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August 2007
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आलेख

- मनोज सिंह

कनाडा का अति आधुनिक शहर मांट्रियल, व्यवस्थित, अनुशासित व सुंदर होते हुए भी यहां अंग्रेजी कम बोली और सुनी जाती है। फ्रेंच भाषा व सभ्यता का अधिक बोलबाला है। नगर के मध्य स्थित सेंट कैथरीन रोड यहां का मुख्य आकर्षण है। जहां रूपसियों के अनुपम सौंदर्य को आम चलते-फिरते देखा जा सकता है। आश्चर्य वाली बात है कि इनमें गोरों के साथ-साथ काली अफ्रीकन लड़कियां भी दिखाई देती हैं। जो बराबरी से खूबसूरत, स्मार्ट व आकर्षक मानी जाती हैं और रंगभेद के द्वारा उनमें तुलना नहीं की जाती। यहां की नाइट लाइफ विश्व प्रसिद्ध है। नाइट क्लब अपेक्षाकृत सुरक्षित और वैध हैं। अधिक चौकाने वाली बात है कि अफ्रीकन नृत्यांगनाओं की मांग कई क्लबों में अधिक है और इनके दाम भी कहीं-कहीं ज्यादा बताए जाते हैं। एक पर्यटक के रूप में कई दिनों तक यहां रहने पर भी किसी कनेडियन ने मेरे देश व राज्य के बारे में न तो कोई विशेष पूछताछ की, न ही कोई अपशब्द, घृणा या नापसंद की भावना प्रकट की। परंतु हमारे ही देश से वहां गए एक टैक्सी चालक ने बिना कुछ पूछे व जाने मुझे दक्षिण भारतीय घोषित कर दिया और फिर उसके चेहरे के भाव से मेरे प्रति तिरस्कार को आसानी से पढ़ा जा सकता था। कारण था मात्र मेरी त्वचा का रंग श्याम वर्ण होना। गोरे रंग का वह अनपढ़ उत्तर भारतीय हिंदी कम टूटी-फूटी अंग्रेजी अधिक बोलकर गर्व महसूस कर रहा था और उसे मुझसे किराये के पैसे लेने में भी छोटापन महसूस हुआ था। कहने पर अहम् झलकेगा मगर असलियत में वास्तविकता थी कि वह मुझसे किसी भी तरह से बेहतर नहीं दिखाई दे रहा था। न तो शैक्षणिक, आर्थिक, शारीरिक और न ही मानसिक रूप से।

उपरोक्त उदाहरण हमारी संकीर्ण मानसिकता का एक छोटा-सा उदाहरण मात्र है। हमारे फिल्मी नायक-नायिका पश्चिमी देश में उन पर किए गए नस्लीय टिप्पणी के विरुद्ध चाहे जितना बवाल मचाएं। यह सब सहानुभूति बटोरने के लिए किया जाना प्रतीत होता है। और अगर विदेशियों के मन में हमारे प्रति ऐसा है भी तो उसकी कई वजह हो सकती है, जैसे कि हमारा दूसरे देश का वासी होना, प्रतिस्पर्धा, ऐतिहासिक तथ्य और हमारे द्वारा उनका हक छीनना। मगर अपने ही देश में अपने ही देशवासी के लिए ऐसी भावना रखना अचरज पैदा करता है जो कि हमारे समाज का नंगा सत्य है। अब अपनी फिल्मी इंडस्ट्रीज को ही देख लें, यह सबसे अधिक रंगभेद से ग्रसित है। क्या आपने किसी काले हीरो-हीरोइन को बॉलीवुड में देखा है? नहीं। और अगर गलती से कोई श्याम वर्ण आगे आ भी जाए तो उसे क्रीम लगा-लगा कर कैमरे के द्वारा पर्दे पर गोरा बनाकर दिखाया जाता है। मेकअप के द्वारा पोत-पोत कर प्राकृतिक रंग को ढक दिया जाता है। अधिकांश दक्षिण भारतीयों की त्वचा का रंग काला होने के बावजूद उनके नायक-नायिका भी गोरे होते हैं। जबकि दूसरी तरफ पश्चिमी समाज के हालीवुड में सैकड़ों काले अफ्रीकन मूल के युवक-युवतियां चर्चित नायक-नायिका हैं। और उन्हें उनके मूल रंग में ही दिखाया भी जाता है। अमेरिकन बास्केटबाल की टीम में तो अधिकांश काले खिलाड़ी हैं और कई चर्चित मशहूर गायक अफ्रीकन मिल जाएंगे। माना कि पश्चिमी समाज में आपस में भेद था और कुछ हद तक आज भी है परंतु आम जीवन में गोरे-कालों की आपस में शादी अब एक सामान्य घटना है।

ध्यान से देखें तो पश्चिम देशों की तुलना में हम शायद अधिक रंगभेद की मानसिकता से ग्रसित हैं। वहां कम से कम इसके प्रति विरोध तो होता है, हमारे यहां तो इसे स्वीकार कर लिया गया है। और हम इस कुंठा को मन से निकालने को तैयार भी नहीं। क्षेत्रवाद हम में कूट-कूट कर भरा है तो भाषा पर हम जान ले और दे सकते हैं। अगर आप उत्तर भारत में रहते हैं तो रंगभेद को अधिक महसूस कर सकते हैं। श्याम वर्ण होने पर अकसर आपको दक्षिण भारतीय समझ लिया जाएगा और फिर हेय दृष्टि से देखा जाता है। मद्रासी कहकर भी संबोधित किया जा सकता है फिर चाहे मद्रास का नामकरण वर्षों पूर्व चेन्नई हो गया है। अगर आपका रंग हिंदुस्तानी है तो उच्च पदस्थ व पैसे वाला होने के बावजूद आपको पहली नजर में छोटा माना जाएगा। वहीं दूसरी ओर किसी भी गौर वर्ण को सिर पर बिठाया जाएगा। हालात तो हर जगह खराब है। मगर पंजाब इस क्षेत्र में अपने चरम पर है। जबकि सांवले पंजाबियों की भी कमी नहीं। अन्य स्थानों पर भी स्थिति एक-सी है। भारतीयों के बीच देसी गोरे आज भी राज कर जाते हैं। अधिसंख्य भारतीय लड़कों के मां-बाप द्वारा गोरी लड़की ढूंढ़ी जाती है। गोरेपन की क्रीम में अरबों व्यवसाय करने वाले आधुनिक भारतीय समाज में आदमी के गोरे होने की क्रीम भी चल चुकी है। वो जमाना लद गया जब पुरुष की पढ़ाई, ओहदा और संस्कार से उसको देखा-परखा जाता था। अब तो बाहरी व्यक्तित्व के आकर्षण से तौला जाता है। जिसमें गोरा होना एक महत्वपूर्ण पैमाना है। यह सिद्धांत उच्च व सफल वर्ग में अधिक सख्ती से लागू है। देखने में आकर्षक व गोरे खिलाड़ी मॉडलिंग में ज्यादा चर्चित और काले खिलाड़ियों की अपेक्षा अधिक कमाते हैं।

उपरोक्त परिस्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। यह हमारी संकुचित विचारधारा व गुलाम प्रवृत्ति का सूचक है। हैरानी भी होती है क्योंकि हमारे अधिकांश ईश्वर श्याम वर्ण हैं। सोलह कला संपन्न भगवान श्रीकृष्ण का तो नाम ही श्याम है जिन्हें असंख्य गोपियां प्रेम करती थीं। आज के आधुनिक काल में भी उनके शिष्यों की संख्या सर्वाधिक हैं, और यह विदेशों में भी फैले हैं। भगवान शंकर तो नारी के लिए आदर्श ईष्ट देव हैं, महादेव हैं, शिव शक्ति हैं। वे भी श्याम वर्ण हैं। भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक पूजे जाते हैं। खासकर शादी से पूर्व लड़कियों द्वारा अच्छे वर की कामना और शादी के बाद महिलाओं द्वारा सफल दाम्पत्य जीवन के लिए शिव-पार्वती के व्रत तक रखे जाते हैं। मगर फिर भी वधू को वर गोरा ही चाहिए। मां काली सर्वशक्तिमान हैं, राक्षसों का विनाश करती हैं, भक्तों की रक्षा करती हैं, दयालु हैं। मगर उसी काली की पूजा करने वाला बंगाल भी गोरे रंग के मोह से बच नहीं पाता।

प्रकृति में भी सफेद रंग का कोई अस्तित्व नहीं। यहां तो सब कुछ काला है। अनंत: ब्रह्मांड और हमारा अंतरिक्ष। आकाश नीला नहीं हकीकत में काला है। सफेद रंग तो सिर्फ किसी और के प्रकाश की किरण का मात्र परिवर्तन होता है। अर्थात एक भ्रम, एक मृगमरीचिका। वो भी ब्लैक होल के सामने पूर्णत: झूठा साबित होता है। ये तो प्रकाश भी अपने अंदर समेट लेता है। आकाशगंगा में जितने भी तारे टिमटिमाए मगर चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है, टोटल ब्लैक। मरने के बाद गौर वर्ण का शरीर भी काला पड़ जाता है और फिर मिट्टी में मिल जाता है। इस सत्य को भी नजरअंदाज किया जाता है कि स्वच्छ व निरोगी काले रंग की त्वचा अधिक चमकदार और मुलायम होती है। जबकि गोरे रंग की त्वचा अधिकांशत: खुरदरी, रोयेंदार व पास से देखने में दागदार होती है। काला रंग दागों को छिपाता है जबकि गोरा रंग उभारता है। और फिर भद्दा लगता है।

अगर आप एशियन देश में हैं तो विश्वास कीजिए, दो बराबरी के मनुष्य में एक के गोरे होने पर उसको प्राथमिकता दी जाएगी। यकीन नहीं आता तो आजमा लीजिए। पता नहीं, हम इस सोच के विरुद्ध कब खड़े होंगे? विदेशों के नस्लीय टिप्पणी पर हाहाकार व चिल्लाने वाला मीडिया खुद कब गोरेपन की क्रीम के विज्ञापन को दिखाना बंद करेगा? हमारे तथाकथित जागरूक विचारक, समाज सुधारक, मानवाधिकार संगठन कब इसके विरुद्ध अभियान छेड़ेंगे? क्या हम इस मानसिकता से कभी निकल पाएंगे? शायद कभी नहीं।

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रचनाकार संपर्क:

मनोज सिंह

425/3, सेक्टर 30-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com

''हिन्दी साहित्य में व्यंग्य की एक सुदीर्घ परम्परा रही है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर हरिशंकर परिसाई और शरद जोशी तक यह कई आयामों में जीवित रही है। इस परम्परा की मुख्य विशेषता यह रही है कि व्यंग्य जैसी तिक्त और मारक शैली को हास्य के रंग में ढालकर उसे प्रेषणीय और दिलचस्प बनाया गया, जिसकी वजह से पठनीयता की व्याकुलता पाठक में अन्त तक बरकरार रही।

वर्तमान में गोपाल चतुर्वेदी, के.पी.सक्सेना, श्रीलाल शुक्ल आदि इस विधा में पूरे मनोयोग से सक्रिय हैं। वैसे भी यह माध्यम प्रसंग के सापेक्ष साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक प्रभावकारी है। यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि इस विधा में नयी पीढ़ी के जो रचनाकार काम कर रहे है, उनमें आर.के.भँवर का नाम पूरे भरोसे के साथ लिया जा सकता है।

व्यंग्य आज सामाजिक औजार के रूप में प्रयुक्त हो रहा है। निश्चय ही इसका पथ उत्तरोत्तर प्रशस्त हुआ है। श्री भँवर की व्यंग्य-रचनाओं की धार तीखी है : किन्तु मीठी भी। यह व्यंग्यकार की निजी विशेषता कही जा सकती है। वह विवेच्य वस्तु को कड़वी बोली की तरह नहीं : बल्कि मीठी दवा की तरह अपने पाठकों को परोसता है।

श्री भँवर अपनी व्यंग्य रचनाओं के शीर्षकों का चयन भी व्यंग्यात्मक ही करते है। जहाँ वे नयी सूक्तियों का सृजन करते हैं, वहां प्राय: अधिक प्रभावी हो जाते हैं, यथा : 'फटे लिफाफे को कोई कलेजे नहीं लगाता है।'

युवा व्यंग्यकार भँवर का व्यंग्य पारदर्शी है, पठनीय है और देर तक मन-मस्तिष्क को कुरेदता रहता है। पाठकों को व्यंग्य का यह रूप-स्वरूप बहुत भायेगा।''

दिनेश सिंह

सम्पादक

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रायबरेली

व्यंग्य

हाय ­­­­.... मेरी प्याज

· आर.के.भंवर

क्या पता था कि प्याज के दिन ऐसे बहुरेंगे कि वह सौ फीसदी वी.आई.पी. हो जायेगा। प्याज खाना हैसियत वाले आदमी की पहचान बन गई है। '' क्यों भाई साब ... प्याज खा रहे है, वह भी सलाद में , क्या ठाठ है। सब्जी मंडी में प्याज के दुकानदार के चेहरे की रौनक के भी क्या कहने ! अब वह पहले वाला दुकानदार नहीं है कि आप गये और बैठकर छांटने लगे - प्याज । बात यहीं कोई एक हफ्ते पहले की है जब प्याज 20 रूपये किलो पर ठनठना रहा था। अपनी औकात और छुई-मुई शान के वास्ते आधा किलो प्याज ली, चलते वक्त रास्ते में एक प्याज गिर गई, मैंने गाड़ी रोककर उसे ऐसे सहेजते हुए उठाया, जैसे कोई गिन्नी गिर गयी हो। उन दिनों की वह खरीदी गई आधा किलो प्याज कितने दिन मेरे घर पर मुख्य अतिथि की तरह रही, इसकी गणना यह लिखते समय मेरे पास ठीक-ठीक उपलब्ध नहीं है।

अभी कल ही तो दिल्ली में सस्ती प्याज पाने के लिए लोगों की ऐसी लम्बी लाईन थी कि टेलीविजन का चौखटा काफी छोटा पड़ गया। ..... होटल में खाने की मेज पर यदाकदा सलाद की प्लेट में एक दो लच्छे दिख भर जाएं तो ऐसा लगता कि जैसे मै आम आदमी से तुरंत खास बन गया। लोगों की नजरें चुराकर प्याज के दो छल्लों को कपोल कवलित करने के बजाए पतलून की जेब में रख लेता हूं, घर पहुंचने पर उन छल्लों को बच्चों को दिखा कर कहता हूं कि देख लाले , यह है प्याज, हो गये न हम मोहल्ले में इनेगिने लोगों की हैसियत वाला .... । मेरा बच्चा छल्ला देखकर एक बार रोमांचित होकर बोल पड़ा था , हाय पापा, सुमित बहुत नक्शा मारता था, कि उसके पापा मार्केट से रोज प्याज लाते है। अब तो मै भी कह सकता हूं ..... कि मेरे पापा दि ग्रेट ... । मेरा मन अंदर से कह रहा था कि उससे कह दूं कि स्कूल के बैग में प्याज का छल्ला रख लें और फिर साथियों को दिखा कर वापस ले आना ..... । पर हाय मेरा मोह माया..... । मन नहीं हो रहा था कि प्याज को अपने हाथ से एक पल के लिए दरकिनार करूं । प्याज तू न गई मेरे मन से ..... यही माकूल टाईटिल होता न , यदि दिनकर जी जिंदा होते ..... । दिगम्बरी भाई लोग जो तरह तरह की रोक टोक की बिना पर प्याज को नाकारा समझते थे ...... वह भी प्याजगोषों को समझाने में लग गये है ..... अरे एक मुझे देखो प्याज खाते ही नहीं, प्याज न खाने वाले( महंगी के कारण न खरीद पाने वाले ) उनकी टोली में आ गये है।

आम आदमी के पसीने उस समय छूटने लगते है जब दुकानदार मुंहतोड़ जवाब फेंकता है, ओ बाबू साहेब ... प्याज है प्याज , घुइयां नहीं । लेना हो तो लो, वरना आगे देखो ... । प्याज जिनके यहां थोड़ी बहुत स्टॉक में थी, उनके कहने ही क्या। उनके दिन सुनहरे ही समझिये। मंडी का अपना विज्ञान है। भाव कब चढ़ेंगे और कित्ते दिन चढ़े रहेंगे ... यह उनका अपना गणित है। मेरे एक परिचित आमदनी वाले विभाग में कार्यरत है, मैने उनसे एक दिन कहा - भई कभी अपनी नजरें प्याजखोरों पर तिरछी कर लो । बोले -' क्या तिरछी नजरे करूं खाक, प्याज मिल रही है आगे से न सही पीछे से '।

40 रूपये किलो वाली प्याज में से एक प्याज लेकर आप सुबह सुबह सामने रखकर बैठ जाईए ..., धीरे-धीरे पहले ऊपर का छिलका उतारिये फिर आगे के छिलके उतारते चले जाइए । सावधान आप मन में सब्जी बनाने का इरादा न कीजियेगा। जो छिलका उतार रहे है न, समझिये वही वही प्याज है। अब आप क्या पाते है कि प्याज है और है तो वह छिलकों में । बचा सिर्फ शून्य । यही शून्य परम् तत्व है। परम् विज्ञान है। भगवत प्राप्ति का संतसम्मत साधन। छिलकों की पर्त के संगठन का नाम प्याज है और उनके बिखराव में प्याज तिरोहित हो रही है। शून्य बच रहा है। जो दिख रहा है वो है नहीं .... और जो नहीं है वो दिख रहा है। सरकार इस दिशा में किसी न किसी तरह से प्रयोग कर सकती है। एक अपील जारी कर सकती है। '' लीजिए एक प्याज और भोरहरे उठ बैठिए, प्याज साधना कीजिये ... सारे मर्ज दूर। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी । ''

जैसे एक सीढ़ी होती है, कोई चढ़ता है फिर उतरता है - यह एक सामान्य सा नियम है। चढ़ा है तो उतरेगा और उतरा है तो चढ़ेगा। यही है न दर्शन । पर जरूरत की वस्तुओं के भाव मंडी में तो ऊंचान तक बड़ी देर तक रूके रहते है। चढ़ गये तो चढ़ गये, अब लखियों मनौती मनाओं ... पर उतरेंगे नहीं । बस चढ़े है तो ... । जैसे जरूरतों के बाजार में भाव मरखैना सांड़ हो गया हो ... । और अपनी प्याज ... चढ़ी जो चढ़ती चली गयी।

कल के लिए कागज के पन्ने कोरे है सिर्फ यह लिखने के वास्ते - बेटा वह भी समय था जब 40 रूपये किलो वाली प्याज तुम्हारे दादा जी बाजार से लाते थे। और 21 वीं सदी का लल्ला बोल उठेगा .... हाऊ स्ट्रैंज! सच ममी .... तब इत्ती सस्ती थी प्याज ... ।

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व्यंग्य

दुविधा तू न गई मेरे मन से

· आर.के.भंवर

मेरी लेखनी की इस निसृति का राष्ट्रकवि दिनकर जी के व्यंग्यालेख से कोई लेना देना नहीं है। वे मेरे लिए आज भी परम् आदरणीय हैं। उन्होंने ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से उस समय लिखा था जब समाज में ईर्ष्यालु मनुष्य पग पग पर रेंगते दिखते थे। इतनी भयंकर ईर्ष्या कि हरे भरे पेड़ को कोई देख ले तो वह जल जाये । तब का आदमी ईर्ष्या को किसी न किसी अंदाज में बयां जरूर कर लेता था। उस समय उनका लिखा यह आलेख बड़े काम का था। पर अब ईर्ष्या का वैश्वीकरण हो गया है। वैसे है अभी भी, आज के समय में वह बड़े-बड़े अमलों में अपने विभिन्न रूपों में चली गई है। यह अब मुकेष - अनिल अम्बानी के यहां पैर पसारने लगी है। धीरू भाई अम्बानी इसे ऊपर कितना भी मुठ्ठी में बंद कर लें, पर जो जल रहा है, उसका क्या।

उन्होंने उस समय ईर्ष्या पर काफी शोध किया था और इस माहौल में हमने दुविधा पर काफी शोध कर डाला है। दुविधा बड़ा अर्थपूर्ण शब्द है। ये एक अरबी हिन्दुस्तानी ही नहीं पूरी दुनिया के बाशिंदों के मन में अपना स्थायी स्थान बनाये हुए है। इससे सभी का पाला पड़ता है। दुविधा और सुविधा एक ही सिक्के के दो पहलू है। आज जो दुविधाग्रस्त है वह कल सुविधासम्पन्न भी होगा। हिन्दी फिल्म गोरा-काला की तरह लिंगभेद करते हुए सुविधा यदि गोरी है तो दुविधा काली, ये आप अपनी सुविधा के लिए कह सकते है। हालांकि सुविधा सात्विकी होने के साथ साथ तामसी भी होती है। चूंकि म्यान में एक तलवार की तरह एक समय में एक ही रहती है। इसलिए सुविधा को सात्विकी ही मानकर चलता हूं।

भारतीय पत्नी सदैव दुविधा में जीती है और पति सुविधा को रखैल बनाकर रखना चाहता है। भारतीय परिवारों में प्राय: छिड़े रहने वाले द्वंद्व का एक कारण है - संशय। कृष्ण ने अर्जुन से कहा संशयात्मा विनष्यति। संशय या दुविधा की वृत्ति का विनाश ही सुविधा की सीढ़ी सुलभ कराता है। इस सीढ़ी से चढ़ने के बाद व्यक्ति आरामतलबी के छज्जे पर बैठ न जाये, आगे बढ़े। समूची महाभारत में अर्जुन को श्रीकृष्ण ने विषेष रूप से यह कहते हुए मोटीवेट किया था कि शत्रु की सेना तो पहले से ही मरी है, इसे तू बाकायदे मार दे। दुविधाग्रस्त अर्जुन एक-एक कर दुविधाओं को काटता चला गया। ऐसा उसके लिए आसान था क्योंकि कृष्ण उसके सारथी थे। सारथी प्रेरक हो तो दुविधा पास नहीं फटकती। उधर सारथी अपने ध्येय से विचलित हो जाए तो कोई भी जीवन के महाभारत में हीरो क्या जीरो भी नहीं बन सकता है।

