, डी. एच. लारेंस, कामू, काफ्का, समरसेट मॉम की किताबें, उनके अक्षर सब अमृता से दोस्तों की तरह बातें करते थे. इसके बाद अगर कोई कहे कि वे पढ़तीं नहीं थीं तो क्या कहा जाए. हावर्ड फास्ट का 'स्पार्टेकस' पढ़ कर उनके रगों का लहू गर्म हो गया था, माथे में यथार्थ के लिए एक तडफ पैदा हो गई थी.

टॉल्सटॉय का 'वार एंड पीस', 'अन्ना केरेनीना' अमृता की रग-रग में समाए हुए थे. उनके मन में टॉल्सटॉय के प्रति बहुत इज्जत थी, बहुत प्यार था और यही इज्जत और प्यार उन्हें 1966 में उसके घर खींच ले गया. वे इतनी संवेदनशील थीं कि जब वे टॉल्सटॉय के कमरे में गई तो उन्हें एहसास हुआ कि उसकी कमीज ने उन्हें छुआ और स्वयं लेखक उनके सामने खड़ा है. कितना रोमांचक क्षण और अनुभव रहा होगा. वे उसकी कब्र से एक पत्ता उठा लाई जो उन्होंने अपनी डायरी में रखा हुआ था. मात्र साहित्य में ही उनकी रूचि न थी वे अन्य कलाओं में भी दिलचस्पी लेतीं थीं, अन्य कलाओं के बारे में भी बराबर पढ़ती थीं. इमरोज के साथ ने उन्हें अवश्य ही चित्रकला तथा अन्य कलाओं की ओर आकर्षित किया होगा. वे चित्रकला के विषय में बराबर पढ़ती थीं. उन्होंने के. सी. आर्यन की किताब 'पंजाब: चित्रकला के सौ साल' पढ़ी थी और उसमें वर्णित हुनर में मजहब की दखल अन्दाजी के भयानक हवालों से मर्माहत थीं, इसका जिक्र उन्होंने अपनी डायरी में किया है.

वे जो किताब पढ़ती उसकी पंक्तियाँ, उसके भाव विचार उन्हें काफी दिन तक हॉन्ट करते, कोई-कोई पंक्ति मन को छू जाती, जेहन में बस जाती और वे इन सबको अपनी डायरी में उतार लेतीं. जब उन्होंने यूनानी कवि और उपन्यासकार निकस कजनजाकिस की एक किताब पढ़ी तो उसकी एक सतर उनके मन मं अंकित हो गई और उसे उन्होंने अपनी डायरी में लिख लिया ‘Create an idealised image of yourself and try to resemble it’ अपनी एक आदर्श मूत बनाओ और उसके समान होने की कोशिश करो, उसे अमल में उतार लो. और यह सतर उनकी जिन्दगी का मकसद बन गया. इसको वे अपने गुरु मंत्र के रूप में मानती थीं. इसी तरह अनन्तमूत की किताब 'संस्कार' और बिमल मित्र की कहानी 'घरन्ती' पढ़ी और इनसे भी काफी कुछ सीखा. वे खूब पढ़ती और एक बार उनके मन में विचार आया क्यों न उन कहानियों की एक फाइल बनाई जाए जिन कहानियों ने उन्हें छू लिया और बाद में उसे वे एक किताब का रूप देना चाहती थीं. काम शुरु भी किया कुछ कहानियाँ थीं होटल का कमरा (लिविस निकोस), गदल (रांगेय राघव), आखिरी फैसला (कारेल चापेक), सीढियाँ (खरिस्तो समरनैस्की), प्रेतनी (प्रबोध कुमार सान्याल), खोल दो (सादत हसन मंटो), इतने अच्छे दिन (कमलेश्वर) आदि पर न तो फाइल पूरी बन सकी न ही किताब. इतना पढ़ने वाला भला दूसरों का लिखा कितना लिख-लिख कर रखेगा, जबकि पास में अपना भी इतना सारा लिखने को हो, उसे अपना भी इतना कुछ लिखना हो.

एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, ''जन्मों की बात मैं नहीं जानती, लेकिन कोई दूसरा जन्म हो तो... इस जन्म में कई बार लगा कि औरत होना गुनाह है... लेकिन यही गुनाह मैं फिर से करना चाहूँगी, एक शर्त के साथ, कि खुदा को अगले जन्म में भी, मेरे हाथ में कलम देनी होगी... ऐसे व्यक्ति के विषय में कैसे कहा जा सकता है कि उसने जीवन भर सिर्फ लिया-ही-लिया किसी को कुछ दिया नहीं''.

अमृता की दृष्टि सदैव विश्व साहित्य खासकर विश्व में रची जा रही कविताओं पर रहती थी. वे पंजाबी की कवयित्री, लेखिका थीं पर अन्य भाषाओं, अन्य मुल्कों में क्या रचा जा रहा है इसकी खबर रखती थीं. बल्गारिया जाने का उन्हें मौका मिला बल्गारियन भाषा में उनके साहित्य का अनुवाद हुआ. वे स्वयं बल्गारियन साहित्य की जानकारी रखतीं थीं, तभी 2 मई 1983 को भारतीय भाषा परिषद, कलकत्ता में दिए अपने भाषण में वे बल्गारिया की एक शायरा ऐलिसावेता बागरियाना के अल्फाज कोट करतीं हैं. इसी भाषण में उन्होंने एक पाकिस्तानी शायरा शगुफ्ता, डोगरी की शायरा पद्मा सचदेव, उर्दू की इस्मत चुगताई, इटली की शायरा ऐनेतोलिया पोजी, स्वीडिश शायरा कारिन बोये, पॉलिश शायरा कादिया मोलोतोवस्की जिसे फासिस्टों के खिलाफ लिखने के कारण देश से निकाल दिया गया था का जिक्र किया है. क्या बिना पढ़े रूसी, जर्मन और फ्रांसिसी लेखकों कवियों की बात की जा सकती है. उन्हें मालूम था कि जापान का मशहूर उपन्यास 'गेंजी की कहानी' एक औरत ने लिखा था जिसका असली नाम आज भी कोई नहीं जानता. वे हब्बा खातून, लल्ल आरिफा, सैफो, जॉर्ज सैंड, एमिली डिकंसन और न मालूम कितनी रचनाकारों की जिंदगी के दु:खों-कष्टों से वाकिफ थीं. अमृता पंजाब की लोक संस्कृति, लोक गीतों, लोक कथाओं से बड़े गहरे जुडी थीं वे वारिस शाह बुल्ले शाह, सुल्तान बाहू में रची-बसीं थीं. साथ ही उन्हें वेद पुराण, महाभारत, रामायण का भी खासा ज्ञान था. उन्होंने न केवल पढ़ा बल्कि चिंतन-मनन किया. उनकी अपनी स्थापना थी कि अर्ध नारीश्वर का फलसफा इस बात की तक्सीद है कि दुनिया का पहला शायर सिर्फ मर्द नहीं था, औरत भी थी. अपने 'कड़ी धूप के सफर' में उन्होंने भारतीय प्राचीन साहित्य से रचनाकारों की एक लम्बी फेरहिस्त दी है.

किताबों से अमृता को कितना प्यार था यह जानना हो तो 24 फरवरी 1983 में नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से चंडीगढ मे लगे बुक फेयर के मौके पर दिए उनके उद्-घाटन भाषण को पढ़ना होगा. वे हंगरी का हवाला देते हुए कहतीं हैं कि वहाँ की एक कहावत है कि जब कोई दुश्मन दूर धरती के किसी टुकड़े पर कदम रखता है, तो सबसे पहले किताबों की अलमारियाँ काँपतीं हैं. लेकिन जब कोई दोस्त शायर या अदीब, दूर धरती के किसी टुकड़े पर कदम रखता है तो सबसे पहले किताबों की अलमारियाँ बड़ी हो जातीं हैं. इसी भाषण में वे किताबों का पूरा इतिहास भी प्रस्तुत करतीं हैं. और अमृता ने किताबों की अलमारियों में जम कर इजाफा किया. कौन कहेगा अमृता प्रीतम ने केवल लिया-ही-लिया किसी को कभी कुछ दिया नहीं. एक शायरा से, एक अदीब से, एक लेखिका से क्या देने की उम्मीद करनी चाहिए. 'कादम्बरी' और 'पिंजर' जैसी फिल्में अमृता प्रीतम की कथाओं पर आधारित फिल्में हैं. उन्होंने पंजाबी साहित्य को तकरीबन 75 पुस्तकें दीं जिससे पंजाबी के साथ-साथ भारतीय और विश्व साहित्य समृद्ध हुआ क्योंकि साहित्य किसी एक जाति, किसी एक कौम की बपौती नहीं होता है, वह सम्पूर्ण मनुष्यता की थाती होता है.

'1947 में देश का विभाजन हुआ, सामाजिक राजनीतिक और धामक मूल्य काँच के बरतनों की तरह टूट गए और उनकी किरचें लोगों के पैरों में बिछी हुई थीं. यूरोप में महायुद्धों और महाविनाश पर काफी कुछ लिखा गया और अब भी लिखा जा रहा है, उसकी तुलना में हिन्दी में विभाजन पर कुछ खास नहीं लिखा गया. भला क्यों? शायद इसका कारण हमारा भाग्यवाद के दर्शन पर विश्वास है जो हमें बड़े-से-बड़े दारुण कष्ट को सह कर भी चुप रहना सिखाता है. या शायद यह विनाश इतना भयंकर था कि हमारा मन इसे याद नहीं करना चाहता, 'सलेक्टिव एम्नेशिया' के कारण निजी और सामूहिक स्मृति से हम इसे मिटा डालना चाहते हैं. मनोविज्ञान का एक नियम है आदमी अपनी तीव्रतम, कष्टदायी, दु:खद अनुभूतियों को भुला देना चाहता है, जिजीविषा के लिए यह आवश्यक भी है. यशपाल ने भी तुरंत नहीं बल्कि आजादी के करीब दस वर्ष बाद झूठा-सच लिखा.

हिन्दी में जो लिखा भी गया वह पश्चिमी पाकिस्तान से ही सम्बंधित रहा. हम अक्सर भूल जाते हैं कि बंटवारा पूर्व में भी हुआ था. हाँ, बंगला में काफी कुछ उपलब्ध है. अभी हाल में जशोधरा बाग्ची एंव शुभोरंजन दासगुप्ता की एक पुस्तक इंग्लिश में आई है, द ट्रॉमा एंड द ट्रायम्फ: जेंडर एंड पार्टीशन इन ईस्टर्न इंडिया. इसमें ॠत्विक घटक की फिल्म मेघे ढाका तारा, सेलिना होसैन केकांटा तारे प्रजापति आदि के माध्यम से पूर्वी पाकिस्तानी की उन शरणार्थी औरतों की सच्ची कहानियों को सामने लाने का प्रयास किया है जो संघर्षपूर्वक गरीबी और भूख से अपने परिवार की रक्षा करती हैं. तसलीमा नसरीन ने जब विभाजन के त्रासद स्वर को शब्दों में बांधा तो उसे जलावतन होना पड़ा.

नारी आन्दोलन, दलित विमर्श आदि ने पुन: इस विषय को उभारा है. और शायद दु:खद स्मृतियों से निपटने का यही सबसे अच्छा तरीका भी है. अभी भी जो कडुआहट है उससे छूटने का शायद एक अच्छा उपाय होगा इस पर ज्यादा-से-ज्यादा कलम चलाना. जापान में जिन स्त्रियों का उपयोग युद्ध के दौरान किया गया था, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, खुलापन तथा नारी स्वातंत्र्य के तहत उन स्त्रियों के अनुभव सुने और एकत्र किए जा रहे हैं. योरोप के महाविनाश से बचे हुए लोगों से उनकी आपबीती जानकर उसे लिपिबद्ध (राइटिंग एंड रिराइटिंग द हॉलोकास्ट नैरेटिव एंड द कांसिक्वैसेंस ऑफ इंटप्रटेशन: जेम्स इयंग) किया जा रहा है. उर्वशी बुटालिया ने भी पहले बी.बी.सी के चेनल 4 के लिए, फिर अपने लिए इसी तरह के साक्षात्कार इकट्ठे कर उन्हें द अदर साइड ऑफ साइलेंस: व्यॉयजेज फ्रॉम द पार्टीशन ऑफ इंडिया, लिखी जिसका हिन्दी अनुवाद राजीव कुमार श्रीवास्तव ने किया है जो खामोशी के उस पार नाम से वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है.

लास्ट ट्रेन टू पाकिस्तान खुशवंत सिंह ने इंग्लिश में लिखी जिस पर इसी नाम से फिल्म बनी. पंजाब की मस्ती की पृष्ठभूमि और बंटवारे का दर्द के साथ इस पर बनी फिल्म तत्कालीन प्रशासनिक, सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन का सुन्दर चित्रण करती है. मुटियार और गबरू जवान का प्रेम धीरे-धीरे विभाजन की त्रासदी के दृश्य दिखाता है. गबरू जवान और उसके साथी ट्रेन उड़ाने का प्रयास कर रहे हैं पर जब पता चलता है कि मुटियार इसी ट्रेन से पाकिस्तान जा रही है तो जवान अपनी जान पर खेल कर सवारी गाड़ी को बचाता है. अंत में फिल्म गम्भीरता की ओर मुड़ जाती है.

