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February 2008
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आहत युग



-महेंद्र भटनागर

(इस कविता संग्रह का ई-बुक यहाँ से डाउनलोड करें)

*
(१) संग्राम; और
जिस स्वप्न को
साकार करने के लिए-
सम्पूर्ण पीढ़ी ने किया
संघर्ष
अनवरत संघर्ष,
सर्वस्व जीवन-त्याग;
वह
हुआ आगत !
*
कर गया अंकित
हर अधर पर हर्ष,
चमके शिखर-उत्कर्ष !
प्रोज्ज्वल हुई
हर व्यक्ति के अंतःकरण में
आग,
अभिनव स्फूर्ति भरती आग !
संज्ञा-शून्य आहत देश
नूतन चेतना से भर
हुआ जाग्रत,
सघन नैराश्य-तिमिराच्छन्न कलुषित वेश
बदला दिशाओं ने,
हुआ गतिमान जन-जन
स्पन्दन-युक्त कण-कण !
*
आततायी निर्दयी
साम्राज्यवादी शक्ति को
लाचार करने के लिए-
नव-विश्वास से ज्योतित
उतारा था समय-पट पर
जिस स्वप्न का आकार
वह,
हाँ, वह हुआ साकार*!
*
लेकिन तभी....
अप्रत्याशित-अचानक
तीव्रगामी / धड़धड़ाते / सर्वग्राही,
स्वार्थ-लिप्सा से भरे
भूकम्प ने
कर दिए खंडित-
श्रम-विनिर्मित
गगन-चुम्बी भवन,
युग-युग सताये आदमी के
शान्ति के, सुख के सपन !
*
इसलिए; फिर
दृढ़ संकल्प करना है,
वचन को पूर्ण करना है,
विकृत और धुँधले स्वप्न में
नव रंग भरना है,
कमर कस कर
फिर कठिन संघर्ष करना है !
(२) अमानुषिक
आज फिर
खंडित हुआ विश्वास,
आज फिर
धूमिल हुई
अभिनव जिन्दगी की आस !
*
ढह गये
साकार होती कल्पनाओं के महल !
बह गये
अतितीव्र अतिक्रामक
उफनते ज्वार में,
युग-युग सहेजे
भव्य-जीवन-धारणाओं के अचल !
*
आज छाये; फिर
प्रलय-घन,
सूर्य- संस्कृति-सभ्यता का
फिर ग्रहण-आहत हुआ,
षड्यंत्रों-घिरा
यह देश मेरा
आज फिर
मर्माहत हुआ !
*
फैली गंध नगर-नगर
विषैली प्राणहर बारूद की,
विस्फोटकों से
पट गयी धरती,
सुरक्षा-दुर्ग टूटे
और हर प्राचीर
क्षत-विक्षत हुई !
*
जन्मा जातिगत विद्वेष,
फैला धर्मगत विद्वेष,
भूँका प्रांत-भाषा द्वेष,
गँदला हो गया परिवेश !
सर्वत्र दानव वेश !
घुट रही साँसें
प्रदूषित वायु,
विष-घुला जल
छटपटाती आयु !
(३) फतहनामा
आतंक:ः सियापा !
छलनी / खून-सनी
बेगुनाह लाशें,
खेतों-खलियानों में
छितरी लाशें,
सड़कों पर
बिखरी लाशें !
*
निरीह
माँ, पत्नी, बहनें, पुत्रियाँ,
पिता, बन्धु, मित्र, पड़ोसी-
रोके आवेग
थामे आवेश
नत मस्तक
मूक विवश !
*
जश्न मनाता
पूजा-घर में
सतगुरु-ईश्वर-भक्त
खुदा-परस्त !
*** (४) त्रासदी
दहशत : सन्नाटा
दूर-दूर तक सन्नाटा !
*
सहमे-सहमे कुत्ते
सहमे-सहमे पक्षी
चुप हैं।
*
लगता है-
क्रूर दरिन्दों ने
निर्दोष मनुष्यों को फिर मारा है,
निर्ममता से मारा है !
रातों-रात
मौत के घाट उतारा है !
सन्नाटे को गहराता
गूँजा फिर मजहब का नारा है !
खातरा,
बेहद खातरा है !
*
रात गुजरते ही
घबराए कुत्ते रोएंगे,
भय-विह्वल पक्षी चीखेंगे !
*
हम
आहत युग की पीड़ा सह कर
इतिहासों का मलबा ढोएंगे !
(५) होगा कोई
*
एक आदमी / झुका-झुका / निराश
दर्द से कराहता हुआ
तबाह जिन्दगी लिए
गुजर गया।
*
एक आदमी / झुका-झुका / हताश
चोट से लहूलुहान
चीखता हुआ / पनाह माँगता / अभी-अभी
गुजर गया।
*
(६) हॉकर से
यह क्या
रोज-रोज
तरबतर खून से
अखबार फेंक जाते हो तुम
घर में मेरे ?
*
* तमाम हादसों से रँगा हुआ
**अंधाधुंध गोलियों के निशान
*** पृष्ठ-पृष्ठ पर स्पष्ट उभरते !
*
*** छूने में.....पढ़ने में इसको
लगता है डर,
लपटें लहराता
जहर उगलता
डसने आता है अखबार !
*
यद्यपि
यही खबर सुन कर
सोता हूँ हर रात
कि कोई कहीं
अप्रिय घटना नहीं घटी,
तनाव है
किन्तु नियंत्रण में है सब !
*** (७) आत्मघात
हम खुद
तोड़ रहे हैं अपने को !
ताज्जुब कि
नहीं करते महसूस दर्द !
इसलिए कि
मजहब का आदिम बर्बर उन्माद
नशा बन कर
हावी है
दिल पर सोच-समझ पर।
हम खुद
हथगोले फोड़ रहे हैं अपने ही ऊपर !
पागलपन में
अपने ही घर में
बारूद बिछा कर सुलगा आग रहे हैं
अपने ही लोगों पर करने वार-प्रहार !
*
हम खुद
छोड़ रहे हैं रूप आदमी का
और पहन आये हैं खालें जानवरों की
गुर्राते हैं
छीनने-झपटने जानें
अपने ही वंशधरों की !
*** (८) लोग
चल रहे हैं लोग
सिर्फ पीछे भीड़ के !
*
जाना कहाँ
नहीं मालूम,
हैं बेखबर
निपट महरूम,
*
घूमते या इर्द -
गिर्द अपने नीड़ के !
*
छाया इधर-
उधर जो शोर,
आया कहीं
न आदमखोर ?
*
सरसराहट आज
जंगलों में चीड़ के !
(९) आपात्काल
तूफान
अभी गुजरा नहीं है !
बहुत कुछ टूट चुका है
टूट रहा है,
मनहूस रात
शेष है अभी !
*
जागते रहो
हर आहट के प्रति सजग
जागते रहो !
न जाने
कब.....कौन
दस्तक दे बैठे-
शरणागत।
*
जहर उगलता
फुफकारता
आहत साँप-सा तूफान
आखर गुजरेगा !
सब कुछ लीलती
घनी स्याह रात भी
हो जाएगी ओझल !
*
हर पल
अलस्सुबः का इंतजार
अस्तित्व के लिए !
(१०) जागते रहना
*
जागते रहना, जगत में भोर होने तक !
*
छा रही चारों तरफ दहशत
रो रही इंसानियत आहत
वार सहना, संगठित जन-शोर होने तक !
*
मुक्त हो हर व्यक्ति कारा से
जूझना विपरीत धारा से
जन-विजय संग्राम के घनघोर होने तक !
*
मौत से लड़ना, नहीं थकना
अंत तक बढ़ना नहीं रुकना
हिंसकों के टूटने - कमजोर होने तक !

