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January 2008
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किस तरह से और कैसे-कैसे

कितना प्यार करता हूं तुझसे

काश कि कह पाता मैं ये तुझको

या काश कि जानती तू बिना कहे


कहने को तो सारी पीड़ाएं

यूं तुझसे हम कह जाते

इस पागलपन का हाल सारा

और दीवानगी की सारी बातें


कहते-कहते लेकिन रुक जाऊं

मन ये जाने क्या-क्या सोचे

स्वीकार नहीं है इस दिल को

कि मैं कहूं और तु परेशान रहे


तू तो पूरी जिन्दगी है मेरी

नहीं महज एक हिस्सा है

जान पाये तू कभी जो

वो मेरे रोने का किस्सा है


सुनते वो हांजो तेरी तो

शायद अभी हम कुछ और होते

फ़र्क तुझे क्या पड़ता है लेकिन

आंसू ये बहते हैं तो बहे


रुला-रुला जाये उदासीनता तेरी

बेरुखी तेरी कर दे विकल

इतनी मुहब्बत किसी पर्वत से करुँ

वो भी अब तक जाता पिघल


इस अथाह पीड़ा से ऊब कर

जी चाहे अब जीना छोड़ दे

कब तक करें यूँ ही प्रतीक्षा

दर्द ये कब तक और सहें

उपन्यास

 

गरजत बरसत

----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग---- -

-असग़र वजाहत

दूसरा खण्ड

(पिछली किश्त  से आगे पढ़ें...)

 

..

दूसरा खण्ड

----१५----

अब्बा और अम्मां नहीं रहे। पहले खाला गुजरी उसके एक साल बाद खालू ने भी जामे अजल पिया। मतलू मंज़िल में अब कोई नहीं रहता। खाना पकाने वाली बुआ का बड़ा लड़का बाहरी कमरे में रहता है। मल्लू मंजिल का टीन का फाटक बुरी तरह जंग खा गया है। ऊपर बेगुन बेलिया की जो लता लगी थी वह अब तक हरी है। मौसम में फूलती है। मैं हर साल मल्लू मंज़िल की देखरेख पर हज़ारों रुपया खर्च करता हूं। यही वजह है कि दादा अब्बा के ज़माने की इमारत अब कि टिकी हुई है। साल दो साल कभी तीन-चार साल बाद घर जाना हो जाता है। मल्लू मंज़िल आबाद होती है। 'द नेशन` जैसे अखबार के ज्वाइंट एडीटर का उस छोटे से शहर में आना अपने आप ही खबर बन जाती है। स्थानीय अखबारों के सम्पादक, बड़े अखबारों के रिपोर्टर और कभी-कभी हमारे अखबार का लखनऊ संवाददाता आ जाते हैं। पत्रकारिता पर बेबाक बहसें होती हैं।

कोई सात-आठ साले आता था तो स्टेशन पर पत्रकार माथुर मिला करते थे। वे उस ज़माने में किस अखबार में काम करते थे, मुझे याद नहीं। हो सकता है या शायद ऐसा था कि किसी अखबार से उनका कोई संबंध न हो और पत्रकार हो गये हों। बहरहाल माथुर मुझे स्टेशन पर रिसीव करते थे। चाय पिलाते थे। उस दौरान आसपास से गुजरने वाले किसी सिपाही को बड़े अधिकार के साथ आवाज़ देकर बुलाते थे और कहते थे, सुनो जी दरोगा जी से कह देता दिल्ली 'द नेशन` के ज्वाइंट एडीटर साहब आ गये हैं। इंतिज़ाम कर लें और सुनो सामने पान वाले की दुकान से दो पैकेट विल्स फिल्टर और चार जोड़े एक सौ बीस के

बनवा लेना।

ज़ाहिर है सिपाही पान वाले को पैसे तो न देता होगा। वह दरोगा जी का नाम लेता होगा जैसे माथुर जी मेरा हवाला देते हैं। उन दिनों माथुर जी की ये सब चालाकियां मैं टाल दिया करता था यह सिर्फ अनुभव प्राप्त करने के लिए कुछ नहीं कहता था। कुछ अंदाज़ा था कि मेरे एक बार आने से माथुर के दो चार महीने ठीक गुज़र जाते होंगे।

मुझसे मिलने शहर के अदीब-शायर आ जाते हैं कभी-कभी कुछ पुराने लोग और कभी अब्बा के जानने वाले भी आते हैं। मेरे ज़माने के पार्टी वाले लोगों में करीब-करीब सब हैं। मिश्रा जी काफी लटक गये हैं। मेरे ख्याल से सत्तर से ऊपर है पर अभी भी पार्टी के जिला सैक्रेट्ररी है। कामरेड बली सिंह पूरी तरह मछली के व्यापार में लग गये हैं।

पिछले सालों जब मैं गया तो मिलने वालों में युवा लड़कों का एक गुट जुड़ गया है जो शहर में शैक्षणिक गतिविधियां करते रहते हैं। कस्बों से शहर आये लोग भी बढ़ गये हैं और उनमें से कुछ आ जाते हैं। मल्लू मंज़िल कुछ दिन के लिए गुलज़ार हो जाती है।

शहर की हालत वही है। उतना ही गंदा, उतना ही उपेक्षित, उतना ही भ्रष्टाचार, उतना ही उत्पीड़न और वही अदालतें जहां मजिस्ट्रेट महीनों नहीं बैठते, अस्पताल जहां डॉक्टर नहीं बैठते, सरकारी दफ्तर जहां बाबू नहीं बैठते।

नूर और उसके अब्बा, अम्मां की यही राय थी कि बच्चा लंदन के हैवेट अस्पताल में पैदा होना चाहिए। मैं जानता था कि मामला दिल्ली के किसी अस्पताल में कुछ गड़बड़ हो गया तो बात मेरे ऊपर आ जायेगी। मैंने नूर को लंदन भेज दिया था। वहां उसने हीरा को जन्म दिया था। हीरा का नाम उसके दादा ने रखा था। जाहिर है हीरे जवाहेरात का व्यापारी और क्या नाम रख सकता था। नाम मुझे इसलिए पसंद आया कि हिंदू मुसलमान नामों के खाँचे से बाहर का नाम है। बहरहाल हीरा के पैदा होने के बाद कुछ महीने नूर वहीं रही। फिर दिल्ली आ गयी। उस जमाने में मल्लू मंजिल आबाद थी। मैं नूर और हीरा को लेकर घर गया था। अब्बा को हीरा का नाम कुछ पसंद नहीं आया था। उन्होंने कुरान से उसका नाम

सज्जाद निकाला था और अम्मां अब्बा जब तक जिंदा रहे हीरा को सज्जाद के नाम से पुकारते थे।

गर्मियां शुरू होने से पहले नूर हीरा को लेकर लंदन चली जाती थी। मिर्जा साहब ने अपने नवासे के लिए लंदन से बाहर एसेक्स काउण्टी के एक गांव में किसी लार्ड का महल खरीद लिया था। इस महल का नाम उन्होंने 'हीरा पैलेस` रखा था। ये सब लोग गर्मियों में 'हीरा पैलेस` चले जाते थे। मैं भी एक आद हफ्ते के लिए वहां जाया करता था। हीरा पैलेस बीस एकड़ के कम्पाउण्ड में एक दो सौ साल पुराना महल है जिसमें चार बड़े हॉल, एक बड़ा डाइनिंग हाल, बिलियर्ड रूम, स्मोकिंग रूम, काफी लाउंज, पिक्चर गैलरी और बीस बेडरूम हैं। मुझे यहां ठहरना अटपटा लगता था। क्योंकि हमेशा ये एहसास होता रहता था कि किसी म्यूजियम में रह रहे हैं। मिर्जा साहब को यह पैलेस इस शर्त पर बेचा गया था कि वहां रखी कोई चीज़ हटायेंगे नहीं और उसमें कोई बड़ा परिवर्तन नहीं करा सकते। इसलिए वहां के बाथरूमों में रखे टोंटी वाले लोटों के अलावा कुछ ऐसा नहीं था जिसका मिर्जा साहब से कोई ताल्लुक हो।

पैलेस की 'विजिटर्स बुक` भी उतनी ही पुरानी थी जितना पुराना पैलेस था। मोटे चमड़े की लाल जिल्द चढ़ी इस किताब में ब्रिटेन के तीन प्रधानमंत्रियों के अलावा बर्टेंड रसेल के भी हस्ताक्षर और रिमार्क्स लिखे थे। इस किताब में जब मुझसे कुछ लिखने और दस्तख़त करने को कहा गया तो मुझे बड़ा मज़ा आया। लगा कि मेरे हस्ताक्षर इस रजिस्टर का मज़ाक उड़ा देंगे।

बुढ़ापे में मिर्जा इस्माइल लार्ड का खिताब हासिल करना चाहते थे और उसके लिए ज़रूरी था कि वो प्रभावशाली अंग्रेजों को एक शानदार महल में बुलाकर इंटरटेन करें। ऐसा करने के लिए ही उन्होंने यह पैलेस खरीदा था। एसेक्स काउण्टी के शेरे गांव के बाहर एक पहाड़ चोटी पर बना यह महल काफी दूर से जंगल में खिले फूल-सा लगता था।

एक बार गर्मियों में नूर ने हीरा का नाम लंदन के किसी मशहूर किण्डरगार्डेन स्कूल में लिखा दिया। मैं समझ गया कि अब वे दोनों वापस नहीं आयेंगे। लेकिन इससे बड़ी चिंता यह थी कि मैं हीरा को कुछ

नहीं सिखा पाऊंगा। मैं यह चाहता था कि वह अवधी लोक गीतों पर सिर धुन सके जैसा मैं करता हूं। वह 'मीर` और 'गा़लिब` की शायरी से ज़िंदगी का मतलब समझे। लेकिन अब वह सब ख्व़ाब हो गया था। लेकिन मैं नूर के ख्वाब को चूर-चूर नहीं करना चाहता था। लेकिन पता नहीं कैसे नूर ये समझ गयी थी। वह हीरा को हिंदी पढ़ाती थी। पूरा घर उससे हिंदुस्तानी में बातचीत करता था। नूर और हीरा जाड़ों में पन्द्रह दिन के लिए दिल्ली आते थे और मैं उन दिनों छुट्टी ले लेता था। हम खूब घूमते थे और मैं हीरा के साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुज़ारता था। स्कूल पूरा करने के बाद हीरा अब बी.ए. कर रहा है। उसे समाजशास्त्र में बेहद दिलचस्पी है और इस बारे में हमारी लंबी बातचीत होती रहती है।

नूर के लंदन चले जाने के बाद मैं सुप्रिया के नजदीक आता गया। बंगाली और उड़िया मां-बाप की बेटी सुप्रिया के चेहरे की सुंदरता में दुख की कितनी बड़ी भूमिका है यह किसी से छिपा नहीं रह सकता। उसकी बड़ी-बड़ी ठहरी हुई आंखों से अगर उदासी का भाव गायब हो जाये तो शायद उनकी सुंदरता आधी रह जायेगी। उसमें हाव-भाव में दुख की छाया में तपे हुए लगते हैं। सुप्रिया के दोनों भाई कभी नहीं मिले और यह मान लिया गया कि पुलिस ने जिस बर्बरता से नक्सलवादी आंदोलन को कुचला था, वे उसी में मारे गये हैं। उनका कहीं कोई रिकार्ड न था। कहीं किसी आसतीन पर खून का निशान न था लेकिन दो जवान और समझदार लड़के मारे जा चुके थे।

सुप्रिया की मां उसके साथ रहती है। पिताजी कलकत्ता में ही हैं। उसकी मां को शायद मेरे और सुप्रिया के संबंधों के बारे में पता है लेकिन वह कुछ नहीं बोलती। दरअसल पूरे जीवन का संघर्ष और दो बेटों के दु:ख ने उसे यह मानने पर मजबूर कर दिया है कि कहीं से सुख की अगर कोई परछाई भी आती हो तो उसे सहेज लो. . .पता नहीं कल क्या हो। सुप्रिया और मेरे संबंध गहरे होते चले गये। मैंने सोचा नूर को बता दूं. . .फिर सोचा नूर को पता होगा। वह जानती होगी मैं और नूर साल में दो बार मिलते हैं और उसके बाद साल के दस महीने हम अलग रहते हैं तो जाहिर है. . .

सुप्रिया का संबंध चूंकि राजनैतिक परिवार से है इसलिए उससे मैं कुछ ऐसी बातें भी कर सकता हूं जो नूर से नहीं हो सकती। 'द नेशन` में जब मेरे 'पर कतरे` जाते हैं तो सुप्रिया के संग ही शांति मिलती है। मेरे अंदर उठने वाले तूफ़ानों को दुख से भरा-पूरा उसका व्यक्तित्व शांत कर देता है।

मेरे दो बहुत प्राचीन मित्रों अहमद और शकील के मुकाबले के वे अच्छी तरह समझती है कि मेरे सपने किस तरह छोटे होते जा रहे हैं ओर सपनों का लगातार छोटे होता जाना कैसे मेरे अंदर विराट खालीपन पैदा कर रहा है जो ऊलजलूल हरकतें करने से भी नहीं मरता।

कभी-कभी अपने अर्थहीन होने का दौरा पड़ जाता है। लगता है मेरा होने या न होने का कोई मतलब नहीं है। मैं पूरी तरह 'मीनिंगलेस` हूं। मेरे बस का कुछ नहीं है। मैं पचास साल का हो गया हूं लेकिन कुछ न कर सका और जब जिंदगी कितनी बची है। मेरा 'बेस्ट` जा चुका है। कहां गया, क्या किया, इसका कोई हिसाब नहीं है।

मैं ऑफिस से चुपचाप निकला था। लिफ्ट न लेकर पीछे वाली सीढ़ियाँ ली थीं और इमारत के बाहर निकल आया था। ऐसे मौकों पर मैं सोचता हूं काश मेरा चेहरा बदल जाये और कोई मुझे पहचान सके कि मैं कौन हूं। मैं भी अपने को न पहचान सकूँ और एक 'नॉन एनटिटी` की तरह अपने को आदमियों के समुद्र में डुबो दूं।

पीछे से घूमकर मुख्य सड़क पर आ गया और स्कूटर रिक्शा पकड़कर जामा मस्जिद के इलाके पहुंच गया। भीड़-भाड़, गंदगी, जहालत, गरीबी, अराजकता, अव्यवस्था की यहां कोई सीमा नहीं है। यहां अपने आपको खो देना जितना सहज है उतना शायद और कहीं नहीं हो सकता। पेड़ की छाया में रिक्शेवाले अपने रिक्शों की सीटों पर इस तरह आराम करते हैं जैसे आरामदेह बेडरूम में लेटे हों। आवाजें, शोर, गालियां, धक्का, मछली बाजार, मुर्गा बाजार, उर्दू बाजार, आदमी बाजार और हर गली का अपना नाम लेकिन कोई पहचान नहीं। मैं बेमकसद तंग गलियों में घूमता रहा। जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठा रहा। नीचे उतरकर ये जानते हुए सीख के कबाब खा लिए कि पेट खराब हो जायेगा

और सुप्रिया को अच्छा नहीं लगेगा। रिक्शा लिया और बल्ली मारान आ गया। गली कासिमजान से निकला तो हौजकाज़ी पहुंच गया बेमकसद।

रात ग्यारह बजे स्कूटर रिक्शा करके मैं ऑफिस के इमारत के सामने अपनी ऑफीशियल गाड़ी के सामने उतरा। मैं बीड़ी पी रहा था। मुझे यकीन था कि ऑफिस के ड्राइवर और मेरा ड्राइवर रतन मुझे देख लेंगे। पागल समझेंगे। ठीक है, मुझे पागल की समझना चाहिए।

रतन ने मुझे देखा। मैं बीड़ी पीता हुआ उसकी तरफ बढ़ा। “सर, आप चलेंगे”, उसने पूछा।

“हां चलो”, मैं गाड़ी में बैठ गया।

ये ऑफिस वाले मुझे अधपागल, सिड़ी सनकी, दीवाना, मजनूं समझते हैं। ये अच्छा है।

एक दिन एडीटर-इन-चीफ से किसी बात पर कहा-सुनी हो गयी। मुझे गुस्सा आ गया। मैं वापस आया और अपने चैम्बर के बाहर पड़े चपरासी के मोढ़े पर बैठ गया। सब जमा हो गये। कुछ मुस्कुरा रहे थे। कुछ मुझे अफसोस से देख रहे थे। चपरासी परेशान खड़ा था। जब काफी लोग आ गये तो मैंने कहा, “मैं यहां इसलिए बैठा हूं कि इस अख़बार में मेरी वही हैसियत है जो मुरारीलाल की है जो इस मोढ़े पर बैठता है।”

यार लोगों ने ये बात भी एडीटर साहब को नमक-मिर्च लगाकर बता दी।

गुस्से में आकर एडीटर-एन-चीफ ने मेरा ट्रांसफर मीडिया ट्रेनिंग सेण्टर में कर दिया था। ऑफिस आर्डर निकल आया था। मैंने ये आर्डर लेने से इंकार कर दिया था। मेरा कहना था कि मैं पत्रकार हूं और मुझसे पत्रकारिता पढ़ने या अखबार का ट्रेनिंग सेण्टर संचालित करने का काम नहीं लिया जा सकता। मैनेजमेंट कहता था, नहीं, ऐसा हो सकता है। मैंने तीन महीने की छुट्टी ले ली थी और सुप्रिया के साथ पश्चिम बंगाल घूमने चला गया था। हम दोनों ने बहुत विस्तार और शांति से बंगाल का एक-एक जिला देखा था। तस्वीरें खींची थी। मैं खुश था कि चलो इस बहाने कुछ तो हुआ।

शकील उन दिनों उपविदेश राज्यमंत्री था। मेरे मना करने के बावजूद वह 'द नेशन` के मालिक सीताराम बड़जातिया से मिला था और मामले को रफ़ा-दफ़ा करा दिया था। मैंने तो ये सोच लिया था कि 'द नेशन` को गुडबॉय कहा जा सकता है क्योंकि वैसे भी मैं वहां तकरीबन कुछ नहीं करता हूं। कभी साल छ: महीने में कुछ लिख कर देता हूं तो एडीटर छापता नहीं क्योंकि वह अखबार की पॉलिसी के खिलाफ होता है।

----१६----

रात के दो बजे फोन की घण्टी घनघना उठी। पता नहीं क्या हो गया है। सुप्रिया भी जाग गयी। मैंने फोन उठा लिया, दूसरी तरफ चीफ रिपोर्टर खरे था, “सर! मंत्री पुत्रों द्वारा फुटपाथ पर सोये लोगों को कुचल दिए जाने की एक और न्यूज़ है। मैं दरियागंज थाने से बोल रहा हूं।”

किस मंत्री का लड़का है?”

“सर, शकील अहमद अंसारी के लड़के कमाल अहमद अंसारी।”

“ओहो. . .” मैं और कुछ न बोल सका।

“सर. . .ऑफिस में अमिताभ है. . .उससे कह दीजिए सर पेज वन पर दो कॉलम की खबर है. . .हमारे पास पूरी डिटेल्स. . .”

“हां मैं फोन करता हूं।” मैंने कहा।

इससे पहले के मैं ऑफिस फोन करके नाइट शिफ्ट में काम करने वाले अमिताभ को निर्देश देता, शकील का फोन आ गया।

“तुम्हें न्यूज़ मिल गयी।” वह बोला।

“हां, अभी-अभी पता चला. . .कमाल कैसा है?”

“वह तो ठीक है. . .हां उसके साथ जो लड़के थे उनमें से एक लड़के को लोगों ने काफी पीट दिया है. . .वह अस्पताल में है।”

किसका लड़का है।”

“बी.एस.एफ. के डायरेक्टर जनरल का बेटा है रवि।”

“दूसरे और कौन थे?”

