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September 2007
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(30 सितम्बर, दुष्यन्त कुमार की जयंती पर विशेष)

dushyant kumar

(दुष्यन्त कुमार. चित्र साभार अनुभूति-हिन्दी.ऑर्ग)

-अरुण मित्तल अद्भुत

दुष्यन्त कुमार हिन्दी कवियों में एक ऐसा नाम है जिसे हिन्दी ग़ज़ल का प्रवर्तक माना जाता है। दुष्यन्त कुमार के विषय में अगर कहा जाए कि उन्होने हिन्दी रचनाकारों के लिए हिन्दी में ग़ज़ल का एक रास्ता खोला तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसे हिन्दी ग़ज़ल की एक सामान्य परिभाषा देना कठिन कार्य है। क्योंकि यदि छंद के दृष्टिकोण से देखें तो हिन्दी ग़ज़ल में हिन्दी छंद का प्रयोग एवं हिन्दी छंद शास्त्र के नियमों का पालन होना चाहिए, अर्थात् मात्राओं की गणना ध्वनि के आधार पर नहीं अपितु प्रयोग किए गए शब्द के वास्तविक वजन के आधार पर होनी चाहिए। और यदि भाषा एवं शब्द चयन कि दृष्टि से देखें तो हिन्दी शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का गहन अध्ययन किया जाए तो उन्होने उपर्युक्त दोनों नियमों का पूर्ण रूप से पालन नहीं किया। उन्होंने अपनी ग़ज़लें उर्दू बहरों में लिखी और हिन्दी शब्दों के साथ उर्दू शब्दों का भी जमकर प्रयोग किया। परंतु इस सब के बाद दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लों का महत्व कम नहीं हो जाता। एक आम आदमी की जुबान बनकर दुष्यन्त ने जिस पीड़ा को कलमबद्ध किया वह कोई आसान काम नहीं था। भाषा के बारे में वो कितने ईमानदार थे यह तो उनकी साए में धूप पर लिखी भूमिका से ही पता चलता है। उन्होने स्पष्ट किया मैं उस भाषा में लिखता हूं जिसे मैं बोलता हूं, जब हिन्दी और उर्दू अपने अपने सिहांसन से उतरकर आम आदमी के पास आती हैं तो इनमें फर्क करना मुश्किल हो जाता है। दुष्यन्त कुमार की ग़ज़लें पढ़कर ऐसा लगता है कि वो हिन्दी से कहीं ज्यादा हिन्दुस्तान की ग़ज़लें है। जिनमें उस समय के आम आदमी की पीड़ा, संघर्ष, एवं परिस्थितियों से जूझते रहने का चित्रण किया है। अपने अशआर में बारूद भरकर दुष्यन्त कुमार ने शायरी के एक ऐसे स्वरूप को दिखाया जिससे हिन्दी साहित्य में ग़ज़ल का एक नया रूप प्रकट हुआ। जिसे कहीं लचर छंद विधान के आधार पर अस्वीकार किया गया तो कहीं उसकी बेबाकी को सलाम ठोंका गया। लेकिन दुष्यन्त कहीं किसी भी आलोचना की परवाह नहीं की उनका सारा संघर्ष उनकी शायरी में प्रतिबिंबित हुआ है वो एक जगह लिखते हैं

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए

कहीं पे शाम सिराहने लगा के बैठ गए

 

वह बेबसी एवं अभाव को भी आशावादी स्वर देते हैं

न होगा कमीज तो पावों से पेट ढक लेंगे

ये लोग कितने मुनासिब हैं सफर के लिए

 

उनकी पीड़ा में हर किसी की पीड़ा झलकती है। झूठ फरेब, धोखाधड़ी, भौतिकवाद को उन्होने अपनी ग़ज़लों में अनेक जगह प्रतीकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। जिसके कुछ सटीक उदाहरण हैं ये शेर

जरा सा तौर तरीकों में हेर फेर करो,

तुम्हारे हाथ में कॉलर हो आस्तीन नहीं

 

परंतु दुष्यन्त कुमार का मुख्य स्वर दहशत से भरे समाज का चित्रांकन करना रहा उन्हें आजादी की वो आबो हवा रास नहीं आई. बहुत गुस्से में उन्होंने लिखा

यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं,

खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा

इस शहर में अब कोई बारात हो या वारदात,

अब किसी भी बात पर खुलती नहीं हैं खिड़कियां

 

दुष्यन्त देश की तत्कालीन परिस्थितियों से बहुत नाराज थे। और यह बात उन्होने प्रखर स्वर में कही

आप आएं बडे शौक से आएं यहां

ये मुल्क देखने लायक तो है हसीन नहीं

कल नुमाइश में मिला वो चीथडे पहने हुए

मैने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है

 

दुष्यन्त कुमार ने ऐसी ही स्थितियों का आईना बनने की हमेशा कोशिश भी की और अपने अक्खड़पन को मूर्त रूप भी दिया। उनकी नाराजगी इन शेरों में स्पष्ट जाहिर होती है

हालाते जिस्म सूरते जां और भी खराब

चारों तरफ खराब यहां और भी खराब

खंडहर बचे हुए हैं इमारत नहीं रही

अच्छा हुआ कि सर पे कोई छत नहीं रही

 

एक शायर के रूप में दुष्यन्त अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटे समाज को जागृति प्रदान करने के लिए भी उनकी लेखनी सदैव ज्वलन शील रही। उन्होने भले ही निराशा एवं क्रोध का अधिकाधिक चित्रण किया लेकिन अंतत: उनका स्वर आशावादी ही रहा। यह उनकी हुंकार थी

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं

मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

 

दरख्तों के साए में भी धूप झेलते हुए दुष्यन्त कुमार ने हर तरह का कटु सत्य जनमानस में प्रवाहित किया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि ऐसा अद्भुत शायर न तो कभी हुआ और भविष्य में शायद ही कभी हो। हिन्दी कविताओं में कबीर के बाद इतना अक्खड़पन केवल दुष्यन्त कुमार की ही रचनाओं में उभरकर सामने आया। दुष्यन्त का अंदाजे बयां सबसे जुदा था। वास्तव में यह हिन्दी पाठकों का सौभाग्य है कि उन्हें दुष्यन्त को पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उनकी समस्त साहित्यिक सोच एवं संघर्ष शायद इसी शेर से प्रकट होता है।

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा जरूर

हर हथेली खून से तर और ज्यादा बेकरार

 

आइए इसी असर के लिए दुआ करें हम भी, दुष्यन्त को नमन करते हुए।

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रचनाकार संपर्क:

 

arun mittal अरुण मित्तल अद्भुत

एम बी ए, एम फिल, पी एच डी शोधार्थी

प्रवक्ता, (प्रबंध), बिरला प्रोद्यौगिकी संस्थान

ए. ७ सेक्टर १ नोएडा

स्थायी पता:

हरियाणा टिम्बर स्टोर

काठ मण्डी

चरखी दादरी, भिवानी

हरियाणा १२७३०६ फोन न ०१२५० २२१४८०, ०९८१८०५७२०५

- सुजान पंडित

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1- सदभावना गीत --

बेला, गुलाब, जुही, चम्पा, चमेली।

नाम अलग पर हम है सहेली॥

भारतीय - हम है भारतीय --

 

मंदिर में सजते हम मस्जिद में सजते

गिरजा-गुरुद्वारा के बेदी में चढ़ते।

अपना न जात-पात, धर्म न मजहब।

माला बन सारे देवों पे सजते॥

भारतीय - हम है भारतीय --

 

ईद, दिवाली हम मिलकर मनाते।

प्यार-मोहब्बत का पाठ पढ़ाते॥

लड़ना-झगड़ना न सीखा कभी हम।

धागे में मिलकर हम जीना सिखाते॥

भारतीय - हम है भारतीय --

 

2- मेरी चिट्ठी तेरे नाम---

चलो चलें हम बाटें, चिट्ठी एकता की।

मिलकर बाटें चिट्ठी हम सब एकता की।

मेरी चिट्ठी तेरे नाम, हिन्द के लोगों तुम्हें प्रणाम--

मेरा न कोई मंदिर मस्जिद, न गिरजा गरुद्वारा।

हम हैं एक खुदा के बंदे, एक है अपना नारा॥

चलो चलें हम बाटें--

 

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, चारों दिशाएं अपनी है।

हिन्द का कोना कोना अपना, सब भाषाएं अपनी है॥

चलो चलें हम बाटें--

इस चिट्ठी में लिखी हुई है, विश्व शांति का संदेशा।

सारे विश्व के घर आंगन में, जोत जले भाई चारे का॥

चलो चलें हम बाटें--

 

3- सरगम गीत--

म, से मंदिर, म, से मस्जिद, ग, से गिरजा, गुरुद्वारा।

सात स्वरों में छुपा हुआ है, आपस का भाईचारा॥

सा, सिखलाता है सबको, सबका ईश्वर एक है।

रे, कहता है रे मनवा, राम-रहिमन एक है॥

ग, की वाणी है अनमोल, ज्ञान की आंखें अपनी खोल,

म से मंदिर म से मस्जिद --

 

प, के स्वर में प्यार बसा है, प्यार इबादत प्यार है पूजा।

ध, है सब धर्मों की धरती, नाम अलग है न कोई दूजा॥

नि, का निश्छल निर्झर तानें, कहता जय जय हिन्दुस्तान।

शत् शत् हो तुझको परनाम, शत् शत् तुझको हो परनाम,

म, से मंदिर, म, से मस्जिद --

 

4- पंद्रह अगस्त आया--

पंद्रह अगस्त आया, जन गण मन मुसकाया।

नील गगन पर तीन रंग का विजय ध्वज लहराया॥

घर घर में हर आंगन में, सूरज किरण बिखेरा।

जुल्मों के अंधेरेपन में, आया नया सवेरा॥

मिलकर दसों दिशाएं सबसे पहले शीश झुकाया-

नील गगन पर--

 

आज यहां न कोई हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई।

सब है भारत मां के बेटे सब है भाई-भाई॥

कोई न अपना कोई पराया सबको गले लगाया-

नील गगन पर--

 

समता और स्वतंत्रता का आदर्श हमें सुहाया।

जीयो जीने दो की कसमें सबने मिलकर खाया॥

जनगण मन अधिनायक जय हे, का त्योहार है आया-

नील गगन पर--

 

5- मौसम सुहाना--

मौसम सुहाना आया रे-

पूनम का चंदा नीले गगन पर,

दूल्हन सा रूप लाया रे--

 

छेड़े मुरली की तान कोई बन में।

गाए कोयलिया सप्त सुरन में॥

कली कुसुम महक उठे, पंक्षी भी चहक उठे,

फूलों में रंग आया रे--

 

मौसम सुहाना आया रे-

देखो तारों की रात गा रही है।

चांदनी भी तो मुसका रही है॥

बरखा बहार लिए, सोलह श्रृंगार किए

श्रृतुओं का राजा आया रे--

 

मौसम सुहाना आया रे-

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संपर्क:

सुजान पंडित,

शंकर विला, कांटाटोली चौक, ओल्ड एच0 बी0 रोड, रांची-834001 झारखंड

दूरभाष - 99343 70408

 -संजय पुरोहित

नासमझ

nasamajh1''पापा, ये कविता तो मुझे बिल्कुल ही समझ नहीं आई''

''बेटा, इसमें हैरानी की क्या बात, जो समझ में आ जाए वो कविता ही क्या ?''

''लेकिन पापा, मुझे छठी क्लास की 'झांसी की रानी'', ''पाथल और पीथल'' तो पूरी समझ में भी आई, और मैंने याद भी की थी। इतने सालों बाद भी मुझे वो पूरी याद है। वो भी तो कविता ही थी ना!''

''बेटा, वो जमाना गया जब सीधी भाषा में जन भावना पर कविता की रचना होती थी, कविता में भी अब तो कई प्रयोग हो रहे हैं''

''प्रयोग!, ये आप क्या कह रहे हैं। कविता कोई मेंढक, चूहा या बन्दर है जिस पर प्रयोग हो रहे हैं''

''तुम समझे नहीं, अब कविता भी पहले जैसी नहीं रही। कोई 'नयी कविता' लिख रहा है तो कोई 'हाईकू', ये कुछ-कुछ मॉर्डन आर्ट की तरह है, जो कम ही लोगों के समझ में आता है, कवि नये-नये प्रयोग कर साहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।''

''पापा, सच-सच बताओ, क्या आपके समझ में ये नयी कविताएं आती है ?''

''बेटा, मैं एक आम भारतीय जितनी ही औसत बुद्धि का आदमी हूँ मुझे कैसे समझ में आएगी ?''

हाँ,शब्दकोश लेकर बैठूं तो शायद समझ में आ जाए लेकिन इतना समय किसके पास है''

''पापा, जब आम भारतीय व्यक्ति के समझ में ही नहीं आती तो फिर इन कविताओं को पढ़ता और समझता कौन है ?''

''बेटा हर शहर में दस हजार की आबादी में एक साहित्यकार तो होता ही है अब जितनी जनसंख्या होगी उनके अनुपात में उतने लोग साहित्यकार भी होंगे। अपने शहर में भी कम से कम पन्द्रह-बीस तो हैं ही। वो समझते हैं इन कविताओं को''

''पापा, ये तो माजरा मेरी कुछ समझ में नहीं आया, आजकल के कवि ऐसी कविताएं क्यों नहीं लिखते तो समझ में भी आ जाएं और जिन्हें गुनगुनाया जा सके और कुछ प्रेरणा भी प्राप्त हो''

''बेटा, ऐसी बात नहीं है कि कवि ऐसी कविताओं को लिख नहीं सकते, लेकिन ऐसी कविताएं लिखने से आम आदमी को समझ में भी आजाएगी और तेरे जैसे बालकों को याद भी हो जाएगी लेकिन इससे कवि का स्टेण्डर्ड डाउन हो सकता है और आउट-डेटेड होने का भय रहता है''

''पापा, मुझे तो ये समझ बात बिल्कुल भी समझ में नहीं आई''

''बेटाजी, समझने के लिये साहित्यकारों के स्तर की बुद्धिलब्धि होनी चाहिए, और वो तुममें और शायद मुझमें भी नहीं है।''

 

काली चिड़िया

मेघों के रौद्र ने जल, नभ और स्थलचरों को तिनका बना डाला। तिनका-तिनका जोड़ जमाया जीवन पुन: तिनका-तिनका हो गया। विषम परिस्थिति में हिम्मत के सिवा विकल्प न था । कंधों तक पानी में हिम्मती गरीब अनजाने बाढ़-जल से लबालब टूटी सड़क पर चलने लगे। कंधे पर बूढ़ी अम्मा और परेशानियों को लिये यह हवा से हिलते पानी के साथ डगमग होते संतुलन के साथ छोर पर पहुंचने की अनजान आस लिया वह चलता रहा। दु:खों को ओढ़नी की तरह लपेटे इसकी औरत अपने कंधों पर तीन दिनों से भूखे मुन्ने को लिये पति के फटे बनियान को पकड़े चली जा रही थी। अन्तत: पानी में भीगे कदमों ने अपेक्षाकृत कम गीली जमीन को छुआ। यह परिवार भी बाढ़ से उपजे सहायता को तरसते मानवों के समूह में शामिल हो गया। कुछ सफारी सूट पहने साहब बता रहे थे कि अभी मंत्री जी का हैलीकॉप्टर आएगा और अपने हाथों से सबको खाना देने का प्रोग्राम शुरू करेगा।

''पर साहेब'', यह बोला ''अम्मा बूढ़ी है, तीन दिन से भूखी है, और लल्ला को तो देखो साहेब, आंखें ही नहीं खोल रहा, कुछ तो दे दो''

साहेब ने आखें तरेरी और झिड़का,''अरे तीन दिन की भूख तो सहन कर ली और अब हमारे कहने से एक आध घन्टे भी रूक नहीं सकते ?, और बता, तू क्या मेरा जमाई लगता है और बाकी दुश्मन ?, ये लोकतंत्र है, यहां सभी बराबर हैं, समझे ?''

बड़ी बातों के बोझ तले और दबा यह सर खुजलाने लगा। औरत को समझाया ''हैलीकॉप्टर माने काली चिड़िया, समझी ?'' औरत ने सर हिला कर सहमति दिखाई। हैलीकॉप्टर की आवाज आई। सभी की नजर आसमान में टिकी। इसकी औरत ने लल्ला को झिंझोड़ा ''देख, लल्ला देख, वो काली चिड़िया आई'' लल्ला, जो कभी काली चिड़िया की आवाज सुन झोपड़े क़ी खपरेल से बनी मुन्डेर पर जा सिपाही की तरह तन जाता था, आज गरदन भी नहीं हिला रहा था।

मंत्री जी आ गए। फोटो सेशन हुआ। गरीबों को नियंत्रित कर लाइन से खड़ा कर खाना बांटा। यह अपना पैकेट लेकर अम्मा के पास पहुंचा, अम्मा अमूल्य निवाले की राह तकते-तकते मौत की राह पकड़ चुकी थी और लल्ला का काली चिड़िया में भर आया भोजन भी उसकी कोमल गरदन लटकने के बाद आया था।

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संपर्क:

(संजय पुरोहित) द्वारा श्री बुलाकीदास पुरोहित, बावरा निवास, समीप सूरसागर, धोबीधोरा, बीकानेर 334001

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-शंकर पुणतांबेकर

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एक नेताजी के हाल ही में साठ वर्ष पूर्ण हुए. काफी ऊँची किस्म के राष्ट्रीय नेता थे वे. अतः जब साठ साल जी लेने के उपलक्ष्य में समारोह मनाया गया, तो उसमें देश के और लोगों की तरह व्यंग्यकारों को भी निमंत्रित किया गया. हमारे हिन्दी के व्यंग्यकारों ने हरिशंकर परसाईं से लेकर बृजेश परसाईं तक बधाइयों के जो तार भेजे थे नीचे दिए जा रहे हैं -

 

 

