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आलेख || कविता ||  कहानी ||  हास्य-व्यंग्य ||  लघुकथा || संस्मरण ||   बाल कथा || उपन्यास || 10,000+ उत्कृष्ट रचनाएँ. 1,000+ लेखक. प्रकाशनार्थ रचनाओं का  rachanakar@gmail.com पर स्वागत है

मनुष्य स्वयं है अपने सुख-दुख का कर्ता और नियंता

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-सीताराम गुप्ताख़लील जिब्रान कहते है, ‘‘हम अपने सुखों और दुखों का अनुभव करने से बहुत पहले ही उनका चुनाव कर लेते हैं।'' कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। जो बीज हम बोते हैं उसी बीज से उत्पन्न पेड़ के फल हमें प्राप्त होते हैं। कुछ बीज ऐसे होते हैं जो बोने के बाद जल्दी ही बड़े होकर फूल-फल प्रदान करने लगते हैं जबकि कुछ बीज धीरे-धीरे अंकुरित होते हैं और धीरे-धीरे ही उनकी वृद्धि होती है। फूल-फल भी वे बहुत देर में देते हैं। जिस प्रकार हमें अपने बोए गए बीजों के फूल-फल अवश्य ही मिलते हैं ठीक उसी प्रकार हमारे कर्म रूपी बीजों के फल भी अवश्य ही हमें देर-सवेरे वहन करने पड़ते हैं। यही कर्म रूपी बीज हमारे सुख-दुख या हर्ष-विषाद का मूल हैं। हमारा वर्तमान इन्हीं के कारण इस अवस्था में है। किसी भी कार्य की पहली रूपरेखा हमारे मन में बनती है। किसी भवन के निर्माण से पहले उसका नक्शा बनाया जाता है लेकिन भवन का नक्शा काग़ज़ पर बनने से पहले किसी के मन में बनता है। कोई भी विचार सबसे पहले मन में आकृति ग्रहण करता है। उसके बाद ही विचार वास्तविकता में परिवर्तित होता है। इस …

नईम की कविताएँ : लिखने जैसा लिख न सका मैं

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दो कविताएँ-नईमलिखने जैसालिखने जैसा लिख न सका मैं सिकता रहा भाड़ में लेकिन, ठीक तरह से सिक न सका मैं. गत दुर्गत जो भी होना थी, खुद होकर मैं रहा झेलता, अपने हाथों बना खिलौना, अपने से ही रहा खेलता. परम्परित विश्वास भरोसों पर यक़ीन से टिक न सका मैं. अपने बदरंग आईनों में, यदा-कदा ही रहा झांकता. थी औक़ात, हैसियत, लेकिन अपने को कम रहा आंकता. ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन, हाट-बज़ारों बिक न सका मैं. अपने करे-धरे का अबतक, लगा न पाया लेखा-जोखा. चढ़ न सकेगा अपने पर अब भले रंग हो बिलकुल चोखा. चढ़ा हुआ पीठों मंचों पर कभी आपको दिख न सका मैं. --------------. बातों का क्या बातों का क्या है बातें तो चलती रहतीं कतई जरूरी नहीं कि कोई बड़ी बात हो, आड़ी, तिरछी हो या कोई खड़ी बात हो. अनगढ़ सांचों में लेकिन वो ढलती रहती. छोटा हो या बड़ा भले हो कोई मसला, नहीं चाहिए इन्हें अलग से कोई असला. ख़ुशबू सी कुछ को पर कुछ को खलती रहती. शब्द नहीं होते, तब भी ये बाज न आतीं, संकेतों सेनों से अपनी धाक जमातीं गिरी गिर गयीं उठकर रोज संभलती रहती. ------ संपर्क:7/6 राधा गंज देवास – 455001 फोन – 07272…

