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October 2007
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पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी 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-सीताराम गुप्ता

sitaram guptaख़लील जिब्रान कहते है, ‘‘हम अपने सुखों और दुखों का अनुभव करने से बहुत पहले ही उनका चुनाव कर लेते हैं।'' कर्मफल के सिद्धांत के अनुसार हम जैसा कर्म करते हैं वैसा ही फल पाते हैं। जो बीज हम बोते हैं उसी बीज से उत्पन्न पेड़ के फल हमें प्राप्त होते हैं। कुछ बीज ऐसे होते हैं जो बोने के बाद जल्दी ही बड़े होकर फूल-फल प्रदान करने लगते हैं जबकि कुछ बीज धीरे-धीरे अंकुरित होते हैं और धीरे-धीरे ही उनकी वृद्धि होती है। फूल-फल भी वे बहुत देर में देते हैं। जिस प्रकार हमें अपने बोए गए बीजों के फूल-फल अवश्य ही मिलते हैं ठीक उसी प्रकार हमारे कर्म रूपी बीजों के फल भी अवश्य ही हमें देर-सवेरे वहन करने पड़ते हैं। यही कर्म रूपी बीज हमारे सुख-दुख या हर्ष-विषाद का मूल हैं। हमारा वर्तमान इन्हीं के कारण इस अवस्था में है।

किसी भी कार्य की पहली रूपरेखा हमारे मन में बनती है। किसी भवन के निर्माण से पहले उसका नक्शा बनाया जाता है लेकिन भवन का नक्शा काग़ज़ पर बनने से पहले किसी के मन में बनता है। कोई भी विचार सबसे पहले मन में आकृति ग्रहण करता है। उसके बाद ही विचार वास्तविकता में परिवर्तित होता है। इस प्रकार मन में निर्मित मानचित्र द्वारा ही उत्पत्ति होती है हमारे कर्मों की। अर्थात्‌ कर्म की उत्पत्ति हमारी सोच, हमारे चिंतन हमारे संकल्पों का परिणाम मात्रा है। ये हमारे विचारों अथवा संकल्पों की तीव्रता तथा हमारे विश्वास की सीमा पर निर्भर है कि हमारे विचार कब कर्मफल के रूप में हमारे सामने आ उपस्थित होंगे।

जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सोच अच्छी या बुरी अर्थात्‌ सकारात्मक या नकारात्मक कोई भी हो सकती है। सकारात्मक सोच या नकारात्मक सोच में से सही का चुनाव करना व्यक्ति पर निर्भर करता है और यह निर्भर करता है व्यक्ति के परिवेश, शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों पर। लेकिन इतना निश्चित है कि सकारात्मक सोच से उत्पन्न कर्म हमारी भौतिक उन्नति के साथ-साथ हमारी आध्यात्मिक उन्नति में भी सहायक होते हैं जबकि नकारात्मक सोच से उत्पन्न कर्म हमें न केवल हर दृष्टि से पीछे की ओर ले जाते है अपितु हमें औंधे मुँह गिराते भी हैं। मनुष्य की स्थिति ठीक एक दोपहिया वाहन के समान होती है। सभी दोपहिया वाहन पैडल या मोटर के सहारे केवल आगे की ओर चलते हैं पीछे की ओर नहीं। स्कूटर, मोटर-साइकिल अथवा साइकिल में पिछला गीयर नहीं होता। साइकिल में सही दिशा में पैडल मारेंगे तो आगे बढ़ेंगे। ग़लत दिशा में पैडल मारेंगे तो फ्री-व्हील की कटकट कटकट की आवाज़ के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा। ज्यादा प्रयत्न करेंगे तो संतुलन बिगड़ जाएगा. साइकिल समेत ज़मीन पर आ गिरेंगे। इसी प्रकार अपनी सकारात्मक या नकारात्मक सोच द्वारा अपने सुख-दुख का सामान जुटाने वाले हम स्वयं हैं अन्य कोई नहीं।

एक बार एक व्यक्ति चूहे मारने की दवा खरीदने बाजार गया। दुकानदार से दवा ली, पैसे दिये और घर की तरफ चल दिया। रास्ते में मन में न जाने क्या ख़याल आया कि वापस दुकान पर गया और दुकानदार से पूछा, भाई एक बात बताओ। दवा से चूहे मरेंगे तो पाप लगेगा। अब ये बताओ कि पाप तुम्हें लगेगा या मुझे? दुकानदार ने कहा कि पाप-पुण्य तो तब लगेगा जब चूहे मरेंगे क्योंकि आज तक इस दवा से कोई चूहा नहीं मरा है।

भगवान कृष्ण कहते हैं : ‘‘सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत''। सहज-स्वाभाविक कर्म दोषयुक्त होने पर भी नहीं त्यागना चाहिये। मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह कर्म करे और फल अथवा परिणाम की चिंता न करे लेकिन हमारे मनों में परिणाम की आशंका पहले से ही घर कर जाती है जिससे न तो कर्म का मूल अर्थात्‌ विचार ही सहज रह पाता है और न ही सहज रूप से कर्म का निष्पादन हो पाता है। एक भाव और हमारे मन में व्याप्त रहता है और वो है कर्ता भाव। मैं ही अमुक कार्य करता हूँ और मैं ही अमुक कार्य नहीं करता। मैं सबको खिलाता-पिलाता हूँ। मैं किसी का नहीं खाता। मैं सबको आमंत्रित करता हूँ और सबकी ख़ातिरदारी करता हूँ लेकिन मैं हर ऐरे-ग़ैरे के यहाँ नहीं जाता। अहंकार और कर्ता भाव की पराकाष्ठा है ये। कर्ता भाव में लाभ-हानि का आकलन पहले से हो जाता है। जिस क्रिया में लाभ-हानि का आकलन किया जाता है वह व्यवसाय के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो सकती। लाभ-हानि व्यवसाय के कारण होते हैं। कर्म व्यापार न बनें तो अच्छा है। कर्म जब व्यापार बन कर बंधन पैदा करते हैं तो दुख की उत्पत्ति का कारण बनते हैं।

हमें चाहिये कि हम स्वयं को कर्ता नहीं अपितु कर्म का माध्यम समझें। कर्ता नहीं अभिकर्ता समझें। कर्ता के रूप में लाभ-हानि देखनी ही पड़ती है लेकिन अभिकर्ता के रूप में नहीं। अभिकर्ता अर्थात्‌ एजेंट बनें। एक निश्चित कमीशन भी मिल जाएगा और लाभ-हानि से मुक्ति भी। ईश्वर के अभिकर्ता के रूप में कर्म कीजिए। प्रभु की ऐसी ही इच्छा है यह सोचकर सहज-स्वाभाविक कार्य सहज-स्वाभाविक ढंग से कीजिए। प्रभु की ऐसी ही इच्छा है यह सोचकर हर परिणाम को स्वीकार कीजिए। राग-द्वेष से मुक्त होकर, निर्लिप्त होकर सहज-स्वाभाविक कर्म निष्काम भाव से कीजिए कर्मों के बंधन से ही मुक्त हो जाएँगे। कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाना ही सुख-दुख अथवा मानापमान से ऊपर उठ जाना है, यही मुक्ति है, मोक्ष है अथवा निर्वाण है।

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संपर्क

सीताराम गुप्ता,

ए.डी. १०६-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-११००८८

फोन नं. ०११-२७३१३९५४

दो कविताएँ

chari (WinCE)

-नईम

 

लिखने जैसा

लिखने जैसा लिख न सका मैं

सिकता रहा भाड़ में लेकिन,

ठीक तरह से सिक न सका मैं.

गत दुर्गत जो भी होना थी, खुद होकर मैं रहा झेलता,

अपने हाथों बना खिलौना, अपने से ही रहा खेलता.

परम्परित विश्वास भरोसों पर

यक़ीन से टिक न सका मैं.

अपने बदरंग आईनों में, यदा-कदा ही रहा झांकता.

थी औक़ात, हैसियत, लेकिन अपने को कम रहा आंकता.

ऊँची लगी बोलियाँ लेकिन,

हाट-बज़ारों बिक न सका मैं.

अपने करे-धरे का अबतक, लगा न पाया लेखा-जोखा.

चढ़ न सकेगा अपने पर अब भले रंग हो बिलकुल चोखा.

चढ़ा हुआ पीठों मंचों पर

कभी आपको दिख न सका मैं.

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बातों का क्या

बातों का क्या है

बातें तो चलती रहतीं

कतई जरूरी नहीं कि कोई बड़ी बात हो,

आड़ी, तिरछी हो या कोई खड़ी बात हो.

अनगढ़ सांचों में

लेकिन वो ढलती रहती.

छोटा हो या बड़ा भले हो कोई मसला,

नहीं चाहिए इन्हें अलग से कोई असला.

ख़ुशबू सी कुछ को

पर कुछ को खलती रहती.

शब्द नहीं होते, तब भी ये बाज न आतीं,

संकेतों सेनों से अपनी धाक जमातीं

गिरी गिर गयीं

उठकर रोज संभलती रहती.

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संपर्क:

7/6 राधा गंज

देवास – 455001

फोन – 07272-256311

(साभार - नया ज्ञानोदय, अक्तूबर 2007)

कविताएँ

-शैलेन्द्र चौहान


 Shailendra

कामना 

कितनी गहरी रही ये खाई  
मन काँपता डर से
अतल गहराइयाँ मन की
झाँकने का साहस कहाँ
दूर विजन एकांत में
सरिता कूल सुहाना दृश्य कैसा
नीम का वृक्ष
चारों ओर से गहरी खाई
काली सिंध बह रही मंथर
बीहड़ खाइयाँ
परिंदे पी पानी तलहटी का
आ बैठते नीम की टहनियों पर

बड़ी मुश्किल से
हम खाइयों के भय से पीछा छुड़ाते
किलोल करते ये परिंदे
हम को चिढ़ाते
चींटियाँ रेंगती भू भाग पर
समझतीं प्रणियों को भी पेड़ पौधे
चढ़ती और गुदगुदा जिस्म पा
काट लेतीं त्वचा को
किनारे नदी के
भेड़ बकरियों का झुंड
साथ चरवाहा 
नहाता नदी में निश्छल भाव से
निचोड़ पानी कपड़ों से
होता साथ बकरियों के
बादल घिर रहे आकाश में 
अतृप्त हैं ये खाइयाँ

पावस में गहन ताप से
सूखी हैं ये, संतप्त हैं,
जल विहीना हैं
बादलों तुम बरसो यहाँ इतना    
इस धारा को तृप्त कर दो   
नदी काली सिंध पानी से लहलहाए
और ये ढूह
जिसके किनारे बैठा हूँ
आज मैं यहाँ 
इस नदी में डूब जाए
होंगे प्रफुल्लित ग्रामवासी
आऊँगा मैं यहाँ फिर
शिशिर और हेमंत में
हरित वृक्ष और पौधों से भरी
देखना चाहता हूँ मैं
" यह धरा "
..............

विवशता


एक लंबी सुरंग
खड़ी प्रेत छाया  
द्वार पर उसके
निकलने का रास्ता नहीं कोई
प्रारंभ में चले थे जहाँ से
धसक कर टूट चुकी
अब सुरंग वहाँ
मुश्किल है पहचानना अँधेरे में
था उसका कैसा और
किस स्थिति में रचाव
छिन्नभिन्न रास्ता पीछे
सामने विकट स्थितियाँ
भयावह आकृति वह
डर पैठा अंतर में सघन
मन और मति दोनों
कर गया अस्थिर
चेतना है शेष इतनी
निकल सकता है रास्ता
सकुशल बच निकलने का
कुछ क्षणों के लिए यदि
हट जाए वह भयंकर आकृति
डरती है प्रेत छाया
जिस आग और लोहे से
दोनों नहीं हैं पास अपने!
.............

परिवर्तन

कई बार    
झुँझलाया हूँ मैं
सड़क के किनारे खड़ा हो
न रुकने पर बस
गिड़गिड़ाया हूँ कई बार
बस कंडक्टर से
चलने को गाँव तक
हर बार
कचोटता मेरा मन
कसमसाता
आहत दर्प से गुज़रता मैं
तेज गति वाहनों से
देखता इंतज़ार करते
ग्रामवासियों को
किनारे सड़क के
नहीं कचोटता मन
न आहत होता दर्प
सोचता
नहीं मेरे हाथ में लगाम
न पैरों के नीचे ब्रेक
नहीं
अब कोई अपराध बोध भी नहीं
मेरे मन में
............

पेड़ होने का मतलब

समझते हैं लोग क्या
पेड़ से
होने से,उसके न होने से
पेड़ का मतलब छाया,
हवा,लकड़ी,
हरियाली
पेड़ जब सनसनाते
सन्नाटे को तोड़ते
कभी खुद टूट जाते
तूफ़ान से लड़कर
देखते लोग पेड़ वे
आँधी में टूटे हुए
होते हैं कितने लाभदायक
नहीं टूटते तब
टूटने पर
आते हैं अनगिनत काम
घरद्वार, हलमूँठ और बैलगाड़ी
नावघाट,मोटर,रेल,
बक्सासंदूक,कुर्सीमेज़
न जाने कहाँ कहाँ
सोचते हैं क्या हम कभी ?
पेड़ों के स्पंदन
उनके जीवन और मृत्यु की बात
हरीपीली पत्तियों एवं शिराओं में
बहते जीवन रस के बारे में
क्या आदमी के साथ
पेड़ों का संबंध
है मात्र पूजा और उपयोग का
प्रतीक होते हैं पेड़
सतत जीवंतता,उत्साह
और प्रेम के
..........

पुनर्वास

मन होता जब क्लांत
बनती प्रकृति सहचरी
यह तो है सौभाग्य
हिमालयश्रृंग और चीड़
निकट पा जाता
निहारता उत्कंठा,कौतूहल
और ललक से
स्मृतियों के पहाड़ पीछे
बहुत घने
पहुँचते जंगलों में
सागौन
स्काउट बन सीखता
पहचानता जंगल के रास्ते
संकेत से
झरने का बहता
स्वच्छ पानी,
बीच जंगल
मिल बैठ कर खाना
मन में कितना मीठापन !

...........

पहाड़ से नीचे


मालवा की काली माटी
सोंधीसोंधी गंध
खेत में बागड़ काँटों की
चनों के हरेहरे चमोने
बड़े भी रोक नहीं पाते
मन को
बालक तो बालक ही ठहरे
हिमालय आज पास है
कल था विंध्याचल
समय सांप्रदायिक
यदि बड़ी उर्वर ज़मीन थी वह
युगों तक
तब आज रेगिस्तान यह
रेंगता सा
कहाँ से आया
कुएँ का पानी
नालियों में बहता
पहुँचता खेत गेहूँ के
होली के रंग
पकी बालियों के संग
महक भुने दानों की
होरी आई, होरी आई, होरी आई रे
खचाखच भर गई चौपाल
मन का मृदंग बजता मद भरा
कबिरा ने छेड़ी फागुन में
बिरहा की तान
झूम उठा विहान
कितना विस्तृत मन का मान
भूल गए सब
मेहनत, मार और लगान
दूर हुआ शैतान
पर आज हर घर में
हाँडी के चावल
फुदकफुदक फैले
मन भी रेगिस्तान हुआ
छवि खो गई जो
हो गई रात
स्याह काली
नीरव हो गया
वितान   खग,मृग सब
निश्चेष्ट  
दृग ढूँढ़ते वह
छवि खो गई जो
बढ़ रहा
अवसाद तम सा
साथ रजनी के
छोड़ तुमने दिया साथ
कुछ दूर चल के
रह गया खग
फड़फड़ाता पंख
नील अंबर में
भटकता चहुँओर
वह
लौटेगा धरा पर
होकर थकन से चूर
अनमना बैठा रहेगा
निर्जन भूखण्ड पर
अप्रभावित,अलक्ष
..........

जग के व्यापार से समभाव हुए हैं

भाव बहुत बेभाव हुए हैं
दिन तो दिन रातों के भी अभाव हुए हैं

कितने अँधियारे कष्टों में काटे
उजियारे कितने अलगाव हुए हैं

अपने अपने किस्से हर कोई जीता है
औरों के किस्से किससे समभाव हुए हैं

दूर निकल आए जब तक भ्रम टूटे
वक्त बहुत बीता बेहद ठहराव जिए हैं

नहीं कहूँगा दुख मैं इसको
सुख ने भी कितने घाव दिए हैं

भाव बहुत बेभाव हुए हैं
..........

बदलते परिदृश्य !

अब
बहार जाने को है
और टूटने को है भ्रम
याद आने लगी हैं
बीती बातें मधुर
छड़े लोग स्नेहिल
प्रकृति सुन्दर अनंत
बहुत बरसे मेघ
उपहार तुमने दिया
उर्वरता का धरा को
दुख है पावस बीतने का
बीतनी ही थी रुत
आखिर यह कोई
कांगो (ज़ेर) का भूमध्यसागरीय
भूभाग तो नहीं
कि बरसते रहें
बारहों मास मेघ
धुआँ उगलती रहेंगी चिमनियाँ
सड़कों पर अनगिनत मोटर गाड़ियाँ
रसायनों का लगातार बहना नालियों में
भाँति भाँति के कचरे के ढ़ेर हर जगह
विषैली गैसें, जहरीला जल, दूषित भूमि   
आएँगे अब शरद,
शिशिर फिर हेमंत
सघन ताप और
चिलचिलाहट से भरी ग्रीष्म
न रुका यदि विनाश यह
बदलती ऋतुओं के
साथसाथ
बदल जाएँगे परिदृश्य भी !
..........

आतप

फिर फूले हैं
सेमल,टेसू,अमलतास
हुआ ग़ुल मोहर
सुर्ख़ लाल
ताप बहुत है
अलसाई है दोपहरी
साँझ ढले
मेघ घिरे
धीरेधीरे खग,मृग
दृग से ओट हुए
दुबके वनवासी
ईंधन की लकड़ी पर
रोक लगी जंगल में
वनवन भटकें मूलनिवासी
जल बिन
बहुत बुरा है हाल
तेवर ग्रीष्म के हैं आक्रामक
कैसे कट पाएँगे ये दिन
जन मन,पशु पक्षी
हुए हैं बेहाल
..............

