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July 2007
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आलेख

 

-कमल

 

ये उन लोगों की बात है जिनके बारे में प्रारंभिक जानकारियां बताती हैं कि आर्यों ने अपने अभियानों के दौरान उन पर आक्रमण ही नहीं किये, बल्कि उन्हें खदेड़ कर दूसरी जगहों पर जाने और बसने के लिए मजबूर किया। उनके जल, जंगल और जमीन पर नैसर्गिक व सामूहिक अधिकार की मूल अवधारणा को भंग किया। पौराणिक संदर्भों में देखें तो सतयुग, त्रेता व द्वापरयुग आदि कालों में आदिवासियों को राक्षस, प्रेत, दैत्य, दानव, असुर आदि संज्ञाओं से संबोधित कर उन्हें मनुष्य होने से ही नकारने का दुष्चक्र रचा जाता रहा है। और आधुनिक युग की विडंबना यह शब्दों के हेर-फेर के क्रम में आज उनके अस्तित्व को भी नकारने की जुगत भिड़ाई जा रही है। कोई उनके लिए जनजाति तो कोई उनके लिए वनवासी शब्द गढ़ता फिर रहा है। लेकिन आदिवासी से बढ़ कर कोई दूसरा शब्द हाही नहीं सकता जो उनके लिए उपयुक्त हो या उन्हें ठीक-ठीक परिभाषित कर सके। इस शब्द के साथ ऐसे लोगों का बोध होता है जिनका बोलना ही प्रकृति का गीत है और जिनका चलना ही प्रकृति का नृत्य। जिनकी संस्कृति और समूचा जीवन दर्शन अपनी प्रकृति के साथ सामंजस्य की अदभुत मिसाल है।

ऐसा नहीं है कि ये लोग आक्रमणकारियों का मुकाबला नहीं कर सकते थे सच तो यह है कि जंगलों और पहाड़ों में रहने वाले ये लोग, बर्बर आर्य आक्रमणकारियों से कहीं ज्यादा सभ्य माने जाने चाहिए क्योंकि उन्होंने युद्ध की बर्बरता से ज्यादा महत्व शांति को दिया था। भले ही इसके लिए उन्हें पलायन का विकल्प चुनना पड़ा। गैर-आदिवासियों से हार कर भी आदिवासियों का जुझारूपन कभी खत्म नहीं हुआ और उन्होंने निरंतर जंगलों को काट कर नये-नये गाँव बसाये, कृषि योग्य नयी भूमि तैयार की। सामने से आने वाले दुश्मन का तो वे सामना कर सकते थे लेकिन जो दुश्मन उनके अपने बन कर उनके साथ रहने लगे थे, उनका सामना करने में सीधी-सादी जिंदगी जीने वाले संताल असमर्थ थे। आने वाला काल राजतंत्र, जमींदारी प्रथा एवं महाजनी व्यवस्था का होता चला गया। छोटानागपुर, पोड़ाहाट, सराईकेला-खरसावाँ, धालभूम में राजवंशों की नींव मजबूत पड़ते ही आदिवासी ग्राम-प्रशासन व्यवस्था नष्ट होती चली गई।

विश्व के प्राचीनतम गोंडवाना पठार का कुल 7971400 हेक्टेयर उत्तरी-पूर्वी भूखंड है झारखंड। भूगोलशास्त्रियों के अनुसार इसकी आयु डेढ़ से तीन अरब वर्ष है। प्रशासनिक दृष्टि से झारखंड को संताल परगना, उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर और पलामू चार प्रमंडलों में बांटा गया है। 15 नवंबर 2002 (भगवान बिरसा जयन्ती) के पूर्व का बिहार और अब के झारखंड में आदिवासियों की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा संताल आदिवासी हैं। अकेले उनकी जनसंख्या उराँव, मुंडा और हो की कुल जनसंख्या के बराबर है। पूरे देश की बात की जाए तो लगभग पचास लाख संताली झारखंड, उड़ीसा और प बंगाल के विस्तृत क्षेत्र में फैले हुए हैं। लेकिन इसके साथ ही यह निराशाजनक तथ्य भी जुड़ा हुआ है कि प्रति हजार निरक्षरता की दर सबसे ज्यादा (872) उनकी ही है।

वसंत पंचमी को 'बाहा पोरोब' (फूलाें का त्योहार) मनाने वाले संताल कई मायनों में राज्य के अन्य आदिवासियों से भिन्न हैं। 'होरकोरेन मारे हपरमको रियाक' (गुरू कोलियन) की कथा का ध्यान रखा जाए तो प्राचीन एवं मध्यकालीन भारत में हो रहे राजनैतिक एवं सांस्कृतिक द्वंदों के काल में संताल आदिवासी छोटानागपुर के हज़ारीबाग, सिंहभूम एवं मानभूम जिलों में फैले। आगे चल कर वे लोग बंगाल के बीरभूम, बांकुड़ा एवं मेदिनीपुर आदि इलाकों में बसते चले गये। यह सही है कि संताल 19वीं सदी के बाद जबरदस्त सांस्कृतिक दबावों का सामना कर रहे हैं और गैर आदिवासी समाज का वर्चस्व लगातार बढ़ता जा रहा है। अभी मोटे तौर पर संताल आदिवासियों की दो तरह की बसाहटें हैं। पहली गैर-आदिवासी जन जीवन के बीच बिखरी हुई। इस तरह की बिखरी हुई बसाहट खासतौर पर उस इलाके में है जहां जंगल पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं और पहाड़ नहीं हैं। दूसरी है आदिवासी जनजीवन की निरंतरता वाली बसाहट जहां अभी भी आदिवासी बाहुल्य है या हाल तक रहा है। झारखंड के संताल परगना में निरंतर व बिखरी हुई दोनों तरह की बसाहटें मिलती हैं।

संताली गीतों व गाथाओं में इनकी उत्पत्ति के बारे में एक पौराणिक गीत है:- 'आमगे बाबा प्रभू ईश्वर कुश काराम सिरोम रेहेत रिनपिचलू हाड़ाम पिचलू बूड़ही दो' अर्थात् है पिता परमेश्वर! तुमने कुश करम सिरम पेड़ की जड़ों से हंस-हंसिनी का जोड़ा बनाया था। उन दोनों ने अतल समुद्र के मध्य स्थित करम पेड़ की डाली पर घोंसला बनाया था और उसमें दो अंडे दिये थे। हे पिता परमेश्वर! तुम्हारे आदेश से उन अंडों से दो मानव शिशुओं ने जन्म लिया था। तुम्हारे ही आदेश से दोनों ने हिहिड़ी-पिपिड़ी इलाके से कंटीली घास ला कर उन दोनों शिशुओं की रक्षा की थी। नौ दिनों के बाद अर्जुन के पत्तों में लिटा कर उनकी छट्टी की गई और उन दोनों मानव शिशुओं का नाम रखा गया था-पिचलू हाड़ाम बूढ़ा (पुरूष) और पिचलू बूढ़ी (स्त्री)। हम संताल उन्हीं दोनों की मानव संतान हैं।

1760 में संथाल परगना क्षेत्र में ईस्ट-इंडिया कंपनी के पाँव पसारते ही संतालों की स्वशासी व्यवस्था टूटने लगी। मगर आदिवासी इलाकों में बढ़ते अंग्रेजों के कदमों के साथ-साथ उनके विरुद्ध विद्रोहों का सिलसिला भी बढ़ता गया। पहाड़िया विद्रोह(1788-90), चुआड़ विद्रोह(1798), चेरो विद्रोह(1800)। इन विद्रोहों का झंडा झुका नहीं तो इसका एकमात्र कारण था कि संताल औरतें पीठ पर बच्चा बांधकर पुरुषों का साथ दे रही थीं।

गैर-आदिवासी ठेकेदारों के हाथों अपनी जमीनें गंवाने के साथ-साथ संताल पुन: विस्थापित होने लगे, उनकी आर्थिक स्थिति दयनीय होने लगी। गरीबी और भुखमरी ने उनको महाजनों के चंगुल में जा पटका। महाजनों और सामंतों के शोषण ने उनकी जिंदगी नारकीय बना दी। जिसके खिलाफ संतालों का गुस्सा 1854 में मोरगो मांझी और बीर सिंह मांझी का दिकू लोगों के विरुद्ध आंदोलन और 1855 में महान संताल विद्रोह के रूप में सामने आया।

शोषण का वह दौर अभी भी थमता नहीं दिखता, शायद इसीलिए यहां झारखंड राज्य गठन के बाद अब तक पंचायत चुनाव नहीं हुए हैं। अपनी जमीनों को बचाने के लिए उनको हमेशा ही संघर्ष करने पड़े हैं। आज भी भारत सरकार जल, जंगल, जमीन और विस्थापन संबंधी नीतियों के मामले में अंग्रेजों की राह पर चल रही है, जो नीतियाँ कभी भी आदिवासियों की हितैषी नहीं रहीं। संताल परगना टीनेंसी एक्ट-1949 उनके ऐसे ही संघर्ष का परिणाम था। लेकिन इस एक्ट के तहत अंग्रेजों की सामंती व्यवस्था ने महिलाओं को सत्ता-संसाधनों के मालिकाना हक से दरकिनार कर दिया।

जैसे मुंबइया फिल्मों ने भाई शब्द का अर्थ बदल दिया है। पहले जहाँ इसका अर्थ आदरणीय बड़ा भाई या प्यारा छोटा भाई होता था वहाँ अब इसका नया अर्थ अपराधी, गुंडा या मवाली हो गया है। वैसे ही आज आदिवासियों के लिए 'विकास' शब्द का अर्थ बदल चुका है। अब यह शब्द उनमें खुशी की जगह भय पैदा करता है। क्योंकि इसके नाम पर उनका विकास तो नहीं हुआ अलबत्ता विस्थापन और स्थानांतरण ही अधिक हुआ है। यदि ऐसा न हुआ होता, तब क्या कारण है कि उनकी वर्तमान स्थिति और उस दिन की स्थिति (जब उनके लिए विकास योजनाओं का प्रारंभ किया गया था) में कोई भी उल्लेखनीय अंतर नहीं दिखता? सच तो यह है कि आदिवासियों के विकास के नाम पर किये गये कार्यों से चंद आदिवासी (क्रीमी लेयर) और प्रभावशाली गैर-आदिवासियों का ही विकास हुआ है। उनके विकास की बात करने के लिए संतालियों के अतीत और वर्तमान की चर्चा मात्र ही नहीं होनी चाहिए वरन् हर स्तर पर (चाहे पंचायत हो या विधायिका, कार्यपालिका हो या न्यायपालिका) उनकी सीधी और सच्ची भागीदारी जरूरी है वरना उनके विकास की बात बेमानी होगी, जैसा कि अब तक होता आया है।

निश्चय ही हिन्दू लुटेरों, शोषकों के साथ-साथ ब्रिटिश शासन अथवा ईस्ट-इंडिया कंपनी के विरुद्ध 1855 का संताल विद्रोह ही था जिसने विदेशी मिशनरियों में संताली भाषा के प्रति दिलचस्पी जगाई। 'संताली' ऑस्ट्रियक भाषा समूह की एक प्रमुख भाषा है। 'एन इंट्रोडक्शन टू संताल लैंग्वेज' (रेवरेंड डॉ ज़े फिलिप्स) सन् 1852 में प्रकाशित संताली भाषा साहित्य की पहली पुस्तक मानी जा सकती है।

इतर साहित्यों की तरह संताली साहित्य भी काफी प्राचीन व विकसित है। लगभग सवा सौ साल (सन् 1880) पहले प्रकाशित कवि रामदास टुडू का महाकाव्य 'खेरवाड़ बोंशा धोरोम पुथी' एक महत्वपूर्ण रचना है। इसे ही प्रकाशित संताली साहित्य का प्रारंभ माना जाता है। यह बंगाली लिपि में प्रकाशित हुई थी। संताली भाषा के साथ एक बड़ी ही दिलचस्प बात यह है कि इसकी रचनाएं बंगाली, उड़िया, रोमन और नागरी लिपि सभी में लिखी जाती रही हैं। इधर संताली के लिए 'ओलचिकि' लिपि को समृद्ध और विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। नागरी लिपि में संताल लेखन, प्रकाशन बहुत बाद में प्रारंभ हुआ जबकि रोमन लिपि में कहानियाँ व कहानी संकलन दशकों पूर्व से प्रकाशित होते रहे हैं। हृदय नारायण मंडल 'अधीर' की कहानी 'बापुड़िचूकिन' को नागरी लिपि में प्रकाशित पहली संताली कहानी माना जाता है। संताली भाषा साहित्य में संताली और असंताली-भाषी दोनों तरह के लेखकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। संताली में कविता की पहली किताब पूर्व लोकसभा सदस्य पाऊल जुझार सोरेन की 'ओनोड़हें बाहा डालवा' (फूलों की डाली) है जो रोमन लिपि में सन् 1936 में प्रकाशित हुई थी। उसमेें राष्ट्रनिर्माण, ग्रामोद्धार, प्रेम और सौंदर्य के शाश्वत भावों से ओतप्रोत 17 कविताएं हैं।

उसके लगभग छ: वर्षों बाद संताली में एक पत्रिका 'मारसाल' (प्रकाश) के माध्यम से संताली कविताएं लिपिबद्ध हुईं। उसके संपादक श्री सिहरी मुरमू उर्फ 'चंपाई' थे। सन् 1942 में प्रकाशित 'मारसाल' का पहला अंक हस्तलिखित था, दूसरा अंक भवानी प्रेस गालूडीह से बंग्ला लिपि में छपा था।

इसके बाद अनेक लोक कवियों ने संताली लोक गीतों का संकलन एवं प्रकाशन किया है। इनमें पं रघुनाथ मुरमू का 'होर सेरेज' (1936) डहर गीत, डब्लू ज़ार्ज आर्चर का 'होड़ सेरेज' (1945) लोक गीत एवं 'दोंङ सेरेज' विवाह गीत (1945), नायके मुगल चंद्र सोरेन का 'दांसाय-सोहराय-करम गीत' (1945), भागवत मुरमू ठाकुर का 'दोंङ सेरेज' (1963) विवाह गीत, गोमस्ता प्रसाद सोरेन का 'अखाड़ा थुती' (1965) लांगड़े गीत, नुनकू सोरेन का 'कारम सेरेज' (1980) करम गीत, केवल राम सोरेन का 'माँझी छटका' (1981) लांगड़े गीत, मलिंद्र नाथ हंसदा का 'देवी देसाय' (1982), हरिहर हंसदा एवं बिरबल हेमब्रम का 'संताली लोक गीतों का संग्रह' (1985) आदि कई महत्वपूर्ण कृतियां हैं। संताली कविवर स्व साधु रामचांद मुरमू की जन्म शताब्दी वर्ष 1997 पर श्री प्रसाद दासगुप्त ने उनकी रचनावली 'साधु रामचांद ओनोलमाला' की अधिकांश रचनाओं का बंगाली में अनुवाद किया है। उनकी प्रसिद्ध कविता 'देबोन तेंगोन आदिबली वीर' तो अब संताली राष्ट्रीयता का गीत बन चुकी है।

गीत-संगीत हमेशा से इनके सुख-चैन की जीवंत अभिव्यक्ति का मधुर माध्यम रहा है। अलग-अलग मौसमों और त्योहारों के अवसरों पर गाये जाने वाले इन विभिन्न गीतों और नृत्यों में ये अपने सारे दुख-दर्द भूल कर कुछ ऐसे खो जाते हैं मानों प्रकृति ने दुनियाँ भर की खुशियां इनकी झोली में भर दी हों। प्राचीन संताली काव्य में पर्व-त्योहार, विवाह, प्रकृति, प्रेम के गीत हैं, वहीं आधुनिक काव्य में देश भक्ति, हास्य, गीतिकाव्य प्रकृति, प्रेम आदि कई रस पाये जाते हैं।

संताली कविता ने पद्य से छंदमुक्त होने तक का सफर सफलतापूर्वक पूरा किया है। आधुनिक संताली कविता में पाऊल जुझार सोरेन, पंचानन मरांडी, नारायण सोरेन, रघुनाथ टुडू, हरिहर हंसदा, साधु रामचांद मुर्मू, कृष्ण चंद्र टुडू, साकिल सोरेन, डोमन हंसदा, काजली सोरेन, डोमन साहू समीर, बासुदेव बेसरा, अमृत हंसदा, सुरूजमुनी मरांडी, कर्नलियस मुरमु, विभा हंसदा, नली सिरंजन मुरमु निर्मला पुतुल आदि के साथ-साथ कई कवि उल्लेखनीय योगदान कर रहे हैं।

दुनियाँ के अन्य समाजों की तरह आदिवासी समाज की रचना में भी महिलाओं एवं पुरूषों की साझेदारी रही है। यदि आक्रमणों व शोषण के विरूद्ध सिद्धो-कानो जैसे पुरुषों ने संघर्ष किया तो संताल विद्रोह के समय फूलो-झानोके रूप में महिलाओं ने भी उनके साथ कंधे से कंधा मिला कर संघर्ष किया था। जहाँ तक संताल समाज की मूलभूत संरचना का प्रश्न है आदिवासी महिलाओं का योगदान पुरुषों से कई गुना ज्यादा है। वे अपने समाज की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। खेत-खलिहान, जंगल-पहाड़, हाट-बाजार उन्हें हर जगह मेहनत-मजदूरी करते देखा जा सकता है। लेकिन कमाई के पैसों को खर्च करने में उनके अपने निर्णय नहीं होते। परिवार के काहिल पुरुषों का खर्चा-पानी के अलावा उनके लिए दारू-ताड़ी आदि का प्रबंध करना भी उनके ही जिम्मे होता है। लेकिन अफसोस की बात यह है कि आज संताली समाज में स्त्री-पुरुष समानता भी एक ऐतिहासिक सत्य बन कर रह गई है। अपने समाज में ही संताल आधी आबादी बुरी तरह उपेक्षित है। संताल समाज में भी जन्म के साथ ही मादा शिशु को ले कर भेद-भाव शुरू हो जाता है। बेटा पैदा होने पर जिस धाई माँ को दो मन धान दिया जाता है वहीं बेटी पैदा होने पर उसका मेहनताना घट कर आधा हो जाता है। क्या बेटी पैदा होने पर धाई माँ को आधी मेहनत करनी पड़ती है?

एक तरफ आदिवासी प्रथागत नियम कानून में संताली औरतों के लिए कहीं कोई व्यवहारिक व्यवस्था नहीं है, तो दूसरी तरफ संवैधानिक व्यवस्था को भी लकवा मार गया है। वह भी आदिवासी पुरुष-सत्ता और प्रधानी व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में खड़ी है। 'ट्राइबल लॉ एण्ड जस्टिस' (डब्ल्यूज़ीऑर्चर) के अध्याय-द राइट्स ऑफ संताल वुमेन (पृष्ठ-187-201) के अनुसार संताल औरत ने अपनी श्रमशक्ति और उपादेयता के कारण परिवार में भले ही निर्णयात्मक स्थान ग्रहण कर लिया हो सिद्धांतत: उन्हें समाज में पुरुष की तुलना में दोयम दर्जा ही हासिल है। वह जब तक कुंवारी है अपने पिता-भाई की, विवाहोपरांत पति और वृद्धावस्था में पुत्र की जिम्मेदारी मानी जाती है। उसने अगर किसी सामाजिक नियम का उल्लंघन किया है तो ग्राम के पंच उसकी अवस्था अनुसार उस पर जुर्माना लगाते हैं और उम्मीद करते हैं कि उसके पति, पिता-भाई या पुत्र उसे चुकाएंगे। बहुत सारी सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों (जैसे-छप्पर छाना, तीर-धनुष चलाना, उस्तरे का उपयोग, हल चलाना, खेत को समतल करना, बरमा से छेद करना, कुल्हाड़ी चलाना, बंशी-काँटा से मछली पकड़ना, कपड़ा-खटिया आदि बुनना आदि) से महिलाओं को वंचित कर दिया गया है। वे पुरुषों का वस्त्र धारण नहीं कर सकतीं, ना उनके उपकरणों का उपयोग ही कर सकती हैं। संताली स्त्रियों को सम्पत्ति पर कोई अधिकार नहीं है। सम्पत्ति पर अधिकार ना रहने के कारण ही समाज में शादी करके छोड़ने एवं डायन बता कर मार डालने की घटनाएं होती रहती र्हैं। डायन घोषित करने के पीछे मूलत: स्त्रियों को सम्पत्ति के अधिकार से वंचित करना है। परंपरागत न्याय व्यवस्था में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। यदि किसी स्त्री की समस्या को लेकर पंचायत होती है तो उस पंचायत में वह स्त्री सीधे जा कर अपनी बात नहीं कह सकती। उसे किसी पुरुष के माध्यम से ही अपनी बात पंचायत में पहुँचानी पड़ती है। इससे संताल औरतों की उनके अपने समाज में स्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

संताल समाज में ऐसा अंधविश्वास है कि चूँकि महिलाएं ही डायन बन सकती हैं इसलिए न तो वे शव के साथ अंतिम यात्रा में भाग ले सकती हैं, न ही मांझीथान में नगाड़ा बजा सकती हैं। इन सब से यही प्रमाणित होता है कि अन्य समाजों की तरह ही संताल समाज ने भी स्त्री को प्रतिष्ठा और शान के रूप में 'संपत्ति' मात्र ही बना कर रखा है।

यह बात कम पीड़ादायक नहीं कि संतालों ही नहीं सारे आदिवासियों के बुनियादी अस्तित्व को नष्ट करने के प्रयत्न लगातार हो रहे हैं। जिसका आधार यह लंगड़ा तर्क है कि उनके विकास व संवर्धन के लिए उन्हें समाज की मुख्य धारा में जोड़ना नितांत आवश्यक है। (इस मुख्य धारा के छद्म का ताजा उदाहरण तो द्वीपों पर बसने वाली वे जनजातियां हैं जो सुनामी के प्रकोप से जीवित बच गईं। जबकि तथाकथित मुख्य धारा के सभ्य लोगों का हाल सारी दुनियाँ जानती है।) तो आजकल आदिवासियों को हिन्दू साबित करने का फैशन कुछ ज्यादा ही जोर पकड़ता जा रहा है। संघ कार्यकर्ता आदिवासियों को समझाते हैं कि तुम हिन्दू हो, हनुमान तुम्हारे पुराने देवता हैं। आदिवासियों से बजरंगबली के झंडे का जुलूस हथियारों और नगाड़ों के साथ निकलवाया जाता है। सरल और धार्मिक दृष्टि से बिल्कुल उदार आदिवासी इसे भी हड़िया पीने और नाचने-गाने का एक अवसर मानकर जश्न मना लेते हैं।

जबकि वास्तविकता यह है कि सहिष्णुता पर आधारित उनका अपना विशिष्ट, प्रकृतिवादी धर्म-दर्शन है जिसे आदिधर्म या सरना कहा जाता है। सरना आदिवासियों की धार्मिक आस्थाओं का वह मूल स्वरुप है जिसे प्रकारांतर में एनिमिज्म, एनिमिस्टिक रिलीजन, प्रिमिटिविज्म, प्रिमिटिव रिलीजन, बोंगाइज्म आदि नामों से जाना गया है। लेकिन इन सब के बावजूद संविधान में उनकी कोई स्वतंत्र धार्मिक पहचान नहीं है। जनगणना में इसके लिए उन्हें 'अन्य' के विकल्प में रखा जाता है। अत: जो आदिवासी स्वयं को ईसाई, मुसलमान या बौद्ध नहीं बताते, वे हिन्दू के अंतर्गत ही चिन्हित होने को विवश हैं और हिन्दू धर्म की इस उदारता में उनकी जगह सबसे नीचे (हरिजन से भी नीचे) होती है। आदिवासियों के लिए इस तथाकथित उदारता के आगे नतमस्तक होना अनंत काल के लिए गुलामी स्वीकार करना ही होगा।

आधुनिक युग में संताल भी अन्य आदिवासियों की तरह अपने आप को दोराहे पर पाता है। पहले उनका जीवन सीधा, सरल, निश्छल होता था। वे लोग अपनी खुशी के लिए प्राकृतिक माहौल में नृत्य करते और गीत गाते थे, अब बाहर वालों की खुशी के लिए बाहरी कृत्रिम माहौल में वैसा नृत्य-संगीत करते हैं। और किस कीमत पर?