शैलेन्द्र चौहान की चंद चुनिंदा कविताएँ

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कविताएँ -शैलेन्द्र चौहान
कामना  कितनी गहरी रही ये खाई  
मन काँपता डर से
अतल गहराइयाँ मन की
झाँकने का साहस कहाँ
दूर विजन एकांत में
सरिता कूल सुहाना दृश्य कैसा
नीम का वृक्ष
चारों ओर से गहरी खाई
काली सिंध बह रही मंथर
बीहड़ खाइयाँ
परिंदे पी पानी तलहटी का
आ बैठते नीम की टहनियों पर बड़ी मुश्किल से
हम खाइयों के भय से पीछा छुड़ाते
किलोल करते ये परिंदे
हम को चिढ़ाते
चींटियाँ रेंगती भू भाग पर
समझतीं प्रणियों को भी पेड़ पौधे
चढ़ती और गुदगुदा जिस्म पा
काट लेतीं त्वचा को
किनारे नदी के
भेड़ बकरियों का झुंड
साथ चरवाहा 
नहाता नदी में निश्छल भाव से
निचोड़ पानी कपड़ों से
होता साथ बकरियों के
बादल घिर रहे आकाश में 
अतृप्त हैं ये खाइयाँ पावस में गहन ताप से
सूखी हैं ये, संतप्त हैं,
जल विहीना हैं
बादलों तुम बरसो यहाँ इतना    
इस धारा को तृप्त कर दो   
नदी काली सिंध पानी से लहलहाए
और ये ढूह
जिसके किनारे बैठा हूँ
आज मैं यहाँ 
इस नदी में डूब जाए
होंगे प्रफुल्लित ग्रामवासी
आऊँगा मैं यहाँ फिर
शिशिर और हेमंत में
हरित वृक्ष और पौधों से भरी
देखना चाहता हूँ मैं
" यह धरा "
.............. विवशता
एक लंबी सुरंग
खड़ी प्रेत छाया  
द्वा…

आक्रोश युवा पीढ़ी का

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-प्रो. अश्विनी केशरवानी युवा कौन है...युवा किसे कहें...युवा कहलाने की कसौटी और पहचान क्या है ? सिर्फ उम्र, नवीनतम फैशन, होश रहित जोश, अपनी ध्वंशात्मक शक्ति का तूफानी उबाल या वर्तमान की विद्रूपताओं को चुनौती देकर नया भविष्य गढ़ने का संकल्प...? आदर्शों के लिए मृत्यु तक का वरण करने की तैयारी, हमारे नवयुवक 21 वीं सदी के भारत को स्वर्ग बनाना चाहते हैं.. या यह कहना कि हमारी युवा पीढ़ी नालायक है, कुछ नहीं कर सकती, दोनों में सच क्या है ? युवा पीढ़ी कोई स्वप्न नहीं, वास्तविकता है। उसके सामने खड़ी समस्या भी कोई स्वप्न नहीं बल्कि एक कचोटती हुई चुनौती है। आप रोज नवजवानों को कालेज जाते, काम ढूंढते, काम पर जाते, भीख मांगते, चोरी करते, मारामारी और दादागिरी करते देखते हैं...क्या आप सचमुच उसे ऐसा करते देखते हैं ? आपने उन्हें मुट्ठी भर अनाज के लिए दिन भर खेतों में मजदूरी करते देखा है ? हां कहना आसान है, मगर सच्चाई कुछ और है..? जनगणना के समय 18 वर्ष का हो जाने पर मतदान का हक प्राप्त करने पर उन्हें युवा कहेंगे या जीन्स और टी शर्ट पहनकर विचरण करने वाले, कैम्पस में नशीली दवाओं का प्रदूषण फैलाने वाले युवा कहलान…

व्यंग्य : ख़ुराक

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- सीताराम गुप्ता संतलाल से मेरा थोड़ा परिचय जरूर था पर मित्रता नहीं। परिचय का कारण था एक ही डिपार्टमेंट में काम करना और संतलाल का और मेरा गाँव एक ही बस के रूट पर होना। एक दिन रविवार को दोपहर बाद लगभग पाँच बजे संतलाल मेरे घर आया और कहने लगा, ''तुम्हारे गाँव में मेरे कई रिश्तेदार रहते हैं। मुझे किसी काम से दीनदयाल जी के घर जाना है। चल मेरे साथ चल उनके घर तक।`` मैंने पूछा, ''क्या आप उनका घर नहीं जानते?`` ''जानता क्यों नही? मेरे ख़ास रिश्तेदार हैं``, संतलाल ने बताया। ''फिर मैं क्या करूँगा आपके साथ जाकर? आप खुद ही चले जाओ``, मैंने कहा। संतलाल उठकर जाने लगा तो मैंने कहा ''ऐसे नहीं पहली बार हमारे घर आए हो चाय पीकर जाना।`` संतलाल बैठ गया और बोला, ''चाय की तो ख़ास इच्छा नहीं पर वापसी में आऊँगा और खाना खा के जाऊँगा।`` ''अच्छी बात है ये तो भाई साहब``, मैंने कहा। संतलाल चाय पीकर चला गया। मैंने पत्नी से कहा कि शाम को जल्दी खाना बना लेना। आठ बजे के बाद कोई बस भी नहीं जाती। आख़िरी बस निकल गई तो ये यहीं डेरा डाल देगा। पत्नी खाना बनाने लगी तो मैं…