मेरे एक मित्र हैं, से बतियाकर किसी को भी यह लगेगा कि वह दुविधा में ही पैदा हुए, दुविधा में जी रहे है और जीवन की सांझ नियरायेगी तो दुविधा में ही अवसान प्राप्त करेंगे। मैं इतना कहने में बेमरौव्वत इसलिए हो गया कि उन्होंने एक नहीं अनेक सारथियों को बाहर का दरवाजा दिखाने में चूक नहीं की। होगा कि नहीं होगा, बनेगा कि नहीं बनेगा, चलेगा कि नहीं चलेगा , इससे मिलेगा कि नहीं मिलेगा .... ऐसे न जाने कितनी विचारवीथियों में ज्वार-भाटा आया करते थे। दुविधा की वजह से ही उनकी तीन-तीन लड़कियां जवानी से बुढ़ापे की ओर बढ़ने लगी हैं। वह दुविधा के कारण ही किसी काम को पूरी तन्मयता व निष्ठा से नहीं कर पाते थे। उनमें एक खास आदत यह रही है कि वे उपदेष सभी को देते है कि दुविधा में आदमी को नहीं रहना चाहिए। दुविधा आदमी के अंदर उसके साहस का सत्यानाश कर डालती है। आदि-इत्यादि। यह सब बोलकर वह अपने को समझाने की चेष्टा जरूर करते थे कि वे दुविधा में नहीं जीते है। होता ही यही है कि जूते-चप्पलें चुराने वाला सबसे ज्यादा नैतिकता पर चर्चा कर सकता है।

मेरे इन मित्र के साथ यही दिक्कत है कि वे जमीनी हकीकत से दो-दो हाथ नहीं कर पाते। अजीब किस्म के संकोची। संकोची भी इस तरह कि चलती बस में उन्हें यदि अपशिष्ट जल के विसर्जन की उत्कट इच्छा हो तो न वे बस चालक से अनुरोध करेंगे और न परिचालक से ही। सिवाय इसके कि वह अपना आसन इधर से उधर भले ही करते रहे। दुविधा में जीने वाला व्यक्ति संकोच को अपने साथ लेकर चलता है, साथ ही वह जरूरत से कुछ ज्यादा ही चिंतन में समाधिस्थ हो जाता है। दुविधा से मन में वहम जन्म लेता है। यह वहम ही है जो कुछ समय तक व्यक्ति के मन में पाल्थी लगा लेता है और उसे न्यूरो फिजीशिएन के क्लीनिक तक पहुंचा देता है। वहम और अहम दोनों यदि व्यक्ति पर अपना आधिपत्य जमा लें तो वह गया काम से।

दुविधा मनुष्य की प्रकृति में है। उससे अलग रहकर जीना कोई जीना है ! दुविधा से मन में जो अनिर्णय की स्थिति उत्पन्न होती है उसे पार पाने के लिए ध्यान का बहुत बड़ा व्यवसाय चल रहा है। सुविधा की श्यामरंगी मलाई खाने वाले बाबाओं के आश्रमों में दुविधाग्रस्त मनोरोगी ही विचरण करते मिलेंगे। इन बाबाओं की भूमिका यह है कि मनुष्यमात्र में दुविधा का संचार कराते रहें जिससे उनका व्यवसाय बढ़ता रहे। जब वे कहते थे कि इस नश्वर शरीर से मोह कैसा, तो उनकी चतुर चेलियां बाबा के सायंकालीन मेकअप का लेप तैयार कर रही होती थी। उनका जब यह कहना होता था कि दुविधा को भगाने के लिए ध्यान करना, तो उनके चेले दूसरे छोर पर सुविधा -सम्पन्नता के लिए एक नये आश्रम की जमीन पर कब्जा कर रहे होते थे।

नब्बे प्रतिशत दुविधा में जीने वाले मनुष्य 10 प्रतिशत लोगों के लिए सुविधा का कारोबार देते है या कह ले कि उन्हें पंचतारा संस्कृति में जीने का हकदार बनाते है। बाबा रहीम यदि आज होते तो दुविधा पर लिखा अपना दोहा ही पलट देते। क्योंकि दुविधा की सीढ़ी पर चढ़कर माया और राम दोनों ही मिल रहे है। नतीजन दुविधा ही सुविधा को मालामाल कर रही है। इलेक्शन में वोटर जब-जब दुविधाग्रस्त हुआ, तब-तब जमानत जब्त कराने की फिराक वाला उम्मीदवार जरूर जीतता है। इसलिए ध्यान और प्रार्थना का दर्शन यही है ' दुविधाम् शरणं गच्छामि ..।'

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आर. के. भंवर

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आलेख

- डॉ. महेश परिमल

आज जीवन की धरती पर रिश्तों की इंद्रधनुषी धूप ऐसी चटकी है कि हर रिश्ता अपने अर्थ खो रहा है. इन्हीं अर्थ खोते रिश्तों में एक रिश्ता है, भाई-बहन का. सदियों से चला आ रहा यह पवित्र रिश्ता श्रद्धा और मर्यादा से परिपूर्ण है. इस रिश्ते को लेकर न जाने कितनी ही बार भाइयों ने अपनी बहनों के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है, तो कई बार बहनों ने भी अपने धर्म का पालन किया है. भाई-बहन के इस अटूट रिश्ते पर अब उँगलियाँ उठने लगी हैं. अब तो कहीं भी कोई भी सुरक्षित नहीं है. न बहन और न ही भाई.

देखते ही देखते भाई शब्द ने अपनी परिभाषा बदल दी. अब तो भाई शब्द इतना डरा देता है कि जान हलक पर आकर अटक जाती है. बहन अपने भाई से छुटकारा पा सकती है, लेकिन कोई भी इंसान इस भाई से छुटकारा नहीं पा सकता. जिसकी कलाई में राखी बँधी है, वह तो है भाई, पर जिसके हाथ में कोई अस्त्र-शस्त्र है, वह भी तो कुछ है भाई. इस भाई के आगे रिश्तों की गुनगुनी धूप भी आकर सहम जाती है. इसके सामने कोई रिश्ता नहीं होता, इनका रिश्ता केवल अपराध से होता है. आज किसी बहन का भाई होना भले ही फख्र की बात न हो, पर दूसरे ही तरह का भाई होना फख्र की बात हो गई है. एक तरफ ये दूसरा भाई उतनी सहजता से प्राप्त नहीं होता, तो दूसरी तरफ ये ही भाई समाज में अपनी धाक जमाने के लिए काम भी आता है. एकमात्र बहन के यदि आठ भाई भी हुए, तो ये अकेला भाई उन सब पर हावी हो सकता है.

क्या करें, आज समाज का ढाँचा ही बदल गया है. संबंधों की पवित्रता पर अब विश्वास किसे है? हर कोई इसे दागदार बनाने में अपना योगदान दे रहा है. संबंध चाहे ईश्वर से हो या समाज से, इंसान ऐसा कोई भी मौका नहीं चूकना चाहता, जिससे उसका स्वार्थ सधे. स्वार्थ की यह बजबजाती नदी इतनी प्रदूषित हो गई है कि पूरा समाज ही इससे प्रभावित हो रहा है.

भाई-बहन के पवित्र संबंधों को दर्शाने वाला त्योहार रक्षा बंधन भी आज पूरी तरह से व्यावसायिक हो गया है. राखी बाँधने के पहले ही बहन सोच लेती है कि इस बार भैया से क्या लेना है? ये तो है घर की बातें. हमारे समाज में ऐसे बहुत से महिला संगठन हैं, जो इस दिन विशेष रूप से सक्रिय हो जाते हैं. इन संगठनों की महिलाएँ भले ही अपने सगे भाइयों को राखी न बाँध पाएँ, पर शहर की जेल में जाकर वहाँ कैदियों को राखी बाँधना नहीं भूलती. आप शायद उन महिलाओं की पवित्र भावनाओं को समझ सकते हैं. आप शायद यही सोच रहे होंगे कि इससे कैदियों की कलाई सूनी न रह जाएँ, इसलिए इन महिलाओं का यह कार्य पुनीत है. लेकिन आज जब प्रचार और प्रसार की भूख अपना पंजा फैला रही है, तब भी क्या ऐसा सोचना उचित है. ये महिला संगठन चुपचाप अपना काम करे, तो इनकी पवित्र भावनाओं को समझा जा सकता है. पर इस काम को करने के पहले वे इसका खूब प्रचार करती हैं. राखी के दिन जेल जाने के पहले मीडिया को सूचित करना नहीं भूलती. राखी बाँधने का काम पूरा होते ही महिला आत्मसंतुष्टि का भाव लिए अपने घर पहुँचती हैं. सोचती हैं आज एक बड़ा काम हो गया. दिन में लोकल टीवी पर अपने आप को देखकर शायद इतरा भी लें. पर वह क्या सच्चा आत्म सुख प्राप्त कर पाती हैं. उन्हें तो यह भी नहीं मालूम होता कि आज कितनों को राखी बाँधी. चलो यह संख्या मालूम भी हो गई, पर क्या अपने सभी भाइयों के नाम जानती होंगी वे सभी?

एक दृश्य की कल्पना करें. राखी के दिन जिस महिला संगठन ने जेल जाकर कैदियों को राखी बाँधी थी, उस संगठन की अध्यक्ष के घर जन्म दिन की पार्टी चल रही है. इतने में जेल से अपनी सजा पूरी कर उसी दिन छूटने वाला एक कैदी वहाँ पहुँचकर अपनी कथित बहन को प्रणाम करता है और कहता है दीदी, पहचाना मुझे, मैं आ गया हूँ. क्या वह महिला उस कैदी को पहचानते हुए भी सबके सामने उसे भाई के रूप में स्वीकार करेगी?

बदलते जीवन मूल्यों के साथ आज सब कुछ बदल रहा है. अब न तो रिश्तों की गरिमा ही रह गई है और न ही रिश्तों की पवित्रता. अब तो ऐसे-ऐसे रिश्ते बन रहे हैं, जिसे कोई संबोधन ही नहीं दिया जा सकता. अपनी ही बेटी के साथ व्यभिचार करने वाले दुराचारी और हवसखोर पिता को क्या कहेंगे, कभी सोचा है किसी ने. यही नहीं आज तो रिश्तों की आड़ में जो कुछ अनुचित हो रहा है, उससे क्या लगता है कि समाज सही दिशा में जा रहा है?

अभी तो केवल 'भाई' शब्द ने ही अपनी पवित्रता खोई है, पर धीरे-धीरे ऐसे कई शब्द होंगे, जिनकी पवित्रता पर विश्वास करना मुश्किल होगा. इसे आधुनिकता की अंधी दौड़ कहें या समय की खुली माँग, कि आज हम इस बदलाव को महसूस करने के बाद भी इसे अनदेखा किए हुए हैं. हम अच्छी तरह से जानते हैं कि रिश्तों में परिवर्तन आ रहा है और तेजी से आ रहा है. फिर भी इस परिवर्तन के प्रति हमारी चुप्पी क्या ज्वार के पहले की शांत लहरों का परिचय दे रही है? यदि हाँ, तो नहीं चाहिए हमें ऐसा परिचय जो हमारे भीतर की कोमल भावनाओं को ही समाप्त कर दे.

हमारे रिश्तों की गहरी नदी जो यूं ही सूखती रही, तो एक समय ऐसा भी आएगा, जब मानवता को सिसकने के लिए आंसुओं का भी अकाल होगा. बंजर हो जाएगी स्नेह की धरती और वीरान हो जाएगा हमारा जीवन. हम दूसरे देशों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध बनाने की बातें करते हैं, हम चाँद-तारों को मुट्ठी में कैद करने की बातें करते हैं, इस ग्रह से दूर एक नए ग्रह की खोज और उस पर जीवन होने की बातें करते हैं, पर उसके पहले तो हमें अपने ही घर में खून के रिश्तों को गहरा बनाना होगा, एक दूसरे में भाई-चारा और स्नेह ढूँढना होगा, मानवता के लहू को अपने रग-रग में बहाना होगा और इसके भी पहले रिश्तों के मोती को अपनी हथेली पर सहेजना होगा, तभी मिलेगी रिश्तों को सही पहचान.

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रचनाकार संपर्क:

- डॉ. महेश परिमल,

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वर्ल्ड ऑफ बुक्स

-डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

तेज़ी से बढती दुनिया की आबादी और तकनीक का कल्पनातीत प्रसार. कहीं ऐसा तो नहीं कि मनुष्य प्रकृति से भी ज़्यादा शक्तिशाली बन गया है? हम बहुत तेज़ी से, हालांकि अनचाहे ही, मौसम को बदल रहे हैं, पारिस्थितिकी को बदल, प्रदूषित और यहां तक कि नष्ट कर रहे हैं, और अपने तथाकथित विकास को कुछ इस तरह धकिया रहे हैं कि इस पृथ्वी के अन्य जीवों को भी एक नए मानव-निर्मित विश्व से तालमेल बिठाने को मज़बूर होना पड रहा है.

ऐसे में, यह कल्पना कि अगर अचानक पूरी मानव-जाति लुप्त हो जाए तो क्या होगा?

यह दुष्टतापूर्ण कल्पना की है ‘ईको इन माय ब्लड’ (1999) पुस्तक के लेखक, जाने-माने और बहु पुरस्कृत पत्रकार एलन वाइज़मैन ने अपनी सद्य प्रकाशित किताब ‘द वर्ल्ड विदाउट अस’ में. वाइज़मैन ने सवाल किया है कि अगर कोई विषैला वायरस या किसी भी तरह की कोई हलचल रातों-रात हमारी इस पृथ्वी को जन-विहीन कर दे तो जो कुछ मानव ने अब तक बनाया-संजोया है वह और कब तक बचा रह सकेगा. बेशक वाइज़मैन की यह कल्पना शरारती है, एक हद तक रुग्ण भी, लेकिन है विचारोत्तेजक. और यह भी कि किताब इस सवाल पर ही खत्म नहीं हो जाती, इससे आगे भी जाती है. किताब की उपादेयता इस बात से और बढती है कि अपने इस सवाल का जवाब पाने के लिए लेखक ने सॉलिड साइंस और कल्पना का जो मिश्रण तैयार किया है वह हमें बहुत कुछ सोचने को विवश करता है.

वाइज़मैन कहते हैं कि मानव जाति के विलुप्त हो जाने के दो दिन बाद ही मैनहट्टन के सबवे’ज़ को सूखा रखने वाले पम्प काम करना बन्द कर देंगे, कुछ ही दिनों बाद टनल्स में पानी भर जाएगा, सडकों के नीचे की सारी मिट्टी बह जाएगी और सदियों तक बने रहने के लिए निर्मित गगन चुम्बी अट्टालिकाओं की नींवें ढहने लगेंगी. रोज़मर्रा काम में आने वाली चीज़ें फॉसिल बन जायेंगी और सारी धातुएं गल-पिघलकर लाल रंग की चट्टानों जैसी दीखने लगेंगी. हो सकता है कि मनुष्य के शुरुआती दौर की कुछ इमारतें ही स्थापत्य के अवशेष के बतौर बची रह जाएं. यह सारी कल्पना वाइज़मैन ने बगैर किसी आधार के नहीं कर डाली है. इसके लिए उन्होंने दुनिया भर के विशेषज्ञों से चर्चा की, पर्यावरण वैज्ञानिकों, कला संरक्षकों, प्राणी वैज्ञानिकों, तेल शोधकों, यहां तक कि धर्म गुरुओं से भी गम्भीर विमर्श किया और विश्व भर के महत्वपूर्ण स्थलों की यात्रा की. तब जाकर तैयार हुई है यह 336 पन्नों की रोमांचक, उत्तेजक, अवसादक और सम्मोहक किताब. किताब के पन्नों से गुज़रते हुए वाइज़मैन की नीयत साफ हो जाती है. हालांकि वे एक भयावह तस्वीर उकेरकर आगत से हमें डराते हैं लेकिन उनका मक़सद है हमें अपने अंधाधुंध विकास के खतरों के प्रति सजग करना.

वाइज़मैन ने अपने वृत्तांत को इस सोच के साथ बुना है कि अगर पृथ्वी पर से सारा मानवीय दबाव एकबारगी ही खत्म हो जाए तो उस की प्रतिक्रिया क्या और कैसी होगी ! हमने जबसे और जो-जो ज़्यादतियां उस पर की हैं, उनसे पहले का महौल पुनर्स्थापित होने में कितना समय लगेगा. मानव-निर्मित कंकरीट का जंगल नष्ट हो जाने के बाद असली जंगल कितने समय में उग सकेगा? और, आदम के इस धरा पर अवतरित होने से पहले के हालात और स्वर्गोपम धरा की वापसी होगी भी या नहीं. क्या प्रकृति मनुष्य के सारे पद चिह्न मिटा पायेगी?

पर्यावरण के बारे में ज़्यादातर समकालीन किताबें स्यापा करके खत्म हो जाती हैं. वे यह बताने के लिए कि हम उसे कैसे और कितना बरबाद कर रहे, प्राकृतिक विश्व का गुणगान करती हैं. निश्चय ही उनका उद्देश्य तो परिवर्तन होता है पर उस उद्देश्य में वे प्राय: कामयाब नहीं हो पातीं, बल्कि कभी-कभी तो होता यह है कि ऐसी किताबें नींद की गोली बन कर रह जाती हैं. ऐसे में वाइज़मैन की इस किताब का महत्व और भी अधिक है . यह हमारे समय की सबसे बडी समस्या पर सर्जनात्मक और दिलचस्प तरीके से विचार करती है. किताब इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसके माध्यम से वाइज़मैन ने खुद का इलाज़ करने की पृथ्वी और मानवता की अद्भुत क्षमता को उजागर किया है. जब वे चेर्नोबिल की चर्चा करते हुए बताते हैं कि 1986 के भीषण विकीरण रिसाव के बाद अब वहां जंतुओं की वापसी होने लगी है, या उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच के असैन्यीकृत क्षेत्र में लगभग विलुप्त हो चुके पहाडी बकरे और चीते 1953 से ही दिखाई देने लगे हैं, तो अन्धेरे में प्रकाश की किरण नज़र आती है. इसी तरह जब वे यह कहते हैं कि मानवीकृत विनाश के बावज़ूद हमारी कला-संस्कृति के कुछ उत्कृष्ट नमूने तो बचे ही रहेंगे तो वे बहुत बारीकी से विनाश की विभीषिका के खिलाफ एक ऐसा मूलभूत और कारगर विकल्प सुझाते हैं जो हमारे अपने विलोपन पर निर्भर नहीं है. इस तरह यह किताब हमारे अपने चतुर्दिक के बारे में सार्थक चिंता के उम्दा प्रयास के रूप में सामने आती है.

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(टोनी मॉरीसन)

आलेख

-विजय शर्मा

डेढ़ सौ साल पहले एक अमेरिकी लेखक ने अपने पूर्वजों के पाप का प्रायश्चित करने के लिए एक पुस्तक रची, जो आज इतने वर्षों के बाद भी इंग्लिश साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान रखती है. पुस्तक है 'द स्कारलेट लैटर. इसने लेखक नथैनियल हॉथर्न को स्थापित कर दिया और स्वयं भी इतने वर्षों से विश्व साहित्य में जमी हुई है, अभी भी अमेरिकी साहित्य के शीर्ष पर है. साहित्य जगत में मील का पत्थर है 'द स्कारलेट लैटर’, जिसके बारे में एक विख्यात समीक्षक ने लिखा है, 'साहित्यिक सृजनात्मकता की पराकाष्ठा पूर्णता के उतना निकट, जितना मानवीय प्रयास पहुँच सकता है’. हरमन मेल्विल नथैनियल हॉथर्न को 'अमेरिका का शेक्सपीयर कहता है. इतना ही नहीं इसने अन्य कई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया इस पर 1926 से ले कर अब तक चार-पाँच बहुचर्चित फिल्में बन चुकी हैं और भविष्य में भी इससे काफी संभावनाएँ हैं. इस रचना का उत्स उससे दो सदी पहले सत्रहवीं सदी में है. स्कारलेट लैटर जैसी रचना देने के पीछे एक कारण यह था कि हॉथर्न के पूर्वजों में से एक जॉन हॉथर्न 1692 में सेलम के कुख्यात

विच-क्राफ्ट मुकदमे में जज की भूमिका में था. उसका परिवार प्योरिटन था. वे 1630 में न्यू इंग्लैंड आए थे. कहानी से उसका परिवार और वह स्वयं बहुत गहरे जुड़े हुए थे. उपन्यास में सेलम और उसके जीवन का बड़ा सूक्ष्म एवं विस्तृत विवरण है. हम अपने पूर्वजों द्वारा किए गए कुकर्मों को मिटा नहीं सकते पर किसी न किसी ढंग से उसका प्रायश्चित करके उन्हें हल्का अवश्य कर सकते हैं और नेथनियल ने उपन्यास के रूप में यही करने का प्रयास किया है.

बँटवारे के दौरान जो हिंसा हुई उसे दोनों कौमों का पागलपन मान कर भुलाने की कोशिश करें पर चौरासी के एक तरफा दंगे? उन्हें दंगे कहना उचित नहीं, वह सोची समझी रणनीति थी. फिर गुजरात का नर संहार. हमारे यहाँ भी कम अत्याचार नहीं हुए हैं परंतु अभी तक कोई ऐसी कृति मेरी नजरों से नहीं गुजरी है जिसमें रचनाकार अपने अथवा अपने पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित करता दीखता हो. शायद कभी भविष्य में कोई अत्याचारी या उसका कोई वारिस अपराध बोध से ग्रसित हो और अपने पूर्वजों के प्रायश्चित स्वरूप स्कारलेट लैटर जैसी कोई कृति हमारे सामने आए.

मेरे मन में एक और प्रश्न उठा रहा है सेलम के जिन लोगों को विच कहकर नष्ट किया गया उनमें से किसी परिवार का कोई सदस्य यदि रचना करे तो वह कैसी होगी? स्त्रियों और दलितों पर सदियों से अत्याचार किया गया है. सताई गई स्त्रियों और दलियों द्वारा की गई रचनाएँ इसी श्रेणी में आती हैं. इस दिशा में अब हमारे यहाँ काम हो रहा है. नारी और दलित जो सदियों से अत्याचार का शिकार रहे हैं उन लोगों ने कलम उठाई है. मराठी में पहले और फिर अब हिन्दी में. हालाँकि इतना काफी नहीं है.