  • आप बिना संसद के प्रधानमंत्री बनें. – हरिशंकर परसाईं
  • आपके दल-बदल नित्य सफल रहें. –शरद जोशी
  • आपके बेटे खोटे काम करें फिर भी उनका बाल बांका न हो. - रवीन्द्रनाथ त्यागी
  • सुसंग से बचें और जीवन में नित्य सफल रहें. - श्रीलाल शुक्ल
  • वर्तमान स्थिति के विपरीत चेहरे से कम उम्र के और मस्तिष्क से अधिक उम्र के लगें. – नरेन्द्र कोहली
  • सिर सलामत बना रहे पगड़ियाँ हजार हैं . – केशवचन्द्र वर्मा, श्रीनारायण चतुर्वेदी
  • आपके कानों के परदे नित्य मोटे बने रहें. – बरसानेलाल चतुर्वेदी
  • बांधने के लिए भविष्य में मुट्ठी हमेशा खुली रहे. – आत्मानंद मिश्र, संसारचन्द्र
  • बहती सत्ता में हाथ धोते रहें. – प्रभाकर माचवे, अमृतलाल नागर
  • जेलों में जाने से बचे रहकर जेलों के उद्घाटन करते रहें. – अजातशत्रु
  • आपको लोग चरित्र की थैली भेंट करें – के. पी. सक्सेना
  • आपका स्वास्थ्य लोगों की आहें पचाने लायक आगे भी बना रहे. – लतीफ घोंघी
  • राजनीति में आप नित्य राज पर ही नजर रखे रहें. – रामनारायण उपाध्याय
  • आपकी टोपी के ले सिर चलती-फिरती खूंटी न लगे. -लक्ष्मीकांत वैष्णव, हरिजोशी
  • सत्ता के बाजार में आपके दाम नित्य ऊँचे रहें. – अशोक शुक्ल
  • कुरसी आपके बिना विधवा लगे. – असीम चेतन, रामावतार चेतन
  • आपकी टोपी आपके सिर को ही नहीं, पूरे कुनबे को ढंके. - श्यामसुन्दर घोष, हनुमंत मनगटे
  • विमोचन को छोड़कर पुस्तकों से भविष्य में भी कोई सम्बन्ध न आए. – संतोष खरे
  • आपको अधिक से अधिक पार्टियों से निकाह के अवसर मिलें. -श्रीकांत चौधरी
  • हवा का रूख सूंघने की शक्ति बढ़े. – सुबोध कुमार श्रीवास्तव, विष्णुदेव पांडेय
  • आपको जनता की उम्र लगे. – प्रेम जनमेजय
  • अख़बार पचाने की शक्ति बरकरार रहे. – विश्वम्भर मोदी, यशवंत कोठारी
  • नित्य ऊँची कलम से ही नहीं, ऊँची तराजू से तौले जाएँ. – मुकुल उपाध्याय, शंकर पुणतांबेकर
  • आपको इलाज की बीमारी के सिवा कोई बीमारी न हो. – अंजनी चौहान, ज्ञान चतुर्वेदी
  • भविष्य में भी देश के मुकाबले चरित्र को टूटने दें. –सूर्यबाला
  • ग्रेशम के नए नियम का ध्यान रखें. बुरी कुरसी अच्छी कुरसी को बाजार से निकाल फेंकती है. – सरोजिनी प्रीतम
  • ख्याल रखें आदमी कर्म से नहीं कुरसी से बड़ा बनता है. – बालकवि बैरागी
  • मानद उपाधियाँ पाएँ और विश्वविद्यालय धन्य हो उठें. – रोशनलाल सुरीरवाला, श्रीबाल पांडे
  • स्मरण रहे बखत पड़े बांका तो गधे को भी कहे काका. – कमल गुप्त, श्याम गोइन्का
  • धर्मनिरपेक्षता बनी रहे धर्म-अधर्म में भेद न रहे. – विद्रोही, बटुक चतुर्वेदी
  • नयी पीढ़ी आपके सामने बूढ़ी हो और सत्ता की वरमाला नित्य आपके ही गले में शोभा पाती रहे. – कैलाशचन्द्र, यज्ञ शर्मा
  • हमेशा सरकार में रहें, असरकार में नहीं. – श्रीराम ठाकुर दादा, रासबिहारी पांडेय
  • अनेक – अनेक लोग आपके अनुगामी बने रहें. – महेश अनघ, धनराज चौधरी
  • आपको सौ-सौ राजनारायण प्राप्त हों. – रमेश शर्मा निशिकर, श्रीराम आयंगार
  • नित्य छत का खयाल रखें फर्श का नहीं. –मनीषराय यादव, जगदीश किंजल्क
  • आपके सांप मरें और कुरसी भी न टूटे. – हरीश नवल, सुरेश कांत
  • याद रहे सिर के आदमी से पद का आदमी बड़ा होता है. – व्यंगानन्द, महेश अग्रवाल
  • नित्य मुख में नारे, बगल में कुरसी रहे. – बालेन्दुशेखर तिवारी, किट्टू
  • सत्ता आपको लज्जा, नैतिकता, ईमानदारी से नित्य मुक्त रखे. – प्रदीप मेहता, नरेशचन्द्र
  • आपका इतिहास नहीं अभिनंदन ग्रन्थ लिखा जाए. – सनत मिश्र, बृजेश परसाईं

विशेष सूचना – इधर तार विभाग ने इन बधाइयों के नम्बर निर्धारित किए हैं जो तार-ऑफिस से पूछकर प्राप्त किए जा सकते हैं और पैसे बचाए जा सकते हैं. इन नेताओं ने ही अपने ये तार इस विभाग को भेजकर यह कार्य बड़ी खटपट के बाद करा लिया है. ... ये बधाइयाँ सबको खुली हैं, केवल व्यंग्यकारों को नहीं.

साभार – व्यंग्य संग्रह – विजिट यमराज की, व्यंग्यकार – शंकर पुणतांबेकर, प्रकाशक – पंचशील प्रकाशन, फिल्म कॉलोनी , जयपुर 302003

(नेताजी का चित्र – साभार अभिव्यक्ति हिन्दी.ऑर्ग)

-अरुण मित्तल अद्भुत

 

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफला: क्रिया।

नारी तुम केवल श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में,

पीयूष स्रोत सी बहा करो,जीवन के सुंदर समतल में

 

उपरोक्त हिन्दी एवं संस्कृत की अति प्रसिद्ध काव्योक्तियां न केवल नारी की पवित्रता एवं सम्मान को दर्शाती हैं, अपितु यह संकेत भी करती हैं कि जीवन के सुंदर समतल में अमृतसम बहने वाली नारी एक विश्वास के बंधन के साथ साथ कितनी कर्तव्यपरायण भी हैं। पुरातन साहित्य की इन पंक्तियों अनुवादित करते हुए मुख्य विषय यह है कि आज रचा जाने वाला पद्य साहित्य जिस पर निराला की साहित्यिक निष्ठा से लेकर उदारीकरण, निजीकरण एवं भूमण्डलीकरण तक का प्रभाव है, ने नारी की सहनशीलता, कर्तव्यपरायणता, उच्छृंखलता एवं कर्मक्षेत्र में योद्धा की भांति लड़ने वाली प्रवृत्ति को किस रूप में दिखाया है। आधुनिक हिन्दी पद्य साहित्य में नारी के लिए पर्याप्त स्थान है। परंतु जैसे-जैसे समाज में नारी ने अपना रूप बदला है। वैसे-वैसे साहित्यकारों ने उसका पीछा किया है। और साहित्य ने कम से कम इस विषय में तो, अर्थात् नारी को प्रस्तुत करते हुए समाज के दर्पण के रूप में काम किया है। साहित्य ने नारी को मुख्यत: चार रूपों मे दिखाया है। प्रथम रूप वह है जिसमें उसे देवी मानकर पूजा जाता है। ऐसी आधुनिक नारी की छवि यूं तो देखने में कम ही मिलती है। परंतु साहित्यकारों में अब भी वह सकारात्मकता है कि वो नारी को नमन करते हैं। एक युवा कवि कि कुछ पंक्तियां इस विषय में प्रस्तुत हैं

 

नारी पूजा, नारी करुणा, नारी ममता, नारी ज्ञान

नारी आदर्शों का बंधन, नारी रूप रस खान

नारी ही आभा समाज की, नारी ही युग का अभिमान

वर्षों से वर्णित ग्रंथों में नारी की महिमा का गान

 

डॉ कुंवर बेचैन की पंक्तियां नमन कराती हैं सीमा पर जाते हुए एक जवान के द्वारा अपनी बहन के स्नेह को

 

रेशमी रक्षा कवच राखी के धागों को नमन

 

औरत का दूसरा रूप जिसमे उसे वर्तमान साहित्य में सर्वश्रेष्ठ भूमिका में दिखाया गया है। वह एक ऐसा रूप है जिसमें आधुनिक महिला समाज के लिए एक आदर्श है। वह एक मां, बहन, पत्नी एवं बेटी सभी रूपों में सफल है। यह वह रूप है जिसमें आधुनिक नारी घर में सभी भूमिकाओं का सफलता से निर्वाह करती है। घर में उसके त्याग पर गुलशन मदान लिखते हैं

 

पुरुष वह लिख नहीं सकता कभी भी

लिखा नारी ने जो इतिहास घर में

 

प्रसिद्ध शायर निदा फाजली ने मां का वर्णन करते हुए कुछ ऐसी पंक्तियां लिखी हैं जिनमें नारी की सरलता का अदभुत रूप देखने को मिलता है।

 

बेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी मां

याद आती है चौका बासन चिमटा फूंकनी जैसी मां

बांट के अपना चेहरा माथा, आंखें जाने कहां गई

फटे पुराने इक अलबम में चंचल लड़की जैसी मां

 

डॉ सारस्वत मोहन मनीषी ने बड़ी ही सहजता से मां का वर्णन किया है

 

बंजर में मधुमास हुआ करती है मां

खुश्बू का अहसास हुआ करती है मां

कवि गोपालाचार्य ने बहुत ही विनम्र भाव से लिखा है

नारी घर की आन है, आंगन की है धूप

रिश्ता है विश्वास का, पूरक रूप अनूप

 

आधुनिक महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही है। और उसका परिवार की आर्थिक समृद्धि में भी भरपूर योगदान है। वर्तमान साहित्य इस पर भी कडी नजर रखता हुआ प्रतीत होता है-

 

अध्यापिका बनी है नारी ज्ञान बांटती वह फिरती है

बड़े बड़े उद्योग चलाती, अपने निर्णय खुद करती है

 

नारी का तीसरा रूप एक ऐसा रूप है जिस पर कवियों की लेखनी हर युग में सबसे अधिक चलती आई है, न जाने वह कौन सा समय था जब स्त्री को अबला की उपाधि मिल गई और वह उससे ऐसी चिपकी कि आज तक वह इससे नहीं उबर पाई। हालांकि यह भी सत्य है कि आज समाज में महिला उत्पीड़न के ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि सारा समाज शर्मशार हो जाता है। आधुनिक कवि इस दर्द पर जन मानस को जागृत करने मे पीछे नहीं हैं। भ्रूण हत्या की मानसिकता पर कवि योगेन्द्र मौदगिल का शेर-

 

नहीं चाहिए मुझको पोती

दादी का फरमान हो गया

 

दहेज प्रथा पर वह लिखते हैं-

कब तलक यूं ही जलाई जाएंगी

कागजी नोटों के बदले बेटियां

 

युवा कवि अदभुत के शब्दों में

वो घर आंगन को महकाती रचती सपनों का संसार

पर निष्ठुर समाज ने उसको दिया जन्म से पहले मार

 

डॉ सारस्वत मोहन मनीषी भ्रूणहत्या पर बहुत ही मार्मिक कविता में लिखते हैं-

मैं तेरे आंगन की तुलसी तेरे हाथ कटारी मां

जन्म पूर्व ही मार दिया क्यूं बोल अरी हत्यारी मां

 

आधुनिक कवियों ने नारी के एक अबला, बेबस और लाचार रूप को भी कविताओं में उकेरा है शायर गुलशन मदान लिखते हैं-

इक तवायफ पेट भरती है यहां

रोज अपनी बेबसी को बेचकर

 

डॉ रश्मि बजाज के शब्दों में-

बैठे हैं अब करते प्रतीक्षा/आएगा अवतार करेगा रक्षा/

हर गली हर कूँचे में/अपमानित द्रौपदी।

 

पुरूषोत्तम दास निर्मल आधुनिकता की दौड में नारी देह के दुरूपयोग पर व्यंग्य कसते हैं

औरत के साथ आदमी का देखिए सुलूक

ब्यूटी के नाम चीरहरण कर रहें हैं लोग

 

साहित्य ने केवल नारी पर हो रहे इन अत्याचारों को ही नहीं दिखाया अपितु नारी को जागृत एवं उत्साहित भी किया है ताकि वह न केवल स्वयम् पर हो रहे आघातों से बच सके एवं अपने ऊपर हुए जुल्मों का प्रतिशोध ले सके।

लोक कवि महेन्द्र सिंह बिलोटिया को इसका पूरा विश्वास भी है। वह लिखते हैं

काली बनकर जब कामिनी खंजर हाथ उठाएगी

दुर्गा रूप धरकर नारी दुष्टों से टकराएगी

 

कवि मक्खनलाल तंवर ने अत्याचारों के विरुद्ध नारी का आह्वान किया

खड्ग थाम अपने हाथों में महाकाली बनना होगा

अबला के अत्याचारी का शीश कलम करना होगा

 

नारी हर कठिन से कठिन वक्त में चट्टान बनकर खडी हो सकती है, नारी ने हर युग में ऐसे कार्य किए हैं जिनकी कल्पना करना भी दुष्कर है। इसका इतिहास गवाह है। प्रसिद्ध कवि हरिओम पंवार उस सैनिक की पत्नी को नमन करते हैं जिसने अपने शहीद पति की अर्थी को कंधा दिया था। समस्त विश्व के इतिहास में यह पहली घटना थी। उन्होने लिखा-

वो औरत पूरी पृथ्वी का बोझा सर ले सकती है

जो अपने पति की अर्थी को भी कंधा दे सकती है

मैं ऐसी हर देवी के चरणों में शीश झुकाता हूं

इसीलिए मैं केवल कविता को हथियार बनाकर गाता हूं

 

नारी का चौथा रूप वो रूप है जिसकी साहित्य ने आलोचना की है। इस रूप में नारी उच्छृंखल है और उसने सामाजिक मर्यादाओं को तोडा है। साहित्य इस विषय पर भी अपनी पैनी नजर रखता है। कवि असलम इसहाक की दो क्षणिकाएं इसका प्रमाण हैं

नेताजी ने/ आधुनिक छात्रा की पोशाक देखकर कहा

विचार और वस्त्र /दोनों जरा ऊंचे हैं।

एवं

आधुनिक महिला ने सखी से

अपने पति का परिचय कराया

किचन के कोने में/जो लगा है धोने में/चाय का प्याला

सखी वही है मेरा घरवाला।

 

उपर्युक्त विश्लेषण वर्तमान हिन्दी पद्य साहित्य में नारी के कुछ पहलुओं को दिखाता है। बहुत सी सूक्ष्म बातें ऐसी भी होती हैं कि कई बार किसी सीमा के कारण साहित्यकार जिन्हें नहीं छू पाता। फिर भी यह विश्लेषण एक बात तो सिद्ध करता ही है कि वर्तमान कवि जागरूक है और समाज के लिए अपने योगदान का उत्तरदायी भी। नारी के चाहे कितने ही रूप हों या रहे हों परंतु उसकी असीम शक्ति ने समाज को सदैव एक नई दिशा देने का कार्य किया है। जिसके कारण वह सदा ही वंदनीय रही है और रहेगी। और वर्तमान साहित्य भी इस तथ्य को स्वीकार करता है।

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रचनाकार संपर्क:

अरुण मित्तल ‘अद्भुत’`

(एमबीए, एमफ़िल, लेक्चरर, बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉज़ी)

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· आर.के.भंवर

r k bhanwar हमारे स्वनामधन्य एवं गुणज्ञ महापुरूषों ने देश की व्यवस्था में सुधार लाने के लिए बड़े-बड़े काम किये है और नारे दिये है। नारे वही लोग देते है जो मनसा वाचा कर्मणा उन पर अमल कर चुके होते। तभी तो इन नारों का प्रभाव लोगों पर पड़ता है। किसी संत ने पहले गुड़ खाना छोड़ दिया तभी बुढ़िया के बेटे से कहा था कि उसे गुड़ नही खाना चाहिए । ऐसी बाते अंदर तक घंटी बजाती है।

इन्हीं महापुरूषों में से एक ने देश को नारा दिया था '' सत्यमेव जयते '' । '' सत्य '' पहले से था किन्तु रजिस्टर्ड नही था । दरअसल नारा देना और देश की उस नारे के प्रति स्वतंत्र स्वीकारोक्ति ही नारें का रजिस्टर्ड होना कहलाता है। अब सब जान गये कि सत्य की जीत होती है। स्कूलों, थानों, कार्यालयों, न्यायालयों, संसद, विधान सभाओं अर्थात् सभी महत्वपूर्ण ठिकानों पर '' सत्यमेव जयते '' लिखा हुआ पाया जाने लगा। थाने में दरोगा जी की कुर्सी के ठीक ऊपर ' सत्यमेव जयते ' पढ़ने को मिलेगा। चुनांचे जहां-जहां सत्य जा कर स्वयं को कृतार्थ कर सकता था, वहां-वहां वह पहुंचा। किताबों, सेमिनारों, सामूहिक-चर्चाओं से लेकर बड़े-बडे व्याख्यानों में गया। पर ' व्यवहार ' में देखा गया कि सत्य तो पोथियों में कैद है। मानते है कि ' सत्य ' की जीत होती है। 'सत्यं वद, धर्मं चर ' यह भी कुछ दुविधा में है। कि सत्य को वंदना चाहिए व धर्म को चर जाना चाहिए। बहरहाल मैं ग्रेज्युएट था सो इतना फर्क तो कर सकता था कि सत्य को बोलना चाहिए । सत्य के लिए आग्रह करना आवश्यक है। इसलिए एक दिन ठान के निकला कि चाहे जो हो जाए, आज सत्य ही बोलूंगा। सौ में सूर सहस्त्र में काना यानी एक अंधा 100 के बराबर व एक काना हजार के बराबर होता है। एक दफ्तर में काम के लिए गया तो दफ्तर के एकनयन बड़े बाबू को काने जी नमस्कार कह दिया, तो मेरी दुर्गति कर दी गई। वापस आते समय रास्ते में एक व्यक्ति मरी भैस की खाल उतार रहा था, उसे चमा... जी कहते ही वह गरम हो गया और लाठी लेकर मुझे दौड़ा लिया। सोचा सब गलत लिखा है। इससे ' काम ' कहां चलता है। सत्य के भी ' भेद ' हो गये। ' सत्यं ब्रूयात्, अप्रिय सत्यं न ब्रूयात् ' - अर्थ यह है कि ' सत्य ' प्रिय और अप्रिय के वर्गीकरण में फंस गया है। इसलिए सत्य बोलने के लिए बी.ए. के बाद पी-एच.डी. कर लेनी चाहिए।

इधर लोगबाग सत्य में कम रूचि लेने लगे । उन्हें सत्य किताबों एवं अध्यापकों के पढ़ानें तक अच्छा लगता था, आगे नहीं। क्या हो देश का, देश तो नारों के बगैर बढ़ेगा नहीं। सत्य की दुर्गति देश के किस हिस्से में नहीं हो रही भला , कुल जमा यह उसकी दुर्गति मुंबई के खैरनार बन चुकी थी। महापुरूष देश को नाराशून्य कैसे बनाये रहे ! एक नारा आया ' श्रममेव जयते ' ! मेहनतकश मजदूरों का कहना ही क्या ! कबहुं सुनौगो दीनदयाल, लो भैया सुन लिये दीनदयाल। अब मजदूर वर्ग डटकर काम करने लगे, काम तो पहले भी करते थे, पर पहले का काम करना अपंजीकृत था। अब चौड़े से, कहना ही क्या। बोल जवान हईसा ... हिम्मत कर ले हईसा ........ देश तरक्कियों चढ़ने लगा। । कल कारखाना हो या हो दफतर, स्कूल हो या हो कोई वर्कशॉप - सब श्रम की बलिहारी । मिल का सायरन टोटली धर्मनिरपेक्ष और जातियां, धर्म एवं रंग भेद के तेवर हाशिये पर सिकुड़ गये थे। श्रमिक होना अपने आप में गर्व का विषय था। गर्व से कहो हम श्रमिक है। पर धीरे-धीरे श्रम में लोगों की दिलचस्पी कम होने लगी। कारण जो तथाकथित श्रमिक थे वे शार्टकट में भरोसा रखते थे। शार्टकट इस तरह का कि श्रम कम लगे, माल ज्यादा मिले। माल समझ गये न, माल। अपने ही लोगों ने श्रममेव जयते का नारा भी खारिज कर दिया।

देश का क्या होगा। देश बिना नारों के चलेगा कैसा। कोई न कोई ऐसा होगा ही जिसे यह हिम्मत करनी पड़ेगी। देश में अब बड़े महानुभावों और महात्माओं का भी अभाव था। इस शून्यता को कैसे भरा जाये ?