ज्योतिर्मयी देवी ने द रिवर चनंग: अ पाटशन नॉवेल और सरोज कासवानी ने ऑर्फनस ऑफ द स्टोर्म लिखा. 1973 में एम. एस. सथ्यु एवं बलराज साहनी ने गरम हवा फिल्म बनाई. और भीष्म साहनी ने 1974 में तमस रचा, पर उसे प्रसिद्धि मिली जब वह टी.वी. सीरियल बना और कठमुल्लाओं ने उसे लेकर उत्पात प्रारम्भ किया. हालाँकि गुरुदत्त ने विभाजन पर उपन्यास लिखे, पर उन्हें साहित्य की श्रेणी में रखने को लेकर मतभेद है. आचार्य चतुर्सेन शास्त्री के धर्मपुत्र पर फिल्म बनी. कुछ लेखकों ने साम्प्रदायिकता की पृष्ठभूमि पर लिखा, पर विस्तार या गहराई में न गए. भगवती चरण वर्मा, भैरव प्रसाद गुप्त, फणीश्वर नाथ 'रेणु' ने इस विषय को लिया मगर ऊपर-ऊपर. उर्दू और इंग्लिश में इस दर्दनाक हादसे पर काफी कुछ रचा गया, खासकर स्वतंत्रता की पचासवीं वर्षगांठ पर. बाप्सी सिद्धवा विभाजन काल में मात्र सात-आठ साल की बच्ची थी. ईसाई, बौद्धों, जैनियों की तरह ही पारसी भी विभाजन से सीधे प्रभावित नहीं थे. परंतु इस पारसी लड़की ने अपने आस-पास के वातावरण और लोगों के जीवन में होते परिवर्तन को बड़ी शिद्दत से अनुभव किया और आगे चलकर इन्हीं अनुभवों ने उसे साहित्य सृजन की सामग्री प्रदान की. द क्रो ईटर्स और क्रैकिंग इंडिया उसी का परिणाम है, क्रैकिंग इंडिया के एक हिस्से आइस कैंडी मैन पर दीपा मेहता ने अर्थ-1947 बनाई. जे. पी. दत्ता रिफ्यूजी को विभाजन और उसकी त्रासदी से जुडी एक यादगार फिल्म बना सकते थे पर वो एक सतही बॉलीवुड फिल्म बन कर रह गई. विभाजन पर कई फिल्में बनी. धर्मपुत्र, गर्म हवा, गदर एक प्रेम कथा, रिफ्यूजी, ट्रेन टू पाकिस्तान, और अभी हाल में बनी है पिंजर. जिसका मूल विषय इस थीम पर बनी बाकी की फिल्मों से काफी हट कर है, गम्भीर है. इसकी पृष्ठभूमि भी विभाजन है पर ट्रीटमेंट अलग है. यह अमृता प्रीतम के उपन्यास से कुछ छूट लेती है अलग माध्यम होने के कारण, पर निर्माता निर्देशक ने उपन्यास की आत्मा सुरक्षित रखी है.

गुलजार, मंटो, कृष्णा सोबती और अमृता प्रीतम ने भी विभाजन पर लिखा. अमृता प्रीतम ने पंजाबी में विभाजन पर खूब लिखा जो अनुवादित हो कर हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में उपलब्ध है. उन्होंने यह सब बहुत पहले लिखा. उनकी रचनाओं, कहानियों, उपन्यास में विभाजन और उस समय हुई हिंसा खासकर स्त्रियों के साथ हुए जघन्य हादसे उभर कर आए हैं. देश विभाजन का दर्द अमृता की कहानियों उपन्यासों और कविताओं में बड़ी शिद्दत के साथ आया है. उन्होंने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में लिखा है, 'मैं औरत थी, चाहे बच्ची सी, और यह खौफ सा विरासत में पाया था कि दुनिया के भयानक जंगल में से मैं अकेली नहीं गुजर सकती'. उनके उपन्यास पिंजर का कथ्य औरत के इसी खौफ की कथा है, औरत के इसी अकेलेपन की कहानी है. यह उन हजारों-लाखों स्त्रियों के दु:ख की कहानी है जो देश के बँटवारे, और सांप्रादयिकता की आग में बिना अपनी किसी खता के अपनों से कट गईं, जिनका जिस्म और रूह लहुलुहान हुआ.

यह उस पूरो की कहानी है जो बिना अपनी किसी खता के रशीद द्वारा उठा ली गई. उठा ली गई क्योंकि पूरो और रशीद के खानदानों में पीढियों से अवादत चली आती थी. पूरो के ताऊ ने रशीद की बुआ को उठा कर तीन दिन अपने घर रख लिया था. और न चाहते हुए भी चाचा-ताया के दवाब में आकर रशीद पूरो को, जिसकी सगाई रामचन्दर से हो चुकी है, उठा लाता है. और इसी बीच देश का बँटवारा हो जाता है. पूरो जो अब हमीदा है रशीद के बच्चे की माँ बन चुकी है. स्त्री का मन पिघलते देर नहीं लगती है, वह धीरे-धीरे अपने नए घर की दीवारों से परच जाती है. रशीद की बीमारी पूरो को उसके करीब ले आती है. वह दिन रात लग कर उसकी देखभाल करती है आखिरकार अब वह उसका पति और उसके बच्चे का पिता है. रशीद जिसने कभी उसके संग जोर जबरदस्ती न की थी.

पूरो के कहे पर रशीद पूरो की भाभी और रामचन्दर की बहन लाजो को विजातियों के घर से निकाल कर अपने घर में रखता है. वह रामचन्दर से भी मिलता है और सिपाही जब अपहृत औरतों की अदला-बदली कर रहें हैं पूरो और रशीद लाजो को पूरो के भाई और रामचन्दर को सौंप देते हैं. मौका अच्छा था पूरो सोचती है, 'जो मैं इस समय कह दूँ मैं एक हिन्दू स्त्री हूँ तो मुझे अवश्य ही इन सबके साथ लारी में बिठा कर ले जाएँगे. मैं भी लौट सकती हूँ लाजो की भाँति... देश की हजारों लड़कियों की भाँति... ' पर वह रशीद के पास जा खड़ी होती है और भाई से कहती है, 'लाजो अपने घर लौट रही है, समझ लेना कि इसी में पूरो भी गई. मेरे लिए तो अब यही जगह रह गई है'.

उपन्यास के अंत में पूरो एक व्यक्ति से समष्टि में परिवर्तित हो जाती है. वह मन ही मन सोचती है, 'चाहे कोई लड़की हिन्दू हो या मुसलमान, जो भी लड़की लौट कर अपने ठिकाने पहुँचती है, समझो कि उसी के साथ पूरो की आत्मा भी ठिकाने पहुँच गई'. पूरो एक ऐसा स्त्री चरित्र है जो उदात्त है जिसमें स्त्रियोचित गुण कूट-कूट कर भरे हुए हैं. वह कम्मो की अपनी बेटी की तरह देखभाल करती है. एक पगली औरत, जिसे न मालूम किसने खराब किया था, के नवजात बच्चे को अपना दूध पिला कर अपने बच्चे के समान पालती है. मुसलमान हिन्दुओं की लड़कियों और हिन्दू मुसलमान की लड़कियों को उठा कर ले जा रहे थे. वह देखती है, दस बारह मनचले नवयुवकों ने एक नंगी जवान लड़की को अपने आगे करके, दोनों हाथों से ढोल ढमाके बजाते हुए ले जा रहें हैं. वह औरत है और औरत का दरद समझती है. इसी बीच उसे गन्ने के खेत में छिपी हुई एक लड़की मिलती है जिसे फौज की कैम्प में रहते हुए नौ रातें अलग-अलग घरों में बितानी पड़ी हैं. पूरो न केवल उसे अपने घर में छिपा कर रखती है वरन रामचन्दर के साथ विनती करके उसे हिन्दुस्तान भी भिजवाती है.

पूरो में एक मासूम लड़की, एक संवेदनशील औरत, एक ममतामयी माँ और सबसे बढ़कर एक मनुष्य के दया धरम, सहानुभूति जैसे गुण हैं, और वह 'एक विचारक की भाँति गम्भीर है'. अमृता ने एक इंटरव्यू के समय कहा कि उनके लिखने का विषय है बेहतर इंसान की कल्पना, इंसान की थिंकिंग की इवॉल्यूशन यही उनकी राइटिंग में परसिस्ट करता है. यही इंसान की सोच का विकास, बेहतर इंसान की कल्पना उनके उपन्यास पिंजर में भी दृष्टिगोचर होता है. इसमें चरित्रों का निरंतर विकास होता जाता है. पूरो की आयु बीस वर्ष से अधिक नहीं थी. उसे जीवन के कुठाराघातों ने बहुत कुछ सिखा दिया था. रशीद, रामचन्दर, यहाँ तक कि पूरो के भाई का भी उत्तरोत्तर चारित्रिक विकास होता है. अमृता स्वयं एक ममतामयी माँ हैं केवल अपने बच्चों की नहीं और उन सारी लड़कियों की भी जो उन्हें सास के रूप में पाने को भी लालायित थीं. हाँ देश-विदेश की कई लड़कियाँ उनके बेटे की बहु बन कर आना चाहती थी ताकि अमृता जैसी सास पा सकें. जब रशीद की रचना हो रही होगी अमृता के तसव्वुर में जरूर कहीं सज्जाद हैदर और साहिर रहे होंगे. साहिर जिनसे अमृता का केवल रुहानी रिश्ता था पर वे चाहती थीं कि उनका बेटा उनके प्रेमी जैसा हो पति जैसा नहीं. इमरोज तो शायद तब तक उनके जीवन में आए नहीं थे. पिंजर के रूप में एक अनमोल कृति दी है अमृता ने साहित्य को.

बिना कुछ दिये ही अमृता प्रीतम को साहित्य अकादमी, पद्मश्री, भारतीय ज्ञानपीठ, वाप्तसारोव बुल्गारिया, फ्रांस सरकार आदि से ढेरों पुरस्कार और सम्मान यूँ ही नहीं प्राप्त हुए. बिना किसी कारण के दिल्ली, पंजाब तथा जबलपुर के विश्वविद्यालयों ने उन्हें डी.लिट. की उपाधियाँ नहीं प्रदान कर दीं. रॉबर्ट फ्रॉस्ट भी विद्यालयी शिक्षा से वंचित था पर उसकी रचनात्मक देन के लिए उसे विभिन्न शिक्षा संस्थानों से इतनी उपाधियाँ प्राप्त हुई कि इन अवसरों पर मिली टोपियों को जोड कर उसने एक रजाई बना ली थी. अमृता ने संसार को अवश्य ही कुछ ऐसा दिया है कि वे सदैव याद की जाएँगी. उनके साहित्य का संसार की 34 भाषाओं में अनूदित हो चुका है और सिलसिला अभी रुका नहीं है. उनके न मालूम कितने पाठक भविष्य में पैदा होने हैं. और उनके चाहने वाले, उनके पाठक, यदि उन्हें प्यार-प्रेम, आदर-सम्मान देते हैं तो यह अमृता का हक बनता है.

उन्होंने दुनियाँ को दिये हैं अपने विचार, अपने शब्द, अपनी भावनाएँ, अपनी संवेदनाएँ. इसके लिए की है साधना. एक साहित्यकार शब्द साधना से बढ़कर और क्या कर सकता है, और अमृता ने यह भरपूर क्या है. अगर उन्होंने किसी को कुछ दिया नहीं तो भला टेलीविजन सेंटर के हरजीत को क्या पड़ी थी कि वह फोन करके कहता, ''मैं एक लड़की के साथ ब्याह करना चाहता हूँ, ब्याह वहीं आपके पास आकर करना है''. उन्हें आश्चर्य होता है कि मेरा प्यार किसी के लिए ब्याह की रस्म भी बन सकता है. जब भी कोई समाज की मान्यताओं के खिलाफ जा कर संबंध बनाना चाहता है, उससे उसके रिश्तेदार तो आँख फेर ही लेते हैं अक्सर उससे उसके यार दोस्त भी मुँह फेर लेते हैं. पर ऐसे कठिन समय में ही अपने-परायों की सच्ची पहचान होती है. अमृता ने हरजीत की शादी अपने घर में करवाई समाज की परवाह न करते हुए. उन्होंने और इमरोज ने पंजाबी की एक और चचत रचनाकार दलीप टिवाडा की शादी भी अपने घर में कराई. उन्होंने अवश्य ही कुछ अनमोल दिया है तभी एक पाठक ने उनके जन्मदिन पर तार भेजा, ''वी विश यू ऐज मच प्लेजर ऑन युअर बर्थडे ऐज वी डिराइव फ्रॉम युअर वर्क्स''.

यह सही है कि उन्होंने धामक तुकबन्दियों से अपनी रचना यात्रा प्रारम्भ हुई, पर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वे अपनी इस लम्बी रचनात्मक यात्रा में कहाँ पहुँची, कितनी मंजिलें प्राप्त की, कितने मुकाम तय किए. क्या स्थिति थी पंजाबी भाषा की अमृता से पहले? पंजाबी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने में उनका दाय अप्रतिम है. और इस तरह उन्होंने भारतीय साहित्य को विश्व में प्रसारित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है. क्या यह किसी लेखक की मानवता को दी गई सौगात नहीं है?

माँ का साया कच्ची उम्र में मात्र ग्यारह बरस की उम्र में सिर से उठ गया. पिता करतार सिंह मार्गदर्शक बने पर विद्रोह भी उन्हीं से किया. पिता से इतना ज्यादा लगाव था कि बाद में भी उन्हें सपने में अक्सर देखा करतीं.

अमृता प्रीतम जीयीं और खूब जम कर जीयीं अपनी शर्तों पर जीयीं. यदि विभाजन की किरचें उनके पैरों और माथे में चुभीं तो प्रेम भी उन्हें भरपूर मिला. सज्जाद हैदर और उनके खत अमृता के अकेलेपन के साथी थे.