उनकी समझ में नहीं आता कि औद्योगिक संस्थानों, परियोजनाओं और बाँध निर्माण आदि विकास कार्यों के लिए उन्हें क्यों विस्थापित किया जा रहा है?

कई वर्ष पूर्व लिखी गई रेड इंडियन आदिवासी कवि 'सिएंथल' की कविता 'प्रमुख के नाम पत्र' आज भी कितनी प्रासंगिक है (उसकी कुछ पंक्तियां):-

"...इस जमीन का एक-एक कण हमें पूज्य है।

पेड़ों का एक-एक पत्ता, हरेक रेतीला तट,

शाम के कोहरे से ढंका हुआ जंगल,

सपाट मैदान और भौरों का गुंजन,

ये सभी पवित्र हैं, पूज्य हैं।

हम आदिवासियों की यादों और जीवन से बंधे हैं।

ये पेड़ अपनी रगों में

हमारी अतीत की यादें संजोए हुए हैं।

यहाँ के सुगंधित फूल हमारे भाई बहन हैं।

ये हिरण, ये धोड़े, ये विशाल पक्षी

सब हमारे भाई हैं।

गोरे भूल जाते हैं मरने के बाद अपनी जन्मभूमि

लेकिन हम नहीं भूलते अपनी मिट्टी, मरने पर भी।..."

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कमल

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कहानी

निगरानी

 

- राजनारायण बोहरे

 

पंछी राम बड़ा तुर्रम खाँ है । पूरे पैंतीस बरस से वह कलेक्टर के हाथ के नीचे काम कर रहा है, सो बड़े -बड़े हाकिम-हुक्कामों से बोलने बतियाने और उनकी सेवा करने का अच्छा तज़ुर्बा है उसके पास । इस हुनर और तज़ुर्बे के दम पर अपने साथी चपरासियों के साथ बैठकर वह खूब लंबी लंबी गप्पें मारता है । बाकी लोग, चुप बैठ कर उसकी बातें मुंह बाये सुनते रहते हैं और उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं ।लेकिन इस दफा पंछीराम ऐसा फंसा कि सारी चौकड़ी भूल गया ।

दरअसल हुआ कुछ ऐसा , कि उन दिनों चारों ओर घनघोर बदरा छाये थे । सावन का महीना था । पूरे देश में झमाझम बरसात हो रही थी । छोटे-साधनहींन और दूर के इलाके में बसे गाँवों की कौन कहे, खूब ठीकठाक कस्बों और ख़ासे बड़े, तरक्की पा गये गाँवों तक पहुंचने के रास्ते गोबर और कीचड़ की गहरी लम्बी नदियों में तब्दील हो चुके थे ।

ऐसे बसकारे के टप्प-टप्प मौसम में दिल्ली बैठे एक आला हुक्काम ने हुकुम दागा कि अगले माह देश में आम-चुनाव कराये जायेंगे । जिस दिन अखबारों में यह खबर छपी, देश भर के प्राइमरी स्कूलों के मास्टर, तमाम दफ्तरों के बाबू-चपरासी, तहसीलों के पटैल-पटवारी और कोटवार तथा पुलिस थानों के दरोगा और सिपाही समेत अनेक कर्मचारी मन-ही-मन दहल उठे । ब्याह के डला-टिपरियों सी चुनाव की पेटी, थैली और तमाम सामग्री माथे पर लादे, अन्जान डगर और अजनबी गांवों में जाकर, भूखे-प्यासे और नींद के सताये रहकर ,भय और दहशत के माहौल में उनने अब तक की नौकरी में जितने भी चुनाव कराये थे , वे सब एक-एक कर उन्हें याद आने लगे । चुनाव तो वैसे भी भय कारी होता है, चाहे सूखा मौसम और ऐन शहर का पोलिंग क्यों न हो, फिर इस बार तो बारिश का घुटन भरा मौसम होगा । तो कैसे क्या होगा , इस चिन्ता में कई अफसर-अहलकारों की वह रात जगते हुये बीती । उधर यही खबर जब छोटे-बड़े नेताओं ,बिल्ला-परचा और पोस्टर छापने वाले प्रेसमालिकों, छुटमुट पेन्टरों ,माईकवालों और बेरोजगार गुण्डे-मवालियों ने पढ़ी, वे सब खुशी से नाच उठे-अब पांच साला कुम्भ आ गया था उनका ।

इधर चाय की दुकानों और दफ्तरों की खुली सभाओं में बारिश के मौसम में चुनाव हो पाने की संभाव्यता पर बहस चल रही थी और उधर दिल्ली में चुनावों की व्यवस्था समझाने के लिए बैठक बुलायी गयी बैठक में देश भर के आला हाकिम रबर के गूंगे गुवें की तरह चुनाव-व्यवस्था संभाल लेने के प्रश्न पर हामी में सिर हिला रहे थे- अब तक हर काम के लिए हामी में सिर हिलाते-हिलाते उनकी गरदन की हड्डी सिर्फ आगे-पीछे सिर हिलाने लायक ही रह गयी थी शायद, दांये-बांये यानी कि इन्कार में सिर हिलाना इस अवस्था में संभव नहीं था ।

दिल्ली में सब ''यस सर'' कह कर लौट आये और घर आ के इस चिंता में डूब गये कि अब इन झमेलों से कैसे निपटें- दूबरी और दो अषाड़ ! अलबत्ता प्रदेश कार्यालयों से कागजी कबूतर नाना प्रकार के सन्देश और परवाने लेकर उड़े तथा जिला कार्यालयों के सुस्त पड़े चुनाव-दफ्तरों में प्राण फूंकने लगे । सोये-अलसाये अंगड़ाई लेकर उठे और हुंकारा भर के आंखों का कांटा बने पुराने कई कर्मचारियों को अपने यहां अटैच करने के हुक्मनामे पहली ही फुरसत में जारी कर डालें ।

कलेक्टर के खासलुखास होने से चपरासी पंछी राम की ड्यूटी कभी भी चुनाव कार्यालय में नहीं लगी थी । लेकिन इस बार जाने कैसे जब उसे चुनाव कार्यालय में अटैच किया गया तो उसका माथा ठनका । मन ही मन उसने दिल्ली के आला हुक्काम से लेकर चुनाव कार्यालय के बड़े बाबू तक को खूब गरियाया ।

कीचड़ और गन्दगी से घिरे गांवों में बैठे भोले और निश्छल किसानों को बसकारे के नीरस मौसम में वक्त काटने का नया शिगूफ़ा हाथ लगा तो वे लोग अफ़सरों ,नेताओं और पुलिस वालों के भाग-दौड़ को बड़ी उत्सुकता से निहारने लगे । सबको कौतूहल था कि बरसात के इस झलाझल मौसम में अफसर लोग कैसे चुनाव करा पायेंगें ?

कलेक्टर के चैम्बर में उस समय केवल दो लोग थे -चपरासी पंछी राम और नायब तहसीलदार तोता राम उर्फ टी0 आर0 खुर्राट ।

कलेक्टर साहब एक फाइल में सिर गड़ाये बैठे थे, जबकि नायब साब पूरी तन्मयता से अपने सामने रखा एक अखबार पढ़ रहे थे । पीछे खड़े पंछीराम को उत्सुकता हुई, तो वह भी कलेक्टर साहब की नजर से बचते हुए ऐड़ियों के बल आहिस्ता से ऊंचा उठा और इस तरह खुर्राट साहब की आंखों के आगे फैली खबर को बांचने लगा । समाचार इस प्रकार छपा था -

चुनाव सुधार का नया फार्मूला

दिल्ली (संवाद एजेंसी ) चुनावों में लगातार बढ़ रहे खून-खराबे तथा फिजूल खर्ची पर एक अरसे से देश के बड़े कानूनविद चिंता जताते रहे है । इस चिन्ता से सहमत होते हुए केन्द्र सरकार ने अभी हाल में एक महत्वपूर्ण


निर्णय लिया है । इस निर्णय के तहत चुनावी माहौल को साफ-सुथरा करने की दृष्टि से खून-खराबे व फिजूल खर्ची रोकने के लिए देश में नया फार्मूला लागू किया जायेगा । आइंदा से हर चुनाव में प्रत्येक क्षेत्र में एक बाहरी निगरानी अफसर तैनात किया जायेगा, यह अफसर क्षेत्र में हाजिर रहकर सारी चुनाव प्रक्रिया पर निगरानी रखेगा, उसे जहां भी किसी तरह की धांधली या नियम विरुद्ध काम दिखेगा, वह सारा चुनाव रद्द करा सकेगा । इस नये फार्मूले से देश के चुनावी इतिहास में क्रांतिकारी फेर बदल होने की संभावना है । आशा है कि हर तरह की धमकी-लालच और प्रचार-प्रसार के शोर-शराबे, हिंसक झड़पों तथा बेशुमार चुनावी खर्च पर ये अफसर नकेल डाल देंगे और मतदाता निडर होकर मतदान करेगा । जिसके कारण देश में जनतंत्र का वास्तविक स्वरूप उभरेगा, और चुनावों की पवित्रता पुन: स्थापित होगी ।

सहसा कलेक्टर साहब ने सिर उठाया, और वे बड़ी विनीत मुद्रा में कहने लगे - कहने-सुनने में ये सब चीजें अच्छी लगती हैं । शायद सैद्धांतिक रूप से भी यह इंतजाम ठीक होंगे। लेकिन प्रेक्टिकली बड़ी दिक्कत है,दिल्ली में बैठे लोग क्या जानें कि जाने-अनजाने हम लोग बहुत-सी अनदेखी अपरिहार्य गलतियां और लापरवाही करते रहे हैं,जो अब शायद नुकसानदायक हो जायें । ........खैर । आप लोगों ने देख ही लिया कि अपने ऊपर दिल्ली से एक बाहरी अफसर तैनात किया जा रहा है, जो बिला-वजह अपने को परेशान करने के लिए हमारी छाती पर बैठा रहेगा । पर आप दोनों पुराने अनुभवी आदमी हो । मुझे विश्वास है कि आप लोग सब संभाल ही लेंगे । मैं आप दोनों को अपना आदमी मान के उस अफसर के साथ लगा रहा हूं । देखना उसकी सेवा सत्कार में कोई कमी न रह जाये । अपने को जैसे-तैसे केवल दस दिन का समय निकालना है । यदि इस पीरियड में उस अफसर को कोई शिकायत रह गई तो वो मेरा कैरियर ही चौपट हो जायेगा ।

कलेक्टर की बात सुनते समय पंछी राम मन ही मन बड़ा खुश हो रहा था, क्योंकि बात-बात में शेर सा दौंकी मारने वाला कलेक्टर इस वक्त भीगी बिल्ली सा म्याऊं म्याऊं कर रहा था ?

लेकिन भीतर ही भीतर एक अज्ञात सा भय उसे खाये जा रहा था, कि जिस अफसर से कलेक्टर डर रहा है उसके लिये नायब और पंछीराम तो मक्खी - मच्छर हैं । गलती से दिल्ली वाला अफसर कहीं उनसे नाराज हो गया तो नौकरी जाने में सेकंड नहीं लगेंगे । वह सोचने लगा कि महीना भर पहले से उसने छुट्टी क्यों नहीं ले ली ! अब इस वक्त किसी को छुट्टी मिलने से रही । इस समय तो बाकी सारे काम व्यर्थ हैं । इस समय सब अफसर छोटे हैं । इस समय तो मात्र दिल्ली वाला अफसर ही बहुत ताकतवर है । वो जो लिख देगा, दिल्ली से वैसा ही हुकुम आ जायेगा । उसकी दिल्ली जाने वाली रोज-रोज की रपट बड़ी महत्वपूर्ण है ,इस कारण कलेक्टर की भी फूंक सरकती है इन दिनों ।

कलेक्टर के चेम्बर से बाहर निकला तो बाकी चपरासियों ने पंछी राम को घेर लिया -कलेक्टर ने अकेले में क्या बात करी ?

पंछीराम को भरपूर मौका मिला ,सो उसने गप्पें ठोंकने में कोताही नहीं की और लंतरानियां मारना शुरु कर दीं, कि किस तरह कलेक्टर ने उसे बगल की कुर्सी पर बिठा कर चाय पिलाई और दिल्ली से आने वाले हुक्काम के साथ एक ख़ास अफसर के रुप में काम करने का अनुरोध किया वगैरह वगैरह । बाकी लोग विस्मय में डूबे पंछीराम की आड़ी-तिरछी उड़ान के नजारे देखते रहे ।

घर जाकर उस दिन पंछी राम को रात भर नींद नहीं आई । उसने कलेक्टर को रात भर खूब गालियां दी, जिसका अंग विशेष इस कारण फट रहा था, कि दिल्ली से आने वाला अफसर बड़ा कड़क है । दिल्ली के आला हुक्कामों को भी निगरानी अफसर तैनात करने के नये चलन पर पंछी राम ने नहीं बख्शा-अरे भैया चालीस साल से जिस ढंग से चुनाव चल रहे थे वैसे ही चलने देते । ये क्या कि सारे देश को उलट पुलट दो और इधर के अफसर इधर, उधर के अफसर इधर की जगहों पर तैनात कर डालो । जाने कहां का फिजूल चलन शुरु दिया, यूं ही बैठे ठाले । जैसे प्रदेश और जिले के अफसरों पर कोई विश्वास ही नहीं बचा हो ।

''शताब्दी एक्सप्रेस का खर्चा या तो सरकारें उठातीं हैं या फिर विधान सभायें, और पार्लियामैण्ट । या तो अटैची हाथ में लिये मोटा चश्मा,भारी तोंद और गर्मी में भी सूट डाटे बैठे घाघ अफसर इस चलते फिरते महल में यात्रा करते हैं, या फिर एम0 पी0 और विधायक ।'' पंछी राम की इस धारणा को सच साबित करता पचपन-छप्पन साल का एक अध गंजा खड़ूस -सा आदमी शताब्दी एक्सप्रेस के डिब्बे से उतर के स्टेशन पर अनाथ सा खड़ा था । वह नाक-भौ सिकोड़े आसपास के यात्रियों को तुच्छ नजरों से घूरता हुआ अपने दो सूटकेस संभाले इधर-उधर ताक रहा था । नायब साहब ने अन्दाजा लगाया कि यही होगा दिल्ली वाला निगरानी अफसर ।

नायब साहब उसके बगल में पहुँचे, अपने आगे निकले पेट को जितना वे दबा सकते थे उतना दबाते हुये अधझुके से होकर उस खडूस से आदमी से बड़े मीठे स्वर में वे पूछने लगे-आप कोहली साहब हैं ना सर ।

''हूँ !!!'' एक लम्बे हुंकारे ने नायब साब को और झुका दिया, ''नमस्ते सर । मैं आपकी कॉस्टीटयूऐन्सी का लायजनिंग अफसर हूँ - नायब तहसीलदार टी.आर.खुर्राट । ''

''तुम्हारा कलेक्टर कहाँ है ? उसे फुरसत नहीं मिली मुझे लेने आने की ।'' कोहली की त्यौरियां चढ़ गयी ।

''सर'' नायब साब ने ऐसा शब्द कहा, जिसके मनमाने अर्थ निकाले जा सकते थे, यानी कि ''जी सर'' भी या फिर ''नहीं सर'' भी, या फिर आप माई बाप हैं हुजूर, जो कुछ कहें वही सच है श्रीमान'' । नायब साब की चालाकी पर मन ही मन हंसा - पंछीराम ।

''चलो '' कोहली ने हुकुम दागा ।

और नायब साब ने एक सूटकेस उठा लिया तो दूसरा पंछीराम ने लाद लिया ।

स्टेशन के बाहर लाल बत्ती लगी वातानुकूलित कार खड़ी थी, नायब साब ने ड्रायवर को इशारा किया, तो उसने पिछला दरवाजा खोल दिया । ड्रायवर ने डिग्गी खोलकर पीछे दोनों सूटकेस जमा दिये ।

नायब साब खिड़की से झांकते हुये बोले ''हम अगली गाड़ी में हैं सर, अभी होटल चल रहे हैं, फिर फील्ड के लिये चलेंगे । अपना एरिया यहां से चालीस किलो मीटर बाद शुरु होगा सर और डेढ़ सौ किलोमीटर तक रहेगा''

''हँ !!!''फिर लम्बा हुंकारा गूंजा, तो नायब साब वहां से हट गये । चपरासी पंछी राम उनके पीछे था । आगे एक और कार खड़ी थी, वे दोनों उसमें बैठ गये पिछली कार को संकेत देती हुई वह कार चल पड़ी ।

होटल में पंछीराम को कुछ भी नहीं करना पड़ा । वर्दीधारी बैरे ने कोहली की अटैची उठाने से लेकर भोजन परोसने तक का सारा काम अपने हाथों निपटाया । तब तक पंछीराम ने बरसात में भीग गये अपने कपड़े सुखा डाले ।

दोपहर दो बजे दिल्ली वाले अफसर ने नायब साब को तलब किया और ढाई बजे दोनों कारें होटल छोड़कर चल पड़ी । तब भी हल्की बूंदाबांदी हो रही थी । जिला मुकाम यहाँ से अस्सी किलोमीटर दूर था ।

रास्ते में वे लोग कहीं नहीं रूके सीधे कलेक्ट्रेट पहुँचे ।

खबर लगी तो कलेक्टर दौड़े-दौड़े बाहर आ पहुंचे - ''आइये सर ! मैं आई.सी. घोष !''

''इलैक्सन का ऑफिस कहाँ है ?'' कोहली के स्वर में उपेक्षा का भाव था,और कलेक्टर समेत सारे कर्मचारी डरे से दिख रहे थे । पंछीराम मन ही मन खुश हुआ - अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे । इस पल वह अपने आपको इस दफ्तर का कर्मचारी नहीं मान रहा था, उसे लग रहा था, कि मानो वह भी दिल्ली से आया है और कलेक्टोरेट के कर्मचारी उस के लिये कीड़े मकोड़े हैं ।

कलेक्टर साब स्वयं आगे आगे चलते हुये कोहली साब को चुनाव के दफ्तर में ले गये । कोहली ने डिप्टी साब की घूमने वाली गद्देदार कुर्सी देखी तो नाक-भौं चढ़ा लिये - ''इसे हटाओ यहाँ से । ''

पंछीराम ने तुरंत ही वह कुर्सी हटा दी और कोहली की नजर को भांपते हुए एक साधारण सी कुर्सी उस जगह रख दी । कोहली बैठे तो पंछीराम बाहर खिसक आया और भीतर को कान लगाके दरवाजे के बाहर खड़ा हो गया ।

''कितने पोलिंग सेंटर हैं इस कांस्टीटयूएंसी में ?'' कोहली की तीखी आवाज में प्रश्न उछला था ।

''बारह सौ सैंतीस'' कलेक्टर साब का स्वर रिरियाहट लिये था ''आठ सौ बीस इस जिले में, और चार सौ सत्रह अटैच जिले में ।''

''सैंसिटिव कितने हैं ?''

''सात सौ पाँच !''

''व्हाट ? सेवन हण्डरेड फाईव !''

''यस सर, दिस इज ए डैकेट इनफैरेटेड एरिया । टोटल कांस्टीटयूएंसी इज सेसंटिव, वट सेविन हन्ड्रेड बूथ्स आर वेरी सेंसिटिव । पिछले चुनाव में पचास पोलिगं सेंटर पर दुबारा चुनाव कराना पड़े थे सर । सत्रह आदमी मारे गये थे । इसलिये पिछली बार की तुलना में इस साल दुगने सुरक्षा गार्ड तीन हजार लगा रहे हैं और सी आर पी भी बुला रहे हैं हम।''

'' जहां-जहां हिंसा हुई थी, वहां क्या बंदोबस्त है आपका ?''

'' वहां हर पोलिंगबूथ और गांव में सी आर पी के जवान तैनात कर रहे हैं।''

'' इस बार दूसरे जिलों से भी तो चुनाव पार्टियां आयेंगी, उनके रूकने और खाने पीने के इन्तजाम हैं इस कस्बे में !''