(११) *जरूरी
*
इस स्थिति को बदलो
कि आदमी आदमी से डरे,
इन हालात को हटाओ
कि आदमी आदमी से नफरत करे !
*
हमारे बुजुर्ग
हमें नसीहत दें कि
बेटे, साँप से भयभीत न होओ
हर साँप जहरीला नहीं होता,
उसकी फूत्कार सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम।
हिंस्र शेर से भी भयभीत न होओ
हर शेर आदमखोर नहीं होता,
उसकी दहाड़ सुन
अपने को सहज बचा सकते हो तुम !
पशुओं से, पक्षियों से
निश्छल प्रेम करो,
उन्हें अपने इर्द-गिर्द सिमटने दो
अपने तन से उन्हें लिपटने दो,
कोशिश करो कि
वे तुमसे न डरें
तुम्हें देख न भगें,
पंख फड़फड़ा कर उड़ान न भरें,
चाहे वह
चिड़िया हो, गिलहरी हो, नेवला हो !
*
तुम्हारे छू लेने भर से बीरबहूटी
स्व-रक्षा हेतु
जड़ बनने का अभिनय न करे !
तुम्हारी आहट सुन
खरगोश कुलाचें भर-भर न छलाँगे
सरपट न भागे !
*
लेकिन
दूर-दूर रहना
सजग-सतर्क
इस आदमजाद से !
जो-
न फुफकारता है, न दहाड़ता है,
अपने मतलब के लिए
सीधा डसता है,
छिप कर हमला करता है !
कभी-कभी यों ही
इसके-उसके परखचे उड़ा देता है !
फिर चाहे वह
आदमी हो, पशु हो, पक्षी हो,
फूल हो, पत्ती हो, तितली हो, जुगनू हो !
*
अपना, बस अपना
उल्लू सीधा करने
यह आदमी
बड़ा मीठा बोलता है,
सुनने वाले कानों से मधुरस घोलता है !
*
लेकिन
दबाए रखता है विषैला फन,
दरवाजे पर सादर दस्तक देता है,
'जयराम जी‘ की करता है !
तुम्हारे गुण गाता है !
और फिर
सब कुछ तबाह कर
हर तरफ से तुम्हें तोड़ कर
तडपने-कलपने छोड़ जाता है !
*
आदमी के सामने ढाल बन कर जाओ,
भूखे-नंगे रह लो
पर, उसकी चाल में न आओ !
ऐसा करोगे तो
सौ बरस जिओगे, हँसोगे, गाओगे !
*
इस स्थिति को बदलना है
कि आदमी आदमी को लूटे,
उसे लहूलुहान करे,
हर कमजोर से बलात्कार करे,
निर्द्वन्द्व नृशंस प्रहार करे,
अत्याचार करे !
और फिर
मंदिर, मसजिद, गिरजाघर, गुरुद्वारा जाकर
भजन करे,
ईश्वर के सम्मुख नमन करे !
*
(१२) इतिहास का एक पृष्ठ
*
सच है -
घिर गये हैं हम
चारों ओर से
हर कदम पर
नर-भक्षियों के चक्रव्यूहों में,
भौंचक-से खड़े हैं
लाशों-हड्डियों के
ढूहों में !
*
सच है -
फँस गये हैं हम
चारों ओर से
हर कदम पर
नर-भक्षियों के दूर तक
फैलाए-बिछाए जाल में,
छल-छद्म की
उनकी घिनौनी चाल में !
*
बारूदी सुरंगों से जकड़ कर
कर दिया निष्क्रिय
हमारे लौह-पैरों को
हमारी शक्तिशाली दृढ़ भुजाओं को !
भर दिया घातक विषैली गंध से
दुर्गन्ध से
चारों दिशाओं की हवाओं को !
*
सच है -
उनके क्रूर पंजों ने
है दबा रखा गला,
भींच डाले हैं
हर अन्याय को करते उजागर
दहकते रक्तिम अधर !
मस्तिष्क की नस-नस
विवश है फूट पड़ने को,
ठिठक कर रह गये हैं हम !
खंडित पराक्रम
अस्तित्व / सत्ता का अहम् !
*
सच है कि
आक्रामक-प्रहारक सबल हाथों की
जैसे छीन ली क्षमता त्वरा-
अब न हम ललकार पाते हैं
न चीख पाते हैं,
स्वर अवरुद्ध
मानवता-विजय-विश्वास का,
सूर्यास्त जैसे
गति-प्रगति की आस का !
अब न मेधा में हमारी
क्रांतिकारी धारणाओं-भावनाओं की
कडकती तीव्र विद्युत कौंधती है,
चेतना जैसे
हो गयी है सुन्न जड़वत् !
*
चेष्टाहीन हैं / मजबूर हैं,
हैरान हैं,
भारी थकन से चूर हैं !
*
लेकिन
नहीं अब और
स्थिर रह सकेगा
आदमी का आदमी के प्रति
हिंसा-क्रूरता का दौर !
*
दृढ़ संकल्प करते हैं
कठिन संघर्ष करने के लिए,
इस स्थिति से उबरने के लिए !
*
(१३) वसुधैवकुटुम्बकम्
*
जाति, वंश, धर्म, अर्थ के नामाधार पर
आदमी आदमी में करना
भेद-विभेद,
किसी को निम्न
किसी को ठहराना श्रेष्ठ,
किसी को कहना अपना
किसी को कहना पराया-
आज के उभरते-सँवरते नये विश्व में
गंभीर अपराध है,
अक्षम्य अपराध है।
*
करना होगा नष्ट-भ्रष्ट
ऐसे व्यक्ति को / ऐसे समाज को
जो आदमी-आदमी के मध्य
विभाजन में रखता हो विश्वास
अथवा
निर्धनता चाहता हो रखना कायम।
*
सदियों के अनवरत संघर्ष का
सह-चिन्तन का
निष्कर्ष है कि
हमारी-सबकी
जाति एक है - मानव,
हमारा-सबका
वंश एक है - मनु-श्रद्धा,
हमारा-सबका
धर्म एक है - मानवीय,
हमारा-सबका
वर्ग एक है - श्रमिक।
*
रंग रूप की विभिन्नता
सुन्दर विविधरूपा प्रकृति है,
इस पर विस्मय है हमें
इस पर गर्व है हमें,
सुदूर आदिम युग में
लम्बी सम्फ दूरियों ने
हमें भिन्न-भिन्न भाषा-बोल दिए,
भिन्न-भिन्न लिपि-चिन्ह दिए।
*
किन्तु आज
इन दूरियों को
ज्ञान-विज्ञान के आलोक में
हमने बदल दिया है नजदीकियों में,
और लिपि-भाषा भेद का अँधेरा
जगमगा दिया है
पारस्परिक मेल-मिलाप के प्रकाश में,
मैत्री-चाह के अदम्य आवेग ने
तोड़ दी हैं दीवारें / रेखाएँ
जो बाँटती हैं हमें
विभिन्न जातियों, वंशों, धर्मों, वर्गों में।
*** (१४) भ्रष्टाचार
गाजर घास-सा
चारों तरफ
क्या खूब फैला है !
देश को हर क्षण
पतन के गर्त में
गहरे ढकेला है,
करोड़ों के
बहुमूल्य जीवन से
क्रूर वहशी
खेल खेला है !
*
वर्जित गलित
व्यवहार है,
दूषित भ्रष्ट
आचार है।
** (१५) अंत
जमघट ठगों का
कर रहा जम कर
परस्पर मुक्त जय-जयकार !
*
शीतक-गृहों में बस
फलो-फूलो,
विजय के गान गा
निश्चिन्त चक्कर खा,
हिँडोले पर चढ़ो झूलो !
जीवन सफल हो,
हर समस्या शीघ्र हल हो !
*
धन सर्वस्व है, वर्चस्व है,
धन-तेज को पहचानते हैं ठग,
उसकी असीमित और अपरम्पार महिमा
जानते हैं ठग !
*
किन्तु;
सब पकड़े गये
कानून में जकड़े गये
सिद्ध स्वामी; राज नेता सब !
धूर्त मंत्री; धर्मचेता सब !
*
अचम्भा ही अचम्भा !
हिडिंबा है; नहीं रम्भा !
*
मुखौटे गिर पड़े नकली
मुखाकृति दिख रही असली !
*
(१६) रक्षा
देश की नव देह पर
चिपकी हुई
जो अनगिनत जोंके-जलौकें,
रक्त-लोलुप
लोभ-मोहित
बुभुक्षित
जोंके-जलौकें-
आओ
उन्हें नोचें-उखाड़े,
धधकती आग में झोंकें !
उनकी
आतुर उफनती वासना को
फैलने से
सब-कुछ लील लेने से
अविलम्ब रोकें !
देश की नव देह
यों टूटे नहीं,
खुदगरज कुछ लोग
विकसित देश की सम्पन्नता
लूटे नहीं !
*
(१७) तमाशा
*
तुम भी घिसे-पिटे सिक्के
फेंक कर चले गये*?
अफसोस
कि हम इस बार भी छले गये*!
*
देखो-
खोटा सिक्का है न
'धर्म-निरपेक्षता‘ का ?
और दूसरा यह
'सामाजिक न्याय-व्यवस्था‘ का ?
मात्र ये नहीं
और हैं सपाट घिसे काले सिक्के-
'राष्ट्रीय एकता‘ के / 'संविधान-सुरक्षा‘ के
जो तुम इस बार भी
विदूषक के कार्य-कलापों-सम
फेंक कर चले गये*!
*
तुम तो भारत-भाग्य-विधाता थे !
तुमसे तो
चाँदी-सोने के सिक्कों की
की थी उम्मीद,
किन्तु की कैसी मिट्टी पलीद !
*
अद्भुत अंधेरे तमाशा है
घनघोर निराशा है,
यह किस जनतंत्र-प्रणाली का ढाँचा है ?
जनता के मुँह पर
तड़-तड़ पड़ता तीव्र तमाचा है !
*
(१८) वोटों की दुष्टनीति
दलितों की गलियों से
कूचों और मुहल्लों से,
उनकी झोपड्पट्टी के
बीचों-बीच बने-निकले
ऊबड़-खाबड़, ऊँचे-नीचे
पथरीले-कँकरीले सँकरे पथ से
निकल रहा है
दलितों का
आकाश गुँजाता, नभ थर्राता
भव्य जुलूस !
*
नहीं किराये के
गलफोडू नारेबाज नकलची
असली है, सब असली हैं जी-
मोटे-ताजे, हट्टे-कट्टे
मुश्टंडे-पट्ठे,
कुछ तोंद निकाले गोल-मटोल
ओढे महँगे-महँगे खोल !
*
सब देख रहे हैं कौतुक-
दलितों के
नंग-धड़ंग घुटमुंडे
काले-काले बच्चे,
मैली और फटी
चड्डी-बनियानों वाले
लड़के-फड़के,
झोंपडयों के बाहर
घूँघट काढ़े दलितों की माँ-बहनें
क्या कहने !
चित्र-लिखी-सी देख रही हैं,
पग-पग बढ़ता भव्य जुलूस,
दलितों का रक्षक, दलितों के हित में
भरता हुँकारें, देता ललकारें
चित्र खिँचाता / पीता जूस !
निकला अति भव्य जुलूस !
कल नाना टीवी-पर्दों पर
दुनिया देखेगी
यह ही, हाँ यह ही-
दलितों का भव्य जुलूस !
*
अफसोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की टोली,
अफसोस !
नहीं है शामिल इसमें
दलितों की बोली !
(१९) घटनाचक्र
हमने नहीं चाहा
कि इस घर के
सुनहरे-रुपहले नीले
गगन पर
घन आग बरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर का
अबोध-अजान बचपन
और अल्हड़ सरल यौवन
प्यार को तरसे !
*
हमने नहीं चाहा
कि इस घर की
मधुर स्वर-लहरियाँ
खामोश हो जाएँ,
यहाँ की भूमि पर
कोई
घृणा प्रतिशोध हिंसा के
विषैले बीज बो जाए !
*
हमने नहीं चाहा
प्रलय के मेघ छाएँ
और सब-कुछ दें बहा,
गरजती आँधियाँ आएँ
चमकते इंद्रधनुषी
स्वप्न-महलों को
हिला कर
एक पल में दें ढहा !
*
पर,
अनचाहा सब
सामने घटता गया,
हम
देखते केवल रहे,
सब सामने
क्रमशः
उजड़ता टूटता हटता गया !
*** (२०) निष्कर्ष
उसी ने छला
अंध जिस पर भरोसा किया,
उसी ने सताया
किया सहज निःस्वार्थ जिसका भला !
*
उसी ने डसा
दूध जिसको पिलाया,
अनजान बन कर रहा दूर
क्या खूब रिश्ता निभाया !
*
अपरिचित गया बन
वही आज
जिसको गले से लगाया कभी,
अजनबी बन गया
प्यार,
भर-भर जिसे गोद-झूले झुलाया कभी !
*
हमसफर
मुफलिसी में कर गया किनारा,
जिन्दगी में अकेला रहा
और हर बार हारा !
*** (२१) आत्म-संवेदन
हर आदमी
अपनी मुसीबत में
अकेला है !
यातना की राशि-सारी
मात्र उसकी है !
साँसत के क्षणों में
आदमी बिल्कुल अकेला है !
*
संकटों की रात
एकाकी बितानी है उसे,
घुप अँधेरे में
*
किरण उम्मीद की जगानी है उसे !
हर चोट
सहलाना उसी को है,
हर सत्य
बहलाना उसी को है !
*
उसे ही
झेलने हैं हर कदम पर
आँधियों के वार,
ओढने हैं वक्ष पर चुपचाप
चारों ओर से बढ़ते-उमड़ते ज्वार !
सहनी उसे ही ठोकरें-
दुर्भाग्य की,
अभिशप्त जीवन की,
कठिन चढ़ती-उतरती राह पर
कटु व्यंग्य करतीं
क्रूर-क्रीड़ाएँ
अशुभ प्रारब्ध की !
उसे ही
जानना है स्वाद कड़वी घूँट का,
अनुभूत करना है
असर विष-कूट का !
अकेले
हाँ, अकेले ही !
*
क्योंकि सच है यह-
कि अपनी हर मुसीबत में
अकेला ही जिया है आदमी !
*
(२२) दिशा-बोध
*
निरीहों को
हृदय में स्थान दो
सूनापन-अकेलापन मिटेगा !
*
जिनको जरूरत है तुम्हारी-
जाओ वहाँ,
मुसकान दो उनको
अकेलापन बँटेगा !
*
अनजान प्राणी
जोकि
चुप गुमसुम उदास-हताश बैठे हैं
उन्हें बस, थपथपाओ प्यार से
मनहूस सन्नाटा छँटेगा !
*
जिन्दगी में यदि
अँधेरा-ही अँधेरा है,
न राहें हैं, न डेरा है,
रह-रह गुनगुनाओ
गीत को साथी बनाओ
यह क्षणिक वातावरण गम का
*** हटेगा !
ऊब से बोझिल
अकेलापन कटेगा
(२३) स्वीकार
*
अकेलापन नियति है,
हर्ष से
झेलो इसे !
*
अकेलापन प्रकृति है,
कामना-अनुभूति से
ले लो इसे !
*
इससे भागना-बचना-
विकृति है !
मात्र अंगीकार करना-
एक गति है !
इसलिए स्वेच्छा वरण,
मन से नमन !
(२४) अवधान
*
कश-म-कश की जिन्दगी में
आदमी को चाहिए
कुछ क्षण अकेलापन !
कर सके
गुजरे दिनों का आकलन !
किसका सही था आचरण !
कौन कितना था जरूरी
या कि किसने की तुम्हारी चाह पूरी,
प्यार किसका पा सके,
किसने किया वंचित कपट से
की उपेक्षा
और झुलसाया
घृणा-भरती लपट से !
*
जानना यदि सत्य जीवन का
तथ्य जीवन का
अकेलापन बताएगा तुम्हें,
सार्थक जिलाएगा तुम्हें !
*
वरदान -
सूनापन अकेलापन !
किसी को मत पुकारो,
पा इसे
मन में न हारो !
रे अकेलापन महत् वरदान है,
अवधान है !
*
(२५) सामना
पत्थर-पत्थर
जितना पटका
उतना उभरा !
*
पत्थर-पत्थर
जितना कुचला
उतना उछला !
*
कीचड़ - कीचड़
जितना धोया
उतना सुथरा !
*
कालिख - कालिख
जितना साना
जितना पोता
उतना निखरा !
असली सोना
बन कर निखरा !
*
जंजीरों से
तन को जब - जब
कस कर बाँधा
खुल कर बिखरा
उत्तर - दक्षिण
पूरब - पश्चिम
बह - बह बिखरा !
*
भारी भरकम
चंचल पारा
बन कर लहरा !
*
हर खतरे से
जम कर खेला,
वार तुम्हारा
बढ़ कर झेला !
(२६) अकारथ
दिन रात भटका हर जगह
सुख-स्वर्ग का संसार पाने के लिए !
*
कलिका खिली या अधखिली
झूमी मधुप को जब रिझाने के लिए !
*
सुनसान में तरसा किया
तन-गंध रस-उपहार पाने के लिए !
*
क्या-क्या न जीवन में किया
कुछ पल तुम्हारा प्यार पाने के लिए !
*
डूबा व उतराया सतत
विश्वास का आधार पाने के लिए !
*
रख जिन्दगी को दाँव पर
खेला किया, बस हार जाने के लिए !
** (२७) असह
बहुत उदास मन
थका-थका बदन !
बहुत उदास मन !
*
उमस भरा गगन
थमा हुआ पवन
घुटन घुटन घुटन !
*
घिरा तिमिर सघन
नहीं कहीं किरन
भटक रहे नयन !
*
बहुत निराश मन
बहुत हताश मन
सुलग रहा बदन
जलन जलन जलन !
*** (२८) मूरत अधूरी
तय है कि अब यह जिन्दगी
मुहलत नहीं देगी
अब और तुमको जिन्दगी
*फुरसत नहीं देगी !
*
गुजरे दिनों की याद कर, कब-तक दहोगे तुम ?
विपरीत धारों से उलझ, कितना बहोगे तुम ?
रे कब-तलक तूफान के धक्के सहोगे तुम ?
*
यों खेलने की, जिन्दगी
नौबत नहीं देगी,
अब और तुमको जिन्दगी
कूवत नहीं देगी !
*
साकार हो जाएँ असम्भव कल्पनाएँ सब,
आकार पा जाएँ चहचहाती चाहनाएँ सब,
अनुभूत हों मधुमय उफनती वासनाएँ सब,
*
यह जिन्दगी ऐसा कभी
जन्नत नहीं देगी,
यह जिन्दगी ऐसी कभी
किस्मत नहीं देगी !
*** (२९) मजबूर
जिन्दगी जब दर्द है तो
हर दर्द सहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
राज है यह जिन्दगी जब
खामोश रहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
है न जब कोई किनारा
तो सिर्फ बहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
जिन्दगी यदि जलजला है
तो टूट ढहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*
आग में जब घिर गये हैं
अविराम दहने के लिए
मजबूर हैं हम* !
*
सत्य कितना है भयावह !
हर झूठ कहने के लिए
मजबूर हैं हम !
*** (३०) एक रात
अँधियारे जीवन-नभ में
बिजुरी-सी चमक गयीं तुम !
*
सावन झूला झूला जब
बाँहों में रमक गयीं तुम !
*
कजली बाहर गूँजी जब
श्रुति-स्वर-सी गमक गयीं तुम !
*
महकी गंध त्रियामा जब
पायल-सी झमक गयीं तुम !
*
तुलसी-चौरे पर आ कर
अलबेली छमक गयीं तुम !
*
सूने घर-आँगन में आ
दीपक-सी दमक गयीं तुम !
*
(३१) सहसा
आज तुम्हारी आयी याद,
मन में गूँजा अनहद नाद !
बरसों बाद
बरसों बाद !
*
साथ तुम्हारा केवल सच था,
हाथ तुम्हारा सहज कवच था,
सब-कुछ पीछे छूट गया, पर
जीवित पल-पल का उन्माद !
आज तुम्हारी आयी याद !
*
बीत गये युग होते-होते,
रातों-रातों सपने बोते,
लेकिन उन मधु चल-चित्रों से
जीवन रहा सदा आबाद !
आज तुम्हारी आयी याद !

(३२) स्वागत१
जूही मेरे आँगन में महकी,
रंग-बिरंगी आभा से लहकी !
*
चमकीले झबरीले कितने
इसके कोमल-कोमल किसलय,
है इसकी बाँहों में मृदुता
है इसकी आँखों में परिचय,
*
भोली-भोली गौरैया चहकी
लटपट मीठे बोलों में बहकी !
*
लम्बी लचकीली हरिआई
डालों डगमग-डगमग झूली,
पाया हो जैसे धन स्वर्गिक
कुछ-कुछ ऐसी हूली-फूली,
*
लगती है कितनी छकी-छकी
गह-गह गहनों-गहनों गहकी !
*
महकी, मेरे आँगन में महकी
जूही मेरे आँगन में महकी !
*** (१ पौत्री इरा के प्रति।)
*
*** (३३) वर्षा-पूर्व
आज छायी है घटा
काली घटा !
*
महीनों की
तपन के बाद
अहर्निश
तन-जलन के बाद
*
हवाओं से लिपट
लहरा उठा
ऊमस भरा वातावरण-आँचर !
*
किसी ने
डाल दी तन पर
सलेटी बादलों की
रेशमी चादर !
*
मोह लेती है छटा,
मोद देती है घटा,
काली घटा !
*
(३४) कामना-सूर्य
*(१)** हर व्यक्ति सूरज हो
ऊर्जा-भरा,
तप-सा खरा,
*** हर व्यक्ति सूरज-सा धधकता
*** आग हो,
*** बेलौस हो, बेलाग हो !
*(२)** हर व्यक्ति सूरज-सा
प्रखर,
पाबन्द हो,
रोशनी का छन्द हो !
*** जाए जहाँ-
*** कण-कण उजागर हो,
*** असमंजस अँधेरा
*** कक्ष-बाहर हो !
(३) हर व्यक्ति सूरज-सा
दमकता दिखे,
ऊष्मा भरा
किरणें धरे,
*** हर व्यक्ति सूरज-सा
*** चमकता दिखे !
(३५) एक सत्य

बन्धन
उभरता है - चुनौती बन
अस्वीकृति बन,
जगाता है सतत
विद्रोह / बल / प्रतिरोध /
ज्वाला / क्रोध।
*
बन्धन
उभरता - स्नेह की उपलब्धि बन,
स्वीकार बन,
जगाता -
मोह / अक्षय सन्धि / अर्पण चाह /
जीवन - दाह।
*
** (३६) उपलब्धि

सपनों के सहारे
एक लम्बी उम्र
हमने
सहज ही काट ली -
बडे सुख से
*** सहन से
*** सब्र से !
मन के गगन *पर
मुक्त मँडराती व घहराती
गहन बदली अभावों की
उड़ा दी, छाँट दी
हमने
अटल विश्वास के
*** दृढ़ वेगवाही वातचक्रों से
दिन के, रैन के
अनगिनत सपनों के भरोसे !
*
मौन रह अविराम जी ली
यह कठिनतम जिन्दगी
हमने
अमन से, चैन से !
सपनो !
महत् आभार,
वृहत् आभार !

** (३७) विचार-विशेष
सपने आनन-फानन साकार नहीं होते
पीढ़ी-दर-पीढ़ी क्रम-क्रम से सच होते हैं,
सपने माणव-मंत्रों से सिद्ध नहीं होते
*** पीढ़ी-दर-पीढ़ी धृति-श्रम से सच होते हैं !

** (३८) सार्थकता
जिस दिन
मानव-मानव से प्यार करेगा,
हर भेद-भाव से
ऊपर उठ कर,
भूल
अपरिचित-परिचित का अन्तर
सबका स्वागत-सत्कार करेगा,
पूरा होगा
उस दिन सपना !
विश्व लगेगा
उस दिन अपना !

(३९) अलम्

आहों और कराहों से
नहीं मिटेगी
आहत तन की, आहत मन की पीर !
*
दृढ़ आक्रोश उगलने से
नहीं कटेगी
हाथों-पैरों से लिपटी जंजीर !
*
जीवन-रक्त बहाने से
नहीं घटेगी
लहराती लपटों की तासीर !

आओ -
पीड़ा सह लें,
बाधित रह लें,
पल-पल दह लें !
*
करवट लेगा इतिहास,
इतना रखना विश्वास !

** (४०) चाह
जीवन अबाधित बहे,
जय की कहानी कहे !
*
आशीष-तरु-छाँह में
जन-जन सतत सुख लहे !
*
दिन-रात मन-बीन पर
प्रिय गीत गाता रहे !
*
मधु-स्वप्न देखे सदा,
झूमे हँसे गहगहे !
*
मायूस कोई न हो,
लगते रहे कहकहे !
*
हर व्यक्ति कुन्दन बने,
अन्तर-अगन में दहे !
*
अज्ञात प्रारब्ध का
हर वार हँस कर सहे !
*
(४१) सम्भव (१)
*
आओ
चोट करें,
घन चोट करें -
परिवर्तन होगा,
धरती की गहराई में
कम्पन होगा,
चट्टानों की परतें
*** चटखेंगी,
अवरोधक टूटेंगे,
फूटेगी जल-धार !
*
आओ
चोट करें,
मिल कर चोट करें -
स्थितियाँ बदलेंगी,
पत्थर अँकुराएंगे,
लह-लह
पौधों से ढक जाएंगे !

(४२) सम्भव (२)
*
आओ
टकराएँ,
पूरी ताकत से टकराएँ,
आखर
लोहे का आकार
*** हिलेगा,
बंद सिंह-द्वार
*** खुलेगा !
मुक्ति मशालें थामे
जन-जन गुजरेंगे,
कोने-कोने में
अपना जीवन-धन खोजेंगे !
नवयुग का तूर्य बजेगा,
प्राची में सूर्य उगेगा !
आओ
टकराएँ,
मिल कर टकराएँ,
जीवन सँवरेगा,
हर वंचित-पीड़ित सँभलेगा !

(४३) विपत

आखर,
गया थम !
उठा-
चीखता
तोड़ता - फोड़ता
लीलता
क्रुद्ध अंधड़ !
*
तबाही.... तबाही.... तबाही !
*
इधर भी; उधर भी
यहाँ भी; वहाँ भी !
दीखते
खण्डहर.... खण्डहर.... खण्डहर,
अनगिनत शव !
सर्वत्र निस्तब्धता,
थम गया रव !
*
दबे,
चोट खाये,
रुधिर - सिक्त
मानव... मवेशी... परिन्दे
विवश तोड़ते दम !
*
भयाक्रांत सुनसान में
सनसनाती हवा,
खा गया
अंग-प्रति-अंग
लकवा !
अपाहिज
थका शक्ति-गतिहीन जीवन,
विगत-राग धड़कन !
*
भयानक कहर
अब गया थम,
बचे कुछ
उदासी-सने चेहरे नम !
*
सदा के लिए
खो
घरों-परिजनों को,
बिलखते
बेसहारा !
असह
कारुणिक
दृश्य सारा !
*
चलो,
तेज अंधड़
गया थम !
गहरा गमजदा हम !
*
(४४) स्व-तंत्र
*
आकाश है सबके लिए,
अवकाश है सबके लिए !
*
विहगो !
उड़ो,
उन्मुक्त पंखों से उड़ो !
*
ऊँची उड़ानें
शक्ति-भर ऊँची उड़ानें
दूर तक
विहगो भरो !
विश्वास से ऊपर उठो;
गन्तव्य तक पहुँचो,
अभीप्सित लक्ष्य तक पहुँचो !
*
ऊँचे और ऊँचे और ऊँचे
तीव्र ध्वनि-गति से उड़ो,
निडर होकर उड़ो !
आकाश यह
सबके लिए है-
असीमित
शून्याकाश में
जहाँ चाहो मुड़ो,
जहाँ चाहो उड़ो
*
ऐसे मुड़ो; वैसे मुड़ो,
ऐसे उड़ो; वैसे उड़ो,
सुविधा व सुभीते से उड़ो !