“हरियाणा के सी.एम. का लड़का था. . .”

“और?” मैंने पूछा।

“ये सब छाप देना।” वह बोला।

“हमारा चीफ रिपोर्टर थाने में है. . .उससे अभी मेरी बात हुई . . .पहले पेज पर दो कालम में खबर जा रही है।”

“यार हम तीस साल से दोस्त है।” वह बोला।

“दोस्ती से कौन इंकार करता है।”

“साजिद ये लोकल खबर है. . .तीसरे पेज पर जहां दिल्ली की खबरें लगती हैं, वहां लगा दो।”

“देखो ये लोकल ही खबर होती. . .इसमें अगर यूनियन पावर एण्ड इनर्जी मिनिस्टर शकील अहमद अंसारी का लड़का न इनवाल्व होता।”

“साजिद ये तुम क्या कह रहे हो. . .यानी मुझे बदनाम. . .”

“प्लीज शकील. . .आई एम सॉरी।”

उसने फोन काट दिया। मैंने ड्यूटी पर बैठे अमिताभ को इंस्ट्रक्शन दिए। सुप्रिया ने चाय बना डाली थी। वह जानती थी कि अब चार बजे के बाद फिर सोना कुछ मुश्किल होगा।

“मैं कमाल को बचपन से जानता हूं. . .तुम्हें पता है मैं शकील और अहमद यूनीवर्सिटी के दिनों के दोस्त हैं. . .शायद मेरे ही कहने पर शकील ने कमाल का एडमीशन दिल्ली पब्लिक स्कूल में कराया था। लेकिन शकील के पास टाइम नहीं है. . .तुम्हें पता कमाल के लिए यू.एस. से एक स्पोर्ट मोटर साइकिल इम्पोर्ट करायी थी शकील ने?”

“ओ हो. . .”

“हां, मेरे ख्याल से पांच हज़ार डालर. . .के करीब. . .”

“माई गॉड।”

“कमाल ने आज जो एक्सीडेंट किया है वह पहला नहीं है. . इससे पहले अपने बाप के चुनाव क्षेत्र में यह सब कर चुका है।”

“एण्ड ही वाज़ नॉट कॉट?”

“वो हम सब जानते हैं।”

“कानून, न्याय, प्रशासन, अदालतें, गवाह, वकील सब पैसे के यार हैं . . .अगर देने के लिए करोड़ों हैं तो कोई कुछ भी कर सकता

है. . .हमने इसी तरह समाज बनाया है. . . हमारे सारे आदर्श इस सच्चाई में दब गये हैं।”

“लेकिन शकील कैन टेल. . .”

“शकील क्या कहेगा? तुम्हें पता है पच्चीस साल की उम्र में ही कमाल शकील की सबसे बड़ी पॉलिटिकल स्पोर्ट है. . .उसके चुनाव की बागडोर वही संभालता है और बड़ी खूबी से 'आरगनाइज़` करता है क्योंकि यह सब बचपन से देख रहा है. . .अपने क्षेत्र से शकील ग़ाफ़िल रहकर दिल्ली की उठापठक में आराम से लगा रहता है और कमाल क्षेत्र संभाले रहता है. . .आजकल चुनाव क्षेत्र जागीरें हैं. . .बाप के बाद बेटे के हिस्से में आती है।”

“कमाल ने पढ़ाई कहां तक की है?”

“मेरे ख्याल से बी.ए. नहीं कर पाया है या 'क्रासपाण्डेन्स` से कर डाला है। बहरहाल, पढ़ाई में वह कभी अच्छा नहीं रहा लेकिन व्यवहारिक बुद्धि ग़ज़ब की है, जन सम्पर्क बहुत अच्छे हैं. . .मतलब वह सब कुछ है जो एक राजनेता में होना चाहिए।”

“वैसे क्या करता है?”

“शकील की कंस्ट्रक्शन कंपनी और 'रियल स्टेट डिवल्पमेंट कंपनी का काम देखता है. . .अभी इन लोगों ने वेस्टर्न यू.पी. के कुछ शहरों में कोई सौ करोड़ की ज़मीन खरीदी है. . दस कालोनियां डिवलप करने जा रहे हैं।”

“ओ माई गॉड इतना पैसा।”

“मैं उसका दोस्त हूं. . .मुझे पता है. . .दौ सौ करोड़ के उसके स्विस एकाउण्ट्स हैं।”

“हजार करोड़।”

“हां. . .”

छोटी उम्र में ही उसका कमाल का चेहरा पक्का हो गया है। उस का कद पांच दस होगा। काठी अच्छी है। कसरती बदन है। देखने से ही सख्त जान लगता है। हाथ मज़बूत और पंजा चौड़ा है। आधी बांह की कमीज़ पहनता है तो बांहों की मछलियाँ फड़कती दिखाई देती रहती है।

रंग गहरा सांवला है। आंखें छोटी हैं पर उनमें ग़जब की सफ़्फ़ाकी दिखाई देती है। लगता है वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ भी कर सकता है। उसमें दया, सहानुभूति, हमदर्दी जैसा कुछ नहीं है। वह जब सीधा किसी की आंखों में देखता है तो लगता है आंखें भेदती चली जा रही हों। एक कठोर भाव है जो अनुशासन प्रियता से जाकर मिल जाता है लेकिन अपनी जैसी करने और अपनी बात मनवा लेने की साध भी आंखों में दिखाई पड़ती है। नाक खड़ी और होंठ पतले हैं। गाल के ऊपर उभरी हुई हडि्डयां हैं जो बताती हैं कि वह इरादे का पक्का और अटल है। जो तय कर लेता है वह किए बिना नहीं मानता।। कमाल की गर्दन मोटी और मजबूत है जो सिर और शरीर के बीच एक मजबूत पुल जैसी लगती है। उसके चेहरे पर धैर्य और सहनशीलता का भाव भी है। पतले और तीखे होंठ उसके व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं की तरफ इशारा करते हैं। आंखें शराब पीने की वजह से थोड़ी फूल गयी हैं। लेकिन उनका बुनियादी भाव निर्ममता बना हुआ है। 'द नेशन` के प्रादेशिक क्रासपाण्डेंट बताते रहते हैं कि कमाल का आतंक एक जिले तक सीमित नहीं है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आठ-दस जिले और यहां तक कि लखनऊ तक कमाल का नाम चलता है। वह इतना शातिर है कि अपनी अच्छी पब्लिक इमेज बनाये रखता है। कभी बाढ़ आ जाये, शीत लहर चल जाये, गरीब की लड़की की शादी हो, बेसहारा को सताया जा रहा हो, कमाल वहां मौजूद पाया जाता है।

“सुनो, क्या हमारे नेता ऐसे ही होते रहेंगे?” सुप्रिया ने पूछा।

“ये राष्ट्रीय नेताओं की तीसरी पीढ़ी है। पब्लिक स्कूलों में पढ़ी लिखी या अध पढ़ी, अंग्रेजी बोलने वाली और हिंदी में अंग्रेज़ी बोलने वाली इस पीढ़ी का सिद्धांत, विचार, मर्यादा, परम्परा से कोई लेना-देना नहीं है. . .ये सिर्फ सत्ता चाहते हैं. . .पावर चाहते हैं ताकि उसका अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करें. . .ये चतुर चालाक लोग जानते हैं कि उनके पूर्वजों ने यानी पिछली पीढ़ी के नेताओं ने जनता को जाहिल रखा है. . .जानबूझ कर जाहिल रखा है ताकि बिना समझे वोट देती रहे।

“जाहिल कैसे रखा है?”

“इस देश को जितने बड़े पैमाने पर शिक्षित किया जाना था वह नहीं किया गया। साहबों और चपरासियों के अलग-अलग स्कूल अब तक चले रहे हैं. . .अब ये सरकार देशवासियों को शिक्षित करना अपनी जिम्मेदारी भी नहीं मान रही है. . .थक गये यार. . .गुलशन से कहो ज़रा चाय और बनाए।”

सुप्रिया लौटकर आयी तो उसके हाथ में अखबारों का पूरा बण्डल था। मैंने सबसे पहले 'द नेशन` खोला पहले पन्ने पर कमाल वाले 'एक्सीडेंट की खबर नहीं थी। ऐसा लगा जैसे मुझे किसी ने ऊपर से लेकर नीचे तक जलाकर राख कर दिया हो। सुप्रिया ने मुझे देखा। अखबार देखा और समझ गयी कि बात क्या है।

इससे पहले कि मैं न्यूज़ एडीटर को फोन करता। शकील का फोन आ गया। वह बोला, 'माफी मांगने के लिए फोन कर रहा हूं।`

किस बात के लिए माफी मांग रहे हो? मुझे ज़लील करके माफी चाहते हो।”

“नहीं. . .फिर तुम गलत समझे. . .”

“तो बताओ सही क्या है? क्या ये सच नहीं कि एक मंत्री होने के नाते तुमने मेरे अखबार पर दबाव डालकर वह खबर उस तरह नहीं छपने दी जैसे छपना चाहिए थी. . .और ऐसा करके तुमने ये साबित किया कि अखबार में मेरी कोई हैसियत नहीं है. . .मैं कुत्ते की तरह जो चाहे भौंकता. . .”

वह बात काटकर बोला, “तुम बहुत गुस्से में हो. . .मैं शाम को फोन करूंगा।”

“नहीं तुम शाम को भी फोन न करना।” मैंने गुस्से में कहा और फोन बंद कर दिया।

खबर न सिर्फ तीसरे पेज पर एक कॉलम में छपी थी बल्कि एक्सीडेंट की वजह टायर पंचर हो जाना बताया गया था। इस तरह कमाल को साफ बचा लिया गया था। यह भी लिखा था कि उस वक्त गाड़ी कमाल नहीं चला रहा था बल्कि ड्राइवर चला रहा था। ड्राइवर को पुलिस ने गिरफ्तार करके हवालात में डाल दिया था। उसकी जमानत करा लेना

शकील के लिए बायें हाथ का काम था।

“ऐसे समाज में इंसाफ हो ही नहीं सकता जहां एक तरफ बेहद पैसे वाले हों और दूसरी तरफ बेहद गरीब।” मैंने सुप्रिया से कहा। वह दूसरे अखबार देख रही थी। सभी अखबारों में खबर इस तरह छपी थी कि कमाल साफ बच गया था।

“अब देखे इस केस में क्या होगा? शकील मरने वालों के परिवार वालों को इतना पैसा दे देगा जितना उन्होंने कभी सोचा न होगा, गवाहों को इतना खिला दिया जायेगा कि उतनी सात पीढ़ियां तर जायेंगी . . .पुलिस को तुम जानती ही हो. . .न्यायालय मजबूर है. . .गवाह सबूत के बिना अपंग है. . .और अगर न भी होता तो शकील के पास महामहिमों का भी इलाज है. . .अब बताओ, किसका मज़ाक उड़ाया रहा है. . .मैं तो पूरे मामले में एक बहुत छोटी-सी कड़ी हूं।”

दफ्तर जाने का मूड नहीं था लेकिन सुप्रिया का जाना जरूरी था। उसकी वीकली मैगज़ीन का मैटर आज फाइनल होकर प्रेस में जाना था। उसके जाने के बाद मैं अखबार लेकर बैठा ही था कि गुलशन ने आकर बताया, मुख्तार आये हैं, मुख्तार का नाम सुनते ही सब कुछ एक सेकेण्ड में अंदर दिमाग में चमक गया।

खेती बाड़ी और राजनीति छोड़कर दिल्ली चले आने से एक-दो साल बाद एक दिन मुख्त़ार ऑफिस आ गया था। मुझे लगा था कि वह शायद पिए हुए था। मैं उसे लेकर कैंटीन आ गया था।

“आप चले आये तो हम भी चले आये।” वह बोला, मैं कुछ समझ नहीं पाया और उसकी तरफ देखने लगा।

“आपने वतन छोड़ दिया. . .दिल्ली आ गये. . .हम भी दिल्ली आ गये. . .”

“क्या कर रहे हो?”

“फतेहपुरी मस्जिद के पास एक सिलाई की दुकान में काम मिल गया है।”

“और वहां क्या हाल है?”

“ठीक ही है।” वह खामोश हो गया था।

“मिश्रा जी कैसे हैं?”

“उनसे मिलना नहीं होता. . .” मुझे आश्चर्य हुआ। वह बोला, “अब आपसे क्या छिपाना मिश्रा जी के साथ हम लोगों की निभी नहीं। आपके आने के बाद. . .उमाशंकर, हैदर हथियार, कलूट, शमीम सब अलग होते गये. . .रिक्शा यूनियन टूट गयी. . .सिलाई मज़दूर यूनियन भी खतम ही समझो. . .बीड़ी मज़दूर. . .” वह बोलता रहा और मैं अपराध भाव की गिरफ्त में आता चला गया था। मेरे दिल्ली आने के तीन साल के अंदर यूनियनें टूट गयीं, जिला पार्टी में झगड़े शुरू हो गये, जो लोग पार्टी के करीब आये थे, सब दूर चले गये। जिला पाटी सचिव मिश्रा जी का वही हाल हो गया जो पहले था। लाल चौक का नाम फिर बदल कर लाला बाज़ार हो गया. . .इतने लोगों, रिक्शे वालों, बीड़ी मज़दूरों, सिलाई करने वालों के दिल में एक आशा की किरन जगाकर उन्हें अधर में छोड़ देना विश्वासघात ही माना जायेगा। अपने कैरियर और पैसे के लिए मैं उन सबको उनके हाल पर छोड़ कर यहां आ गया. . .मिश्रा जी ने ठीक ही कहा था, “कामरेड हमें पता था, आप यहां रुकोगे नहीं।” इतना तय है कि मैं वहां रुकता तो यह न होता जो हो गया है और इसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर आती है। मैं पता नहीं कैसे अपने आपको प्रतिबद्ध और ईमानदार मानता हूं। मैं तो दरअसल अवसरवादी हूं। अगर मेरे अंदर हिम्मत नहीं थी तो मुझे वह सब शुरू ही नहीं करना चाहिए था।

एक बार दिल्ली आने के बाद मुख्त़ार वापस नहीं गया। शायद वह इतना हयादार है कि अपना चेहरा उन लोगों को नहीं दिखाना चाहता जिनके साथ उसने मेरी वजह से विश्वासघात किया है। वह दिल्ली में ही रहने लगा। रोज़ जितना पैसा कमाता था उससे शाम को एक 'अद्धा पाउच` खरीदता था। गटगट करके. . .पुराने स्टाइल में अद्धा पेट में उतारकर नमक चाटता था और थोड़ी गप्प-शप्प मारकर दुकान में ही सो जाता था। वह कभी-कभी साल छ: महीने में मुझसे मिलने चला आता था। मुझे यह एहसास हो रहा था कि वह 'एल्कोहलिक` होता जा रहा है यानी रात-दिन नशे में डूबा नज़र आता था। मैं सोचता क्या उसकी बर्बादी का जिम्मेदार मैं ही हूं? पता नहीं यह कितना सच है लेकिन इतना तो

है कि अगर वह दिल्ली न आता। इस तरह न उखड़ता तो शायद बर्बाद न होता।

आज भी वह नशे में हैं। उसका दुबला-पतला जिस्म देशी ठर्रे की ताब नहीं ला पाया है और जर्जर हो चुका है। ओवर साइज़ कमीज में वह अजीब-सा लग रहा है। बाल तेज़ी से सफेद हो गये हैं और चेहरे पर लकीरें पड़ने लगी हैं।

“चाय पियोगे?” मैंने उससे पूछा।

“चाय?” वह बेशर्मी वाली हंसने लगा। लेकिन सिर नहीं उठाया।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“अब. . .आप जानते हो।”

“तो क्या पियोगे।”

“अरे बस. . .आपको थोड़ी तकलीफ देनी है. . .”

मैं समझ गया। उसका ये रटा हुआ जुमला मुझे याद हो चुका है। इससे पहले कि वह वाक्य पूरा करता मैंने जेब में हाथ डाला पर्स निकालना और दो सौ रुपये उसकी तरफ बढ़ा दिए।

उसने पैसे मुट्ठी में दबाये और तेज़ी से उठकर बाहर निकल गया। वह उसे जाते देखता रहा। फाटक पर उसने गुलशन से कोई बात की और बाहर निकल गया। मैं सोचता रहा कि देखें ये क्या हो गया। मुख्त़ार बहुत अच्छा संगठनकर्ता रहा है। वह वक्ता भी अच्छा था। अपने समाज के लोगों को 'कन्विन्स` करने के लिए उसके पास मौलिक तर्क हुआ करते थे। अगर राजनीति में रहता. . .या ये कहें कि अगर मैं राजनीति में रहता . . .अपने जिले में. . .अपने घर में. . .अपने गांव में रहता तो वह भी . . .लेकिन कोई गारंटी तो नहीं है। गारंटी तो वैसे किसी चीज़ की भी नहीं है यही तो जिंद़गी की लीला है।

----१७----

काफी हाउस क्यों उजड़ा? ये कुछ उस तरह की पहेली बन गयी है। जैसे 'राजा क्यों न नहाया, धोबन क्यों पिटी?` पहेली का उत्तर है। धोती न थी। मतलब राजा इसलिए नहीं नहाया कि नहाने के बाद पहनने के लिए दूसरी धोती न थी और धोबन इसलिए पिटी कि धोती न थी, यानी कपड़े न धोती थी। तो 'काफी हाउस क्यों उजड़ा?` पहेली का उत्तर हो सकता है। 'स` न था। 'स` से समय, 'स` से समझदारी, 'स` से सहयोग, 'स` से सगे, 'स` से सत्ता, 'स` से सोना. . .साहित्य. . .

काफी हाउस उजड़ा इसलिए कि वहां बसने वाले परिन्दों ने नये घोंसले बना लिये। मेरी और यार दोस्तों की शादियां हो गयीं। बच्चे हो गये। सास-ससुर और साले सालियों की सेवा टहल और पत्नी की फरमाइशों के लिए वक्त कहां से निकलता? और फिर कनाट प्लेस और काफी हाउस के नज़दीक कोई कहां रह सकता है? इसलिए पटक दिए गये काफी हाउस से दस-दस बीस-बीस मील दूर इलाकों में, वहां से कौन रोज़ रोज़ आता?