गीत बहुत बन जाएँगे

यूँ गीत बहुत
बन जाएँगे
लेकिन कुछ ही
गाए जाएँगे
कहीं सुगंध
और सुमन होंगे
कहीं भक्त
और भजन होंगे
रीती आँखों में
टूटे हुए सपने होंगे
बिगड़ेगी बात कभी तो
उसे बनाने के
लाख जतन होंगे
न जाने इस जीवन में
क्या कुछ देखेंगे
कितना कुछ पाएँगे
सपना बन
अपने ही छल जाएँगे
यूँ गीत बहुत
बन जाएँगे
लेकिन कुछ ही
गाए जाएँगे
............

विरक्ति

कदापि उचित नहीं
दिगंत के उच्छिष्ट पर
फैलाना पर
शमन कर भावनाओं का
मनुष्य मन पर
प्राप्त कर विजय
उड़ भी तो नहीं सकते
अबाबीलों के झुंड में
ठहरी हुई हवा
बेपनाह ताप
बहुत सुंदर हैं
नीम की हरीहरी
पत्तों भरी ये टहनियाँ
अर्थ क्या है
पत्तों वाली टहनियों का
न हिलें यदि
उमस भरी शाम
विरक्त मन,
फैल गई है विरक्ति
बगनवेलिया के गुलाबी फूल
करते नहीं आनंदित
यद्यपि खूबसूरत हैं वे
...............

ग्रीष्म : एक कविता

झंकृत होती हैं
नाड़ियाँ
शिराओं का बढ़ जाता है चाप
तापमापी करता दर्ज
तापमान
अड़तालीस डिग्री सैलसियस
कविताऍ होती वाष्पित जल सी
उत्सर्जित होती
स्वेद सी
फूटती मन और शरीर से
फैल जाती है
ब्रह्मांड में
............

उदासीनता

क्या मुझे पसंद है व  उदासीनता
क्या तटस्थता और
विरक्ति ही है
उपयुक्त जीवन शैली
क्या निष्क्रियता है
मेरा आदर्श ?
थमी हुई है हवा
निर्जन एकांत में
ध्वनि,
नहीं महत्वहीन
न नगण्य और
असंगत

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लघु कविताएँ

(एक)
काव्य सृजन 
कंसीव्ह हुआ
कोख में पला
बन विकसित हुआ
नियत समय बाद
तेज हुई
प्रसव वेदना
जन्म हुआ
कविता का

(दो)
सामने पहाड़ का टुकड़ा
जैसे गोवर्धन पर्वत
होगी जब अतिवृष्टि
नाराज होने पर इन्द्र के
उठा लेंगे कृ़ष्ण इसे
एक उँगली पर
शरण पाएँगे समस्त मरुवासी
इसके तले
इस मरुभूमि पर
ऐसा भी होगा कभी
बहुत रोमांचक है यह कल्पना

(तीन)
न कलम हिली
न अमलतास
न बादल हटे
न सूरज उदास
हवा चली
घूमने लगा
एक्झॉस्ट फैन
कुछ हिले पत्ते
कुछ हिली डालियाँ
गाने बजे
गज़लें चलीं
सड़क पर
आवारा गायें चलीं
बुझी बुझी निगाहें चलीं

(चार)
दूर दूर तक
रंग हुए बेरंग
अच्छे न रहे
बिजली भी है
टेलीफोन भी
मोटर भी,गाड़ी भी
अनजान रस्ता
अनजान डेरा
दूर है मंजिल

(पांच)                 
अफ़सोस भी है
आक्रोश भी
असफलता भी है
असमर्थता भी
जो भी है
नीले आसमान पर
बादलों का
पैच वर्क है

(छः)
यही नर्क है
निर्मल बहती कोई
सरिता नहीं है
ये जिंदगी एक जंग है
कविता नहीं है
हायब्रिड
खिले हैं गुलाब
बड़े बड़े
सुर्ख लाल
फिरोज़ी
हल्के नीले
सुगंध नहीं इनमें
जैसे भावनाविहीन
सुंदर शरीर
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  परिचय


शैलेन्द्र चौहान
जन्म : २१-१२-१९५४ ( खरगौन )
पैतृक स्थान : मैनपुरी (उ.प्र.)
संप्रति स्थाई निवास : जयपुर (राजस्थान)
शिक्षा : प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा ( विदिशा जिले के ग्रामीण भाग में )

बी.ई. ( इलेक्ट्रिकल ) विदिशा से
लेखन : विद्यार्थी जीवन से प्रारंभ
कविताएँ एवं कहानियाँ,
बाद को आलोचना में हाथ आजमाए,
वैज्ञानिक, शैक्षिक, सामाजिक एवं राजनैतिक लेखन भी

प्रकाशन : सभी स्तरीय साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन

कविता संग्रह : नौ रुपये बीस पैसे के लिए, १९८३ में प्रकाशित
श्वेतपत्र दो दशकों के अंतराल के बाद 2002 में  व
और कितने प्रकाश वर्ष 2003 में
ईश्वर की चौखट पर 2004 में

कहानी संग्रह : नहीं यह कोई कहानी नहीं, १९९६ में प्रकाशित
कथा, संस्मरणात्मक उपन्यास एवं एक आलोचना पुस्तक तैयार

संपादन : धरती अनियतकालिक साहित्यिक पत्रिका, जिसके कुछ अंक, यथा गज़ल अंक, समकालीन कविता अंक, त्रिलोचन अंक और शील अंक चर्चित रहे,
हाल ही में कवि शलभ श्रीराम सिंह पर एक महत्वपूर्ण अंक संपादित.
अन्य :    श्री रामवृक्ष बेनीपुरी पर सामान्य जन संदेश का बहुचर्चित विशेषांक संपादित,सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कुंदनलाल गुप्त, शिव वर्मा एवं अमर शहीद महावीर सिंह की
संक्षिप्त परिचयात्मक जीवनियां एक निबन्ध संग्रह संस्कृति और समाज, विकल्प की ओर से प्रकाश्य. अभिव्यक्ति, प्रेरणा और सामान्य जन संदेश पत्रिकाओं में संपादन सहयोग.

सदी के आखरी दौर में कविता संग्रह के बारह कवियों में से एक सामाजिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में लगातार सक्रियता पुरस्कारों, सम्मानों एवं जोड़-जुगाड़ से नितांत परहेज़.

संप्रति : एक सार्वजनिक उपक्रम में मुख्य प्रबंधक

संपर्क : ४२ रॉयल ब्लॉक, साकार रेसीडेंसी,ए बी रोड, इंदौर-४५२११ (म प्र)
फोन : ९४२७६१३१४

ई मेल : shailendrac@webdunia.com

shailensingh_२१@yahoo.co.in

शैलेन्द्र चौहान की कविताएँ

dunia gol hai

-प्रो. अश्विनी केशरवानी

Ashwini kesharwani (WinCE) युवा कौन है...युवा किसे कहें...युवा कहलाने की कसौटी और पहचान क्या है ? सिर्फ उम्र, नवीनतम फैशन, होश रहित जोश, अपनी ध्वंशात्मक शक्ति का तूफानी उबाल या वर्तमान की विद्रूपताओं को चुनौती देकर नया भविष्य गढ़ने का संकल्प...? आदर्शों के लिए मृत्यु तक का वरण करने की तैयारी, हमारे नवयुवक 21 वीं सदी के भारत को स्वर्ग बनाना चाहते हैं.. या यह कहना कि हमारी युवा पीढ़ी नालायक है, कुछ नहीं कर सकती, दोनों में सच क्या है ? युवा पीढ़ी कोई स्वप्न नहीं, वास्तविकता है। उसके सामने खड़ी समस्या भी कोई स्वप्न नहीं बल्कि एक कचोटती हुई चुनौती है।

आप रोज नवजवानों को कालेज जाते, काम ढूंढते, काम पर जाते, भीख मांगते, चोरी करते, मारामारी और दादागिरी करते देखते हैं...क्या आप सचमुच उसे ऐसा करते देखते हैं ? आपने उन्हें मुट्ठी भर अनाज के लिए दिन भर खेतों में मजदूरी करते देखा है ? हां कहना आसान है, मगर सच्चाई कुछ और है..?

जनगणना के समय 18 वर्ष का हो जाने पर मतदान का हक प्राप्त करने पर उन्हें युवा कहेंगे या जीन्स और टी शर्ट पहनकर विचरण करने वाले, कैम्पस में नशीली दवाओं का प्रदूषण फैलाने वाले युवा कहलाने के हकदार हैं ? हजारों की संख्या में रचनात्मक कार्य का किसी प्रेरणादायी व्याख्यान को सुनने के लिए उमड़ते हुए लोगों की हम बात कर रहे हैं...अथवा उन युवकों की बात कर रहे हैं जो आंखों में स्वप्न और ओठों पर संकल्प करते हैं..? एक अमेरिकी हिप्पी चरस का कश लेते हुए बताता है-''...जब मैं छोटा था तब झार में मेरे पापा मुझसे कहते थे कि अगर किसी का फोन आये तो कह देना कि मैं घर में नहीं हूं.. दिन भर झूठ बुलवाते थे और रात में कहते थे कि अच्छे बच्चे हमेशा सच बोला करते हैं, तुम भी कभी झूठ मत बोलना'' अब बताइये मैं क्या करता ? इस अमेरीकी युवक की बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया। आखिर हम अपनी युवा पीढ़ी के समक्ष क्या आदर्श प्रस्तुत करते हैं ? उन्हें हम जो कहते हैं और जो करते हैं, उसमें कहीं फर्क तो नहीं है..?

एक बार रूस के प्रसिद्ध दार्शनिक गुर्जिफ अपने कुछ शिष्यों के साथ टिकलिस नामक शहर में गये। उनके शिष्यों को वहां यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि पूरा शहर नींद में डुबा हुआ है। व्यापारी नींद में व्यापार कर रहे हैं, ग्राहक नींद में खरीददारी कर रहे हैं। एक शिष्य ने अपने गुरू से पूछा-'कमाल है, ये सब नींद में है। मगर एक बात मुझे समझ में नहीं आती कि जब मैं तीन माह पूर्व यहां आया था तब ऐसा कुछ नहीं था।' गुर्जिफ ने कहा-'उस वक्त तुम नींद में थे, आज तुम जागे हुए हो। जब तुम सो रहे थे तब ये सभी सो रहे थे जो तुम्हें जागते प्रतीत हुए। इसी प्रकार आज तुम जागे हुए हो तो तुम्हें ये सब सोते प्रतीत हो रहे हैं।' हमारा हाल ही कुछ ऐसा है कि हम नौजवानों को देखते हैं मगर उनकी संवेदनाओं को समझ नहीं पाते। हम रोजमर्रा की नींद में हैं- सुबह से शाम तक सभी काम आदत से करते हैं। रास्ते पर निकलकर अच्छे रास्ते पर चलना, अच्छे दफ्तर में ऊंचे पद पर कार्य करना, आना जाना सभी काम नींद में करते हैं।

गुजरात और असम आंदोलन :-

गुजरात में युवाओं ने भ्रष्ट्राचार आंदोलन के द्वारा तत्कालीन मुख्य मंत्री श्री चिमन भाई पटेल की सरकार का तख्ता पलट दिया था। युवा शक्ति का अंदाजा सन् 1977, 1980 और 1989 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था। मार्च 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत उनके किसी धुरंधर नेता के करिश्मों से नहीं हुई थी बल्कि श्री जयप्रकाश नारायण के नाम पर न्योछावर हो जाने वाले नवजवानों के कारण हुई थी। सन् 1980 में ये नवजवान उनकी गतिविधियों से भलीभांति परिचित हो गये थे अत: जनता पार्टी के वही नेता चुनाव में बुरी तरह पराजित हो गये। ठीक इसी प्रकार सन् 1989 में भी हुआ था। असम में कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों ने मिलकर असम गण परिषद बनाया और ऐसा करिश्मा कर दिखाया कि अगले चुनाव में उनकी सरकार बन गयी। इससे सिद्ध हो गया कि युवा चाहे तो कुछ भी कर सकते हैं।

जे राजनीति में होता है वही साहित्य और कला के क्षेत्र में भी होता है। एक विद्रोही नवयुवक जिन मापदंडों के लिए विद्रोह करता है उसे प्राप्त कर लेने पर उसका विद्रोह समाप्त हो जाता है। अर्नाल्ड टायनबी ने अपनी पुस्तक 'सरबाइविंब द फ्यूचर' में नवजवानों को सलाह देते हुए लिखा है कि 'मरते दम तक जवानी के जोश को कायम रखना।' अधिकांश नवयुवक पहले विद्रोह करते हैं और उम्र के साथ साथ उसका विद्रोह समाप्त होते जाता है। फिर वे स्वयं वही करने लगते हैं जिनके कभी वे खिलाफ थे। यदि आप जीवन भर अपने जोश को कायम नहीं रख सकते तो आप यह मौका खे रहे हैं। कला में, संगीत में अथवा पारिवारिक जीवन में यही सब होता है। स्वयं अपनी जिंदगी में जिन विडंबनाओं को सहते हैं, वह दूसरों को सहनी न पड़े, इस बात का सभी ध्यान नहीं रखते। हर बहू सास बनने पर बहू की तरह सोचना छोड़ देती है। इस एक मात्र खतरे का अगर युवा पीढ़ी निवारण कर सके तो भविष्य उनके हांथों संवर सकता है। युवा पीढ़ी अपने दंभ से थक गई है। यदि वह पारदर्शक बनने का संकल्प करें तो वह कुछ भी कर सकता है। युवा वर्ग से हमने कभी कभी ऐसे चमत्कार होते देखा है जिसकी हमने कल्पना तक नहीं की थी। सुकरात नवयुवकों से बातें करते थे। उनके लिए गोष्ठी आयोजित करते थे। नवयुवकों का दिमाग उपजाऊ जमीन की तरह होता है। उन्नत विचारों का बीज बो दें तो वही ऊग आता है। ऐथेंस के शासकों को सुकरात का इसलिए भय था कि वह नवयुवकों के दिमाग में अच्छे विचारों के बीज बोने की क्षमता रखता था। आज इसका सर्वथा अभाव है। इस पीढ़ी में सोचने वालों की कमी नहीं है मगर उनके दिलों दिमाग में विचारों के बीज पल्लवित कराने वाले दिनोंदिन घटते जा रहे हैं। कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में भी ऐसे कितने लोग हैं जो नई प्रतिभाओं को उभारने का ईमानदारी से प्रयास करते हैं ?

हेनरी मिलर ने एक बार कहा था-'मैं जमीन से उगने वाले हर तिनके को नमन करता हूं। इसी प्रकार मुझे हर नवयुवकों में वट वृक्ष बनने की क्षमता नजर आती है। हर क्षेत्र में चाहे वह कला, संगीत और साहित्य का हो, राजनीति और विज्ञान का हो, उसमें नई प्रतिभाएं उभरती रहती हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या हम उन्हें उभरने का पूरा मौका देते हैं ?' उनकी बातों में मुझे सत्यता लगती है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। इसी प्रकार नवयुवकों में अन्याय का सामना करने के लिए जोश और जिगर होना चाहिए। महादेवी वर्मा के शब्दों में 'बलवान राष्ट्र वही होता है जिसकी तरूणाई सबल होती है। जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरूणाई है।' महादेवी वर्मा जब ऐसा कहती हैं तो इसका अर्थ होता है- मृत्यु को मार डालना। तरूणाई अनजानी भूमि पर जन्म लेकर विकसित होती है। उसके सामने चुनौतियां अधिक होती है मगर इन चुनौतियों का मुंहतोड़ जवाब देने का जज्बा उनमें होनी चाहिए। युवाशक्ति यदि ठान ले तो देश में बहुत बड़ा उलट फेर कर सकती है, आजादी का सदुपयोग कर सकती है, बशर्ते हम उन्हें मौका दे, उनके उपर विश्वास करें..? हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन सी परिस्थितियां हैं जो इस पीढ़ी को उनके उद्देश्यों से विमुख कर देती है, उन्हें असंयमित और अनुशासनहीन बना देती है।

कुंठा, निराशा और हिंसा :-

आज हमारी शिक्षा रोजगारोन्मुखी न होकर बेरोजगारोन्मुखी होकर रह गयी है। माता-पिता अपने बच्चों को सही शिक्षा और दिशा देने में असफल रहे हैं। एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि चालीस प्रतिशत माता-पिता ही अपने बच्चे को शिक्षा के लिए सही मार्गदर्शन दे पाते हैं शेष भगवान भरोसे चलता है। इनके बच्चे बाइचान्स अच्छी शिक्षा लेकर अच्छे पदों पर रोजगार प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं बाकी बेलाइन हो जाते हैं। ये अपनी जिंदगी से निराश होकर चोरी, डकैती, गुंडागर्दी आदि के रास्ते निकल पड़ते हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार किसी भी तरह की निराशा हिंसा को जन्म देती है। यही निराशा अवसर पाकर विस्फोटक रूप धारण कर लेती है। यह एक खतरनाक संकेत है जिसका निराकरण समय रहते करना आवश्यक है।

