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March 2008
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भूपेन हजारिका


दिल हूम-हूम करे


-दिनकर कुमार

(पिछले अंक से जारी....)

(साथ में सुनिये रेडियोवाणी पर भूपेन दा के गीत यहाँ पर)

सात
स्वतंत्रता के बाद गोपीनाथ बरदलै असम के प्रथम प्रधानमंत्री (उस समय असम में मुख्यमंत्री नहीं प्रधानमंत्री होते थे) बने थे। उनके प्रयास से भूपेन को अमेरिका जाने के लिए छात्रवृत्ति मिली थी। सितम्बर 1949 में भूपेन की यात्रा शुरू हुई। गुवाहाटी से डेकोटा जहाज में सवार होकर भूपेन कलकत्ता पहुंचे। फिर समुद्र के मार्ग से तेरह दिन की यात्रा कर मार्स बन्दरगाह तक पहुंचे। जहां से रेलगाड़ी में सवार होकर पेरिस पहुंचे। पेरिस दर्शन करते हुए भूपेन कोलम्बिया विश्वविद्यालय पहुंच गये।

कोलम्बिया विश्वविद्यालय में भी भूपेन ने संगीत के जरिए सहपाठियों का दिल जीत लिया। भारतीय विद्यार्थियों के बीच भूपेन काफी लोकप्रिय हो गये। भूपेन ने देखा कि अधिकांश भारतीय विद्यार्थी अमीर परिवारों से ताल्लुक रखते थे। अमेरिका के मुक्त जीवन के साथ भूपेन का परिचय हुआ।


भूपेन के युवा जीवन में एक लड़की आयी थी, जो शिलांग में रहती थी। अमेरिका में भी भूपेन को उस लड़की की याद आती थी। अपने साथ भूपेन उसके खत लेकर गये थे। बीच-बीच में खत खोलकर पढ़ते थे। दिल में टीस होती थी। माता-पिता की भी याद आती थी।

इण्डियन स्टूडेण्ट एसोसिएशन का चुनाव हुआ और भूपेन को सचिव चुन लिया गया। दाखिला लेने से पहले अंग्रेजी ज्ञान का एक टेस्ट देना पड़ता था। भूपेन उस समय टेस्ट में प्रथम आये। अध्यापकों को आश्चर्य हुआ था कि जिस टेस्ट में फ्रांस, जर्मनी, आस्ट्रिया आदि देशों के विद्यार्थी शामिल हुए थे, उसमें भूपेन किस तरह प्रथम आ गये थे। पढ़ाई करते हुए भूपेन को इण्टरनेशनल हाउस में एक घण्टा लिफ्ट चलाने का काम मिल गया, जिसके बदले उन्हें चार डॉलर मिलते थे। इसके साथ ही भूपेन स्विमिंग पुल के बाहर कपड़ों की पहरेदारी का भी काम करते थे। गर्मी की छुट्टियों में हॉलीवुड जाकर पार्ट टाइम नौकरी करते थे।


भूपेन की दोस्ती केरल के छात्र राव से हुई थी, जो कम्युनिस्ट था। तब भारत में तेलंगाना कृषि विद्रोह चल रहा था। राव विद्यार्थियों से चन्दा लेकर तेलंगाना भेजता था। भूपेन गीत गाकर पैसे जुटाने लगे और राव के उद्देश्य की सहायता करने लगे।

भूपेन को केवल दो साल के लिए छात्रवृत्ति मिली थी। राजनीतिशास्त्र में एम. ए. होने के कारण उन्हें नये सिरे से मास कम्युनिकेशन विषय में एम. ए. की पढ़ाई करनी पड़ी थी। पी. एच. डी करने का अर्थ था - ज्यादा समय अमेरिका में ठहरना। वैसी स्थिति में उन्हें छात्रवृत्ति का पैसा नहीं मिलने वाला था। उन्हें प्रतिमाह दो सौ पचास डॉलर मिलता था। फिर भी किल्लत की स्थिति बनी रहती थी। उसी दौरान भूपेन ने एक गीत की रचना की थी - ‘शतिकार रूपकथा किबा जेन विसारि ...'।


जाकिर हुसैन की सिफारिश पर भूपेन संयुक्त राष्ट्र संघ के रॉबर्ट ट्रेस से मिले। रॉबर्ट ट्रेस ने दस महीने तक भूपेन को अपने सहायक का काम दिया। बदले में प्रतिमाह भूपेन को सौ डॉलर मिल रहे थे। अतिरिक्त डॉलर को भूपेन जमा कर रहे थे ताकि छात्रवृत्ति खत्म हो जाने पर उनकी पढ़ाई जारी रह सके।


विजयलक्ष्मी पण्डित राजदूत बनकर अमेरिका गयी थीं। भारतीय छात्र संघ के सचिव होने के नाते भारतीय दूतावास के कार्यक्रमों में भूपेन को आमंत्रित किया जाता था। 26 जनवरी के अवसर पर भारतीय दूतावास में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। उसमें भूपेन से एक कार्यक्रम पेश करने के लिए कहा गया। कार्यक्रम की तैयारी करने में प्रियंवदा पटेल नामक एक गुजराती युवती ने भूपेन की मदद की। प्रियंवदा सरदार वल्लभ भाई पटेल के परिवार से ताल्लुक रखती थी। इण्टरनेशनल रिलेशंस विषय की पढ़ाई कर रही थी। वह अपने माता-पिता के साथ अफ्रीका में रहती थी। एम. ए. की पढ़ाई पूरी कर वह अफ्रीका लौटने वाली थी। कुछ दिनों तक शान्ति निकेतन में रही थी। नृत्य में पारंगत थी। बांग्ला बोलना जानती थी। भूपेन गीत गाने वाले थे और प्रियंवदा नाचने वाली थी। रिहर्सल शुरू हो गया। भूपेन ने गीत चुना था - ‘ए जय रघुर नंदन ...' इस गीत पर प्रियंवदा को भावाभिनय करना था। इसके अलावा गरबा, रवीन्द्र संगीत आदि की तैयारी की गयी थी। भूपेन ने एक असमिया परिवार से मेखला-चादर का जुगाड किया ताकि कार्यक्रम के दिन प्रियंवदा मेखला-चादर पहनकर नृत्य पेश कर सके। धूप-अगरबत्ती जलाकर भूपेन ने बरगीत का गायन शुरू किया और प्रियंवदा नाचने लगी। दोनों प्रथम स्थान पर रहे। दोनों के नाम की धूम मच गयी। भारत में ‘इलस्ट्रेटेड वीकली' ने सचित्र समाचार प्रकाशित किया।


एक दिन बर्फ गिर रहा था। पैदल चलते हुए भूपेन गिर पड़े और बेहोश हो गये। चेहरे की हड्डी टूट गयी थी। अस्पताल में प्रियंवदा लगातार भूपेन की देखभाल करती रही थी। उसी दौरान भूपेन ने महसूस किया कि प्रियंवदा उनके प्रति लगाव अनुभव कर रही थी। प्रियंवदा के पिता डॉ. एम. एम. पटेल अमीर डॉक्टर थे। कम्पाला में उनका अस्पताल था। भूपेन जब स्वस्थ होकर लौटे तो सहपाठियों ने उन्हें प्रियंवदा के नाम पर छेड़ना शुरू कर दिया।


भूपेन बीच-बीच में रामकृष्ण मिशन जाते थे। प्रियंवदा भी मिशन जाने लगी। इसी दौरान भूपेन ने प्रियंवदा का ‘प्रियम' कहना शुरू कर दिया था और उसे असमिया बोलना सिखा दिया था।


अचानक एक दिन प्रियम ने भूपेन से कहा - ‘मैं एम. ए. की पढ़ाई करने के लिए चार साल के लिए यहां आयी थी। अब पापा ने वापस बुलाया है। जाने से पहले तुमसे विवाह करना चाहती हूं।'


भूपेन ने कहा, ‘मेरे भविष्य का कोई ठिकाना नहीं है। तुम चली जाओगी। मुझे तीन साल और पढ़ना होगा।' इसके अलावा भूपेन ने प्रियम को अपने खस्ताहाल परिवार के बारे में बताया। तीस रुपये के किराये के घर में दस भाई-बहनों का परिवार गुजारा करता है। पिताजी को 145 रुपये पेंशन के रूप में मिलते हैं।


प्रियम ने पूछा, ‘और कोई रुकावट है ?'
‘मैं एक लड़की को चाहता था। ये रहे उसके खत' - भूपेन ने खत प्रियम को पढ़ने के लिए दिया।
‘वह कहां है ?'
‘उसका विवाह हो चुका है।'
प्रियम ने कहा कि भूपेन गम्भीरता पूर्वक उसके विवाह के प्रस्ताव पर विचार करे।


आठ
प्रियम ने भूपेन को बताया कि एक-एक हजार की दस साड़ियां लेकर एक अमीर युवक उसे विवाह का प्रस्ताव देने आया था। लड़का बम्बई में संयुक्त राष्ट्र संघ कार्यालय में काम करता था। प्रियम ने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। रॉबर्ट केनेडी की पत्नी एथोलो प्रियम के साथ कोलम्बिया में पढ़ती थी। गर्मी की छुट्टियों में एथोलो हेलीकॉप्टर में प्रियम को बिठाकर अपने घर ले जाती थी। प्रियम विजय लक्ष्मी पण्डित के घर भी आती-जाती थी।


भूपेन ने प्रियम से कहा कि वह पढ़ाई कर चुकी है, इसीलिए अपने घर लौटकर जा सकती है।
प्रियम ने कहा, ‘तुम अगर आज भी उस लड़की को नहीं भूल पाये हो, वह तुम्हें मिलने वाली भी नहीं है। मैं किसी और से शादी नहीं करूंगी।'


भूपेन दुविधा में फंस गये। भूपेन को अपनी प्रेमिका की याद आ रही थी, जिसने एक अमीर लड़के से विवाह कर लिया था और हावड़ा में रह रही थी। अपने दिल के दर्द को भूपेन ने ‘शैशवते धेमालीते ...' गीत रचकर व्यक्त किया था।


भूपेन ने प्रियम को स्पष्ट बता दिया कि भूपेन उसे सुख-सुविधाओं से भरपूर जीवन नहीं दे पाएंगे, न ही आर्थिक सुरक्षा दे पाएंगे। प्रियम को कोई एतराज नहीं था। इस तरह दोनों विवाह करने के लिए तत्पर हुए। भारतीय विद्यार्थियों ने टेपरिकार्डर पर बिस्मिल्ला खान की शहनाई बजाई, बंगाली लड़कियों ने अल्पना अंकित की, गुजराती लड़कियों ने गरबा नृत्य पेश किया। एक ब्राह्मण बंगाली अध्यापक ने मंत्रोच्चारण किया। फिर सिटी कोर्ट में जाकर दोनों ने कानूनी रूप से एक-दूसरे को पति-पत्नी मान लिया। इस विवाह के लिए न तो भूपेन के माता-पिता तैयार थे न ही प्रियम के माता-पिता।


प्रियम ने कहा, ‘मैं एक सन्तान गर्भ में लेकर चली जाऊंगी।' प्रियम की इच्छा पूरी हुई। वह कम्पाला लौट गयी। प्रियम के पिता का घर बड़ौदा में भी था। प्रियम कम्पाला से बड़ौदा गयी।
भूपेन मेस छोडकर एक किराये के घर में रहने लगे और पढ़ाई पूरी करने में जुट गये। इसी बीच प्रियम के मामा एच. एम. पटेल भूपेन से मिलने आये। मामा ने लौटकर प्रियम को बताया कि भूपेन रात-रात भर घर से गायब रहते हैं। प्रियम ने फोन कर भूपेन से कैफियत पूछी। कहीं-न-कहीं सन्देह का भाव प्रियम के मन में पैदा होने लगा। चार दिनों का दाम्पत्य जीवन गुजारने के बाद दोनों के बीच ढाई साल का अन्तराल था।


इसी दौरान भूपेन का पॉल राबसन से परिचय हुआ। पॉल राबसन रात्रिकालीन गोष्ठियां चलाते थे, जिसमें माक्र्सवाद पर विचार प्रकट किया जाता था। भूपेन माक्र्सवाद से काफी प्रभावित थे और नियमित रूप से पॉल राबसन की गोष्ठी में भाग लेते थे।
भूपेन को सूचना मिली की प्रियम ने एक पुत्र को जन्म दिया है। भूपेन को पिता के पत्र से पता चला कि गोपीनाथ बरदलै भूपेन को लौटते ही डी. पी. आई. की नौकरी देने वाले थे। कोलम्बिया में भी यूनेस्को की तरफ से भूपेन को नौकरी का प्रस्ताव मिला था।
पी. एच. डी. पूरा करने के साथ ही भूपेन ने प्रियम को सूचित किया कि अब वे असम लौटने वाले हैं। प्रियम ने जवाब दिया कि भूपेन अफ्रीका के रास्ते भारत लौटने का टिकट लें, ताकि प्रियम के माता-पिता भूपेन से मिल सकें। पॉल राबसन ने भूपेन से कहा कि लन्दन में रजनीपाम दत्त रहते हैं, जो घोर साम्यवादी हैं, भूपेन जरूर मुलाकात करें।


लन्दन पहुंचकर भूपेन रजनीपाम दत्त से मिले। भूपेन ने उनसे पूछा - ‘असम लौटकर एक पतनशील समाज के साथ मैं किस तरह तालमेल कायम कर पाऊंगा ? मैं निम्न मध्यवर्ग का हूं। मेरा मन टूट रहा है। मैं ब्यूरोक्रेसी का हिस्सा बनना नहीं चाहता। विश्वविद्यालय में काम मिले तो करूंगा।'


दत्त ने कहा, ‘तुम निराश क्यों हो रहे हो ? निराश नहीं होना चाहिए। तुम जिस बिन्दु पर रहोगे, उसी बिन्दु पर रहकर अगर दस लोगों के विचार बदल सकोगे तो वही तुम्हारी सार्थकता होगी। मान लो, तुम लोक निर्माण विभाग में इंजीनियर बनकर एक पुल का निर्माण कर रहे हो। वैसी स्थिति में तुम्हें यह नहीं देखना है कि पुल किसके लिए बना रहे हो, बल्कि पुल का निर्माण ठीक से हो, इस बात का ध्यान रखना है। तुम वहां जाकर पढ़ाओगे, विद्यार्थियों को अपने विचार से बदलने की कोशिश करोगे। लड़कों का हृदय परिवर्तन कर तुम समाज का परिवर्तन कर सकते हो।'


असम लौटते समय भूपेन काफी चिन्तित थे। नौ भाई-बहनों की देखभाल करनी होगी। एक अमीरजादी पत्नी के साथ गृहस्थी बसानी होगी। फिलहाल परिवार जिस किराये के घर में था, उसमें बहुत कम जगह थी।


भूपेन अफ्रीका पहुंचे। अफ्रीका में प्रियम के पिता ने अपने दामाद की खूब आवभगत की। भूपेन को नये-नये स्थानों की सैर करवाई गयी। अफ्रीका से भूपेन बम्बई पहुंचे। फिल्म अभिनेता अशोक कुमार से अमेरिका में परिचय हुआ था। भूपेन बम्बई में अशोक कुमार से मिले। तब अशोक कुमार ‘परिणीता' की शूटिंग कर रहे थे। अशोक कुमार ने भूपेन से पूछा कि क्या वे फिल्म उद्योग में आना चाहेंगे ? भूपेन ने कहा कि फिल्म में रुचि तो है, पर अभी कुछ तय नहीं किया है। भूपेन बलराज साहनी से मिले।


भूपेन और प्रियम का एक अन्तराल पर मिलन हुआ। दो साल के अपने बेटे को भूपेन ने पहली बार देखा। बड़ौदा में भूपेन का शाही स्वागत हुआ। शहर के नामी-गिरामी लोगों के साथ भूपेन का परिचय करवाया गया।


भूपेन प्रियम और बेटे के साथ कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता से गुवाहाटी तक का सफर रेलगाड़ी से तय किया गया। गुवाहाटी स्टेशन पर काफी आत्मीय लोग स्वागत करने के लिए आये थे। किराये के घर के एक कमरे को माता-पिता ने सजाकर नवदम्पति के लिए रखा था। पिताजी ने एक नौकरानी भी रख ली थी। मगर भूपेन ने देखा कि इतने बड़े परिवार के लिए किराये का घर बहुत छोटा था। पिता कर्ज में डूबे थे। भाई-बहनों की सेहत भी ठीक नहीं लग रही थी।


भूपेन ने रेडियो में काम करना शुरू कर दिया। अलग से 5॰ रुपये मासिक किराये वाला घर ले लिया। गीत लिखकर गाने लगे। गणनाट्य संघ के कार्यक्रमों में भाग लेने लगे। प्रियम ने भी अपने-आप को असम की बहू के रूप में परिवर्तित कर लिया। कई तरह के प्रलोभन आ रहे थे। प्रियम के पिता भूपेन को घर जमाई बनाना चाहते थे। असम सरकार भूपेन को कोई बड़ा पद देना चाहती थी, मगर तत्कालीन मुख्यमंत्री विष्णुराम मेधी को इस बात पर एतराज था कि भूपेन ‘कम्युनिस्ट' बन गए थे।


नौ
गुवाहाटी लौटने के दो साल बाद बिरंचि कुमार बरुवा के प्रयास से भूपेन को विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के लेक्चरर की नौकरी मिल गयी। शैक्षणिक माहौल में भूपेन का मन रमने लगा।