कुछ लोग हम लोगों के बारे में कहते हैं जब तक ये लोग संघर्ष कर रहे थे काफी हाउस आते थे। अब स्थापित हो गये हैं। सोशल सर्किल बड़ा हो गया है। जोड़-तोड़, लेन-देन के रिश्ते बन गये हैं। जिनमें काफी हाउस के लिए कोई जगह नहीं है। पता नहीं ये कितना सच है लेकिन कुछ न कुछ सच में इसमें हो सकता है।

पिछले डेढ़ दशक में पन्द्रह बहारें आयीं हैं और पतझड़ गुज़रे हैं। जेल से निकलने के बाद सरयू डोभाल का कविता संग्रह 'जेल की रोटी` छपा था और उसकी गिनती हिंदी के श्रेष्ठ कवियों में होने लगी थी।

उसके बाद 'पहाड़ के पीछे` और 'आवाज का बाना` उसके दो संग्रह आ चुके हैं। वह 'दैनिक प्रभात` का साहित्य संपादक है और हिंदी ही नहीं भारत की अन्य भाषाओं के प्रतिष्ठित साहित्यकारों में उसका अमल-दखल है। उसकी शादी इलाहाबाद में हुई है। पत्नी एन.डी.एम.सी. के किसी स्कूल में पढ़ाती है। एक लड़का है जो बी.ए. कर रहा है। इसमें शक नहीं कि अब सरयू के पास काफी हाउस में दो-दो तीन-तीन घण्टे गप्प मारने का वक्त नहीं है। उसे अपने दफ्तर में ही आठ-साढ़े आठ बजे जाते हैं। बाहर ड्राइवर खड़ा इंतिज़ार करता रहता है कि साहब को जल्दी से जल्दी घर छोड़कर मैं आजाद हो जाऊं। उसकी पत्नी शीला खाने पर इंतिज़ार करती है और बेटा अपनी सहज ज़रूरतों की सूची थामे उसका 'वेट` करता रहता है। ऐसे में सरयू काफी हाउस तो नहीं जा सकता न? और फिर हफ्ते में तीन चार शामें ऑफीशियल किस्म के 'डिनर` होते हैं जहां जाना नौकरी का हिस्सा है। कोई कुछ कहता नहीं लेकिन ऐसे 'डिनरों` में ही नीतियां तय होती, फैसले लिए जाते हैं, लॉबींग की जाती है, समझौते होते हैं, रास्ते निकलते हैं। लखटकिया से लेकर दस हज़ारी इनामों तक की लॉबींग होती है। सरयू को साहित्य की राष्ट्रीय पत्रिका निकालनी है, साहित्यकारों के बीच रहना है, उनका समर्थन प्राप्त करना है, उनसे संबंध बनाना है इसलिए यह सब नौकरी का आवश्यक हिस्सा बन जाता है।

नवीन जोशी की शादी सुमित्रानंदन पंत के परिवार में हुई है। शादी के बाद नवीन ने दो-तीन नौकरियां बदलने के बाद एक बड़ी पब्लिक अंडरटेकिंग में पी.आर.ओ. के पद पर पांव जमा लिए हैं। शादी से पहले उसका एक कविता संग्रह 'चुप का संगीत` छप चुका है। अब शादी, नौकरियों और बाल-बच्चों के झंझटों में इंज्वाय करना सीख गया है। वह दिल्ली के पहाड़ी ब्राह्मण समाज का एक प्रतिष्ठित सदस्य है। ऐसा होना अस्वाभाविक भी नहीं है क्योंकि उसके पिताजी अंग्रेजों के ज़माने के सेक्शन ऑफीसर थे, चाचा जी जज थे, छोटे चाचा इलाहाबाद यूनीवर्सिटी में अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। आज उसके परिवार में दो दर्जन आई.ए.एस. और प्रोफेसर हैं। अखबारों के सम्पादक हैं, टी.वी. चैनलों के एंकर हैं,

संवाददाता हैं, कुमाऊंनी पंडितों की प्रतिष्ठा और प्रभाव से नवीन गदगद रहता है। वह अपने पिछले राजनैतिक विचारों पर शर्मिन्दा तो नहीं लेकिन उसका उल्लेख करने पर असुविधाजनक स्थिति में आ जाता।

'पब्लिक अण्डरटेकिंग` किस तरह अपने कर्मचारियों और वह भी ऊंचे कर्मचारियों के नाज़ नखरे उठाती हैं इसका सउदाहरण बयान करना नवीन को बहुत पसंद है। वह कंपनी की उन तमाम योजनाओं के बारे में जानता है जिनसे लाभ उठाया जा सकता है। जैसे बच्चे के जन्म से लेकर उनकी शिक्षा तक कंपनी कितनी छुट्टी मां को और कितनी छुट्टी बाप को देती है। बच्चे के पैदा होने पर कितना एलाउंस मिलता है। स्कूल योग्य हो जाने पर यह एलाउंस कितना बढ़ जाता है। अगर कार खरीद ली जाये तो कितना पैसा कार 'मेनटेनेंस एलाउंस` का मिलता है। ड्राइवर की तनख्वाह मिलती है। ऑफिस अगर तेरह किलोमीटर से दूर है तो पांच रुपये पचास पैसे प्रति किलोमीटर और ज्यादा एलाउंस मिलता है। साल में तीस हज़ार पेट्रोल के लिए बीस हजार इंजन बदलवाने आदि आदि ये सब उसे जबानी याद है और वह धड़ाके से बताना शुरू कर देता है। तीन साल बाद नयी कार खरीदने का इंटरेस्ट फ्री लोन मिल जाता है। पुश्तैनी मकान ठीक कराने और बच्चों की शादी करने के लिए भी दस लाख तक का 'इंटरेस्ट फ्री` लोन मिलता है।

नवीन परिवार के पुराने किस्सों का भी ख़ज़ाना है। अंग्रेजों के ज़माने में राजधानी शिमला चली जाती थी। एक ट्रेन में पूरी भारत सरकारी दिल्ली से शिमला कैसे जाती थी। उसके पिताजी को दो घर एलाट थे। एक दिल्ली में एक शिमला में। सारा काम बहुत व्यवस्थित और योजनाबद्ध हुआ करता था। इन किस्सों के साथ-साथ उसके पास अपने परिवार के बुजुर्गों की ईमानदारी, मेहनत और लगन को दर्शाने वाले अनगिनत किस्से थे। बडे चाचा सन् बीस में जज थे। आठ सौ रुपये महीने तन्खा मिलती थी। वे हर महीने दो सौ रुपये के दस-पन्द्रह मनीआर्डर अल्मोड़ा करते थे। किसी गरीब रिश्तेदार को पांच रुपये, किसी को दस, जैसी जिसकी जरूरत होती थी। पचास रुपये महीने का गुप्तदान करते थे। सौ रुपये महीने हेड़ाखान बाबा के मठ में जाता था।

इसके अलावा परिवार का जो भी लड़का हाईस्कूल कर लेता था उसे इलाहाबाद बुलाकर अपनी कोठी में रख लेते थे और आगे की पढ़ाई का पूरा खर्चा उठाते थे।

नवीन के एक चचा जी पंडित गोविन्द वल्लभ पंत के क्लासफेलो थे। इन दोनों के बड़े रोचक किस्से उसे याद हैं जिनमें पंडित पंत को शिकस्त हुआ करती थी और पंडित भुवन जोशी विजेता और आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित होते थे। एक रिश्तेदार शूगरकेन इंस्पेक्टर थे और तरक्की करते करते शूगरकेन कमिश्नर हो गये थे। वे कभी किसी से बहस में हारते नहीं थे। नवीन के अनुसार कहते थे, भाई मैं तो बातचीत को खींचकर गन्ने पर ले आता हूं और वहां अपनी मास्टरी है. . .बड़े से बड़े को वहीं चित कर देता हूं।

हम लोगों ने ये सब किस्से काफी हाउस के जमाने में सुने थे। इनमें अल्मोड़ा के लोगों, वहां आपसे एक नवाब साहब, एक आवारा और न जाने किन-किन लोगों के किस्से नवीन अब भी जब मौका मिल जाता है सुना देता है। उसका मनपसंद काम चाय की प्याली और गपशप्प का आदान-प्रदान है। वह यह काम घण्टों कर सकता है।

कविता का पहला संग्रह छपने के बाद नवीन अपनी पब्लिक सेक्टर नौकरी में आ गया था। पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, नातेदार सब समय की मांग करते थे। इसलिए उसका काफी हाउस आना बंद हो गया था और फिर अकेला क्या आता? न तो सरयू जाता था। न मैं जाता था, न रावत ही जाता था। वह अकेला वहां क्या करता? मेरा कभी-कभी मूड बन जाता था और कोई काम नहीं होता था। तो मैं उसके आफिस का कभी-कभार एक आद चक्कर लगा लेता था। मैं जानता था उसे आमतौर पर कोई काम नहीं होता है। वह आफिस के दो-चार दूसरे अधिकारियों से गप्प-शप्प करता रहता है। चाय पीता है। ए.सी. की बेहिसाब हवा खाता है। गप्प करने को जब कोई नहीं मिलता तो चपरासियों से खैनी लेकर खाता है और गप्पबाज़ी करता है। यह उसका बड़प्पन है कि वह पद को महत्व नहीं देता जिसकी वजह से कभी-कभी ऑफिस में उसकी आलोचना भी हो जाती है।

अच्छी खासी नौकरी में होते हुए भी नवीन को हम सब की तरह यह कामना तो थी कि यार पैसा बनाया जाये। हम में से किसी को पैसा मिल जाता तो शायद वह सब न करते जो दूसरे पैसे वाले करते हैं। हम फिल्म बनाते, यात्राएं करते, किताबें खरीदते वग़ैरा, वग़ैरा. . .नवीन अक्सर काफी हाउस में भी मोटा पैसा बनाने की योजनाएं बताया करता था और रावत उसका मज़ाक उड़ाया करता था। पैसा कमाने की मोटी योजनाएं अब भी उसके पास आती रहती हैं। एक दिन मैं उसके आफिस गया तो बोला कि यार किसी का फोन आया था, सोवियत यूनियन से एक आर्डर है। पांच करोड़ की प्याज़ भेजना है।?

“क्या?” मुझे अपने कानों पर यकीन नहीं आया।

“हां यार पांच करोड़ की प्याज़ भेजने का आर्डर है।”

“तुम्हारे पास है?”

“हां हां . . .और क्या . . .पांच परसेंट कमीशन।” वह बहुत गंभीर लग रहा था।

“मज़ाक तो नहीं कर रहे हो।”

“नहीं यार. . .” वह नाराज़ होकर बोला।

इसी तरह पुरानी बात है, एक दिन उसका फोन आया कि अमेरिका से पानी का एक जहाज 'डनहिल` सिगरेट लेकर ईरान जा रहा था कि ईरान में क्रांति हो गयी है। अब यह जहाज खुले समुद्र में रुका खड़ा है और विश्व में अपने माल के ग्राहक तलाश कर रहे हैं। नवीन ने बताया कि 'डनहिल` का ग्राहक खोजने की कोशिश कर रहा है।

इस तरह के कोई काम उससे नहीं हो सके। बस टेलीफोन ऑफिस का, क्लर्क और चपरासी, काग़़ज स्टेशनरी. . .अपने शौक मुफ्त में पूरे कर लेता था और थोड़ी देर के लिए एक सपना देख लेता था। यार इसमें बुराई क्या है?

“यार ये निगम को साले को हो क्या गया है?” रावत गुस्से में बोला।

“अच्छा खासा पैसा है साले के पास।” नवीन ने कहा।

“भई देखो चाहे जो करे. . .हमें क्यों पार्टी बनाता है. . .” सरयू ने अपनी बात रखी।

“ये बताओ उसने तुमसे कहा क्या था?” सरयू ने मुझसे पूछा।

“यार यही कहा था कि आज रात तुम चारों हमारे साथ डिनर करो. . .और कुछ नहीं बताया था।” मैंने कहा।

“यही चालाकी है उसकी . . .वहां जाकर पता चला कि क्या किस्सा है।”

“देखो मैं तो बहुत पहले से निगम के बारे में 'क्लियर` हूं। मुझे पता है उसका मुख्य धंधा दलाली है . . . वह पैसा कमाने के लिए कोई भी रास्ता अपना सकता है।” रावत ने कहा।

“चलो अब आगे से देखा जायेगा।”

“यार किस बेशर्मी से मंत्री से कह रहा था, सर एक ड्रिंक तो और लीजिए. . .देखिए सर. . .साकी कौन है।” सरयू ने कहा।

“मतलब अपनी पत्नी को साकी बना दिया. . .।”

“यार मंत्री को तो वही सर्व कर रही थी न?” नवीन ने कहा

“मंत्री के बराबर बैठी थी।”

“देखो राजाराम चौधरी पर्यटन मंत्री हैं. . .और निगम की एडवरटाइजिंग. . .”

“वो सब ठीक है. . .पर हद होती है।”

हम चारों में मेरी निगम से ज्यादा पटती है। वह यह जानता है और इन तीनों को 'इनवाइट` करने के लिए भी उसने मेरा ही सहारा लिया था। हम जब उसके घर पहुंचे तब ही पता चला था कि वह अपनी पत्नी का जन्मदिन मना रहा है और उसमें चीफगेस्ट के रूप में राजाराम चौधरी को बुलाया है। वैसे एक-आद बार यह बात काफी हाउस में उड़ती उड़ती सुनी थी कि निगम अपनी पत्नी के माध्यम से बहुत से काम साधता है। उसकी पत्नी सुंदर है। बच्चा कोई नहीं है। आज तो निगम का चेहरा अजीब लग रहा था। उसने उतनी शराब पी नहीं थी जितनी दिखा रहा था। वह नशे में है इसका फ़ायदा उठा रहा था। यह सब समझ रहे थे।

निगम मुझसे बता चुका था कि पार्टी में राजाराम चौधरी होंगे और

उसने यह भी कहा था कि यह बात मैं सरयू और रावत वगै़रा को न बताऊं। उसे शक था क तब शायद ये लोग न आते।

“लेकिन वो हम लोगों को क्यों बुलाता है।”

“सीधी बात है यार. . .मंत्री को यह बताना चाहता है कि उसके मित्र पत्रकार भी हैं।”

“हां यार मुझे तो उसके दो बार मिला दिया मंत्री से. . .और दोनों बार खूब जोर देकर कहा कि ये 'दैनिक प्रभात` में साहित्य सम्पादक हैं।”

“तो ये बात है।” रावत आंखें तरेरता हुआ बोला।

कुछ महीनों बाद सुनने में आया कि निगम को पर्यटन मंत्रालय से बहुत काम मिल गया है। यह भी सुना गया कि निगम ने दो कोठियां खरीद ली हैं। यह भी पता चला कि गाड़ी बदल ली है। उसने फोन करके खुद बताया कि नैनीताल में एक काटेज खरीद लिया है। जब कभी मिल जाता है तो बड़े जोश में दिखाई देता है। नया ऑफिस खोल लिया है जहां बीस पच्चीस का स्टाफ काम करता है।

मैंने शकील के पास संबंध खत्म कर लिये थे लेकिन उसका फोन अक्सर आता रहता था। वह कहता था कि मैं तुम्हें फोन करता रहूंगा। . . . इस उम्मीद पर के एक दिन हम फिर उसी तरह मिलेंगे जैसे हम पहले मिला करते थे। मैंने भी सोच लिया था कि बस पुरानी दोस्ती जितनी निभ सकी है मैंने निभायी है और अब जिन्दगी के इस मोड़ पर मेरे और शकील के बीच कुछ 'कामन` नहीं है। हमारे रास्ते अलग है।

एक साल तक हमारी मुलाकात नहीं हुई। अहमद टोक्यो से लौट कर आया तो उसने अपना 'ऐजेण्डा` घोषित कर दिया कि वह मेरी और शकील की दोस्ती करवाना चाहता है। मुझे उसकी इस बात पर हँसी आई और उसे समझाया कि यार कि अब हम लोग हॉस्टल के लौण्डे नहीं है हम पचास के आसपास पहुँचे लोग हैं। न तो अब शकील को मेरी ज़रूरत है और मुझे उसकी। हमारी जिन्दगी अलग है, सोचने का तरीका अलग है।

- अरे साले तो मेरा और तुम्हारे सोचने का तरीका कौन सा एक है?``

- कभी एक नहीं रहा`` मैनें कहा।

- यही तो बात है . . . तुम उस साले को इतना 'सीरियसली` क्यों लेते हो``।

मुझे हँसी आ गयी आज भी अहमद उसी तरह के बेतुके तर्क देता है जैसे तीस साल पहले दिया करता था।

अहमद पीछे पड़ गया आखिरकार मैं शकील से एक साल बाद मिला और हैरत ये हुई कि वह मुझसे लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा पहले तो मैं समझा साला 'एक्टिंग` कर रहा है नेता साले एक्टिंग का कोर्स किए बिना 'टॉप` के एक्टर बन जाते है। लेकिन बाद में पता चला कि वह एक्टिंग नहीं कर रहा था।

----१८----

मोहसिन टेढ़े धड़ाधड़ अपनी जायदाद बेचकर पैसा खड़ा कर रहा है। अभी आम का बाग और वह हवेली नहीं बेची है जहां उसकी मां रहती है। मां से वह काफी परेशान है। कहता है अम्मां दिल्ली आना नहीं चाहती। मोहसिन टेढ़ा किसी भी तरह अब तक इसमें कामयाब नहीं हो सका कि अम्मां को दिल्ली ले आये। हां, उसके बहनोई दिलावर हुसैन एडवोकेट ने कहला दिया है कि पुश्तैनी जायदाद में उनका मतलब उनकी बीवी का भी हिस्सा है। मोहसिन टेढ़े किसी भी तरह जायदाद का एक तिनका अपनी बहन और बहनोई को नहीं देना चाहता।

सौ बीघा कलमी आम का बाग मोहसिन टेढ़े के दादा ने लगवाया था और यह ज़िले के ही नहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े बागों में गिना जाता है। बाग में चार कुएं हैं, पक्की नालियां हैं, और हर तरह से कलमी आम के पेड़ हैं। मोहसिन टेढ़े ने जब इस बाग का ग्राहक तय किया तो उसके बहनोई दिलावर हुसैन एडवोकेट ने उसे धमका दिया और वह बयाना देने भी नहीं आया। मोहसिन ने एक और खरीदार को पटाया और उससे बयाना ले लिया। यह बात दिलावर हुसैन को पता लग गयी। उन्होंने मोहसिन को चैलेंज किया कि वे तहसील में बाग की लिखा-पढ़ी न करा सकेंगे। उनका मतलब यह था कि गुण्डे मोहसिन टेढ़े को तहसील न पहुंचने देंगे। ऐसे मौके पर मोहसिन टेढ़े के काम कौन आता सिवाय शकील अहमद अंसारी के। शकील ने यह छोटा-सा काम करने की जिम्मेदारी अपने सुपुत्र कमाल को सौंप दी।

कमाल ने मोहसिन को यकीन दिलाया कि बैनामा हो जायेगा। दिलावर हुसैन एडवोकेट कुछ नहीं कर सकेंगे। मोहसिन को यह बड़ा

अच्छा लगा। कमाल उन्हें बताता रहता था कि उसने अपने इलाके के इतने लोग बुला लिए हैं, जिले के अफसरों को साउण्ड कर दिया है कि यह मंत्री जी का काम है। सब मदद करने के लिए तैयार हैं। बैनामा अगले दिन होना था।

रात शकील के घर पर खाना-वाना खाने के बाद कमाल ने मोहसिन टेढ़े से पूछा, “अंकिल ये बताइये. . .अगर अपनी सिस्टर को उनका शेयर आपको देना ही पड़ जाता तो वह कितना होता?”

इस सवाल पर मोहसिन टेढ़े के हवास गुम हो गये। वह उड़ती चिड़िया के पर गिन गया।

“क्यों?” उसने पूछा।

“मतलब अंकिल आप जानते हैं. . .हमने पचास लोग बुलाये हैं जो हर तरह से लैस होंगे. . .अधिकारियों को उनका हिस्सा पहुंचा दिया गया है। पुलिस को भी दिया गया है क्योंकि पुलिस किसी के रिश्तेदार नहीं होती. . .”

मोहसिन टेढ़े की अकल के सभी दरवाजे खुल गये। उसने सोचा, कल बैनामा होना है, अगर आज कमाल कह दे कि उसके आदमी वहां नहीं पहुंच पायेंगे, वह नहीं जा सकता तो क्या होगा।

कितना खऱ्चा लग जायेगा।” मोहसिन टेढ़े मरी हुई आवाज़ में बोला।

पांच लाख।” कमाल ने कहा और मोहसिन टेढ़ा कुर्सी से उछल पड़ा, पांच लाख।”

“हां अंकिल पांच लाख. . .ये कुछ नहीं है. . .आप अस्सी लाख का बाग बेच रहे हैं।”

“ठीक है।”

मोहसिन टेढ़ा यह समझ रहा था कि कमाल शायद किसी काग़ज पर दस्तखत करायेगा। पर ऐसा नहीं हुआ।

अगले दिन जब बैनामा हो रहा था तो मोहसिन टेढ़े को कमाल के पचास आदमी कहीं नहीं दिखाई दिए। पुलिस भी नहीं थी। सब कुछ सामान्य था। मोहसिन टेढ़े ने कमाल से पूछा, तुम्हारे आदमी कहां हैं?”