उन्हें साहिर का प्रेम मिला जो साहिर की माँ के चलते परवान न चढ सका. एक औरत ही दूसरी औरत को न समझ सकी दोनों के नजरिए में इतना फासला था कि किसी तरह की समझ की कोई गुंजाइश नहीं थी और साहिर को अमृता के साथ-साथ अपनी माँ से बहुत लगाव था मदर फिक्सेसन की हद तक. वे हद पार ना कर सके. पर इमरोज हर हद पार कर गए. दोनों में बेपनाह मुहब्बत हुई. इमरोज-अमृता की प्रीत की जैसी एक और मिसाल साहित्य जगत में पहले से कायम है सिमोन और सार्त्र. अमृता को अपने पाठकों का भरपूर प्यार और आदर मिला.

मुल्ला, पादरी, पुजारी समझते हैं धर्म का ठेका केवल उन्होंने ले रखा है. इसीलिए जब कोई लेखक धर्म पर कुछ लिखता है तो इन लोगों को बड़ी परेशानी होती है और ये तुरंत फतवा जारी करने में लग जाते हैं फिर वो चाहे सल्मान रुश्दी हो या तस्लीमा नसरीन या अमृता प्रीतम. 'रसीदी टिकट' की पंक्तियों से भी कुछ लोगों को सिख धर्म की तौहीन होती लगी. कुछ लोगों ने इसे जब्त करने के लिए एक फाइल तैयार कर ली. पर इसी पुस्तक के उन्हीं आपत्तिजनक हिस्सों को बुल्गेरिया के साहित्यकारों ने पसन्द किया और उसका अपनी भाषा में अनुवाद किया और अमृता को पुरस्कृत भी किया.

उनके एक पाठक ने उनकी आत्मकथा 'रसीदी टिकट' पढ़ने के बाद कहा कि 'यदि कभी संयोग से अमृता जी का दीदार हो जाए तो मेरा आधा हज यहीं हो जाए'. अमृता ने अपनी आत्मकथा का नाम रसीदी टिकट रखा, इसमें खुशवंत सिह का हाथ था. एक दिन खुशवंत सिंह ने बातों-बातों में कहा, ''तेरी जीवनी का क्या है, बस एक आध हादसा. लिखने लगो तो रसीदी टिकट की पीठ पर लिखी जाए''. अमृता कहती हैं, ''खुशवंत सिंह ने रसीदी टिकट शायद इसलिए कहा कि बाकी टिकटों का साइज बदलता रहता है पर रसीदी टिकट का वही छोटा-सा रहता है.” आगे वे कहती हैं ठीक ही कहा था, जो कुछ घटा, मन की तहों में घटा, और वह सब नज्मों और नॉवलों के हवाले हो गया. फिर बाकी क्या रहा? अमृता ने जो पाया सब कलम की मार्फत दे दिया कुछ बचा कर न रखा. नज्मों और नॉविलों के लेखेजोखे की कच्ची रसीद को पक्की रसीद करने के लिए उन्होंने 'रसीदी टिकट' लिखी. जिसे लेकर तूफान खडा हो गया. उनके समकालीनों ने उसे प्रतिबंधित कराने की हरचन्द कोशिशें कीं. रसीदी टिकट में से अर्थों के अनर्थ निकाले गए. परंतु विरोधियों के साथ ऐसे लोग भी थे जिन्हें लगा कि यदि रसीदी टिकट का कत्ल हो गया तो इससे अमृता का तो खैर क्या बिगड़ जाएगा, पर पंजाब के ही नहीं, सारी दुनिया भर के बुद्धिजीवियों और कलाकारों के लिए मरने जैसी बात होगी. और इस तरह के लोगों ने अपनी कलम अमृता के लिए समर्पित कर दी थी. खुशवंत सिंह ने भी इस कठिन दौर में उनका संग दिया था. उन्होंने कहा था, ''मैं तुम्हें अकेली किसी कचहरी की पेशी में नहीं जाने दूँगा. तुम्हारे साथ रहूँगा. अगर तुम्हें किसे ने गोली मारनी है तो साथ में मुझे भी मार दें...” जरूर खुशवंत सिंह के मन में अमृता के लिए प्यार और सम्मान होगा तभी वे उनके संग गोली खाने के लिए तैयार हुए.

उन्होंने दिया और भरपूर दिया अपने समकालीन रचनाकारों को सम्मान और आदर. मूर्तिकार सोभासिंह, लेखक प्रभाकर माचवे और जैनेंद्र, डा. लाल, फिल्मकार बासु भट्टाचार्य, लोक नाटकों की संरक्षिता नोरा रिचर्ड, दिल्ली के डिप्टी कमिश्नर, जिन्हें साहित्य, कला और लोक संस्कृति तथा गाँव, मिट्टी और किसानों से बेहद लगाव था, महिन्दर सिह रंधावा, राष्ट्रकवि दिनकर, पंजाबी कवि शिव कुमार, पाकिस्तानी शायरा सारा शगुफ्ता, बंगला साहित्यकार और घुमक्कड़ प्रबोध कुमार सान्याल और ना मालूम कितने और कलाकार साहित्यकार उनकी श्रद्धा, आदर और प्रेम के पात्र थे. क्या दूसरों को इज्जत, प्रेम-प्यार, आदर-सम्मान देना, देने की श्रेणी में नहीं आता है? कितने लोग अपने समकालीनों को यह सब दे पाते हैं?

उन्होंने अपना सारा व्यक्तित्व अपनी रचनाओं और अपने प्रेम में पिरो दिया, उंडेल दिया, शायद ही कुछ बचा कर रखा. उनके अनुसार साधना लेखक भी करता है, तपस्वी भी, पर, साधना साधना में अंतर होता है. वे अपने विषय में कहतीं हैं कि मेरी साधना जीवन के किसी रस से इंकार करने के लिए नहीं, सहज मन होने में है. ऐसे सहज मन को मेरा भी आदर और प्रेम भरा नमन.

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(चित्र - साभार द ट्रिब्यून )

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रचनाकार संपर्क –

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- मनोज सिंह

'चित भी मेरा, पट भी मेरा, अड्डा मेरे बाप का` चोरी और सीनाजोरी की इससे बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। देशों में अमेरिका पर यह कहावत पूर्णत: चरितार्थ होती है। अपने मोहल्ले में तो हम भारतीय भी इसमें पीछे नहीं हैं। उपरोक्त कहावत हिंदी में है तो हिंदी प्रदेशों में इसे स्वाभाविक रूप से अधिक प्रासंगिक होना चाहिए। और है भी। उत्तर प्रदेश, बिहार में तो यह आम बात है।

राजनीतिज्ञों का तो इसके भावार्थ पर एकाधिकार शुरू से ही रहा है। चोर जब पुलिस से मिल जाता है तो ताल ठोंककर यह मुहावरा बोलने लगता है। फिल्मों की नायिका निर्माता-निर्देशक से मिलकर नायक को यह झटका दे सकती हैं। आजकल की औरतों के भी मजे हैं मायके में तो धाक पहले से ही थी ससुराल में भी पति के कान खींचकर कब्जा किया जाने लगा है। और अगर कभी पति के लिए प्रेम गीत गाती भी हैं तो बोल यही होते हैं। आदमी भी पीछे कहां रहने वाला, इन चंद शब्दों को बोलने के लिए शराब के दो पैग अंदर और फिर वो शेर की भांति दहाड़ने लगता है। मगर फिर भी, घर पर तो बोल नहीं सकता, उधर चित-पट चाहे जितना मर्जी कर लें अड्डा बीयर बार के मालिक का ही होता है और रही-सही कसर गली का गुंडा पूरी कर देता है।

अड्डा शब्द सुनते ही अवैध-अनैतिक कार्य, विचार और भावनाओं वाले स्थान अपने आप मस्तिष्क से जुड़ने लगते हैं। पता नहीं कहां से यह शब्द आया कि कोई इसे अपना कहने को तैयार नहीं। अंग्रेजी ने इसकी जमकर काट-पीट और सर्जरी करके इसका हुलिया ही बिगाड़ दिया तो हिंदी ने अपने साहित्य के भंडार में इसे जोड़ने से मना कर दिया। अरबी-फारसी ने अन्य की भांति दिल ही दिल पसंद तो किया मगर अपनाने से इंकार कर दिया। इतना सौतेला व्यवहार!! हालत ऐसी कर दी गई कि इसके पास जाना तो सभी चाहते हैं मगर कोठे वाले की औलाद की तरह इसको अपना नाम देने से मना कर देते हैं।

पढ़े-लिखों ने इसको ठेठ गंवार और गुंडे-बदमाशों की जगह बताकर अपने लिये नये नाम ढूंढ़ लिये। पुरानी शराब नये बोतल में। शराब के अड्डे, मयखाना से बार तक पहुंच गये तो नाच-गाने के अड्डों को डिस्को बना दिया गया। वैसे भी अड्डा आम आदमी के लिए है। अत: थोड़ा-थोड़ा कहीं-कहीं बस अड्डा अभी भी चल रहा है। मगर बस स्टैंड जिस रफ्तार से इसे हटा रहा है इससे इसका भविष्य खतरे में है। अंग्रेजी की माया है जो रेलवे ने अपने घर में रेलवे स्टेशन नाम ही रहने दिया। पुराने टैक्सी चालकों के लिए एयरपोर्ट हवाई अड्डा ही रहा, मगर नये लोगों ने शहर के बीचों-बीच बस स्टैंड के बगल में अपने सुरक्षित स्थान को टैक्सी स्टैंड बना दिया। पत्ते और जुए के अड्डे, जुआघर से लेकर क्लब और कैसिनो कहलाने लगे। धर्म के संबंध में भी बड़ी मजेदारी है स्वयं के धर्म के लिए तो पवित्र स्थल और दूसरों के धार्मिक स्थल को धार्मिक गतिविधियों का अड्डा घोषित किया जाने लगा।

अड्डा से इतनी बेरुखी क्यों? सीधी-सी बात है आदमी बदनामी से डरता है। करना तो सब कुछ चाहता है मगर छिपकर। इसीलिए उसने अपने सभी कामों के लिए वैध और नैतिक नाम ढूंढ़ लिये और अड्डे को गलत साबित कर अपनी शब्दावली से हटा दिया। हर शहर में कई तरह के अड्डे अलग-अलग नाम से चल रहे हैं। मुझे तो अड्डा नाम ही पसंद है कम से कम अंदर हो रहे काम की सही जानकारी तो मिल जाती है। अन्यथा मसाज पार्लर, ब्यूटी पार्लर, बिलियर्ड्स कार्नर और सैलून से दिमाग चकरा कर भ्रमित होने लगता है।

सबसे पहला सवाल उठता है अड्डे के स्थान को लेकर। सुनने में थोड़ा मुश्किल लगता है पर जवाब बड़ा आसान है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि किस तरह का अड्डा चाहिए। और उससे पहले बड़ी बात है किसलिये। फिर बारी आती है कि जेब में कितना पैसा है। जब राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक कार्य हों तो शहर के बीचों-बीच अड्डे बनाये जाते हैं। लोगों की भीड़ इकट्ठा करने में आसानी होती है। वैसे बाबाओं के लिए पहाड़, तालाब, नदी का किनारा हो तो ज्यादा चलेगा। लेकिन अनैतिक कार्य हो तो शहर के किसी कोने में, जहां आपको आते-जाते न देखा जा सके। घरवालों से छुपाकर रखना है तो शहर के दूसरे छोर पर या फिर दूसरे शहर में बनाया जाये तो सबसे उपयुक्त है। अवैध काम के लिए भीड़-भाड़ वाली जगह सबसे बेहतर होती है। अवैध और अनैतिक दोनों हो तो फ्लैट या फिर बड़ा बंगला सबसे बढ़िया। बिल्डिंग में घुसने से पहले किसी को अंदाज नहीं कि किस फ्लैट में जा रहा है। बंगले के अंदर पता नहीं क्या हो रहा है। बड़े शहर के फ्लैट के तो मजे ही मजे हैं। छोटे शहर में थोड़ा मुश्किल हो जाती है। युवाओं के लिए सड़क और मार्केट के बीच स्थित अड्डे ज्यादा उपयुक्त और उपयोगी होते हैं। नौजवानों द्वारा तो गर्ल्स कॉलेज या महिला छात्रावास के बाहर किसी भी तरह का अड्डा बना लिया जाता है। वैसे भी जवानी में पैसा और ताकत दोनों होने पर कोई भी अड्डा मुश्किल नहीं। मुसीबत सिर्फ बुड्ढों को आती है।

पुराने जमाने में तो शहर हो या गांव, शराब का अड्डा और जुए का अड्डा अक्सर पास-पास ही होते थे और साथ ही बसंती का अड्डा हो तो इसमें आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं। अधिकांशत: कस्बों के बस अड्डों के आसपास ही इनका ठिकाना होता था अन्यथा इनका पता यहां से जरूर मिल जाया करता था। तांगे वाले और रिक्शेवाले आसानी से ले जाया करते थे। अब जमाना बदल गया है लेकिन फिर भी बचपन हो या जवानी या फिर बुढ़ापा, सभी को कोई न कोई अड्डा चाहिए। घर पर तो आदमी के लिए यह संभव होता नहीं, यहां तो मोहल्ले भर की औरतों का पहले से ही अड्डा होता है। इसीलिए दूसरे उपाय ढूंढने पड़ते हैं। वैसे पान के अड्डे पर सबसे आसानी होती है। सस्ता और टिकाऊ। शहर की सभी ताजा खबरों एवं दूसरे अड्डों की जानकारी के लिए उपयुक्त स्थान। पान-सिगरेट खरीदो या न खरीदो, खड़े-खड़े रेडियो-स्टीरियो पर गाने सुनते हुए सड़क पर आती-जाती सुंदरता का नैनसुख लिया जा सकता है। मगर जबसे टेलीविजन पान की दुकानों पर लगाए जाने लगे हैं थोड़ी मुश्किल हो रही है। टीवी के स्क्रीन पर परोसे जा रहे ग्लैमर को देखकर आंखें खराब करें या फिर रोड पर चले रहे लाइव शो को देखकर दिल खराब करें। दिमाग दोनों ही सूरत में खराब होता है। मगर अब तो पान और पान के अड्डे दोनों नदारद हैं।