सन् 1954 में गणनाट्य संघ के आमंत्रण पर भूपेन मघाई ओझा के साथ कलकत्ता गये। वेलिंग्टन स्क्वायर पर भूपेन ने गीत गाया और मघाई ओझा ने ढोल वादन प्रस्तुत किया। कलकत्ता में भूपेन की जबर्दस्त प्रशंसा हुई। पत्र-पत्रिकाओं ने उनकी तारीफ में काफी कुछ लिखा। सुचित्रा मित्र ने भूपेन को घर बुलाकर उनका अभिनंदन किया।


हेमांग विश्वास के साथ मिलकर भूपेन ने गणनाट्य संघ का अधिवेशन आयोजित किया, जिसमें बाइस हजार लोगों को आमंत्रित किया। बम्बई से अधिवेशन में शामिल होने के लिए बलराज साहनी आये। उस समय असम के एक दैनिक पत्र ने भूपेन की रचनाधर्मिता पर साम्यवादी दर्शन का प्रभाव बताते हुए आरोप लगाया कि उनकी रचनाओं से कुछ और गन्ध आ रही है।


‘असम ट्रिब्यून' के संस्थापक राधा गोविन्द बरुवा के प्रोत्साहन से गुवाहाटी के उजान बाजार इलाके में भूपेन ने पहली बार मंच पर बिहू कार्यक्रम आयोजित करने का सिलसिला शुरू किया था। मजेदार बात यह थी कि उस कार्यक्रम में भूपेन को गाने नहीं दिया गया क्योंकि कार्यक्रम में सरकार के मंत्री उपस्थित थे। अगले दिन भूपेन के गीतों को छापकर दर्शकों के बीच बांट दिया गया।
वीरेन्द्र कुमार भट्टाचार्य अक्सर भूपेन के घर आते थे। वे थाह लेना चाहते थे कि भूपेन सोशलिस्ट हैं या नहीं। भूपेन ने कहा कि पहले वे समाज को ठीक से पहचान लेना चाहते हैं।


गुवाहाटी का अभिजात वर्ग शास्त्रीय संगीत कार्यक्रम आयोजित करता था। भूपेन उसके पास ही लोकसंगीत कार्यक्रम आयोजित करते थे और लोगों से कहते थे कि यही जनता का संगीत है।


सन् 1954 में भूपेन कृश्न चन्दर, एम. एम. हुसैन, बालचन्दर, इस्मत चुगताई, मुल्कराज आनन्द के साथ फिनलैण्ड गये। उससे पहले असम के प्रगतिशील कलाकार दिलीप शर्मा चीन गये थे, तब भूपेन ने उनके लिए एक गीत लिखा था - ‘प्रतिध्वनि शुनू, नतून चीनर प्रतिध्वनि शुनू'। इस गीत का बांग्ला अनुवाद हुआ और यह गीत बंगाल में बहुत लोकप्रिय हुआ।
फिनलैण्ड में युद्घविरोधी सम्मेलन में ज्यां पाल सार्त्र समेत दुनिया भर के बुद्घिजीवी शामिल हुए थे। फिनलैण्ड से लेनिनग्राड, मास्को, काबुल होते हुए जब भूपेन गुवाहाटी लौटे तो उन्हें पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार लौटने में तीन दिन देर हो गया। तार भेजकर उन्होंने इसकी सूचना विश्वविद्यालय प्रशासन को दे दी थी। मगर प्रशासन ने उनके नाम ‘कारण बताओ' नोटिस जारी कर दिया। भूपेन के भावुक दिल पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला किया। पिता एवं दूसरे शुभचिन्तकों ने भूपेन को समझाने की कोशिश की, पर भूपेन अपने फैसले पर अटल थे। जिस दिन भूपेन ने त्याग-पत्र दिया, उसी दिन तेजपुर से गंगा प्रसाद अग्रवाल और फणि शर्मा भूपेन से मिलने आये। वे ‘पियली फुकन' नामक फिल्म बनाना चाहते थे और भूपेन को संगीतकार की भूमिका निभाने के लिए कहने आये थे। अग्रिम राशि के रूप में उन्होंने सौ रुपये भूपेन को दिये और अनुबन्ध पत्र पर दस्तखत करवा लिया। भूपेन ने इस्तीफा दे दिया। फिल्म का संगीत तैयार करने के लिए भूपेन कलकत्ता आ गये और एक किराये का घर लेकर संगीत सृजन में जुट गये। प्रियम और बेटे को भूपेन ने बड़ौदा भेज दिया था। जाते समय प्रियम ने कहा था - ‘भूपेन, इस कठिन वक्त को गुजर जाने दो, तुम्हें खुद ही रास्ता ढूंढना होगा। हम कभी तुम्हारी मदद नहीं करेंगे, क्योंकि तुम मदद स्वीकार नहीं करोगे।'


‘पियली फुकन' से पहले भूपेन ‘सती बेउला' में संगीत दे चुके थे। ‘पियली फुकन' को स्वर्ण पदक मिला। भूपेन को बांग्ला फिल्म में संगीत देने का प्रस्ताव मिलने लगा। असम के नगांव शहर के निवासी असित सेन उस समय बांग्ला फिल्में बना रहे थे। उसी दौरान सत्यजीत राय की फिल्म ‘पथेर पांचाली' बनी थी। भूपेन के मन में एक फिल्म बनाने की योजना पनपने लगी थी।
भूपेन को एक साथ चार बांग्ला फिल्मों में संगीत देने का प्रस्ताव मिला था। ‘पियली फुकन' में संगीत देने के लिए उन्हें छह सौ रुपये मिले थे।


भूपेन ने कलकत्ता में घर खरीद लिया। पचीस हजार रुपये का प्रबन्ध किया और ‘एरा बाटर सुर' नामक फिल्म बनाने में जुट गये। पटकथा लिखते समय प्रियम ने उनकी सहायता की थी। फिल्म के लिए भूपेन ने कई नये कलाकारों की खोज की। फिल्म का नायक जयन्त निशा नामक लड़की से प्रेम करता है, पर निशा उसकी नहीं हो पाती। अन्त में नायक असम छोडता है और कहता है - ‘असम की धरती मुझे गलत तो नहीं समझेगी।' भूपेन ने बाद में स्वीकार किया कि इस फिल्म के जरिए उन्होंने अपने जीवन के एक हिस्से को सेल्यूलाइड पर उतारने की कोशिश की थी।


भूपेन अपनी फिल्म के दो गाने लता मंगेशकर की आवाज में रिकार्ड करना चाहते थे। लता के साथ उनका परिचय नहीं था। हेमन्त कुमार के साथ भूपेन का परिचय था। हेमन्त कुमार ने ही भूपेन का परिचय एच. एम. वी. कम्पनी के साथ करवाया था।


भूपेन ने हेमन्त कुमार को पत्र लिखा कि वे लता मंगेशकर से बात करें। हेमन्त कुमार ने जवाब दिया कि लता तैयार हैं। भूपेन बम्बई गये और हेमन्त कुमार के घर में ठहरे। लता के साथ पहली बार परिचय हुआ। लता ने कहा, ‘मैं आपको दादा कहकर पुकारूंगी।'
पहला गाना था ‘जोनाकर राति ...' और दूसरा गाना भूपेन व हेमन्त के साथ था। गाना रिकार्ड होने के बाद धूम मच गयी। ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया' ने गाने की भूरि-भूरि प्रशंसा की।


खुद लता मंगेशकर ने अभिभूत होकर भूपेन से कहा, ‘आज तक मैंने ऐसा सुर नहीं सुना था दादा!'

(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)

(साथ में सुनिये रेडियोवाणी पर भूपेन दा के गीत यहाँ पर)

भूपेन हजारिका


दिल हूम-हूम करे


-दिनकर कुमार

(पिछले अंक से जारी....)


तीन
एम. ई. स्कूल के शिक्षक नीलकान्त हजारिका बाद में सरकारी अधिकारी बन गये थे और उनका तबादला असम के कई शहरों में होता रहा था। बचपन के शुरुआती कुछ साल भूपेन हजारिका ने गुवाहाटी में अपने ननिहाल में गुजारे थे। गुवाहाटी के भरलुमुख इलाके में नाना का घर था। विभिन्न भाषा-भाषी लोग रहते थे। बंगाली लोगों का कीर्तन कार्यक्रम देखने भूपेन जाते। वहीं थाने में बिहारी सिपाही रहते थे, जो भोजपुरी में गाया करते थे। उनके गीतों को भी भूपेन मन लगाकर सुना करते थे। मां के साथ ‘ओजापाली' (महापुरुष शंकरदेव द्वारा प्रारम्भ की गयी नृत्यनाटिका की परम्परा) देखने जाते थे।


नाना के घर के पास से छोटी नदी ‘भरलू' बहती थी, जो ब्रह्मपुत्र में मिलती थी। सबको तैरते हुए देख भूपेन का जी चाहता कि वह भी तैरें, मगर तैरना नहीं आता था। एक दिन भूपेन ने देखा कि एक छोटी लड़की नदी में नहा रही है। किनारे पर खड़े किसी आदमी ने कहा कि वह डूब जाएगी। भूपेन फौरन नदी में कूद गये। बच्ची ने उन्हें जकड़ लिया। दोनों डूबने लगे। तभी एक बिहारी पुलिसवाले ने उन्हें पानी से बाहर निकाला। बाहर निकालने के बाद पुलिस वाले ने भूपेन को धमकाया कि आइन्दा इस तरह की हरकत नहीं करे। उसकी डांट सुनने के बाद बालक भूपेन ने तय कर लिया कि वह तैरना अवश्य सीखेगा। अगले दिन वह एक बांस की सहायता से तैरना सीखने लगा। एक घण्टे तक कोशिश करने के बाद वह तैरना सीख गया। जब तैरना आ गया तो भूपेन ने तय किया कि रेलवे के पुल पर उस समय खड़ा होकर पानी में छलांग लगाने में बड़ा मजा आएगा, जब रेलगाड़ी आ रही होगी। उसने वैसा ही किया। कामाख्या स्टेशन से रेलगाड़ी गुवाहाटी की तरफ आ रही थी। तभी भूपेन पानी में कूद गया। तैरते हुए किनारे के एक पेड़ के पास पहुंचा। रेलगाड़ी आगे जाकर रुक गयी। गार्ड ने उतर कर फटकारा, ‘मरना चाहता है क्या ?' भूपेन भागता हुआ नानी के पास पहुंच गया और सारा हाल कह सुनाया।


गार्ड ने जो फटकारा था, उससे बालक भूपेन नाराज हो गया था। उसने तय किया कि रेलगाड़ी को पटरी से गिराना होगा, तब उस गार्ड को सजा मिल जाएगी। अगले दिन भूपेन ने रेल की पटरी पर पत्थरों को ढेर के रूप में रख दिया। इसके बाद घर में आकर खाट के नीचे छिप गया और बेसब्री के साथ रेलगाड़ी की प्रतीक्षा करने लगा। रेलगाड़ी की आवाज सुनाई पडी। भूपेन के दिल की धड़कन तेज हो गयी। रेलगाड़ी तेजी से गुजर गयी। पटरी से रेलगाड़ी उतरी नहीं। बालक भूपेन ने दुबारा वैसी कोशिश नहीं की।


चार
नीलकान्त हजारिका का जल्दी-जल्दी तबादला होने का प्रभाव बालक भूपेन की पढ़ाई पर पड़ना स्वाभाविक था। 1933 में गुवाहाटी के सोनाराम स्कूल की तीसरी कक्षा में भूपेन का दाखिला हुआ। 1935 में धुबड़ी के प्राइमरी स्कूल में भूपेन का दाखिला हुआ। छह महीने बाद ही भूपेन का दाखिला गुवाहाटी के काटन कॉलेजिएट स्कूल में करवाया गया। जहां से पांचवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद भूपेन को पिता के साथ तेजपुर जाना पड़ा। तेजपुर हाई स्कूल की छठी कक्षा में भूपेन का दाखिला हुआ। 1936 से 194॰ तक भूपेन तेजपुर में रहा और ये चार वर्ष उसके जीवन के अत्यन्त ही महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुए, क्योंकि इन्हीं चार वर्षों में भूपेन के भीतर की प्रतिभा को उजागर होने का मौका मिला।


तेजपुर में उस समय असमिया साहित्य-संस्कृति के दो युग पुरुष ज्योतिप्रसाद अग्रवाल और विष्णु राभा सक्रिय थे। उनके प्रयासों से तेजपुर
में सांस्कृतिक वातावरण बन गया था। पद्मधर चालिहा, पार्वती प्रसाद बरुवा जैसे गीतकार-संगीतकार थे। इन सबके सम्पर्क में आने के साथ ही भूपेन के भीतर का कलाकार पल्लवित-पुष्पित होने लगा। बंगाली मंच पर रवीन्द्र संगीत प्रतियोगिता हुई। तब भूपेन को केवल एक रवीन्द्र गीत गाना आता था, जिसे गाकर भूपेन ने प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। पुरस्कार के रूप में सोने का पदक मिला। पांच वर्ष की उम्र से भूपेन हारमोनियम बजाना सीखने लगा था। तेजपुर में विष्णुराभा ने शास्त्रीय संगीत की बुनियादी बातें सिखाई।
असम में तब लोकगीतों एवं सत्रों के नृत्य-संगीत को प्रचारित करने का कोई प्रयास नहीं हुआ था। बांग्ला भाषा के तर्ज पर फूहड़ और सस्ते गीतों का प्रचलन हो गया था। ज्योतिप्रसाद और विष्णुराभा इस माहौल को बदलने की कोशिश कर रहे थे। वे असमिया लोकगीतों को जनप्रिय बनाने का आन्दोलन चला रहे थे। संगीत के क्षेत्र में नये-नये प्रयोग कर रहे थे। विष्णु राभा गजल के अंदाज में असमिया में गीत लिखते थे और भूपेन को सिखाते थे। एक ऐसा ही गीत था ‘आजली हियार माजे बिजुली कण मारे, पूवर दुवार भेलि आहे ताई किरण ढालि, हिया जे मोर चमके ...' (भोले दिन में बिजली की तरह वाण मारती है, पूरब का दरवाजा खोलकर वह किरणें फैलाती है, मेरे दिल में रोशनी फैल जाती है)। भूपेन छोटा था और ऐसे गीतों का भावार्थ समझ पाने में असमर्थ था। इसके बावजूद मंच पर वह गाने लगा था। भविष्य के कलाकार को खाद-पानी मिलने लगा था। भूपेन बचपन में ही सोचने लगा था कि क्या गीत से समाज का कुछ उपकार किया जा सकता है ? स्कूल में छठी कक्षा में पढ़ते हुए उसने पहला गीत लिखा - ‘कुसुम्बर पुत्र श्रीशंकर गुरु'। 1939 में एक और गीत लिखा - मई अग्निकुमार फिरिंगीत'। फिर लिखा - ‘कंपि उठे किय ताजमहल'।


तेजपुर के वाण रंगमंच पर आये दिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता था। भूपेन के पिता भी नाटकों में अभिनय करते थे। ज्योतिप्रसाद पिआनो बजाते थे। भूपेन मां के साथ कार्यक्रम देखने जाता और महिलाओं की गैलरी में बैठकर कार्यक्रम देखता। ज्योतिप्रसाद के व्यक्तित्व का उस पर गहरा प्रभाव पड़ रहा था। तभी भूपेन को पता चला कि ज्योतिप्रसाद ने असमिया की पहली फिल्म ‘जयमती' बनायी थी, हालांकि तब तक फिल्म प्रदर्शित नहीं हो पायी थी। ज्योतिप्रसाद ने वाण रंगमंच को जीवन्त रूप प्रदान किया था। अधिकतर लोग केवल उनकी एक झलक देखने के लिए आते थे। जब तक ज्योतिप्रसाद से परिचय नहीं हुआ था तब तक भूपेन के मन में बड़ी इच्छा थी कि किसी तरह ज्योतिप्रसाद के करीब पहुंच जाए।


महापुरुष शंकरदेव (असम के प्रख्यात वैष्णव सन्त) की जयन्ती के अवसर पर भूपेन की मां ने उसे धोती-कुर्ता पहनाकर जयन्ती कार्यक्रम में एक ‘बरगीत' गाने के लिए भेज दिया। मां ने भूपेन को ‘बरगीत' गाना सिखाया था - ‘जय जय यादव जलनिधि यादव धाता'। इससे पहले केवल पांच साल की उम्र में भूपेन ने गुवाहाटी में मंच पर पहली बार गीत गाया था। तब असमिया साहित्य के जनक लक्ष्मीनाथ बेजबरुवा ने मंत्रमुग्ध होकर उसे चूम लिया था। दूसरी बार धुबड़ी में भूपेन ने गाया था। तीसरी बार तेजपुर में बरगीत का गायन प्रस्तुत कर भूपेन ने भूरि-भूरि प्रशंसा अर्जित की। लोग कहने लगे कि नीलकान्त हजारिका का लड़का मीठे सुर में बरगीत गाता है।
तेजपुर के घर में गुवाहाटी से आने वाले मेहमान ठहरते थे। भूपेन तब आठवीं के छात्र थे, जब उनका परिचय गुवाहाटी से आये कमलनारायण चौधरी से हुआ। कमल बहुत अच्छे गायक थे। उन्होंने भूपेन को एक गजल गाना सिखा दिया।