सर्वेक्षण से पता चलता है कि इसका सबसे बड़ा कारण है- आर्थिक विषमता। बेरोजगारी से त्रस्त नवयुवकों के लिए मौका मिलते ही किसी लूट में शामिल हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। टाटा इंस्टीटयूट ऑफ सोसल सांइन्सेस के अपराध विज्ञान के विभागाध्यक्ष के अनुसार नवयुवकों का किसी लूटपाट में शामिल होने का कारण नि:संदेह आर्थिक विषमता है। लेकिन पुलिस सूत्रों के अनुसार ब्रिटिश शासन काल के मंदी के दौर में ऐसी कोई घटनाएं नहीं घटती थी। तब समाज में आदर्शो के प्रति गहरा मूल्यबोध था। आज हमारे समाज में कोई मूल्य, कोई आदर्श नहीं रह गया है। मूल्यों का अंकुश समाप्त हो जाने के कारण हिंसा और लूटपाट की घटनाओं का विस्फोट स्वाभाविक है। इसके लिए आज की युवा पीढ़ी को दोष देना उचित नहीं होगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऊपरी तबके का एक ही लक्ष्य पैसा कमाना रहा है, चाहे इसके लिए उन्हें अपना ईमान बेचना क्यों न पड़े और यही आदर्श हमने अपनी युवा पीढ़ी के सामने रखा है। वस्तुत: आज की मूल्यहीन पीढ़ी हमारी बुजुर्ग पीढ़ी का उत्पाद है। अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई का नग्न रूप आंखों को चूभता है। रही सही कसर को पूरा किया है टी. वी. ने। हिन्दी फिल्मों में प्रदर्शित सेक्स और हिंसा का ग्लैमराइजेशन युवक युवतियों के मन में वैसे ही जीवन जीने की लालसा पैदा कर देती है। इनमें बढ़ रही हिंसा और लूटपाट को उपर्युक्त सामाजिक और आर्थिक संदर्भ में देखा जा सकता है। अमीरी गरीबी के बीच बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, कानून व्यवस्था के प्रति घटता सम्मान और टूटते सामाजिक राजनैतिक मूल्यों ने इन युवकों के भीतर निराशा पैदा कर दिया है जिसका एकमात्र निकासी उन्हें हिंसा और लूटपाट में मिलता है।

कर्म ही श्रेष्ठ है :-

जिस व्यक्ति ने अपना भविष्य निर्धारित कर लिया है तो उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि लक्ष्य के मार्ग में जो विपत्तियां आयेंगी उसका हम मुकाबला करेंगे। वह लक्ष्य ही क्या जिसकी पूर्ति में संघर्ष नहीं किया। हंसते हुए कष्टों को झेलना, विपत्तियों का स्वागत करना तथा अपने कर्म पर अडिग रहना, कर्तव्य के प्रति अटूट श्रद्धा उत्पन्न करती है। अपने निर्धारित लक्ष्य की सफलता के लिए कर्म ही श्रेष्ठ है। भाग्यवादी लोग आलसी होते हैं और भगवान भरोसे जीवन व्यतीत करते हैं। कर्मशील व्यक्ति भाग्य के बजाय अपने कर्म में विश्वास रखता है।

रोजगारोन्मुखी शिक्षा :-

शिक्षा के द्वारा हम न केवल अतीत के पृष्ठों को ही नहीं उलटते बल्कि उनकी अच्छाईयों करके स्वस्थ्य, सुंदर और सुखद भविष्य के निर्माण करते हैं। राष्ट्रीय विकास के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा के माध्यम से योजनाबद्ध सामाजिक परिवर्तन लाया जा सकता है। आज हमारी शिक्षा का माध्यम यह होना चाहिए कि हम आत्मनिर्भर बन सके। सरकार और अभिभावकों को अब समझ में आ गया कि शिक्षा को रोजगार परक होना चाहिए। इसके लिए वे अपने बच्चों को इसके लिए प्रेरित भी करने लगे हैं। शिक्षा को वास्तविक जीवन और उत्पादकता के साथ जोड़ना नितांत आवश्यक है। इसके लिए कार्य अनुभव को शिक्षा का आवश्यक अंग बनाना जरूरी है। शिक्षा को व्यवसायिक रूप देने का अर्थ है युवा पीढ़ी में ज्ञान, कौशल और अभिरूचि का पूर्ण विकास होना चाहिए जिससे आगे चलकर ये जो भी व्यवस्था अपनायें उसमें उनकी शिक्षा का समुचित उपयोग हो सके। कुछ लोगों का मत है कि सामान्य शिक्षा प्राप्त व्यक्ति की तुलना में व्यवसाय से जुड़े व्यक्ति केवल व्यवसायिक होकर रह जाते हैं।

उचित मार्गदर्शन :-

उचित मार्गदर्शन के अभाव में आज की युवा पीढ़ी अपने मार्ग से भटक जाती है और कुंठाग्रस्त होकर जहां घातक आत्मवंचना एवं स्वयं के प्रति उदासीनता लिए दिग्भ्रमित हो रहा है, वहीं आज का शिक्षक और अभिभावक सामान्यतया उस आत्म केंद्रित, आत्मचिंतक तथा स्वकल्याण मग्न मनु जैसा हो गया है जो अपने ही प्रज्ञा से प्रसूत संतति के प्रति उदासीन है। अपने ही मानस पुत्रों के प्रति उसके इसके दुर्भाग्यपूर्ण कृत्य का परिणाम है-संपूर्ण दिग्भ्रमित, अनुत्तरदायी और अनुशासनहीन पीढ़ी। इस पर ध्यान दिया जाना अति आवश्यक है।

विश्वास को जगायें :-

मनुष्य के मन में दो शक्तियां निवास करती हैं-भय और विश्वास। ये दोनों शक्तियां मनुष्य की विचारधारा पर नियंत्रण पाने के लिए निरंतर एक दूसरे से संघर्ष करती है। आप जो भी निर्णय लेंगे उसे पूरा करने की क्षमता आप में निहित है। किंतु इसके लिए दृढ़ विश्वास और सतत् प्रयास करते रहना आवश्यक है। ऐसा कतई नहीं है कि ज्ञान का भंडार विश्व का महान कहलाने वाले व्यक्तियों के पास ही है, आप में भी ज्ञान के स्रोत हैं बशर्ते आप उसका दोहन करना जानते हों ? विश्वास में महान शक्ति निहित होती है। विश्वास शरीर की ऊर्जा को मुक्त कर देती है जिससे निर्णय लेने की शक्ति मिलती है। विद्वानों ने कहा भी है कि आत्महीनता विचारों का तराना है। उसके माधुर्य को आप अस्वीकार कर दीजिए। दर्पण के सामने खड़े होकर अपने स्वाभिमान को जगाइये, स्वयं को चुनौती दीजिए। सफलता या असफलता एक मानसिक स्थिति है इसे स्वीकार करना या न करना पूरी तरह आपके वश में है। आपका व्यक्तित्व एक दर्पण है। उसमें आप जितना झांकेंगे उतना ही वह आकर्षक बनेगा और दर्पण को आप जितना साफ करेंगे उतना ही वह चमकेगा, उसमें आपकी छवि उतनी ही स्पष्ट दिखाई देगी।

बदलता जीवन शैली और युवा :-

युवाओं की स्थिति आज कटी पतंग जैसी अथवा पुराण के त्रिशंकु जैसी अनिश्चित हो गयी है। जीवन के मूल्य तेजी से बदल रहे हैं। बल्कि यूं कहिए कि प्राचीन मूल्य नष्ट हो रहे हैं और नवीन मूल्यों का निर्माण नहीं हो पा रहा है। परिवर्तन की इस आपाधापी में हमारी युवा पीढ़ी प्राय: भ्रमित होती दिखाई देती है। हमारे उदीयमान नागरिक उचित अनुचित को पहचानने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। मूल्यों की इस अव्यवस्था में समाज और संस्कृति का विघटन होने लगा है। समाज में पलायन और बेगानेपन के स्वर गूंजने लगे हैं और मानव सभ्यता के सामने एक प्रश्न चिन्ह लग गया है।

आज युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है। हिंसक प्रवृत्तियाँ बलवती होती जा रही हैं। प्रत्येक क्षेत्र में असंतोष, अशांति, विध्वंस और विघटन की प्रवृत्तियां हावी हैं। ऐसे में हमें अपनी युवा पीढ़ी के प्रति उदारता दिखाते हुए उन्हें सहयोग करना चाहिए तभी एक नया सबेरा हो पायेगा।

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रचना, लेखन और प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी, चांपा-495671

- सीताराम गुप्ता

sitaram gupta संतलाल से मेरा थोड़ा परिचय जरूर था पर मित्रता नहीं। परिचय का कारण था एक ही डिपार्टमेंट में काम करना और संतलाल का और मेरा गाँव एक ही बस के रूट पर होना। एक दिन रविवार को दोपहर बाद लगभग पाँच बजे संतलाल मेरे घर आया और कहने लगा, ''तुम्हारे गाँव में मेरे कई रिश्तेदार रहते हैं। मुझे किसी काम से दीनदयाल जी के घर जाना है। चल मेरे साथ चल उनके घर तक।`` मैंने पूछा, ''क्या आप उनका घर नहीं जानते?`` ''जानता क्यों नही? मेरे ख़ास रिश्तेदार हैं``, संतलाल ने बताया। ''फिर मैं क्या करूँगा आपके साथ जाकर? आप खुद ही चले जाओ``, मैंने कहा।

संतलाल उठकर जाने लगा तो मैंने कहा ''ऐसे नहीं पहली बार हमारे घर आए हो चाय पीकर जाना।`` संतलाल बैठ गया और बोला, ''चाय की तो ख़ास इच्छा नहीं पर वापसी में आऊँगा और खाना खा के जाऊँगा।`` ''अच्छी बात है ये तो भाई साहब``, मैंने कहा। संतलाल चाय पीकर चला गया। मैंने पत्नी से कहा कि शाम को जल्दी खाना बना लेना। आठ बजे के बाद कोई बस भी नहीं जाती। आख़िरी बस निकल गई तो ये यहीं डेरा डाल देगा।

पत्नी खाना बनाने लगी तो मैंने कहा कि जरा ज्यादा सब्जी बना लेना। घी गरम कर लेना और बूरा निकाल लेना। गुंधा हुआ आटा देखकर मैंने कहा कि इतना ही आटा और गूंध लो वरना कम पड़ेगा। ''तुम्हें ज्यादा पता है खाना बनाने के बारे में? एक आदमी खाना खाने आएगा या पूरी बारात आएगी? एक नहीं दो आदमियों का ज्यादा आटा डाल दिया है,`` पत्नी ने आश्वस्त किया। मुझे खाने की नहीं इस बात की चिंता ज्यादा हो रही थी कि यदि संतलाल ने आने में देर कर दी तो उसके ठहरने की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। सारी रात कान खाएगा सो अलग। लेकिन संतलाल जल्दी ही लौट आया।

खाने की शुरूआत हुई घी-बूरा और पराँठों से। चार-पाँच पराँठों के बाद थाली का सारा बूरा ख़त्म हो गया तो संतलाल ने कहा, ''भई तुम्हारा बूरा स्वादिष्ट है। बूरा और है तो थोड़ी और दे नहीं है तो कोई बात नहीं। लगभग आधा किलो बूरा था जो संतलाल तीन बार में पूरी की पूरी चट कर गया। अब सब्जी की बारी आई। पद्रह-सोलह पराँठे आने के बाद मैंने देखा कि गुँधा हुआ आटा टैं बोलने वाला था सो मैंने पत्नी से कहा, ''भागवान क्या कर रही हो? आटा ख़त्म होने वाला है और गूँध लो फटाफट।`` पत्नी ने अविश्वास से मेरी ओर देखा और चार-पाँच रोटियों का आटा निकालकर गूंधने लगी। इसमें उस बेचारी का कोई दोष नहीं था पर मैं संतलाल की रग-रग से वाकिफ़ था। मैंने पत्नी से कहा कि इतना ही आटा और डाल लो नहीं तो फिर गूँधना पड़ेगा। पत्नी ने मेरी चेतावनी की ओर ध्यान नहीं दिया लेकिन उसे इसका ख़ामियाजा भुगतना पड़ा तीसरी बार आटा गूँध कर।

दुबली-पतली काया के स्वामी संतलाल बाईस-चौबीस पराँठे उदरस्थ कर चुके थे। मैं अत्यंत श्रद्धा भाव से उन्हें भोजन करा रहा था जिसमें बाद में उपेक्षा का भाव भी सम्मिलित हो गया था लेकिन संतलाल को कहाँ किसी की परवाह थी। अंत में जब एक और पराँठा उसकी थाली में रखने लगा तो संतलाल कहने लगा, ''बस यार बहुत हो गया। पहले ही एक रोटी ज्यादा खिला दी। मैं अपने हिसाब से खाता हूँ ज्यादा नहीं खाता।`` मैंने भी कह ही दिया, ''हाँ हिसाब से ही खाना चाहिए। ज्यादा खाना भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।`` ''इतना ज्यादा भी नहीं खाया है जितना तू अहसान जता रहा है। अब घर जाकर दोबारा थोड़े ही खाने बैठूँगा। मुझे बार-बार खाने की आदत भी नहीं है। हाँ जब खाना खाने बैठता हूँ तो पेट भर खाकर ही उठता हूँ,`` संतलाल ने मेरी पत्नी के किये कराये पर पानी फेरते हुए कहा। खैर किसी तरह धक्का देकर संतलाल को बस स्टैंड तक ले गया और एक बस में बिठाकर चैन की साँस ली।

इस अविस्मरणीय घटना को कई साल गुजर गए। एक दिन संतलाल ट्रांसफर होकर मेरे ही ऑफिस में आ गया। लंच के दौरान एक दिन यूँ ही गपशप चल रही थी। लोग अपनी-अपनी ख़ुराक के बारे में बता रहे थे कि संतलाल कहने लगा, ''लोग पता नहीं कैसे इतना खा जाते हैं। मेरी ख़ुराक तो बहुत कम है। एक बार में दो रोटी से ज्यादा नहीं खाता। हर से हद तीन रोटी।`` हमारे एक सहयोगी कृष्ण कुमार कहने लगे, ''संतलाल तभी तो इतने दुबले-पतले हो।``

मैं चुपचाप सारी बातें सुन रहा था। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने कहा, ''संतलाल उस दिन गाँव में मेरे घर आए थे तो अकेले ने तीन बार आटा गुँधवा दिया था। बीस से उपर पराँठे खा गए थे।`` पास बैठे कृष्ण कुमार ने कहा ''नहीं वर्मा जी मुझे तो विश्वास नहीं होता कि संतलाल बीस पराँठे खा सकता है।`` संतलाल ने भी कुटिल मुस्कान बिखरते हुए कहा, ''ओए वर्मा, क्यों मुझे मुफ्त़ में बदनाम करने पर तुला है? मैं कभी तेरे घर गया ही नहीं फिर खाना वैफसे खाता? हाँ मेरी ख़ुराक देखनी है तो किसी दिन चलता हूँ तेरे घर। इन सब भाइयों को भी ले चलते हैं। बोल कब चलें?``

मेरी आँखों के सामने उस दिन का वो दृश्य घूम गया जब मैं संतलाल को बस में बिठाकर घर वापस आया और देखा कि माँ सब्जी काट रही थी और पत्नी चौथी बार आटा गूँध रही थी।

मैंने तुरंत मना किया – “नहीं, नहीं, तुम्हारी दुबली काया को देख कर मैं भी माने लेता हूँ कि तुम्हारी ख़ुराक दो रोटी से ज्यादा हो ही नहीं सकती!”

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-१०६-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-११००३४

फोन नं. ०११-२७३१३९५४

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-शशिभूषण द्विवेदी

घड़ी की सुई रात के 11 बजा रही थी। दिल्ली जाने वाली अंतिम बस अब तक नहीं आई थी। स्टेशन पर मातमी सन्नाटा था। अधिकतर सवारियां जा चुकी थीं। जैसे जैसे वक्त बीत रहा था, मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। सुबह अगर समय से मीटिंग में नहीं पहुंचा तो ये नौकरी भी गई समझो। बास सरेशाम ही अपनी मोना डार्लिंग के साथ कार से दिल्ली के लिए निकल चुका है। साला मुझे यहां छोड़ गया बसों में धक्के खाने। खुद इस समय रंगरेलियां मना रहा होगा मोना डार्लिंग के साथ। मैंने बास को एक भद्दी सी गाली दी और सिगरेट सुलगा ली।

मेरी बगल में ही एक औरत बैठी थी अपने दुधमुंहे बच्चे को गोद में संभाले। मैंने उसे देखा। पसीने से चिपचिपाया उसका चेहरा। मुझे वितृष्णा सी हुई। फिर दया आई। यह मोना डार्लिंग नहीं हो सकती- मैंने सोचा। वैसे हो भी सकती है, कौन जाने। दफ्तर के बाद मैंने उसे देखा ही कहां। तो क्या दफ्तर के बाद मोना डार्लिंग भी पसीने से चिपचिपाए मांस के भद्दे लोथड़े मे बदल जाती होगी...और फिर वह दुधमुहां बच्चा?...नहीं...नहीं मोना डार्लिंग की तो अब तक शादी भी नहीं हुई और फिर इन मामलों में वह प्रिकाशन भी तो कितना लेती है। बास तक को कोई रियायत नहीं देती। बेशक यह मोना डार्लिंग नहीं हो सकती। वो तो इस वक्त होटल के ऐसी रूम में बास के साथ जादू की झप्पियां ले रही होगी।....