रिश्वत सृष्टि के बनने के समय भी थी। पहले आये नजराना, शुक्राना, मेहनताना, हकराना, जबराना फिर उपहार, उत्कोच जैसे शब्द घूस, रिष्वत के रूप में समय-समय पर सत्याग्रह की तरह टूटते, बिगड़ते और बनते रहे। लोग चोरी, छिपे और नजरे बचाकर लेते थे। कहीं-कहीं अंग्रेजी का रौबदार 'कमीशन' के रूप में बरस पड़ता था - सर इसमें इतना पर्सेन्ट कमीशन का होगा , ये बातें खुलकर इसलिए हो जाती थी कि अंग्रेजी का मामला है। हिन्दी में घूस लेने को बड़ी हिकारत से सिद्धान्त नवीस लोग देखते थे। '' वो रहा घुसहा बाबू '' ... हालांकि ये लोग अंग्रेजी के कमीशन , गिफ्ट से कतई परहेज नहीं करते थे। व्यवहार में लोग लेते थे, वह भी चोरी-छिपे। एक बात और घूस शब्द केवल बाबू के स्तर के कर्मचारी के लिए होता है। बकिया जितने भी अंग्रेजी शब्द हैं वे अफसरों के लिए ही वाजिब होते है। ये पांच सौ से ऊपर की रकम के लिए होते है।

मुझसे रहा नही गया। यह ओढ़ी हुई नैतिकता किस काम की। मैंने आनन-फानन में '' रिश्वतमेव जयते '' का नारा दे कर देश पर बड़ा अहसान किया। देश में नारे के अभाव का संकट दूर हो गया। वैसे भी हमारे महापुरूष पूर्वजों ने समय समय पर देश की अर्थ व्यवस्था को सुधारने के उद्देश्य से जो अच्छे एवं बुद्धिमानी के काम किये उनमें धन का गुप्त आदान प्रदान प्रमुख है। मनसा कर्मणा जो इस लेनदेन की पद्धति का अनुसरण करते है, वे सुखी रहते है, उनके बच्चे इन्जीनियर, अफसर और डाक्टर बनते हैं, घरवालियां भी तरह तरह के रंगों से अपने होंठ रंगती है, नाखूनों को संवारती है। धन के लेन देन को घूस या रिश्वत कहते है। रिश्वतमेव जयते .... अब क्या था, कहना ही क्या, '' रिश्वत सर्वत्र विराजयते '' । दफ्तर का अफसर बोला ....... ठीक है आप दें अप्लीकेशन, नीचे से फाईल चलवा लीजिए, मेरे पास आयेगी तो समझ लेंगे .....। नीचे से माने कल का सत्यवाची श्रमिक। नीचे वाला बोला - आप दस दफे आयेंगे, आने-जाने में खर्चा तो होगा ही, आप समझिये काम आपका है, और काम होना है। अब आप समझ गये हो तो आप का काम डन ... । वरना दृ...। दरअसल घूस वेतन संचयिका का काम करती है। वह साल के बारहों महीने अछूती या आप कहिये कुमारी कन्या बनी रहती है। कचहरियों, समाजसेवियों और मुंसिफाना काम करने वाले किसी भी जाति, रंग-रूप, मजहब के कर्मियों में भी अब इसकी पैंठ हो चुकी है।

रिश्वत भ्रष्टाचार की जवान बेटी है जो पूरे देश में घूम-घूम कर डोरे डाल रही है। जहां-जहां जाती है, वहीं लोगों को अपना बनाकर छोड़ आती है। शिक्षा, राजनीति, शासन, न्यायपालिका शायद ही कोई महकमा बचा हो जहां यह न जाती हो। रिश्वत बाढ़ का पानी है। सारे तटबंधों को तोड़कर सामाजिक ढांचे को तहस-नहस करने पर आमादा है। पैसा लाईए .. काम कराईए .... ऐसे में प्रेमचन्द का बुधिया कहां टिकता है। ऐसी व्यवस्था में मान भी ले कि बुधिया कहीं या किसी स्तर पर अपना काम कराने में सफल हो जाता है तो उसकी किस्मत या पूर्व जन्म के संस्कार ही माने जायेंगे।

गिव एण्ड टेक ने डिवाईड एण्ड रूल की जड़ों को और पुख्ता कर दिया है। दीमक से घुनी लकड़ी पर रंग-रोगन ...... मेरा भारत महान .... जय हो .... मुझे खुशी है कि मेरा दिया गया नारा सुपरहिट है।

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संपर्क:

आर. के. भंवर

सूर्य सदन, सी-501/सी, इंदिरा नगर,,लखनऊ(उ0प्र0)-226016 फोन नं0 - 0522-2345752 मोबाईल नं0 : 9450003746

- सीताराम गुप्ता

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बच्ची

 

एक व्यक्ति रेलगाड़ी में सफर कर रहा था। दोपहर को जब उसे भूख लगी तो उसने अपना खाने का डिब्बा बाहर निकाला और खाना खाने लगा। खाने के साथ प्याज भी रखा था। प्याज काटने के लिए उस व्यक्ति के पास चाकू वग़ैरा तो था नहीं इसलिए प्याज को सीट पर रखकर मुक्का मारकर उसे तोड़ने लगा। प्याज पर मुक्का लगना था कि प्याज के बीच का हिस्सा जिसे बच्ची कहते हैं छिटककर रेलगाड़ी के डिब्बे की खिड़की से बाहर जा गिरा। इस व्यक्ति ने शोर मचा दिया कि उसकी बच्ची गाड़ी से बाहर गिर गई। लोगों ने सुना तो उन्होंने जंजीर खींच दी और रेलगाड़ी रुक गई। वह व्यक्ति फुर्ती से रेलगाड़ी से नीचे उतरा और ढूँढ़कर बच्ची को उठा लाया। गाड़ी रुकने पर दूसरे डिब्बों के यात्राी भी आ गए और पूछने लगे कि क्या हुआ? लोगों ने बताया कि किसी की बच्ची गिर गई थी।

''किस की बच्ची गिर गई थी? क्या बच्ची मिल गई?'' ये पूछने पर उस आदमी ने जो रोटी खा रहा था कहा, ''हाँ, बच्ची मिल गई।'' जब लोगों ने ये पूछा कि बच्ची को चोट तो नहीं लगी तो उस आदमी ने जवाब दिया, ''चोट तो नहीं लगी पर मिट्टी में गिरने से जरा किरकिरी हो गई।''

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जबान के पक्के

 

सुरजे अपनी बड़ी लड़की की शादी के लिए लड़के की तलाश में एक दूसरे गाँव में अपने एक परिचित दलीप के पास गया और उससे कोई ठीक सा लड़का दिखाने के लिए कहा। दलीप ने अपने पड़ौस में एक लड़का दिखाया और उसके माँ-बाप से बातचीत भी करवाई। लड़का खेती-बाड़ी करता था और उसकी उम्र बताई गई थी पच्चीस साल। किन्हीं कारणों से यहाँ रिश्ते की बात पक्की न हो सकी। सुरजे की लड़की की शादी कहीं और हो गई।

सुरजे की एक और लड़की भी थी जो बड़ी लड़की से पाँच साल छोटी थी। पाँच साल बाद सुरजे छोटी लड़की की शादी के लिए लड़के की तलाश में फिर उसी गाँव में अपने परिचित दलीप के पास जा पहुँचा जहाँ बड़ी लड़की के लिए लड़का देखने गया था लेकिन बात नहीं बनी थी। सुरजे उस बात को भूल चुका था। इस बार फिर दलीप सुरजे को लड़का दिखाने ले गया और संयोग से उसी घर में जा पहुँचे जहाँ पाँच साल पहले भी गए थे। वहाँ जाकर सुरजे को याद आया कि ये तो वही लड़का है जिसे पाँच साल पहले बड़ी लड़की के लिए देखने आया था। बातचीत का दौर शुरू हुआ और लड़के के माँ-बाप ने बताया कि लड़का खेती-बाड़ी करता है और उम्र है पच्चीस साल।

सुरजे ने कहा, ''भई क्या माजरा है? मैं पाँच साल पहले आया था तब भी आपने लड़के की उम्र पच्चीस साल बताई थी और आज भी पच्चीस साल बता रहे हो।''

लड़के के बाप ने कहा, ''देखो भाई हम इस किस्म के आदमी नहीं है जो आज कुछ कहें और कल कुछ कहें। हम अपनी जबान के पक्के हैं और आप पाँच साल बाद भी पूछोगे तो भी लड़के की उम्र पच्चीस साल ही बताएँगे।''

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निमंत्रण

 

रामनाथ के लड़के की शादी की तारीख़ नजदीक आ गई थी लेकिन उसके पड़ौसी भगवाना को अभी तक शादी का या बारात में जाने का निमंत्रण नहीं मिला था। पहले लोगों को बारात में जाने का बड़ा शौक होता था ख़ासकर गाँवों में। भगवाना की भी बड़ी इच्छा थी कि रामनाथ के लड़के की बारात में सम्मिलित हो। पहले बारात दो-दो दिन रुकती थी और ख़ूब ख़ातिरदारी होती थी। अपने गाँव से बाहर जाने तथा बस या रेलगाड़ी में बैठने का अवसर ऐसे ही मौकौं पर मिलता था अत: भगवाना की उत्सुकता भी स्वाभाविक थी। उसने सोचा कि ऐसा क्या करे जिससे बारात में जाने का निमंत्रण मिल जाए। भगवाना इसी उधेड़बुन में था कि अचानक उसने दिमाग़ में एक विचार आया। वह सीधे रामनाथ के घर आया और उससे पूछा, ''हाँ भई रामनाथ शादी की तारीख़ तो एकदम नजदीक आ गई। शादी की सारी तैयारी तो हो गई न?'' ''हाँ, सारी तैयारी हो गई,'' रामनाथ ने जवाब दिया। भगवाना ने फिर पूछा, ''बारातियों की लिस्ट बना ली?'' रामनाथ ने बताया कि बारातियों की लिस्ट तो नहीं बनाई है। ''फिर क्या तैयारी हो गई शादी की? सबसे पहले लिस्ट बना बारातियों की'', भगवाना ने कहा। रामनाथ काग़ज और पैंसिल ले आया और भगवाना से कहा, ''ऐसा कर तू ही बनवा दे न बारातियों की लिस्ट!''

भगवाना बारातियों की लिस्ट बनवाने लगा। उसने कहा, ''सबसे पहले अपना और अपने सारे भाइयों के नाम लिख। फिर मेरा नाम लिख भगवाना।'' इतना लिखवाकर भगवाना ने कहा, ''बाकी लिस्ट तू ख़ुद बना ले मैं तो खेत की तरफ जा रहा हूँ।'' रामनाथ ने कहा कि लिस्ट पूरी तो करवा दे। भगवाना ने कहा, ''अब उन लोगों के नाम और लिख ले जिनके यहाँ तुम्हारा आना-जाना है। लिस्ट पूरी और क्या?'' ''हाँ सबको ख़बर कर देना और मेरी चिंता मत करना मैं अपने आप ठीक टाइम पर पहुँच जाउँगा,'' चलते-चलते भगवाना ने रामनाथ को आश्वस्त करते हुए कहा।

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तथा
''गुरु के मूल्यांकन की कसौटी है उसके शिष्यों का आचरण''

-सीताराम गुप्ता

sitaram gupta साधु-संत त्याग, तपस्या और सहनशीलता तथा क्षमा की प्रतिमूर्ति होते हैं इसमें संदेह नहीं। इसी से संत की जीवन अनुकरणीय तथ प्रेरणास्पद होता है। एक शिष्य अथवा अनुयायी की चरितार्थता इसी में है कि वह अपने गुरु के आचरण को जीवन में उतारे। यही बात धर्म के संबंध में भी कही जा सकती है। धर्म वह है जो हमें व्यवस्थित करे, हममें सकारात्मक गुणों का विकास करे। हमें राग-द्वेष, हिंसा, क्रोध, अहंकार, अविद्या, असत्य, असहिष्णुता आदि नकारात्मक भावों से बचाए। एक धार्मिक व्यक्ति की चरितार्थता भी इसी में है कि वह अपने धर्म पर की गई किसी भी टिप्पणी पर उत्तेजित न हो और अपने धर्म के विरोध में बोलने वाले को भी क्षमा कर धैर्य का परिचय दे। यह कोई बहुत बड़ी बात नहीं है अपितु धर्म का अनिवार्य तत्व है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता है तो वह धार्मिक होने का ढोंग तो कर रहा है लेकिन सही अर्थों में धार्मिक नहीं है क्योंकि किसी भी धर्म में धर्म की रक्षा के लिए उत्तेजना, अधैर्य, असहिष्णुता अथवा हिंसा का कोई स्थान नहीं है अपितु इनकी निंदा की गई है। प्राय: धर्म की रक्षा के दंभ में हम पूर्णत: अधार्मिक या धर्महीन हो जाते हैं।

 

कई बार ऐसा होता है कि किसी साधु-संत का जाने-अनजाने में अपमान हो जाता है या उसे सामान्य लोगों के मुकाबले विशिष्ट सम्मान या छूट नहीं मिल पाती तो उसके शिष्य आपे से बाहर हो जाते हैं। हंगामे और हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। नारेबाजी और अभद्र आचरण का प्रदर्शन तो सामान्य बात है कई बड़े नाम वाले गुरुओं के शिष्यों के लिए। इस प्रकार की घटनाएँ शिष्यों या अनुयायियों की पात्रता पर ही प्रश्नचिह्न लगा देती हैं और शिष्यों या अनुयायियों का आचरण गुरु की पात्रता पर।

साधु-संत सदैव न केवल नकारात्मक वृत्तियों और भावों के त्याग का उपदेश देते हैं अपितु अपने आचरण से भी उसे सिद्ध करते हैं। उनका आचरण ही उनका संदेश होता है और होना भी चाहिये। श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है :-

 

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तादेवेतरो जन:।

स: यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ 3:21

 

महापुरुष जो-जो आचरण करता है, सामान्य व्यक्ति उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने अनुसरणीय कार्यों से जो आदर्श प्रस्तुत करता है, संपूर्ण विश्व उसका अनुसरण करता है। सभी संत, सभी महापुरुष राग-द्वेष, घृणा, वैमनस्य, क्रोध, उपेक्षा, ईर्षा, अहंकार, असहिष्णुता, हिंसा आदि के सर्वथा त्याग का उपदेश देते हैं। समता में स्थापित होने की बात होती है। मानापमान, सुख-दुख, लाभालाभ आदि परस्पर विरोधी भावों से ऊपर उठने की बात की जाती है। पर क्या ये बातें मात्र सुनने-सुनाने के लिए हैं आचरण में उतारने के लिए नहीं? गुरु का दर्जा भगवान से भी ऊँचा माना गया है। गुरु महत्वपूर्ण है। ज्ञान का स्रोत और संवाहक है गुरु। ज्ञान से तात्पर्य सूचनाओं के आदान-प्रदान अथवा भौतिक जगत की वस्तुओं की जानकारी से नहीं है। शास्त्रों का पठन-पाठन या स्वाध्याय अथवा सत्संग भी ज्ञान नहीं है। ज्ञान है स्वयं की जानकारी। आत्मज्ञान ही सही अर्थों में ज्ञान है। गुरु शास्त्रों के माध्यम से अपने आचरण में रूपांतरण द्वारा ज्ञान का संवाहक बनता है। ज्ञान अर्थात् रूपांतरण का माध्यम है गुरु एक शिष्य के लिए। यदि गुरु अपने आचरण द्वारा शिष्य के रूपांतरण में असफल रहता है तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि गुरु स्वयं आत्मज्ञान को प्राप्त नहीं हुआ है और जिसने आत्मज्ञान नहीं प्राप्त किया, स्वयं का रूपांतरण नहीं किया, वह दूसरों को इसका आभास कैसे करा सकेगा। यदि रूपांतरण की प्रक्रिया सम्पन्न नहीं होती है तो बाह्य ज्ञान भार के समान है जो मिथ्या अहंकार का कारण बनता है जिसके फलस्वरूप द्वंद्व की उत्पत्ति होती है।

 

आज किसी ने किसी के धर्म या धर्मगुरु पर टिप्पणी कर दी तो ख़ून की नदियाँ बहने लगती हैं। धर्म की रक्षा के लिए सरफरोशी की तमन्ना लिए लोग सरों पर कफन बाँध के निकल पड़ते हैं। सरफरोशी तो होती है पर धर्म की रक्षा नहीं। क्या धर्म इतना कमजोर, इतना क्षणभंगुर होता है कि कोई दो शब्द कहे और वो मिट्टी में मिल जाए। धर्म न हुआ काँच का खिलौना हो गया। शीशे की अलमारी में बंद करके रखो। कोई छू देगा तो अपवित्र हो जाएगा या टूटकर बिखर जाएगा। धर्म न हुआ कच्ची मिट्टी का कसोरा हो गया जो पानी लगते ही घुलने लगेगा और हमेशा के लिए अदृश्य हो जाएगा। यदि आपका धर्म, आपका मत या संप्रदाय इतना ही नाजुक, इतना ही कमजोर और क्षणभंगुर है तो उसे टूट जाने दीजिए। ऐसा धर्म आपको क्या संभालेगा? आपकी क्या रक्षा करेगा? जो अपनी ही रक्षा नहीं कर सकता वह दूसरों की क्या रक्षा करेगा? किसी मजबूत धर्म की शरण में चले जाइये या नये धर्म का आविष्कार कर लीजिए या बिना धर्म के ही रह जाइये लेकिन एक धर्म को मत छोड़िये और वह है मनुष्य धर्म। मनुष्यता है तो सभी धर्म हैं नहीं तो बाहरी धर्म को ढोकर ही क्या होगा?

 

हम कभी धर्म की रक्षा के लिए आगे आते हैं तो कभी संतों के बचाव में आगे आते हैं पर क्या धर्म या संत इतने कमजोर होते हैं कि उनकी रक्षा के लिए धर्मावलंबियों या अनुयायियों अथवा शिष्यों को आगे आना पड़े। धर्म की रक्षा या स्थापना के लिए संत हैं और संतों की रक्षा के लिए धर्म है। जहाँ तक मानापमान या बेइज्जती की बात है किसी को भी ये अधिकार नहीं कि बेवजह किसी का अपमान करे। एक संत के अपमान का तो प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि संत तो वही है जो मानापमान से ऊपर उठ चुका है। यदि मानापमान की बात करें तो क्या नियम पालन में ही किसी का अपमान हो गया? कदापि नहीं। विषम परिस्थितियाँ या अपमानजनक स्थितियाँ मनुष्य को ऊँचा उठाने के लिए आती हैं। कहा गया है कि ''असम्मानात् तपोवृद्धि: सम्मानात्तु तप: क्षय:'' अर्थात् असम्मान से तपस्या में वृद्धि होती है और सम्मान से तपस्या का क्षय होता है। अपमान की अवस्था धैर्य और सहिष्णुता की परीक्षा ही तो है साथ ही अधिक धैर्य और सहिष्णुता के विकास का अवसर भी। कबीर ने भी कहा है कि 'निदंक नियरे राखिये'। कहीं निंदा या सही आलोचना के अभाव में अथवा अधिक सम्मान के कारण ही तो ये गड़बड़ नहीं हो गई?