उम्र बढ़ती जाती है अड्डों के रूप-रंग और नाम बदलते रहते हैं। अड्डा तो फिर भी चाहिए, कवि को कविता सुनाने का अड्डा, पत्रकार को खबरें और सनसनी ढूंढने का अड्डा, नशेड़ी को नशे का अड्डा, नेता को नेतागिरि का अड्डा तो पहलवान के लिए कुश्ती-कसरत का अड्डा। अब वो जमाने चले गये जब राजा-महाराजाओं के लिए नाच-गानों के अड्डे होते थे। पुलिस ने पत्रकार और टीवी के साथ मिलकर सारे अड्डों के स्वरूप को बदलकर उनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा दिया, अन्यथा सारे शरीफ खुलेआम बग्घी में बैठकर अड्डों पर जाया करते थे। और उनकी शान होती थी।

काश! हम भी सौ दो सौ साल पहले पैदा होते और किसी के अड्डे पर जा पाते। आज तो यह संभव नहीं। मुश्किल है। खैर, शाम तो गुजारनी है, अड्डा तो ढूंढ़ना ही पड़ेगा। अंत में हमने भी बढ़ी मुश्किल से एक अड्डे की खोज कर ही ली। घर के अंदर ही, सर्वेंट क्वार्टर में। चिंता न करें। यह पढ़ने-लिखने का अड्डा है, जहां मुझे अकेले रहने में मजा आता है। हां, आपके पास किसी और नये अड्डे की जानकारी हो तो जरूर बताएं।

रचनाकार संपर्क:

-मनोज सिंह

४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़

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चित्र - जगदीश चिंताला की कलाकृति से डिटेल

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वर्ल्ड ऑफ़ बुक्स

हंसते-हंसते दर्शन शास्त्र



डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

उम्र के सत्तर बरस पूरे कर लेने के बाद थॉमसन ने सोचा कि अब उसे अपनी जीवन शैली को बदल डालना चाहिये ताकि कुछ बरस और जिया जा सके। बेहद संतुलित भोजन, जॉगिंग, तैराकी – इन सब का असर यह हुआ कि तीन माह में उसका हुलिया ही बदल गया। वज़न में तीस पाउण्ड और कमर के घेरे में 30 इंच की कमी हो गई। उत्साहित होकर उसने सोचा कि अब इस युवा लगती काया के अनुरूप हेयर स्टाइल भी हो जाए! गया एक हेयर कटिंग सेलून में, बाल कटवाये, और जैसे ही बाहर निकला, एक बस की चपेट में आ गया।

गिरते-गिरते भी उसके मुंह से निकला , “ हे भगवान, तूने मेरे साथ ऐसा क्यूं किया?”

जवाब में आकाशवाणी हुई, “थॉमसन सच तो यह है कि मैं तुम्हें पहचान ही नहीं पाया।“

दर्शन शास्त्र की किताब में यह लतीफ़ा! कुछ अजीब नहीं लगता? थॉमस केथकार्ट और डेनियल क्लाइन की ताज़ा किताब प्लेटो एण्ड अ प्लेटिपस वॉक इण्टु अ बार : अण्डरस्टैंडिंग फ़िलोसॉफ़ी थ्रू जोक्स में यही बेमेल लगने वाला संयोजन चौंकाता भी है, आनन्दित भी करता है। टॉम (यानि थॉमस) और डेनियल हार्वर्ड विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र पढे हैं और बहुधन्धी है। डैन तो अनेक जाने माने कॉमेडियनों के लिए लतीफ़े लिखते भी हैं। इनकी पिछली किताब ‘मेचो मेडिटेशंस’ भी खासी चर्चित रह चुकी है। अपनी इस नई किताब में इन्होंने लतीफ़ो के माध्यम से दर्शन शास्त्र की जटिल अवधारणाओं को समझाने का मज़ेदार उपक्रम किया है।

पूरी किताब इन दो दोस्तों के बीच का सम्वाद है और उसी के बीच लतीफ़े, फ़िल्मी प्रसंग, गीत, समसामयिक घटनाओं के हवाले और छोटे-छोटे प्रसंग सब आते रहते हैं। प्रसंगवश, प्लेटो को भी सम्वाद शैली प्रिय थी। तत्वमीमांसा, तर्क शास्त्र, ज्ञानमीमांसा, नीति शास्त्र, अस्तित्ववाद, भाषा दर्शन, नारीवाद वगैरह सब कुछ यहां मौज़ूद है। महान दार्शनिकों ने जो कुछ पढा-सीखा-समझा और समझाया उस सबको यह किताब हल्के फ़ुलके लतीफ़ों के माध्यम से प्रस्तुत करने की कोशिश करती है। यहीं यह भी बता दूं कि किताब के शीर्षक में उल्लिखित प्लेटिपस एक ऑस्ट्रेलियाई प्राणी है जो जल और थल दोनों में विचरण करता है। यह कुछ-कुछ बत्तख से मिलता-जुलता होता है।

किताब उन लोगों को ध्यान में रखकर लिखी गई है जो गम्भीर चीज़ों को सरल तरह से समझना चाहते हैं। दुनिया की सभी महान दार्शनिक परम्पराओं, शैलियों, शाखाओं, अवधारणाओं और विचारकों को इसमें समेटा गया है। ऊपर हमने जिस लतीफ़े को उद्धृत किया है उसका इस्तेमाल अरस्तू की ज़रूरी (एसेन्शियल) और आकस्मिक (एक्सीडेण्टल) की अवधारणा को समझाने के लिए किया गया है।

लेखक द्वय का कहना है कि लतीफ़ों और दार्शनिक अवधारणाओं की निर्मिति और परिणति में बहुत कुछ समान है। दोनों ही आपके मस्तिष्क को समान तरह से उद्वेलित करते हैं, दोनों का उद्गम समान है, दोनों चीज़ों के बारे में आपकी सम्वेदना को उलट-पलट डालते हैं, सोच की दुनिया को औंधे मुंह खडा करते हैं और आपके भीतर छिपे,प्राय: असुविधाजनक सत्यों को बाहर ले आते हैं।

मज़े की बात यह कि आप चाहें तो 200 पन्नों की इस किताब को महज़ एक जोक बुक की तरह भी पढ सकते हैं और अगर उससे आगे जाना चाहें तो पायेंगे कि ये लतीफ़े दर्शन शास्त्र की विविध धाराओं और शैलियों के क्रम में संयोजित हैं और आप इनके माध्यम से दर्शन शास्त्र की प्रारम्भिक जानकारी पा सकते हैं।

इसी किताब में एक प्रसंग प्रख्यात जासूस शर्लक होम्स का है। होम्स की ख्याति उसकी निगमन पद्धति के कारण है। इस किताब के लेखक द्वय का कहना है कि होम्स निगमन नहीं आगमन पद्धति का प्रयोग करता है। वह स्थितियों का सूक्ष्म अध्ययन करता है और फ़िर अपने विगत अनुभवों के आधार पर साम्य और सम्भाव्यता को मिलाकर सामान्यीकरण करता है। इस बात को इस प्रसंग से समझाया गया है:

शर्लक होम्स और उसका मित्र वाट्सन कैम्पिंग पर हैं। रात है। दोनों सो रहे हैं। अचानक होम्स उठता है, वाट्सन को जगाता है। कहता है, “वाट्सन, ऊपर आकाश की तरफ़ देखो और मुझे बताओ कि तुम क्या देख रहे हो।“

वाट्सन जवाब देता है, “ मुझे अनगिनत तारे दिखाई दे रहे हैं।“

होम्स पूछता है, “इसका मतलब?”

वाट्सन कुछ क्षण सोच कर जवाब देता है, “खगोल शास्त्र के लिहाज़ से यह कि अनगिनत आकाश गंगाएं हैं और कदाचित अरबों ग्रह हैं। ज्योतिष के लिहाज़ से यह कि शनि सिंह राशि में स्थित है। समय हुआ है दो बजकर पैंतालिस मिनिट। मौसम विग़्यान के हिसाब से कल का दिन खुशगवार होने वाला है। धर्म शास्त्र के लिहाज़ से यह कि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और हम अकिंचन। होम्स, ये तो मेरे निष्कर्ष है। आप क्या सोचते हैं?”

“वाट्सन, बेवकूफ़! किसी ने हमारा टेण्ट चुरा लिया है।“

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सम्पर्क सूत्र:

ई-2/211, चित्रकूट

जयपुर – 302021।

मोबाइल : 98295 32504

ई मेल : dpdddpagrawal24@gmail.com

(रुक्ष्मणि पटेल)
आलेख

- प्रा.रुक्ष्मणि पटेल

सागर-सेवित, मेघ-मेखलित यात्रा-विवरण अज्ञेय की प्रसिद्ध पुस्तक अरे यायावर, रहेगा याद का एक अंश है जिसमें उन्होंने भारत-भ्रमण के विशिष्ट अनुभवों को अभिव्यक्त किया है।

अज्ञेय जी यह बताते हैं कि कालिदास ने कुमारसंभव की रचना करने के पूर्व समुद्रों को हिमालय के साथ जोड़ दिया है। भारत का काव्य-चित्र प्रस्तुत करते हुए हम भी उत्तर में हिमाद्रि तुंग श्रृंग और दक्षिण में तट-प्रक्षालन करते हुए महासागर की बात करते हैं। किन्तु यह उत्तर-दक्षिण को जोड़ना नहीं है, अलग करना है। जबकि कालिदास का हिमालय महासागरों में अवगाहन करके निकला है। सागर भी महान है जो हिमालय के पाँव पखारने झुकता है और हिमालय भी महान है जो मानो उसे क्रीड़ा-सहचर बना कर अंक भेंट लेता है। इस प्रकार शिव और सती, पिनाकी और गिरिजा, पर्वतों का तपस्यारत योगी और अंतरीप की तपस्विनी कुमारिका के महा-मिलन का वर्णन किया है, जिससे कुमार का जन्म हुआ होगा। यह मिलन सिर्फ शिव-पार्वती का ही नहीं है, उत्तर और दक्षिण का भी है।

दो परमशक्तियों के संगम में जन्म लेगा एक परम योद्धा (कार्तिकेय), जो दानवी सत्ता के आतंक से दैवी व्यवस्था को मुक्त करेगा- यह मिथक, यह पौराणिक संदर्भ हमें श्रद्धा से भर देता है। क्योंकि हमारे भीतर भी तो वही महामिलन उस भव्य अवतरण की भूमिका प्रस्तुत कर रहा है जिसके द्वारा निश्चय ही आसुरी सत्ता की पराजय होगी और दैव साधना की विजय होगी। यह मिलन-गाथा एक नया सायुज्य-उत्तर और दक्षिण भारत पा कर, एक नई अर्थवत्ता पा लेती है। उत्तर और दक्षिण भारत की संस्कृतियों मिलकर भारत की एक अखंड सास्कृतिकता प्रकट हो सकती है।

अज्ञेय का संबंध जिन प्राचीन स्थलों और पुरावशेषों से रहा है, वे सभी स्थलादि शिव और पार्वती के पौराणिक संदर्भ से जुड़े हैं और आश्चर्य की बात यह है कि भारतीय जन-मानस की सही और अधिक गहरी पहचान शिव-पार्वती के पुराण मिथक के सहारे होती रहती है। शिव-भक्ति के मिथक के क्षेत्र का कोई भी नया उन्मेष भारत की अधिक गहरी पहचान कराता है, भारत के मानस की कोई नई झाँकी शिव-भक्ति के मिथक की रहस्य सत्ता का नया आभास दे जाती है...-इसका कारण यह भी है कि अज्ञेय की यात्रा तपस्विनी कुमारी और योगीश्वर शिव के महा-मिलन पथ का अऩुधावन करती रही है। अज्ञेय ने जिस पहाड़ पर निवास और सागर की समीपता चाही, उनके भीतर शिव-पार्वती का असीम मिलन हमेशा स्पंदित होता रहा है। वैसे अज्ञेय की यात्रा वस्तुतः दक्षिण-उत्तर की रही है। जिनके साथ शिव-पार्वती की अनंत कथा जुड़ी है। हिमालय का तो कण-कण शिव-पार्वती से जुड़ा है ही, और कन्याकुमारी के साथ भी। कुमारी-तीर्थ (शायद कन्याकुमारी) के साथ तपस्विनी पार्वती की वर प्रतीक्षा की कथाएँ भी जुड़ी हैं, जो शिव और सती को, सागर और हिमालय को, दक्षिण-उत्तर को एक सूत्र में बाँध देती है। सागर-लहरियों की अनवरत हलचल मानो कुमारी के अटूट विश्वास की आवृत्ति की गूँज है, जिसे सुनकर हिमालय से उठकर वह महायोगी (शिव) एक दिन अवश्य आयेगा।

इस प्रकार शिव-पार्वती के युग्म ने लोक-मानस में गहराई से अपना घर बना लिया है। और वहाँ तेजस् (सती) और कारुण्य (शिव) के संगम की प्रतिष्ठा जीवन के गंभीर सत्य के रूप में हुई है। वत्सल करुणता की मूर्ति पार्वती दीन-दुनिया की ओर से मध्यस्थता और निवेदन करती है और शिव स्मितपूर्वक द्रवित हो जाते हैं। अतः शिव-पार्वती का युगल चित्र स्निग्ध रूप में हमारे सामने आता है।