“अंकिल आप अपना काम कीजिए।” वह सख्ती से बोला था। काम हो गया था। जितना पैसा कैश मिलना था वह सब कमाल ने गिनकर अपने पास रख लिया था। दिल्ली आकर उसमें से पांच लाख बड़ी ईमानदारी से गिनकर बाकी मोहसिन को लौटाते हुए कहा था, पापा को ये सब न बताइयेगा. . .”

मोहसिन ने सिर हिला दिया।

सुप्रिया को यह पसंद नहीं कि उसके रहते मेरे टेरिस पर महफिलें जमें और यार लोग शराब कबाब करें। अगर कभी ऐसा होने वाला होता है तो वह अपनी बरसाती में चली जाती है। लेकिन आजकल वह कलकत्ता गयी है इसलिए मेरी टेरिस आबाद हो गयी है।

मसला जेरेबहस यह है कि बलीसिंह रावत ने लोक सेवा आयोग द्वारा विज्ञापित डायरेक्टर मीडिया की पोस्ट पर अप्लाई कर दिया है। यह एस.टी. के लिए रिजर्व पोस्ट है और रावत के पास एस.टी. का प्रमाण-पत्र है। आज वह जिस वेतनमान पर काम कर रहा है उससे दुगना वेतनमान इस पोस्ट का है।

सरयू, नवीन का कहना है कि यह 'गोल्डन अपारच्युनिटी` है रावत के लिए। मैं इससे सहमत हूं। डायरेक्टर मीडिया की पोस्ट सीधे मंत्रालय में है। क्या कहने?

रावत अपनी जानकारियों, समझदारी, फिल्म और साहित्य की सूक्ष्म दृष्टि के बावजूद सीधा है। उसमें मध्यवर्गीय छल कपट है। हम लोग ये जानते हैं रावत को 'खींचने` का काई मौका नहीं छोड़ते।

पता नहीं कैसे धीरे-धीरे हम लोगों ने रावत को 'कन्विंस` कर लिया कि नौकरी के लिए उसका जो इंटरव्यू लिया जायेगा उसका पूर्वाभ्यास करके देखना चाहिए।

कुछ ही देर में 'मॉक इंटरव्यू` शुरू हो गया। कहावत है कि दाई से पेट नहीं छिपाना चाहिए। हम सब दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह साल पुराने दोस्त, एक दूसरे के बारे में सच जानते हैं। पूरे विश्वास से ऐसे सवाल पूछने लगे जिनका जवाब रावत नहीं दे सकता। चार पांच सवालों का

उत्तर रावत नहीं सके क्योंकि वे वैसे ही सवाल थे जिनके उत्तर की उपेक्षा उनके नहीं हो सकती।

कुछ देर में रावत चिढ़ गया और शायद समझ भी गया कि उनके साथ खेल हो रहा है। वह बोला, “अरे मादरचोदो, सत्यजीत रे पर सवाल पूछो, चार्ली चैपलिन पर पूछो, अम्बादास की पेंटिंग पर पूछो, रवीन्द्र संगीत पर पूछो. . .फिलिस्तीनी प्रतिरोध कविता पर पूछो. . .”

हम सब हंसने लगे।

हम लोगों ने पूरे प्रसंग को चाहे जितना 'नॉन सीरियसली` लिया हो लेकिन बलीसिंह रावत की निदेशक मीडिया के पद पर नियुक्ति हो गयी। हमने जश्न मनाया। रावत पर सब अपने-अपने दावे पेश करने लगे। नवीन ने कहा यार मैंने तो तुझे सूट का कपड़ा खरीदवाया और सूट सिलवाया था। मैंने कहा, मैंने तुम्हें टाई बांधना सिखाई थी। बहरहाल रावत बहुत खुश था।

संबंध ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चल रहे हैं। नूर अब पूरे साल लंदन में रहती हैं। पहले जाड़ों में हीरो के साथ एक दो हफ्त़े के लिए आ जाती थी और हीरा का कॉलिज खुलने से पहले लौट जाती थी। धीरे-धीरे साल में एक चक्कर लगना भी बंद हो गया और दो-तीन साल में एक बार आने लगी। मैं भी लंदन जाते-जाते थक गया था। अब वहां सब कुछ नीरस था। मैं गर्मियों में श्रीनगर चला जाता था।

धीरे-धीरे सुप्रिया ने नूर की जगह ले ली थी लेकिन सुप्रिया के साथ भी संबंधों में कोई पक्कापन न था। हमेशा लगता था जब पत्नी ही अपनी न हुई तो प्रेमिका क्या होगी। लेकिन सुप्रिया ने हमेशा विश्वास बनाये रखा। कभी जब नूर को आना होता था तो बिना मुझे बताये अपने कपड़े वग़ैरा लेकर अपनी बरसाती में चली जाती थी और कभी नहीं कहती थी कि ये संबंध कैसे हैं? वह मेरी कौन है? नूर कौन है? मैं ये क्यों कर रहा हूं। लगता है कि सुप्रिया को अपार दुख ने सतह से उखाड़ दिया है वह अब जहां है वहां कोई सवाल जवाब नहीं होते।

लंदन और नूर से दूर होने के साथ-साथ मैं हीरा से भी दूर हो गया

हूं। मैंने उसे लेकर जो ख्वाब पाले थे वे छितरा गये हैं। लेकिन हीरा से मेरी बातचीत होती रहती है। हो सकता है नूर से किसी महीने बात न हो लेकिन हीरा से होती ही है। वह चाहे जहां हो, मैं उसे फोन करता हूं। हॉस्टल में था तो वहां 'काल` करता था। मेरे और उसके बीच सबसे बड़ा विषय तीसरी दुनिया के संघर्ष हैं। उसे राजनीति और अर्थशास्त्र में दिलचस्पी है और मैं पत्रकार होने के नाते इन दोनों विषयों से बच नहीं सकता। 'लंदन स्कूल ऑफ इकोनामिक्स` के रेडीकल टीचर्स उसके 'आइडियल` हैं। वह बराबर उनकी किताबें और लेख मुझे भेजता रहता है। वह जानता है कि मैं कभी वामपंथी राजनीति में था और भी उससे सहानुभूति रखता हूं। वह बताता रहता है नवपूंजीवाद किस तरह संसार के गरीब देशों पर कब्ज़ा जमाना चाहता है। हीरा अपनी शिक्षा, परिवार के उदार मानवीय विचारों, बॉब से दोस्ती और रेडिकल टीचर्स की संगति में काफी इन्किलाबी बन गया है। वह क्यूबा और चीन की यात्रा कर चुका है। मिर्जा साहब, उसके नाना लेबरपार्टी से अपने पुराने और गहरे रिश्ते की वजह से 'गुलाबी` विचारों को पसंद करते हैं और उन्हें लगता है कि हीरा जवानी के जोश में 'अतिलाल` है जो समय के साथ-साथ 'गुलाबी` हो जायेगा।

सुप्रिया के साथ रहते हुए कभी-कभी यह ख्य़ाल आता है कि मुझे यहां सुप्रिया का सहारा मिल गया है। नूर लंदन में क्या करती होगी? पता नहीं मुझे लगता है लेकिन हो सकता है मैं गल़त हूं कि नूर और बॉब की दोस्ती सिर्फ दोस्ती की हद तक कायम नहीं है। दोनों स्कूल में साथ पढ़ते थे फिर कॉलिज में साथ आये। यूनीवर्सिटी साथ-साथ गये। अंग्रेज़ संस्थानों का माहौल 'वीकली पिकनिक`, 'नाइट आउट`, 'पार्टियां डांस`, 'ड्रिंक्स डिनर` ऐसा कौन है जो इस माहौल में एक बहुत अच्छे आदमी और दोस्त के साथ गहरे और बहुत गहरे संबंध बनाने में हिचकिचायेगा? लंबे जाड़ों और बरफीले तूफान के बाद जब प्रकृति जागती है तो ऐसा लगता है जैसे वीनस की मूर्ति चादर ओढ़े सो रही थी और अचानक उसने चादर फेंककर एक अंगड़ाई ली है। ऐसे मौसम में युवक पागल हो जाते हैं और रंगों के तूफान में अपने को रंग लेते हैं। जाड़ा बीत जाने

के बाद सूखी-सी लगती टहनियों के ऊपर हरे रंग की कोपल जैसी पत्तियां निकलती जिनके रंग हरे होने से पहले कई चोले बदलते हैं और पत्तियाँ हर चोले में मारक नज़र आती है। सड़कें किनारे खड़ी बेतरतीब झाड़ियां इस तरह फूल उठती है कि उन पर से निगाह हटाना मुश्किल होता है। लगता है यह पृथ्वी, पेड़, फूल, रंग, नीला पानी, नीला आसमान सब आज ही बना है। दूर तक फैली हरी पहाड़ियों की गोद में बसे गांवों में बसंत उत्सव मनाये जाते हैं। सेब के बागों में आर्केस्ट्रा बजता है, नृत्य होता है, बियर बहती है, 'बारबीक्यु` होता है और पूरा माहौल नयी जिंदगी का प्रतीक बन जाता है। पता नहीं इस तरह के कितने वसंत उत्सवों में नूर और बॉब गये होंगे। पता कितनी बार हरे पहाड़ों के जंगली फूलों के बीच ट्रैकिंग की होगी। पता नहीं टेम्स के किनारे कितनी दूर तक टहले होंगे।

नूर और बॉब के रिश्ते या उनके बीच शारीरिक संबंधों की बात जब मैं सोचता हूं तो मुझे गुस्सा नहीं आता। मैं मानता हूं अगर ऐसे संबंध होंगे तो नूर की इच्छा बिना न होंगे। और दूसरी बात यह कि बॉब इतना अच्छा आदमी है कि उसे साधारण की परिभाषा में नहीं बाध जा सकता। अगर यह संबंध है तो विशेष संबंध होगा. . .क्या यह मैं किसी और से भी कह सकता हूं।

बाग बेचने के बाद मोहसिन टेढ़े ने शादी कर डाली। चूंकि मोहसिन टेढ़े नौकरी वगै़रा तो करता न था सिर्फ ज़मीन जायदाद का खेल था। वह भी तेजी से बेच रहा था इसलिए मोहसिन टेढ़े के लिए लड़की मिलना मुश्किल था। ये बात जरूर है कि इलाके वालों, रिश्ते-नातेदारों में अच्छी साख थी। लोग जानते और मानते थे लेकिन अच्छे घरों से इंकार ही हो रहा था। आखिरकार एक मीर साहब जो मेरठ कचहरी में पेशकार थे, की चौथी लड़की के साथ मोहसिन टेढ़े का रिश्ता तय हुआ।

मोहसिन की शादी सीधी-साधी थी। दोनों पक्षों को अच्छी तरह मालूम था कि 'एडजस्टमेंट` क्यों किया जा रहा है। दहेज वाजिब वाजिब मिला था। रिसेप्शन वाजिब वाजिब था। लड़की इंटर तक पढ़ी थी। घरदारी से अच्छी वाक़िफ़ थी। देखने सुनने में वाजिब वाजिब थी। मोहसिन टेढ़े जानता है कि इससे ज्यादा इन हालात में कुछ नहीं हो सकता। शादी के बाद वह बीवी को लेकर सीधे दिल्ली आ गया। उसने कहा था, यार क्या फायदा पहले घर ले जाऊं? घर में है कौन अम्मां हैं, वो यहीं शादी में आ गयी। बाकी बहनोई साहब ने तो मुकदमा दायर कर दिया है। दूसरे रिश्तेदारों से मेरा मतलब ही नहीं है।

दिल्ली में उसने गुड़गांव के पास किसी सेक्टर में मकान खरीद लिया था। मैंने बहुत समझाया था कि यार इतनी दूर क्यों जा रहे हो। पर वह नहीं माना था। उसका कहना था, “यार मैं रिश्तेदारों से दूर रहना चाहता हूं. . .ये सब मुझे लूटना खाना चाहते हैं। मैं गुड़गांव सेक्टर तेरह में रहूंगा वहां कोई साला क्या पहुंचेगा. . .और फिर वहां सस्ता है और फिर यार कौन-सा मुझे नौकरी करनी है। हफ्ते में एक आद बार दिल्ली चला आया करूंगा और वही सुकून से रहूंगा. . .तुम कभी वहां आकर देखो. . .बड़ी पुरफ़िज़ा जगह है।”

----१९----

“देखो आदमी सच बोलने के लिए तरसता है। उसकी ये समझ में नहीं आता कि कहां सच बोला जाये? मेरी तो समझ में आ गया कि सच कहां बोलना चाहिए. . .यहीं बोलना चाहिए, यहीं बोलना चाहिए और यहीं बोलना चाहिए. . .” अहमद हंसने लगा।

टेरिस पर चांदनी फैली है नीचे से चमेली की फूलों की तेज़ महक आ रही है। मलगिजी चांदनी में जामो-सुबू का इंतिज़ाम है। तीन पुराने दोस्त ज़िंदगी की दोपहर गुज़ारकर आमने सामने हैं।

“क्या कमजोरी है तुम्हारी।” शकील ने पूछा।

“यार तुम लोग पूछ रहे थे न कि पहले मैंने इंदरानी को छोड़ा था, फिर राजी रतना को छोड़ा। उसके बाद एक रूसी लड़की के साथ रहने लगा. . .मास्को से टोक्यो आ गया तो एक अमरीकी टकरा गयी . . . मैं यार. . .” उसे कुछ नशा आ गया था और जबान लड़खड़ा रही थी।

“तुम्हें नशा ज्यादा हो रहा है।” मैंने कहा।

वह हंसने लगा हां, मैं जानता हूं और ये भी जानता हूं कि कहां नशा होना चाहिए और कहां नहीं. . .डिप्लोमैटिक पार्टियों में नशा होना जुर्म है. . .वहां हम वी.वी.आई.पी को नशे में लाते हैं, उसे खुश करते हैं. . .उसके चले जाने के बाद अपने हाई कमिश्नर साहब को नशे में लाते हैं। ये भी हमारी ड्यूटी होती है. . .जानते हो. . .एक बार मैक्सिको में हमारे एम्बैस्डर एक स्पेशल कोटे वाले आदमी थे और लगता था उन्हें उनके पूरे कैरियर ''दूसरे तरह के लोगों ने परेशान किया था। अब 'टॉप बॉस` हो जाने के बाद उनके अंदर बदला लेने की ख्वाहिश बहुत मज़बूत

हो गयी थी. . .तो जब उन्हें चढ़ जाती थी तो 'उन लोगों` में से किसी को बुलाकर दिल की भड़ास निकाला करता था. . .गाली गलौज करता था और जवाब में हम सब यस सर, यस सर कहते रहते थे। सब जानते थे दस-पन्द्रह मिनट में थककर चला जायेगा या. . .”

“जो बात शुरू की थी वो तो रह ही गयी।”

“हां सच ये है कि औरतें मेरी कमज़ोरी है. . .और ये भी मेरी कमज़ोरी है कि मैं एक औरत के साथ लंबे अरसे नहीं रह सकता. . .और . . .”

“इतनी बड़ी और भयानक बातें इतनी जल्दी एक साथ न बोलो।” मैंने उससे कहा। शकील हंसने लगा।

“ये बताओ कि तुम राजदूत बन रहे हो न?” शकील ने पूछा।

“टेढ़ा सवाल है. . .देखो हमारी मिनिस्ट्री में जो सबसे पावरफुल लॉबी है वह चाहती है कि अब मुझे दिल्ली में सड़ा दिया जाये क्योंकि मेरी जगह उनका एक आदमी राजदूत बन जायेगा। हमारे सेक्रेटरी उन लोगों के दबाव में हैं. . .अब अगर पी.एम.ओ. और कैबनेट सेक्रेटरी दखल दें तो बात बन सकती है. . .मैंने शूज़ा चौहान से बात की है।”

“वाह क्या तगड़ा सोर्स लगाया है. . .वह तो आजकल कैबनेट सेक्रेटरी की गर्ल फ्रेण्ड है।”

“हां यही सोचकर उससे कहा है।”

“फिर?”

“वह तो एम.ई.ए. में भी बात कर सकती है।”

“नहीं उससे काम नहीं चलेगा. . .तुम लोग या और दूसरे लोग एम.ई.ए. के बारे में नहीं जानते. . .वहां अजीब तरह से काम होता है . . .क्योंकि पब्लिक डीलिंग नहीं है. . .प्रेस तक खबरें कम ही पहुंचती हैं इसलिए अजीब माहौल है. . .”

“कुछ बताओ न?” मैंने कहा।

“नहीं यार तुम प्रेस वाले हो।”

“तो तुम ये समझते हो कि मैं चाहूंगा तो स्टोरी छप जायेगी? ऐसी बात नहीं है मेरी जान. . .सरकार के खिलाफ हमारे यहां कुछ नहीं

या कम ही या नपा तुला छपता है।”

फ्तब तो बता सकता हूं।” वह हंसकर बोला, “तुमने जर्मनीदास की किताब महाराजा पढ़ी है?”

“हां।”

“बस उसे भूल जाओगे।”

“नहीं यार।”

“छोड़ो यार छोड़ो. . .ये तुम लोग कहां से लेकर बैठ गये। दिनभर यही सब सुनते-सुने कान पक गये हैं” शकील ने उकता कर कहा।

“तो तुम्हारे मंत्रालय में भी. . .”

“मेरे भाई कहां नहीं हैं. . .अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान. . .कहां 'करप्शन` नहीं है।

“तो उसके बारे में बात न की जाये?” मैंने कहा।

“जरूर करो. . .मैं चलता हूं. . .यार यहां मैं इसलिए नहीं आया हूं।” शकील बोला, “अहमद ने मुझे आंख मारी।”

“कबाब ठण्डे हो गये हैं।” अहमद ने कहा।

मैंने हांक लगाई “गुलशन. . .”

“तो राजी रतना को तुमने छोड़ दिया?” शकील ने अहमद से पूछा।

“नहीं उसने मुझे छोड़ दिया।”

“कैसे?”

“जब हम मास्को में थे तो एक बड़ी 'डील` जो मेरी वजह से ही मिली थी, राजी ने मुझे बाहर कर दिया था। पूरे पचास लाख का चूना लगाया था।” अहमद ने कहा।

मेरे अंदर ये सब सुनकर 'वहश्त` बढ़ने लगी। यार मैं इस दुनिया में इसलिए हूं कि शकील और अहमद जैसे लोगों की बकवास सुनता रहूं? मैंने अपने ऊपर कितनी ज्यादती की है। दसियों साल से मैं इनकी बकवास सुनता आया हूं। खामोश रहा हूं। पर और कर भी क्या सकता हूं? लेकिन कम से कम से मैं मजबूर तो नहीं हूं उनकी बकवास सुनने

के लिए? सुप्रिया अक्सर कहती है कि तुम इन दोनों को 'टालरेट` कैसे कर लेते हो? मैं पुरानी दोस्ती का हवाला देकर उसे चुप करा देता हूं लेकिन जानता हूं कि यह सही नहीं है। पता नहीं, मेरी क्या कमजोरी है जो मैं इन लोगों से अब तक जुड़ा हुआ हूं। अहमद तो फिर भी ब्यूरोक्रैट है लेकिन शकील अहमद अंसारी ये तो सत्ता का एक पहिया है जो करोड़ों इंसानों को कुचलती आगे बढ़ती चली जा रही है।

“क्या सोच रहे हो उस्ताद?” अहमद ने पूछा।

मैं चौंक गया। सोचा जो सोच रहा हूं सब कह दूं और ये खेल यहीं खत्म हो जाये। लेकिन नहीं। मैंने कहा, “कुछ नहीं यार. . .हीरा की याद आ गयी थी।”

“क्या कर रहा है हीरा?” शकील ने पूछा।

“एशिया पर कुछ रिसर्च का प्रोजेक्ट है।”

“बहुत अच्छा. . .तुम खुशनसीब हो यार. . .हीरा बहुत कामयाब होगा।” शकील ने कहा।

“कमाल का क्या हाल है?” अहमद ने पूछा।

“यार मेरे नक्शे कदम पर चल रहा है। जिला परिषद का चेयरमैन है, जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष है।”

रात घिर आई थी। चांदनी महक गयी थी। मैंने तय किया धीरे-धीरे इन दोनों से पीछा छुटाना है। क्या मैं इनसे अलग हूं? मैंने ऐसा क्या किया है?