भूपेन तब छठी में था, जब एक दिन ज्योतिप्रसाद अग्रवाल, विष्णु राभा और फणि शर्मा भूपेन के पिता से मिलने आये। ये तीनों व्यक्ति तेजपुर के सांस्कृतिक आकाश के झिलमिलाने वाले सितारे थे। उन्होंने बताया कि भूपेन को कलकत्ता ले जाना चाहते हैं और उसकी आवाज में रिकार्ड तैयार करना चाहते हैं।


दो दिन दो रात का सफर तय कर भूपेन कलकत्ता गये। रिकार्डिंग कम्पनी एचएमवी के स्टुडियो में भूपेन ने गाया। बालक भूपेन के कद के हिसाब से माइक ऊंची थी, इसलिए दो लकड़ी के बक्से जोड़कर भूपेन को उस पर खड़ा कर दिया गया था। ‘जयमती' और ‘शोणित कुंवरी' फिल्म के लिए नायिका की आवाज में भूपेन ने गीत रिकार्ड करवाए। भूपेन को ‘यंगेस्ट आर्टिस्ट ऑफ हिज मास्टर्स व्यॉइस ऑफ इण्डिया रिकार्ड संगीत' का सम्मान मिला। गले में सोने का मेडल पहनकर भूपेन ने जो तस्वीर खिंचवाई उसे बंगाल की ‘रिकार्ड संगीत' पत्रिका ने आवरण पर प्रकाशित किया। इससे पहले मास्टर मदन ने कम उम्र में गाने का कीर्तिमान स्थापित किया था। फिल्मों में गाने रिकार्ड हो गये तो ज्योतिप्रसाद ने तय किया कि दो गाने स्वतंत्र रूप से भूपेन की आवाज में रिकार्ड किए जाएं। विष्णु राभा ने गीत रचा और आधे घण्टे में धुन तैयार की और रिकार्डिंग करवा दी। इससे पहले असमिया गानों के इक्के-दुक्के रिकार्ड निकले थे। पहला रिकार्ड अच्छा लगा तो ज्योतिप्रसाद ने भूपेन की आवाज में दूसरा रिकार्ड भी तैयार करवा दिया।


कलकत्ता से लौटकर भूपेन ने परीक्षा दी और उत्तीर्ण हुए। गणित में खराब नम्बर मिले। शिक्षकगण भी भूपेन को अजीब नजरों से देखने लगे - कैसा लड़का है, जो पढ़ाई-लिखाई छोडकर गाने रिकार्ड करवा रहा है। भूपेन के पिता स्वयं शिक्षक थे, इसलिए घर पर भूपेन को पढ़ाते थे। घर में साहित्यिक पत्रिका ‘जयन्ती' और ‘असमिया' आती थी। भूपेन उन पत्रिकाओं को पढ़ते थे और कुछ लिखने की छटपटाहट उनके भीतर होने लगी थी। तेजपुर गवर्नमेण्ट हाई स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका के लिए भूपेन ने ‘अग्नियुगर फिरिंगति' गीत की रचना की। भूपेन के पिता ने चार हजार दो सौ रुपए में एक फोर्ड कार खरीदी थी और एक गैरेज बनाया था। भूपेन उसी गैरेज में बैठकर आरम्भिक साहित्य साधना करने लगे। घर में एक विशाल पलंग पर माता-पिता और भाई-बहनों के साथ भूपेन सोते थे। जब पिता को पता चला कि भूपेन गैरेज में बैठकर पढ़ता-लिखता है तो उन्होंने भूपेन के लिए एक अलग कमरे की व्यवस्था कर दी। भूपेन ने पिता से वादा किया कि एकान्त पाकर वह मन लगाकर पढ़ाई करेंगे। मगर पिता ने भांप लिया कि अलार्म बजने पर भूपेन मां का उबला हुआ अण्डा खा लेते हैं और फिर रजाई में दुबक कर सो जाते हैं। पिता ने भूपेन को रात में उबला हुआ अण्डा देने पर रोक लगा दी।


शुरू में भूपेन का प्रिय विषय इतिहास था। इतिहासकार पद्मनाथ गोहाईंबरुवा से मिलने के लिए भूपेन अक्सर जाते थे। इसी तरह इतिहास के मर्मज्ञ राजमोहन नाथ भूपेन के पिता से मिलने के लिए आते थे। उन्होंने भूपेन से कहा था - एक पत्थर को उठाना, पूछना, पत्थर तुमसे ढेर सारी बातें करेगा। वह बताएगा - मेरे सीने से ह्वेनसांग गुजरा था, मेरे सीने में उषा ने स्नान किया था। पिता ने भूपेन को ‘बुक ऑफ नॉलेज' के दस खण्ड खरीद कर दिये थे। इसके अलावा हिटलर की आत्मकथा का बांग्ला अनुवाद का बांग्ला अनुवाद पढ़कर काफी प्रभावित हुए थे। बालक भूपेन पर जिस व्यक्ति का सबसे गहरा प्रभाव पड़ा था, वह थे ज्योतिप्रसाद। जीवन के प्रति एक सर्वांगीण दृष्टिकोण विकसित करने में ज्योतिप्रसाद ने उल्लेखनीय योगदान किया। तेजपुर में भूपेन चार साल रहे। इन चार सालों में भविष्य के भूपेन के निर्माण के लिए ठोस बुनियाद रखी जा चुकी थी।


पांच
194॰ में मैट्रिक की पढ़ाई पूरी कर भूपेन ने तेजपुर को अलविदा कर दिया। गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में भूपेन को दाखिला मिला। तब भूपेन मामा के घर में रहकर पढ़ाई करने लगे। भूपेन ने केवल 13 साल 9 महीने की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। वास्तव में उनकी पढ़ाई तीसरी कक्षा से शुरू हुई थी और उनके पिता ने उनकी उम्र एक वर्ष बढ़ाकर लिखवाई थी। हाफ पैंट पहनकर जब भूपेन कॉलेज गए तो चौकीदार ने पूछा - ‘क्या तुम कॉटन कॉलेजिएट स्कूल में पढ़ते हो ?' भूपेन ने कहा - ‘मैं कॉलेज में पढ़ने आया हूं।' चकित होकर चौकीदार ने पूछा - ‘क्या तुमने मैट्रिक पास कर लिया है ?' भूपेन ने कहा - ‘हां !' इसी तरह कक्षा में अध्यापक पी. सी. राय ने नन्हें भूपेन को देखकर वही सवाल पूछा। फिर जब भूपेन ने दृढ़ता के साथ बताया कि वह मैट्रिक उत्तीर्ण कर कॉलेज में पढ़ने आये हैं, तब जाकर पी. सी. राय को यकीन हुआ।


कॉलेज में नवागत विद्यार्थियों के लिए स्वागत समारोह आयोजित हुआ। भूपेन को पिता ने एक भाषण अंग्रेजी में लिखकर दिया था। जब भूपेन को मंच पर बुलाया गया तो भाषण भूलकर उन्होंने गाना सुनाया -
दुरनिर हरिणी सरू गांवखनि
तार एटि पंजाते सरू बांधेर मुखबनि ...
विद्यार्थियों के साथ ही अध्यापकगण भी भूपेन का गायन सुनकर मंत्रमुग्ध हो उठे। पी. सी. राय, वाणीकान्त काकती, लक्ष्मी चटर्जी, डॉ. सूर्य कुमार भुइयां आदि अध्यापकों ने भूपेन को आशीर्वाद दिया। भूपेन कॉलेज में लोकप्रिय हो गये।
भूपेन संगीत विषयक पुस्तकें ढूंढ-ढूंढकर पढ़ते थे। भातखण्डे की पुस्तक का बांग्ला अनुवाद उन्होंने पढ़ा। इसके अलावा लक्ष्मीराय बरुवा लिखित ‘संगीत कोष' का भी उन्होंने अध्ययन किया। साहित्यिक पत्रिका ‘आवाहन' में प्रकाशित होने वाले संगीत विषयक लेखों को भी वह गौर से पढ़ते थे।


भूपेन के पिता गुवाहाटी आ गये थे और एक छोटे से किराये के घर में भूपेन अपने माता-पिता के साथ रहने लगे थे। उसी समय द्वितीय विश्वयुद्घ छिड गया था और कॉटन कॉलेज अमेरिकी सैनिकों का अड्डा बन गया था। अचानक महंगाई बढ़ गयी थी। चावल पांच रुपए प्रति सेर बिकने लगा था। उधर पिता सेवानिवृत्त होने वाले थे और पेंशन के रूप में उन्हें 145 रुपये प्रतिमाह मिलने वाले थे। तब भूपेन आठ भाई-बहन थे। इतने बड़े परिवार के भविष्य का प्रश्न था। पिता ने जीवन भर दूसरों की मदद की थी। कभी अपने परिवार के सुरक्षित भविष्य के लिए कोई बचत नहीं की थी, न ही जमीन-जायदाद खरीदी थी।


युद्घ के कारण जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। 1942 में भूपेन के पिता सेवानिवृत्त हुए। परिवार का गुजारा चलना मुश्किल हो गया। उस दौरान भूपेन को भयंकर अभाव की स्थिति का सामना करना पड़ा। गोपीनाथ बरदलै को भी फाकाकशी की स्थिति से गुजरना पड़ रहा था। भूपेन के पिता के साथ उनकी दोस्ती थी। वे आपस में चावल बांटते थे, ताकि दोनों के परिवार के चूल्हे जलते रहें।
पिता ने भूपेन से कहा कि उसे बनारस जाकर आगे की पढ़ाई करनी होगी। कलकत्ता में बम गिराया गया था और वहां के हालात ठीक नहीं थे। इसीलिए पिता ने भूपेन को बनारस भेजने का फैसला किया। पिता ने कहा कि वह प्रतिमाह भूपेन को 6॰ रुपये भेजेंगे। 6॰ रुपये से ही भूपेन को अपने रहने, खाने और पढ़ने का खर्च चलाना पड़ेगा।


छह
सन् 1942 में भूपेन बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए आ गये। तब बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की ख्याति दुनिया भर में फैली हुई थी। सर्वपल्ली राधकृष्णन विश्वविद्यालय के कुलपति थे। स्वतंत्रता आन्दोलन के वरिष्ठ नेता अक्सर भाषण देने के लिए आते थे। समावर्तन समारोहों में आचार्य कृपलानी, पण्डित जवाहरलाल नेहरू, तेज बहादुर सप्रू, मौलाना अब्दुल कलाम आजाद आदि नेताओं का वक्तव्य भूपेन ने सुना था। जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय में छिपकर रहते थे। आचार्य नरेन्द्रदेव ने विश्वविद्यालय में सोशलिज्म फोरम का गठन किया था। देशप्रेम की जो लहर चल रही थी, भूपेन पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा था। बनारस पहुंचकर भूपेन का हिन्दी और उर्दू साहित्य के साथ परिचय हुआ था। मुंशी प्रेमचन्द, फिराक गोरखपुरी आदि की रचनाएं भूपेन पढ़ने लगे थे। शास्त्रीय संगीत के नये रूप से भूपेन का साक्षात्कार हुआ था, भूपेन गजल गाने लगे थे।


विश्वविद्यालय में अनुसूचित जाति के विद्यार्थियों को मासिक शुल्क नहीं देना पड़ता था। भूपेन चाहते तो आवेदन पत्र देकर मासिक सात रुपये बचा सकते थे। पर उन्होंने वैसा नहीं किया। उनके मन में जिद थी कि किसी प्रकार की अनुकम्पा लेकर आगे नहीं बढ़ना है। जो भी पाना है, अपनी प्रतिभा और मेहनत के सहारे ही पाना है।


उसी दौरान बनारस की एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए गोपीनाथ बरदलै ने हिन्दी में कहा था - हमारे असम को अगर लेना चाहते हैं जिन्ना साहब, पाकिस्तान का हिस्सा बनाना चाहते हैं तो हम कहते हैं कि वे आसमान का चांद भी ला सकते हैं, लेकिन असम को कभी भारत से अलग नहीं कर सकते।


बनारस में पढ़ रहे असमिया विद्यार्थियों ने ‘असम एसोसिएशन' का गठन किया था, जिसकी बैठकों में भूपेन शामिल होते थे। एसोसिएशन की वार्षिक पत्रिका में भूपेन का लेख प्रकाशित हुआ था।


बनारस में भूपेन चार वर्षों तक रहे। 1946 में राजनीतिशास्त्र विषय से उन्होंने एम. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने भूपेन से कहा - यू आर दी यंगेस्ट इट सिम्स ! भूपेन ने कहा - यस सर। बीस साल की उम्र में भूपेन ने एम. ए. की पढ़ाई पूरी कर ली थी।


बनारस की दालमण्डी गली में कोठे पर अक्सर तवायफों का गायन सुनने के लिए जाते थे। कोठे पर जाने के लिए पच्चीस रुपये देने पड़ते थे। भूपेन अपने साथियों के साथ पांच-पांच रुपये का चन्दा देकर इस राशि का इन्तजाम करते थे। भूपेन की उम्र कम थी और तवायफें अक्सर उनका मजाक उडाती थीं - देवर, तू क्यों आया ! भूपेन कजरी और गजल सुनने के लिए उनके मजाक की तरफ ध्यान नहीं देते थे।
इसी दौरान भूपेन के मन में तूफान मचा हुआ था - भविष्य को लेकर। दस भाई-बहन का परिवार। पिता को 145 रुपये पेंशन मिल रहा था। भूपेन सोचते थे कि एम. ए. पढ़ने के बाद पत्रकारिता करेंगे। कानून की पढ़ाई करेंगे। यह सोचकर भूपेन ने हार्डिंग यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया था। अर्ल लॉ कॉलेज में भी दाखिला लिया था। कलकत्ता गये तो वहां भी लॉ कॉलेज में दाखिला लिया था। शुरू से मन में इच्छा थी - नौकरी नहीं करनी है, गाते रहना है। भूपेन सोचते थे कि ‘नतून असमिया' या ‘असम ट्रिब्यून' में पत्रकारिता करेंगे। कभी यह नहीं सोचा था कि केवल संगीत उनकी जीविका का आधार बनेगा।


परिवार में अभाव की स्थिति गम्भीर होती जा रही थी। जब भूपेन एम. ए. में पढ़ रहे थे तब उनके सबसे छोटे भाई समर हजारिका का जन्म हुआ था। भूपेन ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए नहाते हुए शेक्सपीयर की भाषा में चिल्लाकर कहा था - दस फार एण्ड नो फर्दर। बदले में भूपेन को पिता का चांटा खाना पड़ा था। भाई अमर हजारिका रेडियो इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए पूना जाना चाहता था। एक भाई बॉटनी की पढ़ाई कर रहा था। खर्च का इन्तजाम भूपेन को करना था। बहन सुदक्षिणा का विवाह करवाना था।


उस समय देश स्वतंत्रता की प्रसव पीड़ा से गुजर रहा था। भूपेन पर कार्ल माक्र्स, महात्मा गांधी का प्रभाव पड़ रहा था, दूसरी तरफ असम के शंकरदेव, ज्योतिप्रसाद आगरवाला और विष्णुप्रसाद राभा का प्रभाव पड़ रहा था। धरती को सुन्दर बनाने का सपना दिमाग में कौंध रहा था। कला को समाज परिवर्तन का हथियार बनाने का संकल्प दृढ़ होता जा रहा था। आगरा में ताजमहल देखकर उसी दौरान भूपेन ने लिखा था - ‘कांपि उठे किय ताजमहल ...'।


सन् 1948 में असम में भारतीय गण नाट्य संघ की स्थापना हुई। भूपेन संघ के साथ जुड गये। ज्योतिप्रसाद आगरवाला, हेमांग विश्वास, विष्णुप्रसाद राभा आदि सांस्कृतिक कर्मियों के साथ भूपेन समाज परिवर्तन के लिए संस्कृति के हथियार का इस्तेमाल करने में जुट गये थे।
गुवाहाटी लौटकर परिवार की तंगहाली को देखते हुए सन् 1947 में भूपेन गुवाहाटी के बी. बरुवा कॉलेज में अध्यापक की नौकरी करने लगे थे। इसके बाद उन्हें आकाशवाणी में नौकरी मिल गयी थी। डेढ साल तक आकाशवाणी में नौकरी करने के बाद भूपेन को अमेरिका में मास कम्युनिकेशन विषय में शोध करने के लिए छात्रवृत्ति मिल गयी थी। माता-पिता ने प्रोत्साहन दिया था - जाओ, शोध करके लौट आओ। फिर जो करना होगा, करना। भूपेन अमेरिका जाने के लिए तैयार हो गये थे।


(जारी क्रमशः अगले अंकों में...)