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रचनाकार संपर्क -

-- प्रा.रुक्ष्मणि पटेल

हिंदी विभाग, वनराज कॉलेज

धरमपुर,जि.वलसाड-396050


- सुशील अंकन

झारखंड प्रकृति के आंचल में एक ऐसा प्रदेश है जहां की हवाओं, घटाओं, पर्वत, पानी और मिट्टी में समृद्धि की गाथा लिखी हुई है। यहां की संस्कृति यहां की परंपरा खुले आकाश के नीलवर्ण जैसा पारदर्शी है। ईश्वर ने मुक्त हाथों से इस राज्य को सौगात दिए हैं और ऐसी पृष्ठभूमि में यहां का सौंदर्य यहां के फूल यहां के झरने यहां के गीत अगर फ़िल्मों के माध्यम से बांटी जाय तो सारे लोग बरबस ही इस ओर आकर्षित होंगे ऐसा मैं मानता हूं।

कुछ लोगों ने झारखंड प्रदेश में बहुत पहले से फ़िल्म निर्माण का कार्य करते रहे हैं किन्तु उनका कोई प्रमाणिक रिकार्ड उपलब्ध नहीं होने के कारण उनके कार्यों को रेखांकित करना शोध का विषय है। जिन लोगों ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में कदम रखा उनके कार्यों का लेखा जोखा सरेआम मौजूद है ज़रूरत है इन पर एक दृष्टि डालने की और पूरे आंकड़ों को ईमानदारी से लिपिबद्ध करने की ।

जॉलीवुड की फ़िल्मी धरातल पर अगर नज़र डालें तो 1988 में दृश्यांतर इंटरनेशनल के बैनर तले बनी एक हिन्दी फ़िल्म ''आक्रांत'' को पहले पड़ाव पर रख सकते हैं। झारखंड की मौलिक समस्याओं पर बनी इस फ़िल्म में सूदखोरी , जंगल क्षरण , मजदूर पलायन को बिनोद कुमार के निर्देशन में चित्रित किया गया था । इसकी शूटिंग राजाडेरा (नेतरहाट) , एवं रांची सहित मुंबई के फ़िल्मसिटी , फेमस स्टूडियो तथा बोरीवली के जंगलों में भी की गई थी । इसके मुख्य कलाकारों में सदाशिव अमरापुरकर , श्रीला मजुमदार , शकीला मज़ीद , सी.एस.दुबे सहित झारखंड के कलाकारों में बलदेव नारायण ठाकुर , विश्वनाथ उरांव , मसूद जामी , तापस चक्रवर्ती , और अन्य थे । डॉ. रामदयाल मुंडा ने इस फ़िल्म में संगीत पक्ष को संभाला था । बकौल निर्देशक इस फ़िल्म को एक मिशन की तरह लिया गया था किन्तु कई कारणों से यह फ़िल्म सिनेमा हॉल के पर्दे तक नहीं पहुंच पाई। 1990 में दूरदर्शन ने इसका प्रीमियर किया और इसका वीडियो रिलीज़ टाइम्स मैगज़ीन ने निकाला था।

''सोना कर नागपुर'' जॉलीवुड में बनने वाली संभवत: पहली नागपुरी फ़िल्म है जिसने न केवल सिनेमाहॉल के पर्दे पर अपने को प्रतिबिंबित किया वरन नागपुरी दर्शकों को गांव और खेतों से निकाल कर सिनेमा हॉल की कुर्सियों और ज़मीन पर बैठने को उद्वेलित भी किया । इसके निर्माता निर्देशक धनंजय नाथ तिवारी के अनुसार उन्होने तो अपने सपनों को साकार किया किन्तु तकनीकी पहलुओं की अल्प जानकारी के कारण इस फ़िल्म को अधिक धारदार नहीं बना सके । मां छिन्नमस्तिके प्रोडक्षन के बैनर तले बनने वाली इस फ़िल्म में पुरूषोत्तम तिवारी, सोसन बाड़ा, पुष्पा कुल्लु, मुकुन्द नायक, धनंजयनाथ तिवारी सहित अन्य सभी कलाकार झारखंड के ही थे ।

इसके बाद जॉलीवुड में एक और नागपुरी फ़िल्म ने जन्म लिया ''प्रीत''। पहले से स्थापित सालेम म्युज़िक ग्रुप का एक नागपुरी ऑडियो कैसेट रांची और आसपास के इलाके में धूम मचा रखा था । इस ऑडियो कैसेट की पूरी परिकल्पना सालेम ग्रुप की ही थी । इस ऑडियो कैसेट की सफलता के बाद एक योजना के अंतर्गत सोना कर नागपुर की तर्ज पर ही इस फ़िल्म को 16 मिमी कैमरे से शूट किया गया किन्तु लचर कथानक और निर्देशकीय कमजोरियों के कारण यह फ़िल्म फ़्लॉप साबित हुई।

जॉलीवुड की फ़िल्मों में अच्छा व्यवसाय करने वाली फ़िल्मों में ''सजना अनाड़ी'' का नाम लिया जा सकता है। 1998-99 में बनी इस फ़िल्म की शूटिंग रांची के आसपास चान्हों , रामगढ़ , मैकलुस्कीगंज आदि जगहों पर की गई थी । इसकी सफलता के पीछे हाथ था इसके निर्देशक कलकत्ता के प्रवीर गांगुली का जिसने नागपुरी के साथ थोड़ी आधुनिकता को मिलाया था जिसके कारण इस फ़िल्म को प्रदर्शन के समय हल्का विरोध भी झेलना पड़ा था । इस फ़िल्म की कथानक मज़बूत थी जिसे लिखा था स्वयं इसके निर्माता युगलकिशोर मिश्र ने । इसमें काम करने वाले कलाकारों में एक दो बाहरी कलाकारों के साथ युगलकिशोर मिश्र, सोनी बबीता, शेखर वत्स, जीतेन्द्र वाढेर सहित अन्य सभी कलाकार इसी क्षेत्र के थे ।

नागपुरी फ़िल्म निर्माण के इस तेज़ रफ्तार में ''गुईया नंबर वन'' भी शामिल हुआ । निर्देशक थे आभाष शर्मा । कुछ बाहरी कुछ भीतरी कलाकारों को लेकर बनने वाली यह फ़िल्म भी कुछ कर नहीं पायी। 2001 से लेकर 2005 तक झारखंड कोई यादगार फ़िल्म बनाने में सफल नहीं हो सका।

यहां और इस प्रदेश के बाहर निवास करने वाले लोगों को लगने लगा कि यहां छोटे बजट की नागपुरी फ़िल्में और एलबम बनाकर ही कुछ बिजनेस किया जा सकता है इसलिए छोटे बजट की नागपुरी फ़िल्मों और एलबम का बाजार बनने लगा । झारखंड प्रदेश का प्रथम नागपुरी एलबम बनाने का श्रेय जाता है धनंजय नाथ तिवारी को । ''झांझोरानी'' के नाम से उन्होंने ही पहला नागपुरी एलबम बनाया । इसके बाद इस क्रम में टुअर, सलाम, पूर्णिमा, डोली, माय कर दुलारा, बेदर्दी गुइया, पगला दिवाना, चिंगारी, जख्मी दिल, मितवा परदेशी आदि ढेर सारी फ़िल्में और एलबम बनी लेकिन इनकी हालत रेत की दीवार की तरह ही रह गई । कोई ठोस आधार इन फ़िल्मों ने नहीं बनाया । साथ ही वीडियो पर शूट कर सिनेमा हॉल के पर्दे पर चलाने का प्रयोग उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता । सभी का हश्र वही हुआ जो कच्चे घड़े की आकृति का होता है ।

अलबत्ता श्री प्रकाश द्वारा बनाया गया वीडियो वृत चित्र देश विदेश में खूब नाम और प्रशंसा पाया । ''बुध्दा वीप्स एट जादूगोड़ा'' नाम की डॉक्युमेंट्री कई पूर्वी देशों में प्रदर्शित की गई और कई जगहों से सम्मानित भी हुई ।

प्रायोगिक वीडियो फ़िल्मों में ''वर्ड्स टू से'' भी एक सफल प्रयोग साबित हुआ क्योंकि कम समय कम लागत कम संसाधन कम लोकेशन कम लाइट कम कलाकारों के साथ फ़िल्म बनाने का प्रयोग था यह । प्रो. सुशील अंकन ने संप्रेषण की भाषा के स्थान पर केवल संवेदनाओं के संप्रेषण से ही फ़िल्म का निर्माण किया । झारखंड प्रदेश में बनने वाली इस तरह की प्रायोगिक फ़िल्मों की यह पहली कड़ी है ।

जॉलीवुड में फ़िल्म निर्माण की असीम संभावनाएं हैं। ज़रूरत है इस क्षेत्र में कुशलता और तकनीक की । आशा जगती है जब नज़र जाती है करीमसीटी कॉलेज जमशेदपुर और संत जेवियर कॉलेज रांची के मास कम्युनिकेशन एंड विडियो प्रोडक्षन विभाग की ओर जहां विद्यार्थी फ़िल्म बनाने की बारीकियों को सीख रहे है समझ रहे हैं। उनके बीच से अगर कोई फिल्म मेकर उभर कर सामने आता है तो विश्वास है कि उस फ़िल्म को निश्चित ही सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, औद्योगिक एवं राजनैतिक मान्यता मिलेगी जो अभी तक जॉलीवुड के किसी भी फ़िल्म को नहीं मिल सकी है । इस क्षेत्र में फ़िल्म निर्माण को निष्चित रूप से औद्योगिक मान्यता एवं वाणिज्यिक समर्थन मिलेगा ऐसा मेरा विश्वास है । सरकार की भी नज़रें इनायत इस पर होगी ।

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रचनाकार संपर्क

सुशील अंकन,

325, न्यू बस्ती पिंजरा पोल

गौषाला , रांची - 834 001

झारखंड

 

महत्त्वपूर्ण कड़ी चाणक्य गुरू

बालक , अभिभावक और शिक्षक के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । शिक्षा की कोई भी विधि -प्रविधि ,पाठ्यक्रम-पाठ्यचर्या लागू करने से पहले बच्चे को समझना होगा । कोई भी तौर-तरीका बच्चे से ऊपर नहीं है और न हो सकता है । कोई भी व्यक्ति या संस्था इसके ऊपर नहीं है ,वरन् इसके लिए है । यह बात सदैव ध्यान में रखनी होगी । श्री सुकेश साहनी ने शिक्षा-जगत पर कई महत्त्वपूर्ण लघुकथाएँ लिखी हैं ;जिनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं । ये लघुकथाएँ हमारी आँखें खोलने का काम करती हैं एवं शिक्षा के लिए हमारी अव्यावहारिक कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगाती हैँ ।
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प्रस्तुति : रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

1-मैं कैसे पढ़ूँ ?


पूरे घर में मुर्दनी छा गई थी। माँ के कमरे के बाहर सिर पर हाथ रखकर बैठी उदास दाई माँ---रो-रोकर थक चुकी माँ के पास चुपचाप बैठी गाँव की औरतें । सफेद कपड़े में लिपटे गुड्डे के शव को हाथों में उठाए पिताजी को उसने पहली बार रोते देखा था----
शुचि!टीचर की कठोर आवाज़ से मस्तिष्क में दौड़ रही घटनाओं की रील कट गई और वह हड़बड़ा कर खड़ी हो गई।
तुम्हारा ध्यान किधर है? मैं क्या पढ़ा रही थी----बोलो?” वह घबरा गई। पूरी क्लास में सभी उसे देख रहे थे।
बोलो!टीचर उसके बिल्कुल पास आ गई।
भगवान ने बच्चा वापस ले लिया----।मारे डर के मुँह से बस इतना ही निकल सका ।
कुछ बच्चे खी-खी कर हँसने लगे। टीचर का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा।
स्टैंड अप आन द बैंच !
वह चुपचाप बैंच पर खड़ी हो गई। उसने सोचा--- ये सब हँस क्यों रहे हैं, माँ-पिताजी, सभी तो रोये थे-यहाँ तक कि दूध वाला और रिक्शेवाला भी बच्चे के बारे में सुनकर उदास हो गए थे और उससे कुछ अधिक ही प्यार से पेश आए थे। वह ब्लैक-बोर्ड पर टकटकी लगाए थी, जहाँ उसे माँ के बगल में लेटा प्यारा-सा बच्चा दिखाई दे रहा था । हँसते हुए पिताजी ने गुड्डे को उसकी नन्हीं बाँहों में दे दिया था। कितनी खुश थी वह!
टू प्लस-फाइव-कितने हुए?” टीचर बच्चों से पूछ रही थी ।
शुचि के जी में आया कि टीचर दीदी से पूछे जब भगवान ने गुड्डे को वापस ही लेना था तो फिर दिया ही क्यों था? उसकी आँखें डबडबा गईं। सफेद कपड़े में लिपटा गुड्डे का शव उसकी आँखों के आगे घूम रहा था। इस दफा टीचर उसी से पूछ रही थी । उसने ध्यान से ब्लैक-बोर्ड की ओर देखा। उसे लगा ब्लैक-बोर्ड भी गुड्डे के शव पर लिपटे कपड़े की तरह सफेद रंग का हो गया है। उसे टीचर दीदी पर गुस्सा आया । सफेद बोर्ड पर सफेद चाक से लिखे को भला वह कैसे पढ़े?
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2-पिंजरे