अपने प्राप्य को
*** हासिल करो !
स्वच्छंद हो, निर्द्वन्द्व हो,
ऊर्ध्वगामी, ऊर्ध्वमुख;
गगनचुम्बी उड़ानें
दूर तक
*** विहगो भरो !
*
न हो
कोई किसी की राह में,
बाधक न हो
कोई किसी की
पूर्ण होती चाह में !
*
स्वाधीन हों सब
स्वानुशासन में बँधे,
हम-राह हों
सँभले सधे !
(समाप्त)
*
संपर्क:
डा. महेंद्र भटनागर
११० बलवंतनगर, गांधी रोड,
ग्वालियर - ४७४ ००२ (म. प्र.)
फोन : ०७५१-४०९२९०८
ई-मेल :
drmahendrabh@rediffmail.com


ग़ज़ल

-तरूण शर्मा

 
मेरी मजार पे एक चिराग जला गया कोई
बुझती उम्मीदों को एक आस दिखा गया कोई

आज की रात बहुत बेचैन है कटती ही नही
सुबह का एक ख्वाब इसे दिखा गया कोई

एक तेरे दर्द के बीमार थे हम, मर भी गए
उसकी दवा सारे शहर को पिला गया कोई

अपना चेहरा पहचानता तो था मैं लेकिन
एक आईना कल रात मुझे दिखा गया कोई

मैं एक कागज़ को लिए सोचता ही रहा तुझको
तेरी एक तस्वीर फलक पे बना गया कोई
----
संपर्क:
-तरुण शर्मा
फ़ोस्टर सिटी, सीए, यूएसए



यह सभी उपस्थित जनों के लिये एक विशेष अनुभव रहा होगा क्यों कि भारतीय उच्चायोग लंदन, यू.के. में कार्यरत हिन्दी विद्वानों का सम्मान कर रहा था। यह अपने आप में एक अनूठा कदम है।

इन सम्मानों की घोषणा विश्व हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में की गई थी जो कि 10 जनवरी को विश्व भर में मनाया जाता है। इन सम्मानों की शुऱूआत वर्ष 2006 से की गई थी। इस योजना के अंतर्गत मानपत्र एवं शॉल पहनाने का काम मंत्री-समन्वय श्री रजत बागची ने स्वयं किया।

हिन्दी के जाने माने कथाकार श्री तेजेन्द्र शर्मा को इस कार्यक्रम में डा. हरिवंश राय बच्चन सम्मान प्रदान किया गया। पिछले वर्ष तेजेन्द्र शर्मा का कहानी संकलन बेघर आंखे, कविता संग्रह ये घर तुम्हारा है एवं अंग्रेज़ी की पुस्तक ब्लैक एण्ड व्हाइट का प्रकाशन हुआ था। इस के साथ साथ तेजेन्द्र शर्मा के तीन अनुवादित संकलन उर्दू, नेपाली एवं पंजाबी भाषाओं में प्रकाशित हुए। उन्हें भारत में संकल्प सम्मान एवं तितली पत्रिका सम्मानों से भी नवाज़ा गया। तेजेन्द्र शर्मा कथा यू.के. एवं फ़िल संस्था के महासचिव भी हैं।

 

इसी कार्यक्रम में हि‍न्‍दी के शि‍क्षक श्री वेद मि‍त्र मोहला को जॉन गि‍लक्रि‍स्‍ट यू के हि‍न्‍दी शि‍क्षण सम्‍मान से नवाज़ा गया। आचार्य महावीर प्रसाद द्वि‍वेदी यू के हि‍न्‍दी पत्रकारि‍ता सम्‍मान 05 नवम्‍बर, 1989 से अपने हि‍न्‍दी प्रसारण के माध्‍यम से दक्षि‍ण एशि‍याई श्रोताओं में अति‍ लोकप्रि‍यता प्राप्‍त करने वाले सनराइज रेडि‍यो को दिया गया। फ्रेडरि‍क पि‍न्‍काट यू के हि‍न्‍दी प्रचार प्रसार सम्‍मान : लन्‍दन की यू के हि‍न्‍दी समि‍ति को प्रदान किया गया।

इसी अवसर पर सोआस में कार्यरत डा. फ़्रैंचेस्का

(बांए से नैना शर्मा, तेजेन्द्र शर्मा, श्री रजत बागची, डा. निखिल कौशिक, राकेश दुबे)

ऑरसीनी का भी सम्मान किया गया। विश्व हिन्दी सम्मेलन, न्युयॉर्क के दौरान डा. ऑर्सीनी, भारत में अपने शोध कार्य के चलते, सम्मान ग्रहण करने के लिये नहीं पहुंच पाईं थीं। श्री रजत बागची ने उन्हें उनका सम्मान भारत सरकार की ओर से इस अवसर पर भारत भवन में प्रदान किया।

भारतीय उच्चायोग के कर्मचारियों के बच्चों को उनकी हिन्दी उपलब्धियों के लिये प्रथम सचिव संस्कृति श्री राजेश श्रीवास्तव ने पुरस्कार प्रदान किये।

यू.के. में हिन्द लेखकों को पुस्तकें प्रकाशित करवाने में सहायता प्रदान करने के लिये पिछले वर्ष डा. लक्ष्मीमल सिंघवी यू.के. हिन्दी प्रकाशन सहायता योजना की घोषणा की गई थी। इस योजना को विदेश मंत्रालय का भी समर्थन प्राप्त है। इस योजना के तहत प्रकाशन सहायता के तौर पर श्री मोहन राणा (बाथ) एवं श्रीमती स्वर्ण तलवार को बीस बीस हज़ार रुपये की राशि प्रदान की गई।

ग्रेट ब्रिटेन हिन्दी लेखक संघ की स्थापना की घोषणा भी इसी कार्यक्रम में की गई। यह संस्था यू.के. के हिन्दी लेखकों को एकजुट होने में सहायता प्रदान करेगी।

इस कार्यक्रम में अन्य लोगों के अतिरिक्त काउंसलर ज़कीया ज़ुबैरी, श्री इस्माइल चुनारा, डा. कृष्ण कुमार, श्री प्राण शर्मा, श्री नरेश भारतीय, श्री इन्दर स्याल, तनवीर अख़तर, दिव्या माथुर, जय वर्मा, डा. निखिल कौशिक, आदि भी उपस्थित थे।

 

(प्रस्तुति : तेजेन्द्र शर्मा)


कविता

आखिरी झलक

-विद्या देवदास नायर

पहले मैं भी सोचा करता था,

जब कोई अपना हमसे दूर चला जाता,

तो किसी से ये दर्द क्यों नहीं सहा जाता?


इस सवाल का जवाब आज मुझे मेरे नसीब ने दे दी,

क्यों कि आज मेरे जीवन की सबसे अजीज की मौत हो गई,


आज एक सूने मरघट पर सब के होते हुए भी, तन्हा हूँ मैं खड़ा,

सामने मेरा प्यार गहरी नींद सो रहा है , काट के टुकड़ों में पड़ा।


तुम्हें देख कर मैं आज बिलकुल चुप हो गया हूँ,

आज के बाद जिन्दगी में शायद ही किसी से खुल कर मैं अब बोल पाऊँ,

याद कर रहा हूँ मैं, उस हसीन पल को,

जब पहली बार मैंने देखा था तुमको,


प्यार भरी नजरों का वह इशारा,

उस पहले प्यार की पहली झलक,

तुम ही तो लाई थी मेरी जिन्दगी में रौनक,


उस वक्त भी मैं चुप था,

मगर तब मैं तुम्हारी खूबसूरती से मुग्ध था,


पर आज मेरी खामोशी का कारण कुछ और है,

क्यों कि, आज तूने छोडा मेरा दामन है,


पानी से भरे मटके के साथ ले रहा हूँ मैं तुम्हारे फेरे,

याद आ रहें हैं मुझे जब हमने ली थी अग्नि के समक्ष वो सात फेरे,


ली थी हमने सात जन्मों तक संग रहने की कसम,

लेकिन आज तुम्हारे बिन बहक रहें हैं मेरे कदम,


फेरे के बाद अब मैंने मटकी तोड़ दी,

मगर उस दिल का क्या जो आज टुकड़े बन कर रह गई,


मैंने तुम्हारे साथ तो जिया है हर पल,

पर आज मेरे पास रह गया है सिर्फ तुम्हारी यादों का आँचल,


तुम्हारे शरीर पर केवल आग लगाना बाकी है,

मगर हमारे तुम्हारे बीच बात करने के लिए कितना कुछ बाकी है,


काश ये पल जरा थम जाए,

और हम खुशी से इक दूजे के गले लग जाए,


यदि मेरे बस में हो तो मैं तुम्हें यहाँ से जाने ही न दूँ,

पर तुम्हारी मौत की सच्चाई को कब तक झुठलाता रहूँ,


आज दे रहे हो तुम अपनी आखिरी झलक,

जी करता है तुम्हें यूँ ही देखता रहूँ मैं अपलक,


आज के बाद तुम्हें कभी न देख पाऊँगा,

मगर अपनी दुआओं में तुझे हमेशा माँगा करूँगा,


मेरी गल्तियों को हो सके तो माफ करना,

अनजाने में हुई भूल को बोझ बनाकर दिल में मत रखना,


जानेमन मुझे आज कहना पड़ रहा है तुझसे अलविदा,

मगर याद रखना मौत भी कभी कर न पाएगा हमें जुदा,


आग की चिनगारी अब भड़कती हुई तुम्हें जला देगी,

पर तेरी प्यार और यादें तो मेरे ही वश रहेगी,


तुम इस जिन्दगी से सदा के लिए मुक्त हो जाओगी,

और मुझे यूहीं तड़पता हुआ छोड़कर चली जाओगी,


थोड़ी देर बाद यह आग भी थम जाएगा,

दिन तो कैसे भी गुजर जाएँगें, पर रातें काटे नहीं कटेंगे,

सावन के महीने में प्यार तेरा मुझे सताएगा,

तड़पते हुए प्राणियों को राहत वह पहुँचाएगा,

मगर मेरे दिल में सुलगते तेरी याद को कौन सावन बुझाएगा,


काल के क्रूर क्रीड़ा ने तो आज हमें कर दिया है अलग,

और मेरे सामने से मिट गई है तुम्हारी आखिरी झलक,


आँखों में आँसुओं की बौछार है,

पर दिल में तो धड़कता अभी भी तेरी प्यार है,


मैं जियूँगा सिर्फ एक मकसद के लिए,

तुम्हारी हसीन यादों को जिन्दगी देने के लिए,


नहीं मिटेगी मेरे दिल की तस्वीर से तुम्हारी आखिरी झलक,

मेरी मुहब्बत है सिर्फ तुम्हारे लिए, नहीं है इसमें कोई शक,


मेरी सिर्फ एक गुजारिश है तुमसे मेरी जाने मन,

सपनों मे ही सही, एक परी बनकर थाम लिया करो मेरा दामन।


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सम्पर्क:

विद्या देवदास नायर

डॉ.जी.आर.दामोदरन विज्ञान महाविद्यालय

कोयम्बत्तूर - १४

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(चित्र - कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)


आलेख

आंसू की सार्थकता

-अनिल पाण्डेय

आंसू जो कभी कभार बहा करते हैं। बेवजह और अनायास। तब जब हम किसी को विदा करते हैं या किसी के घर से विदा होते हैं। अथवा कोई अचानक आ जाता है और हम दौड़ पड़ते हैं इस आंसू को लेकर। उनका स्वागत करने के लिए, अगवानी करने के लिए। ये तो हुए प्रेम की आंसू जिसके कोई न कोई वारिस होते हैं। यह अनाथ नहीं होती, दूसरों की उसमें कम से कम कुछ न कुछ अभिव्यक्ति होती ही है। जो चूकर गिरने से पहले ही थाम ली जाती है। पर क्या हम इस आंसू को वास्तविक आंसू कह सकते हैं? यह कैसी आंसू है जो कभी कभार बहा करती है और दूसरों की दिलासायें पाकर अपने आपको तिलान्जित कर लेती है?

आंसू तो शायद वो होते हैं जो अनवरत बहा करते हैं ,जो लावारिस होते हैं । जिसमें दूसरों की अभिव्यक्ति होती है तो शोषण के लिए। दिलासायें होती हैं तो विकास को विनाश में परिवर्तित करने के लिए जिसमें यदि स्वार्थता होती है तो दो रोटी के लिए और यदि निस्वार्थता होती है तो अपने आपको समर्पण करने के लिए। इसके सिवाय वो कर ही क्या सकते हैं? ना तो विद्रोह और ना ही तो विरोध। पर यदि विद्रोह और विरोध करें भी तो किस आधार पर सब कुछ राजनीतिकों का जो ठहरा।

धन- दौलत, रूपया- पैसा, मान-ईमान। भारत में चल रहे आतंकवादी हमले हों या आसाम में सितम ढा रहे उल्फा संगठन के कारनामें अथवा दिल्ली के मास्टर प्लान के अंतर्गत भूमि अधिग्रहण मामले या तो फिर निठारी हत्याकांड,इन सब में इन्हीं आंसू के तो दर्शन होते हैं। जिसमें निह्स्वार्थ्ता होती है । स्वार्थता होती है । निराशा , डर ,भय , अनुकम्पा होती है। जो जीवन के समतल पर ऐसा बहा करती है जैसे नदियों के पानी। जिनको न तो कोई पूछने वाला होता है , और ना ही तो कोई रोकने वाला। कभी कभार यदि रोकने की कोशिश की भी गयी तो बाँध बनाकर किसी नाम से विभूषित कर दिया गया । घोट दिया गया गला उसका,उसके विकास का और उसके व्यक्तित्व का । पर यहाँ यह भी कहना तो एक देश के लिए , उसके लोगों के लिए , हमारे लिए, अन्यायपूर्ण होगा , कि आंसू रोके नहीं जाते । वी अनवरत बहते रहते हैं । वे लावारिस होते हैं । उनको कोई पूछने वाला नहीं होता। नहीं;ऐसा नहीं है। जरूर कोई न कोई होता है। उसे रोकने वाला । उसके बदले भले ही वह अपने आंसू बहाए। पर वह एक कोशिश तो करता है-लाखों आंसू को बहनें से रोकने के लिए । भले ही वह सीलिंग मामले के अंतर्गत अन्यायपूर्ण ढंग से जेलों की रोटी खाए या फिर उसमें उसकी राजनीतिक हित छिपा हो, पर वह एक संघर्ष तो करता है इन असहाय आंसुओं के साथ ।

यदि इन्हीं के जैसा देश का ३५% भाग करने लगे तो ये आंसू बहे ही क्यों? फिर तो ना राजतन्त्र , न लोकतंत्र , ना तो प्रजातंत्र , सब तंत्र आ जाये । स्वतंत्र तंत्र आ जाये । जिस स्वतंत्र तंत्र में न तो पुलिस हो, ना तो अन्याय हो , ना तो कानून हो । पर, ये तो गांधीवादी विचारधारा है । इसका समर्थन कौन करेगा ? कांग्रेस , भाजपा , या फिर अन्य राजनीतिक दल? शायद कोई नहीं। क्योंकि उनके पास ये आंसू नहीं है । हित है। राजनीतिक हित। वर्ग हित । सामूहिक हित । समाज हित से कोई मतलब नहीं । समाज क्या कर रहा है? क्या हो रहा है? कहाँ जा रहा है?कोई मतलब नहीं , कोई परवा नहीं।

कुछ हो रहा है वो भी बुरा, कुछ न हो रहा है वह तो बुरा हुआ है । जो कुछ कर रहे हैं वो आलोचना के शिकार , और जो नहीं कर रहे हैं वो तो आलोचित हुए हैं । फिर आंसू कौन है? कहाँ है? कैसे है? किस तरह से उसको परिभाषित किया जाय? किस तरह से उसकी सार्थकता दिखाई जाय ? कैसे नाम दिया जाय उसको आंसू का ? क्या आंसू नैराश्य है? जो यूँ ही चू पड़ती है। जो यूँ ही भावुक हो उठती है। बहने लगती है , गिरने लगती है, चूने लगती है झरनों की तरह , किसी को देखकर । शायद यही। .....................

