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November 2007
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पुण्यतिथि : 30 नवंबर  पर विशेष

पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान

Malik Ram Bhogha (WinCE)

प्रो. अश्विनी केशरवानी


Ashwini kesharwani (WinCE) छत्तीसगढ़ प्रदेश अनेक अर्थों में अपनी विशेषता रखता है। यहां ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेषों का बाहुल्य है जो अपनी प्राचीनता और वैभव सम्पन्नता की गाथाओं को मौन रहकर बताता है लेकिन इसके प्रेरणाास्रोत और विद्वतजन गुमनामी के अंधेरे में खो गये। उन दिनों आत्मकथा लिखने की पिपासा नहीं होने से कुछ लिख छोड़ने की परम्परा नहीं रही। दूसरी ओर उनकी कृतियां और पांडुलिपियां पर्याप्त सुरक्षा के अभाव में चूहे और दीमक का भोजन या तो बन गये हैं या बनते जा रहे हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस ओर देशोद्धार के सम्पोषकों ने ध्यान नहीं दिया। उनकी उपेक्षा नीति के कारण अंचल के अनेक मेघावी कवि, लेखक और कला मर्मज्ञ गुमनामी के अंधेरे में खो गये। इसी अज्ञात परम्परा के महान कवि-लेखकों में पंडित मालिकराम भोगहा भी थे जिन्हें प्रदेश के प्रथम नाटककार होने का गौरव प्राप्त होना चाहिए था, मगर आज उन्हें जानने वाले गिने चुने लोग ही हैं। छत्तीसगढ़ ऐसे अनेक स्वनामधन्य कवि-लेखकों से सुसम्पन्न था। देखिये पंडित शुकलाल पांडेय की एक बानगी :-

        रेवाराम गुपाल अउ माखन, कवि प्रहलाद दुबे, नारायन।
        बड़े बड़े कवि रहिन हे लाखन, गुनवंता, बलवंता अउ धनवंता के अय ठौर॥
        राजा रहिन प्रतापी भारी, पालिन सुत सम परजा सारी।
        जतके रहिन बड़े अधिकारी, अपन जस के सुरूज के बल मा जग ला करिन अंजोर॥

    पंडित मालिकराम भोगहा इनमें से एक थे। छत्तीसगढ़ गौरव में पंडित शुकलाल पांडेय लिखते हैं :-

        नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।
        बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।
        हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।
        विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद ब्रज गिरधर।
        विश्वनाथ, बिसाहू, उमर, नृप लक्ष्मण छत्तीस कोट कवि।
        हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम, मीर, मालिक सुकवि॥

महानदी के तट पर स्थित प्राचीन, प्राकृतिक छटा से परिपूर्ण और छत्तीसगढ़ की संस्कारधानी शिवरीनारायण नवगठित जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत जांजगीर से 60 कि.मी.,बिलासपुर से 64 कि.मी.,रायपुर से 120 कि.मी. बलौदाबाजार होकर और रायगढ़ से 110 कि.मी. सारंगढ़ होकर स्थित है। यहां वैष्णव परम्परा के मठ और मंदिर स्थित है। कलिंग भूमि के निकट होने के कारण वहां की सांस्कृतिक परम्पराओं से पूरी तरह प्रभावित यह नगर भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान माना गया है। उड़िया कवि सरलादास ने 14 वीं शताब्दी में लिखा था कि भगवान जगन्नाथ को शबरीनारायण से पुरी ले जाया गया है। यहां भगवान नारायण गुप्त रूप से विराजमान हैं और प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को सशरीर विराजते हैं। इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। कदाचित् इसी कारण इसे ''गुप्तधाम'' माना गया है। यहां भगवान नारायण के अलावा केशव नारायण, लक्ष्मीनारायण, जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा, राम लक्ष्मण जानकी, राधाकृष्ण, अन्नपूर्णा, चंद्रचूढ़ और महेश्वर महादेव, बजरंगबली, काली, शीतला और महिषासुरमर्दिनी आदि देवी-देवता विराजमान हैं। प्राचीन साहित्य में यहां मतंग ऋषि का गुरूकुल आश्रम होने का उल्लेख मिलता है। यहीं श्रीराम और लक्ष्मण शबरी के जूठे बेर खाकर उन्हें मोक्ष प्रदान किये थे। यहीं भगवान श्रीराम ने आर्य समाज का सूत्रपात किया था। शबरी से भेंट को चिरस्थायी बनाने के लिए ''शबरी-नारायण'' नगर बसा है। यहां की महत्ता कवि गाते नहीं अघाते। देखिए कवि की एक बानगी :-

        रत्नपुरी में बसे रामजी सारंगपाणी
        हैहयवंशी नराधियों की थी राजधानी।
        प्रियतमपुर है शंकर प्रियतम का अति प्रियतम,
        है खरौद में बसे लक्ष्मणेश्वर सुर सत्तम
        शिवरीनारायण में प्रकट शैरि-राम युत हैं लसे
        जो इन सबका दर्शन करे वह सब दुख में नहिं फंसे।

    प्राचीन काल में यहां के मंदिरों में नाथ सम्प्रदाय के तांत्रिकों का कब्जा था। उनके गुरू ''कनफड़ा बाबा और नगफड़ा बाबा'' कहलाते थे और जिसकी मूर्ति यहां आज भी देखी जा सकती है। नवीं शताब्दी के आरंभ में रामानुज वैष्णव सम्प्रदाय के स्वामी दयाराम दास तीर्थाटन करते रतनपुर आये। उनकी विद्वता और चमत्कार से हैहयवंशी राजा प्रसन्न होकर उन्हें अपना गुरू बना लिए। उनके निवेदन पर स्वामी जी शबरीनारायण में वैष्णव मठ स्थापित करना स्वीकार कर लिए। जब वे शबरीनारायण पहुंचे तब उनका सामना तांत्रिकों से हुआ। उनसे शास्त्रार्थ करके उन्हें यहां से जाने को बाध्य किये। इस प्रकार यहां वे वैष्णव मठ स्थापित किये और वे इस मठ के प्रथम महंत हुए। आज मठ के 14 महंत हो चुके हैं जो एक से बढ़कर एक ईश्वर भक्त और चमत्कारी थे। वर्तमान में राजेश्री रामसुन्दरदास जी यहां के महंत हैं। यहां के मंदिरों की पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी ''भोगहा'' उपनाम से अभिसिक्त हुए। यहां की महिमा श्री मालिकराम भोगहा के मुख से सुनिए :-

        आठों गण सुर मुनि सदा आश्रय करत सधीर
        जानि नारायण क्षेत्र शुभ चित्रोत्पल नदि तीर
        देश कलिंगहि आइके धर्मरूप  थिर पाई
        दरसन परसन बास अरू सुमिरन तें दुख जाई।

    सन् 1861 में जब बिलासपुर जिला पृथक अस्तित्व में आया तब उसमें तीन तहसील क्रमश: बिलासपुर, शिवरीनारायण और मुंगेली बनाये गये। सुप्रसिद्ध साहित्यकार ठाकुर जगमोहनसिंह सन् 1882 में तहसीलदार होकर शिवरीनारायण आये। उनका यहां आना इस क्षेत्र के साहित्यकारों के लिए एक सुखद घटना थी। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य उन्हें इतना भाया कि उन्होंने इसे अपनी रचनाओं में समेटने का भरपूर प्रयास किया। बनारस में ''भारतेन्दु मंडल'' की तर्ज पर उन्होंने यहां ''जगमोहन मंडल'' की स्थापना कर यहां के बिखरे साहित्यकारों को एक सूत्र में पिरोकर उन्हें लेखन की एक नई दिशा प्रदान की। उनकी रचनाओं में कई स्थानों पर 'जगन्मोहन मंडल' का उल्लेख है। यहां के आनरेरी मजिस्ट्रेट पं. यदुनाथ भोगहा के अनुरोध पर उनके चिरंजीव मालिकराम भोगहा को उन्होंने अपने शागिर्दी में साहित्य लेखन करना सिखाया। पं. मालिकराम जी ने उन्हें अपना गुरू माना है। वे लिखते हैं :-

        प्रेमी परम रसिक गुणखान।
        नरपति विजयसुराघवगढ़ के, कवि पंडित सुखदान॥
        जय जन वंदित श्री जगमोहन, तासम अब नहिं आन।
        जग प्रसिद्ध अति शुद्ध मनोहर, रचे ग्रंथ विविधान॥
        सोई उपदेश्यो काव्य कोष अरू, नाटक को निरमान।
        ताकि परम शिष्य ''मालिक'' को, को न करे सनमान॥

Bhogha dwar aur tahsil office (WinCE)

    तब इस अंचल के अनेक स्वनामधन्य साहित्यकार यहां आकर साहित्य साधना किया करते थे। उनमें पं. अनंतराम पांडेय(रायगढ़), पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय (बालपुर), पं. मेदिनीप्रसाद पांडेय (परसापाली),  श्री वेदनाथ शर्मा (बलौदा), पं. हीराराम त्रिपाठी (कसडोल), पं. मालिकराम भोगहा, श्री गोविंद साव, (सभी शिवरीनारायण), श्री बटुकसिंह चौहान (कुथुर-पामगढ़), जन्मांध कवि नरसिंहदास वैष्णव (तुलसी), शुकलाल पांडेय और पं. लोचनप्रसाद पांडेय भी यहां सु जुड़े रहे। तब यह नगर धार्मिक, सांस्कृतिक तीर्थ के साथ साहित्यिक तीर्थ भी कहलाने लगा। कौन हैं ये मालिकराम भोगहा ? छत्तीसगढ़ में उनका साहित्यिक अवदान क्या था ?
शिवरीनारायण मंदिर के पुजारी और भोगहापारा के मालगुजार पंडित यदुनाथ भोगहा का उल्लेख एक सज्जन व्यक्ति के रूप में ठाकुर जगमोहनसिंह ने सन् 1884 में प्रकाशित अपने सज्जनाष्टक में किया है :-

         बन्दो आदि अनन्त शयन करि शबरनारायण रामा।
         बैठे अधिक मनोहर मंदिर कोटि काम छबिधामा॥
        जिनको राग भोग करि निसुदिन सुख पावत दिन रैनू।
         भोगहा श्री यदुनाथ जू सेवक राम राम रत चैनू॥
        है यदुनाथ नाथ यह सांचों यदुपति कला पसारी।
         चतुर सुजन सज्जन सत संगत सेवत जनक दुलारी॥
        दिन दिन दीन लीन मुइ रहतो कृषि कर्म परवीना।
         रहत परोस जोस तजि मेरे हैं द्विज निपट कुलीना॥

    भोगहा जी बड़े सुहृदय, भक्त वत्सल और प्रजा वत्सल थे। सन् 1885 में यहां बड़ा पूरा (बाढ़) आया था जिसमें जन धन की बड़ी हानि हुई थी। इस समय भोगहा जी ने बड़ी मद्द की थी। शिवरीनारायण तहसील के तहसीलदार और कवि ठाकुर जगमोहनसिंह ने तब ''प्रलय'' नाम की एक पुस्तक लिखी थी। इस पुस्तक के 'समर्पण' में वे भोगहा जी के बारे में लिखते हैं :-''भोगहा जी आप वहां के प्रधान पुरूष हो। आपकी सहायता और प्रजा पर स्नेह, जिसके वश आपने टिकरीपारा की प्रजा का प्राणोद्धार ऐसे समय में जब चारों ओर त्राहि त्राहि मची थी, किया था-इसमें सविस्तार वर्णित है। यह कुछ केवल कविता ही नहीं वरन सब ठीक ठाक लिखा है।'' देखिये उनका पद्य :-

         पुरवासी व्याकुल भए तजी प्राण की आस
     त्राहि त्राहि चहुँ मचि रह्यो छिन छिन जल की त्रास
         छिन छिन जल की त्रास आस नहिं प्रानन केरी
         काल कवल जल हाल देखि बिसरी सुधि हेरी
         तजि तजि निज निज गेह देहलै मठहिं निरासी
     धाए भोगहा और कोऊ आरत पुरवासी॥ 52 ॥
         कोऊ मंदिर तकि रहे कोऊ मेरे गेह
         कोऊ भोगहा यदुनाथ के शरन गए लै देह
         शरन गए लै देह मरन तिन छिन में टारयौ
     भंडारो सो खोलि अन्न दैदिन उबारयौ
         रोवत कोऊ चिल्लात आउ हनि छाती सोऊ
         कोउ निज धन घर बार नास लखि बिलपति कोऊ॥ 53 ॥

     श्री यदुनाथ भोगहा को मालगुजार, माफीदार और पुजारी बताया गया है। बाढ़ के समय उन्होंने बड़ी मद्द की थी। टिकरीपारा (तब एक उनकी मालगुजारी गांव) में स्वयं जाकर वहां के लोगों की सहायता की थी। ठाकुर साहब ने लिखा है :-''ऐसे जल के समय में जब पृथ्वी एकार्णव हो रही थी, सिवाय वृक्षों की फुनगियों के और कुछ दिखाई नहीं देता था और जिस समय सब मल्लाहों का टिकरीपारा तक नौका ले जाने में साहस टूट गया था, आपका वहां स्वयं इन लोगों को उत्साह देकर लिवा जाना कुछ सहज काम नहीं था। यों तो जो चाहे तर्क वितर्क करें पर जिसने उस काल के हाल को देखा था वही जान सकता है।'' एक दोहा में इसका उन्होंने वर्णन किया है :-

         पै भुगहा हिय प्रजा दुख खटक्यौं ताछिन आय।
         अटक्यों सो नहिं रंचहू टिकरी पारा जाय॥ 63 ॥
         बूड़त सो बिन आस गुनि लै केवट दस बीस।
         गयो पार भुज बल प्रबल प्रजन उबारयौ ईश॥ 64 ॥
     इस सद्कार्य से प्रभावित होकर ठाकुर जगमोहनसिंह ने इनकी प्रशंसा अंग्रेज सरकार से की थी और उन्हें पुरस्कार भी देने की सिफारिश की थी मगर अंग्रेज सरकार ने ध्यान नहीं दिया था। उन्होंने लिखा है :- ''आपका इस समय हमारी सरकार ने कुछ भी सत्कार न किया-यद्यपि मैंने यथावत् आपकी प्रशंसा अपने अधिकार के सम्बंध में श्रीयुत् डिप्टी कमिश्नर बिलासपुर को लिखी थी तथा सोच का स्थान है कि उस पर भी अद्यापि ध्यान न हुआ-'नगार खाने में तूती की आवाज कौन सुनता है ?' आदि आपकी सहायता, प्रजागण पर स्नेह और उनका उपकार जगत ने स्वीकार किया और उनकी भी प्रीति आप पर निष्कपटता के साथ है तो इससे बढ़ के और पारितोषिक नहीं। क्यों कि 'धनांनि जीवितन्नजैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत तन्निमित्ते वरं त्यागि विनाशे नियते सति' और भी 'विभाति काय: करूणा पराणाम्परोपकारैर्नतु चन्दनेन' ऐसा प्राचीन लोग कह आये हैं।' इस प्रकार उनकी प्रशंसा कर ठाकुर साहब ने उनके सुखी रहने की कामना की है :-

         सुखी रहैं ये सब पुरवासी खलगन सुजन सुभाए।
         श्री यदुनाथ जियै दिन कोटिन यह मन सदा कहाए॥ 109 ॥