इधर अंधेरा बढ़ने के साथ साथ स्टेशन के मातमी सन्नाटे मे अब एक खौफ भी घर करने लगा था। पता नहीं खौफ औरत के चेहरे पर था या मेरे मन में। औरत ने और जोर से कसकर बच्चे को अपनी छाती सा लगा लिया।

ऐसे अंधेरे वक्त मे मेरे भीतर के तीनों दुश्मन दोस्त जाग उठते हैं। मैंने महसूस किया कि उनकी अंगड़ाइयां शुरू हो चुकी हैं। थोड़ी देर में बाहर आकर वे मेरा जीना हराम कर देंगे। मेरे इन तीनों दुश्मन दोस्तों में पहला कुछ प्रगतिशील किस्म का है। मैं इसे फिलासफर कहता हूं। दूसरा लफंगा है और हमेशा औरतों को देखकर लार टपकाता रहता है। तीसरा पोंगा पंडित है जो इन सबमें घाघ है। यह जब भी सामने आता है, मुझे परेशान करके चला जाता है। लफंगा किसी भी चीज को गंभीरता से लेता नहीं और फिलासफर तो साला और भी पागल है। मन को हमेशा द्वंद्व में रखता है। लेकिन दोस्ती गजब की है तीनों में। पल में तोला पल में माशा। दुनिया इधर की उधर हो जाए रहेंगे साले साथ ही। जैसे ही मुझे लगा कि ये तीनों मुझे घेरने के लिए तैयार हो चुके हैं, मैं स्टेशन से बाहर आ गया। वह खौफजदा औरत भी मेरे पीछे पीछे बाहर आ गई।

बाहर एक ढाबा है जहां कुछ चारपाइयां और मेजे थीं। फूस की छत से लटके तीन चार बल्ब टिमटिमा रहे थे। फिजा में सिगरेट का धुंआ था और शराब का सुरूर। लोगों की बातचीत वहां मक्खियों की भिनभिनाहट जैसी लग रही थी। बीच बीच में ढाबे के सरदार मालिक और ग्राहकों की आवाजें आतीं- बहादुर, पानी ला,बहादुर, ये बर्तन उठा। हाफ पैंट कमीज लटकाए बहादुर फिरकनी की तरह यहां वहां नाच रहा है। ढाबे के मालिक के काउंटर पर एक ब्लैक एंड व्हाइट पोर्टेबल टीवी रखा था जिस पर खबरें आ रही थीं। खबरों में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश का भाषण चल रहा था। बुश के मुंह से डेमोक्रेसी, ह्यूमन राइट्स, वार अगेंस्ट टेरेरिज्म जैसे कुछ बिंदास शब्द सुनाई देते हैं। मैं उकता जाता हूं। बुश मुझे किसी पगलाए बंदर की तरह लगता है। हालांकि स्क्रीन पर बार बार हथकड़ी बेड़ियों में जकड़े सद्दाम हुसैन को दिखाया जाता है। एक पल पहले इराक का वह धड़कता हुआ दिल जहां बेखौफ बगदाद में घूमता नजर आ रहा था वहीं अगले पल गिलमेगस महान का वही वंशज किसी बदहवास भालू की तरह लगने लगता है। मानो बता रहा हो कि बगदाद में अलिफ लैला की कहानियां दम तोड़ चुकीं और दजला फरात के पानी में भी अब वह ताब नहीं। बीच बीच में अबू गरेब जेल के दृश्य भी दिखते है जिसमे एक महिला अमेरिकी सैनिक नंग धड़ंग इराकी सैनिकों के गुप्तांगों पर उंगलियों से बंदूक का निशाना साध रही है और उसके पुरुष साथी उन पर लात घूंसे बरसा रहे हैं। महिला सैनिक की हरकतों पर ढाबे में बैठे लोग कुछ अश्लील फब्तियां कसते हैं। एकाएक जैसे उन सबका पौरुष जाग जाता है। उधर फर्जी अदालत में जज पर चीखता हुआ सद्दाम है जिस पर मानवता के खिलाफ अपराध का मुकदमा चल रहा है। कुछ ही क्षणों सदियां बीत जाती हैं। मुझे उबकाई सी आती है कि तभी इराक जिंदाबाद के नारे के साथ सद्दाम फांसी के फंदे पर झूलता नजर आता है। मैं चुपचाप एक कुर्सी खींचकर धम्म से बैठ जाता हूं। मेरे तीनों दुश्मन दोस्त अब पूरी तरह जाग चुके हैं और पूरी बेशर्मी के साथ खीस निपोरे सामने मेरी मेज पर आ बैठे हैं।

अचानक मेरा लफंगा दुश्मन दोस्त शराब की फरमाइश करनेश् लगता है और मेरे बार बार मना करने के बावजूद बहादुर को एक अद्धा और गिलास लाने को कह देता है। बदले में लफंगा मुझे बास और मोना डार्लिंग की रंगरंगेलियों के रसभरे किस्से सुनाने लगता है। उसकी बातें सुनकर मुझे भी अपने भीतर एक उत्तेजना भरी सरसराहट महसूस होती है। लेकिन इसी बीच पंडित बिदक जाता है और इस्तेहारी अंदाज में घोषणा करता है कि शराब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन मोना डार्लिंग से ज्यादा नहीं। लफंगा बचाव की मुद्रा मे ंहै। मुझे आश्चर्य होता है कि फिलासफर अब तक चुप कैसे रह गया? हम तीनों की नजरें एकसाथ फिलासफर की ओर उठ जाती है। फिलासफर इत्मीनान से अपना गिलास शिप करते हुए धीरे से कहता है,यारों, बेफिक्र रहो। बुश के भाषण से ज्यादा न तो शराब हानिकारक है और न ही मोना डार्लिंग। पोंगा पंडित फिलासफर की बात सुनकर कसमसा उठता है। इससे पहले कि वह कुछ कहता, हम सबकी नजरें ढाबे के बाहर झटके से आकर रुकी एक चमचमाती हुई कार पर जा टिकती हैं। शहर के बाहर इस फटेहाल से ढाबे पर इस तरह रात के साढ़े ग्यारह बजे किसी चमचमाती कार का आकर रूकना हम सबको थोड़ा विचित्र लगता है। लेकिन हम हल्के नशे में थे और सांस रोककर लगातार उसी ओर देख रहे थे। इस बीच ढाबे में हलचल कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी।

हमने देखा कार से कुल तीन लोग उतरे। पचास पचपन साल का एक अधेड़ जो सस्ती पेंट शर्ट में किसी चिरकुट क्लर्क सा लग रहा था। उसके साथ जींस और टी शर्ट पहने एक खूबसूरत बांका नौजवान था और उन दोनों के साथ थी बीस पच्चीस साल की एक छमिया (लफंगा लड़कियों के बारे में इसी भाषा में बात करता है।) बेशक लड़की खूबसूरत थी और बिंदास। उसके कंधे पर इम्पोर्टेड पर्स और हाथ में महंगा मोबाइल था। बेहद लो कट की जींस और टीशर्ट में उसकी देह का हर गोलार्द्ध जैसे फट पड़ने को आतुर था। मैंने भर नजर देखा। लड़की का हाथ लड़के के हाथ में था। वे तीनों मेरी सामने वाली मेज पर आकर बैठ जाते हैं। इधर हम चारों इस झटके से उबर भी नहीं पाए थे कि देखते हैं कि अधेड़ बहादुर को एक अद्धा और तीन गिलास लाने का आदेश दे रहा है। बहादुर लड़की पर एक नजर डालकर मुस्कुराता है और तत्परता से अपने काम में जुट जाता है। लड़की भी अंग्रेजी में कुछ बुदबुदाती है। इधर लफंगा भी पूरे मूड में आ गया है। एक आंख दबाकर बड़े अश्लील ढंग से वह मुझसे पूछता है,क्यों क्या ख्याल है? कौन हो सकती है ये छमिया?

पता नहीं देखने में तो बाप बेटी और भाई बहन लगते हैं। मैं कहता हूं। लफंगा मेरी इस मूर्खता पर जोरदार ठहाका लगाता है। पोंगा पंडित हस्तक्षेप करते हुए कहता है, मुझे तो कोई धंधेबाज लड़की या वेश्या लगती है। शरीफ खानदान की कोई लड़की इस तरह आधी रात को मर्दो के साथ शराब पीने तो आएगी नहीं। अब तक माहौल मे एक तुर्शी आ गई थी। फिलासफर ने अटक अटककर उसी तुर्शी में कहा,हां...खानदानी औरतें तो सिर्फ बिस्तर पर ही वेश्या बनती है। वैसे वेश्या भी तो औरत ही होती है न पंडितजी! पंडित फिर खिसिया जाता है और हैं है कर बेशर्मी से हंसने लगता है। लड़की अपना दूसरा पैग ले चुकी है। अधेड़ का तीसरा पैग खत्म हो चुका है और अब वह थोड़ा थोड़ा बहकने भी लगा है। रह रहकर वह लड़की से लाड़ जताने लगता है। कभी उसके गाल पर चिकोटी काटता है तो कभी उसके हाथ सहलाने लगता है। लड़की हर बार हाथ झटक लेती है और अपने मोबाइल से चिपक जाती है। बार बार वह लड़के से भी सटने की कोशिश करती है। लड़के ने भी तीन पैग लेकर अपनी सिगरेट सुलगा ली है। इस बीच खाने का भी आर्डर दिया जा चुका है। अधेड़ चौथा पैग लेकर बार बार अपने ही गिलास से लड़की को थोड़ा सा और पी लेने का आग्रह कर रहा है। लड़की भी बाल झटककर बार बार कह रही है, नो अंकल नो...इट्स टू मच। इसके बाद वह लड़के के हाथ से सिगरेट लेकर कश लेने लगती है। लड़का फिलहाल संतुलित दिख रहा है मगर अधेड़ नशे में तारी है और लड़की भी झूमने लगी है। इसी बीच लड़की के मोबाइल पर किसी का फोन आता है। थोड़ी देर तक लड़की हंसते खिलखिलाते फोन पर बतियाती है और फिर चीख चीखकर रोने लगती है। फिलासफर उसकी एक एक हरकत गौर से देख रहा है। वह उहापोह में है। इतनी सुंदर लड़की को वह वेश्या या कालगर्ल मानने को तैयार नहीं। अपने अव्यावहारिक तर्कों से वह लड़की के सार्वजनिक रूप से शराब पीने की आजादी की तरफदारी कर रहा है। उसका कहना है कि कोई पिता जब अपने बेटे के साथ शराब पी सकता है तो बेटी के साथ क्यों नहीं पी सकता? हालांकि गु्त्थी है कि तब भी नहीं सुलझ रही। लफंगे और पोंगा पंडित ने साफ निर्णय दे दिया है कि लड़की निश्चित रूप से कोई हाई क्लास कालगर्ल है और लोगो को उल्लू बनाने के लिए अंकल अकंल कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि अगर वह कोई हाई क्लास कालगर्ल है तो यहां इस फटेहाल ढाबे पर क्या रही है? पोंगा पंडित मुंह बिचकाते हुए एक वाहियात सी थ्योरी देता है। उसके अनुसार संभव है कि अधेड़ लड़की का बाप या चाचा ही हो। देखने में ही साला चिरकुट लगता है। लड़का रईस है। हो सकता है कि अधेड़ और लड़के के बीच लड़की को लेकर कोई सौदा हुआ हो और वे उसे यहां शराब पिलाने लाए हों। शराब पीकर बूढ़ा जा पड़ेगा कही और चिड़िया उड़ेगी लड़के के बिस्तर पर...कलजुग है भाई..कुछ भी हो सकता है।

पंडित की बातों से फिलासफर खीझ जाता है। वह कहता है. तुम साले हमेशा जार्ज बुश की भाषा में बात करते हो। तथ्य सिर्फ इतना है कि एक लड़की है जो दो लोगों के साथ बैठकर शराब पी रही है। हो सकता है कि वह अपने मित्रों के साथ शराब पीने आई हो जैसे तुम लोग आए हो। चूंकि वह शराब पी रही है इसलिए तुम्हारी नजर में वह अनिवार्य रूप से वेश्या ही होगी जैसे बुश की नजर में सद्दाम अनिवार्य रूप से मानवता के लिए खतरा है। भले रासायनिक हथियारों के नाम पर उसके पास पिद्दी का शोरबा भी न मिला हो। बहस एक बार फिर लड़की से हटकर बुश की ओर मुड़ गई। तभी लड़की उठ खड़ी होती है। लड़का भी उसका हाथ पकड़कर खड़ा हो जाता है। अधेड़ सबका बिल चुकाता है और बचे हुए पैसे लड़की के पर्स में ठूंस देता है। लड़का और लड़की तेजी से कार की ओर बढ़ जाते है। अधेड़ भी लड़खड़ाते हुए उनके पीछे चला आता है।

मै फिर घड़ी देखता हूं। बारह बच चुके हैं। मेरे तीनों दुश्मन दोस्त नींद के आगोश में जा चुके है। मैं उठकर ढाबे से बाहर आ जाता हूं। कार स्टार्ट हो चुकी है। कार की खिड़की से लड़की मुझे देखती है। शराब के सुरूर में उसकी आंखें मतवाली हुई जा रही है। वह मुझे आंख मारती है और हौले से मुस्कुरा देती है। मैं उसकी मुस्कान का कोई अर्थ नहीं निकाल पाता। कार जा चुकी है। दिल्ली जाने वाली अंतिम बस अब तक नहीं आई। मैं होटल के कमरे में बास के साथ अलमस्त बिखरी मोना डार्लिंग की कल्पना करता हूं। स्टेशन पर अपने दुधमुंहे बच्चे के साथ खड़ी वह खौफ़जदा औरत भी मेरे साथ बाहर आ गई है। पसीने से चिपचिपाया उसका चेहरा देखकर इस बार मुझे बिल्कु्ल वितृष्णा नहीं हुई। बास की अब मुझे कोई परवाह नहीं और न ही जार्ज बुश की जो अब भी टीवी के परदे पर बड़बड़ा रहा था। दरअसल शराब का नशा भी अब अपने पूरे ऊरूज पर था और हां, सद्दाम भी मारा जा चुका था।

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संपर्क: संपादकीय विभाग, संपादकीय-मंथन पृष्ठ, सहारा इंडिया काम्प्लैक्स, सी-2,3,4 सैक्टर-11, नोयडा (उप्र)

manoj singh रेडीमेड कपड़ों का जमाना है। फास्ट फूड खाना पसंद किया जाता है। हर एक को हर चीज में जल्दी है। यहां तक कोशिश की जाती है कि सर्दी-जुकाम भी हो तो जल्दी से जल्दी ठीक होकर इंसान भागने-दौड़ने लगे, फिर चाहे उसके लिए स्टिरायड ही क्यूं न खाना पड़े। पहली फिल्म आई नहीं कि ऐसा कुछ हो जाए कि स्टार बन जाएं। चर्चा में आने के लिए कोई विवाद भी खड़ा किया जा सकता है। राजनीति का छोटे से छोटा कार्यकर्ता सीधे मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री बनने के सपने देखता है। व्यवसायी ही नहीं, हर एक रातों-रात लखपति-करोड़पति बनना चाहता है। बंगला, मोटर, मोबाइल, मॉल, फाइव स्टार संस्कृति ख्वाब नहीं हर एक के जीवन की मूल चाहत बन चुकी है, और आधुनिक मानव इसे पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। महत्वाकांक्षी होना ठीक है मगर किसी के कंधे पर पैर रखकर चढ़ना अब ये भी गलत नहीं माना जाता। समय से अधिक तेज चलने की मांग है और यही आधुनिकता की देन और पहचान है।

इसी रफ्तार में मुझसे भी एक संपादक ने सवाल पूछ लिया, 'सफलता के पांच मूलमंत्र बताएं।` लेख के लिए समय कम दिया गया था। कुछ घंटों में लिखकर देना था। समाचारपत्र को अगले दिन छपना जो था। ठीक भी है, वैसे भी आजकल अधिकांश कॉलम फास्ट फूड की तर्ज पर ही कुक किए जाते हैं। और इसमें गलत भी क्या है, पत्रकारिता को जल्दी में लिखा गया साहित्य भी तो कहा जाता है। फिर आजकल हर अखबार में किसी न किसी चर्चित व्यक्ति के द्वारा कहे गए पांच बिंदु, अलग-अलग संदर्भ में रोज से छपे होते हैं, गोरे होने व हीरो बनने से लेकर पांच पसंदीदा व्यंजन, शहर, फिल्म वगैरह-वगैरह तो कभी सर्दी-गर्मी से बचने के पांच नुस्खे। इन सबको याद कर मुझे भी हिम्मत बंधी थी। ऊपर से सवाल देखने में साधारण और सुना व देखा हुआ महसूस होते ही लगा कि उत्तर भी सीधा होना चाहिए। सिर्फ मूलमंत्र ही तो चाहिए, वो भी सिर्फ पांच। तो फिर जवाब लिखना प्रारंभ करते ही सबसे पहले एक उदाहरण जेहन में आया, इसे गेस पेपर (कुंजी) की तरह बनाया जा सकता है। अर्थात जिसका घोटा लगाया और हो गये परीक्षा में पास। या फिर उसी तरह से जिस तरह से, भोजन बनाने के लिए पाक कला की किताबें बाजार में उपलब्ध हैं। वो दीगर बात है कि फिर जिसके द्वारा खाना तो बन सकता है मगर वो खाने लायक हो ये कोई जरूरी नहीं। मार्केट में और भी कई किताबें हैं- दोस्त कैसे बनाएं, हंसना सीखिए, व्यक्तित्व निखारने के नुस्खे, मैनेजमेंट फंडा और मात्र पंद्रह दिनों में अंग्रेजी बोलना सीखें। अब पता नहीं इन लाखों में बिक रही किताबों से कितने लोग हंस रहे हैं, भाषा सीख रहे हैं, सफल हो रहे हैं और खुद की रसोई में परिवार पका-खाकर खुशहाल हो रहे हैं। फिर ये कौन पूछे कि दुनिया में जितने भी महान लोग आज तक हुए हैं, क्या उन्हें ऐतिहासिक उपलब्धियां सिर्फ किसी किताब को पढ़ने से प्राप्त हुई थी? नहीं। मगर हां, उन पर सैकड़ों लेख जरूर लिख दिए जाते हैं। इतिहास बनने के नुस्खे किसी पुस्तक के अंदर उपलब्ध नहीं होते। जिन्होंने महान साहित्य की रचना की है उनको भी देखा जाए कि लिखने से पूर्व क्या उन्होंने किसी और के द्वारा लिखे हुए की मदद ली थी? यकीन से कह सकता हूं, नहीं। चूंकि मौलिकता के लिए नकल नहीं की जा सकती। फिर दूसरा अहम सवाल मैंने स्वयं से किया कि क्या मैं सफल हूं? संक्षिप्त में नहीं और हां कहना मुश्किल होगा। दृष्टि और दृष्टिकोण में मतभिन्नता हो सकती है। और फिर मन में तुरंत संशय उत्पन्न हुआ कि तो फिर जवाब लिखने का हक मुझे कैसे मिल सकता है? इसे यूं भी समझाया जा सकता है कि इन्हें जानकर-समझकर मैं खुद भी तो सफल हो सकता था।

