संदेश

January, 2008 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गौतम राजऋषि की प्रेम कविता

चित्र
किसतरहसेऔरकैसे-कैसेकितनाप्यारकरताहूंतुझसेकाशकिकहपातामैंयेतुझकोयाकाशकिजानतीतूबिनाकहे
कहनेकोतोसारीपीड़ाएंयूंतुझसेहमकहजातेइसपागलपनकाहालसाराऔरदीवानगीकीसारीबातें
कहते-कहतेलेकिनरुकजाऊंमनयेजानेक्या-क्यासोचेस्वीकारनहींहैइसदिलकोकिमैंकहूंऔरतुपरेशानरहे
तूतोपूरीजिन्दगीहैमेरीनहींमहजएकहिस्साहैजानपायेतूकभीजोवोमेरेरोनेकाकिस्साहै
सुनतेवोहांजोतेरीतोशायदअभीहमकुछऔरहोतेफ़र्कतुझेक्यापड़ताहैलेकिनआंसूयेबहतेहैंतोबहे
रुला-रुलाजायेउदासीनतातेरीबेरुखीतेरीकरदेविकलइतनीमुहब्बतकिसीपर्वतसेकरुँवोभीअबतकजातापिघल
इसअथाहपीड़ासेऊबकरजीचाहेअबजीनाछोड़देकबतककरेंयूँहीप्रतीक्षादर्दयेकबतकऔरसहें

असग़र वजाहत का उपन्यास : गरजत बरसत (किश्त 5)

चित्र
उपन्यास गरजत बरसत----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग---- --असग़र वजाहतदूसरा खण्ड (पिछली किश्त  से आगे पढ़ें...).. दूसरा खण्ड----१५----अब्बा और अम्मां नहीं रहे। पहले खाला गुजरी उसके एक साल बाद खालू ने भी जामे अजल पिया। मतलू मंज़िल में अब कोई नहीं रहता। खाना पकाने वाली बुआ का बड़ा लड़का बाहरी कमरे में रहता है। मल्लू मंजिल का टीन का फाटक बुरी तरह जंग खा गया है। ऊपर बेगुन बेलिया की जो लता लगी थी वह अब तक हरी है। मौसम में फूलती है। मैं हर साल मल्लू मंज़िल की देखरेख पर हज़ारों रुपया खर्च करता हूं। यही वजह है कि दादा अब्बा के ज़माने की इमारत अब कि टिकी हुई है। साल दो साल कभी तीन-चार साल बाद घर जाना हो जाता है। मल्लू मंज़िल आबाद होती है। 'द नेशन` जैसे अखबार के ज्वाइंट एडीटर का उस छोटे से शहर में आना अपने आप ही खबर बन जाती है। स्थानीय अखबारों के सम्पादक, बड़े अखबारों के रिपोर्टर और कभी-कभी हमारे अखबार का लखनऊ संवाददाता आ जाते हैं। पत्रकारिता पर बेबाक बहसें होती हैं।कोई सात-आठ साले आता था तो स्टेशन पर पत्रकार माथुर मिला करते थे। वे उस ज़माने में किस अखबार में काम करते थे, मुझे याद नहीं। हो सकता …

असग़र वजाहत का उपन्यास : गरजत बरसत (किश्त 4)

चित्र
उपन्यास गरजत बरसत----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग---- --असग़र वजाहतपहला खण्ड (पिछली किश्त  से आगे पढ़ें...).. वह भी चला गया तो क्या करोगे।` नवीन ने बुरा-सा मुंह बनाया। वह जब स्कूल में था तो उसे टी.वी. हो गयी थी और एक पूरा फेफड़ा निकाल दिया गया था।'अरे यार कौन सा मैं 'इनहेल` करता हूं। तुम तो साले हर बात पर टोक देते हो।` नवीन ने कहा।रात ग्यारह बजे तक मोहन सिंह प्लेस आबाद रहा फिर मैं घर आ गया। नूर टेलीविजन पर खबरें देख रही थी और गुलशनिया किचन में खाना पका रही थी। मुझे लगा चारों तरफ अमन-चैन है। सब कुछ ठीक है। कहीं न तो कुछ कमी है और न कहीं कुछ दरकार है। पता क्यों कभी-कभी कुछ क्षण अपनी बात खुद कहलवा लेते हैं उनमें चाहे जितना सच या झूठ हो।जब से मैं कोठी में शिफ्ट हुआ हूं शकील दिल्ली में मेरे ही पास ठहरता है क्योंकि ग्राउण्ड फ्लोर पर बड़ा-सा गेस्टरूम है जो पूरी तरह ''इण्डेपेंनडेण्ट` है। आजकल शकील आया है। उसका 'मॉरल` कुछ गिरा हुआ जरूर है लेकिन फिर भी मजे में हैं। उसने पिछले एक साल में खासी कमाई कर ली है और अपने क्षेत्र में 'कोल्ड स्टोरेज` खोल लिया है। नूर उसे बहुत पसंद त…

----------

10,000+ रचनाएँ. संपूर्ण सूची देखें.

अधिक दिखाएं

ऑनलाइन हिन्दी वर्ग पहेली खेलें

---

तकनीक व हास्य -व्यंग्य का संगम – पढ़ें : छींटे और बौछारें

Google+ Followers

फ़ेसबुक में पसंद/अनुसरण करें

परिचय

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही रचनाकार से जुड़ें.

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है. अपनी रचनाएं इस पते पर ईमेल करें :

rachanakar@gmail.com

अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

डाक का पता:

रचनाकार

रवि रतलामी

101, आदित्य एवेन्यू, भास्कर कॉलोनी, एयरपोर्ट रोड, भोपाल मप्र 462030 (भारत)

कॉपीराइट@लेखकाधीन. सर्वाधिकार सुरक्षित. बिना अनुमति किसी भी सामग्री का अन्यत्र किसी भी रूप में उपयोग व पुनर्प्रकाशन वर्जित है.

उद्धरण स्वरूप संक्षेप या शुरूआती पैरा देकर मूल रचनाकार में प्रकाशित रचना का साभार लिंक दिया जा सकता है.


इस साइट का उपयोग कर आप इस साइट की गोपनीयता नीति से सहमत होते हैं.