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भूपेन हजारिका


दिल हूम-हूम करे
-दिनकर कुमार

रचनाकार परिचय:

दिनकर कुमार
जन्म : 5 अक्तूबर 1967, ग्राम ब्रह्मपुरा, जिला दरभंगा (बिहार)
एक कविता संग्रह ‘आत्म निर्वासन (1993), एक उपन्यास ‘निहारिका' (1995) प्रकाशित ।
असमिया से चालीस कृतियों का हिन्दी अनुवाद ।
अनुवाद के लिए 1998 का सोमदत्त सम्मान ।
कविताओं का असमिया, अंग्रेजी, नेपाली आदि भाषाओं में अनुवाद ।
100 से अधिक टीवी धारावाहिकों की पटकथाओं का लेखन ।
पत्रकारिता, रंगमंच एवं टीवी के क्षेत्र में योगदान ।
संप्रति : गुवाहाटी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘सेंटिनल' का संपादन ।
संपर्क : रोहिणी भवन, श्रीनगर, बाईलेन नं. - 2, दिसपुर, गुवाहाटी-781 005 (असम)


प्रकाशक (प्रिंट मीडिया, उषा पब्लिकेशन) का वक्तव्य
बचपन से ही मुझे साहित्य कला, सिनेमा आदि में व्यापक रूचि रही है शायद इसी के परिणाम स्वरूप दिनकर जी के सहयोग से कालेज में ‘‘अपवाद'' नामक एक पृष्ठीय पत्रिका का पदार्पण हुआ। भविष्य में इस आशा के साथ की अपवाद एक अपवाद नहीं रहेगा, हमने साहित्य के सफर में एक अंग्रेजी पत्रिका ‘‘क्रानिस इन्टरनेशनल'' को भी प्रकाशित किया। यद्यपि साहित्य की इस अनोखी और दिल लुभाने वाले अनुभव ने इस क्षेत्र में आगे बढने के लिए प्रेरित किया किंतु पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझकर इसमें एक विराम चिह्न लग गया।
परंतु बचपन के सखा दिनकर जी ने फिर इस पुस्तक को प्रकाशित करने का अनुरोध किया तो अनायास ही सोया हुआ वह साहित्य प्रेम फिर उभर कर एक बार सतह पर आ गया। हालांकि यह अब मैं अच्छी तरह समझ चुका था कि इस तरह का प्रयास आर्थिक रूप से कोई लाभ नहीं लाएगा परंतु यह एक व्यवसाय ही तो नहीं है, वरना प्रेमचन्द जी, फणीश्वर नाथ रेणु आदि अनेक साहित्यकार अतिधनाढ्य होते।

खैर भूपेन हजारिका जी किसी भी परिचय के मोहताज नहीं है। मां कामाख्या व ब्रह्मपुत्र के इस विलक्षण कलाप्रेमी को सारा देश जानता है। बचपन में एक बार इनसे मिलने का मौका मिला तो इन्होंने गले लगाकर मानो मुझमें अपनी अमिट छाप का एक अंश छोड दिया। यह दृश्य व चित्र मैं अपनी आंखों में हमेशा छिपाए रखता हूं।
संगीत, गायन व गीत रचना, वह भी इतनी स्मरणीय, संवेदनशील व कर्णप्रिय यह भूपेनदा का अपना अनोखा अंदाज हैं। लोगों के दिल में भूपेनदा का गीत ‘‘दिल हुम हुम करे'' बस गया। परंतु मैं तो उसी दिन उनका भक्त हो गया जब इनका संगीतबद्घ किया हुआ गीत आरोप फिल्म में ‘‘नयनों में दरपन है, दरपन में कोई'' सुना। सच में भूपेनदा असम के गौरव हैं, इनके व्यक्तित्व के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में इस पुस्तक को प्रकाशित करते हुए मैं गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। भगवान उन्हें स्वस्थ रखे और वे अपनी धुनों से हमें सदा रिझाए रखें, इसी आशा के साथ.....आशा है यह आपको पसंद आएगी, कृपया अपने सुझावों से हमें अवगत कराएं। अतः इस महान हस्ती भूपेनदा को मेरा एक बार फिर ‘‘सलाम''।

उषा पब्लिकेशन की पहली प्रस्तुति हिंदी में प्रथम प्रकाशित भूपेनदा के व्यक्तित्व पर पुस्तक, आफ आशीर्वाद, प्रेरणा, सहभागिता की अपेक्षा करेगी ताकि भविष्य में भी अन्य साहित्य के नगीने आफ समक्ष प्रस्तुत कर सकें।
अजय चोखानी


प्रस्तावना


गुवाहाटी के एक कार्यक्रम में स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने कहा था - ‘हम असम को भूपेन हजारिका के नाम से जानते हैं।' भूपेन हजारिका के बहुआयामी व्यक्तित्व के कितने रूपख हैं - गीतकार, संगीतकार, गायक, साहित्यकार, पत्रकार, फिल्म निर्देशक, पटकथा लेखक, चित्रकार - और हर रूप अद्वितीय है, अनूठा है। असम की माटी की सोंधी महक को सुरों में रुपान्तरित कर उन्होंने देश-विदेश में असम के संगीत को प्रचारित किया है। वे असम की जनता की चार पीढ़ियों के सबसे चहेते गायक हैं। बिहू समारोहों में वर्षा में भींगते हुए रात-रात भर लोग उनको गाते हुए देखते-सुनते हैं। असम की संस्कृति, ब्रह्मपुत्र नदी, लोक परम्परा, समसामयिक समस्या - जीवन के हरेक पहलू को उन्होंने गीतों में रूपान्तरित किया है।

एक
रंगाली बिहू। प्रथम वैशाख। असमिया नववर्ष का पहला दिन। गुवाहाटी के चांदमारी इलाके में रात के 1॰.3॰ बजे हजारों लोग बेसब्री के साथ अपने प्रिय गायक डॉ. भूपेन हजारिका की एक झलक पाने के लिए इंतजार कर रहे हैं। बिहू मण्डप में कहीं सूई रखने की भी जगह नहीं है। लोग सड़कों पर, फ्लाई ओवर पर खड़े हैं। दर्शकों में मुख्यमंत्री और अन्य कई मंत्री भी उपस्थित हैं।
भूपेन हजारिका मंच पर आते हैं। जनता को प्रणाम करते हैं। सबको बिहू की शुभकामनाएं देते हैं। फिर मुस्कराते हुए कहते हैं, ‘मुझे खुशी है कि मैं अपने मोहल्ले के बिहू उत्सव में गाने के लिए आया हूं।' चूंकि चांदमारी इलाके में ही उन्होंने संघर्षपूर्ण जीवन के कई साल गुजारे हैं।
वे गाना शुरू करते हैं - ‘बरदै शिला ने सरू दै शिला ...' बिहू की परम्परा पर आधारित गीत। आवाज में वही गम्भीरता, वही खनक, वही दिल को छू लेने वाली मिठास है, केवल उम्र का प्रभाव नजर आने लगा है। पहले वे बिहू उत्सवों में रात-रात भर गाते रह जाते थे, परन्तु अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता।
वे गाना शुरू करते हैं - ‘मानुहे मानुहर बावे, यदिउ अकनो ने भावे ...' इसी गीत को वे बांग्ला में भी गाते हैं, असमिया में भी गाते हैं, हिन्दी में भी गाते हैं। फिर वे कहते हैं, ‘मैं एक प्रेमगीत सुनाना चाहता हूं।' वे गाने लगते हैं - ‘शैशवते धेमालिते ...' गीत का भाव है - ‘बचपन में हम साथ-साथ खेलते थे। वैशाख में ब्रह्मपुत्र में तैरते थे। तुमने मुझसे वादा किया था कि साथ-साथ जिएंगे। तुमने कहा था कि तुम्हारे बिना जी नहीं सकूंगी, जान दे दूंगी। मगर मेरे पास धन नहीं था। तुम अपना वादा भूल गयी और एक धनवान के साथ ब्याह कर चली गयीं। एक दिन मैंने तुम्हें महंगी पोशाकों में देखा। क्या तुम सोच रही थी कि तुम्हारे बिना मैं अपनी जान दे दूंगा ? मैं जान नहीं दूंगा, बल्कि जीता रहूंगा, ताकि एक नये समाज का निर्माण कर सकूं। युवावस्था में उन्होंने यह गीत लिखा था, जो आज भी सुनने वालों के हृदय को स्पर्श करता है।
फिर वे गाने लगे ‘जीवन बूहलिषलै आह ...' इसी गीत को उन्होंने बांग्ला में भी गाया। वे थक गए थे। उन्होंने एक नवोदित गायिका की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘घर की लड़की है। दो गाने सुनाएगी। फिर मैं गाऊंगा। ‘दमन' फिल्म का एक गाना भी सुनाएगी।' ‘दमन' में भूपेन हजारिका ने अपने पुराने लोकप्रिय गीतों को नये अन्दाज में पेश किया है। गायिका ने गाना शुरी किया ‘बिजुलीर पोहर मोट नाई', फिर गाया - ‘ओ राम-राम आलता लगाऊंगी ...' भूपेन हजारिका ने ताली बजाकर गायिका की प्रशंसा की। अब उन्होंने फिर गाना शुरू किया - ‘सागर संग मत कतना सातूरिलो, तथापितो हुआ नाई क्लान्त ...' यह गीत उन्हें बहुत पसन्द है। इस गीत में उनका जीवन दर्शन छिपा हुआ है - सागर संगम में कितना तैरा मैं, फिर भी मैं थका नहीं। निरन्तर जूझते रहने का जीवन दर्शन।
अब वे गाने लगे - ‘बूकू हूम-हूम करे, घन घम-घम करे ओ आई ...' गुलजार ने फिल्म ‘रूदाली' के लिए इसका अनुवाद किया है। हिन्दी में भी उन्होंने गाया - ‘दिल हूम-हूम करे ...'। यह गीत जब खत्म हुआ तो उन्होंने कहा - ‘एब्सट्रेक्ट पेंटिंग्स हो सकती है, एब्सट्रेक्ट फिल्म हो सकती है तो एब्सट्रेक्ट गीत क्यों नहीं हो सकता ...'। इसके साथ ही अपना मशहूर गीत गाने लगे - ‘विमूर्त मोर निशाति जेन मौनतार सूतारे बोवपा एखनि नीला चादर ...' मेरी विमूर्त रात मानो मौन के धागे से बुनी हुई एक नीली चादर है ...।
उन्होंने कहा - ‘मुझे पता चला है कि आज के इस कार्यक्रम को इण्टरनेट के जरिए दुनिया भर में प्रसारित किया जा रहा है। मैं बाहर बसे असम के लोगों के लिए, भारतवासियों के लिए, विश्ववासियों के लिए गाना चाहता हूं' - वे गाने लगे - ‘वी आर इन द सेम बोट ब्रदर, वी आर इन द सेम बोट ब्रदर ...' फिर इसी गीत को असमिया में और बांग्ला में भी गाकर सुनाया - ‘आमि एखनरे नावरे यात्री, आमि यात्री एखनरे नावरे ...'।
उन्होंने विनीत होकर दर्शकों को प्रणाम किया। एक घण्टे तक मंत्रमुग्ध दर्शक उन्हें देख रहे थे - सुन रहे थे। इन दर्शकों में चार पीढ़ियां थीं - असम की चार पीढ़ियों के दिल में भूपेन हजारिका बसते हैं। प्रेम, विषाद, विरह, करुणा - हर रस के गीत को उन्होंने रचा है, जनमानस के मन में घुल-मिल गये हैं। यही कारण है कि केवल उन्हें एक बार देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

दो
8 सितम्बर, 1926 को भूपेन हजारिका का जन्म शदिया में हुआ। नाजिरा निवासी नीलकान्त हजारिका गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में पढ़ते थे और अपने सहपाठी अनाथबन्धु दास के घर में रहते थे। अनाथबन्धु अच्छे गायक और संगीतकार थे। सितार बजाते थे। टाइफाइड की वजह से केवल 23 वर्ष की उम्र में अनाथबन्धु की मौत हो गयी। अनाथबन्धु की मां ने अपनी बेटी शान्तिप्रिया का विवाह नीलकान्त हजारिका से करवा दिया। बी. ए. की पढ़ाई पूरी करने के बाद नीलकान्त हजारिका को शदिया के एम. ई. स्कूल में शिक्षक की नौकरी मिली। विवाह के दो वर्ष बाद ही भूपेन पैदा हुए।
तब शदिया अंचल ब्रिटिश पोलटिकल एजेण्ट के अधीन था। भूपेन के पिता पोलटिकट एजेण्ट के घर में ट्यूशन पढ़ाते थे। प्रसव के समय शान्तिप्रिया को काफी तकलीफ हुई थी। वहां के एकमात्र मेडिकल ऑफिसर को बुलाया गया। उसने कहा कि ‘फोरसेप डिलीवरी' करनी होगी। इसका मतलब था कि शिशु के सिर का आकार बड़ा था और सिर को तोड़कर प्रसव किया जाना था। डॉक्टर ने नीलकान्त हजारिका से पूछा था, ‘आपको बच्चा चाहिए या पत्नी ?' ‘सम्भव हो तो दोनों को बचा लें, नहीं तो बच्चे की मां को बचा लें।' नीलकान्त हजारिका ने जवाब दिया था। परन्तु सिर तोड़ने की जरूरत नहीं हुई। भूपेन हजारिका इस तरह दुनिया में आये।
असम के पूर्वी छोर में स्थित शदिया उस समय एक दुर्गम क्षेत्र था, जहां आदिवासी जनजाति के लोग रहते थे। भोले-भाले जनजातीय लोगों के साथ शिक्षक नीलकान्त हजारिका का आत्मीय सम्बन्ध था। सामान्य उपहारों के बदले जनजातीय लड़कियां शान्तिप्रिया के साथ घरेलू कार्यों में हाथ बंटाया करती थीं। लड़कियां बालक भूपेन को बहुत प्यार करती थीं।
पोलटिकल एजेंट को जब पता चला कि शिक्षक नीलकान्त हजारिका के घर पुत्र ने जन्म लिया है तो उसने लकड़ी की गाड़ी बच्चे को घुमाने के लिए उपहार के रूप में दिया। जनजातीय लड़कियां उस गाड़ी पर बालक भूपेन को घुमाती फिरतीं। एक दिन वे बालक को घुमाने ले गयीं तो शाम को लौटकर नहीं आयीं। रात हो गयी। नीलकान्त और शान्तिप्रिया चिन्तित और परेशान हो उठे। अगली सुबह लड़कियां बालक भूपेन को लेकर लौटीं। उन्होंने बताया कि बस्ती की औरतें उसे अपने पास रखना चाहती थीं। शान्तिप्रिया ने पूछा - ‘वह तो मां का दूध पीता है। दूध के बिना वह रात भर कैसे रह पाया ?' लड़कियों ने खिलखिलाकर उत्तर दिया - ‘बस्ती की कई औरतों ने भूपेन को अपना दूध पिलाया।'
भूपेन हजारिका की नानी ने एक दिन सपना देखा। नानी ने बताया - ‘मैंने एक सपना देखा है। मेरा पुत्र अनाथबन्धु दुबारा शान्ति के गर्भ में लौट आया है। सपने में उसने मुझसे कहा - मां, तू क्यों रो रही है, मैं फिर तुम्हारे परिवार में लौटकर आ रहा हूं। अपनी बहन के गर्भ में आ रहा हूं। नानी जब तक जीवित रहीं, वह भूपेन को अनाथबन्धु कहकर पुकारती रहीं।

(क्रमशः अगले अंकों में जारी....)


जूता चलता है

डॉ० कान्ति प्रकाश त्यागी


आओ दोस्तों,तुम्हें सुनाएं जूते की महिमा
जिसका चल रहा, उसकी ही होती गरिमा
रूस के थे ख्रुश्चेव निकेता
यू०एन०ओ० में रखा जूता
मन चलों को करना पड़े हैंडिल
उन्हें दिखाओ, सिर्फ़ एक सैंडिल


गली मोहल्ले में करे, कोई उल्टा काम
उसको तो न बचा सकते जय श्रीराम
अर्ध बाल मुंडन,काला मुंह, गर्धभ सवारी
गली गली में देखें तमाशा, नर और नारी


कभी कभी ऐसा भी होता
बगैर गलती के पड़ता जूता
जिसका जूता, उसी का सर
भाई झूठ नहीं है रत्ती भर


खोला होगा, आगरे में मानसिक दवाखाना
फिर खोलना पड़ा होगा, जूतों का कारखाना
यदि मरीज काबू न आएं
जूते दिखाकर अन्दर लाएं
पड़ते जिसे, मिरगी के दौरे
जूता सूंघा कर होते थोरे


कुछ निपुण हैं, करने में तेल मालिश
कुछ बन गए बड़े, करके बूट पालिश
एक दूकान पर लगी जूतों के सेल
घुसने को हो रही जनता, पेलम पेल
आप एक जोड़ी खरीदेंगे
तो एक जोड़ी फ़्री पड़ेंगे
छोटा पहनिए, काटेगा जूता
बड़ा पहनो, तो बांधो फ़ीता


ग्राम सभाएं, जन सभाएं
राज सभाएं, लोक सभाएं
विधान सभाएं, चुनाव सभाएं
बताओ, कुछ ऐसी सभाएं,
जहां चले न हो जूते
बात, बेबात पर न
कितनों के सर फूटे


कहीं लूट पाट, कहीं धमाका,कहीं हड़कम
कही मारपीट, कहीं धरना, कहीं जूत पत्रम
नेता हो या अभिनेता
हर कोई चला रहा जूता


बाज़ारों में, गलिहारों
मन्दिर,गुरुद्वारों में
नुक्कड़ , चौपालों में
हलवाई, गोपालों में
केवल एक शस्त्र चलता
शस्त्र सिर्फ़ होता जूता


करना किसी को सभा मॆं हूट
श्रोतागण फ़ेंके, टूटे चप्पल बूट
श्रोतागण, नंगे पैर मंदिर जायें
जूते चप्पल पहन कर आयें


प्रभु बोले,मैं न अयोध्या जाऊं
कहा भरत ने, तो मैं प्राण गवाऊं
अनुज, तुम्हें कैसे समझाऊं
राज करो, ले जाओ खड़ाऊं


भगवान राम पहने होते जूते
निषाद केवट कैसे पग धोते
यदि सुदामा पहन कर गए होते जूते
क्यूं, करुणाकर नयन जल से पग धोते