पंडित मालिकराम भोगहा का जन्म बिलासपुर जिले (वर्तमान जांजगीर-चांपा जिला) के शिवरीनारायण में संवत् 1927 में हुआ। वे सरयूपारी ब्राह्मण थे। उनके पिता पं. यदुनाथ भोगहा यहां के नारायण मंदिर के प्रमुख पुजारी, मालगुजार और आनरेरी मजिस्ट्रेट थे। जब मालिकराम बहुत छोटे थे तभी उनकी माता का देहावसान हो गया। मातृहीन पुत्र को पिता से माता और पिता दोनों का प्यार और दुलार मिला। उनकी सम्पूर्ण शिक्षा दीक्षा तहसीलदार ठाकुर जगमोहनसिंह के संरक्षण में हुई। संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू के अलावा उन्होंने संगीत, गायकी की शिक्षा ग्रहण की। आगे चलकर मराठी और उड़िया भाषा सीखी। उन्होंने कम समय में ही अलौकिक योग्यता हासिल कर ली। मालिकराम जी धीरे धीरे काव्य साधना करने लगे। पहले उनकी कविता अवस्थानुरूप श्रृंगार रस में हुआ करती थी। बाद में उनकी कविताएं अलंकारिक थी। उनकी कविताएं सरस और प्रसाद गुण युक्त थी। उनकी कुछ कविताओं को ठाकुर जगमोहनसिंह ने अपनी पुस्तकों में सम्मिलित किया है। देखिए उनकी एक कविता : -

        लखौं है री मैंने रयन भयै सोवै सुख करी।
        छकी लीनी बीनी मधुर गीत गावै सुर भरी।
        मिटावै तू मेरे सकल दुख चाहे छनिक में।
        न लावै ज्यों बेरी अधर रस सोचे तनिक में॥

    मालिकराम जी अपना उपनाम ''द्विजराज'' लिखा करते थे। उनकी अलंकारी भाषा होने के कारण लोग उन्हें ''अलंकारी'' भी कहा करते थे। शिवरीनारायण के मंदिर के पुजारी होने के कारण ''भोगहा'' उपनाम मिला। उनके वंशज आज भी यहां मंदिर के पुजारी हैं।

    मालिकराम जी, ठाकुर जगमोहनसिंह के प्रिय शिष्य थे। उसने भोगहा जी को अपने साथ मध्य प्रांत, मध्य भारत, संयुक्त प्रांत और पंजाब के प्रसिद्ध स्थानों की यात्रा करायी जिससे उन्हें यात्रा अनुभव के साथ विद्यालाभ भी हुआ। बाल्यकाल से ही मालिकराम जी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। वे हमेशा धार्मिक ग्रंथों का पठन और मनन किया करते थे। किशोरावस्था में उन्होंने वेद, उपनिषद और दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया। ब्रह्यचर्य रहकर चतुर्मास का पालन करना, पयमान को जीवन का आधार समझना, नित्य एक हजार गायत्री मंत्र का जाप करना, योग धर्म में पथिक होकर भी सांसारिकर् कत्तव्यों से जूझना और अपनी सुशिक्षा तथा सच्चरित्र के द्वारा लोगों में धर्मानुराग उत्पन्न कर परमार्थ में रत रहना वे परम श्रेष्ठ समझते थे। इन्हीं गुणों के कारण मालिकराम जी आदर्श गृहस्थ के पावन पद के अधिकारी हुये। वे अक्सर कहा करते थे-'' ब्रह्यचर्य व्रत और गायत्री मंत्र में ऐसी शक्ति है जिससे मनुष्य देवतुल्य बन सकता है।'' वे स्त्री शिक्षा और पत्नीव्रत पर लाोगें को उपदेश दिया करते थे। उनके इस उनदेश का लोगों पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता था। बैसाख पूर्णिमा संवत् 1964 को उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया। इससे उन्हें बहुत धक्का लगा। वे अक्सर कहा करते थे-'' मेरी आध्यात्मिक उन्नति का एक कारण मेरी पत्नी है। उनके सतीत्व और मनोदमन को देखकर मैं मुग्ध हो जाता हूं। उनका वियोग असहनीय होता है :-

        मेरे जीवन की महास्थली में तू थी स्निग्ध सलिल स्रोत।
        इस भवसागर के तरने में तेरा मन था मुझको पोत॥

    कहीं पत्नीव्रत में विघ्न उपस्थित न हो और चित्त की एकाग्रता जो दृढ़ अध्यावसाय से प्राप्त हुई है, कहीं विचलित न हो जाये, कुछ तो इस आशंका से और कुछ अपने पिता की आज्ञा का पालन करने के लिये उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया। समय आने पर उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई लेकिन जन्मते ही वह मृत्यु को प्राप्त हो गया। नवजात पुत्र की मृत्यु से वे बहुत व्यथित हुये। वे अस्वस्थ रहने लगे और सूखकर कांटा हो गये। उपचार से उन्हें कोई विशेष लाभ नहीं हुआ और अंतत: वे 38 वर्ष की अल्पायु में 30 नवंबर सन् 1909 को स्वर्गवासी हुए। यह जानते हुये भी कि शरीर नश्वर है, न अतीव वेदना से भर उठा। उन्हीं के शब्दों में :-

        जो जन जन्म लियो है जग में सो न सदा इत रैहैं।
        जग बजार से क्रय विक्रय कर अंत कूच कर जैहैं।
        तद्यपि जे सज्जन विद्वज्जन असमय ही उठ जावै।
        तिनके हेतु जगत रोवत है गुनि गुनि गुण पछतावै।

    पंडित लोचनप्रसाद पांडेय उन्हें शोकांजलि देते हुए लिखते हैं :-

        हे प्राणियों की प्रकृति जग में मरण यह सब जानते।
        यह देह है भंगुर इसे भी लोग हैं सब मानते।
        पर मृत्यु प्रियजन की जलाती हा ! न किसके प्राण है ?
        किसका न होता प्रिय विरह से भ्रष्ट सारा ज्ञान है ?
        भवताप तापित प्राण को चिरशांति का जो स्रोत है।
        भवसिंधु तरने हेतु जिसका हृदय पावन पोत है।
        चिर विरह ऐसे मित्र का हो सह्य किसको लोक में ?
        छाती नहीं फटेगी किसकी हाय ! उसके शोक में ?
        शोकाश्रुप्लावित नेत्र होते हैं रूक जाता गला।
        कर कांपता है फिर लिखें हम इस दशा में क्या भला ?
        इस समय तो रोदन बिना हमसे नहीं जाता रहा।
        हा हन्त मालिकराम ! धार्मिक भक्त ! हा द्विजराज ! हा !

    पं. मालिकराम जी एक उत्कृष्ट कवि और नाटककार थे। उन्होंने रामराज्यवियोग, सती सुलोचना और प्रबोध चंद्रोदय (तीनों नाटक), स्वप्न सम्पत्ति (नवन्यास), मालती, सुर सुन्दरी (दोनों काव्य), पद्यबद्ध शबरीनारायण महात्म्य आदि ग्रंथों की रचना की। उनका एक मात्र प्रकाशित पुस्तक रामराज्यवियोग है, शेष सभी अप्रकाशित है। यह नाटक प्रदेश का प्रथम हिन्दी नाटक है। इसे यहां मंचित भी किया जा चुका है। इस नाटक को भोगहा जी ने ठाकुर जगमोहनसिंह को समर्पित किया है। वे लिखते हैं :-'' इस व्यवहार की न कोई लिखमत, न कोई साक्षी और न वे ऋणदाता ही रहे, केवल सत्य धर्म ही हमारे उस सम्बंध का एक माध्यम था और अब भी वही है। उसी की उत्तेजना से मैं आपको इसे समर्पण करने की ढिठाई करता हूं। क्योंकि पिता की सम्पत्ति का अधिकारी पुत्र होता है, विशेष यह कि पिता, गुरू आदि उपमाओं से अलंकृत महाराज के स्थान पर मैं आपको ही जानता हूं। जिस तरह मैंने अपना सत्य धर्म स्थिर रख, प्राचीन ऋण से उद्धार का मार्ग देखा, उसी तरह यदि आप भी ऋणदाता के धर्म को अवलम्ब कर इसे स्वीकार करेंगे तो मैं अपना अहोभाग्य समझूंगा..।''

    भोगहा जी के बारे में पं. लोचनप्रसाद पांडेय लिखते हैं :-'' पूज्य मालिकराम मेरे अग्रज पं. पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय के बड़े स्नेही मित्र थे। उनमें बड़ी घनिष्ठता थी। मालिकराम जी हमारे प्रदेश के एक सुप्रसिद्ध और दर्शनीय पुरुष थे। उनकी सच्चरित्रता और धार्मिकता की प्रशंसा हम क्या अंग्रेज अधिकारी और पादरी तक किया करते थे। कई पादरी उनकी आध्यात्मिक उन्नति से मुग्ध होकर उनका मान करते थे। मालिकराम जी का हृदय बालकों के समान कोमल और पवित्र था। वे बालकों के साथ बातचीत करके खुश होते थे। ग्रामीण किसानों और उन आदमियों से जिन्हें हम असभ्य कहकर घिनाते थे, उनसे बड़े प्रेम और आदर के साथ मिला करते थे। वे ग्रामीण भाषा में गीत गाकर और हावभाव के साथ बोला करते थे जिससे हजारों नर नारियां मोहित उठ उठते थे। उनकी साहित्य सेवा और मातृ भाषानुराग आदर्श था। स्वदेश भक्ति तो उनके नस नस में भरी हुई थी। उनकी विद्वता और काव्य शक्ति की प्रशंसा अनेक विद्वानों ने की है। ऐसे आदर्श और गुणवान पुरूष का अल्प अवस्था में उठ जाना हमारे देश का दुर्भाग्य है। उनकी मृत्यु से छत्तीसगढ़ का एक सपूत हमसे छिन गया।'' अस्तु :-

            जिसका पवित्र चरित्र औरों के लिये आदर्श है।
            वह वीर मर कर भी न क्या जीवित सहस्रों वर्ष है॥

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रचना, लेखन, फोटो और प्रस्तुति,

    प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,
चांपा-495671 (छत्तीसगढ़)

taron ke geet

डॉ. महेंद्र भटनागर

mahendra bhatnagar

उत्कृष्ट काव्य-संवेदना समन्वित द्वि-भाषिक कवि : हिन्दी और अंग्रेज़ी।

सन् 1941 से काव्य-रचना आरम्भ। 'विशाल भारत' कोलकाता (मार्च 1944) में प्रथम कविता का प्रकाशन।
लगभग छह-वर्ष की काव्य-रचना का परिप्रेक्ष्य स्वतंत्रता-पूर्व भारत; शेष स्वातंत्रयोत्तर।

सामाजिक-राजनीतिक-राष्ट्रीय चेतना-सम्पन्न रचनाकार।
लब्ध-प्रतिष्ठ नवप्रगतिवादी कवि। अन्य प्रमुख काव्य-विषय प्रेम, प्रकृति, जीवन-दर्शन ।
दर्द की गहन अनुभूतियों के समान्तर जीवन और जगत के प्रति आस्थावान कवि। अदम्य जिजीविषा एवं आशा-विश्वास के अद्भुत-अकम्प स्वरों के सर्जक।

जन्म : 26 जून 1926 / झाँसी (उत्तर-प्रदेश)
शिक्षा : एम.ए. (1948), पी-एच.डी. (1957) नागपुर विश्वविद्यालय से।
कार्य : कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय / जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर से प्रोफ़ेसर-अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।
सम्प्रति : शोध-निर्देशक  :  हिन्दी भाषा एवं साहित्य।
कार्यक्षेत्र : चम्बल-अंचल, मालवांचल, बुंदेलखंड।

प्रकाशन % 'डा. महेंद्रभटनागर-समग्र' छह खंडों में उपलब्ध।
प्रकाशित काव्य-कृतियाँ अठारह।

अनुवाद : कविताएँ अंग्रेज़ी, फ्रेंच, चेक एवं अधिकांश भारतीय भाषाओं में अनूदित व पुस्तकाकार प्रकाशित।

सम्पर्क :
फ़ोन : 0751-4092908
110, बलवन्तनगर, गांधी रोड, ग्वालियर - 474 002 (म.प्र.) 

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तारों के गीत


- महेंद्र भटनागर

(1) तारक

झिलमिल-झिलमिल होते तारक !
टिम-टिम कर जलते थिरक-थिरक !

कुछ आपस में, कुछ पृथक-पृथक,
बिन मंद हुए, हँस-हँस, अपलक,

कुछ टूटेपर, उत्सर्गजनक
नश्वर और अनश्वर दीपक।

बिन लुप्त हुए नव-ऊषा तक
रजनी के सहचर, चिर-सेवक !

देखा करते जिसको इकटक,
छिपते दिखलाकर तीव्र चमक !

जग को दे जाते चरणोदक
इठला-इठला, क्षण छलक-छलक !

झिलमिल-झिलमिल होते तारक !

 

(2) जलते रहो
जलते रहो, जलते रहो !

चाहे पवन धीरे चले,
चाहे पवन जल्दी चले,
आँधी चले, झंझा मिलें,
तूफ़ान के धक्के मिलें,
    तिल भर जगह से बिन हिले
    जलते रहो, जलते रहो !

या शीत हो, कुहरा पड़े,
गरमी पड़े, लूएँ चलें,
बरसात की बौछार हो,
ओले, बरफ़ ढक लें तुम्हें,
आकाश से पर बिन मिटे
जलते रहो, जलते रहो !

चाहे प्रलय के राग में
जीवन-मरण का गान हो,
दुनिया हिले, धरती फटे
सागर प्रबलतम साँस ले,
    पिघले बिना सब देखकर
    जलते रहो, जलते रहो !

 

(3) तारों से

तारक नभ में क्यों काँप रहे ?

क्या इनके बंदी आज चरण ?
अवरुद्ध बनी घुटती साँसें इन पर भी होता शस्त्र-दमन ?
क्या ये भी शोषण-ज्वाला से,
झुलसाये जाते हैं प्रतिपल ?
                   दिखते पीड़ित, व्याकुल, दुर्बल,
कुछ केवल कँपकर रह जाते,
कुछ नभ की सीमा नाप रहे !
तारक नभ में क्यों काँप रहे ?

क्या दुनिया वाले दोषी हैं ?
सुख-दुख मय जीवन-सपनों में जब जग सोया, बेहोशी है,
रजनी की छाया में जगती
सिर से चरणों तक डूब रही,
            एकांत मौन से ऊब रही,
जब कण-कण है म्लान, दुखी; तब
ये किसको दे अभिशाप रहे ?
तारक नभ में क्यों काँप रहे ?

क्या कंपन ही इनका जीवन ?
युग-युग से दीख रहे सुखमय, शाश्वत है क्या इनका यौवन ?
गिर-गिर या छुप-छुप कर अविरल
क्या आँखमिचौनी खेल रहे ?
            स्नेह-सुधा की बो बेल रहे !
अपनी दुनिया में आपस में
हँस-हँस हिल अपने आप रहे !
            तारक नभ में क्यों काँप रहे ?

 

(4) तिमिर-सहचर तारक
ये घोर तिमिर के चिर-सहचर !

    खिलता जब उज्ज्वल नव-प्रभात,
    मिट जाती है जब मलिन रात,
    ये भी अपना डेरा लेकर चल देते मौन कहीं सत्वर !
                ये घोर-तिमिर के चिर-सहचर !

    मादक संध्या को देख निकट
    जब चंद्र निकलता अमर अमिट,
    ये भी आ जाते लुक-छिप कर जो लुप्त रहे नभ में दिन भर!
                ये घोर तिमिर के चिर-सहचर !

    होता जिस दिन सघन अंधेरा
    अगणित तारों ने नभ घेरा,
    ये चाहा करते राका के मिटने का बुझने का अवसर !
                ये घोर-तिमिर के चिर-सहचर !

