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संताल और उनकी दुनिया

आलेख -कमल ये उन लोगों की बात है जिनके बारे में प्रारंभिक जानकारियां बताती हैं कि आर्यों ने अपने अभियानों के दौरान उन पर आक्रमण ही नहीं किये, बल्कि उन्हें खदेड़ कर दूसरी जगहों पर जाने और बसने के लिए मजबूर किया। उनके जल, जंगल और जमीन पर नैसर्गिक व सामूहिक अधिकार की मूल अवधारणा को भंग किया। पौराणिक संदर्भों में देखें तो सतयुग, त्रेता व द्वापरयुग आदि कालों में आदिवासियों को राक्षस, प्रेत, दैत्य, दानव, असुर आदि संज्ञाओं से संबोधित कर उन्हें मनुष्य होने से ही नकारने का दुष्चक्र रचा जाता रहा है। और आधुनिक युग की विडंबना यह शब्दों के हेर-फेर के क्रम में आज उनके अस्तित्व को भी नकारने की जुगत भिड़ाई जा रही है। कोई उनके लिए जनजाति तो कोई उनके लिए वनवासी शब्द गढ़ता फिर रहा है। लेकिन आदिवासी से बढ़ कर कोई दूसरा शब्द हाही नहीं सकता जो उनके लिए उपयुक्त हो या उन्हें ठीक-ठीक परिभाषित कर सके। इस शब्द के साथ ऐसे लोगों का बोध होता है जिनका बोलना ही प्रकृति का गीत है और जिनका चलना ही प्रकृति का नृत्य। जिनकी संस्कृति और समूचा जीवन दर्शन अपनी प्रकृति के साथ सामंजस्य की अदभुत मिसाल है। ऐसा नहीं है कि ये लोग आक…

निगरानी

कहानीनिगरानी - राजनारायण बोहरेपंछी राम बड़ा तुर्रम खाँ है । पूरे पैंतीस बरस से वह कलेक्टर के हाथ के नीचे काम कर रहा है, सो बड़े -बड़े हाकिम-हुक्कामों से बोलने बतियाने और उनकी सेवा करने का अच्छा तज़ुर्बा है उसके पास । इस हुनर और तज़ुर्बे के दम पर अपने साथी चपरासियों के साथ बैठकर वह खूब लंबी लंबी गप्पें मारता है । बाकी लोग, चुप बैठ कर उसकी बातें मुंह बाये सुनते रहते हैं और उसकी हाँ में हाँ मिलाते हैं ।लेकिन इस दफा पंछीराम ऐसा फंसा कि सारी चौकड़ी भूल गया । दरअसल हुआ कुछ ऐसा , कि उन दिनों चारों ओर घनघोर बदरा छाये थे । सावन का महीना था । पूरे देश में झमाझम बरसात हो रही थी । छोटे-साधनहींन और दूर के इलाके में बसे गाँवों की कौन कहे, खूब ठीकठाक कस्बों और ख़ासे बड़े, तरक्की पा गये गाँवों तक पहुंचने के रास्ते गोबर और कीचड़ की गहरी लम्बी नदियों में तब्दील हो चुके थे । ऐसे बसकारे के टप्प-टप्प मौसम में दिल्ली बैठे एक आला हुक्काम ने हुकुम दागा कि अगले माह देश में आम-चुनाव कराये जायेंगे । जिस दिन अखबारों में यह खबर छपी, देश भर के प्राइमरी स्कूलों के मास्टर, तमाम दफ्तरों के बाबू-चपरासी, तहसीलों के पटैल-पटवा…

संजय पुरोहित की दो लघुकथाएँ

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2 लघुकथाएं - संजय पुरोहितमातमन्यूज टीवी चैनल के स्टूडियो के एक कमरे में कुछ लोग निराश-निढाल बैठे थे। उनकी इतने दिनों की मेहनत बेकार चली गई थी। राष्ट्रीय स्तर के एक बड़े नेता दुर्घटना में घायल हुए थे। बचने की संभावना बहुत कम थी। टीवी चैनल की इस टीम ने उनकी संभावित मृत्यु की स्थिति में प्रसारित किये जाने वाले कार्यक्रमों की तैयारी आरम्भ कर दी थी। नेताजी के जन्म से लेकर उनके राष्ट्रीय राजनीति में उत्कर्ष और उतार चढ़ाव पर टिप्पणी के लिए चित्र व अभिलेख जुटा लिए गए थे। नेताजी के करीबी लोगों को उन पर टिप्पणी करने के लिए अनुबंधित किया गया। नेताजी के जन्म स्थल पर भी कुछ रिपोर्टरों को एक्सक्ल्यूसिव कवरेज के लिए भेजा गया था। कार्यक्रम के लिए विज्ञापन जुटाने की तैयारी भी लगभग फाइनल थी। सब मेहनत बेकार गई। नेताजी के इलाज के लिए बुलाये गये विदेशी डॉक्टरों ने दो ही दिन बाद स्पष्ट कर दिया कि नेताजी के दो महत्वपूर्ण ऑपरेशन कर दिये गये हैं। उनकी जान को अब कोई खतरा नहीं है। नेताजी की जान बच जाने का समाचार सुनकर उनके परिजन और कार्यकर्ताओं में राहत और खुशी थी, वहीं टीवी न्यूज चैनल के इस स्टूडियो में चहुँओ…