''हां सर, कुछ भोजनालय है। ठहरने के लिए सिविल लाइंस के स्कूल में इंतजाम करा रहे है।''

''गिव मी ए मैप आफ दि कांस्टीटयूएंसी एण्ड लिस्ट ऑफ पोलिंग बूथ्स ।''

''जस्ट ए मिनट सर'' कहते कलेक्टर दरवाजे की और मुड़ करके बोले ''खुर्राट नक्सा और वो लिस्ट लाओ ''। फिर वे कोहली साब से बोले -सर पिछली बार का ही तो डर है कि हर कर्मचारी इस बार चुनाव से बचना चाहता है ।''

बाहर खड़े खुर्राट साहब ने अपना ब्रीफकेस खोल कर कुछ कागजात निकाले और खुला ब्रीफ केस पंछी राम को पकड़ा के दफ्तर में दाखिल हो गये । पंछीराम को इस वक्त खुर्राट का चेहरा उस बकरे जैसा लग रहा था, जिसे तुरन्त ही ज़िबह किया जाना है । पंछी राम को खुद की औकात मुर्गे से भी बदतर लग रही थी । घोस साहब खुद को क्या समझ रहे होंगे, पंछीराम इसका अंदाज नहीं लगा पा रहा था । अलबत्ता कोहली साब उसे जल्लाद से लग रहे

थे । हिन्दी फिल्मों में जल्लाद का रुप कुछ अलग ही गेट अप के साथ दिखाया जाता है - कमर में काली सलवार पहने, माथे पर काले कपड़े से खोपड़ी बांधे, हट्टे-कट्टे बदन को उघारा करके मसल दरसाता एक क्रूर सा व्यक्ति । पंछीराम ने मन ही मन कल्पना करी कि कोहली साहब को यदि वह ड्रेस पहना दी जाये तो कैसे लगेंगे ।

पंछीराम की कल्पना को झटका देते हुये कलेक्टर अचानक बाहर आये और खुर्राट को एक तरफ ले गये । पंछीराम के कान उधर ही लगे थे । कलेक्टर पूछ रहे थे- खुर्राट तुमने इस अफसर की पसंद-नापंसद तो पता कर ली ना । देखना अपना प्लान फेल न हो जाये । ये तो सचमुच कड़क आदमी है। बहुत सारी कमियाँ ढूंढ़ लेगा ।

आप चिंता न करें सर, मैं सब निपटा लूंगा । खुर्राट कलेक्टर के चरणों में झुके जा रहे थे ।

मतदान दलों के पहुंचाने के इंतजामात यानी कि बसें, ट्रक, ट्रेक्टर, बैलगाड़ी और नाव तथा ऊंट भी, सुरक्षा यानी कि पुलिस वालों की संख्या, मतदान दलों की नियुक्ति और दूसरे जिलों से आने वाले दलों के ठहरने आदि के साधन वगैरह की कार्यवाहियाँ देखने में कोहली साब को चार घंटे लगे ।

फिर एकाएक कुछ याद आया तो वे कलेक्टर से बोले -'' मुझे एस डी एम और एसडीओपी दो जरा जल्दी से, मैं कस्बे में जाके संपत्ति-विरूपण के कुछ प्रकरण बनाना चाहूंगा ।''

पंछीराम एक अलग जीप में था । कस्बे के चौराहे पर कोहली साब रूके और रोड पार करके टांगे गये कपड़े के अनेक बैनरों पर नाराजी व्यक्त करनेलगे । पंछीराम को इशारा मिला तो उसने उछल-उछल कर वे सारे के सारे बैनर खींच लिये । दीवारों पर लिखे चुनाव प्रचारों के बारे में भी उनने एसडीएम को प्रकरण बनाने का आदेश दिया । पंछीराम ने देखा कि कोहली साब की इस कार्यवाही पर, चौराहे से गुजर रहे तमाम राहगीर बड़े खुश दिख रहे थे ।

सर्किट-हाउस में सारी व्यवस्था चाक-चौबंद थी । साफ और बदबू रहित बाथरूम , बेदाग चादरें, उम्दा ए.सी., फोन, फैक्स, टी.वी. और कम्प्यूटर से सजे कमरे को देख इत्मीनान हुआ, तो कोहली साब ने पंछीराम को छुट्टी दे दी ।

शाम को उनकी कार कस्टीटूयेंसी के दूसरे जिले को रवाना हुई तो पंछीराम और खुर्राट साब कार की अगली सीट पर ठुंसे हुये थे जबकि पिछली सीट पर कोहली साब अजीब से तरीके से लेटे हुये आराम फरमा रहे थे । कलेक्टर साब ने आग्रह किया तो कोहली साब ने सुरक्षा गार्ड लेने से कतई मना कर दिया था । बोले थे - रहने दो । आय एम स्ट्रांग । मैंने नक्सली इलाके में चुनाव कराये हैं ।

कार इत्मीनान से दौड़ रही थी । तब ,आधा घण्टा हो चुका था । सहसा वे बोले ''रास्ते में कोई सैंसिटिव सेन्टर दिखे तो गाड़ी रोकना । मैं चैक करूंगा ।''

और रास्ते में चार मतदान केन्द्रों पर उनकी गाड़ी रूकी, सब जगह एस.ए.एफ. के जवान तैनात थे । कोहली साब सिर्फ कार की खिड़की से बाहर झांकते रहे, खुर्राट साब ने ही हर जगह तहकीकात की ।

एक गांव के निकट पहुंचते-पहुंचते सड़क पर भारी भीड़ दिखी तो ड्रायवर ने गाड़ी धीमी कर ली । वे लोग कुछ समझ पाते कि अचानक उनकी गाड़ी को उस भीड़ ने घेर लिया । खुर्राट साब तो घबरा ही गये जब भीड़ में मौजूद दर्जन भर बन्दूक धारियों ने धड़ाधड हवाई फायर कर डाले । उनने जैसे तैसे हिम्मत बांधी और उन्हें डाँटते हुये पूछा ''ये क्या नाटक है ? गाड़ी क्यों घेर ली है । चलो दूर हो जाओ सब ! बन्द करो ये बन्दूकें ।''

पंछीराम ने पीछे देखा कोहली साब थर-थर काँपते नीचा सिर किये बैठे थे ।

''पहले कलेक्टर को बाहर निकालो'' भीड़ में से एक नेतानुमा आदमी ने खुर्राट साब को डाँटते हुये जवाब दिया तो कोहली साब की जान में जान आई ।

''गाडी में कलेक्टर साहब नहीं हैं, दिल्ली वाले अफसर हैं'' खुर्राट साब ने नर्म पड़ते हुये जानकारी दी ।

''फिर तो और अच्छा है ये तो कलेक्टर से भी बड़े होगें । उनसे कहो बाहर निकल के हमारी बात सुन ले, नहीं तो हम आज यह रास्ता आज चालू नहीं होने देगें । देखते हैं कैसे चुनाव कराओगे तुम हमारे एरिया में ।''

खुर्राट साब भीड़ को बहलाना चाहते थे पर शायद कलेक्टर से बड़ा हुक्काम होने का प्रमाण देना जरूरी समझ कर अचानक कोहली साब कार का दरवाजा खोल कर बाहर निकल पड़े और पूछने लगे ''क्या प्रॉबलम है ?''

एक नेता होता तो बताता, भीड़ का हर आदमी अपनी बात सुनाने के लिये कोहली साब की तरफ लपक पड़ा तो कोहली साब घबरा उठे । खुर्राट साब उतरे, अब तक भीड़ ने कोहली साब को खूब धकिया लिया था ।

जैसे तैसे लोगों को दूर कर शांत किया गया तो पता लगा कि गांव में बिजली और पानी न मिलने के कारण इस गांव के लोग रास्ता जाम कर बैठे हैं । इलाके के कई गांव के लोग चुनाव का बहिष्कार कर रहे हैं । खुर्राट साब के कहने पर कोहली साब ने गांव वालों को झूठा-सच्चा आश्वासन दिया और ऐन केन प्रकारेण वे लोग वहां से आगे बढ़े तो पंछीराम को लग रहा था कि अब कोहली साब ठण्डे पड़ जायेंगे । लेकिन उसे ताज्जुब हुआ कि उनके नथुने अब भी फड़क रहे थे । वे फुंफकारते हुये कह रहे थे - ''देखा ! ये हैं तुम्हारे कलेक्टर का लॉ एण्ड आर्डर । इतनी बन्दूकें बाहर हैं । आर्म्स तक जमा नहीं कर पाये । मैं तो आज ही दिल्ली को लिख दूँगा कि ये कलेक्टर चुनाव नहीं करा पायेंगा । ही इस डफर एण्ड फैल्यूअर डी.एम. एज रिटर्निंग ऑफीसर । ''

दयनीय मुद्रा बनाते हुये खुर्राट साब ''सौरी सर'' ''सौरी सर'' की तोता रटन्त बोलने लगे तो पंछीराम इस पहेली को बूझने लगा कि खुर्राट साहब किस बात की माफी माँग रहे हैं ।

''मैं तुम सबको सस्पैण्ड करता हूँ । तुम लोग एकदम जाहिल और नाकारा हो ।'' कोहली साब ज्यादा ही अकड़े तो पंछीराम की मूँछ फड़क उठी । वह खुद को रोक न सका बोला - ''ये डकैतों का इलाका है हुजूर ! इधर तो दिन दहाड़े गोली चल जाती है । यहाँ न कलेक्टर कुछ कर पायेगा न एस.पी. । यहां के तो खून में ही गर्मी रहती है । हमारे यहाँ चुनाव कराना बड़ी टेढ़ी खीर है हुजूर, कोई तुर्रम खाँ चला आये यही होगा।''

''यू शटप'' चीखते हुये कोहली ने उसे डांटा ।

पंछीराम का बदन फड़का, लेकिन खुर्राट साहब ने इशारा किया तो वह अपने होंठ ही कस कर बैठ गया । वह सोचने लगा कि चुनाव में अभी सात दिन बाकी हैं,और इतने दिन खुद को जप्त कैसे रख पायेगा वह । निश्चित ही इस बार के चुनाव उसकी नौकरी ले जायेंगे । चुनाव तो दूर है आज ही नौकरी बच जाये तो बजरंग की कृपा होगी ।

उसके इशारे पर कार ने मुख्य मार्ग छोड़ा और एक सूने से रोड़ पर चल पड़ी । अंधेरा घिरता जा रहा था । मार्ग एकदम सूना और सन्नाटे में डूबा दिख रहा था । कोहली साहब की तो बोलती ही बन्द थी । फिर भी वे बुदबुदाते हुये से बोले -'' ये रास्ता कहाँ जाता है ? ''

''यह रास्ता शॉर्टकट है सर'' खुर्राट साहब ने कहा ।

वे लोग दस किलोमीटर ही चल पाये होंगे कि ड्रायवर ने कार रोक दी । पंछीराम ने देखा कि बीच सड़क पर चार-पांच भैंस खड़ी हैं । उसे मन ही मन डर सा लगा । इस क्षेत्र के लोग किसी कार को लूटते समय ऐसे ही रोड जाम कर देते हैं । फिर भी अपनी सजगता दर्शाते हुये उसने कांच उतार के गरदन बाहर निकाली और चिल्लाया-'' काहे रे लला ! ये चौंपे को छोड़ गयो इते । हटाओ तो सड़क से !''

'' को लफ्टेंट है जा कार में ?'' डांटते से स्वर में अंधकार को पार करते हुए एक बन्दूक धारी अचानक प्रकट हो गया और उसने ऐसा प्रश्न पूछा, कि जिसका जवाब देना किसी के वश में न था । सब चुप सुनते रहे । पंछीराम ने तो बाकायदा हनुमान-चालीसा का पाठ शुरू कर दिया ।

लेकिन संकट अपने आप ही टल गया । उस बन्दूक धारी ने स्वयं ही वे भैंसे रोड से हटा दीं और उनकी कार को निकालने का संकेत दिया तो ड्रायवर ने गियर बदला और एक्सीलेटर दबाकर गाड़ी को हवा कर दिया ।

उनकी गाड़ी रात दस बजे सर्किट हाउस पहुंची । जिले के सर्किट हाउस में न तो कलेक्टर मौजूद मिले न डिप्टी कलेक्टर, इसके भी ऊपर तुक्का यह हुआ कि सर्किट हाउस का वी आई पी वाला वातानुकूलित कमरा खाली नहीं मिला-उसमें कोई मंत्री रुके हुये थे । सर्किट हाउस पर मौजूद गरीब से दिखते एक नायब तहसीलदार ने कोहली साहब से एक दूसरे नॉन ए.सी. कमरे में पहुंचने की प्रार्थना की तो उनका क्रोध फट पड़ा -''डू यू नो , दैट आई एम सुप्रीम अफसर । यू आर टेकिंग मी अदर साइड आई विल टेक यू टू टास्क । ''

बेचारा वह नायब तहसीलदार तो कुछ बोल ही नहीं पा रहा था हकलाते -अटकते हुये उसके मुंह से जो स्वर टपके, उनका आशय था कि........हजूर कृपा करें........हमारी मजबूरी है.......हम विवश हैं छोटे कर्मचारी हैं............हजूर माई बाप हैं ! आला हुक्काम है.!........ जो कहें ठीक है क्षमा करें.........माफी दें ।

अपने कमरे में घुस के कोहली साब ने कुर्सी पर बैठकर टेबल पर रखा फोन अपनी ओर खींचा और जाने कहां का नम्बर डायल करने लगे । अगले ही पल उनका गुस्सा और ज्यादा धधक उठा था ''खुर्राट कम हियर ।''

खुर्राट साब शायद रसोई घर में जाकर साहब के खाने के लिये खानसामा को चीजें बता थे सो पंछी राम अपना कर्तव्य समझकर कोहली साब के कमरे में घुस बैठा ।

यकायक उसने महसूस किया कि उसके माथे पर आ कर कोई गोला सा टकराया है, और उसकी आंखों के आगे तारे नाच उठे हैं । शायद कोहली साहब ने कोई चीज उठाकर फेंकी थी, जो उछलती हुई पंछीराम के माथे से आकर लगी है । वह घबरा कर पीछे पलटा । बाहर निकलते निकलते उसने देखा कि उसके माथे से टकराने वाली चीज टेलीफोन है । जो अब दरवाजे के बीचों बीच क्षत-विक्षत सा बिखरा पड़ा है । वह क्षुब्ध हो उठा, नाराजी का यह कौन-सा तरीका है । ये तो साला नाक में दम कर रहा है,जैसे ससुराल में दामाद नखरे दिखा रहा हो ।

खुर्राट साब उस वक्त कोहली साब के कमरे में प्रवेश कर रहे थे , दूसरे नायब साब जाने कहां गायब हो गये थे । सारे सर्किट हाउस में अफरा तफरी थी । कुछ देर बाद पंछी राम को अपनी चोट का अहसास कुछ कम हुआ तो वह स्थानीय नायब साब को तलाशने लगा ताकि उन्हें और यहां के चपरासी को अपनी बला सौंप कर वह किसी कोने में आराम से लम्बी तान कर सो जाये ।

उसने सोचा कि जिस तरह से कोहली साब की एण्ट्री हुई है, उसका परिणाम तो यही लग रहा है ,कि नायब साब को अचानक ही सर्किट हाउस के किसी संडास में घुसना पड़ा होगा, सो पंछीराम उन्हें उधर ही ढूढ़ने लगा ।

तब तक 'सोंई-सोंई' करती दो कारें सर्किट हाउस में आ पहुंची थीं । चौकीदार ने बताया कि एक में कलेक्टर आये हैं, और शायद दूसरी कार में चुनाव खर्च देखने वाले अफसर हैं । कलेक्टर एक जवान सा लड़का था जबकि दूसरा अफसर एक प्रौढ़ दक्षिणी व्यक्ति दिख रहा था । वे लोग सीधे कोहली के कमरे में प्रवेश कर गये ।

पंछी राम दरवाजे से सट के खड़ा हो गया - देखें कोहली साहब जैसे परशुराम से इस नयी उम्र के लक्ष्मण जैसे कलेक्टर का क्या संवाद होता है पर उसे निराशा ही हाथ लगी । कुछ देर दरवाजा बंद रहा फिर खुला । पता नहीं तीनों अफसरों ने किस भाषा में क्या बात की, कि कोहली साहब के कमरे से बजाय गालियों के, हँसी के ठहाके गूँजते सुने पंछीराम ने । उसने पूरी प्रशासनिक बिरादरी को गरियाना शुरू कर दिया - साले सब हरामी और मादर.......हैं । छोटे कर्मचारियों को गाली देंगे पर बड़ों की गांड़ में................।

कलेक्टर तो लौट गये, दूसरे अफसर को एक और कमरा खुलवाया गया ।

रात को मेहमानों के लिए मुर्गा और विदेशी व्हिस्की का इंतजाम एक्साइज अफसर की ओर से था । खर्च देखने वाले दक्षिणी अफसर ने सिर्फ मछली पसंद की, जबकि कोहली साहब ने मेजबान को निराश नहीं किया, न केवल मुर्गा खाया बल्कि उसके पहले पीना पसंद किया,इसके बाद उसने एक वीडियो सेट और लाने को कहा ।

उसका आदेश बजाया गया । वीडियो लगा, जिसके सामने बैठ कर वह जाने कितनी रात तक बंद किवाडों के पीछे कोई खास फिल्म देखता रहा । पंछीराम को इसमें भला क्या आपत्ति होती, उसे और खुर्राट साहब को भी उचित पथ्य मिल गया था और रात भर के लिए कोहली से छुटकारा भी ।

सुबह आठ बजे कलेक्टर खुद ही अपनी गाड़ी चलाते हुये सर्किट हाऊस आ पहुँचे वे खुर्राट को एक ओर ले गये । पंछीराम ने सुना वे खुर्राट से कह रहे थे - ''इस खूंसट को चुनाव तक कैसे झेलेगें खुर्राट ! ऐसा करो कि इसे वहीं घुमा-फिरा लाओ'' ।

'वहां तो बहुत खर्च होगा सर, मेरे पास तो केवल पांच-छ: हजार........फिर इन्हें तो सिग्नेचर व्हिस्की के साथ तीतर का मांस पसंद है और मिल जाये तो कुछ और भी.........यानी कि..............। इतने कम पैसे में इनके शाही-शौक कैसे............।''

''इसकी चिन्ता तुम मत करो । हम एक एक्साइज इंसपेक्टर तुम्हारे साथ भेज रहे हैं ।''

''ठीक है सर, आप उनसे एक बार कह दीजिये फिर मैं उन्हें तैयार कर लूंगा ।''

दिन में कोहली साब कुछ देर को कलेक्टर के चुनाव कार्यालय में बैठे तो शिकायत बाजों का तांता लग गया । उन्हें जैसे तैसे निपटा के कोहली साब ने राहत की सांस ली ही थी कि खर्च देखने वाले पर्यवेक्षक शिवरामन वहीं आ बैठे ।

पंछीराम ने सुना, कोहली साब अजीब सी आवाज में उनसे कह रहे थे - ''कमीशन ने इस कौन से जंजाल में फंसा दिया शिवरामन साब ? इतने दिनों से जो हो रहा था वही ठीक था ।''

शिवरामन साहब कह रहे थे ''यह तो लोकतंत्र का पवित्र यज्ञ है साहब । हमारे चुनाव पर सारे विश्व की निगाह रहती है । इसलिये निगरानी अफसर रखना मुझे तो कतई गलत नहीं लगता । देश की सर्वोच्च निष्पक्ष और गरिमामयी संस्था के इस नवाचार में भी बड़ा विवेक छिपा है । हमें भी निष्पक्ष चुनाव कराने का प्रयत्न करना चाहिये । आखिर दिल्ली के बड़े अफसर जनहित की बात कर रहे हैं । आप ही कहें हमारे गरीब देश में अरबों का सरकारी खर्च और एक महीने तक चलने वाले भयानक शोर-शराबे प्रचार-प्रसार, जनसंपर्क, बैनर बिल्ले, पैम्पलेट, जीपों, आम-सभाओं में पार्टियों के अगणित खर्च कुल मिला कर कितना नुकसान होता होगा । प्रचार-प्रसार में बढ़ रहे व्यय को देख कर हम सोच सकते हैं कि अब गरीब आदमी तो उम्मीदवार बन ही नहीं पायेगा । शायद इसीलिये ज़नतंत्र का लाभ हर जन तक पहुंचाने के लिये यह नई व्यवस्था की गई है ।''

पंछीराम ने देखा कि यहां की बातें उसके सिर के ऊपर से गुजर रही हैं । वह बाहर चला आया। दफ्तर के बाहर डिप्टी कलेक्टर और तहसीलदारों की पूरी की पूरी भीड़ इस प्रयत्न में थी कि चुनाव प्रक्रिया के किसी काम की शिकायत न होने पावे । इसके लिये वे राजनैतिक पार्टियों के छुटभैया नेताओं के गले लग-लग जा रहे थे । दफ्तर से दुत्कार कर भगाये जाने योग्य छोटे-मोटे कार्यकर्ता भी इस वक्त प्रशासनिक अफसरों के सगे-सहोदर जैसा सम्मान पा रहे थे । पंछीराम को रेवेन्यू अफसरों का वह रूप याद आया, जब वे अपने सिंहासन पर बैठकर गांव-देहात के गरीब किसानों को देखकर दहाड़ उठते हैं, और कुछ वैसे ही हिंस्र भाव चेहरे पर ले आते हैं, जैसे कोई गीदड़ मोटा-ताजा शाकाहारी निरीह पशु देखकर उसे खाने को ललचा उठे । उनके चेहरे पर इस वक्त बड़ी कातरता दिख रही थी, जैसे दुनिया के सबसे दीन-हीन और अकिंचन व्यक्ति ये ही लोग हों ।

वे लोग एक साथ डबल रोल कर रहे थे । कर्मचारियों से अलग और राजनैतिक कार्यकर्ताओं से अलग व्यवहार था उनका । वहां उनके पास जब कोई कर्मचारी अपनी चुनाव डियूटी निरस्त कराने आ जाता तो वे अपनी गर्दन फिर अकडा लेते, रीढ़ की हड्डी फिर सीधी कर लेते और आवाज में फिर वही क्रूरता ले आते जो इस वक्त चुनावी अफसरों में होनी चाहिये ।