खैर, बाजार में चर्चित लेखक बने रहने के लिए विश्लेषणात्मक विस्तृत लेख लिखना जरूरी था। कुछ प्रयास और थोड़े से आत्मचिंतन के बाद इस बिंदु पर पहुंचा कि सफलता के संदर्भ में दो प्रकार के मूलमंत्र हो सकते हैं, एक आंतरिक और दूसरा बाह्य। आंतरिक वो हैं जो प्रत्यक्ष होते हुए हमारे व्यक्तित्व और कर्म से संबंधित हैं, हमारे नियंत्रण में हैं और जिसे अधिकांश गुरु अपने व्याख्यान और लेख में बताते रहते हैं। और वो हैं परिश्रम, आत्मविश्वास, निरंतरता, आत्मविश्लेषण, फोकस। अब इसे संक्षिप्त में यूं भी कहा जा सकता है कि स्वयं का विश्लेषण कर कमजोरियां एवं गुणों का आकलन करते हुए लक्ष्य पर फोकस कर आत्मविश्वास के साथ निरंतर मेहनत करना सफलता का मूलमंत्र है। दूसरा खंड है बाह्य। जो आपके हाथ में नहीं, अप्रत्यक्ष मगर अधिक महत्वपूर्ण है। और वो है ईश्वर, भाग्य, परिवार, समाज व देशकाल। आधुनिक विज्ञानी मानव के लिए ये शब्द व्यर्थ के हो सकते हैं लेकिन ध्यानपूर्वक देखें तो जीवन के हर क्षेत्र, पक्ष, पहलू एवं मोड़ पर अधिक प्रभाव डालते हैं। कोई माने न माने इस पर हम अधिक निर्भर करते हैं। प्रथम दृष्टि में ये बड़े सामान्य लगते हैं परंतु हम इन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। ये हमारे साथ जन्म से जुड़े रहते हैं और हम इनका चुनाव नहीं कर सकते।

जहां तक रही बात सफलता के पैमाने की तो कोई यकीन करे न करेंे, मगर प्रारंभ से ही प्रसिद्धि, पैसा और पॉवर के द्वारा ही इसे नापा-तौला जाता है। फिर चाहे वो लेखन का क्षेत्र हो, पढ़ाई का, पॉलीटिक्स, व्यवसाय, फैशन, संगीत या फिर कला। यहां तक कि सफल धर्म भी संख्या पर निर्भर करता है। गुरु भी वही सफल है जिसके पास अधिक शिष्य हैं। या यूं भी कहा जा सकता है कि जिनके सफल छात्रों की संख्या अधिक है। फिल्म वही सफल है जो बॉक्स ऑफिस पर हिट हो। करोड़पति, लखपति से अधिक सफल माना जाता है। अधिक अंक वाला विद्यार्थी होशियार माना जाता है तो आज के दौर में ज्यादा पैसा लेने वाला हीरो सबसे सफल नायक। मगर असल में यह पूर्णत: सत्य नहीं। यह निर्भर करता है कि आप किस दृष्टिकोण से देख रहे हैं, आपकी मंजिल क्या है। और निष्कर्ष निकलता है कि जो भी आप चाहते हैं उसे प्राप्त करना ही सफलता का प्रमुख पैमाना है और महत्वपूर्ण आधार भी। अंधा क्या मांगे? दो आंखें। इस कथन का भावार्थ अधिक रोशनी डाल सकता है। किसी उत्साही नवयुवक के लिए फिल्मी हीरो तो किसी के लिए सफल व्यवसायी आदर्श हो सकता है तो एक पढ़ाकू छात्र के लिए वैज्ञानिक। अंतिम सवाल पर तो मैं चौंक उठा था, सबसे सफल आदमी कौन? बिल गेट्स, बिल क्लिंटन, जार्ज बुश से लेकर तमाम चेहरे पहली नजर में ही नाकाफी लगे थे। विचारों में आत्ममंथन का सार निकला था कि सबसे सफल वही है जो संतुष्ट है, शांत है, खुश है, शारीरिक मानसिक रूप से स्वस्थ है और सबसे महत्वपूर्ण जिसका जीवन सुमधुर है। सफल वही है जो अपनी सफलता का उपयोग व उपभोग भी कर रहा है। फिर चाहे वो सांसारिक हो या आत्मिक। बात वही है जो जैसा चाहता है वैसा पाता है या नहींं। भोगी को विचारों से संतुष्टि नहीं और ज्ञानी को पैसे से तृप्ति नहीं। इसीलिए सिर्फ एक ही नारा बनता है जिसे मूल कह सकते हैं 'जो चाहा वो पाया`। जीवन की सफलता के जड़ में यही है। फिर आज के बिकने खरीदने के दौर में, जहां हर चीज दुकान पर उपलब्ध है और पैसा ही सफलता का पैमाना, उस बाजार में भी सामान छोड़ कुछ भी नहीं मिलता। कम से कम सफलता तो बिल्कुल नहीं।

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संपर्क:

मनोज सिंह

४२५/३, सेक्टर ३०-ए, चंडीगढ़

http://www.manojsingh.com

-मनोज कुमार

उरांव जनजाति को अंग्रेजी शासन कभी अपना गुलाम नहीं बना पायी और न ही स्थानीय राजाआें की हुकूमत उन पर चली। उरांव स्वतंत्रता के साथ दो हजार साल तक छोटा नागपुर में राज करते रहे। यह जानकारी उरांव जाति के वयोवृद्ध सदस्य संत पडरु राम की वह किताब से मिलती है। छत्तीसगढ़ की दूसरी जनजातियों की तरह ही उरांव जनजाति की परम्पराएं, जीवनशैली है। उरांव की उत्पत्ति को लेकर मतभेद है लेकिन अधिकांश लोग इन्हें द्रविड जाति का वंशज मानते हैं। उरांव जनजाति मूलत: दक्षिण भारत निवासी हैं लेकिन धीरे धीरे उनका वे स्थान परिवर्तन करने लगे और उत्तर भारत की ओर आते गए। आरंभिक दौर में इनकी बसाहट महाराष्ट्र, फिर बिहार और इसके बाद छत्तीसगढ़ के रायगढ़ व सरगुजा जिले में अधिकाधिक होती गई।

एक अनुमान के अनुसार इन दो जिलों में किसी दूसरी जनजाति की अपेक्षा उरांव की जनसंख्या अधिक हैं। यह जनजाति ऐसी हैं जहां वाचिक परम्परा के साथ लिखित परम्परा भी रही है। संत पडरु राम ने अपनी किताब में लिखा है कि छोटा नागपुर क्षेत्र में बसने वाले उरांव जनजाति को न तो अंग्रेजी शासन ने और न ही स्थानीय राजाआें ने गुलाम बना सके। वे पूरे समय स्वतंत्र रहे। इस किताब के अनुसार उरांव उरमाल क्षत्रिय हैं और छोटा नागपुर में दो हजार से ज्यादा साल इनका शासन रहा। इनके शासन की गवाही छोटा नागपुर में मिलने वाले खंडहर हैं। छत्तीसगढ़ में बसने वाले उरांव की बोली को कुरुख कहते हैं। इनकी भाषा में तमिल और कनारी भाषा के शब्दों की बहुतायत है।

हमेशा से स्वतंत्र रहने वाले उरांवों ने अंग्रेजी शासन को लोहे के चने चबवा दिए थे और शायद यही कारण है कि अंग्रेजों के साथ स्थानीय रियासतों के शासकों ने भी उरांवों की स्वतंत्रता में कभी बाधक बनने का साहस नहीं किया। दो हजार साल शासन करने वाले उरांवों का समय गुजरने के साथ शासन तो खत्म हो गया लेकिन उनका चमकदार इतिहास आज भी कायम है। अपनी उत्पत्ति के आरंभ से मेहनतकश और मस्ती में डूबे रहने वाले उरांव खुद को प्रकृति के निकट रहना और रखना पसंद करते रहे हैं और इन्हीं कारणों से पहाड़ों के बीच रहना उन्हें आज भी पसंद है। जनपदीय सामाजिक व्यवस्था से परे वे अलग-थलग ही रहना पसंद करते हैं। देश की दूसरी जनजाति की तरह ही उरांव भी स्वयं को धरती पुत्र मानते हैं और वनोपज से अपना जीवन-यापन करते हैं। जानवरों का शिकार भी उरांव जनजाति करते हैं।

परिवर्तनशील उरांव समय के परिवर्तन के साथ खुद को उसमें ढाल लेते हैं। जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण इनकी जीवनशैली में बाधा आने लगी तो उरांव जनजाति के लोग खेती-किसानी करने लगे। कुछ परिवारों ने मुर्गीपालन भी करने लगे। उरांव जनजाति की महिलाएं भी श्रमजीवी होती हैं और परिवार की आय में हाथ बंटाने के लिए वे भी आयमूलक कार्य करती रही हैं। घर-परिवार का कार्य निपटा कर जंगलों में जाकर तेंदूपत्ता, सरई बीज, महुआ तथा चिरौंजी आदि एकत्र करने का कार्य करती हैं जिससे उन्हें अच्छा आर्थिक लाभ हो जाता है। उरांव जनजाति में महिला एवं पुरूषों का बराबरी का अधिकार रहता है। इस जनजाति में दहेज प्रथा नहीं है तथा महिलाएं पर्दाप्रथा से भी मुक्त है। एक आंकलन के अनुसार उरांव जाति में महिला अत्याचार का प्रतिशत लगभग शून्य है। उरांव जनजाति प्रगतिशील नागर समाज के लिए आदर्श उदाहरण हैं।

उरांव जनजाति के जीवन में नृत्य और गीत बहुत महत्व रखते हैं। जीवन में खुशहाली और अपने अपने परिवार की समृद्धि की कामना के साथ ये उत्सव और पूजा-अर्चना का आयोजन करते हैं। अच्छी फसल की कामना के साथ सरना पूजा की जाती है। परम्परागत रूप से आयोजित इस पूजन ग्राम पुरोहित बैगा सम्पन्न कराता है। इसी तरह परिवार की समृद्धि हेतु कुलदेव की पूजन की जाती है और कुलदेव की प्रसन्नता के लिए बकरा व मुर्गे की बलि दी जाती है। भादो मास शुक्ल एकादशी के दिन करमा उत्सव का आयोजन होता है। दिन भर उरांव जनजाति के स्त्री और पुरूष उपवास रखते हैं और शाम को करमा डार की पूजा तथा कथावाचन के पश्चात खाना-पीना होता है। उत्साह से मगन स्त्री-पुरूष मांदल और ढोलक की थाप पर नृत्य करते हैं। उरांव जनजाति के जीवन का यह सबसे सुखद पक्ष होता है जब ये निश्चिंत होकर अपने देव को प्रसन्न करने के लिए नृत्य और गीत का आयोजन करते हैं।यूं तो उरांव जनजाति के लोग हिन्दू जीवन पद्धति को अपना चुके हैं और भगवान राम उनके आराध्य देव माने जाते हैं।

उरांव जनजाति मंे विवाह की कई पुरातन परम्परा आज भी कायम है। सामान्यत: विवाह योग्य युवक का पिता अपने लिए पुत्रवधू का तलाश करता है और खोज पूरी हो जाने के बाद वधू के पिता के समक्ष प्रस्ताव रखता है। दोनों पक्षों की आपसी सहमति के बाद परम्पराके अनुसार बूंदे की रकम तय होती है। बूंदे में नगद राशि के साथ चावल, दाल तथा तेल दिया जाता है। यह सामग्री वरपक्ष रिश्ता तय हो जाने के बाद वधूपक्ष को देता है। नगद राशि का कोई बंधन नहीं। वरपक्ष की आर्थिक स्थिति के अनुसार दिया जाता है। विवाह उरांव जनजाति की प्रथा के अनुसार होता है।

उरांव जनजाति में बंदवा और ढूंकू विवाह परम्परा भी प्रचलन में है। भीलों में भगोरिया पर्व के समय जिस तरह युवा अपने मनपसंद साथी का चयन करते हैं, वैसी ही कुछ परम्परा उरांव में भी है। यहां भगोरिया जैसा कोई पर्व नहीं होता है बल्कि सामान्य स्थितियों में जीवनसाथी पसंद आने पर युवक युवती की रजामंदी के बाद उसकी पसंद की चूड़ी और वस्त्र पहना कर अपनी जीवनसंगिनी बना लेता है। इसे बंदवा प्रथा का नाम दिया गया है जबकि ढूंकू विवाह परम्परा में युवती को कोई युवक पसंद आया तो युवक की रजामंदी के बाद वह उसके घर में बिना किसी औपचारिकता के रहने लगती है। विवाह की औपचारिकता बाद में पूरी की जाती है।

उरांव जनजाति मुंडा व खारिया जनजाति से मेल खाते हैं। इनका आपस में मेलजोल है लेकिन नातेदारी नहीं। उरांव अपने ही लोगों के बीच संबंध करते हैं। पशु-पक्षियों के नाम पर इन्होंने अपने गोत्र का नामकरण किया हुआ है और बदलते समय के साथ ये अपने नाम के साथ गोत्र का उपयोग करने लगे हैं। उरांव जनजाति में जो गोत्र प्रचलन में है, उनमें मिंज, लकड़ा, एक्का, केरकेट्टा आदि हैं। इस जनजाति में शिक्षा की कमी है लेकिन शासन की नीतियों का लाभ इन्हें मिल रहा है और इनका रुझान शिक्षा की ओर होने लगा है। कई उरांव युवा शिक्षित होकर ऊंचे पदों पर पहुंच गए हैं। परम्परागत उरांव परिवार आज भी अंधविश्वास के शिकार हैं और रोग-दुख की मुक्ति के लिए तांत्रिकों की शरण में जाते हैं। ऐसे परिवारों का चतुर चालक लोग शोषण करने से नहीं चूकते हैं। इनकी सामाजिक -आर्थिक स्थितियों में परिवर्तन आ रहा है और शिक्षा के प्रसार के साथ ये अपनी परम्परागत रूढ़िवादी छवि से मुक्त होकर समय के साथ चल पड़े हैं।

कहानी

वह पागल

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-विश्वजीत सपन

'ऐ इधर आओ।`

'क्या बात है ?`

'कुछ नहीं।`

'फिर बुलाया क्यों ?`

'मेरी मर्जी।`

'मेरी मर्जी ! क्या मतलब मेरी मर्जी ?`

'मेरी मर्जी।`

'पागल हो क्या ?`

'हा....हा....हा` - जोरदार हँसी।

'यह दुनिया भी अजीब है। लोग अपने आपको पहचानने से पहले दूसरों को पहचानने की कोशिश करते हैं।` वह आदमी बोलता गया और अजीबो-गरीब हरकतें करते उस व्यक्ति की तरफ ही बढ़ने लगा।

'अजीब आदमी है।` - वह व्यक्ति भुनभुनाया -'पहले तो बुलाया, अब मुझे ही सीख दे रहा है। पागल कहीं का।`

'अरे भाई ! वह सचमुच ही पागल है।` किसी राहगीर ने उन्हें अवगत कराया।

उस व्यक्ति ने भी यही अंदाज़ा लगाया था। पागल ही होगा, वरना ऐसी बहकी-बहकी बातें क्यों करता ? उसने दिल ही दिल में उस पागल को कोसा, जिसने सुबह-सुबह ही उसका मूड खऱाब कर दिया था और बड़ी तेजी से एक ओर भाग खड़ा हुआ। लेकिन पागल भी न जाने क्यों उसकी तरफ ही बढ़ा चला जा रहा था। अब उसे डर लगा। पागल का क्या भरोसा, पता नहीं क्या कर बैठे? साथ ही वह बीच-बीच में पीछे मुड़कर भी देखता जा रहा था कि कहीं वह सचमुच ही पीछा तो नहीं कर रहा था ? सौभाग्य से वह पागल कुछ दूर उसके पीछे चलने के बाद रुक गया। वह व्यक्ति तेजी से कदम बढ़ाकर उस पागल की नज़रों से ओझल हो गया।

तभी गली के कुछ आवारा बच्चे चिल्लाते हुए उस पागल के सामने आ खड़े हुए। पहले तो वे सभी कुछ देर तक उस पागल की अजीबो-गरीब हरकतों को तमाशा समझकर देखते रहे, फिर जब धीरे-धीरे बच्चों की एक अच्छी-खासी टोली जमा हो गई, तो उन्होंने उसे छेड़ना शुरू कर दिया। कोई उसकी फटी कमीज खींचकर भाग जाता तो कोई उसे पीछे से धक्का मारकर भाग जाता। कभी बचने की कोशिश में तो कभी ज़ोर से धक्का लगने के कारण वह कई बार गिरते-गिरते बचा। जब कभी वह गुस्से में बच्चों को मारने को दौड़ता तो क्षणभर में ही वे बच्चे शोर मचाते उसकी पहुँच से दूर हो जाते। पागल कुछ देर पीछा करता, फिर थककर ज़मीन पर बैठ जाता। उसके बैठते ही बच्चे पुन: एकजुट होकर उसे तंग करने लगते।