“यार ये क्या है प्यारे? इतनी भी कंजूसी ठीक नहीं. . .तुमने खिड़कियों पर पर्दे अब नहीं लगाये हैं?”

मोहसिन टेढ़े हंसने लगा “नहीं यार कंजूसी नहीं. . .कसम खुदा की पर्दे तो रखे हैं. . .लेकिन बस. . .”

चाय लेकर मोहसिन टेढ़े की बीवी आ गयी। हम चाय पीने लगे।

“अच्छा गाड़ी का क्या हुआ? खरीद ली तुमने?”

मोहसिन टेढ़े फिर शर्मिन्दगी वाली हंसी हंसने लगा। उसकी बीवी के चेहरे पर पीड़ा के भाव आ गये।

मोहसिन टेढ़े की शादी को दस साल हो गये हैं। इस बीच उसकी अम्मां गुजर गयी हैं। खानदानी हवेली भी वह बेच चुका है और एक अंदाज़ के तहत उसके पास सत्तर अस्सी लाख रुपये हैं जिनका ब्याज आता है। गुड़गांव में एक और फ्लैट है जो किराये पर उठा दिया है।

शादी के बाद जब मैं एक बार उसके घर आया था तब भी घर में पर्दे नहीं थे। उसने कहा था यार देखो दिन में तो बाहर से कुछ नज़र नहीं आता। रात की बात है। तो रात मैं पहले बत्ती बंद कर देता हूं उसके बाद अपन लेटते हैं, मतलब यार छोटी-सी एहतियात से काम चल जाता है। वैसे पर्दे पांच हजार के लग रहे हैं। अब देखो यार लगवाते हैं,”

धीरे-धीरे उसकी बीवी मुझसे खुलने लगी थी और जब भी जाता था कोई न कोई मसला सामने आ जाता था। शादी के बाद बीवी को मायके भेजने में भी मोहसिन बड़ी कंजूसी करता था। बीवी जब तक दो-तीन दिन खाना नहीं छोड़ती थी। रो-रोकर अपना बुरा हाल नहीं कर लेती थी तब तक उसे लेकर उसके घर न जाता था।

“भाई साहब देखिये किचन का बल्ब पिछले दो महीने से फ्यूज है। अंधेरे में रोटी डालती हूं। हाथ जल जाता है।” उसने एक बार शिकायत की थी।

“यार मोहसिन तुम पैसा किसके लिए बचा रहे हो? तुम्हारे कोई औलाद है नहीं। ले देके एक बहन है जिनसे तुम्हारा मुकदमा चल रहा है. . .तुम्हारी सारी जायदाद उन्हीं को. . .”

“नहीं यार क़सम खुदा की मैं कंजूसी नहीं करता। यार बस बाज़ार जाना नहीं हो पाता।” वह बोला।

मैंने अपने ड्राइवर को भेजकर दो बल्ब मंगवाये और मोहसिन की पत्नी को दे दिए।

कभी वह शिकायत करती थी कि भाई साहब देखिए राशन पूरा नहीं पड़ता`` मोहसिन का ये कहना था कि यार सलमा बर्बादी बहुत करती है, रोटियाँ बच जाती है, दाल दो- दो दिन फ्रिज में पड़ी रहती है, फेंकी जाती है, और इफ़रात में आ जायेगा तो और बर्बादी होगी।

जैसे जैसे वक्त गुज़र रहा था मोहसिन टेढ़े के पैरों की तकलीफ बढ़ रही थी, वह अस्पताल के चक्कर लगाया करता था, कभी-कभी मुझसे भी सरकारी अस्पतालों में फोन कराता था। बीमारी के साथ- साथ उसकी कंजूसी भी बढ़ रही थी।

एक दिन उसने मुझसे कहा, “यार देखो, तुम्हें तो हर महीने तनख्वाह मिलती है न?”

“हां”

“मुझे नहीं मिलती।”

“अरे यार फ्लैट का किराया आता है. . .ब्याज आता है. . .ये क्या है?”

“साजिद. . .यार मुझे डर लगता रहता है कि मेरा पैसा यार ख़त्म हो जायेगा. . .यार फिर मैं क्या करूंगा।”

“तुम पागल हो।” मैंने कहा।

“सच बताओ यार।”

“तुमने पैसा 'इनवेस्ट` किया हुआ है. . .वहां से आमदनी होती है. . .अपने ऊपर भी खर्च न करोगे तो पैसे का फायदा?”

“हां यार बिल्कुल ठीक कहते हो।”

मोहसिन टेढ़े यह वाक्य कई सौ बार बोल चुका है लेकिन करता वही है जो उसका जी चाहता है।

रावत कुछ खुलकर तो नहीं बता रहा है लेकिन इतना अंदाज़ा लग गया है कि हालत गंभीर है।

“यार पहले तो मैं समझा कि ठीक है. . .मुझे नौकरशाही की कोई ट्रेनिंग नहीं है। मैं तो पत्रकार रहा हूं. . .इसलिए गल़तियां होती हैं . . . और फिर अंग्रेज़ी भी उतनी अच्छी नहीं है। फ़ाइल वर्क सारा अंग्रेजी में होता है. . .फिर सालों ने मुझे डरा भी दिया था। रावत साहब सरकारी काम है. . .ज़रा सा भी इधर से उधर हो जाता है तो जेल चला जाता है. . .नौकरी तो जाती ही है।”

“तुम्हारी उम्र दूसरे बराबर के अधिकारियों से कम है। तुम एस.टी. कोटे में हो, तरक्की भी जल्दी ही होगी। बहुत जल्दी वह अपने साथ के दूसरे अफसरों से बहुत आगे निकल जाओगे। असली खेल ये लगता है।” मैंने कहा।

“नहीं यार, ऐसा क्यों होगा?” नवीन बोला।

“है क्यों नहीं, कुलीन इस बात को पसंद क्यों करेंगे कि सत्ता उनके हाथ से निकलकर किसी 'ट्राइबल` के हाथ में जाये।”

“तुम भी तो कुलीन मुसलमान हो।” नवीन हंसकर बोला।

“हां ठीक कहते हो।” मैंने कहा।

“ये बातचीत कुछ ज्यादा ही निजी स्तर पर आ गयी।” सरयू बोला।

“चलो यार रावत को बताने दो।” मैंने कहा।

“देखो भाई हमारे तो ऐसे संस्कार हैं नहीं. . .तुम मेरे दोस्त हो . . .मैं कभी सोचता भी नहीं कि मुसलमान हो. . .जोशी ब्राह्मण है, ये कभी मेरे मन में आया ही नहीं. . .तो मैं ये सब नहीं सोचता लेकिन यहां मतलब मंत्रालय में. . . र वह रूक गया।

“कहो, कहो, इसमें छिपाने की क्या बात है।” सरयू बोला।

“देखो मेरे बॉस ने पहले मुझसे कहा कि आपको फाइल वर्क नहीं आता. . .आप सीख लें. . .मैंने सीख लिया. . .उसके बाद बोले, देखिए इंग्लिश में ही सब कुछ होता है. . .आपकी लैंग्वेज हिंदी रही है. . .खैर मैंने इंग्लिश नोटिंग सीखी. . .अब रोज कोई न कोई गल़ती निकाल देता है. . मैं फाइलों को विस्तार से पढ़ता हूं तो ये 'कमेण्ट` आ जाता है कि 'अनावश्यक देरी हो गयी` अगर ठीक से नहीं पढ़ता तो ये लिख देते हैं कि फाइल पढ़ी नहीं गयी। एक ही अफसर नहीं. . .मुझे तो लगता है सब के सब. . .” वह खामोश हो गया। पिछली नौकरी उसने छोड़ दी है। अब कोई और नौकरी मिलेगी नहीं। डायरेक्टर के पद पर वेतन अच्छा मिलता है। सरकारी मकान मिला हुआ है। लेकिन . . .

“देख यार मैं. . .जंगली हूं. . .मेरा पिता भेड़ियों से लड़ते हुए मर गया था. . .मैं साला आदमियों से लड़ते हुए नहीं मर सकता।” रावत गिलास खाली कर गया।

“यही प्राब्लम है. . .मध्यवर्गीय संस्कार नहीं है।” नवीन बड़बड़ाया जो रावत नहीं सुन सका।

पता नहीं ये मध्यवर्गीय संस्कार क्या होते हैं? क्या वही तो नहीं होते जो निगम साहब के हैं। उनके बारे में उड़ती-उड़ती खबरें आती हैं। अब तो लोग कहने लगे हैं कि निगम ने अपने पत्नी को राजाराम चौधरी की रखैल बना दिया है और दोनों हाथों से पैसा बटोर रहा है। शिमला मेंं फ्लैट खरीद रहा है। रामनगर में बड़ा-सा फार्म लिया है। अय्याशी में खूब पैसा उड़ा रहा है। हर शाम एक नयी लड़की के साथ गुजरती है। इस तरह शायद वह राजाराम चौधरी से बदला ले रहा है। दिखाना चाहता है कि वह घाटे में नहीं है। अगर उसकी पत्नी किसी की रखैल है तो वह हर रात एक नयी लड़की के साथ सोता है।

निगम कभी छटे-छमाहे मुझे फोन भी कर देता है और बड़े 'ऑफर` देता है। जैसे चलो यार जिम कार्बेट पार्क चलते हैं। 'लैण्ड क्रूसर` ले ली है मैंने, ड्राइवर है। मिनी बार साथ ले लेंगे। नमकीन वग़ैरा साथ होगा। पीते-पिलाते चलेंगे. . .रामनगर में बढ़िया खाना खायेंगे . . .अब इन साले एम.पी., एम.एल.ओ. ने वहां होटल डाल दिए हैं। सब फारेस्ट की लैण्ड पर बनाये हैं। कोई साला कहने सुनने वाला नहीं है। जंगल में घूमेंगे. . .सुबह-सुबह तुम्हें चीता दिखायेंगे. . .उसके इस तरह के आफरों को मैं टाल देता हूं।

(जारी क्रमशः अगले अंकों में...)

उपन्यास

 

गरजत बरसत

----उपन्यास त्रयी का दूसरा भाग---- -

-असग़र वजाहत

पहला खण्ड

(पिछली किश्त  से आगे पढ़ें...)

 

..

वह भी चला गया तो क्या करोगे।` नवीन ने बुरा-सा मुंह बनाया। वह जब स्कूल में था तो उसे टी.वी. हो गयी थी और एक पूरा फेफड़ा निकाल दिया गया था।

'अरे यार कौन सा मैं 'इनहेल` करता हूं। तुम तो साले हर बात पर टोक देते हो।` नवीन ने कहा।

रात ग्यारह बजे तक मोहन सिंह प्लेस आबाद रहा फिर मैं घर आ गया। नूर टेलीविजन पर खबरें देख रही थी और गुलशनिया किचन में खाना पका रही थी। मुझे लगा चारों तरफ अमन-चैन है। सब कुछ ठीक है। कहीं न तो कुछ कमी है और न कहीं कुछ दरकार है। पता क्यों कभी-कभी कुछ क्षण अपनी बात खुद कहलवा लेते हैं उनमें चाहे जितना सच या झूठ हो।

जब से मैं कोठी में शिफ्ट हुआ हूं शकील दिल्ली में मेरे ही पास ठहरता है क्योंकि ग्राउण्ड फ्लोर पर बड़ा-सा गेस्टरूम है जो पूरी तरह ''इण्डेपेंनडेण्ट` है। आजकल शकील आया है। उसका 'मॉरल` कुछ गिरा हुआ जरूर है लेकिन फिर भी मजे में हैं। उसने पिछले एक साल में खासी कमाई कर ली है और अपने क्षेत्र में 'कोल्ड स्टोरेज` खोल लिया है। नूर उसे बहुत पसंद तो नहीं करती लेकिन चूंकि मेरा दोस्त है इसलिए सारी औपचारिकताएँ पूरी करती है।

'देखो, कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानमती का कुनबा जोड़ा . . . तुम्हें लगता ये सब चलेगा? मैं चैलेंज करता हूं साल छ: महीने के अंदर ही ये सब ढेर हो जायेंगे।` शकील ने कहा।

'हो सकता है तुम ठीक कह रहे हो. . .लेकिन इस वक्त जो हुआ वो अच्छा ही हुआ।`

'ये तुम अखबार वालों का सोचना है यार. . .बताओ क्या फ़र्क़ पड़ेगा।`

'अरे यार नेता जेल में बंद तो नहीं है।`

हम विस्की पीते रहे। गुलशन कबाब ले आया। कुछ देर बाद नूर भी आ गयी। वह किसी तरह का 'एलकोहल` नहीं लेती लेकिन पीना बुरा भी नहीं समझती। नूर के सामने शकील के अंदर और जोश आ गया।

“देख लेना यार सब ठीक हो जायेगा. . .” नूर यह सुनकर कुछ मुस्कुरा दी। शकील देख नहीं पाया।

“और सुनाओ. . .तुम्हारे बीवी बच्चे कैसे हैं?” मैंने बात बदलने के लिए सवाल पूछा।

“यार कमाल की पढ़ाई की तरफ से फिक्रमंद हूं. . .वहां कोई अच्छा स्कूल नहीं है।”

“छोटे शहरों में क्या अच्छा है?”

वह बात को टाल गया और बोला “यार मैं सोचता हूं कि कमाल का एडमीशन दिल्ली के किसी अच्छे स्कूल में करा दूं।”

“क्या उसे हॉस्टल में रखना चाहते हो?”

वह कुछ देर सोचता रहा फिर दाढ़ी खुजाते हुए बोला, 'यार मैं सोचता हूं दिल्ली आ जाऊं।`

“क्या मतलब?”

“मतलब दिल्ली में घर ले लूं।” उसने कहा, “वैसे भी महीने में दिल्ली के चार-पांच चक्कर लग जाते हैं।”

“चुनावक्षेत्र छोड़ दोगे?”

“चुनावक्षेत्र कहां भागा जा रहा है।”

“मतलब?”

“मतलब ये कि दिल्ली में ही सब कुछ होता है।” वह खामोश हो गया।

“क्या?”

“सब कुछ. . .टिकट यहीं से मिलते हैं। नेता यहीं से तय होते हैं। नीतियां यहीं से बनती हैं, बड़े-बड़े नेता यहीं रहते हैं। उनका दरबार यहीं लगता है. . .यहां जो फ़ैसले हो जाते हैं। उन्हें लागू किया जाता है देश में।” वह विश्वास से बोला।

“ओहो।”

“मेरा पन्द्रह साल का यही अनुभव है. . .जो लोग दिल्ली में हैं उन्हें फायदा पहुंचता है. . .जो दूर बैठे हैं. . .वो दूर ही रहते हैं।

“लेकिन तुम्हारा चुनाव क्षेत्र।”

“यार तुम क्या बात करते हो? चुनाव क्षेत्र है क्या? मुश्किल से पचास आदमी हैं जिनके हाथ में वोट हैं। उन पचास आदमियों को दिल्ली बैठकर आसानी से साध जा सकता है। सबके सालों के दिल्ली में काम पड़ते हैं। कोई हज पर जाना चाहता है, कोई अपने लड़के को दुबई में नौकरी दिलाना चाहता है, कोई आल इण्डिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में ऑपरेशन कराना चाहता है. . .ये सब काम कहां होते हैं? दिल्ली में? और फिर क्षेत्र में मेरी उपस्थिति तो है ही है। मेरा घर है, मेरे बाग हैं, मेरा पेट्रोल पम्प है, मेरा कोल्ड स्टोरेज है, मेरी मार्केट है. . .और क्या चाहिए।”

“बेगम रहेंगी तुम्हारी दिल्ली।”

“अब ये उनकी मरज़ी . . .लगता तो नहीं।”

“तो यहां मज़े करोगे।”

वह दबी-दबी सी हंसी हंसने लगा।

मेरी हाथ में वार्ड नंबर और बेड नंबर की पर्ची है जो मुझे कल ही बाबा ने दी थी। उसे किसी ने मेरे लिए मैसेज दिया था कि अलीगढ़ से जावेद कमाल दिल्ली ले लाये गये हैं और अस्पताल में भर्ती है। होते हुआते आज चौथा दिन है। सोचा जावेद कमाल बीमार हैं। इलाज चल रहा है। उनके लिए कुछ फल वग़ैरा ही लेता चलूं। आश्रम के चौराहे से फल खरीदे और अस्पताल आ गया। बेमौसम की बारिश तो नहीं है लेकिन छींटे पड़ रहे हैं।

क्या आदमी है यार जावेद कमाल। मुझे अलीगढ़ में बिताये दिन याद आ गये। वे शामें याद आ गयीं जब जावेद कमाल की कैंटीन में महफ़िलें जमा करती थीं और वे अपने दोस्तों पर पानी की तरह पैसा बहाते थे। उनके शेर याद आ गये। उनकी दावतें याद आ गयीं। उनका फक्क़ड़पन और अकडूपन याद आ गया। रॉ सिल्क की शेरवानी, चौड़े पांयचे का पाजामा, सलीम शाही जूते, गेहुआँ रंग, लंबे सूखे बाल, बड़ी बड़ी रौशन आंखें, हाथों में पानों का बण्डल और विल्स फिल्टर सिगरेट की दो डिब्बियां. . .उनकी गलियां. ..रामपुर के लतीफ़े. . .फिर कैंटीन का बंद होना. . .उन्हें पी.आर.ओ. आफिस में क्लर्की करते देखना।

वार्डों के चक्कर लगाता रहा। पता नहीं सोलह नंबर का वार्ड कहां है। वैसे भी अस्पताल मुझे नर्वस कर देते हैं और यह विशाल काय सरकारी अस्पताल जहां हर तरफ गंदगी है, जहां गैलरियों में मरीज़ लेटे हैं, जहां गरीबी और भुखमरी अपने चरम पर दिखाई देती है, मुझे और ज्यादा नर्वस कर रहे हैं लेकिन वार्ड नंबर सोलह और बेड नंबर सात तक तो जाना ही है। वहीं चिर परिचित मुस्कुराहट आयेगी उनके चेहरे पर।

वार्ड के अंदर आ गया। लंबा चौड़ा हाल है जहां तीन तरफ मरीज भरे पड़े हैं। बेड नंबर कहां लिखे हैं? शायद नहीं है? या किसी ऐसी जगह लिखे हैं जो अस्पताल वालों को ही नज़र आते हैं। बहरहाल पूछता हुआ बेड नंबर सात पर पहुंचा देखा बेड खाली है। लगता है कहीं और शिफ्ट कर दिया है। मैं कुछ देर खाली बेड को देखता रहा। आसपास जो मरीज थे वे बता न सके कि जावेद कमाल को किस वार्ड में शिफ्ट किया गया है। कुछ देर बाद गुज़रती हुई नर्स से पूछा तो जवाब देने के लिए रुकी नहीं, चलते चलते बोली- 'ही एक्सपायरड यस्टर डे।`

मैं सन्नाटे में आ गया। जावेद कमाल कल मर गये। मर गये? कई बार अपने आपसे सवाल किया। जवाब नहीं आया कि मर गये। मैं खाली बेड को देखता रहा। मर गये जावेद कमाल? मुझे देर हो गयी। मैं बेड को देखता रहा। वहां कुछ न था। गंदे से गद्दे पर गंदी सी चादर बिछी थी जिसमें इधर-उधर कई धब्बे और छेद थे। मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। हाथ में फल वाला बैग था उसे बेड के नीचे सिरहाने की तरफ रख दिया। इससे पहले कि आसपास वाले मुझसे कुछ पूछते मैं तेज़ी से बाहर निकल गया। अब भी फुहार पड़ रही थी। पूरा शहर गीला-गीला हो रहा था। मेरी आंखों मेंं आंसू आ गये। मैं अपने आपको कन्विंस नहीं कर पाया कि जावेद कमाल मर गये हैं। यार जावेद कमाल जैसा आदमी कैसे मर सकता है? जो यारों का यार हो, जो मनमौजी और मस्त हो, जो जिंदगी की हर खूबसूरत चीज़ से प्यार करता हो, जो लतीफ़ों का बादशाह हो, जो गालियों का एक्सपर्ट हो वो मर कैसे सकता है. . .मैंने आंखों से आंसू पोंछे. . .नहीं, जावेद कमाल मरे नहीं. . .शायर कभी नहीं मरते

. . . दोस्त कभी नहीं मरते. . .और वो भी जावेद कमाल जैसे दोस्त . . . जो आन-बान से रहते हों, जो दोस्तों के लिए कभी इतना-इतना झुक जाते हों कि जमीन को चूम लें और दुश्मनों के लिए सीना तानकर इस तरह खड़े हो जाते हों कि सिर बादलों से टकराने लगे. . .वो मर कैसे सकते हैं. . .चांदनी रातें. . .कच्ची पगडण्डियां, हवा के झोंके, ओस की बूंद, गुलाब के फूल मर कैसे सकते हैं. . .अब मैं रोने लगा. . . अस्पताल के बाहर शायद बहुत लोग ये करते होंगे. . .किसी ने तवज्जो नहीं दी. . .मुझे यकीन है जावेद कमाल नहीं मरे. . .दुनिया झूठ बोलती है. . .