ऐसे में कुछ रोचक नजारे भी देखे पंछीराम ने, हुआ ये कि किसी चुनावी अफसर की तरफ जब एक मरघिल्ला सा आदमी हाथ में कागज ले के आगे बढ़ा, तो अफसर ने समझा कि वह चुनाव ड्यूटी निरस्त कराने वाला कोई कर्मचारी है, सो वह झल्ला उठा और उसे भाग जाने का हुकुम दे डाला । पर दुर्भाग्य से वह मरघिल्ला सा आदमी किसी पार्टी का चुनावी कार्यकर्ता निकल बैठा । फिर क्या था चुनाव आयोग और अफसर से शिकायत करने की धमकी देता वह व्यक्ति खूब जोर से चिल्लाने लगा तो अफसर लपक के उसके चरणों में गिरने तक को तैयार हो गया । ऐसा भी हुआ कि कुर्ता धोती धारी जिस बुजुर्ग को व्यक्ति को अफसर ने नेता समझ कर मन का सारा सम्मान और अपनापन उंडेल डाला, वह एक दफ्तर का बड़ा बाबू निकला, तो अफसर का क्रोध फट बैठा ।

एक बड़ा हादसा तो तब होते-होते टल गया जब एक प्रत्याशी के प्रचार में लगी बिना झंडा की अट्ठाइस जीपों के नम्बर दूसरा प्रत्याशी सौंप रहा था कि पहला प्रत्याशी आ गया । उसका तो पारा ही चढ़ गया और वह क्रोध में चीखते-चिल्लाते हुये दूसरे प्रत्याशी तरफ झपटा तो दूसरे व्यक्ति ने अपनी जेब में रखा कट्टा निकाल कर धाँय से हवाई फायर कर डाला ।

गोली चलने का स्वर गूंजा तो दोनों पक्षों के महारथियों के हाथों में नाना प्रकार, नाना रंग और नाना आकृतियों के कट्टे चमक उठे ।

डरता हुआ पंछीराम यह सोच रहा था कि हमारे देश में और चीजें भले न बनती हों पर कट्टा जैसे खतरनाक चीजें बनाने का कुटीर उद्योग खूब पनप गया है । यही नहीं कट्टा उत्पादन में हमारे यहाँ कितनी सरलता, कैसी कलाकारी, कितनी दूर दर्शिता और कितनी विविधता आ गई है कि दिल वाह-वाह करने लगता है ।

उधर दोनों प्रत्याशी आपस में भिड़ रहे थे,और इधर दोनों अफसर भीतर बैठे थर-थर कांप रहे थे । दिन में सुरक्षा संबंधी बंदोबस्त की बैठक में पेश किये गये डी.एम. और एस.पी. के सारे बन्दोबस्त और सारे तथ्य उन्हें मिथ्या लगने लगे थे, जब चुनाव कार्यालय का ये नजारा है-तो बूथ्स पर क्या होगा ? कुछ देर बाद कलेक्टर और एस.पी. अपने दलबल के साथ वहां आये तो दोनों पक्ष अलग अलग-अलग हुये, फिर किसी तरह से दोनों अफसर वहां से सर्किट हाउस ले जाये गये । कुछ ही देर में सारी कलेक्टोरेट पुलिस छावनी में तब्दील हो चुकी थी ।

पंछीराम ने वहां से स्टार्ट होती एक जीप में छलांग लगा दी और उसमें लद कर वह भी सर्किट हाउस की ओर भाग निकला था । नायब साब का कहीं कोई पता नहीं था ।

उसी शाम अंधेरा होते-होते उनकी कार पर्यटन स्थल पहुंच गई । पता नहीं खुर्राट साहब के पास कितनी बंधनी बंधी थी कि एक बहुत उम्दा होटल में कोहली साहब को ठहराया गया, और वो लॉज भी सस्ता नहीं था, जिसमें एक्साइज इंसपेक्टर, पंछीराम और खुर्राट साब ठहरे थे । पंछीराम को अपनी जैसी कई टीम दिखीं वहां, तो उसने उत्सुकतापूर्वक पता लगाया । पता चला कि आस पास के तमाम चुनाव क्षेत्रों के निगरानी अफसर इन दिनों यहीं आराम फरमा रहे हैं ,सो कई बारातें ठहरी हैं यहां के जनवासों में।

सुबह वे लोग जब मंदिर देखने निकले तो कोहली साहब के साथ थे ।

मंदिर में घुसने के पहले दीवारों पर बनी हजारों पत्थर की मूर्तियां दिखीं। मूर्तियां तो सदैव भगवान की बनती हैं सो पंछीराम ने बड़ी श्रद्धा से उनके भी हाथ जोड़े और दर्शन की लालसा से उन पर नजर डाली तो पानी-पानी हो गया । ऐसी मूर्तियां ! उफ्फो, भीतर भगवान और बाहर च्चचच । फिल्म और टीवी पर जरा सा अंग उघरता देख के समाज के लोग इतनी हाय तौबा मचाते हैं, और यहां तो अंग ही अंग थे, कपड़ा थे ही नहीं । बापरे ! घर के अंधियारे में होने वाले पति-पत्नी के बीच के सारे काम यहां तो बड़े ऐलानिया ढंग से मूर्ति बनाकर खडे क़रे गये थे कै ऐसे करो लला सिग काम, और यहां तो एक एक औरत ,कित्ते कित्ते आदमी!

अधेड़ कोहली साब अपना चश्मा साफ कर करके मूर्तियों को कामुक नजरों से घूर रहा था लेकिन पंछीराम वहां से तुरंत ही भाग निकला । वह अपने लॉज में लौट आया और उसका माथा जोर से खदबदा उठा था । आंख मूंदता तो बार-बार उन हंसती खिलखिलाती नौजवान औरतों के पुष्ट स्तन और नंगे शरीर दिखने लगते जो पत्थर की मूरत बनी इन मंदिरों की बाहरी दीवारों पर किलक रही थीं । उन्हें देखके कोहली साहब गदगद भाव से खुर्राट साहब से कह रहे थे - ''ओ माई गॉड, एक्सीलेंट मोनुमेंट्स'' । देखा तुमने यह है आर्ट, आजकल के मूर्तिकार कहां बना पायेंगे ऐसी मूर्तियां ?''

वे मन ही मन कुछ और बुदबुदाते रहे थे, फिर बोले थे - इन मूर्तियों का एलबम मिलता होगा यहाँ, ! तुम तलाश करो । बेसिकली आइ एम एकेडमिक परसन । तुम ऐसा करो कि कोई नर्तकी ढूंढो यहां । मैं चाहता हूँ कि इन मूर्तियों के सामने इसी एक्शन में खड़ा करके नर्तकी के कुछ फोटो ले लूं और यहां के शानदार स्मृति चिन्ह अपने साथ ले जाऊँ ।

शाम ढले उनके लॉज में जब खुर्राट साहब लौटे थे तो बेहद झुंझलाये हुये थे । आते ही बोले- साले इन अफसरों के लिये जाने क्या-क्या करना पड़ेगा हमें ।

रात शुरू हो रही थी और उनकी कार खुर्राट साहब के निर्देशन में पर्यटन बस्ती को बाहर निकल रही थी । पंद्रह-बीस किलोमीटर दूर एक गांव में जाकर वे लोग रूके । बस्ती से बाहर एक उम्दा पक्का मकान था जिस पर एक बड़ा सा साइन बोर्ड टंगा था - '' नृत्य कला संरक्षण गृह '' ।

उस संस्था की मालकिन से खुर्राट साहब इतने सयानेपन से बतियाना शुरू हुये कि पंछीराम मुंह बायें देखता रह गया ।

दस मिनिट में ही दर्जन भर नौजवान लड़कियां उनके सामने खड़ी हो गईं थीं । नायब साहब ने छांट कर उनमें से तीखे नाक-नक्श वाली , एक गोरी सी, रूबी नामक लड़की को पसंद किया।

कुछ देर बाद वह लड़की उनके साथ कार में बैठकर होटल लौट रही थी ।

पंछीराम ने छिपी नजरों से रूबी को ताका जो इस वक्त किसी कॉलेज में पढ़ने वाली शहराती युवती सी लग रही थी । उसने आसमानी रंग का चुस्त चूड़ीदार पैजामा और कूल्हे के ऊपर से खुल-खुल जाता लम्बा सा कुर्ता पहन रखा था । उसके कुर्ते का कपड़ा इतना पारदर्शी था कि भीतर पहनी गई ब्रेसरी का नंबर भी पढ़ सकता था पंछीराम । गले में लपेटे गये दुपट्टे का होना न होना बराबर था क्योंकि वह जिन अवयवों को छिपाने के लिये डाला गया था,वे तो वैसे ही कुर्ता फाड़कर बाहर आने को कसमसा रहे थे ।

कोहली साहब के पास एक दूसरे कमरे में रूबी की अटैची पहुंचा के पंछीराम बाहर निकल ही रहा था कि कोहली साहब ने उसे टोका - '' पंछीराम तुम आज मेरे दरवाजे के बाहर बैठना, स्पेशल ड्यूटी है तुम्हारी ।''

''जी हुजूर'' कहता पंछीराम वहां से बाहर निकल आया । उसे अब भी कोहली साहब का रागड़ समझ में नहीं आ रहा था ।

नायब साहब को नया हुकुम था कि वे दो कैमरों का इंतजाम करें - एक वीडियो कैमरा और दूसरा सादा स्टिल कैमरा । बेचारे खुर्राट साहब उसी तरह सिर झुकाये हर आज्ञा सिर माथे धर रहे थे । जैसे बेटी का बाप दूल्हे की सेवा में घूमता रहता है ।

रात के दस बजे होंगे जब नायब साहब ने कोहली साहब के कमरे में कैमरे पहुंचाये । फिर रूबी अपने कमरे से निकली और कोहली साब के कमरे में चली गयी । हुकम मिला तो पंछीराम ने रूबी का सूटकेश भी कोहली साब के पास पहुंचा दिया । कुछ देर बाद खुर्राट साहब बाहर आये तो उनके हाथों में कागजों का एक पुलिंदा था । पंछीराम के पास आकर वे बोले - ''जि हैं हमाये इलाके की उम्दा निगरानी तहरीरें । बस अब अपुन को रोज एक तहरीर दिल्ली के काजे फैक्स कर देनो है । इनमें कोहली ने लिख दियो है के जि इलाके में सब अमन चैन है ।''

नायब साहब गये तो अधखुले दरवाजे से पंछीराम ने भीतर झांका । अब चम्पा सोफे की बैंच पर अधलेटी सी पड़ी थी और उसके पास उकड़ूं से बैठे कोहली जानबूझ कर उसके कुर्ते के बड़े गले से झांकती गोलाईयों को ताकने की कोशिश कर रहे थे । इस समय कोहली साहब ने आधी आस्तीन की पीली बनियान और घुटनों तक पसरी रंगबिरंगी बड़ी चड्डी डाट रखी थी । टेबिल पर बाज के आकार की एक बड़ी सी काली बोतल और कुछ खाली गिलास भी सजे धरे थे ।

यकायक पंछीराम को बड़ी तेज प्यास सी लगी, उसने गौर किया कि यह प्यास नहीं तलब है, शराब की तलब । ऐसे शाही सरकारी दौरों में वह प्राय: दो तीन गिलास दारू खींच लेता है और बिना डगमग हुये नशे का मजा लेता है । पर इस वक्त कहां धरा है ये मजा !

इस वक्त तो वह स्पेशल ड्यूटी पर है......। एकाएक उसकी बुद्धि ने उसे याद दिलाया ।

उसका मन हमेशा उल्टा सोचता है.........इस वक्त की ड्यूटी काहे की ड्यूटी है उसने खुद से प्रश्न किया - घंट पर मारी ऐसी ड्यूटी ।

होटल की गैलरी में सन्नाटा था । खाली बैठा पंछीराम बुरी तरह ऊब चुका था, वह कुछ क्षणों में उठना ही चाहता था कि एकाएक उसे कुछ खयाल आया तो उसने कोहली साहब के किवाड़ों में बने चाबी के छेद से आंख लगा दी ।

अंदर रूबी इस वक्त घाघरा चोली पहन कर अपनी नृत्य कला का प्रदर्शन कर रही थी - नृत्यकला काहे की वह वैसी ही मुद्रा में फोटो खिंचा रही थी जो दिन में देखी मिथुन मूर्तियों में बनाई गयीं थीं । रूबी कभी दोनों हाथ पीछे कर अपने दोनों उरोज तान लेती और ऊपर देखने लगती तो बगल में बैठे कोहली साहब नीचे झुककर उसका फोटो लेने लगते । कभी वह अपनी अधनंगी पीठ कोहली साहब तरफ कर खड़ी हो जाती और मुड़ के उन्हें देखने लगती - कुछ इस तरह कि तेरे जैसे लल्लू पंजू मैंने बहुत देखे हैं, तू क्या बिगाड़ पायेगा मेरा ।

उधर कोहली गिलास पर गिलास दारू पिये जा रहा था और रूबी के पैरों में गिर गिर जा रहा था ।

पंछीराम को इस बात से बड़ा सुख मिल रहा था कि तीन दिन से कटखने कुत्ते की तरह उन्हें डपटने वाला कोहली इस वक्त खुद किसी पालतू कुत्ते सा व्यवहार कर रहा है । इसके लिये उसने मन ही मन रूबी को खूब सा धन्यवाद दिया ।

कोहली साहब को जाने क्या सूझी वे रूबी से चिरौरी करने लगे कि वह कुछ और कपड़े उतार दे । पंछीराम की नजर इस वक्त रूबी के चेहरे पर थी । जो अपने होंठ तिरछे कर के विंहस रही थी - शायद मरदों की जल्दबाजी का उसे अच्छा ज्ञान था, इसलिये लग रहा था कि वह कोहली साहब के बावलेपन का मजा ले रही थी ।

केवल दो कपड़ों में कैद उसका मांसल बदन अब किरणें सी छोड़ रहा था, जिसे देख कोहली फोटो खींचना भूल कर तिरछी खड़ी रूबी के चिकने बदन पर अपनी मोटी हथेली फेर रहा था । उधर बंदर को नचाते मदारी की तरह रूबी सिर्फ उसकी हरकतें देख रही थी । उसकी आंखों में जाने कितने भाव थे - विजेता सा, स्वामित्व सा और कुछ-कुछ कोहली जैसे अधबूढ़े कामुक व्यक्ति के प्रति दयार्द्रता का ।

एकाएक कोहली ने रूबी को जकड़ लिया और उसे नीचे फर्श पर गिरा लिया । आगे का दृश्य चाबी के छेद से दिखना संभव न था सो सब कुछ गंवाने के भाव से पंछीराम दरवाजे से हटा और अपने स्टूल पर आ बैठा । वह मन ही मन कल्पना कर रहा था कि अब क्या हो रहा होगा । जाने क्यों उसे बार-बार विश्वास हो रहा था कि कोहली साहब शुरूआत करने के पहले ही अंटागफील हो गये होंगे ।

रात बारह बजे पंछीराम अपने लॉज लौटने लगा तब कमरे के अंदर से कोहली साहब के भद्दे से खर्राटे गूंज रहे थे और चाबी के छेद से रूबी कहीं नजर नहीं आ रही थी ।

अगले दिन सुबह रूबी नये फैशन के स्कर्ट टॉप में कमरे से निकल कर कोहली साहब के साथ मूर्ति वाले मंदिर में चली गई थी । खुर्राट साहब को कैमरे पहुंचाने का आदेश देकर कोहली ने पंछीराम को शाम समय इसी होटल में आने को कहा था । वे रूबी के साथ अपनी बेडौल सी तोंद उचकाते चले गये थे और इस बेतुकी जोड़ी पर पंछीराम को खूब हंसी आई थी । बाद के तीन-चार दिन पंछीराम ने मजे मारे, न कोई काम, न धन्धा । वह डट के खाता और सो जाता ।

वही शताब्दी एक्सप्रेस थी, वही स्टेशन ! पर इस बार नजारा बदला हुआ था । ट्रेन में बैठता अफसर चुप-चुप तो था, पर कड़क मिजाज न था । ट्रेन में चलते समय कोहली साहब अफसर ने खुर्राट साहब और पंछीराम से बाकायदा हाथ मिला कर थैंक्यू कहा ।

पंछीराम चकित था । एक आदमी में इतना परिवर्तन ! गजब है ! वह देर तक अपना हाथ सहलाता रहा, ताकि यह अहसास बना रहे कि सचमुच कोहली साहब ने उससे हाथ मिलाया था ।

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रचनाकार परिचय-

राजनारायण बोहरे

जन्म

बीस सितम्बर उनसठ को अशोकनगर मध्यप्रदेश में

शिक्षा

हिन्दी साहित्य में एम. ए. और विधि तथा पत्रकारिता

में स्नातक

प्रकाशन

' इज्ज़त-आबरू ' एवं ' गोस्टा तथा अन्य कहानियां'

दो कहानी संग्रह और किशोरों के लिए दो उपन्यास

पुरस्कार

अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता 96 में पच्चीस हजार रूपए

के हिन्दी में एक कहानी पर अब तक के सबसे बड़े पुरस्कार से

पुरस्कृत

सम्पर्क

एल आय जी 19 , हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया-475661

फोन - 07522-506304

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2 लघुकथाएं

- संजय पुरोहित

मातम

न्यूज टीवी चैनल के स्टूडियो के एक कमरे में कुछ लोग निराश-निढाल बैठे थे। उनकी इतने दिनों की मेहनत बेकार चली गई थी। राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े नेता दुर्घटना में घायल हुए थे। बचने की संभावना बहुत कम थी। टीवी चैनल की इस टीम ने उनकी संभावित मृत्यु की स्थिति में प्रसारित किये जाने वाले कार्यक्रमों की तैयारी आरम्भ कर दी थी। नेताजी के जन्म से लेकर उनके राष्ट्रीय राजनीति में उत्कर्ष और उतार चढ़ाव पर टिप्पणी के लिए चित्र व अभिलेख जुटा लिए गए थे। नेताजी के करीबी लोगों को उन पर टिप्पणी करने के लिए अनुबंधित किया गया। नेताजी के जन्म स्थल पर भी कुछ रिपोर्टरों को एक्सक्ल्यूसिव कवरेज के लिए भेजा गया था। कार्यक्रम के लिए विज्ञापन जुटाने की तैयारी भी लगभग फाइनल थी। सब मेहनत बेकार गई। नेताजी के इलाज के लिए बुलाये गये विदेशी डॉक्टरों ने दो ही दिन बाद स्पष्ट कर दिया कि नेताजी के दो महत्वपूर्ण ऑपरेशन कर दिये गये हैं। उनकी जान को अब कोई खतरा नहीं है। नेताजी की जान बच जाने का समाचार सुनकर उनके परिजन और कार्यकर्ताओं में राहत और खुशी थी, वहीं टीवी न्यूज चैनल के इस स्टूडियो में चहुँओर मातम छाया हुआ था।

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विचारधारा

"बाबूजी, ये मूर्ति किसकी है, देखो कितनी साफ सुथरी है, लगता है इसकी खूब साफ सफाई होती है"

"बेटा, ये महापुरूष हैं प. दीनदयाल उपाध्याय, बहुत बड़े देश भक्त थे, इस मूर्ति की हर सप्ताह सफाई होती है। तुम्हें मालूम है कि राज्य में इनकी विचारधारा वाले लोगों की सरकार है।"

"उधर देखो बाबूजी, वो रही चाचा नेहरू और इन्दिरा गांधी की मूर्तियां, ऐसा लगता है, इन्हें कभी कभी ही साफ किया जाता है"

"बेटा, अभी केन्द्र में इनकी विचारधारा वाले लोगों की सरकार है, लेकिन राज्य में नहीं, इसलिये कभी-कभी ही इन मूर्तियों की सफाई हो पाती है, वैसे इनकी पार्टी की सत्ता वाले राज्यों में इनकी मूर्तियां भी खूब चमकती है।"

"वो तो देखो, बाबा साहब की मूर्ति, बाबूजी, हमारा संविधान इन्होंने ही लिखा था ना ?"

"हां बेटा, इनकी मूर्ति हमेशा साफ-सुथरी और चमकती है। इनकी विचारधारा वाले लोगों का सरकार में बड़ा योगदान रहता है।"

"और वो देखो बाबूजी, हमारे स्वर्गीय महाराजा की मूर्ति। कितनी शानदार, चमकीली और साफ सुथरी

बेटा, इस मूर्ति का रख-रखाव निजी हाथों में है। और तुम्हें मालूम है निजी संस्थान अपनी सम्पत्तियों का और विचारधारा का कितना ख्याल रखते हैं।"

"और बाबूजी, वो मूर्ति किसकी है ?, चेहरा भी साफ नहीं दिखाई दे रहा है, ये प्रतिमा तो पक्षियों की बीटों से भरी हुई है। देखो, एक पक्षी ने तो घोंसला ही बना लिया है, क्या इसकी साफ सफाई कभी नहीं होती ?"

"बेटा, वो बापू की प्रतिमा है, वैसे शहीद दिवस और गांधी जयन्ती पर इसकी भी साफ सफाई होती है। बस फिर एक साल तक ये पक्षियों का आशियाना बन जाती है।"

"तो क्या बापू की विचारधारा वाले लोगों की सरकार कहीं नहीं है ?"