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संपर्क:

अनिल पाण्डेय

म. नं.-4162, ST.N-4, मोहल्ला बेअंतपुरा, समराला चाकुम के पास,

चंडीगढ़ रोड,

लुधियाना (पंजाब)

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(चित्र - कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)


कहानी

सही

- मेराज अहमद

गाँव के लोग काहिल होते हैं।‘‘ बेटे की मां ने उसके पेपर में आये सवाल को दुहराते हुए कहा, ’’बताओ सही कि गलत?‘‘

बेटे को जवाब मालूम था इसलिए वह मेरी तरफ देखकर मुस्कुराया। मुझे लगा कि वह अभी कहेगा गलत। मगर उसने जवाब नहीं दिया। वह मुस्कुराये ही जा रहा था। न जाने क्यों लगा कि वह मेरा मजाक उड़ा रहा है। हालांकि इसके लिए अभी उसकी उम्र नहीं हुई थी, फिर भी मुझे गुस्सा आने लगा। मैं सुबह ही गाँव से लौटा था। वैसे तो ट्रेन का सही समय दो बजे के आस-पास का था, मगर ट्रेन लेट हो गयी। यदि ट्रेन सही समय पर आयी होती तो मैं नींद पूरी करके ताजादम हो जाता और सुबह आठ बजे तक उठने के बाद काम पर आसानी से पहुँच जाता। सोना इसलिए जरूरी था कि काम ही कुछ ऐसा था कि दिनभर की भागदौड़ थी इस साइट से उस साइट भागना पड़ता था। कम्पनी में पैसे तो इतने अच्छे मिलते थे कि हर कोई इस कम्पनी में आना चाहता है, मगर ड्यूटी? बाप रे! ऊपर से सख्ती से वक्त की पाबन्दी! थके और कमजोर आदमी के लिए तो काम करना लगभग नामुमकिन-सा था।

आकर बिस्तर पर लेटने के बाद जैसे ही नींद आनी शुरू हुई बीवी ने खटर-पटर शुरू कर दी। बेटे की परीक्षाएँ चल रही थीं। वैसे भी इसी समय उठकर घरेलू कामों को शुरू कर देना उसकी दिनचर्या थी। नींद आते-आते उचट गयी, फिर तो हजार प्रयत्न किए मगर जब नींद गायब तो गायब। लेकिन बिस्तर छोड़ने का मन नहीं हुआ। मेरी कसमसाहट से बीवी को भी मेरे नींद न आने का एहसास हो गया इसलिए आठ से पहले ही एक-दो बार कमरे में आकर टोक भी गयी कि, ’’ नींद नहीं आ रही तो उठ जाओ।‘‘

बीवी के बार-बार टोकने के बावजूद मैंने बिस्तर नहीं छोड़ा। उठने की जैसे हिम्मत ही नहीं हो रही थी। आज की ड्यूटी तो खैर गयी ही। न जाने क्यों यह बात मन में संतुष्टि का भाव भर रही थी। यही नहीं! बार-बार यह भी ख्याल जोर मार रहा था कि नौकरी ही क्यों न छोड़ दूं। आखिर इसमें जान खपाने से हासिल क्या होगा?

ईद के ठीक से दो महीने भी नहीं गुजरे थे जब मैं सपरिवार घर गया था। मेरी कम्पनी की एक विशेषता यह भी थी कि छुट्टियों को लेकर ना-नूकर करने में मैनेजर लोहनी साहब मेरे मालिक वर्मा जी से भी एक कदम आगे थे। उनकी तो जन्दगी ऐसी थी कि बस काम...काम! इसके अलावा कुछ भी नहीं। कहने को मैनेजर थे वरना सबको पता था कि पूरे तीस प्रतिशत की हिस्सेदारी भी उनकी कम्पनी में, कहते, ’’कंस्ट्रक्शन की दुनियाँ में मैंने मेट की पोजीशन से काम शुरू किया। तुम लोग तो बडी-बडी डिग्रियों के साथ आये हो। चाँद सितारों से भी आगे बढ सकते हो। मगर क्या है कि जब देखो छुट्टी की एप्लीकेशन लिए हाजर! साल में कम से कम चार बार जाते हो मुलुक। फॉरेन का सपना भी देखते हो! खान वहाँ से कैसे बार-बार आओगे?‘‘

कभी-कभार शाम में समय से घर पहुँचने का मन होता तब भी लोहनी साहब की भाषणबाजी का ख्याल आते ही हिम्मत पश्त हो जाती। ’’अगर घर ही रहने का इतना शौक था तो गवर्मेंट जॉब देखते। सिविल में तो पैसा भी खूब है।‘‘ इसी के साथ यह कहना कभी नहीं भूलते कि, ईमानदारी के सैटिस्फैक्शन का जो मजा और आगे बढ़ने के जितने चान्सेज यहाँ है। वहाँ भला कहाँ? नेता लोग भी अब तो गुन्डों ठेकेदारों के साथ-साथ सर पर सवार रहते हैं।

घर में सर पर सवार बीवी को अपनी ही शिकायतें थीं, ’’सरकारी नौकरी के कितने ठाठ हैं! काश तुम्हारे भी दिमाग में यह बात उस वक्त आ गयी होती।‘‘

’’कब?‘‘ मैं उसकी बातों को हवा में उड़ा देने की गरज से कहता।

’’जब नौकरी में आये और कब?‘‘

मैं हंसकर कहता, ’’उस वक्त तुम जो मिल गयी होतीं तब न। मगर तब तो न जाने किसके ख्वाब में मुब्तला रही होंगी!‘‘

वह मेरे मजाक के प्रत्युत्तर में चिढ़ने के बावजूद अपनी ही रव में कहती ’’ कम से कम सलीके का घर तो होता।‘‘

’’मगर होता तो वह भी सरकार का। क्या फर्क पड़ता? किराये का हो या सरकारी। बल्कि किराये के मकान में अपनी मरजी के चुनाव की आजादी तो है।‘‘ मैं अपनी कमजोरी को ढंकने की गरज से कमजोर सा तर्क देने की कोशिश करता।

’’यही दो कमरुल्ली का घर! कौन सी अपनी मरजी का है?‘‘ वह फिर सवाल करतीं और कहतीं, ’’खुदा जाने कब अपनी जमीन और अपना घर होगा?‘‘

मैं उस पर प्रभावी होने की कोशिश करता, ’’ईमानदारी से इतनी मोटी रकम मिलती है सरकारी नौकरी में? मरजी का भी हो जायेगा बस अपना घर होने तो दो।‘‘

’’पहले एक घर से तो निपट लो फिर दूसरे घर के बारे में सोचो।‘‘ वह अपनी बात बड़ी सादगी और सामान्य लहजे में कहकर इस प्रकार से खुद को पेश करती मानो उसे घर की कोई परवाह ही नहीं। उसने तो बस यूँ ही घर बात निकली तो कह दिया।

उसकी इस अदा पर मैं तिलमिलाए बगैर नहीं रह सका।

’’उठो जी! साढ़े नौ बजने वाले हैं। ड्यूटी नहीं जाना है? तुम्हारे लोहनी साहब?‘‘ वह आगे कुछ कहते-कहते रुक गयी और पल भर की चुप्पी के बाद संजीदा स्वर में पूछा, ’’गाँव का क्या हाल है? अब्बा-अम्मा ठीक तो हैं न? आखिर क्या बात थी कि इतनी इमरजेन्सी का बुलावा आ गया?‘‘

मैंने उसके सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। चुप ही रहा। थोड़ी देर तक मेरे जवाब का शायद उसने इन्तजार किया हो? मगर मुझे दुबारा आँख बंद करके सोने का उपक्रम करते देख वह अपने काम में लग गयी।

मैं जानता था कि उसे अनुमान हो गया होगा। वह इतनी भी बुद्धू नहीं कि जाने का कारण न समझती। दरअसल समझना आसान भी था। इस प्रकार जल्द-असजल्द घर किसी को बुलवाने के दो ही अहम कारण होते हैं। पहला, तब जब कि किसी की शदीद तबियत खराब हो या किसी की मौत हो गयी हो और उसे इस गमगीन खबर के साथ सफर न करने देने का इरादा हो! दूसरा, इसका सम्बन्ध किसी न किसी गम्भीर घरेलू समस्या से होता है। बुलाने वाले समस्या को फोन इत्यादि से साफ-साफ बताने के बजाय केवल उसका संकेत मात्रा करके इसलिए बुलाते हैं कि जाने वाला समस्या को अपने पैमाने पर भी तो तोलेगा। और यदि पलड़ा हल्का पड़ गया तो! बहरहाल कारण पहला होता तो अब तक उसे खबर मिल गयी होती। दूसरे किस्म के बुलावे और बाद में सामने आने वाले जवाज से अक्सर-व-बेश्तर हमारा साबका पड़ता रहता। समझने के बाद भी व अनजान बन रही है! मैंने उसके सारे सवालों को दरकिनार करके सिर्फ ड्यूटी वाले सवाल के जवाब देने की गरज से कहा, ’’नहीं!‘‘

उसने भी बजाय कुछ और बोलने के मुस्कुरा कर कहा, ’’नौकरी छोड़ने का इरादा है क्या?‘‘ सहज रूप में अथवा व्यंग्य के लहजे में वह बोली, मेरे लिए समझना जरा मुश्किल था। ’’गाँव में चलेंगे रहने। कम से कम घर की फिक्र से तो फुरसत मिलेगी।‘‘ कुछ देर खामोश रहने के बाद वह वैसे ही चहकी जैसे कि बेटा पेपर देने आने पर चहक रहा था, ’’अल्ला कसम! मजा आ जायेगा!‘‘

गाँव में अच्छा खासा दो खन का दादा के जमाने का बना लखौरी ईंटों का घर था। आगे ढलान और उससे लगी अन्दुरूनी कमरों की कतार चूने के छत की थी। बाकी का हिस्सा कोठेदार बनावट का खपरैल का था। लोग कहते पुराने जमाने में गाँवों में इतने अच्छे घर कम होते थे। दादा की कोई खास हैसियत भी नहीं थी। पूरा गाँव ही जमींदारों का था, मगर कहने के लिए अपनी ही जोत की जमींदारी थी। जमीन भी कितनी? सीलिंग के भी दायरे में न आ सकी। परिवार भरा पूरा था। दो बड़ी बहनें। चार भाई। वालिद की तो घर में मौजूदगी भर थी। दादा के इन्तकाल के बाद वालिदा ने अपने मैके की भव्यता से मिले तजुर्बे और व्यक्तित्व के बल पर घर को संभाला। खेती-बाड़ी उन्हीं के दम पर हो रही थी। हालांकि वक्त की बदलती रफ्तार का साथ ठीक से खेती दे नहीं पा रही थी, मगर उसी के बल पर जितनी जो ले सका उसे उतनी तालीम देने के कोशिश की। बडे भैया ने तो इंटर किसी तरह कर भी लिया मगर मझिले और छोटे कई-कई स्कूल बदलने के बाद भी हाई स्कूल की दीवार को फांद नहीं सके। सब घर थे, इसका मतलब था कि खेती में ही लगे हैं। करें चाहे जो, अगर मैं कुछ भी कहता तो गाँव में रहने का मुझ पर एहसान लादते हुए छोटे के अतिरिक्त सभी यह जरूर कहते कि, गाँव में रहो तो पता चले।

जब भी मैं सपरिवार गाँव आता तो भाभी पत्नी से यह कहे बिना रहती ही नहीं कि, ’’दुल्हन मौज तो तुम्हारी है। अकेली जान सास-नन्द और देवरानी-जिठानी की झंझटों से पाक!‘‘ फिर वह बडे विश्वास के साथ यह जरूर बतातीं कि, ’’ मैंने तो सुना है शहरों में राज ही औरतों का चलता है घरों में।‘‘ शुरू में तो मुझसे ऐसी बातें नहीं कहतीं मगर अब तो बराबर मुझसे भी ताने तवाजे की लात मारते हुए अपनी जानकारी के सम्बन्ध में समर्थन की आकांक्षा से हुंकारी भरवाने के लिए अन्त में यह भी कहतीं ’’क्यों बाबू?‘‘

बडे भैया थे! बाहर अफलातून बने घूमते। समझते कि सारे इलाके की राजनीति की बागडोर उन्हीं के हाथों में है। हाँ, भाभी के आगे उनकी एक न चलती। पूरे परिवार के न चाहने के बावजूद अपने तीनों बेटे बेटियों को उनके ननिहालियों को सौंप दिये थे। भाभी की देखा-देखी मझिले की बीबी ने भी तिरछी चाल में चलना शुरू कर दिया। काम-धाम तो कितना करना पड़ता है अब गाँवों में? उसका सारा समय भी शिकवे-शिकायत में बीतता। वह भी पत्नी से हर बार यह जरूर कहती कि, ’’बाजी! मेरी तो किस्मत ही फूट गयी। न जाने क्या देखकर ब्याह दिया अब्बा ने। ढंग के काम काज से तो दुश्मनी है इनकी।‘‘ ऐसे अवसरों पर वह कभी-कभी बड़ी व्यावहारिक बातें करती ’’बेटी माशा अल्लाह पानी की तरह बढ़ रही है। तीन-तीन बेटे भी हैं, मगर इन्हें अभी भी खेल-तमाशे से फुरसत नहीं। बस एक धुन। हाय क्रिकेट! हाय क्रिकेट। कभी मैच तो कभी टूर्नामेंट। कभी वालीबाल तो कभी हाकी। एक बार अब्बा ने कहा भी कि यहीं आकर कस्बे में कोई दुकान डलिया करो तो इनकी बात तो छोड़ो! पूरा खानदान आग का गोला बन गया। अब जो खुद हमारे यहाँ दरगाह के लिए सिन्नी-बताशा और अगरबत्ती बनाने का काम होता है तो वही तो कहेंगे? या कि इनके लिए हवाई जहाज का कारखाना लगवाऐंगे।‘‘

लोग कहते कि छोटा थोड़ा कमअक्ल है, मगर मुझे उसकी कमअक्ली संजीदगी लगती। किसी को रही हो या न मुझे उससे ही कुछ करने की उम्मीद थी लेकिन समय के साथ बढ़ती उसकी एकान्तप्रियता ने मेरी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। मन में यह भी ख्याल आता कि उसे किसी तरह बाहर ही भेज दिया जाय मगर उसकी इस विशेषता का ख्याल आते ही यह विचार अपने आप ही खारिज हो जाता। पहले कभी-कभी घर में कारोबार के सिलसिले में चर्चा भी चलती, मगर मेरी पढ़ायी पूरी होने के बाद नौकरी लगते ही मानो इस प्रकार की चर्चा अब गुनाह हो गयी। घर के खर्चे बढ़ रहे हैं। भला कैसे काम चलेगा? मैं सोचता। मेरी भी नौकरी कोई ऐसी नहीं कि धन बरसता हो। पसीना ढरकाओ तो जाकर पैसे मिलें। घर का मोटा किराया, बच्चे की पढ़ायी का अनाप-शनाप खर्च, हसब-हैसियत का खयाल भी तो रखना पड़ता है। ऊपर से घर वालों का यह तुर्रा कि तुम्हारे ही जितनी कमायी जो अरब में करते है उनकी बिल्डिंगें लहरा रही हैं। जब कोई यह कहता तो मेरे दिमाग की नसें फटने लगतीं। उन्हें यह समझाना भी तो आसान नहीं था कि मुझमें और मेरे काम और अरब वालों और उनके काम में क्या फर्क है। ऐसी बातों से काटने से पहले ले जाये जा रहे मुर्गे की तरह फड़-फड़ाकर मैं शान्त हो जाता फिर घरेलू समस्याओं को सुलझाने की नयी-नयी योजना बनाने में लग जाता।

छोटे ने इशारतन ट्रैक्टर निकालने की बात की, भैया और मझिले ने उसके लाभ को गिनवाया तो मेरे मन में आशा का संचार हुआ। छुट-पुट खाद-पानी के लिए दी जाने वाली हर महीने की निश्चित रकम के साथ मैं नयी हीरोहोन्डा मोटर साइकिल और ट्यूबवेल पर इंजन के लिए एक मुश्त रकम भी दे चुका था। कुछ पैसे प्लाट के लिए जोड़ रक्खे थे मगर इस कार्यक्रम को मुल्तवी करके लोन के साथ नकद जमा करने के लिए सारे पैसे दे दिए। ट्रैक्टर आ गया।

घर जब पहुँचा तो पता चला कि समस्या का सम्बन्ध ट्रैक्टर से ही है। चाय पानी से फारिग होता इससे पहले ही आंगन में सपरिवार मोर्चेबन्दी के साथ तैयार बैठी अम्मा सामने आ गयीं। ’’बाबू! आरसी कटने वाली है। अब तक तो किसी तरह भैया ने तुम्हारे रोक रखा था मगर अब?‘‘

’’मतलब?‘‘ मैं सन्नाटे में आ गया।

’’हर बात में मतलब ढूँढने की यह नयी आदत ठीक नहीं यार।‘‘ भैया ने थोड़ा झुंझला कर कहा। फिर बोले, ’’मतलब साफ है। किस्त जमा नहीं हुई।‘‘

’’मगर क्यों?‘‘ मैंने रोषपूर्ण आवाज में कहा, ’’जब भी मैं पूछता तो यही कहा जाता कि हो जायेगी।‘‘

मझिले ने मेरी तरफ इस तरह सवालिया निगाहों से देखा मानों कहना चाह रहा हो, नहीं हुई तो?