मैं प्रतिदिन की तरह नित्य नियम से अपने लॉन में बैठा अखबार पढ़ रहा था। इन बातों से मेरा ध्यान बार-बार अखबार से हटकर उनकी तरफ चला जाता था। सुबह-सवेरे अखब़ार की गरमा-गरम खब़र का आनंद न ले पाने से मुझे परेशानी होती थी। दरअसल ऑफिस में उन्हीं खब़रों से तो बातचीत का आगाज़ हुआ करता था। भला मैं इस सुख से महरूम कैसे रहता ? तब मैं भलमनसाहत का ज़ामा पहनते हुए बच्चों को मना करता, लेकिन असफल रहता। बच्चे बड़े ही उद्दण्ड किस्म के थे। मेरा कहा मानना तो दूर उल्टा मुझे ही मुँह बिचकाकर चिढ़ाने लगते। मैं अपने लॉन से ही चाहरदीवारी के पास आकर गरज़कर उन्हें फटकारता, लेकिन वे अपनी हरकतों से बाज नहीं आते थे। लाचार होकर मैं अखब़ार में अपना मन लगाने की कोशिश करता। लेकिन उस शोर-गुल में ध्यान केन्द्रित करना नामुमकिन होता था।

लगभग प्रतिदिन यह तमाशा देर तक चला करता। कम ही ऐसे दिन होते जब वह पागल वहाँ नहीं होता या फिर वे बच्चे नहीं होते या फिर पागल पूरी तरह से लाचार होकर एक तरफ भाग खड़ा होता। बच्चे फिर भी उसके पीछे ही होते थे। जितना ही वह बचने की कोशिश करता, बच्चे उतना ही छेड़ने को उतारु होते जाते थे। अपने आपको बचाने की फिक्र में वह सड़क पर बेतरतीब मारा-मारा फिरता। लेकिन कोई उसकी मदद को नहीं आता था। कुछ राहगीर रुककर तमाशा देखते और कुछ बिना रुके ही चले जाते। वह भागता-भागता सड़क के पार किसी गली में जाकर मेरी नज़रों से ओझल हो जाता, तभी मेरी परेशानियों का निवारण हो पाता था और मैं अखबार का आनंद ले पाता था।

मेरा मन उचट जाता। मैं खब़रों में मन लगाकर इसे भूल जाना चाहता, लेकिन मन में किसी अजनबी पीड़ा का एहसास होता था। कोई अनजानी वेदना कुछ कहने का प्रयास करती थी। मैं उसे जान-बूझकर अनसुना कर देता था। उस एहसास को दबा देता था। फिर भी बात नहीं बनती थी तो अपने मन को ललकारता कि यह कौन-सी नई बात है ? यहाँ तो आए दिन ऐसे ही न जाने कितने तमाशे होते रहते हैं। और फिर हो भी क्यों न ? जब तक हम जैसे मूक तमाशबीन होंगे तब तक ऐसे तमाशे रोज़ होते ही रहेंगे। लेकिन यह एक ऐसा तमाशा था, जिससे मैं प्रभावित था। मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या प्रभावित थी। इसलिए मैं चिंतित था। न जाने क्यों, उस पागल को भी मेरे ही लॉन के सामने सड़क पर बैठना था और उसके बैठते ही फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता था जैसे चिर-परिचित फिल्म पर्दे पर सिमटती चली जा रही हो।

क्या वह पागल था ? या फिर यूँ ही पागलपने का नाटक कर रहा था ? तब कभी-कभी मुझे लगता था कि वह पागल नहीं था। बस लोगों को बरगलाने के लिए पागलपने का ढोंग कर रहा था। लेकिन दुनिया वाले कहते थे कि वह सचमुच में ही विक्षिप्त था। तो क्या वे सही कहते थे ? या फिर उन्हें भी मेरी ही तरह कोई भ्रम था ? जब सोचने की क्षमता जवाब देने लगती तो मुझे लगता कि वे लोग शायद ठीक ही कहते होंगे। और यह सोचकर मैं खुद से खुद को अलग कर लेता था। मुझे क्या लेना-देना था कि वह कौन था ? क्यों था ? अपने कार्यों से फुर्सत मिले तब तो किसी और के बारे में सोचें ! वैसे भी ऐसे वि शय पर विचार करने का समय ही कहाँ मिलता है ? काम हो न हो हम व्यस्त रहने का नाटक तो करते ही हैं। हमारा जीवन भी तो बस एक नाटक ही है। वह पागल भी अगर नाटक कर रहा है तो इसमें बुरा ही क्या है ? अब सोचना बंद करो और अपने सुखमय जीवन को और सुखमय बनाने का प्रयत्न करो। इसी से ज़िन्दगी चलती है। बाकी सब बकवास है। मुझे यह महामंत्र सबसे सुखकर प्रतीत होता था।

ठीक ही तो है। अपने जीवन का भार उठाना ही हम सबके लिए कठिन है तो किसी और के बारे में सोचकर अपने मन पर बोझ डालना हितकर नहीं हो सकता। लेकिन इतना तो तय था कि मेरे दिल के किसी कोने में कोई ऐसी सोच घर कर गई थी जो मुझे बार-बार उसके बारे में सोचने पर विवश किया करती थी। मैं पूर्वजन्म में विश्वास नहीं रखता, वरना पिछले जन्म का कोई रिश्ता या फिर किसी ऋण की बात मानकर उसकी मदद को उतारु हो जाता। ऐसे में मन को बहलाना पड़ता था। अरे पागल ही होगा सभी तो उसे पागल ही कहते और मानते हैं। मेरे एक के मानने से क्या फ़र्क पड़ जाएगा ? अब मैंने भी फैसला दे दिया, नहीं तो वह मेरी कार का शीशा क्यों तोड़ता ? वह तो भगवान् का लाख-लाख शुक्र था कि पत्थर का टुकड़ा मेरे सिर पर नहीं लगा, वरना ...। और उस दिन मैं भी बरस पड़ा था। पता नहीं कितने लात-घूँसों से उसकी मरम्मत कर डाली थी। आज न जाने क्यों दयाभाव उमड़ रहा था ? तो क्या वह दया का पात्र नहीं था ? हर कोई उसे धक्के मारता था, कोई उसकी मदद नहीं करता था, कोई उससे हमदर्दी नहीं दिखाता था। उसकी इस पात्रता के बारे में मैं अपनी उधेड़बुन में होता कि तभी श्रीमती जी की पुकार सुनाई पड़ती और मैं रत्ती भर भी समय गँवाए बिना पुन: सांसारिक मायामोह के अधीन हो जाता।

उस दिन सुबह सवेरे एक दोस्त के घर जाना पड़ गया। उसके पिता अचानक ही चल बसे थे। मैं उसे ढाढस बँधाकर लौट रहा था। अभी घर के करीब पहुँचा ही था कि न जाने कहाँ से वह पागल मेरी कार के सामने आ गया। मेरे पैर ब्रेक पर चरमराये। लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उसने एक बड़ा-सा पत्थर उठाकर फेंका और मेरी कार का शीशा तोड़ दिया। मेरा मन पहले से ही उदास था, इस घटना से मेरा गुस्सा उबल पड़ा। कार से उतर कर उस पर झपट पड़ा। फिर आव देखा न ताव उसे बालों से पकड़कर कई थप्पड़ उसकी गाल पर रसीद कर दिए। मेरे दो हाथ पड़ते ही न जाने और कितने हाथ उस पर बरस पड़े। लगता था सबको सिर्फ इसी मौके की तलाश थी। भागा भी तो नहीं वह। अधमरा होकर वहीं बैठ गया। मेरा मन खिन्न हो गया। उसकी दशा मेरे दिल के किसी कोने में दया के भाव जगाने ही वाली थी कि स्वार्थी मन ने उसे दबा दिया - 'तुम बार-बार, बेकार ही उस पर दया दिखाने की चे टा करते हो। वह पागल है, वह सचमुच ही पागल है। वह किसी को नहीं जानता है और न पहचानता है। तुम्हारी हमदर्दी उसकी समझ में नहीं आएगी।`

मैं गुस्से से भरा घर में दाखिल हुआ और आते ही बूढ़े नौकर बिरंची पर बरस पड़ा। बेचारा बूढ़ा सकपका गया। ज़िन्दगी में पहली बार उसे ऐसी डाँट पड़ी थी। वह चुपचाप सुनता रहा, सिर झुकाये जैसे ज़र-खऱीद गुलाम हो। शायद नमक बीच में आ गया था।

मेरा गुस्सा दूध की तरह उफान लेकर पुन: शान्त हो गया। मैंने बिरंची को बुलाया। वह चुप था - पूर्ववत्। उसकी सागर-सी चुप्पी मुझे खटकने लगी। मैं अपने आपको कोसने लगा। उससे अपनी नाराज़गी का कारण बताया, पर अपनी मालिकता बरक़रार रखते हुए। अनुभवी बिरंची ताड़ गया और बोला - 'बाबूजी, उस पागल और मुझमें बहुत समानता है। वह सरे-आम धक्के खाता है और मैं दिल ही दिल में।`

मुझे पछतावा होने लगा कि बेकार ही उस बूढ़े का दिल दुखाया। उसकी गलती ही क्या थी ? वह तो कभी चूँ-चपड़ भी नहीं करता है। कितना ही काम ले लो, गधे की तरह खटता रहता है। ऊपर से वफ़ादार है और पुश्तैनी भी। मेरे पिता ने भी शायद ही कभी उसे इस तरह से फटकारा होगा। हम इंसानों में यही तो एक बड़ी कमजोरी होती है कि हमें अपनी भावनाओं पर कोई नियंत्रण नहीं होता और उसका खमियाज़ा किसी और को भुगतना पड़ता है। इसलिए अक्सर हम किसी का गुस्सा किसी पर निकालकर स्वयं को व्यावहारिक बनाने का असफल प्रयास करते हैं।

घर का नौकर था बिरंची, लेकिन उम्र और तज़ुर्बे में काफी बड़ा था मुझसे। मेरा क्या अधिकार बनता था कि बिना किसी गलती के उसपर बरस पड़ूँ। मुझे इस गलती का एहसास तो था, लेकिन कबूलना नहीं चाहता था। फिर भी उसके दिल को हल्का करने के लिए और वक्त की नज़ाकत देखकर मैंने उससे पूछा।

'बिरंची लाल, क्या तुम्हें वह पागल सचमुच का पागल लगता है ?`

'हाँ मालिक।` सीधा-सा जवाब था।

'लेकिन मैं नहीं मानता।`

'मानता तो मैं भी नहीं हूँ मालिक।` स्वर गंभीर था।

'मानते नहीं तो उसे पागल क्यों कह रहे हो ?` मेरा प्रश्न था।

'लोग कहते हैं।` स्वर पुन: शान्त था।

मैंने सोचा, उसका कहना कितना सटीक था। आज तो बहुमत की सत्ता होती है। अकेलों और कमज़ोरों की तो बिसात ही नहीं होती। फिर मेरा दिल भी तो उसे पागल नहीं मानता था। कितनी ही बार दिल की आवाज़ को उठने से पहले ही दबा चुका था मैं, इस भ्रम में कि वह मुझे सुनाई नहीं देती थी। और लोगों के कहे अनुसार उसे पागल ही समझता आया था।

'बाबूजी।` बिरंची लाल उदास होकर बोला।

'वह पागल मेरा पड़ोसी था। बड़ा ही नेक इन्सान था। मजाल है, किसी को भी उससे कोई ठेस पहुँच जाये। अपनी लुटाकर भी दूसरों की मदद करना उसकी आदत थी। बड़ा ही हँसमुख और दिलचस्प आदमी था। भगवान् की दया से पेट भर जुटा ही लेता था। मूंगफली का खौंचा लगाता था। न ऊधो का लेना न माधो का देना। शाम तक पैसे जुटाकर घर लौटता तो बेटे को स्कूल से लेता आता था। दीपू अकेला सहारा था उस बूढ़े का।`

अब मुझे भी इस कहानी में रस आने लगा था। मैंने चाय की ख्वा़हिश जाहिर की ताकि आराम से कहानी का आनंद ले सकूँ। बिरंची चाय बनाकर ले आया। मैं चाय की चुस्कियाँ लेता आगे की कहानी सुनने लगा। बिरंची ने कहानी की कड़ियों को जोड़ा।

'रामदीन की पत्नी का निधन दीपू के जन्म के साथ ही हो गया था। उसके जीवन का लक्ष्य दीपू ही था। रामदीन उसे माँ-बाप दोनों का प्यार देता था। उसकी दिली तमन्ना थी कि दीपू बड़ा होकर एक बड़ा अफसर बने। इसलिए सरकारी स्कूल में पढ़ाने लगा। स्कूल ले जाते और वहाँ से लाते वक्त वह उसे एक ही बात कहता था कि वह खूब मन लगाकर पढ़े और परीक्षा में अच्छे नंबरो से पास हो। दीपू भी पढ़ने में ठीक ही कर रहा था। रामदीन हमेशा सोचता कि वह दिन दूर नहीं जब उसकी गरीबी का अंत हो जाएगा। उस छोटे से ज़मीन के टुकड़े पर उसका अपना मकान होगा। और वह भी समाज में सिर उठाकर जी सकेगा। लेकिन होनी बलवान् थी। गोपी पहलवान ने रंगदारी जमाने के लिए उससे पैसे माँगे। बेचारा गरीब कहाँ से देता - नतीजा, खौंचे से हाथ धोना पड़ा। लाला गिरधारी मल ने गोपी पहलवान की मदद से डरा-धमका कर उसकी ज़मीन भी हथिया ली। बेचारा भटकने लगा। दीपू का सहारा ही उसे जीने के लिए मजबूर करता रहा था। तब वह स्टेशन पर सामान उठाता हुआ भी खुश रहने लगा, क्योंकि दीपू के रूप में उसे भवि य के सपने सामने नज़र आते थे। पर, ईश्वर को शायद यह भी मंजूर नहीं था। इस मकान के ठीक सामने उसके ज़िगर के टुकड़े का एक्सीडैंट एक कार से हो गया। वह सफेद कार किसी नेता की थी। और नेता बरी हो गया, लेकिन दीपू अपनी मौत से बरी न हो सका। दीपू का गम़ रामदीन सहन न कर सका और उसी दिन से उल्टी-सीधी हरकतें करने लगा। इसलिए लोग उसे पागल कहते हैं।`

बिरंची लाल थोड़ा रुका। उसने अपनी साँसों को नियंत्रित किया और पुन: बोला - 'मेरा भी जवान बेटा सुजन लाल जब मरा था तो मैं भी विक्षिप्त हो गया था। लेकिन बाबूजी, मुझे मेरे बेटे से शायद उतना प्यार नहीं था, जितना रामदीन को था। वरना, मुझे भी पागल हो जाना चाहिए था।`

मेरा मन उदास हो गया। मैं समझ गया, उस पागल को मेरी कार से क्यों दुश्मनी थी ? मैं आत्मग्लानि से भर उठा। उस दिन ऑफिस में भी जी नहीं लगा। काम खत्म करके सीधा घर आया तो उस संध्या वेला में भी उस पागल को देखने की इच्छा जागृत हो उठी। रात भर मन बेचैन रहा। बार-बार यही खय़ाल आता रहा कि मैं कितना स्वार्थी हूँ। अगर कुछ मदद नहीं कर सकता तो किसी को चोट पहुँचाने का भी हक नहीं है। मैंने किसी तरह रात काटी और मन ही मन में निश्चय किया कि रामदीन की मदद अवश्य करूँगा।

दूसरे दिन का सवेरा मेरे लिए एकदम नया था। जैसे प्रकृति का प्रत्येक तत्त्व नवीन जागृति से प्रेरित हो। मेरा मन सागर की तरह शान्त और निश्चल प्रतीत हो रहा था। सूरज की रोशनी तीखी नहीं थी। मुझे छाँव के लिए किसी वृक्ष अथवा किसी शाखा के सहारे की आवश्यकता नहीं थी। बीच लॉन में ही कुर्सी लगाकर बैठ गया। वह लॉन भी न जाने क्यों कुछ ज्यादा ही सुन्दर लग रहा था। हाथों में आज का अखबार था - नया अखब़ार। खब़रें नयी, पृ ठ नये। लेकिन दृश्य में परिवर्तन नहीं आया।

बच्चों का काफिला पुन: उपस्थित हो गया। आगे-आगे पागल - नहीं रामदीन था और पीछे बच्चे। मैं झटपट उठ खड़ा हुआ। दरवाज़े पर जाकर बच्चों को ज़ोर से आवाज़ लगाई। कुछ रुके, अधिकतर आगे बढ़ गये। मेरी किसी ने नहीं सुनी। मैं दरवाज़े से बाहर आ गया। बच्चों को रोकना मेरा फऱ्ज बन गया था। तभी एक बड़ी-सी एम्पाला तेज़ी से आई। बच्चे बिखर गये, रामदीन नहीं बिखर सका। कार की चपेट में आ गया। उसकी ज़िन्दगी बिखर गई। मैं विस्मित-सा खड़ा देखता रहा। इत्तफाकन कार पुन: किसी नेता की थी। चमचों ने भीड़ हटाई। कार बगल से निकाल ली गई। किसी ने इतनी जहमत भी उठा ली और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन को फोन घुमा दिया। लाश पर फटी-सी चादर डाल दी गई। मैं देखता रहा। प्रायश्चित का बहाना ढूँढता रहा। लाश सफेद गाड़ी में रख दी गई और आँखों से ओझल भी हो गई। मैं देखता रहा अवाक्, निश्चल, शान्त।

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संपर्क:

-विश्वजीत 'सपन`

१५/२ सर्कुलर रोड, डालनवाला, देहरादून - २४८००१

-डॉ. रेखा श्रीवास्तव

clip_image002 मानव मन की सहज अभिव्यक्ति ही कला कहलाती है। जो मानव जीवन की समृद्धि के साथ साथ विकसित होती चली गई है। जिस प्रकार आदि काल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता। परन्तु यह तथ्य सत्य है कि कला मानवजीवन की सहचरी के रूप सदा विद्यमान रही है। लोककला के रूप में तो यह मानवों की भावनाओं, परम्पराओं और संस्कृति की अभिव्यक्ति बन गई। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्यावसायिक कला की पृष्ठभूमि भी है, ऐसा विद्वानों का मत है। कला की उन्नति में लोक कला का भी बहुत महत्व रहा है। कला का विकास तो राजाश्रयों में पेशेवर कलाकारों द्वारा हुआ है परन्तु लोक कला का विकास घरों के आंगनों में, ग्रामों में, अशिक्षित जातियों में, बिना कोई प्रसिद्धि के शांत व अबोध रूप से धार्मिक, सांस्कृतिक व पारिवारिक परम्पराओं के साथ बिना बौद्धिक पुट के होता जा रहा है। लोक कला को किसी आश्रय, प्रलोभन या प्रोत्साहन की आवश्यकता नहीं होती है वह तो स्वच्छन्दता तथा मौलिकता के साथ सदा प्रगति करती है, क्योंकि उसका सम्बंध तो प्राणीमात्र से है।१ स्टीवैंस के अनुसार आदिमानव के साथ लोककला का गहरा संबंध है।२ आदिमानव भी प्रकृति से प्रेरित होकर सहज भाव से दैविक शक्तियों का सहारा लेकर आराधना, मांगल्य, जादू टोना इत्यादि के लिए कला की शुरूवात की होगी । प्रागैतिहासिक काल की चित्रकला इसके उदाहरण है। आज हम देखते है कि हर प्रांत हर सम्प्रदाय में बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यु तक अनेक रीति रिवाजों, परम्पराओं, धार्मिक कार्यों इत्यादि अवसरों पर आज भी कलात्मक कार्य किये जा रहें है,जैसे सम्पूर्ण उत्तर भारत, में गोवर्धन पूजा, गणगौर और तीज की राजस्थानी मूर्तियां, बंगाल की दुर्गा, शुभ अवसरों में बनाई जाने वाली अल्पना, बिहार की मधुबनी, मालवा की सांझी इत्यादि। लोक कला लोक मानस से प्रेरणा और पोषण पाती है। एवं उसी को प्रतिबिम्बित करती है। लोक कलाकार किसी कला स्कूल में जाकर शिक्षा नहीं प्राप्त करता, किसी दुरूह सिद्धांत व शैली की जटिलता में नहीं पड़ता और न ही उसे नये सृजन की अति महत्वाकांक्षा होती है। जन्मजात कौशल ही उसका सर्वस्व है। उसके आंगन में ही उसे उपयुक्त कला सामग्री मिल जाती है। घर की सुख समृद्धि ही उसकी कला का पुरस्कार है।

clip_image004 छत्तीसगढ़ अंचल के बस्तर प्रांत में ऐसी ही एक परम्परा है मृत्यु स्तम्भ की। जिसे मृतक की कब्र पर स्मृति स्वरूप लगाया जाता है। इस स्तम्भ पर मृत्यु प्राप्त व्यक्ति की पसंद के अनुरूप जीवन में उपयोग की गई वस्तुओं इत्यादि का चित्रांकन किया जाता है। इस तरह की परम्पराओं के इतिहास में भी उदाहरण मिलते है। दक्षिण भारत के अनेक स्थानों से ईसा पूर्व पांचवी सदी की लोहे की वस्तुएं मिली है। उस जमाने में लोग शवों को मिट्टी के बड़े शवाधानों में रखकर लम्बे चौड़े गड्ढों में रख देते थे और उपर बडे बड़े पाषाण खड़े कर देते थे ,इसलिए उनकी संस्कृति को महापाषाण संस्कृति का नाम दिया गया । ३ मिश्रवासियों ने भी पूर्व में पिरामिडों का निर्माण कर उसमें शवों को सुरक्षित रख उसके जीवन से संबंधित वस्तुओं को उसके समीप रख दिया जाता था । इसी तरह बस्तर में शुभ अवसरों पर भी कलात्मक स्तम्भ निर्माण किया जाता है जिसमें विवाह स्तम्भ प्रचलन में हैं। किसी भी स्थानीय व्यक्ति के धर के आंगन में खड़े स्तम्भ और उस पर अंकित आकृतियों चाहे रिलीफ द्वारा निर्मित हो या चित्रांकन हो, उस घर में आयोजित विवाहों का अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि प्रत्येक विवाह का एक स्तम्भ आंगन में विवाह की परम्परा के अनुसार लगाया जाता है।

छत्तीसगढ़ अंचल में सम्पूर्ण बस्तर काष्ठकला के लिये न केवल भारत में बल्कि अब विदेशों में प्रसिद्ध हो रहा है। जिनमें काष्ठ शिल्पी राधेश्याम ,सुकपाल धुर्वा, पदुमदास पंत, बेनिस ने बस्तर का नाम रोशन किया है। औंधी क्षेत्र में डोमीकला, गहनकट्टा गढ़डोमी, आमाकोड़ो और कोरछा में काष्ट कला के आकर्षक उदाहरण मिलते हैं। जहां कि मूर्तियों का स्वतन्त्र अंकन नहीं होता बल्कि स्मृति स्तम्भों में आकारों का उद्रेखन किया जाता है। औरधी क्षेत्र के विवाह स्मृति स्तंभों पर और बस्तर क्षेत्र के जगदलपुर दंतेवाड़ा मार्ग पर स्थित मृत्यु स्मृति स्तंभों पर उद्रेखन कर कृति निर्माण किया जाता है। यह आदिवासियों के भावाभिव्यक्ति की अनोखी परम्परा है।

clip_image006 बस्तर क्षेत्र में निर्मित काष्ठकला में मृतक स्मृति स्तंभ भी अपना विशिष्ठ स्थान रखते हैं। ग्राम इरपा, बड़े सुरोखी,

 

गमावाड़ा, ग्राम किलापारा, गलबा, से प्राप्त मृतक स्मृति स्तंभ उत्कृष्ट है। ये वास्तानार दंतेवाड़ा मार्ग के किनारे स्थित है। इन स्तंभो पर मृतक की जीवन प्रसंगों का अंकन विभिन्न आकारों द्वारा किया जाता है। इन स्मृति स्तंभो में आधुनिकता का समावेश स्पष्ट दिखाई देता है। प्रारंभिक समय पर आदिवासियों के अनुसार इन मृतक स्तंभो में परम्परागत रूप से काष्ठ का प्रयोग किया जाता था, समय के परिवर्तन को स्वीकार करते हुए शिलास्तभों का प्रयोग किंचित काष्ठ का समावेश करके किया जाने लगा। चित्र क्रमांक ३ ।

 

 

अब सीमेन्ट कांक्रीट से बने चबूतरों ने स्थान ले लिया । काष्ठ स्तंभों को चौकोर स्तभंनुमा बनाकर उस पर मृतक से

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संबंधित घटनाओं, रहन सहन से संबंधित, उसकी पसंद, इत्यादि को उकेरा जाता था । चित्र क्रं. १। हम यह भी कह सकते है कि उस पर उकेरित आकृतियों से मृतक की जीवन शैली का अंदाजा लगाया जा सकता है। उस स्तभ पर मृतक के कपड़े भी लटका दिया जाता है। अब काष्ठ स्तंभों के स्थान पर पत्थर अथवा कांक्रीट के स्तंभों का प्रयोग किया जाने लगा। इन स्तंभों के शीर्ष पर काष्ठ का आयताकार अथवा पशु की आकृति का आकार लगा होता है। जिस पर लोहे की सलाखों पर लकड़ी से बने तीन से पांच अथवा छः पक्षियों की आकृति लगी होती है तथा मृतक के कपड़े उस लटका दिये जाते है। चित्र क्र. २।

आदिवासियों की इस मौलिक कल्पना से सुखद आश्चर्य होता है। इन चित्रित गाथाओं में उत्कीर्ण आकृतियां हो या चित्रित आकृतियां हो आदिम शैली की कल्पनाशीलता और आदिवासियों की सहजता सरलता clip_image010का अद्भुत संगम लगता हैं । बिना शिक्षा दीक्षा के अपनी परम्पराओं का निर्वाह करने की क्षमता इन सरल आदिवासियों में अब भी विद्यमान है। इन स्तंभों में अंकित आकृतियों में मानवाकृतियां, पशु-पक्षियों की आकृति और कही कहीं ज्यामितीय आकृतियां, उपयोग में आने वाले औजार अस्त्र शस्त्र होते है। आजकल कही कही सायकिल भी अंकित की गई है। इन स्तम्भों पर अंकन विभिन्न खण्डों में किया जाता है जिसमें चार से छः खण्ड होते हैं। प्रत्येक खण्ड में अलग अलग दृश्य अंकित किये जाते हैं। काष्ठ स्तंभों का शीर्ष गुम्बदनुमा आकार में बना होता है। या कभी कभी उस पर आकृतियां उकेर दी जाती हैं। जैसा चित्र क्र.५। काष्ठ स्तंभों पर उकेरित आकृतियां अपेक्षाकृत अधिक आनुपातिक है। हाथ पैर को हल्की गोलाई लिये हुए अंकित किया गया है। जिसमें आकृतियों को सम्मुख मुद्रा में या एकचश्म अंकित किया गया। मानवों की कतारबद्ध श्रृंखला अंकित की गई है। हाथों में वाद्ययंत्र अथवा औजार पकड़े हुए बनाया गया है। कभी कभी सर्प अथवा गाय के मुख के स्थान पर मानव मुखाकृति बना दी जाती है। वस्त्र स्थानीय पारम्परिक अथवा आधुनिक बनाये जाने लगे है। काष्ठ में उकेरी गई आकृतियों में रंग नहीं भरे जाते । उन्हें प्राकृतिक रूप में ही रहने दिया जाता है।

इन स्तम्भों पर मानवाकृतियों के साथ साथ पशु पक्षियों जैसे हिरण गाय हाथी शेर केकड़ा सांप बिच्छू मोर बत्तख उल्लू इत्यादि का अंकन भी बहुतायात से मिलता है। इन आकृतियों का प्रतीकात्मक अंकन किया गया है। यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति के मध्य रहनेवाले ये आदिवासी ने भी प्रागैतिहासिक मानवों की तरह प्रकृति का अंकन नहीं किया । यदा कदा कमल के फूल या धान की बालियों का अंकन मिला है। कुछ उदाहरण ऐसे भी मिले हैं। जिनमें आदिवासियों का शहरों के प्रति रूझान दिखाई देता है। जिनमें सायकिल स्कूटर कार का चित्रण मिलता है। पत्थरों या कांक्रीट के स्तम्भों पर तैल रंग अथवा स्थानीय रंगों से चित्रण किया गया है। इन स्तम्भों पर आदिवासियों की परम्पराओं की मौलिक अभिव्यक्ति होती है। ये इनकी कल्पनाशीलता का परिचायक भी है। इन कलात्मक उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाता है कि ये स्मृति स्तम्भ अपनी मौलिकता, उत्कृष्ट संयोजनों, सरल सुबोध आकार, एवं कल्पना की बेजोड़ कृतियां हैं। जिन्होंने छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को समृद्ध बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दिया है।

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संदर्भ सूची

१,२- भारत की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास-डॉ. लोकेश चन्द्र अग्रवाल, पृ.१७९-लोककला

३- भारतीय विज्ञान की कहानी-गुणाकर मूले, पृ. १०७ प्राचीन भारत में धातुकर्म

४- कलाविलास -आर ए अग्रवाल , लोककला

५-शोध प्रबंधः छत्तीसगढ़ की रूपंकर लोक कलाएं -डॉ. राजेश सिंह

५ चौमासा अंक वर्ष

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सम्पर्क:

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डॉ. रेखा श्रीवास्तव

सहा प्राध्यापक चित्रकला

घर का पता-१००,सुकृति, राजीव नगर, (कस्तूरबा)

रतलाम म.प्र.

Intezaar15 (WinCE)

- डॉ.उत्तम पटेल

श्री जयशंकर प्रसाद हिंदी के भावुक कवि और कुशल कलाकार हैं। इसे कोई यदि उनकी एक ही रचना में देखना चाहें तो उसे आँसू की ओर ही इंगित किया जा सकता है। आँसू में प्रेम की स्मृति इतनी सत्यता के साथ अभिव्यक्त हुई है कि हमारा कवि के साथ अविलम्ब साधारणीकरण हो जाता है। आँसू कवि के जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला को आविष्कार है।

जीवन में प्रत्येक अभिलाषा को पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है और उसमें असफल होने पर व्यक्ति चिंता, दुःख, असंतोष और कुण्ठा से पीड़ित होता है। आँसू इस प्रकार की प्रेमभावनाओं की चरम परिणति है। आँसू का संपूर्ण महत्व कवि के करुणाकलित हृदय से मुखरित विफल रागिनी में देखा जा सकता है। आँसू में कवि ने लौकिक-प्रेम की व्यक्तिगत विरहानुभूति को अभिव्यक्त किया है।

आँसू का मुख्य भाव विरह-श्रृंगार है। आँसू का आधार असीम व्यक्ति है, जिसके मिलन सुख की स्मृति ने कवि के हृदय में वेदना-लोक की सृष्टि की है। कवि के हृदय में प्रिय की स्मृतियों की एक बस्ती ही बस गई है। उनके ह्रृदय में विरह की आग जल रही है-

शीतल ज्वाला जलती है, इँधन होता दृग जल का,

यह व्यर्थ साँस चल-चल कर करती है काम अनिल का।

कवि अपने प्रेम को याद कर कह रहा है कि जिस प्रकार समुद्र के मध्य बडवाग्नि सुप्त रहती है उसी प्रकार उसके प्रणय-सिंधु के तल में भी विरह की अग्नि छिपी हुई थी। उसे अपनी प्रेयसी की निष्ठुरता याद आती है। कवि अपने बीते हुए प्रेम-प्रसंगों को स्मृत कर रहा है-

मादक थी मोहमयी थी, मन बहलाने की क्रीड़ा,

अब हृदय हिला देती है वह मधुर प्रेम की पीड़ा।

कवि के मन में प्रिय-मिलन की अभिलाषाएँ रह-रहकर चेतन हो उठती हैं। किन्तु उसी क्षण सोयी हुई व्यथा जाग पड़ती है। जिस प्रकार आकाश घनीभूत होकर दुर्दिन में जल-बिंदुओं की वर्षा करता है। उसी प्रकार कवि की चेतना के आकाश पर अपने विगत जीवन की स्मृतियाँ आ-आकर धिर जाती हैं। घनीभूत पीड़ा कवि के मन को व्यथित कर देती है और जीवन की विषम परिस्थितियों में उसकी वेदना का यह मेघ आँसुओं की धारा के रूप में बरस पड़ता है-

जो घनीभूत पीड़ा थी, मस्तक में स्मृति-सी छायी,

दुर्दिन में आँसू बनकर वह आज बरसने आई।

कवि को अपनी प्रिया की लज्जा की याद आती है। कवि के मन के निर्मल आकाश में प्रियतम की मधुर स्मृतियों का झंझावात आकर चलने लगता है। प्रियतम की मधुर स्मृतियों ने आकर कवि के हृदय में एक वेदना विह्वल कोलाहल भर दिया है।

आँसू के नायक को दुर्दिन में अपने गत वैभव-विलास पूर्ण जीवन का स्मरण हो आता है, उसकी प्रेयसी की मदमाती छवि उसकी आँखों में बस जाती है। उसे याद आता है, मानो हाफिज़ के शब्दों में माशूकों के जमाव में सम्राट एक ही था। गिनती में वे हजारों थे, मगर उसके दिल को चुरानेवाला एक ही था। स्मृति के जागृत होते ही वह उदास हो जाता है। अपने प्रिय के प्रथम आगमन-प्रथम परिचय की अवस्था को रह-रहकर बिसूरने लगता है। कभी वह सोचता है, वह इस पृथ्वी की न थी, स्वर्गीय आभा थी, जो उससे मिलने को नीचे आई थी। वह प्रियतम का मधुर, लजानेवाला मुख देखते ही उसकी ओर खींच गया था। प्रिय का सौंदर्य उसके शून्य-हृदय को आत्म-विभोर कर देता है तभी वह एकदम उसके साथ एक होकर कहने लगा था-

परिचित से जाने कब के, तुम लगे उसी क्षण हमको।

उसमें वह अपना अस्तित्व ही भूल जाता है। प्रिय ने उस पर पूर्ण अधिकार जमा लिया था। जब मनुष्य के मन में किसी की स्मृति तीव्रतम हो उठती है, तो वह स्मृति के आधार की आकृति, उसकी बातों, उसके व्यापारों-कार्य-कलाप का बहुत विस्तार के साथ मनन करने लगता है। हम आँसू के नायक को अपने प्रिय के शारीरिक सौंदर्य-वर्णन, उसके साथ मिलन-क्रीड़ाओं का उल्लेख करने में भी हर्ष विकंपित पाते हैं। चाँदनी की चाँदी भरी रातें सुख के सपनों की अधिक समय तक उसके कुंज में वर्षा नहीं करने पाई। वह तो कवि के निराशा पूर्ण पतझर के समान जीवन में प्रेम के पुष्प बिछाकर आया था। उसके प्रियतम का प्रवेश जीवन में एक विशेष उल्लास लेकर हुआ था। कवि के जीवन में निराशा के क्षण का तिमिर फैला हुआ था तब आशा ता उज्ज्वल दीप जलाकर उसने कवि के मन को प्रकाशित किया था। प्रियतम के सौंदर्य की स्मृति कवि को आ रही है। ये स्मृतियाँ कहीं असीम वेदना से भरे हुए कवि के हृदय को आकार प्रदान करती हैं तो कहीं प्रेमास्पद की निर्ममता का उद्घाटन करती हैं।

संक्षेप में, आँसू हिंदी का एक श्रेष्ठ विरह काव्य है। इसमें हलचल और उन्माद तथा अतृप्ति और पिपासा है। इसमें प्रेयसी की निष्ठुरता और ह्रृदय की गहरी टीस है। आँसू में स्निग्ध आर्द्रता और हृदय की आहें हैं। जिस रूप-सी रमणी के संपर्क से कवि के दिल में एक अजीब मस्ती, प्रेमोन्माद, विलासितापूर्ण सरसता और यौवन-विलास का उद्वेग होता हुआ था, वह उसके विछोह से क्षण भर में विलुप्त हो गया। वह तो अपनी झलक दिखाकर शून्य में समा गई, किन्तु उसकी स्मृति न मिटी। जो तड़पन, जो आकुलता, जो व्यथा वह छोड़ गई वह बल खाता हुआ आँसू में बह आया। आँसू में प्रशांत भाव-धारा अश्रु-कणों में बिखर फूट पड़ी है।

*****

संपर्कः 14-बी, अवधूतनगर, नगारिया, धरमपुर, जि.वलसाड-396 050 (गुजरात)

kavita sangrah mai mera astavakra harish bhadani

- हरीश भादानी

मैं

---.