----१३----

सरयू जेल से छूटते ही घर चला गया। वापस तब भी किसी से नहीं मिला। बस उड़ी-उड़ी बातें सुनने में आती रही। ये भी पता नहीं चला कि वह कहां नौकरी कर रहा है क्योंकि उसका अख़बार तो बंद हो ही चुका था। मैंने नवीन जोशी, रावत और मोहसिन टेढ़े ने सोचा कि सरयू से चलकर मिला जाये। हम रावत के नेतृत्व में क्योंकि रावत का नेतृत्व करने का सबसे ज्यादा शौक है, सरयू के कमरे पहुंचे। वह कमरे पर ही था मिल गया। हम सब को एक साथ देखकर उसके चेहरे पर अजीब से भाव आये कि पता नहीं। उसे खुश होना चाहिए या कुछ और महसूस करना चाहिए।

उसने विस्तार से अट्ठारह महीने का लेखा-जोखा दिया। सबसे अहम बात तो यही बताई कि अमरेश जी अपने बयान में साफ-साफ कहा था कि अखबार में केवल उनका नाम संपादक के तौर पर जाता था लेकिन उसमें जो भी छपता था उसका निर्णय सरयू डोभाल लेते थे। मतलब यह कि असली अपराधी वही है। इसके बाद सरयू का कहना था कि जेल में उसे पार्टी की तरफ से कोई मदद नहीं मिली। अगर उसके साथ आर.एस.एस. के लोग न होते तो वह शायद मर जाता। मुझे यह डर लगने लगा कि सरयू कहीं आर.एस.एस. में न चला जाये। लेकिन मैं खामोश रहा। सरयू बताता रहा कि तिहाड़ में दूसरे समाजवादी कैदी आराम से थे। उनके पास पैसा भी था, उनकी जरूरतें भी पूरी होती थी और जेलवाले भी उनसे कुछ डरते थे क्योंकि उनके पीछे राजनैतिक ताकत थी। मुझे पार्टी ने कुछ नहीं समझा क्योंकि शायद मैं उनका मेम्बर

नहीं हूं लेकिन उनके अखबार का पत्रकार था। डिसूजा इसके मालिक थे। अमरेश जी प्रधन संपादक थे और इस अखबार के काम करने की वजह से ही गिरफ्तार किया गया था। क्या पार्टी की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि मेरा भी ध्यान रखा जाये? सब जानते हैं विक्टर के पास पैसे की कमी नहीं है, साधनों की कमी नहीं है।``

“और अब तो वह मिनिस्टर है।” रावत ने कहा।

“इन लोगों की तरफ से मैं बहुत निराश हुआ, दुखी हुआ, अपमानित महसूस किया मैंने. . .मुझे यार आर.एस.एस. वाले तौलिया साबुन दिया करते थे. . .यार. . .

“सरयू कहीं तुम आर.एस.एस. तो नहीं ज्वाइन कर लोगे?” मैंने पूछ ही लिया।

“आर.एस.एस. ज्वाइन करने की मेरी उम्र निकल गयी।” वह हंसकर बोला, देख निजी तौर पर, व्यक्तिगत स्तर पर मुझे वे अच्छे लोग लगे। सामाजिक स्तर पर, राजनैतिक स्तर पर मैं उनसे सहमत नहीं हो सकता. . .बल्कि हो सकता है मैं जेल के अनुभवों के आधार पर आर.एस.एस. पर किताब लिखूँ. . .वैसे मैंने ये कुछ कविताएं लिखी है कहो तो सुनाऊं।”

सरयू ने कविताएं सुनाईं तो सन्नाटा गहरा हो गया। बिल्कुल अलग ढंग की बड़ी सशक्त और मार्मिक कविताएं लिखी थी उसने।

“इन कविताओं के छपते ही तुम हिंदी के प्रमुख कवियों में. . .” रावत ने कहा।

“अरे छोड़ो यार।”

“नहीं, कविताएं बहुत ज्यादा अच्छी हैं. . .आज हिंदी में कोई ऐसा नहीं लिख रहा।” नवीन ने कहा।

इसके बाद नवीन ने भी अपनी कुछ नयी कविताएं सुनायीं। देर तक हर सरयू के यहां बैठे रहे। सरयू ने बताया कि उसकी बात 'नया भारत` में चल रही है, हो सकता है वहां नौकरी लग जाये।

वापसी पर मैं मोहसिन टेढ़े को अपने साथ लेता आया। ये हम दोनों के लिए अच्छा है। उसे घर का पका खाना मिल जाता है। नूर उससे गप्प शप्प कर लेती है। उसे मोहसिन टेढ़े के कुछ अंदाज जैसे छोटी-छोटी बातों पर बेहद आश्चर्य व्यक्त करना आदि पसंद आते हैं क्योंकि वह उनके नकलीपन को पहचान लेती है। मोहसिन टेढ़ा उससे योरोप के बारे में सैकड़ों सवाल करता है। नूर थोड़ी बहुत फ्रेंच भी जानती है और मोहसिन को गाइड करती रहती है कि यहां से डिप्लोमा करने के बाद उसे फ्रांस की किस यूनीवर्सिटी में जाना चाहिए।

मोहसिन टेढ़ा नूर को अपनी जायदाद के झगड़ों, अपने अकेले होने, जायदाद बेचकर दिल्ली शिफ्ट हो जाने के इरादों, अपनी पोलियो की बीमारी वगै़रा के बारे में बताता रहता है। नूर हिन्दुस्तानी तेजी से सीखी है और अब वह अंग्रेज़ी की बैसाखी के सहारे नहीं है। उसकी सबसे बड़ी टीचर है गुलशनिया यानी गुलशन की बीवी जो हम लोगों के साथ ही रहते हैं। इस कोठी में आने के बाद अब्बा ने गांव से गुलशन को यहां भेज दिया था।

मैं ये समझ रहा था कि शायद नूर को दिल्ली ममें 'एडजस्ट` करना मुश्किल होगा। लेकिन वह बड़े आराम से रहने लगी। पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन सेंटर में उसे नौकरी मिल गयी है। वहां अपने काम से खुश है। सुबह मैं उसे आफिस छोड़ता हूं। शाम कभी-कभी जब मुझे कहीं जाना होता है तो स्कूटर करके घर आ जाती है। बिल्कुल सीधी-साधी सामान्य और निश्चिंत जिंदगी जी रही है। दिन में एक बार लंदन फोन करना नहीं छुटा है। जब तक वह ममी से पन्द्रह मिनट बात नहीं कर लेती तब तक खाना हज़म नहीं होता।

आफिस पहुंचा तो हसन साहब ने बताया कि मेरी तलबी हुई है। ब्यूरो चीफ़ ने मुझे बुलाया है।

“क्या मामला हो सकता है हसन भाई, अब तो दूसरी आजादी का जश्न भी मनाया जा चुका है।”

“टोटल रेवोल्यूशन` आ गया है. . .फिर भी हो सकता है कहीं दुम फंसी रह गयी हो. . .जाओ देखो क्या कहते हैं”, वे बोले।

सक्सेना साहब के विशाल कमरे में पहुंचा तो पता चला कि वे एडीटर इन चीफ के पास हैं और मैं कुछ देर बात आऊं। इधर-उधर देखा तो सबिंग में सुप्रिया दिखाई दे गयी। मैं उसके पास आ गया। उसके चेहरे पर वही उदासी थी। उसने बताया कि उसके भाइयों कोमल और सुकुमार का अभी तक कोई पता नहीं चला है और वह कलकत्ता जा रही है। हम दोनों कुछ देर तक पश्चिम बंगाल के आतंक की चर्चा करते रहे। थोड़ी देर बाद, उसे दिलासा देने के बाद मैं उठा तो उसके हाथ पर मैंने एक क्षण के लिए अपना हाथ रख दिया। वह मुस्कुरा दी। फीकी सी मुस्कुराहट।

सक्सेना साहब हैं तो ब्यूरो चीफ लेकिन माना जाता है कि मैनेजमेण्ट की नाक का बाल हैं और कभी-कभी एडीटर-इन-चीफ के ऊपर भी हावी हो जाते हैं। उन्होंने मुझसे बैठने के लिए और एक दो काग़जों पर दस्तख़त करके बोले “पिछले साल तुमने अलीगढ़, संभल वगै़रा पर जो रिपोर्ट की थी वो मैंने पढ़ी हैं।”

“जी।”

“काफी संवेदना है तुम्हारे लेखन में. . .इमोशन्स का भी अच्छा इस्तेमाल करते हो।”

मैं समझ नहीं पा रहा था कि यह भूमिका क्यों बांधी जा रही है। कुछ देर के बाद वे नुक्ते पर आ गये। देखो पार्लियामेंट बंधुआ मज़दूर वाले मसले पर बहुत सीरियल है। हम पर यह इल्जाम तो है ही है कि हम 'अर्बन` हैं। हमारे यहां गांव के बारे में कुछ नहीं छपता या कम छपता है. . .अब सारे अखबार बंधुवा मज़दूरों पर छापें ओर हम ख़ामोश रहें यह भी नहीं हो सकता. . .तुम्हें इस तरह की रिपोर्टिंग में दिलचस्पी भी है”, वे बोलते-बोलते रुक गये। आदेश नहीं देना चाहते थे। पहले यह जानना चाहते थे कि मुझ्रे कितनी रुचि है।

“लेकिन हसन साहब. . .मैं तो. . .”

“उनसे बात हो गयी है. . .हम तुम्हें ब्यूरो मे ले लेंगे. . .तुम्हें तो कोई. . .?”

“जी नहीं, मैं तो ये काम खुशी खुशी करूंगा।”

मैंने 'हां` कर दी थी लेकिन एक सवाल मेरे दिमाग की दीवारों से टकराता रहा। अगर पार्लियामेण्ट में 'कुलक लॉबी` और 'उद्योग लॉबी` के बीच टकराव की स्थिति न होती तो क्या बधुआ मज़दूर मुद्दा आज भी उसी तरह दबा न पड़ा रहता जैसे आज़ादी के बाद से लेकर आज तक दबा पड़ा था? क्या इसका मतलब यह हुआ कि मुद्दे भी 'दिए` जाते हैं? कौन देता है? वे लोग जो सत्ता संघर्ष में या सत्ता बनाये रखने की कोशिश में लगे हुए हैं? क्या इसका यह मतलब हुआ कि मुद्दे या तो वास्तविक मुद्दे नहीं होते या उनको उठाने वालों का उद्देश्य मुद्दा विशेष नहीं बल्कि कुछ और होता है। कभी-कभी कुछ मुद्दे इसलिए भी उठाये जाते हैं कि वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाना जा सका। लेकिन इतना तय है कि बंधुआ मज़दूरी का मुद्दा ग्रामीण जीवन के शोषण की 'हाईलाइट` करेगा।

सक्सेना साहब ने जो नाम और फोन नंबर दिया था वहां फोन किया तो “फौरन डॉ. आर.एन. सागर से बात हो गयी। उन्होंने बताया कि 'रुरल इंस्टीट्यूट` की टीम अगले सप्ताह पूर्णिया जा रही है और मैं उस टीम के साथ जाना चाहूं तो जा सकता हूं। अगले दिन मैं इंस्टीट्यूट पहुंच गया। यहां डॉ. आर. एन. सागर से मिलना था। वे अभी तक आये नहीं थे। मैं इंतिज़ार करने लगा। कुछ देर बाद आये तो कई अर्थों में बहुत अजीब लगे। दिन का ग्यारह बजा था लेकिन यह लगता था कि डॉ. सागर के लिए रात के आठ का समय है क्योंकि वे 'महक` रहे थे। उसके विशाल सिर पर ढेर सारे बाल और चेहरे पर कार्ल मार्क्स कट फहराती हुई दाढ़ी थी। बंद गले का काला कोट और पतलून पहने थे पर कपड़े उनके शरीर पर ऐसे लग रहे थे जैसे यह शरीर इस तरह के कपड़ों के लिए बना ही नहीं। कुछ ही देर में उन्होंने बंधुआ मज़दूर सर्वेक्षण के बारे में दुर्लभ जानकारियां दी। यह साबित होते देर नहीं लगी कि डॉ. सागर न सिर्फ विषय के विशेषज्ञ हैं बल्कि बहुत पढ़े लिखे और सोचने समझने वाले, मौलिक किस्म के आदमी हैं। उन्होंने मुझे चाय पिलाई और खुद पानी पीते रहे क्योंकि जाड़े के इस मौसम में भी उन्हें खूब पसीना आ रहा था और रुमाल से अपना माथा पोछ रहे थे।

एयरपोर्ट पर ही पता चला कि पूर्णिया जाने वाली टीम में सरयू भी 'नया भारत` की तरफ से जा रहा है। अब चूंकि मेरा काफी हाउस जाना छूट गया था इसलिए सरयू से मुलाकात ही न होती थी। एयरपोर्ट पर उसे देखकर खुश हो गया क्योंकि इतने सालों बाद उसके साथ कुछ समय बिता सकूंगा और अपने पुराने साहित्यिक मित्रों के बारे में जानकारियां मिलेंगीं। सरयू जब भी मिलता है यह शिकायत करता है कि मैंने कहानियां लिखना क्यों बंद कर दिया है। मेरे पास इसका सवाल का कोई जवाब नहीं है। पत्रकारिता का काम सोख लेता है लेकिन दूसरे पत्रकार भी तो लिखते हैं? फिर भी शायद यह लगता है कि मैं जैसा लिखना चाहता था वैसा लिख नहीं सकूंगा या लंबे अंतराल के बाद आत्मविश्वास डिग जाता है या दूसरे तो कहां के कहां निकल गये और मैं यही रह गया। मैं उस दौड़ में क्या शामिल होऊं? बहरहाल सरयू ने एयरपोर्ट पर चाय पीते हुए फिर यही से बात शुरू की और कहा कि यार तुमने कहानियां लिखनी क्यों बंद कर दिया है। मैंने सवाल को टालते हुए पुराना जवाब दिया कि यार टाइम ही नहीं मिल पाता, ये अखबार का काम बड़ा जानलेवा होता है।

सरयू सागर साहब को पहले से जानता है। उसने जो जानकारियां दीं उनसे सागर साहब की नामुकम्मल तस्वीर पूरी हो गयी। सरयू ने बताया “दरअसल सागर साहब स्वयं एक बंधुआ मज़दूर परिवार में पैदा हुए थे। सागर उन्होंने उपनाम रखा था कि किसी ज़माने में कविताएं लिखा करते थे। वे पता नहीं कैसे गांव के स्कूल में पहुंच गये थे। उसके बाद तो उन्होंने कभी पीछे नहीं देखा। सरयू ने बताया यार जीनियस हैं सागर साहब. . .तुम सोचो मूल जर्मन में 'दास कैपिटल` पर इनकी टीका बर्लिन विश्वविद्यालय ने छापी है। इनके जैसा पढ़ा लिखा और मौलिक सोच रखने वाला यार मैंने तो आजकल देखा नहीं।”

किसी के बारे में कुछ सुनकर न प्रभावित होने वाली प्रवृत्ति के कारण मैंने इन बातों का कोई नोटिस नहीं लिया और सोचा खुद ही पता चल जायेगा सागर साहब क्या है?

यह 'हापिंग` “लाइट है दिल्ली से लखनऊ और फिर पटना और फिर रांची जहां हमें दो दिन रुकना है ताकि 'रीजनल रुरल डवलप्मेंट इंस्टीट्यूट` में 'लैण्ड रेवेन्यु` रिकार्ड देख लें। उसके बाद पूर्णिया जाना है। हापिंग “लाइट बड़े मज़े से लखनऊ में दो घण्टे के लिए खड़ी हो गयी। यही हरकत उसने पटना में भी की। लेकिन मैं और सरयू बेफिक्र थे कि सालों बाद मिले हैं और बातचीत करने का मौका मिल रहा है।

- “यार तुम्हें मालूम है अमरेश जी का क्या हुआ?”

- “कौन अमरेश जी?”

- “यार वही. .कभी कभी काफी हाउस भी आते थे. . .जार्ज मैथ्यू के दोस्त. . .

- “हां हां याद आ गया। बताओ क्या हुआ?”

- “यार कुछ समय में नहीं आता क्या हो रहा है। अभी पिछले महीने मुझे अमरेश जी से मिलना था। मैं उनसे मिले डिफेन्स कालोनी डी-१३ में पहुंचा और सीधे सर्वेण्ट क्वार्टर पहुंच गया। क्योंकि अमरेश जी इससे पहले कोठियों के सर्वेण्ट क्वार्टरों में ही किराये पर रहा करता थे। पर कोई हमें मुख्य कोठी में ले गया। यार अमरेश जी ने वह कोठी खरीद ली है। क्या कोठी है यार. . .और डियर क्या लायब्रेरी बनाई है. . .लाखों रुपये की तो किताबें हैं. . .हर चीज़ 'टाप` की है. . .

- “ये सब हुआ कैसे?”

- “यार बताते हैं कि किसी डील में जार्ज मैथ्यू ने कई सौ करोड़ बनाये हैं और इस डील में अमरेश जी भी साथ थे. .अब बताओ यार मैं तो ये सब देखकर भी यक़ीन नहीं कर सकता।” वह बताते बताते शरमाने लगा।

- “जार्ज मैथ्यू की तो समाजवादी छवि है. . .ट्रेड यूनियन बैक ग्राउण्ड है. . .

- “यही तो हैरत है यार. . .”

- “हैरत करने का ज़माना चला गया प्यारे. . .”

- “अच्छा और सुनो. . .कामरेड सी.सी. कनाडा में जाकर बस गये हैं।”

- “क्या अमित के साथ वो भी गये?”

- “हां. . .कहते हैं उन्होंने जेल में माफी मांग ली थी. . .उनके भाई कनाड़ा से आये थे और उन्हें अपने साथ ले गये।”

- “ओर सुनो भुवन पंत. . .उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री का पी.एस. हो गया है।”

- “वही जो सब को डांटता था और अपने को सबसे बड़ा क्रांतिकारी समझता था।”

- “हां वही।”

- “तो यार तुम्हारे सब नक्सलवादी वाले ऐसे ही निकले।”

- “नहीं यार. . .” वह बुरा मानकर बोला जो लोग काम करते हैं वो तो जंगलों में हैं. . .उन्हें क्या मतलब है काफी हाउस या शहरों से. . .ऐसे हज़ारों हैं. . .