    ज्योति-अंधेरे का स्नेह-मिलन,
    बतलाता सुख-दुखमय जीवन,
    उत्थान-पतन औ' अश्रु-हास से मिल बनता जीवन सुखकर!
                ये घोर-तिमिर के चिर-सहचर !


    (5) दीपावली और नक्षत्र-तारक

    दीप अगणित जल रहे !
    अट्टालिकाएँ और कुटियाँ जगमगाती हैं
    सघन तम में अमा के !
    कर रही नर्तन शिखाएँ ज्योति की
    हिल-हिल, निकट मिल !
    और थिर हैं बल्ब
    नीले, लाल, पीले औ' विविध
    रंगीन जगती आज लगती !
    हो रही है होड़ नभ से;
    ध्यान सारा छोड़ कर
    मन सब दिशाओं की तरफ़ से मोड़ कर,
    इस विश्व के भूखंड भारत ओर
    ये सब ताकते हैं झुक गगन से,
    मौन विस्मय !
    दूर से भग - देख कर मग,
    मुग्ध हो-हो
    साम्य के आश्चर्य से भर
    ग्रह, असंख्यक श्वेत तारक !
    हो गयी है मंद जिनकी ज्योति सम्मुख,
    हो गया लघुकाय मुख !
    निर्जीव धड़कन; लुप्त कम्पन !

 

(6) तारे और नभ

तुम पर नभ ने अभिमान किया !

नव-मोती-सी छवि को लख कर
अपने उर का शृंगार किया,
फूलों-सा कोमल पाकर ही
अपने प्राणों का हार किया,
कुल-दीप समझ निज स्नेह ढाल
        तुमको प्रतिपल द्युतिमान किया !
        तुम पर नभ ने अभिमान किया !

सुषमा, सुन्दरता, पावनता
की तुमको लघुमूर्ति समझकर,

निर्मलता, कोमलता का उर
में अनुमान लगाकर दृढ़तर,
एकाकी हत भाग्य दशा पर
        जिसने सुख का मधु गान किया !
        तुम पर नभ ने अभिमान किया !

 

(7) संध्या के पहले तारे से

शून्य नभ में है चमकता आज क्यों बस एक तारा ?

जब कि क्षण-क्षण पर प्रगति कर रात आती जा रही है,
चंद्र की हँसती कला भी ज्योति क्रमश: पा रही है,
हो गया है जब तिमिरमय विश्व का कण-कण हमारा !
शून्य नभ में है चमकता आज क्यों बस एक तारा ?

बादलों की भी न चादर छा रही विस्तृत निलय में,
और टुकड़े मेघ के भी,  हो नहीं जिसके हृदय में,
है नहीं कोई परिधि भी, स्वच्छ है आकाश सारा !
शून्य नभ में है चमकता आज क्यों बस एक तारा ?

जब कि है गोधूलि के पश्चात का सुन्दर समय यह,
हो गये क्यों डूबती रवि-ज्योति में विक्षिप्त लय यह ?
बन गयी जो मुक्त नभ के तारकों को सुदृढ़ कारा !
शून्य नभ में है चमकता आज क्यों बस एक तारा ?

 

(8) अमर सितारे

टिमटिमाते हैं सितारे !
दीप नभ के जल रहे हैं
स्नेह बिन, बत्ती बिना ही !
मौन युग-युग से
अचंचल शान्त एकाकी !
लिए लघु ज्योति अपनी एक-सी,
निर्जन गगन के मध्य में।
ढल गये हैं युग करोड़ों
सामने सदियाँ अनेकों
बीतती जातीं लिए बस
ध्वंस का इतिहास निर्मम,
पर अचल ये
हैं पृथक ये
विश्व के बनते-बिगड़ते,
क्षणिक उठते और गिरते,
क्षणिक बसते और मिटते
अमिट क्रम से
मुक्त वंचित !
कर न पायी शक्ति कोई
अन्त जीवन-नाश इनका।
ये रहे जलते सदा ही

मौन टिमटिम !
मुक्त टिमटिम !

 

(9) उल्कापात

जब गिरता है भू पर तारा !

आँधी आती है मीलों तक अपना भीषणतम रूप किये,
सर-सर-सी पागल-सी गति में नाश मरण का कटु गान लिये,
    यह चिन्ह जता कर गिरता है
    तीव्र चमक लेकर गिरता है,
    यह आहट देकर गिरता है,
यह गिरने से पहले ही दे देता है भगने का नारा !
         जब गिरता है भू पर तारा !

हो जाते पल में नष्ट सभी भू, तरु, तृण, घर जिस क्षण गिरता,
ध्वंस, मरण हाहाकारों का स्वर, आ विप्लव बादल घिरता,
    दृश्य - प्रलय से भीषणतर कर,
    स्वर - जैसा विस्फोट भयंकर,
    गति - विद्युत-सी ले मुक्त प्रखर,
सब मिट जाता बेबस उस क्षण जग का उपवन प्यारा-प्यारा !
   जब गिरता है भू पर तारा !

 

(10) ज्योति-केन्द्र

    ज्योति के ये केन्द्र हैं क्या ?

    ये नवल रवि-रश्मि जैसे, चाँदनी-से शुद्ध उज्ज्वल,
    मोतियों से जगमगाते, हैं विमल मधु मुक्त चंचल !
    श्वेत मुक्ता-सी चमक, पर, कर न पाये नभ प्रकाशित,
    ज्योति है निज, कर न पाये पूर्ण वसुधा किन्तु ज्योतित !
    कौन कहता, दीप ये जो ज्योति से कुटिया सजाते ?
    ये निरे अंगार हैं बस जो निकट ही जगमगाते !
    ये न दे आलोक पाये बस चमक केवल दिखाते,
    झिलमिलाते मौन अगणित कब गगन-भू को मिलाते ?
                ज्योति के तब केन्द्र हैं क्या ?

 

(11) नश्वर तारक

इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

जीवन की क्षणभंगुरता को
इनने भी जाना पहचाना,
बारी-बारी से मिटना, पर
अगले क्षण ही जीवन पाना,
आत्मा अमर रही, पर रूप न शाश्वत; यह मंत्र महान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

जलते जाएंगे हँसमुख जब-
तक शेष चमक, साँसें-धड़कन,
कर्तव्य-विमुख जाना है कब,
चाहे घेरें जग-आकर्षण ?
इस संयम के पीछे बोलो, कितना ऊँचा बलिदान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !

हथकड़ियों में बंदी मानव-
सम विचलित हो पाये ये कब ?
अधिकार नहीं, पग भर
भी बढ़ना है हाय, असम्भव !
चंचलता रह जाती केवल दृढ़ तूफ़ानी अरमान छिपा !
इन तारों की दुनिया में भी मिटने का अमिट विधान छिपा !   

  

(12) नभ-उपवन

इनके ऊपर आकाश नहीं ।
इस नीले-नीले घेरे का बस होता है रे अंत वहीं !
  इनके ऊपर आकाश नहीं !

पर, किसने चिपकाये प्यारे,
इस दुनिया की छत में तारे,
कागज़ के हैं लघु फूल अरे हो सकता यह विश्वास नहीं !
  इनके ऊपर आकाश नहीं !

कहते हो यदि नभ का उपवन,
खिलते हैं जिसमें पुष्प सघन,
पर, रस-गंध अमर भर कर यह रह सकता है मधुमास नहीं !
इनके ऊपर आकाश नहीं !

 

(13) इंद्रजाल
ये खड़े किसके सहारे ?

है नहीं सीमा गगन की मुक्त सीमाहीन नभ है,
छोर को मालूम करना रे नहीं कोई सुलभ है !
सब दिशाओं की तरफ़ से अन्त जिसका लापता है,
शून्य विस्तृत है गहनतम कौन उसको नापता है ?

टेक नीचे और ऊपर भी नहीं देती दिखायी,
पर अडिग हैं, कौन-सी आ शक्ति इनमें है समायी ?
खींचती क्या यह अवनि है ? खींचता आकाश है क्या ?
शक्ति दोनों की बराबर ! हो सका विश्वास है क्या ?
        जो खडे उनके सहारे !
        ये खड़े किसके सहारे ?

 

(14) ज्योति-कुसुम
फूल ही
बस फूल की रे,
एक हँसती
खिलखिलाती,
वायु से औ' आँधियों से
काँपती
हिलती
सिहरती
यह लता है !
यह लता है !
देह जिसकी बाद पतझर के
नवल मधुमास के,
नव कोपलों-सी,
शुद्ध, उज्ज्वल, रसमयी
कोमल, मधुरतम !

आ कभी जाता प्रभंजन
बेल के कुछ फूल
या लघु पाँखुड़ी सूखी
गँवाकर ज्योति, जीवन शक्ति सारी,
मौन झर जातीं गगन से !
या कभी
जन स्वर्ग के आ,
अर्चना को,
तोड़ ले जाते कुसुम,
इस बेल से,
जो विश्व भर में छा रही है
नाम तारों की लड़ी बन !

 

(15) जलते रहना

तुम प्रतिपल मिट-मिट कर जलते रहना !

जब तक प्राची में ऊषा की किरणें
बिखरा जाएँ नव-आलोक तिमिर में,
विहगों की पाँतें उड़ने लग जाएँ
इस उज्ज्वल खिलते सूने अम्बर में,
    तब तक तुम रह-रह कर जलते रहना !
    तुम प्रतिपल मिट-मिट कर जलते रहना !
जैसे पानी के आने से पहले
दिन की तेज़ चमक धुँधली पड़ जाती,
वेग पवन के आते स्वर सर-सर कर
फिर भू सुख जीवन शीतलता पाती,
    गति ले वैसी ही तुम जलते रहना !
तुम प्रतिपल मिट-मिट कर जलते रहना !

  

(16) शीताभ

ये हिम बरसाने वाले हैं, ये अग्नि नहीं बरसाएंगे !

जब पीड़ित व्याकुल मानवता, दुख-ज्वालाओं से झुलसायी,
बंदी जीवन में जड़ता है ; जिसने अपनी ज्योति गँवायी,

जब शोषण की आँधी ने आ मानव को अंधा कर डाला,
क्रूर नियति की भृकुटि तनी है, आज पड़ा खेतों में पाला,

त्राहि-त्राहि का आज मरण का जब सुन पड़ता है स्वर भीषण,
चारों ओर मचा कोलाहल, है बुझता दीप, जटिल जीवन,

जब जग में आग धधकती है, लपटों से दुनिया जलती है,
अत्याचारों से पीड़ित जब भू-माता आज मचलती है,
ये दु:ख मिटाने वाले हैं; जग को शीतल कर जाएंगे !
ये हिम बरसाने वाले हैं, ये अग्नि नहीं बरसाएंगे !

 

(17) नृत्त

देखो इन तारों का नर्तन !

सुरबालाओं का नृत्य अरे देखा होगा हाला पीकर,
देखा होगा माटी का क्षण-भंगुर मोहक नाच मनोहर,
पर गिनती है क्या इन सबकी यदि देखा तारों का नर्तन !
युग-युग से अविराम रहा हो बिन शब्द किये रुनझुन-रुनझुन!                  

  देखो इन तारों का नर्तन !

सावन की घनघोर घटाएँ छा-छा जातीं जब अम्बर में,
शांति-सुधा-कण बरसा देतीं व्याकुल जगती के अंतर में,
तब देखा होगा मोरों का रंगीन मनोहर नृत्य अरे !
पर, ये सब धुँधले पड़ जाते सम्मुख तारक-नर्तन प्रतिक्षण !                   

  देखो इन तारों का नर्तन !

 

(18) अबुझ
ये कब बुझने वाले दीपक ?

अविराम अचंचल, मौन-व्रती ये युग-युग से जलते आये,
लाँघ गये बाधाओं को, ये संघर्षों में पलते आये,
रोक न पाये इनको भीषण पल भर भी तूफ़ान भयंकर
मिट न सके ये इस जगती से, आये जब भूकम्प बवंडर !

झंझा का जब दौर चला था लेकर साथ विरुद्ध-हवाएँ,
ये हिल न सके, ये डर न सके, ये विचलित भी हो ना पाए!
ये अक्षय लौ को केन्द्रित कर हँस-हँस जलने वाले दीपक !
                  ये कब बुझने वाले दीपक ?

 

(19) प्रिय तारक

यदि मुक्त गगन में ये अगणित
तारे आज न जलते होते !

    कैसे दुखिया की निशि कटती !
    जो तारे ही तो गिन-गिन कर,
    मौन बिता, अगणित कल्प प्रहर,
    करती हलका जीवन का दुख।
        कुछ क्षण को अश्रु उदासी के
        इन तारे गिनने में खोते !
        यदि मुक्त गगन में ये अगणित
        तारे आज न जलते होते !
    फिर प्रियतम से संकोच भरे
    कैसे प्रिय सरिता के तट पर,
    गोदी के झूले में हिल कर,
    कहती, 'कितने सुन्दर तारक !
        आओ, तारे बन जाएँ हम।'
        आपस में कह-कह कर सोते !
        यदि मुक्त गगन में ये अगणित
        तारे आज न जलते होते ! 

         

(20) मेघकाल में

बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !

    आज उमड़ी हैं घटाएँ,
    चल रहीं निर्भय हवाएँ,
    दे रहीं जीवन दुआएँ,
        उड़ रहे रज-कण गगन में,
        घोर गर्जन आज घन में,
        दामिनी की चमक क्षण में,
  जब प्रकृति का रूप ऐसा हो गये ये दूर-न्यारे !
  बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !

        जब बरसते मेघ काले,
        और ओले नाश वाले
        भर गये लघु-गहन नाले,
        विश्व का अंतर दहलता,
        मुक्त होने को मचलता,
        शीत में, पर, मौन गलता,
    हट गये ये उस जगह से, हो गये बिलकुल किनारे !
    बादलों में छिप गये सब दृष्टि सीमा तक सितारे !

 

(21) जगते तारे

अर्ध्द निशा में जगते तारे !
जब सो जाते दुनिया वासी; जन-जन, तरु, पशु, पंछी सारे !                                      

  अर्द्ध निशा में जगते तारे !

ये प्रहरी बन जगते रहते,
आपस में मौन कथा कहते,
ना पल भर भी अलसाये रे, चमके बनकर तीव्र सितारे !
    अर्द्ध निशा में जगत तारे !

झींगुर के झन-झन के स्वर भी,
दुखिया के क्रन्दन के स्वर भी,
लय हो जाते मुक्त-पवन में चंचल तारों के आ द्वारे !
    अर्द्ध निशा में जगते तारे !

निद्रा लेकर अपनी सेना,
कहती, 'प्रियवर झपकी लेना'
हर लूँ फिर मैं वैभव, पर, ये कब शब्द-प्रलोभन से हारे !
    अर्द्ध निशा में जगते तारे !

जलते निशि भर बिन मंद हुए,
कब नेत्रा-पटल भी बंद हुए,
जीवन के सपनों से वंचित ये सुख-दुख से पृथक बिचारे !
                      अर्द्ध निशा में जगते तारे !