मोना डार्लिंग और जार्ज बुश

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-शशिभूषण द्विवेदीघड़ी की सुई रात के 11 बजा रही थी। दिल्ली जाने वाली अंतिम बस अब तक नहीं आई थी। स्टेशन पर मातमी सन्नाटा था। अधिकतर सवारियां जा चुकी थीं। जैसे जैसे वक्त बीत रहा था, मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सुबह अगर समय से मीटिंग में नहीं पहुंचा तो ये नौकरी भी गई समझो। बास सरेशाम ही अपनी मोना डार्लिंग के साथ कार से दिल्ली के लिए निकल चुका है। साला मुझे यहां छोड़ गया बसों में धक्के खाने। खुद इस समय रंगरेलियां मना रहा होगा मोना डार्लिंग के साथ। मैंने बास को एक भद्दी सी गाली दी और सिगरेट सुलगा ली। मेरी बगल में ही एक औरत बैठी थी अपने दुधमुंहे बच्चे को गोद में संभाले। मैंने उसे देखा। पसीने से चिपचिपाया उसका चेहरा। मुझे वितृष्णा सी हुई। फिर दया आई। यह मोना डार्लिंग नहीं हो सकती- मैंने सोचा। वैसे हो भी सकती है, कौन जाने। दफ्तर के बाद मैंने उसे देखा ही कहां। तो क्या दफ्तर के बाद मोना डार्लिंग भी पसीने से चिपचिपाए मांस के भद्दे लोथड़े मे बदल जाती होगी...और फिर वह दुधमुहां बच्चा?...नहीं...नहीं मोना डार्लिंग की तो अब तक शादी भी नहीं हुई और फिर इन मामलों में वह प्रिकाशन भी तो कितना लेती है। बास तक क…

सफलता का मूलमंत्र-जो चाहा वो पाया

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रेडीमेड कपड़ों का जमाना है। फास्ट फूड खाना पसंद किया जाता है। हर एक को हर चीज में जल्दी है। यहां तक कोशिश की जाती है कि सर्दी-जुकाम भी हो तो जल्दी से जल्दी ठीक होकर इंसान भागने-दौड़ने लगे, फिर चाहे उसके लिए स्टिरायड ही क्यूं न खाना पड़े। पहली फिल्म आई नहीं कि ऐसा कुछ हो जाए कि स्टार बन जाएं। चर्चा में आने के लिए कोई विवाद भी खड़ा किया जा सकता है। राजनीति का छोटे से छोटा कार्यकर्ता सीधे मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनने के सपने देखता है। व्यवसायी ही नहीं, हर एक रातों-रात लखपति-करोड़पति बनना चाहता है। बंगला, मोटर, मोबाइल, मॉल, फाइव स्टार संस्कृति ख्वाब नहीं हर एक के जीवन की मूल चाहत बन चुकी है, और आधुनिक मानव इसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। महत्वाकांक्षी होना ठीक है मगर किसी के कंधे पर पैर रखकर चढ़ना अब ये भी गलत नहीं माना जाता। समय से अधिक तेज चलने की मांग है और यही आधुनिकता की देन और पहचान है। इसी रफ्तार में मुझसे भी एक संपादक ने सवाल पूछ लिया, 'सफलता के पांच मूलमंत्र बताएं।` लेख के लिए समय कम दिया गया था। कुछ घंटों में लिखकर देना था। समाचारपत्र को अगले दिन छपना जो था। ठीक …