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''रांची में ज़मीन खरीद-फ़रोख्त के रिकार्ड देखिए तो आपको हक़ीकत का पता चल जायेगा।” सागर साहब ने हमें एक मोटा-पोथा थमा दिया।

“ये जो आप रांची शहर देख रहे हैं यह आदिवासियों की ज़मीन पर बसा है। आज यह करोड़ों रुपये की ज़मीन है. . .लेकिन यह किस तरह, कितना पैसा देकर खरीदी गयी है, ये रिकार्ड बतायेगा. . .कहीं कहीं . . .ज़मीन खरीदने वालों के नाम नहीं दिए गये हैं. .क्योंकि वे लोग इतने असरदार. . .इतने बड़े. . .इतने सम्मानित हैं कि चोरों की सूची में उनका नाम दर्ज करने की हिम्मत यहां किसी को नहीं है। ये देखिए. ..पांच एकड़ ज़मीन. . .सौ रुपये में बिकी. . .ये देखिए दो एकड़ जमीन. . .दस रुपये में. . .ये कहानियां नहीं हैं. . .लैण्ड रिकार्ड है. . .अगर चाहें तो मूल बैनामे भी देख सकते हैं।”

हम हैरत से रिकार्ड देखने लगे। पता लगने लगा कि देश के अंदर कितने देश हैं। देश किसका है और विदेशी कौन है?

- “हमने इन आदिवासियों के साथ वही किया है जो अमरीकी में 'रेड इण्डियन्स` के साथ किया गया था। पर इस देश में कोई यह मानता नहीं क्योंकि जिनके पास यह मानने का अधिकार है उन्होंने ही यह

अपराध किया है। आज वे सब आदिवासी बंधुआ हैं जिनके पास कल तक ज़मीन थी। उन्हें यह सज़ा क्यों मिली है? क्या इसलिए कि वे हमसे ज्यादा चतुर नहीं हैं?”

रांची में हमारी मुलाकात लेबर कमिश्नर से हुई और एक और आश्चर्य का पहाड़ टूट पड़ा।

कभी-कभी महज़ इत्तफ़ाक़ से कुछ ऐसे लोग ऐसी जगह पहुंच जाते हैं कि उन्हें वहां देखकर हैरानी होती है। लेबर कमिश्नर विनय टण्डन भी ऐसे ही आदमी हैं। उन्हें देखकर कोई यह नहीं कह सकता कि वे आई.ए.एस. होंगे। उलझे-उलझे से बेतरतीब बाल, लंबा पतला चेहरा, गहरी आंखें जिन पर मोटा चश्मा, बहुत मामूली सीधी-सीधी कमीज़ पैण्ट और पैरों में सस्ती किस्म की चप्पल। हमें बताया गया कि विनय टंडन 'सिंगिल` है मतलब अविवाहित हैं। अपना खाना खुद पकाते हैं और अपने कपड़े भी खुद धोते हैं। आफिस ठीक साढ़े नौ बजे आते हैं और शाम छ: बजे जाते हैं। सरकारी गाड़ी सिर्फ दफ्तर लाती ले जाती है। अपने निजी आने-जाने के लिए वे रिक्शे का सहारा लेते हैं। विनय टण्डन को काफी लोग पागल कहते हैं। कुछ सिड़ी, सनकी, दीवाना कुछ घमण्डी और कुछ मूर्ख बताते हैं।

सुबह हम लोग तीन जीपों पर बंधुआ मज़दूरों का पता लगाने निकले। बहुत जल्दी ही डामर वाली सड़क ख़त्म हो गयी और कच्ची धूल उड़ाती पगडण्डियों जैसी सड़कों पर गाड़ी आ गयी। दो ही एक घंटे के अंदर पूरे चेहरे, हाथों और कपड़ों पर धूल की एक गहरी परत जम गयी। रास्ते के धचकों से कमर की ऐसी तैसी हो गयी। दरअसल रास्ते और क्षेत्र की दिक्कतों को छोड़कर हमारा काम आसान था। हम खेतिहर मज़दूरों से यह पूछते थे कि क्या उन्हें एक जगह से काम छोड़कर दूसरी जगह काम करने की आज़ादी है? यदि उत्तर 'हां` में मिलता था तो बंधुआ मज़दूर नहीं हैं ओर नहीं में मिलता था तो है। उसके बारे दूसरे सवाल भी थे। पूरा परिवार बंधुआ है? कितने समय या कितनी पीढ़ियों से बंधुआ है। क्या पैसा मिलता है? कितना अनाज या जोतने के लिए ज़मीन मिलती है. . .वगैऱा वगै़रा. . .हमें यह भी बताया गया था कि कोई

कमिश्नर 'रैंक` का आदमी कभी इस तरह के सर्वेक्षणों में नहीं जाता लेकिन विनय टण्डन के चेहरे पर ज़रा भी उकताहट कभी नज़र नहीं नहीं पड़ती थी। इन सवालों के साथ बंधुआ मज़दूरों से यह सवाल भी पूछा जाता था कि क्या साल भर खाने को अनाज हो जाता है? इसके उत्तर में आमतौर पर वे बताते थे कि दो-एक महीने जंगली पेड़ों की जड़े खाकर गुज़ारा करना पड़ता है।

मैं और सरयू बंधुआ मज़दूरों के झोपड़े नुमा घरों में जाते थे। पूरे घर में जो कुछ भी दिखाई देता था। उस सबको अगर जमा करके बाज़ार में बेचा जाये तो कोई दो रुपये का भी नहीं खरीदेगा, यह हमारी पक्की राय बनी थी। कुछ चटाइयां, चीथड़े हुए कपड़े, मिट्टी के बर्तन, मिट्टी का दिया और मुश्किल से एक टीन का कनस्तर ही दिखाई पड़ते थे। दूसरी तरफ बड़े-बड़े फार्म थे जिनमें पचास हज़ार एकड़ जमीन थी। दो हज़ार एकड़ भगवान के नाम. . .हज़ार एकड़ कुत्ते के नाम. . .इसी तरह ज़मीन पर कब्जा बनाया गया था।

एक दिन कई गांवों का चक्कर काटकर एक दिन हमारा कारवां एक कस्बे के बी.डी.ओ. कार्यालय जा रहा था। हम रास्ते में ही थे कि एक मामूली और गरीब किसान ने हाथ देकर जीप को रुकने का इशारा किया। इस जीप पर विनय टण्डन बैठे थे। उन्होंने “फौरन ड्राइवर से कहा कि जीप रोको। जीप रुकी तो पीछे वाली जीपें भी रुक गयीं और हम लोग जीप से उतर पड़े। यह गरीब किसान बता रहा था कि कस्बे के सिनेमा हाल के मालिक ने उसके लड़के के साथ मारपीट की है और थाने वाले उसकी रपट नहीं लिख रहे हैं। विनय टण्डन ने उस किसान को “फौरन अपनी जीप में बैठा लिया। ब्लाक ऑफिस में बी.डी.ओ. शायद विनय टण्डन को भी दिल्ली से आये कोई शोधकर्ता समझे। टंडन जी ने खाये पिये मोटे और ताज़े देखने में राशी लगने वाले बी.डी.ओ. से कहा कि वे इस किसान को थाने ले जायें और एफ.आई.आर. दर्ज करा दें। इसके बाद हमने वे जानकारियां लीं जो लेना थीं और चाय पानी के बाद आगे बढ़े। कुछ ही दूर गये होंगे कि एक जीप खराब हो गयी। यह तय पाया कि लौटकर ब्लाक ऑफिस चला जाये और वहां से जीप ली

जाये ताकि आगे का कार्यक्रम पूरा हो सके।

हम लौटकर ब्लाक ऑफिस की तरफ जा रहे थे तो फिर वही किसान रास्ते में मिल गया। उसने फिर हाथ दिया और टण्डन जी ने फिर जीप रुकवा दी। किसान ने बताया कि बी.डी.ओ. साहब ने थानेदार के नाम पर्चा लिख कर दिया था लेकिन थाने में फिर भी रपट नहीं लिखी गयी। टण्डन जी ने फिर उसे जीप में बैठा लिया।

बी.डी.ओ. बरात को बिदा करके सो गये थे कि उन्हें पता चला फिर सब आ गये हैं। बी.डी.ओ. को देखते ही टण्डन जी ने कहा मैंने आपको आदेश किया था कि थाने जाकर इस आदमी की एफ.आई.आर. लिखा दीजिए। आपने आदेश का पालन क्यों नहीं किया?”

आदेश शब्द सुनते ही बी.डी.ओ. के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। जाहिर है कि इस शब्द के प्रयोग का अधिकार सरकारी अधिकारियों को ही है। वे गिड़गिड़ाने लगे. . .सर सर . . .मैंने पर्चा. . . ।

“यह तो आदेश नहीं था कि आप पर्चा लिखकर दें. . .आपने आदेश का पालन नहीं किया है और मैं चाहूं तो आपको अभी सस्पेण्ड कर सकता हूं।”

अब तो बी.डी.ओ. का भारी भरकम शरीर लोच खाकर ज़मीन से आ लगा।

''आप सुबह इसके साथ थाने जाइये। रपट लिखवाइये। रहट की कापी लेकर कल ग्यारह बजे तक सर्किट हाउस आइये. . .और मुझे दिखाइये।”

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सर्किट हाउस में रोज़ रात का खाना खाने के बाद पीछे वाले बरामदे में सब बैठ जाते थे। विनय टण्डन और सागर साहब आदिवासी समस्या और बंधुआ मज़दूरी के विषय में बातचीत करते थे। हम चार पांच लोगों का काम सवाल पूछना था। विनय टण्डन सारी उम्र आदिवासी इलाकों में ही रहे हैं। उन्होंने बताया कि मध्य प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में एक समय था कि जब आदिवासियों को कपड़े के दुकानदार चारों तरफ से

नाप कर कपड़ा देते थे। लंबाई चार गज़ और चौड़ाई एक गज़ इधर से . . .एक गज़ उधर से। उन्होंने बताया कि पटवारी आदिवासी क्षेत्रों में जाने वाला सबसे बड़ा अधिकारी हुआ करता था। वह मौका मुआयना करने इस तरह जाता था कि चारपाई पर बैठ जाता था और आदिवासी चारपाई अपने कंधें पर उठाये-उठाये उसे खेत-खेत ले जाकर मौका मोआयना कराते थे। एक पटवारी रेडियो का शौकीन था और अपने साथ रेडियो भी ले जाता था। चारपाई पर वह खुद बैठता था। एक आदमी सिर पर रेडियो उठाता था। दूसरा बैटरी उठाता था। दो लोग बांस में बंधे एरियल उठाते थे और इस तरह मौका मोआयना होता था। जब कभी पटवारी का दिल चाहता था वह रेडियो बजाने लगता था। रात में पूरा गांव चंदा करके उसे अच्छा-से-अच्छा खाना खिलाता थे। लेकिन पटवारी कोई बहाना बनाकर खाना नहीं खाता था। जैसे रोटियां जल गयी हैं या मुर्गे में नमक ज्य़ादा हो गया है। उसके खाना न खाने से पूरा गांव डर जाया करता था और हाथ जोड़ता था कि पटवारी खाना खा लें। पटवारी के खाना न खाने से उन्हें कितना नुकसान होगा इसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। पटवारी कहता था ठीक है मैं बीस रुपये लूंगा तब खाना खाऊंगा। वे किसी न किसी तरह उसे रुपये देते थे और तब वह खाना खाता था।

सागर साहब ने बताया कि छोटा नागपुर के आदिवासी क्षेत्रों में सूद पर पैसा देना संसार का सबसे ज्यादा मुनाफा देने वाला और सुरक्षित व्यवसाय है। इतना ब्याज संसार में और कहां मिल सकता है। उन्होंने ने बताया कि एक आदिवासी ने किसी तरह सूद समेत अपना सारा कर्जा चुका दिया। महाजन ने आदिवासी से कहा कि आज तो तुम बड़े खुश होंगे कि सारा कर्जा चुका दिया है। उसने कहा- 'हां महाराज बहुत खुश हूं।` साहूकार बोला- 'तो मुंह मीठा कराओ।` वह बोला- 'महाराज अब मेरे पास एक पैसा नहीं है।` साहूकार ने कहा- 'अच्छा अगर तुम्हारे पास पैसा होता तो कितने पैसे से मुंह मीठा करा देते।` उसने कहा- 'महाराज चार आने से करा देता।` साहूकार ने कहा- 'ठीक है. . .चार आने तुम्हारे

नाम खाते में चढ़ाये लेता हूं।`

“आदिवासियों की दुनिया अलग है। इतना सहयोग है उस दुनिया में कि आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते। उनके ऊपर हमने अपनी दुनिया लाद दी है। छल, कपट, लालच और हिंसा की दुनिया के नीचे ये पिस गये हैं अब न तो जंगल हैं जो इनके पेट भरते थे, न नदियों में पानी है जहां से इनकी सौ ज़रूरतें पूरी होती थीं। विकास के नाम पर इन्हें हमें लालची और झूठा-मक्कार बना दिया है। भाई ये तो हर तरफ से मारे गये हैं. . .अब शहर में जाकर मज़दूरी के अलावा क्या चारा है? एक ज़माने के गर्वीले आदिवासी जिन्होंने बड़े-बड़े सम्राटों के साथ युद्ध किए थे आज निरीह, कमज़ोर और दया के पात्र बन गये हैं। हमारे लोकतंत्र ने इन्हें यही दिया है।” सागर साहब ने खुलासा किया।

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'द नेशन` में बंधुआ मजदूरों पर मेरी रिपोर्ट छपने लगी तो हंगामा हो गया। पहली बार इतने बड़े पैमाने पर, देश के सबसे बड़े अख़बार में तस्वीरों के साथ एक ऐसी जिंदगी पेश होने लगी कि पढ़कर लोगों के रोंगटे खड़े हो गये। आजादी मिले चौथाई सदी बीत चुकी है और हमारे देश में लोगों की हालत जानवरों से भी बदतर है। एडीटर-इन-चीफ ने मुझे बुलाकर पीठ ठोकी। सक्सेना साहब तो मुझे अपनी खोज बता-बताकर नाम रोशन कर रहे थे। हसन साहब ने कहा- अच्छा है, देखे कब तक चलता है।” उनके इस कमेण्ट से मैं कुछ परेशान हो गया। सुप्रिया ने खासतौर पर काफी पिलाई और पूछती रही कि वहां क्या क्या देखा। नूर को भी रिपोर्ट पसंद आयीं। उसने उनकी अंग्रेजी भी ठीक की थी। इस तरह उनकी भाषा भी मंझ गयी थी। कहा जा रहा है कि पार्लियामेण्ट के अगले सत्र में मेरी इन रिपोर्ट के आधार पर विषय पर चर्चा का समय भी मांगा जायेगा।

सागर साहब बहुत खुश थे। एक दिन शाम उन्होंने घर बुलाया था। कुछ दूसरे सोशल साइंटिस्ट भी वहां थे। सागर साहब के यहां पीने पिलाने का प्रोग्राम हुआ था। ये कुछ हैरत की बात थी कि सागर साहब ने अब तक अपने रहने का तरीका बिल्कुल गांधीवादी रखा हुआ था। वे खुद एक कमरे में दरी पर बैठते थे। बाकी लोगों के लिए लकड़ी की कुर्सियां थीं। दीवारों पर कैलेण्डर वो छोड़कर कुछ नहीं था। मैं जैसे जैसे सागर साहब के बारे में जानता जा रहा था वैसे वैसे उनकी विलक्षण प्रतिभा का कायल होता जा रहा था। उनका अध्ययन बहुत ज्यादा था। उनकी समझ बहुत साफ थी। शराब में उनकी बहुत ज्यादा दिलचस्पी थी। हम लोग

अपने हिसाब से पी रहे थे लेकिन सागर साहब शराब का सागर पी रहे थे। इतना पीने के बाद भी पूरे होशोहवास में थे। वे अपने इंस्टीट्यूट के नये प्रोजेक्ट की बात कर रहे थे जिसे यू.एन.डी.पी. सपोर्ट कर रहा था। मुझे उन्होंने नयी प्रोजेक्ट साइट यानी छोटा नागपुर के एक आदिवासी गांव में चलने की भी दावत दी जिसे मैंने कुबूल कर लिया। खूब पीने के बाद सागर साहब की दावत पर हम सब एक ढाबे पर गये जहां तली मछली खाई गयी और रात करीब साढ़े ग्यारह बजे बर्खास्त हुई।

बंधुआ मज़दूरों पर मेरी रिपोर्ट अहमद ने मास्को में पढ़ी थी। जहां वह दूतावास में फर्स्ट सेक्रेटरी था। उसने फोन पर मुझे मुबारकबाद दी थी और कहा था कि यार अब मिर्जा इब्राहिम की लड़की से शादी के बाद तुम ये जर्नलिज़्म वगैरा छोड़ो और बिजनेस में आ जाओ। सोवियत यूनियन बहुत बड़ा मार्केट है मैं तुम्हें यहां बेहिसाब बिजनेस दिला सकता हूं. . .अगर चाहो तो तुम और मैं साथ-साथ भी कर सकते हैं। उस इस प्रस्ताव पर मैंने उसे गालियां दी थीं और अपनी दुनिया में चला आया था।

इन रिपोर्टों के छपने के बाद पहली बार मुझे कुछ थोड़ा-सा संतोष हुआ था। दिमाग में 'कुछ करने` के कीड़े ने मुझे कुरेदने की रफ्तार कुछ कम कर दी थी। मैं सोचता था चलो राजनीति में कुछ नहीं कर सका, चुनाव हार गया, पार्टी होल टाइमर नहीं बन सका, लेखक नहीं बन सका तो क्या मैं कुछ ऐसा कर रहा हूं जो गरीब और बेसहारा आदमी के हक में है। कुछ दोस्तों खासतौर पर नवीन जोशी और रावत ने कहा था कि अंग्रेज़ी में आमतौर पर लोग ग्रामीण क्षेत्रों पर नहीं लिखते हैं। तुमने शुरुआत की है। अगर तुम दस-पांच साल इधर ही लगे रहे तो बड़ा 'कान्ट्रीब्यूशन` माना जायेगा। मैं कान्ट्रीब्यूशन से ज्यादा अपने मन को समझाने और संतोष देने के चक्कर में था। सबसे बड़ी बात तो यही कि आपको अच्छा लगे कि जो कर रहे हैं वह 'मीनिंगफुल` है।

शकील ने बसंत विहार में कोठी खरीद ली है। हालांकि आजकल दिल्ली में उसके पास कोई काम नहीं है लेकिन यहीं रहता है। कभी-कभी पार्टी ऑफिस चला जाता है। एक दो नेताओं के घरों के चक्कर मार देता है। कहता है यार जिन नेताओं के यहां पहले घुस नहीं सकता था उनसे इस दौरान पक्का याराना हो गया है। देखो यही फायदा होता है दिल्ली में रहने का।

उसकी अक्सर शामें हमारे यहां गुजरती हैं। नूर मुझसे अक्सर पूछती रहती है कि मैं शकील जैसे लोगों के साथ कैसे 'एडजस्ट` कर लेता हूं जो मुझसे बिल्कुल अलग हैं। मैं इस बात का बहुत तसल्लीबख्श जवाब दे नहीं पाता। आदमी की कैमिस्ट्री बड़ी अजीब होती है और वह समझ में आ जायेगी, यह दावा कोई आदमी खुद अपने बारें में भी नहीं कर सकता। शकील की राजनीति से मैं सहमत नहीं हूं लेकिन इतना पुराना 'एसोसिएशन` है कि हम बाकी बातें भूल जाते हैं। मैंने नूर को वह किस्सा सुनाया जब शकील ने मुझे पहली बार शराब पिलाई थी।

शकील के बेटे कमाल का दाखला तो किसी तरह दिल्ली पब्लिक स्कूल में हो गया है लेकिन उसका दिल दिल्ली में बिल्कुल नहीं लगता। मौका मिलते ही घर भाग जाता है। वैसे भी उसके रंग-ढंग बड़े लोगों के बेटों जैसे हैं। शकील के पास पैसा है और वह बेटे का दिल्ली में पढ़ाने के चक्कर में उसकी ख्वा़हेशात पूरी करता रहता है।

दिल्ली से रांची वाली “लाइट पर सागर साहब ने मुझे गलहौटी प्रोजेक्ट के बारे में बताना शुरू किया था। ख़ासा दिलचस्प प्रोजेक्ट लग रहा था। उन्होंने बताया ''यू.एन.डी.पी. वाले किसी आदिवासी क्षेत्र में विकास का एक मॉडल प्रोजेक्ट चलाना चाहते थे। इस सिलसिले में उन्होंने हमारे इंस्टीट्यूट से सम्पर्क किया। मैं मिस्टर ब्लेक से मिलने गया। मैंने साफ कह दिया कि पैसे से डिवलपमेंट नहीं होता। मतलब नालियां बना देना, हैण्डपम्प लगा देना, कर्ज दे देना, खुशहाली की गारंटी दे देना विकास नहीं है। इस पर ब्लैक चौंके और पूछा फिर डिवलपमेंट क्या है? मैंने कहा लोगों को बदलना, लोगों को जागरूक बनाना, उनके अंदर बदलाव की चेतना पैदा करना, उनके अंदर संगठन और संयोजन की शक्तियों का विकास करना, उन्हें सामूहिकता से जोड़ना. . .ये विकास है यानी विकास की पहली शर्त है।”

फिर?