मैं कुछ तल्ख बोलता मगर मानों मेरे तेवर को पढ़ते हुए अब्बा ने बात को सँभालने की कोशिश की ’’बेटा खेती-बाड़ी में हजार झंझटें हैं। जितनी तुम समझते हो लोन की अदायगी आसान नहीं।‘‘

’’बिल्कुल। खेत की मेड़ पर जाओ तो पता चले।‘‘ मझिले ने लुक्मा दिया।

’’इसका मतलब तो यह है कि खेती जब इतनी बड़ी झंझट है तो उसे छोड़ देना चाहिए। जब लोन वापस करना इतना मुश्किल था तो लेना ही नहीं चाहिए था।‘‘ मैंने भरसक सामान्य लहजे में कहा।

छोटे ने मासूमियत से कहा, ’’मगर लेते तो सभी हैं।‘‘ ’’जो लेते हैं वह नहीं सोचते कि वापस भी करना है?‘‘ मैंने उसी के लहजे में उससे सवाल किया।

सब मेरा मुँह देखते रहे किसी ने कुछ कहा नहीं चुप ही रहे। मैं ही फिर बोला, ’’लोन अगर वापस न किया जाता तो ये जो बैंक वगैरह हैं, कब के बंद हो गये होते। हाँ वापसी के लिए मेहनत की जरूरत जरूर होती है।‘‘

’’इसका मतलब है कि हम लोग मेहनत नहीं करते?‘‘ भैया बोले।

’’करते तो यह नतीजा सामने आता?‘‘

’’मतलब?‘‘

’’मतलब यह कि, मेहनत का नतीजा मिलना ही मिलना है... थोडी देर-सबेर भले हो।‘‘

’’हमें तम्बीहों की जरूरत नहीं।‘‘

’’यह तम्बीह नहीं सच्चायी है।‘‘

’’सच्चायी बड़ी तल्ख और धार-धार होती है। उसका बयान तो आसान है।‘‘ कहकर भैया थोड़ा जजबाती से हो गये। ’’कभी बाढ़ तो कभी सूखा! आजकल तो वक्त से काम के लिए मजदूर तक नहीं मिलते।‘‘

’’इस तरह के ’खुदायी कहर और अचानक की परेशानियों का सामना तो हर कारोबार में करना पड़ता है। नौकरी जितनी आसान लगती है उतनी है नहीं। उसमें भी हजार झंझटों से सामना होता है।‘‘ मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की।

’’सुकून तो है।‘‘ उन्होंने झट जवाब दिया।

’’यहां से कम! अकेले की जिन्दगी! कोई अपना नहीं। सब अपनी अपनी दुनिया में खोये।‘‘

’’पैसे हों तो पराये भी अपने हो जाते हैं।‘‘

’’पैसों के लिए मेहनत की जरूरत होती है।‘‘

’’मैंने एक से एक मेहनत करने वालों को देखा है।‘‘ अब्बा को भी मेरा लहजा सम्भवतः अच्छा नहीं लगा।

’’अब्बा। यह बात गये जमाने की हो गयी जब गाँव में जद्दो-जहद के अलावा कुछ नहीं था। अब न शहर न गाँव। कोई फर्क नहीं है दोनों जगहों की जिन्दगी में।‘‘

’’तुम्हारा मकसद?‘‘ काफी देर से खामोश बैठी अम्मा ने अपनी चुप्पी तोड़ी।

’’मेरे कहने का मकसद यह है कि कोई काम नहीं करना चाहता इस घर में। जैसे जिम्मेदारी का किसी को एहसास ही नहीं।‘‘ मैंने झुंझलाते हुए स्वर में कहा, ’’मैं अरब में मजदूरी नहीं करता कि पेट काट-काटकर घर वालों को पैसे भेज-भेजकर ऐश कराऊँ।‘‘

’’जरूरतें पूरी करने को ऐश कहते हो! वाह बेटा, यही सुनने के लिए पाल-पोस कर इतना बड़ा किया था?‘‘ अम्मा खुद कितनी भावुक थीं मेरी समझ में नहीं आया मगर यह बात मुझे भावुक करने के लिए ही कही थी, मैं समझ रहा था।

मेरी भावुकता का ही यह नतीजा था कि मैं अपने और अपने बाल-बच्चों के लिए कुछ भी नहीं जोड़ सका था। कोई ऐसी नौकरी भी नहीं थी कि फंड पेंशन का सहारा हो। भावुकता को परे धकेल मैंने कहा, ’’शहर में नहीं पैदा हुआ मैं भी इसी गाँव में रहा हूँ। सब कुछ जानता-समझता हूँ। मेरा भी हक है लेने का भी, न कि देता रहूँ। देता रहूँ।‘‘

’’हक की बात कर रहे हो बाबू? जो जहाँ वहीं उसका हक।‘‘ भाभी भी आखिरकार बहस में कूद ही पडीं, ’’हक पाने के लिए अदा भी करना पड़ता है।‘‘

’’मतलब?‘‘

’’मतलब यह कि हम सब भी माँ-बाप हैं। बच्चे जब बडे हो जायें और माँ-बाप बूढ़े हों तो उनके लिए बच्चों का भी कुछ हक बनता है।‘‘

’’मैंने हक अदा करने से गुरेज किया?‘‘

’’थोड़े से पैसे देकर समझ लिया कि हक अदा?‘‘ भारी भरकम सवाल करके भैया ने मेरी बोलती बन्द करना चाहा।

’’मैंने या मेरी बीवी ने सेवा सुभीता से कभी भागने की कोशिश की? मना किया?‘‘

’’मना नहीं किया तो! किया?‘‘ भाभी ने जो एक बार जबान खोल दी तो भला कहाँ रुकने वाली थीं।

उनके इस पलटवार से मेरी बोलती बन्द सी होती लगी मगर मैंने फिर हौसला रखते हुए कहा, ’’कितना तो कहते हैं हम इन लोगों से! चलिए साथ।‘‘

’’लो! इनकी सुनो! हम लोग इस उमर में शहर जायेंगे इनके साथ!‘‘ अम्मा ने व्यंग्य भरे लहजे में कहा,

उनके व्यंग्य भरे लहजे से मैं खिसिया सा गया, ’’फिर तो एक ही रास्ता है। सेवा करने को नौकरी छोड़कर चला आऊँ।‘‘

अब्बा एक बार फिर बात को संभालने के लिए आगे बढ़े, ’’यही तो इस घर की शान है। बहस-मुबाहसे के अलावा भी कोई कुछ करना चाहेगा भला? सामने जो मुश्किल आयी है उसका सामना कैसे हो सोचने की बात तो यह है।‘‘ कहकर वह खामोश हो गये।

इसमें सोचना क्या है? सीधी-सी बात है, मुझे पैसे का इन्तजाम कहीं न कहीं से करना है। करूँगा ही। सबको पता है। चाहे इसके लिए फिर लोन ही क्यों न लेना पड़े। मन में आया कि कह दूँ, मगर न जाने कौन सी ताकत थी जिसने मुझे रोक दिया। मन उलझने लगा। घर छोड़ने को कोई तैयार नहीं। अव्वल तो सोचेंगे ही नहीं कारोबार के बारे में, सोचें तो उसके लिए भी एक मुश्त रुपयों का सवाल! खेत में जाकर काम करने की कौन कहे? वहाँ जाने में सबकी हेठी होती है। सब कुछ मजदूरों के जिम्मे है तो खाक फायदा होगा। बडे भैया को तो बस सुबह अच्छा सा नाश्ता चाहिए फिर मोटर साइकिल स्टार्ट की और कस्बे की बाजार में हाजिर। बेमकसद! इस दुकान उस दुकान बैठक करेंगे। फुरसत है तो लोगों की बेगार करनी ही पड़ेगी। किसी की तारीख तो किसी का थाने का मामला हल करने के लिए मुफ्त का आदमी तैयार हो तो फिर लोग तो करवाना चाहेंगे ही। दो घड़ी रात के बाद वापसी होगी, फिर देर रात तक दरवाजे पर लोगों का जमावड़ा लगेगा। मुफ्त की चाय और पान-दोहला मिलेगा तो लोग तो आयेंगे ही! सबको फुरसत ही फुरसत है। जवान होने से पहले बच्चों को बम्बई, दिल्ली भेज देंगे। नरक भोगने के लिए! आने वाले मनीआर्डर के बल पर सभी एक दूसरे को देख लेने की योजना बनाते सामने वाले को खाक में मिला देने को तैयार रहेंगे। अगर घर से एकाध बच्चा अरब चला गया तब तो कहना ही क्या? एक जमाने में इसी गाँव में पढ़े-लिखे कितने तो सरकारी नौकरी में थे, मगर आज? मुसलमानों को नौकरी तो मिलती नहीं, कहकर बच्चों के पढ़ाने-लिखाने की जिम्मेदारी से बचने के लिए पढ़ाकर टाइम न खराब करने का एक नया बहाना गढ़ लिया।

’’बाबू! कहते हो कि तनखाह पूरी नहीं पड़ती है। तो? यहाँ तो इतना बड़ा परिवार है! खेती को छोड़ा भी तो नहीं जा सकता‘‘ अब्बा ने यह कहकर मुझे सचेत किया।

’’भैया। खेती पैसा चाहती है।‘‘ अब्बा आगे कोई तर्कपूर्ण बात कहते, इससे पहले ही मझिले ने उनकी बात को कुतरा।

’’देती भी तो हैं?‘‘ मैंने उससे ये सवाल किया।

’’यकीनन देती तो हम सब राजा होते।‘‘ उसने तुरन्त जवाब दिया। फिर गहरी नजर से मेरी तरफ देखने लगा मानो कहना चाह रहा हो, अब जवाब दो।

एक सीमा तक उसका ये तर्क सच्चायी पर आधारित था। मेरी समझ में तुरन्त जवाब नहीं आया तो कहा, ’’राजा इस लिए नहीं कि मेहनत नहीं करता है। जो करता है वह राजा ही है।‘‘ कहकर मैं जैसे ही चुप हुआ तुरन्त पंजाब के किसानों का ख्याल आया, मगर लगा यहाँ ऐसी बातें करना सावन के अन्धों के सामने सूखे की बात करने से बढ़कर कुछ नहीं होगा, न ही कोई समझेगा। मैंने सच ही कहना मुनासिब समझा, ’’दिन भर चौराहे-चौराहे मीटिंगें करना। आठ बजे, नौ बजे तक सोना और बेमतलब की कारगुजारियों लगे रहते हो तो भला खेती में क्या होगा?‘‘

’’बाबू पढ लिखकर जो आज इस जगह न होते तो ऊँची-ऊँची निकलती‘‘ अम्मा ने तल्ख लहजे में कहा।

’’अम्मा! मैं किसी राजघराने से नहीं कि कम्पनी ने नौकरी देकर खुद को इज्जत बख्श दी है। मेहनत इतनी करनी पड़ती है कि मजदूर भी क्या करते होंगे।‘‘

’’सब मौका-मिलने की बात है!‘‘ मझिला बोला, ’’अगर मौका न मिला होता तो निकलती इतनी बड़ी-बड़ी बात?‘‘

’’अब मैं क्या कहूँ तुमसे? पढ़ाने की सबको कोशिश की गयी मुझसे ज्यादा ही। मगर पढ़ायी में भी मेहनत और जज्बे की जरूरत होती है। मौज मस्ती की नहीं। सोचते-सोचते मन उदास हो गया। अतीत की छवियाँ सामने आ गयीं। इन्टर के बाद दो साल तक जब इन्जीनियरिंग का इन्टरेन्स क्लियर न कर सका तो स्वागत ही ताने तवाजों से करती थीं भाभी। पीछे से भैया भी रुपये पैसों की बरबादी पर अच्छा-खासा भाषण दे देते थे। खुद इन्टर करने शहर गये और अनाप-शनाप पैसे लेते थे। बी.ए. सिर्फ इसलिए नहीं किया कि पहले ही साल में थे तो प्रिंसिपल से तू-तू मैं-मैं करके पढ़ायी छोड़ दी। ये साहबजादे हैं ऐसे पोज करते जैसे सोबर्स, बस वेस्टइंडीज से बुलावा आते-आते रह गया। पढ़ायी-लिखायी क्या खाक करते! अम्मा भी गाँव देहातों में शुरू हुए कुकुरमुत्तों के ढेर जैसे टूर्नामेन्टों में मिले जग-गिलासों और प्लेटों को लोगों को दिखा-दिखाकर निहाल होती रहती हैं। दादा ने अपने ही वक्त में दोनों आपाओं की शादियाँ न कर दी होतीं तो...? मैं सोचकर सिहर जाता।

मेरी चुप्पी से अम्मा शायद कुछ सहम-सी गयीं और मान-मनुहार करने वाले अन्दाज में आहिस्ता से कहा ’’सब अपनी-अपनी तकदीर है।‘‘

इसी तकदीर और अपने साथ हो रहे भेदभाव भरे रवैये की दुहायी देकर कितनी पश्ती की तरफ बढ़ रही हमारी कौम? पढ़ायी लिखायी में आगे बढ़ने के बजाय पीछे जाती, मेहनत-मशक्कत से दूर होती। खेती-बाड़ी में आसानी के लिए नयी-नयी मशीनें आ रही हैं मगर उसको सही सिम्त में इस्तेमाल के बजाय आराम तलबी का साधन बना लिया है सबने। बस एक ख्वाब गल्फ का! बच्चों को जितनी जल्दी हो सके गल्फ भेजा जाय। राजनीति ने भी खूब अपने पाँव पसार लिए हैं। सब उसमें डूबकर न जाने कौन सा अमृत पा लेना चाहते हैं। सबकी झुन्ड की झुन्ड औलाद हैं। उनकी रोटी तक ख्याल नहीं है किसी को, मुर्गी बकरियों को पालकर कितने घरों में औरतें कैसे-कैसे तो चूल्हा जलाने का इन्तजाम करती हैं। सब, सबकी जानते हैं। कोई कुछ कहता सुनता नहीं किसी से। अचानक मन में आया कि ये बात मैं चीख-चीख कर कहूँ। आँगन में सारा गाँव इकट्ठा हो जाये। मेरी आवाज गोली बनकर लोगों के कानों के बंद पर्दे को छेदती हुई जड़ ही चुकी दिमाग की नसों में प्रहार करके रक्त का संचार कर दें। मगर आश्चर्यजनक रूप से सीने में ही घुट कर रह गयी, तमाम कोशिशें की आवाज नहीं फूटी। घबराहट होने लगी, लगा कि साँसे भी टूट सी रही हैं। दिल बैठा जा रहा है।

’’पापा! पापा!‘‘ बेटा बाहर से थोड़ी देर तक खेलकर आया और मेरे कान के पास मुँह करके बोला। हालाँकि उसकी आवाज में लाड़ था मगर मुझे लगा कि वह चीख रहा है। उसने फिर उसी अंदाज में कहा, ’’मैंने जवाब नहीं दिया मम्मी को तो आप ने भी समझा होगा कि मुझे जवाब का पता नहीं।‘‘ वह मेरी तरफ मुँह करके फिर मुस्कुराया।

’’चलो भागो। शोर मचाकर सोने भी नहीं देते। उसकी मुस्कान के प्रत्युत्तर में मैंने अकारण ही उसे डांटा।

बच्चे ने सहमकर मुंह गिरा लिया। दरअसल मैं जब भी बाहर से आता तो बेटे के साथ मुझे भी उस पर कुछ अधिक ही लाड़ आने लगता। मैं अपनी गैर मौजूदगी में किये गये उसके तमाम कारनामों की जानकारी लेता और इतना बड़ा हो जाने के बावजूद उसे अपनी गोद में बैठाकर दुलारता। इस समय भी शायद वह उसी उम्मीद से आया था और मेरे डाँटने के बावजूद कुछ देर तक मेरे सर के पास खड़ा रहा। मैंने आँखें नहीं खोलीं न उससे कुछ कहा-सुना तब वह वहाँ से चला गया। शायद रूठ गया हो! मेरे मन में एक बार आया तो! फिर भी मैं आँखें बन्द किये बिस्तर पर पड़ा ही रहा।

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संपर्क:

मेराज अहमद

रीडर - हिन्दी विभाग,

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़

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(चित्र : कृष्ण कुमार अजनबी की कलाकृति)


कहानी

मुखौटा

-सीमा सचदेव

मेट्रिक पास , उम्र लगभग सोलह साल ,बातों में इतनी कुशल कि बड़े-बड़ों मात दे जाए , साँवला रंग , दरमियान कद , दुबली-पतली,तेज़ आँखें , चुस्त - दुरुस्त, व्यक्तित्व ऐसा कि क्या डॉक्टर, क्या इन्जीनियर , क्या करोड़पति महिलाएं उसके इशारे पर नाचने को मजबूर हो जाती है |

बड़ी ही चालाकी से वह दूसरों के बाल काट देती है , केवल बाल ही नहीं काटती मुँह पर थपेड़े भी मारती है और किसी को बुरा भी नहीं लगता बल्कि इसके लिए मिलती है उसको अच्छी खासी मोटी रकम भी |(जो वह किसी और के लिए होती है) कोई खुशी से देती है तो कोई मजबूरी में लेकिन देती सब है,जिसको वह अपनी उंगलियों पे नचाती है | जिस तेज़ी के साथ चेहरे पर उसके हाथ चलते है उसी आत्म-विश्वास के साथ चलती है बालों में कैंची | कभी वह अपनी गोदी में पैर रख कर बिना किसी भेद-भाव और नफरत के करती है दूसरों के पैरो और नाख़ुनों की सफाई और कभी उतनी ही ईमानदारी से करती है मालिश और साथ - साथ में चलती रहती है उसकी मीठी जुबान भी | अपने हाथों और जुबान में तालमेल बैठाना वह बखूबी जानती है |

जी हाँ ! मैं जानती हूँ एक ऐसी लड़की को जो एक लेडिज़ ब्यूटी पार्लर में काम करती है | नहीं , वह केवल ब्यूटी पार्लर में काम नहीं करती , बल्कि एक घरेलू कन्या है |

घरेलू कन्या ! नहीं घरेलू नौकरानी है | अरे ! वह एक छोटे बच्चे की आया भी है , अभी वह स्वयं भी बच्ची ही है | छोटी सी गुड़िया को नहलाना,उसका लन्च बॉक्स तैयार करना और फिर स्कूल(डे केयर) छोड़ने जाना वापिस आ कर सबका नाश्ता तैयार करना ,सबको खिलाना,बर्तन साफ करना ,ब्यूटी पार्लर में जाना और जुट जाना अपने काम में | दोपहर का भोजन भी वही बनाती है , शाम तक कार्य और फिर बच्ची को स्कूल से लाना, घर जाकर रात का खाना बनाना,बर्तन साफ करना,रात को कपड़े धोना,सुखाना और अगली सुबह सबके पहनने के लिए कपड़े इस्तरी करना और फिर जाकर पूरी दुनिया को सुलाकर सोना, सुबह सूर्य की पहली किरण से पहले जागना उसका नियमित कार्य है | फिर भी उसके चेहरे पर कभी उदासी नहीं देखी | हमेशा मुस्कराता हुआ चेहरा अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर लेता है |

उसे देखने पर ऐसा महसूस होता है मानो दुनिया की सबसे खुश रहने वाली लड़की वही है | कभी कोई शिकन नहीं , और न ही कोई शिकायत | निम्मो यही नाम है उसका या फिर सभी उसे इसी नाम से बुलाते है | कभी -कभी मुलाकात हो जाती है , जब मैं भी अपने बच्चे को स्कूल छोड़ने जाती हूँ | दोनों बच्चे एक ही स्कूल में है जब मिलती है तो थोड़ी बातचीत होना स्वाभाविक है |

एक दिन ऐसे ही बातों ही बातों में मैंने पूछ लिया, (जो शायद मुझे नहीं पूछना चाहिए था ) तुम्हें कितनी तनख्वाह मिलती है ? (निम्मो के चेहरे पर कुछ अजीब से भाव दौड़ गए ,लेकिन बिना मुझे महसूस करवाए उसने उत्तर दिया) दो हजार मैडम

केवल दो हजार ....?