"पता नहीं बेटे"

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रचनाकार संपर्क :

(संजय पुरोहित)

समीप सूरसागर, धोबीधोरा,

मेजर जेम्स विहार, बीकानेर

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चित्र - साभार - डॉ. आलोक भावसार

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आलेख

 

-मनोज सिंह

 

पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का तकरीबन दो दशक पूर्व एक वक्तव्य आया था कि वह अपने बेटे को या तो सेना में भेजना चाहेंगी या वकील बनाएंगी। किसी साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार द्वारा उनके बेटे के करिअर के बारे में प्रश्न पूछने पर उपरोक्त संदर्भ उठा था। बात सामान्य-सी है मगर जाने-अनजाने यह प्रदर्शित कर जाती है कि पाकिस्तान में रहने वाली एक मां अपने बेटे के लिए क्या सपना देखती है। कथन का शब्दार्थ सरल है जो पहले भी समझ आया होगा मगर अब तो पूर्णत: प्रमाणित भी हो रहा है। इसके भावार्थ में छिपी है एक समझदार मां की दूरदर्शिता, जो बेनजीर भुट्टो में भी साफ दिखाई दे रही थी। यहां सोचने वाली बात है कि उन्होंने अपने बेटे के लिए कोई और प्रोफेशन के बारे में क्यूं नहीं सोचा? भुट्टो परिवार के लिए, जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत है, हर तरह से समर्थ है, अपने बच्चों के लिए कोई भी शिक्षा चुन सकते हैं, तो फिर सिर्फ इन दो क्षेत्रों को चुनने का ही क्यूं सोचा गया? विश्लेषण किया जाना चाहिए। आज की तारीख में बच्चे (बिलावल, बख्तावर व आशिफा) अभी पढ़ रहे हैं, भविष्य में क्या करेंगे, उनकी पसंद व परिस्थितियों पर निर्भर करता है। परंतु माता-पिता द्वारा बच्चों के लिए देखा गया ख्वाब, समाज की हकीकत बयान करता है। यह बताता है कि तत्कालीन युग में सबसे महत्वपूर्ण ओहदे कौन से हैं। हर एक मां-बाप को अपने बच्चे को ऊंचे से ऊंचे पद पर देखने का ख्वाब होता है। वो उन्हें शक्तिशाली, बड़े से बड़ा, खुशहाल और सुरक्षित देखना चाहते हैं। और ध्यान से देखें तो यही दोनों क्षेत्र पाकिस्तान में सबसे ज्यादा आकर्षक हैं फिर जिनके द्वारा शीर्ष तक भी पहुंचा जा सकता है। इस क्षेत्र से संबंधित लोग अधिक प्रभावशाली हैं। पैसा, पावर सब कुछ है यहां पर। पाकिस्तान के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक जितने भी शासक यहां हुए हैं, वे या तो तानाशाह के रूप में सेनाध्यक्ष हुए या फिर अधिकांश प्रमुख प्रधानमंत्री, पेशे से वकील थे। पाकिस्तान के कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना एक मशहूर एडवोकेट थे। लोकप्रिय जुल्फिकार अली भुट्टो, एकमात्र ऐसे नेता थे जो राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री दोनों रहे, उन्होंने भी विदेश से वकालत पास की थी। रईस घर के सफल व्यवसायी नवाज शरीफ ने भी पाकिस्तान के पंजाब विश्वविद्यालय से लॉ की परीक्षा पास कर रखी है। बेनजीर खुद वकालत की मानद उपाधि से सम्मानित हैं और वे छात्र जीवन में भी सक्रिय थीं। वो प्रथम एशियाई महिला हैं जिन्हें ऑक्सफोर्ड यूनियन के निर्वाचित प्रेसीडेंट होने का गौरव प्राप्त है।

लड़ाई दो तरह से लड़ी जा सकती है- एक हाथ से दूसरी जुबान से। शासन दो तरीके से किया जा सकता है शब्द के द्वारा या शस्त्र के माध्यम से। शासक सदैव नियमों को बनाकर उसका क्रियान्वयन करता रहता है। समाज को अनुशासित करने के लिए, व्यवस्था बनाए रखने के लिए, जितनी भी कोशिश की जाती है सभी के मूल में यही दो रास्ते होते हैं। अवाम के लिए लड़ने वाला नेतृत्व भी दो तरह से विद्रोह करता है एक शारीरिक दूसरा मानसिक। दोनों रास्ते में सफलता के लिए बुद्धि, होशियारी व साहस का होना आवश्यक है। मुंह से बोलने वाला अपनी वाक् कला से सामने वाले को मोहित करता है, तर्क से संतुष्ट करता है, बहस से वश में करता है और वाद-विवाद से हराता है, अपने अधीन करता है, अपनी बात मनवाता है। वहीं हाथ से लड़ने वाला, ताकत से, जोर-जबरदस्ती से, डर से, बाहरी दुश्मन से बचाने व सुरक्षा प्रदान करने के नाम पर अपने नियंत्रण में कर लेता है। विश्व इतिहास को देखें तो या तो जिन्होंने शस्त्र उठाया या फिर जो अच्छे वक्ता रहे हों, इन दोनों ने ही नेतृत्व प्रदान किया है। इन दोनों ने ही क्रांतियां की और फिर इन्हीं में से कुछ शासक बने। इन दोनों विधाओं व कला के प्रदर्शन के लिए सर्वाधिक अनुकूल व उपयुक्त क्षेत्र देखना हो तो जहां शस्त्र के लिए सेना सर्वश्रेष्ठ है वहीं शब्द के लिए वकालत से बड़ा कोई पेशा नहीं। इसीलिए अधिकांश क्रांतियां सैनिकों द्वारा लड़ी गयी और ज्यादातर नेता वकील हुए।

पाकिस्तान में, पिछले कुछ दिनों की घटनाओं को देखें तो वर्तमान काल इन्हीं विचारों की सत्यता को प्रमाणित करता है। वहां के सैनिक तानाशाह को अपने ही न्यायाधीश ने चुनौती दे रखी है और बहुत हद तक अवाम इस विद्रोह के साथ दिखाई देता है। पद से हटाये गये मुख्य न्यायाधीश इफ्तेखार मोहम्मद चौधरी ने अब तक कोई राजनीतिक वक्तव्य नहीं दिया इसके बावजूद वो मुशर्रफ के लिए सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभर कर आए हैं। पाकिस्तान स्वतंत्रता के बाद से ही कभी भी स्थिर नहीं रह सका। और सदा ही युद्धभूमि बना रहा। और इसीलिए यहां लड़ने वाला ही जीवित रहता है। और जो जीता वो सिकंदर, वही राज करता है। अधिकांश समय सेना ने बंदूक के नोक पर शासन किया तो चुनाव में जाने-अनजाने वकीलों का वर्चस्व रहा। वैसेे भी सेना हो या वकालत, राजनीति इन दोनों के दरवाजे पर खड़ी भीख मांगती नजर आती है। दुनिया के दूसरे स्वतंत्रता संग्राम को भी देख लें, शब्द और शस्त्र ने ही क्रांतियां की हैं। एक तरफ हाथों से लड़ने वाले सैनिक, मजदूर, स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारी व आंदोलनकारी और दूसरी तरफ विचारक, लेखक, दार्शनिक और सबसे बड़ी संख्या में वकील। जो शब्दों के माध्यम से जिरह कर न्याय प्राप्त करते और दिलवाते हैं। और यही कारण है जो अधिकांश विद्रोह, क्रांतियां, स्वतंत्रता संग्राम और आंदोलनों में वकीलों की संख्या सर्वाधिक रही है। भारत में भी तमाम बड़े नेता या तो वकीली पेशा से आए या फिर नेता बनने के बाद एडवोकेट भी बन गए।

आज पाकिस्तान जल रहा है। वो न्याय की उम्मीद में है। वर्तमान में ही नहीं पूर्व में भी सैनिक तानाशाह तभी तक बने रह सके जब तक विपक्ष कमजोर रहा। बेहतर विकल्प पर सदा सेनाध्यक्ष को या तो हटना पड़ा या समय द्वारा हटा दिया गया। और अवाम ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था को कई मौके दिए, फिर चाहे वो तत्कालीन नवयुवती बेनजीर रही हों या सफल व्यवसायी शरीफ। अबकी बार उसे आशा की किरण एक न्यायाधीश से प्राप्त होती दिखाई देती है। ध्यानपूर्वक देखें तो ऐसा ही कुछ हाल हिंदुस्तान का भी है। हम चाहे अपने प्रजातंत्र पर जितना भी गौरव करें मगर असलियत है कि हमारी सर्वोच्च न्यायालय भी दिन प्रतिदिन लोकप्रिय होती जा रही है। और उसकी वजह है कि प्रजा न्याय चाहती है। वह चाहती है कि जो उसकी भलाई में हो वही उसके साथ किया जाये। फिर चाहे कुछ पल के लिए बुरा ही क्यूं न लगे। वो स्वयं के लिए कोई शार्टकट नहीं चाहती। झूठा दिखावा, लाड़-प्यार नहीं चाहती। वह दिवा-स्वप्न नहीं चाहती। उसे सुख की चाशनी में दु:ख पसंद नहीं। वह तुष्टिकरण नहीं चाहती। हमारी प्रजातांत्रिक नेतृत्व इस बात को समझने के लिए तैयार नहीं। वो जनता को झुनझुना पकड़ाकर बच्चों की तरह बहलाना-फुसलाना चाहते हैं। वह उसे वो सब चीज देना चाहते हैं जो देश, समाज, परिवार किसी के भी हित में नहीं। परिपक्व अवाम, इसी कारण से, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये जा रहे अधिकांश फैसलों को, जो दूरगामी व सकारात्मक परिणाम से बंधे दिखाई देते हैं और उसके वास्तविक हित में है, दिल से स्वीकार कर रही है। कइयों का तो यह भी मत है कि न्यायालय कम से कम फैसले तो ले रही है। अब क्या करें, शासन खुद तो कुछ भी करने को तैयार नहीं।

अगर हमारे प्रजातांत्रिक संस्थान के तथाकथित महान नेतृत्व को इन बातों का यकीन न हो तो हिंदुस्तान में भी जनमत करा कर देख लें, वे सर्वोच्च न्यायालय के सामने भी चुनाव हारते हुए दिखाई देंगे। हिंदुस्तानी नेताओं सावधान, कहीं तुम्हारी जमानत भी जब्त न हो जाए।

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रचनाकार संपर्क :

मनोज सिंह

४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com/

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कहानी

-कमल

न चाहते हुए भी भुजंग दम साधे पल्टू के पीछे खतरनाक पहाड़ी पर बढ़ा जा रहा था। उस बेहद कठिन सूत-सी पतली पगडंडी पर जरा भी चूक का अर्थ था, सैकड़ों फीट गहरी खाई में गिरना। लेकिन 'उस` तीखे मोड़ के नजदीक आते ही भुजंग की घबराहट बढ़ने लगी। काफी प्रयत्नों के बावजूद उसका ध्यान भटकने लगा।

"मैंने कहा मुझे गांव जाने दो, मगर तुम नहीं माने। अब बताओ तुम कैसे बचोगे?" गुस्से से लाल आंखों वाले पल्टू का अट्टहास गहरी खाई में गूंजता चला गया।

पसीने में सराबोर भुजंग का रहा-सहा हौसला भी टूट गया। उसके कदम लड़खड़ाये। पांव फिसलने की देर थी, वह झटके से गहरी खाई में गिरने लगा। उसके मुँह से मौत की डरावनी चीखें उबलने लगीं। वह बचने के लिए चारों तरफ हाथ-पांव मारने लगा। परन्तु उसके चारों तरफ पल्टू का अट्टहास करता डरावना चेहरा घूम रहा था। भुजंग का शरीर तीव्रता से गहरी खाई में गिरता जा रहा था।

इसके पूर्व कि पथरीली, नुकीली चट्टानों से टकरा शरीर टुकड़े-टुकड़े होता, उसकी नींद खुल गई। वह बुरी तरह हांफ रहा था। टटोल कर उसने लैंप जलाया और पानी की बोतल उठा मुँह से लगा ली। गट्...गट्...गट्...पानी की ठंढक गले से होकर पेट में उतरी तो ज़ोरों से धड़कते दिल ने कुछ राहत महसूस की। धीरे-धीरे वह प्रकृतस्थ होने लगा।

पिछली तीन रातों से लगातार वही सपना उसे परेशान कर रहा है। अब यह बात उसके मन में धर करने लगी है कि जब तक पल्टू हवालात में बंद है, सपने में यूं ही उसे परेशान करता रहेगा। पल्टू को छुड़वा गाँव वापस भेजना ही होगा। कल सुबह ही दूध बेचने का काम खत्म कर वह थानेदार से मिलेगा। ऐसा सोच वह लेट गया परन्तु नींद उससे कोसों दूर थी। पल्टू उसके दिलो-दिमाग पर बुरी तरह छाया हुआ था। ये है कहानी का सपना नंबर एक।

संभवत: अब आप भी पल्टू के बारे में जानना चाहते होंगे। लेकिन पल्टू से पहले भुजंग के बारे में जानना ज़रुरी है। यूं समझिए कि भुजंग के बिना पल्टू की कहानी प्रारंभ ही नहीं हो सकती।

भूतकाल की पड़ताल से भुजंग का इतिहास बहुत लंबा नहीं मिलता। सिवाय इसके कि कहीं दूर से, जहां उसका लंबा-चौड़ा दूध -व्यापार चलता था, कई वर्ष पूर्व वहाँ आ बसा है। वहां वाले गुर यहाँ के व्यापार में प्रयोग कर उसका वर्तमान सुदृढ़ बन चुका है। वो वर्तमान उसके सुरक्षित व समृद्ध भविष्य का गवाह भी है।

उन दिनों वह कुछ बीमार गाय-भैसों के साथ आया था। बल्कि यूँ कहें कि अपने बीमार जानवरों के कारण उसे पूर्व की जगह छोड़नी पड़ी थी। शरीर पर अज़ीब से चकते उनकी बीमारी के प्रमाण थे। उनके दूध में भी पहले जैसी पौष्टिकता न थी। इन्हीं कारणों से पिछली जगह पर उसका दूध प्रतिबंधित हुआ था। उनका ईलाज करवाने की जगह वह अपने बीमार जानवरों से होने वाली आमदनी त्यागने को तैयार न था। तब उसने यहां का रास्ता पकड़ा जहां के लोग चमक दमक पर ही ज्यादा ध्यान देते थे।

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वह प्रचार युग था। तेज़ रो्शनियों, चमकदार रंगों और सुंदर बालाओं वाला प्रचार युग। प्रचार-बालाएं जो सदा टी.वी, पत्रिकाओं और बड़े-बड़े हो डगों पर लहराती हुई बला बनी रहतीं! सुंदरियाँ भी ऐसी जिनके रसीले होंठों से झाँकती श्वेत दंत-पंक्ति वाली तिरछी मुसकानें, नशीली आँखें, वक्ष से कटि तक की प्रत्येक उठान और ढलान, उनके उठने-बैठने व चलने का अंदाज आदि सौंदर्य वि्शेषज्ञों द्वारा पूर्व में ही जांचे और पास किये गये। बस यूँ समझ लें कि स्वर्ग की अप्सराओं को मात करती उन प्रचार-बालाओं की एक अदा के सामने पूरी की पूरी मेनका फेल।

उन अप्सराओं द्वारा भुजंग ने अपने दूध का ऐसा प्रचार करवाया कि सब तरफ सनसनी फैल गईं। अपनी दिलकश अदाओं वाले पोस्टरों में वे लोगों को ऐसी दिखतीं मानों भुजंग नहीं वे सुंदरियां ही दूध बेच रही हों। उनके आकर्षण से हर कोई खिंचा चला आने लगा। जब वे प्रचार-बालाएं टी.वी.पर उस दूध की वि्शेषताएं लगातार बताने लगीं तब भला लोगों को बीमार जानवर और खराब दूध कैसे नजर आते? अब मदहो्श आँखों, रसीले होंठों, कामुक अदाओं की बात कौन ठुकरा सकता था? उन बालाओं ने तो यहाँ तक बताया कि भुजंग के दूध में ऐसे-ऐसे पौष्टिक तत्व हैं, जिनकी लोगों ने पूर्व में कभी कल्पना तक न की होगी। ...इस प्रकार भुजंग को वहां के दूध-बाज़ार पर अपना एकछत्र राज स्थापित करने में कोई खास कठिनाई न हुई। यही तो तिलिस्म है प्रचार का, जो मिट्टी को भी सोना बता, बेच देता है!

व्यापार में माहिर भुजंग कई तरह के ऑफर भी देता रहता था। जैसे कि दो लीटर दूध के साथ चौथाई लीटर फ्री और चार लीटर के साथ आधा लीटर फ्री। खूब चमकदार खटाल में ऊँचे टाइल्स जड़े चबूतरे पर बैठ, भुजंग स्टाइल से दूध बेचा करता। प्रतीक्षारत ग्राहकों के लिए अखबार पढ़ने की अतिरिक्त सुविधा भी थी। शीघ्र ही उसके दूध की धाक चारों तरफ फैलने लगी। भुजंग ने किला फतह कर लिया था।

उसने जिस तेजी से अपने काम निपटाए, हतप्रभ स्थानीय दूध विक्रेताओं को कुछ भी समझ न आया। बड़े-बड़े अधिकारियों की पत्नियाँ जब भुजंग के दूध की धार में बहीं तो उन्हें अचानक स्थानीय दूध विक्रेताओं के वही खटाल गंदे तथा अनधिकृत लगने लगे, जहाँ से उनकी आज तक सारी दूध-आवश्यकताएं पूरी हुआ करती थीं। वहीं से बात आगे बढ़ी और अतिक्रमण हटाने तथा शहर-सौंदर्यीकरण के नाम पर उन सब को शहर की सीमा के बाहर खदेड़ दिया गया। परिणामत: शहर से बाहर जा दूध लाने की कठिनाई न उठा सकने वाले सभी लोगों के लिए शहर में रह गये भुजंग का दूध ही एकमात्र विकल्प बचा था। जहां साफ-सुथरे और चमकदार खटाल की बाहरी दीवारों पर लगे मादक प्रचार-बालाओं के बड़े-बड़े पोस्टर पूरे शहर को दूध पिलाने का आमंत्रण देते प्रतीत होते।

हालाँकि चर्चा थी कि भुजंग भी अतिक्रमित जमीन पर है। लेकिन उसकी शक्ति्शाली सेटिंग के सामने सब नियम-कानून मुँह बाये खड़े थे (समरथ के नहीं दोष गोसाईं....)। इस प्रकार स्थानीय दूध वालों के सामने केवल दो विकल्प बचे। पहला कि वे अपना बोरिया-बिस्तर समेट कहीं और चले जाएं और दूसरा कि वे अपना दूध भुजंग की शर्तों पर उसे दे दिया करें, जैसा कि उन्हें ऑफर मिल चुका था। पहले विकल्प के बारे में वे सोच भी नहीं सकते थे। अंतत: सब ने अपना दूध भुजंग को बेचना स्वीकार कर लिया था।

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लेकिन असल कहानी यहाँ से भी नहीं शुरु होती। वह शुरू होती है लगभग दो सौ मील पूर्व में बसे वर्मा जी के गाँव, मेरा मतलब है पल्टू के गाँव से। गर्मी की छुटि्टयाँ जहां से सपरिवार बिता, शहर लौट रहे वर्मा दंपत्ति को एक विश्वासी नौकर की आवश्यकता थी।

''पल्टू के बापू, उसे हम खाना-कपड़ा के अलावा प्रतिमाह सौ रुपये नकद देंगे।``

वर्मा जी की बात सुन, गदगद पल्टू के बापू ने अपने दोनों हाथ जोड़े, ''हुजूर, पल्टू तो आपका ही बच्चा है।``

''तब ठीक है, यह लो छ: माह का एडवांस।`` वर्मा जी ने सौ-सौ के छ: करारे नोट उसकी हथेली पर रख दिये।

जब पल्टू को पता चला, उसका मन-मयूर नाच उठा। तब तक उसने शहर के केवल किस्से-कहानियाँ ही सुने थे। ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, चमचमाती गाड़ियाँ, चमकते-दमकते लोग। वहां गाँव का कादो-कीचड़ थोड़े न होता है! ...और पल्टू शहर आ गया था...अपने सपनों के शहर...शहरी लोगों के बीच!