अमेरिका की अश्वेत जनता पर जो अत्याचार हुए उस पर उन्हीं लोगों और उनके परिवार वालों के द्वारा थोड़ा-बहुत, कुछ रचा गया है. जैसे कि एलैक्स हेली की 'द ऑटोबॉयग्राफी ऑफ मैल्कॉम एक्स’ जो अफ्रीकन-अमेरिकन साहित्य और इतिहास के विद्यार्थियों के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक बन गई. फिर उन्होंने लिखा 'रूट्स’. जिसको पुलित्सर अवार्ड तथा नेशनल बुक अवार्ड सहित दर्जनों पुरस्कार मिले. इसकी लाखों प्रतियाँ बिकीं और 26 भाषाओं में जिसका अनुवाद हुआ. जिस पर 1977 में टीवी प्रोग्राम बना. इसमें उन्होंने अपने अतीत, अपनी जड़ों को अफ्रीका तक खोज निकाला है. इसने बहुत से लोगों को अपना इतिहास खोजने के लिए प्रेरित किया. अश्वेत गुलामों की एक और

वंशज हैं टोनी मॉरीसन उन्होंने अश्वेतों के दारुण दु:ख, उनकी आशा-निराशा को वाणी दी है. उन्होंने अपने उपन्यासों 'बिलवड, 'जाज’, 'पैराडाइज’, 'सुला’, 'साँग ऑफ सोलमन’, 'लव’ आदि उपन्यास तथा अपने आलेखों के द्वारा अफ्रीकन-अमेरिकन इतिहास को नए ढंग से दुनिया के सामने प्रस्तुत किया है. जैसा कि स्वाभाविक था प्रारम्भ में उनकी उपेक्षा हुई पर कब तक उपेक्षा की जाती. अधिकार तो लेना पड़ता है और वही हुआ. पहले टोनी मॉरीसन को पुलित्सर प्राइज मिला और 1993 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ. मॉरीसन ने अपनी रचनाओं में नस्ल भेदभाव वाली सभ्यता में अश्वेत स्त्री के अनुभवों को जुटा कर स्वर दिया है. इतना ही नहीं उन्होंने अपने प्रभाव का उपयोग करके अन्य अश्वेत रचनाकारों को प्रोत्साहित किया और उनके कार्यों को प्रकाशित करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. वे नेशनल कौंसिल ऑन आट्र्स तथा द अमेरिकन एकेडमी एंड इंसटिटयूट ऑफ आट्र्स एंड लेटर्स की सदस्य हैं.

टोनी मॉरीसन का जन्म का नाम चोल एंथोनी वोफोर्ड था. चोल के उच्चारण में लोगों को मुश्किल होती थी अत: उन्होंने अपना नाम बदल कर टोनी कर लिया. परंतु कुछ रचनाओं के पश्चात उन्हें लगा कि जो वे लिखती हैं उसमें से अधिकाँश अनुभव चोल एंथोनी वोफोर्ड के होते हैं अत: उन्हें लगता है कि अपना नाम पुन: चोल रखना ही उचित होगा. अमेरिका का ओहिओ राज्य अपने जन्म एक मार्च 1803 से ही गुलामी के विरोध में रहा है. इसीलिए इसके शहर 'अंडरग्राउंड रेलरोड’ गुलामों के भागते समय उनकी शरणस्थली रहे हैं. यहीं सबसे पहले 1821 में बेंजामिन लुन्डी ने अश्वेतों का जीनियस ऑफ यूनिवर्सल एमान्सीपेशन नामक पहला न्यूजपेपर शुरु किया. यहीं मॉरीसन के माता-पिता भी आ कर बसे. उनका जन्म 1931 में ओहिओ में ही हुआ जहाँ उनके माता-पिता दक्षिण के नस्लवाद और पूर्वग्रह की समस्याओं से बचने के लिए आ गए थे. ऐसा नहीं था कि यहाँ अश्वेतों के लिए समस्याएँ नहीं थी, हाँ दक्षिण की बनिस्बत कम थी. अत: उसका बचपन उतना कष्टकर नहीं था. वे सोचती थी कि उनके बच्चों को उनके जितना भी कष्ट नहीं झेलना पड़ेगा पर ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने अपने बेटों को नस्ल भेद भाव वाले समुदाय के लिए तैयार नहीं किया था. वे सोचती थीं कि अब समय बदल गया है परंतु उनके बेटों को अस्सी के दशक में अमेरिका में हुए रंगभेद और नस्लवाद का शिकार होना पड़ा. उन्होंने अश्वेत होने की पीड़ा झेली. यह पहली की गुलामी से भिन्न था. विश्व के लिए स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की चौधराहट का दावा करने वाले अमेरिका में भेदभाव बना हुआ है इसमें कोई दो राय नहीं है. चूँकि उनके बच्चे इसके लिए तैयार नहीं थे अत: वे मानती हैं कि उनके बच्चों को उनसे ज्यादा दु:ख मिला. अश्वेत क्रिमिनल होते हैं यह धारणा बहुत पक्की बनी हुई है. बनार्ड शॉ के अनुसार, 'अमेरिकन श्वेत चर्म वाले काले नीग्रो को जूता पॉलिश करने वाले लड़के के वर्ग में उतार लेते हैं और इसके बाद वे यह फैसला देते हैं कि अश्वेत आदमी जूता पॉलिश करने के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता है. हमारे अपने समाज में अस्पृश्यता कानूनन समाप्त हो चुकी है पर क्या समाज में वास्तव में ऐसा हो गया है? अंग्रेजों ने जिन समुदायों को क्रिमिनल घोषित कर दिया था आज भी वे उसका खामियाजा भुगत रहे हैं. संजीव जैसे कुछ लेखकों ने इस समस्या पर कलम उठाई है. आज भी हमारा नजरिया आदिवासियों के प्रति कैसा है?

अमर साहित्य के रचयिता, मानवता के आदिम कवियों ने कहा हैं कवि: क्रांतदृष्टि:. साहित्यकार की महानता मानव जीवन की और मनुष्य की अंतस की उसकी अचूक, गहन पहचान और इनकी सशक्त अभिव्यक्ति में है. मानव के सुख-दु:ख, आशा-निराशा, उसकी आकांक्षा, प्रेम-घृणा यही सब है महान साहित्य को ऊर्जा देने वाला, प्राण देने वाला स्रोत. साहित्य का विषय होता है मानव जीवन और उसका परिवेश. यह परिवेश बाह्य तथा आंतरिक दोनों होता है. आदिकाल से मानव के सुख-दु:ख, आशा-निराशा-हताशा, उसकी आकांक्षा, प्रेम-घृणा, स्वार्थ-परमार्थ, घमंड-विनम्रता का विश्लेषण साहित्य का कथ्य बनता आया है. टोनी मॉरीसन के पिता जॉर्ज वोफोर्ड जो एक वेल्डर थे उन्हें अश्वेतों की लोक कथाएँ सुनाया करते थे. बचपन में सुनी ये लोक कथाएँ उनके साहित्य की थाती बना. प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवेश के द्वारा निर्मित होता है. इसी तरह प्रत्येक रचनाकार अपने परिवेश, जिसमें उसकी पृष्ठभूमि भी जुड़ी होती है, से अपनी रचना के लिए ऊर्जा पाता है. किसी रचना का वास्तविक आनन्द उठाने के लिए उसका मनन-विश्लेषण करने के लिए उसके वातावरण, इतिहास, भूगोल, उसकी संस्कृति को जानना बहुत जरूरी है. विदेशी रचनाकारों के विषय में यह और भी मायने रखता है. टोनी मॉरीसन की रचनाओं को जानने समझने के लिए, उनका विश्लेषण करने के लिए, उनका आनन्द उठाने के लिए भी उनकी पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है.

वे एक समय के अफ्रीकी-अमेरिकन गुलाम परिवार की संतान हैं. यह सही है कि वे गुलाम नहीं थीं और उनके माता-पिता भी गुलामी से छूट चुके थे पर अमेरिका में रंग भेद और नस्लवाद सामाजिक संरचना का अंग हैं और कौन दावे के साथ कह सकता है आज भी सामाजिक जीवन में रंग और नस्ल महत्वपूर्ण भूमिका अदा नहीं करता है. उन्होंने अपने उपन्यास पैराडाइज में एक ऐसे शहर की कल्पना की है जहाँ केवल अश्वेत लोग रहते हैं और 1980 तक अमेरिका में कई जगह ऐसा ही था. उन्होंने अमेरिका में रह रहे काले समुदाय, उसके अतीत को अपनी रचनाओं में स्वर दिया है. वे अपने देश में अफ्रीकन की उपस्थिति को अमेरिकन स्वप्न के पूर्ण होने की एक आवश्यक परंतु अव्यक्त पूर्वदशा मानती हैं, एक जरूरी शर्त मानती हैं. उन्होंने अफ्रो-अमेरिकन लोगों को उनका इतिहास दिया है. अत: टोनी मॉरीसन और उनके लेखन के विषय में बात करने से पहले यदि अफ्रीकन-अमेरिकन के विषय में थोड़ी चर्चा कर ली जाए तो बेहतर होगा. हम मॉरीसन की रचनाओं के कथानक, उनकी भाषा की विशेषताओं उनके उनकी शैली, उनके निहितार्थ को ज्यादा अच्छी तरह समझ पाएँगे.

अमेरिका में प्रारम्भ से, कोलम्बस द्वारा उसकी खोज के समय से अश्वेत गुलाम रहे हैं. 1513 में जब स्पैनिश अन्वेषक वास्को न्युनेज ड बाल्बोआ प्रशांत महासागर के तट पर पहुँचा और उसने स्पैन के लिए भूमि अधिकृत की जो आज पनामा कहलाती है तो उसके संग अश्वेत गुलाम थे. जब हरमन कोटर्स ने मैक्सिको को जीता तब भी वे उसके संग थे. 1532 में फ्रांसिस्को पिजार्नो की पेरु जीत में वे थे. स्पैनिश-अफ्रीकन को लैडिनस कहा जाता था. परंतु 1518 में अमेरिकन सीधे अफ्रीका से गुलाम लाने लगे. स्पैन के चार्ल्स प्रथम ने इसकी अनुमति दे दी थी. 1530 तक पुर्तगाली ब्राजील में अफ्रीकन गुलामों का उपयोग करने लगे थे. 1870 तक दस मिलीयन अफ्रीकी लोग जबरदस्ती गुलाम बना कर अमेरिका लाए जा चुके थे. तम्बाकू, गन्ना, कॉफी, कपास, नील, चावल की खेती के लिए मजदूरों की आवश्यकता थी, खदानों से सोना तथा अन्य धातु निकलने के लिए हाथ चाहिए थे और जंगल को जीतने, साफ करने के लिए भी लोगों की जरूरत थी. अमेरिका में आदिवासी थे पर वे अफ्रीका के लोगों की तरह मलेरिया तथा पीले बुखार के प्रतिरोध की क्षमता नहीं रखते थे, साथ ही वे आसानी से हाथ नहीं आते थे. जरूरत पड़ने पर ये बराबरी से लड़ते थे और यह उनका अपना देश था वे इसके चप्पे-चप्पे से परिचित थे अत: उनका पीछा करना अमेरिका में अवसरों की खोज में आए यूरोपियंस के लिए आसान न था. कितनी विचित्र बात है जो एक कौम के लिए अवसरों की भूमि सिद्ध हुई वही दूसरी कौम के लिए गुलामी का पट्टा लिखा लाई, वह भी पीढ़ी दर पीढ़ी के लिए.

और कैसे लाए जाते थे ये लोग? इन्हें पहले तो पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका से, बाद में दक्षिणी अफ्रीका से

जानवरों की तरह शिकार कर, हाँक कर लाया जाता था. अफ्रीका के अधिकांाश कबीले शांत प्रकृति के थे अत: कबीलों के सरदारों को शराब एवं हथियार दे कर गोरों ने उनमें फूट डलवाई और इस षडयंत्र का शिकार होने के बाद कुछ अपने ही देशवासियों को गुलाम बनाने के लिए बिचौलियों का काम करने लगे. एक और बात थी ये कबीले वाले यदि युद्ध के दौरान किसी को पकड़ कर गुलाम बनाते भी थे तो उनकी प्रथा के अनुसार गुलाम को परिवार का सदस्य माना जाता था और उसे शादी करने, सम्पत्ति रखने तथा अन्य अधिकार प्राप्त होते थे. काफी समय तक वे इसी भ्रम में रहे कि जिन अफ्रीकन को अमेरिकन गुलाम बना कर ले जाते हैं वे भी इन्हीं सब सुविधाओं के साथ अमेरिका में रहते होंगे. उन्हें ज्ञात नहीं था अमेरिकन अपने गुलामों को कैसे रखते हैं क्योंकि उन दिनों यातायात की सुविधाएँ नहीं थीं न संचार के साधन थे जो एक बार अमेरिका गया सो सदा के लिए गया. अमेरिकन के लिए गुलाम उसकी सम्पत्ति होते थे जिसके जितने अधिक गुलाम वह उतना सम्पत्तिशाली. और कैसे रखते थे वे अपने गुलाम? दड़बों में बन्द करके, हथकड़ी बेड़ी डाल कर सारे गुलामों को जिनकी संख्या दो चार से लेकर सैंकड़ों तक हो सकती थी एक साथ जंजीर से बाँध कर. दिन रात जिन्हें चाबुक से हाँका जाता था. बात-बात पर जिनकी चमड़ी उधेड़ डाली जाती थी. टोनी मॉरीसन के उपन्यासों में ये बातें आई हैं. सजा के तौर पर गले में लोहे का घेरा, कान में कील से ठोंक कर लकड़ी का पट्टा, मुँह में लोहे की रॉड रख कर जाबी लगाना, और बधिया करना सामान्य बात थी. सजा के लिए मालिक की शराब से एकाध घूँट पी लेना, आदेश को देर से पूरा करना, झूठ बोलना अथवा मालिक का मन करना ही काफी था. अक्सर गुलामों की पीठ का माँस और चमड़ी मार के कारण लोथों में लटकती रहती थी. बिलवड की नायिका सेथे की पीठ पर कोड़ों के इन्हीं निशानों के गर्दन से नितम्ब तक पेड़ उग आए हैं. और खाने के लिए मिलता था मात्र उबला हुआ ओल (जिमीकन्द) तथा आलू.

कोई भी स्वतंत्र चेतना अपनी इच्छा से अपनी खुशी से गुलाम बनना नहीं चाहती है. उनकी अस्मिता को नष्ट करने का, उनकी पहचान को समाप्त करने का काम अफ्रीका में ही प्रारम्भ हो जाता था. अमेरिका के लिए निकलने वाले जहाजों के पास लाकर उन्हें झुंड में रख दिया जाता. चलने से दो दिन पहले उनके सिर पूरी तरह से मूढ़ दिए जाते, उनके कपड़े पूरी तरह से उतार दिए जाते इन सबमें स्त्री पुरुष का भेद नहीं किया जाता था. और प्रत्येक को उसके खरीददार की सील के ठप्पे से गाल पर दाग दिया जाता. अब सब बराबर थे. ना उनका कोई नाम होता न कोई अन्य पहचान. वे मात्र जिंस होते, अपने मालिक की सम्पत्ति. स्त्रियों-बच्चों को डेक पर रखा जाता सब तरह का मौसम नंगे शरीर पर झेलने के लिए और पुरुष नीचे जहाज के काम में ढकेल दिए जाते. उन्हें बोलने-बतियाने की न तो हिम्मत होती, न छूट. हंटर सदा तैयार रहता. किसी व्यक्ति के आत्मसम्मान को तोड़ने के लिए उसको नष्ट करने के लिए और क्या करना होगा?

धर्म, न्याय, नीति, आर्थिक स्थिति, विज्ञान तथा राजनैतिक परिस्थितियाँ सब अश्वेतों के विरुद्ध थे. उन्हें कई स्तरों पर तोड़ा जाता था मसलन कठोर अनुशासन, उनके अपने प्रति हीन भावना, श्वेत लोगों की उच्च शक्ति में विश्वास, मालिक के स्तर की अनुकूलता और एक गहन हीन भावना कि वे बेचारे हैं, श्वेतों पर निर्भर हैं, बेसहारा है, आदि आदि. उन्हें गोरों के मूल्य कंठस्थ करा देना गुलामों की शिक्षा थी. एक गणना के अनुसार करीब 30 मिलियन लोग गुलाम व्यापार के लिए अफ्रीका से उजाड़े गए जिसमें से करीब पचास प्रतिशत अमेरिका पहुँचने के पहले ही समाप्त हो गए. स्कॉटिश दार्शनिक डेविड ह्यूम मानता था कि काले लोगों में ओराँगुटान जितनी ही बुद्धि होती है. सेंट सीमोन नस्ल की असमानता पर विश्वास करता था. कई वैज्ञानिकों का मानना था कि काले लोग जैविक रूप से गोरों से निकृष्ट होते हैं. अगस्ट काँट जो कि सेंट सीमोन का शिष्य और प्रसिद्ध समाजशात्री मानता है कि गोरों की उच्चता अवश्य उनकी दिमागी संरचना में है. बाइबिल भी गुलामी की प्रथा के पक्ष में है. हालाँकि बाद में कई स्थानों पर इंग्लैंड की भाँति ईसाइयत स्वीकार करने से गुलामी से मुक्ति मिलने लगी थी. बाद में कहीं-कहीं पर आजादी खरीद भी सकते थे. बिलवड की बेबी सग्ग का बेटा हाल अपनी माँ के लिए आजादी खरीदता है पर खुद कभी गुलामी से नहीं छूट पाता है. एक गोरा जब भी चाहे, जहाँ चाहे किसी भी गुलाम स्त्री पुरुष से यौन सम्बंध कायम कर सकता था. सेथे और बेबे सग्ग भी नहीं जानती हैं कि उनके किस बच्चे का पिता कौन है. पर कोई श्वेत स्त्री किसी गुलाम से सम्बंध नहीं बना सकती थी. इस मामले में अमेरिकन स्त्री पुरुष के लिए अलग-अलग मूल्य एवं नियम थे. गोरे अमेरिकन गुलाम के साथ अमानुषिक व्यवहार करके भी कानून के घेरे के बाहर रहते थे क्योंकि माना जाता था कि कोई भी अपनी सम्पत्ति नष्ट नहीं करना चाहता है और अफ्रीकन गुलाम गोरों की सम्पत्ति हैं अत: अमेरिकन उन्हें हानि पहुँचा ही नहीं सकते हैं. बेबी सग्ग के साठ साल की गुलामी और दस साल के स्वतंत्र जीवन का निचोड़ है,' दुनिया में गोरों के अलावा कोई दुर्भाग्य नहीं है. क्योंकि 'वे नहीं जानते हैं कब रुकना है.

मनुष्य में स्वतंत्रता के प्रति असीम लालसा होती है. अमेरिका में गुलामों को जानवर से भी बदतर जीवन जीना पड़ता था फिर भी उसकी आजादी की आकांक्षा समाप्त नहीं हुई, इच्छा मरी नहीं. छिटपुट वारदातों को छोड़ दें तो पहला विद्रोह 1661 में वर्जीनिया में हुआ. 1712 में 23 गुलामों ने न्यू यॉर्क में 9 गोरों को मार डाला पर फिर वे पकड़े गए और उन्हें फाँसी दे दी गई. 1831 का नैट टर्नर का विद्रोह इतिहास में सुरक्षित है इस काले गुलाम को इहलाम हुआ कि वह अपने बंधु-बाँधवों के उद्धार के लिए पैदा हुआ है. उसने 21 अगस्त 1831 को पाँच अन्य गुलामों के साथ मिल कर अपने मालिक और उसके परिवार को मार डाला और बगल वाले प्लांटेशंस के 60 गुलामों के संग मिलकर विद्रोह प्रारम्भ कर दिया. पर शीघ्र ही उन्हें दबोच लिया गया और सभी को फाँसी दे दी गई. कई बार विद्रोह प्रारम्भ होने के पहले ही किसी काले गुलाम की धोखेबाजी से काल कवलित हुए, परवान न चढ़ सके. विद्रोहियों अथवा भगोडों की सजा निश्चित थी. पुआल में रख कर जला देना या फिर खुले में फाँसी. जुलाई 1640 में एमैनुआल नाम के एक गुलाम ने भागने की को कोशिश की तो पकड़े जाने पर उसे 30 कोड़े लगे और 'रनअवे के लिए उसके गाल पर सदा के लिए लैटर 'आर दाग दिया गया. एक साल तक उसे बेड़ियों में रह कर काम करना पड़ा. भगोड़ों को शरण देने वालों को भी जुर्माना भरना पड़ता था पर अगर सरकारी तौर पर कोड़े लगाए जा रहें हैं तो कोड़े लगाने वाले काँसटेबल को, प्रति कोड़ा 50 सेंट मिलते थे. यहाँ न्यायाधीश ही अपराधी थे, अपराधी ही न्यायाधीश.

अमेरिका में गुलाम व्यापार कानून द्वारा मान्यता प्राप्त था और जब 1808 में इस व्यापार को कानूनन रोकने की बात हुई तब भी यह मजे में चलता रहा. 1870 में 15 वें संशोधन के द्वारा अमेरिकी संविधान ने अश्वेतों को अमेरिकी नागरिकता दी, तब भी रंग भेद और नस्लवाद कायम रहा. 1955 में एक स्त्री रोजा पार्कर ने एक श्वेत आदमी को अपनी सीट देने से इंकार कर दिया जिसको लेकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने आन्दोलन चलाया तब जाकर ऐसी घटनाएँ कम हुई. पिछली सदी के आठवें दशक में वे फिर उखड़ पड़ी. 1980-90 में टोनी मॉरीसन के बेटों को यह भेदभाव झेलना पड़ा. 1832 में विलियम लॉयोड गैरीसन ने एंटी स्लेवरी सोसाईटी की स्थापना की. गुलामी के खिलाफ आवाज उठाने वालों थियोडोर ड्वयट बेल्ड, आर्दर टैपन तथा लुइस टैपन आदि को दक्षिण अमेरिका में लोग फैनेटिक कहते थे. वैसे तो जब से मानव इस धरती पर आया है गुलामी की प्रथा भी उसी समय से है परंतु अमेरिका में गुलामी अन्य देशों और अन्य समाजों से तनिक भिन्न है. एक समय था जब यहाँ 'प्रत्येक गुलाम अफ्रीकन था और हर अफ्रीकन गुलाम था. नई दुनिया या संभावनाओं के देश अमेरिका में गुलामों का जीवन जानवरों से भी बदतर था.