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यह चुप्पियों का शहर है

-   सुशील कुमार

image of sushil (WinCE)

यह चुप्पियों का शहर है


निजाम बदल गयी
तंजी में बदल गयीं
पर इस शहर की तसवीर नहीं बदली
यह,
हादसों का एक शहर है
यहां धूल है, धुंआ है
राख की ढीहें हैं
और ढेर-सी चुप्पियां हैं।

इन चुप्पियों के बीच
इक्की-दुक्की जो आहटें हैं
अधजले शवों पर श्मशान में
कौवों, चीलों की
छीना-झपटी जैसे हैं
जो टूटता है जब-तब
उंघती सरकार की
नींद उचाटती नारों की फेहरिस्त से
गलियों में सड़कों पर/इमारतों में
जिनकी बोलियां पहले ही लग चुकी होती है।

'मंगलदायक-भाग्यविधाताओं'
की छतरियों के नीचे
मर-मर कर जीने
और अभिषप्त रहने की तमीज
स्वशासन के इतने सालों में
लोगों ने शायद सीख लिया है,
तभी तो शहर में इतनी वहशत के बाद भी
न इनकी आंखें खुलती हैं
न जुबान हिलती है
पेट के संगत पर सिर्फ
इनके हाथ और
इनकी जांघें चलती हैं।

इनकी 'बोलती बंद'के पीछे
तरह-तरह की भूख की तफसीलें हैं
जो इंसानियत की सभी हदें फांदकर
इस शहर के जनतंत्र में
इन्हें पालतू
बनाये रखती हैं
जहां अपनी आंखों के सामने
खून होता देखते हैं ये
चीखें सुनते हैं
मगर बोल नहीं पाते।
न कटघरे में
खड़े होकर अपने हलफनामे दे सकते।
इन पर बिफरना,
गुस्से से लाल होना
हमारे कायर चलन हैं,
क्योंकि हर लफ्ज, हर सिफर पर
यहां कोई गुप्त पाबंदी है,
इसलिए खून को खून, पानी को पानी
कह पाना यहां लगभग बेमानी है,
हां यह बात अलग है
कि अपना खून भी यहां पानी है!

डर के चूहों ने
हमारे मगज में घुसकर
इतनी कारसाजी से
होश की जड़ें कुतर दिये हैं कि
ड्राइंगरूम की सीमा लांघ
कभी हम भी सड़क पर
उतरने की जहमत
नहीं उठा पाते।
इतने जात, धर्म, झंडे
और सफेद होते सच हैं यहां
कि जन का स्वर
इस तंत्र में दब कर रह जाता है।
लपक लेता है कोई
अन्दर की सुगबुगाहटें
चंद शातिर चालों को खेलकर
अनगढ़े गढ़ देने का आश्वासन देकर
सुशासन के कई-कई वादों में।

हताश जनमन ठगा सा पाता है
शहर के हर मोड पर अपने को।
और हर बार यही होता है 
कि क्रांतिबीज
अंकुरन की दशा में ही पालों के
अनेक आघात झेलकर मर जाता है,
शहर की नाक पर चढ़ा तापमान भी
गिर जाता है।

समझ नहीं पाते
इस शहर के बासिंदे
इस सच को
और ईहलोक-परलोक सुधारने
का सपना लिये
अपने सपनों की दुनिया में वापस
लौट आते हैं
जहां हाड़तोड़ कमाई को
ठेकेदार की झोलियों में भरते रहते हैं
खूद फकीरचंद बने रहते हैं!

जाहिर हैं,
जायज सवालों को लेकर जबतक
लोगों की चुप्पियां नहीं टूटेंगी,
रीढ़ अपनी सीधी कर लोग
सख्त इरादों से तनी
अपनी मुट्ठियां
कुव्यवस्था के खिलाफ
जनतंत्र के आकाश में
जबतक नहीं लहरायेंगे
मतपेटियों पर काबिज जिन्न
तबतक कानून की आड़ में
तंत्र के अक्स बनकर
इस शहर पर कहर
बरपाते रहेंगे
और लोग अपनी आंखें
मलते रहेंगे
लानतों के इस गर्द-गुबार शहर में!

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तंत्र में सेंध लगाते कायरों के विरुद्ध एक रिपोर्ट

वे सहमत नहीं हैं
कि हथियार कायरों की भाषा है
जो विचार की जगह
लोगों में डर उपजाते हैं
क्योंकि इस पर धार
उन बहुभाषियों के शब्दों की धार है
जिनके हौसले पर खौफनाक इरादों का
पानी चढ़ा है
सत्ता का सुख जिनके सपनों से हमेशा
बंधा है
जो हत्यारों के पेट में घुसकर
उसकी बुद्धि और भाषा खाते हैं
और अपने नापाक मंसूबों की
अधूरी जबान से बोलते हैं

हथियार का
अपना कोई वजूद नहीं होता
वह रूपहीन, रंगहीन, गंधहीन है
उसका सारा कच्चा माल
दैनिक उपयोग की क्रीडा-सामग्री मात्र है
और हत्यारे तो
इस संसार के निरीहतम जीव हैं
जैसे सफेद पांडा या डॉल्फिन, लेकिन

हथियार और हत्यारे
के बीच खड़ा है
वही अदद आदमी
जो दोनों को तोड़ता है
टूटने के अंतिम क्रम तक
अंतिम क्षण तक
फिर जोड़ता है उसे
अपने मगज की प्रयोगशाला में
दोनों मटियामेट होकर
अपने रूप और अस्तित्व खोकर
आतंक के दमकते गोले से
उर्जावान होते हैं और
तब सिर्फ, उसके फरमानों के
गुलाम होते हैं
कितनी विडंबना है कि
(जन) तंत्र के सभी कमजोर
बुर्जों और इलाकों में
हत्यारे रोज गुप्त रहते हैं और
अपनी आंखों में काली पट्टियां बांध
अरसे से खड़ी वह माता
तराजू ढोती
उसके पैरों के निशान
ढूंढती है चप्पे-चप्पे!
पर हलफनामे और सबूत
डर के साये में
शिनाख्त नहीं हो पाते
कानून के दायरों से
छुटता हुआ आतंकी
शहर में फिर उधम मचाता है
और हलकान जनता की
पलकें झपकते ही
उसकी नींद को
गुनाहों की काली रात में बदल देता है

भागमभाग-सा पूरा शहर
सन्नाटे के जंगल में डूब जाता है
और तंत्र के त्रिकोण पर बैठा
हत्यारों का सौदागर
ठहाका मारकर
शहर के बीचों बीच हंसता है
और विजयी मुद्रा में
जनता का वोट बन जाता है

इसलिए जनता के डर
के विरूद्ध मुनासिब कार्रवाई जरूरी है
क्योंकि अपराध के चोर-गलियारों से
तंत्र में घुसपैठ करते
कायरों के खिलाफ
सिर्फ जनता ही
सही और सख्त हथियार
हो सकती है
(इस हत्यारी आबहवा में)।

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तमस के साये में

अन्यमनस्कता नहीं
क्योंकि हत्यारे. विचार अब
नये मुहावरों के साथ
भाषा  की नई तमीज में
शताब्दी के चोर दरवाजों से
हमारे यहां घुसपैठ करते हैं
जहां निशाने पर ज्यादातर
नई पौध होती हैं
जिनके कल्लों से
जड़ों के अंतिम रंध्र तक
वे फैल जाते हैं
और सिर्फ़ इनकी
संवेदी शिराओं पर वार करते हैं

यह कितना कठिन समय है कि
टीवी स्क्रीनों और कंप्यूटर मॉनीटरों से
अपनी जादुई  भाषा की तमक
वे सीधे हमारे बिस्तरों पर फेंकते हैं
और लानतों के बाजार में
नई पीढ़ियों को ला खड़े करते हैं
जहां अपनी अक्लें और नस्लें खोकर
ये पीढ़ियां शरीर में जिन्दा पर
दिमाग से पंगु बन जाती है
और कृत्रिम सभ्यता के
मकड़जाल में फंस जाती हैं।

'विकासवाद  उपभोक्तावाद
उदारीकरण  वैश्वीकरण  
विश्व अब एक ग्राम है ' - 
और न जाने कितनी ही
भद्रगालियों के कनफोड़ शोर हैं
इस सभ्यता के बाजार में
जहां फैशन की ओट में
आधुनिकता के अनगिनत मुखौटे पहन
अपने भीतर के घावों को
हम हंसकर सालते रहते हैं
क्योंकि उन्होंने हमें
मातहत और पालतू बनाये रखने के
नये-नये सुघड़ तरीके
ईज़ाद किये हैं
जिनमें सबसे नायाब है-
आदमीपन मारना !
(वे आदमी नहीं मारते)

दरअस्ल
हत्यारे विचारों के अलबम से निकलकर
वही पुराने नायक (बीसवीं सदी के)
इस सदी की सुबह की धूप में
हमारे चौबारों में उतर आये हैं
जिनकी काली करतूतों की भनक
पहलेपहल कविताओं को लगी है
जैसे धरती के अन्दर हलचल की खबरें
बिलों में चूहों और
आकाश में परिन्दों को पहले
हुआ करती हैं।

लेकिन उनको मालूम हो गया है कि
कविताएं मकान होती हैं
जहां आदमी संजीदा और
पूरा ज़िन्दा होता है
और कविताएं
वक्त की सियाही भी काटती हैं
इस वजह से बाजार में
जगह-जगह सलीबें
खड़ी की गई हैं और
कविताओं के खिलाफ
तरह-तरह की साज़िशें चल रही हैं।

कविताएं
नई पीढियों के हश्र पर बिसूरती हैं कि
समय के इस पड़ाव के आगे
धरती नहीं बची है
पर बेताबी के पर
अपनी बांहों में बांध
वे उड़ रहे हैं
नई सभ्यता के 'मॉड'.. बन
तमस के साये में।
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नये रंग की तलाश में

कैनवस पर
इन दिनों वह
आजादी के इतने सालों  की
तमीज से गुजरा हुआ
एक आदमी की तसवीर
उकेरने की तदबीरें करता रहा है
पर रंगों की असहमति ने
अपनी दुनिया से बेदखल कर
उसे हर बार
अपनी ऊब के साथ
शहर की भीड़ से दूर ,
कहीं सुनसान में
ला खड़ा किया है
जहां विचारों की भीड़ में
वह हमेशा
एक रंगहीन बेलौस
चेहरे से मिलता रहा है
जिसमें हिन्दुस्तान की पूरी तफसील है।

कैनवस पर
इन दिनों हाथ और रंग के बीच
एक लडाई-सी छिडी हुई है
आंखें गवाह हैं कि कूचियाँ
रंगों के पक्ष में चली गई हैं ,
लकीरें भी लीक से हट गई हैं

रंग बिफरते हैं कि
हाथ की गिरफ्त में
अब उसकी रौनकें बिगड रही हैं
क्योंकि हिन्दुस्तान कोई घिसा-पीटा
बदरंग आदमी का
खंडहर नहीं हो सकता।
वह तो
चिकने चेहरों पर चमकता है
कुर्सी पर आसीन रहता है
अपनी हुलिया का रोब-गालिब करता है
अपने मातहतों में
और लश्कर के साथ
सड़कों पर धूल उड़ाता चलता है
चमचमाती गाड़ियों में।
रंग भी उसी के साथ चलते हैं।
पर चित्रकार को इतने सालों के
रंगसाजी का अनुभव है कि
रंग यहां तरह-तरह के हैं
जिन पर रंग अभी चढ़े हैं
वे सब सुशासन के मुखौटे हैं
असली चेहरा तो
उस आदमी का है
जो सपनों को अपनी
पीठ पर लादे सडक पर
खाली पांव चल रहा है वर्षों से
और झुर्रियों की दुकान बनकर
अब इस बाजार में लटक रहा है
उसे गौर से देखो
उसका रंग कितना उतर गया है!
वह आदमी स्वशासन  के इतने सालों से
राहें ताक रहा है
नये रंग की आहटों की।
पर वह रंग अभी
समय की कोख में पल रहा है और
धीरे-धीरे दिमाग की शिराओं में
जम रहा है।

उसे तसकीन है कि
वह रंग हर आदमी के
लहू में
बदलाव की आंधी बनकर
एक दिन दौड़ेगा।

लेकिन
कैनवस पर
इन दिनों
जगह-जगह चिकटे धब्बे
इस बात के सबूत हैं कि
यह रंग उस कलाकार के साथ नहीं है
जो हिन्दुस्तान की तसवीर
उकेरने की तदबीरें करता रहा है।
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रचनाकार संपर्क:
सुशील कुमार

शिक्षा अधिकारी,
हंसनिवास/कालीमंडा
दुमका/झारखंड-814101

shuklal pandey

प्रो. अश्विनी केशरवानी

Ashwini kesharwani (WinCE) भव्य ललाट, त्रिपुंड चंदन, सघन काली मूँछें और गांधी टोपी लगाये साँवले, ठिगने व्यक्तित्व के धनी पंडित शुकलाल पांडेय छत्तीसगढ़ के द्विवेदी युगीन साहित्यकारों में से एक थे.. और पंडित प्रहलाद दुबे, पंडित अनंतराम पांडेय, पंडित मेदिनीप्रसाद पांडेय, पंडित मालिकराम भोगहा, पंडित हीराराम त्रिपाठी, गोविंदसाव, पंडित पुरूषोत्तम प्रसाद पांडेय, वेदनाथ शर्मा, बटुकसिंह चौहान, पंडित लोचनप्रसाद पांडेय, काव्योपाध्याय हीरालाल, पंडित सुंदरलाल शर्मा, राजा चक्रधरसिंह, डॉ. बल्देवप्रसाद मिश्र और पंडित मुकुटधर पांडेय की श्रृंखला में एक पूर्ण साहित्यिक व्यक्ति थे। वे केवल एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि एक संस्था थे। उन्होंने संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और छत्तीसगढ़ी भाषा में बहुत सी रचनाएं लिखीं हैं। उनकी कुछ रचनाएं जैसे छत्तीसगढ़ गौरव, मैथिली मंगल, छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया ही प्रकाशित हो सकी हैं और उनकी अधिकांश रचनाएं अप्रकाशित हैं। उनकी रचनाओं में छत्तीसगढ़ियापन की स्पष्ट छाप देखी जा सकती है। छत्तीसगढ़ गौरव में ''हमर देस'' की एक बानगी देखिये :-

ये हमर देस छत्तिसगढ़ आगू रहिस जगत सिरमौर।

दक्खिन कौसल नांव रहिस है मुलुक मुलुक मां सोर।

रामचंद सीता अउ लछिमन, पिता हुकुम से बिहरिन बन बन।

हमर देस मां आ तीनों झन, रतनपुर के रामटेकरी मां करे रहिन है ठौर॥

घुमिन इहां औ ऐती ओती, फैलिय पद रज चारो कोती।

यही हमर बढ़िया है बपौती, आ देवता इहां औ रज ला आंजे नैन निटोर॥

राम के महतारी कौसिल्या, इहें के राजा के है बिटिया।

हमर भाग कैसन है बढ़िया, इहें हमर भगवान राम के कभू रहिस ममिओर॥

इहें रहिन मोरध्वज दानी, सुत सिर चीरिन राजा-रानी।

कृष्ण प्रसन्न होइन बरदानी, बरसा फूल करे लागिन सब देवता जय जय सोर॥

रहिन कामधेनु सब गैया, भर देवै हो लाला ! भैया !!