जिह्वा तो सब कुछ कर अन्दर घुसती
बिना भाव के ,खोपड़िया पर जूती पड़ती
कानपुरी,कोल्हापुरी,जोधपुरी,एक्शन
पेशावरी,रेबोक,लिबर्टी,नाइक,फ़ेशन


जूतों में नाम पा गए बाटा
नेनों ले कर अब आये टाटा
अगर जूते न चुराती साली
कैसे बनती आधी घरवाली
कुछ अपराध में ऎसे शातिर
धर लिए गय़े, जूते की खातिर


बेटे को आने लगे, बाप का जूता
समझो उसको भाई, न केवल बेटा
मज़बूरी में एक बाप, जूते पर रखता पगड़ी
दूसरा बाप, जूते की ठोकर से उछाले पगड़ी


कुछ को जूते रखने का इतना शौक
तरह तरह के , जूतों का रक्खा स्टोक
इसलिए कहता हूँ, जूतों पर रक्खो ध्यान
न जाने कब करना पड़े, तुम्हें, इन्हें प्रणाम
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(चित्र - साभार ज्ञानदत्त पाण्डेय की मानसिक हलचल)

कविता

फ़िर गलती हो गई

- रचना श्रीवास्तव
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होली के हुडदंग मे
हो गई भूल हमसे भारी
बीवी समझ रंग लगा जिसको
वो निकली पड़ोसन हमारी
मारा सर पे हाथ कहा-
बहनजी गलती हो गई

खेलते खेलते देखा
भीग गई थी बुरी तरह ,
श्रीमती जी हमारी
फगवा की थी उमंग
प्रेम की उठी तरंग
हाथ पकड़ के बोला
जा के कपड़े बदल लो प्यारी
हाथ छोड़ डैमफूल
मै हूँ शरमा जी की नारी
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

लगी थी मेज पे
गुझियों की क्यारी
एक खाया दो खाया
खाता गया
औए खा ली ढेर सारी
थोडी देर मै सिर घूमा ,
हो गया भारी
किसी ने कहा
भाई साहब ये है भाँग की बीमारी
मारा सिर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई

भाँग का गहरा होता गया रंग
हम होते गए मगन
बेखयाली मे बोल गए
मीना मीना मै हूँ तुम्हारे संग
श्रीमती जी गरज के बोली
है ये मीना कौन ,चढा जिस के प्रेम का रंग
लो मै चली मैके
संभालो आपने छगन मगन
मेरी अब क्या जरूरत
उडाओं उसी के संग आपनी पतंग
मारा सर पे हाथ
कहा फ़िर गलती हो गई
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रचना श्रीवास्तव
डलास, अमेरिका

योगेन्द्र कृष्णा के काव्य संकलन 'बीत चुके शहर में' का लोकार्पण

 

पिछले दिनों प्रलेस के तत्वावधान में माध्यमिक शिक्षक संघ सभागार, पटना में संवाद प्रकाशन, मुंबई से प्रकाशित योगेन्द्र कृष्णा के काव्य-संकलन बीत चुके शहर में का लोकार्पण चर्चित वरिष्ठ कवि अरुण कमल के द्वारा किया गया. समारोह की अध्यक्षता समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने की. उनकी प्रतिनिधि कविताओं पर समालोचनात्मक टिप्पणी करते हुए अरुण कमल ने अपने वक्तव्य में कहा कि योगेन्द्र कृष्णा की कविताएं संपूर्ण हिंदी काव्य-परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ती हैं. उन्होंने कहा कि बीत चुके शहर में की कविताओं में आज का हिंसक होता सामाजिक परिदृश्य एक नए मुहावरे में उजागर हुआ है.

आयोजन की शुरुआत करते हुए कवि शहंशाह आलम ने कहा कि योगेन्द्र कृष्णा के इस रचनात्मक साहस को वे सलाम करते हैं.

इस अवसर पर समीक्षक ओम निश्चल ने पुस्तक की अंतर्वस्तु पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आठवें दशक से ही बिहार का काव्य-परिदृश्य काफी समृद्ध हुआ है. पुस्तक में संकलित कविताओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इनकी कई कविताएं मूल्यों के टूटने का दर्द बयान करते हुए वर्तमान समय को रूपांतरित करती हैं. यथार्थ को बुनने का उनका एक अपना तरीका है. वे नेपथ्य की गतिविधियों को संजीदगी से दर्ज करते हैं. उन्होंने कवि की सुबह के पक्ष में, हत्यारे जब बुद्धिजीवी होते हैं, हत्यारे जब मसीहा होते हैं, बीत चुके अपने शहर में, पूर्वजों के गर्भ में ठहरा समय, कम पड़ रहीं बारूदें तथा दिल्ली में पहली बार जैसी कविताओं की विशेष चर्चा करते हुए कहा कि इन कविताओं के माध्यम से कवि अपने समय के बड़े प्रश्नों से मुठभेड़ करता दिखता है. उन्होंने कहा कि अपनी कविताओं में योगेन्द्र बिलकुल ही नए एवं मौलिक मुहावरे के साथ प्रस्तुत हुए हैं. ये कविताएं इन्हें अग्रिम पंक्ति के समकालीन कवियों के बीच खड़ा करती हैं.

अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में समकालीन जनमत के प्रधान संपादक रामजी राय ने कहा कि योगेन्द्र कृष्णा ने अपनी हत्यारा सीरीज की कविताओं में समय की जो बारीकियां दर्ज की हैं वे बेहद दिलचस्प हैं.

समारोह का समापन कथाकार शिवदयाल ने अपने धन्यवाद-ज्ञापन के साथ किया. इस अवसर पर रवीन्द्र राजहंस, कुमार मुकुल, विनय कुमार, संजय कुमार कुंदन, भगवती प्रसाद द्विवेदी, सुधीर सुमन, जावेद हसन, एम के मधु, मुसाफिर बैठा, अरुण नारायण समेत शहर के अनेक सुधी पाठक, साहित्यकार एवं बुद्धिजीवी उपस्थित थे.

 

शहंशाह आलम, सचिव

प्रगतिशील लेखक संघ, पटना


दो कविताएं

- डॉ. शरद काळे

ओ मेरी अनुभूतियों

ओ मेरी अनुभूतियों,

समय से पहले ही प्रकाशित

हो जाने वाली पत्रिकाओं की तरह

यूँ असमय न फूटो

रहना है तो रहो

गर्भाशय में गर्भ की तरह मंद स्पंद

सड़ना है तो सड़ो

नौकरी में हुनर की तरह — अदुर्गंध

धुले हुए सूखते वस्त्रों में

जनानी अंगिया के स्पर्श मात्र से सिहरने वाले

किशोर की तरह यूँ शब्द स्पर्श से न सिहरो

सीमा पर सजग प्रहरी की तरह

करो आदेश का इंतजार

कंधों पर अपने रखे शब्द हथियार निर्विकार

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कविता लिखते हो

कविता लिखते हो, लिखो, निभा पाओगे क्या

सविता रखते हो, प्रभा सह पाओगे क्य़ा

दर्द कर्ज लेना पड़ता है कविता लिखना खेल नही,

लटका ' एयर बैग ' सफर पर निकलें ये वो रेल नही

यह ठीक, पास है टिकट, पहुँच पाओगे क्या

कई चाबियों के गुच्छे हैं, ताले फिर भी खुल न सके

डाली खेंची कई, उमर कट गई, मगर ये कट न सके

इस तरह भेद हैं कई समझ पाओगे क्या

शब्द-शब्द को लिखने में तो रक्त जलाना पड़ता है

हाड़ मांस सब जलता है तब थोड़ा अर्थ उजलता है

तुम पहले से कंकाल यज्ञ में डालोगे क्या

लोग यहाँ सब के सब कविता लिखने की तैयारी में

समय निकल जाता है उनसे बीज़ न डलता क्यारी में

छिन जाता है आखिर खेत, गँवा यूँ ही दोगे क्य़ा

कविता लिखने की तैयारी कुछ लोगों ने अभिनव की

पैसा, घुड़की, भोग हजम कर चर्बी कर दी अनुभव की

चर्बी में तुम यूँ व्यथा बदल पाओगे क्या

कविता लिखते हो लिखो, निभा पाओगे क्या

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(स्व.) डॉ शरद काळे की प्रस्तुत रचनाएं नीला अंबर कविता संग्रह से, - साभार, प्रस्तुति: आशा जोगेळकर

प्रेम जनमेजय जैसे ‘खतरनाक’ रचनाकारों से सावधान रहना चाहिए क्योंकि इनकी दृष्टि बहुत पैनी है । - कन्हैयालाल नंदन

‘कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण

-प्रवीण शुक्ल
कार्यक्रम संयोजक ‘अक्षरम्’

‘‘ व्यंग्य लेखन एक बहुत कठिन कर्म है जिसमें अपने को छिपाने की चतुराई नहीं चलती है । व्यंग्य लेखन और आत्मकथा लेखन में चतुराई नहीं चलती है । आप व्यंग्य के माध्यम से ऐसी मार करते हैं जो मार हो और लगे भी नहीं । प्रेम जनमेजय अपने लेखन के द्वारा ऐसा ही कठिन कर्म कर रहे हैं ।’ ये उद्गार प्रसिद्ध आलोचिका निर्मला जैन ने प्रेम जनमेजय के, ‘अक्षरम्’ द्वारा हिंदी भवन दिल्ली में आयोजित, ‘ग्रंथ अकादमी’ द्वारा सद्यः प्रकाशित व्यंग्य संकलन ‘कौन कुटिल खल कामी’ का लोकार्पण करते हुए व्यक्त किए । उन्होंने सबसे पहले लेखक को बधाई दी कि वह रचना के अकाल से बाहर निकल आया है । उन्होंने लेखक की इस बात की भी प्रशंसा की कि उसमें ईमानदारी जिंदा है और इसी ईमानदारी के तहत उसने भूमिका में अपने रचना-अकाल से संघर्ष करने में रवींद्र कलिया और ज्ञान चतुर्वेदी के सहयोग को रेखांकित किया है । प्रेम जनमेजय के व्यंग्य अपने प्रहार में निष्ठुर हैं पर उनमें मानवीयता निरंतर बनी हुई है । निर्मला जेन ने प्रेम जनमेजय के लेखकीय फक्कड़पन की प्रशंसा भी की ।



मुख्य अतिथि डॉ. कन्हैयालाल नंदन ने कहा कि प्रेम जनमेजय जैसे ‘खतरनाक’ रचनाकारों से सावधान रहना चाहिए क्योंकि इनकी दृष्टि बहुत पैनी है । इनकी कलम ईमानदार कलम है जो अपनी विसंगतियों पर भी बेहिचक प्रहार करती है । वे दिशायुक्त प्रहार करते हैं और निरर्थक बहकते नहीं हैं । उन्होंने कहा कि कुटिल खल कामी के गर्मागर्म बाजार में कौन नंगई कर रहा है और कौन इस सबमें उजला दिख रहा है इसका ज्ञान यह संकलन देता है । ज्ञान चतुवेर्दी ने कहा कि मैं इस संकलन को एक उपन्यास की तरह, बहुत सारे काम छोड़कर, एक ही सिटिंग में पढ़ गया, यह किताब की ताकत को बताता है । प्रेम जनमेजय ने इस किताब के द्वारा नई जमीन तोड़ी है और सही जगह तोड़ी है । प्रेम ने रेत में बीज डालने का काम किया है । उन्होंने अपनी सोच को तोड़कर बाहर आने का प्रयास किया है । प्रदीप पंत ने प्रेम जनमेजय की मुहावरेदार भाषा और विषय वैविध्य की प्रशंसा की । उन्होंने कहा कि प्रेम जनमेजय उन गिने चुने व्यंग्य लेखकों में हैं जो तात्कालिक घटनाओं पर मात्र व्यंग्यात्मक टिप्पणियां नहीं करते हैं अपितु दूर तक मार करने वाली रचना का सृजन करते हैं । और यही कारण है उनकी रचनाओं में नेताओं पर व्यंग्य कम हैं । हरीश नवल ने कहा कि प्रेम का व्यंग्य प्रयोजनीय व्यंग्य है । प्रेम ने भूमिका में अपने जिस अकाल की चर्चा की है, वो अकाल नहीं है बहुत दिनों से जिस जमीन पर कोई फसल नहीं उस जमीन के अधिक उर्वर होने की प्रक्रिया है । ये परती के बाद की परती-कथा है । प्रेम जनमेजय जैसा भाषिक प्रयोग हमारे समय के व्यंग्यकारों में बहुत कम है । दिविक रमेश ने कहा कि प्रेम जनमेजय उन गिने चुने व्यंग्यकारों में से हैं जिन्होंने व्यंग्य को फूहड़ होने से बाचाया है । भाषा पर इनकी पकड़ बहुत गहरी है । प्रेम जनमेजय की रचनाओं में एक तरह की महाकाव्यात्मकता है । ये खतरा मोल लेते हुए व्यंग्य करते हैं और स्वयं को भी कटघरे में रखते हैं । प्रेम की रचनाओं में हास्य की कमी है और ये व्यंग्य के साथ हास्य का घलमेल कम ही पसंद करते हैं और यही कारण है इनका हास्य भी चुटीला होता है ।



इस अवसर पर गद्य व्यंग्य पाठ का भी आयोजन किया गया जिसमें विष्णु नागर, ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जनमेजय, प्रदीप पंत, हरीश नवल,राजेश कुमार ने अपनी रचनाएं पढ़ीं । कार्यक्रम का संचालन राजेश कुमार ने किया और धन्यवाद ज्ञापन अक्षरम् के अध्यक्ष अनिल जोशी ने किया । कार्यक्रम में प्रभाकर श्रोत्रिय, बालस्वरूप राही, शेरजंग गर्ग, अनूप श्रीवास्तव, प्रताप सहगल, प्रभात,नरेंश शांडिल्य, वीरेंद्र सक्सेना, जगदीश चंद्रिकेश, सुभाष चंदर मनोहर पुरी, पुष्पा राही, के0पी0सक्सेना ;दूसरे, ललित लालित्य समेत सौ से अधिक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे ।


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कौन कुटिल खल कामी

व्यंग्य संग्रह

व्यंग्यकार : प्रेम जनमेजय

प्रकाशक - ग्रंथ अकादमी, 1659, पुराना दरियागंज, दिल्ली 2

मूल्य - 200.00

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जीवन के तीन रंग

-डॉ. ओम प्रकाश एरन

(1)

धर्मराज ने राशन की दुकान पर पूछा-

उत्तर मिला “घासलेट अभी नहीं आया”

कुछ दिनों बाद पूछा उत्तर मिला-

“बीस तारीख तक आएगा”

बीस तारीख को गए तो कहा-

“कब से समाप्त हो गया, आप इतने दिन कहां थे?”

इसके बाद धर्मराज परिवार सहित

हिमालय की ओर चले गए

-----.

(2)

कालू रोज स्कूल आता है

काश टीचर भी रोज आते

कालू को रोज मिलता है चपरासी

वह उसी से बात करता रहता है

नियमित स्कूल आने का फायदा हुआ

वह बीड़ी पीना सीख गया

एक दिन टीचर आए

कालू को बुलाया

बोले, “तू पास है

ला, एक बीड़ी मुझे भी पिला

तेरी बीड़ी कुछ खास है.”

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(3)

नेताजी खिड़की के पास बैठकर

सुस्ता रहे थे

एक कव्वा कहीं से आया

अपना परम्परागत गाना गाया

फिर नेताजी से पूछा-

“मजा आया?”

नेताजी कव्वे को भगाते हुए बोले-

“न सुर, न ताल, न अक्ल

हमारे सामने हमारी ही नकल?”

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संपर्क:

शास्त्री नगर, रतलाम, मप्र. 457001

(साभार, साप्ताहिक उपग्रह, रतलाम. चित्र – कृष्णकुमार अजनबी की कलाकृति)


 फाग


-महेंद्र भटनागर




फागुन का महीना है, मचा है फाग
होली छाक छाई है; सरस रँग-राग !

बालों में गुछे दाने, सुनहरे खेत
चारों ओर झर-झर झूमते समवेत !

पुरवा प्यार बरसा कर, रही है डोल
सरसों रूप सरसा कर, खड़ी मुख खोल !

रे, हर गाँव बजते डफ़ मँजीरे ढोल
देते साथ मादक नव सुरीले बोल !

चाँदी की पहन पायल सखी री नाच
आया मन पिया चंचंल सखी री नाच !

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होली


नाना नव रंगों को फिर ले आयी होली,
उन्मत्त उमंगों को फिर भर लायी होली !

आयी दिन में सोना बरसाती फिर होली,
छायी निशि भर चाँदी सरसाती फिर होली !

रुनझुन-रुनझुन घुँघरू कब बाँध गयी होली,
अंगों में थिरकन भर, स्वर साध गयी होली !

उर में बरबस आसव री ढाल गयी होली,
देखो, अब तो अपनी यह चाल नयी हो ली !

स्वागत में ढम-ढम ढोल बजाते हैं होली,
हो कर मदहोश गुलाल उड़ाते हैं होली !

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समता का गान [परिप्रेक्ष्य होली]




मानव समता के रंगों में
आज नहा लो !

सबके तन पर, मन पर है जिन चमकीले रंगों की आभा,
उन रंगों में आज मिला दो अपनी मंद प्रकाशित द्वाभा,
युग-युग संचित गोपन कल्मष
आज बहा दो !