 

संत का मूल स्वभाव है क्षमा करना। बार-बार और बिना माँगे क्षमा करना। धर्म इसमें सहायक होता है। धर्म ही मानापमान सहना तथा विषम परिस्थितियों में आगे बढ़ना सिखाता है। सहिष्णुता का विकास करता है धर्म। एक कथा है सबने सुनी होगी। एक संत नदी में स्नान कर रहे थे। एक बिच्छू पानी की तेज धार में बहता हुआ जा रहा था। संत ने उसकी प्राणरक्षा के निमित्त उसे अपनी हथेली पर उठा लिया। जल से बाहर आते ही बिच्छू ने संत की हथेली पर डंक मारा। संत पीड़ा से तिलमिला उठे और झटके के कारण बिच्छू फिर पानी में जा गिरा और बहने लगा। दयालु संत ने बिच्छू के प्राणों की रक्षा के निमित्त पुन: उसे हथेली पर उठा लिया। बिच्छू ने फिर डंक मारा। संत बिच्छू को बचाने के उपक्रम में लगे रहे और बिच्छू उन्हें डंक मारता रहा। यह सब देखकर एक शिष्य ने पूछा, ''गुरुजी जब यह कृतघ्न जीव आपको बार-बार पीड़ा पहुँचा रहा है तो आप क्यों व्यर्थ इसकी प्राणरक्षा में अपने को संकट में डाल रहे हो?'' संत ने कहा कि वत्स अपना-अपना स्वभाव है। अपना-अपना धर्म है। जब यह अपना स्वभाव नहीं त्यागता तो मैं अपना स्वभाव क्यों त्यागूँ? बिच्छू का स्वभाव है डंक मारना और साधु का स्वभाव है क्षमा करना। उसकी ग़लती के लिए क्षमा नहीं किया जाएगा तो उसके प्राणों की रक्षा कैसे होगी? उसके प्राणों की रक्षा नहीं होगी तो धर्म का पालन कैसे होगा? धर्म की रक्षा बदले की भावना या हिंसा से नहीं अपितु स्वयं के त्याग और उत्सर्ग द्वारा ही संभव है। जब धर्म की रक्षा के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है तब धर्म की प्रासंगिकता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाता है। धर्मावलंबियों के आचरण से धर्म का ही मूल्यांकन हो जाता है और गुरु का मूल्यांकन करता है उसके शिष्यों का आचरण।

 

'आज का धर्म'

 

- सीताराम गुप्ता

 

'धर्म' वो

बेड़ियाँ अज्ञान की

जो काट दे,

आज का जो धर्म है

धर्मसंकट में वो डाल दे

न जीने दे

न मरने दे

न मुक्त होने दे

मुक्त करने की बजाए

बेड़ियाँ कुछ और घट में डाल दे।

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sitaram gupta

'आवभगत'

कई बार कालबेल का बटन दबाने के उपरांत अंदर से एक युवती निकल कर बाहर आई और बरामदे में से ही ऊँची आवाज में पूछा, ''यस? क्या बात है? किससे मिलना है?'' वर्मा जी ने बतलाया कि मैं रामनारायण जी के ऑफिस में ही काम करता हूँ और उन्हें कुछ जरूरी कागजात देने आया हूँ। ये सुनकर युवती ने कहा कि मैं अभी पापा को बुलाती हूँ और बिना गेट खोले ही जीने से ऊपर चली गई। लगभग पन्द्रह मिनट बाद रामनारायण जी जीने से नीचे उतरते दिखलाई पड़े। साथ ही उनकी बेटी भी एक हाथ में एक ट्रे में पानी से भरा एक गिलास रखे उनके पीछे-पीछे नीचे उतर रही थी। बाहर तेज धूप थी। रामनारायण जी ने लोहे का भारी गेट खोलते हुए पूछा कि भई वर्मा जी इतनी तेज गर्मी में दोपहर के वक्त कैसे आना हुआ? अंदर बरामदे में आने पर वर्माजी ने काग़जों का एक पुलिंदा उनकी ओर बढ़ा दिया। रामनारायण जी वहीं बरामदे में खडे होकर काग़जों को देखने लगे। काग़जों को देखने के बाद रामनारायण जी के चेहरे पर रौनक आ गई और कहने लगे कि वर्मा तुमने बहुत अच्छा किया जो ये पेपर्स मुझे फौरन देने के लिए आ गये। इतना कहकर उन्होंने बेटी के हाथ से ट्रे लेकर पानी का गिलास वर्माजी की ओर बढ़ाते हुए कहा कि लो पहले पानी पीओ। इतनी गर्मी है प्यास लगी होगी। वर्माजी ने गिलास अभी होंठों से लगाया भी नहीं था कि रामनारायण जी ने वहीं बरामदे में खड़े-खड़े पूछा, ''वर्माजी क्या सेवा करूँ आपकी? आओ अंदर तो चलो!'' वर्माजी ने गिलास का सारा पानी एक ही झटके में हलक से नीचे उतार कर कहा कि धन्यवाद रामनारायण जी अब इजाजत दीजिए। रामनारायण जी ने हाथ में पकड़ी हुई ट्रे वर्माजी की ओर बढ़ा दी। वर्माजी ने खाली गिलास आहिस्ता से ट्रे में रख दिया और धीरे-धीरे चलते हुए गेट से बाहर आ गए। रामनारायण जी ने झटके से लोहे का भारी गेट बंद करके कुंडी चढ़ा दी।

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'मिठाई का डिब्बा'

जीवन में कभी ऐसा नहीं हुआ जब सुनील बाबू कभी किसी के घर खाली हाथ गए हों। शादी-ब्याह में क्या मजाल जो कोई भी मेहतान बिना मिठाई के चला जाए। ख़ुद मुख्य द्वार पर उपस्थित रहेंगे और सभी मेहमानों को आदर-मान के साथ विदा करेंगे। सुनील बाबू के इकलौते बेटे की शादी का रिसेप्शन था। भव्य समारोह आयोजित किया गया था। मेहमान खाने-पीने और नाचने-गाने में मशग़ूल थे। पर सुनील बाबू हस्बे-मामूल मुख्य द्वार पर डटे हुए थे। कुछ देर पहले आगंतुकों का स्वागत कर रहे थे और अब उन्हीं को विदाई दे रहे थे। उनके करीब ही मिठाइयों के छोटे-बड़े विविध प्रकार के डिब्बों का पहाड़-सा खड़ा था। जैसे ही कोई मेहमान जाने के लिए इजाजत माँगता सुनील बाबू नौकर की ओर इशारा करते। उनका पुराना ख़िदमतगार राम बहादुर फौरन एक डिब्बा उठाता और सुनील बाबू को थमा देता। सुनील बाबू उसे मेहमान को सौंपते हुए उसके आने का धन्यवाद करते और झुक कर प्रणाम करते। ज्यों-ज्यों समय सरकता गया मेहमानों की वापसी में भी तेजी आने लगी। विदा लेने वाले मेहमानों की लाइन-सी लग गई। इसी लाइन में सबसे अंत में खड़े थे जय प्रकाश जी। सुनील बाबू के ख़ास परिचितों में रहे हैं जयप्रकाश जी और साथ ही रिश्तेदार भी। उन्होंने भी इजाजत माँगी। नौकर ने जैसे ही मिठाई का एक डिब्बा जय प्रकाश जी को देने के लिए सुनील बाबू के हाथ में थमाया सुनील बाबू ने डिब्बे को वापस नौकर को देते हुए अत्यंत धीमी लेकिन स्पष्ट आवाज में कहा कि लोगों की हैसियत तो देख लिया कर और एक छोटा सा डिब्बा उठाकर जय प्रकाश जी को थमाते हुए आने के लिए उनका धन्यवाद किया और कहा कि भाभीजी और बच्चों को भी साथ लाते तो मुझे कितना अच्छा लगता! जय प्रकाश जी को बाद में कही गई बात तो नहीं सुनाई पड़ी लेकिन जो बात वो सुन चुके थे वो सब सुनने के बाद भी उन्होंने ऐसा प्रकट किया जैसे कुछ सुना ही न हो। लेकिन पकड़ा हुआ मिठाई का डिब्बा उन्हें इतना भारी लग रहा था कि उन्हें अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्हें लगा कि नौकर ने छोटा डिब्बा दिया होगा इसी से उसे डाँट रहे थे और ख़ुद बड़ा डिब्बा उठाकर मुझे दिया। घर पहुँचने तक सारे रास्ते जयप्रकाश जी डिब्बे के भार और आकार में संतुलन बिठाने का प्रयास करते रहे।

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sitaram gupta पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने की संभावना से ही हलचल शुरू हो गई। पेट्रोल पंपों पर रौनक बढ़ गई। आख़िरकार आधी रात के बाद दाम बढ़ने की घोषणा भी एक दिन कर ही दी गई। चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई। जिसे देखो भागा जा रहा है पेट्रोल भरवाने। गाड़ी में दस-पंद्रह लीटर पेट्रोल होगा पर आज तो टंकी फुल करवानी है। वैसे तो दो-दो लीटर पेट्रोल डलवाते फिरेंगे। बाप गाड़ी ले जा रहा है तो 50 रुपये का पेट्रोल डलवा रहा है और बेटा 25 रुपये में ही काम चला रहा है। न जाने पेट्रोल समाप्त हो जाने पर कितनी बार गाड़ी सड़क के बीच में ही लटक कर रह गई पर आज टंकी फुल करवानी है।

 

पेट्रोल पंपों पर लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं। घंटों में पेट्रोल डलवाने का नंबर आ रहा है पर आज ये मैदान मारना ही है जैसे आज ये जीत हासिल कर ली तो फिर जीवन भर कोई ख़तरा नहीं। पेट्रोल भरवाकर विजयी की मुद्रा में घर लौट रहे हैं। मैंने ऐसे ही एक साहब से पूछा कि भाई साहब चार किलोमीटर जाकर पेट्रोल भरवा कर लाए हो इतना पेट्रोल तो जाने-आने में ही लग गया होगा जितना फायदा नहीं हुआ होगा। कहने लगे, ''फायदा कैसे नहीं हुआ?'' मैंने पूछा कैसे? कहने लगे पन्द्रह लीटर पेट्रोल भरवाकर लाया हूँ। ढाई रुपये लीटर के हिसाब से साढ़े सैंतीस रुपये का लाभ हुआ और जाने-आने में लगा चौबीस रुपये का पेट्रोल। इस प्रकार साढ़े तेरह रुपये का फायदा ही हुआ। नेट प्रॉफिट। हर चीज का हिसाब उंगलियों पर है। यही तो है हमारी आज की शिक्षा। लाभ-हानि का आकलन फौरन हो जाता है। हाथों-हाथ प्रॉफिट एंड लॉस अकाउण्ट और बैलेंसशीट। फिर ये हमारा अधिकार भी है हम अपना अधिकार क्यों छोड़ दें?

 

लाभ-हानि की बात करें तो लाभ तो तब होता है जब किसी चीज को ज्यादा में बेचें लेकिन यहाँ तो विक्रय हुआ ही नहीं। यदि प्राप्त संतुष्टि को ही लाभ मान लिया जाए तो यहाँ पूरे साढ़े सैंतीस रुपये की संतुष्टि हुई है लेकिन उसमें से चार किलोमीटर जाने और चार किलोमीटर आने की निरर्थक क्रिया का नुकसान भी घटाना पड़ेगा। लेकिन क्या इस निरर्थक क्रिया को पैसों में ऑंका जा सकता है? क्या चार किलोमीटर जाने और आने की निरर्थक यात्रा का नुकसान मात्र चौबीस रुपये ही होगा?

 

एक दुकानदार ने थाने में रपट दर्ज करवायी कि एक ग्राहक ने उसे तीन किलोग्राम का बट्टा दे मारा। दरोगा ने पूछा कि भई तीन किलोग्राम का तो कोई बट्टा होता ही नहीं फिर उसने तुम्हें तीन किलोग्राम का बट्टा कैसे मार दिया। लाला जी अपनी बात पर डटे हुए थे कि मुझे तीन किलोग्राम का बट्टा ही मारा गया है। दरोगा ने कहा कि भाई मुझे पूरी बात विस्तार से बताओ। लाला जी ने कहा कि हमारी कहासुनी हो गई। मुझे गुस्सा आ गया और मैंने दो किलोग्राम का बट्टा उठा कर उसे दे मारा। उसने बदले में पाँच किलोग्राम का बट्टा मुझे मार दिया। उसने मुझे पाँच किलो का बट्टा मारा पर मैंने तो सिर्फ दो किलो का बट्टा ही मारा था। उसके पाँच किलो के बट्टे में से दो किलो का बट्टा घटा दिया जाए तो तीन किलो का बट्टा बचा कि नहीं? क्या ख़ूब तर्क है आप अपराध करके भी अपराधी नहीं।

 

प्रश्न उठता है कि जब दो व्यक्तियों ने एक दूसरे के प्रति अपराध किया हो तो क्या ज्यादा अपराध करने वाले के अपराध में से कम अपराध करने वाले के अपराध को घटा कर बाकी बचे अपराध के लिए बड़े अपराधी को सजा दे दी जाए अथवा दोनों को उनके अपने-अपने अपराध की सजा मिले? न्याय तो यही कहता है कि दोनों को ही उनके अपराधों की पूरी-पूरी सजा मिले। जिसने दो किलो का बट्टा मारा है उसे भी उसके कृत्य की सजा मिले और जिसने पाँच किलो का बट्टा मारा है उसे भी उसके कृत्य की सजा मिले। यहाँ ये भी संभव है कि दो किलो का बट्टा मारने वाले को ज्यादा सजा मिले क्योंकि अपराध की शुरूआत उसने की। दूसरे ने संभव है बचाव में ये कार्य किया हो।

 

अगले दिन से दाम बढ़ने हैं इसलिए आज और अभी पेट्रोल भरवाने चले जाते हैं। काम छोड़ना पड़े, गर्मी लग जाए कोई बात नहीं। बेशक ये एक आर्थिक लाभ का सौदा हो सकता है लेकिन वास्तव में देखें तो चार किलोमीटर का जाना और उतना ही आना उसमें जो खर्च आया वह चौबीस रुपये मात्र नहीं है। आपको जाने की जरूरत ही नहीं थी। कल उस रास्ते से गुजरते तो पेट्रोल भरवा लेते। आज जाकर आपने बेकार सड़क पर भीड़ बढ़ाई और प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि की। कोई आपात स्थिति नहीं थी ये। वस्तुत: आपने एक अपराध किया है आर्थिक भी और सामाजिक भी। वस्तुओं की जमाखोरी की जिससे कृत्रिम अभाव की स्थिति पैदा हो सकती है कालाबाजारी को प्रोत्साहन मिल सकता है। मात्र साढ़े तेरह रुपये के लिए आपने पूरे राष्ट्र को ख़तरे में डाल दिया। आपने आठ किलोमीटर की निरर्थक ड्राइविंग की लेकिन लाखों-करोड़ों लोग यदि ऐसा ही एक साथ करेंगे तो क्या होगा? करोड़ों किलोमीटर की निरर्थक यात्रा और करोड़ों रुपये के तेल की बर्बादी और प्रदूषण का तो कुछ हिसाब ही नहीं। क्या आपके साढ़े तेरह रुपये की नकद बचत से या करोड़ों लोगों की साढ़े तेरह-तेरह रुपये की कुल बचत से भी इस प्रदूषण पर काबू पाया जा सकता है?

 

इसके लिए दोषी कौन है? हमारी घोर व्यावसायिक सोच और अल्पकालिक लाभवृत्ति और इसका निर्माण किया है हमारी शिक्षा ने। इन सब स्थितियों के लिए उत्तरदायी है हमारी शिक्षा प्रणाली। आज की शिक्षा हमें बचत करना सिखाती है। छोटी-छोटी बचतों को बढ़ाकर ज्यादा लाभ कमाना सिखाती हैं। इसके लिए पर्यावरण, सामाजिक जीवन और नैतिक मूल्यों की घोर उपेक्षा की जाती है। उत्पादक अपना सामान बेचने की फिराक में रहते हैं। नहीं बिकता तो एक के साथ एक फ्री देते हैं। फिर भी नहीं बिकता तो एक के साथ दो फ्री देते हैं लेकिन किसी न किसी तरह आपको फंसा ही लेते हैं। आज की शिक्षा उनके पक्ष में है। शिक्षा उपभोग पर नियंत्रण कर पर्यावरण और सामाजिक परिवेश के संरक्षण की आवश्यकता से विमुख है।

 

शिक्षा हमें पैसे बचाना सिखाती है। किसी भी प्रकार भाग दौड़ कर हम सस्ती चीशें ख़रीदने का जुगाड़ कर ही लेते हैं। पैसे बचाकर व्यक्तिगत जीवन को आरामदायक बनाने के लिए सुख-सुविधा प्रदान करने वाली वस्तुओं को प्राप्त करना ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य रह गया है और इसी के लिए न जाने कितनी निरर्थक क्रियाएँ करते हैं। इस आपाधापी में अपने सामाजिक दायित्वों को पूरी तरह भुला देते हैं। इसके लिए शिक्षा के उद्देश्यों में परिवर्तन करना ही होगा। शिक्षा वही हो जो व्यक्तिगत लाभ-हानि का आकलन करना न सिखाए अपितु हमारे अंदर उदात्ता मूल्यों को स्थापित करे।

 

जो चीज समाज या राष्ट्र के हित में नहीं, परिवेश के अनुकूल नहीं उसे न करना ही सही लाभ है शेष हानि ही हानि है उससे चाहे कितना भी पैसा क्यों न मिले। जो इस चीज का ज्ञान दे सके वही शिक्षा है और जो इस ज्ञान को जीवन में उतार सकें वही शिक्षित हैं। बाकी सब व्यवसायी हैं। इतने बड़े व्यवसायी बनना भी किस काम का कि पैसों के लिए अपना सुख-चैन, समाज का सुख-चैन बेचना पड़े। हमारे आध्यात्मिक विकास की राह में हमारे आर्थिक विकास का ढाँचा हमारी आकस्मिक लाभ वृत्ति और शिक्षा प्रणाली के संकुचित उद्देश्य सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। इन बाधाओं को पार करके ही हम समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास कर सकते हैं।

 

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sitaram gupta चीन और जापान में भाषा, संस्कृति, कला तथा जीवन के कई अन्य क्षेत्रों में इतनी अधिक समानता पायी जाती है जिसके कारण इन दोनों देशों का नाम प्राय: साथ-साथ लिया जाता है। इन दोनों देशों की एक विशेषता ये भी है कि इन दोनों देशों में उपहार के तौर पर तरबूज भेंट करने की भी प्रथा है और वो भी चौकोर तरबूज। चौकोर तरबूजों की यहाँ ख़ूब माँग रहती है अत: चीन और जापान के किसान चौकोर तरबूज उगाने पर विशेष ध्यान देते हैं। अब प्रश्न उठता है कि क्या खेतों में चौकोर तरबूज उगाए जा सकते हैं? वास्तव में प्राकृतिक रूप से तरबूज चौकोर नहीं होते। तरबूज तो सामान्यत: गोल, अण्डाकार या इन दोनों आकारों से मिलते-जुलते आकार के ही हो सकते हैं लेकिन यहाँ के किसान तरबूजों को चौकोर बनाने के लिए एक पात्र विशेष का सहारा लेते हैं। यह पात्र चौकोर या घनाकार होता है जिसे छोटे फल पर लगा देते हैं। फल जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है वह अपने ऊपर लगे पात्र या खोल का आकार ग्रहण करता जाता है। फल के परिपक्व होने पर पात्र को खोल कर अलग कर दिया जाता है। और इस प्रकार मनचाहे आकार का फल तैयार कर लेते हैं।

 

ईंटें बनाने के लिए भी साँचों का प्रयोग किया जाता है। साँचों में गीली मिट्टी भरकर उसे निकाल लेते हैं और सूखने पर भट्ठों में पका लेते हैं। इस प्रकार निर्मित ईंट तैयार होने के बाद टूट तो सकती है पर उसके आकार को परिवर्तित नहीं किया जा सकता। जैसा साँचा बिल्कुल वैसी ही ईंट। मिट्टी, पीओपी, लुगदी, मोम अथवा विभिन्न धातुओं और अन्य माध्यमों से मूर्तियाँ या खिलौने बनाने के लिए भी इन सामग्रियों को साँचों में डालकर मनचाहे आकार की प्रतिमा प्राप्त की जा सकती है। दीपावली पर बनी मोमबत्तियाँ हों अथवा चीनी से बने खिलौने साँचों के अभाव में इनको बनाना असंभव ही है। विभिन्न प्रकार की वैंफडी, चॉकलेट, आइसक्रीम तथा केक-पेस्ट्री आदि के आकर्षक नमूने बनाने के लिए भी साँचों का खूब प्रयोग किया जाता है। साँचे का अर्थ है मनचाहा आकार।