अंग्रेज भी उरांवों को दास नहीं बना सके

-मनोज कुमारउरांव जनजाति को अंग्रेजी शासन कभी अपना गुलाम नहीं बना पायी और न ही स्थानीय राजाआें की हुकूमत उन पर चली। उरांव स्वतंत्रता के साथ दो हजार साल तक छोटा नागपुर में राज करते रहे। यह जानकारी उरांव जाति के वयोवृद्ध सदस्य संत पडरु राम की वह किताब से मिलती है। छत्तीसगढ़ की दूसरी जनजातियों की तरह ही उरांव जनजाति की परम्पराएं, जीवनशैली है। उरांव की उत्पत्ति को लेकर मतभेद है लेकिन अधिकांश लोग इन्हें द्रविड जाति का वंशज मानते हैं। उरांव जनजाति मूलत: दक्षिण भारत निवासी हैं लेकिन धीरे धीरे उनका वे स्थान परिवर्तन करने लगे और उत्तर भारत की ओर आते गए। आरंभिक दौर में इनकी बसाहट महाराष्ट्र, फिर बिहार और इसके बाद छत्तीसगढ़ के रायगढ़ व सरगुजा जिले में अधिकाधिक होती गई। एक अनुमान के अनुसार इन दो जिलों में किसी दूसरी जनजाति की अपेक्षा उरांव की जनसंख्या अधिक हैं। यह जनजाति ऐसी हैं जहां वाचिक परम्परा के साथ लिखित परम्परा भी रही है। संत पडरु राम ने अपनी किताब में लिखा है कि छोटा नागपुर क्षेत्र में बसने वाले उरांव जनजाति को न तो अंग्रेजी शासन ने और न ही स्थानीय राजाआें ने गुलाम बना सके। वे पूरे समय स्…

विश्वजीत सपन की कहानी : वह पागल

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कहानीवह पागल-विश्वजीत सपन'ऐ इधर आओ।` 'क्या बात है ?` 'कुछ नहीं।` 'फिर बुलाया क्यों ?` 'मेरी मर्जी।` 'मेरी मर्जी ! क्या मतलब मेरी मर्जी ?` 'मेरी मर्जी।` 'पागल हो क्या ?` 'हा....हा....हा` - जोरदार हँसी। 'यह दुनिया भी अजीब है। लोग अपने आपको पहचानने से पहले दूसरों को पहचानने की कोशिश करते हैं।` वह आदमी बोलता गया और अजीबो-गरीब हरकतें करते उस व्यक्ति की तरफ ही बढ़ने लगा। 'अजीब आदमी है।` - वह व्यक्ति भुनभुनाया -'पहले तो बुलाया, अब मुझे ही सीख दे रहा है। पागल कहीं का।` 'अरे भाई ! वह सचमुच ही पागल है।` किसी राहगीर ने उन्हें अवगत कराया। उस व्यक्ति ने भी यही अंदाज़ा लगाया था। पागल ही होगा, वरना ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करता ? उसने दिल ही दिल में उस पागल को कोसा, जिसने सुबह-सुबह ही उसका मूड खऱाब कर दिया था और बड़ी तेजी से एक ओर भाग खड़ा हुआ। लेकिन पागल भी न जाने क्यों उसकी तरफ ही बढ़ा चला जा रहा था। अब उसे डर लगा। पागल का क्या भरोसा, पता नहीं क्या कर बैठे? साथ ही वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर भी देखता जा रहा था कि कहीं वह सचमुच ही पीछ…

मृत्यु स्मृति स्तम्भ

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-डॉ. रेखा श्रीवास्तव मानव मन की सहज अभिव्यक्ति ही कला कहलाती है। जो मानव जीवन की समृद्धि के साथ साथ विकसित होती चली गई है। जिस प्रकार आदि काल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता। परन्तु यह तथ्य सत्य है कि कला मानवजीवन की सहचरी के रूप सदा विद्यमान रही है। लोककला के रूप में तो यह मानवों की भावनाओं, परम्पराओं और संस्कृति की अभिव्यक्ति बन गई। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि भी है, ऐसा विद्वानों का मत है। कला की उन्नति में लोक कला का भी बहुत महत्व रहा है। कला का विकास तो राजाश्रयों में पेशेवर कलाकारों द्वारा हुआ है परन्तु लोक कला का विकास घरों के आंगनों में, ग्रामों में, अशिक्षित जातियों में, बिना कोई प्रसिद्धि के शांत व अबोध रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक व पारिवारिक परम्पराओं के साथ बिना बौद्धिक पुट के होता जा रहा है। लोक कला को किसी आश्रय, प्रलोभन या प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं होती है वह तो स्वच्छन्दता तथा मौलिकता के साथ सदा प्रगति करती है, क्योंकि उसका सम्बंध तो प्राणीमात्र से है।१ स्टीवैंस के अनुसार आदिमानव …