उसके कदमों की आहट से चौंककर नीलू ने आँखें खोलीं, उसे पहनाकर धीरे से दुम हिलाई और फिर निश्चिन्त होकर आँखें बंद कर लीं। चारों पिल्ले एक दूसरे पर गिरते पड़ते माँ की छाती से दूध पी रहे थे। वह मंत्रमुग्ध-सा उन्हें देखता रहा।
नीलू के प्यारे-प्यारे पिल्लों के बारे में सोचते हुए वह सड़क पर आ गया। सड़क पर पड़ा टिन का खाली डिब्बा उसके जूते की ठोकर से खड़खड़ाता हुआ दूर जा गिरा । वह खिलखिलाकर हँसा। उसने इस क्रिया को दोहराया, तभी उसे पिछली रात माँ द्वारा सुनाई गई कहानी याद आ गई, जिसमें एक पेड़ एक धोबी से बोलता है, “धोबिया, वे धोबिया! आम ना तोड़----” उसने सड़क के दोनों ओर शान से खड़े पेड़ों की ओर हैरानी से देखते हुए सोचा---पेड़ कैसे बोलते होंगे,---कितना अच्छा होता अगर कोई पेड़ मुझसे भी बात करता! पेड़ पर बैठे एक बंदर ने उसकी ओर देखकर मुँह बनाया और फिर डाल पर उलटा लटक गया। यह देखकर वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।
खुद को स्कूल के सामने खड़ा पाकर वह चौंक पड़ा। घर से स्कूल तक का लम्बा रास्ता इतनी जल्दी तय हो गया, उसे हैरानी हुई । पहली बार उसे पीठ पर टँगे भारी बस्ते का ध्यान आया। उसे गहरी उदासी ने घेर लिया। तभी पेड़ पर कोयल कुहकी। उसने हसरतभरी नज़र कोयल पर डाली और फिर मरी-मरी चाल से अपनी कक्षा की ओर चल दिया।
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३-शिक्षाकाल

“सर,मे आय कम इन?” उसने डरते-डरते पूछा।
“आज फिर लेट? चलो, जाकर अपनी सीट पर खड़े हो जाओ।
वह तीर की तरह अपनी सीट की ओर बढ़ा----
“रुको!” टीचर का कठोर स्वर उसके कानों में बजा और उसके पैर वहीं जड़ हो गए। तेजी से नज़दीक आते कदमों की आवाज़, “जेब में क्या है? निकालो ।”
कक्षा में सभी की नज़रें उसकी ठसाठस भरी जेबों पर टिक गई। वह एक-एक करके जेब से सामान निकालने लगा----कंचे,तरह-तरह के पत्थर, पत्र-पत्रिकाओं से काटे गए कागज़ों के रंगीन टुकड़े, टूटा हुआ इलैक्ट्रिक टैस्टर, कुछ जंग खाए पेंच-पुर्जे---
“और क्या-क्या है? तलाशी दो।” उनके सख्त हाथ उसकी नन्हीं जेबें टटोलने लगे। तलाशी लेते उनके हाथ गर्दन से सिर की ओर बढ़ रहे थे, “यहाँ क्या छिपा रखा है?” उनकी सख्त अंगुलियां खोपड़ी को छेदकर अब उसके मस्तिष्क को टटोल रहीं थीं ।
वह दर्द से चीख पड़ा और उसकी आँख खुल गई।
“क्या हुआ बेटा?”माँ ने घबराकर पूछा ।
“माँ, पेट में बहुत दर्द हैं” वह पहली बार माँ से झूठ बोला, “आज मैं स्कूल नहीं जाऊँगा ।”
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4-बोंजाई




मम्मी जाने दो न !मिक्की ने छटपटाते हुए कहा, “ मैदान में सभी बच्चे तो खेल रहे हैं!
कहा न, नहीं जाना ! उन गंदे बच्चों के साथ खेलोगे?”
मम्मी ----वे गंदे नहीं हैं”, फ़िर कुछ सोचते हुए बोला, “ अच्छा---घर के बाहर सेठ अंकल के बरामदे में तो खेलने दो—“
नहीं---सामने बिजी रोड है, किसी गाड़ी की चपेट में आ जाओगे।मिसेज आनंद ने निर्णायक स्वर में कहा, “ तुम्हें ढेरों गेम्स लाकर दिए हैं, कमरे में बैठकर उनसे खेलो ।
मिक्की !ड्राइंग रूम से मिस्टर आनंद ने आवाज दी।
जी ---पापा।
कम हियर----।
ड्राइंग रूम के बाहर मिक्की ठिठक गया। भीतर पापा के मित्र बैठे हुए थे। वह दाँतों से नाखून काटते हुए पसीने-पसीने हो गया।
उसने झिझकते हुए ड्राइंग रूम में प्रवेश किया।
माय---सन!आनंद साहब ने अपने दोस्त को गर्व से बताया।
हैलो यंग मैन,” उनके मित्र ने कहा,” हाऊ आर यू?”
ज---जा---जी ई!मिक्की हकलाकर रह गया। उसे पापा पर बहुत गुस्सा आया- क्या वह कोई नुमाइश की चीज है, जो हर मिलने वाले से उसका इस तरह परिचय करवाया जाता है ।
मिस्टर आनंद फ़िर अपने मित्र के साथ बातों में व्यस्त हो गए थे। गमले में सजाए गए नींबू के बोंजाई के पास खड़ा मिक्की खिड़की से बाहर मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों को एकटक देख रहा था

5-ग्रहण

“पापा राहुल कह रहा था कि आज तीन बजे---” विक्की ने बताना चाहा ।
“चुपचाप पढ़ो!” उन्होंने अखबार से नजरें हटाए बिना कहा, “पढ़ाई के समय बातचीत बिल्कुल बंद !”
“पापा कितने बज गए?” थोड़ी देर बाद विक्की ने पूछा।
“तुम्हारा मन पढ़ाई में क्यों नहीं लगता? क्या ऊटपटांग सोचते रहते हो? मन लगाकर पढ़ाई करो, नहीं तो मुझसे पिट जाओगे।”
विक्की ने नजरें पुस्तक में गड़ा दीं ।

“पापा! अचानक इतना अँधेरा क्यों हों गया है?” विक्की ने खिड़की से बाहर ख़ुले आसमान को एकटक देख़ते हुए हैरानी से पूछा। अभी शाम भी नहीं हुई है और आसमान में बादल भी नहीं हैं! राहुल कह रहा था---”
“विक्की!!” वे गुस्से में बोले-ढेर सारा होमवर्क पड़ा है और तुम एक पाठ में ही अटके हो!”
“पापा, बाहर इतना अँधेरा---” उसने कहना चाहा ।
“अँधेरा लग रहा है तो मैं लाइट जलाए देता हूँ। पाँच मिनट में पाठ याद न हुआ, तो मैं तुम्हारे साथ सुलूक करता हूँ?”
विक्की सहम गया। वह ज़ोर-ज़ोर से याद करने लगा, “सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाने से सूर्यग्रहण होता है---सूर्य और पृथ्वी के बीच---”
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आलेख

- भारती परिमल

'वो कागज की कश्ती, वो बारिश का पानी' जगजीत-चित्रा सिंह द्वारा गाई गई ग़ज़ल की ये पंक्तियाँ सुनते ही हम सब कई बरस पीछे अपने बचपन की यादों में समा जाते हैं. बचपन जहाँ केवल मस्ती ही मस्ती होती है. हम सबका बचपन तितली की तरह उड़ता, चिड़िया की तरह चहकता और गिलहरी की तरह फुदकता हुआ था. सुख और दु:ख की घनी छाँव क्या होती है, इसकी हमें खबर न थी.

सावन की पहली फुहार का बेताबी से इंतजार रहता था हम सबको. बूँदें धरती पर गिरी नहीं कि हथेली उसे सहेजने के लिए अपने आप ही आगे बढ़ जाती थी. पलकों को छूती हुई वे बूँदें मन को भिगो जाती थी. बारिश में भीगने का ऐसा जुनून होता था कि भरी दोपहरी में जब घर के सारे लोग सो रहे हों, तब चुपके से माँ की ओट छोड़ कर दबे पाँव एक कमरे से दूसरा कमरा पार करते हुए, धीरे से किवाड़ खोल कर घर की देहरी लांघ जाते थे. देहरी लांघने में खतरा हो, तो दीवार फांदने में देर नहीं करते थे. फिर एक के बाद एक सबको आवाज देते, किसी को खिड़की से पुकारते, तो किसी को पक्षी या जानवर की आवाज के इशारे से पुकारते घर के बाहर ले आते थे. फिर लगता था मस्ती का मेला, खुद की मस्ती, खुद की दुनिया. काला घुम्मड़ आकाश और कौंधती-कड़कड़ाती बिजली के बीच मूसलाधार बारिश में उफन आए पोखरों व नालों में कागज की कश्ती बनाना और उसे दूर तक जाते हुए देखना कितना सुखद अहसास है. तब न कपड़े भीगने का डर पास फटकता था, न ही दादाजी की छड़ी और न ही माँ की झिड़की या पिता की पिटाई याद आती थी. उस समय तो मन बस भीगा होता था, मटमैले पानी में डूबती-उतराती कश्तियों में.

हममें से भला कौन होगा, जिन्हें अपना बचपन बुरा लगता होगा. एक वही थाती है, जो जीवन भर हमारे साथ होती है, कभी रात को चुपचाप बिना बताए भी चला आता है, यह शरारती बचपन. हम भले ही यह कहते रहें- भला यह भी कोई उम्र है, जो हम अपने बचपन जैसी हरकतें करें? पर वह कहाँ मानता है, थोड़ी-सी चुहल के बाद वह हमसे करा ही लेता है, ऐसी कोई न कोई हरकत, जिसे हम बचपन में बार-बार करते थे. इस बार करते समय हम भी थोड़ा सहम गए थे, कहीं किसी ने देख तो नहीं लिया ना. यह होता है बचपन का एक छोटा-सा अहसास, जो मन को भीतर तक गुदगुदा कर रख देता है. हमारे बचपन को तो यह अच्छी तरह याद है, जब हम सब बहते पानी के बीचों-बीच खड़े हो जाते थे, नीचे से रेत खिसकती थी, हमें ऐसी गुदगुदी होती थी, मानों रेत नहीं, रुई के फाहों से कोई हमारे घावों को हल्के से साफ कर रहा हो. आज भी जब कभी चोट लगती है, कम्पाउंडर हमारे घाव को रुई से साफ करता है, तो वही अहसास धीरे से हमारे सामने आ खड़ा होता है. हम कनखियों से उसे देख लेते हैं, उसे पास नहीं बुलाते. केवल इसलिए कि कहीं वह हमारे बचपन की शरारतों को गिनाना शुरू न कर दे.

हममें से शायद ही कोई ऐसा होगा, जिसका बचपन शरारतों के साथ न गुजरा हो. शरारतें भी ऐसी कि जिसे यदि आज याद किया जाए, तो हमारे यौवन को भी शर्म आने लगे. मेंढक पकड़कर साथी की जेब में डालना, तितलियों और पतंगों को पकड़कर डिब्बे में बंद कर एक साथ छोड़ना, पतंगों के पीछे धागे बाँधना, कीचड़ से सने पैरों समेत बेधड़क घर में घुस जाना, केंचुएँ पर नमक छिड़ककर उसका छटपटाना देखना, पेड़ पर चढ़कर डालियों को तेजी से हिलाकर राहगीर को भिगो देना, बस्ते को जानबूझकर भिगो कर शाला न जाने के बहाने करना, पेन की स्याही को बहते पानी में डालना, पानी भरे जूतों से थपथप करते हुए चलना, पानी भरे गड्ढों से ही गुजरना, ऐसी शरारतों की सूची काफी लंबी हो सकती है, अपने-अपने अनुभवों के आधार पर. किंतु यह सारी शरारतें केवल बचपन की ही देन हैं. हमारा यौवन इस तरह की शरारतें करने के लिए गवाही नहीं देता. कोमल मन की कोमल भावनाओं से भरा हमारा बचपन आज भी हमारे ही भीतर है, पर हम हैं कि उसे बाहर ही नहीं आने देते.

आज जब हम बच्चों को उस तरह की शरारतें करते देखते हैं, तब एक बार तो लगता है कि बच्चे ये क्या कर रहे हैं, पर तभी हमारे भीतर से आवाज आती है, क्या तुमने यह सब नहीं किया? आज हम सोचते हैं कि हमारा बचपन अब चौराहों पर ही सिमट गया है, जहाँ से एक रास्ता यौवन को गया, एक विवाहित जीवन को गया, एक नौकरी के नाम पर गया और एक यह उम्र, जब बचपन को याद करते हुए आंखें भीग रही हैं. पचपन में आंखों का भीगना फिर बचपन में ले जाता है, जब बारिश के पानी को पलकों पर लेते थे, कभी उसका स्वाद अपनी जीभ पर लेते थे. कभी धोखे से पानी यदि खुली आंख पर चला जाता था, तब आंखें काफी पीड़ा देती थी. पर उस समय तो पीड़ा से नाता ही टूटा रहता था हमारा. हम किसी भी पीड़ा को नहीं जानते थे. हमारी पीड़ा वह थी, जब हमारा कोई साथी बुखार से तप रहा होता था, या फिर उसकी झोपड़ी में बारिश का पानी भर जाता था, गाँव से शाला आते हुए किसी साथी की कापी-किताबें पानी में बह जाती थी और शिक्षक उसे भीगे कपड़ों में ही क्लास के बाहर खड़े कर देते थे. यही थी हमारी पीड़ा.