वाशिंगटन में काले बच्चों के लिए पहला स्कूल 1807 के आसपास बना था. 1949 में मॉरीसन वॉशिंगटन डी सी के अश्वेतों के लिए विशिष्ट कॉलेज हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी गई. उन्होंने न्यू यॉर्क के इथाका में कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से 1955 में एम ए किया. उनकी थीसिस का विषय था 'विलियम फॉक्नर तथा वर्जीनिया वूल्फ के कार्यों में आत्महत्या. वे कई वर्षों से रैन्डम हाऊस की एडीटर हैं. साथ ही प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में फिक्शन राइटिंग पढ़ाती हैं. वे मानती हैं कि लेखन के कुछ पक्षों का शिक्षण किया जा सकता है पर दृष्टि या प्रतिभा जैसी बातें नहीं सिखाई जा सकती हैं हाँ आप सीखने वाले की सहायता कर सकते हैं वे अपने छात्रों के साथ बहुत कठोर व्यवहार करती हैं बहाने नहीं सुनती हैं उनसे खूब मेहनत करवाती हैं. क्योंकि वे एक कुशल और कड़ाई से संपादन करने वाली संपादक हैं. वे लेखक, शिक्षक, संपादक तथा माँ कई भूमिकाएँ एक साथ बखूबी निबाहती हैं.

अश्वेत लोग प्रतिभावान होते हैं यह आज सिद्ध हो चुका है परंतु इसे स्वीकार ने में बहुत समय लगा. 1721 में वनसीमेस ने स्मॉल पॉक्स की दवा खोज निकाली थी और 1809 के आसपास पॉल जेनिंग्स पहला अश्वेत लेखक हुआ था. पिछली सदी में अमेरिकन अश्वेतों ने संगीत, विज्ञान तथा खेलकूद में अभूतपूर्व सफलता दिखाई इसने अश्वेतों के प्रति लोगों का नजरिया बदलने में मदद की. पिछली सदी के दूसरे दशक से ही अश्वेत अमेरिकन अपनी सभ्यता संस्कृति के प्रति रूचि दिखाने लगे थे. 1960 के पहले उपन्यासकार राल्फ एलीसन तथा जेम्स बॉल्डविन और नाटककार लोरीयन हैंसबरी ने नई दिशा दिखाई थी. वे नस्लवाद के विवादास्पद मुद्दों का सामना करने को तैयार थे परंतु साठ के अंत में नाटककार एवं कवि एमिरी बराका ने वास्तव में श्वेत लोगों के मूल्यों का विरोध किया. सातवें और आठवें दशक में एलेक्स हेली, पॉल मार्शल, एलिस वॉकर, ग्लोरिया नेलोर तथा टोनी मॉरिसन ने अश्वेतों के अनुभवों को परिभाषित और विश्लेषित करने का काम प्रारम्भ किया. पुलित्सर प्राइज प्राप्त नाटककार चाल्स फुलर का 'ए सोल्जर्स प्ले’ (1982) तथा अगस्त विल्सन का 'फेन्सेस’ (1985) इन्हीं कथानकों पर आधारित हैं. गेंडोलिन ब्रूक्स, माया एंजलो, निक्की गिओवानी जैसे कवियों ने अश्वेतों की भावनाओं को वाणी दी. इसी तरह ऑपेरा स्टार लिओनटिन प्राइज, डाँस कोरिओग्राफ एल्विन ऐली, फिल्म निर्माता गोर्डन पर्क्स, मेल्विन वान पीबल, स्पाइक ली, चित्रकार रोमरे बीयर्डन, जैकब लॉरेंस एवं बेंनी एंड्रूज आदि ने अपने-अपने ढंग से अश्वेत सांस्कृतिक दाय को प्रदशत करने की कोशिश की है.

1987 में लिखे 'बिलवड’ के लिए मॉरीसन को 1988 में पुलित्जर पुरस्कार मिला. परंतु आसानी से नहीं यह तब मिला जब इसके लिए अड़तालिस अश्वेत लेखकों ने हस्ताक्षर के साथ एक खुला पत्र द न्यू यॉर्क टाइम बुक रिव्यू में प्रकाशित करवाया. उन लोगों ने प्रतिरोध जताया कि मॉरीसन को कभी भी पुलित्जर अथवा नेशनल बुक अवॉर्ड से नहीं नवाजा गया है. फिर भी इसे 1987 का नेशनल बुक एवॉर्ड नहीं मिला. गुलामों के साथ इतना अमानुषिक अत्याचार होता था कि वे आत्महत्या करने का प्रयास करते और कभी-कभी अपनों की हत्या भी. सोचा जा सकता है कि क्या हुआ होगा जब एक गुलाम स्त्री ने कूद कर जान देनी चाही पर मरी नहीं केवल उसकी कमर और हाथ-पैर टूट गए. बिलवड की कहानी एक अश्वेत अमेरिकन गुलाम स्त्री की सच्ची कहानी से प्रेरित है. यह स्त्री मार्ग्रेट गार्नर गुलाम थी और वह केनटकी प्लांटेशन में अपने पति के साथ काम करती थी वहाँ से वह अपने पति रॉबर्ट के साथ भाग निकलती है और ओहिओ में शरण लेती है. 1850 के कुख्यात फ्युजिटिव स्लेव एक्ट के तहत गुलामों का मालिक उन्हें पकड़ लेता है तब मार्ग्रेट अपनी संतान को गुलामी से बचाने के लिए स्वयं उन्हें मार डालती है. यही अपने बच्चे की हत्या 'बिलवड’ कहानी का मुख्य बिन्दु है. मॉरीसन को पहले लगता था कि यह कहानी लिखी ही नहीं जा सकती है पर वे इस बात से परेशान और चिढ़ी हुई तथा चिंतित थी कि ऐसी कहानी कला की पहुँच के बाहर कैसे रह सकती है. बिलवड की नायिका सेथे अपने चारों बच्चों को मारने का प्रयास करती है परंतु असफल रहती है. वह मात्र अपने एक शिशु को जिसका अभी नामकरण भी नहीं हुआ था को ही मार पाती है. बाद में वह शिशु के कब्र के पत्थर पर मात्र बिलवड ही लिखवा पाती है डीयर शब्द लिखवाने के लिए उसके पास पैसे नहीं होते हैं. बाद में वह जिस घर में रहती है उसका यही शिशु उसकी किशोर बेटी बिलवड के रूप में उसके पास रहने आती है और उसके घर को भूत के उत्पात से भर देती है. वे लिखती हैं ''कौन सोच सकता था कि एक छोटा बच्चा इतना उत्पात मचा सकता है? 1998 में इसी पुस्तक के आधार पर जोनाथन डेम ने स्पेशल इफेक्ट का बड़ी खूबसूरती से प्रयोग करते हुए इसी नाम से एक फिल्म बनाई. टीवी पर प्रसिद्ध ओपरा विनफ्रे ने नायिका सेथे की भूमिका निभाई. फिल्म की कहानी लिखने में अकोसुआ बुसिया, रिचर्ड लाग्रेवेंस तथा एडम ब्रूक्स तीन-तीन लेखकों ने मेहनत की. पूरी फिल्म में संगीतकार रेचल पोर्टमैन ने एकाकी रुदन का स्वर भर कर फिल्म को विशिष्ट बना दिया है. पूरी फिल्म में बिलवड छाई हुई है. ओपरा विनफ्रे के लिए अभिनय का यह खास अनुभव रहा और उन्होंने फिल्म के प्रचार-प्रसार में अपना पूरा प्रभाव लगा दिया था.

पॉल डी जिसे सेथे गुलामी के दिनों से जानती थी उससे मिलता है और वह बिलवड के भूत को कुछ समय के लिए भगा पाने में सफलता है. वह मानता है कि जो औरत कभी गुलाम थी उसके लिए किसी भी चीज को इतना ज्यादा प्यार करना ठीक नहीं है. सबसे अच्छा है बस थोड़ा-सा प्यार करना, सब कुछ बस जरा-सा, अत: जब कमर तोड़ दी जाए तब भी अगले के लिए थोड़ा-सा प्रेम बच जाए. पर समय बीतने के साथ बिलवड पॉल डी को लुभाती है वह बहुत उग्र हो जाती है. सेथे की जीवित बेटी किशोर डेनवर घर छोड़ देती है. सेथे नंगी गर्भवती बिलवड के साथ खेत में मिलती है. इसी समय जादू टूटता है और बिलवड गायब हो जाती है. पॉल डी सेथे की देखभाल करने लगता है. कहानी का अंत विशिष्ट है. घटनाओं की आवृति मॉरीसन की विशेषता है यहाँ भी वह होता है पर उनके उपन्यासों में आवृति कभी भी ज्यों-कि-त्यों नहीं होती है. कहानी के अंत की ओर जब फिर से सेथे को श्वेत आदमी का सामना करना है तो इस बार वह अपने बच्चों को नहीं मार कर उस श्वेत के प्रति आक्रामक हो उठती है. जो उसके बच्चों को हानि पहुँचाने आ रहा था.

इस आलेख की सीमा है इस कारण इसमें टोनी मॉरीसन के दो उपन्यासों 'बिलवड’ तथा 'पैराडाइज’ को खास तौर पर लेकर अफ्रीकन-अमेरिकन उपन्यास साहित्य को समझने का प्रयास किया गया है. आलोचकों और लेखकों का रिश्ता बड़ा अजीब-सा होता है यदि आलोचक लेखक के कैलीबर का है तो दोनों को एक दूसरे के विकास में योगदान कर सकते हैं अन्यथा नुकसान होने की गुंजाइश ज्यादा रहती है. मॉरीसन नहीं सोचती हैं कि वे आलोचकों से बच सकती हैं, वे मानती हैं कि उनकी बातें सुननी चाहिए. वे जानती हैं कि कुछ लेखकों को आलोचकों की बात सुनना नहीं जँचता है. अगर वे आलोचकों को सुनते भी हैं तो छान कर. अच्छा-अच्छा गप, कडुआ-कडुआ थू. मॉरीसन इस प्रकार की चुनी हुई आलोचना में विश्वास नहीं करना चाहती हैं. वे जानना चाहती हैं कि उनका देश अफ्रीकन-अमेरिकन साहित्य के विषय में क्या सोचता है, उसे किस दृष्टि से देखता है. वे इसमें रूचि रखती हैं कि अश्वेत लेखन के विषय में आलोचक क्या लिखते-कहते हैं इसे कैसे देखते हैं. अफ्रीकन-अमेरिकन लेखन एक लम्बा संघर्ष रहा है बहुत कठिन है और अभी बहुत और काम होना बाकी है. वे खास तौर से जानना चाहती हैं कि स्त्रियों के द्वारा रचा साहित्य किस नजर से देखा, परखा, समझा जाता है. और इसको जानने का सर्वोत्तम तरीका उन्हें अपने काम की आलोचना पढ़ना लगता है. वे अपने काम की समीक्षा इसलिए नहीं पढ़ती हैं कि उन्हें उससे लिखने का गुर मिलेगा, वे दूसरों के दृष्टिकोण से नहीं लिखना चाहती हैं पर इसलिए पढ़ती हैं क्योंकि वे जानना चाहती हैं कि वे जो कहना चाहती थीं उसमें उन्हें कितनी सफलता मिली है. वे अपने काम का जवाब जानना चाहती हैं और आलोचकों ने उन्हें निराश नहीं किया है. यू एस ए टुडे के डेड्रे डोनाहु के अनुसार ''कोई इतना समृद्ध नहीं लिखता है जितना टोनी मॉरीसन ... और कोई इतनी जादूई तरीके से अश्वेत समुदायों का आवाहन करती है लोगों, सम्बंधों, बातों, गढ़े हुए अमर्षों और गुप्त इतिहासों को. एक और आलोचक उनकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं ''साँस रोकने वाला, जोखिम उठाने वाला प्रमुख कार्य पाठक जिसका उत्तेजना, व्यग्रता और भयभीत हो कर पन्ने पलटेगा. बहुत कौतुकपूर्ण और मजेदार बातें भी उन्हें अपनी समीक्षा के बारे में पढ़ने को मिलती हैं. अफ्रीकन-अमेरिकन साहित्य की समीक्षा के लिए एक अलग सौंदर्य-शास्त्र की आवश्यकता है. अलग औजार, भिन्न उपकरण चाहिए. उसे अलग मानदंड से ही परखा जाना चाहिए तभी उसके संग न्याय हो सकेगा.

सब प्रकार के साहित्य की आलोचना एक तरह से नहीं की जा सकती है. सब को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता है. जैसे नारी और दलित के लिए अलग समीक्षा शास्त्र की आवश्यकता है, वैसे ही अमेरिकी साहित्य की समीक्षा के लिए भी अन्य उपकरण चाहिए. जिन उपादानों से अमेरिकी साहित्य की समीक्षा हो सकती हैं उन्हीं औजारों, उन्हीं कसौटियों, उपकरणों पर अफ्रीकन-अमेरिकन साहित्य को नहीं कसा जाना चाहिए है. इसीलिए कई बार मॉरीसन के साहित्य की उचित समीक्षा नहीं हो पाती है और वे इससे परेशान हो जाती हैं. उनकी बिलवड के समय उनकी पुस्तक की तुलना एक टीवी सीरियल से की गई थी जो कि एक अश्वेत परिवार के विषय में था. इसी तरह से एक बार उनकी तुलना दो अन्य अश्वेत लेखकों से कर दी गई. उन्हें समीक्षक की बुद्धि पर तरस आया, गुस्सा भी क्योंकि ये तीनों लेखक एक दूसरे से बिल्कुल अलग तरह के लेखन की शैली और विधा के थे. आलोचक ने बिना सोचे समझे जाने बिना उन्हें एक ही लाठी से हाँक दिया. केवल इसलिए कि वे सभी अश्वेत लेखक थे. और समीक्षक वहीं नहीं रुका उसने तीनों किताबों में से एक को सर्वोत्तम साबित कर दिया केवल इसलिए क्योंकि उसमें उस समीक्षक को 'वास्तविक अश्वेत लोग नजर आए. उपन्यास सदा से उनके लिए जिज्ञासा का विषय रहे हैं. जब उनके एक उपन्यास की द न्यू यॉर्क टाइम्स में समीक्षा हुई तो उन्हें बड़ी निराशा हुई क्योंकि समीक्षक ने बिना पुस्तक पढ़े समीक्षा की थी. इसे मॉरीसन अपने लिए अपमान मानती हैं. यह उन्हें गहराई तक व्यथित करता है. ज्यों-ज्यों मॉरीसन लिखती गई आलोचकों का नजरिया उनके प्रति बदलता गया. अब वे अधिक बौद्धिक ढंग से उनकी समीक्षा करते हैं, शुरुआत में ऐसा नहीं था. वे समलिंगी साहित्य, अश्वेत साहित्य, अश्वेत महिला साहित्य सबके प्रति बहुत आशावान हैं. धीरे-धीरे यह बात समीक्षकों की समझ में भी आने लगी है. नई कसौटियाँ बनने लगीं हैं. उनकी एक और विशेषता है, एक रचनाकार के रूप में वे अपने लेखन से कभी भी संतुष्ट नहीं हैं हमेशा लगता है कुछ और सुधारा जा सकता है यहाँ ऐसे लिखना चाहिए था वहाँ यह जोड़ना-घटाना चाहिए था.

वाद व्यक्ति को संकुचित कर देता है उसके नजरिए को तंग करके रंग देता है, यदि वह लेखक है तो वाद का माउथपीस बन कर रह जाता है. मॉरीसन किसी वाद में विश्वास नहीं करती हैं खास तौर पर नारीवादी लेखन के ठप्पे को तो बिल्कुल भी नहीं स्वीकारती हैं. जब उनके उपन्यास पैराडाइज पर समीक्षकों ने नारीवाद की मुहर लगाई तो उन्होंने बड़े जोर से इसका प्रतिवाद किया. इसका खंडन करते हुए उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा, ''बिल्कुल नहीं. मैं कभी भी किसी 'वाद में नहीं लिखुँगी. मैं 'वाद के उपन्यास नहीं लिखती हूँ. उन्हें लगता है कि वाद बाँधते हैं, बन्द करते हैं और वे स्वतंत्र रहना चाहती हैं. उनका कहना है कि अब तक जो भी मैंने लिखा है वह विस्तार के लिए लिखा है. अक्सर द्वार खोलने के लिए लिखा है. यहाँ तक कि वे किताब का अंत भी ऐसा रखती हैं कि उसमें पुनर्व्याख्या, पुनरागमन की गुंजाइश रहती है. वे जानबूझ कर थोड़ी-सी जगह, तनिक-सी अस्पष्टता छोड़ती हैं. मॉरीसन का कहना है कि वे 'पितृसत्तात्मकता को मान्यता नहीं देती है इसका मतलब यह नहीं कि मातृसत्तात्मकता को माना जाए. मातृसत्तात्मकता उसका स्थानापन्न नहीं हो सकता है. बहुत से आलोचक चाहते हैं कि मॉरीसन अश्वेतों के बारे में वही लिखें जो उन लोगों ने सुन रखा है 'मसलन सब ठीक हो जाएगा. किसी को दोष नहीं दिया जा सकता है, आदि, आदि. पर वे एक अन्वेषी हैं, वे किसी को दोष नहीं देती हैं मात्र अपलक देखना चाहती हैं कि चीजें अतीत में कैसी थीं, वे लोग जैसे अब रह रहें हैं उसमें अतीत की उन सब बातों, उन सब चीजों का कितना हाथ है. उपन्यास उनके लिए सदा एक खोजबीन का विषय रहा हैं. मॉरीसन को अफसोस है कि अधिकांश लोग कहानियों को सरल रेखीय देखना चाहते हैं जैसा कि अब बहुत से टीवी सीरियल में दिखाया जाता है. जबकि वे मानती हैं कि जीवन सरल रेखीय नहीं होता है. हम जीवन को वर्तमान के क्षण में, भविष्य के अनुमान लगाने में और बहुत कुछ अतीत के टुकड़ों में अनुभव करते हैं. उन्होंने अपने लेखन के द्वारा अमेरिका के काले अतीत को स्वर देने का प्रयास किया है.

वे स्वयं को नारीवादी नहीं मानती हैं क्योंकि जब वे सयानी हो रहीं थीं लगातार अश्वेत औरतों से घिरी हुई रहती थीं औरतें जो बहुत मजबूत थीं, बहुत आक्रामक थीं और जो सदा सोचती थी कि उन्हें बहुत काम करने हैं, बच्चे पालने हैं और घर चलाना है. ये औरतें अपनी बेटियों से बहुत अपेक्षाएँ रखती थी. इन औरतों का काम मॉरीसन को कभी भी नारीवादी नहीं लगा. उनकी माँ वहाँ के थियेटर में जाती थी खासतौर पर देखने कि श्वेत और अश्वेतों को अलग अलग तो नहीं बैठाया जा रहा है. यह भेदभाव वे औरत या मर्द किसी के संग नहीं होने देती थीं. न अपनी बेटियों के संग न अपने बेटों के संग. ऐसी माँ की बेटी केवल औरतों के लिए कैसे काम कर सकती है? वे कहती हैं कि इसी को बाद में नारीवाद कहा गया. उन्हें नारीवादी परिभाषा से भी परेशानी है. उनका सुला उपन्यास इसी नए विचार पर आधारित है. उनके बचपन में औरतें पुरुष की अपेक्षा औरतों का साथ ज्यादा खोजती थीं. उनकी कुछ महिला लेखक दोस्त हैं पर वे दोस्त हैं इसलिए नहीं कि वे महिला हैं या लेखक है बल्कि इसलिए क्योंकि वे विशिष्ट मनुष्य हैं. उनकी पुस्तकों में नारी पात्र बहुतायत से होते हैं फिर भी वे स्वयं को नारीवादी लेखक मानने से इंकार करती हैं. उनका तर्क है कि कोई सोल्सनिस्त्न पर आरोप नहीं लगाता है कि वे मात्र रूसियों के बारे में क्यों लिखते हैं कोई हेमिंग्वे पर कटाक्ष नहीं करता है, उन्हें पुरुषवादी नहीं कहता है तो स्त्रियों पर लिखने के कारण वे कैसे नारीवादी हो गई.

मॉरीसन का उपन्यास सुला (1973) ओहिओ शहर में रहने वाली दो अश्वेत दोस्तों की कहानी है. शैशव, बचपन किशोरावस्था तथा बाद में भी वे संग रहती हैं परंतु दोनों ने बिल्कुल अलग राह चुनी है. नेल राइट ओहिओ में ही रह जाती है शादी करती है उसके बच्चे होते हैं वह अपने अश्वेत समुदाय की रीढ़ बन जाती है, दूसरी ओर सुला पीस विद्रोह में इन सबको त्याग देती है. वह कॉलेज जाती है और शहर के जीवन में खुद को डूबो देती है. एक विद्रोही, अपने समुदाय का मखौल उड़ाने वाली, बिना नैतिकता के सैक्स का प्रयोग करने वाली के रूप में वह अपनी जड़ों की ओर लौटती है. दोनों के अपने दु:ख हैं, संघर्ष और परेशानियाँ हैं. दोनों अपनी विपरीत जीवन शैली के बावजूद एक- दूसरे से बेहद प्रेम करती हैं. इसमें मॉरीसन दिखाती हैं कि अमेरिकी समाज में एक अश्वेत स्त्री के लिए अस्तित्व बचाए रखने के क्या अर्थ है और उसे इसके लिए कौन-कौन से मूल्य चुकाने पड़ते हैं. इस उपन्यास के लिए उनको नैशनल बुक क्रिटिक्स अवॉर्ड मिला.

शादी के छ: सालों के बाद उनका जमैइकन वास्तुकार हेरॉल्ड मोरीसन से तलाक हो गया. वे दोबारा शादी नहीं करना चाहती हैं पर वे मानती हैं कि विवाह का विचार अच्छा है उन्हें शादी अच्छी लगती है. उनके अनुसार बच्चों के लिए दोनों अभिभावक होने चाहिए. अकेला रह जाना भयानक है वे भरे-पूरे संयुक्त परिवार की पक्षधर हैं. हर अनुभव व्यक्ति को कुछ न कुछ सिखा जाता है. उन्होंने शादी से भी सीखा पर तलाक ने भी उन्हें बहुत कुछ सिखाया, मसलन वे क्या-क्या कर सकती हैं, कौन-कौन-सी जिम्मेदारी उठा सकती हैं. इससे उनके व्यक्तित्व में कटुता नहीं आई है. तलाक उन्हें हार नहीं लगता है. एक बार यही बात उन्होंने अन्य तलाक शुदा औरतों से कही और एक-एक करके वे बताने लगीं कि उन्होंने क्या-क्या सीखा है. किसी को इसने बोलना सिखा दिया, किसी को इससे संगठन की कुशलता प्राप्त हुई तो किसी अन्य को घर, बच्चे और जिन्दगी सँवारनी आ गई. खुद टोनी मॉरीसन ने तलाक के कारण ढेर सारा आत्म-गौरव सीखा-पाया. वे मानती हैं कि उन्होंने इसके कारण अपने अधिकारों के प्रति सजग होना सीखा. सो मॉरीसन के अनुसार तलाक का मायने हारना नहीं है इससे कुछ प्राप्त भी होता है. विवाह उन्हें पसन्द है विवाह के विचार को वे मान्यता देती हैं उन्होंने तलाक के बाद भी कभी अपने बच्चों के सामने उनके पिता की निन्दा नहीं की क्योंकि वे मानती हैं कि यह उनका आपसी सम्बंध है.