छायावाद की एक प्रमुख रचनाः आँसू

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- डॉ.उत्तम पटेलश्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के भावुक कवि और कुशल कलाकार हैं। इसे कोई यदि उनकी एक ही रचना में देखना चाहें तो उसे आँसू की ओर ही इंगित किया जा सकता है। आँसू में प्रेम की स्मृति इतनी सत्यता के साथ अभिव्यक्त हुई है कि हमारा कवि के साथ अविलम्ब साधारणीकरण हो जाता है। आँसू कवि के जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला को आविष्कार है। जीवन में प्रत्येक अभिलाषा को पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और उसमें असफल होने पर व्यक्ति चिंता, दुःख, असंतोष और कुण्ठा से पीड़ित होता है। आँसू इस प्रकार की प्रेमभावनाओं की चरम परिणति है। आँसू का संपूर्ण महत्व कवि के करुणाकलित हृदय से मुखरित विफल रागिनी में देखा जा सकता है। आँसू में कवि ने लौकिक-प्रेम की व्यक्तिगत विरहानुभूति को अभिव्यक्त किया है। आँसू का मुख्य भाव विरह-श्रृंगार है। आँसू का आधार असीम व्यक्ति है, जिसके मिलन सुख की स्मृति ने कवि के हृदय में वेदना-लोक की सृष्टि की है। कवि के हृदय में प्रिय की स्मृतियों की एक बस्ती ही बस गई है। उनके ह्रृदय में विरह की आग जल रही है- शीतल ज्वाला जलती है, इँधन होता दृग जल का,यह व्यर्थ साँस चल-चल कर करती है काम अ…

मैं और मेरा अष्टावक्र

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- हरीश भादानीमैं---. मेरे भेजे में न तेरा ई-उ पार आवे और ना ही यह जौल-टौल तू तो वो बता कहा था न तूने.... मन का बीमार- वह कैसा होता है, कहाँ रहता है, तूने देखा है कभी उसे? मेरा अष्टावक्र---. यह भी तूने भली कही मैं तो रोज ही देखूं ऐसों-ऐसों को अभी भी मेरे सामने ही है पर इस पल मैंने तुझे एक क्लास का अपना उस्ताद मान ही लिया अरे! वह भी कोई बीमार जिसे अपनी बीमारी याद रहे, समझ का एकाध कणूका तो बच ही गया है तुझमें कोई बात नहीं, सींच ही दूंगा तेरी फोफस जमीन, रिसे ही है मोहताजी के कूए में पानी दो-चार बाजरी के सिट्टे तो लहलहा ही लेंगे... यह मैंने तुझ से नहीं अपने आप से कहा है रे कभी-कभार मैं भी बोल लिया करूं अपने-आप से तेरी छाया जो पड़ती रहे मुझ पर; .... कविता संग्रह – मैं - मेरा अष्टावक्र से साभार कवि- हरीश भादानी प्रकाशक – कलासन प्रकाशन, कल्याणी भवन, बीकानेर (राज.) पृ. 152, मूल्य 200/-, आईएसबीएन नं. 81-86842-21-2

श्रीमती तारा सिंह की कुछ ग़ज़लें

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ग़ज़ल (1) आँख उनसे मिली तो सजल हो गई प्यार बढने लगा तो गजल हो गई रोज कहते हैं आऊँगा आते नहीं उनके आने की सुनके विकल हो गई ख्वाब में वो जब मेरे करीब आ गये ख्वाब में छू लिया तो कँवल हो गई फिर मोहब्बत की तोहमत मुझ पै लगी मुझको ऐसा लगा बेदखल हो गई वक्त का आईना है लवों के सिफर लव पै मैं आई तो गंगाजल हो गई 'तारा' की शाइरी किसी का दिल हो गई खुशबुओं से तर हर्फ फसल हो गई ग़ज़ल (2) मेरी आँखों में किरदार नजर आता है रँगे फलक यार का दीदार नजर आता है पर्वत जैसी रात कटी कैसे पूछो मत आसमाँ फूलों का तरफदार नजर आता है सर्द पवन पहले लगता था मुझे गुलाबी अब तो सनका-सा फनकार नजर आता है माँगे भीख नहीं छीनो जो चाहे ले लो यह कहना हमको दमदार नजर आता है तुमसे बिछड़ी भूल हो गई 'तारा' की उनका चेहरा सपनों में हर बार नजर आता है हृदय मिले तो मिलते रहना अच्छा है वक्त के संग - संग चलते रहना अच्छा है गम का दरिया अगर जिन्दगी को समझो धार के संग - संग बहते रहना अच्छा है खुदा मदद करता उनकी जो खुद की करते हिम्मत से खुद बढते रहना अच्छा है अगर विश्व है, मंदिर-मस्जिद के अधीन नियमित मंत्रों का जपते रहना अच्छ…

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डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

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