भूलो जग के भेद-भाव सब — वर्ण-जाति के, धन-पद-वय के,
गूँजे दिशि-दिशि में स्वर केवल मानव महिमा गरिमा जय के,
मिथ्या मर्यादाओं का मद-गढ़
आज ढहा दो !

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आओ जलाएँ [संदर्भ होली]

आओ जलाएँ
कलुष-कारनी कामनाएँ !

नये पूर्ण मानव बनें हम,
सकल-हीनता-मुक्त, अनुपम
आओ जगाएँ
भुवन-भाविनी भावनाएँ !

नहीं हो परस्पर विषमता,
फले व्यक्ति-स्वातंत्र्य-प्रियता,
आओ मिटाएँ
दलन-दानवी-दासताएँ !

कठिन प्रति चरण हो न जीवन,
सदा हों न नभ पर प्रभंजन,
आओ बहाएँ
अधम आसुरी आपदाएँ !

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(चित्र, साभार सजीव सारथी)


होली पर्व पर विशेष

कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी ।

-ऋषि कुमार शर्मा

वृषभान लली राधा और देवकी नंदन कृष्ण की प्रेम भरी पिचकारियों से लबालब ब्रज की होली विश्व–विख्यात हैं । आज भी बड़ी धूमधाम से संपूर्ण ब्रज में होली मनाई जाती है । बदली हुई परिस्थितियों और समय – चक्र की गतिशीलता ने हो सकता है होली के रंग कुछ फीके कर दिए हों ;किन्तु आज भी ब्रज के रसिया, ब्रज की होली में उसी प्रेम और प्रीति के दर्शन करते हैं जो कि रति किशोरी श्री राधिका और नंदलला श्री कृष्ण के हृदय में व्याप्त थी ।

ब्रज की होली में नन्दगॉव और बरसाने की लठामार होली विश्वविख्यात है ।इस होली की अपनी अनूठी विशेषता हैं जो अन्य स्थानों की होली परम्पराओं से भिन्न हैं । नंदगॉव और बरसाने की होली में भी, बरसाने की होली अधिक रंग–रंगीली होती हैं। बरसाना वृषभानु नन्दिनी राधा का गॉव, नन्दगॉव कृष्ण कन्हैयॉ का गॉव हैं। संभवत: यही एकमात्र कारण हैं कि नन्दगॉव का प्रत्येक व्यक्ति बरसाना को अपनी ससुराल समझाता है और बरसानें के पुरूष अपने में सखी भाव की मान्यता रखते है।

फाल्गुन शुक्ला नवमी को बरसाने मे लट्ठमार होली खेली जाती हैं। जिसमे नन्दगॉव के सखा और बरसाने की गोपिकाएँ प्रतीक रूप में स्त्री–पुरूष होली खेलते है । कोई नहीं जानता कि कितने समय से बरसाने का कण–कण नन्दगॉव के कृष्ण–कन्हैयॉ को होली खेलने का निमंत्रण देता चला आ रहा है ।

‘‘अइयों–अइयों रे कन्हैया नन्दलाल रंगीली होली में

दुल्हन प्यारी राधिका रे ,दूल्हा नंदकुमार’’

बरसाने के इस सामूहिक निमंत्रण के अतिरिक्त राधा भी अपने कृष्ण को बरसाने आने का निमंत्रण दे रही हैं।

कान्हा बरसाने में आइ जइयों, बुलाइ गई राधा प्यारी ।‘

नन्दगॉव के पुरूष बरसाना आकर होरी के रसिया और सखियॉ गाते हुए बरसाने की स्त्रियों को छेड़ते है । तब रंग–बिरंगी ओढ़नी और चुनरियों से ढकी हुई स्त्रियॉ उन पर लाठियों का प्रहार प्रारम्भ कर देती हैं। पुरूष अपने सिर पर सींग से बनी हुए ढाल से लाठियों का प्रहार रोकते हैं। इस लट्ठमार होली से पूर्व बरसाने के भव्य श्री जी के मंदिर में नन्दगॉव और बरसाने के गोस्वामियों में मान–अभिमान,अनुराग और उल्लास से परिपूर्ण संगीत में उत्तर–प्रत्युत्तर होते हैं।

होली के दिन नन्दगॉव का प्रत्येक पुरूष अपने का रसिया कृष्ण और बरसाने की प्रत्येक स्त्री अपने को राधा समझती हैं। इसी प्रेम–भावना में विभोर वे परस्पर ऐसी होली खेलते हैं कि रंग की फुहारों से ब्रज की धरती और उड़ते अबीर-गुलाल से आकाश ही नहीं उनके हृदय भी रंग जाते हैं।

एक ओर राधिका और दूसरी ओर कृष्ण जी हैं। दोनों ओर से पिचकारियॉ चल रही हैं और गुलाल पड़ रहा हैं। केसरिया रंग में रंगे हुए विविध स्नेह रंगों से ऐसी झर लग गई हैं। मानों बरसाने में वर्षा ने झड़ी लगा दी हैं ।

उत तें कन्हाई लरिकाई के सखन लीन्हें,

करि चतुराई केलि होरी की मचाई है।

इत वृषभान की कुमारी सुकुमारी प्यारी,

आली गन आली में रसीली सी सोहाई है।।

बरसाने की होली का एक अन्य कवि नें इस प्रकार चित्रण किया हैं:–

होरी होरी करत अबीर भरि झोरी लीन्हें,

खोरी -खोरी फिरैं ग्वाल ,बाल समुदाई है ।

कीरति किसोरी संग गोरी -यूथ, यूथ मिलि,

भरी अनुराग फाग स्यामा सो मचाई हैं ।

केसर के रंग साने सुरंग नेह सरसाने

मानों बरसाने बरसाने झरि लाई है ।

एक और कवि का चित्रण इस प्रकार है:–

होरी के सुजान रची आली सुरु स्यामा–स्याम,

केसर अबीर लें गुलाल नीर घोरी हैं।

राधा और कृष्ण की परस्पर प्रीति तथा विनोद का बरसाने की होली में मूर्त रूप प्रस्तुत हो उठता हैं। बरसाने की होली मे जो रस बरसता हैं, उसे प्राप्त करने के लिए देवता भी उत्कंठित रहते हैं :– ‘‘ जो रस बरसाने में, वो रस बैकुण्ठ में नॉय । ’’ और इसीलिए कहा जाता हैं कि बरसाने की होली देखने के लिए सूर्य का रथ भी कुछ समय के लिए रुक जाता है, और शायद बरसाने में सूर्य कुछ अधिक समय पश्चात अस्त होता हैं।

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होली की प्रासंगिकताः

घातक मनोभावों से मुक्ति का पर्व है रंगोत्सव

-सीताराम गुप्ता

होली एक ओर तो बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाई जाती है तो दूसरी ओर रंगों तथा हास्य के पर्व के रूप में भी। कुछ लोगों को इस पर्व के फूहड़पन या अमर्यादित हुड़दंग पर आपत्ति है तो कुछ इसे अश्लील पर्व की संज्ञा भी देते हैं क्योंकि इस पर्व में कई बार सामान्य शिष्टाचार की सीमाओं का अतिक्रमण भी हो जाता है। इस प्रकार होली विशेषरूप से फाग या रंगोत्सव, जो होलिका दहन की रात्रि के पश्चात् अगले दिन मनाया जाता है, मनाने या खेलने की विधि को लेकर विभिन्न विचारधाराएँ देखने-सुनने में आती हैं। लेकिन क्या वास्तव में रंगों से खेलने का ये त्यौहार अश्लील या असभ्य कहा जा सकता है? यदि ध्यानपूर्वक अवलोकन करें जो जीवन में ऐसे क्षणों की भी आवश्यकता है जब हम अपने मन में समाए घातक मनोभावों अथवा विकारों से मुक्त हो सकें। होली का हुड़दंग हमें ये अवसर उपलब्ध कराता है। इस अवसर पर हमारे अवचेतन मन में एकत्र विकृत भाव या विकार किसी भी रूप में बाहर निकल कर हमें तनावमुक्त कर प्रफुल्लित बना देते हैं।

रंगों का हमारे मनोभावों पर और हमारे मनोभावों का हमारे शरीर पर गहरा असर पड़ता है। होली के अवसर पर हर व्यक्ति अपने पसंदीदा रंग ख़रीदकर दूसरों पर लगाता है जिससे उसे आनन्द की अनुभूति होती है और यह आनंदानुभूति अनेक व्याधियों के उपचार में सहायक होती है। होली का गहरा संबंध हास्य से भी है क्योंकि होली के रंगों से हास्य की सृष्टि होती है। रंगों और कीचड़ से पुते चेहरे हास्य की सृष्टि में सहायक होते हैं। दूसरों को रंगने या मूर्ख बनाने की चेष्टा में ख़ुद ही रंगा जाना तथा मूर्ख बन जाना, रंग लगाने के बहाने थोड़ी छूट लेने के प्रयास में पकड़े जाना और उपहास का पात्र बनना ये सब क्रिया-कलाप करने वालों को स्वयं और देखने वालों को भी गुदगुदाते हैं। और हास्य में जो उपचारक शक्ति होती है वह किसी से छुपी नहीं है। हँसना न केवल एक अच्छा व्यायाम है जो गले से उपर के सभी अंगों ओर मांसपेशियों की जकड़न को दूर कर देता है अपितु यह ध्यान का ही एक रूप है। ध्यान अर्थात् एक बिन्दु पर चेतना की एकाग्रता। जब हम हँसते है तो सोच नहीं पाते। जब हम अन्य कोई भी कार्य करते हैं तो ध्यान के कार्य से भटकने की आशंका रहती है और ऐसे में कार्य की संपूर्णता में बाधा उत्पन्न हो जाती है। ध्यान को कार्य पर एकाग्र करना ही सफलता की गारंटी है। हँसने के दौरान ध्यान वि शृंखलित नहीं होता। चिंतन रुक जाता है। बाह्म संसार से कुछ क्षणों के लिए कट जाने के कारण तनाव से मुक्त हो जाते हैं। हँसने के दौरान शरीर में जिन लाभदायक हार्मोंस का उत्सर्जन होता है वे न केवल तनाव को समाप्त करते हैं अपितु शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता का विकास कर हमें स्वस्थ बनाए रखने में भी सहायक है। होली हास्य के माध्यम से रूपांतरण की प्रक्रिया ही तो है।

होली के हुड़दंग का लाभ उठाते हुए हम ऊल-जलूल हरकतें करते हैं। करनी भी चाहिएँ। यह हरकतें हमें विकारों से मुक्त करने में सहायक होती है। विकारों से मुक्ति का अर्थ है नये भाव से जीवन की शुरूआत। होली ही एक ऐसा पर्व है जो हमें पुराने, ख़राब, तनावपूर्ण संबंधों और नकारात्मक दृष्टिकोण तथा निराशावादिता को तिलांजलि देने का अवसर प्रदान करता है। होली के रंगों और हुड़दंग के माध्यम से जीवन में व्याप्त निराशाजनक विचारों से मुक्त होकर नये आशावादी विचारों के साथ उत्साहपूर्ण जीवन की शुरूआत संभव है। ये व्यक्ति के पुनर्जन्म जैसी अवस्था है।

हँसी मजाक़ या गाली-गलोच के माध्यम से ही सही होली एक ऐसा अवसर है जो हमें अपनी भड़ास निकालने का अवसर प्रदान करता है। एक तरह से इस दिन पिछले पूरे साल की क्षतिपूर्ति का अवसर मिल जाता है। परिचितों के मध्य संबंध सुधारने या मनमुटाव दूर करने तथा अपरिचितों से नये संबंध बनाने का ये एक अच्छा अवसर है। होली ही एक ऐसा त्यौहार है जब कोई बुरा नहीं मानता। किसी को रंगों से सराबोर कर दीजिए ओर बदले में उससे मित्रता स्थापित कर लीजिए। कई बार गाल पर एक चुटकी गुलाल कमाल कर देता है।

भारत एक पुरुष प्रधान देश है। पुरुषों और स्त्रियों की सामाजिक स्थिति और उनके अधिकारों में काफी अंतर है। स्त्री को प्रायः क़दम-क़दम पर दबना पड़ता है। घर में भी बाहर भी। होली के अवसर पर विशेष रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण अंचलों में होली खेलते समय स्त्रियाँ पुरुषों पर कोड़े या डंडे बरसाती है। ब्रज की फूलों की होली के साथ-साथ नंदगाँव और बरसाने की लट्ठमार होली भी बहुत प्रसिद्ध है। इस अवसर पर स्त्रियाँ पुरुषों से साल भर का बदला ले लेती है। वास्तव में शोषित वर्ग को उसके विकारों और हीन भावनाओं से मुक्ति प्रदान करने का पर्व भी है होली।

प्रायः वसंत ऋतु के मध्य में यह पर्व मनाया जाता है। इस दौरान प्रकृति में भी ख़ास परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। एक तरफ धरती रंग-बिरंगे फूलों से लद जाती है तो दूसरी तरफ ऐसी वनस्पतियाँ और पेड़-पौधे भी हैं जो अपना पुराना लिबास उतार फेंकते हैं और निपट नंगे हो जाते हैं। ये सब होता है मौसम के कारण। मौसम में परिवर्तन तथा उसके प्रभाव से प्रकृति में परिवर्तन। इसी तरह व्यक्ति के मनोभावों में परिवर्तन से संभव है उसके भौतिक शरीर में परिवर्तन। होली इस परिवर्तन का अवसर प्रदान करती है। प्रकृति के परिवर्तन को देखें और उससे तादात्म्य स्थापित कर प्रेरणा ग्रहण करें। मौसम का बदलना अनिवार्य घटना है। जब मौसम का बदलना अनिवार्य है तो मनुष्य का बदलना भी अनिवार्य है। हम भी बदलें। अपने अंतर्मन में समाए घातक मनोभावों से मुक्त हो जाएँ। जिस प्रकार पेड़ अपनी पुरानी पीली पड़ गई पत्तियों को फेंक नई पत्तियाँ धारण कर पुनर्जन्म पाता है हम भी नकारात्मक भावों से मुक्त होकर सकारात्मक भावों का विकास कर नये जीवन में प्रवेश करें। परिवर्तन के अभाव में ये विकास ये पुनर्जन्म संभव नहीं।

होली एक ऐसा पर्व है जो दूषित मनोभावों से मुक्त कर सकारात्मक परिवर्तन का आधार प्रस्तुत करता है। प्रायः हमारे सभी पर्व चाहे वो दशहरा-दीपावली हों या होलिका-दहन सभी बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में मनाए जाते हैं। असतो मा सद्गमय की कामना की जाती है। लेकिन जब तक मन में विकार मौजूद हैं जब तक कैसे ‘‘असतो मा सद्गमय’’ की ओर अग्रसर हो सकेंगे अथवा बुराई पर अच्छाई की विजय प्राप्त कर सकेंगे? सत्य और अच्छाई का संबंध तो मनाभावों से ही है अतः सकारात्मक परिवर्तन या रूपांतरण के लिए रंगों के इस पर्व में ग़ोता लगाकर विकार मुक्त होना अनिवार्य है। यही इसकी प्रासंगिकता है।

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संपर्क

सीताराम गुप्ता

ए.डी.-106-सी, पीतमपुरा,

दिल्ली-110034

ईमेल srgupta54@yahoo.co.in


"प्रवासिनी के बोल"

संपादकः डॉ॰ अंजना संधीर


प्रिय अंजना,
महिलाओं का तू चितवन है
सुंदर और सलोना मधुबन है
तेरी सोच व शीरीं सी बातें
कितना उनमें अपनापन है
तेरे स्नेह स्वरूप ये "बोल" मिले
तेरे श्रम का ही ये दरपन है.

-देवी नागरानी


डॉ॰ अंजना संधीर ने एक अनोखी विचार धारा को इस संग्रह के रूप में साकार करके अनूप और अनोखा स्वरूप दिया है और एक सूत्र में पिरोकर प्रस्तुत किया है, लग रहा है जैसे नारी जाति के सन्मान में एक नया मयूर पंख लगा है. उनका दृढ़ संकल्प ही इस काव्य संग्रह "प्रवासिनी के बोल" के रूप में प्रकाशित हो पाया है.
"ख़्याल उसका हरेक लम्हा मन में रहता है
वो शम्मा बन के मेरी अंजुमन में रहता है
मैं तेरे पास हूं, परदेस में हूं, खुश भी हूं
मगर ख़्याल तो हर दम वतन में रहता है." अंजना

अंजना जी के इस कथन में एक निचोड़ है, एक अनबुझी प्यास का अहसास जो सीने में कहीं न कहीं पनपता तो रहता है पर खिल नहीं पाता, खिलता है तो महक नहीं पाता, उस अनजान तड़प को उन्होंने शब्द दिये है "प्रवासिनी के बोल". भरी आंखों और तड़पती हृदय वेदना परदेस में रहने वालों की, उनकी कलम की नोक से पीड़ा स्वरूप बहती सरिता बन कर सामने आई है. मुझे अपनी एक गज़ल के चंद शेर याद आ रहे हैः

इल्म अपना हुआ तो जान गई
मैं ही कुरआन, मैं ही गीता हूँ.

है अयोध्या बसा मेरे मन में
वो तो है राम, मैं तो सीता हूं.

दर्द सांझा जो सबका है देवी
मैं उसी दर्द की कविता हूं.