उनकी पुस्तक 'द ब्लूएस्ट आई (1970) एक छोटे से समुदाय की कहानी है इसके सारे पात्र अश्वेत हैं उन्होंने 1966 में लेखकों की एक ग्रुप के लिए एक कहानी लिखी थी यह उसी का विस्तार है. इस समूह से वे तब जुड़ी थी जब छ: साल के बाद उनका विवाह टूट गया था. इस उपन्यास की मुख्य पात्र अश्वेत पेकोला ब्रीडलव रोज रात को अभिनेत्री शिर्ली टेम्पल की नीली ऑंखे पाने के लिए प्रार्थना करती है. उसका विश्वास है कि यदि उसे नीली ऑंखें मिल जाएँ तो उसके साथ सब कुछ ठीक हो जाएगा. उसके ग्यारह बरसों के जीवन में किसी ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया है वह सोचती है यदि उसे नीली ऑंखें मिल जाएँ तो सब बदल जाएगा. वह इतनी सुन्दर बन जाएगी कि उसके माता-पिता आपस में लड़ना बन्द कर देंगे, पिता पीना बन्द कर देगा, उसका भाई घर छोड़ कर भागना बन्द कर देगा. बस वह सुन्दर हो जाए नीली ऑंखों के साथ और सब उसकी ओर देखने लगें. कथावाचक क्लॉडिया मैक्टीर पेकोला के नष्ट होते जाने की प्रक्रिया समझने का प्रयास करती है.

1977 में एक परिवार की गाथा 'साँग ऑफ सोलमन आया जिसकी तुलना अलैक्स हेली के 'द रूट्स से की जाती है. इसके साथ ही मॉरीसन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हो गई. क्षह 1949 में अश्वेत लेखक रिचर्ड राइट के नेटिव सन के बाद बुक ऑफ द मंथ क्लब के लिए इतने वर्षों के बाद चुनी जाने वाली किसी अश्वेत लेखक की रचना थी. यह कहानी उन्होंने पुरुष के दृष्टिकोण से लिखी है कहानी मिल्कमैन डेड के प्रयास का वर्णन है जो अपनी प्राचीन की सम्पत्ति थैली में छिपे सोने को वापस प्राप्त करने का संघर्ष है. सॉँग ऑफ सोलोमन उनकी सबसे सरल पुस्तक मानी जाती है पर वह भी कुछ लोगों को कठिन लगती है. साँग ऑफ सोलमन में मैकन डेड जो अब उत्तर में एक उच्च श्रेणी का व्यापारी है अपने दक्षिणी मजदूर वर्ग के अतीत को छिपाने और अपने परिवार को खतरों एवं हताशा से बचाने के लिए अपने पड़ोसी से दूर-दूर रहता है. परंतु उसका बेटा मिल्कमैन डेड उसकी आशा के ठीक विपरीत हथियारों, निम्न वर्ग की स्त्रियों के साथ रहता है.

जिस कथानक को लेकर बिलवड रचा गया है उसके लिए उपन्यास की परम्परागत शैली काफी नहीं है. अत: इसे इस ढंग से लिखा गया है मानो 'एक आईना गिर कर चूर-चूर हो गया हो और हर टुकड़ा और हर आकृति पाठक को उठा कर जोड़नी है. इसमें बेबी सग्ग है जिसके पैर, पीठ, सिर, ऑंखें और हाथ, किडनी, गर्भ तथा जीभ सबको गुलामी ने कुचल डाला है, नष्ट कर दिया है, अत: वह मात्र अपने हृदय के सहारे जीती है. पॉल डी सेथे को जो बताना चाहता है वह बता नहीं पाता है क्योंकि उसके मुँह में लोहा भरा हुआ था. गुलामों के साथ इतना अमानुषिक व्यवहार होता था कि वे हताशा में आत्महत्या पर उतारू हो जाते थे. अपने आप और अपनों को मार कर मुक्ति की राह पाना चाहते थे सेथे भी अपने बच्चों को गुलामी से बचाने के लिए मार डालने की कोशिश करती है यह दीगर है कि अपने चार बच्चों में से वह केवल एक शिशु की हत्या कर पाती है. इतिहास के ऐसे क्रूर अनुभवों के लिए उपन्यास की एक विशिष्ट शैली ईजाद करना आवश्यक था और मॉरीसन ने यही किया है.

1992 में लिखा गया 'जाज’ मॉरीसन का ऐसा उपन्यास है जिसमें वियोलेट का अविश्वासी पति जो अपने आवेग के हाथों मजबूर हो कर डोरकास को मर डालता है. पूरे उपन्यास में टुकड़ों में हत्या के क्रम और कारण को वर्णित किया गया है. अपने नोबेल प्राइज के बाद 1998 में मॉरीसन ने पैराडाइज लिखा. यह कहानी है ओक्लाहोमा के रूबी नामक शहर की, 360 जनसंख्या वाले एक छोटे से समुदाय की. जिसका इतिहास बड़ा जटिल है गुलामी, शिकार, पूर्वाग्रह आदि से भरा हुआ. पूर्व गुलाम स्वयं शिकार में जुटे हैं. यह उन वास्तविक शहरों की कहानी है जहाँ केवल और केवल अश्वेत लोग रहते हैं पिछली सदी के आठवें दशक तक ऐसे शहर अमेरिका में अस्तित्व में थे. शायद आज भी हैं. एक समय का 'द कॉन्वेंट’ के नाम से जाना जाने वाला लड़कियों का स्कूल अब अत्याचारी पतियों, प्रेमियों तथा सताए गए विगत से भागी हुई स्त्रियों की शरणस्थली है. इस शरणगाह पर नौ पुरुष आक्रमण करते हैं. इसमें मॉरीसन बड़ी सहजता से कई युगों में आती जाती हैं और अश्वेत की पृष्ठभूमि, उनकी आपसी लड़ाई, आर्थिक झगड़ों, पूर्वजों की शत्रुता आदि का अन्वेषण करते हुए केवल अश्वेत के नगर रूबी और मात्र औरतों के कॉन्वेंट का विश्लेषण करती हैं. वे जानना चाहती हैं कि पुरुष क्यों अपने पितृसत्तात्मक स्वर्ग से स्त्रियों (डायनों) को जड़ से समाप्त कर देना चाहते हैं. अमेरिका के सेलम में यही हुआ था जिसने नथैनियल हॉथर्न को स्कारलेट लैटर लिखने को प्रेरित किया. हमारे देश में खासतौर पर छोटानागपुर में तथाकथित डायन के नाम पर स्त्रियों को समाप्त करने के विषय में भी यह प्रश्न बड़ा महत्वपूर्ण है. क्यों किया जाता है ऐसा?

स्वर्ग कहाँ है? और कौन इसका निवासी होता है? आदि बातों के उत्तर खोजता यह पूरा उपन्यास पैराडाइज इसी विचार के इर्द-गिर्द बुना गया है. द न्यू यॉर्क टाइम्स को दिए एक साक्षात्कार में उनका कहना है कि 'सभी स्वर्गों का वर्णन पुरुष परिक्षेत्र के रूप में होता है जबकि स्त्री बिना सुरक्षा के और खतरा तथा हस्तक्षेप करने वाली, दखलन्दाजी करने वाली होती है. ऐसी मानी जाती है और जब हम एक जुट हो कर शक्तिशाली होती हैं तब हम पर आक्रमण होते हैं. उन्होंने यह खूब रिसर्च करके, इतिहास का अध्ययन करके यह उपन्यास लिखा है. अमेरिका में गुलामों की लूसीयाना और मिसीसिपी से ओक्लाहोमा की यात्रा एक ऐतिहासिक सत्य है. जहाँ उन लोगों ने पूरे-पूरे शहर बसाए, चर्च, बैंक दुकानें खोलीं. इस कथा में कोई भी पात्र कहानी के अंत तक नहीं मरता है. मॉरीसन मानती हैं कि सारे स्वर्ग, सारे यूटोपिया उन लोगों के द्वारा निर्मित होते हैं जो वहाँ रहते नहीं हैं. ऐसे लोग जिन्हें वहाँ प्रवेश की इजाजत नहीं होती है. एकाकीपन, अलगाव सदा से यूटोपिया का हिस्सा रहा है. यह मॉरीसन का अपना विशिष्ट तरीका है स्वर्ग के विचार को जानने-समझने का, सुरक्षित स्थान, जहाँ सब कुछ इफरात में है, जहाँ कोई आपको हानि नहीं पहुँचा सकता है, इसकी खोजबीन करने का. इसे वे अपना तप मानती हैं. पर इन सबके साथ यह स्थान सबसे विलग है. सबसे अलग-थलग है. वे यह भी मानती हैं कि पृथकता में स्वयं को नष्ट करने के बीज भी छुपे होते हैं क्योंकि समय के साथ अन्य बातें इसमें छन कर आती जाती हैं, वे समय के साथ बदलने से इंकार कर देते हैं. वे सब चीजों को दूर रखना चाहते हैं और इसी कारण स्वर्ग का नाश होता है.

रूबी एक ऐसा स्वर्ग है जिसे प्रवास के लिए केवल अमेरिकन केवल अफ्रीकन अमेरिकन ही नहीं खोज रहें हैं. अफ्रीकन ने, उन्होंने अपना देश अपना घर छोड़ा है सो वे दूसरा घर खोज रहे हैं. दूसरे, अमेरिकन भी यही कर रहे हैं. मगर दूसरों ने अपना घर छोड़ा है क्योंकि अब वे वहाँ नहीं रहना चाहते हैं या वहाँ अब वे रह नहीं पा रहे हैं. अफ्रीकन-अमेरिकन के घर खोजने में फर्क है वे ऐसा स्थान खोज रहे हैं जहाँ उनके अपने ही लोग हों, अपनी आदतें हों, अपनी सभ्यता संस्कृति हो. जहाँ वे अपने आप में परिपूर्ण हों. इस दृष्टि से उनका स्वर्ग खोजने का उद्देश्य तनिक अलग है. रूबी के बाहर का कॉन्वेंट एक अलग स्वर्ग है. रूबी का पूरा शासन पुरुषों द्वारा चलाया जाता है जबकि कॉन्वेंट का शासन स्त्रियाँ चलाती हैं स्त्रियाँ जो सताई गई स्त्रियों के द्वारा शसित है. मॉरीसन ने रूबी की पूरी व्यवस्था ओल्ड टेस्टामेंट के आधार पर की है. जो पितृसत्तात्मक है जहाँ पुरुष अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के प्रति बड़े सतर्क हैं. कॉन्वेंट की स्त्रियाँ पुरुषों का साथ नहीं चाहती हैं यहाँ वे आपस में लड़ती झगड़ती हैं पर उन्हें भय नहीं है कि कोई उनका शिकार करेगा. रूबी में प्रोटेस्टेंट धर्म है जबकि कॉन्वेंट में धर्म संगठन पर आधारित नहीं है वह तकरीबन जादू के कगार पर है. दोनों के मूल्यों में आधारभूत भिन्नता है. यहाँ स्त्रियाँ सातवें दशक की हैं जिन्हें परम्परावादी अश्वेत भयंकर मानते थे.

इस उपन्यास का एक पात्र रेवरेंड मैस्नर मॉरीसन के लिए बहुत विशिष्ट है, बहुत अपना है, क्योंकि वह अपने धर्म के सिद्धांतों, नागरिकों के अधिकारों, नागरिकों के अधिकारों के विलय को लेकर बड़े धर्म संकट में है. वह युवाओं के सब कुछ से कट जाने को लेकर भी बड़ा परेशान है, उनके अलग-थलग पड़ जाने से चिंतित है. वह अन्ना केरेनीना के लेव की तरह है, वह भी वैसे ही नैतिकता से उलझा हुआ जैसे लेव. वह बहस के लिए तैयार है. तर्क को महत्व देता है. वह बच्चों की बात सुनने को राजी है. चूँकि यह कहानी धर्म के बारे में है इसलिए वे मानती हैं कि इसका सही ढंग से नहीं अध्ययन किया जाएगा. क्योंकि लोग इन बातों की चर्चा नहीं करना चाहते हैं वे वही पढ़ना चाहते हैं जिसे वे मानते आए हैं खासकर अश्वेत लेखन के बारे में. वे नहीं चाहती हैं कि उनकी पुस्तकें मात्र बिस्तर के सिरहाने की शोभा बन कर रहें वे इन पर लगातार विचार-विमर्श चाहती हैं और उन्हें इंटरनेट पर यह देख कर खुशी हुई कि पाठक इनमें रूचि ले रहें हैं वे इस पर गम्भीर बहस चला रहें हैं. विनफ्रे अपने बुक क्लब में मॉरीसन की पुस्तक की चर्चा करती हैं. वाशिंगटन पोस्ट में 1998 में मॉरीसन ने कहा, ''केवल हम (मनुष्य) स्वर्ग की कल्पना कर सकते हैं, अत: चलो इसकी सटीक कल्पना करें, यह केवल मेरा तरीका, मेरा स्वामी, मेरी सीमाएँ, मेरे मूल्य, और आपको, आपको, आपको दूर रखना नहीं है. केवल हमीं यह कर सकते हैं . अत: इसके बारे में सोचें ... हाँ, स्वर्ग का अवसर बहुत क्षीण है. तो क्या?

मॉरीसन अपने उपन्यास पैराडाइज को वार (युद्ध) नाम देना चाहती थीं परंतु उनके प्रकाशकों नॉफ (Knopf) ने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया प्रकाशकों को डर था कि इस नाम से मॉरीसन के पाठक उनसे विनुख हो जाएँगे. आज भी मॉरीसन को लगता है उपन्यास को वार के स्थान पर पैराडाइज नाम देना ठीक नहीं हुआ. मॉरीसन के लेखन पर मार्केस के जादूई यथार्थ और फॉक्नर के परत-दर-परत कथानक की शैली का गहरा प्रभाव है. उन पर राजनीति से प्रेरित होने का आरोप लगाया गया, जब कि वे स्वयं ही इस बात को मानती हैं कि प्रत्येक कलाकार राजनैतिक होता ही है. वाशिंग्टन पोस्ट में जोनाथन यार्डली ने पैराडाइज पर आरोप लगाया कि पूरे उपन्यास पर मेजर स्टेटमेंट स्पष्ट लिखा हुआ है उसके उत्तर में मॉरीसन ने कहा कि ''मैं विश्वास नहीं करती हूँ कि सच्चा कलाकार कभी भी अराजनैतिक होता है. वे सब भले ही इस उस खास प्रतिज्ञा के प्रति असंवेदनशील रहे हों पर वे सब राजनैतिक थे क्योंकि यही एक कलाकार होता है एक राजनैतिक.

पैराडाइज की भाँति ही 2003 में आया उनका उपन्यास 'लव भी समय में स्वतंत्र रूप से घूमता है. यह बिल कोसी की कहानी है. एक आकर्षक होटल मालिक है जो बरसों पहले मर चुका है परंतु भुलाया नहीं गया है उसकी विधवा और उसकी पोती जो कि उसके महल में रहती हैं वे उसे बराबर याद करती हैं. पूरी कहानी गोथिक शैली में रची गई है. लोग जो षणयंत्र रचते रहते हैं कटु और स्वार्थी स्त्रियाँ, शिकारी पुरुष.

मॉरीसन की एक खास शैली है. 'बिलवड’, 'जाज’ तथा 'पैराडाइज’ अपनी उपन्यास त्रयी में मॉरीसन कहानियों की कई स्तर पर आवृति करती हैं और इस तरह वे इतिहास के आधिपत्य को पुनर्व्याख्यायित करती हैं इस तरह वे बदलाव स्वस्थ होने और सूझ की प्रक्रिया को प्रस्तुत करती हैं. बिलवड में गुलाम सेथे की आजादी मात्र ओहिओ नदी पार करने से नहीं आती है, तब भी नहीं जब वह हताशा में हत्या जैसा जघन्य कार्य करती है. आजादी आती है जब हादसे की आवृति होती है और इस बार एक विशिष्ट बदलाव के साथ. इस बार वह अपने बच्चों के खिलाफ हथियार नहीं उठाती है बल्कि हथियार उठाती है उस गोरे के खिलाफ जो उसके बच्चों के लिए खतरा बन कर आता है. जाज में भी सारा कथानक जाज संगीत की संरचना की तरह दोहराया जाता है यहाँ भी परिवर्तन है और यह परिवर्तन वियोलेट तथा फेलिस का प्रेम, वियोलेट और डोरकास के हत्यारे त्रिकोण से उभरता है. पैराडाइज में फिर हत्या के दृश्य की आवृति होती है. दृश्यों, चरित्रों, और विचार बिन्दुओं की आवृति हर बार एक नए परिवर्तन के साथ पाठक को सारी प्रक्रिया को नए आलोक में देखने के लिए प्रेरित करती है. यदि परिवर्तन के बिना आवृति की जाए तो पूरा वर्णन कितना अर्थहीन हो जाएगा.

पत्रकार एलीजाबेथ फरंसवर्थ मानती हैं कि पैराडाइज में दिखाए गए स्थल कुछ मायनों में बहुत खूबसूरत हैं और कुछ मायनों में बहुत खतरनाक. पैराडाइज की कथावस्तु 1970 में ओक्लाहोमा में काले लोगों के समूह द्वारा बहुत सारी अपनी औरतों को अपने सम्मान को बचाने के लिए मार देने की घटना पर आधारित है. वे सोचते थे कि ये स्त्रियाँ बुरी हैं और इसका असर उनकी नैतिकता पर पड़ता है. यह एक भीतर तक हिला देने वाली मार्मिक कथा है निसन्देह मॉरीसन की रचनाओं में यह एक विशिष्ट स्थान रखती है.

'टार बेबी कहानी है गोरों की संस्कृति द्वारा रची गई एक अश्वेत मॉडल की, उसके और एक काले आदमी के प्रेम की. काला आदमी उन सब बातों का प्रतिनिधित्व करता है जिसे यह मॉडल चाहती भी है और जिससे वह खौफ भी खाती है. इसमें एक अमेरिकन मिलीनितर की ऐय्याशी, से लेकर मैनहट्टन की शालीनता से ले कर दक्षिण अमेरिका की कटु सच्चाइयाँ सब समेटा गया है. इसमें लयात्मक सौंदर्य, अपूर्व आकर्षण के साथ साथ सभी प्रकार अनुभूतियों की छटा है और है अमेरिका में श्वेत अश्वेत सभी के समक्ष विकल्प के खुले बिम्ब प्रतिबिम्ब.

अमेरिकन फुटबॉलर, कई विज्ञपनों में मॉडल, ब्रोडकास्टर और द टावरिंग इनफर्नो, कसाम्डा क्रॉसिंग, तथा द नेकेड गन जैसी फिल्मों का एक्टर ओ जे सिमसन जिस पर 1994 में अपनी पत्नी और एक दोस्त की हत्या का सनसनीखेज केस चला उसके बारे में, उस पर लिखने के बारे में जब मॉरीसन से पूछा गया तो वे कहती हैं कि काले लोगों को सदा से बिना सिर पैर की बातें करने वाला, चालाक, धूर्त, स्टुपिड, परभक्षी, लुटेरा और पागल माना जाता है. वे मानती हैं कि इस केस में बहुत लोगों का स्वार्थ निहित था इसकी सच्चाई कभी बाहर नहीं आई और न कभी आएगी. उन्हें सिमसन का सारा केस एक साजिश लगता है. लोगों के लिए चटखारे ले कर मजा उठाने की कहानी लगता है.

कैसे और कब लिखती हैं टोनी मॉरीसन? जब उनके बच्चे छोटे थे वे एक साथ कई काम कर रहीं थीं. रोज ऑफिस जाना, घर संभालना और लिखना. अब उन्हें लौट कर सोचने पर यह सब थोड़ा पागलपन जैसा लगता है. पर उस समय उन्होंने यह सब एक साथ किया. वे इसे विचित्र नहीं मानती हैं क्योंकि प्रत्येक सामान्य स्त्री यह करती है. कई काम एक साथ. वे भोर में बहुत सुबह और लोगों के उठने के पहले लिखती. रात को वे ज्यादा नहीं लिख पाती. उनकी सृजनात्मकता सुबह अपने चरम पर होती. और वे सप्ताहांत में भी खूब लिखती. इसी तरह जब गर्मी की छुट्टियों में उनके बच्चे उनके अभिभावकों के पास ओहिओ जहाँ उनकी बहन भी रहती है चले जाते तब वे भरपूर लिखतीं. उनके अनुसार यदि समय का संयोजन कर लिया जाए तो यह सम्भव है. समय का उपयोग करना सीखना पड़ता है. बहुत सारे काम करते हुए आप लिखने की योजना बना सकते हैं. कई काम ऐसे होते हैं जिनमें दिमाग लगाने की जरूरत नहीं होती है. अब बच्चे बड़े हो गए हैं जीवन का तरीका बदल गया है, आज भी वे बहुत व्यस्त हैं मगर दूसरी तरह के कार्यों में.

नोबेल पुरस्कार मिलने के ठीक बाद उनके घर में आग लग गई जिसमें उनकी पहले की किताबों की (जब वे हाथ से लिखती थीं) सारी पांडुलिपियाँ जल गई वे सोचती हैं कि उन पांडुलिपियों का उनके लिए कोई महत्व नहीं है क्योंकि वे पुस्तक के रूप में आ चुकी हैं पर शायद औरों के लिए उसका महत्व है. पर उन्हें अपने बच्चों के विभिन्न उम्र के फोटोग्राफ्स, उनके रिपोर्ट कार्डस जल जाने का बड़ा अफसोस है. कुछ पोशाकों कुछ पौधों के जलने का दु:ख है और याद करती हैं एमिली डिकेंसन, फॉक्नरा के प्रथम संस्करण की अपनी कॉपियों अपने ढेर सारे पत्रों के जो इस आग में खाक हो गए. करीब 40 ऐसी किताबें जो उन्हें खासतौर पर प्रिय थीं. इस आग में उनका बहुत कुछ स्वाहा हो गया. पर वे इससे निराश नहीं हुईं.