आज हमारा बचपन तो हमारे साथ है, पर हमारे बच्चों का बचपन शायद उनसे दूर जा रहा है. बारिश के बहते पानी में उनकी कागज की कश्ती दूर कहीं चली गई है. उनकी हरकतों में वह अल्हड़ता, वह मस्ती, वह उमंग दिखाई नहीं देती, जिसे हमने विरासत में पाया. हमारे बचपन में तो चाँद में परियाँ रहती थी, पर हमारे बच्चों के बचपन में परी तो नहीं रहती, बल्कि चाँद में क्या सचमुच जीवन है या नहीं, यही उनके शोध का विषय बना हुआ है. कॉपी-किताबों, टीवी, चैनल, कम्प्यूटर ने उनके बालपन को सीधे यौवन में पहुँचा दिया है. उनका बचपन स्कूल, ट्यूशन और होमवर्क में बंट कर रह गया है.

अब नहीं थमती उनकी नन्हीं हथेलियों पर पानी की बूँदें, रिमझिम फुहारें उन्हें भिगो नहीं पाती, पैरों तले फिसलती रेत की गुदगुदी को वे महसूस नहीं कर पाते, उनकी कल्पनाओं में कोई कागज की कश्ती ही नहीं, तितलियों और पतंगों की हल्की-सी छुअन का अहसास भी नहीं जागता उनकी हथेलियों में. उनकी नन्हीं आंखों में पल रहे हैं माता-पिता के सपने और पीठ पर है अपेक्षाओं का बोझ. ऐसे में भला कहाँ ठहर पाता है बचपन? हमने तो खूब जिया अपने बचपन को. पर हमारी संतान अपने बचपन से काफी दूर हो गई है. यदि हम उनमें अपना ही बचपन देखना चाहते हैं, तो उनके बचपन के साथ अपने बचपन को मिलाकर एक बार, केवल एक बार अपनी छत पर बारिश के पानी में खूब भीगें, खूब बतियाएँ, खूब मस्ती करें और खूब छोड़ें इस बारिश में कागज की कश्तियाँ।

(चित्र - विनोद शाह की कलाकृति.)

रचनाकार संपर्क :-

- भारती परिमल, 403, भवानी परिसर, इंद्रपुरी भेल, भोपाल. 462022.

(पिछले दिनों असग़र वजाहत की कहानी शाह आलम कैम्प की रूहें के परिप्रेक्ष्य में चिट्ठा जगत् में जमकर विवाद हुआ और उसकी परिणति नारद पर एक चिट्ठे पर प्रतिबंध के रूप में सामने आया. प्रस्तुत समीक्षा उसी कहानी-संग्रह – मैं हिन्दू हूँ की है. समीक्षक हैं अभिषेक श्रीवास्तव. यह समीक्षा तद्भव में  प्रकाशित हो चुकी है. प्रसंगवश, अभिषेक वही हैं जिनकी एक कहानी को (भाषा का सवाल उठाते हुए किसी चिट्ठे को पहली दफ़ा) नारद पर प्रतिबंधित किया गया था. – सं.)

 

शैतानी गणित में बिलबिलाती रूहें...

पुस्तक समीक्षा – कहानी संग्रह – मैं हिन्दू हूँ

लेखक – असग़र वजाहत

समीक्षक – अभिषेक श्रीवास्तव

असग़र वजाहत की कहानियों के केन्द्र में साम्प्रदायिकता है। लेकिन यह साम्प्रदायिकता उस पारम्परिक साम्प्रदायिकता से बिल्कुल भिन्न है जिनका साक्षात्कार हमें रोज ब रोज की घटनाओं में अपने समाज में देखने को मिलता है। ये घटनाएं , दंगे और फसाद इनकी कहानियों के एक महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन चिन्ता उस शैतान की है जिसकी गणित पूरे सामाजिक तानेबाने को छिन्न भिन्न किये दे रही है। मैं हिन्दू हूं एक ऐसा कहानी संग्रह है जहां मानवीय विद्रूपताएं अपने नग्नतम रूपों में अतिरेक के स्तर पर जाकर बिलबिलाने लगती हैं, जहां यथार्थ की रूह कांप उठती है और इन तमाम अपराधों के पीछे दरअसल वह इन्सानी फितरत होती है जो न तो हिन्दू है न मुस्लिम, बल्कि उसमें गहरे कहीं छिपा एक शैतान है जो जिन्दगियां तबाह कर मजे लेता है।

उसी शैतान का एक बौद्धिक चेहरा हमें ‘जख्म’ में दिखाई देता है। यह कहानी एक दंगा पीड़ित का बयान है, उस पूरे सभ्य समाज पर एक टिप्पणी है जो हर बार लगने वाले घाव से अपनी कमाई कर वातानुकूलित कमरों में चैन से सोता है। ‘ साम्प्रदायिकता विरोधी सम्मेलन' के माध्यम से असग़र वजाहत उस सभ्य पैटी बूर्जुआ समाज, सोशल डेमोक्रेट आबादी की नग्नता को दिखाते हैं जिसके पास एक दंगा पीड़ित के सवालों का कोई जवाब नहीं। दूसरी ओर उस आबादी की संवेदनहीनता का भी मखौल उड़ाते हैं जिसके लिए साम्प्रदायिक दंगे होने का अर्थ ठीक वैसे ही होता है जैसे कि शहर में ‘ गर्मी बहुत बढ़ गयी है' या ‘ अबकी पानी बहुत बरसा' जैसी खबरें। यहीं दिक्कत पैदा होती है। लेखक सन्देह पैदा करता है। उसे उस शैतानी गुणा गणित के सारे फलसफे पता हैं, कि किस तरीके से हर दंगे के पहले सामाजिक आन्दोलनकारियों और साम्प्रदायिकता विरोधी कार्यकर्ताओं के पास कोई मुद्दा नहीं होता और हर दंगे के बाद उनके हाथ एक ऐसा मुद्दा हाथ लग जाता है जिससे वे बरसों अपनी रोटियां सेंकते रहते हैं। वह यह भी जानता है कि कैसे चुनाव के पहले राजनेता अपने संसदीय क्षेत्र में अधिकारियों की तैनाती जाति धर्म के आधार पर करवाते हैं ( नया गणित), अब की राजनीति में दो और दो चार नहीं बाईस होते हैं। इसके बावजूद यदि ‘ जख्म' में वह भी उसी आबादी का हिस्सा खुद को पाता है तो इसे उसका आत्मस्वीकार कह कर प्रशंसा नहीं करनी चाहिए। बल्कि मुख्तार को पूछना चाहिए, कि क्यों आप मेरे सवालों से बच रहे हैं? यह पूछने की बजाय मुख्तार अपने सिर के बाल हटा कर जख्म से रिस रहे ताजा लाल खून को दिखाना मुफीद समझता है। पूरे संग्रह में यह जख्म दिमाग पर तारी रहता है और ‘ शाह आलम कैम्प की रूहें' में पाठक को भीतर तक जख्मी कर जाता है। इस संग्रह की कहानियों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बांटा जा सकता है।

एक वे कहानियाँ जो साम्प्रदायिकता पर पूरी तरह केन्द्रित हैं, दंगों के बाद बदहाल इन्सानियत की तस्वीर पेश करती हैं। दूसरी वे कहानियाँ जो अनाम अजाने पात्रों के माध्यम से अपने लघु संस्करणों में ही पूरी सामाजिक, राजनैतिक सत्ता का मजाक उड़ाती हैं, एक परिवार की आत्महत्या को सामाजिक टिप्पणी के रूप में प्रदर्शित कर व्यवस्था को शर्मसार करती हैं और यथार्थ को खोदबीन कर सामने लाती हैं। साम्प्रदायिकता की व्यापक अर्थछवियों में देखें तो ये सभी उस ढांचे में फिट बैठती हैं। मसलन, ‘ गिरफ्त' में मल्लू नाम का एक पात्र है जो खून बेच कर अपने परिवार का खर्च चलाता है। प्रधानमंत्री का आगमन होता है; रक्तदान शिविर लगा हुआ है और एक स्थानीय महिला नेता को यह दिखाना होता है कि सबसे पहले उसने रक्तदान किया ताकि उसकी तस्वीर प्रधानमंत्री के साथ आ जाए। इसके लिए मल्लू का इस्तेमाल किया जाता है। उसे भर अंटी पैसे दिये जाते हैं जिसमें डॉक्टर, नर्स और चपरासी बन्दरबांट कर लेते हैं। फिर भी उसकी जेब में कुछ पैसे बच जाते हैं। उधर प्रधानमंत्री महिला नेता के साथ तस्वीर खिंचवाते हैं, इधर बिस्तर के नीचे से मल्लू के खून की बूंदें बोतल में भर रही होती हैं। इस पूरे मेलोड्रामे में व्यवस्थापक इस तथ्य को भूल जाते हैं कि मल्लू का खून निकला ही जा रहा है। नतीजा, मल्लू महान बन जाता है। उसकी मौत हो जाती है। यह प्रसंग सत्ता और उसके बिचौलियों का ऐसा साम्प्रदायवाद है जो हाशिए पर जी रहे इन्सान को मौत की हद तक निचोड़ डालता है। अफसोस, कि साम्प्रदायिकता के पारिभाषिक कोश से ऐसी हिंसात्मक कार्रवाइयां नदारद हैं।

हाशिए पर जी रहे लोगों की ऐसी दास्तानों की लम्बी फेहरिस्त हमें असग़र वजाहत की कहानियों में देखने को मिलती है। गनीमत ही है कि सैफू की जान सिर्फ इस एक उद्घोष से बच जाती है कि ‘ मैं हिन्दू हूं' । यह उद्घोष उस आजाद भारत की सबसे बड़ी विडम्बनाओं में से एक है जिसका मुजाहिरा हमें शमोएल अहमद के उपन्यास ‘ महामारी' में विस्तार से देखने को मिलता है। यह सैफू दरअसल ‘ महामारी' का ढानचू है। एक सनातन खौफ में आविष्ट, हमेशा ‘ ट्रांस' की स्थिति में बुदबुदाता और सवाल पूछता। यह खौफ आज भी भारतीय मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को आविष्ट किये हुए है। इसका वीभत्सतम् रूप हमें गोधरा काण्ड के बाद गुजरात में सुनियोजित तरीके से अंजाम दिये गये नरसंहार में दिखाई पड़ता है। उसी के बाद ‘ शाह आलम कैम्प की रूहें' नामक कहानी लिखी गयी थी।

असग़र वजाहत का कहानीकार किसी फालतू आशा में नहीं जीता। वह जानता है कि रोजी रोटी के साधन छिन जाने के बाद इन्सान के पास मौत के सिवा कोई चारा नहीं होता। ‘ जिम्मेवारी' में यह यथार्थ बिल्कुल एक सत्यकथा मार्का शैली में हमारे सामने पुनरुज्जीवित होता है। यह तय है कि दुलीराम के परिवार समेत आत्महत्या जैसे किसी मामले से लेखक का सीधा साक्षात्कार नहीं हुआ होगा, लेकिन काल्पनिकता के जिस औजार से यह कहानी गढ़ी गयी है, उससे यह दिल को चीर जाती है। कल्पना का यथार्थ में इतना यथार्थवादी रूपान्तरण पहले कभी नहीं हुआ है। और अन्त में, अपने ‘ सुसाइड नोट' में दुलीराम लिख छोड़ता है- ‘‘ मेरी और मेरे परिवार की हत्या की जिम्मेवारी किसी पर नहीं है। '' ऐसे ही रोज कई दुलीराम और मल्लू अल्लाह को प्यारे हो जाते हैं। बचता है तो सिर्फ एक सवाल, कि आखिर कौन है इस मौत का जिम्मेवार?

यह सवाल लेखक ने एक नहीं कई बार अपनी कहानियों में उठाया है। गुरु चेला संवाद में चेला पूछता है कि गुरुजी , दंगों का जिम्मेवार कौन है। गुरु आखिरकार जनता को जिम्मेवार ठहराता है। जनता का मतलब हम और हम का मतलब कोई नहीं। कोई नहीं यानी शैतान भी नहीं, अल्लाह भी नहीं। संग्रह का अन्त इसी सवाल की खोजबीन से होता है। शैतान के दिल से बोझ उतर जाता है कि चलो, लोग सचाई जानते हैं कि दंगे उसने नहीं करवाये। बाद में लोग उसे बताते हैं कि यहां अल्लाह मियां भी आये थे और वह भी यही बात कह रहे थे। पूरा संग्रह दिल पर पत्थर रख कर समाप्त होता है... सवाल अधर में लटका रहता है... ‘ आखिर कौन?'