(चेहरे पर व्यंज्ञात्मक हँसी को छुपाने का असफल प्रयास करती हुई) बहुत है मैडम |

पर तुम दिन भर काम करती हो | बच्चे को सँभालना, घर की सारी जिम्मेदारी और फिर ब्यूटी पार्लर में भी काम देखना ,कैसे कर लेती हो यह सब ?

हो जाता है मैडम .....|

पर इतनी कम तनख्वाह में कैसे ....? तुम्हें तो काम करने का अनुभव है फिर तुम अपना स्वयं का काम क्यों नहीं शुरू कर लेती ?अच्छी -खासी कमाई भी होगी और इतना काम भी नहीं करना पड़ेगा.....|

(निम्मो की आँखें आँसुओं से छलक आई |) मजबूरी मैडम......|

बस निम्मो इतना ही बोल पाई थी कि पीछे से उसकी किसी नियमित ग्राहक ने आवाज़ दे कर बुलाया | निम्मो ने बिना कोई देरी किए अपने आँसू पोंछ लिए और पीछे मुड़कर उसे हँसते हुए बुलाया , उसके चेहरे पर वही हँसी थी |मैं उस हँसी का राज जान चुकी थी | पहली बार मुझे उसकी हँसी नकली प्रतीत हुई और लगा जैसे उसने चेहरे पर मुखौटा ओढ़ रखा हो |

(जिस चेहरे पर मैंने सदा हँसी ही देखी , उसकी आँखों में आँसू देखकर मुझे खुद को ग्लानि अनुभव हुई)

निम्मो तो अपने उसी अंदाज में बात कर रही थी और मैं खड़ी हुई निम्मो की मजबूरी सोचने पर मजबूर थी | कितने ही प्रश्न मन में उठने लगे थे ? मेरे पास हर प्रश्न का जवाब तो था मगर कोई हल नहीं |

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सम्पर्क:

सीमा सचदेव
एम. ए ,एम.एड , पी.जी.डी.सी.टी.टी.एस
रामान्जन्या

लेआऊट
माराथली, बैंगलोर
५६००३७

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(चित्र - कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)


कहानी

तिब्बत बाजार

-प्रेम कुमार

फुब्बू,

तुम्हारे अलीगढ़ से जाने के बाद भी एक पत्र लिखा था। उसका क्या हुआ, मालूम नहीं। जब तुम्हारा ठौर-ठिकाना ही नहीं मालूम तो पता तो कुछ इसका भी नहीं है, पर फिर भी लिख रहा हूँ। देखो तो बीस वर्ष बीत चले हैं बिना तुम्हें देखे। पर तुम्हारे साथ के हिस्से में का न कुछ रीता हुआ है, न धुँधला। तुम्हारे देश की बात पर या तुम्हारे हम वतनों को देखते ही हमेशा तुम जैसे शरीर मेरे सामने आ खड़ी होती हो-उन खूबसूरत आँखों में न अट पा री अपनी सागर जितनी उस व्यथा के साथ। मन के अंदर की आग से दीपते-दमकते अपने उस खूबसूरत चेहरे के साथ। समझ नहीं आता कि इतनी अधिक उम्र और ताकत कहाँ से पाती रहती हैं ये यादें ! कभी आग, कभी पानी तो कभी तूफान बनकर अचानक आ धमकने का जादू इन्हें कौन सिखा जाता है फुब्बू? उम्र के असर से बेअसर ये यादें क्या अधिक पुरानी और ज्यादा तीखी, धारदार हो जाती हैं? किसी उम्मीद, इंतजार या भुला सकने के लिहाज से बीस वर्षों जितनी लम्बाई कुछ कम तो नहीं होती न ? इतने इन वर्षों में कितना कुछ नहीं हो गुजरा है इस देश और दुनिया में। बदलावों की ऐसी आँधियाँ आईं कि आदमी तो आदमी देशों तक के इतिहास, भूगोल, दीन-धर्म, ईमान तक बदल गए। कुछ हिले, टूटे तो कुछ इतने ताकतवर और जद्दी हो गए कि उनकी खुदाई एक तरफ और सारी दुनिया की यातनाएँ एक तरफ। पर हाँ, वो आँधी अभी आना बाकी है जिसकी तुम्हें प्रतीक्षा है और इंतजार मैं भी कर रहा हूँ। इसीलिए जब बहुत याद आती हो तो मन में जतन से सहेज-संभालकर रखे तुम्हारे हिस्से के गंगाजल से खुद को शीतल, पवित्र कर लेता हूँ और मान लेता हूँ कि मैंने तुमसे बात कर ली है।

तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारे जाने के बाद के साल, उसके अगले साल और फिर अगले साल रेलवे रोड पर लगी तिब्बतियों की दुकानों पर तुम्हें कितना ढूंढा - तलाशा था मैंने। न तुम मिलीं, न तुम्हारे पिता। इतना भर पता चला कि तुम वतन के काम से तिब्बत चली गई हो। मुझे पता था कि तुम तिब्बत जरूर जाओगी। मेरे सामने ही तो किया था तुमने अपने पिता से यह वादा कि तिब्बत से लौटने के बाद तुम शादी जरूर कर लोगी। अगले साल पता चला कि तुमने अपने मंगेतर को भी तिब्बत बुला लिया है और अब तुम्हारे पिता तुम्हारे बिना दुकान लगाने भी नहीं निकल पा रहे हैं। फिर कभी उधर जाने की हिम्मत नहीं हुई। पता नहीं किससे कहाँ क्या सुनने को मिल जाए। पर ऐसे ये सिलसिले कभी थमते हैं क्या फुब्बू?

हर साल तिब्बत दिवस के अगले दिन मैं अखबारों में तुम्हारा नाम, तुम्हारा चित्र तलाश रहा होता हूँ। टी०वी० के समाचारों में तुम्हारी शक्ल ढूँढ रहा होता हूँ। चीन से आए राजनेताओं के विरोध-प्रदर्शनों की खबरों और तस्वीरों में से हमेशा मैंने तुम्हें ढूँढ निकाल लेना चाहा है - शायद नारे लगाती भीड़ की अगुआई करती तुम दिख जाओ, पुलिस की निगाहों से बचकर किसी इमारत पर अपना झंडा फहराती तुम दिख जाओ ...... पुलिस से उलझती जूझती ही शायद कहीं दिख जाओ। पर तबकी गईं तुम न फिर कभी मिलीं, न कभी दिखीं।

पर हाँ....... वह दिन........वह तिब्बती......और वह लड़की! हकबक था मैं.......हैरान रह गया था। एकदम अचानक घटा और जादुई-सा लगा। लगा कि इतने वर्षों बाद जैसे तुम मेरे पास हो, मेरे साथ हो। वही सब तो बताना-सुनाना है तुम्हें। उन दिनों का सब कुछ शेयर करना है तुमसे आज। पर पहले वह जो शायक तुम्हें पता न हो। सर्दी शुरू होते ही अब भी अलीगढ़ में तिब्बती लोग आते हैं। तुम्हारे समय से कई गुना ज्यादा। वे तुम्हारी या तुम्हारे पिता की तरह पीठ या कंधों पर कपड़ों के गट्ठर लादे-लादे घर-घर, गली-गली आवाजें लगाते नहीं घूमते। न तुम लोगों की तरह सस्ते होटलों या धर्मशालाओं में गिचपिच-गिचपिच इकट्ठे रहते हैं। साठ-सत्तर परिवार हैं। मालवीय पुस्तकालय और दुबे के पड़ाव का कुछ तो ध्यान होगा तुम्हें? इन दोनों जगह तिब्बती बाजार लगते हैं अब। तीस-तीस, चालीस-चालीस दुकानों वाले एक नहीं.......दो-दो बाजार! बाजार हो चली दुनिया के इस अलीगढ़ में दो-दो तिब्बती बाजार फुब्बू! कितनी बार मन हुआ, नहीं गया। वही डर कि पता नहीं क्या सुनने को मिले वहाँ तुम्हारे बारे में! सालों-साल टलता गया वहाँ जाना।

पर उस दिन........। दरअसल उन दिनों करमापा के भारत आने ने हम सबको उद्वेलित कर रखा था। हर रोज यहाँ करमापा, दलाईलामा, पंचेनलामा, तिब्बत और चीन से जुड़े समाचार छापे - दिखाए जा रहे थे। कैसे कहाँ-कहाँ से छिप-छिपाकर करमापा भारत पहुँचे, किसको क्या लगा, अनेक इंटरव्यूज, बहुत सारे दृश्य - यही सब छाया रहा था अखबारों में, टी०वी० चैनल्स पर। चीन के आरोप, भारत की चिंताएँ, तिब्बतियों की आँखों में जागी उम्मीद की चमक........। कदम-कदम पर तुम याद आती रही थीं उन दिनों। शायद इसीलिए तुम्हारे हम वतनों की आँखों में जागी उस चमक को देखने का लोभ जागा था उस दिन। या फिर तुम्हारी कोई खबर पा लेने की उम्मीद जागी थी मन में और फिर उस दिन वहाँ जाना नहीं टला तो नहीं ही टला। व्यग्र, आवेशित, उत्तेजित-सा मैं तिब्बत बाजार जा ही पहुँचा। कमाल यह कि जाना एक बार ही नहीं हुआ, तीन बार हुआ। एक सप्ताह में तीन बार।

तब वहाँ भीड़भाड़ नहीं थी। दुकानों के आस-पास कुछ बच्चे धूप में खेल रहे थे। कुछ वृद्ध-वृद्धाएँ खुले में बैठे आँखें बंद किए मालाएँ फेरने में मग्न थे। कुछ अकेले गुमसुम बैठे धूप सेंक रहे थे। कुछ घेरा बनाकर बैठे किसी चर्चा में मस्त थे। एक-दो दुकानों पर इक्का - दुक्का ग्राहक मोल-भाव में लगे थे। मैं बाजार के दो चक्कर लगा चुका था। कोई एक तो ऐसा दिखे जिससे कुछ पूछूं बात करूँ। तलाश तो तुम्हारी वाली उस बेचैनी, आग और रोशनी की भी थी, पर उसकी छाया तक किसी चेहरे पर नहीं दिखी। ऊँचाट मन वापस हो ही रहा था कि उस पर दृष्टि पड़ी-जींस, शर्ट पहने तब वह उन महिला ग्राहकों को स्वेटर्स की खूबियाँ गिना रही थी। कदम वही अड़ गए। लगा कि बीस साल पहले वाली तुम मेरे सामने आ खड़ी हुई हो। अपनी उस पारंपरिक तिब्बती वेशभूषा में नहीं, एकदम आधुनिक लिबास में। वैसी शांत, शर्मीली-सी नहीं, बहुत मुखर, चंचल, वाचाल-सी। पलभर को लगा कि मैं भी बीस साल पहले वाला वही हो गया हूँ जो तुम्हें पहली बार देखने के बाद हुआ था - सहमा, सकुचा, डरा-डरा सा! बात करने को मन हुआ। ठिठका-सा कुछ देर खड़ा भी रहा। पर तभी तीन-चार और महिलाएँ दुकान पर आ जमी थी। धुक-धुक जैसे कुछ तेज हुई........ और कदम खुद-ब-खुद आगे बढ़ लिए।

दो-तीन दुकानों की ही दूरी तय की थी कि वह दिखा। शांत, गंभीर आकर्षक-सा वह युवक ट्रांजिस्टर कान से सटाए कुछ सुन रहा था। अकेला, फुर्सत में दिखा तो उसके पास जा पहुँचा। मन में कहीं यह भी था कि शायद इतनी देर में वह लड़की फुर्सत में आए। पास जाते ही लगा कि इससे बात की जा सकती है। नाम पूछा तो कहा - शिम्मी-शिरिंग डोल्मा। जल्दी ही लगने लगा था कि जैसे हम अरसे से परिचित-आत्मीयता हैं। तिब्बत के जक्र के साथ ही जैसे कई दीपक उसके अंदर एक साथ जल उठे थे - ’नहीं, हम धर्मशाला में पैदा हुआ। पर क्या बात करते हैं आप? देश को मर सकता है कभी। सेना में था हम। दो साल पहले छोड़ा। बीबी लद्दाख - बच्चे कॉलिज! फीस बहुत-सो अर्निंग को ये धंधा। वो जो दिल्ली में आग लगाया चीनी मंत्री के आने पर वो हमारे साथ था सेना में। उसने अपना सपना देखा था - पूरा कर लिया। बहुत बहादुरी से लड़ा हमारा लोग सेना में। सामने से देखो तो अपने से कितना बड़ा दिखे। और हमारा आदमी छोटा-सा, इतना-सा। गाली मारो तो दिखे नहीं। हम खुखरी से, चाकू से मारा उनको।.....सेना में अब वैसा अफसर नहीं.........करप्शन इंडिया, को खा गया। रेल में जाओ तो टी०टी० पैसे माँगता है, थाने-पुलिस का आदमी आता है तो माँगता है........। करमापा की चर्चा तो लगा कि जैसे वह तिब्बत की निर्वासित सरकार का कोई बड़ा अधिकारी हो गया था - ’हम कहीं और नहीं जा सकते। अगर इंडिया परमीशन नहीं दिया तो करमापा को हम इंग्लैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, अमेरिका या कहीं और भेज देगा। हाँ, हम लोगों का आदमी भेजेगा.......।........चीन से क्या डरना? हाँ, अमेरिका कुछ करेगा हमें भरोसा नहीं! भारत-भारत क्या करे?.......हाँ, लड़ाई ये करेगा नहीं।......कब मिलेगा, नहीं पता, पर आजादी हमें मिलेगा। जरूर.......। वह जोश में था, बहुत उत्साहित था - ’तब वहाँ था क्या? कुछ नहीं था, ऊसर था। पानी नहीं था। दलाईलामा जी वहाँ गया तो कमाल हो गया। काया पलट हो गया। अपने लिए वो सड़कें, वो अस्पताल, वो कॉलोनियाँ - सब तिब्बतियों ने बनाया। बाप रे, आज देखो तो कैसा लगता है। सुनसान इलाके.......वो जंगल आज.........सब दलाईलामा जी की कृपा।‘

तब चीनी विदेश मंत्री की भारत यात्रा की बात मैंने शुरु ही की थी। उसकी आँखें जैसे दहक उठी थीं और शब्द-शब्द चिंगारी हो गया था - ’बिल्कुल गलत बात है! चाइना का मिनिस्टर आया - भूख हड़ताल किया हमारा लोग इंडिया का पुलिस उनको जबर्दस्ती उठाकर ले गया। वो जलना चाहा था - उसे जलने नहीं दिया। गलत बात है न ये? क्यों किया वो लोग ऐसा? ? ? उसका स्वर पीड़ित और शिकायती हो उठा। देर तक सफाई-सी दी तो लगा कि स्वर कुछ नर्म हुआ, पर शिकायत तब भी बाकी थी - ’कोई ना नहीं कहेगा-इंडिया गवर्नमेंट बहुत किया था पहले। इंडिया अगर आज जैसा सिक्सटी टू में होता तो कुछ और बात होता! लाल बहादुर शास्त्री आज होता - तब वह न मरता तो हालत कुछ और होता। ....हाँ, राजीव गाँधी गया था चीन-तब कैसा उम्मीद जगा था सबको! पर अब - ऐसा चुप क्यों है? आप सुना-वैसा सब नहीं बोलना था इंडिया को........हमारा लोग सुना तो लगा कि भारत तिब्बत को चीन का मान लिया........।‘

उदास चेहरा, खोयी-भटकती-सी आँखें - वह आसमान को तक जा रहा था। इतनी लम्बी चुप्पी हम दोनों पहली बार सुन रहे थे। कुछ और बुलवाने के लिए मैंने दलाईलामा के विरोध में उठी कुछ आवाजों की चर्चा की थी। सुनते ही जैसे उसकी आँखों में, चेहरे पर - सब जगह क्रोध उग आया था - ’दलाईलामा जी, करमापा को जो बुरा, बोला, गलत कहा, वो सब चीनी दलाल-चीन का एजेन्ट! पैसे का लालची ऐसे ही बोलेगा। ऐसा लोग चीन के इशारे पर कब से कह रहा है - दलाईलामा को कैंसर हो गया, वो ज्यादा नहीं जीएगा। कभी बोलता है दलाईलामा डर गया, बिक गया........। इन सबको हमारा लोग छोड़ेगा नहीं........इन सबको साफ कर देगा हमारा लोग.........‘ उसकी तेज हो उठी साँसों की आवाज को सुनते-सुनते अचानक मुझे तुम्हारी एम्बैसी होटल के कमरे वाली मुद्रा याद हो आई थी। तुम्हें रेलवे रोड पर न पाकर मैं अचानक वहाँ जा पहुँचा था। दरवाजा खोलते ही मुझे सामने देख तुम्हारा चेहरा फक्क पड़ गया। तुम्हारी वो हड़बड़ाहट, तुम्हारे उन दो साथियों का हाथों में लगे हथियारों को इधर-उधर छिपाना.......तुम्हारा कुछ न बोल पाना - सब कुछ एक क्रम में मुझे याद आए जा रहा था।