मॉरीसन ने नोबेल भोज के समय दिए गए अपने वक्तव्य में अपने पूर्ववर्ती और समकालीन लेखकों को याद किया है. कौन-कौन हैं मॉरीसन के प्रेरक व्यक्ति? किन-किन लोगों को वे पढ़ती हैं? किनकी ओर आशा भरी नजरों से देखती हैं? मार्केस का लिखा हुआ सब वे पढ़ती हैं और वे पढ़ती हैं पीटर कैरी, पैन्चोन, जमैइका किन्काइड को. वे ये सब किताबें खरीद कर पढ़ती हैं. वे नेल्सन मन्डेला को बहुत इज्जत देती हैं उनके अनुसार वे एक महान राजनैतिक हैं. वे अफ्रीका जाने को भी बहुत ज्यादा उत्सुक हैं उन्हें दक्षिण अफ्रीका से अनगिनत निमंत्रण मिले हैं. अब तक हो भी आई होंगी मेरे पास इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है. आज की विनी मन्डेला के विषय में वे कुछ नहीं कहना चाहती हैं परंतु पहले की विनी के लिए मॉरीसन के मन में अपार श्रद्धा है. क्योंकि वे पूरी सच्चाई नहीं जानती हैं क्यों लोगों के विचार विनी के विषय में इतने विरोधी हो गए हैं उन्हें विनी के विषय में सच्चाई जानने की उत्सुकता है. वे वास्तविक विनी को जानना चाहती हैं.

मॉरीसन अपना जादू भाषा-प्रेम के द्वारा दिखाती हैं. उनकी शैली पाठक को नदी की तरह बहा कर ले जाती है, सारे भ्रम और अविश्वास को बहाते हुए और पाठक धीरे-धीरे उनके इरादे की गम्भीरता से परिचित होता है. नोबेल पुरस्कार ने उनकी जीवन शैली को बदल दिया उन्होंने एक घर ले लिया पर उनकी कला नहीं बदली. बचपन से ही पढ़ने की आदत थी जिसने अमेरिका के इतिहास से परिचित कराया और कई रचनाएँ इसी इतिहास से निकली. वे जब नोबेल भोज के लिए गई तो उन्होंने अपने से पहले आने वालों को स्मरण किया साथ ही अपने बाद आने वालों को भी वे नहीं भूलीं. जिन लोगों को उनसे पहले नोबेल मिल चुका था उनके कार्यों से उन्हें दुनिया की जानकारी मिली है वे उनके साहस और स्पष्टता की कायल हैं इन लोगों का लेखन मॉरीसन के लिए चुनौती रहा है साथ ही इससे उन्हें सत्त भी मिला है. पुरस्कार की घोषणा पर उनकी एक मित्र ने उनके लिए सन्देश छोड़ा था, 'यह प्राइज जो तुम्हारा है हमारा भी है और इससे बेहतर हाथों में नहीं दिया जा सकता था’. जिसमें आशा और विश्वास छिपा है अपनी दोस्त के इस सन्देश का महत्व वे जानती हैं. उन्हें मालूम है कि कितनी बड़ी जिम्मेदारी उन पर है. उनके लोगों को उनसे कितनी ज्यादा अपेक्षाएँ हैं. वे इस अवसर पर उन सबको याद करती हैं जो इस समय अपनी भाषा अपने लेखन को चमका रहे हैं यह बात दीगर है कि सब इस भोज तक नहीं पहुँचेँगे. नोबेल समिति के अनुसार 'जो अपनी दिव्यद्रष्टा की शक्ति से और काव्यात्मक विशेषता वाले उपन्यासों में अमेरिकन सच्चाई के एक आवश्यक आयाम को जीवन प्रदान करती हैं. वे कहती हैं कि मेरे कार्य की यह जरूरत है कि मैं सोचूँ 'एक अफ्रीकन-अमेरिकन स्त्री लेखक अपने लिंगवादी समाज में, पूरे तौर पर नस्लवादी दुनिया में कितनी स्वतंत्र हो सकती है.

नोबेल भाषण एक खुला और महत्वपूर्ण मंच है पुरस्कार प्राप्तकर्ता जहाँ से अपने लेखन का सार दुनिया तक

पहुँचता है. यहाँ वह सन्देश सूत्र के रूप में दुनिया को थमाता है जो वह अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करता आया है. इसमें उस रचनाकार के समस्त मूल्य, उसकी धारणाएँ, उसके विश्वास मुखरित होते हैं इस सम्बोधन में वह लोगों से सीधा जुड़ता है साहित्य में जो कार्य वह अपने पात्रों के माध्यम से करता है वही कार्य वह इसमें प्रत्यक्ष रूप से करता है. अपने नोबेल भाषण में भी वे बचपन में सुनी एक काली गुलाम अमेरिकन स्त्री की कहानी सुनाती हैं यह भाषण भी बहुअर्थी है. वे कहती हैं कि एक बूढ़ी औरत थी. अंधी. बुद्धिमान. उसकी बुद्धिमानी बेजोड़ और बिना शक की थी. अपने लोगों के बीच वह कानून थी और कानून के पार जाने वाली भी. जो सम्मान और विस्मय उसे मिलता था उसकी ख्याति दूर-दूर तक थी. दूर शहरों तक जहाँ ग्रामीण भविष्यवक्ता मनोरंजन का वायस होता है. एक दिन उसके पास कुछ जवान लोग आते हैं. बूढ़ी औरत उनके शक्ति प्रदर्शन और उसकी असहायता के लिए उनकी भर्त्सना करती है वह उन्हें बता देती है कि वे न केवल मखौल उड़ाने के लिए जिम्मेदार है बल्कि अपने उद्देश्य की पूत के लिए उन्होंने नन्हीं-सी जान की बलि भी ले ली है. अंधी स्त्री ने शक्ति के हठधर्मिता से शक्ति के उस औजार की ओर ध्यान खींचा है जिससे शक्ति का प्रयोग होता है. वे कहती हैं कि वह हाथ की चिड़िया किस बात की ओर इंगित करती है यह विचारना मुझे सदा से आकर्षित करता रहा है.

वे उस चिड़िया को भाषा के रूप में और उस स्त्री को एक लिखने वाले के रूप में लेती हैं वे चिंतित हैं कि जिस भाषा में वे सपने देखती हैं जो उन्हें जन्म से मिली है उसका कैसा उपयोग होता है, कैसे उससे सेवा ली जाती है यहाँ तक कि कैसे वह उनसे खास पाप पूर्ण जुगुप्सित उद्देश्यों के लिए रोक ली जाती है. लेखक होने के कारण वे सोचती हैं कि भाषा एक सिस्टम है, आंशिक रूप से जीवित चीज जिस पर व्यक्ति का नियंत्रण होता है, परंतु अधिकतर एक एजेंसी की तरह एक कार्य परिणाम के साथ. अत: बच्चे उससे प्रश्न करते हैं: ''यह जीवित है या मृत है? यह अवास्तविक नहीं है क्योंकि वह भाषा को मृत्यु के लिए सम्भाव्य, मिटाने योग्य, पक्के तौर पर खतरे में और केवल इच्छा से ही जिसे बचाया जा सकता है. वह विश्वास करती है कि यदि उसके आगंतुओं के हाथ की चिडिया मृत है तो उसके शव के जिम्मेदार उसके अभिरक्षक हैं. उसके लिए एक मृत भाषा वही है जो अब बोली या लिखी नहीं जाती है.

मॉरीसन अपने नोबेल भाषण में भाषा के उत्सव का गान करती हैं. मनुष्य के हाथ में भाषा एक बहुमूल्य, विरासत है. टोनी मॉरीसन जिनकी खुद की भाषा अति सुन्दर और अति सशक्त है अपने नोबेल पुरस्कार भाषण को भाषा पर एक गीत बना लेती हैं एक सौंदर्य गीत, एक शक्ति गीत. उनके अनुसार भाषा को उन्मुक्त छोड़ना उसे जीवंत और अर्थपूर्ण रखना बहुत आवश्यक है उन्हें दु:ख है कि आज भाषा राजनेताओं, धर्माचार्यों, सम्प्रदायवादियों, राष्ट्राध्यक्षों, तानाशाहों और सरकारों तथा अन्य आजादी के जल्लादों के हाथ में आदमी को अपने काबू में रखने का, उसे सोचने और महसूस करने से रोकने का, एक औजार मात्र बन कर रह गया है. यह भाषा के लिए और मानवता के लिए महान विनष्टि की बात है. भाषा की भूमिका है सृजन, न कि हिंसा, जिसके लिए वो आज बहुतायत से प्रयोग की जा रही है. भाषा का कार्य है नए ज्ञान और नई संवेदनाओं को जन्म देना न कि ज्ञान और संवेदनाओं को सीमाओं के बंधन में कैद करना. आज भाषा की स्थिति बहुत दु:खद हो गई है. भाषा का आज बलात्कार हो रहा है, चारों तरफ उसकी इज्जत लूटी जा रही है और उसकी महत्ता और आत्मसम्मान को समाप्त करके उसको कचरे का ढेर बनाया जा रहा है. मॉरीसन का नोबेल भाषण भाषा की आज की दुर्गति और उस पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ अपना विरोध प्रकटन है, साथ ही साथ उनके हृदय की गहराइयों से उत्सृत एक शोक गीत भी है. कौंच मिथुनों में से एक का निर्मम वध पर वाल्मिकी का दु:ख, रुदन और आक्रोश आदि श्लोक बन कर उदगीर्ण हुआ. भाषा के साथ जो अन्याय हो रहा है अत्याचार हो रहा है वह दु:ख, रुदन और आक्रोश बन कर इस भाषण में नि:सृत हुआ है. आज की दुनिया में भाषा आराधना की चीज न रह कर उसके मांत्रिक जादूई पंखों को बाजारीकरण, सम्पत्ति और अधिकार के प्रति मनुष्य की अंतहीन लालसा ने बेदर्दी से कतर दिया है. मॉरीसन का भाषण भाषा को चाहने वाले, उसे अत्यंत प्यार करने वाले, उसकी असीम क्षमताओं को पहचानने वाले एक व्यक्ति का आक्रोश है जिसने उसे अपना माध्यम बनाया है. मॉरीसन चाहती हैं कि भाषा फिर जीवंत हो जाए, जिन्दगी के उत्स से पुनर्जन्म ले. जीवन की अजस्र धाराओं से शक्ति अर्जित करे और जीवन की कथा, आनन्द की, उन्माद की दु:ख की उपलब्धियों की, हानियों की कथा कहे.

उनका लेखन अमेरिका के काले इतिहास की आवाज है. अमेरिका के इतिहास का यह काला हिस्सा मानवता के इतिहास का काला शर्मनाक हिस्सा है. इतिहास को मिटाया नहीं जा सकता है (हालाँकि कुछ लोग लिखित इतिहास से छेड़छाड़ का निष्फल प्रयास करते रहते हैं), उसके जघन्य कृत्यों को वाणी दे कर उससे सीख ली जा सकती है. लोगों को संवेदनशील बनाया जा सकता है ताकि भविष्य में ऐसे अमानुषीय कार्य मनुष्य न करे. यह एक तरह से कैथारसिस का काम भी है. इतनी सदियों के दबी-कुचली अस्मिता को साहित्य स्वर प्रदान कर सकता है. मॉरीसन यही कर रहीं हैं. भाषा पर उनका गजब का नियंत्रण है वे कहीं भी लोगों को उकसाती नहीं हैं वे चीजों को सामने रख देती हैं. उनकी भाषा की प्रशंसा करते हुए नोबेल एकेडमी ने अपनी प्रेस रिलीज में टोनी मॉरीसन को 'प्रथम श्रेणी का साहित्यिक कलाकार’ कहा है. और कहा है कि 'वे स्वयं भाषा में गहन प्रवेश करती हैं, भाषा जिसे वे नस्ल की बेड़ियों से स्वतंत्र कराना चाहती हैं और वे हमें काव्य की द्युति से संबोधित करती हैं. वे स्वयं स्वतंत्र जीना चाहती हैं और अपने पूरे समुदाय को स्वतंत्रता से जीवन व्यतीत करते हुए देखना चाहती हैं. वे अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ते हुए सारी दुनिया से जुड़ना चाहती हैं’. साहित्य लिबरेट करता है, सबलीमेट करता है, उदात्तीकरण करता है. अफ्रीकन-अमेरिकन का अतीत दु:ख तकलीफों से पटा पड़ा है. गुलामों का मुँह लोहे से बन्द कर दिया जाता था. कई बार उनकी जबान काट ली जाती थी. इन्हीं गुलामों की संतानों में से एक संतान टोनी मॉरीसन ने अपने पूर्वजों के मौन को साहित्य में स्वर दिया है. अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया है. उनके और अपने अतीत को आवाज दी है. पर वे अपने कार्य को आह्लाद से उत्पन्न मानती है, निराशा से उत्पन्न नहीं.

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रचनाकार संपर्क:

विजय शर्मा,

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चित्र - साभार आईटीमाइंड.ऑर्ग

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वर्ल्ड ऑफ बुक्स

-डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

भारतीय पाठक मार्क टली के नाम से भली भांति परिचित हैं. 1935 में कोलकाता में जन्मे और ब्रिटेन में पले-पढे-बढे सर मार्क टली पूरे बाइस साल तक नई दिल्ली में बी बी सी के ब्यूरो चीफ रहे हैं. भारत और ब्रिटेन दोनों देशों के नागरिक टली को ब्रिटेन में नाइटहुड से तो भारत में पद्मभूषण से नवाज़ा जा चुका है. टली भारत विषयक कई पुस्तकें लिख चुके हैं, जिनमें प्रमुख हैं नो फुल स्टॉप्स इन इण्डिया, इण्डिया इन स्लो मोशन, और हार्ट ऑफ इण्डिया. भारत विषयक उनकी ताज़ा किताब का शीर्षक है इण्डिया ’ज़ अनएण्डिंग जर्नी : फाइंडिंग बैलेंस इन अ टाइम ऑफ चेंज.

टली महसूस करते हैं कि पश्चिमी राष्ट्र और पश्चिमी लोग भारत के नियंता बन गए हैं. इससे चिंतित होकर वे प्रश्न करते हैं कि भारत का पश्चिमी शैली के भौतिकवाद आदि को गले लगाना, वह भी अपनी विशिष्ट पहचान और संस्कृति को त्यागते हुए, कितना उचित है? वैसे तो टली विनम्रता में यह भी कहते हैं कि “मेरी किताब यह नहीं कहती कि भारत जो भी कर रहा है, सब गलत कर रहा है. मैं तो मात्र यह कहना चाहता हूं कि समायोजन और संतुलन की ज़रूरत है. हमें देखना चाहिये कि हम किधर जा रहे हैं. हमें यह भी देखना चाहिये कि पश्चिम कहां जा रहा है और क्या वह ज़रूररत से ज़्यादा दूर जा रहा है?” लेकिन इस विनम्रता के बावज़ूद टली यह कहने से नहीं चूकते कि भारत को अमरीका की फूहड नकल बनने से बचना चाहिये.

टली पिछले सालों में दुनिया में आए अनेक बदलावों की चर्चा व व्याख्या करते हैं. वे बताते हैं कि पश्चिम में जहां पहले समाजवाद को पूर्ण व अंतिम सत्य माना जाता था, अब उसके एकदम उलट यह माना जाने लगा है कि बाज़ार-पूंजीवाद से ही समृद्धि मुमकिन है. इस तरह के परिवर्तनों की चर्चा करते हुए टली जहां पश्चिम को चेतावनियां देते हैं, वे भारत को भी यह कहने से नहीं चूकते कि उसे आधुनिक पाश्चात्य संस्कृति की तरफ भागने के मोह में अपनी परम्पराओं की अनदेखी नहीं करनी चाहिये.

पश्चिम के अन्धानुकरण पर चिंता वे भूमण्डलीकरण के सन्दर्भ में भी करते हैं. उन्हें लगता है कि भूमण्डलीकरण को अपनाने के लिए जो भी समझौते किये जा रहे हैं वे पश्चिमी मॉडल के अनुरूप किये जा रहे हैं, और यह भारत की विशिष्टता के लिए घातक है. अपनी बात को आगे बढाते हुए वे एक भारतीय अर्थशास्त्री को उद्धृत करते हैं जिन्होंने टली से कहा था कि बाज़ार तो एक गधे की मानिंद होता है. अगर आप उस पर सवारी गांठ लें तो उसे मनचाही दिशा में ले जा सकते हैं, और अगर उसे खुल्ला छोड दें तो फिर वह ही आपको लात मार देता है.

टली का भारत प्रेम विख्यात है. वे तो यहां तक कहते हैं कि वे आज जो भी हैं, भारत के ही कारण हैं. लेकिन इसी सांस में वे यह भी कहते हैं कि वे कभी भारतीय नहीं हो सकते क्योंकि उनका ‘कर्म’ ब्रिटिश है. “मेरा जन्म तो भारत (कलकत्ता) में हुआ मगर मुझे लगातार यह सिखाया गया कि मैं कैसे एक भारतीय बनने से बचूं.” टली को यह भी याद आता है कि एक बार उनकी एक अंग्रेज़ नैनी ने उन्हें इसलिए चांटा मारा था कि वे ड्राइवर से हिंदी में गिनती सीख रहे थे. इस किताब में अपनी सरल, दिल को छू लेने वाली शैली में टली उन अनेक बातों का ज़िक्र करते हैं जो उन्होंने भारत से सीखी हैं. वे यह भी बतते हैं कि आर्थिक विकास, गरीबी उन्मूलन, पर्यावरणीय मुद्दों, शिक्षा, प्रबन्धन और प्रजातंत्र आदि के क्षेत्र में पश्चिम को भारत से बहुत कुछ सीखना चाहिये.

टली ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में धर्मशास्त्र का अध्ययन किया जहां उन्हें यह पढाया गया कि ईश्वर तक पहुंचने का एकमात्र मार्ग ईसाई धर्म है. टली को पादरी बनना था लेकिन जब उन्हें यह लगा कि ईसाई धर्म ईश्वर तक पहुंचने का एक मार्ग है, न कि एक मात्र मार्ग, तो उन्होंने अपना इरादा बदल दिया. टली की भारत के साथ-साथ हिन्दू जीवन पद्धति में भी गहरी आस्था है. उन्होंने लिखा है, “ईश्वर तक पहुंचने के मार्गों की अनिश्चितता हिन्दुत्व को भिन्न बनाती है. दूसरों को गले लगाने की इसकी क्षमता के कारण ही यहां अनेक आस्थाएं पनप सकीं.” हिन्दू जीवन शैली के अपने सूक्ष्म अध्ययन के दम पर वे कहते हैं कि “आधुनिक समय में हिन्दू शैली तभी बची रह पाएगी जब लोग हवा के झोंकों के साथ झुकना सीख लेंगे. लोगों को नए और पुराने के बीच संतुलन साधना होगा.” टली मानते हैं कि संतुलन की वजह से ही भारतीय संस्कृति इतनी दीर्घजीवी हो सकी है. उन्हें लगता है कि आज भी भारत दो अतियों के बीच सामंजस्य कायम करने की कोशिश कर रहा है.

स्वयं टली की यह किताब कई तरह से एक संतुलन भरी मध्यमार्गी यात्रा है. पूरी किताब में वे ब्रिटेन और भारत के बीच टहलते हुए, दोनों देशों के धर्म, राजनीति और संस्कृति का विश्लेषण करते हैं. वे भारतीय संस्कृति से प्रभावित हैं, लेकिन उनका संतुलन भाव ही है जो इस किताब को अन्य बहुत सारे लेखन की तरह भारतीय संस्कृति की महानताओं का भावुकता और अतिरेकपूर्ण मूर्खताओं भरा पिटारा नहीं बनने देता. टली के लेखन की सबसे बडी विशेषता यह है कि अपने इतने व्यापक अनुभवों, अध्ययन और सामाजिक स्वीकृति के बावज़ूद कहीं भी अपने दृष्टिकोण को पाठक पर लादने की कोशिश नहीं करते. वे अपने विचारों को मात्र हमसे शेयर करते हैं. इस अर्थ में वे इस विकट असहिष्णु समय में हममें से अनेक भारतीयों से अधिक भारतीय नज़र आते हैं.

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शब्द : 900

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(हेरॉल्ड पिंटर - चित्र : साभार नोबेल प्राइज डॉट ऑर्ग)

आलेख

-विजय शर्मा

हेरोल्ड पिंटर नाम है उस शख्सियत का जो अपने देश के प्रधान मंत्री टोनी ब्लेयर को उसकी गलतियाँ गिनाते हुए बेवकूफ कहने की हिम्मत रखता है. यह वह शख्सियत है जो आज के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्रपति जॉर्ज बुश को खुलेआम हत्यारा कहता है. यह वह शख्सियत है जिसने अपनी किशोरावस्था में राजाज्ञा का उल्लंघन किया और खुले तौर पर युद्ध में भाग लेने से इंकार कर दिया और जेल जाने के लिए तैयार रहा तथा जिसने सजा के तौर पर जुर्माना भरा. यह वह शख्सियत है जिसने 1966 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री जॉन मेजर के द्वारा नाइटहुड देने की पेशकश को ठुकरा दिया, जो मागरेट थेचर की दक्षिणपंथी नीतियों का कटु आलोचक है. यह वह शख्सियत है जो आज के दौर का इंग्लिश भाषा का सबसे चर्चित नाटककार है, जिससे इंग्लिश भाषा को नए शब्द मिले. यह वह शख्सियत है जो नाटककार होने के साथ-साथ कवि, पटकथा लेखक, अभिनेता, और निर्देशक है. यह वह शख्सियत है जिसने छोटेबड़े उन्तीस नाटक और करीब इतने ही स्क्रीनप्ले लिखने के बाद अपनी सम्पूर्ण शक्ति को समेट कर मानवाधिकारों की जद्दोजहद में खुद को डुबो देने का निश्चय किया है. जिसे उसकी साहित्यिक देन के लिए पूर्व के सैमुअल बेकेट और यूजीन ओ'नील की भाँति इस वर्ष नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है.