 

यही बात हमारे व्यक्तित्व तथा परिवेश के निर्माण के संबंध में भी उतनी ही सही है। बाह्य व्यक्तित्व हो अथवा आंतरिक व्यक्तित्व, व्यक्तित्व को सही आकार देने के लिए व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए भी हमें एक साँचे की जरूरत होती है और वह साँचा है व्यक्ति का 'मन'। मन हमारे विचारों का उद्गम स्थल है और मन में उठने वाले विचार ही हमारे व्यक्तित्व और परिवेश का निर्माण करते हैं। हमारा भौतिक शरीर, हमारा स्वास्थ्य, हमारी भौतिक सुख-समृद्धि के साधन, हमारे संबंध तथा हमारे आध्यात्मिक विकास की दिशा सब हमारे विचारों अथवा भावों से ही निर्धारित होता है। जैसे भाव वैसी दशा। हमारा वर्तमान हमारे पिछले भावों अथवा विचार प्रक्रिया का परिणाम ही तो है और आज की विचार प्रक्रिया हमारे आने वाले कल को तथा आगामी हर पल को अवश्य ही प्रभावित करेगी, हमारे भविष्य का निर्माण करेगी।

 

जब एक किसान तरबूज जैसी स्वल्पचेतन या अचेतन वस्तु को मनचाहा आकार दे सकता है. एक कुम्हार निर्जीव मिट्टी को अपेक्षित आकृति प्रदान कर सकता है अथवा एक शिल्पी ठोस धातु को पिघलाकर पुन: पुन: मनमाफिक आकार की प्रतिमा निर्मित कर सकता है तो फिर मनुष्य अपने विचारों या भावों को मनचाहा आकार क्यों नहीं दे सकता? विचारों को आकर्षक और उपयोगी बनाकर अपने व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास क्यों नहीं कर सकता? अवश्य कर सकता है। एक मनुष्य ही तो है जो अपने विचारों से क्रांति ला सकता है, इस समस्त भूमण्डल को परिवर्तित कर सकता है। हर क्रांति, हर परिवर्तन विचारों के द्वारा ही संभव है। हर सुधर, हर पुनरुत्थान के पीछे कोई विचार ही तो कार्य करता है।

 

कहा गया है कि ''मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध्मोक्षयो'' अर्थात् मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का कारण है। इसके लिए मन के उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। मनुष्य अपने मन की शक्ति द्वारा अपने विचारों का आकर्षक और उपयोगी बना सकता है उन्हें मनचाहा आकार दे सकता है। नकारात्मक भावों को त्यागकर सकारात्मक भावों को प्रश्रय दे सकता है। विचारों का उद्गम और नियंत्रण स्थल हमारा मन है और यहीं विचार आकार ग्रहण करते हैं। मन की एक विशेष अवस्था में ही विचार शीघ्र और अपेक्षित आकार ग्रहण कर पाता है और मन की वह अवस्था अभ्यास द्वारा प्राप्त की जा सकती है। ध्यान यही तो है। मन की वह अवस्था है ध्यान जब मन सर्वाधिक ग्रहणशील होता है। इस अवस्था में जो भी विचार मन को छूता है अथवा मन में जो प्रतिमा बनती है फौरन वह विचार या प्रतिमा भौतिक जगत में वास्तविकता में परिवर्तित हो जाती है।

 

पारस पत्थर लोहे को स्वर्ण में परिवर्तित कर देता है लेकिन मन रूपी पारस पत्थर मात्र विचार को भौतिक जगत की वास्तविकता में परिवर्तित करने में सक्षम है। इस प्रकार मन में उठने वाले विचारों का सीध असर हमारे शरीर मस्तिष्क और बाह्य जगत पर पड़ता है। यदि विचार बुरे हैं, नकारात्मक और निराशावादी हैं तो उनका वैसा ही प्रभाव हम पर होगा इसलिए मन को सदैव सकारात्मक व उपयोगी विचारों से ओतप्रोत रखना अनिवार्य है। लेकिन क्या ये इतना सरल है? मन को नियंत्रित कर विचार प्रक्रिया को सकारात्मक दिशा देना यद्यपि बहुत सरल नहीं है लेकिन असंभव कदापि नहीं। अभ्यास से सब कुछ संभव हो सकेगा। मन में सकारात्मक विचारों को ला सकें, चाहे प्रयास करके जबरदस्ती ही ला सकें यही जरूरी है। इस सकारात्मक विचार प्रक्रिया के प्रवाह से जीवन के हर क्षेत्र में अवश्य ही लाभान्वित होंगे।

 

यह भी कहा गया है कि ''संकल्पविकल्पात्मकं मन:'' अर्थात् मन संकल्प और विकल्प स्वरूप है अत: विकल्प अथवा अनावश्यक संकल्पों या संकल्प के विरोधी भावों का पूर्ण त्याग कर दीजिए। इसी में आवश्यक या अपेक्षित संकल्प की पूर्णता निहित है और इसके लिए अपेक्षित है मन रूपी साँचा। मन ही वह यंत्र है जो भावों का परिष्कार भी करता है और परिष्कृत भावों को वास्तविकता में बदल कर हमारा जीवन सुखमय बना देता है। संभवत: इसी की पुष्टि कर रहा है ये  शेर :

 

अपने मन में डूब कर पा जा सुरागे-जिंदगी,
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन।
-अल्लामा 'इकबाल'

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सीताराम गुप्ता

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sitaram gupta होरेस ने कहा है कि ''प्रतिकूल या विषम परिस्थितियाँ प्रतिभा को प्रकट करती हैं तथा समृद्धि इसका लोप''। सामान्य व्यक्ति इस तथ्य को स्वीकार नहीं कर सकता और इसीलिए वह सामान्य रह जाता है आगे नहीं बढ़ पाता। सफल व्यक्ति वह है जो विषमताओं में भी अवसर खोज लेता है। वस्तुत: जीवन की हर समस्या किसी बड़े लाभ के लिए अवसर का आधार प्रस्तुत करती है। यह बात केवल व्यक्ति के संदर्भ में ही नहीं अपितु समाज, राष्ट्र तथा विश्व के संदर्भ में भी उतनी ही सटीक लगती है। यह तो हुआ आर्थिक या व्यावसायिक पहलू लेकिन विषम या प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्तम साहित्य, संस्कृति और विभिन्न कलाओं के विकास के लिए भी कम उपयोगी आधार प्रस्तुत नहीं करतीं।

 

समस्याएँ या कठिनाइयाँ जीवन का स्वाभाविक क्रम है। ये समस्याएँ प्राकृतिक भी हो सकती हैं और मनुष्य निर्मित भी। अकाल, बाढ़, भूकंप, महामारी, जंगलों की आग, ज्वालामुखी विस्फोट, तूफान और अब अंत में प्रचंड सूनामी लहरों का ताण्डव आदि न जाने कितनी प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्य अपने आरंभिक काल से ही दो-चार होता रहा है। आज वैज्ञानिक प्रगति के युग में असावधनीवश भी अनेक आपदाएँ देखी जा सकती हैं। एयरक्रैश, रेल, बस या अन्य साधनों की दुर्घटनाएँ, गैसों का रिसाव, बड़ी बिल्डिंगों तथा औद्योगिक इकाइयों में आग व विस्फोट तथा और न जाने कितनी तरह की दूसरी दुर्घटनाएँ घटित होती ही रहती है।

 

दूसरे विश्वयुद्ध में हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए बम प्रहारों को कौन भूल सकता है लेकिन विध्वंस के मलबे से एक नये शक्तिशाली, प्रगतिशील और विकसित औद्योगिक जापान का उदय हुआ। खूबसूरत टाइटैनिक के जलसमाधि लेने से इस क्षेत्र की उन्नति पर कोई विपरीत असर नहीं पड़ा अपितु टाइटैनिक से अच्छे जलयान तैयार किये गए। किसी भी स्पेसशटल के दुर्घटनाग्रस्त या नष्ट होने से अंतरिक्ष कार्यक्रमों में और तेजी ही आई है।

 

सुनामी हादसे को ही लीजिए। इसकी विनाशलीला जहाँ हमें भविष्य के प्रति आशंकित और आतंकित करती है, एक अनजाने भय में जकड़ती है, वहीं कुछ लोग इसमें अपार संभावनाएँ भी तलाशते हैं। एक बात तो निश्चित है कि पूरे घटनाक्रम ने सारे भेद-भाव भुलाकर एक बार तो सारे विश्व को नजदीक ला ही दिया है। संभव है यही संदेश देने के लिए प्रकृति ने इतनी बड़ी विनाशलीला रची हो। वैसे भी संसार के समस्त लोगों की सामूहिक सोच का ही परिणाम होती हैं प्राकृतिक आपदाएँ। जब सामूहिक सोच अत्यंत विकृत होकर सघन हो जाती है तब प्रकृति व्यग्र होकर इस प्रकार की आपदाओं को अंजाम देने के लिए विवश हो जाती है। यदि इन घटनाओं के पीछे छुपे संदेश को हम देख सकें और उस पर अमल कर सकें तो संभव है इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति ही न हो। अब यही अमल कई रूपों में प्रकट होगा। कहीं सुनामी पीड़ितों के लिए करुणा के रूप में कहीं सहायता के रूप में तो कहीं विकास योजनाओं द्वारा निर्माण के रूप में। सोच में यही सकारात्मक परिवर्तन कला है और जो घटित हो चुका है वह सृजन की प्रसव-पीड़ा। प्रसव-पीड़ा के बाद नया सृजन अवश्यंभावी है।

 

यदि मनुष्य, समाज या राष्ट्र चाहे तो विनाश को विकास में तथा अकाल को कला में परिवर्तित करना असंभव नहीं। विश्व के तमाम देशों में जहाँ भी प्राकृतिक आपदाएँ आती हैं वहाँ की सरकारें तथा अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ लोगों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए नये-नये विकास कार्यों की शुरूआत करती हैं। यदि हम इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो हमें ऐसे असंख्य उदाहरण देखने को मिलते हैं जब प्रतिकूल परिस्थितियों में रोजगार के साथ-साथ कलाओं की भी उन्नति हुई विशेष रूप से स्थापत्य कला की।

 

नवाबों का शहर लखनऊ और लखनऊ का बड़ा इमामबाड़ा इसका जीता जागता उदाहरण है। बड़ा इमामबाड़ा जिसे भूल-भुलैया के नाम से भी जाना जाता है स्थापत्य का अद्वितीय नमूना है। इस मशहूर इमामबाड़े का निर्माण सन् 1784 में हुआ और निर्माण कराया लखनऊ के तत्कालीन नवाब आसफुद्दौला ने। आसफुद्दौला एक रहमदिल इंसान और दानी व्यक्ति भी थे। कहते हैं आसफुद्दौला ख़रबूजों में मोती भर-भर कर ग़रीबों में तक्सीम किया करते थे। उनकी इसी फितरत के कारण लखनऊ में एक कहावत मशहूर हो गई थी कि ''जिसको न दे मौला उसको दे आसफुद्दौला।'' इन्हीं आसफुद्दौला ने बड़े इमामबाड़े का निर्माण करवाया था।

 

बड़े इमामबाड़े के निर्माण की पृष्ठभूमि ये है कि आसफुद्दौला के शासनकाल में अवध में एक बार भीषण अकाल पड़ा। लोगों को रोजगार मुहैया कराने के मकसद से इस अज़ीम इमारत की तामीर शुरू की गई। इमारत की तामीर का काम दिन-रात चौबीसों घंटे चलता था ताकि रात में वे शरीफ लोग भी यहाँ काम कर सकें जो दिन के उजाले में ऐसा काम करने में शर्म महसूस करते थे। लखनऊ ठहरा नवाबों का शहर। कोई बड़ा नवाब तो कोई छोटा नवाब। अब नवाब साहब दिन में मजदूरी करने से तो रहे। हाँ, रात की बात अलग है। तो सब लोगों के रोजगार का ध्यान करके ही निर्माण कार्य रात-दिन चालू रखा गया।

 

अपनी विशिष्ट बनावट और विशालता के लिए प्रसिद्ध इस भवन का नक्शा बनाया था ईरान के एक वास्तुशिल्पी मुहम्मद किफायतुल्लाह ने। इसके स्तंभहीन मेहराबदार विशाल कक्ष के बीचोंबीच स्थित है आसफुद्दौला की मजार और ऊपरी मंजिल पर भूल-भुलैया। भूल-भुलैया में असंख्य दरवाजे हैं और प्रवेश करने के बाद लोग अक्सर रास्ता भूल जाते हैं इसी कारण इसका नाम पड़ गया भूल-भुलैया। इमामबाड़े की दीवारों की मोटाई सोलह फिट है। इसी से पूरी इमारत की विशालता का अंदाजा लगाया जा सकता है और ये अंदाजा भी कि कितने लोगों को इससे रोजगार मिला होगा।

 

ताजमहल और मुग़लकालीन दूसरी इमारतों के निर्माण में भी कम लोगों को रोजगार नहीं मिला होगा? ताजमहल के निर्माण में ही बीस हजार लोगों ने बीस साल तक कार्य किया तब कहीं जाकर यह विश्व प्रसिद्ध मकबरा अस्तित्व में आया। लेकिन ताजमहल को वो सम्मान प्राप्त नहीं जो इमामबाड़े या इसी तरह की दूसरी इमारतों को प्राप्त है क्योंकि ताजमहल के निर्माण का उद्देश्य व्यक्तिगत प्रेम की अभिव्यक्ति और स्वयं के अहम् की तुष्टि ही रहा है। ताजमहल देखने के बाद तभी सुमित्रानंदन पंत ने कहा है :

 

हाय! मृत्यु का ऐसा अमर अपार्थिव पूजन?
जब विष्ण्ण निर्जीव पड़ा हो जग का जीवन!

 

'साहिर' लुधियानवी भी अपनी प्रेमिका से ताजमहल पर मिलने की बजाय कहीं और मिलने को कहते हैं क्योंकि :

 

इक शहनशाह ने दौलत का सहारा लेकर,
हम ग़रीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक

मेरी महबूब! कहीं और मिलाकर मुझसे।

 

कहने का अर्थ ये है कि एक शाहकार के रूप में ताजमहल की प्रशंसा तो की जा सकती है ताजमहल के निर्माण की नहीं।

 

लखनऊ में बड़े इमामबाड़े के निर्माण के लगभग एक शताब्दी बाद ऐसा ही एक निर्माण पुणे में हुआ और यह था सन् 1892 में आगाख़ाँ पैलेस का निर्माण। आग़ाख़ाँ पैलेस का निर्माण सुल्तान मुहम्मदशाह आग़ाख़ाँ तृतीय ने अपने निवास के रूप में करवाया था। बाद में 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में गाँधी जी और कस्तूरबा के साथ महादेव भाई देसाई, सरोजिनी नायडू तथा मीराबेन ;मैडलीन स्लेड, आदि स्वतंत्रता सैनानियों को यहाँ नशरबंदी की हालत में रखा गया था। इसी दौरान यहाँ पर महादेव भाई देसाई और कुछ समय बाद कस्तूरबा का देहांत हो गया और आग़ाख़ाँ साहब ने उनके दाह-संस्कार के स्थान पर उनकी समाधियाँ निर्मित कराईं।

 

आग़ाख़ाँ तृतीय ईरान के ख़ोजा इस्माइली संप्रदाय के 48वें आध्यात्मिक गुरु थे। वे अपने मत के प्रचार के लिए भारत और पुणे में आते रहते थे। पुणे में उन्होंने अपने निवास स्थान के रूप में इस पैलेस का निर्माण करवाया लेकिन निर्माण के पीछे एक अन्य उद्देश्य भी रहा है। उन दिनों उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में इस पूरे क्षेत्र में अनेक बार अकाल पड़ा और महामारियाँ फैलीं। वस्तुत: लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से ही इस विशाल प्रासाद का निर्माण प्रारंभ कराया गया था। इसके बनने में पाँच वर्ष का समय लगा तथा हजारों लोगों को यहाँ काम दिया गया। इस प्रासाद के निर्माण पर उस समय बारह लाख रुपये खर्च हुए।

 

वर्ष 1894 में वहीं पुणे में लोकमान्य तिलक ने जनजागरण तथा राष्ट्रीय जागरण हेतु गणेशोत्सव तथा शिवाजी उत्सव मनाने की शुरूआत की। तिलक ने धर्म के माध्यम से सामाजिक और राष्ट्रीय चेतना का विकास किया। वही कार्य आग़ाख़ाँ साहब ने भी किया। निर्माण कार्य प्रारंभ कर अकाल और दुर्दशाग्रस्त मानवता को राहत पहुँचाई। वस्तुत: अकाल, महामारी अथवा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय लोगों की सहायता करना ही सच्चा धर्म हो सकता है। और यदि इन प्रतिकूल परिस्थितियों का उपयोग धर्म प्रचार के उद्देश्य से किया जाता है तो वह धर्म ही नहीं है। सभी मतों और सिद्धान्तों को एक ओर रखकर मानव मात्र की सेवा ही सच्चा धर्म हो सकता है। इसी उद्देश्य से किये गए निर्माण कार्य कला के उत्कृष्ट नमूने भी अवश्य होंगे।

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-सीताराम गुप्ता

sitaram gupta ये

जितने पेड़-पौधे

हैं तुम्हारी कैद में

जिन्हें तुम रोज

 

नवजात शिशुओं की तरह अपने

चम्मचों में डालकर

पानी पिलाते हो

खिलाते हो

 

परवरिश करते हो इतने प्यार से

तेज सर्दी और गर्मी से

हिफाजत करते हो जिनकी

ऑंधियों से और हवाओं से

 

बचाते हो जिन्हें

बड़े एहतियात से

कभी अंदर कभी बाहर सजाते हो

उन्हें आजाद कर दो

 

कि पाव भर मिट्टी में

छिछले गमले की

नग्न हैं जड़ें जिनकी

उन्हें दे दो

 

ढाँपने को नग्नता अपनी

खुला आकाश ऑंगन का

फैलने दो धरती में

जड़ें उनकी पाताल तलक

 

भीगने दो बारिश में

काँपने दो सर्द मौसम की

बर्फ़ीली हवाओं में

और तपने दो

 

तेज गर्मी में उन्हें

उनकी पत्तियों को झूमने दो

ऑंधियों में तेज उनको नृत्य करने दो

फिर देखना इक दिन

 

तुम्हें ही ये दुआ देंगे

बिठाएँगे सर-ऑंखों पर तुम्हें अपनी

फूल, फल और छाँव देंगे

तेज हवाओं से ऑंधियों से

 

भिड़ जाएँगे

तुम्हें बचाने को

बारिश लाएँगे

और तेज बारिश में

 

धरती को कटने से यही बचाएँगे

ये बूढ़े बोनसाई पौधे

दुआएँ देंगे

कैद से गमलों की

 

आजाद इन्हें कर दो

और दुआएँ जीने की इनसे लो।

 

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-मनोज सिंह

 

कितना अच्छा लगता है यह सोचना, सुनना और महसूस करना कि हम स्वतंत्र हैं। कितना गर्व होता है यह कहकर कि हम एक आजाद देश के नागरिक हैं। गुलामी की बातों को याद कर अत्यंत दु:ख और फिर आक्रोश आता है। इस बात की हम हर जगह, हर वक्त दुहाई देते रहते हैं कि हमें अपने देश में घूमने-फिरने, लिखने-बोलने की आजादी है। जो कि गुलाम देशों में सामान्यत: नहीं होती। मगर क्या यह पूर्णत: सत्य है? वास्तविकता में अगर देखें तो हकीकत कुछ और है। शासन, व्यवस्था, सुरक्षा, धर्म और समाज के नाम पर ही कई सारे प्रतिबंधों को देखा जा सकता है। यही नहीं बच्चे जो मन के सच्चे होते हैं, उन्हें भी बचपन से ही मां-बाप द्वारा जगह-जगह पर रोका, समझाया और कभी-कभी तो डांटा भी जाता है कि क्या बोलना है और क्या नहीं, क्या करना है और क्या नहीं। बड़े होने पर कॉलेज-स्कूल में अनुशासन के नाम पर, अध्यापक के खिलाफ आप कुछ नहीं बोल सकते। चाहे वो पढ़ाने में बिल्कुल भी ध्यान न दे रहे हों।