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शहर पहुंचते ही उसकी ट्रेनिंग आरंभ हो गई। वह बड़ा समझदार साबित हो रहा था। जैसे-जैसे वह काम समझता जाता, वर्मा दंपत्ति के कार्य आसान होते गये। हालाँकि पल्टू के लिए सारी चीजें उतनी आसान न थीं। जब वह पहली बार मेम साहब के साथ बाज़ार गया, सब्जी वाले से उलझ गया था। थैले में पड़ी सब्जी को जब उसने हाथ से तौला, इसमें वह माहिर था, उसे वह काफी कम लगी। सब्जी वाला मालकिन को ठग रहा है, ऐसा सोच वह सब्जी दोबारा तुलवाने को अड़ गया था।

''अइसे ही लेना है तो लो वरना छोड़ दो। बड़े आये सब्जी दुबारा तुलवाने वाले।`` उसकी बात सुन सब्जी-वाला आग-बबूला हो गया।

उसके जी में आया, सब्जी वाले का सर फोड़ दे। परन्तु यह देख हैरान रह गया कि मिसेज वर्मा सब्जी वाले को कुछ बोलने की जगह उसे ही खींचती आगे बढ़ गई।

जब एक दिन वर्मा जी के साथ रा्शन ले कर लौटते ही उसने कुछ सामानों के पैकेट हाथ में उठा, न सिर्फ उनमें वजन कम होने की बात कही, बल्कि पास में पड़े तराजू से तौल कर उसे प्रमाणित भी किया तो शाबासी की अपेक्षा कर रहा पल्टू यह जान दंग रह गया कि कम वजन की बात उसके साहब और मेम साहब दोनों जानते हैं। उन्होंने समझाया कि दुकानदार की मनमानी न सहने का अर्थ है, कहीं ज्यादा दूर से रा्शन लाना, जो उनके लिए संभव नहीं है। फिर उस दूसरी दुकान पर भी वजन के सही होने की क्या गारंटी? शहर की इस भाग-दौड़ वाली जिंदगी में जहाँ भी और जैसे भी मिले हम सामान ले लेते हैं। तभी पल्टू को दुकान की छत पर लगा बोर्ड याद आया- 'सही वजन और सही दाम की एकमात्र दुकान।`

''एक बार...।`` वर्मा जी ने अपनी स्मृति पर जोर डालते हुए बताया, ''मैंने रा्शन वाले को कम वजन के लिए टोका था। उसने कहा तो कुछ नहीं लेकिन ऐसा सामान देने लगा, जिसमें काफी कंकड़ रहते। यदि वैसा सामान मैं ले आऊँ तब उसे साफ कौन करेगा? माना मेहनत करके उसे साफ कर भी लें तो निकले कंकड़ों के वजन बराबर कमी हो गई न! अब तुम्हीं बताओ रा्शन वाले की मर्जी से चलना ठीक या अपनी मर्जी से?``

यह जान कर पल्टू को अपने मालिक बुद्धिमान लगे। लेकिन फिर भी शायद उसे समझने में कोई कठिनाई हो रही थी, ''मगर ई तो चोरी अउर सीनाजोरी हुई न!``

''मैं अकेला तो नहीं हूँ। मुहल्ले वाले सभी वहां से सामान लेते हैं।`` वर्मा जी ने उसे समझाया।

...इस प्रकार धीरे-धीरे और न चाहते हुए भी पल्टू शहर की बातें सीखने लगा था। जब कभी उसका सरल मन शहर की बातों के विरुद्ध गुस्से से भरने लगता, वह मन मार कर स्वयं को समझाने लगता, वो शहर है। शहर में यही सब चलता है! वहां की बातें देख-सुन उसके मन में बसी शहर और शहर के लोगों की सुंदर छवि, बुरी तरह खंडित हो रही थी। साफ-सुथरे शहर से उसे अपना धूल-मिट्टी वाला गाँव ज्यादा भला लगने लगा था। लेकिन इन सब के बावजूद वह अपने गाँव वापस लौटने के बारे कभी न सोचता। शहर की जकड़ में धीरे-धीरे, बेमन से ही सही, परन्तु रहना सीख रहा था।

+++ +++ +++

ऐसे ही एक सुबह उसे उठ कर दूध लाना सिखाया गया। भुजंग से उसका परिचय पहले ही करवाया जा चुका था।

अगली सुबह दूध लेने पहुँचे पल्टू के कानों में भुजंग का अपनत्व भरा वाक्य फिर से गूँज गया। ''का हो भइया, शहर में मन तो लग रहा है न!``

भुजंग का अपनापन और चम-चम करता खटाल देख वह प्रभावित हुआ। वह चहक-चहक कर उससे बातें करने लगा। वहाँ की हर चीज उसकी उत्सुकता जगाने वाली थी। भुजंग ने दूध दुहने से पहले भैंस को सूई लगाई तो वह चौंका।

''आपकी भैंस बीमार है क्या?`` उसने चिंता व्यक्त की।

''नहीं, बिल्कुल नहीं!``

''तब उसे सूई काहे लगाई?`` चिंतित स्वर अब उत्सुक था।

''सूई से दूध ज्यादा होता है।``

कुछ विचारते हुए पल्टू ने अपना संदेह प्रकट किया, ''...वैसा दूध ज़रुर कम ताकत वाला हो जाता होगा।``

"नहीं, बिल्कुल नहीं। सूई वाला दूध तो और ज्यादा ताकत वाला हो जाता है।`` भुजंग ने अपना व्यापारिक चतुराई भरा ऐसा उत्तर दिया कि पल्टू को सहज ही विश्वास हो आया, ''...और ज्यादा दूध का अर्थ है ज्यादा ग्राहक। यानी ज्यादा मुनाफा समझे!`` भुजंग के भीतर का कुटिल व्यापारी उत्साह से बताए जा रहा था।

''जब तुम्हारे ग्राहक ज्यादा हो जाएंगे, तब तुम क्या करोगे?`` पल्टू ने भोलेपन से पूछा, ''तुम उन सबके लिए दूध कहाँ से लाओगे?``

''दूध लाना तो मेरे लिए बाँये हाथ का खेल है।`` भुजंग मुस्कुरा रहा था।

''भला वो कैसे?`` फिर बोला, ''मैं जान गया। तुम और जानवर ले आओगे।``

लेकिन भुजंग के उत्तर ने उसे चक्कर में डाल दिया, ''नहीं, बिल्कुल नहीं!``

''तब कैसे करोगे? क्या तुम कोई जादू जानते हो?``

''शहर में नये-नये आये हो, सब कुछ आज ही जान लेना चाहते हो क्या?`` कहता भुजंग दूध दुह रहे अपने चेले की ओर बढ़ गया। और उनके बीच उस दिन की बात चीत खत्म हो गई।

सुबह के कामों को निपटा खटाल पहुंचने तक उसे अक्सर देर हो जाती। फिर भी उसे दूध सुरक्षित और पूरा मिलता। भुजंग के साथ बहुत ज्यादा बातें नहीं हो पातीं, मगर वे दोनों काफी अपनेपन से मिलते। पल्टू और भुजंग की प्रगाढ़ता खिलने लगी। परन्तु पहले दिन जहां बात खत्म हुई थी, पल्टू उसे नहीं भूल पाया था। अब इसे संयोग कहें या दुर्योग, एक दिन वह समय से पहले खटाल पहुँच गया। दोनों प्रसन्नता से बातें करने लगे। जब उसे लगा भुजंग उसकी बात न टालेगा, उसने दूध बढ़ाने वाली बात फिर छेड़ दी।

"तुमने कहा था, बिना जानवरों को बढ़ाए ही दूध बढ़ा लोगे। भला ऐसा कैसे करोगे?``

भुजंग उस दिन कुछ मौज में था। उसने चुनौती दे डाली, ''बूझो तो जानूं।``

कुछ देर सोचने का उपक्रम कर पल्टू ने हथियार डाल दिये, ''मैं हार गया, अब तो बता दो। हमारे गाँव में तो ऐसा जादू कोई नहीं कर सकता।``

अपने स्वर को रहस्यमय बनाता भुजंग बोला, ''ये राज किसी को न बताना।``

"हां, हां नहीं बोलूंगा।`` पल्टू ने हामी भरी।

"ज्यादा ग्राहक होने पर पहले समस्या थी। अब मैं ग्राहक बढ़ने से पहले ही उनके दूध की व्यवस्था कर लेता हूँ। यहां सब को मेरा ही दूध पसंद है। दूसरे ग्वालों से कोई दूध नहीं लेता। वे अपना सारा दूध मुझे, मेरी मन चाही कीमत पर बेच देते हैं। इस तरह मेरे पास दूध नहीं फटता।`` भुजंग अपनी ही रौ में बोले जा रहा था। पल्टू के लिए सारी बातें किसी तिलिस्म से कम न थीं।

''...जब ग्राहक और बढ़ गये, तब मैंने दूध नापने वाले पौवे को नीचे से चपटा कर लिया।``

''भला वो क्यों?``

''अरे बुद्धू, इस तरह कम दूध में ही पौवा भर जाता है।`` भुजंग की बेफिक्री इस बात की गवाह थी कि उन जानकारियों के बावजूद पल्टू उसका अहित नहीं कर सकता, ''...और अब तो मैं ऐसा उपाय खोज चुका हूँ जिससे मेरा दूध कभी नहीं फटेगा।``

''वो उपाय क्या है?`` आश्चर्यचकित पल्टू को भुजंग वाकई एक जादूगर लग रहा था।

''अब मैं दूध में बस ज़रुरत भर पानी मिला देता हूँ।...स्वच्छ जल, समझे! चलो अब तुम शांति से डोल चबूतरे पर रख लाईन लगा लो, फिर बोलोगे देर हो गई।`` भुजंग काम में लग गया।

पल्टू को मिली जानकारियाँ काफी आश्चर्यजनक थीं। ये सब बातें तो वर्मा साहब ने उसे नहीं बताइंर्। डोल रख वह एक तरफ खड़ा हो गया। लोग आते, अपना दूधवाला बर्तन लाईन में रख गप्पों में म्यगूल हो जाते। सकुचाया सा पल्टू एक तरफ गुमसुम खड़ा दिख रहा था। लेकिन उसके भीतर विचारों का तूफान उथल-पुथल मचा रहा था। दूध कम देने की बात तो खैर, न चाहते हुए भी, वह समझ ले रहा था। लेकिन मिलावटी व अशुद्ध दूध वाली बात उसकी समझ में नहीं उतर रही थी। वह कई-कई तर्कों से स्वयं को समझाने का प्रयत्न कर रहा था। परन्तु समझ कर शांत हो जाने की जगह उसका अंतर और भी धधकने लगता। तब तक भुजंग दूध की बाल्टी ले आया। साथ में पानी भरा चमचमाता जग भी। पल्टू के भीतर का तूफान अपने चरम पर था।...दूध तो शरीर बनाता है...खून बनाता है...आत्मा बनाता है! मिलावटी दूध से कैसा शरीर...कैसा खून...कैसी आत्मा बनेगी...? उसका अंतर्मन उबल रहा था। उसने फिर से स्वयं को समझाना चाहा, वो शहर है। शहर में ऐसा ही शरीर, ऐसा ही खून और ऐसी ही आत्मा होती है, उसे परेशान नहीं होना चाहिए। लेकिन न चाहने पर भी उसका ध्यान वहीं जा अटकता। और जब भुजंग दूध में पानी मिलाने लगा तो वह स्वयं को न रोक पाया, उसने बढ़ कर मजबूती से उसका हाथ पकड़ लिया।

''तुम दूध में पानी नहीं मिला सकते!`` उसके स्वर में दृढ़ता थी।

अब तक सीधी-साधी बातें कर रहे पल्टू के व्यवहार में अचानक आये उस परिवर्तन से भुजंग बुरी तरह चौंका। इतने वर्षों में आज तक किसी ने उसका हाथ यूं नहीं पकड़ा था। इतने बड़े और पहुँच वाले व्यापारी का हाथ एक अदना-सा मूर्ख-गँवार, वह भी उसके ही खटाल में पकड़ ले! परन्तु स्वयं पर शीघ्र ही उसने नियंत्रण कर लिया। उसके होंठों पर उपहास करती मुस्कान तैरने लगी।

''पानी मिला दूध सेहत के लिए अच्छा होता है।``

पल्टू ने आस-पास नजरें दौड़ाईं, ''क्या आप लोग यह मिलावटी दूध लेंगे?``

''हां लेंगे! हम तो यही दूध लेते हैं।`` कुछ लोगों का ढिठाई से मुस्कराता उत्तर सुन उसे लगा, वह चकरा कर गिर जाएगा।

''क्यों आज दूध को क्या हो गया?`` एक हंसी पल्टू के कानों में ज़हर घोल गई।

''तुम्हें नहीं लेना तो साईड हटो।`` दूसरे ने टहोका लगाया।

''मैं साइड क्यों हटूँ? सबसे पहले मैं आया हूँ, दूध पहले मैं ही लूंगा।`` तब तक वह उन लोगों की उदासीनता से उबर चुका था।

''तो लो न मेरे बाप और हमें भी लेने दो, ऑफिस जाना है।`` पीछे से एक गर्दन निकली।

''...लेकिन मैं पानी वाला दूध नहीं लूँगा। मैं खाँटी दूध लूँगा।`` पल्टू दृढ़ था।

''क्यों भई, चिड़िया र से भागे हो क्या?`` एक और व्यंग-बाण उसकी ओर झपटा।

अब तक मजे से तमाशा देख रहे भुजंग ने मुस्कराते हुए कहा, ''शायद वहां किसी चिड़िया र में ही रहता था। वर्मा जी अपने गाँव से लाये हैं।``

पल्टू ने भीड़ को ललकारा, ''आप सब के सामने दूध में पानी मिलाया जा रहा है। परन्तु आप लोग इसे रोकने की जगह मुझे ही रोक रहे हैं!``

''तो क्या करें? तुम्हारी आरती उतारें या तुम्हारी तरह बेवजह का शोर करने लगें?`` एक और आवाज पल्टू की पीठ पर चाबुक सी पड़ी, ''पानी मिलाने की सहमति देने के बाद हम ही उसे रोकेंगे क्या?``

''आप सब की सहमति!`` वह बुरी तरह चौंका।

''हां, पहले भुजंग पहले छुप कर पानी मिलाता था। डर बना रहता था, कहीं तालाब या पोखर का पानी न मिला दे। सामने मिलाने से अब वह डर तो नहीं है।`` आवाज वाला चाबुक फिर लहराया।

''पल्टू महाराज, वास्तव में हम सब भुजंग के शुक्रगुजार हैं। वह सब कुछ बड़ी ईमानदारी से करता है। अगर वो बेईमानी करना चाहे तो, धोखे से हमें सिंथेटिक दूध बेच लाखों का वारा-न्यारा कर ले। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। जानते हो न सिंथेटिक दूध कितना हानिकारक होता है?`` एक प्रश्न भी साथ में उछल कर आया।

पल्टू के इंकार पर उपहास करती हंसी फिर उभरी, ''सिंथेटिक दूध नहीं जानते और चले हो हमें मिलावटी दूध की बात बताने!``

''लेकिन मुझे सब पता है।`` भुजंग ने मोर्चा संभाला, ''वह एक निश्चित अनुपात में तरल साबुन या डिटरजेंट, कास्टिक सोडा, खद्य तेल(पामोलिन), यूरिया, पानी आदि के मिश्रण से बनाया जाता है जिसे बाद में क्रीम निकाले दूध (सपरेटा) में मिला शुद्ध दूध के भावों पर बेचा जाता है। वह दूध बिना उबाले तकरीबन आठ घंटे तक सुरक्षित रह सकता है। चाहो तो ऐसे दूध से दही भी तैयार कर लो। मज़े की बात तो यह कि समझदार से समझदार वि्शेषज्ञ भी ऐसी मिलावट का पता नहीं लगा सकता। लेकिन मैं उसका व्यापार नहीं करता, क्योंकि वैसा दूध जीवन के लिए बड़ा हानिकारक है। वह 'धीमे ज़हर` की तरह काम करता है।`` गर्दन ताने भुजंग ऐसे बता रहा था, मानों वैसा न कर के उसने सब लोगों पर अहसान किया है। उसके भारी-भरकम तर्कों से दबा पल्टू स्वयं को बड़ा असहज और कमजोर महसूस कर रहा था। जिन लोगों को उसका समर्थन करना चाहिए था, वे ही उसके विरुद्ध भुजंग के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं। वह तो एक भुजंग को रोकना चाहता था, वहाँ कई-कई भुजंग सीना ताने खड़े हैं। उसका विश्वास पक्का होने लगा, उन लोगों का खून, शरीर, आत्मा मिलावटी दूध से कमजोर हो चुके हैं। उसका निश्चय और मजबूत हो गया, वह किसी भी हाल में मिलावटी दूध नहीं लेगा।

हाल में ही 'मिनरल वॉटर` की एजेंसी ले चुके एक सज्जन आगे बढ़े, ''जल्द ही हम अपने लिए और ज्यादा सुरक्षित दूध लेने लगेंगे।"

"वो कैसे?"

"हम सब आम सहमति से दूध में 'मिनरल वॉटर` मिलाने वाले हैं।`` आवाज वाली आँखों में संभावित मुनाफा चमक रहा था।

वे सारी जानकारियां पल्टू को चकरा कर पटक देने के लिए काफी थीं, लेकिन उसने अपने हो्श काबू में रखे। वह चीखा, ''एक तो मिलावटी दूध लेते हैं। दूसरे फरेबी भुजंग को सच्चा साबित करने के लिए इसका पक्ष ले रहे हैं। अरे, दूध ही तो इस पृथ्वी पर सबसे सच्ची और पवित्र चीज है। जब वही अशुद्ध हो गया तब बाकी क्या बचेगा? आप लोगों को शर्म आनी चाहिए।``

''नहीं, हमें तो शर्म नहीं आती।`` पहली आवाज ने बे्शर्मी से कहा।

''हमारी मर्जी जैसा चाहें दूध लें, तुम कौन होते हो हमें सिखाने वाले? हम तुम्हारे पैसों से तो नहीं ले रहे।`` पल्टू को लगा उसकी चीख प्रतिध्वनि बन कर लौट आयी है।

''अरे गोबर गणे्श, तुम्हें दूध नहीं लेना तो हटो एक तरफ। हमें ले लेने दो पहले ही काफी देर हो चुकी है।`` मिनरल वॉटर वाले सज्जन ने उसे घुड़का।

अब तक पल्टू समझ चुका था, उसे अकेले ही मोर्चा लेना होगा, ''नहीं, मैं नहीं हटूंगा। मैं पहले आया था, दूध पहले मैं ही लूंगा! मेरे बाद आप लोगों की मर्जी है, दूध में पानी मिलवाएं या ज़हर।``

हालाँकि पल्टू अकेला था, लेकिन उसके स्वर की दृढ़ता सभी आवाजों पर भारी पड़ी थी। इस बवाल में देर होने से लोगों की कसमसाहट बढ़ रही थी। वे सब किसी भी तरह मामला निपटा कर निकल जाना चाहते थे।

एक ने भुजंग को समझाया, ''अरे भई, तुम ही मान जाओ। दे दो इसे खाँटी दूध।``

भुजंग बुरी तरह चौंका। उसकी हां में हां मिलाने वाले पल्टू के पक्ष में क्यों बोलने लगे? वह सावधान हो गया। यह सिलसिला चल पड़ा तो आगे कठिनाई पैदा करेगा। इसे अभी और यहीं खत्म करना होगा, ऐसा सोच वह भी अड़ गया, ''नहीं सर, हम तो सब को एक सी क्वालिटी का दूध देंगे। हमारा पूरा व्यापार क्वालिटी पर खड़ा है। एक गँवार के कहने से अपना क्वालिटी तो खराब नहीं करेंगे न।``

लोग चुप थे, उन्हें भुजंग का फैसला सही लगा। लेकिन हल निकलता न देख उनकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी।

तभी एक आदमी की समझ में भुजंग की कठिनाई आयी। वह बोला, ''ऐसा करो, इसे खाँटी दूध देने से तुम्हें जो नुकसान होगा, उसे हमारे दूध में ज्यादा पानी मिला कर मेकअप कर लो।``

दूसरों ने भी उस प्रस्ताव का समर्थन किया, ''हां, हां ऐसा कर लो।``

परन्तु भुजंग जैसे व्यापारी ने तुरंत ही उस प्रस्ताव के दूरगामी प्रभावों की गणना कर ली, ''नहीं सर, ऐसा नहीं हो सकता। आज इसके कहने पर हम आपके दूध में ज्यादा पानी मिलाएंगे, कल किसी और को खाँटी दूध देने के लिए आपके दूध में और ज्यादा पानी मिलाएंगे। हम आपके दूध में कितना पानी मिलाएंगे? हमको आपके दूध की क्वालिटी की चिन्ता नहीं है क्या?`` भुजंग ने अपनी आवाज में मिश्री घोलते हुए उस प्रस्ताव को रद्द कर दिया।

पल्टू के अलावा वहां मौजूद हर व्यक्ति बड़ा प्रभावित हुआ, देखो भुजंग को हमारी कितनी चिन्ता है। उन्हें एक बार फिर से पल्टू नागवार लगने लगा। भुजंग का मनोवांछित हो गया। उसकी कुटिल चाल ने बाजी फिर से अपने हक़ में कर ली।

"हां, हां भुजंग बिल्कुल ठीक कह रहा है।`` भीड़ की आवाज उभरी, ''तुम मिलाओ दूध में जितना पानी मिलाना है, हम सब तुम्हारे साथ हैं।``

भीड़ की आवाज सुन पहले तो पल्टू बड़ा विचलित हुआ, फिर उसके स्वर में भी कठोरता बढ़ गई। उसने कुटिलता से खिल आये भुजंग के चेहरे पर आँखें गड़ाये कठोर स्वर में पूछा, ''तुम मुझे दूध दोगे या नहीं?``

जाल में फंसे कीड़े को देख जो भाव मकड़े के चेहरे पर उभरते हैं, ठीक वही भाव भुजंग के चेहरे पर थे, ''दूंगा, ज़रुर दूंगा। लेकिन पानी मिलाने के बाद।`` उसने अपने हाथ में थमा पानी भरा जग दूध की बाल्टी में उलट दिया।...उसका दूध बिक्री योग्य हो गया था।

यह देख पल्टू हिस्टीरियाई अंदाज में चीखा, ''यह दोगे मुझे?...यह अब दूध कहाँ रहा?`` कहते हुए उसने जोरदार लात बाल्टी पर दे मारी। धड़ाम्...की आवाज से बाल्टी उलट गई।

जमीन पर फैलते दूध के साथ भुजंग के चेहरे पर अपमान और हार की कालिमा साफ नजर आ रही थी। एक पल को वहां सन्नाटा छा गया। सभी सकते में थे।

गुस्से में कांपता भुजंग जोर-जोर से चीखने लगा, ''जाने कैसे-कैसे गँवार नौकर आप लोग ले आते हैं। पहले ऐसे मूर्खों को शहर के तौर-तरीके सिखाइए, तब मेरे पास भेजिए।`` फिर फर्श पर फैले दूध की ओर इशारा करता बोला, ''आप सब कान खोल कर सुन लीजिए यह नुकसान मेरा नहीं है। मैं यह दूध भी आप सब के हिसाब में लिखूंगा।``

वहां काम करने वाले एक लड़के ने पल्टू को पकड़ लिया। लेकिन वह कुछ करता उससे पहले ही पल्टू के जोरदार झटके ने उसे दूर फेंक दिया। कुछ लोग बीच-बचाव करने लगे।

''देखो भुजंग, मार-पीट करने से क्या फायदा?``

''वैसे भी इस दूध के पैसे तुम हमारे खाते में चढ़ाने की बात कह चुके हो।``

भुजंग ने अपने लड़के को रोक लिया। पल्टू ने भी वापसी की राह ली।

''आज तो बिना चाय के ही ऑफिस जाना पड़ेगा।``

''आज नींबू वाली चाय पी लेना।`` दूसरे ने सुझाया।

एक आवाज धीमे से उभरी, ''देखा जाए तो पल्टू ठीक ही कह रहा था।``

''तो जाइए न आप भी उसके साथ घूम- घूम कर लातें चलाइए। आपको रोका किसने है? हां इतना बता दीजिए, कहां-कहां लातें चलाइएगा?`` पहली आवाज ने उन्हें ललकारा।

परन्तु उस ललकार का जवाब न आया। सब लोग खामो्शी से अपने गंतव्यों की ओर बढ़ गये।

+++ +++ +++

खटाल में शांति छा गई। मगर भुजंग को चैन न था। पास बैठा लड़का भी कसमसा रहा था, ''आपने मुझे रोक दिया, वरना मैं उस गँवार को न छोड़ता।``

''चेले, हम व्यापारी अगर लड़ने लगे, तब हुआ हमारा धंधा!``

''अगर उसने कल भी आकर ऐसा हंगामा किया तो?``

''हां, वही सोच रहा हूँ। ऐसा उपाय ढूंढना पड़ेगा जिससे साँप मर जाए और लाठी भी न टूटे।`` भुजंग उठते हुए बोला, ''मैं उसे कल यहां आने लायक नहीं छोड़ूंगा। तुम बाकी के काम देखो मैं जरा थानेदार के घर से हो कर आया।``

''उनका दूध...।``

''नहीं, अभी बिना दूध के जाऊंगा। तभी बात बनेगी।`` भुजंग निकल गया।

+++ +++ +++ +++

लगभग उसी समय पल्टू अपराधी बना वर्मा जी के सामने खड़ा था। मिसेज वर्मा दूध न आने से वे खासी परेशान थीं।