शासन शब्द और शस्त्र से होता है

आलेख -मनोज सिंहपाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का तकरीबन दो दशक पूर्व एक वक्तव्य आया था कि वह अपने बेटे को या तो सेना में भेजना चाहेंगी या वकील बनाएंगी। किसी साक्षात्कार के दौरान एक पत्रकार द्वारा उनके बेटे के करिअर के बारे में प्रश्न पूछने पर उपरोक्त संदर्भ उठा था। बात सामान्य-सी है मगर जाने-अनजाने यह प्रदर्शित कर जाती है कि पाकिस्तान में रहने वाली एक मां अपने बेटे के लिए क्या सपना देखती है। कथन का शब्दार्थ सरल है जो पहले भी समझ आया होगा मगर अब तो पूर्णत: प्रमाणित भी हो रहा है। इसके भावार्थ में छिपी है एक समझदार मां की दूरदर्शिता, जो बेनजीर भुट्टो में भी साफ दिखाई दे रही थी। यहां सोचने वाली बात है कि उन्होंने अपने बेटे के लिए कोई और प्रोफेशन के बारे में क्यूं नहीं सोचा? भुट्टो परिवार के लिए, जो राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत है, हर तरह से समर्थ है, अपने बच्चों के लिए कोई भी शिक्षा चुन सकते हैं, तो फिर सिर्फ इन दो क्षेत्रों को चुनने का ही क्यूं सोचा गया? विश्लेषण किया जाना चाहिए। आज की तारीख में बच्चे (बिलावल, बख्तावर व आशिफा) अभी पढ़ रहे हैं, भविष्य में क्या करेंगे, उ…

तीसरा सपना

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कहानी -कमल न चाहते हुए भी भुजंग दम साधे पल्टू के पीछे खतरनाक पहाड़ी पर बढ़ा जा रहा था। उस बेहद कठिन सूत-सी पतली पगडंडी पर जरा भी चूक का अर्थ था, सैकड़ों फीट गहरी खाई में गिरना। लेकिन 'उस` तीखे मोड़ के नजदीक आते ही भुजंग की घबराहट बढ़ने लगी। काफी प्रयत्नों के बावजूद उसका ध्यान भटकने लगा। "मैंने कहा मुझे गांव जाने दो, मगर तुम नहीं माने। अब बताओ तुम कैसे बचोगे?" गुस्से से लाल आंखों वाले पल्टू का अट्टहास गहरी खाई में गूंजता चला गया। पसीने में सराबोर भुजंग का रहा-सहा हौसला भी टूट गया। उसके कदम लड़खड़ाये। पांव फिसलने की देर थी, वह झटके से गहरी खाई में गिरने लगा। उसके मुँह से मौत की डरावनी चीखें उबलने लगीं। वह बचने के लिए चारों तरफ हाथ-पांव मारने लगा। परन्तु उसके चारों तरफ पल्टू का अट्टहास करता डरावना चेहरा घूम रहा था। भुजंग का शरीर तीव्रता से गहरी खाई में गिरता जा रहा था। इसके पूर्व कि पथरीली, नुकीली चट्टानों से टकरा शरीर टुकड़े-टुकड़े होता, उसकी नींद खुल गई। वह बुरी तरह हांफ रहा था। टटोल कर उसने लैंप जलाया और पानी की बोतल उठा मुँह से लगा ली। गट्...गट्...गट्...पानी की ठंढक …

बिजनेस वेब डॉट कॉम

कहानी- राजनारायण बोहरेएकबारगी मैं तो पहचान ही नहीं पाया उन्हें...ऽ कहां वो अन्नपूर्णा भाभी का चिर-परिचित नितांत घरेलू व्यक्तित्व , और कहां आज उनका ये अति आधुनिक रूप ! चोटी से पांव तक वे बदली-बदली सी लग रही थीं । वे कस्बे के नये खुले इस फास्टफूड कॉर्नर से जिस व्यक्ति के साथ निकल रही थीं , वह सोसाइटी का कोई भला आदमी नहीं कहा जा सकता था । मुझे तो ऐसा अनुभव हुआ कि सिर्फ संग-साथ वाली बात नहीं , यहां कुछ दूसरा ही मामला है । क्योंकि वे बात-बेबात उस भले आदमी से सट-सट जा रहीं थीं , जैसे उसे पूरी तरह रिझाना चाहती हों ! आज उनने बनने संवरने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रखी थी । उनके चमक छोड़ते गोरे बदन पर ' सब कुछ दिखता है ' नुमा कपड़े सरसरा रहे थे । हल्की शिफॉन की मेंहदी कलर की साड़ी से मैंच करता लो कट ब्लाउज , इसी रंग की बिन्दी और कलाई भर चूड़ियाँ , पांव में मेंहदी कलर की ही चौड़े पट्टे की डिजाइनदार चप्पलें और ताज्जुब तो ये कि हाथ के पर्स का भी वहीं रंग । मैंने उन्हें गौर से देखा तो ठगा-सा खड़ा रह गया । मैं ऐसी जगह खड़ा था ,जहां से उन्हें निकलना था । मुझे यहां पाकर वे कोई संकोच अनुभव न करें ,…

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