अपने देश और संस्कृति से कट कर प्रवासी जीवन में जो उपलब्धि और विघटन होता है, उसे नारी ह्रदय महसूस करता है और भावनायें कलम का सहारा पाने से नहीं चूकती. जाने अनजाने में वो पद चिन्ह बनकर कहीं न कहीं अपनी छाप जरूर छोड़ जाती हैं, जो कभी न कभी साकार स्वरूप अख्तियार कर लेती हैं.
एक फिलासफ़र राल्फ वाल्डो एमरसन के शब्दों में " सीधा सीधा रास्ता पकड़कर न चलो, वहां चलो जहां कोई रास्ता या सड़क न हो. चलो और अपने पीछे एक पगडंडी छोड़ जाओ. " इस विचार धारा को अंजना जी ने स्वरूपी जामा पहनाने का प्रयास किया है अपने श्रम परिश्रम के बलबूते पर, और साहित्य साधना की इस नई पगडंडी पर नारी जाति के मनोबल व सामर्थ्य को एक मुकाम पर लाने का बखूबी प्रयास किया है.

सारा आकाश नाप लेती है
कितनी ऊंची उड़ान है तेरी. देवी

जो स्वप्न अभी तक आंखों में तैरता रहा, उसकी नींव इस किताब के रूप में रक्खी है. देश से बाहर परदेस में, भाषा के विरोधी वातावरण में, अपनी हिंदी भाषा को कविता के माध्यम से जिंदा रखना अनुकूल क्रिया है. भाषा को ज़िंदा रखना हमारा कर्तव्य है, क्योंकि यह हमारे पास, आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है . भाषा ज़िंदा है तो हम भी जिंदा रहेंगे. स्त्री मन को जागृत करके उसके मनोबल को पहचान देना एक साहस पूर्ण प्रयास ही नहीं, एक काबिले तारीफ कदम है, जो इतिहास के पन्नों पर उल्लेखनीय बन जाता है, और तो और भारत व अमरीकी हिंदी रचनाकारों के बीच एक सेतु बांधने का श्रेय भी उन्हें जाता है.

इसी प्रयास को अंजनाजी ने एक बागबान की तरह दिन रात की मेहनत से सींचकर एक महकते हुए मधुबन का स्वरूप देकर अमेरिका के नारी पक्ष को उजागर किया है. यहां पर वाली आसी साहब का शेर इस बात का संपूर्ण गवाह हैः

हमने एक शाम चरागों से सजा रखी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रखी है
हम भी अंजाम की परवाह नहीं करते यारों
जान हमने भी हथेली पे उठा रखी है.

उसी साहस और शालीनता का उदाहरण एक परिपूर्ण ग्रंथ (An anthology connecting the East & the West) के रूप में "प्रवासिनी के बोल" कुल मिलाकर ६२२ पन्नों के रूप में मनोभावों से भरपूर आपके सामने आया है, जिसमें यू़.एस.ए में रहने वाली ८१ अमरीकी भारतीय हिंदी कवयित्रियों की ३२४ कविताएं पहले भाग में दी गई हैं, हिंदी से जुड़ी ३३ प्रतिभाशाली महिलाओं का सचित्र परिचय दूसरे भाग में दर्शाया गया है, तथा तीसरे भाग में अमरीका में अब तक प्रकाशित महिला साहित्यकारों की प्रकाशित पुस्तक भी शामिल है. विदेश में रचा जा रहा साहित्य ही इस बात का प्रमाण है कि हम अपने देश से दूर जरूर है, पर देश हमसे दूर नहीं. दिल्ली से राजी सेठ का कथन है " भाषा के घेरे से परे रहकर अपनी भाषा की, देश से परे रहकर देश की, परिवेश से परे रहकर देश के रँग- रूप, तीज-त्यौहार. मिथिक -इतिहास को रचने की प्रेरणा इन्हें कौन देता होगा?" उनके उत्तर में मेरी ये दो पँक्तियाँ

हर नारी के ह्रदय की पुकार है, ललकार है.
दिल में देश बसाकर रखा हमने
धड़कन बनकर खुद हम बसते उसमें. देवी

हमारा घर, उसका वातावरण, दिन चर्या में हमारा चलन, आपसी व्यवहार, हमारी भाषा और संस्कृति को बरक़रार रखने के लिये हिंदी भाषा का अनुकूल उपयोग एक योगदान है. साहित्य के वरदान को अलग - अलग अनुभूतियों को भिन्न-भिन्न स्वरूप में से सजाकर इस संकलन में पिरोया गया है, जिनमें नारी हृदय के वात्सल्य के साथ करुणा, दया, प्रेम, सेवा के भाव लिये हुए अनेक मधुर ग़ज़ल, गीत, लोक गीत, कवितायें, तीज त्यौहार पर अपनी भावनाएं, अपने कोमल ह्रदय के ताने -बाने बुनते-बुनते कभी इन्हीं अहसासों को शब्दों का जामा पहना कर बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया है नारी के तसव्वुर को "वसुधा" के प्रकाशक व सम्पादक श्रीमती स्नेह ठाकुर ने बड़ी खूबी के साथ प्रस्तुत किया है, पः ६७

नारी

अश्क हूं
वक्त की पलकों पर टिकी हूं
लहर हूं
सागर की बाहों में थमी हूं
शबनम हूं
ज़मीं के आगोश में बसी हूं
चिंगारी हूं
शोला बन कर भड़की हूं
किरण हूं
सूरज में समाई हूं
लता हूं
तन के सहारे बढ़ी हूं
नदी हूं
कगार के बँधन में बँधी हूं
फूल हूं
काँटों से उलझी हूं
कोमल हूं
रुई के फाहों से सहेजी जाती हूं
धरती हूं
अंबर के चँदोबे तले फली फूली हूं
अबला हूं
पुरुष की संरक्षता में रहती हूं
नारी हूं
पुरुष व पुरुषार्थ की जन्मदात्री हूं.

नारी मन आकाश से ऊँचा व पाताल से गहरा होता है यही सत्य है, क्योंकि नारी जन्मदात्री है, हर हाल में अपना आपा बनाये रखती है कारण कुछ भी हो.

मेरी एक कविता "प्रदर्शन" का एक चित्र कुछ इसी तरह का है. पः २०३
दरिद्रता को ढाँपे
अपने तन के हर पोर में
वह नारी फिर भी,
कर रही है
प्रदर्शन अपना,
उन भूखी आँखों के सामने
जो आर पार होकर
छेद जाती है निरंतर
पर देख नहीं पाती
उस नारी का स्वरूप
जो एक जन्मदाता है
जीवन को बनाये रखती है
उसको सजाने के लिये
बलि तो दे सकती है
पर, ले नहीं सकती.

और सच तो यही है, एक कण कविता का एक युग को ज़ायकेदार बना सकता है, और भाव प्रकट करने का एक निर्मल माध्यम बन जाता. आनेवाली कई पीढ़ियों तक औरत जाति के नाम के साथ अंजनाजी का नाम भी जुड़ा रहेगा. इल्म का दान उत्तम दान है, इसके द्वारा विकास व प्रगति के कई नये रास्ते खुल जाते हैं, इस युग में वतन की मिट्टी से दूर निवास करने वाली भारत के हर कोने में बसने वाली नारी, जो विदेश में आ बसी है, इस "प्रवासिनी के बोल" में अपनी कलम की जुबानी अपने मन के भावों को, अपने अंदर पनपते अहसासों को जुबाँ दे पाई है. पर अंजना जी ने इन्हें एक सूत्र में बाँध कर एक महिला संगठन को एक नई रौशनी की नींव पर खड़ा किया है. इस आशावादी संकल्प के बल पर प्रवासी कवयित्रियों की रचनाओं में, उनकी देश से दूर रहने की वेदना, कुछ अमरीका की खट्टी -मीठी अनुभूतियां, मन में उठती हर भावपूर्ण लहर को खुले मन से कविता द्वारा प्रकट करने के लिये यह क्रियाशील प्रयास किया है.

फिलास्फर इलेन लाइनर का कहना हैः " अगर लेखक ये न लिखते कि उन्हें क्या महसूस हुआ तो बहुत सारे कागज़ ख़ाली होते". इसी सच को यदि सामने रखा जाय तो देखने को मिलेगा, उन कवित्रियों के मन का मंथन, उनके अंदर की कोमलता, दृढ़ता, वेदना, संघर्ष, दुख, सुख, यादों की परछाइयां, मजबूरियां, तन्हाइयों के साथ बातें करने का अनुभव, देश के प्रति उमड़ते उनके ज़ज़बे जिनको इसी किताब से चुनकर मैंने यहां प्रस्तुत किया हैँ. अँतरमन की वेदना कुसुम टँडन ने "बनवास" नामक कविता से छलकती हुई, पः १६५

रच गया एक इतिहास नया
फिर से इस नये ज़माने में
दे दिया है बनवास राम ने
माता पिता को अनजाने में.
॰॰
मेरी एक कविता "यादों का आकाश" यादों की दीवारों को खरोंच रहा है
मेरी यादों के आकाश के नीचे
दबी हुई है
मेरे जमीर की धरती,
थक चुकी है जो
बोझ उठाकर
अपने जेहन के आँचल पर
झीनी चुनरिया जिसकी
तार तार हुई है
उन दरिंदों के शिकंजों से
उन खूंखार नुकीली नजरों से, जो
शराफत का दावा तो करते हैं
पर,
दुश्वारियों को खरीदने का
सामान भी रखते हैं
बिक रहा है जमीर यहां
रिश्तों के बाजार में
बस बची है अंगारों के नीचे
दबी हुई कुछ राख
मेरे जिंदा जज्बों की
जो धाँय धाँय उड़कर
काला स्याह करती जा रही है
मेरे यादों के आकाश को.
॰॰
डा. प्रियदर्शिनी का अनुभव जिंदगी के बारे में उनकी ज़ुबानी, पः ३५

ज़िंदगी
नदी पर बना हुआ
लकड़ी का वह अस्थाई पुल है,
जिस पर हम
डगमगाते - डोलते
हिलोरें खाते
भयभीत
नीचे खाई में न झाँकने का प्रयास करते,
उस पार पहुँचने की ललक किये
चलते जाते हैं.
॰॰
बीना टोडी "मेरा अस्तित्व" में मन को टटोल रही है, पः३१२

करता है प्रश्न अचानक मेरा मन
साये से क्या वजूद है मेरा
या है अस्तित्व साये का मुझसे?
॰॰
अंजना संधीर के अपने अहसास कुछ यादों की परछाई बने हैं, पः ८४

चलो
एक बार फिर लिखें
खुशबू से भरे भीगे खत
जिन्हें पढ़ते पढ़ते भीग जाते हैं हम
इन्तजार करते थे डाकिये का हम
बंद करके दरवाज़ा
पढ़ते थे चुपके चुपके
वे भीगे ख़त तकिये पर सर रखकर.
॰॰

"फिर गा उठी प्रवासी" की रचनाकार लावन्य शाह, का कोमल मन झूमता हुआ. पः ४१५
पल पल जीवन बीता जाए
निर्मित मन के रे उपवन में
कोई कोयल गाये रे!
सुख के दुख के, पंख लगाये
कोई कोयल गाये रे!
॰॰
सारिका सक्सेना की कल्पना इंद्रधनुषी रूप धारण करती हुई उड़ रही है, पः४६०

तितली बन मन पंख पसारे
बिखरे रंग घनक के सारे.
शोख हवा से लेकर खुशबू
लिख दी पाती नाम तुम्हारे.
॰॰
मेरी अपनी एक आजाद कविता "सियासत" का अंग देश के जवानों को ललकार कर खून की लाली को चुनौती

दे रहा है कुछ इस तरह
ऐ जवानो ! तुम बचालो
बरबादी के इस अणु से
आबादियों को आतिशों से
उठ के आगे तुम बढ़ो, कर लो
सामना तूफान का
करो कुछ काम ऐसा
अमन और शोहरत से मिलो...
॰॰
रजनी भार्गव के कोमल मन के अछूते अहसास "अभिमान" से , पः ३७०

आँगन में किलकती वीरानियां
जब तुलसी के आगे लौ में सुलगती है
कार्तिक की खुन्नक और लौ की गरमाहट- सा है
ये अभिमान मेरा.
॰॰
इला प्रसाद की जुबानी "यह अमेरिका है" पः १२१

रात भर चमकता रहा जुगनू
रह रह कर
किताबों की अलमारी पर,
हरी रौशनी, जलती रही, बुझती रही
मैं देखती रही, जब भी नींद टूटी
सोचती रही
"कल सुबह पकड़ूंगी
रख लूंगी शीशे के ज़ार में,
जैसे बचपन में रख लेती थी!"

इतने अनोखे अहसास, माध्यम कविता. इस नए संचार की श्रृंखला शुरू करके अंजना जी ने बहुत ही गौरवपूर्ण उदाहरण कायम किया है. विश्व कवि रवींद्रनाथ का कथन, बरसों बाद भी उसी सच्च को ऐलान कर रहा है. वे कहा करते थे कि शांतिनिकेतन का रचनाशील विद्यार्थी जहां कहीं भी जायेगा वहां एक छोटा भारत निर्मित करेगा. याद आ रहा है कालिदास का "मेघदूत" जो सालों पहले पढ़ा था, मेघ अर्थात बादल जो दूत बनकर संदेशा ले कर आते है. अंजनाजी का सफलपूर्ण प्रयास कविता की जुबानी पूरब और पश्चिम के बीच का सेतु बनकर यही सरमाया देगा, और इसी नज़रिये से यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने अमेरिका में एक छोटा भारत निर्मित करने का सफल प्रयास किया है.

कहा जाता है, हासिल की हुई कामयाबी अगर जग को अच्छी लगती है पर अपने मन को नहीं भाती, तो वह अधूरी कामयाबी होती है. पर इस रचना को रचित करने में योगदान देने वाली हर नारी इस कामयाबी का हिस्सा है, जैसे एक परिपूर्ण परिवार का मिला जुला एक सफल यज्ञ है " प्रवासिनि के बोल". नई दिल्ली से डॉ॰ कमल किशोर गोयनका का कहना है " इस संकलन का सब से बड़ा कार्य यह है कि इतनी प्रवासी हिंदी कवयित्रियाँ पहली बार हिंदी संसार के सम्मुख आ रही हैं और इतनी प्रकार की अनुभूतियाँ हमें मिल रही हैं. मेरे विचार में यह प्रयास स्तुत्य है, स्वागत के योग्य है." इसी बात का समर्थन करते हुए मुझे भी ऐसे लगता है, इस किताब पर हर नारी के हृदय से निकले बोल "प्रवासिनी के बोल" के रूप में जी उठे हैं. इसी संदर्भ में, मैं सारी नारी जाति की तरफ़ से अंजना जी को हार्दिक धन्यवाद देती हूं, और शुक्रगुजार हूँ जो मुझे भी अपने इस क्रियाशील अनुभव में अपने स्नेह के धागे में पिरोकर सम्मानित किया है.
शुभकामनाओं के साथ

देवी नागरानी
न्यू जर्सी, यू.एस.ए
नवंबर ५, २००६
Email: devi1941@yahoo.com

अंजना संधीरः anjana_ sandhir@yahoo.com

होली का त्योहार मनायें, ले लेकर अबीर झोली में

प्रो. अश्विनी केशरवानी


होली केवल हिन्दुओं का ही नहीं वरन् समूचे हिन्दुस्तान का त्योहार है। इस त्योहार को सभी जाति और सम्प्रदाय के लोग मिल जुलकर मनाते हैं। इसमें जात-पात कभी आड़े नहीं आती। सारी कटुता को भूलकर सब इसे मनाते हैं। इसे एकता, समन्वय और सद्भावना का राष्ट्रीय पर्व भी कहा जाता है। होली के आते ही धरती प्राणवान हो उठती है, प्रकृति खिल उठती है और कवियों का नाजुक भावुक मन न जाने कितने रंग बिखेर देता है अपनी गीतों में, देखिए एक बानगी ः-

होली का त्योहार मनायें
ले लेकर अबीर झोली में
निकले मिल जुलकर टोली में
बीती बातों को बिसराकर
सब गले मिलें होली में
पिचकारी भर भरकर मारें
सबको हंसकर तिलक लगायें
आओ मिलकर होली मनायें।

होली का लोक जीवन से जितना गहरा सम्बंध है, उतना किसी अन्य त्योहार से नहीं है। इस त्योहार पर तो जीवन खुशी से उन्मत्त हो जाता है। वास्तव में ग्राम्य जीवन का उल्लास यदि फसल कटने के बाद नहीं बहेगा तो कब बहेगा ? घर धन-धान्य से भरा है और कोठी गौओ से। साल भर के बाद होली आई है पाहुन बनकर। यदि इसके आगमन पर खुशी नहीं मनाई जायेगी तो कब मनाई जायेगी..? ऐसे अवसर पर लोक जीवन खुलकर रंग रेलियां मनाता है, खुशी से बावला होकर नाचता और गाता है ः-

होली आई रे...
सरसंगी सपने दुलारती होली आई रे।
फागुन फाग सुनाता आया, गाये कोयलिया,
आम्र मंजरी छनन छनन झनकाये पायलिया।
अमलतास किंशुक ने मांग भरी बन देवी की
केसर कचारी की अंगराई पीली चुनरियां।
डालों के किसलय आंचल छू बेला बौराया
भरमाती कलियों को अलियों की तरूणाई रे।
कुमकुम और गुलाल भरे घन उमड़ घुमड़ छाये,
सुर धुन पिचकारी अंवर का तन नहलाये
संध्या के अरूणिम मुख पर
मल कालिख सूर्य भगा
शशि मेघों में छिपा कि काजर निशा न मल पाये।
होली आई रे...।