“बड़ी बहस होती रही। मैंने उनसे कहा कि प्रोजेक्ट को मैं अपने तौर पर, अपनी परिकल्पना के आधार पर करूंगा। पहले तो उन्होंने सोचने का वक्त मांगा और मुझसे एक नोट बनाकर देने को कहा। मैंने नोट दे दिया और भूल गया। सोचा ये लोग जो खाँचों में सोचते हैं, जो सिर्फ आँकड़ों में बात करते हैं उनकी समझ में यह सब नहीं आयेगी।”

“इसके बाद?”

“तीन महीने बाद उनका फोन आया कि मैं जाकर मिलूं। मैं गया और बताया गया कि प्रोजेक्ट मंजूर हो गया है और प्रोजेक्ट में हमें दस लाख रुपया दिया गया है। फिर वही सवाल सामने आ गया। मैंने कहा, पैसे से विकास नहीं हो सकता। अगर हो सकता होता तो भारत सरकार कर चुकी होती।”

“क्या भारत सरकार विकास करना चाहती हैं?”

“ये और भी बुनियादी सवाल है. . .देखो हम कहते हैं कि हमारे देश की जाति व्यवस्था में एक सुपर जाति पैदा हो गयी है जो हर जाति से ऊंची है।”

“मैं हंसने लगा, ये कौन सी जाति है सागर साहब?”

“इस जाति को कहते हैं आई.ए.एस.” मैं ओर जोर से हंसने लगा।

“क्यों क्या मैं ग़लत हूं?”

“आप सौ फीसदी सच कह रहे हैं।”

“पूरे देश पर यह जाति शासन कर रही है जैसे पहले मान लो ब्राह्मण किया करते थे।”

“हर मर्ज की यही दवा है।”

“इनका जाल इतना भयानक है कि इन्होंने पूरे देश को जकड़ रखा है। अरे भाई कहो, कलक्टर का काम लगान वसूली है, प्रशासन है, पर ये जाति विकास पर भी कब्जा करके बैठ गयी। बड़े से बड़े और तकनीकी से भी अधिक तकनीकी संस्थानों पर छा गयी। कोई भी कारपोरेशन ले लो. . . यही लोग जमे बैठे हैं. . .और ये हैं बुनियादी तौर 'नॉन कमिटेड` लोग। इनका धर्म स्वयं अपना और अपनी जाति का भला करने के अलावा कुछ नहीं है।”

“और ये करप्ट भी है. . .शायद पहले न होते होंगे. . .अब।”

“नहीं, 'करप्शन` तो नौकरशाही का बुनियादी कैरेक्टर है। फ़र्क़ सिर्फ इतना आया है कि अब ये कायदा, कानून, शर्म-हया, क्षेत्र प्रांत छोड़कर खुल्लम खुल्ला भ्रष्ट हो गये हैं. . .और इन्हें राजनेताओं का संरक्षण भी मिल रहा है। वे भी इनके साथ शामिल है. . .अब ऐसे लोग क्या विकास करेंगे?”

“लेकिन इनमें कुछ अच्छे भी होते हैं।” मैंने कहा।

“अरे अच्छे तो कुछ डाकू भी होते हैं. . .पर क्या आप डकैती को अच्छा कहेंगे?” सागर साहब ने हंसकर कहा।

रांची पहुंचकर सागर साहब ने मेरे साथ कुछ ऐसा किया जिसकी उम्मीद नहीं थी और मैं सकते में आ गया। हम दोनों को साथ-साथ गलहौटी गांव जाना था। वही प्रोजेक्ट चल रहा था। सागर साहब ने मुझसे कहा कि उन्हें तो किसी ज़रूरी काम से पलामू जाना है। वे गलहौटी नहीं जा पायेंगे। मैं बस पकड़कर पलेरा चला जाऊं जो मेन हाई वे पर एक छोटा-सा बस स्टाप है। वहां मुझे गलहौटी जाने वाले लोग मिल जायेंगे। गलहौटी पलेरा से बारह किलोमीटर दूर है। ये पैदल का रास्ता है। वहां प्रोजेक्ट का आदमी रविशंकर मिल जायेगा। उसे मेरी विज़िट के बारे में मालूम है। अब मैं बड़ा चक्कर में फंसा। जाहिर है गलहौटी अकेले जाना आसान न होगा। अगर नहीं गया तो यहां तक आना बेकार जायेगा। सागर साहब किसी भी तरह मेरे साथ गलहौटी नहीं जा सकते थे क्योंकि उन्हें पलामू जाना था।

ख़ै़र और कुछ हो या न हो, हमने रात खूब जमकर पी। बहुत अच्छी बातचीत हुई और सुबह-सुबह सागर साहब चले गये और मैं अनिश्चय के सागर में डूब गया।

मैं परेला में उतरा तो देखा दो चार छोटी-छोटी लकड़ी की गुमटियों के अलावा और कुछ नहीं है। शाम का चार बज रहा था। बस मुसाफ़िरों को उतारकर आगे बढ़ गयी। मैं एक चाय के खोखे पर आया और पूछा कि गलहौटी जाने वाला कोई है? चाय वाले ने इधर-उधर देखा और बोला, 'नहीं अभी तो नहीं है।`

मैंने यह भी देखा कि चाय वाला कुछ अपनी दुकान बढ़ाने के मूड में है। वह बर्तनों को अंदर रख रहा था।

मैंने उसे एक चाय बनाने को कहा तो वह चाय बनाने लगा।

“अब यहां बस कितने बजे आयेगी?” मैंने पूछा।

“कल सुबह आठ बजे।”

“उससे पहले यहां कोई बस नहीं आयेगी।”

“नहीं”, वह चाय बनाता रहा।

मेरे होशो हवास गुम हो गये। रात कहां रहूंगा? ख़ै़र अब तो फंस गया था। गलहौटी मैं अकेले पहुंच नहीं सकता था क्योंकि वहां तक जाने के लिए जो पगडण्डी थी वह छितरे पहाड़ों में जाकर खो जाती थी।

चाय पी ही रहा था कि एक आदमी आता दिखाई दिया। चाय वाले ने कहा, 'ये गलहौटी के पास वाले गांव में जायेगा। इससे बात कर लो।`

मैं झपटकर आगे बढ़ा। सफेद कमीज़, पजामे में यह आदमी कहीं स्कूल मास्टर था और अपने गांव जा रहा था। वह मुझे गलहौटी पहुंचा देने पर तैयार हो गया।

पगडण्डी पर चलते हुए उसने मुझसे पूछा, आप तेज़ चलते हैं या धीरे?

मैं क्यों कहता कि धीमे चलता हूं? मैंने कहा, 'तेज़ चलता हूं।` मेरे यह कहते ही वह सरपट रफ्तार से चलने लगा। मैंने भी अपनी रफ्तार तेज़ कर दी लेकिन पन्द्रह मिनट के अंदर ही अंदर लग गया कि मैं उसकी तरह सरपट नहीं चल सकता। मजबूर होकर कहना पड़ा कि 'भाई जी थोड़ा धीमे चलिए।` उसने रफ्तार कम कर दी।

सूरज डूब गया था। पहाड़ियाँ धुंधली छाया में बदल गयी थी। पगडण्डी भी ठीक से नहीं दिखाई पड़ रही थी। अचानक स्कूल मास्टर रुक गया और ज़ोर ज़ोर से कुछ सूँघने लगा।

“क्या सूंघ रहे हैं,” मैंने पूछा।

“आसपास कहीं जंगली हाथी का झुण्ड है।” वह बहुत सरलता से बोला और मेरे छक्के छुट गये। यहां तो झाड़ियां छोड़कर ऊंचे पेड़ भी

न थे जिन पर चढ़कर जान बचाई जा सकती।

“अब क्या करें।”

“चले जायेंगे।” वह आराम से बोला।

कुछ देर हम खड़े रहे। वह हवा में सूँघता रहा फिर बोला, 'चले गये।` हम लोग आगे बढ़ने लगे। मैं इतना डर गया था कि उससे यह भी न पूछ सका कि उसे सूँघने से कैसे पता चल गया था कि हाथियों के झुण्ड चले गये।

रात नौ बजे के करीब हम गलहौटी पहुंचे। स्कूल टीचर मुझे सीधा प्रोजेक्ट के ऑफिस ले गया जहां रविशंकर सो चुके थे। वे उठे और उन्होंने मुझसे पहला सवाल यह पूछा कि क्या मैं कम्बल लेकर आया हूं? मेरे यह कहने पर कि मुझे नहीं बताया गया था कि कम्बल लेकर जाना और मैं नहीं लाया, वे परेशान से हो गये। बोले, 'चारपाई तो है लेकिन कम्बल नहीं है। रात में सर्दी बढ़ जाती है।`

हम दोनों एक ही चारपाई पर लेटे। रविशंकर ने मेरे सिरहाने की तरफ पैर कर लिए और मैंने भी यही किया। एक कम्बल से हमने अपने को ढंक लिया। सर्दी बढ़ चुकी थी। तेरह किलोमीटर पैदल चलने और मानसिक कलाबाज़ियों की वजह से गहरी नींद आ गयी।

अचानक आधी रात के करीब आंख खुली तो देखा रविशंकर चारपाई से कुछ दूर चूल्हे में आग जलाये ताप रहे हैं। पूछने पर बताने लगे कि आपने सोते में कम्बल खींच लिया था। हम खुल गये थे। सर्दी लगने लगी। हमने सोचा कि हम भी कम्बल खींचेंगे तो आप को सर्दी लगने लगेगी। आप उठ जायेंगे। सो हमने आग जला ली।

मुझे अपने ऊपर शर्म आयी। मैं उठ बैठा। आधी रात हमने चूल्हे के सामने बैठकर आग तापकर गुजार दी।

छ: बजे के करीब मैंने उनसे पूछा, “भाई रविशंकर जी यहां चाय-वाय भी कुछ बनती है?”

“बनाते तो हैं. . .पर लकड़ी नहीं है। रात लकड़ी जला डाली।”

“फिर क्या होगा?”

“लकड़ी बीनना पड़ेगी. . .बाहर ही मिल जायेगी।” वह उठने लगा।

“नहीं आप बैठो मैं बीनकर लाता हूं।”

लकड़ियां बीनकर लाया और चाय का पानी चढ़ा दिया गया। ज़िंदगी में मुझे याद नहीं कि इससे पहले मैनें पानी कभी इतनी देर में उबलते देखा हो। आध घण्टा हो गया। पानी उबलने का नाम ही नहीं ले रहा था और लकड़ियां बीनकर लानी पड़ी। अल्लाह अल्लाह करके पानी उबला, चाय बनी।

चाय पीते हुए मैंने कहा, “भाई रविशंकर जी यहां एक स्टोव तो रखा जा सकता है।” वह हंसने लगा। मैं हैरत से उसे देखने लगा।

“सागर साहब स्टोव के खिलाफ हैं।”

“यार बेचारे स्टोव ने सागर साहब का ऐसा क्या बिगाड़ा है।”

वह हंसने लगा “नहीं, सागर साहब कहते हैं यहाँ वह वैसी कोई चीज़ नहीं होना चाहिए जो आदिवासियों के घरों में नहीं होती। मुझे यहां घड़ी भी लगाने की अनुमति नहीं है।” वह खाली कलाइयां दिखाकर बोला।

“आप यहां करते क्या हैं?”

“हम कुछ नहीं करते।”

“आपके कुछ करने के भी सागर साहब खिलाफ हैं क्या?” वह हंसते हुए बोला “ठीक कहा आपने, सागर साहब कहते हैं। हम कौन होते हैं इन आदिवासियों को यह बताने वाले कि यह करो यह न करो।”

“तो श्रीमान जी फिर आप यहां हैं ही क्यों? अपने घर जाइये?” मैंने कुछ व्यंग्य और कुछ प्यार से कहा।

वह खिलखिलाकर हंस पड़ा।

“मेरा काम यह देखना है गांव के लोग सामूहिकता की भावना से प्रेरित होकर क्या कर रहे हैं और जो कर रहे हैं उसमें उन्हें सफलता मिले. . .कोई अड़चन न आये।”

रविशंकर की उम्र मुश्किल से बाइस- तेइस साल है। पटना विश्वविद्यालय से इसी साल सोशलवर्क में एम.ए. किया है और इस प्रोजेक्ट में लग गया है। छ: महीने से वह यहां लगातार रह रहा है। सागर

साहब आते जाते रहते हैं। रविशंकर ने मुझे विस्तार से छ: महीने की कहानी सुनाई। आमतौर पर लोग इस इलाके के आदिवासी गांवों में पटवारी या पुलिस के सिपाही के साथ आते हैं, अपना काम करते हैं और चले जाते हैं। लेकिन सागर साहब यह चाहते थे कि हमें सरकारी आदमी न समझा जाये। इसलिए हम लोग यहां अकेले ही आये थे। शुरु में न तो कोई हमारे पास आता था, न हमसे बात करता था। पहली रात तो हमने एक पेड़ के नीचे गुजारी थी। उनके बाद कलिया ने वह खपरैल दे दी थी जहां उसके जानवर भी बंधते हैं।”

“बहुत दिलचस्प कहानी है।”

“विश्वास जमाना बहुत टेढ़ी खीर है। हमने धीरे-धीरे विश्वास जमाया। कभी चूके भी, कभी गल़ती भी हुई लेकिन. . .”

“विश्वास कैसे जमा?”

“ब्लॉक ऑफिस के काम, पटवारी के काम. . .इनको एक तरह से सहायता सहयोग देना और बदले में कुछ न लेना. . .ऐसा इन्होंने कभी देखा नहीं है. . .पहले इन्हें हैरत होती थी कि ये कौन लोग हैं? फिर समझने लगे. . .ये जंगल से जड़ी बूटियाँ, झरबेरी के बेर, आंवला और दूसरी चीज़ें जमा करके बाज़ार में बेचा करते थे. . .हमारे सुझाव पर यह काम अब पूरा गांव मिलकर करता है और आमदनी बढ़ गयी। गांव का एक अपना फण्ड बनाया गया है जिसमें दो-दो चार रुपये जमा होते हैं . . .अभी पिछले महीने पूरे गांव ने मिलकर तीन कुएं खोदे हैं. . .मतलब पूरे गांव के जवान लोग लग गये थे। दो-दो तीन-तीन दिन में एक कुआं खुद गया था।”

मैं चार दिन गलहौटी में रहा और पूरी रिपोर्ट तैयार की। इस रिपोर्ट ने भी राष्ट्रीय स्तर का तहलका मचा दिया। योजना आयोग में विशेष बैठक बुलाई गयी। इसके बाद मैं मध्य प्रदेश के उन आदिवासी क्षेत्रों में गया जहां उद्योग धंधों के कारण आदिवासी उजड़ रहे थे। कारखानों का दूषित पानी नदी की मछलियाँ मार रहा था और गंदा पानी पीने से आदिवासियों में तरह-तरह की नयी बीमारियां फैल रही थी। आदिवासियों की हज़ारों एकड़ जमीन पर उद्योग लग रहे थे, बांध बन रहे थे और

जाहिर था कि वहां पैदा होने वाली बिजली उनके लिए नहीं थी। ये रिपोर्ट भी 'द नेशन` में छपी।

एक दिन सक्सेना साहब ने बुलाया कहा कि अब अखबार आदिवासी अंचलों पर उतना बल नहीं देना चाहता क्योंकि यह संवेदनशील मामला है। मुझे लगा मैं पहाड़ पर से गिर गया हूं। मैंने तो आगे पांच साल तक के लिए अपने 'टारगेट` तय कर लिए थे। मैं सक्सेना साहब से बहस क्या करता। एक अजीब तरह की खीज, अपमानित होने का एहसास, गुस्सा और द्वेष की भावना मेरे अंदर भर गयी। हसन साहब ने कहा, ये तुमने 'इण्डस्ट्री` को 'टारगेट` क्यों किया? तुम्हें नहीं मालूम नेशनल चैम्बर ऑफ कामर्स ने तुम्हारी रिपोर्टों पर एडीटर-इन-चीफ को बड़ा सख्त खत लिखा है।

इस पूरे प्रकरण के बारे में शकील को पता चला था तो उसकी आंखों में चमक आ गयी थी। उसे लगा था कि वह मुझे जो कुछ समझाया करता था उसका निचोड़ सामने आ गया है। मेरे घर में ही टेरिस पर विस्की पीते हुए उसने कहा, ''यार साजिद तुम इन लोगों से लड़ नहीं सकते। तुम सत्ता से टक्कर ले नहीं सकते। तुम्हारे अख़बार का मालिक भी इण्डस्ट्रियलिस्ट है। उसकी भी उसी इलाके के पेपर फैक्ट्री है जिसे प्रदेश सरकार ने बीस हज़ार एकड़ बॉस के जंगल सौ रुपये प्रति एकड़ की दर से नब्बे साल के लिए दे दिये हैं. . .अब बताओ. . .और बिजली ये तो जान है यार इण्डस्ट्री की. . .बड़े बांध नहीं बनेंगे तो बिजली कहां से आयेगी?. . .देखा इन लोगों ने अपना हर मामला जमाया हुआ है. . भई सरकारों से इनके क्या संबंध हैं, तुम्हें पता है। अखबार इनके हैं। पार्लियामेंट में इनके कितने लोग हैं तुम जानते हो। सर्विसेज़ के लोग तो इनके पहले से ही गु़लाम हैं. . .कला और संस्कृति पर इनका कब्जा है।”

“तुम्हारा मतलब है कुछ नहीं हो सकता।”

“यार फिर वही मुर्गे की एक टांग. . .तुम्हें किस चीज़ की कमी है. . .”

“है. . .कमी है।”

“ये तुम्हारे दिमाग का फितूर है।” वह हंसने लगा।

मेरे अंदर गुस्सा और बढ़ने लगा। इसलिए कि वह जो कुछ कह रहा है सच नहीं है।

(जारी क्रमशः अगले अंकों में....)

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