 

नौकरी में अधिकारी का डंडा। यहां अंग्रेजी की कहावत का उदाहरण दिया जा सकता है, बॉस इज ऑलवेज राइट। कहीं-कहीं तो अधीनस्थ कर्मचारी से डरना पड़ता है तो कभी-कभी यूनियन से भी बचकर रहना पड़ता है। मैनेजमेंट के खिलाफ आप कुछ नहीं कह सकते, चाहे काम गलत हो रहा हो। ज्यादा बुरा लगे तो नौकरी छोड़नी पड़ेगी। घर पर पत्नी का रौब वो अलग। यह दीगर बात है कि औरतों पर तो बचपन से ही बंदिशें होती हैं। शादी के बाद सास-ससुर व पति के द्वारा संस्कारों, संस्कृति व खानदान के नाम पर दबाव। और फिर बुजुर्ग होने पर पति-पत्नी को जवान बच्चों का मोह तो बहू-दामाद का लिहाज। हम जीवन भर कहां स्वतंत्र हो पाते हैं। पत्रकार हर न्यूज या स्टोरी देने से पहले, उसके द्वारा होने वाले असर को हर पहलू से देखता है। लेखक भी हर शब्द लिखने से पहले कई बार सोचता है। उग्रवादी, आतंकवादी, गुंडे की तो छोड़िए पुलिस, संविधान, कोर्ट-कचहरी यहां तक कि मीडिया से भी डरना पड़ता है। यही नहीं समाजवादी, मानवतावादी, धार्मिक, अल्पसंख्यक और बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों की भावनाओं के आहत हो जाने से बचने के लिए भी संभलकर लिखना पड़ता है। और यह सब तब है जबकि भारतीय संविधान बोलने की स्वतंत्रता देता है। अनुच्छेद १९ के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वो राज्य की नीति, राजनीतिज्ञ, नौकरशाह, शासनतंत्र की आलोचना और विवेचना कर सकता है। संक्षिप्त में, सभी के लिए कहा जा सकता है, सिर्फ सर्वोच्च न्यायालय को छोड़कर।

 

प्रत्येक शब्द का अपने शब्दार्थ के साथ-साथ भावार्थ का लंबा इतिहास और विशेष संदर्भ होता है। उसका उपयोग किसी विशेष बात को कहने के लिए किया जाता है। कई शब्द समय के साथ अपने मायने को बदलते देखे गए हैं तो कई बार स्थान परिवर्तन के साथ ही अर्थ भी भिन्न-भिन्न होता है। और कभी-कभी इनमें इतना विरोधाभास होता है कि एक स्थान के लिए लिखे गए शब्द से दूसरे स्थान पर बवाल तक मच जाता है। इस तरह की मुसीबत से बचने के लिए लेखक संवेदनशील विषयों पर लिखते समय कुछ विशेष शब्दों से बचने की कोशिश करता है। मगर कई बार समानार्थक पर्यायवाची शब्द नहीं मिलते। और फिर मूल शब्द को हटाने से अर्थ का अनर्थ या फिर कई बार आवश्यक भावनाओं का सही तरह से संवाद नहीं हो पाता। और भी कई कारणों से हम शब्दों का इस्तेमाल खुलकर नहीं कर पाते हैं। किसी में नस्लवाद तो किसी में धर्म की भावना आहत होती है तो कहीं जाति विशेष को ठेस पहुंचती है। कहीं-कहीं शब्दों को अशोभनीय तक कह दिया जाता है तो कहीं मानवतावादी संगठन इसे अमानवीय करार देते हैं तो कहीं लिंग भेद बताया जाता है अर्थात नारीवादी को पुरुष अहम् की बू आती है। अकेले शब्दों का ये हाल है तो कथनों का क्या कहना। वर्तमान की छोड़ें, सही-सही इतिहास लिखना भी अब खतरे से खाली नहीं। किसी राजनीतिक पार्टी के विरोध में सत्य कहना आपको महंगा पड़ सकता है अगर वो सत्ता में हुई तो आप को जेल की हवा भी खानी पड़ सकती है। पार्टी असामाजिक तत्वों से लैस हुई तो फिर टांग भी टूट सकती है, अगर वो अधिक परिपक्व और शातिर निकली तो आप राजनीति के शिकार भी हो सकते हैं और धीरे-धीरे कब आपको बर्बाद कर दिया जाएगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। आप मजबूरी वश हाशिए पर भी जा सकते हैं।

 

समाज के तथाकथित आदर्श, उच्च पदस्थ, ताकतवर, धनवान या चर्चित व्यक्तियों के बारे में लिखने-बोलने से पूर्व संयमित होना पड़ता है। मान-मर्यादा का उल्लंघन गैर-कानूनी साबित जो जाए तो मानहानि की भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है। कई बार आपके खिलाफ प्रदर्शन भी हो सकता है। भीड़ द्वारा रोष या हिंसा भी की जा सकती है। आप किसी वाद-विवाद में भी पड़ सकते हैं। व्यक्तिगत और पारिवारिक नुकसान की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

 

ध्यान दें, तो महसूस होगा कि जैसे-जैसे हम आधुनिकता का चोला ओढ़ रहे है, ज्ञान और शिक्षा का प्रसार तो हो रहा है, साथ ही विकास भी हो रहा है, मगर अब सच बोलना खतरे से खाली नहीं तो झूठ बोलना बेहद सरल है। और यह विडम्बना दिन पर दिन हकीकत बनती जा रही है। इतिहास गवाह है, स्वतंत्रता सामर्थ्यवान, शक्तिशाली और समृद्ध के साथ रही है। कमजोर के साथ न थी, न है। सामान्य व्यक्ति को हर वक्त संभलकर बोलना पड़ता है। हर कथन पर ध्यान देना पड़ता है। कहते हुए सदा डर बना रहता है। चूंकि हर व्यक्ति पूरी तरह से निडर या निर्भीक नहीं हो सकता। जिसके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं ऐसा अनोखा मनुष्य मिलना संभव नहीं। प्रत्येक की कोई न कोई कमजोरी होती है। और सामने वाला उसी जगह पर हिट करके आपको चोट पहुंचा सकता है। और इसी चोट या फिर कुछ खोने से आदमी डरता है। और यहीं से अपनी स्वतंत्रता को खोने का क्रम प्रारंभ होता है। समाज, संस्कार, संस्कृति की बेड़ियां हमें अपनी भावनाओं पर काबू रखने के लिए प्रेरित करती हैं। सुसभ्य, सुसंस्कृत, शालीन, सामाजिक, धार्मिक, नैतिकता के नाम पर बोलने-लिखने के पैमाने बन जाते हैं। और फिर भी जो सीधे-सीधे बोल सकते हैं उन्हें मुंहफट, उद्दंड और बदतमीज तक कह दिया जाता है। ऐसे लोगों की भी अपनी एक पहचान होती है और ये अकसर इसका कभी फायदा कभी नुकसान उठाते रहते हैं। इनकी पृष्ठभूमि को देखें तो किसी न किसी दल या ग्रुप का इन्हें अप्रत्यक्ष सहारा या आशीर्वाद प्राप्त अवश्य होता है। ऐसे लोग स्वतंत्रता के नाम पर उच्छृंखल बन जाते हैं और लोग इनसे बचते हैं। और जो अकेले चिल्ल-पों मचाते हैं वो अकसर मारे जाते हैं।

 

जागरूकता के बढ़ने से अधिकार के प्रति सचेत सामान्य नागरिक तक अपने बारे में कुछ भी सुनने के लिए तैयार नहीं। और इसीलिए राजनीतिज्ञ वोट लेते समय, कंपनी सामान बेचने वाले विज्ञापन में, धर्मगुरु अपने प्रवचन में, लेखक अपने लेखन में, संपादक अपने न्यूज में, कलाकार अपनी कला में सत्य को मरोड़ कर पेश करता है। और शायद इसी के स्पष्टीकरण के लिए चतुर-चालाक मानव ने कहावत तक बना दी 'सत्य हमेशा कड़वा होता है` अर्थात जिस तरह कड़वा खाना पसंद नहीं किया जाता उसी तरह सत्य सुनना भी किसी को अच्छा नहीं लगता। ऐसे में क्या आप बोलने की स्वतंत्रता का सही स्वाद चखना चाहेंगे? शायद नहीं। कम से कम सच बोलने का तो बिल्कुल भी नहीं।

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सम्पर्क:

मनोज सिंह

४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com/

 

योग द्वारा ही संभव है धर्म का पालन

 

- सीताराम गुप्ता

 

srg (WinCE) प्राय: योग, धर्म और अध्यात्म को अलग-अलग माना जाता है। योग का संबंध भौतिक शरीर को पुष्ट करने अथवा शारीरिक व्याधियों के उपचार तक सीमित माना जाता है। धर्म को प्राय: किसी विशेष पद्धति से पूजा-पाठ अथवा कर्मकाण्ड मान लिया गया है तथा अध्यात्म को दूसरे लोक की रहस्यात्मक वस्तु मान लिया जाता है। वास्तव में धर्म, अध्यात्म तथा योग अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। एक के अभाव में दूसरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अब इन तीनों को अलग-अलग देखने और इनके अंतर्संबंधों को जानने का प्रयास करते हैं।

धर्म क्या है?

धर्म की अनेक परिभाषाएँ और व्याख्याएँ मिलती हैं। मनुस्मृति में लिखा है:

धृति: क्षमा दमोद्धस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रह:।

धीर्विद्या सत्यमक्रोधे दशकं धर्म लक्षणम्॥

धैर्य, क्षमा, दम, चोरी न करना, शुचिता, इंद्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध - ये धर्म के दस लक्षण हैं। जिस व्यक्ति के स्वभाव में इन दस लक्षणों का समावेश होगा, वह व्यक्ति धर्म से युक्त होना ही चाहिए, चाहे वह हिंदू हो अथवा अन्य कोई। यदि संकुचित दृष्टि से ऊपर उठकर देखें तो पाते हैं कि उपरोक्त दस लक्षण ही नहीं अपितु जितने भी सकारात्मक गुण हैं उनका समुच्चय ही धर्म है। यदि हम धर्म को कुछ विशेष लक्षणों या गुणों तक सीमित कर देते हैं तो ये हमारी संकीर्णता है। संकीर्ण मनोवृत्ति का त्याग ही महान धर्म है। जैन धर्म जब अनेकांतवाद को स्वीकार करता है तभी वह सच्चे अर्थों में महान धर्म है। महावीर स्वामी की पूजा महान जैन धर्म नहीं है। महावीर स्वामी के गुणों और सिद्धांतों को आत्मसात करना महान धर्म है। यही शुद्ध धर्म है। शुद्ध धर्म को किसी टैग की जरूरत नहीं।

संत तिरुवल्लुवर कहते हैं कि मन को निर्मल रखना ही धर्म है, बाकी सब कोरे आडंबर हैं। वास्तव में धर्म तो वह तत्व है जो उन सभी लक्षणों को धारण करता है जिनसे मनुष्य विकाररहित होकर अपना स्वाभाविक विकास करता है और इस विकास से किसी दूसरे के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं होती चाहे वह मनुष्य हो अथवा मनुष्येतर प्राणी या प्रकृति। सह-अस्तित्व के विकास का सिद्धांत धर्म ही तो है। धर्म एक कला है जिसके सहारे जीवन को उत्तम बनाया जाता है। कोई भी स्थिति या विचार जो हमारे जीवन को उत्तम बनाए तथा सकारात्मक सहारा प्रदान करे धर्म है।

विपश्यना के आचार्य सत्यनारायण गोयंका कहते हैं:

धर्म न हिंदू, बौद्ध है, धर्म न मुस्लिम, जैन,

धर्म चित्त की शुद्धता, धर्म शांति, सुख, चैन।

शांति, सुख, चैन ही शुद्ध धर्म है और विकाररहित निर्मल चित्त का स्वामी ही इसे धारण कर सकता है। धर्म जीवन जीने की कला है और जीवन जीने की कला है विकारों से मुक्ति।

धर्म का वास्तविक स्वरूप जानने के लिए धर्म के प्रमुख अंगों को समझना भी अनिवार्य है। धर्म के तीन प्रमुख अंग है:

1. दर्शन ;नैतिकता, अध्यात्म,

2. प्रतीक

3. कर्मकाण्ड

दर्शन धर्म का आंतरिक तत्व है जबकि प्रतीक और कर्मकाण्ड बाह्य तत्व हैं। आज हम धर्म के आंतरिक तत्व अर्थात् दर्शन या नैतिक मूल्यों को भूल चुके हैं। प्रतीकों और कर्मकाण्ड को धर्म मान लिया है। धर्म का आंतरिक तत्व ही अध्यात्म है और उसका विकास आध्यात्मिकता। चित्त की शुद्धता के बिना इसे धारण करना असंभव है। धर्म आचरण में हो दिखावे में नहीं। धर्म को आचरण में उतारने के लिए या नैतिक मूल्यों के समावेश के लिए जरूरी है धर्म के आंतरिक तत्व अर्थात् आध्यात्मिकता का विकास।

अब प्रश्न उठता है आध्यात्मिकता से क्या तात्पर्य है? हमारा शरीर मात्र हाड़-मांस का बना नहीं है। भौतिक शरीर के अतिरिक्त अन्य कई शरीर भी इसमें समाहित है। शरीर के इन विभिन्न कोषों अथवा अवयवों को जानना भी अनिवार्य है। मोटे तौर पर शरीर को तीन भागों में बाँटा गया है :

1. स्थूल शरीर अथवा भौतिक शरीर

2. मानसिक शरीर अथवा मन या कारण शरीर

3. सूक्ष्म शरीर या चेतना अथवा आत्मा

इन तीनों शरीरों को जानना तथा मन के माध्यम से चेतना में स्थित होना ही आध्यात्मिकता है। इसके लिए चित्त की शुद्धता अनिवार्य है। चित्त की शुद्धता योग द्वारा ही संभव है अत: योग धर्म और आध्यात्मिकता से पृथक नहीं है। योग शुद्ध धर्म का पर्याय है। शरीर और मन के बीच सेतु बनता है श्वास तथा मन और चेतना के मध्य सेतु है ध्यान एवं एकाग्रता। श्वास का सही अभ्यास और ध्यान योग के ही अंग हैं। अत: योग ही आध्यात्मिकता है योग ही शुद्ध धर्म है।

योगसूत्र में योग की परिभाषा भी शुद्ध धर्म की परिभाषा से मिलती है। कहा गया है:

''योग: चित्तवृत्ति निरोध:'' चित्तवृत्तियों का निरोध अर्थात् मन को स्थिर करना ही योग है। गीता में कहा गया है कि ''समत्वं योग उच्यते'' अर्थात् मन का समता में स्थित होना ही योग है। कुछ व्यक्ति मात्र योगासन तथा प्राणायाम को ही योग समझ लेते हैं। वास्तव में अष्टांग योग के आठों अंगों तथा सभी उपांगों का अभ्यास ही सम्पूर्ण योग है। यम-नियम से लेकर ध्यान और समाधि तक की यात्रा ही पूर्ण योग है। यदि यम-नियम का पालन नहीं किया जाता तो यह धर्म के बाह्य तत्व की तरह अधूरा रह जाता है। धर्म के जितने भी लक्षण गिनवाए गए हैं वे सभी यम और नियम में आ जाते हैं। इन सभी को धारण करने के लिए ध्यान की आवश्यकता पड़ती है। ध्यानावस्था में पहुँचने के लिए आसन और प्राणायाम सहायक होते हैं। इस प्रकार अष्टांग योग का अभ्यास ही शुद्ध धर्म है, यही मनुष्य धर्म है। इसके उपरांत किसी धर्म की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। तो आइये जीवन को धर्ममय बनाने के लिए जीवन को योगमय बनाने की ओर अग्रसर हों। यही सच्ची आध्यात्मिकता है।

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संपर्क:

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

फोन नं. 011-27313954/27313679

कहानी

निताई भिखमंगा, प्रेमिका और कविता एक मौत की

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- लाल्टू

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अजंता,

तपती दुपहरी, लू के तमाचे और शाम का एकाकीपन, इन सबसे अलग अब और कुछ नहीं रहा। तुमने पाँच वर्षों के अनुभव पर कविता लिखने को कहा था न...! मैंने लिखा है–‘बस फटे पन्ने-सी उड़ती ज़िंदगी, इस पुलिये को भी छोड़ चली...।’ बस! इसके बाद और कुछ लिख न पाया! सुना है, बड़े शायरों ने पुरानी जगहों को छोड़ते वक़्त समृतियों को गीतों व ग़ज़लों में संजोया है; पर मैं तो, तुम जानती ही हो कभी दो-एक कविताएं लिख लेता हूँ। अब अचानक किसी फूल के खिलने-सा आलोड़न अनुभव करता हूँ हृदय में, या जब मेरे किसी मित्र की बातों में कहीं कुछ चुभता हुआ सा प्रतीत होता है। अचानक दिशाओं में वीणा के तार झंकृत हो उठते हैं और मैं डायरी के पन्नों में कुछ लिखने लगता हूँ। पर इन पाँच वर्षों में मैं सूखता गया हूँ, पल्लवहीन तरु जैसा। कभी लगता है, किसी ने तीखे चाकू की नोक मेरे हृदय में चुभो दी है। अब कोशिश करने पर भी आवेग नहीं उत्पन्न होता, और फिर यह तो, स्कूल टीचर गिरिधर पांडे कहा करते थे न–कला जो है, सीखी नहीं जा सकती, चक्रवात-सी अचानक उबल पड़ती है। अपने चारों ओर निर्लज्ज नंगे मनुष्यों को महसूस करती मेरी आँखें उन्हीं की तरह ठंडी हो गई हैं। अब कहीं कुछ उबलता नहीं...!