''मैं पूछता हूं, तुम्हें नेता बनने की क्या जरुरत थी?`` वर्मा जी झल्लाये, ''अब अगर भुजंग ने हमें दूध देना बंद कर दिया तो? नहीं, नहीं कल से तुम दूध लेने नहीं जाओगे।``

पल्टू उनकी झल्लाहट ना समझ पाया। वह तो शाबासी की उम्मीद कर रहा था। वहां खटाल में भुजंग मौजूद था, इसीलिए लोग उसकी भाषा बोल रहे थे। परन्तु यहां तो नहीं है, फिर भी क्यों साहब उसी की भाषा बोल रहे हैं? उसे लगा अपने दूध के जरिए भुजंग साहब के भीतर घुस आया है। शहर में सभी भुजंग के वश में हैं। क्या शहर में रहने के लिए उसे भी भुजंग के वश में होना पड़ेगा? पल्टू जैसे-जैसे सोचता जाता, उसके अंतर में बसी शहर की सुंदर छवि वैसे-वैसे ढहती जाती। उसे गाँव का कादो-कीचड़ शहर की साफ-सुथरी सड़कों से ज्यादा अच्छा लग रहा था। शहर की मृग मरीचिका से उसका मोह पूर्णत: भंग हो चुका था।

''साहब, अब मुझे शहर में नहीं रहना है। मुझे गाँव वापस भेज दीजिए।``

वर्मा दंपत्ति ठगे से रह गये। तुरंत ही उन्हें कई चिन्ताओं ने आ घेरा। पल्टू ने घर के कितने काम संभाल लिए थे। वह वापस चला गया तो सारे काम फिर से उन्हीं के सर आ पड़ेंगे।

वे दोनों पल्टू को समझाने लगे, ''अरे इतनी सी बात पर बुरा मान गये। मैंने कहा न कल से दूध मैं ही लाया करुंगा। बिल्कुल मत घबराओ, धीरे-धीरे सब सीख जाओगे। यहां तुम्हारी जिंदगी बन जाएगी, गाँव में क्या रखा है?``

''नहीं साहब, मैं यह सब नहीं सीखना चाहता। मैं आपके हाथ जोड़ता हूं, मुझे जाने दीजिए।`` पल्टू की आँखें नम थीं। उसकी हालत देख, वर्मा दंपत्ति निरुत्तर हो गये।

''सुनो जी!`` मिसेज वर्मा फुसफुसाई, ''ये कोई और बखेड़ा न खड़ा कर दे। जाने दो इसे।``

उस स्थिति में वर्मा जी को भी उसकी बात जँची। अनुमति मिलते ही पल्टू जा कर सामान बाँधने लगा। वह जल्द से जल्द शहर छोड़ देना चाहता था।

+++ +++ +++ +++

भुजंग को खाली हाथ आया देख थानेदारनी का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। मगर उसने जब रोनी सूरत से नमक-मिर्च लगा अपनी रामकहानी सुनाई, थानेदारनी का दिल पसीज गया। उसने बाकायदा 'फ्राई` करके वह कहानी थानेदार को जा सुनाई (संइयाँ भये कोतवाल..)।

''कहाँ है ऊ गुंडा?`` थानेदार की कड़कती आवाज पर दो सिपाही भुजंग के साथ हो लिये।

बस अड्डे की ओर जाते पल्टू की गर्दन 'भुजंग एण्ड पार्टी` ने रास्ते में ही जा पकड़ी।

सारा माजरा समझते ही पल्टू अपनी गर्दन छुड़ाने के लिए छटपटाने लगा, ''छोड़ो मुझे! मुझे जाने दो! मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!``

एकबारगी तो भुजंग के जी में आया कि जाने दे बला अपने आप ही टल रही है। लेकिन तुरंत ही उसने अपने मन की बात काट दी। अब तो उसे मजा चखाना ही चाहिए। यूँ ही जाने देने में क्या मजा आएगा।

"क्यों, तब तो बड़े शेर बन रहे थे। अब शहर की दीक्षा लिए बिना गाँव कैसे जाओगे?"

...और किसी को भी पता न चला, गाँव जाता पल्टू शहर की हवालात में पहुंच गया। वर्मा जी के मुताबिक पल्टू अपने गाँव चला गया है। पल्टू के बाप की जानकारी में वह शहर में है। जबकि उसकी असल जगह का पता केवल भुजंग और पल्टू को था। भुजंग का व्यापार पूर्ववत् चलने लगा। उस दिन की हल्की-फुल्की चर्चा के अलावा किसी ने भी पल्टू के बारे में कुछ भी जानने में रूचि न दिखाई। कायदे से तो यह कहानी यहीं समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन ठीक यही पर पेंचदार मोड़ आ जाने के कारण सब कुछ उल्टा-पुल्टा होने लगा। आप में से कुछ पाठक मुझ पर आरोप लगाएंगे कि मैं भूत-प्रेत पर विश्वास करता हूं और उनके समर्थन में तर्क दे रहा हूँ। मगर विश्वास कीजिए ऐसा नहीं है।

पल्टू का उपाय कर निश्चिंतता से सोये भुजंग को पहली बार जो वह सपना आया तो फिर लगातार ही हर रात आने लगा। धीरे-धीरे उन सपनों की भयानकता बढ़ती ही जा रही थी। इसी कारण भुजंग ने पल्टू को हवालात से छुड़वाने का निश्चय किया।

उधर हवालात में रोते पल्टू को भी दूसरी रात एक सपना दिखा, 'कि भुजंग के खटाल में लाइन लगाए लोग हंस-हंस कर दूध ले रहे हैं। वर्मा जी भी वहां हैं। पल्टू उन्हें वह दूध लेने से रोकता है। मगर वे नहीं मानते। तब पल्टू बाल्टी को लात मार कर गिराना चाहता है। लेकिन इस बार बाल्टी टस से मस नहीं होती। वहां खड़े लोग उस पर हंसते हैं। वह गुस्से में भर कर बाल्टी पर पिल पड़ता है। परन्तु बाल्टी पर कोई असर नहीं होता। लातें चलाता पल्टू पसीने से सराबोर हो हांफने लगता है..।` यहीं आ कर उसका सपना टूट गया। नींद खुलने पर वह बड़ी देर तक रोता रहा। और इस तरह इस कहानी का दूसरा सपना खत्म होता है।

अगली सुबह भुजंग उसके सामने खड़ा था। घृणा से पल्टू ने मुँह फेरना चाहा, लेकिन उसकी बात सुन वह वैसा न कर सका।

''क्या तुम सच में अपने गाँव जाना चाहते हो?`` भुजंग मुस्कुरा रहा था।

पल्टू को सहसा अपने कानों पर विश्वास न हुआ। वह तेजी से उठ कर खड़ा हो गया। उसकी आँखें में तीव्र चमक थी। खु्शी से 'हां` में हिलती उसकी गर्दन में भुजंग को अपनी जीत दिखाई पड़ रही थी। ...थोड़ी ही देर में भुजंग उसे गाँव जाने वाली बस पर चढ़ा खु्शी-खु्शी लौट रहा था।

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...और कभी भी सपना न देखने वाले वर्मा जी को पल्टू के शहर से जाने की सत्रहवीं रात वह भयानक सपना पहली बार दिखा। कहानी का तीसरा सपना बड़ा ही जीवंत था, बिल्कुल 'लाइव टेलीकास्ट` जैसा! इसीलिए वो वर्मा जी को इतना भयानक लगा था। उस रात से वो सपना उन्हें लगातार डरा रहा है। सपने में उनके सर पर सवार पल्टू पागलों की तरह चीखने लगता है, ''मैं तो आपकी लड़ाई लड़ा था। आप मेरा साथ देते तो मुझे कोई नहीं हरा सकता था, भुजंग भी नहीं। मुझे भुजंग ने नहीं आपने हराया है!...आपने!!``

तभी पल्टू के शरीर से टपक कर नीचे गिर रही पसीने की हर बूँद से एक नया पल्टू पैदा होने लगता हैं। पसीने की जितनी बूंदें उतने पल्टू। धीरे-धीरे वहां कई पल्टू खड़े हो जाते हैं। वे सब मिल कर वर्मा जी को बुरी तरह झिंझोड़ने लगते हैं। उनकी बढ़ती भीड़ से वर्मा जी का दम घुटने लगता है। हर बार सपने का माहौल इतना अधिक डरावना हो जाता है कि वे चीख मार कर उठ बैठते हैं।

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(कमल)

संपर्क:- डी-१/१, मेघदूत अपार्टमेंट्स, मरीन ड्राइव रोड, पो.- कदमा, जमशेदपुर-८३१००५ (झारखंड) दूरभाष:- (०६५७) २३१०१४९. ९४३११७२९५४

kamalbalhotra@yahoomail.com

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कहानी-

 

राजनारायण बोहरे

 

एकबारगी मैं तो पहचान ही नहीं पाया उन्हें...ऽ

कहां वो अन्नपूर्णा भाभी का चिर-परिचित नितांत घरेलू व्यक्तित्व , और कहां आज उनका ये अति आधुनिक रूप ! चोटी से पांव तक वे बदली-बदली सी लग रही थीं ।

वे कस्बे के नये खुले इस फास्टफूड कॉर्नर से जिस व्यक्ति के साथ निकल रही थीं , वह सोसाइटी का कोई भला आदमी नहीं कहा जा सकता था । मुझे तो ऐसा अनुभव हुआ कि सिर्फ संग-साथ वाली बात नहीं , यहां कुछ दूसरा ही मामला है । क्योंकि वे बात-बेबात उस भले आदमी से सट-सट जा रहीं थीं , जैसे उसे पूरी तरह रिझाना चाहती हों !

आज उनने बनने संवरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी थी । उनके चमक छोड़ते गोरे बदन पर ' सब कुछ दिखता है ' नुमा कपड़े सरसरा रहे थे । हल्की शिफॉन की मेंहदी कलर की साड़ी से मैंच करता लो कट ब्लाउज , इसी रंग की बिन्दी और कलाई भर चूड़ियाँ , पांव में मेंहदी कलर की ही चौड़े पट्टे की डिजाइनदार चप्पलें और ताज्जुब तो ये कि हाथ के पर्स का भी वहीं रंग । मैंने उन्हें गौर से देखा तो ठगा-सा खड़ा रह गया ।

मैं ऐसी जगह खड़ा था ,जहां से उन्हें निकलना था । मुझे यहां पाकर वे कोई संकोच अनुभव न करें ,इस लिये मैं वहां से हटा और पीसीओ बूथ की ओट में आ गया ।

यह संयोग ही था कि वे दोनों पीसीओ बूथ में प्रविष्ट हो गये । वे कह रहीं थी -'' आप गलत अर्थ मत लगाइये , किसी के यहां जाने से पहले आजकल फोन कर लेना ठीक रहता है । पता नहीं वे फुरसत में हैं या नहीं , या फिर उन्हें कहीं बाहर जाना हो , या ये भी हो सकता है कि वे बाहर ही चले गये हों ।

उनके साथ वाले व्यक्ति ने निरपेक्ष भाव से कहा था-'' अरे मैं कहां बुरा मान रहा हूं । आप का कहना दुरुस्त है मैंडम ।''

बूथ में फोन डायल करने तक सन्नाटा रहा , फिर कुछ देर बाद आवाज गूंजी-'' हलो सिमरनपुर से ! पटेल साहब हैं क्या ? मैं मनीराम बोल रहा हूं । जरा बात कराइये उनसे ।''

'' हलो पटेल साहब, मैंने कहा था न , मैं आज मिलने आ रहा हूं । उन्हें साथ ला रहा हूं । ''

कुछ देर बाद वे लोग बाहर आये । मनीराम ने जेब से चाबी निकाल कर अपनी बाइक स्टार्ट की और पीछे देखने लगा । अन्नपूर्णा भाभी अपनेपन की भीतरी खुशी से मुस्कराती हुयी लपक के मनीराम के पीछे बैठ गयी । गियर डाल के मनीराम ने गाड़ी आगे बढ़ायी तो वे मनीराम पर लद सी गयीं ।

मैं निराश सा वहां से मुड़ा और अपने बीमा ऑफिस की ओर चल पड़ा ।

अगले दिन मेरा मन न माना तो मैं सुबह-सुबह उनके घर जा धमका ।

उनके सरकारी क्वार्टर के बाहर , बाउण्ड्रीवाल पर पुरानी नाम-पट्टिका की जगह पीतल की नयी चमकदार नेम-प्लेट लग चुकी थी- भरत वर्मा , क्षेत्रीय अधिकारी ।

दरवाजा वर्मा जी ने खोला , मुझे देख कर वे थोड़ा चौंके -'' क्यों साहब ,प्रीमियम ड्यू हो गया क्या?''

मैंने हमेंशा बनियान-पैजामा पहने रहने वाले वर्माजी को अच्छी क्वालिटी के गाउन में सजा धजा देखा तो काफी बदलाव महसूस हुआ । लेकिन गौर किया तो मैंने उनके पैंतालीस वर्षीय बदन को वैसा ही दुबला और कमजोर पाया । वही गरदन के पास से झांकती कालरबोन, कपोलों पर मांस से ज्यादा हाड़ दर्शाता सूखा-सा चेहरा और वे ही खपच्चीयों से लटके दुबले लम्बी अगुंलियों वाले हड़ियल हाथ । उन्हें आश्वस्त करता हुआ मैं बोला-'' नहीं वर्मा जी , प्रीमियम तो तीन महीने बाद है ! मैं तो बस यूं ही !''

'' कोई बात नहीं ,स्वागतम् ! आइये न !''

'मैं प्रसन्न मन से भीतर घुसा और सोफा की सिंगल सीट पर पसर के बैठ गया । वर्माजी मेरे ऐन सामने बैठे फिर मुस्कराते हुये बोले-'' और सुनाइये , आपकी प्रोग्रेस कैसी है ? अब तक 'डी एम क्लब' के मैंम्बर बने या नहीं !''

'' हां , वो तो मैं दो बरस पहले ही बन गया था , अपनी ब्रांच का पहला करोड़पति ऐजेण्ट हूं मैं ।'' बताते हुये मैं पुलकित था , पर भीतर ही भीतर सोच रहा था कि पहले कभी किसी बात में रूचि न लेने वाले वर्माजी आज बड़े व्यवहारिक दिख रहे है । ऐसा क्यों है ?

तभी भीतर से अन्नपूर्णा भाभी की ' कौन हैं जी ' मीठी आवाज आयी तो मेरा दिल उछल के हलक में आ गया , मेरी निगाहें बैठक कक्ष के भीतरी दरवाजे पर टिक गयीं ।

सुआपंखी रंग की ज़मीन पर गहरे काले रंग की छींट वाला , सूती कपड़े का ढीला-ढाला गाऊन पहने, दोनों हाथ पीछे करके जूड़ा बांधती वे जब नमूदार हुयीं , तो मैं ठगा सा उन्हें देखता ही रह गया । इस अस्त-व्यस्त दशा में भी वे गजब की जम रहीं थीं ।

मुझे देखकर वे गहरे से मुस्करायीं और हाथ जोड़कर बोलीं-'' अरे गुप्ताजी आप आये हैं ! बड़ी उमर हैं आपकी ! मैं कल ही इनसे कह रही थी, कि एक दिन आपसे मिलना है । आप न आते तो मैं आज ही आपके पास आ रही थी ।''

हमें बतियाता देख, यकायक वर्माजी चुपचाप खिसक गये ।

और अब जाने क्यों मैं खुद को सहज नहीं पा रहा था।

मुझे सोच में पड़ा देख वे तपाक से बोलीं-''अरे अमर, किस टैन्शन में फंसे हुये हो यार !''

'' कहां ? मैं किसी टैन्शन में नहीं हूँ ।'' कहता हुआ मैं मुस्कराने की व्यर्थ सी कोशिश करने लगा-''आपके बच्चे नहीं दिख रहे आज ! ''

'' वे दोनों स्कूल गये हैं '' कहते हुये वे मुझसे पूछने लगीं -''आपने बीमा एजेंसी लेते वक्त , ग्राहक को डील करने का कोई खास कोर्स किया था क्या ?''

'' नहीं तो , बस पन्द्रह दिन का ओरियेंटेसन प्रोग्राम हुआ था ,मंडल कार्यालय में ! क्यों कोई खास बात ?'

मुझे लगा ,आज कोई ख़ास बात है ,इसी वजह से वे इतना अपनत्व दिखा रही हैं। वे इस तरह धाराप्रवाह ढंग से मुझसे बतियाने में जुट गयीं कि मैं उन्हें ठीक ढंग से देख ही नहीं पा रहा था। शायद मुझे इसी उलझन में डालने के लिये वे लगातार बोलती जा रही थीं।

वर्माजी चाय बहुत अच्छी बनाने लगे थे ।

बिस्कुट कुतरते समय वे गहरे आत्मविश्वास में डूबी थीं , मैं उनके व्यवहार पर क्षण क्षण चकित था । बीमा की किश्त लेने मैं हर छह माह में इनके यहां आता रहा हूँ । बीच में नयी लांच की गयी पॉलिसी लेने के लिये उनको पटाने भी मैं अक्सर आ जाता था , पर वे इतनी खुलकर कभी नहीं मिली । प्राय: वर्माजी से भेंट होती थी , वे बीच में कभी-कभार बैठक में आती थीं तो नमस्कार करके तुरंत भीतर चली जाती थीं ।

मेरी निगाह उनके मोहक चेहरे और ढीले - ढाले गाऊन में से उभरते उनके आकर्षक बदन को ताकने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही थी और अब अपने को ताके जाने का ज्ञान होने के बाद , वे मुझसे नजरें नहीं मिला रही थीं , छत को बेवजह घूर रहीं थी , और खुद को ठीक से ताकने का मौका दे रही थीं ।

शाम को कार्यालय से लौटकर , मैं बाथ रूम से बाहर ही आया था कि पत्नी ने आंखें चमकाते हुये कहा-''जाओ , बैठक में एक स्मार्ट और सुंदर सी महिला आपसे मिलना चाहती है । ''

मैं समझ गया कि वे ही होंगी । पांच मिनट में ही बाहर जाने वाले कपड़े पहन ,सेंट का छिड़काव कर मैं बैठक में था ।

'नमस्ते ! सॉरी ,मुझे जरा देर हो गयी ।'' आवाज में ढेर सी मुलामियत भर के मैं अदब से झुकते हुये बोला ।

'' नमस्ते , नमस्ते !'' वे चहकीं ।

'' अरे शुभा ! भाभी जी को चाय पिलाओ , और देखना ,जरा बिस्कुट वगैरह लेती आना ।'' मैंने भीतर की ओर मुंह करके पत्नी से इल्तिजा की ।

'' अरे रहने दीजिये , गुप्ता जी । मेरे रिसोर्स परसन आने वाले हैं ,उन्हें चाय पिला देना आप ।''

''रिसोर्स परसन माने ?''

''माने मुझे काम सिखाने वाले ! मेरे अपलाइनर !''

''आप कोई काम करने लगी हैं क्या इन दिनों !''

''आपको पता नहीं , मैंने पिछले महीने से एक बिजनेस शुरू किया है । आपको जानकारी होगी कि कुछ ऐसी मल्टी नेशनल कंपनियां हैं , जो विज्ञापन में फिजूलखर्ची नहीं करती बल्कि अपना नेटवर्क डेवलप करके और अपने एजेंट नियुक्त करके सीधे अपनी वस्तुएं ग्राहकों तक पहुंचाती हैं ।''

'' हँ !:'' मैंने गंभीर होते हुये उनकी बात में रूचि प्रदर्शित की ।

वे बोलीं-'' मैंने अभी तक ज्यादा काम नहीं किया , इसलिये मैं ज्यादा नहीं बता सकती , बस मेरे रिसोर्स परसन आ रहे है ! वे आपको विस्तार से सारी बातें समझायेंगे ।''

शुभा चाय लेकर आयी तो उनने उठ कर उससे नमस्ते की ,और बोली -''आप भी बैठिये भाभी जी ,दरअसल मैं जिस काम से आयी हूँ ,वो आप दोनों पति-पत्नी मिलके ज्यादा अच्छी तरह से कर सकेंगे ।''

अब मेरी भौहों में बल पड़ गये थे ।

झिझकती सी शुभा बैठ तो गयी , पर उसकी निगाहें जमीन से चिपक गयी थीं । यकायक मुझे लगा कि शुभा तो मेरी इज्जत खराब करे दे रही हैं । इसे इतना संकोची नहीं होना चाहिये कि एक औरत के सामने भी नयी दुल्हन सी शरमाये ।

हमारी चाय खत्म ही हुयी थी कि उनके वे रिसोर्स परसन आ गये । मैंने उनका स्वागत किया और अपना परिचय दिया -'' मैं अमर गुप्ता ,बीमा एजेंट ।''

'' मैं जम्बो कंपनी का एक छोटा सा वर्कर -सिल्वर एजेंट मनीराम !''

हम लोग हाथ मिला कर बैठने लगे तो शुभा बर्तन समेट कर बाहर जाने लगी , वर्मा भाभी ने उसे फिर रोका -'' भाभी आप रूकिये प्लीज !''

'' मैं अभी आती हूँ ' कहती हुयी शुभा पीछा छुड़ा कर भागी , और भीतर पहुंच के बर्तन बजाकर मुझे अन्दर आने का इशारा करने लगी ।

मैं भीतर पहुंचा , तो वह झल्ला रही थी -'' कौन है ये सयानी मलन्दे बाई !''

हंसते हुये मैं बोला-'' तुम काहे जल रही हो ? बेचारी वो तुम्हें क्या सयानपन दिखा रही है ? वो अपना कोई प्रॉडक्ट बेचने आयी है ।''

'' हमें नहीं खरीदना उसकी कोई चीज । उससे कहो अपने खसम के साथ उठे और कहीं दूसरी जगह जाकर नैन मटक्का करे ! और जो मर्जी हो बेचे चाहे गिरवी रखे ।''

मैं शरारतन मुस्कराया -'' अरे यार ,हजार दो हजार रूपये देकर इतनी कमसिन और ख़ूबसूरत औरत के साथ बैठने का मौका मिल जाये तो महंगा नहीं है ।''

शुभा की आंखें अंगार हो गयीं थीं , वह जलते स्वर में बोली -''कहे दे रही हूं , मैं अभी बैठक में जाकर उसे घर से बाहर निकाल दूंगी ।''

मुझे लगा कि खेल बिगड़ रहा है ,सो समझौते के स्वर में उससे कहा-''यार तुम भी बिना पढ़ी-लिखी औरतों की तरह बेकार की बातें करने लगती हो । वो क्या हमारी जेब में हाथ डाल के रूपया निकाल लेगी । अब कोई अपना माल दिखाये ,तो लो मत लो देखना तो चाहिये । अपने घर में हर सामान भरा पड़ा है, हमको क्या खरीदना है ? वो जो बतायेगी , देख लेते हैं बेचारी को निराश काहे करती हो ?''