मस्त रहे खा लोग लुगैया, दुध दही घी के नदी बोहावै गली गली अउ खोर॥

सबो रहिन है अति सतवादी, दुध दही भात खा पहिरै खादी।

धरम सत इमान के रहिन है आदी, चाहे लाख साख हो जावै बनिन नी लबरा चोर॥

पगड़ी मुकुट बारी के कुंडल, चोंगी बंसरी पनही पेजल।

चिखला बुंदकी अंगराग मल, कृष्ण-कृषक सब करत रहिन है गली गली मां अंजोर॥

''छत्तीसगढ़ी भूल भुलैया'' जो ''कॉमेडी ऑफ इरर'' का अंग्रेजी अनुवाद है, की भूमिका में पांडेय जी छत्तीसगढ़ी दानलीला के रचियता पंडित सुन्दरलाल शर्मा के प्रति आभार व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ी में लिखने का आह्वान करते हैं। उस समय पढ़ाई के प्रति इतनी अरूचि थी कि लोग पेपर और पुस्तक भी नहीं पढ़ते थे। पांडेय जी तब की बात को इस प्रकार व्यक्त करते हैं- ''हाय ! कतेक दुख के बात अय ! कोन्हो लैका हर कछू किताब पढ़े के चिभिक करे लागथे तो ओखर ददा-दाई मन ओला गारी देथे अउ मारपीट के ओ बिचारा के अतेक अच्छा अअउ हित करैया सुभाव ला नष्ट कर देथे। येकरे बर कहेबर परथे कि इहां के दसा निचट हीन हावै। इहां के रहवैया मन के किताब अउ अखबार पढ़के ज्ञान अउ उपदेस सीखे बर कोन्नो कहे तो ओमन कइथे-

हमन नइ होवन पंडित-संडित तहीं पढ़ेकर आग लुवाट।

ले किताब अउ गजट सजट ला जीभ लमा के तईहर चाट॥

जनम के हम तो नांगर जोत्ता नई जानन सोरा सतरा।

भुखा भैंसा ता ! ता ! ता !! यही हमर पोथी पतरा !!!

''भूल भुलैया'' सन् 1918 में लिखा गया था तब हिन्दी में पढ़ना लिखना हेय समझा जाता था। पंडित शुकलाल पांडेय अपनी पीड़ा को कुछ इस प्रकार व्यक्त करते हैं-''जबले छत्तिसगढ़ के रहवैया मन ला हिन्दी बर प्रेम नई होवे, अउ जबले ओमन हिन्दी के पुस्तक से फायदा उठाय लाइ नई हो जावे, तबले उकरे बोली छत्तीसगढ़ीच हर उनकर सहायक है। येकरे खातिर छत्तीसगढ़ी बोली मां लिखे किताब हर निरादर करे के चीज नो हे। अउ येकरे बर छत्तीसगढ़ी बोली मां छत्तीसगढिया भाई मन के पास बडे बड़े महात्मा मन के अच्छा अच्छा बात के संदेसा ला पहुंचाए हर अच्छा दिखतय। हिन्दी बोली के आछत छत्तीसगढ़ी भाई मन बर छत्तीसगढ़ी बोली मां ये किताब ला लिखे के येही मतलब है कि एक तो छत्तीसगढ़ ला उहां के लैका, जवान, सियान, डौका डौकी सबो कोनो समझही अउ दूसर, उहां के पढ़े लिखे आदमीमन ये किताब ला पढ़के हिन्दी के किताब बांच के अच्छा अच्छा सिक्षा लेहे के चिभिक वाला हो जाही। बस, अइसन होही तो मोर मिहनत हर सुफल हो जाही...'' वे आगे लिखते हैं- ''मैं हर राजिम (चंदसूर) के पंडित सुन्दरलाल जी त्रिपाठी ला जतके धन्यवाद देवौं, ओतके थोरे हे। उनकर छत्तीसगढ़ी दानलीला ला जबले इहां के पढ़ैया लिखैया आदमी मन पढ़े लागिन हे, तब ले ओमन किताब पढ़े मा का सवाद मिलथे अउ ओमा का सार होथे, ये बात ला धीरे धीरे जाने लगे हावै। येही ला देख के मैं हर विलायत देस के जग जाहीर कवि शेक्सपियर के लिखे ''कॉमेडी ऑफ इरर'' के अनुवाद ल ''भूल भुलैया'' के कथा छत्तीसगढ़ी बोली के पद्य मां लिख डारे हावौं।''

पंडित शुकलाल पांडेय के शिक्षकीय जीवन में उनकी माता का जितना आदर रहा है उतना ही धमधा के हेड मास्टर पंडित भीषमलाल मिश्र का भी था। भूल भुलैया को उन्हीं को समर्पित करते हुए वे लिखते हैं :-

तुहंला है भूल भुलैया नीचट प्यारा।

लेवा महराज येला अब स्वीकारा॥

भगवान भगत के पूजा फूल के साही।

भीलनी भील के कंदमूल के साही॥

निरधनी सुदामा के जो चाउर साही।

सबरी के पक्का पक्का बोइर खाई॥

कुछ उना गुना झन, हाथ ल अपन पसारा।

लेवा महराज, येला अब स्वीकारा॥

ऐसे प्रतिभाशाली कवि प्रवर पंडित शुकलाल पांडेय का जन्म महानदी के तट पर स्थित कला, साहित्य और संस्कार की त्रिवेणी शिवरीनारायण में संवत् 1942 (सन् 1885) में आषाढ़ मास में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविंदहरि और माता का नाम मानमति था। मैथिली मंगल खंडकाव्य में वे लिखते हैं :-

प्रभुवर पदांकित विवुध वंदित भरत भूमि ललाम को,

निज जन्मदाता सौरिनारायण सुनामक ग्राम को।

श्री मानमति मां को, पिता गोविंदहरि गुणधाम को,

अर्पण नमन रूपी सुमन हो गुरू प्रवर शिवराम को॥

उनका लालन पालन और प्राथमिक शिक्षा शिवरीनारायण के धार्मिक और साहित्यिक वातावरण में धर्मशीला माता के सानिघ्य में हुआ। उनके शिक्षक पं. शिवराम दुबे ने एक बार कहा था-''बच्चा, तू एक दिन महान कवि बनेगा...।'' उनके आशीर्वाद से कालांतर में वह एक उच्च कोटि का साहित्यकार बना।

सन् 1903 में नार्मल स्कूल रायपुर में प्रशिक्षण प्राप्त कर वे शिक्षक बने। यहां उन्हें खड़ी बोली के सुकवि पं. कामताप्रसाद गुरू का सानिघ्य मिला। उनकी प्रेरणा से वे खड़ी बोली में पद्य रचना करने लगे। धीरे धीरे उनकी रचना स्वदेश बांधव, नागरी प्रचारिणी, हितकारिणी, सरस्वती, मर्यादा, मनोरंजन, शारदा, प्रभा आदि प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। सन् 1913 में सरस्वती के मई के अंक में ''प्राचीन भारत वर्ष'' शीर्षक से उनकी एक कविता प्रकाशित हुई। तब पूरे देश में राष्ट्रीय जनजागरण कोर् कत्तव्य माना जाता था। देखिये उनकी एक कविता :-

हे बने विलासी भारतवासी छाई जड़ता नींद इन्हें,

हर कर इनका तम हे पुरूषोत्तम शीघ्र जगाओ ईश उन्हें।

पंडित जी मूलत: कवि थे। उनकी गद्य रचना में पद्य का बोध होता है। इन्होंने अन्यान्य पुस्तकें लिखी हैं। लेकिन केवल 15 पुस्तकें ही प्रकाश में आ सकी हैं, जिनमें 12 पद्य में और शेष गद्य में है। उनकी रचनाओं में मैथिली मंगल, छत्तीसगढ़ गौरव, पद्य पंचायत, बाल पद्य पीयुष, बाल शिक्षा पहेली, अभिज्ञान मुकुर वर्णाक्षरी, नैषद काव्य और उर्दू मुशायरा प्रमुख है। छत्तीसगढ़ी में उन्होंने भूल भुलैया, गींया और छत्तीसगढ़ी ग्राम गीत लिखा है। गद्य में उन्होंने राष्ट्र भक्ति से युक्त नाटक मातृमिलन, हास्य व्यंग्य परिहास पाचक, ऐतिहासिक लेखों का संग्रह, चतुर चितरंजन आदि प्रमुख है। उनकी अधिकांश रचनाएं अप्रकाशित हैं और उनके पौत्र श्री रमेश पांडेय और श्री किशोर पांडेय के पास सुरक्षित है।

''छत्तीसगढ़ गौरव'' पंडित शुकलाल पांडेय की प्रकाशित अनमोल कृति है। मध्यप्रदेश साहित्य परिषद भोपाल द्वारा सन् 1972 में इसे प्रकाशित किया गया है। इसकी भूमिका में पंडित मुकुटधर जी पांडेय लिखते हैं:-'' इसमें छत्तीसगढ़ के इतिहास की शृंखलाबद्ध झांकी देखने को मिलती है। प्राचीन काल में यह भूभाग कितना प्राचुर्य पूर्ण था, यहां के निवासी कैसे मनस्वी और चरित्रवान थे, इसका प्रमाण है। छत्तीसगढ़ की विशेषताओं का इसे दर्पण कहा जा सेता है। इसकी गणना एक उच्च कोटि के आंचलिक साहित्य में की जा सकती है। ''हमर देस'' में छत्तीसगढ़ के जन जीवन की जीवन्त झांकी उन्होंने प्रस्तुत की है। देखिये उनकी यह कविता :-

रहिस कोनो रोटी के खरिया, कोनो तेल के, कोनो वस्त्र के, कोनो साग के और,

सबे जिनिस उपजात रहिन है, ककरों मा नई तकत रहिन है।

निचट मजा मा रहत रहिन है, बेटा पतो, डौकी लैका रहत रहिन इक ठौर।

अतिथि अभ्यागत कोन्नो आवें, घर माटी के सुपेती पावे।

हलवा पूरी भोग लगावें, दूध दही घी अउ गूर मा ओला देंव चिभोर।

तिरिया जल्दी उठेनी सोवे, चम्मर घम्मर मही विलोवे,

चरखा काते रोटी पावे, खाये किसान खेत दिशि जावे चोंगी माखुर जोर।

धर रोटी मुर्रा अउ पानी, खेत मा जाय किसान के रानी।

खेत ल नींदे कहत कहानी, जात रहिन फेर घर मा पहिरे लुगरा लहर पटोर।

चिबक हथौरी नरियर फोरे, मछरी ला तीतुर कर डारैं।

बिन आगी आगी उपजारैं, अंगुरि गवा मा चिबक सुपारी देवें गवें मा फोर।

रहिस गुपल्ला वीर इहें ला, लोहा के भारी खंभा ला।

डारिस टोर उखाड़ गड़े ला, दिल्ली के दरबार मा होगे सनासट सब ओर।

आंखी, कांन पोंछ के ननकू, पढ़ इतिहास सुना संगवारी तब तैं पावे सोर।

जब मध्यप्रदेश का गठन हुआ तब सी.पी. के हिन्दी भाषी जिलों में छत्तीसगढ़ के जिले भी सम्मिलित थे। छत्तीसगढ़ गौरव के इस पद्य में छत्तीसगढ़ का इतिहास झलकता है :-

सी.पी. हिन्दी जिले प्रकृति के महाराम से,

थे अति पहिले ख्यात् महाकान्तार नाम से।

रामायण कालीन दण्डकारण्य नाम था।

वन पर्वत से ढका बड़ा नयनाभिराम था।

पुनि चेदि नाम विख्यात्, फिर नाम गोड़वाना हुआ।

कहलाता मध्यप्रदेश अब खेल चुका अगणित जुआ॥

तब छत्तीसगढ़ की सीमा का विस्तार कुछ इस प्रकार था :-

उत्तर दिशि में है बघेल भू करता चुम्बन,

यम दिशि गोदावरी कर पद प्रक्षालन।

पूर्व दिशा की ओर उड़ीसा गुणागार है,

तथा उदार बिहार प्रान्त करता बिहार है।

भंडारा बालाघाट औ चांदा मंडला चतुर गण,

पश्चिम निशि दिन कर रहे आलिंगन हो मुदित मन॥

ऐसे सुरक्षित छत्तीसगढ़ राज्य में अनेक राजवंश के राजा-महाराजाओं को एकछत्र राज्य वर्षो तक था। कवि अपनी कृति इनका बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। देखिये उसकी एक बानगी :-

यहां सगर वंशीय प्रशंसी, कश्यप वंशी,

हैहहवंशी बली, पांडुवंशी अरिध्वंशी,

राजर्षितुल्यवंशीय, मौर्यवंशी सुख वर्ध्दन,

शुंगकुल प्रसू वीर, कण्ववंशी रिपु मर्दन,

रणधीर वकाटक गण कुलज, आंध्र कुलोद्भव विक्रमी।

अति सूर गुप्तवंशी हुए बहुत नृपति पराक्रमी॥

था डाहल नाम पश्चिम चेदि का।

यहीं रहीं उत्थान शौर्य की राष्ट्र वेदिका।

उसकी अति ही रन्ध्र राजधानी त्रिपुरी थी।

वैभव में, सुषमा में, मानों अमर पुरी थी।

रघुवंश नृपतियों से हुआ गौरवमय साकेत क्यों।

त्रिपुरी नरपतियों से हुई त्रिपुरी भी प्रख्यात् त्यों॥

कहलाती थी पूर्व चेदि ही ''दक्षिण कोसल''

गढ़ थे दृढ़ छत्तीस नृपों की यहीं महाबल।

इसीलिए तो नाम पड़ा ''छत्तीसगढ़'' इसका।

जैसा इसका भाग्य जगा, जगा त्यों किसका।

श्रीपुर, भांदक औ रत्नपुर थे, इसकी राजधानियां।

चेरी थी श्री औ शारदा दोनों ही महारानियां॥

नदियां तो पुण्यतोया, पुण्यदायिनी और मोक्षदायी होती ही हैं, जीवन दायिनी भी हैं। कदाचित् इसीलिए नदियों के तट पर बसे नगर ''प्रयाग'' और ''काशी'' जैसे संबोधनों से पूजे जाते हैं। इसी प्रकार छत्तीसगढ़ में महानदी के तट पर स्थित अनेक नगर स्थित हैं जिन्हें ऐसे संबोधनों से सुशोभित किये जाते हैं। देखिये कवि की एक बानगी :-

हरदी है हरिद्वार, कानपुर श्रीपुर ही है।

राजिम क्षेत्र प्रयाग, शौरिपुर ही काशी है।

शशिपुर नगर चुनार, पद्मपुर ही पटना है।

कलकत्ता सा कटक निकट तब बसा घना है।

गाती मुस्काती नाचती और झूमती जा रही,

हे महानदी ! तू सुरनदी की है समता पा रही॥

छत्तीसगढ़ में इतना मनमोहक दृश्य हैं तो यहां कवि कैसे नहीं होंगे ? भारतेन्दु युगीन और उससे भी प्राचीन कवि यहां रहे हैं जो प्रचार और प्रचार के अभाव में गुमनाम होकर मर खप गये...आज उसका नाम लेने वाला कोई नहीं है। ऐसी कवियों के नाम कवि ने गिनायें हैं :-

नारायण, गोपाल मिश्र, माखन, दलगंजन।

बख्तावर, प्रहलाद दुबे, रेवा, जगमोहन।

हीरा, गोविंद, उमराव, विज्ञपति, भोरा रघुवर।

विष्णुपुरी, दृगपाल, साव गोविंद ब्रज गिरधर।

विश्वनाथ, बिसाहू, उमर, नृप लक्ष्मण छत्तीस कोट कवि।

हो चुके दिवंगत ये सभी प्रेम मीर मालिक सुकवि॥

तेजनाथ भगवान, मुहम्मद खान मनस्वी।

बाबू हीरालाल, केशवानंद यशस्वी।

श्री शिवराज, शिवशंकर, ईश्वर प्रसाद वर।

मधु मंगल, माधवराव औ रामाराव चिंचोलकर।

इत्यादिक लेखक हो चुके छत्तीसगढ़ की भूमि पर॥

''धान का कटोरा'' कहलाता है हमारा छत्तीसगढ़। यहां की भूमि जितनी उर्वर है, उतना ही यहां के लोग मेहनती भी हैं। इसीलिये यहां के मेला-मड़ई और तीज त्योहार सब कृषि पर आधारित हैं। अन्न की देवी मां अन्नपूर्णा भी यहीं हैं। कवि का एक पद्य पेश है :-