पाँच साल...! अच्छा, अजंता! तुम्हें ऐसे किसी द्वीप में भेज दिया जाए जहाँ सभी नपुंसक हों और तुम... एक मिनट के लिए तुम्हें पुरुष मान लेता हूँ ... (हंसना नहीं, मैं सीरियसली सोच रहा हूँ) अपना पुरुषत्व लिए नपुंसकों के बीच घूमती रहो, एक क्षीण आशा लिए कहीं कोई और स्वस्थ मनुष्य मिले! दो-एक पुरुष तुम्हें मिलें भी तो वे नपुंसकों की भीड़ में सम्मोहित दीख पड़ें, तो तुम्हें कैसा लगेगा?... और अचानक एक दिन तुम्हें पता चले कि वे सब नपुंसक नहीं थे, कतिपय राक्षस और उनके भय से पुरुषों की विशाल श्रेणी कुत्तों की तरह दुम हिलाती घूम रहीं!... मुझे पहली दफ़ा जब इस रहस्य का पता चला ... मैं रो पड़ा था... (मैं डर गया था कि मुझे मार डाला जाएगा, पर जब तक मेरी मौत करीब आई, मुझमें ज़िंदा रहने की लेशमात्र भी इच्छा न ती)। जब रोते-रोते मैं थक गया, मैंने कविताएं लिखीं। मेरे आंसुओं से भीगी वे कविताएं...जिनमें मेरे कमरे के बगल से बहती खून की नदी बहती थी, उन्हीं फटे पन्नों में बिखर गईं...जिनमें मिलकर मेरी ज़िंदगी क्रमशः उड़ती जा रही है।


मैंने फूलों को मुरझाते ही देखा। तुम पूछोगी, ‘तुम्हारे मित्रों को हंसते भी तो देखा है?’ बेशक! हंसी, जिसमें मैं नहीं शामिल हो पाया। अजंता! तुमनें किसी फूल को मुरझाते हुए देखा है?... अगर कभी ग़ौर से देखा हो तो मुरझाने से पहले खिलने के लिए जब फूल हाथ-पैर पटकता है... उस क्षण तुम्हें बेहोशी की अनुभूति अवश्य हुई होगी। मैं इसी बदहवासी में दिन गुज़ारता रहा हूँ। पहले दिन जब मैं रोया था, दर्जी गंगाचरण के बेटे को दाख़िला न दिला पाने की वजह से, और गंगाचरण के यह कहने पर कि, ‘डिफेंस में हैं साहब! हमारे बच्चे को सेंट्रल स्कूल में नहीं लिया और प्रोफेसरों के लड़कों को ले लेते हैं...।’ उसी दिन श्यामा के घर निमंत्रण था, अठारह मोमबत्तियां बुझा कर उसने केक काटा था... मेरे मन में सवाल था कि गंगाचरण के बेटे और श्यामा के भाई को क्या एक तराज़ू को दो पलड़ों पर बैठाया जा सकता है।


मेरा हृदय बहुत पहले से ही चूर्ण-विचूर्ण हो चुका है। अब अगर गुड्डी की चिट्ठियों में बापू का शराबी पागलपन या आर्थिक दुर्वस्था का वर्णन हो, तो मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, जबकि पहले में कितना चिंतित हो जाया करता था और ‘शीघ्र ही कुछ करना होगा’ सोचते-सोचते तड़पता रहता था। शायद गुड्डी में भी टूटने की प्रक्रिया शुरू हो गई है, इसलिए आजकल उसकी चिट्ठियां कम ही आती हैं, और जो आती भी हैं, उनमें न तो खेतों की हरीतिमा होती है और न ही बरसाती दिनों का मटमैला आकाश गंभीर हो खड़ा होता है। बस ग्रीष्म की ऐसी रातें, जब कहीं हवा न बहती हो और पसीने में भीगा शरीर बिस्तर पर लुड़कता रहता हो।


अरे! आज तो 20 मई है न? ठीक एक साल पहले, याद है तुम्हें ...? मुझे लग रहा है कुछ ही दिन हुए हैं, तुमने अपनी शादी का निमंत्रण-पत्र भेजा था मुझे ...। अपनी शादी की सालगिरह मनाओगी न? तुम्हें बधाई दे दूं!...मैं तो भूल ही गया, तुम्हारी शादी किस दिन हुई थी ... पर मुझे वह दिन न भूलेगा ... ठीक एक साल पहले मैं तुम्हारे भेजे हुए उस रंगीन कार्ड को लेकर खड़ा रह गया...। जानती हो! उस दिन मैं बहुत रोना चाहता था, पर मैं रो न पाया। उस दिन पहली बार मुझे लगा... मेरी आंखों के नीचे तालाब सूख गया है और मेरा हृदय टूटता जा रहा है। मैंने मन ही मन प्रतिज्ञा की थी कि अब तुम्हारे साथ कोई रिश्ता नहीं रखूंगा, पर कुछ ही दिनों बाद जब तुम्हारा ख़त आया और उसमें तुमने लिखा था–शादी पर मेरे न आने से तुम्हें बुरा लगा ... तुम्हें बीसों साड़ियां मिलीं और क्या-क्या... अंत में लिखा था–तुम्हारे ‘वे’ चीफ़ अकांउटेंट हैं, किसी एक विदेशी कंपनी की शाखा के... उस दिन मैं हंस पड़ा था... अपनी मूर्खता पर हंसने के सिवा और कर भी क्या सकता था!... और भीतर कोई रोने लगता था... उसे भूलने के लिए मैं अपने उन मित्रों की भीड़ में जा बैठा था जो मेरी संकीर्णता पर भावुक हो मुझे विशाल होने का उपदेश देते। इसके कुछ ही दिनों बाद जब गौरी सिंह ने मुझे बताया था, कि उसकी भाभी का शादी से पहले किसी से इश्क था, इसलिए उसका भाई भाभी को पीटता है, मैंने तुम्हें एक ख़त लिखा था जिसे पड़कर ... तुम्हें पता चला कि मैं बदल गया हूँ, जैसे हर कोई बदल जाता है।


अभी कुछ दिनों पहले मेरे कुछ मित्र विदेश यात्रा से पूर्व ‘क्वॉलिटी’ में पार्टी पर बुला ले गये। उस आलीशान रेस्तरां में निशाहार करते मैंने मन ही मन तुमसे कहा, ‘अजंता, देखो मैं कितने बड़े रेस्तरां में डिनर खाता हूँ।’ तुमने हंसकर उत्तर दिया, ‘वाह! आज दोस्तों ने पार्टी दी तो चले आये, रोज़ थोड़े ही आते हो।’ मैंने कहना चाहा था, ‘तुम्हारे दांत दूध से भी ज़्यादा सफ़ेद हैं’, पर मैंने कहा, ‘हां! आज पार्टी है। अब मैं अपने इन मित्रों को असंख्य शुभकामनाएं उपहार दूंगा। ये विज्ञान और तकनीकी के हित धन कमाते हुए ही अपना जीवन कुर्बान कर दें।’ अचानक उठकर चली गईं तुम और लौटी नहीं। मेरे मित्र काफ़ी परेशान थे कि उस दिन मैं बिल्कुल चुप क्यों था...। उस वक़्त मेरी आंखों के सामने एक मोटी तोंद जिस पर ‘चीफ़ अकाउंटेंट’ का लेबल चिपका था और उससे सटी हुई एक कोमल देह तैर रही थी...।


अच्छा अजंता! हमारे स्कूल के गेट पर एक लंगड़ा भिखारी बैठा करता था। निताई नाम था उसका। ज़रा देखना, वह आजकल वहां बैठता है कि नहीं? यहां कॉलेज के गेट पर वैसा ही एक भिखमंगा बैठा करता है। एक बार बचपन में पिताजी आये थे स्कूल में, शायद हेडमास्टर ने बुलाया था। निताई को देखकर काफ़ी बिगड़े और उन्होंने हेडमास्टर से शिकायत की थी। इसके बाद करीब महीने भर वह नहीं आया था। फिर अचानक एक दिन मैंने उसे देखा था, उसी जगह बैठे हुए, एल्यूमीनियम की एक टूटी थाली पसारे...। मैंने उसे निताई कहकर पुकारा तो उसने बतलाया कि वह निताई नहीं, गोपाल है। मुझे आश्चर्य हुआ था, पर मैं हमेशा उसे निताई ही कहता था। उस दिन ‘क्वॉलिटी’ से लौटते हुए कॉलेज के गेट पर बैठे भिखारी को मेरे एक मित्र ने पाँच पैसे दिये। मुझे अचानक हंसी आ गयी। मेरा वह मित्र काफ़ी देर तक मुझे घूरता रहा और धीरे से दूसरे एक मित्र के कानों में फुसफुसाया था, “सनकी है साला!”


उस दिन मैंने एक कविता लिखी थी – ‘त्रिभुज के तीन कोणों का योग दो समकोण होता है।’ तीन कोण – भूख, नग्नता और गरीबी। समकोण – फटा पन्ना और ज़िंदगी।


एक बार यहां कि एक प्रादेशिक समिति के साथ वनभोज पर गया था। ‘बिठूर’ नामक एक स्थान पर (यहां से करीब 14 कि.मी. दूर है)। खेतों के बीच पिकनिक की। करीब ही गंगा बहती थी। वहीं रमजसवा नामक एक स्थानीय वृद्ध ने कुएं से पानी भरा। उसकी बीवी और बच्चे भी काम करते रहे। करीब तीन बजे तक सबका खाना ख़त्म हुआ तो रमजसवा को बचा हुआ खाना दिया गया। वह इतना कम था कि वृद्ध ने बीवी को बच्चों में बांट देने को कहा। बच्चों की भूख न मिटी तो वे रोने लगे। आयोजकों में से एक से मैंने रमजसवा को कुछ पैसे देने को कहा। उसका जवाब था – ‘वह तो ख़ुद आया था, हमने तो उन्हें नहीं बुलाया।’ मैंने रमजसवा को बुलाकर कुछ पैसे दिये। उस दिन भी कविता लिखना चाहता था मैं, पर लिख न पाया। गंगा के किनारे बैठा सोच रहा था, मेरे चारों ओर बहती गंगा का जल खून-सा लाल है!


पाँच वर्ष...! मैं जानता हूँ, इससे पहले के सोलह वर्ष की दुनिया भी ऐसी ही थी। पर उन दिनों तुम थीं। उससे भी पहले सब थे – मेरा अपना दिन, अपनी रात, अपना पहाड़, अपना आकाश, अपनी नदी ... क्या नहीं था! धीरे-धीरे सब कहीं विलीन होता गया, बचपन में संजोयी आकांक्षाएं धीरे-धीरे मरती रहीं। मेरे वे सब सुन्दर क्षण ... एक-एक कर सब उड़ गये और तभी मुझे लगा था, मैं एक फटे पन्ने-सा काल के साथ उड़ता जा रहा हूँ। उड़ता-गिरता, धूलि में स्नान करता मैं किसी ओर जा रहा हूँ, मुझे पता नहीं। मेरे दिन गये। मेरी रातें गयीं। मेरे पहाड़, नदी और आकाश गये, और अजंता! मेरी तुम चली गयीं। मेरी कविताएं भी चली गयीं...!


तुम्हारे ‘वो’ तो काफ़ी पैसा कमाते होंगे! पिछली बार घर गया था तो मित्रों ने बतलाया था कि वे अच्छे खिलाड़ी भी हैं। मुझे ये बेशक काफ़ी पहले से पता था, क्योंकि मैंने उन क्षणों को सहा था, जब वे खेल में वे मुझसे काफ़ी आगे बढ़ गये थे। अगर मैं कहूँ, और वास्तव में यह सच है कि मैंने तुम्हारे ‘उनको’ कई बार निर्मित किया है और उनकी हत्या की है...। उन्माद के उन दिनों में मैंने इन पाँच वर्षों के सबसे बुरे (या अच्छे!) क्षण बिताये हैं...। अजंता! तुम्हें यह सब जानकर हंसी आ रही होगी...(पर कभी किसी क्षण मेरी याद आये तो दो आंसू मेरे लिए बहाना, गंगा के जल से अधिक निर्मल ... तुम्हारे गालों पर टपकते आंसू बड़े अच्छे लगेंगे...)। अब तक शायद तुम्हें मुझ पर गुस्सा आ रहा हो, कि कहां तो पाँच वर्षों के अनुभव पर कविता मंगवायी थी, और कहां यह पागलपन! पर जैसे मई महीने में जहां हर ओर सूखे, पीलिया से आक्रांत-से पेड़ दिखलाई पड़ते हैं, मैदानों में हर दोपहर, केवल चिताएं जलती हैं... इन पाँच वर्षों के बाद मैं भी उन्हीं में कहीं न कहीं हूँ। मैं विज्ञान का विद्यार्थी हूँ न, मुझे हर अन्याय को समझना पड़ा है, मनन करके ... यही मेरी मौत का कारण था। मेरे प्रगतिशील, सक्रिय मित्रों ने उन गहराइयों में डुबकियां लगानी पसंद न की थीं, जिनमें चारों ओर फेनिल पंक था, गंदगी से भरा, टूटते हृदयों की व्यथा से बोझिल ... और वे ज़िंदा रहे।


अजंता तुमने कभी डूबते सूर्य से निकलती सतरंगी किरणों में श्रद्धा, स्नेह आदि भावों को हताशा और रुदन में बदलते देखा है? ... मेरे ये भाव एक दिन ऐसे ही बदल गये थे, जब मुझे पता चला था, किताबों और दो टांगों पर खड़ी ज़िंदगी में कितना फ़र्क है! आदिम नग्नता कि इस वीभत्सता के बारे में मैंने सोचा तक न था! और जिस दिन मैंने जाना, काले अक्षरों पर तैरती आँखों के नीचे भी नग्नता की चाह है, और प्रेम और घृणा वहां सहवास करते हैं ... मुझे याद है, मैंने दिनभर खाना तक न खाया था। शायद हर आदमी एक दिन इस परिस्थिति से गुज़रता है जब एक मिमियाती भेड़-सा वह कुछ कहना चाहता है। पर कह नहीं पाता। अगर हिम्मत कर कुछ कह भी दिया (कि देखो चारों ओर अंधेरा है! ... स्तब्ध और गाढ़ा ...) लोग संदेह की नज़रों से ताकते हैं ... पागल! और इन सबके साथ क्रमशः चलता रहता है ख़ुद को बेईमान समझने की बार-बार होने वाली मौत का सिलसिला!...


और यह मौत ही मेरी कविता है। इसे मैंने गत पाँच वर्षों में लिखा है इसके पहले कि मैं यहां से सचमुच चला जाऊं (जो अब असंभव-सा प्रतीत होता है) मैं यहां के हर पेड़, जो कि सूखे हुए हैं, हर बगीचे को, थकी रातों को जलती दुपहरियों को इसी तरह कुछ न कुछ कहना चाहता हूँ, जैसे तुमसे कह रहा हूँ ... या भिखमंगे निताई को कहना चाहता रहा ... पर कह नहीं पाया ...


इति –

पुनश्चः ... कितनी ख़ौफ़नाक मौत है यह! अपने सब आदर्शों की मौत! और काटती ज़रूरतों को ढोता मेरा पैशाचिक अस्तित्व! ... हाय अजंता! मैं न चाहता हुआ भी यह लिखने को मजबूर हो रहा हूँ ... वैसे मेरे ज़िंदा रहने की परवाह भी किसने की है। ... मेरी कविताओं का गला घोंट दिया गया। मैंने कभी कुछ चाहा था। एक प्राणमय जीवन, सृजन और संस्कृति से समृद्ध एक सामाजिक परिवेश ...। और कितना कुछ...। पर अब मेरी मौत हो चुकी है। अब मुझे कोई शर्म नहीं ... अजंता! भाई साहब की चिट्ठी आयी थी कि उन्होंने तुम्हारे ‘उन’ की कंपनी के चौरंगी स्थित ऐडमिनिस्ट्रेटिव ऑफ़िस में क्लर्की के लिए दरख़्वास्त की है। चूंकि मैं तुम्हें कभी अच्छी तरह जानता था (भाई साहब ने ऐसा ही लिखा है) मैं तुमसे अनुरोध कर सकता हूँ कि तुम भाई साहब की नौकरी के मामले में ज़रा उनसे कहो। भाई साहब ने पता लगाया था कि उनके कहने से नौकरी मिलने की संभावना बढ़ जायेगी ...


(सारिका में 1981 में पूर्वप्रकाशित)

(आशीष अलेक्जेंडर ashiah002 AT gmail DOT com का टंकण सहयोग हेतु हार्दिक धन्यवाद )

रचनाकार परिचय के लिए लाल्टू का चिट्ठास्थल आइए हाथ उठाएं हम भी देखें

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कलाकृति - निखिल-छगनलाल की कलाकृति, साभार निखिल-छगनलाल

 

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-सीताराम गुप्ता

 

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हिन्दी में एक मुहावरा है 'श्रीगणेश करना' जिसका अर्थ है किसी कार्य का शुभारंभ करना। इस मुहावरे से जनजीवन में गणेश की सर्वव्यापकता का ही पता चलता है। उर्दू वाले या कहें कि अहले-इस्लाम भी इसी के समकक्ष एक मुहावरे का प्रयोग करते हैं और वह है 'बिस्मिल्लाह करना'। इसका अर्थ भी ठीक वही है जो श्रीगणेश करने का है। ग़ौर करें तो हम पाते हैं कि इस्लाम में 'अल्लाह' एक ओर केवल एक सर्वोच्च शक्ति है। हिंदुओं में ईश्वर के अतिरिक्त अनेक देवी-देवता हैं तो फिर किसी भी कार्य की शुरूआत पर श्रीगणेश करना ही क्यों कहा जाता है? वस्तुत: किसी भी कार्य के प्रारंभ में सबसे पहले गणेशपूजा या गणेश को स्मरण करने का ही विधान है और वो इसलिए कि गणेश को गणाधिपति या गणाध्यक्ष माना जाता है। गणेश का एक नाम है गणपति जिसका अर्थ होता है समूह का नेता और गणेश में देवताओं का नेतृत्व करने के सभी गुण उपस्थित हैं। इन्हीं गुणों के कारण गणेश सबसे पहले पूजे जाते हैं।

पुराणों में वर्णन मिलता है कि जब शिव ने ग़लती से अपने ही पुत्र गणेश का सिर काट दिया तो पार्वती बहुत दुखी हो गई और शोक में डूब गई। पार्वती का शोक दूर करने और अपनी भूल का सुधार करने के लिए शिव ने अपने गणों को दौड़ाया और कहा कि ऐसे प्राणी का सिर काटकर ले आओ जो उत्तर दिशा की ओर सिर करके सोया हो। गण इस अवस्था में सोए हुए एक हाथी का सिर काट कर ले आए। शिव ने उसी हस्तिमुख को गणेश के धड़ पर लगा कर उन्हें पुनर्जीवित पर दिया और साथ ही उनको सेना का नायक भी बना दिया। तभी से गणेश गणपति कहलाए। गणपति के इस रूप की पूजा या स्मरण का मंत्र है : ओम् गणं गणपत्यै नम:। इसका एक दूसरा रूप ''ओम् गं गणपत्यै नम:'' भी मिलता है।

रिद्धि-सिद्धि प्रदायक गणेश केवल सुख-समृद्ध, वैभव एवं आनंद के ही अधिष्ठाता नहीं हैं अपितु हर प्रकार के विघ्न और कष्टों को हरने वाले तथा बुद्धि देने वाले भी हैं इसीलिए चाहे कोई सामान्य व्यक्ति हो अथवा विद्वान, विद्यार्थी हो अथवा कलाकार, व्यवसायी हो अथवा उद्योगपति, स्त्री हो या पुरुष, मांगलिक कार्य हो अथवा कार्य को निर्विघ्न सम्पन्न करने की इच्छा, हर प्रकार की सफलता के लिए सबसे पहले गणेश का ही स्मरण अथवा पूजा की जाती है। पुस्तक का पहला पृष्ठ हो अथवा किसी मांगलिक अवसर का निमंत्रण पत्रा सबसे पहले लिखा जाता है: ''श्री गणेशाय नम:''। बच्चे को वर्णमाला के वर्णों का ज्ञान कराने से पहले उससे उच्चरित कराया जाता है ''श्री गणेशाय नम:''। इस प्रकार ''श्री गणेशाय नम:'' मांगलिक कार्य के प्रारंभ होने का ही प्रतीक है और कार्य को सुचारु रूप से सम्पन्न कराने वाले हैं श्री गणेश। कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न हो जाए इसके लिए गणेश की निम्न स्तुति ही सबसे पहले की जाती है:

 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा॥

 

एक विद्यार्थी भी बुद्धि-प्रदाता गणेश की स्तुति ही सर्वप्रथम करता है ताकि उसे बुद्धि की प्राप्ति हो और साथ ही इस प्राप्ति में कोई विघ्न भी पैदा न हो:

 

विद्यादाता गणाधीश सूर्यकोटि सम प्रभ।

निर्विघ्नं कुरू मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा॥

 

विद्या की देवी हैं सरस्वती। पूजा या प्रार्थना या स्मरण पहले गणपति का तत्पश्चात सरस्वती का। सरस्वतीपूजा हो तो भी गणेश पहले और लक्ष्मीपूजा हो तो भी गणेश पहले। ''रामचरितमानस'' का प्रारंभ करते हुए बालकाण्ड के प्रथम सोपान में पहले श्लोक में तुलसीदास लिखते हैं:

 

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि।

मंगलानां च कत्तरारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥

 

अर्थात अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों छंदों और मंगलों की करने वाली सरस्वती जी और गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ। ''विनयपत्रिका'' में तुलसीदास अपनी विनय सीता के माध्यम से राम तक पहुँचाने की प्रार्थना करते हैं लेकिन 'विनयपत्रिका' में जो सबसे पहला पद है वह है 'श्रीगणेश-स्तुति' जो निम्न प्रकार से है:

 

गाइये गनपति जगबंदन। संकर-सुवन भवानी-नंदन॥

सिद्ध-सिदन, गज-बदन, विनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर सब-लायक॥

मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। विद्या-वारिध, बुद्धि-विधाता॥

माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे॥

 

तुलसीदास राम के अनन्य भक्त हैं इसलिए हृदय में राम और सीता को ही बसाए रखना चाहते हैं लेकिन इसकी प्राप्ति के लिए सबसे पहले गणपति से ही याचना करते हैं। गणेश की अनुकंपा के अभाव में किसी अन्य ईष्ट की कृपा भी संभव नहीं। कोई भी कार्य हो, अनुष्ठान हो अग्रपूज्य हैं गणेश।

तुलसीदास द्वारा रचित 'श्रीगणेश-स्तुति' में गणेश का न केवल परिचय मिलता है अपितु उनकी अनेक विशेषताओं की भी जानकारी प्राप्त होती है। 'स्तुति' में एक पंक्ति है 'संकर-सुवन, भवानी-नंदन'। 'संकर-सुवन' अर्थात् शंकर के पुत्र । इस प्रकार गणेश के पिता हैं भगवान शंकर ;शिव, तथा माता हैं पार्वती ;उमा,। गणेश शंकर और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र हैं तथा उनसे छोटे पुत्र हैं कार्तिकेय। इस प्रकार कार्तिकेय गणेश के अनुज हैं। गणेश की एक बहन भी है जिसका नाम मनसा है।

असंख्य नाम हैं गणेश के लेकिन कहा जाता है कि गणेश के निम्नलिखित बारह नाम प्रात: दोपहर और सांयकाल लेने मात्र से व्यक्ति के सब कष्ट दूर होकर सफलता मिलती है:

वक्रतुंड, एकदंत, कृष्णपिंगाक्ष, गजवक्त्रा, लंबोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचंद्र, विनायक, गणपति और गजानन। इस सूची में कहीं-कहीं अंतर भी मिलता है लेकिन श्रद्धापूर्वक स्मरण करने से कार्य में सफलता अवश्य मिलती है। कहीं पर गणेश के एक सौ आठ नामों की सूची भी मिलती है लेकिन गणेश के नामों की कोई सीमा नहीं। नामावली ही नहीं उनके स्वरूपों को भी सीमा में बाँधना मुश्किल है। गणेश नेतृत्व, शौर्य और साहस के प्रतीक है। कहीं उनके विनायक रूप में विकरालता, कहीं हेरंब रूप में युद्धप्रियता तथा कहीं विघ्नेश्वर रूप में लोकरंजक व परोपकारी स्वरूप के दर्शन होते हैं।

गणेश ऐसे देवता हैं जो सम्पूर्ण भारत में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य अनेक देशों में भी किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित हैं। पड़ोसी देश नेपाल में गणेश को सूर्य विनायक, सूर्यगणपति अथवा हेरंब के नाम से जाना जाता है। यहाँ हेरंब गणेश के पाँच सिर और दस हाथ मिलते हैं। यूनान के प्राचीन ग्रंथों में बुद्धि के देवता के रूप में 'जानस' का जिक्र मिलता है वह गणेश का ही एक रूप है जिसके सात सिर और एक सूंड है। अन्य पडोसी देशों और दूसरे महाद्वीपों में भी गणेश से मिलती-जुलती अनेक प्रतिमाएँ मिलती हैं जिन्हें गणेश की तरह ही पूजा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि वैदिक काल से लेकर आज तक संपूर्ण विश्व की संस्कृति में गणेश किसी न किसी रूप में अवश्य ही विद्यमान हैं।

यदि धर्म की बात करें तो गणेश मात्र हिंदुओं के ही नहीं बल्कि जैन और बौद्धों के भी आराध्य देव हैं। जैन संप्रदाय में ज्ञान का संकलन करने वाले गणाध्यक्ष हैं गणेश। महाभारत के लेखक के रूप तो गणेश जाने ही जाते हैं। महर्षि वेद व्यास ने महाभारत की रचना की लेकिन उनके सहायक हुए गणेश। वेदव्यास बोलते गए और गणेश अपने हाथों से लिखते गए। गणेश के हस्तिमुख पर स्थित दंतद्वय में से एक टूटा हुआ है। कहा जाता है कि इसी टूटे हुए दांत से गणेश ने महाभारत की कथा को लिपिबद्ध किया था। बौद्ध धर्म की अनेक शाखाओं में मान्यता है कि गणेश वंदना के बिना मंत्रसिद्धि असंभव है। नेपाल एवं तिब्बत के अनेक मंदिरों में बुद्ध की प्रतिमाओं के साथ-साथ गणेश की प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं। गणेश किसी धर्म या मत विशेष के नहीं अपितु धर्म का जो मूल तत्व है उसके प्रतीक हैं।

गणेश की रूपाकृति की प्रतीकात्मकता:

गणेश की बाह्य रूपाकृति कुछ विचित्र सी ही प्रतीत होती है। धड़ मनुष्य का तथा सिर हाथी का। पैर मनुष्य की तरह दो लेकिन हाथ चार या कभी-कभी छ:, आठ या दस भी । शरीर के विभिन्न अंगों में भी संतुलन का अभाव तथा अत्यंत स्थूलकाय। स्वयं स्थूलकाय पर वाहन के रूप में मूषक महाशय। ऊपर से देखने पर तो यह विचित्र सा लगता है परन्तु यदि हम गणेश के शरीर के विभिन्न अंगों की प्रतीकात्मकता पर विचार करें तो प्रत्येक अंग एकाधिक आध्यात्मिक संदेश प्रदान करता है। संतुलन बाह्य नहीं आंतरिक होना भी अनिवार्य है। शरीर, मन और बुद्धि में उचित संतुलन और तालमेल होगा तभी व्यक्ति आध्यात्मिक क्षेत्र में पदार्पण कर आत्मज्ञान प्राप्त कर सकेगा। सुकरात अथवा लिंकन की बाह्य कुरूपता उनके विकास और उन्नति में बाधक नहीं बनी। उनके विचार आज भी प्रेरणास्पद हैं। गणेश अपने संपूर्ण शरीर और परिवेश में प्रेरणादायक हैं।

सबसे पहले गणेश के हस्तिमुख पर विचार करते हैं। शिव द्वारा पहले तो गणेश का सिर काटना और फिर उस पर मानवमुख की बजाय हाथी का सिर आरोपित करना वास्तव मे प्रतीकात्मक ही है। मनुष्य सकारात्मक और नकारात्मक भावों अथवा वृत्तियों का समुच्चय ही तो है लेकिन यदि नकारात्मकता बढ़ जाती है तो उसका उन्मूलन अनिवार्य है। सिर या मस्तिष्क अहंकार का प्रतीक है। जब तक सिर रूपी अहंकार को उतार कर नहीं फेंका जाता तब तक आध्यात्मिक उन्नति संभव ही नहीं। आध्यात्मिक उन्नति के अभाव में भौतिक उन्नति भी असंभव है और यदि आध्यात्मिक उन्नति के बिना भौतिक उन्नति प्राप्त कर भी ली जाती है तो जीवन में संतुलन संभव नहीं। शरीर, मन और आत्मा का एक धरातल पर आना ही वास्तविक उन्नति है। जीवन में संतुलन के लिए अहंकार की समाप्ति अथवा शिरोच्छेदन अनिवार्य है। प्रेम भी जीवन का अनिवार्य तत्व है। अहंकार के साथ प्रेम भी असंभव है। तभी कबीर भी कहते है:

 

यह तो घर है प्रेम का खाला का घर नाहिं।

सीस उतारे भुईं धरे तब पैठे घर माहिं॥

 

अहंकार के रहते आपको महत्व नहीं मिल सकता। अंहकार का समापन ही किसी को नायक, गणपति अथवा अग्रपूज्य बना सकता है। हाथी बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। हाथी का सिर पुनर्स्थापित होने का अर्थ है ज्ञान की प्राप्ति का प्रारंभ । अहंकार गया तो आत्मज्ञान होते देर नहीं लगती। आत्मज्ञान के प्राप्त होने पर अहंकार का विसर्जन स्वाभाविक है। अहंकार के साथ अन्य नकारात्मक वृत्तियाँ भी चली जाती हैं। पुनर्जन्म की स्थिति है ये। एक सिर को काट कर दूसरा सिर लगाना या दूषित रक्त को निकालकर स्वस्थ रक्त चढ़ाना पुनर्जन्म नहीं तो और क्या है? पुनर्जन्म से तात्पर्य शारीरिक मृत्यु नहीं अपितु दूषित मनोभावों से मुक्ति है। जब व्यक्ति के दूषित मनोभाव तिरोहित हो जाते हैं तभी वह सही अर्थों में जीना प्रारंभ करता है। गणेश का हस्तिमुख आपको लगातार स्मरण कराता रहता है कि आपको हर हाल में अपनी जड़ता और दूषित मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त होना है।

हाथी शक्ति, साहस और धैर्य का प्रतीक है। हाथी में अनुशासन भी है और स्वामीभक्ति। हाथी के पैर मजबूत तथा सूंड लचीली होती है। जीवन में स्थायित्व भी हो अर्थात् इरादों में फौलाद-सी मजबूती तथा समय के साथ परिवर्तित होने का गुण भी। जिसके विचारों में जड़ता न हो वही सबको साथ लेकर चल सकता है। लोकतंत्र में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च माना गया है क्योंकि राष्ट्रपति किसी भी प्रकार की दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर, पूर्वाग्रह से मुक्त होकर निरपेक्ष भाव से कार्य करता है। वह सबकी भावनों को समझकर सही निर्णय लेने में सक्षम है। निर्णय के समय उसमें लचीलापन है लेकिन निर्णय के कार्यान्वयन में दृढ़ता भी। जब तक किसी व्यक्ति में पूर्वाग्रह तथा अहंकार है, दृढ़ता तथा लोच का अभाव है वह सर्वोच्च पद के लायक नहीं है।

हाथी के कान होते हैं सूप के समान बडे-बड़े। सूप सार तत्व को रखकर बेकार की थोथी अथवा महत्वहीन वस्तु को उड़ा देता है। सिर्फ काम की बातें ग्रहण करो शेष छोड़ दो तभी मानव जीवन की सार्थकता है, तभी सफलता है। उपयोगी का चुनाव हमें आगे ले जाता है। सही जनप्रतिनिधियों का चुनाव राष्ट्र और समाज की उन्नति में सहायक है। गणेश के बड़े-बड़े हस्तिकर्ण सारग्राह्यता के ही प्रतीक हैं। हाथी का मुँह छोटा है पर कान बड़े-बड़े। यहाँ गणेश संदेश देते हैं कि कम बोलो और सुनो ज्यादा तथा ध्यानपूर्वक। जब जरूरत हो तभी बोलो। इसके लिए चिंतनशील होना अनिवार्य है। हाथी का शरीर विशाल होता है लेकिन ऑंखें छोटी-छोटी। गणेश की छोटी-छोटी ऑंखें सूक्ष्म दृष्टि तथा एकाग्रता का प्रतीक हैं जो उनकी चिंतनशीलता का ही प्रमाण है।

हाथी की सूंड दूर तक सूंघने में सक्षम होती है अत: यह दूरदर्शिता के महत्व को प्रतिपादित करती है। आज मनुष्य अपने थोड़े से लाभ के लिए प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर पर्यावरण में अंसतुलन पैदा कर रहा है। ओजोन परत का विनाश कर ख़ुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है। उसे जीवन के हर क्षेत्र में दूरदर्शी होना चाहिये और हर कदम फूंक-फूंक कर रखना चाहिए। गणेश के दो दाँत हैं जिनमें से एक पूरा है तथा दूसरा अपूर्ण। पूरा दाँत श्रद्धा और विश्वास का प्रतीक है तो अपूर्ण या भग्न दाँत बुद्धि और ज्ञान का। बुद्धि अथवा ज्ञान कभी पूर्ण नहीं हो सकता लेकिन पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हम निरंतर ज्ञानार्जन और आत्मज्ञान के क्षेत्र में प्रगति कर सकते हैं। महत्व ज्ञान का उतना नहीं है जितना ज्ञान का जीवन में सही और सार्थक उपयोग करने में हैं। विश्वास भी मात्र ज्ञान प्राप्ति के लिए ही अनिवार्य नहीं है अपितु सामाजिक जीवन में संबंधों के विकास के लिए भी इसका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। श्रद्धा में पूर्ण समर्पण होता है और समर्पण में अहंकार और द्वैत का विसर्जन। इस प्रभार गणेश का हस्तिमुख एक वृहद आध्यात्मिक और सामाजिक प्रतीकात्मक अर्थ प्रस्तुत करता है।

गणेश के मानवेतर अंग अर्थात् हस्तिमुख या गजशिर के अतिरिक्त उनके शरीर के मानव अंग भी कम प्रतीकात्मक नहीं हैं। छोटी-छोटी मगर मजबूत दो टाँगें और भारी भरकम उदर। भारी-भरकम उदर के कारण ही लंबोदर कहलाए लेकिन लंबोदर का गुण है सब कुछ उदरस्थ कर लेना। सब कुछ स्वीकार कर लेना। सह लेना। गणेश सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं, सह लेते हैं और पचा जाते हैं। बुराइयों को फैलने से रोक देते हैं। शिव ने विष को कंठ में धारण किया था, गणेश नकारात्मकता को उदर में धारण कर लेते हैं। गोपनीयता बनाए रखते हैं। समाज को विकृति से बचाए रखते हैं। ये इस बात का प्रतीक है कि नकारात्मक भावों को मन-मस्तिष्क से निकाल कर उदरस्थ कर लो। मल का स्थान मन नहीं ऑंतें हैं।

गणेश के पैर छोटे-छोटे हैं इसलिए वे तेज नहीं दौड़ सकते। मजबूत पैरों से धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हैं। उनमें उतावलापन नहीं है। आगे बढ़ो लेकिन सहजता से यही संदेश देते हैं गणेश के नन्हें-नन्हें पैर।

गणेश के चारों हाथों में से एक में अकुंश है, दूसरे में पाश, तीसरे में मोदक तथा चौथा आशीर्वाद की मुद्रा में। अंकुश प्रतीक है विषय-वासनाओं पर नियंत्रण का तथा पाश प्रतीक है मन तथा इंद्रियों पर नियंत्रण का। इंद्रियों को वश में रख कर मन को नियंत्रित करो उसमें विषय-वासनाओं और विकारों के उत्पन्न होने पर रोक लगाओ। इच्छाओं पर नियंत्रण कर संयमित जीवन जीओ। मनुष्य के जीवन में रूपांतरण तभी संभव है जब भावनाओं को परिष्कृत किया जा सके। तभी नये मनुष्य का जन्म संभव है। मोदक प्रतीक है आनंद का, सात्विक आहार का। मोदक तत्वज्ञान का भी प्रतीक है। निष्काम कर्म द्वारा व्यक्ति कर्म के बंधन से मुक्त होकर आनंद की प्राप्ति करने में सक्षम है। अभय मुद्रा जीवन में निडरता के साथ आगे बढ़ने का संदेश देती है। जब तक किसी भी प्रकार का भय है हम आगे नहीं बढ़ सकते। मृत्यु का भय ठीक से जीने नहीं देता, रोग का भय स्वस्थ नहीं रहने देता, निर्धनता का भय समृद्धि से दूर ले जाता है। निर्भय होकर ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति संभव है।

गणेश का वाहन है नन्हा चूहा जो एक अत्यंत क्षुद्र जीव है। गणेश समता के प्रतीक हैं। उनका सिर पृथ्वी पर सबसे बड़े प्राणी हाथी का तथा वाहन अत्यंत छोटा प्राणी चूहा। समाज के विकास के लिए न केवल सभी वर्गों के लोगों का मिल-जुलकर रहना और कार्य करना अनिवार्य है अपितु धरती पर भी सभी जीवों का अस्तित्व महत्वपूर्ण है। इस शृंखला में यदि एक प्राणी की भी उपेक्षा हुई अथवा उसका लोप हो गया तो मानव जीवन संकट में पड़ जाएगा। सामाजिक विकास के साथ-साथ जीव-जंतुओं और प्रकृति के संरक्षण की भी अत्यंत आवश्यकता है।

गणेश की प्रतीकात्मकता की प्रासंगिकता मात्र धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं अपितु व्यक्ति के स्वयं के विकास, सामाजिक जीवन तथा राष्ट्र की उन्नति के संबंध में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। गणेश की प्रतीकात्मकता अत्यंत व्यापक है और इसी व्यापकता के कारण गणेशोत्सव मनाने की परंपरा का शुभारंभ और विकास हुआ।

गणेश चतुर्थी अर्थात् गणेश जन्मोत्सव भारत के प्रसिद्ध पर्वों में से एक है। महाराष्ट्र और देश के दूसरे भागों में जहाँ महाराष्ट्र के मूल निवासी रहते हैं वहाँ यह पर्व ग्यारह दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन बड़ी धूम-धम से गणेश की सुंदर-सुंदर प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं और ग्यारह दिन तक पूजा-पाठ करने के उपरान्त अनन्त चतुर्दशी के दिन मूर्तियों को जुलूस के रूप में नाचते-गाते हुए ले जाकर नदी, तालाब या समुद्र के किनारे जल में विसर्जित कर दिया जाता है। गणेश प्रतिमाओं की स्थापना, पूजा-पाठ और विसर्जन घरों में व्यक्तिगत रूप से, गणेश मंडलों अथवा अन्य सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से दोनों तरह किया जाता है। महाराष्ट्र में सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की परंपरा की शुरूआत उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में लोकमान्य तिलक ने पुणे से की। वैसे सामूहिक गणेशोत्सव की स्थापना का प्रारंभ 1885 में शोलापुर के आजोबा गणपति मंदिर में हो चुका था। जब तिलक यहाँ आए तो उन्होंने इस सार्वजनिक गणेशोत्सव से प्रेरणा लेकर 1893 में पूरे महाराष्ट्र में सामूहिक गणेशोत्सव मनाने की परंपरा शुरू की जो आज भी विद्यमान है और जिसमें लगातार नये आयाम जुड़ते जा रहे हैं। लोकमान्य तिलक ने धर्म के माध्यम से राजनीतिक व सामाजिक चेतना के विकास के लिए सामूहिक गणेशोत्सव को एक आन्दोलन के रूप में स्थापित किया। उस समय देश को स्वतंत्र कराना एक अहम मुद्दा था। सामूहिक गणेशोत्सव आयोजन के माध्यम से इसकी चेतना का विकास खूब किया गया। आज भी गणेश की पूजा-अर्चना के साथ-साथ समसामयिक समस्याओं को इन आयोजनों के माध्यम से बख़ूबी प्रस्तुत किया जा रहा है। कई सरकारी और ग़ैर सरकारी संगठन भी इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेते हैं और इसके जरिये अपना संदेश प्रसारित करते हैं। गणेशोत्सव सादगी से मनाने और इसके द्वारा होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए लोगों में जागृति उत्पन्न करने के लिए भी इसी मंच का सहारा लिया जा रहा है। इससे गणेश और गणेशोत्सव दोनों ही आधुनिक संदर्भ में अधिकाधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।

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