तभी चोर-चोर चोर की तेज-तेज आवाजों ने हम दोनों का ध्यान अपनी ओर खींचा था। शिम्मी तीर की गति से भीड़ में जा मिला था। तिब्बती औरतें चिल्लाए जा रही थीं - चोर, चोर, चोर! तिब्बती पुरुष भी वहाँ आ इकट्ठे हुए थे। एक प्रौढ़ा चीख-चीखकर, हाथ नचा - नचा कर बता रही थी कि क्या हुआ, कैसे हुआ। एक महिला किसी ग्राहक महिला के थैले की तलाशी ले रही थी और जब उसने चोरी किया स्वेटर थैले में से निकाल लिया तो वह भीड़ को उसे दिखा रही थी, चिल्लाए जा रही थी - चोर, चोर, चोर! मैं डरा कि शिरीन अब इतना जरूर कहेगा कि आफ यहाँ ऐसा ये भी होता है। पर नहीं, वह ऐसे लौटा जैसे कोई तमाशा देखकर लौटा हो। मैंने हाल के घटित से ध्यान हटाने के लिए अलीगढ़ के लोगों के बारे में उसकी राय जाननी चाही। खिन्न, परेशान-सा हुआ था जैसे - ’आदमी के बारे में? क्या तो आप सुनेगा, क्या तो मैं बताएगा? यह शहर गंदा। ग्राहक यहाँ अच्छा नहीं! मारुति वाला खराब, साइकिल वाला अच्छा! सुना था यहाँ का आदमी बदमाश है - झिक-झिक करेगा, लड़ेगा-झगड़ेगा। महाराष्ट्र का आदमी बहुत सॉलिड है - एकदम बढ़िया। पर वहाँ भी बम्बई में अब गुंडागर्दी है.......। बगल की दुकान से उलझती-झगडती-सी आवाजें आ रही थीं। शिरीन का ध्यान उधर जा पहुँचा था।

-’ऐसा सब होता है तो कैसा लगता है शिरीन?‘ कोई उत्तर नहीं। ’ग्राहक लोग लड़ता है तो तुम लोग क्या करते हो शिरीन? देर तक कुछ सोचता सा चुप रहा। फिर थकी - धीमी-सी आवाज सुनाई दी - ’उधर देखो न उस दुकान पर। यहाँ का आदमी जब ऐसा-वैसा बोलता है, झिकझिक करता है, झगड़ता है तो पहले हम जोर से बोलता है - खूब जोर से। नहीं मानता तो हम सब मिलकर धमकाता है उसे। सब आ जाता है - इकट्ठा होकर। फिर भी नहीं मानता तो....... तो क्या - हाथ जोड़ देता है बस। और क्या करेगा हम?‘ पलकें तेज-तेज उठ गिर रही थीं। झिलमिल-झिलमिल सी उन पुतलियों में जैसे किरकिराने लगा हो अचानक कुछ - ’और क्या कर सकता है हम? ये तो लड़ सकता है, अपने देश में है। हम तो उनके देश में हैं। यह हमारा देश नहीं, यहाँ हमारा घर नहीं। बहुत तकलीफ होता है तब.........रोना आता है तब।‘ गीली-भीगी-सी हो आईं वे आँखें रो पड़ने को उतावली-सी दिखीं - रात को सोचता है तो नींद उड़ जाती है। हमारा क्या होगा? कब जाना होगा, ये तो नहीं मालूम पर जाना तो होगा। हम अपने देश लौटेगा जरूर........।‘ देर तक हममें से किसी को किसी की आवाज सुनाई नहीं दी थी। जैसे दोनों की वाणी ही मूक-पंगु हो गई थी अचानक।

छूटे, छिने, बीते को किस-किस तरह जीते दुहराते रहते हैं ताउम्र हम फुब्बू! सारी यात्राएँ, तलाशें, खाजें - सब उसी कुछ को ही तो पा-जी लेना चाहती हैं फिर-फिर। शिरीन से मिलकर बड़ा छटपटाना था मैं। फिर भी तीसरे दिन के आते-आते लगा कि उस लड़की से मिलना - बात करना जरूरी है - एकदम जरूरी। न रुक पाया तो दोपहर में भीड़-भाड़ न होने से सोच तिब्बत बाजार जा पहुँचा।

तब भी वह दुकानदारी में व्यस्त थी। थोड़ा फासला बनाकर खड़ा मैं उसे, उसके दुकानदारी के अंदाजों को देख - सुन रहा था - ’कहीं ट्राईकर लो। इसमें इतनी कमाई नहीं है। हमको माल खत्म करना है जल्दी.......।........अच्छा आप बताओ - लास्ट।‘ साढ़े तीन सौ से शुरु होकर दो सौ से होती हुई बात अब एक सौ अस्सी पर आ टिकी थी - ’ले लो, देखा - ये वाला इन्होंने पहना है - ये भी इसी रेंज में है.........।..........नहीं, दीदी कसम से टू हंड्रेड खरीद........ कमाई नहीं है......आपकी जबान पर दे रही हूँ......खराब निकला तो और कौन हम लौटाएगा न......अगली बार नहीं आएगा क्या हम........? सौदा करके बिगाड़ता है अब.......आप लो, ना लो.......सौ मैं तो हमें भी नहीं मिला........हाँ, हाफ - बोला न आपको - हंड्रेड टेन में लेना है क्या?.......दे दूँ क्या?‘ उँगलियों में पहनी अँगूठियाँ, नेल पालिश के रंग में रंगे लंबे, नुकीले नाखून, सिर की जुंबिश के साथ थिरक-मचल उठते गोल बडे-बडे कुंडल... लता की तरह हिलती - लहराती अनिंद्य सी उसकी वह देहयष्टि...बातों के बीच - में हँसी के नन्हे-मुन्ने से झरने, पतली, लम्बी-सी नदियाँ......हाँ, उसकी वह हँसी कभी किसी बच्ची की तरह, कभी किशोरी की तरह तो कभी एक दम एक युवती की तरह....। उसे मुग्ध-सा निहारता मैं तुम्हें याद किए जा रहा था।

ग्राहक टले तो मैं दुकान के करीब जा पहुँचा। मुझे देखकर उसने सामने से जाते एक लड़के को आवाज दी। लड़का पास आया तो चहकती-सी उससे बातों में व्यस्त हो गई - ’कल जाएगा क्या फेरे में?‘

- हाँ, जाएगा। तीन चार दिन में एंड हो लेगा।

- हाथरस जाएगा क्या?

- नहीं, वहाँ का दुकान वाला चिढ़ता है - लड़ता है।

- क्यों? क्या बोलता है?

- बोलता क्या है.....झगड़ता है। माल नहीं लगाने देता हमें वहाँ।

- पता है, मैं और दीदी गया था - सड़क के बीच में लगा के बेचा था माल.......।

- सच?

- और नहीं तो क्या! हम गली-गली घूमा भी और बाजार में सड़क पर लगा के भी बेचा..........हाँ, दीदी और मैं.......

उस तरह खड़े रहना जब ज्यादा खलने लगा तो मैं दुकान के और करीब जा पहुँचा। तभी उनका हम उम्र एक और लड़का सीटी बजाता, कुछ गाता-सा हाथ में एक कैसिट लिए वहाँ आ पहुँचा! गाते-गाते इशारे से उसने लड़की से कुछ कहा तुरंत कूदकर अंदर रखे स्टूल पर जा बिराजा। अब जरा जोर से गाया है उसने.......तरस गया हूँ.......बंदूक है गोली नहीं है। अपना दाँया हाथ लड़की की ओर बढाते हुए जैसे उसने खुजलाने का आग्रह किया है।

शरारत आ मिली है लड़की के अंदाज में भी - ’क्या मिलेगा?‘ असमंजस में घिरा मैं वहीं का वहीं खड़ा रह गया हूँ। अचानक लड़का घबराया-सा उठ खड़ा हुआ - ’अरे बुड्ढा आ गया।‘ लड़की की आवाज में गुस्सा आ मिला है - ’मेरे सामने ऐसे कभी नहीं बोलना। कभी तो तू भी बुड्ढा होगा। मेरा बाप बुड्ढा है......?‘ लड़के ने मुँह बिचकाया है - ’मैं सामने - मुँह के आगे बोलता है, पीछे नहीं।‘ लड़की और चिढ-झल्ला रही है - ’कभी मेरा बाब हीरो की तरह चलता था। कद मालूम है उसका? पाँच फुट छह इंच। हूँ - बुड्ढा आया है.......बुड्ढा आया है......।‘

लगा कि लड़के अब भाग जाऐंगे और मैं लड़की से बात कर सकूँगा। पर कहाँ? अब तक बाहर खड़ा वह लड़का भी कूदकर अंदर जा पहुँचा। उनकी हँसी - मजाक, बहसबाजी को सुनता मैं अब अधीर हो रहा था।....... ’अरे वो तो अम्मा है। अपने टाइम में टॉप रहा होगा वो भी।‘ लड़के के हाथ से कैसिट छीनकर लड़की उस पर के लिखे को पढ़ रही है। थका-चिढ़ा मैं बिना किसी से कुछ पूछे दुकान के पटरे जा बैठा हूँ। उनमें शामिल होने के लिए मैंने कैसिट के बारे में जानना चाहा है। वे ऐसे मस्त-खोए हैं बातों में कि उनमें से न कोई रुका, न चौंका। फिर से पूछा तो लड़की ने उत्तर दिया। क्षणभर को लगा कि जैसे मैं उन्हीं में से एक हूँ और देर से उनकी बातों में शामिल हूँ - ’नेपाली गीत का कैसिट लाया है.....एक गेम है.......सबको बुला रहा है.........आनन मेहरा-मेहरा हमने लगा दिया है.......हमेशा आनंद में रहता है.......।‘ एक लड़का जोर से हँसा है। दूसरे नेपाली सुपर स्टार गायक प्रेमराज महत की बात करते-करते उसके गीत की एक पंक्ति गुनगुनाई है - देश की याद सताती है.......। मैंने उनमें और घुल-मिल जाने के इरादे से हिन्दी फिल्मों की चर्चा छेडी है। अब वे जिस तरह मुझे देख रहे थे उससे साफ था कि उन्हें मेरे गैर होने का अहसास हो रहा है। एक लड़के ने अनमना-सा उत्तर दिया है - ’हाँ, अच्छा लगता है हिन्दी पिक्चर.......स्टोरी समझ आता है.......।‘ दूसरे ने मेरी ओर से मुँह फेरकर लड़की को बताया है - ’छह को निकलना है हमें।‘ लड़की झुँझलाई-सी बोली - ’छह को दिल्ली में मनाएगा। क्या मनाएगा वहाँ तू? यहाँ से बस में जाएगा.......रोड देखा है? गंदा-गंदा, मिट्टी-मिट्टी हो, जाएगा.......।‘ मैंने और करीब आने के इरादे से छह के बारे में पूछा। लगा कि लड़की का स्वर कुछ नर्म और मीठा हुआ है - ’छह को हमारा न्यू ईयर! हाँ, जैसे लोहिड़ी! छह से पूजा होगा धर्मशाला में। पन्द्रह दिन चलेगा......।‘ एक लड़का अब गाते-गाते जोर से हँसे जा रहा है। हँस-हँसकर उस नेपाली गीत की जैसे व्याख्या कर रहा है - ’लड़की से माँ स्मार्ट है.......मालूम है किससे?......लिपिस्टिक से, पाउडर से! मेरी माँ मेरी सब कुछ.........।‘

मुझे फिर तुम और तिब्बत की आजादी के लिए तुम्हारा वह जुनून याद आया। इन गीतों - बातों को सुनकर लगा कि मैं राख की किसी ऐसी ढेरी को कुरेद रहा हूँ जिसमें बहुत गहराई तक न कोई चिंगारी है, न कोई ताप या रोशनी है। अंदर तेज घुमड़न हुई क्या बदलाव की आँधियाँ ने किसी को भी नहीं बख्शा है? कुछ तो हुआ ही है। नहीं तो कोई एक ताकत, कोई एक देश बडे-बडे समुदायों, समाजों, राष्ट्रों को बाँटने-बर्बाद कर देने की हिमाकत न करता। मुझे चिंता हुई थी फुब्बू! शायद थोड़ा और अंदर, और अंदर ही छिपा हो कुछ। मैंने और गहरे तक कुरेदने के इरादे से ही सीधे तिब्बत की चर्चा छेड़ दी उनसे। सबकी मस्ती जैसे यकायक गुम हो गई थी। गर्दन झुकाए, चुप बैठे वे तीनों अचानक कहीं खो-से गए थे। बुलवाने की बहुत कोशिश की तो लड़की ने ऊबे-उकताए अंदाज में मैदान की ओर इशारा किया था - ’वो बैठा है उधर धूप में। उससे सुन ले सब। जा तो वहाँ। मेरे बाबा की कहानी सुनेगा तो थक जाएगा। बहुत लम्बा है उसकी कहानी। मैं नहीं सुनती सो गुस्सा करता है मुझसे। आप सुनेगा तो खुश होगा मेरा बाबा........।‘ साफ था कि वे नहीं चाहते कि मैं वहाँ रुकूँ। लड़की मेरे साथ चली तो पीछे से हँसी मिली एक आवाज सुनाई दी - ’बाबा सुनाता है तो आँख बंद करके सो जाता है चुप! तो फिर सुनेगा कैसे........।‘

अकेले स्थितप्रज्ञ मुद्रा में बैठकर धूप सेकते अपने बाबा को लड़की ने पता नहीं क्या समझाया। सिर हिला-हिलाकर बच्चे की तरह वे हाँ-हाँ किए जा रहे थे। सिलवटों भरे, गोरी उदासी लपेटे उनके पोपले मुँह से हो-हो की आवाज के साथ हँसी भी सुनाई दे रही थी। पैंट, स्वेटर, सिर परहैट! चुस्त-दुरुस्त सी उनकी काया में अब फुर्ती आ भरी थी। उन्हें सुनते कई बार लगा कि फुब्बू कि जैसे इतने दिनों बाद मैं तुम्हारे पिता की चिंता, चाहत, थकन, खुशी, हैरानी, परेशानी से एक बार फिर से गुजर रहा हूँ। शुरु में थोड़ी देर उनकी तर्जनी धरती पर कुछ लकीरें खींचती रही। फिर गर्दन झुकाए-झुकाए रुकते-अटकते से उन्होंने बताया कि वे कब कहाँ कर्म या ठंडे हिस्सों में रहे, वे कब कहाँ-कहाँ घूमे। कुल्लू, मनाली, शिमला, सिक्किम, नैनीताल, आसाम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश.........। तिब्बत की बात चली तो जैसे वे उसी काल और जगहों पर जा पहुँचे थे। उनकी आँखों में तमाम उम्र की चढ़ाइयाँ उतराइयाँ साफ-साफ दिख रही थीं। कई-कई रंग उनके चेहरे पर जल्दी-जल्दी आ जा रहे थे। किसी रौ में बहे-से बडे भोले अंदाज में वे बता रहे थे - अस्सी से आगे हूँ अब! तिब्बत से आया तो बत्तीस का था। छोटा था तब आसाम आया था पहले। छः बेटी दो बेटे हुए। एक बेटा मर गया। उसकी एक बेटी है। तुमने कैसे सोचा कि भूल गया होगा हम? कैसे भूलेगा हम? पोटाला का राजमहल तुम कभी देखा? एक हजार कमरे, बहुत बडे-बडे हॉल, सोने जड़े खम्भे.........कोई भूलेगा क्या? सागा, न्यालम, ल्हात्से, नारी तुम देखा होता तो मरते तक नहीं भूलने होता। हम कैसे भूलेगा कभी? चीन हमारा तिब्बत तीन टुकड़ों में बाँट दिया। हमारे आम्दो और खाम को चालाकी कर अपने में मिला लिया। एक हिस्से को बोलता है कि ये तुम्हारा तिब्बत है। हम लोग का धर्म बदला वहाँ, मंदिर तोड़ा, लैंगुएज, कल्चर सबको मिटाने में लगा है........। क्या-क्या भूलेगा हम?‘ वे ऐसे हाँफ रहे थे जैसे मीलों लम्बी दौड़ लगाई हो अभी-अभी........ ’तुम कुछ सुना-पढ़ा कि नहीं? ल्हासा में अब लड़का-लड़की नाचता है, बीयर पीता है। बाहर का लाग देखने आता है। जोखंग मंदिर चौक पर अब डांस बार चलता है। भौत ऊँचा-ऊँचा इमारत बन गया है बहुत सारा। वहाँ का लोग को चीन डराता है.......खरीद लेता है सब........।‘ फुफकारते-से शब्दों के साथ झाग-झाग थूक बाहर गिर रहा था। आँखों में से चटखती-सी चिंगारियाँ इधर-उधर छिटके जा रही थीं।

चलने लगा तो मेरी हथेलियाँ उनकी हथेलियों की गिरफ्त में थीं। उन्हें दबाते, उनका सहारा सा लेते वे मेरे साथ उठ खड़े हुए थे। चार कदम ही चले थे कि रुके, मेरे करीब आए। उनकी दांई हथेली ने मेरे बाएँ कंधे को जल्दी-जल्दी कई बार थपथपाया। अपने होठों को मेरे कान के अधिकाधिक करीब लाकर ऐसे फुसफुसाए जैसे राजभरी कोई खास बात उन्हें कहनी हो - ’हम बुद्ध को मानता है न। आदमी के साथ आदमी क्यों नहीं रह सकता भला? चीन वहाँ आया, बोला - हमारा लोग रहने दो। हम कहा - रहो। वो दोबारा आया। फिर बोला - अब तुम जाओ। हमारा लोग मना किया। वो लड़ा। हमारा देश तो बहुत महान-बड़ा, पर हम पर लड़ने को इतना सब नहीं था। इलाईलामा जी यहाँ आया। पंडित नेहरू बोला - तुमको हम रखेंगे। फिर तो बहुत लोग आया यहाँ........।‘ बोलना रुका। इधर-उधर ऐसे देखा कि कोई और तो नहीं सुन रहा - ’तुम तो पढता-लिखता है न? कुछ पढा सुना क्या वहाँ के किसान मजदूर के बारे में, उनकी हडताल के बारे में? तुम वो सुना जो हमारा रिंपोचे दस मार्च को धर्मशाला में बोला‘?