पुरस्कार की घोषणा के तत्काल बाद उसकी प्रतिक्रिया थी, ''जो मैं अनुभव कर रहा हूँ उसे शब्दों में बयान नहीं कर सकता, मेरे पास शब्द नहीं हैं. जब मैं स्टॉकहोम जाऊँगा मेरे पास शब्द होंगे. समारोह 10 दिसम्बर को होगा. 10 अक्टूबर 1930 को ईस्ट एंड लंडन के एक यहूदी परिवार जिसका पेशा दर्जीगिरी था के घर में पिंटर का जन्म हुआ. वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान है. लिखना उसकी महत्वाकांक्षा थी खुद उसके शब्दों में, ''करीब-करीब हाथ में पेन लिए मैं पैदा हुआ था. संगीत से भी उसे लगाव है. वह कहता है, 'मैं नहीं जानता हूँ कि संगीत लिखने को कैसे प्रभावित करता है पर यह मेरे लिए अत्यावश्यक है, जाज संगीत और क्लासिक्कल संगीत दोनों. उसके हीरो हैं जेम्स जॉयस तथा जोहान सेबेस्टियन बाख. आठ वर्ष की उम्र में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन लोगों को लन्दन छोडना पड़ा और जब वह चौदह बरस का हो गया तभी वह फिर वापस लन्दन आ सका. अत्याचार अन्याय कहीं भी किसी पर भी हो रहा हो दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति उसका जिम्मेदार होता है. सार्त्र, सिमोन ने भी लोगों को युद्ध के दौरान मरते हुए अपनी ऑंखों से नहीं देखा था पर वे भी इससे बड़े गहरे ढंग से प्रभावित हुए थे. यह सही है कि युद्ध में पिंटर ने लोगों को मरते हुए अपनी ऑंखों से नहीं देखा था पर उसने वो जगहें देखीं जहाँ बम गिरे थे. वह मानता है कि जिन्होंने बम गिराए वह खुद भी उस दुनिया का हिस्सा है. बमबारी के हालातों से वह कभी मानसिक रूप से उबर नहीं पाया.

1947 में जब उसे नेशनल सर्विस के लिए बुलाया गया तो उसने विरोध किया. एक साल में उसे दो बार बुलाया गया परंतु उसने दोनों बार विरोध किया और राजकोप का भाजक बना. वह जेल जाने, सजा काटने के लिए मन-ही-मन तैयार हो गया था और केस की सुनवाई के दौरान अपना टूथब्रश संग ले गया था उसे पक्का मालूम था राजाज्ञा के उल्लंघन का नतीजा क्या होता है. संयोग से दोनों बार एक ही मजिस्ट्रेट था और वह कुछ दयालु किस्म का भी था अत: उसने केवल 30 पाउंड का जुर्माना लगाया. उसके दर्जी पिता के लिए इतनी रकम जमा करना आसान न था पर उसने जुटाई. नेशनल सर्विस में बुलाए जाने पर इंकार करने की बात लोग सोच नहीं सकते थे. पर विशिष्ट लोग लीक पर नहीं चला करते. पिंटर जैसे स्वतंत्र चेता, साहसी व्यक्ति तो कदापि नहीं. मिलिट्री में जाने से इंकार करने के कारण परिवार की बड़ी बदनामी भी हुई, पर परिवार ने उसका संग दिया. उसे मालूम था वे उसे फिर बुलाएँगे पर वह यह भी जानता था कि वह फिर इंकार कर देगा. वह युद्ध के लिए कभी नहीं जाएगा.

पिंटर अपने पिता को बहुत प्यार करता था. ज्यादातर लोग करते हैं पर पिंटर उसे उसकी खूबियों के लिए प्यार करता था. एक बार हुआ यूँ कि जब पिंटर किशोर ही था, करीब तेरह बरस का तब उसे अपने पड़ोस की एक लड़की से प्यार हो गया. प्यार में पागल वह कविताएँ रचने लगा. पर जैसा कि ऐसे मामलों में अक्सर होता है लड़की किसी और की हो गई, पिंटर को न मिली. वह अब सच में पागल हो गया. उसे न नींद आती न भूख लगती. उसके पिता मुँह अंधेरे अपने काम पर जाने को घर से निकलते थे. एक दिन देखा कि करीब सुबह छ: बजे के आसपास जब अभी उजाला नहीं हुआ था, पिंटर किचेन में टेबल पर बैठा रो रहा है साथ ही कुछ लिख भी रहा है. पिता ने पूछा क्या लिख रहे हो पिंटर ने कागज पिता को पकड़ा दिया. पिता ने पढ़ कर उसे वापस लौटा दिया, एक शब्द न बोल कर केवल उसके सिर को थपथपाया और अपने काम पर निकल गये. उसे मालूम था पिंटर किस कठिन दौर से गुजर रहा था. पिंटर अपने पिता की यह समझदारी और सहानुभूति कभी न भुला सका. पिता यह भी कह सकता था 'क्या बकवास है यह सब. पर उसने कुछ नहीं कहा.

स्कूली दिनों में काफ्का और हेमिंग्वे पढने वाला पिंटर शुरु में हेराल्ड पिंटा के नाम से इंग्लेंड की 'पोयेट्री’ मैगजीन में कविताएँ लिखता था. उसके कई कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. वह स्कूल समारोहों में होने वाले नाटकों में हिस्सा लेता था. स्कूल में उसने मैकबेथ और रोमियो की भूमिकाएँ की. नतीजन उसे लन्दन के रॉयल एकेड़ेमी ऑफ ड्रामटिक आट्र्स में पढने के लिए अनुदान मिला. वह चार साल तक ड़ेविद बैरोन के नाम से थियेटर करता रहा. उसने बी.बी.सी. रेडियो प्रोग्राम में अभिनय किया, नाटक के सिलसिले में वह करीब एक साल तक आयरलैंड घूमता रहा. उसने 1957 में अपना पहला नाटक 'द रूम’ मात्र चार दिन में लिख ड़ाला.

अक्सर जिन्दगी सीधी रेखा में नहीं चलती है, वह किस दिशा में मुड़ेगी यह काफी हद तक संयोगों पर निर्भर करता है. हेरॉल्ड पिंटर कविताएँ लिख रहा था, नाटक कर रहा था, एक दिन हठात उसके मन में एक ड्रामे का प्लॉट कौंधा उसने इसकी चर्चा अपने एक मित्र से इसकी चर्चा की. वह मित्र ब्रिस्टल युनिवसटी के ड्रामा विभाग में काम करता था उसे पिंटर का आइडिया पसन्द आया. संयोग से ब्रिस्टल में नाटक होने वाला था पर समस्या थी कि यदि यह नाटक करना है तो स्क्रिप्ट एक सप्ताह के भीतर हाजिर होनी चाहिए. पिंटर ने अपने दोस्त को उत्तर दिया, 'ऐसा है तो इसे भूल जाओ. और फिर लिखने बैठ गया और मात्र चार दिन में नाटक पूरा कर ड़ाला. नतीजा था, 'द रूम जिसमें पिंटर के नाटकों की सभी खूबिया थीं. और इस तरह नाटककार पिंटर का जन्म हुआ.

उसी साल उसने अपना पूरी लम्बाई का पहला नाटक 'द बर्थ डे पार्टी’ लिखा. काफ्का से प्रभावित यह नाटक एक सामान्य आदमी को दिखाता है जो किन्हीं अज्ञात कारणों से अजनबियों के द्वारा धमकाया जा रहा है. भयभीत वह भागना चाहता है पर पीछा करने वालों के द्वारा दबोच लिया जाता है. वह व्याख्या नहीं करता है मात्र प्रस्तुत करके छोड देता है. 'द बर्थडे पार्टी’ पिंटर का पहला तीन एक्ट का नाटक है. यह नाटक बातचीत का एक बेहतर नमूना है. एक बेवकूफ आदमी स्टेनली जो ढोंग और बहाने बनाने में कुशल है, स्वयं को किसी जमाने में कंसर्ट में पियानो बजाने वाले के रूप में दावा करता है, अभी समुद्र तट पर बने एक गेस्ट हाउस में एकाकी जीवन बिता रहा है. इसमें स्टैनली का कहना है कि इस दिन उसका जन्म दिन नहीं है परंतु दो अजनबी आकर जबरदस्ती उसका जन्मदिन मनाने की जिद करते हैं. ये अजनबी घुसपैठिए उसे एक नया आदमी बना डालते हैं. उनके हाथों उसका पुनर्जन्म होता है, बिलकुल नए बदले हुए आदमी के रूप में और अंतत: वे बर्थड़े पार्टी मनाते हैं, यह बर्थड़े था ही. नाटक 'द डम वेटर में एक रहस्यमयी संस्था के द्वारा दो हत्यारों को एक अजनबी की हत्या के लिए काम पर लगाया जाता है. दोनों हत्यारे अपनी बेचैनी छिपाने के लिए जो संवाद करते हैं पिंटर उसमें कॉमेड़ी के तत्व डाल कर शब्दों का अपना कमाल दिखाता है. थोड़े-थोड़े अंतराल पर डाली गई खामोशियाँ जिसके नीचे भय, बेचैनी और आशंका खदबदाती रहती है, पिंटर की शैलीगत विशेषता है. ये मौन के क्षण खतरों की घंटियाँ बजाते हैं और एक प्रतिकूल एवं संशयात्मक वातावरण की सृष्टि करते हैं.

'द बर्थ डे पार्टी 1958 में वेस्ट एंड में पहली बार खेला गया परंतु एक सप्ताह के बाद ही कटु आलोचना के कारण बन्द हो गया. आलोचकों से उसका पहला साबका इतना कडुआ था कि वह कभी भी आलोचकों के प्रति सदय न हो सका. उसे लगता है आलोचक एक बेजा लोगों का झुंड है. उसे यह भी लगता है कि हमें आलोचकों की आवश्यकता नहीं है जो दर्शकों को बताएँ कि वे क्या सोचें. आलोचकों की तरह ही वह दर्शकों की भी परवाह नहीं करता है. वह लिखता है, किसी को अच्छा लगेगा या बुरा यह सोच कर नहीं लिखता है. 1959 में 'ए स्लाइट पेन उसका बी.बी.सी. के लिए पहला नाटक था, बाद में उसने अपने अधिकाँश नाटक बी.बी.सी. रेडियो प्रोग्राम के लिए ही लिखे.

उसका अपने पात्रों, चरित्रों से खूब द्वंद्व चलता है. इस संघर्ष में कई बार उसके किरदार जीत जाते हैं पर उसे इसमें रस मिलता है. कई बार लिखते-लिखते चरित्र स्वयं स्वतंत्र व्यवहार करने लगते हैं अपना जीवन स्वयं निर्माण करने लगते हैं. और जो वह लिखना चाहता है उसकी जगह कुछ और रच जाता है. एक साक्षात्कार में उसने कहा, 'यही तो नाटक लिखने का मजा है, चीजें स्वतंत्र होती हैं पर अंतिम रूप से लगाम आपके हाथ में रहती है. उसे इस सब में आनन्द आता है. उसे हत्यारे को रचने में भी मजा आता है. और जब वह अभिनय करता है तो उसे किसी भी चरित्र को निभाने में तुष्टि मिलती है. एक बार उसने स्वयं 'वन फोर द रोड में हत्यारे की भूमिका की और इसमें उसे खूब रस आया.

फ्रांसीसी समीक्षक रोला बार्थ 'लेखक की मृत्यु में स्थापित करता है कि रचना पूर्ण होने के बाद रचनाकार से उसका संबंध समाप्त हो जाता है नाटक के संबंध में तो यह और भी सटीक उतरता है. स्टेज पर जाने के बाद नाटक न नाटककार का रह जाता है न ही निर्देशक का. उसका कलाकारों और दर्शकों से प्रत्यक्ष रिश्ता जुड़ता है और कभी-कभी नाटककार जो कहना चाहता है उससे अलग अर्थ अभिनय के दौरान संप्रेषित होता है. एक बार जब हेरॉल्ड पिंटर अपना नाटक 'होमकमिंग’ देख रहा था तो उसे यह देख कर अच्छा नहीं लगा कि नाटक के अंत की ओर एक पात्र आकर रूथ के कंधे पर हाथ रखता है मानों वह उसे अपने अधिकार में रखे हो. इस क्रिया से रूथ की स्वतंत्रता नष्ट होती है. नाटक के बाद पिंटर ने ऐक्टर, डॉयरेक्टर सबसे अपनी बात कही और अपना विरोध प्रकट किया. दर्शक अगर समझदार हो तो नाटककार का संदेश उस तक पहुँच जाता है. एक बार इसी नाटक को उसने न्यूयॉर्क में देखा जहाँ मिंक पहने हुए रईस औरतें और बहुत अमीर लोग दर्शक थे. शुरु में इन तथाकथित रईसों की नाटक के प्रति बड़ी नकारात्मक प्रतिक्रिया थी और यह बात अभिनेताओं तक संप्रेषित भी हो गई. हालाँकि बाद में दर्शक नाटक के साथ हो लिए पर पिंटर को अच्छा नहीं लगा. इसीलिए पिंटर कभी-कभी कहता है, 'फक द ऑडियंस’. कहा भी जाता है 'अरसिकेषु कवित्व पाठनम शिरसि मा लिख मा लिख’.

बेकेट से प्रभावित पिंटर उसी की तरह लिखता है, वह अपने पात्रों और उनके क्रिया-कलापों की कोई तर्कपूर्ण व्याख्या नहीं करता है. कम-से-कम शब्दों में तनावपूर्ण तथा संत्रास का वातावरण सृजन करने में उसे महारत हासिल है. यही उसकी शोहरत का प्रमुख कारण है इसीलिए उसे बीसवीं सदी के सम्मानित नाटककार का दर्जा मिला है. नग्न यथार्थ की दृष्टि और असंगतकार (एब्सडस्ट) के कान के साथ वह पिछली सदी के पाँचवें दशक में स्टेज पर अवतरित हुआ. चुप्पी तनाव पैदा करती है. पिंटर इसी खामोशी का अपने नाटकों में बड़े नाटकीय ढंग से प्रयोग करता है. छोटे-छोटे संवादों के बीच सन्नाटा बोध के नए आयाम खोलता है. उसकी थीम भी ऐसी ही होती है, उत्तेजक कल्पना, जलन, पारिवारिक अशांति, घृणा, मानसिक बेचैनी, बेनाम धमकियाँ, मन की खलबली, परेशानी, घबराहट, आदि, आदि. संवाद रोजमर्रा के जीवन (मंड़ेन) से होते हैं जिनमें अशुभ, डरावनी (सिनिस्टर) अंतरधारा का प्रच्छन्न प्रवाह चलता है. उसके अधिकाँश नाटक एक कमरे में चलते हैं. जिसमें रहने वाले किसी खास कारण से लोगों या किसी अन्य फोर्स से आशंका से घिरे रहते हैं इस कारण को न तो स्पष्ट रूप से दर्शक बता पाता है न ही नाटककार स्पष्ट करता है न ही पात्र स्वयं मुखरित करता है. अक्सर पात्र जीवित बचे रहने या पहचान के संकट से जूझते रहते हैं. वे अपने आंतरिक भय और कमजोरियों को छल कपट, स्वाँग के प्रदर्शन से छिपाने का असफल प्रयास करते हैं परंतु उनका पाखंड ज्यादा देर चलता नहीं है. पिंटर अपने पात्रों के कार्यकलापों की तर्कपूर्ण व्याख्या देने से इंकार करता है. परंतु वह लोगों के जीवन के भयंकर क्षणों की अस्तित्ववादी झलक दिखाता है. वह दिखाता है कि आदमी को स्पेस की जरूरत है अपने भीतर भी और बाहर भी.

उसके नाटकों के प्रत्येक संवाद, लहजे, छोटी बड़ी, हल्की भारी ध्वनि, शब्द, वाक्य, आरोह-अवरोह सबमें कोई उद्देश्य रहता है. यहाँ तक कि व्यतिक्रम, आवृति, विच्छिन्नता, बोलियों के प्रयोग तक में वह सावधानी से काफी कुछ कहने का प्रयास करता है. भाषागत प्रयोग उसके नाटकों की विशेषता है. दर्शक को अगर नाटक अर्थ के बगैर लगता है तो वह स्वयं उसे अर्थ देता चलता है, उसमें एक पैटर्न खोज निकालता है, एक तरह की संपूर्णता कायम कर लेता है. क्योंकि वह अव्यवस्था बर्दाश्त नहीं कर सकता है. यूँ तो सभी नाटककार इस तरह के भाषागत प्रयोग या तो कुछ बताने के लिए या फिर कुछ छिपाने के लिए अक्सर करते हैं, परंतु पिंटर इसका बड़ा सफल प्रयोग करता है. उसके 1973 के 'मोनोलोग’ और 1975 के 'नो मैन्स लेन्ड’ में नाटक के पात्र अपने संघर्ष में शब्दों का प्रयोग हथियार की तरह करते हैं, वे न केवल जीवित बचे रहने के लिए वरन अपना मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखने, पागलपन से बचे रहने के लिए भी इसका प्रयोग करते हैं. पिंटर के किसी भी नाटक को लिया जाए, चाहे वह 'द बर्थड़े पार्टी’, 'टी पार्टी’ और 'पार्टी टाइम’ हो जिसमें सोशल गैदरिंग और परस्पर सामाजिक व्यवहार हैं या घरेलू ताने-बाने में बुने गए 'होमकमिंग’ हो अथवा दुनिया के नजरिया वाले नाटक 'मोनोलोग’ और 'माउंटेन लेंग्वेज’ हो मन में प्रश्न उठता है क्या वास्तविकता और शब्द में कोई रिश्ता होता है.

अपने दूसरे पूरी लम्बाई के नाटक 'द केयरटेकर’ के साथ 1960 में वह नाटककार के रूप में स्थापित हो गया. 'द बर्थडे पार्टी’ तथा 'द केयरटेकर’ के वातावरण ने एक नया विशेषण उत्पन्न किया 'पिंटरस्क’. जिस शब्द का अर्थ बना स्याह संकेतों और सुझावों से भरे वातावरण को अनिश्चय के साथ निष्कर्ष निकलने के लिए दर्शकों को छोडना. 1971 में उसने 'ओल्ड टाइम्स’ लिखा जिसकी प्रमुख पंक्ति थी, 'नॉरमल, वाटिज नॉरमल?’ पिंटर ने थियेटर को उसके मूल तत्वों में स्थापित कर दिया जहाँ एक निश्चित घेरे में रहने वाले लोग एक दूसरे की दया पर हैं और आडम्बर का दिखावा भहरा जाता है. नाममात्र के कथानक (प्लॉट) में अधिकार, सत्ता और शक्ति को लेकर संघर्ष और ऑंखमिचौनी गुँथती चलती है. वह गागर में सागर भरता चलता है. उसके नाटकों में मनोविश्लेषण और नारी विमर्श की पर्याप्त गुंजाइश रहती है.

'नाटक केयरटेकर दो भाई और एक केयरटेकर की कहानी है यहाँ भी सत्ता और अधिकार का संघर्ष है.

वह बराबर लघु नाटक लिखता रहा बड़े नाटक उसने कम लिखे पर जो भी लिखे वो चर्चित हुए. एक लम्बे अंतराल के बाद 78 में 'बिट्रेयल लिखा और फिर 94 में 'मूनलाइट. उसका नाटक 'बिट्रेयल ब्रिटिश ब्रोडकास्टर जोऐन बेकवेल के साथ उसके अफेयर का परिणाम है. जोऐन अपनी जवानी के दिनों में बुद्धिजीवियों के बीच बड़ी मस्त चीज के रूप में जानी जाती थी. पिंटर ने 'माउंटेन लेंग्वेज एक राजनीतिक नाटक बल्खान के आदिवासी अल्पसंख्कों के दमन से प्रभावित हो कर लिखा.

'होमकमिंग एक पारिवारिक नाटक है. परिवार स्त्री विरोधी है. परिवार से विमुख टेड्डी दूर अमेरिका में एक युनिवर्सिटी में फिलॉसफी पढ़ाता है. छ: वर्षों के बाद वह अपनी पत्नी रूथ को अपने परिवार से मिलाने उसके साथ लन्दन आता है. परिवार में केवल पुरुष हैं. टेड्डी का पिता चिड़चिड़ा, आक्रामक और सनकी है जो पहले एक कसाई था. कुछ दिनों के बाद टेड्डी युनिवसटी में पढ़ाने के लिए अकेला अमेरिका लौट जाता है. न तो उसे किसी की जरूरत है, न किसी को उसकी जरूरत है. रूथ लन्दन में परिवार में ही रह जाती है, सबकी देखभाल के लिए माँ या सबकी औरत बन कर. सबको उसकी जरूरत है. इसमें वह असंतुलित परिवार में तनावों का संतुलन प्रस्तुत करता है. नाटक में यौन सत्ता को लेकर संघर्ष की एक प्रच्छन्न अंतरधारा चलती है. स्वयं पिंटर को इसके दूसरे एक्ट का शुरुआती सीन बड़ा अच्छा लगता है, जब खाने के बाद जहाँ रूथ की बेइज्जती होती है सब सिगार पीते हुए आते हैं और बैठ जाते हैं. रूथ टेड्डी के छोटे भाई के साथ कॉफी लिए हुए आती है, एक-एक करके सबको कॉफी देती है और फिर उसके बाद कॉफी टेबल उन सब पर उलट देती है. सारी क्रिया बिना एक भी संवाद के खामोशी में चलती है. रूथ का यह विद्रोही व्यवहार जो पिंटर ने खुद रचा है, पिंटर को बड़ा मजा देता है. वह बहुत खुश है उसके इस कार्य से क्योंकि वह उसे एक स्वतंत्र स्त्री दिखाना चाहता है. वह अपने इस नाटक 'द होमकमिंग’ को वह एक फेमिनिस्ट प्ले मानता है उसके अनुसार नाटक के अंत में रूथ एक स्वतंत्र स्त्री है और उसके आस-पास के लोग नहीं जानते हैं कि उसके संग क्या करना है. क्योंकि अब वह उनके नियंत्रण में नहीं है. 'द होमकमिंग’ को टोनी एवार्ड, द वाइटब्रेड एंग्लो-अमेरिकन थियेटर एवार्ड और न्युयॉर्क ड्रामा क्रिटिक एवार्ड प्राप्त हुए

'द होमकमिंग’, 'केयर टेकर’, 'बिट्रेयल’, 'ओल्ड टाइम्स’, 'ऐशेस टू ऐशेस’ आदि उसके कई एब्सर्ड नाटक हैं. उसके करीब-करीब सभी नाटकों में पोलिटिक्स अंत:सलिला की भाँति है पर पिंटर स्वयं स्वीकार करता है कि 'वन फॉअर द रोड’, 'पार्टी टाइम’, 'माउंटेन लेंग्वेज’ सीधे-सीधे पोलिटिकल प्ले हैं. सत्तर के दशक से वह अमेरिकन फिल्म से जुड गया. 1977 में उसने स्क्रीनप्ले लिखना प्रारम्भ किया और अब तक वह करीब उन्तीस पटकथाएँ लिख चुका है. 1981 में उसकी पटकथा पर बनी फिल्म 'द फ्रेंच लेफ्टीनेंट्स वूमन’ खूब प्रसिद्ध हुई. 'द सरर्वेंट’ (1963), 'द एक्सीडेंट’ (1967), 'द गो बिटवीन’ (1971), 'द लास्ट टाइकून’ (1974), 'बिट्रेयल’ (1982), 'टर्टल ड़ायरी’ (1985), 'रीयूनियन’ (1989), 'द हेंडमेड्स टेल’ (1990), 'द कम्फर्ट ऑफ स्ट्रेंजर्स’ और काफ्का के 'द ट्रायल’ की पटकथा 1990 में लिखी जो प्रसिद्ध हुई.