मेरे भेजे में

न तेरा ई-उ पार आवे

और ना ही यह जौल-टौल

तू तो वो बता

कहा था न तूने....

मन का बीमार-

वह कैसा होता है,

कहाँ रहता है,

तूने देखा है कभी उसे?

 

मेरा अष्टावक्र

---.

यह भी तूने भली कही

मैं तो रोज ही देखूं ऐसों-ऐसों को

अभी भी मेरे सामने ही है

पर इस पल मैंने तुझे

एक क्लास का

अपना उस्ताद मान ही लिया

अरे! वह भी कोई बीमार

जिसे अपनी बीमारी याद रहे,

समझ का एकाध कणूका तो

बच ही गया है तुझमें

कोई बात नहीं, सींच ही दूंगा

तेरी फोफस जमीन,

रिसे ही है मोहताजी के कूए में पानी

दो-चार बाजरी के सिट्टे

तो लहलहा ही लेंगे...

यह मैंने तुझ से नहीं

अपने आप से कहा है रे

कभी-कभार मैं भी

बोल लिया करूं अपने-आप से

तेरी छाया जो पड़ती रहे मुझ पर;

....

कविता संग्रह – मैं - मेरा अष्टावक्र से साभार

कवि- हरीश भादानी

प्रकाशक – कलासन प्रकाशन, कल्याणी भवन, बीकानेर (राज.)

पृ. 152, मूल्य 200/-, आईएसबीएन नं. 81-86842-21-2

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ग़ज़ल (1)

आँख उनसे मिली तो सजल हो गई

प्यार बढने लगा तो गजल हो गई

 

रोज कहते हैं आऊँगा आते नहीं

उनके आने की सुनके विकल हो गई

 

ख्वाब में वो जब मेरे करीब आ गये

ख्वाब में छू लिया तो कँवल हो गई

 

फिर मोहब्बत की तोहमत मुझ पै लगी

मुझको ऐसा लगा बेदखल हो गई

 

वक्त का आईना है लवों के सिफर

लव पै मैं आई तो गंगाजल हो गई

 

'तारा' की शाइरी किसी का दिल हो गई

खुशबुओं से तर हर्फ फसल हो गई

 

ग़ज़ल (2)

मेरी आँखों में किरदार नजर आता है

रँगे फलक यार का दीदार नजर आता है

 

पर्वत जैसी रात कटी कैसे पूछो मत

आसमाँ फूलों का तरफदार नजर आता है

 

सर्द पवन पहले लगता था मुझे गुलाबी

अब तो सनका-सा फनकार नजर आता है

 

माँगे भीख नहीं छीनो जो चाहे ले लो

यह कहना हमको दमदार नजर आता है

 

तुमसे बिछड़ी भूल हो गई 'तारा' की

उनका चेहरा सपनों में हर बार नजर आता है

 

हृदय मिले तो मिलते रहना अच्छा है

वक्त के संग - संग चलते रहना अच्छा है

 

गम का दरिया अगर जिन्दगी को समझो

धार के संग - संग बहते रहना अच्छा है

 

खुदा मदद करता उनकी जो खुद की करते

हिम्मत से खुद बढते रहना अच्छा है

 

अगर विश्व है, मंदिर-मस्जिद के अधीन

नियमित मंत्रों का जपते रहना अच्छा है

 

ठीक नहीं नजरों का फासला 'तारा' से

चाँद अंजुरी में उगते रहना अच्छा है

 

ग़ज़ल (3)

भीड़ भरी सड़कें सूनी - सी लगती है

दूरी दर्पण से दुगनी सी लगती है

 

मेरे घर में पहले जैसा सब कुछ है

फिर भी कोई चीज गुमी सी लगती है

 

शब्द तुम्हीं हो मेरे गीतों , छन्दों के

गजल लिखूँ तो मुझे कमी सी लगती है

 

रिश्ता क्या है नहीं जानती मै तुमसे

तुम्हें देखकर पलक झुकी सी लगती है

 

सिवा तुम्हारे दिल नहीं छूता कोई शै

बिना तुम्हारे बीरानी सी लगती है

 

चाँद धरा की इश्कपरस्ती के मानिंद

मुझको 'तारा' दीवानी सी लगती है

 

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रचनाकार परिचय:

नाम - डा० (श्रीमती) तारा सिंह

शिक्षा/मानदोपाधि-- साहित्य रत्न , राष्ट्रभाषा विद्यालंकार, विद्या वाचस्पति, विद्या वारिधि

अभिरुचि - साहित्य चर्चा और समाज सेवा

संप्रति - उपाध्यक्ष,विश्व हिंदी सेवा संस्थान, इलाहाबाद

पति - डा० ब्रह्मदेव प्रसाद सिंह , भूतपूर्व प्राचार्य, रीडर एवं रसायन विभागाध्यक्ष , आचार्य

जगदीश चन्द्र बसु महाविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय , कलकत्ता

संपर्क - B 605, अनमोल प्लाजा, प्लाट-7, सेक्टर-8, खारघर, नवी मुम्बई-410210

दूरभाष -022- 32996316; 09967362087.

email :- rajivsinghonline@hotmail.com

स्वरचित काव्य -संग्रह प्रकाशित -

(१) एक बूँद की प्यासी (२) सिसक रही दुनिया (३) हम पानी में भी खोजते रंग (४) एक पालकी चार कहार (५) साँझ भी हुई तो कितनी धुँधली (६) एक दीप जला लेना (७) रजनी में भी खिली रहूँ किस आस पर (८) अब तो ठंढी हो चली जीवन की राख (९) यह जीवन प्रातः समीरण-सा लघु है प्रिये (१०) तम की धार पर डोलती जगती की नौका (११) विषाद नदी से उठ रही ध्वनि (१२) नदिया-स्नेह बूँद सिकता बनती (१३) नगमें हैं मेरे दिल के (१४) यह जग केवल स्वप्न आसार (१५) जीवन की रेती पर (शीघ्र प्रकाश्य),(१६) नक्षत्र लोक (शीघ्र प्रकाश्य)

सहयोग़ी पुस्तकें (काव्य-संकलन)--

(१) पूरब-पश्चिम (२)गजल प्रिया-२००४ (३) फूल खिलते रहेंगे (४) काव्य गंगेश्वरी (५) स्त्री नहीं प्रकृति हो तुम (६) आत्मा की पुकार (७) यादों के फूल (८) नया क्षितिज (९) काव्य मंदाकिनी (१०) कविता की लकीर (११) शब्द कलश (१२) काव्य सरिता (१३) रश्मिरथी (१४) अभिव्यक्ति (१५) स्मृति के सुमन (१६) शून्य से शिखर तक (१७) अन्तर्मन (१८) देश- परदेश (१९) लेखनी के रंग (२०) काव्य मंजूषा (२१) श्रम साधना और साहित्य के दर्पण (२२) काव्य सुधा (२३) शब्द -सूर्य (२४)गंगोत्री- (२५) स्वर पसून (२६)काव्य संगम (२७)सप्त सरोवर (२८)शब्द माधुरी (२९)युवा कौन (३०)सरोरूह (३१)काव्य सलिला (३२)अंजुमन (३३)काव्य मजुषा'०७ (३४)वंदना (३५)यादें (३६)अन्य अनेक पत्र-पत्रिकाओं में

जाल स्थलों में प्रकाशित रचनाएँ:-

(i) www.poetrypoem.com/tarasingh ,(ii) www.poetrypoem.com/poetic13 ,(iii) www.writebay.com/tarasingh , (iv) www.writebay.com/poetic13 , (v) www.poetryvista.com/poetic13 ,(vi) www.poetryvista.com/tarasingh , (vii) www.sawf.org , (viii) www.poemsnpoetry.com , (ix) www.maxpages.com/tarasingh ,

(x) http://sharepoetry.com/user/show/tarasingh , (xi) www.desiclub.com  (xii) www.mcl.org ,

(xiii) www.storypublisher.com/tarasingh , (xiv) www.indolink.com ,(xv) http://hindipoems.spaces.live.com

(xvi) www.kaavyanjali.com , (xvii) www.kavitakosh.org  , (xviii) www.writers-club.com ,

(xix) www.srijangatha.com  (XX) www.sahityakunj.net

 

सम्मान -

  1. ''कवि कुलाचार्य',अखिल भारतीय साहित्य संगम , उदयपुर
  2. विद्या वारिधि ( डी० लिट्०) ', भारतीय साहित्यकार संसद , समस्तीपुर
  3. 'विद्या वारिधि ( डी० लिट्०) ', विश्व हिन्दी सेवा संस्थान , इलाहाबाद
  4. ‘साहित्य वारिधि ( डी० लिट्०) ', साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,प्रतापगढ
  5. 'विद्या वाचस्पति (पी-एच्० डी०)', विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर
  6. 'विद्या वाचस्पति (पी-एच्० डी०)',साहित्यिक सांस्कृतिक कला संगम अकादमी,प्रतापगढ
  7. ‘World Lifetime Achievement Award’—The American Biographical Institute
  8. ‘Woman of the year Award’ –the American Biographical Institute
  9. 'Rising Personalities of India Award’ and ‘Gold Medal’ -- International Penguin Publishing

House, New Delhi.

  1. 'महादेवी वर्मा सम्मान', अखिल भारतीय साहित्यकार समिति, मथुरा
  2. 'हिन्दी रत्न ', अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान अकादमी, कुशीनगर
  3. 'ऋतंभरा रत्न -२००६',ऋतंभरा साहित्यिक मंच ,दुर्ग
  4. 'हिन्दी सेवी सम्मान', जैमिनी अकादमी, पानीपत
  5. 'भारती भूषण सम्मान', राष्ट्रीय राजभाषा पीठ , इलाहाबाद
  6. 'साहित्य श्री सम्मान', अ० भा० भाषा सा० सम्मेलन(केन्द्रीय संस्था), भोपाल
  7. 'श्रीमती केसर बाई सोनी स्मृति सा० रा० शिखर सम्मान ',साहित्यांचल,भीलवाड़ा(राजस्थान)
  8. .'हिन्दी काव्य रत्न , अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान अकादमी, कुशीनगर
  9. 'श्रेष्ठ साधना सम्मान' अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन(केन्द्रीय संस्था),भोपाल
  10. 'वीरांगना सावित्री बाई फुले फेलोशिप अवार्ड ' भारतीय दलित साहित्य अकादमी, दिल्ली
  11. 'सन्त कवि कबीर पुरस्कार', अनोखा विश्वास , इन्दौर
  12. 'राष्ट्रभाषा विद्यालंकार',अखिल भारतीय साहित्य कला परिषद , कप्तानगंज
  13. 'निराला सम्मान'’, शब्द कारखाना, जमालपुर (बिहार)
  14. 'साहित्य सुमन ’, अंतर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था (महाराष्ट्र)
  15. 'साहित्य गौरव सम्मान ', खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, नवी मुम्बई
  16. 'विशिष्ट सम्मान(२००५)’', प्रबंध निदेशक, बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पा 0 कारपोरेशन, पटना
  17. 'गंगोत्री सम्मान’', इतिहास एवं पुरातत्व शोध संस्थान (म्० प्र० )
  18. 'कवयित्री महादेवी वर्मा सम्मान ', विश्व हिन्दी सेवा संस्थान , इलाहाबाद
  19. 'भाषा रत्न सम्मान ', जैमिनी अकादमी , पानीपत
  20. 'साहित्य प्रभा सर्वोच्च ग्यानमाला पुरस्कार', दून द्रोण आदिम विकास समिति,देहरादून
  21. 'पूर्व-पश्चिम काव्य गौरव सम्मान ', जागृति प्रकाशन, मुम्बई
  22. 'साहित्यांचल राष्ट्रीय शिखर सम्मान ', साहित्यांचल, भीलवाड़ा (राजस्थान)
  23. 'काव्य प्रतिभा सम्मान ' अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान अकादमी, कुशीनगर
  24. 'सुभद्रा कुमारी चौहान सम्मान ', अंतर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्था, महाराष्ट्र
  25. 'राष्ट्र गौरव साहित्य सृजन सम्मान ',सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी,खण्डवा
  26. 'मीरा रजत स्मृति सम्मान ', हिन्दी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया
  27. 'राष्ट्र काव्य गौरव ', खानकाह सूफी दीदार शाह चिश्ती, नवी मुम्बई
  28. 'मुम्बई रत्न ', जैमिनी अकाडमी, पानीपत
  29. 'स्व० श्री हरिठाकुर स्मृति सम्मान ', पुष्पग़ंधा प्रकाशन, छत्तीसगढ
  30. 'हिरदे कवि रत्न ', छत्तीसगढ शिक्षक साहित्यकार मंच
  31. 'विशिष्ट साहित्य साधना सम्मान ',अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन,भोपाल
  32. 'काव्य मधुरिमा ', अखिल भारतीय साहित्य संगम उदयपुर
  33. 'काव्य भूषण ', काव्यलोक संचालन समिति, जमशेदपुर
  34. मधुमिश्रित आकांक्षा साहित्य सम्मान,सुरभि साहित्य संस्कृति अकादमी,खण्डवा
  35. 'समन्वय श्री ',अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन(केन्द्रीय संस्था),भोपाल
  36. 'हिन्दी गौरव सम्मान ' अंतर्राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान अकादमी, उ० प्र०
  37. 'साहित्य शिरोमणि ', मानव कल्याण संघ , दादरी (भिवानी)
  38. 'भारत गौरव सम्मान', ऋचा प्रकाशन , कटनी (म० प्र० )
  39. 'हिन्दी काव्य ज्योति सम्मान ',खानकाह सूफी दीदार चिश्ती,नवी मुम्बई
  40. 'राष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान ',अखिल भारतीय राष्ट्रभाषा विकास संगठन,गाजियाबाद
  41. 'रंजन कलश शिव सम्मान ', रंजन कलश, भोपाल
  42. 'सम्मान प्रमाण पत्र ', अखिल भारत वैचारिक क्रांति मंच ,लखनऊ
  43. 'राष्ट्रीय साहित्य शिखर सम्मान ', भारतीय साहित्यकार संसद , समस्तीपुर
  44. 'भारती रत्न सम्मान ', राष्ट्रीय राजभाषा पीठ, इलाहाबाद
  45. 'डा० बाबा साहेब आम्बेडकर साहित्य रत्न पुरस्कार ', अनोखा विश्वास, इन्दौर
  46. ऋतम्भरा साहित्य मणि सम्मान’’ , ऋतम्भरा साहित्य मंच , दुर्ग
  47. 'सम्मान प्रमाण पत्र', अ० भा० कवयित्री सम्मे०, विद्यापीठ महोत्सव ,भागलपुर
  48. 'कवि शिरोमणि',विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर
  49. 'स्मृति साहित्य श्री सम्मान',श्री मुकुन्द मुरारी स्मृति सा० माला,कानपुर
  50. 'सम्मान प्रमाण -पत्र', आदित्य साहित्यिक संस्था, कानपुर
  51. 'सारस्वत साहित्य सम्मान',भारतीय वाङमय पीठ , कोलकाता
  52. 'मधुरिमा रत्न', इतिहास एवं पुरातत्व संस्थान , म० प्र०
  53. 'महादेवी वर्मा सम्मान ',तरुण सांस्कृतिक चेतना समिति,समस्तीपुर
  54. 'जन कवि मानदोपाधि',समग्रता शिक्षा साहित्य एवं कला परिषद ,कटनी
  55. 'काव्य मर्मग्य सम्मान',इन्द्रधनुष साहित्यिक संस्था,बिजनौर (उ० प्र०)
  56. 'साहित्य गौरव अवार्ड', श्री महादेव संस्थान , वर्धा (महाराष्ट्र)
  57. 'तुलसी सम्मान' म० प्र० तुलसी साहित्य अकादमी, भोपाल
  58. 'स्व० रामकिशन दास स्मृति गीति-साहित्य-सम्मान', अ० भा० कला मंच,मुरादाबाद

फिल्मी गीत

'जयहिन्द सिपाई जीहिन्दी फिल्म के लिए कविता, तीसरी पुस्तक से अनमोल प्रोडक्शन , मुम्बई द्वारा शीर्ष गीत के रूप में ली गई |

सदस्यता -

(१) उपाध्यक्ष,विश्व हिंदी सेवा संस्थान, इलाहाबाद

(२) दी फिल्म राइटर्स एसोसियेशन , अँधेरी, मुम्बई की सदस्यता

(3) अखिल भारतीय भाषा साहित्य सम्मेलन केन्द्रीय संस्था,भोपाल की आजीवन सदस्यता

(4) संरक्षक-परामर्शदाता मण्डल, अ० भा० साहित्यकार अभिनन्दन समिति, मथुरा की

आजीवन सदस्यता

(5) अखिल भारतीय कवयित्री सम्मेलन, खुरजा (उ० प्र०) की आजीवन सदस्यता

जीवन वृत्त प्रकाशित -

(१) एफ्रो - एशियन हूज -हू, खंड १ (२००६) (२) एशिया-पैशेफिक हूज -हू, खंड ६ (२००६)

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

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