इतना करप्शन बढा है वहाँ........कि वो चीन को जरूर कमजोर करेगा। हांगकांग, ताइवान, कोरिया का कैसा-कैसा फैक्ट्री लगा है वहाँ। माओ का सब उलट दिया देंगशियाओं पिंग ने। माओ मरा तो उसकी बेबा को अरेस्ट किया चीन। वो बेईमानी करता है, जुल्म करता है। रिंपोचे बोला.......चीन जल्दी टूटेगा.......करप्शन और जोर जुल्म उसे तोड़ देगा.......।‘ उनकी आँखों में एक चमक थी और हाँफती सी उस आवाज में एक चाहत बेहद दीन क्षणों में की गई किसी प्रार्थना की सी उन अनुगूँजों को मैं बाद तक, आज तक सुनता रहा हूँ फुब्बू।

फुब्बू, शिरीन और उस लड़की के बाबा से मिलने ने मुझे खुशी भी दी थी और उत्तेजित भी किया था। पर उस लड़की से बातें न हो पाने की कसक ने मुझे बेहद तंग किया। इसीलिए, तुम हैरान होगी, मैं अगले दिन फिर से - हाँ, तीसरी बार तिब्बत बाजार जा पहुँचा। प्रवेश के साथ ही उसके बाबा सामने की दुकान पर बैठे दिखे। प्रणाम के उत्तर में चहकते से अपने पास आने का इशारा किया - ’हाँ, तुम जिसके बारे में पूछा‘ ये बताएगा उनका खबर। ये लोग भी देहरादून का है। उसका नाम इन्हें बताओ। जिनसे पूछने को मुझसे कहा गया वे दोनों आँखें बंद किए माला फेरते हुए कुछ बुदबुदाए जा रहे थे। उनकी आँखें लगभग साथ-साथ खुलीं। छुपा, वुंजू में पुरुष और छुपा, वुंजू के साथ पंगधिन पहने, खाली चोक्ता को पीठ पीछे लटकाए वह स्त्री। मैं बार-बार नाम बताता रहा - फुरबू डोल्मा, नुरबू डोल्मा..........। पर हर बार उनकी गर्दन हिलती रही, होठों से ना ही ना निकलता रहा। बातों को अगर वहीं रोक देता तो शायद उन्हें बुरा लगता। यही सोचकर पूछ लिया-माला फेरते में क्या कहते हैं आप लोग?

- ओम मानी मैं हूँ........ओम नमः शिवाय की तरह.......बहुत लम्बा है यह!

- क्या माँगते हैं आप ईश्वर से अपनी इस उम्र में?

- हम पैसा, मकान नहीं माँगता। माँगता है कि पहले हमें आदमी बनाओ! अगले जनम में हम कुत्ता नहीं बनें, मच्छर-मक्खी न बनें। हाँ, हमारी आँख बंद होने से पहले तिब्बत देखना माँगता है हम........।‘ पकी उम्र की वे उम्रदराज आँखें बहुत छोटी-सी होकर तेजी से मिचमिचाती-सी डबडबाने लगी थी। फुब्बू उन आँखों के बिफर कर बह पड़ने के उस अवश अधैर्य ने मुझे अलीगढ़ से विदा के समय के तुम्हारी आँखों में के उस हौसले और संकल्प की याद दिला दी थी - ट्रेन दिल्ली की ओर रेंगना शुरु कर चुकी थी। तुम्हारी दोनों मुट्ठियाँ खिड़की की सलाख को जकड़े हुए थीं। तुम्हारे शब्दों में उत्तेजना और आवेश का स्वर तीव्रतर होता जा रहा था। डिब्बे के साथ-साथ चलते हुए मैंने तुम्हारे वे आखिरी शब्द सुने थे - ड० फेला डोगी येन-हम तिब्बत लौटेंगे!..........मेरी निगाह ने डिब्बे के अंदर छलांग लगाई थी। मेरी ओर देखती तुम्हारी वो आँखें..........उन आँखों के आसमानों में तूफानी तेजी से घिर आए वो बादल, वो कड़कती बिजली-सी कौंध........और फिर तेज बरसात की सी वो झड़ी........।

इत्तफाक था कि वह लड़की तब दुकान पर अकेली बैठी कोई अंग्रेजी अखबार पढ़ रही थी। मुझे देखा तो उसकी आँखों में पहचान का एक भाव आया। पटरे पर मेरे बैठने के लिए जगह बनाते हुए शिष्ट, आदर मिले अंदाज में बैठने का इशारा किया। आज वो एकदम बदली-सी लगी। शांत, सौम्य, गंभीर, शिष्ट तुमसे पहली बार मिलने को याद करते-करते पता नहीं कैसे यह खयाल आया - यदि तुमने तब शादी कर ली होती तो इतनी इस उम्र की यह लड़की तुम्हारी बेटी भी हो सकती थी। मैंने उसका नाम पूछा बोली - कुसांग डोल्मा! पढ़ाई-लिखाई की बात चली तो बताया कि बी०ए० किया है। नौकरी की बात पर आवाज कुछ ऊँची हुई - ’रखा कहाँ है नौकरी?‘ इंडिया गवर्नमेंट कहाँ देगा..........क्यों देगा हमें नौकरी? धर्मशाला में हमारा सरकार कितनों को देगा?‘ कुसांग के उस लाल-सुर्ख हुए चेहरे को देखकर मुझे उन लाखों-करोड़ों युवकों का ध्यान हो आया था जिनकी देह को कंकाल-सा बना दिया है बेरोजगारी ने। क्या वह आत्म निर्भरता के किन्हीं पाठों का परिणाम था फुब्बू? या फिर निर्वासित जीवन के दबावों-अभावों के लिए दूसरों से कोई उम्मीद न रखने का कोई अभ्यास? क्या उम्मीदें भी दुधारी होती हैं फुब्बू? एक तरफ से जिलाने का दमखम रखती है तो दूसरी तरफ से अपंग भी कर सकती हैं वे? मौन तोड़ने को धीमे से पूछा था मैंने - ’अगर कहीं नौकरी मिले तो.........?‘ अधीर-सी जल्दी में बीच में ही बोल पड़ी -

’नौकरी......सच बात ये कि हमारा शादी हो गया.........।‘

शादी......? अवाक, चकित हुआ मैं विवाहित की पहचान करा सकने वाले कुछ चिह्नों-प्रतीकों को तलाशने में जुट गया था। आश्चर्य प्रकट न होने देने के लिए पूछ लिया - ’ससुराल वाले क्या नौकरी करने को मना करते हैं?‘

- ’नहीं, ऐसा कुछ नहीं.........।‘

- तुम्हारी उम्र क्या है कुसांग?

- नाइनटीन ईअर्स..........।

- शादी को कितना समय हुआ?

- ऐट मंथ्स।

- इतनी जल्दी............?

- हाँ, कोई-कोई का हो जाता है। वैसे ट्वंटी फाइव, ट्वंटी सिक्स-सेविन तक भी करता है। हमारा ग्रांडफादर की लड़की का तब ट्वेल्व ईअर में होता! अब नहीं होता वो........।

- तुमने मना क्यों नहीं किया?

- नहीं, वो क्या था कि लव मैरिज था हमारा।

- लव मैरिज........यानी।

- हाँ, मथुरा से मुलाकात..........फिर डलहौजी, राजपुर-आसाम में साथ-साथ दुकान था हमारा। पहले तब शुरु हुआ बात जब हमारा फादर-मदर लुधियाना गया था माल लेने। उसका सिस्टर के साथ बात हुआ रास्ते में। मेरा हस्बैंड..........? आसाम साइड का! उसका सिस्टर का थ्री चिन्ड्रेन। हमारा ग्रांड फादर उसका लैंगुएच समझा। वो फ्रैंड जैसा हो गया.........। फिर क्या? फिर लव हो गया। उसने रीक्चेस्ट किया........शादी हो जाना बस.......। वह अनरुके बोले जा रही थी। फुब्बू! किसिम-किसिम की हँसियाँ बीच-बीच में आकर थिरकती-कूकती रहीं थीं उसके होठों पर। ऋजुता के वैसे उज्ज्वल पवित्र प्रपातों में तुमसे मिलने के बाद दूसरी बार स्नान कर रहा था मैं। किसे कब मिलता है ऐसा सौभाग्य फुब्बू! पर कुछ था जो अंदर-अंदर चुभे जा रहा था। लव और मैरिज की इस तरह इतनी देर तक बातें कर रही इस लड़की ने एक बार भी अपने तिब्बत को याद नहीं किया। तुम भीं कि तिब्बत के अलावा तुम पर कोई और बात जैसे होती ही नहीं थी। लव और मैरिज की बात पर तो तुमने अपने फादर तक की नाराजगी मोल ली थी।

हाथ में लगे अंग्रेजी अखबार से शुरु होकर बात अब हिन्दी पर आ टिकी थी। मैंने उसे खुश करना चाहा था - ’बहुत अच्छी हिन्दी बोल लेती हो तुम! कैसे सीखी तुमने इतनी अच्छी हिन्दी?‘ झिझकती-शर्माती-सी बोली - ’नहीं मुझे कहाँ आती है अच्छी हिन्दी - शिरींग को आती है........।‘ कुछ देर मौन रहीं। अचानक न जाने क्या हुआ कि उसकी भाव-भंगिमा बदलती दिखी। विचित्र सा तीखापन आ मिला था उसकी आवाज में - ’इंडिया का आदमी जब दूसरे कंट्री जाता है तो कैसे सीख लेता है वहाँ का लैंगुएज। वो तो वहाँ जैसा ही बोलने लगता है, करने लगता है सब। हमारा लोग तो फिर भी तिब्बत की तरह जीता है न यहाँ आज तक। इंडिया का आदमी इंग्लैंड गया तो वहाँ का जैसा और अमेरिका गया तो वहाँ का जैसा सब कुछ.......।‘ दहकते-चुभते से उन वाक्यों को सुनकर मुझे तुम्हारा बहुत गुस्से में दिया लगभग ऐसा ही एक उत्तर याद हो गया था - ’पेट, जरूरत, धंधा क्या-क्या नहीं सिखा देता इंसान को। मजबूरी में फंसेगा तो तुम भी सीख लेगा कुछ भी।‘

चलने से जरा पहले मैंने उसके घर वालों के नाम पूछे थे। कई बार बोलने के बाद भी जब मैं ठीक से नहीं समझ पाया तो वह परेशान सी दिखी। कागज पैन लेकर नामों को अंग्रेजी में लिखा। बार-बार बोलकर मुझसे उनका उच्चारण कराया। सही बोल देने पर ऐसे खुश हुई जैसे किसी कमअक्ल बच्चे को कोई अध्यापक मुश्किल-सा पाठ पढ़ा देने में कामयाब हो गया है। मुझ पर उस समय भी तुम्हारे साथ के अतीत का एक हिस्सा हावी हो गया था। मैंने उससे हिन्दी में कुछ लिखने को कहा। वह सकुचाई। जिद की तो थोड़ा सचेत होकर लिखा - यूकपा, मोमो, छोछो, चाउमिन..........। मस्तिष्क में तो तुम्हारे लिखकर दिए कुछ वे वाक्य घूम रहे थे। मैंने कुछ ऐसा लिखकर देने को कहा जिसे मैं बाद तक पास रख सकूँ। उसने मेरी आँखों में देखा। ऐसे जैसे मेरा मन पढ़ लेना चाहा हो उसने। फिर एकदम छोटे बच्चे की तरह संभल-संभल कर खुशखत-खुशखत उसने लिखना शुरु किया - ’मैं एक तिब्बती लड़की हूँ मेरा नाम कुसांग है हमारे तिब्बत देशचीन के कब्जे में है लेकिन हमने कभी तिब्बत देश को नहीं देखा है मगर ये जरूर जानती हूँ कि हमारा देश बहुत ही बडा और अच्छा जगा है सब कहते हैं वहाँ कुछ लोग पैसे के पीछे भागना शुरु किया है। चीन उनको बहलाता है। सच पूछो तो मैं वहाँ जाना चाहती हूँ बल्कि मैं ही नहीं हमारे सारे तिब्बतियाँ चाहते हैं और मैं भगवान से मांगती हूँ कि जब मेरी आखिरी सांस आएगी उस घड़ी से पहले मैं अपने देश को एक बार जरूर देखने का मिले और दलाई लामा जी का नाम तब तक रोशन रहे, जब तक सूरज रहे चाँद रहे?

मुझे पढते न देख लिया होता तो वह और भी कुछ लिखती। पर अब उसकी तन्मयता भंग हो चुकी थी। मैं चलने को खड़ा हुआ तो अनमनी, उदास-सी वह भी यंत्रवत उठ खड़ी हुई। मन में अचानक ऐसा कुछ घुमड़ा कि मेरी हथेली उसके कंधे को थप-थपाने लगी। मृगछोने की सी उसकी दूधिया आँखों में चलते जादुई रंग-बिरंगे खेलों को जी भर देखलेने के लिए मेरी आँखें मोहाविष्ट सी वहाँ आ जमीं। लगा कि उन आँखों में एक पल घने काले बादल गरजे थे। अगले पल तेज बिजली चमकी थी और फिर लगा कि बेबसी और पीड़ा का भयानक-सा एक समुद्र उन नन्हीं-सी आँखों में हिलोरें ले रहा है। मजेदार बात यह कि हर लहर के शीर्ष पर अपनी लौ को खूब ऊँचा किए कई-कई दीपक एक साथ जल रहे थे।

चकित, सम्मोहित सा मैं चुप खड़ा था और हाथ जोड़े मंत्रविद्ध-सी वह निर्निमेष मेरी ओर देखे जा रही थी। कुछ कहना जरूरी था - बहुत मुश्किल भी। जैसे-तैसे अंतस की आवाज को शब्दों की पोशाक पहनाई - ’जिनके पास साहस और ताकत के ऐसे नायक - ऐसे स्रोत होते हैं - उनके प्रति ऐसा विश्वास और इतनी आस्था होती है - उन्हें कभी कोई थका, झुका, हरा नहीं सकता कुसांग। समय की कैसी कितनी भी राख दिलों में दबी-छुपी आग को कभी बुझा-मार नहीं सकती कुसांग.......।‘

बस फुब्बू! फिलहाल इतना ही। तुम पास आ पाती तो.......। दुआ करता हूँ कि जल्दी ही तुम अच्छी खबर दो।

लाड़-दुलार के साथ तुम्हारा वहीं इंडियन अंकल।

------

संपर्क:

प्रेम कुमार,

१७-ए, कृष्णधाम कॉलोनी

आगरा रोड, अलीगढ (उ०प्र०)

.......

प्रस्तुति:

फिरोज अहमद

संपादक, वाङ्मय

http://www.vangmay.com

-----

(चित्र - कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)

हम सभी कभी न कभी डायरी लिखते हैं या कोशिश करते हैं कुछ यादों को ,कुछ पन्नों में समेटने की ये कविता उसी कोशिश का एक हिस्सा भर है

(कविता का सस्वर पाठ देखने-सुनने के लिए प्ले बटन पर क्लिक करें)

 

आज अचानक फिर से वो टकरा गए...

-दिव्य प्रकाश दुबे

 

आज अचानक फिर से वो डायरी में यूँ टकरा गये
हो पहली-पहली बार सब कुछ ऐसा किस्सा सुना गये

कोशिश तो की मैंने मगर पन्ना नहीं पलटा गया
ली वक्त ने करवट मगर हमसे नहीं पलटा गया

धुँधले हुये शब्दों ने फिर एक साफ मूरत जोड़ ली
सूखे हुये गुलाब ने एक पल में खुशबू मोड़ ली

लिखे हुये वादे सभी एक पल में जैसे खिल गये
छूटे हुये अरमान सब ख्वाबों से आके मिल गये

सब छोड़ के तुम पास थे
बाहों के अब विश्वास थे

आँखों ने फिर से सींच के तुमसे कही बातें वही
तुमने भी शरमा के फिर धीरे से है हामी भरी

अब वक्त जैसे है नहीं और बस तुम्हारा साथ है
अब स्वर्ग को जाना नहीं जो हाथ तेरा साथ है

फिर हाथ तेरा थामकर
खिड़की से बाहर झाँककर

हमने नयी दुनिया गढ़ी
जिसमें न कोई अंत था
पल-पल में जब वसन्त था
इतने में एक झोंका आया
मुझे एक पल को भरमाया

मैंने रोका पर रुका नहीं
पन्ना भी तो अब टिका नहीं

पन्ना पलटा और आँख खुली
पन्ना पलटा और आँख खुली

और दूरी का अहसास हुआ
दूरी का अह्सास हुआ......

-------------

संपर्क:

दिव्य प्रकाश दुबे

dpd111@gmail.com

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