डुहारती थी धान वहन कर वह टुकनों में।

पीड़ा होती थी न तनिक सी भी घुटनों में ।

पति बोते थे धान, सोचते बरसे पानी।

लखती थी वह बनी अन्नपूर्णा छवि खानी।

खेतों में अच्छी फसल हुई है। मेहनती स्त्रियां टुकनों में भरकर धान खलिहानों से लाकर ढाबा में भर देती हैं। उनका मन बड़ा प्रसन्न है, तो संध्या में सब मिलकर नाच-गाना क्यों न हो, जीवन का रस भी तो इसी में होता है :-

संध्या आगम देख शीघ्र कृषि कारक दम्पत्ति।

जाते थे गृह और यथाक्रम अनुपद सम्पत्ति।

कृषक किशोर तथा किशोरियां युवक युवतीगण।

अंग अंग में सजे वन्य कुसुमावलि भूषण।

जाते स्वग्राम दिशि विहंसते गाते गीत प्रमोद से।

होते द्रुत श्रमजीवी सुखी गायन-हास विनोद से॥

पंडित जी ऐसे मेहनती कृषकों को देव तुल्य मानने में कोई संकोच नहीं करते और कहते हैं :-

हे वंदनीय कृषिकार गण ! तुम भगवान समान हो।

इस जगती तल पर बस तुमही खुद अपने उपमान हो॥

इस पवित्र भूमि पर अनेक राजवंशों के राजा शासन किये लेकिन त्रिपुरी के हैहहवंशी नरेश के ज्येष्ठ पुत्र रत्नदेव ने देवी महामाया के आशीर्वाद से रत्नपुर राज्य की नींव डाली।

हैहहवंशी कौणपादि थे परम प्रतापी।

किये अठारह अश्वमेघ मख धरती कांपी।

उनके सुत सुप्तसुम्न नाम बलवान हुये थे।

रेवा तट अश्वमेघ यज्ञ छ: बार किये थे।

श्री कौणपादि निज समय में महाबली नरपति हुये।

सबसे पहिले ये ही सखे ! छत्तीसगढ़ अधिपति हुए॥

बरसों तक रत्नपुर नरेशों ने इस भूमि पर निष्कंटक राज्य किया। अनेक जगहों में मंदिर, सरोवर, आम्रवन, बाग-बगीचा और सुंदर महल बनवाये...अनेक नगर बसाये और उनकी व्यवस्था के लिये अनेक माफी गांव दान में दिये। अपने वंशजों को यहां के अनेक गढ़ों के मंडलाधीश बनाये। आगे चलकर इनके वंशज शिवनाथ नदी के उत्तर और दक्षिण में 18-18 गढ़ के अधिपति हुये और समूचा क्षेत्र ''36 गढ़'' कहलाया। सुविधा की दृष्टि से रायपुर रत्नपुर से ज्यादा उपयुक्त समझा गया और अंग्रेजों ने मुख्यालय रायपुर स्थानांतरित कर दिया। तब से रत्नपुर का वैभव क्रमश: लुप्त होता गया।

रत्नपुर से गई रायपुर उठ राजधानी।

सूबा उनके लगे वहीं रहने अति ज्ञानी।

छत्तीसगढ़ के पूर्व वही सूबा थे शासक।

शांति विकासक तथा दुख औ भीति विनाशक।

आज जब छत्तीसगढ़ राज्य पृथक अस्तित्व में आ गया है तब सबसे पहिले कृषि प्रधान उद्योगों को विकसित किया जाना चाहिये अन्यथा धान तो नहीं उगेगा बल्कि हमारे हाथ में केवल कटोरा होगा...?

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रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी, चांपा (छ. ग.)

बाल-साहित्य


hans hans gayen ham
 

हँस-हँस गाने गाएँ हम ! 

कवि - डॉ. महेंद्रभटनागर

mahendra bhatnagar

                                                                 

       वर्षा



 

   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !

 

     आगे-आगे

     गरमी भागे

 

  हँस-हँस गाने  गाएँ हम !

   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम

 

     मेंढ़क बोलें

     पंछी डोलें

 

   बादल  गरजें; जैसे बम !

   सर-सर करती चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !

 

     नाव चलाएँ

     खू़ब नहाएँ

  आओ कूदें धम्मक - धम !

   सर-सर करती  चले हवा

   पानी बरसे झम-झम-झम !

        

      

        खेलें खेल



    

    छुक-छुक करती आयी रेल

    आओ, हिल-मिल खेलें खेल !

 

    आँख-मिचौनी, खो-खो और

    दौड़ा-भागी सब-सब ठौर !

 

    टिन्नू  मिन्नू  पिन्नू  साथ

    हँस-हँस और मिला कर हाथ !

 

    कूदें - फादें  घर दीवार

    चाहें  जीतें,  चाहें हार !

 

    कसरत करना हमको रोज़

    ताक़तवर हो अपनी फ़ौज !

 

    सब कुछ करने को तैयार;

    नहीं कभी भी हों बीमार !

 

    आपस में हम रक्खें मेल !

 

    छुक-छुक करती आयी रेल

    आओ, हिल-मिल खेलें खेल !

         

        

 

           अच्छे लड़के

 

  हम बालक हैं, हम बन्दर हैं,

  हम भोले-भाले सुन्दर हैं !

 

  हर रोज़ सुबह उठ जाते हैं,

  मुँह धोकर बिस्कुट खाते हैं !

   

  दो कप चाय गरम जब मिलती

  तब यह सूरत जाकर खिलती !

 

  फिर,  पंडितजी से  पढ़ते हैं,

  हम नहीं किसी से लड़ते हैं !

 

  माँ के  कहने पर  चलते हैं,

  ना रोते  और  मचलते हैं !

 

  दिन भर हँसते-गाते रहते,

  भारत-माता की जय कहते !

 

  हम रहते भाई मिल-जुल कर

  हो भला हमें फिर किसका डर ?

 

         

 

   जागो

 

  चहक रहीं है चिड़ियाँ चीं-चीं

  तुमने अब क्यों आँखें मीचीं ?

 

  हुआ सबेरा  जागो भैया

  जागा तोता, जागी गैया !

 

   यदि जल्दी उठ जाओगे,

  तो खूब  मिठाई पाओगे !

 

   अम्मा ने चाय बनायी है,

  मीठा हलुआ भी लायी है !

 

  खाना है तो बिस्तर छोड़ो,

  फ़ौरन मुँह को धोने दौड़ो !

      

        

        

माँ

      

  माँ ! तू हमको प्राणों से भी प्यारी है !

 

     मीठा  दूध  पिलाती है

     रोटी रोज़  खिलाती है

     हँस-हँस पास बुलाती है

     गा-गा गीत  सुलाती है

  दुनिया की सब चीज़ों से तू न्यारी है !

          माँ ! तू हमको प्राणों से भी प्यारी है !

 

     कहती हर रात  कहानी,

     बातें  अपनी   पहचानी,

     सुन जिनको हम खुश होते

     सुख सपनों में जा सोते,

  हे माँ तुझ पर सब वैभव बलिहारी है !

  माँ ! तू हमको प्राणों से भी प्यारी है !

 

       

हम ....

 

हम छोटे - छोटे  भोले - भाले सारे बाल

  पढ़-लिख पर जल्द बनेंगे वीर जवाहरलाल !

     

     अच्छे-अच्छे  काम करेंगे

     नहीं किसी से ज़रा डरेंगे

     दुनिया में कुछ नाम करेंगे

  भारत-माता को  कर देंगे  हम मालामाल !

  पढ़-लिख कर जल्द बनेंगे वीर जवाहरलाल!           हम छोटे - छोटे  भोले - भाले सारे बाल !

 

     जन-जन का दुख दूर करेंगे

     सेवा  हम   भरपूर   करेंगे

     बाधा   चकनाचूर   करेंगे

  झूठे  धोखेबाजों की  नहीं  गलेगी  दाल !

  पढ़-लिख कर जल्द बनेंगे वीर जवाहरलाल !

  हम छोटे - छोटे  भोले - भाल सारे बाल !

        

            

        काम हमारा

 

भारत की आशा हैं हम, बलवान,

     साहसी,  वीर  बनेंगे,

     इसकी सीमा-रक्षा को हँस-

     हँस, सैनिक रणधीर बनेंगे,

     हमको आगे बढ़ते जाना,

     हर पर्वत पर चढ़ते जाना,

     भूल न पीछे पैर हटाना,

   

             इतना केवल  काम हमारा !

              कितना सुन्दर, कितना प्यारा !

 

 

     भारत के दिल की धड़कन हम

       थक कर बैठ नहीं जाएंगे,

     भूख-गऱीबी का युग जब-तक

     है, चैन न किंचित पाएंगे,

 

     घर-घर में जा दीप जलाना,

     रोते हैं  जो  उन्हें  हँसाना,

     आज़ादी  के   गाने  गाना,

   

       इतना केवल  काम हमारा !

       कितना सुन्दर, कितना प्यारा !

   

       

 

हमारा देश

 

आज हमारा देश नया है !

 

  ये खेत हज़ारों मीलों तक

  फैले हैं कितने हरे- हरे,

  गेहूँ-मक्का-दाल-चने-जौ

  चावल से सारे भरे - भरे !

   

     धरती-माँ का वेश नया है !

       आज हमारा देश नया है !

 

 

  इसमें चिड़ियाँ नीली-पीली

     सित-लाल-गुलाबी गाती हैं,

     उषा अपने गालों पर  प्रति-

  दिन नूतन रंग  सजाती है !

 

     बुरा अँधेरा बीत गया है !

     आज हमारा देश नया है !

 

           

   

   हिमालय

 

भारत-माँ का ताज हिमालय !

 

ऊँचा-ऊँचा  नभ को छूता,

     युग-युग जगने वाला प्रहरी,

   जगमग-जगमग करता जिसमें

     किरनों से मिल बऱ्फ-सुनहरी,

   

     तूफ़ानों  का या  हमलों का

       जिसको न कभी भी लगता भय !

       भारत-माँ का ताज हिमालय !

 

  बहती जिसमें माला-सी दो

  गंगा - यमुना की धाराएँ,

   टकरा-टकरा कर छाती से

   जिसके जाती बरस घटाएँ,

   

     हरी-भरी की धरती जिसने

     किया हमारा जीवन सुखमय !

     भारत-माँ का ताज हिमालय !

 

         

 

    

      दीपावली

 

 

    जगमग-जगमग करते दीपक

    लगते कितने  मनहर  प्यारे,

    मानों आज  उतर  आये हैं

    अम्बर से  धरती पर  तारे !

 

    दीपों का त्योहार मनुज  के

    अतंर-तम को  दूर करेगा,

    दीपों का त्योहार मनुज के

    नयनों में फिर स्नेह भरेगा !

 

    धन आपस में बाँट-बूट कर

    एक  नया   नाता  जोडेंगे,

    और उमंगों की फुलझड़ियाँ

   घर-घर में सुख से छोड़ेंगे !

 

    दीपावली का स्वागत करने

    आओ हम भी दीप जलाएँ,

    दीपावली का स्वागत करने

    आओ हम भी नाचे  गाएँ !

  

            

 

     सबेरा

 

  हर रोज़ सबेरा होता है !

 

  ज्यों ही दूर गगन में उड़कर

  यह काली-काली रात गयी-

   झट सूरज पूरब से आकर

     बिखरा देता है धूप नयी !

     जग जाता है 'जिम्मी` मेरा

       फिर और न पलभर सोता है !

     हर रोज़ सबेरा होता है !

 

  चिड़ियाँ घर-घर में चीं-चीं

  शोर मचातीं, गाती आतीं,

  सोई 'जीजी` को शरमातीं

  और जगाकर उड़-उड़ जातीं,

     सब अपने कामों में लगते

     आराम सभी का खोता है !

     हर रोज़ सबेरा होता है !

 

   टन-टन बजती घंटी चलते

  धरती पर जब दो बैल बड़े

   देखो हल लेकर जाने को

  हैं, कितने पथ पर कृषक खड़े,

     खेतों में जाकर इसी समय

     'होरी` फसलें बोता है !

     हर रोज़ सबेरा होता है !

        

           

 

    बादल

 

  ये घनघोर बरसते श्यामल-बादल !

 

  निर्भय नभ में उमड़-घुमड़ कर छाए,

     देख  धरा ने  नाना  रूप  सजाए,

  स्वागत करने नव-वृक्ष  उमग आए,

       पल्लव-पल्लव में आज मची हलचल !

       ये  घनघोर बरसते  श्यामल-बादल !

 

  नदियाँ जल से पूर गयीं मटमैली,

  गिट्टक-टिल्लू ने मिल होली खेली,

     हाथों में कागज़ की नावें ले लीं,

       सड़कों पर पानी, गलियों में दलदल !

       ये घनघोर बरसते श्यामल-बादल !

 

  तालों पर मेंढ़क  करते  टर-टर-टर,

  दीपक पर दीमक़ उड़ती फर-फर-फर,

     आओ झूला  झूलें जी  भर-भर कर,

       सुख पाएँ वर्षा का सब बाल-सरल !

       ये घनघोर बरसते श्यामल-बादल !

     

       

   

चाँद

     चाँद आसमान में निकल  रहा,

  श्याम रूप रात का बदल रहा !

 

  मुँह पुनीत प्यार से भरा हुआ,

  मन सरल दुलार से भरा हुआ,

 

  आ रहा किसी सुदेश से अभी,

  मंद - मंद मुसकरा रहा तभी !

 

  साथ रोशनी  नयी लिए हुए,

  वेश मौन साधु-सा किए हुए ;

 

  नींद का  संदेश भेजता हुआ ,

  स्वप्न भूमि पर बिखेरता हुआ,

 

  दूर के पहाड़ से सरक-सरक,

  झूल पेड़-पेड़ में, झलक-झलक,

 

  और है न ध्यान, खेल में मगन,

  सिऱ्फ एक दौड़ की लगी लगन !

   

  आसमान चढ़ रहा बिना रुके,

  ढाल औ' चढ़ाव पर बिना झुके !

 

  चाँद का बड़ा दुरूह काज है,

     व्योम का तभी न चाँद ताज है !

        

               

 

 

    किशोर

 

 

   शेर-से दहाड़ते चलो,

     आसमान फाड़ते चलो !

 

वीर हो महान देश हिंद के विजय करो,

   मातृभूमि की व्यथा-जलन समस्त तुम हरो,

   देख मौत सामने नहीं डरो, नहीं डरो !

तुम स्वतंत्र-स्वर्ण नव-प्रभात के हरेक

  शत्रु को पछाड़ते चलो !

     शेर से दहाड़ते चलो,

     आसमान फाड़ते चलो !

 

देख आँधियाँ डरावनी नहीं, कभी रुको,

साहसी किशोर शक्तिमान हो, नहीं झुको,

भूख-प्यास झेलते बढ़ो, नहीं कभी थको !

   राह रोकता मिले अगर कहीं पहाड़ तो

        

   उसे उखाड़ते चलो !

     शेर-से दहाड़ते चलो,

     आसमान फाड़ते चलो !

 

      

 

  हम मुसकराएंगे


 

संकटों में भी सदा हम मुसकराएंगे !

 

हम  करेंगे  सामना  तूफ़ान  का

डर नहीं हमको तनिक भी प्राण का

ध्यान केवल मातृ - भू के मान का

  देश की स्वाधीनता के गीत गाएंगे !

  संकटों में भी सदा हम मुसकराएंगे !

 

हो भले ही  राह में बाधा प्रबल

हम रहेंगे निज भरोसे पर अटल,

एकता  हमको बनाएगी  सबल,

  हम कड़े श्रम से, धरा पर स्वर्ग लाएंगे !