पिंटर को ढेरों पुरस्कार मिल चुके हैं. 1963 में बलन फिल्म फेस्टिवल का सिल्वर बेयर, 1965 में बैफ्टा, 1971 में फिर बैफ्टा, 1970 में हम्बर्ग शैक्सपीयर प्राइज, 1971 में कान फिल्म फेस्टिवल में सम्मान, 1981 में कॉमनवेल्थ एवार्ड. 1996 में थियेटर का लाइफ टाइम्स एचीवमेंट के लिए लॉरेंस ओलिवर एवार्ड, 2002 में साहित्य के लिए चैम्पीयन ऑफ ऑनर मिला और अब 2005 में नोबेल. नोबेल पुरस्कार की घोषणा से आलोचकों को आश्चर्य हुआ, भला बुश और ब्लेयर को खुलेआम क्रिमनल कहने वाले को, कट्टर वामपंथी विचारधारा के व्यक्ति को यह पुरस्कार कैसे मिला. आलोचक एकाध को छोड़ कर उसके नाटकों को महज हँसी-मजाक का खिताब देते हैं. वे उसे उच्च कोटि का नाटककार मानने को तैयार नहीं हैं. स्वयं पिंटर भी जानता है कि उसके मुखर विचारों के चलते उसके अपने देश में और विदेशों में भी बहुत सारे लोग उसे पसन्द नहीं करते हैं. पुरस्कार की घोषणा से वह भी कम चकित न था. तत्काल उसका जवाब था, ''आई वंडर, आई वंडर.

जीवन के विषय में पिंटर को लगता है कि यह बहुत बहुत जटिल है जिसमें यथार्थ यथार्थ होता है नाटक की तरह नहीं जिसमें यथार्थ और कल्पना में भेद करना कठिन है, जहाँ सत्य और मिथ्या के बीच भेद करना आसान नहीं है. नाटककार के लिए जरूरी नहीं कि कोई चीज या तो पूरी तौर पर सही हो या फिर पूरी तौर पर गलत; यह एक साथ सही और गलत दोनों हो सकती है, पर एक नागरिक के लिए ऐसा नहीं है. हमारी कल्पना का जगत और वास्तविक जगत बिलकुल दो अलग-अलग संसार हैं.

वैसे तो पिंटर ने 1966 में एक साक्षात्कार में बताया कि वह किसी खास ऐक्टर के लिए कोई भूमिका नहीं लिखता है परंतु उसकी पहली पत्नी विवियेन मरचेंट ने अक्सर उसके नाटकों में काम किया. 1956 में उसने अभिनेत्री विवियेन से विवाह किया जो 1980 तक कायम रहा, दोनों का एक बेटा ड़ेनियल आज एक लेखक और संगीतकार है. परंतु तलाक के कारण उसे अपने बेटे से अलग होना पड़ा था. विवियेन और पिंटर के कटु तलाक ने पत्र-पत्रिकाओं को वर्षों तक मसाला प्रदान किया था. 1982 में विवियेन की मृत्यु हो गई. 1980 में उसने लेखिका एवं इतिहासकार लेड़ी एंटोनिया फ्रासर से शादी की. नोबेल पुरस्कार की खुशी उसने अपनी दूसरी पत्नी लेड़ी फ्रासर के साथ शेम्पेन पी कर मनाई.

2002 में पता चला कि उसे गले का कैंसर है. पता नहीं क्या कारण है बड़े-बड़े लेखक केंसर ग्रसित हो जाते हैं पाब्लो नेरुदा, गैब्रियल गार्शा मर्क्वेज और हेरॉल्ड पिंटर. सबके सब.

पाब्लो नेरुदा, कैफी आजमी, सज्जाद जहीर, सफदर हाशमी की तरह ही लेखक होने के साथ-साथ पिंटर अपने उग्र, निर्भीक राजनीतिक विचारों के लिए भी जाना जाता है. लेखक के रूप में जितनी प्रसिद्धि उसे मिली है उससे भी कहीं ज्यादा वह अपने वामपंथी विचारों के लिए प्रसिद्ध है और यह प्रसिद्धि कुख्याति की हद छूती है. पिंटर विद्रोही प्रारम्भ से था, अपने जीवन की शुरुआत में ही उसने युद्ध में भाग लेने से इंकार कर दिया परंतु जब 1973 में पिनोशे ने चिली के राष्ट्रपति एलेंड़े का तख्ता पलट दिया, इस घटना से पिंटर बहुत विचलित हो गया और तभी से वह खुल कर सक्रिय राजनीति में आ गया, क्योंकि उसे उस समय भी स्पष्ट रूप से पता था कि इस पूरी घटना के पीछे सी.आई.ए. तथा अमेरिका का हाथ है. अब तो खैर सारे दस्तावेज बाहर आ रहें हैं. उसने खुलेआम अमेरिका की नीतियों की आलोचना प्रारम्भ कर दी. जब मारग्रेट थेचर पावर में थी तब लन्दन के कैम्पडेन हिल में पिंटर का घर वामपंथियों की सभाओं का अड्डा बन गया था जो थेचर को उसकी नीतियों की वजह से पदच्युत करने की योजना बनाया करते थे. अयातुल्ला खुमैनी के फतवा के समय पिंटर ने सलमान रुश्दी का पक्ष लिया था. 1999 में सरविया समस्या के दौरान उसने नाटो की भूमिका की भर्त्सना की. 2001 में वह 'द इंटरनेशनल कमिटि टू डेफेंड स्लोवोडान मिलोसेविक’ का सदस्य बन गया और कई अन्य बुद्धिजीवियों के संग मिल करसरबिया के मिलोसेविक के खिलाफ जैसा मुकदमा चलाया जा रहा था, उसको गलत बताया. उसका कहना है कि वह मिलोसेविक के पक्ष में नहीं है परंतु जिस बेजा तरीके से मिलोसेविक का मुकदमा चलाया गया वह उसके खिलाफ है. इसीलिए उसने इस मुहीम में भाग लिया. कुछ लोगों को यह पिंटर को अपना बचाव करने का तरीका लगा, उन्हें लगा कि पिंटर अपनी आलोचना से बचने के लिए सफाई दे रहा है. इस तरह कई बार पिंटर जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे विवादों के घेरे में पड जाता है. पर वह इन सबकी ज्यादा परवाह नहीं करता है और उसे जो उचित लगता है करता, कहता और लिखता जाता है. इराक युद्ध के खिलाफ उसने सक्रिय रूप से काम किया और बड़े कड़े शब्दों में टोनी ब्लेयर तथा जॉर्ज बुश की आलोचना की. वो पूछता है जब बुश और ब्लेयर में खुद को आईने में देखते होंगे तो असल में क्या देखते होंगे?

उसका कहना है बुश एवं ब्लेयर को इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में युद्ध अपराधियों की भाँति मुकदमा चला कर सजा देनी चाहिए. उसने इराक युद्ध पर कविता लिखी,

The bombs go off
The legs go off
The heads go off
The arms go off
The feet go off
The light goes out
The heads go off
The legs go off
The lust is up
The dead are dirt
The lights go out
The dead are dust
A man bows down before another man
And sucks his lust

हेरॉल्ड पिंटर को इराक युद्ध पर कविता लिखने पर विलफ्रेड ऑयेन पुरस्कार मिला.

हमारे अपने देश में आज पिंटर की बात को ध्यान से सुनने और उस पर विचार करके, अमल करने की कितनी सख्त जरूरत है यह बताने की आवश्यकता नहीं है. निजिकरण के नाम पर हमारा देश भी गिरवी रखा जा रहा है, चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, राजनेता मात्र अपना हित साधने में लगे हैं. हाल के वर्षों में ब्रिटेन के नाटककार अमेरिका की बनिस्बत सरकार की नीतियों के विरोध में ज्यादा मुखर रहे हैं. 11 सितम्बर 2001 के बाद से वह और मुखर हो गया है. पिंटर के अनुसार एक विचार के रूप में प्रजातंत्र अच्छा है परंतु जिस तरह उसका उपयोग हो रहा है उसे वह बकवास लगता है. वह ब्रिटिश सरकार की विदेश नीति का आलोचक है तथा देश के अन्दर ही रेल, पानी जैसी मूल जरूरत की वस्तुओं के निजिकरण को गलत मानता है. रेल में सुरक्षा के इंतजाम पर ये निजि कम्पनियाँ खर्च नहीं करना चाहती हैं. लोगों को पानी के लिए काफी कीमत चुकानी पड़ती है और जहाँ पानी मिलना चाहिए वहाँ वह नहीं पहुँचता है और तो और इन निजि कम्पनियों के अधिकारी स्वयं गोल्फ जैसे खेल में मशगूल रहते हैं. मिलीयन पाउंड जेब में भरने वाले ये लोग जनता की सुविधा और सुरक्षा की परवाह नहीं करते हैं. ब्रिटेन की वर्तमान सरकार केवल बड़े उद्योगों में रूचि रख रही है. देश या जनता की भलाई से उसे कुछ लेना देना नहीं है. पिंटर इस बात को न केवल जानता समझता है अपनी कथनी और करनी से वह इसे लोगों को बता भी रहा है. और इस तरह एक जिम्मेदार नागरिक तथा एक बुद्धिजीवी की अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है.

अमेरिका मानवीय मूल्यों, मानवीय सहायता के नाम पर जो कर रहा है वह पिंटर को ढकोसला लगता है. इन राजनेताओं की कथनी और करनी में जो खाई है, उसे इस दोमुहेपन से जुगुप्सा होती है. सत्ता का ढाँचा असल में लोगों की अवहेलना करता है क्योंकि इसी तरह से वह कायम रहता है. परंतु सत्ता में बैठे लोग कहते ठीक इसके विपरीत हैं, वे कहते हैं, ''हम तुमें प्यार करते हैं. हम तुम्हारे प्रति कठोर हैं क्योंकि हम तुम्हारी चिंता करते हैं. यहाँ तक कि जब वे लोगों को यंत्रणा देते हैं तब भी कहते हैं, ''हम तुम्हें प्यार करते हैं. कृपया हमारा विश्वास करों और हम पर निष्ठा रखो. और पिंटर को सबसे ज्यादा भयभीत करने वाला लगता है जब वे कहते हैं, ''हम तुम्हें यंत्रणा देकर तुम्हारे बेहतर हितों की रक्षा कर रहें हैं. पिंटर इसको ऑरविलियन बात मानता है. 2003 फरवरी में चिढ़ कर उसने लिखा,

Democracy

There’s no escape.
The big pricks are out.
They’ll fuck everything in sight.
Watch your back.

अमेरिका जो मानवाधिकारों का ठेकेदार बनता है उसके अपने देश के भीतर कैसे-कैसे मानवाधिकारों का हनन होता है पिंटर के पास इन सबके पुख्ता सबूत हैं क्योंकि अमेरिका में उसके कुछ मित्र हैं जो उसे इन भीतरी बातों की जानकारी देते रहते हैं. उसे अच्छी तरह मालूम है पिछले बीस सालों से अमेरिकी जेलों में क्या चल रहा है. एमनेस्टी रिपोर्ट से ये सब आज जगजाहिर हो चुका है. मानव मन की रहस्यमयी गुत्थिओं को प्रस्तुत करने में माहिर पिंटर को विभिन्न संस्थाएँ अपने यहाँ भाषण देने के लिए आमंत्रित करती रहती हैं. सरबिया में जब बम गिराए जा रहे थे तब मानव जीवन की गुत्थियों की पिंटर की समझ का कायल हो कर उसे 'इंस्टटीयूट ऑफ जुंगीयन साइकेट्रिक्स’ में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया. उसने वहाँ के प्रेसीडेंट से कहा भी कि तुम मुझे क्यों बुला रहे हो? संस्था का अध्यक्ष पिंटर के विचारों से परिचित था. उसने कहा, ''मुझे लगता है वे रुचि लेंगे”. पिंटर ने भाषण लिखा. और उन सब बातों का लेखाजोखा दिया जो अमेरिका में चल रहा था खासतौर पर मानवाधिकारों की रक्षा की ठेकेदारी का दावा करने के नाम पर. और वहाँ उसने अमेरिका की यंत्रणा प्रणाली पर विस्तार से बताया. उसने अपने भाषण में अमेरिका में कैदियों को यातना देने के तरीकों का खुलासा किया. उसने बताया कि वहाँ के जेलों में कितने कैदी हैं और उन्हें किस तरह यंत्रणा कुर्सी, यंत्रणा बेल्ट और यंत्रणा बन्दूक के द्वारा सताया जाता है. वह अमेरिका की ड़ेथ पेनाल्टी व्यवस्था से भी सहमत नहीं है. और वहाँ लोगों ने उसकी बात सुनी और किसी ने भी आपत्ति नहीं की. 250 से ज्यादा श्रोता उसकी बातें ध्यानपूर्वक सुनते रहे. किसी ने भी नहीं कहा यह असंगत है. श्रोताओं ने उसकी कई बात पर अपनी असहमति प्रकट की परंतु इन बातों पर नहीं. आज विश्व जानता है कि अमेरिका अबु गरीब जेल में क्या कर रहा है.

'द टेलीग्राफ’ के स्तम्भकार अमित रॉय के अनुसार हेरॉल्ड पिंटर एक अटपटा आदमी है. परंतु नोबेल एकेडमी को हेरॉल्ड पिंटर सामान्य रूप से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश ड्रामा के सर्व प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में दृष्टिगोचर होता है. ड्रामा में एक खास तरह के वातावरण को बताने के लिए उसका नाम 'पिंटरर्स्क’ भाषा में एक विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है इससे वह आधुनिक क्लासिक की श्रेणी में स्थान ग्रहण करता है. 'द बर्थड़े पार्टी’ तथा 'केयरटेकर’ नाटकों के रोजमर्रा के डॉयलॉग तथा उससे उत्पन्न परिवेश के कारण यह विशेषण निर्मित हुआ. उसके नाटकों पर काफ्काई प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. उसके नाटकों को धमकी की कॉमेडी (कॉमेड़ी ऑफ मेनेस) की संज्ञा भी दी जाती है, जहाँ एक घेराबन्द स्थान में लोग अजनबियों, घुड़कियों से संकटग्रस्त रहते हैं, भय का वातावरण होता है परंतु भय का कारण बहुत स्पष्ट नहीं होता है. उसके नाटकों की दूसरी प्रमुख थीम होती है चलायमान अतीत का पकड़ में न आना. यहाँ हमें ऐसे लोग मिलते हैं जो अपने अस्तित्व को संकुचित और नियंत्रित करते हुए अतिक्रमण के खिलाफ या अपने खुद के संवेगों से ही स्वयं के बचाव में लगे हुए हैं. उसके पोलिटिकल नाटकों की थीम अन्याय और खतरे के विश्लेषण से सम्बंधित होती है.

साहित्यकार का सच्चा धर्म है अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना, दमन का विरोध करना, अल्पसंखकों के हितों की रक्षा करना, कमजोरों का साथ देना, समाज की गजालत, गन्दगी का न केवल पर्दाफाश करना वरन उसकी साफ-सफाई में भी आगे आकर बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेना. और आज वक्त आ गया है जब मात्र लिख कर लेखक अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मन सकता है, उसे सक्रिय रूप से मैदान में उतरना होगा. शायद इसीलिए अब पिंटर स्वयं कह रहा है, ''उन्तीस नाटक लिख लिए. क्या यह काफी नहीं है? वह अपनी काफी ऊर्जा राजनीतिक बातों में लगाता है क्योंकि चीजें आज जिस स्थिति में हैं उसे यह आवश्यक लगता है कि वह इस दिशा में सक्रिय रूप से भाग ले.

उग्र विचारों के संग-संग पिंटर एक मस्त तबीयत का आदमी भी है. एक बार एक पत्रकार उसका साक्षात्कार लेने गई और जब मुलाकात समाप्त होने पर जाने लगी तो पिंटर ने उसे अपने सेल्फ से निकाल कर दो पुस्तकें दीं. एक पुस्तक थी 'सेलेब्रेशन क्योंकि यह उसकी नवीनतम पुस्तक थी और पत्रकार के पास यह तब नहीं थी, और दूसरी थी 'द फ्रेंच लेफ्टीनेंट्स वूमन’ का स्क्रीनप्ले, क्योंकि पत्रकार ने उस पुस्तक की प्रशंसा की थी. पूरे साक्षात्कार के दौरान पिंटर बड़ा सजीव व सक्रिय था, जरूरत पड़ने पर अभिनय करके दिखाता हुआ. खूब गम्भीर और मौका आते ही हँस पड़ने को तत्पर. पिंटर टिपिकल इंग्लिश मैन है. वह सोचता है कि 'ईश्वर ने धरती पर जितनी चीजें बनाई हैं उसमें सबसे बड़ी चीज है क्रिकेट पक्के तौर पर सैक्स से ज्यादा, वैसे सैक्स भी बुरा नहीं है.

हेरॉल्ड पिंटर ने जब लिखना शुरु किया अपने समकालीनों से उसकी खास शैली बिलकुल भिन्न थी. शुरु में लोगों को लगा है एक क्षणिक फैशन है. परंतु उसकी यह शैली क्षणिक शैली से काफी ज्यादा साबित हुई. एक नए जीवन, एक नई आवाज के रूप में स्थापित होने, ख्याति पाने के बाद भी पिंटर अपनी विशिष्ट शैली में एक से बढ़ कर एक मास्टरपीस रचता गया और उसके लेखकीय जीवन काल में ही ब्रिटिश एक्टिंग के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता एवं कलाकार उसकी इन चुनौतीपूर्ण सृष्टियों को स्वीकार करने के लिए आगे आते रहे. बहुत से अन्य कलाकारों के साथ-साथ जॉन गिल्गट, इयान होम, एलान बेट्स, रॉल्फ रिचर्डसन, ड़ोनाल्ड प्लीसेंस, माइकल गैम्बोन, पेनेलोप विल्टन, एलीन एट्कीन, मिरांड़ा रिचर्डसन, डैनियल मेसी जैसे मजे कलाकार उसकी कृतियों को स्टेज पर साकार करते रहे.

पिंटर आज के मनुष्य की भाषा प्रयोग करता है. किसी सामाजिक सम्मेलन, समारोह में, सोशल गेदरिंग में चले जाइए लोग ऐसी ही भाषा बोलते सुनाई देंगे असल में वे भीतर से भयभीत और आशंकित हैं और ऊपर से बहादुरी का मुखौटा लगाए रखते हैं थोड़ा-सा कुरेदा जाए तो उनका मुलम्मा उतर सकता है और उनके अन्दर बैठा डर, जलन, पारिवारिक अशांति, घृणा, मानसिक बेचैनी, बेनाम धमकियाँ, खलबली, परेशानी, घबराहट, बाहर आ सकता है. दूसरों को घुडकी देने वाला, धमकाने की बोली बोलने वाला भीतर से बड़ा कमजोर होता है. आज आउटसोसंग के नाम पर मशरूम की तरह उगे कॉल सेंटर में इसी तरह की अनर्गल भाषा का प्रयोग हो रहा है. जहाँ भी कालिमा है चाहे जीवन में या सत्ता में पिंटर उसका पर्दाफाश करता है. पिंटर के मन में इन बातों को लेकर बहुत अमर्ष है और यही अमर्ष उसके नाटकों और भाषणों में उभर कर आता है.

कई लोगों को लगता है नोबेल पुरस्कार पिंटर को काफी देर से मिला यह उसे बहुत पहले मिल जाना चाहिए था. इस अवसर पर बधाई देते हुए उसके एक चहेते ने सुझाव दिया कि हमें उसके सम्मान में खामोशी का पिंटर पॉज रखना चाहिए. यू.के. के एक और प्रशंसक ने कहा तुम्हें लोग मजाक के तौर पर लेते थे अब वे गम्भीरता से लेंगे. आलोचकों को भले ही आश्चर्य और आपत्ति हो परंतु बहु आयामी व्यक्तित्व के स्वामी हेरॉल्ड पिंटर को पुरस्कार के लिए चुन कर नोबेल कमिटी ने अपनी निष्पक्षता का परिचय दिया है. वैसे आज कोई पुरस्कार विवादों से परे नहीं रह गया है भले ही नोबेल पुरस्कार ही क्यों न हो. 1.3 मिलियन पाउंड का नोबेल पुरस्कार इस बार भी विवादों के घेरे में था जब पुरस्कार की घोषणा के मात्र दो दिन पूर्व समिति के एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया था. पिछले वर्ष का विजेता एल्फ्रिड जेलिनेक भी वामपंथी था और उसके चुनाव पर ऑस्ट्रिया में उसके देशवासियों को आश्चर्य हुआ था. सार्त्र ने नोबेल को आलू के बोरे की मानिन्द ठुकरा दिया था पर पिंटर उसे पाकर प्रसन्न है. जब तक यह आलेख पाठकों के हाथ में पहुँचेगा पिंटर अपना भाषण दे चुका होगा. जिसको जो कहना हो कहता रहे पिंटर ने 10 दिसम्बर को स्टॉकहोम जाने का मन बना लिया है और साहित्य प्रेमियों को इंतजार है उसके शब्दों का जो वह अपने भाषण के दौरान वहाँ प्रयोग करेगा. नोबेल समिति ने अपनी अनुशंसा में कहा है, 'पिंटर रोजमर्रा की बकबक के कगारों को अनावृत करता है और उत्पीड़न के बन्द कमरों में बलपूर्वक प्रवेश करता है.

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