संग्रह में ‘ श्री टी.पी. देव की दस कहानियाँ' ब्रेख्त के महाशय ‘ क' और महाशय ‘ ब' की कहानियों की याद दिलाती हैं। सम्भव है शैली और नाम वहीं से प्रेरित हों। लेखक की समझदारी, हास्य, व्यंग्य और खिलन्दड़ेपन का सबूत ये कहानियाँ कहीं बहुत गहरे जाकर मार करती हैं। ये कहानियाँ सही मायनों में असग़र वजाहत की दृष्टि और निशाने की सूचक हैं। ऐसे ही ‘ गुरु चेला संवाद' और ‘ विकसित देश की पहचान' में कुछ सवाल जवाब हैं। इनमें आपको वृत्ताकार तर्क के कई नमूने मिल जाएंगे जो दक्षिणपन्थ की खास प्रवृत्ति है। इस तर्क का अनेक तरीक़ों से उपयोग किया गया है। संवादों के अन्त में लेखक जो कहना चाहता है वह पूरी तरह व्यंग्यात्मक लहजे में अभिव्यक्त हो जाता है। ठीक इसी तर्क पर एक कहानी है, और इस संग्रह में वह अपने किस्म की इकलौती कहानी है ‘ अपनी-अपनी पत्नियों का सांस्कृतिक विकास' । हालांकि, यहां इसके माध्यम से मध्यवर्गीय बौद्धिक तबके के स्त्रियों के सन्दर्भ में दोमुंहे रवैये का पर्दाफाश किया गया है। एक पुरुष दूसरी स्त्री के सांस्कृतिक विकास में बाधाओं को बड़ी आसानी से लक्षित कर लेता है, लेकिन जब अपनी पत्नी की बात आती है तो वह सामन्ती ढांचे को तोड़ नहीं पाता। इस विषय पर कई कहानियाँ लिखी जा चुकी हैं, लेकिन असग़र वजाहत की शैली और भाषा के कारण यह दिलचस्प बन पड़ी है।

असग़र वजाहत के इस चौथे कहानी संग्रह में उनके पिछले संग्रहों की तुलना में कथा भाषा ज्यादा परिपक्व , शैली मारक तथा अर्थ संकेत अधिक लयबद्ध हुए हैं। इन कहानियों को समझने की एक आवश्यक शर्त यह है कि वाक्यों और शब्दों में कहे गये यथार्थ के अतिरिक्त खाली जगहों में कैद खामोशियों को भी पढ़ने की कोशिश की जाए। अच्छी कविता की यही विशेषता होती है कि वह जितना कहती है उससे ज्यादा अनकहा रहा जाता है। असग़र वजाहत की तमाम कहानियाँ इस मायने में कवितात्मक हैं और जितनी बार पढ़ी जाएं, उतनी ही परत दर परत उघड़ती चली जाती हैं। हरेक परत अपने आप में एक कहानी होती है जिसमें कटु यथार्थ की परछाइयां तैरती चली आती हैं, डराती हैं, सहमाती हैं और आभास दिलाती हैं कि यदि हम अभी तक हंस रहे हैं तो सिर्फ इसलिए कि बुरी खबर हम तक नहीं पहुंची है। वरना शैतान अपनी शायरी रचने में मशगूल है... यह जानते हुए भी कि उसकी हरकतों पर नजर रखी जा रही है, उसकी साजिशों को लोग समझ चुके हैं। वह आगे बढ़ रहा है अपनी कार्रवाइयों में, सिर्फ इसलिए कि उसे पता है कि उसे दोषी ठहराने वाला कोई नहीं।

इस शैतानी गणित के तमाम रूप असग़र वजाहत हमें दिखाते हैं। ‘ लड़कियां', ‘ तेरह सौ साल का बेबी कैमिल', ‘ मेरे मौला', ‘ जिम्मेवारी'... ढेर सारे किस्से लेखक के पास हैं और हरेक में दर्द सान्द्र होता जाता है। लेखक सिर्फ एक चूक कर जाता है - वह दर्द के इस पूरे विन्यास में खुद ‘ आउटसाइडर' हो उठता है। यह यदि एक अच्छे कहानीकार की पहचान है तो एक सन्देह का प्रस्थान बिन्दु भी कि क्या रचनाकार का वास्तविक जीवन वैसा है? यदि वह एक ओर ‘ जख्म' के गोष्ठीबाजों और साम्प्रदायिकता विरोधियों का मखौल उड़ाता है और दूसरी ओर खुद उसके पास मुख्तार के सवालों के जवाब में सिर्फ खीझ बची रह जाती है, तो सवाल मौजूं है। यह वही सवाल है जो ज्ञान के सेब से उपजा था। फर्क सिर्फ इतना है कि देशकाल बदल गये हैं। हालात बदल गये हैं। द्वन्द्व किसी सनातन तत्व की भांति अब भी बाकी है।

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मैं हिन्दू हूं : असग़र वजाहत, प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली मूल्य : 150 रु.

(साभार - तद्भव)

पूरा कहानी संग्रह ‘मैं हिन्दू हूँ’ रचनाकार पर यहाँ पढ़ें.

आलेख

 

अनंत में अस्तित्वहीनता

- मनोज सिंह

अंतरिक्ष से हम बहुत हद तक अनजान हैं। जितना हम अब तक समझ पाये हैं, उस हिसाब से भी देखें तो कितना विशाल ब्रह्मांड है हमारा, जहां असंख्य बड़े-बड़े तारे और अनगिनत आकाशगंगायें हैं। इनके बीच उपस्थित हमारा सूर्य और उसका छोटा-सा सौरमंडल। जिसमें फिर दूसरे ग्रहों की अपेक्षा हमारी पृथ्वी थोड़ी छोटी ही है। इसी पृथ्वी के छोटे से हिस्से में एक देश, भारत मेरी मातृभूमि। सौ करोड़ की आबादी और जिनके लिए बसाये गये लाखों गांव, कस्बे, शहर व महानगर। इन्हीं सैकड़ों नगरों में एक नया शहर चंडीगढ़। अभी छोटा ही है। मगर कोठियों व बिल्डिंगों की संख्या हजारों में पहुंच रही है। इन्हीं में से एक इमारत की दूसरी मंजिल पर स्थित फ्लैट के छोटे से अध्ययन कक्ष में बैठकर जब मैं अपने आपको देखता व सोचता हूं तो मुझे अस्तित्वहीनता का आभास होता है।

छोटी उम्र से ही आकाश और तारे मुझे आकर्षित तो करते हैं मगर फिर जल्द ही बेचैन भी करने लगते हैं। रात के अंधेरे में, छत पर लेटे-लेटे, साफ आसमान को एकटक नजर से निरंतर देखने पर अचानक असंख्य तारों के बीच पाकर अजीब-सा डर लगने लगता है। यह दृश्य अत्यंत भयानक होता है। यकीन न हो तो एक बार जरूर देखें, मगर एकाग्रता से। मैं तो अकसर आसमान में कुछ ढूँढना शुरू कर देता हूं। और फिर बार-बार एक ही सवाल बचपन से अनायास उभरता है कि इस आकाश का कहां जाकर अंत होगा? बालक मन अक्सर कहता कि जब दादा-दादी के गांव की सीमा पर दीवार खड़ी थी, ट्रेन मुंबई में जाकर खत्म हो जाती है, शहर की भी सीमाएं होती हैं, घर भी तो चारों ओर से बाउंडरी वॉल से घिरा होता है, देश की भी तो सीमा सुनिश्चित है, तो फिर आकाश की भी तो कोई न कोई सीमा होगी? मगर फिर उत्तर न मिलने पर जिज्ञासा वश अपने आप से ही वाद-विवाद कर बैठता हूं कि अगर कहीं अंत होगा भी तो फिर उसके बाद क्या होगा? गांव, शहर, घर, देश, ट्रेन सभी की सीमाओं के बाहर तो कुछ न कुछ है, ठीक इसी तरह आकाश की सीमा के पार भी कुछ न कुछ होना चाहिए। क्या पानी ही पानी है? नहीं, पथरीली जमीन होगी? या आग ही आग? या फिर हवा ही हवा? कहीं शून्य तो नहीं? या फिर कुछ और? इसके आगे कल्पना तुरंत उड़ान भरने का प्रयास करती। और फिर अगला प्रश्न जल्द ही उभरकर आता, जो भी कुछ होगा उसका भी तो कहीं न कहीं अंत होगा? और अगर होगा तो फिर उसके बाद क्या? और फिर यह क्रम चलता रहता, जिसका जवाब मिले न मिले, यह अंत में अनंत की परिभाषा जरूर सुनिश्चित कर जाता।

बड़े होने पर रोटी-दाल और तेरे-मेरे के चक्कर में उलझकर उपरोक्त सवालों को उभरने का वक्त व मौका ही नहीं मिलता, ऊपर से मस्तिष्क अपने सीमित ज्ञान से जबरन संतुष्ट करवाकर इस जिज्ञासा को शांत ही नहीं दबा भी देता है। परंतु आज भी जब कभी यह प्रश्न उठता है तो फिर मन को जड़ से हिलाकर ही दम लेता है। आंखें बंद करने पर घबराहट होने लगती है, अकेलापन महसूस होता है, सब कुछ व्यर्थ और खाली लगता है, तुरंत आंखें खोलनी पड़ती है फिर भी चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा लगता है। इसी तरह की कल्पना, विचार बनकर शायद किसी और लेख में, किसी और संदर्भ में, किसी और तरह से पहले भी आये हों। परंतु आज यह एक बार फिर अपने आपको अपने आपसे पूछने के लिए मजबूर कर रहे हैं और फिर जवाब न मिलने पर तंग कर रहे हैं। आप भी सोचिए, जवाब ढूंढिये। धर्मग्रंथों को पलटिये, विज्ञान को खोजिए। दार्शनिक, वैज्ञानिक, धर्म गुरुओं से पूछिए। बस एक बात का ध्यान रखें कि कोई शब्दों में आपको घुमाने का प्रयास न करे। सीधा-सीधा जवाब हो और अगर मिल जाये तो मुझे जरूर बतायें, दुनिया को बतायें। मुझे मालूम है कि इसका कोई जवाब उपलब्ध नहीं है। शायद इसीलिए बनाने वाले ने हमें दैनिक जीवन में उलझाकर ठीक ही किया, नहीं तो हम सब पागल हो जाते।

हर बार की तरह इस बार भी घर के अंदर चींटियों का अस्तित्व भरी गर्मी में अचानक उभर आया था। कतारबद्ध, अनुशासित, निरंतर कार्य करते हुए, इनका झुंड पता नहीं कहां से आता है और कहां पर चलता चला जाता है। एक के पीछे एक। मनुष्य ने उनकी चौकसी करते हुए, निरंतर देखते व अध्ययन से इनकी बहुत सारी जानकारियां इकट्ठी कर ली हैं। अपनी खोज और विज्ञान से सुनिश्चित भी कर दिया कि यह देख नहीं सकतीं। शायद स्पर्श व गंध से काम चलाती हैं। मगर मन में एक सवाल उठता है कि हो सकता है उन्हें देखने की आवश्यकता ही नहीं हो या फिर उनके लिए देखने की परिभाषा ही भिन्न हो। हम मनुष्यों में भी तो ऐसी कई प्राकृतिक शक्तियां व गुण नहीं हैं जो दूसरी प्रजातियों में है। मसलन उड़ना, पानी में रहना, अंधेरे में देखना, सूंघकर खोजना। ये तो उदाहरण हैं जो हम देख रहे हैं, हमें मालूम है, हम जानते हैं। कुछ ऐसे गुण भी तो हो सकते हैं जिन्हें हम नहीं जानते और जो अन्य में हो। और ऐसा भी तो हो सकता है कि दूसरे जानवर जानते हो कि यह शक्ति मनुष्य में नहीं। बहरहाल, यह सुनिश्चित है कि चींटियों की अपनी अलग दुनिया होगी। उनके अपने विचार, भावनाएं, दृष्टि, ज्ञान और उनका अपना विज्ञान होगा। तो सवाल उठता है कि उनके लिए यह दुनिया कैसी होगी? उनकी कल्पना व समझने की परिभाषा को भिन्न मान लें तो इस दुनिया के अस्तित्व का, उनके मतानुसार आकार-प्रकार, रूप-स्वरूप कैसा होगा? यह कितनी बड़ी होगी? वो इन संदर्भों में क्या सोचती होंगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक दीवार से निकल कर दूसरी दीवार पर पहुंचने पर उन्हें दूसरे शहर पहुंच जाने जैसा आभास होता हो। बागीचे के बाद, बगल का मकान उनके लिए दूसरे देश पर जाने के समान हो। ऐसे में हो सकता है कि घर के सामने फैले खेत उनके लिए अनंत की परिभाषा बन जाते हों। जो फिर उनकी कल्पना से बाहर की बात हो। और फिर दूर किसी झाड़ियों या पेड़ पर पहुँचते ही उन्हें दूसरे ग्रह में पहुंच जाने जैसा लगता हो।

चींटियों के संदर्भ में ऐसी अवस्था है तो कई इनसे भी छोटे हैं, उनकी दुनिया के बारे में सोचना बड़ा मुश्किल है। भैंस हो या हमारा सिर, उसके बालों में पैदा होने वाले जुएं, उनके लिए हमारा खुद का शरीर एक ग्रह से कम नहीं होना चाहिए। दूसरे के सिर पर पहुंचने पर उन्हें दूसरी दुनिया में पहुंचने जैसा आभास होता होगा। और वह इतनी ही दुनिया को देखकर प्रसन्न हो जाते होंगे। जबकि हमें पता है कि दुनिया इससे आगे है। समुद्र में ऐसी कई प्रजातियां रहती हैं जिनके लिए पानी ही सारा संसार है। उसके बाहर की दुनिया उनके कल्पना के बाहर की चीज है। चूंकि वे बाहर निकलने पर मर जाती हैं, इसीलिए बाहर की दुनिया का अस्तित्व उनके लिए अकल्पनीय है। जबकि हमें मालूम है कि पानी के बाहर भी एक संसार है। कहीं ऐसा ही हमारे साथ भी तो नहीं? कहीं हम सब भी अपने-अपने कुएं में ही मेंढक की तरह तो नहीं रहते, जहां हमारी दृष्टि, विचार व कल्पनाएं कुएं की दीवारों से टकराकर लौट आती हैं। जबकि दुनिया हर कुएं से बाहर भी होती है। कल्पना करें, आपको अस्तित्वहीनता का आभास होगा। हो सकता है थोड़ी बेचैनी हो, जो फिर बेवजह पनप रहे अहं को कुछ हद तक शांत कर तुरंत आनंद देगी व हल्का कर देगी। मगर मेरे जिज्ञासु मन में एक सवाल फिर उठ रहा है कि मेरे कुएं के बाहर जो कुछ भी है, कहीं वो भी तो दूसरा कुआं नहीं? और अगर हां तो उसके बाद क्या?

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रचनाकार संपर्क:

-मनोज सिंह

425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़

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