ग्राम्य जीवन में किसान नई फसल की बाली को भूनकर सामूहिक रूप से खाते और गाते हैं। छत्तीसगढ़ में धारणा है कि नये अन्न को खाने के पहले अग्नि देव को भेंट किया जाना जरूरी है। मानव ग्रह्य सूत्र में भी उल्लेख है कि 'नये अन्न को यज्ञ को समर्पित किये बिना न खायें‘ अग्नि में भूनी बालियों केा 'होला‘ या 'होलक‘ कहा जाता है। संस्कृत भाषा में भी अधपके भूने हुए अनाज को 'होलक‘ कहा जाता है। संभवतः इसी होलक को आधार मानकर इस पर्व को 'होली‘ कहा जाने लगा..?
रोजमर्रा की जिन्दगी से मुक्ति, आपाधापी से भरी जिन्दगी का एक रस, उबाऊ ढर्रा, पनपता विद्वेश, उफनती हिंसा, अपनों से दूरी, अभाव, अनमनापन, सब कुछ भुला देती है- होली, जब माथे पर लगता है अबीर और मन में चढ़ती है रंग की बौछार। हसरत रिसालपुरी फागुन के इस मदमाते रंग में डूबे हुए हैं। हौले हौले मुख पर अबीर और गुलाल लगाकर नयनों से नयन मिलाकर दूसरों को आत्म ज्ञान का संदेश दे रहे हैंः-

मुख पर गुलाल लाल लगाओ
नयनयन को नयनों से मिलाओ
बैर भूलकर प्रेम बढाओ
सबको आत्म ज्ञान सिखाओ
आओ प्यार की बोली बोले
हौले हौले होली खेले।


मुझे एक वाकिया याद आ रहा है, जब मेरी नई नई शादी हुई थी। मेरी नई नवेली धर्मपत्नी कल्याणी मायके में थी। ऐसी मान्यता है कि नई नवेली दुल्हनों को पहली होली मायके में मनानी होती है। इसी के चलते वह अपने मायके में थी । मुझे ससुराल में होली खेलने का आत्मीय आमंत्रण मेरी साली की ओर से मिला और मैं ससुराल में होली मनाने की ललक को नहीं रोक सका। ससुराल में मेरी अच्छी खातिरदारी हुई षायद नये दामाद होने के कारण ऐसा हुआ हो अथवा कल्याणी के साथ मेरी भी पहली होली थी। जो भी हो, रात्रि में हंसी ठिठोली के साथ भोजनादि से निबटकर मैं निद्रा देवी की गोद में समा गया। रात्रि में मधुर सपनों के कारण सुबह होने का आभास ही नहीं हुआ। पत्र-पत्रिकाओं में मैं अनेक रचनाओं में पढा था कि ससुराल की होली स्मरणीय होती है। बहरहाल, सुबह सुबह कल्याणी और मेरी एक मात्र साली चाय का प्याला लिए मुझे उठाने लगी। उनकी आवाज में मधुरता थी। लेकिन उनके मुख में दबी हुई हंसी रोके रूक नहीं रही थी, मेरी सह धर्मिणी भी उनका साथ दे रही थी। मुझे लगा कि रात भर में ऐसा क्या हो गया जिससे ये दोनों मुझे देखकर हंस रही हैं ? बेड टी तो मैं लेता था लेकिन मैं सोचा कि हाथ मुंह धोकर ही चाय पिया जाये अन्यथा ये लोग मेरे बारे न जाने क्या धारणा बना लें ? बहरहाल, जब मैं बेसिन में मुंह धोने के लिए जैसे ही दर्पण में अपना चेहरा देखा तो एक बारगी मैं अपने को ही नहीं पहचान सका। मैंने देखा कि मेरे चेहरे में कालिख पुती हुई है और मूंछे बनी है। मैं भी अपनी हंसी को नहीं रोक पाया। मेरी हंसी सुनकर मेरी सासु जी भी वहां पर आ गयी। मेरा चेहरा देखकर वे भी हंस पड़ी। लेकिन छत्तीसगढ़ में दामाद के सामने परहेज किये जाने का विधान है। शायद इसी कारण वह अपनी हंसी को रोकर कल्याणी और इंद्राणी को डांटने लगी। लेकिन 'बुरा न मानो होली है' के साथ सबकी हंसी छूट गयी। मैंने चाय पी और कुछ देर बाद मुझे लगा कि चाय में कुछ मिलाया गया है। बार बार मस्ती और हंसी से मुझे अंदाज हो गया कि चाय के साथ भांग पिलाया गया है। फिर तो हम दिन भर होली खेलते रहे। नजीर अकबराबादी होली की रंगीनियां कुछ यूं पेश करते हैं ः-

नजीर होली का मौसम जो जग में आता है
वह ऐसा कौन हो जो होली नहीं मनाता है।
कोई तो रंग छिड़कता है, कोई गाता है
जो खाली रहता है, वह देखने को जाता है
जो ऐश चाहो, कि मिलता है यारों होली में।

मीठी मीठी प्यार की बोली बोलना मनुष्य सीख ले तब कहां हो दंगा-फसाद और लडाई-झगड़े। तब तो बस होली ही होली है। साहिर ने भी होली के इस सुहाने नजर और लुभावने पन को बडी गहराई से आत्मसात किया है। अकबरावादी की शायरी में चटकीली होली और उसका रंग ऐसे दिखता है जैसे शीशे में छलकता जाम हो ः-

जब फागुन रंग झमकते हों,
तब देख बहारें होली की।
और दम के षोर खडकते हों
तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों
तब देख बहारें होली की।

होली में जगह जगह फाग गाये जाते हैं। फाग में प्रणय, बिछोह, हर्श और उत्साह का समावेश होता है। फाग का मौसम याने रंग गुलाल और अबीर की बौछार का मौसम। इस वक्त हर कोई खुशी में मस्त और रंगों में रंगा होता है। इस रंग में बिस्मिल भी रंगे हुए हैं ः-

हम क्या बताएं कि क्या रंग है जमाने का
कहीं अबीर कहीं है गुलाल बेलों में।
कोई निहाल कोई शाद और कोई खुश
बदल गया है जमाने का हाल होली में
निराला जमा है रंग ऐसा
कि दूर है शामें सजा मलाल होली में।
उड़ा रहे हैं अब अहले जम अबीरो गुलाल
फलक पर निकलेंगे तारे भी लाल होली में।
दुआ यह है कि अहज्ज-ओ-दोस्त ऐ बिस्मिल
खुशी में यूं कहें हर साल होली में।

इस मस्ती के मौसम में रंगों की बौछार के साथ हम भी झूमने लगते हैं। ऐसे में जब प्रियतमा भी साथ हो तो रंग कुछ ज्यादा ही चढने लगता है। लेकिन प्रियतमा का चेहरा तो घुंघट के अंदर छिपा है। ऐसे में क्या किया जाये ? बिस्मिल की प्रस्तुति देखिए ः-

उठाओ चेहरे से नकाब होली में
हिजाब और फिर ऐसा हिजाब होली में।
खुदाई भर के तो अरमान हो जायें पूरे
मेरा ही दिल न हुआ कामयाब होली में।
पलक पे छाया है उड़ उड़के आज अबीरो गुलाल
अजब नहीं जो छुपे अफताब होली में।
वह जान बूझकर मुझसे गले नहीं मिलते,
हुई है खुद ही मिट्टी खराब होली म।

कहना न होगा कि होली राष्ट्रीय एकता का प्रतीक त्योहार है। वह एकता, अपनत्व और राष्ट्रीयता का भी प्रतीक है। इन रंगों में ही इसका उद्देश्य निहित है जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। एक बानगी पेश है ः-

होली से खुदा का मतलब है,
मिल जुलकर सब रहना सीखें।
दरिया-ए-मोहब्बत में मिलकर,
लहरों की तरह बहना सीखें।
होली का मजा है मिलने में,
ऐसा जो नहीं, तो कुछ भी नहीं।
यह खूब समझते दिल में तुम,
ऐसा नहीं तो कुछ भी नहीं।
तुम एक रहो तो फिर देखो,
क्या नतीजा मिलता है इसका।
दावे से यह बिस्मिल कहता है,
दुनिया का कलेजा हिलता है।

------

रचना, आलेख एवं प्रस्तुति,

प्रो. अश्विनी केशरवानी

राघव, डागा कालोनी,

चाम्पा-४९५६७१ (छत्तीसगढ़)

इन्टरनेट
डा० कान्ति प्रकाश त्यागी

पड़ोसी श्याम लाल की लड़की ने दरवाज़ा खटखटाया,
अन्दर आओ, कैसी हो ! बिटिया रानी, मैंने फ़रमाया ।
शर्मिला धीरे से अन्दर आई ,
नमस्ते की ,ओर थोड़ा मुसकाई ।
फिर बोली अंकल!, क्या आपका इन्टरनेट चल रहा है ?.
हां बेटा,अंकल कल से हमारा सरवर नहीं मिल रहा है ।
अंकल आज़ मेरी शादी है ओर इन्टरनेट फैल हो गया ,
मैंने बहुत कोशिश की, पर सब कुछ बे मेल हो गया ।
पर बिटिया ! अचानक, यह सब कैसे हो गया ,
ई मेल के ज़रिये, एक लड़की से मेल हो गया ।
अंकल बहुत दिनों से, लंदन में एक लड़की से ई मेल चल रही थी ,
घर पर कभी कभी बिना सरवर के, यह ई मेल बेमेल चल रही थी ।
मालूम था, आपका सरवर जाता नही है ,
आपको इस कदर सताता नहीं है ।
ई मेल के ही ज़रिये , हैरी से मेल हुआ,
चैट से रोमांस बढ़ा, यू दिल फ़ैल हुआ ।
मेरे कोल्ड मेल से , उसके हाट मेल का मेल हो गया ,
पता ही नहीं चला, कब दो दिलों का मेल हो गया ।
न बाज़े गाज़ों का शोर शराबा , न रिश्तेदारों का ज़मघट ,
न शहनाई, न हलवाई ,न हल्दी न उबटन,न घुंघरू की थिरकन ।
क्या तुम्हारे मां बाप की , रज़ामंदी से है यह शादी ?.
नहीं अंकल !, दोनों हैं बड़े दकियानूस ओर रुढीवादी ।
चांद के दर पर जा पहुंचा है आज़ ज़माना ,
अंकल क्या ले बैठे ,अब तुम यह राग पुराना ।
आज़ पुरानी ज़ंज़ीरों को तोड़ चुकी हूँ ,
क्या देखूं उस घर को, जो छोड़ चुकी हूँ ।
आओ इन्टरनेट को अपना ईमान बनायें ,
जो हम से प्यार करे, हम उसके हो जायें ।
श्यामलाल की लड़की हो, समझाना मेरा धर्म ,
कुछ दाल में काला है,मैं समझा ना इसका मर्म ।
मुझे तो इन्टरनेट अर्थात अन्तर जाल, कुछ ज़ालसाज़ी जैसा लगता है ,
अंकल आप भी बाबा आदम के ज़माने के ऎसा मुझे लगता है ।
ई मेल में वायरस आते हैं , लगा तो सारा रोमांस धरा रह जायेगा ,
वह बोली अंकल परवाह नहीं, मैं हूँ ना ,सब कुछ ठीक हो जायेगा ।
समझाना बेकार था, बोल ! मुझे क्या करना है ?
अंकल बस आपको, इन्टरनेट तो खुला रखना है ।
आप मुझे हैरी के साथ इन्टर नेट पर फेरे लेते देखेंगे ,
पंडित को मंत्र पढ़ते, आपको कन्यादान देते देखेंगे ।
एक वर्ष के बाद वह लड़की फिर आई ,
मुझे देख कर ज़रा सा मुसकराई ।
अंकल ! आप ही ठीक कह रहे थे ,
मेरे प्यार की डिस्क क्रेश हो गई ,
एक छोटी से ई मेल से ही
पूरी शादी ही ट्रेस हो गई ।
आप ही के इन्टरनेट से शादी की थी ,
आप ही के इन्टरनेट से तलाक लेने आई हूँ ।
पहले भी आपने आशीर्वाद दिया था ,
आज़ भी आप से आशीर्वाद लेने आई हूँ ।
आप ने अपना धर्म निभाया, मैं अपना धर्म निभाने आई हूँ ,
शादी पर मिठाई लाई थी, तलाक पर मिर्च पकोड़े लाई हूँ ।

 



नारी

डॉ. महेंद्र भटनागर


चिर-वंचित, दीन, दुखी बंदिनि!
तुम कूद पड़ीं समरांगण में,
भर कर सौगंध जवानी की
उतरीं जग-व्यापी क्रंदन में,
युग के तम में दृष्टि तुम्हारी
चमकी जलते अंगारों-सी,
काँपा विश्व, जगा नवयुग, हृत-
पीड़ित जन-जन के जीवन में!


अब तक केवल बाल बिखेरे
कीचड़ और धुएँ की संगिनि
बन, आँखों में आँसू भर कर
काटे घोर विपद के हैं दिन,
सदा उपेक्षित, ठोकर-स्पर्शित
पशु-सा समझा तुमको जग ने,
आज भभक कर सविता-सी तुम
निकली हो बन कर अभिशापिन!


बलिदानों की आहुति से तुम
भीषण हड़कम्प मचा दोगी,
संघर्ष तुम्हारा नहीं रुकेगा
त्रिभुवन को आज हिला दोगी,
देना होगा मूल्य तुम्हारा
पिछले जीवन का ऋण भारी,
वरना यह महल नये युग का
मिट्‌टी में आज मिला दोगी!


समता का, आज़ादी का नव-
इतिहास बनाने को आयीं,
शोषण की रखी चिता पर तुम
तो आग लगाने को आयीं,
है साथी जग का नव-यौवन,
बदलो सब प्राचीन व्यवस्था,
वर्ग-भेद के बंधन सारे
तुम आज मिटाने को आयीं!


--------------------------------------

(चित्र - कलाकृति : रेखा)

कविता

-राजेन्द्र अविरल

होली मन की उमंग

होली के संग
लो मची है हु़ड़दंग
पी के चले अब भंग
छाई मृदुल तरंग
सब रंग ही रंग
भीगा सारा अंग -अंग
पिया नाचे संग -संग
डोला मन का मतंग
हो रहे है सब दंग
छोड़ो अब सारी जंग
उठी जीवन तरंग
उड़ी फिर से पतंग
होली मन की उमंग
होली मन की उमंग...

-----

आओ होली मनाएं...

होली के बहाने
देश में अब आए दिन मन रही है होली
जल रहा, किसी का घर
तो क हीं चल रही बंदूक से गोली
दीवाली भी यदाकदा मन जाती मेरे देश में
धमाकों के शोर में, सब कुछ दब सा जाता है
सनसनी तो आए दिन फैलती ही रहती है
जिस्म मे मेरे ,दहशत की
रंगों की जगह खून भी बहता रहता है
मेरे देश वासियों के जिस्म से
होली के बहाने आओ आज,
फिर से गले लग जाएं.
गोली के बहाने छोड़ ,
ह्म फिर से दीवाने बन जाएं.
माना कि दीवारें मिट्टी की
खींची है जमीं के टु़कड़े पर
दिल की दीवारें ,आज मिटाएं
आओ, गले मिलें ,फिर..होली मनाएं...


कविता-कथा


1.महलों की रानी


सीमा सचदेव


एक कहानी बड़ी पुरानी


आज सुनो सब मेरी जुबानी


विशाल सिन्धु का पानी गहरा


टापू एक वहाँ पर ठहरा



छोटा सा टापू था प्यारा


कुदरत का अदभुत सा नजारा


स्वर्ग से सुन्दर उस टापू पर


मछलियाँ आ कर बैठती अकसर



धूप मे अपनी देह गर्माने


टाप पे बैठती इसी बहाने


उस पर इक जादू का महल था


जिसका किसी को नहीं पता था



चाँद की चाँदनी में बाहर आता


और सुबह होते छुप जाता


उसको कोई भी देख न पाता


न ही किसी का उससे नाता



इक दिन इक भूली हुई मछली


रात को टापू की राह पे चल दी


सोचा रात वही पे बिताए


और सुबह होते घर जाए



देखा उसने अजब नजारा


चमक रहा था टापू सारा


सुन्दर सा इक महल था उस पर


फूल सा चाँद भी खिला था जिस पर



देख के उसको हुई हैरानी


पर मछली थी बड़ी सयानी


जाकर खड़ी हुई वह बाहर


पूछा ! बोलो कौन है अन्दर



क्यों तुम दिन मे छिप जाते हो?


नज़र किसी को नही आते हो?


अन्दर से आई आवाज़


खोला उसने महल का राज



रानी के बिन सूना ये महल


इसलिए रक्षा करता है जल


ढक लेता इसे दिन के उजाले


क्योंकि दुनिया के दिल काले


..................


..................


मछली रानी बड़ी सयानी


समझ गई वो सारी कहानी


चली गई वो महल के अन्दर


अब न रहेगा महल भी खण्डहर


.....................


......................


मछली बन गई महल की रानी


अब न रक्षा करेगा पानी


महल को मिल गई उसकी रानी


खत्म हो गई मेरी कहानी


*************************************


संपर्क:


सीमा सचदेव(एम.ए.हिन्दी,म्.एड.,पी.जी.डी.सी.टी.टी.एस.,ज्ञानी)


७ए,३र क्रॉस,रामान्जन्या ले आऊट,
माराथली ,
बैंगलोर-५६००३७



1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
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