     संकटों में भी सदा हम  मुसकराएंगे !

 

जगमगाते  दीपकों से  प्यार है,

   पास फूलों का मधुर उपहार है,

   लक्ष्य में हँसता हुआ संसार है,

  एक दिन दुनिया सुनहरी कर दिखाएंगे !

  संकटों में भी सदा  हम  मुसकराएंगे !

     

       

 

  महान् ध्रुव

 

 

  सुनीति और सुरुचि थीं

     राजा उत्तानपाद की दो रानी,

  थी प्रिय अधिक सुरुचि राजा को

     इससे वह करती रहती थी मनमानी।

 

  ध्रुव की माँ थीं सुनीति

  और सुरुचि-पुत्र थे उत्तम,

  दोनों शिशु खेला करते

  थे राजा को प्रिय-सम !

 

  एक दिवस शिशु उत्तम को

     गोद लिए खेलाते थे राजा,

     और अचानक तभी वहाँ आये ध्रुव

     देख, लगे चढ़ने अंक पिता के

     उत्तम बोले-

   'आ जा !`

 

  पर, रानी सुरुचि वहीं बैठी थीं,

     जिनके भय से

     ले न सके वे ध्रुव को

     गोद सदय से !

 

   सोत-पुत्र ध्रुव से

  ईर्ष्या से बोली गर्वीली रानी-

     'हे ध्रुव !

    तुमने इतनी-सी बात न जानी

 

  हो तुम राजा के पुत्र सही

  पर, हो न योग्य राज्यासन के

  यदि पाना हो राजा की गोद तुम्हें,

  तो जन्मो फिर से मेरे कोखासन से।`

 

      खा चोट हृदय पर

   रानी के कटु वचनों की,

     बालक ध्रुव

     तत्काल लगे रोने

   सासें भर-भर !

 

   राजा मौन रहे

  मानों ध्रुव हो पुत्र न उनका,

  इतने अधिक सुरुचि के थे वश में

  इतना अधिक उन्हें था उनका डर।

 

  आहत ध्रुव रोते-रोते

  अपनी माँ के पास गये फिर,

   माँ ने बेटे को

   दुलराया, सहलाया,

     रोने का पूछा करण,

  पर, ध्रुव ने नहीं बताया कुछ

   केवल रोते रहे

   झुकाए सिर !

 

   इस पर

  समझायी सारी बात दासियों ने,

   सुन

  ध्रुव-माँ भी धीरज छोड़ लगी रोने !

     फिर दुख से बोली-

   'बेटा !

   यह दुर्भाग्य हमारा है,

   होनहार के आगे

  अरे, न चलता कोई चारा है !

   

  पर, तुम हिम्मत मत हारो,

   कुछ ऐसी युक्ति विचारो

     जिससे पाओ ऊँचा पद

     अचल-अटल

     ऐसा कि जहाँ से

     हिला-हटा न तनिक भी पाये

   देव दनुज मानव बल।`

 

  फिर माँ ने ध्रुव को युक्ति बतायी

     'बेटा ! मेरे मत में

     सब से ऊँचा-सत्य जगत में।

 

   जिसने सत को पाया

   उसका ही यश

   सब लोकों ने गाया!

 

   तुम भी सत्य उपासक बन

   पा सकते हो वह पद

   जिसके आगे तुच्छ

   महत् राज्यासन!

 

  सुन चल पडे तभी बालक ध्रुव

   करने पूरी माँ की बात,

   भाग्य बदलने अपना

  मधुवन में किया उन्होंने

   तप दिन-रात

 

 

   पाना सत्य-

   यही थी बस एक लगन,

   सदा इसी में

   डूबा रहता उनका मन !

 

  सत्य ज्ञान की ज्योति जगाना,

  अज्ञान-तिमिर को दूर भगाना।

 

  बना हुआ था लक्ष्य यही,

  पाना था उनको तथ्य यही।

 

   पढ-लिख कर,

   गुरुओं से सुनकर,

  औ' जीवन में अनुभव कर

   बुद्धि परिश्रम से

   जिसको पाकर छोडा,

   ध्रुव ने बचपन से ही

  जीवन की सुख सुविधाओं से

   मुँह मोड़ा !

 

   तभी जगत में

   ध्रुव का नाम हुआ,

  ज्ञान-ज्योति से ज्योतित

   उनका धाम हुआ,

  ज्ञानी बनकर दुर्लभ पद पाया

  जो जग में ध्रुवपद कहलाया !

 

   पूर्ण ज्ञान पाकर

  ध्रुव लौटे अपने घर !

 

  राजा ने पहचानी अपनी भूल बड़ी,

 

   आशीष-स्नेह देने

   सुनीति-सुरुचि खडीं,

  स्वागत करने जनता उमड पडी !

 

  देख प्रजा का प्रेम तोष,

  उत्तानपाद ने ध्रुव को 

  सौप दिया साम्राज्य कोष।

 

   पर, ध्रुव

  कोरे ज्ञानी बनकर नहीं रहे

  जनहित अगणित काम किये

   औ कष्ट सहे।

 

   माँ की आज्ञा से

   आदर्श गृहस्थ बने।

 

   जन-पीड़क यक्षों को

   दंडित करने

   भीषण युद्ध किये।

 

   विजयी

   जन-प्रिय ध्रुव ने

  वर्षों तक राज्य किया ,

 

   जग से जो कुछ पाया

   वह सब जगे हित

   कर दान दिया!

 

   माना

  नहीं आज हैं ध्रुव-ज्ञानी,

   पर है

  उनके यश की शेष कहानी

   जिसको

   घर-घर में कहती

   माँ या नानी !

 

   उत्तर नभ में

   जो सबसे चमकीला स्थिर

   तारा है,

   लगता जो हम सबको

   बेहद प्यारा है-

   वह

   अद्भुत बाल-तपस्वी

   ध्रुव का घर है !

   वह

   जन-रंजक सम्राट

  तरुण-ध्रुव का घर है !

  वह अनुपम ज्ञानी और विरागी

   ध्रुव का घर है !

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रचनाकार संपर्क:

डा. महेंद्रभटनागर, ११० बलवन्तनगर, गांधी रोड,

ग्वालियर   ४७४ ००२ (म, प्र.) भारत

फ़ोन : ०७५१.४०९२९०८ / मो- ९८९३४०९७९३

gulzaar

गुलज़ार के चंद नगमे

(1)
जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है

होंठ चुपचाप बोलते हों जब
सांस कुछ तेज़-तेज़ चलती हो
आंखें जब दे रही हों आवाज़ें
ठंडी आहों में सांस जलती हो

आँख में तैरती हैं तसवीरें
तेरा चेहरा तेरा ख़याल लिए
आईना देखता है जब मुझको
एक मासूम सा सवाल लिए

कोई वादा नहीं किया लेकिन
क्यों तेरा इंतजार रहता है
बेवजह जब क़रार मिल जाए
दिल बड़ा बेकरार रहता है

जब भी यह दिल उदास होता है
जाने कौन आस-पास होता है
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(2)

हाल-चाल ठीक-ठाक है
सब कुछ ठीक-ठाक है
बी.ए. किया है, एम.ए. किया
लगता है वह भी ऐंवे किया
काम नहीं है वरना यहाँ
आपकी दुआ से सब ठीक-ठाक है

आबो-हवा देश की बहुत साफ़ है
क़ायदा है, क़ानून है, इंसाफ़ है
अल्लाह-मियाँ जाने कोई जिए या मरे
आदमी को खून-वून सब माफ़ है

और क्या कहूं?
छोटी-मोटी चोरी, रिश्वतखोरी
देती है अपा गुजारा यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है

गोल-मोल रोटी का पहिया चला
पीछे-पीछे चाँदी का रुपैया चला
रोटी को बेचारी को चील ले गई
चाँदी ले के मुँह काला कौवा चला

और क्या कहूं?
मौत का तमाशा, चला है बेतहाशा
जीने की फुरसत नहीं है यहाँ
आपकी दुआ से बाक़ी ठीक-ठाक है
हाल-चाल ठीक-ठाक है
---------.

(3)
अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकली बिल्ली
बिल्ली खाए जर्दा-पान
काला चश्मा पीले कान
कान में झुमका, नाक में बत्ती
हाथ में जलती अगरबत्ती
अगर हो बत्ती कछुआ छाप
आग में बैठा पानी ताप
ताप चढ़े तो कम्बल तान
वी.आई.पी. अंडरवियर-बनियान

अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकला मच्छर
मच्छर की दो लंबी मूँछें
मूँछ पे बाँधे दो-दो पत्थर
पत्थर पे इक आम का झाड़
पूंछ पे लेके चले पहाड़
पहाड़ पे बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की इक जोगन होगी
-    गठरी में लागा चोर
मुसाफिर देख चाँद की ओर

पहाड़ पै बैठा बूढ़ा जोगी
जोगी की एक जोगन होगी
जोगन कूटे कच्चा धान
वी.आई.पी. अंडरवियर बनियान

अ-आ, इ-ई, अ-आ, इ-ई
मास्टर जी की आ गई चिट्ठी
चिट्ठी में से निकला चीता
थोड़ा काला थोड़ा पीला
चीता निकला है शर्मीला
घूँघट डालके चलता है
मांग में सेंदुर भरता है
माथे रोज लगाए बिंदी
इंगलिश बोले मतलब हिंदी
‘इफ’ अगर ‘इज’ है, ‘बट’ पर
‘व्हॉट’ माने क्या
इंगलिश में अलजेब्रा छान
वी.आई.पी. अंडरवियर-बनियान

-----------
(गीत संग्रह - मेरा कुछ सामान से साभार. प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन, 2/38, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली 110002. आईएसबीएन नं. 81-7119-175-4)

कविता

sthagan

-अतुल चतुर्वेदी


स्थगित हो जायेंगे
सब सोचे हुए काम एक दिन
वयस्त्तायें पट जायेंगी 
रात के कुहासे सी
बिखरी होगीं साजिशें चारों तरफ़
ऐसे में होंसले स्थगित हो जायेंगे
पूछता होगा पता जब कोई घर का
दरवाजों पर लटकी होगी उदासी
आंखों में कैद होंगे स्वप्न
मुट्ठियाँ छ्टपटाती होंगी
किसी ऐसी घड़ी में ही
संबोधन सब स्थगित हो जायेंगे
बंद होगा रास्ता आम लोगों को
खुली होंगी गलियां सुविधाओं के लिए
डूबती होगी जब आधी दुनिया कहीं
आवरण सारे स्थगित हो जायेंगे

कौन भला टटोलेगा नब्ज रिश्तों की
धूल भरे पग कौन धोएगा
सुनकर आर्तनाद दौड़ पड़े
प्रयोजन पुनीत सब स्थगित हो जायेंगे
गहरा दौर है यह स्थगन का
आज शब्द कल द्श्य स्थगित हो जायेंगे
कहना असंभव है यात्राओं के विषय में
क्या पता कब गंतव्य स्थगित हो जायेंगे ? 

कविता 

  art - dolls

-डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागी

 

कुछ लड़के और लड़कियों के

मम्मी और पाप आपस में मिले

एक ने दूसरे को, दूसरे ने तीसरे को

उचित वर तथा वधु के चर्चे करे

उनमें से किसी चतुर ने , एक बात बताई

प्रापर्टी डीलर से मिलने की सलाह सुझाई

 

एक भाई भड़क पड़े

क्यों भैया !, लड़के , लडकियां

क्या प्रापर्टी हैं ?. जो

प्रापर्टी डीलर से मिलें

कई बार ठोंक ठोंक कर

मोल तोल किया जाता है

ब्रोकर यानी बिचोलिए का

अपना ही रोल होता है

अधिक बोली लगने पर

मुंह मांगा मूल्य न मिलने पर

फौरन पुराने ग्राहक से

रिश्ता तोड़ दिया जाता है

नया ग्राहक ढूंढा जाता है

यह प्रापर्टी से कैसे कम है

अब तो लगा बात में दम है

 

वे प्रापर्टी डीलर के तो नहीं ,

मैरेज़ डीलर के पास गए

डीलर ने रजिस्ट्रेशन के नाम

काफ़ी अच्छे पैसे धरवाए

लड़के लडकी को , १५ दिन का रेपिड

इंटरव्यू फ़ेस करने के नुस्ख़े समझाए

पर्सन्लटी डेवलप्मेन्ट के नाम पर

सेंडविच कोर्स में काफी पैसे धरवाए

भारी भरकम फ़ीस देने के बाद भी

जब शादी की बात नहीं बन पाई

तब अपना ही धंधा चलाने की

एक नई योज़ना बनाई

 

रविवार के सभी प्रमुख

अख़बारों में दे दिया

धांसू बड़ा विज्ञापन

आपके शहर में पहली बार

विवाह योग्य युवक - युवतियों

का विराट परिचय सम्मेलन

युवक युवतियों का

ठहरने का भव्य प्रबन्ध

ममी - पापा भी आकर देख़ें

होनेवाले नए सम्बन्ध

दहेज़ लेने वाले

दहेज़ देने वाले

दहेज़ न देने वाले

दहेज़ न लेने वाले

माता पिता का

वर्गीकरण किया जायेगा

प्रत्येक को गाइड दिया जायेगा

 

विज्ञापन का जबरदस्त असर हुआ

परिचय हाल था खचाखच भरा हुआ

एक लड़के की मम्मी का

लड़की के पापा से परिचय हुआ

बातों ही बातों में दहेज़ का

अच्छा सा खुलासा हुआ

लड़की के पापा ने कहा

मेरे पास बंगले , कारें

नौकर , चाकर , दूकान मकान

ज़मीन , ज़ायदाद सभी कुछ है

 

अगर नहीं है तो बस एक दामाद

क्या कोई कर सकता है

मेरी बिटिया की

ज़िन्दगी आबाद

दहेज़ मुंह मांगा दे सकता हूँ

जो चाहे , कर सकता हूँ

क्या आपके लड़के से , अपनी

लड़की की शादी की

अपेक्षा कर सकता हूँ

 

लड़की लड़के के सवाल ज़बाब

में कुछ मेल नहीं खा पाई

अतः बात चाय पानी से

आगे बढ़ ही नहीं पाई

अधिकतर प्रश्न और उत्तर

निर्धारित पाठ्यक्रम से बाहर थे

ब्रोकर ने भी समझाया

परन्तु सभी प्रयत्न बेकार थे

 

मम्मी ने कहा , तुम्हे लड़की पसन्द नहीं

पर मुझे लड़की के पापा पसन्द हैं

मम्मी थोड़ा शरमाई

कहने में सकुचाई

दांए पैर का अंगूठा

ज़मीन पर घिसा

साड़ी का पल्लू

दांतों में भींचा

बेटा !, इस दौड़धूप में

हमें काफी चपत लग गया

काम वहीं का वहीं

धरा रह गया

लड़की के पापा पैसे वाले हैं

हम सब दिल वाले हैं

क्यों ने हम सब मिल कर

एक ही घर बना लें

 

इस तरह अपनी

समस्या का हल निकाले

लड़के को मम्मी की बात भाई

मम्मी की पापा से कराई सगाई

ब्रोकर बोला , मेरी फ़ीस भाई

क्यूं ?. तेने क्या मदद कराई

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रचनाकार संपर्क : k.p.tyagi@gmail.com

सत्यप्रसन्न के चंद दोहे रचनाकार पर आपने यहाँ पढ़े.

इनका सस्वर पाठ नीचे दिए गए वीडियो में आप देख-सुन सकते हैं.