मैं बैठक में जा कर बैठ गया और उनके रिसोर्स परसन से बात करने के बहाने मुस्कराते हुये पूछने लगा-'' आप कहां रहते हैं मनीराम जी !''

''मैं घाटीपुरा में रहता हूं ,उधर हाई स्कूल की पुरानी इमारत है

न ,उसके पीछे हमारा पुराना मकान है ।''

''अच्छा उधर ,जहां दरोगा संग्रामसिंह रहते हैं ।''

''आप उन्हें जानते हैं ! वे मेरे चाचा हैं ।''

अब हमें बात करने को एक विषय मिल गया था , सो हम पूरी दिलचस्पी के साथ दरोगा संग्रामसिंह और अपने हाई स्कूल के जमाने की बातें करने लगे थे । हालांकि यह विषय अन्नपूर्णा भाभी के लिये बोर कर सकता था , पर ऐसा नहीं दिख रहा था ,बल्कि वे बड़े प्रसन्न भाव से मनीरामजी को देखते हुये हमारी बातें अपनी आंखें फैला कर इस तरह सुनने लगीं ,मानों वे इस विषय से बहुत गहराई से जुड़ी हों ।

इसके बाद वे घर के अन्दर चली गईं और कुछ देर बाद वे लौटीं , तो उनके साथ आंखों में उलझन का भाव लिये शुभा भी थी ।

मनीराम जी ने उठकर मेरी श्रीमती जी का अभिवादन किया और बोला -'' भाभीजी मैं जम्बो कंपनी का एजेन्ट मनीराम हूं । माफ़ी चाहूंगा कि मैं आपके मूल्यवान समय में से दस मिनट ले रहा हूं । आपको अच्छा लगे तो आप मेरे बिजनैस-प्रपोजल पर विचार करें, और न जमे तो कोई बात नहीं ।''

अब उसकी आवाज में एक मखमली अंदाज आ गया था-'' सर कभी आपने सोचा कि आप दूसरों से कुछ हटकर यानी कि अलग हैं । दरअसल आपको अपनी योग्यता के अनुरूप जॉब नहीं मिला है । इसलिये आप अपने वर्तमान-व्यवसाय से पूरी तरह संतुष्ट नहीं होंगे मन में कहीं न कहीं यह चाह रहती होगी यानी कि एक सपना होगा आपका भी , कि आपके पास खूब सारा पैसा हो ! बड़ा सा बंगला हो ! शानदार कार हो! भाभी के पास ढेर सारे जेवर हों !

आपके बच्चे ऊंचे स्कूल में पढ़ने जायें ! आप लोग भी फॉरेन टूर पर जायें ! यानी कि आपके पास वे सारी सुख-सुविधायें हों जो एक आदमी के जीवन को चैन से गुजारने के लिए जरूरी हैं । लेकिन आप लोग मन मसोस के रह जाते है, क्योंकि आपके सामने वैकल्पिक रूप में अपनी इतनी बड़ी इच्छायें पूरी करने के लिए कोई साधन नहीं हैं । छोटी-मोटी एजेंसी या नौकरी से यह काम कभी पूरे नहीं होंगे-हैं न ! एम आय राईट ?''

मैंने सहमति में सिर हिलाया-'' आप बिलकुल सही कह रहे है। ''

''अपने सपने पूरे करने के लिए आपको कम-से-कम पचास हजार रूपये महीना आमदनी चाहिये और पचास हजार रूपये के मुनाफ़े के लिए आप अगर कोई बिजनेस करेंगे तो उसमें पच्चीस लाख रूपये की पूंजी लगाना पड़ेगी ठीक है न ! अब पच्चीस लाख रूपये की रिस्क , फिर नौकर-चाकर, दुकान-गोदाम क़ित्ते सारे झंझट हैं ! लेकिन मैं आपको ऐसा बिजनैस बताने आया हूं , जो आप बिना पूंजी, और बिना रिस्क के शुरू कर सकते है, और जितनी मेहनत करेंगे ,उतना ज्यादा कमाएंगे ।''

'' हमें बेचना क्या है ?''मुझे उलझन हो रही थी ।

'' आप तो सिर्फ नेटवर्किंग करेंगे जनाब , सीधे कुछ नहीं बेचेंगे ।'' मनीराम ने उसी मुस्तैदी के साथ कहा-'' अब वो जमाना नहीं रहा जब दुकान खोलके बैठना पडता था । आप जिन लोगों को डिस्ट्रीब्यूटर बनाऐंगे , वे जम्बो कंपनी के प्रॉडक्ट बेचेंगे ,और घर बैठे मुनाफा आपको मिलेगा ।''

'' लेकिन इसमें मेरी क्या भूमिका होगी ?'' शुभा अब तक मनीराम का जाल नहीं समझ पा रही थी ।

'' आपकी वजह से ही तो गुप्ताजी के डाउनलाइनर्स की फेमिली को इस बिजनैस और इन प्रॉडक्टस में विश्वास होगा । हमारी सोसायटी में ये माना जाता है कि आदमी तो ब्लफ दे सकता है, औरत नहीं ! सो आप इस मान्यता को फोर्स के साथ अमल में लायेंगी । इसका आपको व्यक्तिगत लाभ भी होगा, क्योंकि इस काम के लिए आप दोनों के एक साथ जाने-आने से एक बहुत बड़े सर्कल में आपकी सोशल-रिलेशनशिप बनेगी । जम्बो कंपनी की फेमिली बड़ी रिच है इसके लिये ऊंचे-ऊंचे आइ ए एस अफसर और बड़े-बड़े बिजनिस मैन तक काम करते हैं। उन लोगों के ऐक्सपीरियंस, बिजनैस के टिप्स, आर्ट-ऑफ-लिविंग और थिंकिग, आपकी लाइफ-स्टाइल बदल देगी ।''

मनीराम द्वारा दिखाये गये सपने का जादू हम लोगों पर असर करने लगा था ,हम दोनों उसके चेहरे को मंत्रमुग्ध-से होकर ताकने लगे थे ,यह अनुभव करके वर्मा भाभी अब मनीराम की तरफ बड़े गर्व से देखने लगी ।

हठात् शुभा ने मनीराम से पूछा''आपके इन प्रॉडक्ट की कीमत क्या है ?''

''यह टूथ-पेस्ट एक सौ दो रूपये का है , और ये नाईटक्रीम एक सौ बीस रूपये की है।''

मैंने हस्तक्षेप किया-''बाय द वे , आपको नहीं लगता ये चीजें कुछ ज्यादा मंहगी हैं ? हमारी सोसायटी में कितने लोग ऐसे होगे ,जो ये चीजें अफोर्ड कर सकेंगे !''

'' हां , है तो थोड़ी सी कॉस्टली ! बट एक्चुअली , जनरल प्रॉडक्ट की तुलना में हमारे प्रॉडक्ट तीन गुना ज्यादा सेवा देते हैं । एक बार उपयोग करने पर कंज्यूमर सैटिसफाय हो जाता है। फॉर एग्जामपल देखें ,जनरल पेस्ट की एक इंच लम्बी टयूब जितना काम करती है, इस पेस्ट का चने बराबर हिस्सा ही उससे ज्यादा काम कर देता है । मतलब ये कि सही मायने में ये चीजें महंगी नहीं हैं ।''

'' आप कह रहे हैं कि आपका बनाया हुआ चना बराबर पेस्ट वो काम कर जाता है जो बाजार में मिलने वाले जनरल पेस्ट का एक इंच लम्बा टुकड़ा काम नहीं कर पाता । इसका मतलब ये भी तो हो सकता है कि इस पेस्ट में ज्यादा कैमिकल मिला दिये जाते हों ,जो शरीर के लिये नुकसानदायक हों ।'' मेरा मन लगातार प्रश्न पैदा कर रहा था और मेरी जुबान उन्हें मनीराम की ओर मिसाइलों की तरह दाग रही थी।

'' गुप्ता जी , हमारे यहां कंज्यूमर एवेयरनेस अब भी उतनी ज्यादा नहीं है ,जितनी अमेरिका या दूसरे यूरोपीय देशों में है । यह माल भी यूरोप में बनाया गया है , इसलिये मैं दावा करता हूं कि उसमें मानव शरीर के लिये नुकसान देने वाला कोई रसायन शामिल नहीं होता ।''

'' इसकी शुरूआत कैसे करना पड़ती है ।'' मुझे लगा कि प्रश्नों के बजाय मनीराम के सामने सीधा समर्पण कर दिया जाये तो शायद इस बहस का अंत हो जायेगा ।

'' हमारा एक किट चार हजार छ: सौ रूपये का है , इसमें हमारा हर प्रॉडक्ट छोटी मात्रा में शामिल है'' मनीराम ने गंभीरता से बताया ।

''तो ठीक है , आप एक पैकेट हमारे यहां रख जाइये ।'' शुभा बिना हिचक बोली तो मैं चौंक गया । उसका इतनी जल्दी इस योजना से सहमत होना मुझे विस्मित कर रहा था।

'' देखिये ,पहले मैं आपको गाइड-लाइन समझा रहा हूँ ! आपको सबसे पहले घर में बैठ कर एक सूची बना लेना है, जिसमें आप उन लोगों के नाम लिखेंगे जिनसे आपका धंधा हो सकता है । इस सूची में आप फ्रेण्ड के नाम लिखेंगे ।''

'' फ्रैण्ड यानि की दोस्त लोग ! ''

मनीराम मुस्कराया -'' फ्रैण्ड मायने दोस्त भी, पर हमारे इस फ्रैण्ड में अंग्रेजी के फ्रैण्ड की स्पेलिंग का हर हिज्जा होता है । फ्रैण्ड के पूरे हिज्जे हैं -

एफ आर आई ई एन डी इसके हर हिज्जे से आपके इर्द गिर्द का हर वो आदमी आ जाता है, जो किसी न किसी कारण से आपसे जुड़ा हुआ है । एफ मायने फ्रैण्ड एंड फेमिली - दोस्त और परिवार के लोग । आर का अर्थ है रिलेटिव्स मायने रिश्तेदार । आय मायने इनर परसन , आपके वे परिचित जो आपके अति निकट है । इ मायने इंपलायी यानी कि दूसरे विभाग के कर्मचारी गण । एन मायने नेवर यानी आपके पड़ौसी , और डी याने कि आपके डिपार्टमेंटल कुलीग्स । इस तरह आप यदि आपने आसपास के सब लोगों की सूची बना लेंगे, तो आपके हाथ में उन संभावित लोगों के नाम होंगे, जो कि आपके काम में मददगार हो सकते हैं । इसमें सें तमाम लोग ऐसे होंगे जो वितरक बन सकते हैं , और तमाम लोग ऐसे हो सकते हैं, जो सिर्फ आपसे सामान लेकर यूज करेंगे।''

''जाओ शुभा , चाय ले आओ , आगे की चर्चा हम चाय के बाद करेंगे । मनीराम जी ने हमको मंत्र पढ़ कर मोहित सा कर दिया है , शायद चाय उस जादू को तोड़ेगी ।'' मेैने शुभा से चिरौरी की , तो वह प्रसन्न मनसे उठी और भीतर चली गयी । अन्नपूर्णा भाभी भी झट से उठीं और वे भी उसके पीछे-पीछे भीतर जा पहुंची ।

मनीराम ने बेैग में से निकाल कर एक कैसेट निकाली और कहा

-'' इसे सुनकर आपको ग्राहक की डील करने की टेकनीक ही नहीं ,इस तरह का काम करने वाले उन तमाम लोगों के विचार सुनने को मिलेंगे , पहले जिनमें से हर कोई या तो छोटा-मोटा दुकानदार था ,या फिर छोटी मोटी नौकरी करके अपना गुजारा किया करता था ,और वे सब इस कंपनी को ज्वाइन करने के बाद आज हर महीने लाखों में खेल रहे हैं ।''

फिर उसने वह सिस्टम समझाया जिसे अपना के हम भी लाखों में खेल सकते थे । उसने बताया कि हमको पहले ऐसे आठ लोगों को टारगेट बना के काम शुरू करना है ,जो एक्टिव हों और उनमें से हरेक आठ-आठ वितरक बना सके ।

मनीराम की बातें बड़ी आकर्षक थीं , उनमें मोहक तथ्य थे , और प्रामाणिक आंकड़े भी , पर वह ऐसा प्लान था जिसे हजारों-लाखों में शायद कोई एक चल पाता होगा ।

उस दिन हम लोगों ने विचार करने का समय मांगा और किसी तरह उन दोनों से मुक्ति पायी ।

आठ दिन बात वर्मा भाभी एकाएक मेरे ऑफिस में आ धमकी । मैं उस दिन अपने डेवलपमेंट ऑफीसर के पास बैठा था ।

उन्हें बैठा कर मैंने मुस्कराते हुये उनसे पूछा-''कहिये भाभी जी, क्या हुकुम है ?''

'' अपन लोग बाहर चल कर चाय पियें तो कैसा रहे !''

मैं तपाक से तैयार हो गया । गाड़ी स्टार्ट हुयी तो अन्नपूर्णा भाभी फुर्ती से लपकीं और एक अभ्यस्त की तरह इत्मीनान से मेरे पीछे बैठ गयी । अब उनका चेहरा मेरे कान के पास था , इतने पास , कि मुझे उनके बालों में लगे सुगंधित तेल और चेहरे पर लगायी गयी क्रीम की खुशबू मेरे नासा पुटों में प्रवेश कर रही थी । उनके दांये हाथ ने मेरी कमर के गिर्द घेरा कसा तो मुझे लगा कि मेरी बाइक जमीन पर नहीं चल रही , आहिस्ता से जमीन से ऊपर उठी है और हम आसमान में कुलांचे भरने लगे हैं ।

हर्बल चाय पीते हुए भाभी ने बताया कि दिल्ली में जम्बो कंपनी की एक दिवसीय सेमिनार है ,इसमें जिस वितरक को जाना हो वो सोलह सौ रूपये का टिकट लेकर शामिल हो सकता है । पता लगा कि वे खुद के साथ मेरा भी टिकट ले आयी है । मैं ना नुकुर करने वाला था कि वे बोलीं -'' दरअसल मनीराम जी के घर में गमी हो गयी है ,सो वे नहीं जा पा रहे, इस कारण आप से इसरार करने आयी हूं कि आप मेरे साथ चलें ।''

अब भला मैं मना भी कैसे कर सकता था !

उन्हें विदा कर मैं कार्यालय में लौटा ,तो मेरे मस्तिष्क में पुराना मुहावरा गूंज रहा था-अंधे के हाथ बटेर ।

मैंने अपनी जिन्दगी में अब तक बटेर नहीं देखी थी, आंख मूंद के मैं बटेर की कल्पना करने लगा। जब भी मैं अपने स्मृति-फलक पर बटेर की छबि सृजित करने की कोशिश करता, मुझे हर बार वर्मा भाभी की सूरत याद आती तो मैं अनाम और मीठी सी अनुभूतियों से भर उठता ।

घर पहुंचा , तो शुभा चाय पकड़ाते हुये बड़े प्रसन्न मन से सुना रही थी-'' पता है , आज अपनी चिंकी की टीचर कुलकर्णी मैंडम आयी थीं । पैरेन्ट-टीचर मीटिंग में तो वे प्राय: मिलती रहती हैं ? पर इस बात उनके आने की वजह वहीं जम्बो कंपनी थी ।''

'' जम्बो कंपनी ?'' अब चौंकने की बारी मेरी थी ।

'' हां !'' मन्द-मन्द मुस्काती शुभा रहस्य खोलने के अन्दाज में बोली-'' आजकल वे भी जम्बो कम्पनी का काम कर रही हैं । बोल रहीं थीं , कि इस काम से उन्हें हर महीने पांच हजार से ज्यादा अर्निंग हो जाती है ।''

''हूं ! !'' एक गंभीर हुंकारा छोड़ कर मैंने उसे प्रोत्साहित किया ।

''सुनो ! ! अपन लोग इस काम को काहे को लटका रहे हैं ? चलो अपन भी ये काम शुरू कर दें ।'' उसके स्वर में बड़ा आत्मीय आग्रह झांक रहा था ।

मैंने जम्बो कंपनी के काम से ही वर्मा भाभी के साथ दिल्ली जाने की सूचना दी तो यकायक शुभा जिद करने लगी , कि वह भी दिल्ली जाना चाहती है । मेरी सारी उमंग समाप्त हो गयी । लेकिन दिल्ली तो जाना ही पड़ा ।

अलबत्ता, दिल्ली यात्रा में मुझे वो आनंद नहीं आया ,जैसी कि मैं कल्पना कर रहा था । हां ,ग्राहक को डील करने की कला, नये प्रॉडक्टस का परिचय और नयी स्कीमों के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला । कुछ बातें तो ऐसी भी सीखने को मिली जो बीमा एजेंट होने के नाते मेरे जॉब के लिये लाभ दायक हो सकती थी ।

एक दिन रात आठ बजे मैं अपने एक पॉलिसी होल्डर से प्रीमियम लेने वर्माजी के मोहल्ले की तरफ जा निकला था ,और वहां से लौट ही रहा था कि अन्नपूर्णा भाभी से मिलने का मन हो आया । वर्माजी दरवाजे खोल कर बैठे थे और मेरी गाड़ी को उनने मनीराम की गाड़ी समझा ।

पहले तो मायूस हुये फिर मुझे देख कर वे मुस्कराये । मैंने भाभी के बारे में पूछा तो उनने बताया कि वे सुबह से ही मनीराम के साथ गयी हैं ,और अब तक लौटी नहीं हैं ।

मैंने दुखी से स्वर में उनसे कहा -'' इस तरह बिजनेस के लिए भाभी के प्राय: घर से बाहर रहने पर आपको दिक्कत तो होती होगी । ''

''अब भई तरक्की करना है, तो हमको कुछ न कुछ तो त्याग करना ही पड़ेगा न !''

''फिर भी घर के काम ?''

''घर के काम तो कैसे ही हो जाते हैं अमर भैया ! इत्ती सी बात के लिए उन्हें घर में बन्द रखना उचित नहीं । मैं बेसिकली महिलाओं की स्वतंत्रता का समर्थक हूं । मेरे मतानुसार औरतों को रसोईघर से बाहर निकल कर काम धाम सीखना चाहिये। इससे उनका इंडीजुअल डेवलपमैंट होता है, अभिव्यक्ति का मौका मिलता है ,और घर के साथ साथ स्वयं वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाती हैं ।''

मन ही मन मैंने कहा -' पिछले साल , जब भाभी को बीमा-एजेंट बनाने का प्रस्ताव रखा था तो आप कहते थे कि औरतों की सही जगह घर में है, उन्हें घर में ही रहना चाहिये ! और अगर जॉब भी करना है तो किसी कॉन्वेंट में टीचरशिप वगैरह मिल जाये तो वह कर लेना ठीक रहता है ।'

पर प्रत्यक्षत: मैं यही बोला-'' हां , अभिव्यक्ति का मौका और आर्थिक स्वतंत्रता तो मिलती है !''

'' कहिये आप कैसे पधारे !'' वर्माजी ने सहसा मुझे सकते की स्थिति में डाल दिया था ।

''मैं दरअसल , '' कहते हुये कुछ अटकने लगा तो यकायक याद आया और मैंने बेधड़क उनसे कह डाला -'' उस दिन भाभी ने कहा था कि जम्बो कंपनी का रीजनल-स्टोर आपके घर में हैं ,सो मैं टूथ-पेस्ट और नाईटक्रीम लेने आया था !''

मेरा इतना कहना था कि अब तक उदास और अलसाये से बैठे वर्माजी में यकायक फुर्ती आ गयी , वे उठे और बैठक में अस्त-व्यस्त रखे कार्टूनों में मेरी मांगी गयी चीजें तलाश करने लगे ।

मैंने उड़ती नजर से देखा कि वर्माजी के घर में बैठक ही नहीं, स्टोर, किचेन और यहां तक कि बेडरूम में भी यानी कि हर जगह, अन्नपूर्णा भाभी की कंपनी की चीजें बिखरी पड़ी थीं । लग रहा था कि इस नयी तरक्की यानी भूमण्डलीकरण के इस नये दौर में बहुत कुछ बदला है । ज़िस चीज के लिए जो जगह निश्चित की गयी हैं , अब वो केवल वहीं नहीं मिलती , सब जगह मिल जाती है ! चीजें तेजी से अपनी जगह बदल रही हैं ! बाजार केवल बाजार तक सीमित नहीं रह गया ! अब वर्माजी जैसे कई घरों में बाजार स्वयं घुस आया है-अपने पूरे संस्कार, आचरण , आदतों और बुराइयों के साथ !

घर लौटते वक्त मैं मन ही मन तरक्की के लाभ- हानि का बही खाता तैयार कर रहा था, जिसमें मैं और मेरी पत्नी शुभा भी शायद अपनी प्रविष्टि कराने को आतुर थे ।

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रचनाकार परिचय-

राजनारायण बोहरे

जन्म

बीस सितम्बर उनसठ को अशोकनगर मध्यप्रदेश में

शिक्षा

हिन्दी साहित्य में एम. ए. और विधि तथा पत्रकारिता

में स्नातक

प्रकाशन

' इज्ज़त-आबरू ' एवं ' गोस्टा तथा अन्य कहानियां'

दो कहानी संग्रह और किशोरों के लिए दो उपन्यास

पुरस्कार

अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता 96 में पच्चीस हजार रूपए

के हिन्दी में एक कहानी पर अब तक के सबसे बड़े पुरस्कार से

पुरस्कृत

सम्पर्क

एल आय जी 19 , हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया-475661

फोन - 07522-506304

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