 

आप स्वयं अपनी रचनाओं को सस्वर पाठ में रचनाकार पर प्रकाशित-प्रसारित कर सकते हैं. बस अपना वीडियो रेकॉर्ड करवाइए (स्थानीय स्तर पर वीडियोग्राफ़ी करने वालों से या अपने स्वयं के या मित्रों के वीडियो रेकार्डर युक्त डिजिटल कैमरे से) और उसकी सीडी रचनाकार को भेज दीजिए. बस. ध्यान दें कि रचनाएँ 10 मिनट से अधिक बड़ी न हों. आप अपने आसपास के कविसम्मेलनों, साहित्य-चर्चा इत्यादि के वीडियो भी भेज सकते हैं. सीडी भेजने का पता बाजू पट्टी में दिया गया है.

बाल कहानी

दोस्तों का कर्ज

-ज़ाकिर अली `रजनीश´

jakir ali rajneesh (WinCE) शाम का समय था। असलम उस समय कमरे में अकेला था। वह अभी-अभी खेल के मैदान से लौटा था। उसने कनखियों से देखा- माँ किचन में खाना बनाने में व्यस्त थीं। बहन भी किचन में ही मॉं का हाथ बंटा रही थी। पिताजी अभी-अभी बाथरूम के अंदर गये थे। उसने सोचा कि यही सबसे अच्छा मौका है। किसी ने उसे देखा भी नहीं था। चुपचाप अपना काम करे और फिर से खेलने चला जाए। किसी को पता ही नहीं चलेगा कि वह कब आया और कब चला गया।

शिकारी बिल्ली की तरह इधर-उधर देखते हुए असलम दरवाजे के पास लगी खूटियों के पास पहुंचा। वहॉं पर तमाम कपड़े टंगे हुए थे। उसने पिताजी की पैंट की जेब में हाथ डाला। उसका दिल जोर-जोर से धड़-धड़ कर रहा था।

अगले ही पल पिताजी का मोटा सा पर्स असलम के हाथ में आ गया। उसका दिल बेहद घबराया। लगा पिताजी पीछे खड़े उसे देख रहे हैं। उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी। उसने पीछे देखा। वहॉं तो कोई नहीं था। वह उसका वहम था। वह सोच रहा था कि अगर यह काम अभी नहीं हो पाया, तो फिर वह कभी नहीं कर पाएगा।

असलम ने झटके से पर्स खोला। पर्स के अंदर तमाम नोट रखे हुए थे। असलम ने जल्दी से एक नोट पकड़ कर बाहर खींच लिया। वह 100 रूपये का नोट था। बस इसी की तो उसे जरूरत थी। उसने पर्स को वापस पैंट की जेब में रख दिया। सामने मेज पर उसका बैग पड़ा हुआ था। उसने इतिहास की किताब निकाल कर नोट उसके बीच में रखा और बैग को बंद दिया। उसके बाद वह पुन: चुपके से बाहर निकल गया।

मैदान में बहुत से लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। असलम को देखते ही एक लड़के ने आवाज दी, ``असलम, तुम कहॉं चले गये थे? जल्दी आओ।´´

``नहीं, मेरा मन नहीं है।´´ असलम ने खेलने से साफ इनकार कर दिया।

लड़के पुन: खेल में मगन हो गये। असलम पार्क के कोने में बनी बेन्च पर बैठ गया। उसका दिल अभी तक जोर-जोर से धड़क रहा था। लग रहा था जैसे वह सीना चीर कर बाहर आ जाएगा। वह सोचने लगा कि कल स्कूल जाकर वह अपने दोस्तों का कर्ज चुका देगा और फिर उनके रोज-रोज के तानों से मुक्ति पा जाएगा।

अगले ही क्षण असलम का ध्यान 100 की नोट पर चला गया। वह सोचने लगा- उसे नोट को बैग में नहीं रखना चाहिए था। कहीं किसी ने बैग खोला और नोट दिख गया तो? अगर उसकी चोरी पकड़ ली गयी तो? तब क्या होगा? पिताजी तो उसकी खूब पिटाई करेंगे। मॉं भी डांटेंगी। और दोनों को कितना दु:ख होगा। मुझ पर से उनका विश्वास उठ जाएगा। और फिर क्या मैं कभी उनकी नजरों में विष्वासपात्र बन सकूंगा? शायद कभी नहीं।

असलम का मन आत्मग्लानि से भर उठा। उसे अपने आप पर शर्म आने लगी। क्यों उसने चटोरेपने की आदत डाली? क्यों उसने दोस्तों से पैसे मांग कर चाट-पकौड़ी खाई? वे लोग पैसे मांगते थे तो मांगने देते। बहुत होता तो वे घर में शिकायत कर देते। हो सकता है कि पिताजी नाराज होते, डांटते-डपटते। पर मैं उनकी नजरों से गिरता तो नहीं। यह तो मैंने बहुत गलत काम किया। मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।

अगले ही क्षण असलम ने फैसला कर लिया- मैं इस चोरी का प्रायश्चित करूंगा। मैं पिताजी से सब कुछ सच-सच बता दूंगा। इस प्रकार उनका विश्वास भी टूटने से बच जाएगा और मैं अपना सिर उठाकर भी चल सकूंगा। यह निश्चय करके असलम उठ खडा हुआ और अपने घर की ओर चल पड़ा।

असलम जब अपने कमरे में पहुंचा, तो वहॉं का माजरा देखकर दंग रह गया। उसके पिताजी उसकी कोई किताब लिये बैठे थे। उसे लगा कि पिताजी को सारी बात मालूम हो गयी है। अब? अब वह क्या करे? असलम ने सोचा कि चाहे पिताजी को यह बात मालूम हो या नहीं, वह उन्हें उसे सारी बात सच-सच बता देगा।

अपना दिल कड़ा करके असलम पिताजी के पास पहुंचा और धीरे से बोला, ``मुझे सजा दीजिए पिताजी, मैं आपका गुनहगार हूं।´´

पिताजी आश्चर्यचकित रह गये। उन्हें समझ में नहीं आया कि बात क्या है। दरअसल उन्हें अभी तक अपने पर्स से पैसे गायब होने की बात पता ही नहीं चली थी। इसलिए वे असलम की बात का मर्म नहीं समझ पाए। उन्होंने अचरजपूर्वक पूछा, ``किस बात की सजा बेटे? तुमने कौन सा गुनाह किया है?´´

``मैंने आपके विश्वास को तोड़ा है पिताजी। मैंने आपके रूपये चुराए हैं।´´ कहते हुए उसने इतिहास की किताब के अन्दर से रूपये निकालकर पिताजी के सामने रख दिये।´´

यह देखकर पिताजी हतप्रभ रह गये। उनकी समझ में ही नहीं आया कि वे क्या कहें। असलम कह रहा था, ``यह चोरी मैंने इन्हीं हाथों से की है पिताजी, इन्हें सजा मिलनी ही चाहिए।´´ कहते हुए असलम अपने हाथों को जोर-जोर से दीवार पर पटकने लगा।

अब सारी बात असलम के पिताजी को समझ में आ गयी। वे बोले, ``ठहरो असलम, इतनी सजा तुम्हारे लिए काफी है।´´

पिताजी की बात सुनकर असलम के हाथ जहां के तहां रूक गये। वह आश्चर्यचकित होकर पिताजी की ओर देखने लगा।

``देखो बेटा, किसी भी अपराध की सबसे बड़ी सजा होती है प्रायश्चित। यदि व्यक्ति स्वयं ही सच्चे मन से प्रायश्चित कर ले, तो फिर उसे किसी सजा की जरूरत नहीं होती। क्योंकि सजा तो दी ही इसीलिए जाती है कि उस व्यक्ति को अपनी गल्ती का एहसास हो।´´ पिताजी ने असलम को समझाया, ``मुझे इस बात का अफसोस नहीं है कि तुमने यह चोरी की। जरूर कोई ऐसी बात रही होगी, जिसने तुम्हें मजबूर कर दिया होगा। पर मुझे इस बात की खुशी है कि तुमने सजा पाने से पहले ही प्रायश्चित कर लिया।´´

पिताजी की बातें सुनकर असलम को कुछ हौसला बंधा। उसने चोरी की वजह बताते हुए कहा, ``जी, वो दरअसल मैंने अपने कुछ दोस्तों से उधार लेकर चाट-पकौड़े खाए थे। अब वे लोग मुझसे बार-बार पैसे मांग रहे थे और कह रहे थे कि हम लोग तुम्हारे घर में शिकायत कर देंगे। इसलिए मैंने आपकी डांट से बचने के लिए...।´´

``जो हुआ उसे भूल जाओ बेटा।´´ पिताजी ने असलम के सिर पर हाथ फेरते हुए समझाया, ``लेकिन कोशिश करना कि फिर ऐसी गल्ती न हो।´´

``मैं आपसे वादा करता हूं कि फिर कभी मैं आपके विश्वास को ठेस नहीं लगने दूंगा।´´ असलम ने दृढतापूर्वक अपनी बात कही, ``आगे से मैं ऐसा कोई भी काम नहीं करूंगा, जिससे आपको दु:ख हो और मैं आपकी नजरों में गिर जाऊं।´´

``ये हुई न बात। अच्छा, तो ये रूपये रख लो और इनसे अपने तथाकथित दोस्तों का कर्ज चुका देना।`` कहते हुए पिताजी ने वापस 100 का नोट असलम की ओर बढ़ाया।

``जी, मैं...।´´

असलम को हिचकिचाता देखकर वे बोले, ``हॉं, रख लो। लेकिन भविष्य में उन लड़कों से जरा दूर ही रहना।´´

``जी, मैं समझ गया।´´ कहते हुए असलम ने सौ रूपये का नोट ले लिया और उसे संभाल कर इतिहास की किताब के बीच में ही रख दिया।

इस बार रूपये रखते हुए न तो उसे डर लगा और न ही कोई घबराहट हुई। क्योंकि यह रूपये उसे चुरा कर नहीं, ससम्मान प्राप्त हुए थे।

----------------------.

रचनाकार परिचय:

ज़ाकिर अली रजनीश : एक परिचय

जन्मतिथि

:

एक जनवरी उन्नीस सौ पिचहत्तर.

शिक्षा

:

एम0ए0 (हिन्दी), बी0सी0जे0, सृजनात्मक लेखन (डिप्लोमा).

लेखन

:

कहानी, उपन्यास, नाटक एवं कविता विधाओं में वर्ष 1991 से सतत लेखन। राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में एक हजार से अधिक रचनाएं प्रकाशित। अंग्रेजी एवं बंग्ला भाषा में अनेक रचनाओं का अनुवाद.

मीडिया लेखन

:

उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ से “हिन्दी का बदलता स्वरूप एवं पटकथा लेखन” फेलोशिप (2005), दूरदर्शन से अनेक धारावाहिक प्रसारित, आकाशवाणी तथा दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण.

पुस्तक प्रकाशन

:

गिनीपिग (वैज्ञानिक उपन्यास, 1998), विज्ञान कथाएं (कथा संग्रह, 2000).

बाल उपन्यास

:

सात सवाल (यमन के राजकुमार हातिम पर केन्द्रित, 1996), हम होंगे कामयाब/मिशन आजादी (बाल अधिकारों पर केन्द्रित, 2000/2003), समय के पार (पर्यावरण पर केन्द्रित वैज्ञानिक उपन्यास- 8 अन्य विज्ञान कथाओं के साथ प्रकाशित, 2000).

बाल कहानी

:

मैं स्कूल जाऊंगी (मनोवैज्ञानिक कहानियां, 1996), सपनों का गांव (पर्यावरण पर आधारित कहानियां, 1999), चमत्कार (विज्ञान कथाएं, 1999), हाजिर जवाब (हास्य कहानियां, 2000), कुर्बानी का कर्ज (साहस की कहानियां, 2000), ऐतिहासिक गाथाएं (ऐतिहासिक कहानियां, 2000), सराय का भूत (लोक कथा, 2000), अग्गन-भग्गन (लोक कथा, 2000), सोने की घाटी (रोमांचक कहानियां, 2000), सुनहरा पंख (उक्रेन की लोक कथाएं, 2000), सितारों की भाषा (अरब की लोक कथाएं, 2005), विज्ञान की कथाएं (वैज्ञानिक कहानियां, 2006), ऐतिहासिक कथाएं (ऐतिहासिक कहानियां, 2006), Best of Hi-tech Tales (वैज्ञानिक कहानियां, 2006), Best of Historical Tales (ऐतिहासिक कहानियां, 2006).

ऐतिहासिक लेखन

:

विविध विषयों पर बीस पुस्तकें प्रकाशित (2000).

नवसाक्षर साहित्य

:

भय का भूत (अंधविश्वास पर केन्द्रित, 2000), मेरी अच्छी बहू (पारिवारिक सामंजस्य पर केन्द्रित, 2000), थोडी सी मुस्कान (परिवार नियोजन पर केन्द्रित, 2000) असंयम का फल (एड्स पर केन्द्रित, 2000).

सम्पादन

:

इक्कीसवीं सदी की बाल कहानियां (दो खण्डों में 107 कहानियां, 1998), एक सौ इक्यावन बाल कविताएं (2003), तीस बाल नाटक (2003), प्रतिनिधि बाल विज्ञान कथाएं (2003), ग्यारह बाल उपन्यास (2006).

पुरस्कार / सम्मान

:

भारतेन्दु पुरस्कार (सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार, 1997), श्रीमती रतन शर्मा स्मृति बालसाहित्य पुरस्कार (रतन शर्मा स्मृति न्यास, दिल्ली, 2001), सहस्राब्दि हिन्दी सेवी सम्मान (यूनेस्को एवं केन्द्रीय हिन्दी सचिवालय, दिल्ली, 2000), डा0 सी0वी0 रमन तकनीकी लेखन पुरस्कार (आईसेक्ट, भोपाल, 2006), विज्ञान कथा भूषण सम्मान (विज्ञान कथा लेखक समिति, फैजाबाद, उ0प्र0, 1997), सर्जना पुरस्कार (उ0प्र0 हिन्दी संस्थान, लखनऊ, 1999, 2000) सहित डेढ दर्जन संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरस्कृत।

डिक्शनरी ऑफ इंटेलेक्चुअल, कैम्ब्रिज, इंग्लैण्ड सहित अनेक संदर्भ ग्रन्थ में ससम्मान उदधृत।

बाल साहित्य समीक्षा (मा0, कानपुर, उ0प्र0) मई 2007 अंक विशेषांक के रूप में प्रकाशित।

विशेष

:

भारतीय विज्ञान लेखक संघ (इस्वा, दिल्ली) भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति (फैजाबाद, उ0प्र0) आदि के विज्ञान लेखन प्रशिक्षण शिविरों में सक्रिय योगदान।

‘तस्लीम’ (टीम फॉर साइंटिफिक अवेयरनेस ऑन लोकल इश्यूज़ इन इंडियन मॉसेस) के सचिव के रूप में वैज्ञानिक चेतना का प्रचार/प्रसार।

‘बच्चों के चरित्र निर्माण में बाल कथाओं का योगदान’ लघु शोध कार्य।

अनेक पत्रिकाओं के विशेषांकों का सम्पादन।

सम्प्रति

:

राज्य कृषि उत्पादन मण्डी परिषद, उ0प्र0 में कार्यरत।

निवास

:

नौशाद मंजिल, तेलीबाग बाजार, रायबरेली रोड, लखनऊ-226005

सम्पर्क सूत्र

:

(साधारण डाक) पोस्ट बॉक्स नं0- 4, दिलकुशा, लखनऊ-226002

मोबाईल- 09935923334

E-mail: zakirlko@gmail

वेब पेज- http://alizakir.blogspot.com

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